पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी की पार्टी TMC लगभग टूट की कगार पर खड़ी है। अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स में यह बात सामने आ रही है कि ममता बनर्जी के विरोध में विधायकों और सांसदों के बड़े-बड़े गुट बन गए हैं। कई राज्यसभा सांसद एक के बाद एक इस्तीफा दे रहे हैं। गुरुवार (11 जून 2026) तक शुखेंदु शेखर, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक इस्तीफा दे चुके हैं।
अनुमान लगाया जा रहा है कि TMC से टूट के बाद ये नेता बड़ी संख्या में सत्तारूढ़ BJP का रुख कर सकते हैं। चुनावी हार के बाद से ही लगातार TMC के कई नेताओं, प्रवक्ताओं और सांसदों का रुख बदला हुआ है। BJP को लेकर दिखने वाला उनका आक्रामक रुख शांत है और कई तो BJP सरकार और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की तारीफ भी कर चुके हैं।
ऐसे में यदि चुनावी हार के बाद बड़ी संख्या में TMC के नेता भाजपा (BJP) की ओर आते हैं तो यह भाजपा के लिए जितना अवसर है, उतनी ही बड़ी चुनौती या कहें तो परीक्षा भी है। सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि TMC से कौन BJP में आ रहा है बल्कि यह है कि वे अपने साथ क्या लेकर आ रहे हैं- अनुभव या वही पुराना तंत्र?
किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनाव जीतना जरूरी होता है। लोकतंत्र में संख्या मायने रखती है। BJP को केंद्र की सरकार चलानी है, कई महत्वपूर्ण विधेयक (Bills) पास कराने हैं, संगठन को मजबूत करना है, स्थानीय स्तर पर पकड़ बनानी है और इन सबके लिए अनुभवी नेताओं और प्रभावशाली चेहरों की जरूरत पड़ती है।
इन्हीं वजहों से विपक्षी दलों के नेताओं को पार्टी में शामिल किया जाता है या उनका समर्थन लिया जाता है। BJP को इसकी जरूरत दिखाई भी पड़ रही है। लेकिन यहीं BJP को सँभालने की भी जरूरत है। कुछ दिनों पहले बंगाल के BJP के मंत्री स्वपन दासगुप्ता भी यही चिंता जता चुके हैं।
स्वपन दासगुप्ता ने X पर एक पोस्ट में लिखा था, “मैं TMC की इस खुद की बर्बादी पर कोई दुख या अफसोस नहीं जताता। मेरी बस यही उम्मीद है कि इन उपद्रवी लोगों की राजनीतिक संस्कृति पश्चिम बंगाल BJP को खराब न करने लगे।”
उन्होंने लिखा था, “बीजेपी में हमें हमेशा ऐसे झूठे दोस्तों से सावधान रहना होगा, जो आज अपने पुराने पाप और गलतियाँ छिपाने या धोने के लिए हमारे करीब आने की कोशिश कर रहे हैं। बंगाल को इस खराब राजनीतिक माहौल से पूरी तरह बाहर निकालने का काम अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता।”
I shed no tears for the TMC’s self-destruction. My only hope is that the political culture of the vandals doesn’t start contaminating the W.Bengal BJP. We in the BJP have to be always wary of false friends who are today cosying up to us because they need to wash away their past…
— Swapan Dasgupta (@swapan55) June 4, 2026
स्वपन दासगुप्ता की यह चिंता बेजा नहीं है। क्योंकि पश्चिम बंगाल में लोगों की नाराजगी केवल किसी एक पार्टी से नहीं रही बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति से रही है जिसमें स्थानीय स्तर पर पार्टी का मतलब ही प्रशासन बन जाना, गुंडई करना, राजनीतिक विरोध को दबाना और संगठन का डर पैदा करना शामिल रहा है।
लेफ्ट शासन के दौरान ‘कैडर राज’ खूब चर्चा में रहा। बाद में TMC पर भी वही आरोप लगे कि उसने केवल झंडा बदला लेकिन तरीका नहीं। ऐसे में यदि BJP खुद को एक वैकल्पिक शक्ति के रूप में पेश करती है तो उसके सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि वह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि राजनीतिक संस्कृति परिवर्तन का भरोसा दे।
TMC के जिन नेताओं के भाजपा में आने की चर्चा होती है, उनमें कई ऐसे होते हैं जो वर्षों तक उसी व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं जिसकी आलोचना BJP करती रही है। इनमें से कुछ पर स्थानीय दबंगई, भ्रष्टाचार, राजनीतिक हिंसा या अवसरवाद के आरोप भी लगे होते हैं। ऐसे नेताओं को बिना किसी राजनीतिक या नैतिक फिल्टर के पार्टी में शामिल करने से खतरा पैदा होने की संभावना है।
संगठन का मूल कार्यकर्ताओं के हाशिए पर जाने की तो चिंताएँ रहेंगी ही लेकिन सबसे बड़ी चिंता होगी उसी कल्चर के लौट आने की। भाजपा सत्ता में आई है और मान लीजिए कि नेतृत्व के केंद्र में फिर वे ही लोग आ जाते हैं जो पहले TMC की स्थानीय सत्ता संरचना का हिस्सा थे। तब क्या गारंटी है कि वही ‘सिस्टम’ वापस नहीं आएगा।
कई बार राजनीति में लोग विचारधारा नहीं, सत्ता के हिसाब से दल बदलते हैं। ऐसे नेताओं की प्राथमिकता अक्सर संगठन नहीं बल्कि अपना प्रभाव बनाए रखना होती है। अगर उन्हें बिना शर्त जगह मिलती है, तो वे अपने पुराने नेटवर्क, पुराने तौर-तरीके और पुराने समीकरण भी साथ लाते हैं।
यह कहना भी व्यावहारिक नहीं होगा कि किसी भी दूसरे दल के व्यक्ति को BJP में नहीं आना चाहिए। लोकतंत्र में राजनीतिक बदलाव स्वाभाविक है। कई नेता सचमुच विचार बदलकर आते हैं। कई लोग किसी पार्टी की गलतियों से निराश होकर नया रास्ता चुनते हैं। लेकिन BJP को सतर्कता तो बरतनी ही होगी।
BJP को यह याद रखना होगा कि बंगाल के लोगों ने केवल एक पार्टी बदलने के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक तंत्र बदलने की उम्मीद में विकल्प तलाशा है। अगर वही चेहरे, वही मानसिकता और वही सत्ता संस्कृति नए झंडे के नीचे लौट आई तो BJP के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इसलिए बीजेपी को इसका ध्यान रखना होगा कि अगर नेता आएँ भी तो वो तंत्र ना लौट आए जिससे लोग दशकों तक परेशान होकर BJP को सत्ता में लाए हैं।


