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7 लोगों को उम्रकैद, लेकिन क्या सच में ‘गोरक्षा’ ही था मकसद? अदालत ने कहा- उद्देश्य नहीं हुआ साबित, मीडिया ने बनाई मनगढ़ंत कहानियाँ

कोर्ट ने कहा कि प्रत्यक्षदर्शी शेख लाला और सैयद मुश्ताक ने कोर्ट में ऐसा कोई बयान नहीं दिया कि भीड़ में शामिल किसी व्यक्ति ने उनके सामने वाहन खड़ा कर रास्ता रोका था।

मध्य प्रदेश की एक अतिरिक्त जिला एवं सत्र अदालत ने अगस्त 2022 में मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले में हुई दंगा और हत्या की एक घटना में 7 लोगों को दोषी ठहराया। इस घटना में नजीर अहमद नाम के एक व्यक्ति की मौत हो गई थी जबकि कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।

12 जून 2026 को दिए गए फैसले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान ने 7 आरोपितों दीपक उर्फ बाबा केवट, अजय उर्फ अज्जू राठौर, प्रकाश कौशल, पवन बठाव, अमर उर्फ भोला बठाव, कन्हैया बठाव और बल्लू उर्फ अनुज रघुवंशी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302, 307, 148 सहपठित 149 के तहत दोषी ठहराया। कोर्ट ने सभी दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई।

हालाँकि, दोषियों को हत्या, हत्या के प्रयास और दंगा करने से जुड़े प्रावधानों के तहत सजा दी गई, लेकिन कुछ मीडिया संस्थानों ने केवल इसलिए इस मामले को ‘गौ-रक्षक हिंसा’ या ‘काउ विजिलेंटिज्म’ से जोड़कर पेश करना शुरू कर दिया क्योंकि घटना में शामिल ट्रक मवेशियों को लेकर जा रहा था।

कई मीडिया रिपोर्टों में दोषियों को ‘गौ रक्षक’ बताया गया जबकि कोर्ट के फैसले में कहीं भी इस शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है।

कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह भी गलत दावा किया गया कि कोर्ट ने 14 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई जबकि सत्र अदालत ने 7 लोगों को दोषी ठहराकर सजा दी थी।

कोर्ट की टिप्पणियों और फैसले पर आगे बढ़ने से पहले उस घटना को समझना जरूरी है, जिसके आधार पर यह मामला दर्ज किया गया था। फैसले में दर्ज जानकारी के अनुसार, यह घटना 3 अगस्त 2022 की आधी रात के आसपास मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले के सिवनी मालवा थाना क्षेत्र के बराखड़ गाँव स्थित नंदरवाड़ा रोड पर हुई थी।

शिकायतकर्ता शेख लाला (ट्रक चालक) अपने साथियों नजीर अहमद और शेख मुश्ताक के साथ एक ट्रक में मवेशियों को लेकर यात्रा कर रहा था। यह ट्रक नंदरवाड़ा से निकलकर महाराष्ट्र के अमरावती की ओर जा रहा था।

घटना वाले दिन आधी रात के समय जब ट्रक बराखड़ गाँव के पास पहुँचा, तब उसमें सवार लोगों पर लाठियाँ लेकर आए 10 से 12 ग्रामीणों ने हमला कर दिया। हमलावरों ने शेख लाला, नजीर अहमद और शेख मुश्ताक की पिटाई की।

पुलिस मौके पर पहुँची और घायलों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) सिवनी मालवा पहुँचाया। शेख लाला और शेख मुश्ताक गंभीर रूप से घायल थे जबकि नजीर अहमद की अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई।

इसके बाद सिवनी मालवा थाने में 10-12 लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147, 148, 341, 307 और 302 के तहत FIR दर्ज की गई। बाद में 7 आरोपितों पर मुकदमा चला और उन्हें FIR में दर्ज कुछ अपराधों में दोषी ठहराया गया।

FIR में लगाए गए आरोपों के आधार पर कोर्ट ने अपराध तय करने के लिए कुल सात मुद्दे निर्धारित किए। इन सात मुद्दों में तीसरा मुद्दा खास था, जिसमें यह तय करना था कि क्या आरोपित ने हमला करने से पहले जानबूझकर पीड़ितों के ट्रक को रोका था। यह इस बात को समझने के लिए महत्वपूर्ण था कि क्या आरोपितों के पीछे कोई विशेष उद्देश्य या मकसद था।

फैसले का स्क्रीनशॉट

कोर्ट द्वारा तय किया गया प्रश्न था, “क्या उक्त दिनांक, समय और स्थान पर आरोपितों ने ट्रक नंबर MH-40-CD-8751 में यात्रा कर रहे शिकायतकर्ता शेख लाला, नजीर अहमद और शेख मुश्ताक का रास्ता रोककर उन्हें गलत तरीके से रोका था?”

दोनों पक्षों के तर्कों और प्रस्तुत साक्ष्यों की जाँच के बाद कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुँची कि आरोपितों के खिलाफ गलत तरीके से रास्ता रोकने का आरोप साबित नहीं किया जा सका।

दूसरे शब्दों में, कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपितों ने हमला करने से पहले जानबूझकर पीड़ितों के ट्रक को रोका था। ऐसे में किसी विशेष मकसद के अभाव में कुछ मीडिया संस्थानों द्वारा इस घटना को गौ-रक्षक हिंसा से जोड़कर पेश करने के दावे कोर्ट के निष्कर्षों से मेल नहीं खाते।

फैसले का स्क्रीनशॉट

फैसले के पैरा नंबर 96 में कोर्ट ने कहा कि आरोपितों के खिलाफ घायल व्यक्तियों और मृतक का रास्ता रोकने का आरोप सिद्ध नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि प्रत्यक्षदर्शी शेख लाला और सैयद मुश्ताक ने कोर्ट में ऐसा कोई बयान नहीं दिया कि भीड़ में शामिल किसी व्यक्ति ने उनके सामने वाहन खड़ा कर रास्ता रोका था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस को दिए गए उनके बयानों में भी ट्रक का रास्ता रोके जाने का कोई जिक्र नहीं था। इसके अलावा कोर्ट के सामने ऐसा कोई अन्य साक्ष्य भी पेश नहीं किया गया जिससे यह साबित हो सके कि आरोपित ने ट्रक का रास्ता रोका था।

फैसले को सामान्य रूप से पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि कुछ मीडिया संस्थानों द्वारा इस मामले को गौ-रक्षक हिंसा बताने का दावा कोर्ट के निष्कर्षों से समर्थित नहीं है। अदालत के निष्कर्षों के अनुसार यह मामला हत्या, हत्या के प्रयास और दंगा से जुड़ा था, न कि गौ-रक्षक हिंसा से।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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