चीन पर लंबे समय से दुनिया के प्रमुख लोकतांत्रिक देशों के चुनावों में अलग-अलग तरीकों से दखल देने और उन्हें प्रभावित करने के आरोप लगते रहे हैं। अब अमेरिका में ट्रंप प्रशासन ने वर्ष 2020 से जुड़े खुफिया और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के कई दस्तावेजों को सार्वजनिक किया है।
इन दस्तावेजों में दावा किया गया है कि चीन ने 20 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं का डेटा हासिल कर लिया था और अमेरिकी चुनाव प्रणाली की कमजोरियों का फायदा उठाकर चुनाव को जो बाइडेन के पक्ष में प्रभावित करने की कोशिश की थी।
चीन ने अमेरिकी वोटर्स का डेटा चुराकर किया इस्तेमाल, ट्रंप ने गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए जाँच के दिए आदेश
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 16 जुलाई 2026 को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में 2020 के चुनावों से जुड़े कई गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक किए। उन्होंने दावा किया कि इन दस्तावेजों से अमेरिकी चुनावी व्यवस्था की गंभीर कमजोरियाँ सामने आती हैं और इसी वजह से उन्होंने यह जाँच कराने का आदेश दिया है कि चीन के कथित चुनावी हस्तक्षेप से जुड़ी खुफिया जानकारी उनके पहले कार्यकाल के दौरान आखिर क्यों दबाई गई या सार्वजनिक नहीं की गई।
अपने संबोधन में ट्रंप ने कहा, “आज रात मैं महत्वपूर्ण खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की घोषणा कर रहा हूँ। ये दस्तावेज हमारी चुनावी व्यवस्था की चौंकाने वाली कमजोरियों को उजागर करते हैं। इससे पता चलता है कि चुनाव प्रणाली हैकिंग, दुरुपयोग और विदेशी हस्तक्षेप के लिए पहले से कहीं अधिक संवेदनशील रही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि वर्षों तक यह महत्वपूर्ण जानकारी अमेरिकी जनता से छिपाकर रखी गई।”
US President Donald Trump: Newly declassified documents show that over a period of years starting during the 2020 election cycle, the People’s Republic of China carried out what is believed to be the largest compromise of election data in history — resulting in China’s illicit…
— Aditya Raj Kaul (@AdityaRajKaul) July 17, 2026
ट्रंप ने अमेरिकी खुफिया एजेंसियों पर आरोप लगाया कि उन्होंने चीन के कथित चुनावी हस्तक्षेप और उन्हें हराने की साजिश से जुड़ी जानकारी को दबाकर रखा। उन्होंने इस मामले की जाँच के लिए ऑफिस ऑफ द डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस (ODNI), न्याय विभाग (DOJ), फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (FBI) और सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) को जाँच शुरू करने का निर्देश दिया।
ट्रंप ने यह भी कहा कि अब स्थिति बदल रही है और जिन दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जा रहा है, उन्हें व्हाइट हाउस की गवर्नमेंट ट्रांसपेरेंसी टास्क फोर्स और राष्ट्रपति के इंटेलिजेंस एडवाइजरी बोर्ड ने तैयार किया है। उनके अनुसार, अमेरिका की शीर्ष खुफिया एजेंसियों के प्रमुखों ने इन दस्तावेजों की समीक्षा की है और उनकी प्रामाणिकता की पुष्टि की है।
ट्रंप का दावा है कि सार्वजनिक किए गए दस्तावेज पाँच बड़े मुद्दों से जुड़े हैं। इनमें सबसे बड़ा आरोप यह है कि 2020 के चुनाव के दौरान चीन ने अमेरिकी चुनावी डेटा में इतिहास की सबसे बड़ी सेंध लगाई और अवैध रूप से 22 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं का डेटा हासिल कर लिया।
ट्रंप के मुताबिक, इस डेटा में मतदाताओं के नाम, पते, फोन नंबर, राजनीतिक दलों से जुड़ी जानकारी और अन्य संवेदनशील विवरण शामिल थे, जिनका इस्तेमाल वोटर पंजीकरण में गड़बड़ी और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों के लिए किया जा सकता था।
उन्होंने इसे ‘अमेरिकी चुनावी सुरक्षा के लिए अभूतपूर्व संकट’ बताते हुए दावा किया कि अमेरिकी खुफिया जानकारी के अनुसार, चीन ने इस डेटा का इस्तेमाल करने के लिए एक विशेष डेटा एक्सप्लॉइटेशन यूनिट भी बनाई थी।
गुरुवार (16 जुलाई 2026) को जारी किए गए दस्तावेजों के दूसरे हिस्से में दावा किया गया है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के तथाकथित ‘डीप स्टेट’ से जुड़े अधिकारियों ने चीन के कथित चुनावी हस्तक्षेप की गंभीरता से जुड़ी जानकारी को जानबूझकर दबाया और उसे कम करके दिखाया।
ट्रंप के अनुसार, यह जानकारी न केवल तत्कालीन राष्ट्रपति से बल्कि अमेरिकी जनता से भी छिपाकर रखी गई। गोपनीयता से मुक्त किए गए मेमो का हवाला देते हुए ट्रंप ने आरोप लगाया कि वर्ष 2020 में चीन ने अमेरिका के 18 राज्यों में करोड़ों मतदाताओं का डेटा खरीदा, चुराया या हैक कर लिया था।

ट्रंप ने कहा, “राष्ट्रपति होने के बावजूद मुझे या किसी और को इसकी जानकारी नहीं दी गई। हमारी जानकारी के अनुसार कॉन्ग्रेस को भी इससे अवगत नहीं कराया गया। इसके बजाय बार-बार यही कहा जाता रहा कि यह हमारे देश के इतिहास का सबसे सुरक्षित चुनाव था।”
सार्वजनिक किए गए गोपनीय दस्तावेजों के अनुसार, अप्रैल 2020 से चीन की खुफिया एजेंसियाँ अमेरिका के विभिन्न राज्यों के मतदाता पंजीकरण से जुड़े कई डेटा सेट का विश्लेषण कर रही थीं। व्हाइट हाउस द्वारा जारी जिप फाइल में ऐसे कई गोपनीय मेमो शामिल हैं, जिनमें मतदाता पंजीकरण रिकॉर्ड तक पहुँच या उनमें कथित सेंध लगाए जाने का उल्लेख किया गया है।

सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों में से एक में दावा किया गया है कि अगस्त 2020 में चीनी सरकार ने बड़ी संख्या में नकली अमेरिकी ड्राइविंग लाइसेंस तैयार कर उन्हें गुप्त रूप से अमेरिका भेजा था। दस्तावेज के अनुसार, इन फर्जी लाइसेंसों का इस्तेमाल ऐसे हजारों चीनी छात्रों और प्रवासियों, जिन्हें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) का समर्थक बताया गया है, को अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बाइडेन के पक्ष में मतदान कराने के लिए किया जाना था, जबकि वे अमेरिका में मतदान करने के पात्र नहीं थे।

गोपनीयता से मुक्त किए गए एक दस्तावेज में दावा किया गया है कि चीन ने टिकटॉक के लाखों अमेरिकी यूजर्स का निजी डेटा, जिसमें उनके नाम, पहचान संबंधी जानकारी और पते शामिल थे, इकट्ठा किया था। दस्तावेज के अनुसार, इस जानकारी का इस्तेमाल असली अमेरिकी नागरिकों के नाम पर फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस बनाने के लिए किया जा सकता था।
इन नकली लाइसेंसों में अमेरिकी नागरिकों के वास्तविक पहचान नंबर और पते शामिल होने से उन्हें पकड़ना बेहद मुश्किल होता। दस्तावेज में यह भी दावा किया गया है कि चीन की योजना इन फर्जी लाइसेंसों के जरिए हजारों मेल-इन वोट डलवाने की थी।
सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों में यह भी आरोप लगाया गया है कि चीन ने टिकटॉक, फेसबुक, यूट्यूब, ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ-साथ प्रभावशाली लोगों, पत्रकारों और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से जुड़े नेटवर्क के माध्यम से अमेरिकी जनमत को प्रभावित करने की रणनीति बनाई थी।
दस्तावेजों के अनुसार, चीन ने अमेरिका में प्रवासी समुदायों के बीच सरकार के खिलाफ असंतोष बढ़ाने, ब्लैक लाइव्स मैटर (Black Lives Matter) आंदोलन को हवा देने और विभिन्न प्रमुख मुद्दों पर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की।
ट्रंप ने यह भी दावा किया कि चीनी सरकार ने ऐसे अमेरिकी पत्रकारों की पहचान करने की कोशिश की, जिन्होंने राष्ट्रपति के खिलाफ नकारात्मक रिपोर्टिंग की थी और उन्हें राष्ट्रपति के खिलाफ और अधिक नकारात्मक लेख लिखने के लिए बड़ी रकम देने का प्रयास किया।” हालाँकि उन्होंने किसी भी ऐसे पत्रकार का नाम सार्वजनिक नहीं किया।
दस्तावेजों के अनुसार, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने अमेरिका के उन आंतरिक मुद्दों की पहचान की, जिनका इस्तेमाल समाज में विभाजन बढ़ाने के लिए किया जा सकता था।
इनमें प्रवासी समुदायों में सरकार के खिलाफ असंतोष पैदा करना, कथित मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर विरोध प्रदर्शनों को बढ़ावा देना, प्रवासी विरोधी और प्रवासी समर्थक समूहों के बीच तनाव बढ़ाना तथा आव्रजन विरोधी प्रदर्शनों को भड़काने जैसी गतिविधियाँ शामिल होने का दावा किया गया है।

दस्तावेजों में यह भी आरोप लगाया गया है कि चीन ने नस्लीय तनाव भड़काने की भी कोशिश की। इसके लिए उसने यह नैरेटिव फैलाया कि ट्रंप के नेतृत्व वाला व्हाइट हाउस अश्वेत लोगों से नफरत करता है। दस्तावेजों के अनुसार, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने नस्लीय विभाजन के सबूत के तौर पर प्रदर्शन और मार्च आयोजित कराने या उन्हें बढ़ावा देने का प्रयास किया।
इसके अलावा चीन ने यह नैरेटिव भी फैलाया कि अमेरिकी सरकार और कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के बीच बुनियादी स्तर पर गंभीर मतभेद हैं।

इन दस्तावेजों में कुछ राज्यों की मतदाता सूचियों में गैर-नागरिकों के पंजीकरण जैसे अन्य प्रमुख विषय भी शामिल हैं। व्हाइट हाउस के अनुसार, गोपनीयता से मुक्त किए गए दस्तावेज़ों से संकेत मिलता है कि अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (Department of Homeland Security) का मत था कि कई प्रमुख राज्यों की मतदाता सूचियों में कम से कम 2.5 लाख गैर-नागरिक दर्ज थे।
कुल मिलाकर ट्रंप प्रशासन का मानना है कि गोपनीयता से मुक्त कर सार्वजनिक किए गए दस्तावेज यह संकेत देते हैं कि चीन ने सीधे तौर पर मतपत्रों में बदलाव नहीं किया (हालाँकि ट्रंप ने FBI की 2020 की ‘रॉ इंटेलिजेंस’ का हवाला देते हुए दावा किया कि चीन ने जो बाइडेन के लिए मतपत्र तैयार करने की कोशिश की थी), न ही उसने वोटों की कुल संख्या बदली और न ही मतगणना में इस तरह का हस्तक्षेप किया जिससे 2020 के चुनाव का परिणाम पलट गया हो। लेकिन चीन ने ट्रंप की हार और बाइडेन की जीत सुनिश्चित करने के लिए अमेरिकी चुनावों में हस्तक्षेप जरूर किया।
हालाँकि ट्रंप के आलोचक, जिनमें अमेरिका की पारंपरिक मीडिया भी शामिल है, राष्ट्रपति की इस प्रस्तुति को उनके राजनीतिक लाभ के लिए डेटा तक पहुँच से जुड़े निष्कर्षों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना बता रहे हैं। लेकिन दूसरे देशों की घरेलू राजनीति और चुनावों को प्रभावित करने की चीन की व्यापक प्रवृत्ति को देखते हुए, उनके दावे विश्वसनीय प्रतीत होते हैं।
OpIndia ने पहले रिपोर्ट किया था कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने गैर-लाभकारी संगठनों, एक्टिविस्ट समूहों, थिंक टैंक और मीडिया संस्थानों का एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क खड़ा किया, जो उसके प्रचार तंत्र के रूप में काम करता है।
CCP ने अमेरिका में जन्मे टेक उद्योगपति नेविल रॉय सिंघम के नेतृत्व में एक प्रो-चीन सूचना-प्रचार (information laundering) नेटवर्क तैयार किया।
सिंघम ने 2017 में अपनी आईटी कंसल्टिंग कंपनी Thoughtworks को लगभग 78.5 करोड़ डॉलर में बेचने के बाद शंघाई में जाकर निवास करना शुरू किया था। यह इन्फॉर्मेशन लॉन्ड्रिंग नेटवर्क कच्चे सामाजिक आंदोलनों (raw activism) को व्यवस्थित प्रचार (polished propaganda) में बदलता है।
इसके बाद रॉय सिंघम द्वारा वित्तपोषित नेटवर्क उसे अमेरिका और अन्य लोकतांत्रिक देशों में मतभेद पैदा करने के लिए फैलाता है, जबकि चीन की छवि को ‘साम्राज्यवाद’, विशेष रूप से अमेरिकी साम्राज्यवाद, के मुकाबले एक ‘हितैषी’ विकल्प के रूप में पेश करता है। रिपोर्ट के अनुसार, क्यूबा में जारी वामपंथी सक्रियता इसका एक स्पष्ट उदाहरण है।
अमेरिका में फिलिस्तीन समर्थक आंदोलन, ट्रंप की क्यूबा में बढ़ती रुचि के बीच वहाँ बड़ी संख्या में वामपंथी कार्यकर्ताओं का पहुँचना और ईरान युद्ध को लेकर ‘नो वॉर’ अभियान जैसे आंदोलन देखने में स्वतःस्फूर्त और वास्तविक लगते हैं। लेकिन रिपोर्ट का दावा है कि ये वास्तव में सुनियोजित, पर्याप्त वित्तपोषित और राजनीतिक उद्देश्य से चलाए गए अभियान हैं, जिनके पीछे नेविल रॉय सिंघम के परोपकारी संगठनों, थिंक टैंक, मीडिया, कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, हस्तियों, राजनीतिक संगठकों और सहयोगियों का नेटवर्क है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2017 से नेविल रॉय सिंघम ने अपने चीन समर्थक प्रचार नेटवर्क में सीधे 27.8 करोड़ डॉलर से अधिक की फंडिंग की, जबकि 2025 तक पाँच महाद्वीपों में 223 लेनदेन के जरिए कुल धन प्रवाह 59.1 करोड़ डॉलर से अधिक रहा। यह भारी धनराशि 1,000 से अधिक आपस में जुड़े संगठनों तक पहुँची, जिनमें से करीब 200 संगठन सीधे तौर पर CCP के निर्देश पर चीन समर्थक और अमेरिका विरोधी संदेश तैयार करने और फैलाने में शामिल थे।
दूसरे देशों की राजनीति और चुनावों में चीन का हस्तक्षेप: क्या है CCP की ‘यूनाइटेड फ्रंट’ रणनीति
चीन के लिए सिर्फ अपने देश में ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों में भी नैरेटिव, सत्ता और अपने हितों का सबसे अहम माध्यम है। तियानआनमेन स्क्वायर नरसंहार की सच्चाई दबाने से लेकर सरकार-विरोधी आलोचनाओं पर रोक लगाने तक, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) का मानना है कि उसका अस्तित्व और निर्विवाद शासन नैरेटिव पर नियंत्रण पर निर्भर करता है।
दरअसल CCP की एक राजनीतिक रणनीति है, जिसे ‘यूनाइटेड फ्रंट (United Front)’ कहा जाता है। इसका उद्देश्य विरोधियों को अलग-थलग करना और व्यापारिक समूहों, गैर-कम्युनिस्ट संगठनों तथा अल्पसंख्यक समुदायों जैसे संभावित सहयोगियों को अपने पक्ष में करना है।
CCP का यूनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट (UFWD) एक अच्छी तरह से वित्तपोषित इकाई है, जो विभिन्न देशों में कई फ्रंट संगठनों के माध्यम से चीन के हितों को आगे बढ़ाने और उसका प्रभाव बढ़ाने का काम करती है। ये फ्रंट संगठन खुलकर यह नहीं बताते कि उनका संबंध CCP से है।
इन संगठनों के जरिए सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों, चीन में पंजीकृत निजी कंपनियों, चीनी छात्र संगठनों, विदेशी सांस्कृतिक संस्थाओं, विदेशी मीडिया, चीनी मूल के समुदायों तथा प्रभावशाली कारोबारी और राजनीतिक हस्तियों को लोकतांत्रिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं के माध्यम से CCP के उद्देश्यों का समर्थन करने के लिए जोड़ा जाता है।
‘यूनाइटेड फ्रंट’ रणनीति, जिसे माओ जेदोंग अपनी ‘जादुई हथियार (Magic Weapon)’ कहा करते थे, के तहत CCP प्रभाव संचालन (Influence Operations) चलाती है, दुष्प्रचार (Disinformation) तैयार करती और फैलाती है, प्रभावशाली लोगों को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश करती है, आर्थिक दबाव बनाती है, साइबर जासूसी करती है और प्रॉक्सी नेटवर्क खड़े करती है, ताकि दूसरे देशों में अपने हितों के अनुरूप नैरेटिव, नीतियों और जनमत को प्रभावित किया जा सके।
इस रणनीति के तहत मीडिया, थिंक टैंक, शैक्षणिक संस्थानों और प्रवासी संगठनों को वित्तीय सहायता देना या उन्हें प्रभावित करना, विदेशी सरकारों और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की कमजोरियों का फायदा उठाना और कुछ मामलों में अशांति भड़काना भी शामिल होता है।
चीन यूनाइटेड फ्रंट वर्क का इस्तेमाल खुफिया जानकारी जुटाने और विरोधियों के दमन के लिए भी करता है। हालाँकि दूसरे देशों के चुनावों में हस्तक्षेप करने या उन्हें प्रभावित करने की कोशिश केवल चीन तक सीमित नहीं है, लेकिन CCP जैसी केंद्रीकृत व्यवस्था के जरिए इतने बड़े पैमाने पर इस तरह के प्रभाव या शासन परिवर्तन (Regime Change) के प्रयास करने वाला शायद ही कोई दूसरा देश है।
कनाडा के संघीय चुनावों में चीनी हस्तक्षेप के आरोप
अमेरिका से पहले चीन पर कनाडा के चुनावों में हस्तक्षेप करने के भी आरोप लग चुके हैं। जून 2024 में कनाडा की खुफिया निगरानी संस्था नेशनल सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस कमेटी ऑफ पार्लियामेंटेरियंस (NSICOP) ने ‘Special Report on Foreign Interference in Canada’s Democratic Processes and Institutions’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की।
इस रिपोर्ट में कनाडा की चुनावी और विधायी प्रक्रियाओं में चीन के व्यापक हस्तक्षेप का दावा किया गया। रिपोर्ट के संपादित (Redacted) संस्करण में यह भी उल्लेख है कि कुछ कनाडाई सांसदों ने चीन के साथ मिलीभगत की थी।

रिपोर्ट के अनुसार, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के समर्थन से कुछ चीनी नागरिक कनाडा की शासन व्यवस्था और अर्थव्यवस्था के हर स्तर में घुसपैठ करने और उसे प्रभावित करने के लिए सुनियोजित प्रयास करते रहे हैं और अब भी कर रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया कि CCP ने कनाडा के चुनावों में अवैध हस्तक्षेप, कनाडाई अधिकारियों को रिश्वत देने और संसाधनों के दोहन के लिए कनाडा के मूल निवासियों (Indigenous people) का गुप्त तरीकों से इस्तेमाल करने की कोशिश की। इसका उल्लेख रिपोर्ट के 2019 के गैर-संपादित (Non-redacted) संस्करण में भी किया गया था।
रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने कनाडा और अन्य देशों में ‘ओवरसीज पुलिस स्टेशन’ (Overseas Police Stations) भी स्थापित किए थे। ट्रंप द्वारा अमेरिकी चुनावों में चीनी हस्तक्षेप के लगाए गए आरोपों की तरह ही NSICOP की रिपोर्ट में कहा गया कि चीन ने सोशल मीडिया और पारंपरिक मीडिया (Legacy Media) का इस्तेमाल कर कनाडाई मतदाताओं, विभिन्न जातीय-सांस्कृतिक समुदायों और सांसदों की राय को प्रभावित करने की कोशिश की।
2021 के कनाडाई संघीय चुनाव के दौरान सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस थ्रेट्स टू इलेक्शंस टास्क फोर्स (SITE) ने पाया कि मुख्यधारा के मीडिया और सोशल मीडिया पर ऐसी गतिविधियाँ चल रही थीं, जिनका उद्देश्य मतदाताओं को कंजर्वेटिव पार्टी के समर्थन से हतोत्साहित करना था।
हालाँकि इन गतिविधियों का सीधा संबंध चीनी सरकार से स्थापित नहीं हो सका, लेकिन जाँच में सामने आए पैटर्न ने चीन द्वारा संचालित एक समन्वित अभियान की ओर संकेत किया। कनाडियन सिक्योरिटी इंटेलिजेंस सर्विस (CSIS) के आँकलन और हॉग आयोग (Hogue Commission) 2024 की सार्वजनिक जाँच में कहा गया कि बीजिंग ने 2019 और 2021 के कनाडाई संघीय चुनावों में गुप्त और भ्रामक तरीके से हस्तक्षेप किया।
रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने जस्टिन ट्रूडो के नेतृत्व वाली लिबरल पार्टी का समर्थन किया। इसके लिए अनुकूल सोशल मीडिया प्रचार, चीनी-कनाडाई समुदाय में प्रॉक्सी एजेंटों का इस्तेमाल और अनुकूल उम्मीदवारों के चुनाव अभियान को वित्तीय सहायता देने जैसे तरीकों का उपयोग किया गया।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कनाडाई सांसदों पर CCP का प्रभाव इतना बढ़ गया था कि संसद में चीन के पक्ष या विपक्ष में व्यक्त किए गए विचारों के आधार पर सांसदों को पुरस्कृत या दंडित किया जाता था। चीन का चुनावी हस्तक्षेप अमेरिका और कनाडा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारत जैसे उसके प्रतिद्वंद्वी पड़ोसी देश तक भी पहुँचता है।
भारतीय राजनीति में चीनी हस्तक्षेप: न्यूजक्लिक मामला
अमेरिकी चुनावों में CCP के हस्तक्षेप के ताजा आरोप भारत की चुनावी राजनीति में चीन के लगातार हस्तक्षेप की याद दिलाते हैं। वर्षों से चीन से जुड़े प्रभाव अभियानों, चाहे वे मीडिया संस्थान हों, राजनेता हों या संदिग्ध NGO ने मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव गढ़े हैं, जिनका अंतिम उद्देश्य सत्ता परिवर्तन (Regime Change) बताया गया है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण न्यूज़क्लिक (NewsClick) मामला है। चीन समर्थक प्रचार पोर्टल पहली बार 2021 में उस समय सुर्खियों में आया, जब वह प्रवर्तन निदेशालय (ED) के रडार पर आया। इस पोर्टल पर कथित तौर पर करीब 38 करोड़ रुपए की विदेशी फंडिंग धोखाधड़ी से प्राप्त करने का आरोप लगा था।
2023 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत न्यूजक्लिक के संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ, एचआर प्रमुख अमित चक्रवर्ती समेत अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की और बाद में विस्तृत आरोपपत्र दाखिल किया।
अमेरिका में प्रो-चीन इन्फॉर्मेशन लॉन्ड्रिंग नेटवर्क चलाने वाले वही नेविल रॉय सिंघम भारत में भी अपना नेटवर्क फैला चुके हैं। रॉय सिंघम के Justice and Education Fund ने दिल्ली स्थित चीन समर्थक प्रचार पोर्टल न्यूज़क्लिक को 1.05 करोड़ डॉलर (10.5 मिलियन डॉलर) का दान दिया।
रॉय सिंघम के नेटवर्क के सबसे प्रमुख सदस्यों में विजय प्रसाद शामिल हैं। उन्होंने न्यूजक्लिक के लिए भारत विरोधी प्रचार वाले कई लेख लिखे हैं। विजय प्रसाद CPI(M) नेता बृंदा करात के भतीजे हैं। बृंदा करात, प्रकाश करात की पत्नी हैं, जो CPI(M) के वरिष्ठ नेता हैं।
न्यूजक्लिक की चीनी फंडिंग मामले में पहले सामने आए ईमेल आदान-प्रदान से नेविल रॉय सिंघम और करात परिवार के बीच करीबी संबंधों का खुलासा हुआ था। विजय प्रसाद प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल (Progressive International) के काउंसिल सदस्य भी रह चुके हैं।
यह एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जो दुनिया भर के वामपंथी कार्यकर्ताओं और संगठनों को संगठित करता है। OpIndia पहले भी बता चुका है कि यह संगठन लगातार ऐसे प्रचार लेख और बयान प्रकाशित करता है, जिनमें मुस्लिम पीड़ित होने (Muslim Victimhood) के नैरेटिव को आगे बढ़ाकर मोदी सरकार को बदनाम किया जाता है।
यह मंच नियमित रूप से हर्ष मंदर जैसे हिंदू विरोधी और इस्लामवादी समर्थकों को जगह देता है, जबकि जयति घोष और ब्रिटेन के पूर्व लेबर सांसद जेरेमी कॉर्बिन इसके काउंसिल सदस्यों में शामिल हैं। रॉय सिंघम के प्रचार नेटवर्क का संबंध हमास समर्थक Tides Foundation से भी है।
यह फाउंडेशन कई हिंदू विरोधी और भारत विरोधी संगठनों तथा तत्वों को फंडिंग देने के लिए बदनाम है। इसने हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) को भी अनुदान दिया, जिसके संबंध इस्लामवादी और खालिस्तानी तत्वों से बताए गए हैं। HfHR की स्थापना 2019 में इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) और ऑर्गनाइजेशन फॉर माइनॉरटीज ऑफ इंडिया (OFMI) नामक दो इस्लामवादी वकालत करने वाले संगठनों ने की थी।
Tides Foundation ने AMAN पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट (AMAN) को भी फंडिंग दी। इस ट्रस्ट का संबंध न्यूजक्लिक-चीन फंडिंग मामले से बताया गया है, जिसमें आरोप है कि भारत की संप्रभुता को बाधित करने के लिए चीनी संस्थाओं ने न्यूज़क्लिक को धन उपलब्ध कराया।
नेविल रॉय सिंघम ने भारत से जिन लोगों को अपने बड़े नेटवर्क से जोड़ा और जिन्होंने Tricontinental के साथ काम किया, उनमें प्रबीर पुरकायस्थ, सृजना, प्रशांत और विजय प्रसाद शामिल थे। The New York Times ने Tricontinental को उन गैर-लाभकारी संस्थाओं में शामिल बताया था, जो चीन के पक्ष में प्रचार करती थीं।
विजय प्रसाद के अर्बन नक्सल पी साईनाथ से भी करीबी संबंध हैं। उनके प्रचार पोर्टल PARI ने बाद में नेविल रॉय सिंघम के संदर्भ हटा दिए, जब उनके चीन के प्रचार नेटवर्क से जुड़े होने का मामला सामने आया। OpIndia लगातार न्यूजक्लिक के हिंदू विरोधी प्रचार को उजागर करता रहा है।
इसके अलावा न्यूजक्लिक पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से कथित संबंधों को लेकर भी जाँच होती रही है। 2023 में The New York Times की जाँच में कार्यकर्ताओं, गैर-लाभकारी संस्थाओं, शेल कंपनियों और चीन से जुड़े प्रचार नेटवर्क का खुलासा हुआ, जिसके केंद्र में नेविल रॉय सिंघम थे।
2024 में दिल्ली पुलिस द्वारा दाखिल आरोपपत्र में चीनी सरकार को ‘Ultimate Paymaster’ बताया गया और कहा गया कि कश्मीर तथा किसान आंदोलन जैसे मुद्दों पर भारत विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देने के लिए धन भेजा गया। यह मामला फिलहाल कोर्ट में लंबित है।
2021 में OpIndia ने न्यूजक्लिक के संबंधों पर एक विस्तृत जाँच की थी और बताया था कि उसका संबंध ऐसे कई लोगों से था, जो नियमित रूप से भारत के खिलाफ जहर उगलते रहे हैं। इनमें अर्बन नक्सल, तीस्ता सीतलवाड़, अभिसार शर्मा और कई अन्य नाम शामिल थे।
ऑपइंडिया की वह रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है।
रॉय सिंघम के नेटवर्क से जुड़े कई चीन समर्थक प्रचार तंत्र आज भी भारत विरोधी और सरकार विरोधी नैरेटिव चला रहे हैं। OpIndia ने People’s Dispatch, TriContinental, People’s Forum समेत ऐसे कई संगठनों के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित की है।
कश्मीरी अलगाववाद, हिंदू विरोधी नैरेटिव, केरल के ‘कम्युनिस्ट मॉडल’ का महिमामंडन, मुस्लिम पीड़ित होने का नैरेटिव और भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचाने वाले प्रचार से लेकर, CCP से जुड़े नेविल रॉय सिंघम समर्थित ये संस्थाएँ मुद्दों, गैर-लाभकारी संस्थाओं से जुड़े कानूनों, डिजिटल मीडिया और उपलब्ध हर संसाधन का इस्तेमाल प्रतिद्वंद्वी देशों को कमजोर करने, नीतिगत फैसलों को प्रभावित करने, भारत को कमजोर करने और चीन को भू-राजनीतिक बढ़त दिलाने के लिए करती हैं।
इस वर्ष फरवरी में, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के तहत विदेशी फंडिंग नियमों के उल्लंघन के मामले में न्यूजक्लिक और उसके संस्थापक-संपादक प्रबीर पुरकायस्थ पर 184 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया।
न्यूजक्लिक के संस्थापक पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के सदस्य नेविल रॉय सिंघम के साथ मिलकर भारत सरकार और कोविड-19 के प्रसार को रोकने के उसके प्रयासों को बदनाम करने, तथा भारत बायोटेक द्वारा विकसित भारतीय वैक्सीन ‘कोवैक्सिन’ की प्रभावशीलता पर सवाल उठाने की साजिश रचने के आरोप लगे।
चीन से फंडिंग पाने वाले न्यूजक्लिक ने भारत विरोधी आवाजों को दिया मंच, 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों के आरोपितों तक पहुँची फंडिंग
न्यूजक्लिक पर आरोप है कि उसने चीन से फंडिंग प्राप्त कर भारत में अशांति फैलाने, विशेषकर नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) विरोधी प्रदर्शनों के दौरान मोदी सरकार को गिराने की कोशिश की। इसके अलावा उसके संबंध गौतम नवलखा जैसे भारत विरोधी चेहरों से भी बताए गए हैं।
दिल्ली पुलिस के आरोपपत्र में न्यूजक्लिक के संस्थापक पर लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के आतंकियों से संबंध रखने, 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों के आरोपित शरजील इमाम तथा नक्सलियों को धन उपलब्ध कराने के आरोप लगाए गए हैं।
17 तारीख को राजामणिकम पी (All India Peoples Science Network- AIPSN) की ओर से ‘Share Notes on CAA docs’ शीर्षक वाला एक ईमेल भेजा गया था। AIPSN की स्थापना प्रबीर पुरकायस्थ ने की थी। ईमेल में CAA और NRC को लेकर दुष्प्रचार फैलाया गया और डर का माहौल बनाने की कोशिश की गई।
इसमें कहा गया कि NRC के जरिए मुसलमानों को प्रताड़ित किया जाएगा, जबकि उस समय NRC का कोई मसौदा तक मौजूद नहीं था और CAA का किसी भी भारतीय नागरिक से कोई संबंध नहीं था।
OpIndia ने पहले रिपोर्ट किया था कि तीस्ता सीतलवाड़, हर्ष मंदर, प्रबीर पुरकायस्थ, गीता हरिहरन और अन्य लोगों ने CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हिंसा और पत्थरबाजी भड़काने तथा प्रदर्शनकारियों के लिए फंडिंग की व्यवस्था करने की रणनीति बनाई थी।
8,000 पन्नों के आरोपपत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि न्यूजक्लिक ने जानबूझकर अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर का नक्शा इस तरह विकृत दिखाया, जिससे यह प्रदर्शित हो कि ये क्षेत्र चीन के हैं।
न्यूजक्लिक के संस्थापक और नेविल रॉय सिंघम ने भारत समेत अन्य देशों के अलगाववादी आंदोलनों से गठजोड़ पर की चर्चा
चार्जशीट के अनुसार, न्यूजक्लिक के संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ और नेविल रॉय सिंघम ने इस बात पर चर्चा की थी कि भारत और अन्य देशों में अलगाववादी (Separatist) आंदोलनों के साथ प्रभावी तरीके से गठजोड़ कैसे किया जा सकता है।
आरोपपत्र के अनुसार, इस कथित साजिश की शुरुआत उन ईमेल से हुई, जिन्हें प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के साथ साझा किया था। स्पेशल सेल के अनुसार, 29 जून 2016 को प्रबीर पुरकायस्थ द्वारा नेविल रॉय सिंघम को भेजा गया एक ईमेल इस कथित साजिश की शुरुआत को दर्शाता है।
ED को मिले इस ईमेल का विषय था ‘Social Media Group in India’। ईमेल में प्रबीर ने नेविल से कहा कि ‘उनके’ मीडिया प्रोजेक्ट में एक समूह केवल डेटा एकत्र करने और उसका विश्लेषण करने वाले टूल्स पर ध्यान केंद्रित करे। इसके अलावा उन्होंने सोशल मीडिया अभियानों के लिए एक अलग समर्पित टीम बनाने का सुझाव दिया।
इन सोशल मीडिया अभियानों के लिए उन्होंने 60,000 से 80,000 अमेरिकी डॉलर का बजट प्रस्तावित किया। इसके कुछ समय बाद, 17 सितंबर 2016 को ईमेल के माध्यम से न्यूजक्लिक का एक लेख साझा किया गया, जिसमें माओवादी शैली में बड़े जनआंदोलन खड़े करने की बात कही गई थी।
रॉय सिंघम और प्रबीर पुरकायस्थ के बीच हुए ईमेल आदान-प्रदान से यह भी सामने आया कि उन्होंने इस बात पर चर्चा की थी कि ‘अलगाववादी’ या पहचान आधारित (Identity) आंदोलनों के साथ प्रभावी ढंग से गठजोड़ कैसे किया जाए।
चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को घरेलू अनियमितताओं और विदेशी हस्तक्षेप से बचाने के लिए SIR की आवश्यकता
अमेरिका, कनाडा और भारत की चुनावी राजनीति तथा चुनावी नतीजों में चीन के कथित हस्तक्षेप या प्रभाव के मामलों से यह स्पष्ट होता है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) अपने भू-राजनीतिक और आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिद्वंद्वी या विरोधी देशों में उदारवादी (लिबरल) सरकारों को सत्ता में देखना पसंद करती है।
यह भी दिलचस्प है कि भारत, अमेरिका और कनाडा में चीन समर्थक प्रचारक और राजनेता अक्सर उन सरकारों को, जो चीन के हितों के अनुकूल नहीं होतीं, फासीवादी, अधिनायकवादी, प्रतिगामी, असहिष्णु, नस्लवादी, धार्मिक वर्चस्ववादी और न जाने किन-किन विशेषणों से संबोधित करते हैं।
भारत के संदर्भ में, अमेरिका के हालिया आरोप कि चीन ने 20 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं का डेटा हासिल कर उसका इस्तेमाल 2020 के चुनावों को प्रभावित करने के लिए किया, और चुनावों को प्रभावित करने की विदेशी संस्थाओं की बढ़ती आशंकाएँ, मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision- SIR) की आवश्यकता की ओर संकेत करती हैं।
हाल के वर्षों में भारत निर्वाचन आयोग ने बिहार और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में चुनावों से पहले SIR अभियान चलाया। इस प्रक्रिया के तहत निर्वाचन अधिकारियों ने घर-घर जाकर सत्यापन, मतदाता सूची का मिलान, डुप्लीकेट मतदाताओं, मृत व्यक्तियों, स्थानांतरित हो चुके मतदाताओं और अवैध मतदाताओं के नाम हटाने का काम किया।
हालाँकि मतदाता सूचियों को साफ और अद्यतन करने के उद्देश्य से चलाए गए इस अभियान के बाद लाखों अवैध या फर्जी मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने पर भारत में राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। विपक्षी दलों ने मुस्लिमों को निशाना बनाकर मताधिकार से वंचित करने का आरोप लगाया, जबकि निर्वाचन आयोग ने मजहबी आधार पर की गई किसी भी कार्रवाई से इनकार किया।
इसी दौरान रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य रूप से बांग्लादेश से आए कई अवैध मुस्लिम प्रवासियों में भी घबराहट देखी गई। अमेरिका के आरोप यह दिखाते हैं कि मतदाता डेटा एक अत्यंत महत्वपूर्ण लक्ष्य होता है और यदि मतदाता सूचियों से छेड़छाड़ हो जाए या वे समझौता का शिकार हो जाएँ, तो फर्जी मतदाताओं की एंट्री संभव हो सकती है।
वहीं मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए चलाए जाने वाले प्रॉक्सी प्रचार अभियान उस सरकार के खिलाफ जनमत को एकजुट करने का काम करते हैं, जिसे कोई विदेशी सरकार या संस्था सत्ता से हटाना चाहती है।
विदेशी नैरेटिव वॉरफेयर और सत्ता बदलने की साजिशों से भारतीय लोकतंत्र और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए SIR एक्सरसाइज, FCRA नियमों को सख्ती से लागू करने और तथाकथित ‘बुद्धिजीवियों’ व ‘एक्टिविस्टों’ की भारत-विरोधी गतिविधियों की गहन जाँच करने की जरूरत है, जो लगातार भारत-विरोधी और चीन-समर्थक प्रोपेगैंडा फैलाते रहते हैं।
चुनावों में विदेशी दखलअंदाजी को रोकने के लिए भले ही SIR कोई रामबाण उपाय ना हो, लेकिन यह चुनावी ढाँचे में मौजूद कमजोरियों को सीधे तौर पर दूर करता है।
(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


