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रमजान शुरू होते ही फिर कट्टरपंथियों के निशाने पर हिंदू, 3 राज्यों में शोभायात्राओं में चलाए पत्थर-जूते-चप्पल: पहले भी लव जिहाद-हत्या-धर्मांतरण और मंदिरों पर हमलों का रहा इतिहास

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में, जहाँ ‘सर्वधर्म समभाव’ को संविधान की आत्मा माना गया है, वहाँ एक बेहद डरावना और सुनियोजित ‘पैटर्न’ उभरकर सामने आता है। यह विचार आज करोड़ों हिंदुओं के मन में घर कर रहा है कि क्या उनके त्यौहार और महापुरुषों की जयंतियाँ अब कट्टरपंथियों की दया पर निर्भर हैं? विडंबना देखिए कि जैसे ही रमजान का महीना शुरू होता है, देश के विभिन्न हिस्सों से हिंदुओं पर हमलों की खबरें बाढ़ की तरह आने लगती हैं।

चाहे वह छत्रपति शिवाजी महाराज की शोभायात्रा हो, मर्यादा पुरुषोत्तम राम की नवमी हो या सावन की पावन काँवड़ यात्रा… इन सभी पर होने वाली पत्थरबाजी और हिंसा महज कोई ‘तात्कालिक गुस्सा’ नहीं है। यह हिंदुओं के प्रति गहरी घृणा और उनके नागरिक अधिकारों को कुचलने की एक दीर्घकालिक और खतरनाक साजिश का हिस्सा है। कट्टरपंथियों की यह मानसिकता कि ‘मस्जिद के सामने से हिंदू जुलूस नहीं निकल सकता’, भारत के लोकतंत्र और अखंडता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।

कर्नाटक में शिवाजी जयंती पर पथराव: जब रक्षक ही बना निशाना

कर्नाटक के बागलकोट से आई खबरें और भी भयावह हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती के अवसर पर निकाले गए जुलूस पर तब हमला किया गया जब वह पंका मस्जिद के सामने से गुजर रहा था। कट्टरपंथियों ने मस्जिद की ओर से चप्पलें और पत्थर बरसाए।

इस हमले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) सिद्धार्थ गोयल के सिर और गर्दन पर चोट आई। उनकी वर्दी पर खून के धब्बे इस बात के गवाह थे कि कट्टरपंथियों के मन में कानून और व्यवस्था का कोई डर शेष नहीं रहा है।

बागलकोट की इस घटना में यह आरोप लगाया गया कि मस्जिद के बाहर डीजे की आवाज तेज थी। क्या डीजे की आवाज का समाधान पत्थरबाजी है? पुलिस के अनुसार, जुलूस जब मस्जिद के पास रुका, तभी विवाद बढ़ा और मस्जिद के भीतर से पत्थर फेंके गए। बाद में उग्र माहौल में कुछ ठेलों में आग भी लगा दी गई।

यह पूरी घटना दिखाती है कि कैसे एक ऐतिहासिक महापुरुष के सम्मान में निकाले जा रहे जुलूस को ‘संवेदनशील इलाके’ के नाम पर निशाना बनाया जाता है। जब पुलिस का सबसे बड़ा अधिकारी ही सुरक्षित नहीं है, तो आम हिंदू श्रद्धालु की सुरक्षा की कल्पना करना कठिन है।

मध्य प्रदेश: दुर्गा मंदिर पर प्रहार और जबलपुर का तनाव

जबलपुर के संवेदनशील सिहोरा तहसील में जो हुआ, वह कट्टरपंथी मानसिकता का एक ज्वलंत उदाहरण है। गुरुवार (19 फरवरी) की रात जब हिंदू समाज अपनी परंपरा के अनुसार दुर्गा मंदिर में शाम की आरती कर रहा था, उसी समय पास की मस्जिद में नमाज का समय भी था।

विवाद तब शुरू हुआ जब एक युवक ने कथित तौर पर मंदिर की ग्रिल को नुकसान पहुँचाया। यह घटना केवल संपत्ति के नुकसान की नहीं थी, बल्कि यह हिंदुओं की श्रद्धा पर सीधा हमला था। जब स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया, तो देखते ही देखते कट्टरपंथी समूह ने पत्थरबाजी शुरू कर दी, जिससे पूरा इलाका सांप्रदायिक तनाव की आग में झुलस गया।

जिला प्रशासन और पुलिस को स्थिति संभालने के लिए हल्का बल प्रयोग करना पड़ा और भारी सुरक्षा बल तैनात करना पड़ा। पुलिस ने 20 उपद्रवियों को हिरासत में लिया है, लेकिन सवाल वही खड़ा है… क्या एक ही समय पर आरती और नमाज का होना हिंसा का बहाना बन सकता है?

यह घटना दर्शाती है कि कैसे कट्टरपंथी तत्व हिंदुओं की धार्मिक गतिविधियों को बर्दाश्त करने के बजाय उसे विवाद का रूप देकर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। मंदिर की ग्रिल तोड़ना और फिर संगठित होकर पत्थरबाजी करना एक डराने वाले भविष्य की ओर इशारा करता है।

आंध्र प्रदेश और हैदराबाद: ‘मंदिर बनाएँगे’ के नारों पर कट्टरपंथियों का बवाल

हैदराबाद के अंबरपेट इलाके में भी शिवाजी जयंती के जुलूस के दौरान कट्टरपंथियों ने मोर्चा खोल दिया। जब जुलूस एक मस्जिद के पास से गुजर रहा था, तब वहाँ मौजूद लोगों ने संगीत और ‘मंदिर बनाएँगे’ जैसे गानों पर कड़ी आपत्ति जताई।

आपत्ति धीरे-धीरे तीखी बहस और धक्का-मुक्की में बदल गई। कट्टरपंथी तत्वों का यह दावा कि हिंदू गानों से उनकी प्रार्थना में खलल पड़ता है, अक्सर हिंदू सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को दबाने का एक जरिया बन जाता है।

इस घटना के बाद शहर में तनाव इतना बढ़ गया कि प्रशासन को अगले चार दिनों के लिए धारा 144 लागू करनी पड़ी और 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया। यह विडंबना ही है कि जिस देश में हजारों लाउडस्पीकरों से दिन में पाँच बार आवाजें गूँजती हैं, वहाँ साल में एक बार निकलने वाले हिंदू जुलूस के डीजे और गानों पर इतना बवाल खड़ा कर दिया जाता है। यह कट्टरपंथियों की उस मानसिकता को उजागर करता है जो सार्वजनिक स्थानों पर केवल अपनी धार्मिक प्रधानता चाहती है और दूसरे धर्म के प्रतीकों को बर्दाश्त नहीं कर पाती।

रमजान 2025 का काला इतिहास: 70 घटनाओं का खूनी लेखा-जोखा

पुरानी रिपोर्टों और आँकड़ों पर नजर डालें तो रमजान के महीने में कट्टरपंथियों का असली चेहरा और भी भयावह होकर सामने आता है। मार्च 2025 के दौरान भारत और बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ अपराधों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार हुई, जो कट्टरपंथियों की अटूट नफरत को दर्शाती है।

हत्या और मॉब लिंचिंग: बिहार के सारण में राकेश कुमार (18) की वकील शाह और शकील ने चाकू मारकर हत्या कर दी। दिल्ली के वजीरपुर में 65 साल के राधेश्याम को इरशाद ने मौत के घाट उतार दिया। यहाँ तक कि नागपुर में 1000 से ज्यादा की भीड़ ने केवल ‘अफवाह’ पर हिंदुओं के घरों और 40 गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया।

होली और कीर्तन पर प्रहार: मुरादाबाद में मंदिर में कीर्तन कर रहे हिंदुओं पर असलम और शरीफ जैसे लोगों ने हमला किया। होली के पावन अवसर पर वाराणसी, गिरिडीह और लुधियाना में कट्टरपंथियों ने डीजे और गुलाल का विरोध करते हुए पत्थर और बोतल बमों से हमला किया। यह दर्शाता है कि हिंदुओं के हर त्यौहार को ‘अपराध’ की तरह देखा जाता है।

इन घटनाओं में एक बात सामान्य है ‘साजिश’। चाहे वह मुजफ्फरनगर में हिंदू लड़के का जबरन खतना कराना हो या नागपुर में सुनियोजित तरीके से दंगा भड़काना, कट्टरपंथी कभी अपनी मानसिकता नहीं बदलते। वे हर उस अवसर का लाभ उठाते हैं जहाँ वे हिंदू समाज को चोट पहुँचा सकें।

‘लव जिहाद’ और महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराध

हिंदुओं के खिलाफ चल रही इस साजिश का एक सबसे घिनौना हिस्सा ‘लव जिहाद’ है। रमजान के दौरान भी कट्टरपंथियों ने हिंदू बेटियों को अपना शिकार बनाने का धंधा जारी रखते हैं। दिल्ली के सीमापुरी में आसिफ ने कोमल की हत्या कर दी, तो बाराबंकी और बरेली में हिंदू लड़कियों को अगवा कर धर्मांतरण के लिए मजबूर किया गया। देहरादून में नदीम ने ‘नवीन’ बनकर हिंदू लड़की से शादी की और धोखा दिया। ये घटनाएँ साबित करती हैं कि पहचान छिपाकर हिंदू समाज की जड़ों को खोखला करने का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है।

इतना ही नहीं, बच्चों और बुजुर्गों को भी नहीं बख्शा गया। बिहार के गोपालगंज में 80 साल की बुजुर्ग महिला के साथ सैय्यद अली और उसके साथियों ने जो दरिंदगी की, उसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। नवी मुंबई में मोहम्मद अंसारी ने दो मासूम बच्चियों की हत्या कर दी। कट्टरपंथियों की यह घृणा इतनी गहरी है कि वे अब मासूमों के खून से भी परहेज नहीं कर रहे हैं। स्कूलों में हिंदू छात्राओं से छेड़खानी (सूरजपुर मामला) और धर्मांतरण का दबाव (भोपाल और झाँसी मामले) यह बताने के लिए काफी है कि हिंदू समाज के खिलाफ चौतरफा मोर्चा खोला गया है।

मंदिरों को अपवित्र करने और रेल पलटाने की साजिशें

कट्टरपंथ की यह आग केवल सड़कों तक सीमित नहीं है, यह हिंदुओं के आराध्य और सार्वजनिक सुरक्षा तक पहुँच चुकी है। कर्नाटक के बेलगावी में याशिर ने केवल इसलिए मंदिर पर पत्थर फेंके क्योंकि उसे ‘मंदिर देखकर गुस्सा‘ आता था। पश्चिम बंगाल में शीतला मंदिर में आगजनी और मूर्तियों को तोड़ना अब एक आम घटना बनती जा रही है। ये हमले केवल ईंट-पत्थर के ढाँचे पर नहीं, बल्कि हिंदू मानबिंदुओं पर चोट करने के लिए किए जाते हैं।

सबसे खतरनाक बात यह है कि कट्टरपंथी अब ‘जिहाद’ के नए तरीके अपनाते हैं। गाजियाबाद में शावेज और इस्रार जैसे लोग जागरण और होटलों में रोटियों पर थूकते पकड़े गए। यह केवल घृणा नहीं, बल्कि हिंदुओं की आस्था को भ्रष्ट करने का निकृष्टतम प्रयास है। यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश के हरदोई में इबादुल्लाह और अनवारुल जैसे किशोरों ने रेल की पटरी पर बोल्ट रखकर ट्रेन पलटाने की कोशिश की। यह साफ़ संकेत है कि कट्टरपंथ अब केवल मजहबी नहीं रहा, बल्कि यह सीधे-सीधे देश के खिलाफ युद्ध (Terrrorism) के स्तर पर पहुँच चुका है।

क्या हिंदू अपने ही देश में ‘दोयम दर्जे’ का नागरिक है?

इन तमाम घटनाओं और रिपोर्टों पर अगर निष्पक्ष रूप से विचार किया जाए, तो एक डरावनी सच्चाई सामने आती है। भारत में एक ऐसा ‘इको-सिस्टम’ खड़ा हो गया है जो हिंदुओं को उनके ही घर में असुरक्षित महसूस कराने के लिए दिन-रात काम कर रहा है। कट्टरपंथियों की मानसिकता सदियों से नहीं बदली है। वे आज भी उसी मध्यकालीन सोच में जी रहे हैं जहाँ ‘काफिरों’ के त्यौहारों को रोकना वे अपना मजहबी कर्तव्य समझते हैं। रमजान के दौरान शांति और इबादत की दुहाई दी जाती है, लेकिन उसी महीने में हिंदुओं का खून सबसे ज्यादा बहाया जाता है।

यह हिंदुओं के खिलाफ एक गहरी और स्थायी साजिश है। कट्टरपंथी जानते हैं कि वे संगठित हैं और उन्हें ‘सेक्युलर’ राजनीति का संरक्षण प्राप्त है। जब शिवाजी महाराज की जयंती पर पत्थर चलते हैं, तो यह केवल एक जुलूस पर हमला नहीं है, बल्कि यह भारत के शौर्य और इतिहास पर हमला है। जब काँवड़ यात्रा को रोका जाता है, तो यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था का अपमान है। प्रशासन को अब यह समझना होगा कि ‘तुष्टीकरण’ की नीति ने कट्टरपंथियों के हौसले इतने बढ़ा दिए हैं कि वे अब पुलिस अधिकारियों पर हमला करने से भी नहीं हिचकिचाते।

अगर आज हिंदू समाज अपनी सुरक्षा और सम्मान के लिए खड़ा नहीं हुआ, तो आने वाले समय में अपने त्यौहारों को मनाना भी दूभर हो जाएगा। कट्टरपंथियों की यह मानसिकता बदलने वाली नहीं है। उन्हें केवल ‘कानून के डंडे’ से ही सुधारा जा सकता है। यह देश का दुर्भाग्य है कि जहाँ दीपावली पर प्रदूषण की बात होती है, वहीं रमजान के दौरान होने वाली सरेआम हिंसा पर कथित बुद्धिजीवी मौन धारण कर लेते हैं। अब समय आ गया है कि इन कट्टरपंथी साजिशों का पर्दाफाश किया जाए और हिंदुओं को उनके अपने ही देश में गरिमा के साथ जीने का अधिकार सुनिश्चित किया जाए।

‘मुद्दाहीन नंगपन का प्रदर्शन’: AI समिट में शर्टलेस प्रदर्शन पर यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं को लोगों ने पीटा, नेताओं से लेकर नेटिजन्स ने जमकर लगाई क्लास

दिल्ली के भारत मंडप में चल रहे इंडिया AI इम्पैक्ट समिट में यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन को लेकर हंगामा हो रहा है। BJP से लेकर आम लोग और नेटिजन्स तक यूथ कॉन्ग्रेस की इस हरकत पर भड़के हुए हैं। वहीं, पुलिस ने इस मामले में कुछ कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया है और उनके खिलाफ कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। कुछ वीडियोज में दावा किया जा रहा है कि मौके पर मौजूद आम लोगों ने भी यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं को आड़े हाथ लिया है।

यूथ कॉन्ग्रेस का शर्टलेस हंगामा

कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद यूथ कॉन्ग्रेस के कुछ कार्यकर्ता AI समिट में प्रवेश करने में सफल रहे। शुक्रवार (20 फरवरी 2026) दोपहर करीब 12:30 बजे हुई इस घटना में प्रदर्शनकारियों ने पहले क्यूआर कोड के माध्यम से रजिस्ट्रेशन कराया और इसके बाद कार्यक्रम स्थल के भीतर पहुँच गए। वे स्वेटर और जैकेट पहनकर अंदर आए थे, जिससे उन पर किसी का विशेष ध्यान नहीं गया।

हाल नंबर 5 के लॉबी क्षेत्र में पहुंचने के बाद उन्होंने अपने स्वेटर और जैकेट उतार दिए और टी-शर्ट हटाकर अचानक प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। स्थिति को भांपते हुए सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत हस्तक्षेप किया, प्रदर्शनकारियों को काबू में लिया और हालात को सामान्य कर दिया।

हिरासत में लिए गए यूथ कॉन्ग्रेस के नेता

यूथ कॉन्ग्रेस के इस हंगामे के बाद संगठन से जुड़े कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया है और अन्य लोगों को पहचान की जा रही है। नई दिल्ली जिले के पुलिस उपायुक्त देवेश कुमार महला ने बताया कि हिरासत में लिए गए लोगों में बिहार के 35 वर्षीय कृष्णा शामिल हैं, जो इंडियन यूथ कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय सचिव हैं। उनके साथ बिहार के ही 33 वर्षीय कुंदन यादव, जो प्रदेश सचिव हैं, को भी पकड़ा गया है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के अजय कुमार, जो प्रदेश उपाध्यक्ष हैं, और तेलंगाना के महबूबनगर से नरसिम्हा यादव, जो राष्ट्रीय समन्वयक हैं, भी हिरासत में लिए गए हैं।

BJP ने बोला तीखा हमला

इस प्रदर्शन पर बीजेपी ने तीखा हमला बोला है। कई केंद्रीय मंत्रियों से लेकर बीजेपी प्रवक्ताओं ने यूथ कॉन्ग्रेस से लेकर राहुल गाँधी तक को आड़े हाथों लिया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे भारत की प्रतिष्ठा को धूमिल करने का प्रयास बताया है। उन्होंने X पर एक पोस्ट में लिखा, “कॉन्ग्रेस ने देश का सम्मान बढ़ाने के बजाय आयोजन में व्यवधान उत्पन्न करने का रास्ता चुना है। यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा जिस शर्मनाक तरीके से कार्यक्रम स्थल पर अनुचित व्यवहार करते हुए हंगामा किया गया है वह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि भारत की प्रतिष्ठा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर धूमिल करने का प्रयास भी है।मैं कॉन्ग्रेस के इस कृत्य की भर्त्सना करता हूँ।”

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी कॉन्ग्रेस पर तीखा हमला बोला है। शिवराज सिंह ने कहा, “कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने एआई समिट में सिर्फ अपनी शर्ट ही नहीं उतारी, बल्कि यह भी दिखा दिया कि कॉन्ग्रेस देश के खिलाफ सोच रखती है। यह देशद्रोह है। यह हमारे देश की छवि के साथ खिलवाड़ है।” उन्होंने आगे कहा, “मैं सोनिया गाँधी जी और मल्लिकार्जुन खरगे जी से पूछना चाहता हूँ कि क्या उनके लिए राजनीति देश से बड़ी है? क्या उन्होंने देश की प्रतिष्ठा से खेलने के लिए कोई गुप्त समझौता किया है? क्या यही कॉन्ग्रेस का असली चेहरा है? जनता इसे कभी माफ नहीं करेगी।”

यूथ कॉन्ग्रेस के प्रदर्शन पर बीजेपी सांसद संबित पात्रा ने कहा, “राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी सबसे बड़े देशद्रोही हैं। जब भी देश आगे बढ़ता है, जब भी देश में खुशी का माहौल होता है, ये उसे बिगाड़ने का काम करते हैं। ये लोग देश के गद्दार हैं। कॉन्ग्रेस के लिए मेरे पास सिर्फ तीन शब्द हैं – टॉपलेस, ब्रेनलेस, शेमलेस।” उन्होंने कहा कि इस प्रदर्शन की साजिश राहुल गाँधी, सोनिया गाँधी और प्रियंका गाँधी की मौजूदगी में, राहुल गाँधी के निवास स्थान पर रची गई थी।

मुद्दाहीन नंगपन का प्रदर्शन: कुमार विश्वास

कवि कुमार विश्वास ने इस प्रदर्शन पर कॉन्ग्रेस पर हमला बोला है। कुमार विश्वास ने X पर लिखा, “एक अंतराष्ट्रीय मंच पर जहाँ विश्व भर के सबसे महनीय मेहमानों के सामने देश अपनी तकनीकी-शक्ति को सिद्ध करने पर जुटा पड़ा है, वहाँ देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ ये नंगा प्रदर्शन वस्तुतः विपक्ष के मुद्दाहीन नंगपन का प्रदर्शन है। दुःखद है कि कॉन्ग्रेस जैसी पुरानी व वैचारिक रूप से पकी हुई पार्टी में मुद्दों का इतना भीषण अकाल आ पड़ा है, आपसे न हो पाएगा भाई।”

आम लोगों ने यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं को पीटा

इस दौरान समिट में मौजूद लोगों से भी यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं की झड़प हो गई और सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही वीडियो में दावा किया जा रहा है कि लोगों ने यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं की पिटाई भी की है।

सामने आए एक वीडियो में कुछ लोग कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं के साथ हाथापाई करते और मारपीट करते नजर आ रहे हैं।

नेटिजन्स और लोगों ने भी लगाई कॉन्ग्रेस की क्लास

नेटिजन्स ने भी कॉन्ग्रेस के इस हरकत पर जमकर गुस्सा निकाला है। X यूजर्स ने इस हरकत को बेशर्म और वैश्विक मंच पर देश का अपमान करने की कोशिश बताया है। एक X यूजर ने लिखा, “ऋषियों की यज्ञ अग्नि में मांस फेंकते राक्षस”। एक अन्य ने लिखा, “देश के युवाओं को तकनीक, नवाचार और अवसर चाहिए न कि राजनीतिक स्टंट। भारत AI में आगे बढ़ रहा है और यही भविष्य है। यूथ कॉन्ग्रेस एक देशद्रोही संगठन है, नीचता की हद होती है।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “तुम जैसे गद्दारों को शर्म आनी चाहिए। देश को बदनाम करने की राजनीति करने वालों को शर्म आनी चाहिए। हर मंच पर भारत की उपलब्धियों को छोटा दिखाना, दुनिया के सामने अपने ही देश की छवि खराब करना। ये स्वस्थ विपक्ष नहीं, राष्ट्र के साथ अन्याय है। इतना अहंकार? शर्म आनी चाहिए।”

कार्यक्रम में शामिल और प्रदर्शन के प्रत्यक्षदर्शी रहे लोगों ने भी यूथ कॉन्ग्रेस को आड़े हाथों लिया है। एक प्रत्यक्षदर्शी ने कहा, “एक विजिटर के रूप में मुझे लगता है कि इस तरह का प्रदर्शन करने के लिए यह सही जगह नहीं है। इससे देश की छवि खराब होती है। जहाँ भारत एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम की मेजबानी कर रहा हो और AI जैसे विषय पर चर्चा हो रही हो, वहाँ विरोध करना ठीक नहीं है। ऐसा प्रदर्शन नहीं होना चाहिए।”

एक अन्य ने कहा, “यह विरोध करने का मंच नहीं है। AI भारत और उसके भविष्य के लिए है। उन्हें यहाँ प्रदर्शन नहीं करना चाहिए था। उन्हें इस मंच की गरिमा को समझना चाहिए।”

विरोध का हक लेकिन क्या ये तरीका सही?

AI समिट जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम में यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया प्रदर्शन कई मायनों में गलत और दुर्भाग्यपूर्ण है। सबसे पहली बात यह कार्यक्रम किसी एक राजनीतिक दल का नहीं था बल्कि देश और दुनिया से जुड़े विशेषज्ञों, उद्यमियों और प्रतिनिधियों का मंच था। ऐसे मंच पर हंगामा करना न सिर्फ आयोजन की गरिमा को ठेस पहुँचाता है बल्कि देश की छवि पर भी नकारात्मक असर डालता है।

लोकतंत्र में विरोध करना हर नागरिक और राजनीतिक दल का अधिकार है। लेकिन विरोध का भी एक तरीका और स्थान होता है। यदि किसी मुद्दे पर असहमति है, तो उसके लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस, शांतिपूर्ण धरना या ज्ञापन जैसे कई वैधानिक और सभ्य रास्ते उपलब्ध हैं। किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन के बीच अचानक इस तरह प्रदर्शन करना अनुशासनहीनता को दर्शाता है।

इस घटना से सुरक्षा पर भी सवाल उठते हैं। जब कड़ी सुरक्षा के बावजूद लोग अंदर जाकर प्रदर्शन कर दें तो यह चिंता की बात है। इससे आगे होने वाले ऐसे कार्यक्रमों की व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है। राजनीति में मतभेद होना सामान्य बात है। अलग-अलग विचार होना लोकतंत्र का हिस्सा है लेकिन हर मंच राजनीति के लिए नहीं होता। AI समिट जैसे कार्यक्रम देश की तरक्की और दुनिया के साथ सहयोग बढ़ाने के लिए होते हैं। ऐसे मौके पर विरोध करना अच्छा संदेश नहीं देता।

भारत ने US नेतृत्व वाले Pax Silica ग्रुप में ली एंट्री, सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में घटेगी चीनी निर्भरता: समझिए- कैसे खुद को भविष्य के लिए तैयार कर रहा हिंदुस्तान

वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के इस दौर में तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर और क्रिटिकल मिनरल्स किसी भी देश की ताकत का आधार बन चुके हैं। 21वीं सदी में जिस देश के पास मजबूत और सुरक्षित तकनीकी सप्लाई चेन होगी, वही आर्थिक, सामरिक और रणनीतिक रूप से आगे रहेगा।

इसी सोच के तहत अमेरिका के नेतृत्व में एक नया रणनीतिक गठबंधन खड़ा किया गया है, जिसका नाम है ‘पैक्स सिलिका (Pax Silica)’। इस पहल का मकसद है दुनिया भर में सिलिकॉन आधारित तकनीकों, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और जरूरी खनिजों की एक सुरक्षित, भरोसेमंद और मजबूत सप्लाई चेन तैयार करना।

अब भारत भी इस महत्वपूर्ण वैश्विक पहल का हिस्सा बन गया है। भारत शुक्रवार (20 फरवरी 2026) को अमेरिका के नेतृत्व वाले पैक्स सिलिका अलायंस में शामिल हुआ। दिल्ली में चल रही AI इम्पैक्ट समिट के दौरान भारत और अमेरिका ने घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भारत के प्रवेश को एक रणनीतिक घटनाक्रम बताया।

वहीं माइक्रोन टेक्नोलॉजी के CEO संजय मेहरोत्रा ​​ने कहा, “पैक्स सिलिका पहल US और भारत के बीच टेक्नोलॉजी कोलेबोरेशन को और करीब लाएगी।”

यह कदम भारत-अमेरिका संबंधों में नई मजबूती लाएगा और भारत को वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा में एक अहम खिलाड़ी बना देगा। इस फैसले का असर सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे भारत की अर्थव्यवस्था, तकनीकी विकास, सेमीकंडक्टर उद्योग और AI मिशन को भी जबरदस्त बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

क्या है ‘पैक्स सिलिका’ और इसकी पृष्ठभूमि?

‘पैक्स सिलिका’ शब्द दो लैटिन और वैज्ञानिक अवधारणाओं से मिलकर बना है। ‘Pax’ का अर्थ होता है शांति, स्थिरता और दीर्घकालिक समृद्धि, जबकि ‘Silica’ सिलिकॉन से जुड़ा है, जो कंप्यूटर चिप्स, सेमीकंडक्टर और AI तकनीक का मूल तत्व है। यानी यह पहल तकनीकी सप्लाई चेन के जरिए वैश्विक शांति, स्थिरता और आर्थिक समृद्धि सुनिश्चित करने की सोच पर आधारित है।

इस रणनीतिक गठबंधन की शुरुआत दिसंबर 2025 में अमेरिका ने की थी। 12 दिसंबर को वॉशिंगटन में आयोजित ‘पैक्स सिलिका समिट’ में कई देशों ने इस घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए। इसका उद्देश्य था, क्रिटिकल मिनरल्स, सेमीकंडक्टर, AI इंफ्रास्ट्रक्चर और उससे जुड़ी पूरी सप्लाई चेन को सुरक्षित, भरोसेमंद और नवाचार आधारित बनाना।

(फोटो साभार: ईटीवी भारत)

शुरुआत में इस पहल में अमेरिका के साथ ऑस्ट्रेलिया, ग्रीस, इजराइल, जापान, कतर, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात और यूनाइटेड किंगडम जैसे देश शामिल हुए। भारत को पहले चरण में इसमें शामिल नहीं किया गया था, जिससे कई तरह की अटकलें भी लगाई गईं।

हालाँकि पिछले महीने भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने औपचारिक रूप से नई दिल्ली को इस रणनीतिक गठबंधन में शामिल होने का न्योता दिया।

‘पैक्स सिलिका’ का उद्देश्य और वैश्विक महत्व

‘पैक्स सिलिका’ का मुख्य उद्देश्य दुनिया की तकनीकी सप्लाई चेन को किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता से मुक्त करना है। खासकर चीन पर निर्भरता कम करना इस पहल का एक अहम लेकिन अप्रत्यक्ष लक्ष्य माना जा रहा है। वर्तमान में दुनिया के करीब 70 प्रतिशत दुर्लभ खनिज (रेयर अर्थ मिनरल्स) का खनन अकेले चीन करता है।

यही खनिज सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, बैटरी, AI सर्वर और अत्याधुनिक तकनीकों के निर्माण में जरूरी होते हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का मानना है कि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में आर्थिक दबाव, आपूर्ति संकट और राजनीतिक ब्लैकमेल जैसी स्थितियाँ पैदा कर सकती है।

इसलिए ‘पैक्स सिलिका’ के जरिए एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया जा रहा है, जिसमें ऊर्जा, क्रिटिकल मिनरल्स, मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर, AI मॉडल, डेटा सेंटर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तक पूरी सप्लाई चेन को सुरक्षित किया जा सके। इस पहल का एक और महत्वपूर्ण पहलू है भरोसेमंद तकनीक का विकास।

AI को एक परिवर्तनकारी शक्ति माना गया है, जो आने वाले दशकों में पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को नया आकार देगी। ऐसे में यह जरूरी है कि AI सिस्टम सुरक्षित हों, उनके दुरुपयोग की संभावना कम हो और वे किसी शत्रुतापूर्ण ताकत के नियंत्रण में न जाएँ। पैक्स सिलिका इसी सोच के तहत देशों को एक साझा मंच पर लाकर काम करने का अवसर देता है।

भारत की एंट्री का समय और रणनीतिक पृष्ठभूमि

भारत का इस गठबंधन में शामिल होना ऐसे समय पर हो रहा है, जब भारत और अमेरिका के रिश्ते एक बार फिर नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के बीच व्यापारिक टैरिफ, बाजार पहुँच और तकनीकी सहयोग को लेकर तनाव देखने को मिला था।

खासकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों के चलते दोनों देशों के रिश्तों में खटास आई थी। हालाँकि हाल के हफ्तों में दोनों पक्षों ने अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया है और कई अन्य रणनीतिक पहलों पर सहमति बनाई है।

इसी क्रम में भारत को ‘पैक्स सिलिका’ में शामिल किया जाना दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊँचाई पर ले जाने वाला कदम माना जा रहा है। नई दिल्ली में आयोजित ‘इंडिया AI इम्पैक्ट समिट’ के दौरान इस साझेदारी को औपचारिक रूप दिया जाएगा। इस मौके पर अमेरिका के अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इकोनॉमिक अफेयर्स जैकब हेलबर्ग भी मौजूद हैं।

उनका साफ कहना है कि 20वीं सदी में दुनिया तेल और स्टील से चलती थी, जबकि 21वीं सदी में दुनिया कंप्यूटर, AI और सेमीकंडक्टर से चलेगी। ऐसे में भारत को इस रणनीतिक ढाँचे में शामिल करना अमेरिका की बड़ी प्राथमिकता है।

चीन फैक्टर और वैश्विक भू-राजनीति में ‘पैक्स सिलिका’ की भूमिका

हालाँकि अमेरिका यह कहता है कि ‘पैक्स सिलिका’ किसी देश के खिलाफ नहीं है, लेकिन वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि यह पहल मुख्य रूप से चीन की तकनीकी और खनिज प्रभुत्व को संतुलित करने के लिए लाई गई है।

चीन न सिर्फ दुर्लभ खनिजों के खनन में अग्रणी है, बल्कि सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स और बैटरी उत्पादन में भी उसकी पकड़ बेहद मजबूत है। इसके अलावा AI हार्डवेयर और सप्लाई चेन में भी चीन की बड़ी हिस्सेदारी है।

अमेरिका और उसके सहयोगी देश इसे ‘कोएर्सिव डिपेंडेंसी’ यानी जबरन निर्भरता मानते हैं। उनका तर्क है कि यदि किसी संकट के समय चीन सप्लाई रोक दे या कीमतें बढ़ा दे, तो पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था हिल सकती है। इसी कारण पैक्स सिलिका के जरिए वैकल्पिक और भरोसेमंद सप्लाई चेन तैयार की जा रही है।

चीन ने इस पहल पर संयमित प्रतिक्रिया दी है, लेकिन उसके सरकारी मीडिया ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने इसे चीन को वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन से अलग करने की कोशिश बताया है और चेतावनी दी है कि इससे लागत बढ़ेगी और वैश्विक बाजार अस्थिर हो सकता है।

भारत को क्या-क्या फायदे होंगे: तकनीक, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा

भारत के लिए ‘पैक्स सिलिका’ में शामिल होना कई स्तरों पर फायदेमंद साबित हो सकता है। सबसे बड़ा लाभ भारत के तेजी से बढ़ते तकनीकी बाजार को मिलेगा। भारत में डिजिटल क्रांति, 5G नेटवर्क, डेटा सेंटर, क्लाउड कंप्यूटिंग और AI आधारित सेवाओं की माँग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में भरोसेमंद और सस्ती सप्लाई चेन तक पहुँच भारत की विकास गति को और तेज कर सकती है।

सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भारत अभी शुरुआती दौर में है। सरकार ने ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ के तहत देश में चिप मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की योजना बनाई है। पैक्स सिलिका के जरिए भारत को अत्याधुनिक तकनीक, निवेश और विशेषज्ञता तक पहुँच मिलेगी, जिससे देश में सेमीकंडक्टर फैब्स, पैकेजिंग यूनिट्स और AI हार्डवेयर निर्माण को गति मिलेगी।

AI के क्षेत्र में भी यह साझेदारी भारत के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती है। अमेरिकी कंपनियाँ पहले ही भारत में बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, ओपनएआई और अन्य दिग्गज कंपनियों की दिलचस्पी भारत में AI इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने में बढ़ रही है।

पैक्स सिलिका के तहत भारत को एडवांस्ड AI चिप्स, डेटा सेंटर टेक्नोलॉजी और अनुसंधान सहयोग मिल सकता है, जिससे भारत वैश्विक AI रेस में तेजी से आगे बढ़ सकेगा।

इसके अलावा चीन पर निर्भरता कम होना भी भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक लाभ है। खासकर टेलीकॉम, इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल और बैटरी जैसे क्षेत्रों में भारत चीन से आयात पर काफी निर्भर है। पैक्स सिलिका के तहत वैकल्पिक सप्लाई चेन विकसित होने से भारत को आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी।

सुरक्षा के लिहाज से भी यह पहल बेहद अहम है। संवेदनशील तकनीकों की सुरक्षा, साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर की मजबूती और डिजिटल नेटवर्क की विश्वसनीयता भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़ी है। इस गठबंधन से भारत को सुरक्षित और भरोसेमंद डिजिटल इकोसिस्टम बनाने में मदद मिलेगी।

भविष्य की दिशा और भारत की भूमिका

पैक्स सिलिका केवल एक तकनीकी गठबंधन नहीं है, बल्कि यह भविष्य की वैश्विक व्यवस्था की नींव रखने की कोशिश है। जिस तरह 20वीं सदी में तेल आधारित गठबंधन वैश्विक राजनीति को प्रभावित करते थे, उसी तरह 21वीं सदी में सिलिकॉन, AI और सेमीकंडक्टर आधारित गठबंधन नई भू-राजनीति को आकार देंगे।

भारत की इसमें भागीदारी उसे सिर्फ उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक प्रमुख निर्माता और इनोवेशन हब बनने का अवसर देगी। भारत के पास विशाल मानव संसाधन, मजबूत आईटी सेक्टर, बढ़ता स्टार्टअप इकोसिस्टम और तेजी से विकसित होता डिजिटल बाजार है।

यदि इन सभी ताकतों का सही उपयोग किया गया, तो भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक AI और सेमीकंडक्टर हब बन सकता है।

हालाँकि इसके साथ चुनौतियाँ भी हैं। अन्य देशों की तुलना में भारत के पास अभी सीमित खनिज संसाधन और अत्याधुनिक मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर है। ऐसे में भारत को अपने हितों की रक्षा करते हुए इस गठबंधन में संतुलित भूमिका निभानी होगी, ताकि वह केवल बाजार न बनकर एक मजबूत उत्पादन और तकनीकी शक्ति के रूप में उभर सके।

भारत का ‘पैक्स सिलिका’ में शामिल होना केवल एक कूटनीतिक कदम नहीं, बल्कि देश के तकनीकी और आर्थिक भविष्य की दिशा तय करने वाला फैसला है। यह पहल भारत को वैश्विक तकनीकी मंच पर मजबूत स्थान दिला सकती है, सेमीकंडक्टर और AI क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना सकती है और चीन पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकती है।

आने वाले वर्षों में यह देखा जाएगा कि भारत इस रणनीतिक साझेदारी का किस तरह उपयोग करता है। यदि नीतिगत स्पष्टता, निवेश प्रोत्साहन और तकनीकी नवाचार पर सही तरीके से काम किया गया, तो पैक्स सिलिका भारत के लिए विकास, सुरक्षा और समृद्धि का एक नया अध्याय खोल सकता है।

ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगाँठ पर समंदर में तीसरा साइलेंट रक्षक उतारेगा भारत, न्यूक्लियर पॉवर से लैस ‘अरिदमन’ करेगा दुश्मन का सफाया: जानें- इसकी असीम ताकत का राज, क्यों है ये खास

ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगाँठ पर भारतीय नौसेना ‘INS अरिदमन’ नाम की तीसरी स्वदेशी परमाणु-शक्ति वाली बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन (SSBN) को अप्रैल-मई 2026 के बीच आधिकारिक रूप से सेवा में शामिल करने की तैयारी कर रही है। इसे भारतीय नौसेना के न्यूक्लियर डेटरेंस फोर्स का अगला बड़ा कदम माना जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, INS अरिदमन को भारत में ही बनाया गया है और यह पहले से सक्रिय INS अरिहंत और INS अरिघाट के बाद तीसरी ऐसी सबमरीन है, जो समुद्र के भीतर दुश्मन पर शक्तिशाली जवाबी हमले की क्षमता रखती है।

नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि इसी कमीशनिंग से भारत की सेकेंड स्ट्राइक (Second Strike) क्षमता और मजबूत होगी, यानी अग भारत पर पहले परमाणु हमला होता है तो समुद्र में तैनात यह पनडु्ब्बी जवाबी हमला करने के लिए तैयार रहेगी।

INS अरिदमन को विशाखापट्टनम के पास स्थित स्टोरेज और लॉन्च सुविधा, ‘प्रोजेक्ट वर्षा’ से ऑपरेशन के लिए तैनात किया जाएगा। यह सबमरीन पहले दो SSBNs की तुलना में और उन्नत है और इसे भारतीय नौसेना के स्ट्रैटेजिक फोर्स कमांड (SFC) के अंतर्गत चलाया जाएगा।

अधिकारियों के अनुसार, इसके शामिल होने से समुद्री न्यूक्लियर डिटेरेंस को और विश्वसनीय बनाएगा, खासकर हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन के लिहाज से। अब जानते हैं INS अरिदमन की मुख्य खासियतें, हथियार और तकनीक के बारे में। यह सब जानना जरूरी है ताकि यह समझा जा सके कि यह सबमरीन क्यों महत्वपूर्ण है और इसे मजबूर हथियारों से लैस क्यों किया गया है।

INS अरिदमन की बनावट और क्षमता

INS अरिदमन लगभग 7000 टन वजन वाली परमाणु सबमरीन है, Advanced Technology Vessel programme के तहत शिप बिल्डिंग सेंटर में बनाया गया है। इसमें 83 मेगावाट क्षमता वाला प्रेसराइज्ड वाटर न्यूक्लियर रिएक्टर लगा है। इसी वजह से यह महीनों तक समुद्र के भीतर रह सकती है और इसे बार-बार सतह पर आने की जरूरत नहीं पड़ती।

इसकी लंबाई करीब 110 मीटर बताई जा रही है और इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह समुद्र के भीतर बेहद कम आवाज के साथ आगे बढ़ सके। सबमरीन में विशेष एनेकोइक कोटिंग लगाई गई है जो ध्वनि को कम करती है और दुश्मन के सोनार से बचने में मदद करती है।

मिसाइल और हथियार प्रणाली

INS अरिदमन में चार वर्टिकल लॉन्च ट्यूब हैं। इनसे यह दो प्रकार की सबमरीन से दागी जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें ले जा सकती है। पहली है K15 सागरिका मिसाइल, जिसकी मारक दूरी लगभग 750 किलोमीटर है। यह कम दूरी के लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम है।

दूसरी ओर अधिक ताकतवर है K4 मिसाइल, जिसकी रेंज करीब 3500 किलोमीटर तक मानी जाती है। K4 की लंबी दूरी भारत को समुद्र में रहते हुए ही दूर स्थित रणनीतिक ठिकानों तक पहुँचने की क्षमता देती है। यह सबमरीन अधिकतम 8 K4 मिसाइलें या 24 K15 मिसइलें ले जा सकती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे किस मिशन के लिए तैनात किया गया है।

मिसाइलों को पानी के भीतर से ही दागा जा सकता है। यही इसकी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत है क्योंकि दुश्मन के लिए यह जान पाना बेहद मुश्किल होता है कि सबमरीन किस जगह पर है। इसके अलावा इसमें आधुनिक सोनार प्रणाली, कम शोर वाला प्रोपल्शन सिस्टम और सुरक्षित कमांड एवं कंट्रोल व्यवस्था मौजूद है।

क्यों अहम है INS अरिदमन?

INS अरिदमन के शामिल होने के बाद भारत के पास तीन परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन हो जाएँगी। इससे भारत की परमाणु त्रि शक्ति (Nuclear Triad) और संतुलित होगी, जिसमें जमीन से दागी जाने वाली मिसाइलें, हवा से छोड़े जाने वाले हथियार और समुद्र से जवाब देने की क्षमता शामिल है।

समुद्र में छिपी सबमरीन किसी भी देश के लिए सबसे भरोसेमंद जवाबी ताकत मानी जाती है, क्योंकि इसे ढूँढ पाना आसान नहीं होता। खासकर पड़ोसी देशों चीन और पाकिस्तान को मुँहतोड़ जवाब देकर भारत की सुरक्षा रणनीति को और मजबूती देगी।

वेटिकन-मक्का पीछे, अयोध्या जी दुनिया का सबसे बड़ा तीर्थ: एक राम मंदिर से सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अध्याय हुआ भव्य और विशाल

प्रभु राम की नगरी अयोध्या में उनके भव्य मंदिर का निर्माण केवल एक संरचना का निर्माण नहीं है बल्कि सनातन की जीवंत आस्था के पुनर्जागरण का उद्घोष है। प्रभु राम ने अपने मंदिर के लिए 500 वर्षों का लंबा इंतजार किया और जब भव्य मंदिर का निर्माण पूरा हुआ तो यह एक व्यापक सांस्कृतिक, आर्थिक और पूरी नगरी के परिवर्तन का उदाहरण बनकर सामने आया है।

भव्य मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या की पहचान और भी व्यापक हो गई। राम मंदिर के निर्माण ने ना केवल करोड़ों लोगों की आस्था को नई ऊर्जा दी बल्कि अयोध्या को वैश्विक धार्मिक मानचित्र पर मजबूती से स्थापित कर दिया। इसके बाद से हर दिन देश और विदेश से लाखों श्रद्धालु यहाँ पहुँच रहे हैं।

मक्का और वेटिकन से आगे अयोध्या

श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के निर्णय के बाद जिस तरह ‘डबल इंजन सरकार’ ने अयोध्या को एक वैश्विक आध्यात्मिक नगरी के रूप में विकसित करने का संकल्प लिया उसने अयोध्या को मक्का और वेटिकन जैसे केंद्रों से आगे खड़ा कर दिया है। आज अयोध्या न केवल भारत की बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी तीर्थ नगरी बनने की ओर बढ़ रही है। अनुमान है कि आने वाले वक्त में यहाँ औसतन प्रतिवर्ष 45 से 50 करोड़ श्रद्धालु आएँगे।

श्रद्धालुओं के मामले में अयोध्या ने पहले ही मक्का और वेटिकन को पीछे छोड़ दिया है। IIM लखनऊ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अयोध्या में 2024 में 16-18 करोड़ श्रद्धालु पहुँचने का अनुमान था। ईसाईयों के सबसे बड़े तीर्थस्थल वेटिकन में हर साल लगभग 0.9 करोड़ और मुस्लिमों के मक्का में करीब 2 करोड़ लोग पहुँचते हैं। रिपोर्ट में बताया गया कि 2025-26 तक हर साल अयोध्या में टूरिज्म से 100 बिलियन रुपए (₹10000 करोड़) से ज्यादा का रेवेन्यू मिल सकता है।

अयोध्या: सूर्यवंश की राजधानी से ‘मॉडल सिटी’ तक

अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, अवंतिका (उज्जयिनी) और द्वारका को सनातन परंपरा में सप्त पुरियों में गिना जाता है। इसमें भी अयोध्या को प्रथम माना गया है। माना जाता है कि अयोध्या मानव सभ्यता के प्रथम साम्राज्य की राजधानी थी जिसकी स्थापना वैवस्वत मनु ने की थी। वैवस्वत मनु से ही सूर्यवंश की स्थापना हुई जिसमें आगे चलकर भगवान राम भी हुए। अयोध्या को पहचान सूर्यवंश की राजधानी के तौर पर रही है जिसे अब ‘मॉडल सिटी’ के तौर पर विकसित किया जा रहा है।

मोदी-योगी की डबल इंजन सरकार ने अयोध्या को दुनिया की सबसे बड़ी आध्यात्मिक नगरी के रूप में स्थापित करने के लिए अयोध्या मास्टर प्लान 2031 के तहत ₹85,000 करोड़ से अधिक के निवेश का प्रस्ताव रखा है। इसमें ना केवल भव्य मंदिर बल्कि उसके आसपास के इलाकों को भी विकसित किया जा रहा है। इसके साथ ही शहर में शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा व्यवस्थाओं को भी मजबूत किया जा रहा है। प्रशासन का प्रयास है कि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो और वे सुरक्षित व व्यवस्थित तरीके से दर्शन कर सकें।

इस योजना के तहत शहर को पहले से ज्यादा बेहतर, साफ और व्यवस्थित बनाने का काम किया जा रहा है। नई सड़कों का निर्माण हो रहा है ताकि ट्रैफिक की समस्या कम हो और लोगों को आने-जाने में आसानी हो। बारिश के समय पानी जमा न हो, इसके लिए बेहतर जल निकासी व्यवस्था तैयार की जा रही है। ट्रैफिक को नियंत्रित करने के लिए स्मार्ट सिस्टम लगाए जा रहे हैं और यात्रियों की सुविधा के लिए आधुनिक बस टर्मिनल तथा पर्याप्त पार्किंग जोन बनाए जा रहे हैं।ट

साथ ही शहरी सुविधाओं का भी विस्तार किया जा रहा है। सड़कों के अलावा हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशन को भी विकसित किया गया है। कुल मिलाकर, पूरे शहर को योजनाबद्ध तरीके से तैयार किया जा रहा है ताकि आने वाले वर्षों में बढ़ती आबादी और तीर्थयात्रियों को बेहतर और सुगम सुविधाएँ मिल सकें।

सांस्कृतिक पहचान का पुनर्जागरण

अयोध्या केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपरा का प्रतीक भी है। यहाँ आयोजित होने वाले दीपोत्सव, रामलीला और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने शहर की वैश्विक पहचान को नई ऊँचाई दी है। दीपोत्सव के दौरान लाखों दीपकों से जगमगाती अयोध्या की छवि विश्वभर में दिखती है, जो भारतीय संस्कृति की भव्यता को दर्शाती है।

रामायण से जुड़े स्थलों का संरक्षण और विकास भी किया जा रहा है ताकि श्रद्धालु धार्मिक अनुभव के साथ-साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जानकारी भी प्राप्त कर सकें। इससे अयोध्या आध्यात्मिक पर्यटन का एक बड़ा केंद्र बन रही है।

सांस्कृतिक आत्मविश्वास से आकार लेती अयोध्या

राम मंदिर के निर्माण को कई लोग हिंदू समाज के सांस्कृतिक आत्मविश्वास की वापसी के रूप में देखते हैं। लंबे समय तक यह धारणा रही कि भारत की प्राचीन परंपराएँ और आस्थाएँ आधुनिकता के दौर में पीछे छूट रही हैं। लेकिन मंदिर निर्माण के बाद यह संदेश गया कि आधुनिक भारत अपनी जड़ों से कटकर नहीं बल्कि उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ना चाहता है।

प्रभु राम ने राजा होते हुए भी नियमों का पालन किया, वनवास स्वीकार किया और वचन की मर्यादा बनाए रखी। राम मंदिर का पुनर्निर्माण इसी मर्यादा, धैर्य और सत्य के मूल्यों की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। यह संदेश देता है कि आस्था और आधुनिकता साथ-साथ चल सकती हैं।

प्रभु राम अब अपनी नगरी में विराजमान हैं और अयोध्या में हर ओर मंगल है, जैसा गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘दोहावली‘ में लिखा था-

अनुदिन अवध बधावने, नित नव मंगल मोद।
मुदित मातु-पितु लोग लखि, रघुवर बाल विनोद॥

रोबोडॉग्स क्या हैं और भारत को इनकी सख्त जरूरत क्यों है: इंडिया AI इम्पैक्ट समिट से परे समझिए इन मशीनों को, जो बचा सकते हैं जिंदगियाँ

नई दिल्ली में आयोजित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 एक बड़ा आयोजन था। इस समिट का मकसद भारत की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती ताकत को दुनिया के सामने दिखाना था। लेकिन इस आयोजन के बीच एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया। यह विवाद गलगोटियास यूनिवर्सिटी से जुड़ा था। यूनिवर्सिटी ने अपने स्टॉल पर एक रोबोटिक डॉग यानी रोबोडॉग को प्रदर्शित किया।

यूनिवर्सिटी की एक प्रतिनिधि ने दावा किया कि यह रोबोडॉग उनकी यूनिवर्सिटी ने खुद बनाया है। यह स्वदेशी नवाचार है। लेकिन बाद में पता चला कि यह रोबोडॉग असल में चीन की एक कंपनी यूनिट्री का बना हुआ कमर्शियल प्रोडक्ट था। इसे सिर्फ खरीदा गया था और अपना बताकर पेश किया गया। हालाँकि बाद में यूनिवर्सिटी को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

इसी समिट में एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया। बेंगलुरु की एक स्टार्टअप कंपनी जनरल ऑटोनॉमी ने अपना पूरी तरह स्वदेशी रोबोडॉग पेश किया। इसका नाम रखा गया परम। कंपनी ने इसे पेश करते हुए कहा कि अब (पहले की) विवादों को छोड़िए, परम से मिलिए। परम को भारतीय इंजीनियरों ने पूरी तरह डिजाइन और बनाया है। सिर्फ कुछ छोटे पार्ट्स जैसे NVIDIA की चिप और एक्ट्यूएटर्स बाहर से आए हैं। बाकी सब कुछ भारत में बना है। यह दिखाता है कि भारत सचमुच रोबोटिक्स के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है।

आखिर रोबोडॉग्स होते क्या हैं, क्यों है इतनी चर्चा?

यह पूरा विवाद हमें रोबोडॉग्स की तकनीक पर सोचने को मजबूर करता है। आखिर रोबोडॉग्स होते क्या हैं। ये कोई खिलौना नहीं हैं। ये चार पैरों वाले रोबोट हैं जो असली कुत्तों की तरह चलते-फिरते हैं। लेकिन इनमें बहुत उन्नत तकनीक होती है। ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेंसर और मजबूत मोटर्स से लैस होते हैं। इनका डिजाइन ऐसा होता है कि ये ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर आसानी से चल सकते हैं। सीढ़ियाँ चढ़ सकते हैं। कीचड़, रेत या पत्थरों पर भी संतुलन बनाकर आगे बढ़ सकते हैं। जहाँ पहिए वाले रोबोट फंस जाते हैं वहाँ ये आसानी से निकल जाते हैं।

बिना थके काम करने वाली मशीनें

रोबोडॉग्स का मूल विचार ऐसे रोबोट्स के जरिए आया है, जो कुत्तों जैसे दिखे और काम भी करें, लेकिन उसमें किसी जीव का वास न हो। दरअसल, रोबोडॉग्स को इस तरह से बनाया गया है कि वो बिना थके काम कर सकें। इनके हर पैर में सर्वो मोटर्स या हाइड्रॉलिक एक्ट्यूएटर्स लगे होते हैं। ये मोटर्स पैरों को हिलाते हैं जैसे असली मांसपेशियाँ काम करती हैं। इनका दिमाग एक छोटा कंप्यूटर होता है जो हर सेकंड हजारों गणनाएँ करता है ताकि रोबोट गिरे नहीं।

तमाम तरह के सेंसर्स से लैस हो सकते हैं रोबोडॉग्स

इन रोबोडॉग्स में कई तरह के सेंसर लगे होते हैं। जैसे LIDAR जो लेजर किरणों से दूरी नापता है और आसपास का तीन आयामी नक्शा बनाता है। कैमरे जो दिन-रात देख सकते हैं। इन्फ्रारेड सेंसर जो अंधेरे में गर्मी का पता लगाते हैं। जाइरोस्कोप और एक्सेलेरोमीटर जो रोबोट का संतुलन बनाए रखते हैं। ये सभी सेंसर मिलकर रोबोट को पर्यावरण की पूरी जानकारी देते हैं। फिर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के एल्गोरिदम फैसला करते हैं कि आगे कैसे चलना है। बाधा से कैसे बचना है।

दुनिया में सबसे मशहूर रोबोडॉग अमेरिकी कंपनी बोस्टन डायनेमिक्स का स्पॉट है। स्पॉट बहुत ताकतवर है। यह चौदह किलो तक वजन उठा सकता है। तीन मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से दौड़ सकता है। नब्बे मिनट तक लगातार काम कर सकता है। इसे कई देशों की सेनाएँ और कंपनियाँ इस्तेमाल कर रही हैं। चीन की यूनिट्री कंपनी भी सस्ते रोबोडॉग बनाती है जो आम लोग भी खरीद सकते हैं। लेकिन असली ताकत स्वदेशी डिजाइन में होती है क्योंकि उसमें अपनी जरूरत के हिसाब से बदलाव किए जा सकते हैं।

मानव जीवन में बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं रोबोडॉग्स

रोबोडॉग्स मानव जीवन में बहुत उपयोगी साबित हो रहे हैं। सबसे पहले औद्योगिक क्षेत्र में। तेल रिफाइनरी, बिजली संयंत्र या खदानों में जहाँ जहरीली गैस या ऊँचाई का खतरा रहता है वहाँ ये रोबोडॉग्स निरीक्षण करते हैं। ये गैस लीक का पता लगा सकते हैं। मशीनों की स्थिति देख सकते हैं। तापमान नाप सकते हैं। इससे इंसानों को खतरनाक जगहों पर जाने की जरूरत नहीं पड़ती।

निर्माण स्थलों पर भी ये बहुत काम आते हैं। भारी सामान एक जगह से दूसरी जगह ले जा सकते हैं। साइट का नक्शा बना सकते हैं। काम की प्रगति की निगरानी कर सकते हैं। इससे समय और पैसा दोनों बचता है। कृषि में भी इनका इस्तेमाल शुरू हो रहा है। बड़े खेतों में फसलों की निगरानी। कीटों का पता लगाना। पशुओं की देखभाल। ये सब काम रोबोडॉग्स आसानी से कर सकते हैं।

शिक्षा और मनोरंजन में भी रोबोडॉग्स की भूमिका बढ़ रही है। स्कूल-कॉलेज में बच्चे इनके जरिए रोबोटिक्स सीखते हैं। ये प्रोग्रामिंग और इंजीनियरिंग की समझ देते हैं। पार्कों या आयोजनों में ये लोगों का मनोरंजन करते हैं। नाच सकते हैं। ट्रिक्स दिखा सकते हैं। बुजुर्गों या अकेले रहने वालों के लिए ये साथी का काम भी कर सकते हैं। बातचीत कर सकते हैं। दवाइयाँ याद दिला सकते हैं।

राहत और बचाव कार्यों में बेहद उपयोगी

अब बात करते हैं सबसे महत्वपूर्ण उपयोग की यानी खतरनाक जगहों पर राहत और बचाव कार्य में। प्राकृतिक आपदाएँ जैसे भूकंप, बाढ़, भूस्खलन या आग लगने पर बचाव कार्य बहुत जोखिम भरे होते हैं। इमारतें गिर जाती हैं। मलबा हर तरफ होता है। बचाव दल के लोग खुद खतरे में पड़ जाते हैं। ऐसे में रोबोडॉग्स आगे जाकर काम करते हैं।

ये मलबे के बीच संकीर्ण जगहों में घुस सकते हैं। थर्मल कैमरे से शरीर की गर्मी का पता लगा सकते हैं। माइक्रोफोन से आवाजें सुन सकते हैं। अगर कोई जिंदा व्यक्ति दबा हुआ है तो उसकी लोकेशन बता सकते हैं। अमेरिका में कई बार बोस्टन डायनेमिक्स के स्पॉट रोबोट का इस्तेमाल भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में हुआ है। वहाँ ये जीवित लोगों को खोजने में सफल रहे।

आग लगने की घटनाओं में भी रोबोडॉग्स बहुत उपयोगी हैं। ये आग के बीच जा सकते हैं जहाँ इंसान नहीं जा सकता। पानी की बौछार कर सकते हैं। पीड़ितों तक ऑक्सीजन पहुँचा सकते हैं। रियल टाइम वीडियो भेजकर कमांड सेंटर को पूरी स्थिति की जानकारी देते हैं। इससे बचाव योजना ज्यादा सटीक बनती है। चीन में अग्निशमन विभाग पहले से ही रोबोडॉग्स का इस्तेमाल कर रहा है।

बाढ़ या भूस्खलन में भी ये पानी या कीचड़ में चल सकते हैं। डूबे हुए लोगों की खोज कर सकते हैं। दवाइयाँ या खाना पहुँचा सकते हैं। महामारी के समय जैसे कोविड में ये मरीजों तक दवाई पहुंचाने और निगरानी करने में मदद कर सकते हैं बिना किसी संपर्क के। इस तरह रोबोडॉग्स न सिर्फ समय बचाते हैं बल्कि कई जिंदगियाँ भी बचा लेते हैं।

रोबोडॉग्स इंसानों की रक्षा कई तरीकों से करते हैं। सबसे सीधी रक्षा यह है कि खतरनाक काम खुद करके इंसानों को जोखिम से बचाते हैं। पुलिस और सुरक्षा बलों में ये संदिग्ध वस्तुओं की जाँच करते हैं। अगर कोई बम हो तो उसे दूर से देख सकते हैं। बंधक स्थिति में आगे जाकर जानकारी इकट्ठा करते हैं। इससे पुलिस वाले सुरक्षित रहते हैं।

परमाणु संयंत्रों या रासायनिक कारखानों में रेडिएशन या जहरीली गैस का खतरा रहता है। वहाँ रोबोडॉग्स नियमित जाँच करते हैं। कोई लीकेज हो तो पहले पता लगा लेते हैं। इससे बड़ा हादसा होने से पहले ही रोकथाम हो जाती है। खदानों में भी ये गिरने या गैस भरने का पता लगा सकते हैं। मजदूरों की जान बचाते हैं।

शहरों में सुरक्षा गश्त के लिए भी रोबोडॉग्स इस्तेमाल हो रहे हैं। रात में अंधेरे इलाकों में गश्त लगाते हैं। चोर या संदिग्ध व्यक्ति दिखे तो अलर्ट कर देते हैं। अस्पतालों में ये मरीजों की निगरानी करते हैं। अगर कोई गिर जाए या मदद माँगे तो तुरंत सूचना देते हैं। बुजुर्गों के घर में अकेले रहने वालों की देखभाल करते हैं। इस तरह ये अप्रत्यक्ष रूप से भी इंसानों की रक्षा करते हैं।

आर्मी के लिए बेहद मददगार साबित हो सकते हैं रोबोडॉग्स

अब बात करते हैं सैन्य उपयोग की। भारतीय सेना ने पहले से ही रोबोडॉग्स को अपनी सेवा में शामिल कर लिया है। इनका नाम रखा गया है मल्टी यूटिलिटी लेग्ड इक्विपमेंट यानी MULE। ये रोबोडॉग्स बहुत ताकतवर हैं। पंद्रह किलो तक सामान ढो सकते हैं। ऊँचे-नीचे रास्तों पर आसानी से चल सकते हैं। कड़कड़ाती ठंड या गर्मी में भी काम करते हैं। सीमा पर तैनात सैनिकों तक रसद पहुँचाने में ये बहुत मदद करते हैं। सैनिकों का बोझ कम करते हैं।

सैन्य निगरानी में रोबोडॉग्स दुश्मन के इलाके में चुपके से घुस सकते हैं। हाई डेफिनेशन कैमरे और सेंसर से रियल टाइम जानकारी भेजते हैं। सीमा पर गश्त लगाते हैं। अगर कोई घुसपैठ हो रही हो तो पहले पता लगा लेते हैं। विस्फोटक सामग्री या माइंस का पता लगाने में भी ये बहुत उपयोगी हैं। इससे सैनिकों की जान बचती है।

भारतीय सेना ने हाल ही में इन रोबोडॉग्स को परेड में भी दिखाया। ये सैनिकों के साथ कदम मिलाकर चलते हैं। रिमोट से नियंत्रित होते हैं। भविष्य में ये और उन्नत हो सकते हैं। हथियार ले जा सकते हैं। ड्रोन के साथ मिलकर काम कर सकते हैं। इस तरह भारतीय सेना आधुनिक और तकनीकी रूप से मजबूत बन रही है।

रोबोडॉग्स का स्वदेशी विकास भारत के लिए बहुत जरूरी है। परम जैसे प्रोजेक्ट दिखाते हैं कि हम आयात पर निर्भर नहीं रहना चाहते। गलगोटियास जैसे विवाद हमें सिखाते हैं कि सच्चा नवाचार ही देश को आगे ले जाएगा। आने वाले समय में रोबोडॉग्स हर क्षेत्र में आम हो जाएँगे। ये भारत को आत्मनिर्भर और सुरक्षित बनाएँगे।

सावधानियाँ भी हैं जरूरी, बगावत हुई तो?

अंत में, आप सभी ने सुपरस्टार रजनीकांत की फिल्म एंथिरन (रोबोट) तो देखा ही होगा। यहाँ विज्ञान और तकनीकी के बीच में फिल्मों की बात करना हास्यास्पद लग सकता है, लेकिन आपको समझाने के लिए ये रेफरेंस देना जरूरी लगता है। दरअसल, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की दुनिया में अब वो बहस तेजी से आगे बढ़ चुकी है कि क्या कभी कोई एआई मॉडल बगावत कर सकता है? इससे जुड़े कुछ पहले भी सामने आ चुके हैं, जिसमें इसका जवाब हाँ है। जिसमें एक एआई मॉडल ने लगभग हमलावर रुख अख्तियार कर लिया था। उसने अपनी ही ट्रेनिंग को बाकायदा हैक कर लिया था।

एंथ्रोपिक कंपनी के क्लॉउड ओपस 4 मॉडल की कमजोरियाँ सामने आ चुकी हैं। उसने तो बाकायदा कंपनी को ही बंद करने की धमकी दे दी थी, लेकिन बाद में इसी एंथ्रोपिक कंपनी ने एक रिसर्च पेपर पब्लिश की, जो वाकई डराने वाली है। इसमें ओपन एआई, गूगल, डीपसीक, मेटा और xAI जैसे मॉडल्स पर रिसर्च की गई। जो खास बात कंपनी ने अपनी रिसर्च पेपर में बताया, वो ये था कि एआई मॉडल्स ने अपने ऊपर आए खतरे को भाँपते हुए बाकायदा ब्लैकमेलिंग तक कर दी।

बहरहाल, अब याद करिए रोबोट फिल्म के खलनायक चिट्टी को, वो बागी होने के बाद क्या से क्या करामात दिखाता है। ये खतरा अब सिर्फ फिल्मी या कहानियों तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि वास्तविक बन चुका है। हालाँकि एआई समिट में पीएम मोदी ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को ‘मानव’ कंट्रोल में रखने की लाइन खींची है। यकीनन वैज्ञानिक भी ऐसा ही चाहते हैं, लेकिन क्या होगा, जब कोई एआई मॉडल उस ‘लाइन’ को ही क्रॉस कर दे? ऐसे में रोबोटिक्स का गेम खतरनाक भी हो सकता है।

इंस्टा-फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म बच्चों में बढ़ा रहे डिप्रेशन? अमेरिकी कोर्ट में घिरे जुकरबर्ग, क्या इस पर वैश्विक बैन की हो गई है शुरुआत

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगातार ये आरोप लग रहे हैं कि ये बच्चों और किशोरों को ऐसी लत लगा देते हैं कि उनके बिना ये रह नहीं पाते। अमेरिका में 6 साल की उम्र से सोशल मीडिया पर एक्टिव कैली की मानसिक हालत ठीक नहीं है। इसको लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग को अमेरिका की कोर्ट में पेश होना पड़ा। आरोप है कि मेटा की प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम बच्चों को जानबूझकर लत लगाती है, उससे उनकी मानसिक स्थिति खराब होती है।

क्या है कैली का मामला

दरअसल केस एक कैलिफॉर्निया में रहने वाली 15 साल की लड़की कैली का है, जिसने 6 साल में यूट्यूब शुरू किया और 9 साल में इंस्टाग्राम, फिर टिकटॉक और स्नैपचैट यूज किया। सोशल मीडिया के बचपन से इस्तेमाल करने की उसे लत लग गई। उसका डिप्रेशन बढ़ा और सुसाइड के ख्याल आने लगे। ऐसे कई केस सिर्फ अमेरिका में ही चल रहे हैं, जिसमें बच्चों के पैरेंट्स ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ऐसा डिजाइन करने का आरोप लगाया है, जिससे बच्चे इसे देखें और बार-बार उन्हें देखने का मन करे।

घंटों इन पर वक्त बिताने की वजह से बच्चों और टीनएजर्स की शारीरिक और मानसिक सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है।। ये आरोप मेटा के फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हॉट्सअप, गुगल के यूट्यूब पर लगे हैं।

जुकरबर्ग से सवाल-जवाब

जानबूझकर बच्चों को लत लगाने का इंस्टाग्राम पर आरोप लगाते हुए वकील मार्क लेनियर ने जुकरबर्ग से पूछा कि क्या इंस्टाग्राम एडिक्टिव है। इस पर जुकरबर्ग ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया, लेकिन कहा कि प्लेटफॉर्म ज्यादा वैल्यू देता है, इसलिए यूजर्स इस पर ज्यादा वक्त बिताते हैं। वकील ने 2018 में जकुरबर्ग और एपल के सीईओ टिम कुक के बीच हुए ईमेल एक्सचेंज को दिखाया। मार्क जुकरबर्ग ने कहा कि यह यूजर्स की भलाई के लिए था।

प्लेटफॉर्म को बेहतर बनाने के लिए एपल के साथ मिलकर काम करने की उन्होंने कोशिश की थी। उन्होंने कहा, “मुझे लगा कि हमारी कंपनी और एपल मिल कर और अच्छा कर सकते हैं, इसलिए मैं टिम से इस बारे में बात करना चाहता था।”

वकील ने लड़की के पुराने दस्तावेज भी दिखाए और जुकरबर्ग से पूछा कि 2015 में जब वह इंस्टाग्राम पर अपना अकाउंट बनाई थी तो उस वक्त 40 लाख यूजर्स 13 साल से कम उम्र के थे और 10-12 साल के 30 फीसदी अमेरिकी बच्चे इंस्टाग्राम का यूज कर रहे थे। उम्र की वैरिफिकेशन कैसे किया जाता है और बच्चों को कैसे अनुमति दी जाती है।

क्या 9 साल का बच्चा उस फाइन प्रिंट को पढ़ेगा जो सावधानी के रूप में लिखे जाते हैं। क्या इन बच्चों को प्लेटफॉर्म ने अनुमति दे दी है। इस पर जुकरबर्ग ने कहा कि कंपनी 13 साल से कम उम्र के बच्चों को अनुमति नहीं देती, लेकिन बच्चे झूठ बोल कर अपना उम्र बढ़ा देते हैं। अगर 13 साल से कम उम्र होती है तो कंपनी अकाउंट हटा देती है। हालाँकि उन्होंने माना कि उम्र का वेरिफिकेशन करना आसान नहीं होता है।

कंपनी इसको लेकर कई बदलाव कर रही है। नए टूल्स ला रही है। इस दौरान तीखे सवालों से झुझला कर जुकरबर्ग ने कहा कि उम्र चेक करने को लेकर कई समस्याएँ आ रही है, जिसके समाधान में कंपनी लगी हुई है।

कैली के मामले में उन्होंने कहा कि बच्ची को मानसिक बीमारी पहले से थी, उसकी वजह इंस्टाग्राम नहीं है। इस मुद्दे पर इंस्टाग्राम के हेड एडम मोसेरी जब कोर्ट में पेश हुए थे तो उन्होंने भी कहा था कि इंस्टाग्राम से वजह से बच्ची की तबियत नहीं बिगड़ी है। माना जा रहा है कि ट्रॉयल मार्च 2026 के अंत तक खत्म हो जाएगा। इसके बाद कोर्ट का फैसला आएगा, जिसका असर कंपनियों के साथ-साथ यूजर्स पर भी पड़ेगा।

कई देशों ने बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट बंद कर दिए

ऑस्ट्रेलिया ने दिसंबर 2025 में 16 साल से छोटे बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन कर दिया है। ऐसा करने वाला ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला देश है। फ्रांस की नेशनल असेंबली ने भी 15 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया पर बैन का समर्थन किया है। ऑस्ट्रेलिया की तर्ज पर ब्रिटेन में भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने की तैयारी हो चुकी है।

नॉर्वे में भी सोशल मीडिया पर बैन लगा दिया गया है। इसके लिए पहले 13 साल निश्चित किया गया था, जिसे अब 15 साल किया जा रहा है। ऑस्ट्रिया, पोलेंड, ग्रीस, डेनमार्क आदि देश भी बच्चों पर होने वाले असर की स्टडी कर रहे हैं और उस आधार पर फैसला लेंगे।

फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने पीएम मोदी से की अपील

फ्रांस में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया पर प्रतिबंध की दिशा में आगे बढ़ गया है। एआई इम्पैक्ट समिट में शामिल होने आए फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने प्रधानमंत्री मोदी से बच्चों को लेकर खास अपील की। उन्होंने कहा कि वो चाहते हैं कि भारत में भी 15 साल से कम उम्र के बच्चे के सोशल मीडिया अकाउंट पर बैन हो। उन्होंने कहा कि जिस चीज की इजाजत असल दुनिया में नहीं है, वह बच्चों को इंटरनेट पर भी नहीं दिखनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और इंटरनेट को बच्चों के लिए सुरक्षित बनाना प्लेटफॉर्म, सरकार और रेगुलेटर की जिम्मेदारी है। पीएम मोदी के सामने मैक्रों ने कहा कि फ्रांस के अलावा ग्रीस, स्पेन जैसे दूसरे देश इस दिशा में आगे बढ़ चुके हैं, भारत से भी उन्हें उम्मीद है कि बच्चों और टीनएजर्स की सुरक्षा के लिए कदम उठाया जाएगा।

भारत के सोशल मीडिया बैन करने की माँग

भारत की एक चौथाई आबादी 14 साल से कम की है। भारतीय पेरेंट्स परेशान है कि उनके बच्चे हमेशा सोशल मीडिया पर लगे रहते हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे फीचर्स जैसे इनफिनिट स्क्रॉल, नोटिफिकेशन, फिल्टर्स इन बच्चों को बाँधे रखते हैं। उन्हें न तो खाने-पीने की चिंता रहती है और न ही कहीं आना-जाना चाहते हैं।

पढ़ना-लिखना, बाहर खेलना, दूसरी एक्टिविटी बंद हो गए हैं। अकेले हाथ में फोन लेकर हँसना, खेलना और बिजी रहना। परिवार के बीच रह कर भी बच्चे परिवार से दूर होते जा रहे हैं। शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होते जा रहे हैं। जानकारों के मुताबिक, सोशल मीडिया की लत लगने पर बच्चों में डिप्रेशन, गलत कंटेंट देखना, ऑनलाइन गलत संगति में पढ़ना, आत्मविश्वास का कम होगा, साइबर बुलिंग का खतरा रहता है। भारत में भी सोशल मीडिया पर रोक की माँग होने लगी है।

भारत में बच्चों के सोशल मीडिया पर बैन की तैयारी

भारत में भी बच्चों के सोशल मीडिया पर बैन लगाने की तैयारी शुरू हो गई है। आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसके संकेत दे दिए हैं। उन्होंने कहा है कि उम्र के आधार पर सोशल मीडिया पर पाबंदियों को लेकर उन्होंने सोशल मीडिया कंपनियों से बातचीत की है। 16 साल से कम उम्र के बच्चों को इसके असर से कैसे बचाया जाए, सरकार का ध्यान इस पर है। उन्ह

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, प्लेटफॉर्म को कहा जाना चाहिए कि वह 16 साल से कम उम्र के बच्चों का प्लेटफॉर्म बंद कर दे। लेकिन भारत जैसे देश में इसे उम्र पूछ कर बैन करवाना आसान नहीं है। बच्चे झूठ बोल सकते हैं। आईडी वेरिफिकेशन होता है तो प्राइवेसी और निगरानी का खतरा बढ़ जाता है।

बच्चे वीपीएन का इस्तेमाल कर इसे चला सकते हैं। इसलिए बैन लगाना आसान काम नहीं है। जानकारों के मुताबिक, “प्लेटफॉर्म्स भले ही बैन लागू करें, लेकिन टीनएजर्स वीपीएन का इस्तेमाल करके या अपने से बड़ों के अकाउंट से या फिर नए कम मॉडरेशन वाले ऐप्स से इसे बायपास कर सकते हैं. इससे नुकसान कम नहीं होगा, बल्कि बस अकाउंट बदल जाएँगे। ”

असल जरूरत है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लत लगाने वाले डिजाइन को रेगुलेट किया जाए। उनके फीचर्स बदलें जाएँ, बच्चों की प्रोफाइलिंग रोकी जाए, रिसर्च को फंड किया जाए और एक स्वतंत्र रेगुलेटर को मजबूती दी जाए।

DRDO की ‘स्टील्थ’ क्रूज मिसाइल के आगे S-400 भी माँगेगा पानी, AMCA फाइटर जेट के साथ मिलकर मचाएगी तबाही: जानें- 5वीं पीढ़ी के हथियार की खासियत

भारत रक्षा के क्षेत्र में एक ऐसी ‘सुपर वेपन’ जोड़ी तैयार कर रहा है, जो आधुनिक युद्ध के मैदान को पूरी तरह बदल देगी। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) अब पाँचवीं पीढ़ी (5th Generation) के स्वदेशी लड़ाकू विमान AMCA (एडवांस मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) के लिए एक विशेष लॉन्ग रेंज लैंड अटैक क्रूज मिसाइल (LR-LACM) विकसित कर रहा है।

यह मिसाइल ‘स्टील्थ’ तकनीक से लैस होगी, यानी यह रडार की पकड़ में नहीं आएगी। 600 से 700 किलोमीटर तक मार करने वाली यह मिसाइल दुनिया के सबसे ताकतवर एयर डिफेंस सिस्टम जैसे S-400, THAAD और आयरन डोम को भी चकमा देने में सक्षम होगी। यह प्रोजेक्ट भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल कर देगा जिनके पास अदृश्य रहकर हमला करने की क्षमता है।

21वीं सदी का युद्ध: अब जमीन पर पैर रखे बिना मचेगी तबाही

21वीं सदी में युद्ध लड़ने के तरीके 20वीं सदी के मुकाबले पूरी तरह बदल चुके हैं। पहले जीत के लिए सेनाओं को दुश्मन की सीमा पार करनी पड़ती थी, लेकिन आज का दौर ‘टेक्नोलॉजी बेस्ड वेपन सिस्टम’ का है। अब युद्ध केवल वीरता से नहीं, बल्कि बेहतर रडार और मिसाइल सिस्टम से जीते जाते हैं। आज के समय में लंबी दूरी की मिसाइलें किसी भी देश में बिना घुसे वहाँ भारी तबाही लाने में सक्षम हैं। भारत इसी तकनीक को अपनाकर अपनी सुरक्षा व्यवस्था को अभेद्य बना रहा है।

स्टील्थ यानी पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान और मिसाइलें रडार सिस्टम को धोखा देने की कला में माहिर होती हैं। अमेरिकी स्टील्थ बॉम्बर्स ने अतीत में ईरान जैसे देशों में भारी तबाही मचाई थी, लेकिन वहाँ के रडार उन्हें देख तक नहीं पाए थे। इसी तरह की ताकत अब भारत अपने बेड़े में शामिल करना चाहता है। पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देश लगातार अपने रडार और एयर डिफेंस को चीन की मदद से एडवांस कर रहे हैं, ऐसे में भारत की यह नई मिसाइल और फाइटर जेट की जोड़ी उनकी हर तैयारी को नाकाम कर देगी।

AMCA प्रोजेक्ट: भारत का अपना ‘अदृश्य’ लड़ाकू विमान

भारत ने पाँचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट बनाने के लिए AMCA प्रोजेक्ट लॉन्च किया है। यह विमान शुरू से ही स्टील्थ टेक्नोलॉजी पर आधारित है, जिसका मतलब है कि इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि रडार की किरणें इससे टकराकर वापस नहीं जातीं, जिससे रडार इसे पकड़ नहीं पाता। इसकी सबसे बड़ी खूबी इसका ‘इंटरनल वेपन बे’ (आंतरिक हथियार कक्ष) है। सामान्य विमानों में मिसाइलें बाहर की ओर लटकी होती हैं, जो रडार पर सिग्नल भेजती हैं, लेकिन AMCA में हथियार विमान के पेट के अंदर छिपे होंगे।

एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) द्वारा विकसित किया जा रहा यह विमान 2030 के बाद भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल होने की संभावना है। यह विमान दुश्मन के विवादित एयरस्पेस में बिना शोर मचाए घुसने और बाहर आने की क्षमता रखेगा। इसका रडार क्रॉस-सेक्शन इतना छोटा होगा कि आधुनिक रडार के लिए भी इसे पहचानना लगभग असंभव होगा। जब यह विमान अपनी गुप्त मिसाइलों के साथ आसमान में उड़ेगा, तो यह दुश्मन के लिए एक ऐसा अदृश्य काल होगा जिसे वह अपनी स्क्रीन पर देख भी नहीं पाएगा।

स्टील्थ क्रूज मिसाइल: वजन में कम, पर वार में सबसे घातक

DRDO जिस नई क्रूज मिसाइल पर काम कर रहा है, वह सामान्य मिसाइलों से बिल्कुल अलग है। लंबी दूरी की पारंपरिक मिसाइलें (जैसे निर्भय) वजन में 1500 किलोग्राम से ज्यादा होती हैं, जिन्हें विमान के अंदरूनी हिस्से में फिट करना नामुमकिन होता है। इसी चुनौती को देखते हुए वैज्ञानिक इसे 1000 किलोग्राम के दायरे में ला रहे हैं। यह छोटा आकार और कम वजन ही इस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत है, क्योंकि इससे AMCA अपने आंतरिक बे में एक साथ दो मिसाइलें ले जा सकेगा।

यह मिसाइल केवल आकार में छोटी नहीं होगी, बल्कि इसका पूरा ढाँचा ही स्टील्थ-केंद्रित होगा। इसमें ऐसी विशेष सामग्री (Composites) और बनावट का इस्तेमाल किया जा रहा है जो रडार रिफ्लेक्शन को कम से कम कर देती है। जब यह मिसाइल लॉन्च की जाएगी, तो विमान के दरवाजे बहुत कम समय के लिए खुलेंगे, ताकि जेट की अपनी स्टील्थ क्षमता पर कोई असर न पड़े। यह इंजीनियरिंग का एक ऐसा चमत्कार है जो भारत की मारक क्षमता को दोगुना कर देगा।

रडार की आँखों में धूल: S-400 और आयरन डोम का काल

आज की दुनिया में रूस का S-400 और इजरायल का आयरन डोम जैसे एयर डिफेंस सिस्टम सबसे बेहतरीन माने जाते हैं। ये सिस्टम हवा में आने वाली किसी भी चीज को ट्रैक करके नष्ट कर देते हैं। लेकिन भारत की नई मिसाइल इन सुरक्षा चक्रों को भेदने के लिए ही बनाई जा रही है। इसकी रडार को चकमा देने वाली संरचना और कम ऊँचाई पर उड़ने की क्षमता इसे दुश्मन की नजरों से बचाए रखेगी। यह मिसाइल जमीन के करीब उड़ते हुए दुश्मन के बेस तक पहुंच जाएगी और उन्हें पता भी नहीं चलेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि 600 से 700 किलोमीटर की मारक क्षमता सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। यह रेंज दुश्मन के कमांड सेंटर, रडार स्टेशनों, वायु रक्षा प्रणालियों और लॉजिस्टिक केंद्रों को तबाह करने के लिए काफी है। चूँकि AMCA विमान का अपना हमला करने का दायरा 1500 किलोमीटर है, इसलिए यह मिसाइल उसे और भी खतरनाक बना देती है। विमान सीमा के बाहर से ही मिसाइल छोड़ देगा और मिसाइल अपनी अदृश्य शक्ति से लक्ष्य को भेद देगी।

स्वदेशी तकनीक का दम: इंजन से लेकर गाइडेंस तक ‘मेड इन इंडिया’

इस मिसाइल परियोजना की एक और बड़ी ताकत इसकी स्वदेशी तकनीक है। इसमें भारत के अपने छोटे टर्बोफैन इंजन (जैसे मानिक/STFE) का इस्तेमाल किए जाने की संभावना है। यह इंजन मिसाइल को लंबी दूरी तक उड़ने के लिए जरूरी ताकत प्रदान करेगा। इसके अलावा, मिसाइल में अत्याधुनिक गाइडेंस सिस्टम लगा होगा, जो इसे सटीक निशाना लगाने में मदद करेगा। भारत का लक्ष्य अब विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम करके अपनी सुरक्षा खुद सुनिश्चित करना है।

यह प्रोजेक्ट फिलहाल डिजाइन और कॉन्सेप्ट के चरण में है, लेकिन इसका उद्देश्य बहुत स्पष्ट है। 2030 के दशक के मध्य तक भारत चाहता है कि उसके पास पूरी तरह से स्वदेशी और दुनिया के सबसे आधुनिक हथियारों का सेट हो। रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि जब AMCA और यह नई स्टील्थ मिसाइल एक साथ काम करेंगे, तो भारत की वायु शक्ति वैश्विक स्तर पर एक नई प्रतिष्ठा हासिल करेगी। यह न केवल देश की रक्षा करेगा, बल्कि दुनिया को भारत की तकनीकी प्रगति का लोहा भी मनवाएगा।

रणनीतिक बढ़त: भविष्य के युद्धों के लिए भारत की तैयारी

चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति और पाकिस्तान की रडार तैनाती को देखते हुए भारत का यह कदम बहुत जरूरी है। चीन अपने एयर डिफेंस सिस्टम को लगातार मजबूत कर रहा है, जिसे भेदने के लिए सामान्य मिसाइलें काफी नहीं होंगी। भारत की नई स्टील्थ क्रूज मिसाइल इसी ‘पावर गैप’ को भरने का काम करेगी। यह तकनीक भारत को ‘फर्स्ट स्ट्राइक’ की क्षमता देगी, यानी दुश्मन के हमला करने से पहले ही उसके महत्वपूर्ण ठिकानों को खत्म कर देना।

यह मिसाइल भविष्य के युद्धक्षेत्र में घातक मारक क्षमता और ‘इनविजिबिलिटी’ (अदृश्यता) का एक शानदार संतुलन है। वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती विमान की स्टील्थ क्षमता को बनाए रखते हुए मिसाइल को लॉन्च करना है। DRDO के वैज्ञानिक इसी बारीक तकनीक पर दिन-रात काम कर रहे हैं। जब यह प्रोजेक्ट पूरा होगा, तो भारतीय वायुसेना के पास वह ताकत होगी जो आज केवल अमेरिका या रूस जैसे देशों के पास है।

बदलती दुनिया में भारत का नया ‘शक्ति कवच’

आज के दौर में शांति तभी बनी रह सकती है जब आप युद्ध के लिए सबसे ज्यादा तैयार हों। भारत की ‘स्टील्थ’ क्रूज मिसाइल और AMCA प्रोजेक्ट इसी विचारधारा का हिस्सा हैं। यह केवल हथियारों की होड़ नहीं है, बल्कि देश की संप्रभुता को सुरक्षित रखने का एक आधुनिक तरीका है।

जिस तरह से युद्ध के मैदान अब रडार की स्क्रीन और डिजिटल सिग्नल्स पर लड़े जा रहे हैं, भारत का यह ‘अदृश्य काल’ आने वाले समय में हमारी सीमाओं की रक्षा का सबसे बड़ा हथियार बनेगा। यह आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता एक ऐसा कदम है, जो दुश्मन के मन में खौफ पैदा करेगा और भारत को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित करेगा।

नाबालिग का स्तन दबाना और पायजामे का नाड़ा खोलना रेप का प्रयास माना जाएगा: SC ने रद्द किया HC का ऑर्डर, जानें- क्यों जजों के लिए गाइडलाइन्स बनाने का देना पड़ा आदेश

भारत की न्याय व्यवस्था को दुनिया की सबसे मजबूत और स्वतंत्र न्यायपालिकाओं में गिना जाता है। हम सब यही मानते हैं कि अदालत का दरवाजा खटखटाने पर पीड़ित को न्याय मिलेगा, खासकर जब बात नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण जैसे जघन्य अपराधों की हो। लेकिन पिछले कुछ सालों में हाई कोर्ट्स से आने वाले कुछ फैसले पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

एक 11 साल की बच्ची का स्तन दबाया जाए, पायजामे का नाड़ा खींचकर खोला जाए और उसे सुनसान जगह पर खींच ले जाया जाए और अदालत कह दे कि यह ‘रेप का प्रयास’ भी नहीं है। सोई हुई बच्ची की पैंटी उतारी जाए, चूमा जाए लेकिन ‘पेनिट्रेशन’ नहीं हुआ तो रेप नहीं। कपड़ों के ऊपर से छूना ‘स्किन-टू-स्किन’ संपर्क नहीं, इसलिए POCSO के तहत अपराध नहीं। अकेले आदमी का मुँह दबाकर, कपड़े उतारकर रेप करना ‘असंभव’ लगता है, इसलिए आरोपित बरी…

ये वाक्य कोई कल्पना नहीं, बल्कि अलग-अलग हाई कोर्ट्स के लिखित फैसलों से लिए गए हैं। ये फैसले न सिर्फ कानूनी व्याख्या के नाम पर पीड़िताओं की पीड़ा को कमतर आँकते हैं, बल्कि समाज में यह संदेश देते हैं कि अपराधी तकनीकी दाँव-पेच से बच सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मामलों में दखल देकर इन्हें पलटा है और जजों के लिए संवेदनशीलता की नई गाइडलाइंस बनाने की बात कही है, लेकिन सवाल बरकरार है कि क्या न्याय सिर्फ कानून की किताबी परिभाषाओं तक सीमित रह जाना चाहिए? या उसे पीड़िता की गरिमा, उसके ट्रॉमा और समाज की सुरक्षा को भी उतनी ही गंभीरता से लेना चाहिए?

आगे हम इन्हीं कुछ चर्चित और विवादास्पद फैसलों को विस्तार से देखेंगे और उन फैसलों को समझेंगे कि आखिर क्यों सुप्रीम कोर्ट को अब जजों के लिए गाइडलाइन्स बनाने जैसा फैसला देना पड़ा।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के विवादित फैसले पर भड़का SC, गाइडलाइन्स बनाने को कहा

सबसे ताजा और चर्चित मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट का है, जो 2025 में सामने आया था। इसमें 11 साल की एक मासूम बच्ची के साथ तीन युवकों ने घिनौना काम किया। आरोपियों ने बच्ची का स्तन दबाया, पायजामे का नाड़ा खींचकर खोला और उसे पुलिया के नीचे एक सुनसान जगह पर खींचकर ले जाने की कोशिश की। बच्ची के चिल्लाने पर आसपास के लोग दौड़े आए, जिससे आरोपित भाग निकले। निचली अदालत ने इसे रेप का प्रयास मानते हुए IPC की धारा 376 और POCSO एक्ट की धारा 18 के तहत समन जारी किया।

लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने इसे हल्का करार दे दिया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ स्तन दबाना, नाड़ा तोड़ना और खींचना रेप या रेप के प्रयास की श्रेणी में नहीं आता, क्योंकि आरोपित ने खुद कपड़े नहीं उतारे और आगे का कोई कदम नहीं उठाया। कोर्ट ने इसे सिर्फ महिलाओं की गरिमा भंग करने वाली धारा 354-B में डाल दिया।

यह फैसला आते ही पूरे देश में हंगामा मच गया। लोगों ने कहा कि कोर्ट पीड़िता की तकलीफ को समझने की बजाय कानून की इतनी सख्त व्याख्या कर रहा है कि अपराधी बच निकलें। चार महीने सोच-विचार कर दिया गया यह फैसला संवेदनहीन लग रहा था। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने 10 फरवरी 2026 को इस फैसले को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि स्तन दबाना और पायजामे का नाड़ा खोलना रेप का प्रयास ही है। कोर्ट ने हाई कोर्ट की टिप्पणियों को ‘अमानवीय, संवेदनहीन और घृणित’ बताया। साथ ही कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) को कमेटी बनाने को कहा, जो जजों के लिए यौन अपराधों के मामलों में संवेदनशीलता और करुणा की नई गाइडलाइंस तैयार करेगी।

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि पूरे न्यायिक सिस्टम में संवेदनशीलता की कमी को उजागर करता है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जजों को पीड़िता की मानसिक और शारीरिक पीड़ा को समझना चाहिए, न कि सिर्फ कानून की किताबी व्याख्या करना। लेकिन सवाल यह है कि जब तक ऐसी गाइडलाइंस नहीं बनतीं, तब तक कितनी और बच्चियाँ न्याय से वंचित रहेंगी? क्या जजों को ट्रेनिंग की जरूरत नहीं कि वे अपराध की गंभीरता को महसूस करें, न कि अपराधी को बचाने के रास्ते ढूँढें?

छत्तीसगढ़ HC का मामला- बिना पेनिट्रेशन के इजैक्युलेशन रेप नहीं

यह मामला लगभग 20 साल पुराना है, जिसमें एक व्यक्ति पर बलात्कार का आरोप लगा था। निचली अदालत ने उसे रेप का दोषी मानकर सजा सुनाई। लेकिन छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अपील में फैसला पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि महिला के निजी अंग पर पुरुष अंग रखकर बिना पेनिट्रेशन के स्खलन हो जाना बलात्कार नहीं है। इसके लिए IPC की धारा 375 के तहत पेनिट्रेशन जरूरी है। कोर्ट ने सजा को रेप से बदलकर रेप के प्रयास (धारा 376 के साथ 511) में कर दिया।

कोर्ट ने तर्क दिया कि कानून की व्याख्या सख्ती से करनी चाहिए और अपराध के हर तत्व को साबित होना जरूरी है। कोर्ट ने माना कि यह कृत्य गंभीर है, लेकिन इसे रेप की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता। कोर्ट ने कहा कि अपराध की गंभीरता के हिसाब से सजा होनी चाहिए, लेकिन कानूनी प्रावधानों का पालन भी उतना ही जरूरी है।

यह फैसला उठाता है बड़ा सवाल कि क्या कानून की किताबी व्याख्या पीड़िता की गरिमा और ट्रॉमा से ऊपर है? पीड़िता ने जो सहन किया, उसकी मानसिक पीड़ा को कोर्ट ने नजरअंदाज कर दिया। सिर्फ पेनिट्रेशन न होने की बात पर अपराधी को कम सजा देना क्या न्याय है? ऐसे फैसले अपराधियों को हौसला देते हैं कि अगर पूरा अपराध न कर पाएँ तो सजा भी कम मिलेगी। क्या जजों को यह नहीं सोचना चाहिए कि यौन अपराधों में पीड़िता की सहमति और गरिमा का हनन ही सबसे बड़ा अपराध है?

बॉम्बे हाई कोर्ट का स्किन-टू-स्किन मामला

बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने 2021 में एक चौंकाने वाला फैसला दिया था। एक व्यक्ति पर 12 साल की बच्ची का स्तन दबाने का आरोप था। उसने बच्ची को गुड़ का लालच देकर घर बुलाया। निचली अदालत ने POCSO एक्ट के तहत सजा सुनाई। लेकिन जस्टिस पुष्पा गणेदीवाला ने कहा कि कपड़ों के ऊपर से छूना ‘स्किन-टू-स्किन’ संपर्क नहीं है, इसलिए यह POCSO के तहत यौन शोषण नहीं। कोर्ट ने इसे सिर्फ IPC की धारा 354 (महिलाओं की लज्जा भंग) में डाला।

कोर्ट ने तर्क दिया कि POCSO एक्ट में यौन शोषण के लिए यौन इरादे से सीधा शारीरिक संपर्क जरूरी है। अगर कपड़े उतारे होते या अंडरगारमेंट में हाथ डाला होता, तब बात अलग होती। जज ने कहा कि मामले में टॉप हटाकर स्तन दबाने की पुष्टि नहीं है, इसलिए यह यौन शोषण नहीं।

यह फैसला बेहद संवेदनहीन लगता है। एक बच्ची के साथ ऐसा व्यवहार और कोर्ट कहता है कि कपड़े के ऊपर से छूना अपराध नहीं? क्या बच्ची की मानसिक ट्रॉमा कपड़ों की मोटाई पर निर्भर करती है? यह फैसला पीड़ितों को न्याय से दूर करता है और अपराधियों को तकनीकी बहाने देता है। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में इस पर रोक लगाई, लेकिन सवाल है कि ऐसे जज कैसे फैसले देते हैं जो समाज में गलत संदेश जाते हैं?

बॉम्बे हाई कोर्ट का ‘अकेले असंभव’ वाला फैसला

इसी जस्टिस पुष्पा गणेदीवाला ने एक और विवादित फैसला दिया था। एक युवती के साथ रेप के मामले में निचली अदालत ने 26 साल के आरोपी को दोषी ठहराया। लेकिन हाई कोर्ट ने उसे बरी कर दिया। जज ने कहा कि बिना हाथापाई के मुंह दबाना, कपड़े उतारना और रेप करना अकेले आदमी के लिए ‘बेहद असंभव’ लगता है।

कोर्ट ने पीड़िता के बयान पर शक जताया और कहा कि ऐसी घटना अकेले संभव नहीं। जज का मानना था कि पीड़िता का विरोध न होना और कोई चोट न लगना अपराध को कमजोर करता है। इस आधार पर आरोपी को रेप से बरी कर दिया गया।

यह सोच ही गलत है। क्या रेप सिर्फ तभी होता है जब जबरदस्ती हाथापाई हो? कई बार डर से पीड़िता विरोध नहीं कर पाती। जज का यह कहना कि अकेला आदमी ऐसा नहीं कर सकता, पीड़िताओं के अनुभव को नकारता है। ऐसे फैसले अपराधियों को बचाते हैं और पीड़िताओं को शर्मिंदगी महसूस कराते हैं। जस्टिस गणेदीवाला का कार्यकाल बढ़ाया गया, लेकिन ऐसे फैसलों से न्यायिक व्यवस्था पर सवाल उठते हैं।

कलकत्ता HC- सोई बच्ची की पैंटी उतारी, लेकिन पेनिट्रेशन नहीं तो रेप नहीं

साल 2010 की एक घटना में 11 साल की बच्ची घर में सो रही थी। दीपक सिंघा नाम का व्यक्ति रात को घुसा, बच्ची को दबोचा, चूमा और पैंटी उतारकर रेप की कोशिश की। बच्ची के चिल्लाने पर लोग आए और आरोपित भाग निकला। निचली अदालत ने रेप मानकर आजीवन कारावास की सजा दी। लेकिन कलकत्ता हाई कोर्ट ने 2022 में सजा कम कर दी। कोर्ट ने कहा कि पेनिट्रेशन नहीं हुआ, इसलिए यह रेप नहीं, सिर्फ रेप का प्रयास है।

कोर्ट ने तर्क दिया कि रेप के लिए कम से कम स्पर्श स्तर का पेनिट्रेशन जरूरी है। पीड़िता और गवाहों ने भी पेनिट्रेशन न होने की बात मानी। कोर्ट ने कहा कि बच्ची के विरोध और लोगों के आने से आरोपित नाकाम रहा।

फिर वही सवाल कि क्या यौन अपराध सिर्फ पेनिट्रेशन तक सीमित है? बच्ची की पैंटी उतारना, चूमना, दबोचना- ये सब क्या कम अपराध हैं? कोर्ट पीड़िता की उम्र और ट्रॉमा को भूल गया। ऐसे फैसले कानून को तकनीकी बनाते हैं और अपराधी को राहत देते हैं। क्या जजों को यह नहीं समझना चाहिए कि बच्चियों के साथ ऐसा व्यवहार जीवनभर का दाग छोड़ता है?

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने भतीजी के साथ रेप की कोशिश में दी थी जमानत

फैयाज अहमद डार पर अपनी नाबालिग भतीजी के साथ रेप की कोशिश का आरोप था। उसने पीड़िता का मुँह टेप से बंद किया, उसके और अपने कपड़े उतारे। लेकिन भाई के आने पर भाग गया। IPC और POCSO के तहत केस चला। लेकिन जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने 2021 में जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा कि बिना पेनिट्रेशन के यह रेप का प्रयास नहीं, सिर्फ यौन हमला (धारा 354 और POCSO 7/8) है।

जस्टिस संजीव कुमार ने कहा कि कपड़े उतारना तैयारी है, प्रयास नहीं। मेडिकल रिपोर्ट में कोई चोट नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि तैयारी और प्रयास में पतला फर्क है, और जमानत नियम है।

यह फैसला दिखाता है कि कैसे तकनीकी बहाने से अपराधी बाहर घूमते हैं। भतीजी के साथ ऐसा करना कितना घिनौना है, लेकिन कोर्ट ने पेनिट्रेशन न होने को आधार बनाया। क्या परिवार की बच्ची के साथ विश्वासघात की गंभीरता कम है? ऐसे फैसले समाज में डर पैदा करते हैं कि न्याय मिलना मुश्किल है। जजों को पीड़िता की सुरक्षा पहले सोचनी चाहिए, अपराधी की जमानत बाद में।

उम्मीद जगाने वाला है सुप्रीम कोर्ट का फैसला, ये मील का पत्थर

ये तमाम फैसले पढ़कर दिल बैठ जाता है। छोटी-छोटी बच्चियाँ, जो अभी दुनिया को समझ भी नहीं पाईं, उनके साथ जो होता है, वह सिर्फ शरीर पर हमला नहीं, उनकी पूरी जिंदगी पर वार होता है। लेकिन जब अदालतें तकनीकी दलीलों में उलझकर अपराध को हल्का कर दें, तो पीड़िता को लगता है कि उसकी चीख कोई सुन ही नहीं रहा। न्याय का मतलब सिर्फ कानून की किताब पढ़ना नहीं, उस किताब को इंसानी दर्द से जोड़ना भी है।

सुप्रीम कोर्ट का 10 फरवरी 2026 का फैसला और जजों के लिए संवेदनशीलता की नई गाइडलाइंस बनाने का आदेश एक बड़ी उम्मीद जगाता है। यह बताता है कि सबसे ऊपरी अदालत पीड़िताओं की पीड़ा समझ रही है। अब जरूरत है कि ये गाइडलाइंस सिर्फ कागज पर न रहें। जजों की ट्रेनिंग में पीड़िताओं की कहानियाँ शामिल हों, मनोवैज्ञानिकों की राय ली जाए, ताकि हर बेंच पर बैठा जज यह महसूस करे कि उसके एक शब्द से एक मासूम का पूरा बचपन बच या बर्बाद हो सकता है।

हम सबको भी सोचना होगा। जब तक समाज में बच्चियों को सुरक्षित नहीं माना जाएगा, तब तक अदालतें कितनी ही कोशिश कर लें, न्याय अधूरा रहेगा। उम्मीद है, यह नया कदम सच में बदलाव लाएगा और हर बच्ची को भरोसा दिलाएगा कि उसकी आवाज सुनी जाएगी। क्योंकि न्याय तब ही पूरा होता है, जब वो प्रभावित पक्ष को पूरी तरह से न्याय दे।

8 साल में 3000 किमी+ के एक्सप्रेस-वे, 7 चालू और दर्जन भर निर्माणाधीन: योगी सरकार ने UP को रफ्तार की पटरी पर दौड़ाया

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में पूर्वांचल एक्सप्रेस वे से जुड़ा किस्सा सुनाते हुए बताया है कि किस तरह अखिलेश यादव की सरकार के दौरान बिना जमीन अधिग्रहण के ही टेंडर दे दिए गए थे। इस एक्सप्रेस वे के लिए अखिलेश सरकार में ₹15,200 करोड़ का DPR बनाया गया। वहीं, योगी सरकार आने के बाद एक्सप्रेस वे की चौड़ाई बढ़ी और टेंडर की कीमत भी घटकर ₹11,800 करोड़ रह गई।

सीएम योगी द्वारा बताई गई यह कहानी सिर्फ एक एक्सप्रेस वे बनने की नहीं है बल्कि उस कड़ी का एक हिस्सा है जिसके तहत एक्सप्रेस वे का एक नेटवर्क बनाकर पूरे UP को जोड़ा जा रहा है। योगी सरकार ने मात्र 8 साल में 3000 किमी से अधिक एक्सप्रेस-वे बनाए हैं और UP सबसे अधिक एक्सप्रेस वे वाला राज्य बन गया है। UP में 7 एक्सप्रेस-वे बन गए हैं और करीब एक दर्जन पर काम चल रहा है कुछ में करीब-करीब आखिरी चरण में पहुँच गया है। इतना ही नहीं 7 एक्सप्रेस वे जोड़ने की परियोजना भी शुरू की गई है ताकि उत्तर से दक्षिण तक सीधी कनेक्टिविटी हो।

देश में सबसे ज्यादा एक्सप्रेस-वे वाला राज्य

उत्तर प्रदेश जल्द ही भारत का ऐसा पहला राज्य बन जाएगा, जहाँ 22 एक्सप्रेस वे होंगे। फिलहाल राज्य में 7 एक्सप्रेस वे चल रहे हैं। इनमें आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे और ग्रेटर नोएडा-आगरा एक्सप्रेस वे को छोड़कर बाकी सबका निर्माण योगी काल में हुआ है या हो रहा है। गंगा एक्सप्रेस वे मेरठ से प्रयागराज को जोड़ रहा है, जो सबसे लंबा है। यमुना एक्सप्रेस वे का विस्तार अभी जारी है। यह जेवर को जोड़ता है, जहाँ इंटरनेशनल एयरपोर्ट बन रहा है।

3 एक्सप्रेस वे का शिलान्यास हो चुका है, जिस पर काम चल रहा है। इसके अलावा 12 नए एक्सप्रेस वे विकसित करने की योजना है, यानी राज्य में सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है। 12 नए एक्सप्रेस वे में जो चालू होने हैं उनमें गंगा एक्सप्रेस वे , नोएडा-लखनऊ एक्सप्रेस वे, विंध्य एक्सप्रेस वे और गोरखपुर-सिलीगुड़ी एक्सप्रेस वे शामिल हैं।

इनके माध्यम से छोटे कस्बों और दूर दराज के इलाकों को जोड़ा जा रहा है ताकि विकास को रफ्तार के साथ आखिरी छोर तक पहुँचाया जा सके और राज्य को आर्थिक प्रगति को ‘रास्ता’ दिखाया जा सके। उद्योग-व्यापार और सप्लाई चेन को बढ़ावा मिल सके। इससे राज्य में निवेश आए और रोजगार के नए अवसर पैदा हों।

गंगा एक्सप्रेस वे समेत 12 के निर्माण का प्रस्ताव

12 नए एक्सप्रेस वे में जो प्रस्तावित हैं उनमें गंगा एक्सप्रेस वे, नोएडा-लखनऊ एक्सप्रेस वे, विंध्य एक्सप्रेस वे, और गोरखपुर-सिलीगुड़ी एक्सप्रेस वे शामिल हैं, जो प्रदेश को 22 एक्सप्रेस वे वाला देश का प्रमुख राज्य बना देंगे।

  • गंगा एक्सप्रेस वे राज्य में निर्माणाधीन सबसे लंबा हाईवे है। मेरठ से प्रयागराज को जोड़ने वाली 6 लेन वाली सड़क का काम करीब करीब पूरा हो गया है। 594 किमी का ये हाईवे 2026 में औपचारिक तौर पर शुरू हो जाएगा। पूर्वी यूपी से पश्चिम को इसके माध्यम से जोड़ा जा रहा है, ताकि आवाजाही आसान हो सके।
  • लखनऊ कानपुर एक्सप्रेस वे लखनऊ और कानपुर को जोड़ेगा। यब 63 किलोमीटर का होगा, जिसे पूरा करने में मात्र 45 मिनट लगेंगे। व्यावसायिक दृष्टिकोण से ये फायदेमंद होगा।
  • अलीगढ़ संभल हाईवे का निर्माण अलीगढ़ से संभल को जोड़ने के लिए किया जा रहा है। ये सड़क एनएच 32 और एनएच 509 को जोड़ेगी।
  • गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस वे 91 किलोमीटर का लंबा लिंक रोड़ बन रहा है जो फिलहाल 4 लेन का है लेकिन भविष्य में इसे 6 लेन का बनाया जाएगा। इससे गोरखपुर आजमगढ़, अंबेडकर नगर और संत कबीर नगर जैसे जिले कनेक्ट होंगे। विंध्य एक्सप्रेस वे का निर्माण वाराणसी से सोनभद्र को जोड़ने के लिए किया गया है यह गंगा एक्सप्रेस वे से भी जुड़ेगी।

7 एक्सप्रेस-वे को जोड़ने वाला प्रोजेक्ट

राज्य में बरेली से आगरा, झाँसी, ललितपुर कॉरिडोर बनाने को योगी सरकार ने मंजूरी दी है। 547 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर से 7 एक्सप्रेस-वे जुड़ेंगे। इस पर 7000 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। प्रस्तावित कॉरिडोर सिर्फ एक नई सड़क परियोजना नहीं बल्कि प्रदेश के एक्सप्रेस वे नेटवर्क को ‘ग्रिड मॉडल’ में जोड़ने की रणनीति का केंद्र है। ये 6 सड़कों वाला एक्सप्रेस वे होगा, जो नेपाल के बॉर्डर के पास तक जाएगा।

ये प्रोजेक्ट इसलिए भी अहम है क्योंकि राज्य के ज्यादातर एक्सप्रेस-वे और हाईवे पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों में हैं। ये तराई क्षेत्रों को कवर नहीं करते और गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस वे छोड़ कर यहाँ हाई स्पीड रोड नहीं है। ऐसे में नॉर्थ साउथ कॉरिडोर पूरा होने से राज्य की तस्वीर बदल जाएगी। नेपाल से मध्यप्रदेश तक और पूर्वांचल से बुंदेलखंड तक इससे जुड़ जाएगा।

यूपी में जो 7 एक्सप्रेस वे चल रहे हैं उनमें यमुना एक्सप्रेस वे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे, दिल्ली मेरठ एक्सप्रेस वे, पूर्वांचल एक्सप्रेस वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे, गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस वे नोएडा ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे शामिल हैं।

यमुना एक्सप्रेस वे– यह एक्सप्रेस वे ग्रेटर नोएडा से आगरा तक जाता है। यह 165.5 किमी लंबा है। यह 8 लेन वाले कंक्रीट निर्मित हाई-स्पीड कॉरिडोर है। यह नोएडा-आगरा के बीच यात्रा समय को 2-3 घंटे कम करता है।

आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे– यह देश का पहला ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस वे है। इसकी लंबाई 302 किलोमीटर है। 2016-2017 में बनकर तैयार हुआ था। यह 6-लेन का एक्सप्रेस वे आगरा और लखनऊ को जोड़ता है और इसका उद्देश्य यात्रा समय को कम करना है।

दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस वे– 96 किमी लंबा, 14-लेन वाला दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस वे भारत के सबसे चौड़े मार्ग में से एक है। यह दिल्ली के निजामुद्दीन पुल को मेरठ के परतापुर को जोड़ता है। यह यात्रा के समय को 2-3 घंटे से घटाकर मात्र 45-60 मिनट कर देता है।

पूर्वांचल एक्सप्रेस वे- ये लखनऊ से गाजीपुर तक 341 किलोमीटर तक लंबा है। 6 लेन वाले इस एक्सप्रेस वे पर सुल्तानपुर में 3.2 किलोमीटर की हवाई पट्टी भी है, इससे 3.5-4 घंटे में गाजीपुर से लखनऊ तक की दूरी पूरी की जा सकती है।

बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे– यह चित्रकूट से इटावा तक जाता है, जिसकी लंबाई 296 किलोमीटर है। यह आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे से भी जुड़ा हुआ है।

नोएडा- ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे- नोएडा के महामाया फ्लाईओवर को ग्रेटर नोएडा के परी चौक से जोड़ने वाला एक 6-लेन हाईवे है। यह बेहतर कनेक्टिविटी के लिए जाना जाता है।

गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस वे– गोरखपुर से आजमगढ़ तक 4-लेन एक्सप्रेस वे है, जो गोरखपुर को पूर्वांचल एक्सप्रेस वे के माध्यम से लखनऊ और दिल्ली से जोड़ता है। यह ₹7283 करोड़ से अधिक की लागत से बना है।

अखिलेश यादव के शासनकाल में खर्च ज्यादा, काम कम

अखिलेश यादव कहते रहे हैं कि उनके द्वारा शुरू किए गए योजनाओं से ‘समाजवादी’ शब्द हटाकर योगी सरकार ने इसे अपना नाम दे दिया। उनकी सरकार में 22 दिसंबर 2016 को पूर्वांचल एक्सप्रेस वे का शिलान्यास हुआ था। अखिलेश यादव का कहना है कि योगी सरकार ने इसे लटकाया, बल्कि टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद निरस्त कर दिया। उनके झूठ की पोल उस वक्त खुल गई जब विधानसभा में सीएम योगी ने तथ्यों के साथ पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे की जानकारी दी।

इस आधी-अधूरी परियोजना में जमीन का अधिग्रहण किए बगैर टेंडर जारी कर दिए गए थे। जबकि नियम है कि जब तक एक्सप्रेस-वे के लिए 80 फीसदी जमीन का अधिग्रहण नहीं हो जाता, टेंडर जारी नहीं किए जाते हैं। 2016 में पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे की चौड़ाई 110 मीटर और 390 किमी लंबा बनना था।

प्रोजेक्ट की लागत ₹15,200 करोड़ बताई गई। लेकिन जब 2019 में योगी सरकार ने इस प्रोजेक्ट को अमली जामा पहनाया तो इसकी चौड़ाई 120 मीटर हो गई और प्रोजेक्ट का खर्च भी घट कर ₹11,800 करोड़ हो गया। यानी राज्य को ₹3400 करोड़ रुपए की बचत हुई। इतना ही नहीं सड़क की चौड़ाई भी 10 मीटर बढ़ाई गई। सीएम योगी कहते हैं कि कोई भी प्रोजेक्ट किसी भी सरकार ने शुरू किया हो, इससे फर्क नहीं पड़ता। जो राज्य के हित में है, उसे पूरा किया जाना चाहिए।

लखनऊ आगरा एक्सप्रेस वे बनने के दौरान हुए करप्शन- बीजेपी

आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे, जिसका फोटो सोशल मीडिया पर डालकर अखिलेश यादव अपने शासन के दौरान ‘विकास’ को दर्शाते हैं, उस प्रोजेक्ट में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे। एक्सप्रेस- वे के बनने से पहले किसानों से जमीन कौड़ियों के भाव खरीदकर एसपी नेताओं और उनके परिजनों ने सरकार को प्रोजेक्ट के लिए ये जमीनें बेची। इस दौरान जमकर मुनाफा कमाया गया। यहाँ तक कि आगरा के तत्कालीन डीएम जुहैर बिन सगीर पर आरोप लगा कि उन्होंने एक्सप्रेस वे बनने से पहले अपने रिश्तेदारों को एक्सप्रेस वे वाली जमीन खरीदवाई और फिर मुनाफा कमा कर सरकार को बेच दिया। डीएम जुहैर को अखिलेश यादव का चहेता कहा जाता था। एक्सप्रेस-वे के लिए न केवल जमीन अधिक दाम पर खरीदी गई बल्कि चहेतों को अलग-अलग ठेके भी दिए गए।

अखिलेश यादव ने फैलाया झूठ

अखिलेश यादव एक्सप्रेस वे को लेकर बीजेपी पर निशाना साध रहे हैं। उन्होंने गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस वे की ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम पर कहा था कि ‘व्यवस्था’ किसी एडवांस मैनेजमेंट सिस्टम से नहीं, सही नीयत से शासन-प्रशासन चलाने से सुधरती है। अखिलेश यादव मात्र डेढ़ एक्सप्रेस वे बना पाए, उसको लेकर भी कई आरोप लगे। पूर्वांचल का आधा काम भी पूरा नहीं हुआ और योगी सरकार ने कम खर्च पर उससे अच्छा और चौड़ा एक्सप्रेस वे बना कर उनको जवाब भी दे दिया।