भारत के सबसे छोटे केंद्रशासित प्रदेश लक्षद्वीप में 47 वर्षों बाद शराब नीति में बड़ा बदलाव किया गया है। केंद्र सरकार ने 1979 से लागू शराबबंदी कानून को समाप्त करते हुए नया आबकारी ढाँचा लागू कर दिया है। इसके साथ ही अब लक्षद्वीप में लाइसेंस प्राप्त प्रतिष्ठानों के माध्यम से शराब की नियंत्रित बिक्री का रास्ता खुल गया है।
पहली नजर में यह फैसला केवल शराब से जुड़ा प्रशासनिक निर्णय दिखाई दे सकता है, लेकिन यदि इसके पीछे के घटनाक्रम को देखा जाए तो यह कदम पर्यटन, निवेश, बुनियादी ढाँचे, राष्ट्रीय सुरक्षा और लक्षद्वीप के भविष्य के विकास मॉडल से जुड़ा हुआ नजर आता है।
पिछले कुछ वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार ने लक्षद्वीप को लेकर जिस प्रकार का दृष्टिकोण अपनाया है, उससे स्पष्ट है कि सरकार इस द्वीप समूह को केवल एक दूरस्थ केंद्रशासित प्रदेश के रूप में नहीं बल्कि भारत के भविष्य के प्रमुख समुद्री पर्यटन और सामरिक केंद्र के रूप में विकसित करना चाहती है।
शराब नीति में बदलाव उसी व्यापक रणनीति का एक हिस्सा माना जा रहा है। लक्षद्वीप 36 द्वीपों का समूह है, जिनमें से केवल 10 द्वीपों पर आबादी रहती है। अरब सागर में स्थित यह क्षेत्र भारत की समुद्री सुरक्षा, ब्लू इकोनॉमी, समुद्री व्यापार और पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
प्राकृतिक सुंदरता के मामले में इसकी तुलना अक्सर मालदीव से की जाती है। इसके बावजूद दशकों तक यह क्षेत्र पर्यटन और निवेश के मामले में अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाया।
नए कानून में क्या प्रावधान किए गए हैं?
5 जून 2026 को जारी अधिसूचना के माध्यम से 1979 का कानून समाप्त कर दिया गया और उसकी जगह लक्षद्वीप आबकारी विनियमन-2026 लागू किया गया। नए नियमों के तहत शराब के निर्माण, आयात, निर्यात, परिवहन, बिक्री, खरीद और उपभोग को लाइसेंस आधारित प्रणाली के माध्यम से नियंत्रित किया जाएगा।
सरकार ने साथ ही यह भी सुनिश्चित किया है कि शराब की उपलब्धता पूरी तरह अनियंत्रित न हो जाए। विदेशी शराब और IMFL पर 400 प्रतिशत तक एक्साइज ड्यूटी लगाई गई है। बीयर पर 200 प्रतिशत तथा वाइन पर 80 प्रतिशत कर लगाया गया है।
21 वर्ष से कम आयु के लोगों को शराब बेचना प्रतिबंधित रहेगा। इसके अलावा प्रशासक को विशेष अधिकार दिए गए हैं, जिनके तहत वह किसी भी द्वीप में शराब की बिक्री पर रोक लगा सकता है, खरीद की सीमा तय कर सकता है या आवश्यकता पड़ने पर पुनः प्रतिबंध लागू कर सकता है।
स्पष्ट रूप से सरकार का उद्देश्य शराब को बढ़ावा देना नहीं बल्कि पर्यटन क्षेत्र के लिए नियंत्रित और विनियमित व्यवस्था तैयार करना है।
1979 में शराबबंदी क्यों लागू की गई थी?
लक्षद्वीप में शराबबंदी का इतिहास 1979 से जुड़ा हुआ है। उस समय लक्षद्वीप निषेध विनियमन लागू किया गया था, जिसके तहत शराब के निर्माण, बिक्री और उपभोग पर व्यापक प्रतिबंध लगा दिया गया। इस निर्णय के पीछे सबसे बड़ा कारण वहाँ की मजहबी संरचना थी। 2011 की जनगणना के अनुसार, लक्षद्वीप की लगभग 97 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है।
यह देश का सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला केंद्रशासित प्रदेश है। साथ ही यहाँ की लगभग 95 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजाति वर्ग में आती है। चूँकि इस्लाम में शराब के सेवन को निषिद्ध माना जाता है, इसलिए उस समय की सरकारों और प्रशासनों ने यह माना कि उनकी मजहबी परंपराओं के अनुरूप शराबबंदी लागू रहनी चाहिए।
धीरे-धीरे यह कानून लक्षद्वीप की पहचान का हिस्सा बन गया। कई स्थानीय संगठन, धार्मिक समूह और राजनीतिक दल भी इसका समर्थन करते रहे। उनका तर्क था कि शराब की उपलब्धता बढ़ने से सामाजिक समस्याएँ और अपराध बढ़ सकते हैं।
क्या लक्षद्वीप पूरी तरह ड्राई क्षेत्र था?
इस्लामी अक्सर लक्षद्वीप को पूर्ण शराबमुक्त क्षेत्र बताते रहे, लेकिन वास्तविकता थोड़ी अलग थी। प्रतिबंध लागू होने के बावजूद कुछ पर्यटन स्थलों और रिसॉर्ट्स को विशेष छूट प्राप्त थी। बंगाराम द्वीप जैसे पर्यटन केंद्रों में आने वाले विदेशी और भारतीय पर्यटकों के लिए शराब उपलब्ध कराई जाती थी।
कुछ सरकारी व्यवस्थाओं के तहत भी सीमित स्तर पर शराब की अनुमति थी। यानी स्थानीय के लिए शराबबंदी लागू थी, लेकिन पर्यटन उद्योग के लिए पहले से ही अपवाद मौजूद थे। इसी कारण वर्तमान नीति परिवर्तन को पूरी तरह नई व्यवस्था नहीं माना जा रहा। सरकार ने पहले से मौजूद सीमित छूट को अधिक पारदर्शी, व्यवस्थित और कानूनी ढाँचे में बदल दिया है।
2020 में प्रशासक प्रफुल्ल खोड़ा पटेल की नियुक्ति के बाद लक्षद्वीप में कई प्रशासनिक सुधारों की शुरुआत हुई। पर्यटन विकास, भूमि उपयोग, स्वास्थ्य सुविधाएँ, स्थानीय प्रशासन, मत्स्य उद्योग और निवेश से जुड़े अनेक प्रस्ताव सामने आए। इन्हीं सुधारों के दौरान शराब नीति में बदलाव की चर्चा भी शुरू हुई।
2021 में पर्यटन प्रतिष्ठानों तक शराब सेवा का विस्तार करने का प्रस्ताव सामने आया। इसके बाद 2023 में नया आबकारी मसौदा जारी किया गया। अंततः 2026 में यह नीति कानून का रूप ले सकी। यानी वर्तमान फैसला अचानक नहीं बल्कि छह वर्षों से चल रही प्रक्रिया का परिणाम है।
पर्यटन के लिए क्यों जरूरी है यह बदलाव?
मोदी सरकार के इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा कारण पर्यटन को माना जा रहा है। लक्षद्वीप प्राकृतिक सुंदरता, समुद्री जैव विविधता, कोरल रीफ, स्कूबा डाइविंग, स्नॉर्कलिंग और समुद्री पर्यटन के लिए विश्वस्तरीय क्षमता रखता है। इसके बावजूद दशकों तक यहाँ पर्यटकों की संख्या बेहद सीमित रही।
सरकार का मानना है कि यदि लक्षद्वीप को मालदीव, मॉरीशस, सेशेल्स और अन्य अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थलों के समकक्ष खड़ा करना है तो पर्यटन क्षेत्र को आधुनिक सुविधाएँ प्रदान करनी होंगी। आज दुनिया के अधिकांश समुद्री पर्यटन केंद्रों में पर्यटकों के लिए नियंत्रित शराब व्यवस्था मौजूद है। होटल उद्योग और पर्यटन निवेशक भी इसी प्रकार के ढाँचे की अपेक्षा करते हैं।
केंद्र सरकार का तर्क है कि यदि लक्षद्वीप को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करना है तो उसे अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के अनुरूप तैयार करना होगा। हालाँकि फैसले के प्रस्ताव से लेकर फैसले पर मुहर लगाने तक इस्लामी-लेफ्ट लेबरल गैंग इसका विरोध ही करते रहे हैं। ये कोई नई बात भी नहीं है यहाँ की मुस्लिम बहुल आबादी विकास के मार्ग में हमेशा बाधा ही बनी है।
लक्ष्यदीप में विकास कार्यों का विरोध करते रहे हैं इस्लामी-लेफ्ट लिबरल गैंग
लक्षद्वीप में शराब नीति में बदलाव की प्रक्रिया 2020 में प्रशासक प्रफुल खोड़ा पटेल के कार्यभार संभालने के बाद तेज हुई। प्रशासन का मानना था कि यदि द्वीप समूह को बड़े पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करना है तो वहाँ पर्यटन उद्योग से जुड़े कुछ नियमों में बदलाव आवश्यक होंगे।
इसी सोच के तहत 2021 में आबादी वाले द्वीपों पर स्थित पर्यटन प्रतिष्ठानों में भी शराब परोसने का प्रस्ताव सामने आया। हालाँकि इस प्रस्ताव का स्थानीय वामपंथी दलों और मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया। विरोध करने वालों का कहना था कि शराब की उपलब्धता बढ़ने से सामाजिक समस्याएँ बढ़ सकती हैं और द्वीपों की पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित हो सकती है।
हालाँकि वर्ष 2023 में लक्षद्वीप के लिए नए आबकारी ढाँचे का मसौदा जारी किया गया, जिसमें लाइसेंस आधारित व्यवस्था का प्रस्ताव रखा गया था। इसके बाद फरवरी 2026 में चेतलात और बित्रा द्वीपों पर स्थित सरकारी विश्राम गृहों को ऐसे लाइसेंस प्राप्त परिसरों के रूप में अधिसूचित किया गया, जहाँ निर्धारित नियमों के तहत शराब परोसी जा सकती थी।
शराबबंदी को लेकर होने वाली चर्चा अक्सर मजहबी दृष्टिकोण से जुड़ी रही है, क्योंकि इस्लाम में शराब सेवन की मनाही है। हालाँकि केंद्र सरकार और प्रशासन का तर्क है कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में शराब की वैधता कोई नई बात नहीं है।
जम्मू-कश्मीर में वर्षों से शराब की बिक्री कानूनी है, जबकि मालदीव समेत कई मुस्लिम बहुल देशों में भी पर्यटन क्षेत्रों में नियंत्रित तरीके से शराब उपलब्ध कराई जाती है। केंद्र सरकार का मानना है कि पूरी तरह प्रतिबंध की बजाय कड़े नियंत्रण और सख्त नियमों वाली व्यवस्था पर्यटन उद्योग के लिए अधिक व्यावहारिक होगी।
सरकार के अनुसार, नए नियमों का उद्देश्य शराब को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि पर्यटन और आतिथ्य क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विकसित करना है। प्रशासन का कहना है कि इस प्रक्रिया में सभी निर्णय नियंत्रित और विनियमित ढाँचे के भीतर ही लागू किए जाएँगे, फिर भी इसका विरोध जारी ही है।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान लक्षद्वीप में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित कई सुधारों और विकास परियोजनाओं का विरोध देखने को मिला है। प्रशासनिक सुधारों, भूमि उपयोग नीति, पर्यटन विस्तार, शराब नीति और रक्षा परियोजनाओं जैसे अनेक मुद्दों पर स्थानीय स्तर पर विरोध दर्ज किया गया। कई मामलों में कोर्टों का दरवाजा भी खटखटाया गया।
केरल हाई कोर्ट ने 28 मई, 2021 को लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण विनियमन (एलडीएआर) 2021, असामाजिक गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम (PASA) के मसौदे के कार्यान्वयन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। दरअसल लक्षद्वीप प्रशासन ने गोमांस प्रतिबंध सहित अन्य प्रशासनिक उपायों को पेश किया था।
इसके बाद केंद्र सरकार द्वारा लाए गए सुधारों के खिलाफ कॉन्ग्रेस नेता केपी नौशाद अली ने केरल हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। कॉन्ग्रेस नेता ने याचिका में दावा किया था कि प्रशासन इस नियम के जरिए अरब सागर में स्थिति इस द्वीप समूह की अनूठी संस्कृति और परंपरा को नष्ट करने की कोशिश कर रहा है।
कॉन्ग्रेस नेता की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने इसे नीतिगत मामला बताया और सभी हितधारकों से कोर्ट के साथ अपने विचार साझा करने को कहा। लक्षद्वीप के नए प्रशासक प्रफुल खोड़ा पटेल द्वारा नए सुधारों और नए नियमों को लाने का आदेश जारी करने के बाद से इस केंद्रशासित प्रदेश में सियासी भूचाल आ गया था।
लक्षद्वीप के प्रशासक प्रफुल खोड़ा द्वारा द्वारा किए जा रहे प्रशासनिक सुधारों का कॉन्ग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों ने कड़ा विरोध किया था।
उनका दावा था कि नए नियम द्वीप पर रहने वाली मुस्लिम आबादी की मजहबी भावनाओं को आहत करेंगे। लक्षद्वीप के सांसद मोहम्मद फैजल सहित विपक्षी दलों ने दावा किया था कि नए सुधारों का उद्देश्य द्वीपों की ‘अद्वितीय संस्कृति और परंपरा को नष्ट करना’ है। इसी प्रकार बित्रा द्वीप से जुड़ी योजनाओं और अन्य विकास परियोजनाओं पर भी विरोध सामने आया।
प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के बाद कैसे बदली तस्वीर?
जनवरी 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लक्षद्वीप दौरा इस पूरे अभियान का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। प्रधानमंत्री ने समुद्र तटों, समुद्री गतिविधियों और स्थानीय संस्कृति से जुड़ी तस्वीरें साझा कीं। इसके बाद देशभर में लक्षद्वीप को लेकर जबरदस्त उत्सुकता पैदा हुई। बड़ी संख्या में लोगों ने लक्षद्वीप को पर्यटन स्थल के रूप में देखना शुरू किया।
आँकड़े बताते हैं कि कुछ वर्षों में पर्यटकों की संख्या कई गुना बढ़ गई। RTI डाटा के मुताबिक, 2020 में जहाँ लक्षद्वीप में मात्र 3875 पर्यटक आए थे, वहीं 4 साल बाद यानी 2024 में यह संख्या बढ़कर 68328 हो गई। 2023 में यहाँ 46551 पर्यटक आए थे जो एक साल बाद 68328 हो गए यानी करीब 47 फीसदी का इजाफा हुआ।
यह लगभग 47 प्रतिशत की वृद्धि है। सबसे बड़ा उछाल प्रधानमंत्री मोदी के जनवरी 2024 के दौरे के बाद दर्ज किया गया। केंद्र सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई साल पहले से प्रयास शुरू कर दिए थे। केंद्र सरकार ने इसे संकेत के रूप में देखा कि यदि पर्याप्त सुविधाएँ विकसित की जाएँ तो लक्षद्वीप भारत का सबसे बड़ा समुद्री पर्यटन केंद्र बन सकता है।
नए फैसले पर क्या है सरकार का पक्ष?
बता दें कि लक्षद्वीप लंबे समय तक विकास की मुख्यधारा से दूर रहा। जब भी पर्यटन, निवेश, आधारभूत संरचना या प्रशासनिक सुधारों की बात होती है, तब इस्लामी और लेफ्ट लिबरल गैंग धार्मिक या राजनीतिक विवाद का विषय बनाने की कोशिश करते हैं।
सरकार का पक्ष यह है कि विकास और मजहबी पहचान को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यदि पर्यटन बढ़ेगा, निवेश आएगा, होटल उद्योग विकसित होगा और रोजगार के अवसर पैदा होंगे तो उसका लाभ सबसे अधिक स्थानीय युवाओं को ही मिलेगा।
केंद्र सरकार यह भी मानती है कि लक्षद्वीप को केवल उसकी मजहबी पहचान तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारत का एक रणनीतिक, आर्थिक और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसे देश के अन्य विकसित क्षेत्रों के समान अवसर मिलने चाहिए।
इसी व्यापक सोच के तहत मोदी सरकार पर्यटन विस्तार, रक्षा अवसंरचना, प्रशासनिक सुधार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है। 47 साल बाद शराब नीति में किया गया बदलाव भी इसी बड़ी विकास रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।


