जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले के तुलमुल्ला गाँव में आज से वार्षिक माता खीर भवानी मेले की शुरुआत हो गई। ज्येष्ठ अष्टमी के अवसर पर आयोजित होने वाला यह मेला कश्मीरी पंडित समुदाय का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन माना जाता है।
हर वर्ष हजारों श्रद्धालु देश के विभिन्न राज्यों से यहाँ पहुँचकर माता रग्न्या देवी के दर्शन करते हैं, पवित्र झरने में खीर अर्पित करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
#WATCH | Jammu, J&K: Devotees celebrate Kheer Bhawani Mela at Janipur Temple on Jyeshtha Ashtami. This temple is a replica of the Kheer Bhawani Temple in Srinagar and was constructed by Kashmiri migrants after their migration in the 1990s. pic.twitter.com/47GBwbhyJC
— ANI (@ANI) June 22, 2026
इस वर्ष भी जम्मू से हजारों श्रद्धालु संगठित काफिलों में घाटी पहुँचे हैं। प्रशासन की ओर से सुरक्षा, चिकित्सा शिविर, हेल्प डेस्क, यातायात नियंत्रण, साफ-सफाई और आपातकालीन सेवाओं के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। मंदिर परिसर और यात्रा मार्गों पर विशेष निगरानी रखी गई ताकि श्रद्धालु शांतिपूर्ण वातावरण में पूजा कर सकें।
हालाँकि खीर भवानी मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है। यह कश्मीर की प्राचीन धार्मिक परंपराओं, कश्मीरी पंडित समुदाय की सांस्कृतिक पहचान, विस्थापन की स्मृतियों और घाटी की साझा सामाजिक विरासत से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि यह मेला आज भी धार्मिक, ऐतिहासिक और सामाजिक, तीनों स्तरों पर विशेष महत्व रखता है।
सदियों पुराना तीर्थ: क्या है माता खीर भवानी मंदिर का इतिहास?
माता खीर भवानी मंदिर जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले के तुलमुल्ला गाँव में स्थित है और इसे कश्मीर के सबसे पवित्र शक्ति स्थलों में गिना जाता है। यह मंदिर देवी रग्न्या या राग्न्या भगवती को समर्पित है, जिन्हें शक्ति का स्वरूप और कश्मीरी पंडित समुदाय की कुलदेवी माना जाता है।
मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि काफी प्राचीन मानी जाती है। इस स्थल के ऐतिहासिक संदर्भ कल्हण की राजतरंगिणी, भृगु संहिता और अबू-अल-फजल की ऐन-ए-अकबरी जैसे ग्रंथों में मिलते हैं। समय के साथ यह स्थान केवल पूजा का केंद्र नहीं बल्कि कश्मीरी हिंदू समाज के सांस्कृतिक जीवन का भी प्रमुख आधार बन गया।
वर्तमान मंदिर संरचना डोगरा शासनकाल में विकसित हुई। माना जाता है कि महाराजा प्रताप सिंह ने इसके आधुनिक स्वरूप के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जबकि बाद में महाराजा हरि सिंह के समय इसका संरक्षण और विस्तार किया गया।
मंदिर की वास्तु संरचना पारंपरिक मंदिरों से कुछ अलग है क्योंकि यहाँ पूजा का केंद्र कोई विशाल गर्भगृह नहीं बल्कि मंदिर परिसर के बीच स्थित एक प्राकृतिक पवित्र झरना है, जिसके चारों ओर धार्मिक गतिविधियाँ संपन्न होती हैं। एक कथा यह भी है कि रावण के भक्ति भाव से प्रसन्न होकर माँ रग्न्या प्रकट हुई थीं।
इसके बाद रावण ने उनकी स्थापना कुलदेवी के रूप में करवाई। हालाँकि रावण के व्यवहार और बुरे कर्म के चलते देवी नाराज हो गईं और रावण की नगरी छोड़कर चली गईं। इसके बाद भगवान राम ने जब रावण का वध किया तो राम ने हनुमान से कहा कि वह देवी की स्थापना किसी उपयुक्त स्थान पर करवाएँ। इसके बाद हनुमान की मदद यहाँ स्थापना कराई गई
खीर का प्रसाद, ज्येष्ठ अष्टमी और मंदिर से जुड़ी प्रमुख मान्यताएँ
इस मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपरा देवी को चावल की खीर खीर अर्पित करने की है। इसी वजह से इस स्थान को ‘खीर भवानी’ के नाम से जाना जाता है। श्रद्धालु मंदिर परिसर में स्थित पवित्र झरने के पास पहुँचकर खीर, दूध, फूल और अन्य प्रसाद अर्पित करते हैं। मान्यता है कि माता रग्न्या देवी भक्तों की रक्षा करती हैं और उनके जीवन में समृद्धि और शांति लाती हैं।
ज्येष्ठ अष्टमी का दिन विशेष महत्व रखता है। इसी दिन वार्षिक मेले का आयोजन होता है और इसे देवी की विशेष पूजा का अवसर माना जाता है। सुबह से ही श्रद्धालु पारंपरिक परिधान पहनकर मंदिर पहुँचते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और पूजा-अर्चना में भाग लेते हैं।
कई परिवारों के लिए यह केवल व्यक्तिगत श्रद्धा का विषय नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परंपरा का हिस्सा भी है।
रहस्यमयी झरना: माता खीर भवानी मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा और उससे जुड़ी मान्यताएँ
माता खीर भवानी मंदिर की सबसे विशिष्ट और चर्चित पहचान मंदिर परिसर के बीच स्थित पवित्र प्राकृतिक झरना है। इसी झरने के चारों ओर पूरा धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होता है और यही इस मंदिर को अन्य शक्ति स्थलों से अलग बनाता है। स्थानीय परंपरा में इस झरने को ‘स्यंध’ (Syandh) कहा जाता है और इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।
इस झरने से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध मान्यता इसके पानी के रंग को लेकर है। ऐसा माना जाता है कि इस झरने का पानी क्षेत्र की समृद्धि के आधार पर रंग बदलता है और इसे घाटी के भविष्य, सामाजिक परिस्थितियों या बड़े परिवर्तनों से जोड़कर देखा जाता है। सामान्य परिस्थितियों में पानी का रंग हल्का, साफ या दूधिया दिखाई देना शुभ माना जाता है।
वहीं गहरा, धुंधला या काला रंग कठिन समय या अशुभ संकेत के रूप में देखा जाता है। इस मान्यता को लेकर समुदाय में कई पीढ़ियों से कहानियाँ और स्मृतियाँ प्रचलित रही हैं। 1990 में कश्मीरी पंडितों के बड़े पैमाने पर पलायन से ठीक पहले इसका पानी कथित तौर पर काला हो गया था।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह झरना केवल जल का स्रोत नहीं बल्कि देवी रग्न्या की उपस्थिति और कृपा का प्रतीक है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु इस झरने में खीर, दूध, पुष्प और प्रसाद अर्पित करते हैं। इसी परंपरा के कारण इस तीर्थ का नाम ‘खीर भवानी’ पड़ा। पूजा के दौरान श्रद्धालु झरने के चारों ओर परिक्रमा करते हैं और शांति तथा समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।
पलायन के बाद भी कायम रहा रिश्ता: कश्मीरी पंडितों के लिए क्यों खास है यह मेला?
खीर भवानी मेला कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि उनकी सामूहिक पहचान का भी हिस्सा है। दशकों तक घाटी में रहने वाले कश्मीरी पंडितों के सामाजिक जीवन में यह मेला विशेष स्थान रखता था। परिवारों के लिए यह वार्षिक धार्मिक और सामुदायिक मिलन का अवसर होता था।
लेकिन 1990 के दशक की शुरुआत में कश्मीर में आतंकवाद, लक्षित हिंसा, हत्याओं, धमकियों और असुरक्षा के माहौल के बीच बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर पलायन करना पड़ा। इस घटना ने समुदाय की सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। करीब 5 लाख कश्मीरी हिंदुओं ने अपनी मिट्टी से दूर होने का दर्द झेला।
लगातार नरसंहार और प्रताड़ना के चलते उन्हें घाटी से भागने को मजबूर होना पड़ा। विस्थापन के बाद भी खीर भवानी मेला समुदाय की स्मृति और धार्मिक परंपरा का केंद्र बना रहा। आज भी बड़ी संख्या में लोग हर वर्ष इस मेले में शामिल होकर अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव महसूस करते हैं।
बदलते समय में मेले की नई भूमिका
खीर भवानी मेले की एक महत्वपूर्ण पहचान इसकी सामाजिक भूमिका भी है। कई वर्षों से स्थानीय मुस्लिम समुदाय इस आयोजन में सहयोग करता रहा है। श्रद्धालुओं के स्वागत, व्यवस्थाओं और स्थानीय स्तर पर सहयोग की परंपरा को घाटी के सामाजिक संबंधों और साझा संस्कृति के उदाहरण के रूप में देखा जाता है।
इसी वजह से इस मेले को अक्सर कश्मीरियत यानी साझा सांस्कृतिक विरासत और सहअस्तित्व से भी जोड़ा जाता है। इस वर्ष प्रशासन ने सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए। मंदिर परिसर के आसपास अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की गई, मेडिकल कैंप लगाए गए और सहायता केंद्र बनाए गए।
#WATCH | Tulmulla, Ganderbal | Security heightened across Ganderbal district for the annual Mata Kheer Bhawani Mela at the Tulmulla temple pic.twitter.com/aHJyZOnitY
— ANI (@ANI) June 22, 2026
आगामी अमरनाथ यात्रा को देखते हुए भी सुरक्षा व्यवस्थाओं को और मजबूत किया गया। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य केवल आयोजन को सफल बनाना नहीं बल्कि श्रद्धालुओं के बीच भरोसा और सुरक्षा की भावना को बनाए रखना भी है।
आस्था से आगे: क्यों विशेष है खीर भवानी मेला?
माता खीर भवानी मेला कश्मीर की उन परंपराओं में शामिल है जहाँ धर्म, इतिहास और समाज एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं। तुलमुल्ला स्थित यह मंदिर केवल एक तीर्थस्थल नहीं बल्कि कश्मीरी पंडित समुदाय की आस्था, सांस्कृतिक निरंतरता और ऐतिहासिक स्मृति का केंद्र है।
आज भी जब हजारों श्रद्धालु यहाँ पहुँचकर माता रग्न्या देवी को खीर अर्पित करते हैं, तो यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं होता, यह उस परंपरा को जीवित रखने का प्रयास भी होता है जिसने समय के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन अपनी पहचान को बनाए रखा है।


