हम एक अजीब समय में जी रहे हैं जहाँ कॉमेडी और विवाद का रिश्ता हिंसक हो गया है। इन दिनों स्टैंड-अप कॉमेडी सर्किट में ऐसी घटनाएँ आम हो गई हैं जहाँ ‘मजाक’ के नाम पर सीमाएँ तोड़ी जाती हैं, अपमान किया जाता है और फिर हल्के-फुल्के अंदाज में क्षमा माँग ली जाती है।
प्रणित मोरे का 370 रुपए की बिरयानी वाला विवाद इसी का ताजा उदाहरण है। शो में एक ऑडियंस मेंबर को लेकर जो कंटेंट बना, उसमें एक महिला के प्रति अपेक्षा और एंटाइटलमेंट का संदेश दिया गया। जब इस पर आलोचना हुई, तो मोरे ने दूसरी माफी जारी की और कहा कि इंस्टाग्राम सस्पेंड होने से वह बात नहीं कर सके, लेकिन यह केवल एक घटना नहीं है।
दरअसल प्रणीत मोरे के शो में गुरुग्राम के युवक हिमांशु जांगरा ने महिलाओं पर अश्लील टिप्पणी की थी। शो में सामने आई क्लिप में हिमांशु जांगरा ने अपनी से बड़ी महिला के साथ डेटिंग का एक किस्सा सुनाया।
हिमांशु ने कहा कि वह उसे डेट पर ले गया और ₹370 की बिरयानी खिलाई और जब वह लड़की जाने लगी तो हिमांशु ने सोचा कि बिरयानी के ₹370 तो वसूले ही नहीं। वसूलने से हिमांशु का मतलब यहाँ लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाना था।
इसके बाद प्रणीत मोरे के शो से जुड़ा एक और विवाद सामने आया। शो में एक सेजल पवार नाम की डॉक्टर को मृत पुरुषों के गुप्तांग का मजाक बना रही थी। शो में सेजल पवार कहती है कि वह मुंबई के KEM अस्पताल में काम करती है, यहाँ अस्पताल में वे और उनकी साथी मृत पुरुषों के शवों का गुप्तांग का साइज की तुलना कर मजाक उड़ाती हैं।
ऐसे ही मधुर विरली के एक पुराने स्टैंड-अप क्लिप में रेप और मर्डर को लेकर जोक दिखा, जहाँ वह बताते हैं कि कैसे एक आदमी रेप के बाद किसी को चाकू मार देता है क्योंकि महिला क्डल (Cuddle) करना चाहती है। इसके बाद सोशल मीडिया पर सेलिब्रिटीज ने इस जोक को अपमानजनक बताया और विरली ने अपना इंस्टाग्राम अकाउंट डिएक्टिवेट कर दिया।
अगर आप को याद हो तो इस से भी बड़ा और गंभीर विवाद रहा रणवीर अल्लाहबादिया का समय रैना के शो ‘इंडिया गॉट लेटेंट’ पर की गई अपमानजनक टिप्पणी। महिला कंटेस्टेंट से उन्होंने एक ऐसा सवाल किया जो अभद्र, अपमानजनक और संवेदनशील था। इसके बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में हस्तक्षेप किया, कई FIR दर्ज हुईं और सेलिब्रिटीज ने उनका साथ छोड़ दिया।
वह चक्र जो दोहराया जा रहा है
यह दिलचस्प है कि हर बार एक ही पैटर्न दिखता है, विवादास्पद कंटेंट, वायरल क्लिप, सोशल मीडिया आउटरेज, आधिकारिक माफी और फिर क्या होता है? टिकट की कीमत बढ़ जाती है। शो की डिमांड बढ़ जाती है। कॉमेडियन फेमस हो जाता है।
समाज को यह भुलाने में कितना समय लगता है? कुछ महीने। और फिर क्या होता है? इन्हीं विवादों को लेकर अलग-अलग डेडिकेटेड शो बना दिए जाते हैं। यूट्यूब पर क्लिप दिखाई जाते हैं, विचार-विमर्श वाले शो बनते हैं। विचार आता है – यह कितना गलत था, देखो, क्या बोल गया। और इसी बहाने से दर्शक फिर से लौट आता है।
समाज का सहयोग: हम ही विलेन
यहीं आता है सबसे महत्वपूर्ण सवाल – क्या हम इन कॉमेडियन्स को इसी तरह फेमस बनाने के लिए जिम्मेदार नहीं हैं? जब हम इनके शो में जाते हैं, टिकट खरीदते हैं, उनके यूट्यूब वीडियो देखते हैं, सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं, तो क्या हम उन्हें वैलिडेशन नहीं दे रहे हैं? एक विवाद होता है, कुछ दिनों के लिए भीड़ भड़क जाती है, आलोचना होती है। लेकिन क्या उस चर्चा में कॉमेडियन के शो की और भी ज्यादा चर्चा नहीं हो जाती?
यह ‘सच्चाई’ और ‘सोशल कमेंट्री’ के नाम पर किया जाता है। लेकिन अगर सोशल कमेंट्री है, तो क्या महिलाओं का अपमान करना या बलात्कार जैसे गंभीर विषय पर जोक बनाना उपयुक्त है?
दिलचस्प बात यह है कि यह समस्या केवल पुरुष कॉमेडियन्स तक सीमित नहीं है। महिला स्टैंड-अप कॉमेडियन्स भी बॉडी शेमिंग, सेक्सुअल कंटेंट और आक्रामक जोक्स के लिए जानी जाती हैं। कुछ इंफ्लूएंसर्स और एक्ट्रेसेस भी इसी ट्रेंड में शामिल हैं। यह साबित करता है कि समस्या ‘कॉमेडी’ की सीमा निर्धारण की है, चाहे वह किसी भी लिंग का व्यक्ति कर रहा हो।
असली सवाल
क्या यह सब केवल विचारों को चुनौती देने वाली कॉमेडी है? या फिर यह सिर्फ व्यूज पाने का खेल है जहाँ ‘कंट्रोवर्सी ही प्रमोशन’ है? अगर यही कॉमेडी है, तो क्या महिलाओं को हीन साबित करने वाले जोक्स या ट्रॉमा को हल्के में लेने वाली बातें ‘बोल्ड’ कहलाती हैं?
यह समझ में नहीं आता कि क्यों किसी के दर्द को मजाक बनाना ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ माना जाता है। और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब कोई इसका विरोध करता है, तो उसे ‘सेंसर शिप’, ‘प्रतिबंध’ आदि कहा जाता है।
एक आम जनता की तरह देखे तो हम एक ऐसे समाज में हैं जहाँ विवाद का मुद्रीकरण हो रहा है। जहाँ आलोचना का इंतजार ही कंटेंट का हिस्सा है। हर बार जब कोई कॉमेडियन सीमा तोड़ता है, माफी माँगता है और फिर से आता है तब-तब हम उसे सपोर्ट करते हैं। क्योंकि यह ‘साहस’ लगता है। यह ‘सच कहना’ लगता है।
लेकिन क्या सच कहना हमेशा ही दूसरे को तोड़ने के लिए होना चाहिए? क्या मजाक हमेशा ही किसी के अधिकार, सम्मान, या ट्रॉमा को दाँव पर लगाकर ही बनता है?


