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जौहर यूनिवर्सिटी विवाद के बीच अल्पसंख्यक संस्थानों में आरक्षण पर बहस, AMU-JMI में भी कोटा सिस्टम लागू नहीं: समझें इस ‘दोहरी व्यवस्था’ पर क्यों है विचार की जरूरत

सिर्फ जामिया, AMU, गौहर यूनिवर्सिटी ही नहीं बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में कई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान हैं, जिसमें सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए 50% आरक्षण लागू हैं।

उत्तर प्रदेश में जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े विवादों के फिर से बढ़ने के साथ ही अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में आरक्षण व्यवस्था को लेकर भी बहस छिड़ चुकी है। लोगों का कहना है कि अगर देश में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए संवैधानिक आरक्षण की व्यवस्था है, तो फिर अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त शिक्षण संस्थानों में यह व्यवस्था क्यों लागू नहीं होती?

इस बहस के केंद्र में केवल रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय (जौहर यूनिवर्सिटी) ही नहीं है, बल्कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU), दिल्ली विश्वविद्यालय का खालसा कॉलेज और सेंट स्टीफंस कॉलेज जैसे कई प्रतिष्ठित संस्थान भी हैं। ये संस्थान अल्पसंख्यक छात्रों के लिए 50 प्रतिशत तक सीटें आरक्षित रखते हैं।

दरअसल, भारत में शिक्षा के क्षेत्र में अल्पसंख्यक संस्थानों का दर्जा एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान है। संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार दिया गया है। सवाल यह है कि आखिर इन संस्थानों को ऐसी छूट क्यों मिली है और इसका संवैधानिक आधार क्या है।

यह विरोधाभास इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि कई मुस्लिम जातियाँ अन्य संस्थानों में ओबीसी आरक्षण का लाभ लेती हैं, लेकिन अपने संस्थानों में ऐसा नहीं होता। सिख और ईसाई संस्थान भी इसी तरह अपने समुदाय के लिए आरक्षण रखते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2018 में इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया था और समानता की वकालत की थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार इस पर विचार किया है, लेकिन अभी भी कुछ मामले लंबित हैं। आइए इस पूरे मुद्दे को विस्तार से समझते हैं।

अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा कैसे मिलता है?

किसी भी शैक्षणिक संस्थान को अल्पसंख्यक दर्जा राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग (एनसीएमईआई) या संबंधित राज्य आयोग से मिलता है। इसके लिए संस्थान को यह साबित करना होता है कि वह किसी खास धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा स्थापित किया गया था और उसका प्रशासन भी उसी समुदाय के हाथ में है।

अनुच्छेद 30(1) के तहत यह अधिकार मौलिक अधिकार माना गया है ताकि अल्पसंख्यक अपनी संस्कृति, भाषा और धर्म को संरक्षित रख सकें। हालाँकि यह अधिकार पूर्ण नहीं है। अगर संस्थान सरकारी सहायता लेता है तो कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है। लेकिन आरक्षण के मामले में अदालतों ने स्पष्ट किया है कि अल्पसंख्यक संस्थान अनुच्छेद 30 के तहत अपनी प्रवेश नीति खुद तय कर सकते हैं।

विवाद की सबसे बड़ी वजह संविधान का अनुच्छेद 15(5) है। वर्ष 2005 के 93वें संविधान संशोधन यानी केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम 2006 के तहत केंद्रीय विश्वविद्यालयों में एससी के लिए 15 प्रतिशत, एसटी के लिए 7.5 प्रतिशत और ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य है। लेकिन इसी प्रावधान में स्पष्ट रूप से कहा गया कि अनुच्छेद 30(1) के तहत संरक्षित अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर यह व्यवस्था लागू नहीं होगी।

यही वजह है कि जामिया, एएमयू जैसे संस्थान सामान्य आरक्षण लागू नहीं करते। ऐसे में इन संस्थानों में सामान्य SC, ST और OBC आरक्षण के दायरे में आने वाले छात्रों की हकमारी होती है।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में 50 प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण

जामिया मिल्लिया इस्लामिया दिल्ली की एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है। 2011 में एनसीएमईआई ने इसे अल्पसंख्यक संस्थान घोषित किया। इसके बाद जामिया ने अपनी प्रवेश नीति बदल दी।

विश्वविद्यालय के नियमों के मुताबिक हर कोर्स में कुल सीटों का 30 प्रतिशत मुस्लिम छात्रों के लिए, 10 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं के लिए और 10 प्रतिशत मुस्लिम ओबीसी व एसटी छात्रों के लिए आरक्षित रखा जाता है। यानी कुल मिलाकर मुस्लिम समुदाय के लिए करीब 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित हो जाती हैं। बाकी सीटें सामान्य मेरिट पर भरी जाती हैं।

जामिया पहले सामान्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों की तरह एससी-एसटी-ओबीसी आरक्षण लागू करता था। लेकिन अल्पसंख्यक दर्जा मिलने के बाद यह व्यवस्था बदल गई। संसद में दिए गए जवाब में भी सरकार ने स्पष्ट किया है कि जामिया खुद को अल्पसंख्यक संस्थान मानते हुए एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण नहीं लागू करता।

हालाँकि मार्च 2025 में जामिया ने PhD कोर्स के लिए अपनी नीति में बदलाव किया और अनिवार्य 50% आरक्षण की जगह इसे ऐच्छिक घोषित कर दिया। इसका लेफ्ट विंग के स्टूडेंट्स पार्टियों (खासकर AISA) ने तीखा विरोध किया।

AMU का अल्पसंख्यक दर्जा सुप्रीम कोर्ट में लंबित

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का मामला और भी पेचीदा है। 1920 में यह संस्थान स्थापित हुआ था। 1967 में सुप्रीम कोर्ट ने अजीज बाशा मामले में फैसला दिया था कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है क्योंकि इसे संसद के कानून से बनाया गया था।

लेकिन 8 नवंबर 2024 को सात जजों की संविधान पीठ ने 4:3 के बहुमत से 1967 के फैसले को पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी संस्थान को कानून से मान्यता मिलने भर से उसका अल्पसंख्यक चरित्र समाप्त नहीं होता। कोर्ट ने कुछ मापदंड तय किए कि अल्पसंख्यक संस्थान माने जाने के लिए क्या शर्तें पूरी होनी चाहिए। अब इस मामले को नियमित पीठ के पास भेज दिया गया है ताकि वह तय करे कि एएमयू इन मापदंडों पर खरा उतरता है या नहीं।

फिलहाल एएमयू में भी एससी-एसटी-ओबीसी का पूरा आरक्षण लागू नहीं होता। संस्थान खुद को अल्पसंख्यक मानते हुए मुस्लिम छात्रों को प्राथमिकता देता है। ये AMU से जुड़े स्कूल-कॉलेजों की आड़ में 50% आरक्षण (सामान्य) लागू करता है, जिसमें उसका कहना है कि एएमयू से जुड़े संस्थानों ने पढ़ने वाले सभी बच्चों (सिर्फ मुस्लिम नहीं) को 50% आरक्षण (अनौपचारिक) दिया जाता है, लेकिन पड़ताल में अक्सर से सामने आता है कि इन 50% छात्रों में बहुत कम संख्या जनरल क्लास की होती है। अधिकतर छात्र मुस्लिम ही होते हैं।

एएमयू में 50% आरक्षण को हटा दें तो बाकी सीटें अनारक्षित हैं, यानी ये मेरिट पर भरी जाती हैं। ऐसे में आरक्षण कानूनों का पालन (एससी-एसटी/ओबीसी के लिए) नहीं किया जाता। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ साल 2018 से यह मुद्दा उठा रहे हैं कि अगर इन संस्थानों का अल्पसंख्यक दर्जा अभी लागू नहीं है, तो क्यों यहाँ पर आरक्षण लागू नहीं किया जाता। चूँकि एएमयू सरकारी फंडिंग पर चलता है, इसलिए इसे सबके लिए खुला होना चाहिए।

जौहर यूनिवर्सिटी रामपुर का मामला भी ध्यान देने योग्य

उत्तर प्रदेश के रामपुर में मौजूद मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी भी अल्पसंख्यक संस्थान है। इसे 2013 में एनसीएमईआई ने अल्पसंख्यक दर्जा दिया था। यह यूनिवर्सिटी समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान से जुड़ी हुई है। इसे फाउंडिंग मेंबर्स में आजम खान का पूरा परिवार यानी उनकी बीवी तजीन फातमा, बेटे अदीब आजम खान और दूसरे बेटे अब्दुल्ला आजम खान भी हैं।

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साल 2006 में स्थापित होने और 2013 में अल्पसंख्यक दर्जा मिलने के कारण यह भी सामान्य आरक्षण नीति से मुक्त है। यहाँ मुख्य रूप से मुस्लिम छात्रों को प्राथमिकता दी जाती है। इस यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों को तोड़ने के नोटिस आए हैं, जिसे विपक्ष राजनीतिक बदला बता रहा है, लेकिन मूल मुद्दा इसकी बिल्डिंगों के अवैध निर्माण, जमीनों पर कब्जे का है।

सिख और ईसाई संस्थानों का भी यही मॉडल

दिल्ली विश्वविद्यालय के खालसा कॉलेज जैसे सिख अल्पसंख्यक कॉलेजों में कुल सीटों का 50 प्रतिशत सिख छात्रों के लिए आरक्षित रखा जाता है। बाकी सामान्य मेरिट पर। इसी तरह सेंट स्टीफेंस कॉलेज ईसाई अल्पसंख्यक संस्थान है। वहाँ भी ईसाई छात्रों के लिए खास आरक्षण या प्राथमिकता की व्यवस्था है।

दिल्ली में हमदर्द विश्वविद्यालय और जीसस एंड मैरी कॉलेज को भी अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा प्राप्त है। यहाँ भी आरक्षण लागू नहीं होता है। ये सभी संस्थान अनुच्छेद 30 का हवाला देते हुए कहते हैं कि उन्हें अपने समुदाय के छात्रों को प्राथमिकता देने का अधिकार है। यही वजह है कि यह विवाद सिर्फ मुस्लिम संस्थानों तक सीमित नहीं बल्कि सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों से जुड़ा संवैधानिक प्रश्न है।

देश के अलग-अलग हिस्सों में कई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान

वैसे आपको बता दें कि सिर्फ जामिया, AMU, गौहर यूनिवर्सिटी ही नहीं बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में कई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान हैं, जिसमें सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए 50% आरक्षण लागू हैं। ऐसी ही एक यूनिवर्सिटी यूपी की राजधानी लखनऊ में भी है। लखनऊ के ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय (KMCLU) को अल्पसंख्यक का दर्जा मिला है। पहले इसका नाम ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती उर्दू, अरबी-फारसी विश्वविद्यालय (KMCUAFU) था, जिसे बाद में बदला गया। यह एक राज्य विश्वविद्यालय (स्टेट यूनिवर्सिटी) है।

इसी तरह से बिहार की राजधानी पटना में मौलाना मज़हरुल हक अरबी और फ़ारसी विश्वविद्यालय है तो राजस्थान के जोधपुर में मौलाना आजाद विश्वविद्यालय। हैदराबाद में उस्मानिया यूनिवर्सिटी है, जिसमें पढ़ाई ही उर्दू माध्यम से होती है, जिसमें अंग्रेजी दूसरी भाषा के तौर पर मान्य है। वहीं, हैदराबाद में ही मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी है, जिसकी स्थापना 1998 में हुई।

इसके अलावा देखें तो देश के सबसे पुराने आधुनिक शिक्षण संस्थानों में शामिल कलकत्ता मोहम्मडन कॉलेज भी अल्पसंख्यक संस्थान है, जिसकी स्थापना 1780 में अंग्रेजी हुकूमत के मुखिया वॉरेन हेस्टिंग्स ने की थी। इसे इस्लामिक कॉलेज ऑफ कलकत्ता, कलकत्ता मदरसा, कलकत्ता मोहम्मडन कॉलेज और मदरसा ए आलियाह के नाम से भी जाना जाता रहा है। हालाँकि वॉरेन हेस्टिंग्स इसे कलकत्ता मोहम्मडन कॉलेज ही कहते रहे। साल 2008 से इसे आलियाह विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है, जिसकी नई बिल्डिंग का शिलान्यास और उद्घाटन तत्कालीन CM ममता बनर्जी ने 2011 से 2014 तक किया था।

योगी आदित्यनाथ करते रहे हैं समानता की बात

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साल 2018 में कन्नौज में एक रैली में साफ कहा था कि अगर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में दलित और पिछड़े वर्गों को आरक्षण मिल सकता है, तो एएमयू और जामिया में क्यों नहीं? उन्होंने कहा था कि एएमयू सिर्फ मुसलमानों की नहीं, बल्कि पूरे देश की है।

योगी का तर्क था कि ये संस्थान सरकारी पैसे से चलते हैं, इसलिए इनमें एससी, एसटी और ओबीसी को भी आरक्षण मिलना चाहिए। उन्होंने इसे बड़ी गलती बताया था। 2024 में भी उन्होंने एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे पर सवाल उठाए और आरक्षण की माँग दोहराई।

कानूनी विरोधाभास कहाँ है?

इस पूरे विवाद में सबसे अधिक जिस तर्क का इस्तेमाल किया जा सकता है, वो ये है कि देश में कई मुस्लिम समुदाय केंद्र और राज्यों की OBC सूची में शामिल हैं। ऐसे समुदायों के लोग सरकारी नौकरियों और सामान्य विश्वविद्यालयों में OBC आरक्षण का लाभ लेते हैं। लेकिन जब बात अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की आती है, तो वहाँ वही संस्थान सामान्य OBC, SC और ST आरक्षण लागू नहीं करते।

हालाँकि अल्पसंख्यक संस्थानों का पक्ष है कि संविधान ने जानबूझकर उन्हें यह विशेष संरक्षण दिया है ताकि वे अपने समुदाय की शैक्षणिक और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रख सकें। उनके अनुसार यह विशेषाधिकार सामाजिक आरक्षण का विरोध नहीं बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त एक अलग अधिकार है।

वैसे, कानूनी तौर पर अल्पसंख्यक संस्थान बाध्य नहीं हैं कि वे एससी-एसटी-ओबीसी आरक्षण लागू करें। सुप्रीम कोर्ट ने TMA पाई फाउंडेशन मामले समेत कई फैसलों में कहा है कि अल्पसंख्यक संस्थान अपनी पसंद के छात्र भर्ती कर सकते हैं।

और ये वही ‘दोहरी व्यवस्था’ है, जिसका विरोध किया जाना चाहिए। दरअसल, अगर सामाजिक न्याय की व्यवस्था पूरे देश में लागू है, तो अल्पसंख्यक संस्थानों को इससे बाहर रखना समानता की भावना के सरासर विपरीत ही है।

क्या आगे निकल सकती है आरक्षण लागू करने की राह?

केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में SC, ST, OBC और EWS आरक्षण लागू किया जाता है, लेकिन अनुच्छेद 30 के तहत संरक्षित अल्पसंख्यक संस्थान इससे अलग हैं। सरकार ने यह भी कहा है कि AMU और जामिया से जुड़े कई मुद्दे अभी न्यायालयों में विचाराधीन हैं।

जौहर यूनिवर्सिटी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, खालसा कॉलेज और सेंट स्टीफंस कॉलेज को लेकर चल रही बहस केवल आरक्षण की नहीं बल्कि संविधान की दो महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं के बीच संतुलन की बहस है। एक ओर सामाजिक न्याय के लिए SC, ST और OBC आरक्षण की व्यवस्था है, वहीं दूसरी ओर धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान संचालित करने का संवैधानिक अधिकार है।

यही कारण है कि अल्पसंख्यक संस्थानों में आरक्षण का मुद्दा केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे संविधान, न्यायपालिका और शिक्षा नीति से जुड़ा हुआ विषय है। आने वाले समय में विशेषकर AMU से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय का असर इस पूरे विमर्श पर पड़ सकता है। तब तक वर्तमान कानूनी व्यवस्था के अनुसार, वैध रूप से अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त शिक्षण संस्थानों को सामान्य SC, ST और OBC आरक्षण लागू करने के लिए बाध्य नहीं माना जाता।

वैसे, सामाजिक तौर पर देखा जाए तो अल्पसंख्यक संस्थानों में भी आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों या पिछड़े वर्गों के लिए कुछ प्रतिशत आरक्षण रखा जाए, लेकिन धार्मिक आधार पर पूर्ण छूट न दी जाए। हालाँकि अल्पसंख्यक संगठन कहते हैं कि अनुच्छेद 30 का हनन नहीं होना चाहिए।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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