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क्या है राम मंदिर दान का पूरा विवाद: जानिए कैसे हुआ था उस ट्रस्ट का निर्माण जिसपर उठ रहे सवाल, किसके हाथ में है इसे संभालने की कमान

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट एक स्वतंत्र संस्था है जो अपने वित्तीय कामकाज, दान आदि का प्रबंधन करती है। उत्तर प्रदेश सरकार की भूमिका मुख्य रूप से सुरक्षा और प्रशासनिक तालमेल तक ही सीमित है। मंदिर के खातों को नियंत्रित करने या चंदे का प्रबंधन करने में सरकार की कोई भूमिका नहीं है।

अयोध्या का राम मंदिर महज एक मंदिर नहीं है, बल्कि दुनियाभर के करोड़ों हिंदुओं के आस्था का केन्द्र भी है। यह सदियों पुराने संघर्ष, कानूनी लड़ाई और सामाजिक आंदोलन और हजारों हिन्दुओं के बलिदान का प्रतीक है। जनवरी 2024 में राम लला की प्रतिमा की स्थापना के बाद से ही लाखों लोग यहाँ दर्शन पूजन के लिए हर दिन आते हैं।

प्राण प्रतिष्ठा समारोह के बाद से मंदिर को भक्तों से जबरदस्त दान मिला है। लाखों लोग नकद, सोना, चाँदी, आभूषण और अन्य कीमती उपहार रामलला को चढ़ाते हैं। इसलिए रामलला के चढ़ावे में हेराफेरी, कीमती सामानों का गायब होना, अभिलेखों में कथित तौर पर हेराफेरी के दावे ने इसे राष्ट्रीय विवाद का विषय बना दिया।

हालाँकि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और सनसनीखेज दावों के बीच यह भी सच्चाई है कि इसे यूपी सरकार नहीं चलाती और न ही वित्तीय मदद करती है। बल्कि यह श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा चलाया जाता है, जो एक स्वायत्त निकाय है।

राम मंदिर के दान विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब स्थानीय मीडिया रिपोर्टों में राम मंदिर को मिले दान में कथित अनियमितताओं को उजागर किया। यह मुद्दा 7 जून को तब राजनीतिक बन गया, जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए दावा किया कि करोड़ों रुपये के चढ़ावे का हिसाब नहीं मिल पा रहा है।

करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा मुद्दा बताते हुए अखिलेश यादव ने इस मामले पर चुप्पी साधे रहने पर सवाल उठाया और न्यायिक हस्तक्षेप की माँग की। अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल न होने वाले अखिलेश यादव के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार पर निशाना साधने के लिए यह एक राजनीतिक हथियार था।

आरोपों का सिलसिला बढ़ता चला गया

शुरुआत में खबर आई थी कि 5 करोड़ से 75 करोड़ रुपए तक की दान राशि का हिसाब नहीं मिल रहा है। बाद में कुछ खबरों में दावा किया गया कि कथित गड़बड़ी की रकम कहीं अधिक हो सकती है।

कई रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया कि गायब रकम 200 करोड़ रुपए से भी अधिक हो सकती है। इन आरोपों के कारण व्यापक जाँच की माँग उठी।

आरोपों की सच्चाई क्या है?

यह विवाद दान के प्रबंधन से जुड़ा हुआ है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ कैश काउंटिंग स्टाफ ने कथित तौर पर वाउचर में दान पेटियों से जमा की गई नकदी को कम करके बताया। श्रद्धालुओं द्वारा दान किए गए सोने, चाँदी और आभूषणों के प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

कई महीनों तक नकदी गिनने वाले क्षेत्रों से सीसीटीवी फुटेज कथित तौर पर हटाए जाने के आरोपों के बाद संदेह और भी बढ़ गया। इसके अलावा यह भी आरोप है कि अनियमितताओं से संबंधित शिकायतों को या तो नजरअंदाज कर दिया गया या उन पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं की गई।

इन सभी दावों से इसका अंदाजा लगाया जा रहा है कि प्रबंधन से जुड़ा एक हिस्सा जरूर ‘गलत हाथों’ में था, इसलिए चिंता बढ़ गई है।

लीपापोती के आरोप लगे

इस विवाद के केंद्र में मौजूद व्यक्तियों में से एक महिपाल सिंह हैं, जिनकी पहचान मीडिया रिपोर्टों में मंदिर संचालन से जुड़े पूर्व लेखा प्रभारी के रूप में की गई है।

सिंह ने आरोप लगाया कि दान की चोरी काफी समय से हो रही थी और दावा किया कि इस संबंध में अंदरूनी स्तर पर चिंता जताई गई थीं।

उनके बयान के अनुसार, उन्होंने कथित अनियमितताओं के बारे में वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया था, लेकिन इसके तुरंत बाद उन्हें उनके पद से हटा दिया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कई महीनों की सीसीटीवी फुटेज डिलीट कर दी गई है।

ये आरोप अभी तक साबित नहीं हुए हैं, लेकिन चंदा चोरी की आम धारणा को काफी हद तक मजबूत किया है, इसलिए गहन जाँच की जरूरत है।

लापता रामशिलाएँ और दशकों पुराने आरोप

यह विवाद तब और सुर्खियों में आ गया, जब धर्मसेना के संस्थापक संतोष दुबे ने बहुमूल्य रामशिलाओं के संबंध में सनसनीखेज आरोप लगाए।

दुबे के अनुसार, सोने, चाँदी, हीरे, माणिक और अन्य कीमती धातुओं से बनी लगभग 1250 रामशिलाएँ गायब हैं। इन्हें कथित तौर पर भारत और विदेशों में पूजा-अर्चना के बाद अयोध्या लाया गया था।

उन्होंने दावा किया कि राम मंदिर आंदोलन से जुड़े मूल्यवान दान और कीमती वस्तुओं के बारे में चिंताएं कई दशकों पुरानी हैं। दुबे ने यह भी आरोप लगाया कि राम मंदिर से जुड़ी कीमती वस्तुओं की चोरी 1989 से हो रही है। ये आरोप हैं और इसकी पुष्टि नहीं हुई है। इसकी जाँच की आवश्यकता है।

राम मंदिर में दान कैसे एकत्र किया जाता है

आरोपों को समझने के लिए वसूली प्रक्रिया को समझना महत्वपूर्ण है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने दर्शन मार्ग के आसपास कई दान पेटियाँ या हुंडियाँ लगाई गई हैं। हर दिन हजारों श्रद्धालु इन बक्सों में नकद दान जमा करते हैं।

ट्रस्ट ने दान में दिए गए नकद को गिनने की प्रक्रिया में भारतीय स्टेट बैंक को शामिल किया। बाद में बैंक ने यह काम एक निजी एजेंसी को आउटसोर्स कर दिया।

इसका असर यह हुआ कि दान की पूरी प्रक्रिया में मंदिर के कर्मचारी, आउटसोर्स किए गए कैश काउंटर, पर्यवेक्षक, बैंकिंग टीमें शामिल हो गए।

फिलहाल आरोप इस बात पर केंद्रित हैं कि दान एकत्र होने के बाद क्या हुआ होगा, न कि इस बात पर कि दान की वस्तुएँ सीधे दान पेटियों से गायब हो गईं।

कई कर्मचारियों की संपत्ति अचानक बढ़ी

राम मंदिर चंदा चोरी विवाद का शायद सबसे अहम पहलू इससे जुड़े कई कर्मचारियों की संपत्ति में बेहिसाब इजाफा है।

खबरों के मुताबिक, दान प्रबंधन में शामिल कई कर्मचारी जाँच के दायरे में आ गए, जब जाँचकर्ताओं ने कथित तौर पर उनकी अपार संपत्ति का पता चला। यह उनके बताए गए आय के स्रोतों से कहीं ज्यादा थे।

रिपोर्ट्स से पता चलता है कि लगभग 18000 रुपए से 20000 रुपए प्रति माह कमाने वाले कर्मचारियों के पास आलीशान घर- कार हैं और उसने बिजनेस में निवेश किया है। खबरों के मुताबिक, दो कर्मचारियों ने 1.5 करोड़ रुपए और 40 लाख रुपए की जमीनें खरीदीं थी।

जाहिर है इन घटनाक्रमों ने इस संदेह को और मजबूत कर दिया कि कुछ व्यक्तियों को दान प्रबंधन में अनियमितताओं से फायदा मिला।

लवकुश मिश्रा की गिरफ्तारी और पैसों की बरामदगी

कैश गिनने वाले कर्मचारी लवकुश मिश्रा की गिरफ्तारी के बाद जाँच में तेजी आई। खबरों के मुताबिक, जाँचकर्ताओं ने उसके घर से करीब 10 लाख रुपए बरामद किए हैं।

मीडिया रिपोर्टों में आगे बताया गया कि कुछ नकदी कथित तौर पर गोबर के नीचे छिपाई गई थी। बताया जाता है कि आंतरिक ऑडिट और सीसीटीवी फुटेज की समीक्षा में मिश्रा के आचरण पर सवाल उठे थे। इसके बाद अधिकारियों ने उनकी जाँच शुरू की।

चंपत राय ने चंदे के गायब होने के आरोपों को खारिज किया

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने करोड़ों रुपए गायब होने के आरोपों का पुरजोर खंडन किया है। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने कहा है कि इंटरनल ऑडिट में कोई वित्तीय अनियमितता नहीं पाई गई है।

ट्रस्ट ने लगातार यह दावा किया है कि उसका ऑडिट सिस्टम पारदर्शी है और इसमें कही घपला नहीं मिला है। इस मामले में महत्वपूर्ण बात यह है कि ट्रस्ट ने जाँच का विरोध नहीं किया, बल्कि ट्रस्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिल कर आरोपों की स्वतंत्र जाँच की माँग की।

आधिकारिक बयानों के अनुसार, ट्रस्ट ने तर्क दिया कि तथ्यों को स्थापित करने और राम मंदिर की छवि को नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से फैलाई जा रही गलत सूचनाओं का खंडन करने के लिए एक औपचारिक जाँच आवश्यक थी।

राम मंदिर चंदा विवाद को सीधे उत्तर प्रदेश सरकार से जोड़ना भ्रामक क्यों है?

जैसे-जैसे विवाद बढ़ता गया, विपक्षी नेताओं ने इसे उत्तर प्रदेश सरकार की विफलता के रूप में दिखाने का प्रयास किया जबकि राम मंदिर ट्रस्ट की कानूनी और संस्थागत संरचना से योगी सरकार का कोई लेना-देना नहीं है।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नहीं किया गया था। इसकी स्थापना फरवरी 2020 में सर्वोच्च न्यायालय के अयोध्या फैसले के बाद केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के माध्यम से की गई थी। अधिग्रहित भूमि का स्वामित्व उस कानूनी ढाँचे के तहत सीधे ट्रस्ट को हस्तांतरित कर दिया गया था।

यह ट्रस्ट स्वतंत्र रूप से कार्य करता है और अपने मामलों का प्रबंधन खुद करता है। अध्यक्ष, महासचिव और कोषाध्यक्ष का चुनाव ट्रस्ट खुद करता है और वे लोग मंदिर प्रशासन, वित्त और दान पर नियंत्रण रखते हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार की भूमिका मुख्य रूप से कानून व्यवस्था, सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन और प्रशासनिक समन्वय तक ही सीमित है। ट्रस्ट बोर्ड में राज्य के मनोनीत सदस्यों को मतदान का अधिकार नहीं है और वे वित्तीय निर्णयों को नियंत्रित नहीं करते हैं।

अयोध्या के जिला मजिस्ट्रेट भी प्रशासनिक मामलों में समन्वय का काम करते हैं। उनका दान का प्रबंधन करने या मंदिर के खातों की देखरेख करने से कोई मतलब नहीं है।

इसलिए चंदा चोरी भी साबित होने पर जवाबदेही राज्यसरकार पर नहीं आएगी। यह मंदिर प्रबंधन से जुड़े लोगों, खासकर दान संग्रह, गिनती, ऑडिट और निगरानी में शामिल लोगों पर होगी।

ट्रस्ट की जाँच की माँग के बाद एसआईटी गठित

ट्रस्ट के सदस्यों से मुलाकात और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एसआईटी का गठन किया। तीन सदस्यीय विशेष जाँच दल में प्रशासन, पुलिस और वित्त विभाग के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं।

गौरतलब है कि यह निर्णय ट्रस्ट के अनुरोध के बाद लिया गया, जिसमें आरोपों के पीछे की सच्चाई का पता लगाने के लिए एक स्वतंत्र जाँच की माँग की थी।

एसआईटी को वित्तीय अनियमितताओं के दावों की जाँच करने, उपलब्ध साक्ष्यों की जाँच करने और गलत काम के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान करने के निर्देश दिए गए हैं।

इसके निष्कर्षों से यह पता चलने की उम्मीद है कि सचमुच गबन किया गया, कुछ लोग इसमें शामिल हैं या ट्रस्ट का बड़ा भाग इसमें लगा हुआ था। अभिलेखों की चोरी कैसे हुई और कौन-कौन इसके लिए जिम्मेदार् है अथवा पूरा मामला सिर्फ राजनीतिक है और कोई चोरी नहीं हुई।

जनहित याचिकाएँ, राजनीतिक दबाव और अधिक पारदर्शिता की माँग

यह विवाद कोर्ट तक भी पहुँच गया है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच के समक्ष दायर एक जनहित याचिका में मंदिर दान से संबंधित कथित अनियमितताओं की अदालत की निगरानी में सीबीआई जाँच की माँग की गई है।

इसी बीच, भाजपा नेताओं और राम मंदिर आंदोलन से जुड़े लोगों ने दान का दुरुपयोग करने के दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने पर जोर दिया है। इस मामले में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए दान, खर्च, संपत्ति और अभिलेखों के संबंध में सार्वजनिक जानकारी देने की भी माँग की है।

करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा मुद्दा

करोड़ों हिंदुओं के लिए यह मुद्दा ऑडिट और दान चोरी से जुड़ी अनियमितता से कहीं ज्यादा व्यापक है। राम मंदिर में किया गया हर दान भक्ति का प्रतीक है, करोड़ों हिन्दुओं की आस्था से जुड़ा हुआ है।

यह मंदिर पीढ़ियों की आस्था, त्याग और संघर्ष का परिणाम है। भगवान राम के नाम पर चढ़ाए गए दान का दुरुपयोग सिर्फ आर्थिक कदाचार नहीं है। यह देश-विदेश से आने वाले करोड़ों भक्तों की भावना से खिलवाड़ है। उनके साथ विश्वासघात है। इसलिए आरोपों में भी दम होना चाहिए, इसके सबूत होना भी उतना ही जरूरी है।

राम मंदिर के चंदे को लेकर हुए विवाद ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनके जवाब जरूरी है। लापता धनराशि, गायब कीमती सामान और हटाए गए सीसीटीवी फुटेज से जुड़े आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

एसआईटी की जाँच, गिरफ्तारियाँ और चल रही छानबीन से संकेत मिलता है कि अधिकारी इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं। हालाँकि, तथ्यों को राजनीतिक बयानबाजी से अलग करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट एक स्वायत्त संस्था है, जो अपने वित्त, दान और प्रशासन का प्रबंधन करती है। उत्तर प्रदेश सरकार की भूमिका मुख्य रूप से सुरक्षा और प्रशासनिक समन्वय तक सीमित है और मंदिर के खातों को नियंत्रित करने या दान के प्रबंधन से सरकार का लेना-देना नहीं है।

यदि आर्थिक गड़बड़ियाँ हुई है, तो दोषियों की पहचान करके उन्हें दंडित किया जाना चाहिए। यदि आरोप बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं, तो सबूतों के माध्यम से यह भी स्पष्ट होना चाहिए।

राम मंदिर से जुड़े संवेदनशील मुद्दे पर काफी सावधानी बरतने की जरूरत है। यह हिंदू सभ्यता के सबसे महत्वपूर्ण पवित्र स्थलों में से एक है। यहाँ करोड़ों भक्तों के दान की पवित्रता और उनकी आस्था को बचाए रखने की जरूरत है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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Jinit Jain
Jinit Jain
Writer. Learner. Cricket Enthusiast.

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