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‘लव जिहाद’ पर सख्त कानून से क्यों बढ़ जाता है अशोक गहलोत जैसे नेताओं का राजनीतिक रक्तचाप?

ऐसा भी नहीं है कि लव जिहाद कोई नए स्वभाव का षड्यंत्र है। यह पिछले काफी समय से हो रहा है। फिर भी सरकारें इस मुद्दे पर तुष्टिकरण की राजनीति के तहत मौन थीं। अब कुछ राज्य सरकारें इस मुद्दे पर ठोस कदम उठाना चाहती हैं तो उसका विरोध भी इसी सियासी लाभ के लिए किया जा रहा।

देश में लव जिहाद के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। कई राज्य सरकारों ने इस तरह के मामलों से निपटने के लिए सख्त क़ानून बनाने का ऐलान किया है। इनमें बीजेपी शासित उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकारें शामिल हैं। दूसरी तरफ अशोक गहलोत जैसे कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री भी हैं जो इसे समस्या मानने से इनकार कर रहे हैं।

राजस्थान के मुख्यमंत्री ने लव जिहाद के मुद्दे पर बयान देते हुए कहा है कि भाजपा ने यह शब्द साम्प्रदायिकता फैलाने के लिए गढ़ा है। विवाह निजी स्वतंत्रता का विषय है। उस पर अंकुश लगाने के लिए क़ानून बनाना असंवैधानिक है।   

सही बात है। विवाह देश के हर नागरिक का नितांत निजी मसला है। इसमें कोई सरकार क़ानून बनाकर दखल कैसे दे सकती है? लेकिन पहचान छुपा कर, प्रेम का ढोंग करना और भावनात्मक आधार पर दोनों पक्षों की सहमति होने के बाद अपना मज़हब थोपने का प्रयास करना, इसे न्यायसंगत कहा जा सकता है क्या? ऐसे मुद्दों की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि मूल समस्या एड्रेस होने से पहले अशोक गहलोत सरीखे नेता पूरा मुद्दा दिग्भ्रमित करने की कोशिश में लग जाते हैं हैं। दलील खुद में कितनी स्पष्ट है कि यहाँ क़ानून दो अलग धर्मों के विवाह को रोकने एक लिए नहीं, बल्कि अपनी असलियत छुपाकर प्रेम के पाखंड के ज़रिए विवाह करने वालों के लिए बनाया जा रहा है। 

न जाने किस सभ्य और लोकतांत्रिक समाज में इस तरह की प्रक्रियाओं को उचित माना जाता होगा। बयान राजस्थान के मुख्यमंत्री का है इसलिए कालांतर के कुछ मामले उठा कर देखे जाएँ तो वहाँ के हालात भी इस मुद्दे पर अत्यंत दयनीय हैं। राजस्थान के कई बड़े शहरों में लव जिहाद के मामले सामने आए हैं। लेकिन माननीय गहलोत सरकार के अनुसार यह शब्द एक राजनीतिक दल का सृजित शब्द है, जिसका एकमात्र उद्देश्य सांप्रदायिकता फैलाना है। जबकि राजस्थान में पिछले कुछ ही समय में लव जिहाद की तमाम भयावह घटनाएँ सामने आई हैं, जिन पर न तो कोई सुनवाई होती है और न ही कार्रवाई। फिर भी सूबे के मुख्यमंत्री इस शब्द की प्रासंगिकता को खारिज करते हैं।

इसी साल के अगस्त महीने में ही राजस्थान के जोधपुर में लव जिहाद की एक घटना हुई थी। इस घटना में शाहरुख नाम के युवक ने अपना नाम छुपा कर एक महिला से मित्रता की। उसने प्रेम का झाँसा देकर महिला के साथ संबंध बनाए और तीन साल तक उसका यौन शोषण करता रहा। जब महिला को यह बात पता चली कि उसका असल नाम शाहरुख है, तब उसने युवक से दूरी बनाना शुरू किया और इस बात पर युवक ने महिला की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करने की धमकी दे डाली। 

एक और मामला सामने आया था राजस्थान के उदयपुर शहर से। जून 2020 के दौरान हुई इस घटना में हनीफ़ नाम का युवक वीर सिंह बन कर विवाहित महिला से मित्रता की। इसके बाद बहला-फुसलाकर उसे बाड़मेर ले गया और वहाँ उस महिला को बंधक बना कर उसका जबरन धर्मांतरण कराया। इसके अलावा आरोपित हनीफ़ ने विवाहित महिला की तीन साल की बेटी को जान से मारने की धमकी देकर दो महीने तक लगातार उसके साथ दुष्कर्म किया।

इस साल के जून महीने में ही लव जिहाद की एक और घटना राजस्थान के राजसमंद में हुई थी। इस घटना का प्रारूप भी कुछ अलग नहीं था। रियाज़ नाम के युवक ने पिंटू बन कर एक नाबालिग लड़की से बातचीत शुरू की। फिर रियाज़ ने लड़की को बहला-फुसलाकर अपने प्रेम जाल में फँसाया और उसके साथ बलात्कार किया। रियाज़ ने लड़की को धमकी तक दी कि इसके बारे में उसने कुछ भी कहा तो उसके वीडियो क्लिप्स वायरल कर देगा।

2019 के जून महीने में भी ऐसी ही एक घटना सामने आई थी। राजस्थान के सीकर का रहने वाला इमरान भाटी कबीर शर्मा बना, ब्राह्मण युवती से विवाह रचाया और दहेज में 11 लाख नगद और 5 लाख जेवर लेकर युवती के साथ फ़रार हो गया। जबकि इमरान नाम का यह युवक पहले से शादीशुदा था, इसके 3 बच्चे भी थे। उसने विवाह करने के लिए नकली रिश्तेदार तक बुलाए थे। हालाँकि घटना के कुछ ही समय बाद आरोपित इमरान को गिरफ्तार कर लिया गया था। 

यह ऐसे मामले थे जिनका ज़िक्र किया जा रहा है, इसके अलावा न जाने कितने मामले हैं जिनका उल्लेख नहीं किया जा रहा है और न जाने कितने ऐसे मामले होंगे जो दर्ज तक नहीं किए जाते हैं। बड़े विवादों के साथ समस्या का दायरा भी बड़ा होता है। फिर किसी मुख्यमंत्री के लिए यह किसी का निजी मसला कैसे हो सकता?

ऐसा भी नहीं है कि लव जिहाद कोई नए स्वभाव का षड्यंत्र है। यह पिछले काफी समय से हो रहा है। फिर भी सरकारें इस मुद्दे पर तुष्टिकरण की राजनीति के तहत मौन थीं। अब कुछ राज्य सरकारें इस मुद्दे पर ठोस कदम उठाना चाहती हैं तो उसका विरोध भी इसी सियासी लाभ के लिए किया जा रहा।   

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