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‘बस नाम रहेगा अल्लाह का…’ CJP के प्रोटेस्ट में वामपंथन नंदिता नारायण ने गाई फैज की ‘हम देखेंगे’, क्रांति को रोमांटिसाइज करने वाली इस नज्म का असल मकसद ‘गजवा-ए-हिंद’

नंदिता नारायण का वैचारिक झुकाव कभी छिपा हुआ नहीं रहा। लोकतंत्र, सेकुलरिज्म, सार्वजनिक शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे आकर्षक शब्दों की आड़ में उनकी राजनीति लगातार वामपंथी संगठनों और सरकार-विरोधी मंचों के साथ खड़ी रही है।

NEET के पेपर लीक को लेकर जंतर-मंतर पर जमीन घेरने वाली कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन अब असली रंग दिखाने लगा है। हाल में वहाँ डीयू की नंदिता नारायण ने माइक लेकर मंच से पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज की नज्म ‘हम देखेंगे’ को गाया और ये समझाते हुए दिखीं कि दक्षिणपंथियों ने कैसे ‘सिर्फ नाम रहेगा अल्लाह का’ को गलत समझ लिया है जबकि हकीकत तो ये है अल्लाह हम सब में है।

ये तर्क बिलकुल वही था जो वामपंथी, हिंदुओं का ब्रेनवाश करने से पहले उन्हें देते हैं। नंदिता नारायण ने मंच से खड़े होकर इस नज्म को गाने ने साफ कर दिया कि CJP का छात्र कल्याण वाला मुखौटा उतर चुका है और मकसद अब ‘गजवा-ए-हिंद’ का सपना देखने वालों को मुख्यधारा में लाने का है। इस बात को सामान्य बनाने का है कि अल्लाह ही है जो हम सब के अंदर है और बुत उठवाना सामान्य बात है।

फैज अहमद फैज की नज्म ‘हम देखेंगे’ को भारत में अक्सर ‘क्रांति’, ‘प्रतिरोध’ और ‘लोकतंत्र बचाने’ की भाषा में पेश किया जाता है। लेकिन इस नज्म को लेकर विवाद सिर्फ इतना नहीं है कि यह सत्ता-विरोधी कविता है। सवाल यह है कि जब किसी भी राजनीतिक प्रदर्शन, छात्र आंदोलन या नागरिकता कानून विरोध तक में बात बार-बार ‘हम देखेंगे’ तक पहुँचा दी जाती है तो उसके पीछे सिर्फ कला और कविता है या एक खास वैचारिक एजेंडा भी काम करता है।

यह सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि इस नज्म की सबसे विवादित पंक्तियाँ ‘सब बुत उठवाए जाएँगे’ और ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ किसी सामान्य लोकतांत्रिक विरोध की भाषा नहीं लगतीं बल्कि इस्लामी प्रतीकों और गजवा-ए-हिंद की कल्पना से भरी हुई हैं। Rekhta पर उपलब्ध नज्म में साफ लिखा है ‘जब अर्द-ए-खुदा के काबे से, सब बुत उठवाए जाएँगे’ और आगे ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ आता है।

फोटो साभार: Rekhta

भारत जैसे देश में जहाँ हिंदू परंपरा में मूर्ति-पूजा आस्था का केंद्र है, वहाँ ‘सब बुत उठवाए जाएँगे’ और ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ को केवल लोकतांत्रिक विरोध की भाषा बताना असल में भोला बनने वाली बात है। ऐसा लगता है कि इसे गाने वाला हर शख्स एक खास प्रोपेगेंडा के साथ काम कर रहा है। इस्लामी, वामपंथी-लिबरल मंच इस्लामी प्रतीकों वाली इस नज्म को बार-बार विरोध का प्रतीक बनाकर एक खास मानसिक जमीन तैयार करते हैं।

‘व-यब्का-वज्ह-ओ-रब्बिक’: सैन्य शासन के खिलाफ नहीं, इस्लामी क्रांति से प्रेरित

इस नज्म की पृष्ठभूमि भी विवाद को और गहरा करती है। आम तौर पर कहा जाता है कि फैज ने इसे पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह जनरल जिया-उल-हक के खिलाफ लिखा था लेकिन पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ में रऊफ पारेख ने लिखा कि यह आम धारणा गलत है।

उनके मुताबिक, फैज जिया के विरोधी जरूर थे और नज्म जिया के दौर में लिखी गई लेकिन यह मूल रूप से ईरानी क्रांति से प्रेरित थी और फैज ने इसमें उस जनता को सलाम किया था जिसने व्यवस्था को पलट दिया था। डॉन में यह भी लिखा है कि नज्म का वास्तविक शीर्षक ‘हम देखेंगे’ नहीं बल्कि कुरान की सूरह रहमान की आयत से लिया गया ‘व-यब्का-वज्ह-ओ-रब्बिक’ है।

यही बात इस पूरी बहस को और गंभीर बना देती है। अगर यह नज्म ईरान की इस्लामी क्रांति से प्रेरित थी तो फिर इसे भारत में हर विरोध-प्रदर्शन का मासूम लोकतांत्रिक गीत बताना साफ तौर पर आधा सच परोसना है।

ईरान की क्रांति कोई सामान्य जनांदोलन नहीं थी। उसके बाद वहाँ लोकतंत्र नहीं बल्कि इस्लामी शासन व्यवस्था कायम हुई। इसलिए जब उसी पृष्ठभूमि से निकली पंक्तियाँ भारत के विश्वविद्यालयों, सड़कों और प्रदर्शन स्थलों पर नारे की तरह गूँजती हैं तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि इसका मकसद क्या है? तब यह केवल अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं नजर आती बल्कि गजवा-ए-हिंद स्थापित करने का एक प्लान लगती है।

CAA से लेकर शरजील इमाम तक: फैज की ‘इस्लामिक क्रांति’ की गूँज

CAA विरोध प्रदर्शनों में इस नज्म को सबसे ज्यादा राजनीतिक तौर पर इस्तेमाल किया गया। 2019-20 में जब देशभर में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ आंदोलन चल रहे थे, तब ‘हम देखेंगे’ को मंचों, नारों, पोस्टरों और गीतों में बदला गया। जामिया मिल्लिया इस्लामिया से लेकर शाहीन बाग तक, JNU से लेकर IIT कानपुर तक इस नज्म को बार-बार गाया गया। इसे आंदोलन की आवाज बताया गया जबकि इसके शब्दों में साफ-साफ दिखता है कि यह इस्लामी सत्ता के लिए राह बनाने की कोशिश है। जिस आंदोलन को नागरिकता और संविधान की भाषा में बेचा जा रहा था, उसके केंद्र में एक ऐसी नज्म रखी गई जो ‘गजवा-ए-हिंद’ के विचार से भरी हुई है।

इन कार्यक्रमों में फैज की इस नज्म को गाने वाले लोग यह मनगढ़ंत दावा करते हैं कि भई फैज तो वामपंथी थे, वो तो अल्लाह में नहीं मानते थे तो यह इस्लामी शासन की प्रतीक कैसे हो सकती है? वामपंथियों के पोस्ट बॉय शरजील इमाम से जब फैज को समझने की कोशिश करते हैं तो यह साफ नजर आता है कि उसने फैज को केवल वामपंथी या सेक्युलर कवि मानने से इनकार किया था। उसने साफ लिखा था कि फैज की कविता इस्लामी प्रतीकों और मुस्लिम क्रांतिकारी विचार से भरी हुई है।

2017 में Sabrang India पर शरजील इमाम और साकिब सलीम ने ‘Faiz Ahmad Faiz and the de-Islamisation of a Muslim revolutionary’ शीर्षक से लेख लिखा। इस लेख में उन्होंने कहा कि वामपंथी हलकों ने फैज को कम्युनिस्ट कवि के रूप में पेश किया और उनकी इस्लामी पहचान को या तो अप्रासंगिक या संयोग बताया। शरजील और सलीम ने ‘हम देखेंगे’ की पंक्तियों को कुरानिक प्रतीकों से जोड़ते हुए लिखा कि ‘लौह-ए-अजल’, कयामत, काबा, बुतों का हटना और ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ जैसे प्रतीक इस्लामी विचार से आते हैं।

इसी लेख में शरजील-सलीम लिखते हैं कि फैज ने खुद को मुस्लिम कवि घोषित किया था। इस लेख में लिखा गया है, “फैज के साथी मेजर इशाक बताते हैं कि जब वे दोनों एक साथ जेल में थे, तो फैज ने हैदराबाद जेल में कैदियों को कुरान और हदीस पढ़ाया था। फैज खुद बताते हैं कि एक कर्नल ने उनसे स्पष्ट रूप से पूछा था कि जब वे नास्तिक हैं तो कुरान क्यों पढ़ा रहे हैं। जब फैज ने स्पष्ट किया कि वे मुसलमान हैं।” यानी फैज के सेक्युलर होने की जो घुट्टी पिलाई जाती है, वो बस आँखों में धूल झोंकने की एक कोशिश है।

सेक्युलर क्रांति का नारा नहीं, इस्लामिक प्रभुत्व की घोषणा है ‘हम देखेंगे’

लेफ्ट-लिबरल जमात का यही खेल है। वे सीधे इस्लामी राजनीतिक नारे नहीं लगाते बल्कि उन्हें कविता, कला, प्रतिरोध और संस्कृति की भाषा में पैक कर देते हैं। ‘हम देखेंगे’ इसी पैकेजिंग का सफल उदाहरण है। यह नज्म मंच पर क्रांति लगती है, पोस्टर पर कला लगती है, विश्वविद्यालय में प्रतिरोध लगती है लेकिन इसकी जड़ में इस्लामी गजवा-ए-हिंद की कल्पना है, जो हर तरफ बस इस्लामी शासन चाहती है।

यह इस्लामी सत्ता की कल्पना या यूँ कहें कि चाहत से भरी नज्म है। इसका बार-बार भारतीय विरोध प्रदर्शनों में इस्तेमाल इस्लामी प्रतीकों को सामान्य बनाने की कोशिश है। ‘सिर्फ नाम रहेगा अल्लाह का’ किसी सेक्युलर क्रांति का नारा नहीं हो सकता। यह इस्लामी प्रभुत्व की घोषणा है। इसका राजनीतिक इस्तेमाल साफ बताता है कि ‘हम देखेंगे’ भारत में सांस्कृतिक प्रतिरोध नहीं बल्कि इस्लामी राजनीतिक जमीन तैयार करने वाला वैचारिक हथियार बन चुकी है।

कौन हैं CJP के प्रदर्शन में ‘हम देखेंगे’ पढ़ने वाली नंदिता नारायण?

इस सब उदाहरणों से स्पष्ट है ना कि तो फैज कोई बहुत सेकुलर आदमी हैं और ना ही यह नज्म कोई सत्ता विरोधी क्रांति का प्रतीक है फिर भी नंदिता नारायण जैसे लोग इसे अपने मन से क्रांति का प्रतीक बनाकर पेश करते हैं। नंदिता ने CJP के प्रोटेस्ट में ना केवल यह नज्म पढ़ी बल्कि इस बात के लिए भी दक्षिणपंथी लोगों को जिम्मेदार बताया कि वे इससे दुखी हो जाते हैं।

नंदिता नारायण CJP के प्रोटेस्ट में जब यह नज्म गा रही थीं तो अल्लाह को अपनी तरह से परिभाषा कर रही थीं। ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ गाते हुए उन्होंने कहा कि इससे ही दक्षिणपंथी लोगों को दिक्कत होती है और इससे भी एक कदम आगे बढ़कर उन्होंने कहा, “अल्लाह सर्वोच्च ‘वेदांत’ है, अल्लाह का मतलब वो शक्ति जो हम सबमें है।”

नंदिता नारायण दिल्ली विश्वविद्यालय की उन चर्चित शिक्षक-कार्यकर्ताओं में रही हैं जिनके लिए कक्षा से अधिक महत्वपूर्ण अक्सर आंदोलन, धरना, प्रशासन-विरोध और वामपंथी राजनीति दिखाई दी। सेंट स्टीफेंस कॉलेज में 42 वर्षों तक गणित पढ़ाने वाली नंदिता नारायण ने अपने लंबे अकादमिक करियर के समानांतर दिल्ली विश्वविद्यालय की शिक्षक राजनीति में खुद को एक मजबूत वामपंथी चेहरे के तौर पर तैयार किया है। DUTA, FEDCUTA और Democratic Teachers Front जैसे संगठनों से जुड़कर उन्होंने खुद को शिक्षक नेता से अधिक एक वैचारिक कार्यकर्ता के रूप में स्थापित किया।

नंदिता नारायण का वैचारिक झुकाव कभी छिपा हुआ नहीं रहा। लोकतंत्र, सेकुलरिज्म, सार्वजनिक शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे आकर्षक शब्दों की आड़ में उनकी राजनीति लगातार वामपंथी संगठनों और सरकार-विरोधी मंचों के साथ खड़ी रही है। फीस वृद्धि, स्वायत्तता, नई शिक्षा नीति, प्रवेश परीक्षा और प्रशासनिक बदलाव हर मुद्दे को नियो-लिबरल हमला बताकर आंदोलन खड़ा करना उनकी सक्रियता का स्थायी तरीका रहा।

नंदिता नारायण की सक्रियता लंबे समय तक विवादों से घिरी रही। दिल्ली विश्वविद्यालय और सेंट स्टीफेंस कॉलेज प्रशासन की ओर से उनके आचरण, अन्य कॉलेजों के मामलों में दखल, कथित अपमानजनक टिप्पणियों और प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ सार्वजनिक अभियान को लेकर शिकायतें सामने आईं। उनके खिलाफ तथ्य-जाँच समितियाँ गठित की गईं और कई मामलों में विवाद अदालत तक पहुँचा। नंदिता नारायण और उनके समर्थकों ने इसे प्रताड़ना और असहमति दबाने की कोशिश बताते रहे हैं।

रिटायरमेंट के बाद भी उनका राजनीतिक अभियान समाप्त नहीं हुआ। वे भारत के धर्मनिरपेक्ष बदलाव के लिए लोकतांत्रिक जन-संपर्क (Democratic Outreach for Secular Transformation of India) और शिक्षा आंदोलन के लिए संयुक्त मंच (Joint Forum for Movement on Education) जैसी पहलों से जुड़ी रहीं। वर्ष 2026 में कॉकरोच जनता पार्टी के जंतर-मंतर प्रदर्शन में उनकी मौजूदगी ने साफ कर दिया कि उनका उद्देश्य केवल शिक्षक अधिकारों तक सीमित नहीं है।

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शिव
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7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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