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अहमदाबाद में ‘ग्रीन बेल्ट’ बढ़ाने की तैयारी में है कॉन्ग्रेस? हिंदू बहुल इलाकों में मुस्लिम उम्मीदवार उतारने के फैसले ने गुजरात की राजनीति में छेड़ी नई बहस

अहमदाबाद के मणिनगर और पालडी जैसे इलाकों में मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देकर कॉन्ग्रेस क्या नया राजनीतिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रही है, इस पर चर्चा तेज।

हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों के बाद गुजरात की राजनीति में कई तरह के विवाद देखने को मिले हैं। खास तौर पर अहमदाबाद नगर निगम चुनाव में कॉन्ग्रेस की टिकट बांटने की रणनीति ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। चुनाव के दौरान यह चर्चा तेज रही कि कॉन्ग्रेस ने हिंदू बहुल इलाकों में मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर एक नया और विवादित राजनीतिक प्रयोग किया है।

अगर चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो कॉन्ग्रेस की यह रणनीति ज्यादा असरदार साबित नहीं हुई। राज्यभर में कॉन्ग्रेस के 2223 उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए। इसे इस बात के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है कि जनता ने कॉन्ग्रेस की इस राजनीति को स्वीकार नहीं किया।

हालाँकि मणिनगर और पालडी जैसे इलाकों में किए गए ये प्रयोग आगे की राजनीति को लेकर नई बहस जरूर खड़ी कर रहे हैं। कॉन्ग्रेस ने पालडी जैसे अहम इलाके से फाहेजबानो और मणिनगर वार्ड से फारूक शेख को टिकट देकर राजनीतिक हलकों में चर्चा बढ़ा दी।

आमतौर पर राजनीतिक दल किसी भी क्षेत्र में उम्मीदवार चुनते समय वहाँ की आबादी और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस के इस फैसले को कई लोग एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर देख रहे हैं। इसी वजह से अब इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है।

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस रणनीति के पीछे तथाकथित ‘ग्रीन बेल्ट’ की सोच काम कर रही है। पहले कॉन्ग्रेस का प्रभाव मुख्य रूप से जमालपुर और दानिलिम्दा जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों तक सीमित माना जाता था, लेकिन अब पार्टी पश्चिमी अहमदाबाद के हिंदू बहुल क्षेत्रों में भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती दिख रही है।

इसे केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि शहर की बदलती सामाजिक और राजनीतिक तस्वीर से जोड़कर देखा जा रहा है। अब तक यह आरोप लगाए जाते रहे हैं कि अहमदाबाद के कुछ इलाकों में एक खास पक्ष द्वारा संपत्ति खरीद के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ाई जा रही है।

वहीं अब विपक्षी दलों का आरोप है कि कॉन्ग्रेस इस मुद्दे को राजनीतिक समर्थन देने की कोशिश कर रही है। उनका कहना है कि अगर किसी क्षेत्र का पार्षद मुस्लिम समुदाय से होगा, तो वह अपने समुदाय के लोगों को वहाँ बसने या संपत्ति खरीदने में मदद कर सकता है। इसी आधार पर कुछ लोग भविष्य में इलाकों की जनसंख्या संरचना बदलने की आशंका भी जता रहे हैं।

एलिसब्रिज के विधायक ने चेतावनी दी

एलिसब्रिज के विधायक अमित शाह ने भी सोशल मीडिया के जरिए इस मुद्दे पर लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस हिंदू बहुल इलाकों में एक विशेष समुदाय का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है।

साथ ही उन्होंने यह आशंका भी जताई कि अगर ऐसे क्षेत्रों में मुस्लिम पार्षद चुने जाते हैं, तो इसका वहाँ के सामाजिक माहौल और लंबे समय से चली आ रही सांस्कृतिक पहचान पर असर पड़ सकता है।

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, यह पूरी रणनीति ‘ब्लॉक वोटिंग’ के आधार पर काम करती है। उनका कहना है कि मुस्लिम मतदाता अक्सर संगठित तरीके से बड़ी संख्या में मतदान करते हैं, जबकि कई हिंदू बहुल इलाकों में मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत कम रहता है।

ऐसे में अगर मतदाता यह सोचकर मतदान से दूर रहते हैं कि उनका क्षेत्र पहले से किसी एक दल का मजबूत गढ़ है, तो चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। इसी वजह से अब इन चुनाव नतीजों को लेकर राजनीतिक बहस और भी तेज हो गई है।

क्या कॉन्ग्रेस सिर्फ मुसलमानों के लिए है?

विपक्षी दलों और कई राजनीतिक टिप्पणीकारों का आरोप है कि कॉन्ग्रेस अब अपनी राजनीति में मुस्लिमों को ज्यादा प्राथमिकता देती नजर आ रही है। इसी बहस के बीच एक हिंदू कॉन्ग्रेस विधायक के दरगाह जाकर चुनाव जीतने की मन्नत माँगने की खबर भी चर्चा में रही।

ऐसे मामलों को लेकर विरोधी दल यह दावा कर रहे हैं कि कॉन्ग्रेस वोट बैंक की राजनीति के लिए अपनी पारंपरिक छवि और राजनीतिक संतुलन से समझौता कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर कॉन्ग्रेस की यह रणनीति आगे सफल होती है, तो भविष्य में कई हिंदू बहुल इलाके राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ सकते हैं।

उनका मानना है कि इससे स्थानीय प्रतिनिधित्व और सामाजिक संतुलन को लेकर नई बहस खड़ी हो सकती है। कुछ लोग यह भी आशंका जता रहे हैं कि जनसंख्या और राजनीतिक समीकरणों में बड़े बदलाव भविष्य में सामाजिक तनाव बढ़ा सकते हैं, जिसका असर शहर के माहौल और आपसी सौहार्द पर पड़ सकता है।

राज्यभर में कॉन्ग्रेस के 2223 उम्मीदवारों की जमानत जब्त होना भी राजनीतिक चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है। भाजपा और उससे जुड़े संगठनों का कहना है कि यह सिर्फ चुनावी हार नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस की रणनीति के खिलाफ जनता की नाराजगी का संकेत है।

उनका दावा है कि लोग अब विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक और सामाजिक मुद्दों को भी गंभीरता से देखने लगे हैं। इसी वजह से कॉन्ग्रेस की इस नई चुनावी रणनीति ने भाजपा और हिंदू संगठनों को भी अधिक सतर्क कर दिया है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)



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લિંકન સોખડિયા
લિંકન સોખડિયા
Journalist | Editor | Multimedia Producer Bridging the gap between ground reality and digital storytelling. Specializing in hard-hitting regional news, investigative reports, and high-impact digital media production.

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