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बीमारी के बहाने निशाने पर भारत… BBC ने ’38 परजीवी’ के सहारे 19 साल पुरानी घटना पर किया बदनाम: पढ़ें- कैसे पश्चिमी मीडिया ने फैलाया प्रोपेगेंडा

तीन साल के भीतर शरीर में पनपने वाले किसी भी बैक्टीरिया या पैरासाइट का सटीक स्रोत ढूँढना मेडिकल साइंस में बेहद पेचीदा और लगभग असंभव माना जाता है। लेकिन BBC के लिए 3 साल का यह अंतराल कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि उन्हें तो बस अपनी स्टोरी में 'भारत' का नाम जोड़कर अपनी हेडलाइन को चमकाना था।

ब्रिटिश मीडिया चैनल BBC का भारत विरोधी रवैया एक बार फिर सबके सामने आ गया है। इस विदेशी चैनल ने पत्रकारिता के सारे नियम भूलकर एक ऐसी खबर छापी है, जो लोगों को गुमराह करती है। BBC ने अपनी एक रिपोर्ट की हेडलाइन में लिखा कि ‘भारत घूमने गई महिला के दिमाग में पहुँचे 38 कीड़े (परजीवी)’। यह पूरी रिपोर्ट न तो मेडिकल साइंस के हिसाब से सही है और न ही इसमें कोई सच्चाई है।

यह सिर्फ भारत का नाम खराब करने की एक सोची-समझी कोशिश है। जब इस खबर की गहराई से जाँच की गई, तो पता चला कि हेडलाइन में जो डर फैलाया गया है, उसका रिपोर्ट के अंदर कोई सबूत ही नहीं है। BBC ने केवल एक विदेशी महिला की कही-सुनी बातों और उसके डॉक्टर के एक छोटे से ‘अंदाजे’ को पूरी दुनिया के सामने ऐसे पेश कर दिया, जैसे यह कोई बहुत बड़ा सच हो।

हेडलाइन और हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर

BBC ने जिस चालाकी से इस खबर को बुना है, वह साफ तौर पर शरारत से भरा हुआ है। BBC के रिपोर्ट की हेडलाइन ‘A trip to India left me with 38 parasites in my brain’ है। कोई भी आम इंसान जब इस हेडलाइन को देखेगा, तो उसे पहली नजर में यही लगेगा कि भारत बहुत गंदा और असुरक्षित देश है, जहाँ जाते ही लोगों में भयंकर बीमारी पैदा हो जाती हैं। लेकिन जैसे ही आप इस खबर के अंदर का कंटेंट पढ़ेंगे, तो आपको पता चलेगा कि बीबीसी के अपने ही शब्द उसके झूठ की पोल खोल रहे हैं।

BBC की रिपोर्ट की मुख्य हेडलाइन

खबर के अंदर BBC ने खुद लिखा है कि ब्रिटिश महिला के डॉक्टर को केवल ऐसा ‘लगा’ या उनका ‘अंदाजा’ (Believes) था कि यह बीमारी भारत में हुई होगी। यहाँ न तो कोई लैब रिपोर्ट दी गई है और न ही कोई पक्का मेडिकल सबूत पेश किया गया है। डॉक्टर के पास इस बात का कोई प्रूफ नहीं है।

मेडिकल साइंस में किसी बात का ‘सिर्फ अंदाजा लगाने’ और ‘उसे सच साबित करने’ में जमीन-आसमान का फर्क होता है। BBC ने इसी फर्क को जानबूझकर छिपा लिया। एक डॉक्टर के तुक्के या निजी अंदाजे को दुनिया भर की बड़ी खबर बना देना यह साफ दिखाता है कि BBC का मकसद पत्रकारिता करना नहीं, बल्कि भारत की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खराब करना और भारत के नाम पर सनसनी फैलाना था।

तीन साल का लंबा गैप और BBC की थ्योरी फेल

इस पूरी कहानी का सबसे कमजोर और हास्यास्पद पहलू वह समय सीमा है, जिसे BBC ने बड़ी ही चालाकी से दबाने की कोशिश की। लॉरी डेनमैन नाम की यह ब्रिटिश महिला साल 2007 में तीन महीने के लिए भारत घूमने आई थी। भारत से लौटने के पूरे तीन साल बाद, यानी साल 2010 में उसे पहली बार अपने पेट में टेपवर्म (फीताकृमि) होने का पता चला। इसके बाद साल 2011 में उसे गंभीर दौरे पड़ने शुरू हुए, जिसके बाद स्कैन में दिमाग के अंदर सिस्ट (परजीवी) होने की पुष्टि हुई।

अब कोई भी सामान्य समझ रखने वाला व्यक्ति यह सवाल पूछेगा कि इन तीन सालों के लंबे अंतराल में उस महिला ने ब्रिटेन या दुनिया के किसी अन्य हिस्से में क्या खाया-पिया? तीन साल के भीतर शरीर में पनपने वाले किसी भी बैक्टीरिया या पैरासाइट का सटीक स्रोत ढूँढना मेडिकल साइंस में बेहद पेचीदा और लगभग असंभव माना जाता है। लेकिन BBC के लिए 3 साल का यह अंतराल कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि उन्हें तो बस अपनी स्टोरी में ‘भारत’ का नाम जोड़कर अपनी हेडलाइन को चमकाना था।

शाकाहारी महिला और ‘पोर्क’ से बीमारी का अनोखा दावा

चिकित्सीय तथ्यों के स्तर पर BBC की यह रिपोर्ट इतनी खोखली है कि हँसने का मन करता है। रिपोर्ट के अनुसार महिला ‘न्यूरोसिस्टिसरकोसिस’ नाम की बीमारी से पीड़ित थी। यह बीमारी मुख्य रूप से सूअर के अधपके मांस (Pork) को खाने से या उसके लावे से दूषित हुए भोजन के कारण होती है।

यहाँ सबसे बड़ा झोल यह है कि खुद उस महिला ने स्वीकार किया है कि जब वह 2007 में भारत आई थी, तो उसने फूड पॉइजनिंग से बचने के लिए पूरी यात्रा के दौरान मांस को छुआ तक नहीं था। वह पूरे 3 महीने भारत में शुद्ध शाकाहारी रही थी। भारत में वैसे भी आम तौर पर पोर्क (सूअर का मांस) मिलना और खाना बहुत सीमित है। यह आसानी से हर जगह उपलब्ध भी नहीं होता। इस पर महिला के डॉक्टर डॉ ब्रेंडन हीली ने एक बेहद अजीब थ्योरी दे दी कि महिला ने ‘अनजाने में’ ऐसा पोर्क खा लिया होगा जिसमें टेपवर्म के सूक्ष्म अंडे थे। जब एक महिला खुद कह रही है कि वह शाकाहारी थी, तो उसे जबरन पोर्क खिलाने पर आमादा डॉक्टर और BBC की यह जिद सिर्फ और सिर्फ एजेंडे का हिस्सा लगती है।

मेडिकल साइंस की समझ पर भी उठे गंभीर सवाल

BBC की इस रिपोर्ट में बीमारी के फैलने की वैज्ञानिक प्रक्रिया को भी बहुत गलत और सीधे तरीके से पेश किया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, न्यूरोसिस्टिसरकोसिस की बीमारी सीधे तौर पर सूअर का मांस खाने से दिमाग में नहीं पहुँचती। अधपका सूअर का मांस खाने से व्यक्ति के पेट में वयस्क टेपवर्म विकसित हो सकता है। लेकिन दिमाग में कीड़े (परजीवी) या सिस्ट तब बनते हैं जब कोई व्यक्ति टेपवर्म के अंडों से दूषित पानी या बेहद अस्वच्छ भोजन का सेवन करता है।

यह समस्या दुनिया के किसी भी कोने में खराब पर्सनल हाइजीन या दूषित पानी के कारण हो सकती है। खुद ब्रिटेन और अमेरिका जैसे विकसित देशों में हर साल ऐसे कई मामले सामने आते हैं जो वहीं के स्थानीय होते हैं। लेकिन BBC ने अपनी पूरी रिपोर्ट में इस वैश्विक संदर्भ को पूरी तरह से गायब कर दिया। उन्होंने यह कहीं नहीं बताया कि यह बीमारी लातिनी अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के दर्जनों देशों में आम है। संदर्भ को गायब करने का सीधा मकसद यही था कि पाठक का पूरा ध्यान सिर्फ और छोड़ सिर्फ भारत की नकारात्मक छवि पर टिका रहे।

एकतरफा रिपोर्टिंग: भारत का पक्ष पूरी तरह गायब

पत्रकारिता का एक बुनियादी नियम होता है कि अगर आप किसी देश या संस्था पर इतना गंभीर आरोप लगा रहे हैं, तो आपको उनका पक्ष भी शामिल करना चाहिए। BBC की इस लंबी-चौड़ी रिपोर्ट में आपको दूर-दूर तक किसी भी भारतीय डॉक्टर, भारतीय स्वास्थ्य अधिकारी या किसी मेडिकल एक्सपर्ट का बयान देखने को नहीं मिलेगा।

यह पूरी कहानी सिर्फ एक मरीज के व्यक्तिगत और डरावने अनुभवों पर आधारित है। BBC ने भारत के स्वास्थ्य तंत्र या यहाँ के आँकड़ों को शामिल करने की जरूरत ही नहीं समझी। यह दिखाता है कि यह एकतरफा प्रोपेगेंडा था, जिसे बेहद शातिर तरीके से तैयार किया गया था ताकि भारत के खान-पान और पर्यटन उद्योग को चोट पहुँचाई जा सके।

एक संतुलित हेडलाइन यह हो सकती थी कि ‘विदेशी यात्रा के सालों बाद महिला के दिमाग में मिला दुर्लभ परजीवी, डॉक्टर संक्रमण के स्रोत की कर रहे हैं जाँच’। लेकिन ऐसी संतुलित हेडलाइन से भारत की बदनामी कैसे होती?

पश्चिमी मीडिया की पूँछ बना भारतीय मीडिया: बिना सोचे-समझे देश पर उछाला कीचड़

BBC और ‘द इंडिपेंडेंट‘ जैसे पश्चिमी मीडिया घरानों का भारत विरोधी रवैया तो पुराना है और उनकी मजबूरी समझ आती है। लेकिन सबसे ज्यादा दुखद और शर्मनाक स्थिति तब पैदा हुई जब भारत के अपने नामचीन मीडिया हाउस भी इस बहकावे में आ गए।

द टाइम्स ऑफ इंडिया‘, ‘हिंदुस्तान टाइम्स‘ और ‘न्यूज18‘ जैसे बड़े भारतीय अखबारों और न्यूज पोर्टल्स ने बिना कोई दिमाग लगाए, बिना किसी फैक्ट-चेक के BBC की इस कूड़ा रिपोर्ट को ज्यों का त्यों अपनी वेबसाइट पर जगह दे दी।

भारतीय मीडिया ने भी अपनी हेडलाइंस में चिल्ला-चिल्ला कर लिखना शुरू कर दिया कि ‘ब्रिटिश महिला भारत से लौटी तो दिमाग में 38 कीड़े (परजीवी) थे’। हमारे देश के मठाधीश पत्रकारों ने एक बार भी यह सोचने की जहमत नहीं उठाई कि इस रिपोर्ट के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। वे सिर्फ पश्चिमी मीडिया के टूलकिट का हिस्सा बनकर अपने ही देश के खान-पान, स्वच्छता और पर्यटन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम कर रहे थे।

जब देश का अपना मीडिया ही बिना सोचे-समझे विदेशी प्रोपेगेंडा की रील्स और खबरें फॉरवर्ड करने लगे, तो बाहरी दुश्मनों की जरूरत ही नहीं रह जाती। पश्चिमी मीडिया हमेशा से भारत की बढ़ती आर्थिक और वैश्विक ताकत से चिढ़ता रहा है और उसे दबाने के लिए ऐसी मनगढ़ंत कहानियाँ गढ़ता रहता है। लेकिन भारतीय मीडिया का इस आत्मघाती खेल में शामिल होना देश के साथ एक बड़ा वैचारिक धोखा है।

सोशल मीडिया पर नेटीजन्स ने BBC को बुरी तरह धोया

जैसे ही BBC की यह रिपोर्ट इंटरनेट पर लाइव हुई, दुनिया भर के सोशल मीडिया यूजर्स का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। ट्विटर (X) पर लोगों ने BBC की इस नफरत भरी पत्रकारिता की जमकर धज्जियाँ उड़ाईं और उसे बुरी तरह ट्रोल करना शुरू कर दिया।

सोशल मीडिया पर यूजर्स ने लिखा कि BBC के पास ब्रिटेन के अंदर चल रहे पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग्स और वहाँ महिलाओं के खिलाफ हो रही ढाई लाख से ज्यादा यौन हिंसा की घटनाओं पर रिपोर्ट करने की हिम्मत नहीं है, लेकिन वे भारत को बदनाम करने के लिए 19 साल पुराना मामला ढूँढ लाए हैं।

एक यूजर ने तंज कसते हुए लिखा, “महिला 2007 में भारत आई, कीड़े (परजीवी) 2010 में मिले और BBC इस पर जहर 2026 में उगल रहा है, वाह!”

वहीं कुछ यूजर्स ने ब्रिटिश इतिहास की याद दिलाते हुए लिखा कि भारत में 200 साल के ब्रिटिश शासन ने UK को 38 से कहीं ज़्यादा परजीवी दिए। ब्रिटिश पूरे देश को लूटकर अपने साथ ले गए थे।

सोशल मीडिया पर लोगों ने साफ कहा कि BBC पूरी तरह से भारत विरोधी तत्वों के इशारे पर काम कर रहा है।

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