राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक इन दिनों एक नई जोड़ी की चर्चा है। CJP प्रोटेस्ट के बहाने सुर्खियों में आईं AISA की वामपंथी छात्र नेता नेहा बोरा को राहुल गॉंधी की कॉन्ग्रेस ने हाथोंहाथ ले लिया। मंच मिला, कैमरे मिले, पहचान मिली और वह भी इतनी तेजी से कि लोग पूछने लगे हैं कि आखिर माजरा क्या है।
सवाल जायज भी है। कॉन्ग्रेस का अपना छात्र संगठन NSUI है। क्या उसमें एक भी ऐसा चेहरा नहीं था जिसे इतनी जल्दी और इतनी बेताबी से आगे बढाया जाता? NSUI के कई कार्यकर्ता खुद भीतर ही भीतर यही पूछ रहे हैं कि अपना संगठन मजबूत करने की जगह बाहर के लेफ्ट नेताओं को जगह क्यों दी जा रही है।
लेकिन इतिहास के पन्ने पलटें तो यह कोई नई बात नहीं लगती। आजादी के बाद से ही कॉन्ग्रेस वामपंथियों के आगे-पीछे घूमती रही है। और यह रिश्ता एकतरफा भी नहीं था। वामपंथी भी उतनी ही शिद्दत से कॉन्ग्रेस की तरफ झुके रहे।
1973 की वो किताब
कहानी समझने के लिए 1973 में चलना होगा, जब एक किताब छपी: Communists in Congress: Kumaramangalam’s Thesis। इसकी बुनियाद मोहन कुमारामंगलम के उस दस्तावेज में थी जो 1960 के दशक में तैयार हुआ और जिसमें तर्क दिया गया था कि कम्युनिस्टों को कॉन्ग्रेस के भीतर घुसकर काम करना चाहिए। आलोचक इसे ‘ट्रॉजन हॉर्स’ की रणनीति कहते हैं। यानी पार्टी में घुसो, उसके रेडिकल नारों को और धार दो और भीतर से उसे लेफ्ट की तरफ मोड दो।
तर्क सीधा था। कॉन्ग्रेस के पास जनाधार था, कम्युनिस्टों के पास विचारधारा। भारत की जनता सीधे कम्युनिस्ट पार्टी को चुनने वाली नहीं थी, इसलिए रास्ता यही निकाला गया कि जो बडी पार्टी है, उसी के कंधे पर सवारी की जाए। आज की कॉन्ग्रेस की रणनीति को समझना हो तो यह पुराना दस्तावेज किसी चार्जशीट से कम नहीं।
नेहरू का आकर्षण और नियंत्रण
यह सिलसिला 1930 के दशक से शुरू होता है, जब कम्युनिस्टों ने कॉन्ग्रेस को ‘एंटी-इम्पीरियलिस्ट पीपल्स फ्रंट’ बनाने की कोशिश की। CPI के दस्तावेजों में नेहरू की तारीफ होती थी क्योंकि वे सोवियत मॉडल से प्रभावित थे। नेहरू ने अपनी आत्मकथा में खुद लिखा है कि वे समाजवाद और साम्यवाद की ओर खिंचे थे।
पर सत्ता हाथ आई तो नेहरू का दूसरा रूप दिखा। तेलंगाना में कम्युनिस्टों का सशस्त्र संघर्ष सेना से कुचला गया और 1959 में केरल की चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार बर्खास्त कर दी गई। मतलब वामपंथ के लिए आकर्षण भी था और उस पर नियंत्रण भी। कम्युनिस्ट समझ गए कि सीधे सत्ता लेना मुश्किल है, तो कॉन्ग्रेस में घुसना बेहतर है।
कुमारामंगलम: CPI से इंदिरा के मंत्रिमंडल तक
कुमारामंगलम खुद CPI के नेता थे। बाद में उन्होंने पार्टी छोडकर इंदिरा गॉंधी की कॉन्ग्रेस जॉइन की और उनके मंत्रिमंडल में इस्पात और खान मंत्री बने। 1973 में एक विमान हादसे में उनकी मौत हो गई, मगर उनकी थीसिस का असर बना रहा।
CPI के संस्थापकों में से एक श्रीपाद अमृत डॉंगे ने इमरजेंसी में इंदिरा का खुलकर साथ दिया। उस दौर में CPI अकेला बड़ा विपक्षी दल था जिसके नेता जेल नहीं गए। लोग मजाक में कहते थे, ‘Dange(r) for the Congress’। सोवियत संघ ने इमरजेंसी को ‘राइट-विंग साजिश के खिलाफ कार्रवाई’ बताया। बाद में CPI ने माना कि उससे चूक हुई थी लेकिन तब समर्थन पूरा था।
1969: जब कॉन्ग्रेस टूटी
कॉन्ग्रेस के इस रुझान का सबसे साफ उदाहरण 1969 का बँटवारा है। कामराज, मोरारजी देसाई और निजलिंगप्पा जैसे नेताओं वाला ‘सिंडिकेट’ इंदिरा को अपने नियंत्रण में रखना चाहता था। इंदिरा ने यंग टर्क्स और लेफ्ट का साथ लेकर पार्टी की तस्वीर ही बदल दी। बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ, प्रिवी पर्स खत्म किए गए और CPI ने ‘यूनिटी एंड स्ट्रगल’ की नीति के तहत इंदिरा को समर्थन दिया।
यहाँ कामराज को याद करना जरूरी है। यही वो नेता थे जिन्होंने 1964 में लाल बहादुर शास्त्री और 1966 में इंदिरा को प्रधानमंत्री बनवाया। उन्हें ‘किंगमेकर’ कहा जाता था। पर जब इंदिरा की ताकत को चुनौती मिली तो कामराज और मोरारजी, दोनों पार्टी के भीतर हाशिये पर चले गए। मोरारजी देसाई आगे चलकर जनता पार्टी की सरकार में प्रधानमंत्री बने, मगर कॉन्ग्रेस ने उन्हें कभी वापस नहीं बुलाया।
पटेल से लेकर सिंधिया तक, एक ही पैटर्न
मामला और पुराना है। 1946 में प्रॉंतीय कॉन्ग्रेस कमेटियों में सरदार पटेल के पास ज्यादा समर्थन था, फिर भी गॉंधी ने नेहरू को चुना। पटेल उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री रहे, पर आर्थिक नीति, कश्मीर और चीन पर नेहरू से उनके मतभेद बने रहे। पटेल व्यावहारिक थे, नेहरू आदर्शवादी। 1950 में पटेल ने चीन के खतरे की चेतावनी दी, जिसे नेहरू ने नकार दिया। इसके बावजूद पटेल ताउम्र कॉन्ग्रेसी ही रहे।
कॉन्ग्रेस की यह आदत आज भी वैसी ही है। जो नेता परिवार की लाइन से बाहर निकला या जिसकी विचारधारा लेफ्ट से मेल नहीं खाती थी, उसे किनारे कर दिया गया। जो लेफ्ट से आया या लेफ्ट की भाषा बोलता था, उसे जगह मिली।
ज्योतिरादित्य सिंधिया का मामला देखिए। 2018 में मध्य प्रदेश की जीत में उनकी बडी भूमिका थी, पर सरकार बनी तो हाईकमान ने कमलनाथ को तरजीह दी। 2020 में सिंधिया ने कॉन्ग्रेस छोडकर BJP का दामन थाम लिया। वे कट्टर वामपंथी नहीं थे। उनकी राजनीति क्षेत्रीय, राजसी और व्यावहारिक थी और कॉन्ग्रेस के केंद्रीकृत, परिवार-केंद्रित ढाँचे में उनके लिए जगह नहीं बची।
हिमंत बिस्वा सरमा तो असम में कॉन्ग्रेस के सबसे ताकतवर नेताओं में गिने जाते थे। उन्हें लगा कि हाईकमान उन्हें नजरअंदाज कर रहा है और 2015 में वे पार्टी से निकल गए। BJP में आकर वे पूर्वोत्तर में पार्टी का सबसे असरदार चेहरा बने। हिमंत भी लेफ्टिस्ट नहीं थे, वे संगठन और क्षेत्रीय राजनीति के जानकार थे।
सचिन पायलट का मामला थोडा अलग है। राजस्थान में 2018 की जीत में उनका योगदान रहा, पर अशोक गहलोत से टकराव में हाईकमान गहलोत के साथ खडा रहा। पायलट ने बगावत की लेकिन पार्टी पूरी तरह नहीं छोडी। यह किसी से छिपा नहीं कि वे काफी हद तक मजबूरी में कॉन्ग्रेस में टिके हैं क्योंकि बाहर जाने पर राजनीतिक भविष्य का जोखिम था। कॉन्ग्रेस के ढाँचे में ऐसे नेताओं को बार-बार साबित करना पड़ता है कि वे परिवार के प्रति वफादार हैं।
जितिन प्रसाद और आरपीएन सिंह भी इसी रास्ते निकले। इनमें से कोई भी कम्युनिस्ट या समाजवादी विचारधारा का पक्का समर्थक नहीं था। सब व्यावहारिक, क्षेत्रीय या संगठन से जुड़े नेता थे, और कॉन्ग्रेस ने इन्हें जगह देने के बजाय या तो परिवार के करीबियों को आगे किया या लेफ्ट पृष्ठभूमि वाले नए चेहरों को मंच दिया।
2004 की वापसी
2004 में फिर यही कहानी दोहराई गई। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोकप्रिय नेता के सामने कॉन्ग्रेस सत्ता में आई, तो लेफ्ट पार्टियों के समर्थन से ही सरकार बनी। उस वक्त कॉन्ग्रेस के पास कोई मजबूत राष्ट्रीय चेहरा नहीं था। परमाणु समझौते पर लेफ्ट ने बाद में समर्थन वापस ले लिया लेकिन तब तक तस्वीर साफ हो चुकी थी कि कॉन्ग्रेस को सत्ता चाहिए तो लेफ्ट से समझौता करना ही पड़ता है।
कुमारामंगलम की थीसिस का असली मतलब भी यही था। कम्युनिस्ट विचारधारा जनता में उतनी लोकप्रिय नहीं थी, इसलिए उन्हें कॉन्ग्रेस जैसी बड़ी पार्टी का सहारा चाहिए था। और कॉन्ग्रेस ने भी जब-जब जरूरत पड़ी, उनका इस्तेमाल किया। दोनों ने एक-दूसरे को बराबर बरता।
आज फिरसे लेफ्ट की गोद में कॉन्ग्रेस
अब आज की बात। कन्हैया कुमार पहले CPI के छात्र संगठन AISF से जुड़े थे। वे कॉन्ग्रेस में आए और NSUI के प्रभारी बना दिए गए। नेहा बोरा AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, जो CPI-ML से जुड़ा संगठन है। हाल के विरोध प्रदर्शनों में वे राहुल और प्रियंका गॉंधी के साथ मंच पर दिखीं। पार्टी के भीतर NSUI के कई कार्यकर्ता असहज हैं।
यह सवाल नया भी नहीं है। 1970 के दशक में जब कुमारामंगलम जैसे लोग कॉन्ग्रेस में आए थे, तब भी कई पुराने कॉन्ग्रेसियों ने आपत्ति जताई थी। पर सत्ता और वैचारिक सुविधा के आगे वे आवाजें दब गईं।
नुकसान किसका हुआ?
इस पूरी प्रक्रिया में कॉन्ग्रेस ने अपने कई सक्षम नेता खो डाले। पटेल की व्यावहारिक सोच, कामराज की संगठन क्षमता, मोरारजी की ईमानदारी, सब धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई। 1969 के बाद कॉन्ग्रेस परिवार-केंद्रित पार्टी बनती गई। लेफ्ट का समर्थन मिला, पर जमीन से रिश्ता कमजोर होता गया।
अब कॉन्ग्रेस फिर लेफ्ट छात्र नेताओं की तरफ देख रही है, तो सवाल वही है कि जो पैटर्न बार-बार दोहराया गया, क्या वह पार्टी को मजबूत कर रहा है या खोखला? इतिहास अपना जवाब बहुत पहले दे चुका है। देखना यह है कि कॉन्ग्रेस उसे सुनना चाहती है या नहीं।
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