31 दिसंबर 2026 तक सेना से बाहर हो जाएंगे पहले बैच के 18,300 अग्निवीर। केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने इनके रोजगार के लिए आरक्षण और भर्ती में छूट की व्यवस्था की है। लेकिन हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे राज्यों में पूर्व अग्निवीरों के रोजगार को लेकर अब भी स्पष्ट नीति का इंतजार है। सवाल है कि क्या अग्निवीरों के भविष्य की चिंता सिर्फ कुछ राज्यों को है?
क्या कांग्रेस शासित राज्यों को अग्निवीरों के रोजगार की चिंता नहीं है? क्या कांग्रेस नहीं चाहती कि चार साल तक सेना में देश की सेवा करने वाले युवा सैन्य अनुशासन और प्रशिक्षण के अनुभव के साथ सामान्य जीवन में लौटकर समाज और देश के विकास में योगदान दें?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अग्निवीर योजना के तहत सेना में भर्ती हुए पहले बैच के जवानों की सेवा अवधि अब पूरी होने जा रही है। ऐसे में उनके सामने सबसे बड़ा सवाल है कि सेना से बाहर आने के बाद रोजगार कहां मिलेगा?
अग्निवीर योजना को लेकर राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन चार साल तक देश की सुरक्षा में योगदान देने वाले युवाओं के भविष्य की जिम्मेदारी से राज्य सरकारें कैसे बच सकती हैं?
31 दिसंबर तक सेना से बाहर होंगे 18300 अग्निवीर
अग्निपथ योजना के तहत वर्ष 2022 में सेना में भर्ती हुए पहले बैच के अग्निवीरों की चार साल की सेवा अवधि इस साल पूरी हो रही है। हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 31 दिसंबर 2026 तक करीब 18,300 अग्निवीर सेना से बाहर हो जाएँगे।
ये ऐसे युवा हैं, जिन्होंने चार साल तक सेना में प्रशिक्षण लिया, अनुशासन सीखा और देश की सेवा की। अब जब वे सामान्य जीवन में लौटेंगे, तो उनके सामने रोजगार और भविष्य की सुरक्षा का सवाल खड़ा होगा।
यह सिर्फ इन युवाओं का निजी मामला नहीं है। यह देश के उन युवाओं के भविष्य से जुड़ा विषय है, जिन्होंने सेना में सेवा देने का विकल्प चुना।
चार साल का सैन्य प्रशिक्षण उन्हें अनुशासित, प्रशिक्षित और जिम्मेदार नागरिक बनाता है। ऐसे युवाओं को पुलिस, अर्धसैनिक बलों, सुरक्षा सेवाओं और दूसरे सरकारी विभागों में अवसर देना एक स्वाभाविक विकल्प हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सभी राज्य सरकारें इस दिशा में तैयारी कर रही हैं?
जहां केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों ने पूर्व अग्निवीरों के लिए आरक्षण, आयु सीमा में छूट और भर्ती प्रक्रिया में रियायतों की घोषणा की है, वहीं कई राज्यों में अब तक स्पष्ट नीति सामने नहीं आई है।
केंद्र सरकार ने पूर्व अग्निवीरों के लिए क्या व्यवस्था की है?
केंद्र सरकार ने पूर्व अग्निवीरों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) और असम राइफल्स में भर्ती के दौरान विशेष व्यवस्था की है। इन बलों में कांस्टेबल और राइफलमैन जैसे पदों पर पूर्व अग्निवीरों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था घोषित की गई है।
इसके अलावा आयु सीमा में छूट का भी प्रावधान है। पहले बैच के अग्निवीरों को अधिकतम आयु सीमा में पांच साल की छूट और बाद के बैचों को तीन साल की छूट दी गई है।
भर्ती प्रक्रिया में भी पूर्व अग्निवीरों को लिखित परीक्षा, शारीरिक दक्षता परीक्षा (PET) और शारीरिक मानक परीक्षा (PST) में निर्धारित रियायतें दी जाएंगी।
सरकार की ओर से अग्निवीरों को कौशल प्रमाणपत्र और अनुभव प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी है, जिससे उन्हें सेना के बाहर रोजगार तलाशने में मदद मिल सके।
जो अग्निवीर नौकरी के बजाय अपना व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं, उनके लिए बैंक ऋण और उद्यमिता से जुड़ी सहायता के विकल्प भी उपलब्ध कराए गए हैं। आगे पढ़ाई जारी रखने के इच्छुक युवाओं के लिए भी योजनाएँ हैं, यानी केंद्र सरकार ने पूर्व अग्निवीरों को रोजगार, स्वरोजगार और आगे की शिक्षा के रास्ते उपलब्ध कराने की दिशा में कदम उठाए हैं।
अब सवाल राज्य सरकारों से है। क्या वे भी अपने यहाँ पूर्व अग्निवीरों के लिए इसी तरह की व्यवस्था कर रही हैं?
उत्तर प्रदेश सरकार ने 20 प्रतिशत आरक्षण का किया ऐलान
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने पूर्व अग्निवीरों के लिए पुलिस और विभिन्न वर्दीधारी सेवाओं में आरक्षण देने का ऐलान किया है।
राज्य में पुलिस, प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी (PAC), माउंटेड पुलिस और फायर ब्रिगेड जैसी सेवाओं में पूर्व अग्निवीरों को 20 प्रतिशत आरक्षण देने की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा अधिकतम आयु सीमा में तीन साल की छूट का प्रावधान भी किया गया है।
जेल वार्डर और परिवहन विभाग के कांस्टेबल जैसे पदों पर भी 20 प्रतिशत आरक्षण देने की व्यवस्था की गई है। इसका अर्थ है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने केवल पूर्व अग्निवीरों को रोजगार देने की इच्छा नहीं जताई, बल्कि भर्ती में उन्हें अवसर उपलब्ध कराने के लिए नीतिगत कदम भी उठाए हैं।
हरियाणा में पुलिस से लेकर वन विभाग तक में आरक्षण
हरियाणा की नायब सिंह सैनी सरकार ने भी पूर्व अग्निवीरों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं।
राज्य में पुलिस कांस्टेबल, वन रक्षक, जेल वार्डर, खनन रक्षक, वन्यजीव रक्षक और फायर ब्रिगेड विभाग में पूर्व अग्निवीरों को 20 प्रतिशत आरक्षण देने की व्यवस्था की गई है।
इसके अलावा दूसरे ग्रुप-C पदों में पांच प्रतिशत और अग्निवीरों के कौशल प्रमाणपत्र के आधार पर ग्रुप-B पदों में एक प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है।
हरियाणा सरकार ने 26 अगस्त से ही विभिन्न विभागों से पूर्व अग्निवीरों के लिए उपलब्ध पदों का ब्योरा मांगना शुरू कर दिया था। यह कदम बताता है कि राज्य सरकारें यदि चाहें तो अग्निवीरों की सेवा अवधि पूरी होने से पहले ही उनके रोजगार की योजना बना सकती हैं।
उत्तराखंड में रोजगार और स्वरोजगार के लिए विशेष व्यवस्था
उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी सरकार ने पूर्व अग्निवीरों के लिए वर्दीधारी सेवाओं में 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की है।
इसके साथ ही लिखित परीक्षा और शारीरिक दक्षता परीक्षा में छूट देने का प्रावधान भी किया गया है। राज्य में पूर्व अग्निवीरों के रोजगार और स्वरोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए विशेष पुनर्वास बोर्ड और अग्निवीर एम्प्लॉयमेंट सेल गठित किए गए हैं।
उत्तराखंड ऐसा राज्य है, जहां से बड़ी संख्या में युवा सेना में भर्ती होते हैं। ऐसे में पूर्व अग्निवीरों के रोजगार का सवाल राज्य के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
बिहार में पूर्व सैनिकों और अग्निवीरों के लिए आरक्षण
बिहार में भी वर्दीधारी सेवाओं में पूर्व सैनिकों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है। इसके तहत कुल 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान बताया गया है। इसमें 12.5 प्रतिशत अग्निवीरों और 12.5 प्रतिशत अन्य पूर्व सैनिकों के लिए निर्धारित है।
इस तरह बिहार में भी पूर्व अग्निवीरों के रोजगार के लिए व्यवस्था बनाई गई है।
मध्य प्रदेश में 5 वर्दीधारी सेवाओं में 20 प्रतिशत आरक्षण
मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार ने 5 वर्दीधारी सेवाओं में पूर्व अग्निवीरों के लिए 20 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की व्यवस्था की है। इनमें पुलिस कांस्टेबल, विशेष सशस्त्र बल, जेल प्रहरी, वन रक्षक और आबकारी कांस्टेबल के पद शामिल हैं।
इससे पूर्व अग्निवीरों को राज्य की विभिन्न सुरक्षा और प्रशासनिक सेवाओं में अवसर मिल सकेंगे।
महाराष्ट्र में वर्दीधारी ग्रुप-C सेवाओं में 10 प्रतिशत आरक्षण
महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस सरकार ने वर्दीधारी ग्रुप-C सेवाओं में पूर्व अग्निवीरों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू की है। इसमें पुलिस, जेल, अग्निशमन, वन, आबकारी और अग्नि सुरक्षा सेवाओं के पद शामिल हैं।
इसके अलावा भर्ती प्रक्रिया में पूर्व अग्निवीरों को लिखित परीक्षा, शारीरिक परीक्षा और आयु सीमा में छूट देने का प्रावधान भी किया गया है।
यानी महाराष्ट्र सरकार ने भी सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं को राज्य की सुरक्षा और दूसरी वर्दीधारी सेवाओं में अवसर देने की दिशा में कदम उठाए हैं।
बीजेपी शासित राज्यों की तैयारी, कॉन्ग्रेस शासित राज्यों की चुप्पी?
केंद्र सरकार के साथ उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने पूर्व अग्निवीरों के रोजगार को लेकर विभिन्न व्यवस्थाएं बनाई हैं, लेकिन अब सवाल उन राज्यों से है, जहां अग्निवीर योजना को लेकर राजनीतिक विरोध अधिक रहा है।
हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे राज्यों में पूर्व अग्निवीरों के लिए स्पष्ट रोजगार नीति का इंतजार है।
इन राज्यों में अग्निपथ योजना को लेकर राजनीतिक बहस तो हुई, लेकिन पूर्व अग्निवीरों के रोजगार के लिए वैकल्पिक व्यवस्था बनाने की दिशा में अपेक्षित स्पष्टता दिखाई नहीं देती।
क्या इन राज्यों की सरकारें मानती हैं कि चार साल का सैन्य प्रशिक्षण पुलिस, जेल, वन विभाग या सुरक्षा सेवाओं में उपयोगी नहीं है? या फिर इन राज्यों ने पूर्व अग्निवीरों के रोजगार को लेकर कोई ठोस तैयारी ही नहीं की?
कर्नाटक के पूर्व सैनिक सड़कों पर
कर्नाटक में पूर्व सैनिक लंबे समय से वर्दीधारी नौकरियों में आरक्षण की माँग करते रहे हैं। ऐसे में जब पूर्व अग्निवीर राज्य में वापस लौटेंगे, तो रोजगार का मुद्दा और गंभीर हो सकता है। वर्ष 2022 में जब राज्य में बीजेपी की सरकार थी, तब पूर्व अग्निवीरों के लिए आरक्षण की योजना बनाने के संकेत दिए गए थे, लेकिन 2023 में सरकार बदलने के बाद यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाया।
अब सवाल है कि जब दूसरे राज्य पूर्व अग्निवीरों के लिए आरक्षण की दरें तय कर रहे थे, तब कर्नाटक सरकार ने अपने युवाओं के लिए स्पष्ट नीति क्यों नहीं बनाई?
क्या पुलिस, जेल और वन विभाग जैसे क्षेत्रों में सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं की जरूरत नहीं है? क्या चार साल का सैन्य अनुभव इन पदों के लिए उपयोगी नहीं माना जाता? इन सवालों का जवाब कर्नाटक सरकार को देना होगा।
तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना में क्या है व्यवस्था?
तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना में भी पूर्व अग्निवीरों के रोजगार को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इन राज्यों में राज्य पुलिस या राज्य की नागरिक सेवाओं में पूर्व अग्निवीरों के लिए अलग से विशेष आरक्षण अथवा सीधी भर्ती की घोषणा को लेकर स्पष्टता नहीं है।
यहाँ भी सवाल वही है कि जब हजारों युवा सेना से बाहर लौटेंगे, तो उनके लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
अग्निवीर योजना का राजनीतिक विरोध करने का अधिकार सभी राजनीतिक दलों को है। लेकिन योजना के तहत सेवा देने वाले युवाओं के भविष्य को लेकर राज्य सरकारों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
पंजाब के 2,242 अग्निवीरों को रोजगार नीति का इंतजार
पंजाब से पहले बैच में 2,242 अग्निवीर भर्ती हुए थे। ऐसे में अनुमान है कि करीब 1,500 पूर्व अग्निवीरों के रोजगार को लेकर राज्य सरकार को व्यवस्था करनी पड़ सकती है। लेकिन, अब तक राज्य में पूर्व अग्निवीरों के लिए रोजगार नीति को लेकर स्पष्टता नहीं है।
यहाँ भी घोषणा और उसे लागू करने के बीच का अंतर महत्वपूर्ण है।
अगर राज्य सरकार समिति गठित करती है या नीति बनाने की बात करती है, तो उससे आगे बढ़कर यह बताना भी जरूरी है कि पूर्व अग्निवीरों को किन विभागों में रोजगार मिलेगा, कितना आरक्षण दिया जाएगा और भर्ती प्रक्रिया में क्या छूट होगी।
क्योंकि रोजगार का सवाल सिर्फ घोषणा से हल नहीं होगा। इसके लिए भर्ती नियमों में बदलाव और पदों की उपलब्धता भी जरूरी है।
अग्निवीरों का मुद्दा किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में नारे लगाने का नहीं है। यह देश के युवाओं के भविष्य से जुड़ा सवाल है।
अगर बीजेपी शासित राज्य पूर्व अग्निवीरों के लिए आरक्षण, आयु सीमा में छूट और भर्ती प्रक्रिया में रियायतों की व्यवस्था कर सकते हैं, तो कांग्रेस शासित राज्य ऐसा क्यों नहीं कर सकते?
अगर पंजाब सरकार नीति बनाने के लिए समिति गठित कर सकती है, तो हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में अब तक स्पष्ट नीति क्यों नहीं दिखाई देती?
केरल और तमिलनाडु की सरकारें कब बताएंगी कि उनके यहां पूर्व अग्निवीरों के लिए क्या व्यवस्था होगी? अग्निवीरों के रोजगार का सवाल सेना के सम्मान, युवाओं के भविष्य और सरकारों की जिम्मेदारी—तीनों से जुड़ा हुआ है।
चार साल तक देश की सेवा करने वाले युवाओं को सेना से बाहर आने के बाद रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना सरकारों की जिम्मेदारी है।
सरकारें किसी योजना से सहमत हों या असहमत, लेकिन उस योजना के तहत देश की सेवा कर चुके युवाओं के भविष्य को लेकर जवाबदेह जरूर हैं।
अब सवाल यह है कि जिन राज्यों ने अग्निवीर योजना का विरोध किया, वे पूर्व अग्निवीरों के रोजगार के लिए कब ठोस नीति बनाएँगे? क्योंकि सेना से बाहर आने वाले इन युवाओं को सिर्फ आश्वासन नहीं, रोजगार के वास्तविक अवसर चाहिए। अग्निवीरों ने चार साल देश की सेवा की है। अब उनकी सेवा, प्रशिक्षण और अनुशासन का सम्मान करते हुए उनके भविष्य की जिम्मेदारी निभाने का वक्त सरकारों का है।


