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न कोई नाम- न पहचान… आखिर कौन सी है ये छोटी सी NCPI? जिसमें TMC के 20 बागी विधायकों ने किया विलय: जानिए लोकसभा में अचानक कैसे बन गई 5वीं बड़ी पार्टी

नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है, जिसे चुनाव आयोग ने 2022-23 में पंजीकृत किया था। 14 जून से पहले इस पार्टी की सार्वजनिक या मीडिया उपस्थिति लगभग न के बराबर थी।

बंगाल की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। यहाँ तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी के लगभग 20 सांसदों के एक बागी गुट ने नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय की घोषणा कर दी है। यह संख्या लोकसभा में टीएमसी के कुल सांसदों के दो-तिहाई से अधिक बताई जा रही है, जिसके कारण यह गुट दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता से बचने की कानूनी सुरक्षा प्राप्त कर सकता है।

बागी नेताओं में सुदीप बंद्योपाध्याय, काकोली घोष दस्तिदार, सताब्दी रॉय, सायोनी घोष और अरूप चक्रवर्ती जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र सौंपकर स्वयं को एनसीपीआई का सदस्य मान्यता देने और संसद में अलग बैठने की व्यवस्था की माँग की है। साथ ही, इस गुट ने NDA का समर्थन करने का भी ऐलान किया है।

अचानक कैसे अस्तित्व में आई NCPI?

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जिस NCPI में विलय किया गया है, वह देश की एक बेहद छोटी और लगभग अज्ञात राजनीतिक पार्टी है। नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है, जिसे चुनाव आयोग ने 2022-23 में पंजीकृत किया था। 14 जून से पहले इस पार्टी की सार्वजनिक या मीडिया उपस्थिति लगभग न के बराबर थी। न इसकी कोई पहचान थी और न ही चुनाव चिह्न का किसी को पता था। फेसबुक पर भी इस पार्टी का आखिरी पोस्ट 2023 में ही हुआ था।

कई रिपोर्टों में इसे त्रिपुरा आधारित पार्टी बताया जा रहा है। हालाँकि निर्वाचन आयोग के दस्तावेजों के अनुसार, इसका मुख्यालय जागो बिस्वा, होल्डिंग नंबर 4719, ग्राम हाटगाछा, डाकघर बनिपुर, थाना सांकरैल, जिला हावड़ा, पश्चिम बंगाल – 711304 में स्थित है। इसलिए, कई रिपोर्टों में किए जा रहे दावों के विपरीत, यह पार्टी वास्तव में पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में आधारित है।

लोकसभा में भी बनी बड़ी पार्टी

इस पार्टी की राजनीतिक मौजूदगी अब तक बहुत छोटी रही है। 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इसके सिर्फ दो उम्मीदवार मैदान में उतरे थे। दोनों को बहुत कम वोट मिले। पूरी पार्टी को कुल मिलाकर सिर्फ 822 वोट मिले थे। यही वजह है कि इस पार्टी का नाम कभी राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा में नहीं आया। लेकिन अब लोकसभा में 19-20 सांसदों के साथ एनसीपीआई अचानक पाँचवीं सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। इससे वह एनडीए के भीतर भी एक महत्वपूर्ण सहयोगी बनकर उभरी है और सांसदों की संख्या के आधार पर तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) से आगे निकल गई है।

ये भी माना जा रहा है कि टीएमसी के बागी सांसदों ने सोच-समझकर यह रास्ता चुना है। भारत के दल-बदल कानून के अनुसार यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई या उससे अधिक सांसद या विधायक किसी दूसरी पार्टी में एक साथ विलय करते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए इन नेताओं ने नई पार्टी बनाने या अलग-अलग किसी दूसरी पार्टी में जाने के बजाय एक मौजूदा पार्टी में सामूहिक रूप से शामिल होने का फैसला किया।

इसके अलावा एनसीपीआई को चुनने का एक और कारण यह माना जा रहा है कि यह पार्टी बहुत छोटी और लगभग निष्क्रिय थी। ऐसे में टीएमसी से आए नेता इस पार्टी पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित कर सकते हैं और इसे अपनी राजनीतिक जरूरतों के अनुसार आगे बढ़ा सकते हैं। अगर वे सीधे भाजपा या किसी बड़े एनडीए दल में शामिल होते, तो उन्हें वहाँ के पुराने नेताओं और संगठन के अधीन काम करना पड़ता। इस विलय के बाद लोकसभा में एनसीपीआई की ताकत अचानक बढ़ गई है। करीब 20 सांसदों के साथ यह लोकसभा की पाँचवीं सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। साथ ही एनडीए के भीतर भी इसका महत्व काफी बढ़ गया है।

TMC नेताओं में अब भी असंतोष

गौरतलब है टीएमसी नेताओं में असंतोष की खबरें केवल संसद तक सीमित नहीं हैं। बताया जा रहा है कि 60 से अधिक विधायक पार्टी नेतृत्व के कुछ फैसलों से नाराज हैं। अगर भविष्य में इनमें से बड़ी संख्या में विधायक भी एनसीपीआई में शामिल हो जाते हैं, तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव आ सकता है। इससे टीएमसी की ताकत काफी घट सकती है, जबकि एनडीए को एक नया और मजबूत सहयोगी मिल सकता है।

नोट: यह रिपोर्ट अंग्रेजी में राजू दास द्वारा लिखे गए लेख पर आधारित है। आप मूल रिपोर्ट को इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं

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