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लोकल बिजनेस का ग्लोबल दम: क्या है वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस, जो ट्रंप के टैरिफ प्लान को देगा मात

आज दुनिया भर के व्यापार में अनिश्चितता का माहौल है। डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने कई देशों को टैरिफ (आयात शुल्क) की धमकी देकर एक तरह से ‘टैरिफ वॉर’ शुरू कर दिया है। रूस से कच्चा तेल खरीदने के कारण भारत पर पहले ही 50% टैरिफ लगाया जा चुका है और अब उन्होंने इसे बढ़ाकर 500% करने की धमकी भी दे दी है।

इन वैश्विक चुनौतियों के बीच, गुजरात एक दूरदर्शी और जमीनी स्तर की रणनीति पर काम कर रहा है। ‘वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट’ की सफलता के बाद, अब राज्य सरकार ने साल 2025-2026 के दौरान चार ‘क्षेत्रीय गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस’ (VGRC) के आयोजन का फैसला किया है। इसमें से पहली कॉन्फ्रेंस अक्टूबर 2025 में उत्तर गुजरात के मेहसाणा में आयोजित की गई थी। अब अगली कॉन्फ्रेंस 11-12 जनवरी 2026 को राजकोट में होने जा रही है।

वाइब्रेंट गुजरात की ऐतिहासिक यात्रा और क्षेत्रीय विस्तार का महत्व

वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट (VGGS) राज्य के आर्थिक विकास का एक अनोखा और प्रेरणा देने वाला प्रतीक है। इसकी शुरुआत साल 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी। उस समय 2001 के भुज भूकंप के बाद गुजरात पुनर्निर्माण के दौर से गुजर रहा था और दुनिया भर के निवेशकों का भरोसा फिर से जीतना बहुत जरूरी था।

इस समिट ने न केवल गुजरात को ग्लोबल इन्वेस्टमेंट का केंद्र बनाया, बल्कि भारत में राज्य स्तर पर ‘इकोनॉमिक डिप्लोमेसी’ और ब्रांडिंग का एक सफल मॉडल भी पेश किया। साल 2024 में इसके 10वें संस्करण की सफलता के बाद, अब अगली ग्लोबल समिट 2027 में होने वाली है। इस बीच, विकास को क्षेत्रीय स्तर (रीजनल लेवल) पर ले जाना गुजरात की रणनीति का एक नया और समावेशी चरण है, जो ‘विकसित भारत 2047’ के विजन से सीधा जुड़ा है।

संक्षेप में कहें तो, जो ग्लोबल समिट पहले दुनिया के लिए होती थी, अब वैसी ही समिट गुजरात के अलग-अलग क्षेत्रों के विकास के लिए आयोजित की जा रही है। इसीलिए इस अभियान को ‘ग्लोबल रीजनल समिट’ या ‘कॉन्फ्रेंस’ के नाम से जाना जाता है।

वाइब्रेंट गुजरात का पहला संस्करण

वाइब्रेंट गुजरात का पहला आयोजन 28-30 सितंबर 2003 को अहमदाबाद और सूरत में हुआ था। इसका उद्घाटन तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने किया था। इस समिट का मुख्य उद्देश्य गुजरात को निवेश के लिए एक प्रमुख स्थान (Investment Destination) के रूप में फिर से स्थापित करना था। पहले संस्करण में केवल 76 समझौते (MoUs) हुए थे, जिसके तहत 14 बिलियन डॉलर यानी करीब ₹66,000 करोड़ के निवेश की घोषणा हुई थी। उस समय लगभग 125 विदेशी प्रतिनिधियों, 200 अनिवासी भारतीयों (NRIs) और 200 प्रमुख हस्तियों ने इसमें हिस्सा लिया था।

इसके बाद हर 2 साल में इस समिट का सिलसिला जारी रहा। साल 2005 में करीब 20 देशों के प्रतिनिधि आए और निवेश का आँकड़ा ₹1 लाख करोड़ को पार कर गया। साल 2007 में ₹4.65 लाख करोड़, 2009 में ₹12 लाख करोड़ और 2011 में निवेश का यह आंकड़ा ₹20.83 लाख करोड़ तक पहुँच गया। साल 2013 में विधानसभा चुनाव और 2014 में लोकसभा चुनाव के बाद, 2015 की समिट ‘मेक इन इंडिया’ के तहत आयोजित हुई, जिसमें करीब 110 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और ₹25 लाख करोड़ का निवेश आया।

टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2017 में राज्य सरकार ने जानकारी दी थी कि वाइब्रेंट गुजरात समिट के तहत 2003 से 2017 तक कुल 51,738 समझौते (MoUs) या निवेश के प्रस्ताव आए थे। इनमें से 66% यानी 34,234 प्रोजेक्ट्स या तो शुरू हो चुके हैं या फिर उन्हें लागू करने की प्रक्रिया चल रही है। इसके बाद, 2019 में हुए 9वें संस्करण के दौरान भी हजारों समझौते हुए थे, जिसमें अकेले रिन्यूएबल एनर्जी (अक्षय ऊर्जा) क्षेत्र में ही ₹50,000 करोड़ के निवेश की उम्मीद जताई गई थी।

2023 में 20 साल पूरे होने पर उत्सव

साल 2023 में इस समिट के 20 साल पूरे होने के अवसर पर विशेष उत्सव मनाया गया था। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि यह समिट अब सिर्फ एक समय का ‘इवेंट’ नहीं रह गई है, बल्कि यह एक ‘संस्था’ (Institution) बन चुकी है। जहाँ साल 2003 में इसमें केवल 100 के करीब प्रतिनिधि शामिल हुए थे, वहीं आज इसमें 40,000 से भी ज्यादा प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। इसके बाद, साल 2024 में वाइब्रेंट गुजरात समिट के 10वें संस्करण का शानदार आयोजन किया गया।

2024 में लाखों-करोड़ों के निवेश समझौते (MoUs)

साल 2024 में आयोजित समिट के दौरान 41,299 प्रोजेक्ट्स के लिए ₹26.33 लाख करोड़ के MoUs साइन किए गए। अगर प्री-समिट और मुख्य समिट दोनों को मिला लें, तो कुल 98,540 प्रोजेक्ट्स के लिए ₹45.2 लाख करोड़ से भी ज्यादा का निवेश आया है। इससे करीब 81 लाख रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना है। इस बार खास तौर पर सेमिकंडक्टर्स, ग्रीन हाइड्रोजन और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे आधुनिक क्षेत्रों पर फोकस किया गया।

चूंकि 2027 में गुजरात विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, इसलिए फिलहाल सरकार का पूरा ध्यान संतुलित और सबको साथ लेकर चलने वाले विकास (Inclusive Growth) पर है। इसी कड़ी में चार ‘वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस’ (VGRC) आयोजित की जा रही हैं। यह पहल असल में ग्लोबल समिट के मॉडल को ही क्षेत्रीय स्तर पर लागू करने की एक कोशिश है।

VGRC (वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस) के उद्देश्य

इन क्षेत्रीय सम्मेलनों का मुख्य उद्देश्य हर क्षेत्र की अपनी खासियतों और उत्पादों (ODOP – वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट) को बढ़ावा देना है। इसके साथ ही, MSME, स्टार्टअप्स और स्थानीय उद्योगों को मजबूत करना और विकास का लाभ गाँव, तहसील और जिला स्तर तक पहुँचाना इसका लक्ष्य है। सरकार चाहती है कि वैश्विक निवेश का आकर्षण केवल बड़े शहरों तक सीमित न रहकर सीधे क्षेत्रीय स्तर तक पहुँचे।

इसके अलावा, साल 2025 में वैश्विक हालात भी काफी बदल चुके हैं। डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत पर लगे 50% टैरिफ के कारण निर्यात (एक्सपोर्ट) में गिरावट देखी गई है। इसका सीधा असर गुजरात के प्रमुख उद्योगों जैसे केमिकल्स, टेक्सटाइल्स, जेम्स एंड ज्वेलरी, फार्मा और एग्रो प्रोडक्ट्स पर पड़ रहा है। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में ग्लोबल समिट के साथ-साथ क्षेत्रीय सम्मेलनों (Regional Summits) पर ध्यान देना एक सही और समय की माँग के अनुसार उठाया गया कदम है। यह पूरी पहल ‘विकसित गुजरात 2047’ के लक्ष्य के साथ जुड़ी हुई है।

चार चरणों में VGRC (वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस)

इस योजना के तहत पहली क्षेत्रीय समिट अक्टूबर 2025 में गुजरात के मेहसाणा में आयोजित की जा चुकी है। अब इसी कड़ी में 11-12 जनवरी को राजकोट में यह कॉन्फ्रेंस होने जा रही है। इसके बाद, 9-10 अप्रैल को सूरत में और 10-11 जून को वडोदरा में भी इस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया जाएगा।

खास बात यह है कि हर मुख्य समिट से पहले जिला स्तर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों में स्थानीय उद्योगपतियों, MSME और कलाकारों (आर्टिसन्स) की समस्याओं पर विस्तार से चर्चा की जाती है। इस पूरी प्रक्रिया का मकसद विकास के फायदों को सीधे गाँवों और तहसीलों तक पहुँचाना है।

उत्तर गुजरात VGRC की सफलता और परिणाम

‘वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस’ (VGRC) का पहला सफल आयोजन 9-10 अक्टूबर 2025 को मेहसाणा की गणपत यूनिवर्सिटी में हुआ। इस आयोजन को जबरदस्त सफलता मिली। इस कॉन्फ्रेंस ने संकेत दिया कि उत्तर गुजरात आने वाले समय में ‘गुजरात का एनर्जी पॉइंट’ बनने जा रहा है। इसमें स्थानीय व्यापारियों, किसानों, युवाओं और महिला उद्यमियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

पहले VGRC के शानदार आँकड़े

MoUs और निवेश: कुल 21 क्षेत्रों में 1,212 समझौते (MoUs) हुए, जिसके जरिए ₹3.24 लाख करोड़ का निवेश आया। इसमें रिन्यूएबल एनर्जी, एग्री-टेक और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे आधुनिक क्षेत्रों पर खास जोर दिया गया।

भागीदारी: 29,000 से ज्यादा लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया। इसमें 80 से अधिक देशों की भागीदारी रही और 440 अंतरराष्ट्रीय डेलीगेट्स शामिल हुए।

नेटवर्किंग: समिट के दौरान 160 से ज्यादा B2B (बिजनेस टू बिजनेस) और 100 से ज्यादा B2G (बिजनेस टू गवर्नमेंट) मीटिंग्स हुईं। गुजरात को इसमें कई देशों का पार्टनर के तौर पर साथ मिला।

जिला स्तर पर असर: इस समिट का फायदा छोटे जिलों तक भी पहुँचा है। उदाहरण के लिए, वेरावल में ₹271 करोड़ के समझौते हुए, जिसका मुख्य फोकस ‘एग्रो-मरीन वैल्यू चेन’ पर है। इससे गिर सोमनाथ जिले में रोजगार बढ़ेगा और वहाँ के ‘केसर आम’ जैसे स्थानीय उत्पादों की वैल्यू भी बढ़ेगी।

कच्छ-सौराष्ट्र VGRC: राजकोट में आगामी महासमिट

वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस (VGRC) की दूसरी समिट कच्छ-सौराष्ट्र क्षेत्र के लिए राजकोट की मारवाड़ी यूनिवर्सिटी में 11-12 जनवरी 2026 को आयोजित होने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका भव्य उद्घाटन करेंगे। इस महासमिट में 22 देशों के 350 से ज्यादा विदेशी प्रतिनिधियों और 5000 से अधिक उद्योगपतियों के शामिल होने की उम्मीद है, जहाँ अरबों रुपए के निवेश समझौतों (MoUs) पर हस्ताक्षर होंगे।

इस दौरान होने वाले सेमिनार्स में ब्लू इकोनॉमी, ग्रीन स्टार्टअप, शिप-बिल्डिंग (जहाज निर्माण), सिरामिक्स और टूरिज्म जैसे प्रमुख विषयों पर ध्यान दिया जाएगा। राजकोट, जो पहले से ही इंजीनियरिंग और ऑटो पार्ट्स का बड़ा केंद्र है, इस समिट के जरिए सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ सकेगा।

प्रधानमंत्री का कार्यक्रम और प्रमुख घोषणाएँ: यह महासमिट कच्छ और सौराष्ट्र के 12 जिलों को कवर करेगी। इसका मुख्य लक्ष्य क्षेत्रीय औद्योगिक विकास को रफ्तार देना और ‘वोकल फॉर लोकल’ के साथ-साथ ‘ग्लोबल फ्रॉम लोकल’ के विजन को सच करना है।

तैयारियों की बात करें तो राजकोट-मोरबी हाईवे पर स्थित मारवाड़ी यूनिवर्सिटी के 55 एकड़ परिसर में 6 बड़े एग्जीबिशन डोम और एक मुख्य इनोवेशन हॉल तैयार किया गया है। प्रदर्शनी का क्षेत्र करीब 20,000 से 26,000 वर्ग मीटर में फैला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 जनवरी को सोमनाथ मंदिर के दर्शन के बाद राजकोट पहुँचेंगे। वहाँ वे ट्रेड शो का उद्घाटन करेंगे और कॉन्फ्रेंस को संबोधित करेंगे। इस मौके पर वे 14 नए ग्रीनफील्ड स्मार्ट GIDC एस्टेट की घोषणा करेंगे और राजकोट में मेडिकल डिवाइस पार्क का उद्घाटन भी करेंगे।

कच्छ-सौराष्ट्र VGRC से उम्मीदें

राजकोट में होने वाली इस रीजनल कॉन्फ्रेंस (VGRC) में 22 देशों के 350 से ज्यादा विदेशी प्रतिनिधि और 22 अंतरराष्ट्रीय छात्रों के शामिल होने की उम्मीद है। संभावना है कि जापान, दक्षिण कोरिया, रवांडा, यूक्रेन, वियतनाम और नीदरलैंड जैसे देश इस आयोजन में गुजरात के साथ साझेदारी करेंगे। इसके अलावा कई अंतरराष्ट्रीय संगठन भी इसमें हिस्सा लेंगे। अब तक इस कॉन्फ्रेंस के लिए 5,000 से 6,000 से अधिक रजिस्ट्रेशन हो चुके हैं और अरबों रुपए के निवेश समझौतों (MoUs) की उम्मीद जताई जा रही है।

इस कॉन्फ्रेंस का मुख्य लक्ष्य गुजरात के स्थानीय उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना है। इसमें मोरबी के मशहूर सिरामिक उद्योग, राजकोट के इंजीनियरिंग और ऑटो पार्ट्स हब के साथ-साथ कांडला और मुंद्रा जैसे बंदरगाहों (लॉजिस्टिक्स) को दुनिया से जोड़ने पर खास जोर दिया जाएगा। इसके अलावा मछली पालन (फिशरीज), पेट्रोकेमिकल्स, खेती से जुड़े फूड प्रोसेसिंग उद्योग, खनिज, ग्रीन एनर्जी, जहाज निर्माण और पर्यटन जैसे क्षेत्रों के विकास पर भी पूरा ध्यान दिया जाएगा।

इतना ही नहीं, इस आयोजन में छोटे उद्योगों (MSME), नए स्टार्टअप्स और युवाओं के कौशल विकास (Skill Development) को भी बढ़ावा दिया जाएगा। कॉन्फ्रेंस के दौरान होने वाले विशेष सेमिनार में भविष्य की जरूरतों, जैसे कि समुद्री अर्थव्यवस्था (ब्लू इकोनॉमी), पर्यावरण के अनुकूल स्टार्टअप, शिप रिसाइक्लिंग, ग्रीन हाइड्रोजन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे आधुनिक विषयों पर विस्तार से चर्चा होगी।

यद्यपि इस समिट में होने वाले कुल निवेश या MoUs का कोई सटीक आँकड़ा अभी सामने नहीं आया है, लेकिन उत्तर गुजरात VGRC की शानदार सफलता को देखते हुए यह माना जा रहा है कि यहाँ भी हजारों की संख्या में MoUs होंगे और लाखों करोड़ रुपए का निवेश आएगा।

दक्षिण गुजरात VGRC (सूरत)

दक्षिण गुजरात की इस रीजनल कॉन्फ्रेंस में मुख्य रूप से केमिकल्स और पेट्रोकेमिकल्स, टेक्सटाइल (कपड़ा उद्योग), जेम्स एंड ज्वेलरी (हीरा उद्योग), पर्यटन, खेती और फूड प्रोसेसिंग पर ध्यान दिया जाएगा। जैसा कि हम जानते हैं, सूरत भारत में हीरे और कपड़ों के व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र है, इसलिए इस कॉन्फ्रेंस से इन क्षेत्रों में नए निवेश और निर्यात (एक्सपोर्ट) को रफ्तार मिलने की बड़ी उम्मीद है। इस आयोजन के जरिए सूरत, वलसाड और नवसारी जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में भारी निवेश आकर्षित करने का लक्ष्य रखा गया है।

मध्य गुजरात VGRC (वडोदरा)

वडोदरा में होने वाली इस कॉन्फ्रेंस में मशीनरी और उपकरण, सेमीकंडक्टर्स, शिक्षा और स्किलिंग, IT (सूचना प्रौद्योगिकी), फार्मास्यूटिकल्स, बायो-टेक, एयरोस्पेस और डिफेंस (रक्षा क्षेत्र) जैसे आधुनिक विषयों पर फोकस रहेगा। इसके अलावा पेट्रोकेमिकल्स, ऑटो कंपोनेंट्स, क्रिटिकल मिनरल्स और पर्यटन पर भी चर्चा होगी। वडोदरा को पहले से ही ‘फार्मा और इंजीनियरिंग हब’ माना जाता है, इसलिए यहाँ हाई-टेक और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग यानी आधुनिक तकनीकी उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

VGRC कैसे दे रहा है ट्रंप के टैरिफ को टक्कर?

जैसा कि हमने देखा, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारतीय निर्यात (एक्सपोर्ट) पर 50% तक टैरिफ लगा दिया गया है। इसका सीधा और बुरा असर गुजरात के हीरा उद्योग, टेक्सटाइल, जेम्स एंड ज्वेलरी, केमिकल्स और सिरामिक्स जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर पड़ा है। अमेरिका को होने वाले निर्यात में कमी आई है, जिससे रोजगार पर भी संकट मंडरा रहा है।

इस बड़ी चुनौती का सामना करने के लिए गुजरात सरकार ने वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस (VGRC) को एक रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। इसके जरिए ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ (ODOP) और क्षेत्रीय ताकतों को बढ़ावा देकर स्थानीय उद्योगों को सीधे ग्लोबल मार्केट से जोड़ा जा रहा है। इसका मकसद अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम करना और आत्मनिर्भरता बढ़ाना है।

नए बाजारों की खोज और नेटवर्किंग: VGRC में होने वाली B2B और B2G मीटिंग्स, बायर्स-सेलर्स मीट और प्रदर्शनियों के माध्यम से स्थानीय निर्माताओं को अफ्रीका, एशिया, यूरोप और मिडिल ईस्ट जैसे नए बाजारों से जोड़ा जा रहा है। इससे अमेरिकी टैरिफ के असर को कम करने और निर्यात को स्थिर रखने में मदद मिल रही है। उदाहरण के लिए, मसालों और डेयरी क्षेत्र में नए एक्सपोर्ट समझौतों और कोल्ड चेन निवेश की उम्मीद की जा रही है।

क्षेत्रवार रणनीति और आर्थिक स्थिरता: हर रीजनल कॉन्फ्रेंस में उस क्षेत्र की खासियतों पर ध्यान दिया जा रहा है। जैसे सौराष्ट्र में सिरामिक्स और पोर्ट्स, तो मध्य गुजरात में सेमीकंडक्टर्स और ग्रीन मोबिलिटी पर जोर देकर निवेश आकर्षित किया जा रहा है। इससे उन उद्योगों को, जिन पर टैरिफ का बुरा असर पड़ा है, रिन्यूएबल एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन और एयरोस्पेस जैसे उभरते क्षेत्रों की ओर मोड़कर आर्थिक मजबूती दी जा रही है।

समस्याओं का समाधान और भविष्य की योजना: VGRC एक ऐसा मंच है जहाँ स्थानीय उद्यमी, छोटे उद्योग (MSME) और सरकार के नीति-निर्धारक एक साथ बैठते हैं। यहाँ भविष्य की चुनौतियों, नए बाजारों की तलाश और सरकारी प्रोत्साहन (Incentives) जैसे विषयों पर खुलकर चर्चा होती है। यह प्लेटफॉर्म उद्योगों को अपनी चिंताएं साझा करने और मिलकर समाधान खोजने में बड़ी मदद कर रहा है।

भविष्य की दिशा और बड़े लक्ष्य

वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट का 11वाँ संस्करण पहले 2026 में होने वाला था, लेकिन अब इसे साल 2027 के लिए टाल दिया गया है। इसके पीछे मुख्य कारण 2027 के गुजरात विधानसभा चुनाव, तैयारी के लिए अतिरिक्त समय और सेमीकंडक्टर, ग्रीन हाइड्रोजन व रिन्यूएबल एनर्जी जैसी दूरगामी पॉलिसियों पर ध्यान केंद्रित करना है। इस बीच, VGRC (रीजनल कॉन्फ्रेंस) एक मजबूत आधार का काम कर रही है, ताकि राज्य के हर क्षेत्र का विकास सुनिश्चित हो सके। 2027 की ग्लोबल समिट इन्हीं क्षेत्रीय सफलताओं के दम पर और भी बड़े निवेश को आकर्षित करेगी।

अर्थव्यवस्था का महा-विजन: वर्तमान में भारत की जीडीपी (GDP) में गुजरात का योगदान लगभग 8.3-8.5% है। राज्य सरकार का लक्ष्य साल 2047 तक गुजरात को $3.5 ट्रिलियन की इकोनॉमी बनाना है। इस विजन के तहत प्रति व्यक्ति आय को $38,000-$40,000 तक पहुँचाने और ‘नेट जीरो एमिशन’ (पर्यावरण अनुकूल विकास) का लक्ष्य रखा गया है। VGRC इस मिशन में एक महत्वपूर्ण कड़ी है- क्षेत्रीय विकास के जरिए ही राज्य के योगदान को बढ़ाकर भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयों पर ले जाया जाएगा।

स्थानीय उम्मीदें और वैश्विक सपने: VGRC का असली उद्देश्य स्थानीय आकांक्षाओं को वैश्विक अवसरों से जोड़ना है। इससे शहरी और ग्रामीण इलाकों के विकास में संतुलन आएगा और छोटे उद्योगों (MSME) व स्टार्टअप्स को नई ताकत मिलेगी। इन चारों क्षेत्रीय सम्मेलनों की सफलता 2027 की ग्लोबल समिट के लिए एक मजबूत नींव रखेगी, जिसमें बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय भागीदारी देखने को मिलेगी।

एक नए युग की शुरुआत वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस महज एक आयोजन नहीं, बल्कि गुजरात की आर्थिक मजबूती और सबको साथ लेकर चलने वाले विकास का प्रतीक है। इस क्षेत्रीय रणनीति के जरिए गुजरात वैश्विक चुनौतियों का डटकर मुकाबला कर रहा है, स्थानीय उद्योगों को सशक्त बना रहा है और हर गुजराती को विकास का भागीदार बना रहा है। 2047 तक $3.5 ट्रिलियन की इकोनॉमी की ओर बढ़ता गुजरात, इन क्षेत्रीय और ग्लोबल रणनीतियों के दम पर भारत के विकास का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बनेगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती की लेखक प्रार्थना आमीन ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

सिर्फ भगवान शिव का स्थान ही नहीं, अनंत काल से समंदर में सनातन की शक्ति का प्रतीक भी है सोमनाथ: जानें- व्यापारिक नेटवर्क से दुनिया की प्राचीन संस्कृतियों को कैसे साधता था भारत

जियोपॉलिटिकल थ्योरिस्ट निकोलस स्पाईकमैन की एक थ्योरी है- ‘Those who control the rimland, control the heartland’ यानी समुद्र पर नियंत्रण रखने वाला ही जमीन की सत्ता तय करता है। आजकल की जियो पॉलिटिक्स के लिए यह 20वीं सदी का सिद्धांत है लेकिन भारत के लिए यह कोई नया विचार नहीं था। भारत यह जानता था कि जो समुद्र को समझता है, वही जमीन को सुरक्षित रख सकता है और इसी ज्ञान का सबसे बड़ा प्रतीक था एक मंदिर, जो सिर्फ पूजा का स्थल नहीं था बल्कि हिंद महासागर से जुड़ी एक पूरी सभ्यता का प्रवेश-द्वार था। उस मंदिर का नाम था- ‘सोमनाथ’।

सोमनाथ को केवल इतिहास की एक अलग-थलग घटना के रूप में देखना एक बड़ी ऐतिहासिक भूल है। आम तौर पर इसे महज इतना समझ लिया जाता है कि गजनी आया, मंदिर टूटा और कहानी समाप्त हो गया। जबकि सच यह है कि सोमनाथ एक लंबी और सुनियोजित श्रृंखला का पहला बड़ा प्रहार था। उस भारतीय समुद्री सभ्यता पर, जो सदियों से हिंद महासागर को अपने नियमों पर चला रही थी। अगर हम सोमनाथ को कच्छ, भरूच, सूरत, कोंकण और अंत में गोवा से जोड़कर नहीं देखते, तो इतिहास का असली पैटर्न कभी सामने ही नहीं आएगा।

11वीं सदी से पहले भारत को केवल जमीन तक सीमित मानना, उसके इतिहास को अधूरा पढ़ने जैसा है। भारत उस दौर में एक  मैरी-टाइम पावर विदाउट एम्पायर था (maritime power without empire)। एक ऐसी समुद्री शक्ति, जो उपनिवेश नहीं बनाती थी लेकिन महासागरों में मौजूद थी। अरब सागर और हिंद महासागर में भारतीय व्यापारी, नाविक और तीर्थयात्री बिना किसी डर के आवाजाही करते थे।

पहली सदी का यूनानी ग्रंथ टपेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रीअन सीट (Periplus of the Erythraean Sea) यानी, एरिथ्रियन सागर का समुद्री वृत्तांत साफ बताता है कि भारत का व्यापारिक नेटवर्क ओमान, यमन, बसरा और पूर्वी अफ्रीका तक फैला हुआ था।

ये सारी बातें सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं हैं। भारत की समुद्री समझ कोई खोई हुई कहानी नहीं बल्कि एक जीवित परंपरा है बल्कि इसीका एक उदाहरण आज हमारे सामने है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक सलाहकार Sanjeev Sanyal इन दिनों INSV कौंडिन्य नाम के एक खास जहाज की यात्रा पर हैं।  संजीव सान्याल खुद इस जहाज पर सवार होकर रोजाना इस यात्रा के अपडेट भी शेयर कर रहे हैं।

ये जहाज इसलिए भी खास है क्योंकि यह कोई आम नौसेना का जहाज नहीं है। यह जहाज बिल्कुल उसी तरह बनाया गया है, जैसे हजार साल पहले भारतीय व्यापारी जहाज बनाए जाते थे। इसमें एक भी लोहे की कील नहीं है। पूरा जहाज नारियल की रस्सियों से सिला हुआ है। यानी वही तकनीक, जिससे भारत मजबूती से कभी समुद्रों में मौजूद था।  इस  INSV कौंडिन्य जहाज की यात्रा गुजरात से शुरू हुई है और ओमान तक, लगभग 1400 किलोमीटर का समुद्री सफर तय कर रही है। भारतीय नौसेना का यह विशेष अभियान दुनिया को यह दिखाने के लिए है कि भारत की समुद्री विरासत कोई हवा हवाई बातें नहीं, बल्कि ये एक जाँची परखी, व्यावहारिक और वैश्विक प्रणाली रही है।

यह व्यवस्था किसी एक केंद्र से संचालित होने वाला सिस्टम नहीं थी, बल्कि कई हाथों में बँटा हुआ, फिर भी मजबूती से काम करने वाला एक डिसेंट्रलाइज्ड नेटवर्क था। इसका केंद्र राज्य नहीं, बल्कि मंदिर थे। मध्यकालीन भारत में विशेषकर 10वीं से 12वीं सदी के चोल और सोलंकी काल में मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं थे, बल्कि उस समय की अर्थव्यवस्था के केंद्रीय वित्तीय संस्थान के रूप में काम करते थे।

राजा और व्यापारी अपनी आय का बड़ा हिस्सा मंदिरों को दान करते थे, जिसे मंदिर तिजोरियों में बंद नहीं रखते थे। यह पूंजी व्यापारी गिल्डों और मर्चेंट यूनियनों को ब्याज पर दी जाती थी, ताकि वे सुमात्रा, जावा, जांजीबार और पूर्वी अफ्रीका तक की जोखिमपूर्ण समुद्री यात्राएँ कर सकें। समुद्र पार व्यापार में डूबते जहाज, लूट और मौसम जैसे बड़े जोखिम शामिल थे, जिन्हें कोई अकेला व्यापारी नहीं झेल सकता था लेकिन मंदिरों का विशाल खजाना इन नुकसानों को सहन कर सकता था। सफल होकर लौटने पर व्यापारी मुनाफे का एक हिस्सा मंदिर को अर्पित करते थे।

हिंदू समुद्री व्यापार संस्थागत था और इसमें मणिग्रामम और ऐन्नुरुवर जैसी श्रेणियाँ थीं, जिन्हें ‘पाँच सौ स्वामी’ भी कहा जाता था। इनके पास अपनी निजी सेनाएँ और नौसेनाएँ होती थीं, जो समुद्री डाकुओं से जहाजों की रक्षा करती थीं। पश्चिमी भारत में इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा केंद्र था सोमनाथ। प्रभास पाटन का बंदरगाह हड़प्पा काल से सक्रिय था। रोमन साम्राज्य से लेकर पश्चिम एशिया और अफ्रीका तक का व्यापार यहीं से ऑपरेट होता था। द्वारका से लेकर सोमनाथ और खंभात तक फैला तटीय मार्ग केवल व्यापार का नहीं बल्कि तीर्थ, संस्कृति और सामाजिक जुड़ाव का मार्ग था। इस तरह से सोमनाथ केवल भगवान शिव का निवास नहीं था। वह समुद्री भारत का फाइनेंशियल, सांस्कृतिक और कानूनी केंद्र था।

इस्लाम की एंट्री और उम्मा का इकॉनमी आतंक

सातवीं सदी के बाद हिंद महासागर में अरब और फारसी व्यापारी उभरे, जिन्होंने अंजुवन्नम जैसे व्यापारिक संघ बनाए। हिंदू नेटवर्क जहाँ मंदिर और गिल्ड्स पर आधारित था तो वहीं जबकि इस्लामिक नेटवर्क मस्जिद और बाजार पर। दसवीं-ग्यारहवीं सदी तक मुस्लिम नेटवर्क ने हिंदू व्यापारियों को पीछे धकेलना शुरू किया।

इसी दौरान महमूद गजनवी का सोमनाथ हमला हुआ, एक सुनियोजित रणनीति, जिसमें लगभग 20 मिलियन दीनार की संपत्ति लूटी गई। सोमनाथ टूटने के बाद वहाँ मस्जिद नहीं बनी क्योंकि इसका उद्देश्य धर्म परिवर्तन नहीं बल्कि मंदिर की आर्थिक और कानूनी भूमिका समाप्त करना था। शिवलिंग का खंडन उस कानूनी-आर्थिक इकाई को खत्म करने जैसा था।

खिलाफत और इस्लामी सल्तनतों के लिए व्यापार पैसा कमाने की चीज नहीं बल्कि सत्ता बढ़ाने की रणनीति था। जब उन्होंने देखा कि हिंद महासागर का बड़ा हिस्सा एक ऐसे नेटवर्क के सहारे चल रहा है, जिसे न तलवार से जीता जा सकता है और न सीधे कंट्रोल किया जा सकता है, तो उन्होंने रास्ता बदल लिया और सीधी लड़ाई की जगह उस नेटवर्क की रीढ़ तोड़ने पर ध्यान दिया। इसी रणनीति का पहला बड़ा, प्रतीकात्मक वार था, गजनी के महमूद का सोमनाथ अभियान।

सोमनाथ के साथ केवल मंदिर नहीं टूटा बल्कि भारतीय समुद्री आत्मविश्वास भी क्षतिग्रस्त हुआ। यह हमला भारत को धार्मिक नुकसान के साथ-साथ स्ट्रेटेजिक और आर्थिक कमजोरियाँ पहुँचाने के लिए किया गया था। सोमनाथ उस समय समुद्री भारत का प्रतीक था और हमला हिंदू टेम्पल ट्रेड नेटवर्क पर निशाना था। उद्देश्य था सभ्यतागत मनोबल तोड़ना, जिसे आज हम अयोध्या, काशी और सोमनाथ में कल्चरल इकॉनमी के रूप में देख सकते हैं।

इस्लामिक आक्रमणों के बाद, धीरे-धीरे धर्मशास्त्रों में समुद्र पार करने को ‘काला पानी’ कहकर सामाजिक रूप से हतोत्साहित किया जाने लगा। यह एक भू-राजनीतिक हार को सामाजिक नियम में बदलने जैसा था। राधाकुमुद मुकर्जी अपनी किताब में बताते हैं कि कैसे प्राचीन भारत की जीवंत नेविगेशन परंपरा मध्यकाल में शिथिल हो गई। 

यहीं एक अहम तुलना नजर आती है। जब पश्चिम में गजनी सोमनाथ को लूट रहा था, उसी समय पूर्व में राजेंद्र चोल अपनी नौसेना के साथ सुमात्रा पर आक्रमण कर रहे थे। चोलों ने आक्रामक नौसैनिक अभियानों से समुद्र में अपनी शक्ति दिखाई। वहीं. गुजरात और सोलंकी राजवंश वाले क्षेत्रों ने समुद्र को कभी कम नहीं आँका। उन्होंने इसे अपनी ताकत बनाया- एक ओर रक्षा के लिए ताकि दुश्मन आए तो समुद्री रास्तों से मुँहतोड़ जवाब दिया जा सके और दूसरी ओर व्यापार से आय बढ़ाने के लिए।

गजनी के हमले ने भारत की पश्चिमी भुजा को काट दिया। लेकिन भारत की पूर्वी भुजा कुछ और सदियों तक सक्रिय रही। यही कारण है कि भारत की समुद्री सभ्यता एक दिन में नहीं गिरी। उसे हिस्सों में तोड़ा गया।

सोमनाथ मंदिर परिसर में खड़ा ‘बाण स्तंभ’ इसका साफ सबूत है। यह स्तंभ दिखाता है कि प्राचीन भारतीय नाविकों को दिशा की समझ थी, खगोल का ज्ञान था और उन्हें यह भी पता था कि पृथ्वी गोल है। स्तंभ पर लिखा है कि इस बिंदु से दक्षिण ध्रुव तक कोई जमीनी रुकावट नहीं है। आज के उपग्रहों ने साबित कर दिया है कि यह बात सही है।

सोमनाथ के बाद यही कहानी पूरे पश्चिमी तट पर दोहराई गई। भरूच, कोंकण और सौराष्ट्र के पुराने व्यापारिक नगर धीरे-धीरे दबाव में आने लगे। दिल्ली सल्तनत और उसके बाद मुगल साम्राज्य मूल रूप से जमीन पर टिकी हुई ताकतें थीं। उनकी शक्ति खेतों, किलों और सेनाओं पर थी, समुद्र पर नहीं। उन्होंने कभी एक मजबूत और संगठित नौसेना खड़ी करने की गंभीर कोशिश नहीं की।

यहाँ तक कि मुगलों को अपनी हज यात्राओं की सुरक्षा के लिए भी विदेशी नाविकों और बेड़ों पर निर्भर रहना पड़ा। यानी समुद्र उनके लिए शक्ति स्थापित करने का क्षेत्र नहीं था बल्कि एक ऐसी जगह थी जिसे दूसरों के भरोसे छोड़ा गया था। और यही दूरी धीरे-धीरे भारत को उसके समुद्र से और दूर ले जाती चली गई।

मुगल काल

1299 में जब अलाउद्दीन खिलजी की सेनाएँ दोबारा सोमनाथ पहुँचीं, तो मंदिर फिर तोड़ा गया और गुजरात को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया। इसके साथ ही केवल एक धार्मिक स्थल नहीं गिरा, बल्कि उस पूरे समुद्री तंत्र पर पहला स्थायी प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित हुआ। 14वीं सदी में गुजरात सल्तनत स्वतंत्र हुई। 15वीं सदी में यह प्रक्रिया और आगे बढ़ी, जब बहमनी सल्तनत और उससे निकली आदिलशाही ने कोंकण और गोवा पर कब्जा कर लिया। गोवा, जो कभी कदंब और फिर विजयनगर साम्राज्य का हिस्सा था, अब मुस्लिम शासन के अधीन चला गया। पश्चिमी तट पर हिंदू समुद्री प्रभुत्व की आखिरी बड़ी कड़ी भी यहीं टूट गई।

जहाँ-जहाँ इस्लामी व्यापारिक प्रभाव पहुँचा वहाँ केवल कारोबार नहीं फैला बल्कि मस्जिदें, सराय और स्थायी समुदाय भी स्थापित हुए। यह महज धर्म का प्रसार नहीं बल्कि खलीफाओं और इस्लामी सत्ता केंद्रों के संरक्षण में पनपा एक संगठित, समुदाय-आधारित व्यापारिक नेटवर्क था। इसी दौर में हिंद महासागर एक आर्थिक मार्ग से बदलकर राजनीतिक‑धार्मिक नेटवर्क का विस्तार बन गया।

उसी समय भारत का समुद्र से मानसिक जुड़ाव कमजोर पड़ चुका था। परिणामस्वरूप 15वीं सदी में जब पुर्तगाली गोवा पहुँचे तो उन्हें किसी संगठित भारतीय नौसेना का सामना नहीं करना पड़ा। 1498 में वास्को‑डी‑गामा एक ऐसे समुद्र में दाखिल हुआ जो कभी भारतीय जहाजों से भरा रहता था लेकिन अब लगभग खाली था। पुर्तगाली व्यापार नहीं, समुद्र पर प्रभुत्व स्थापित करने आए थे और 16वीं सदी तक उन्होंने हिंदू‑नेतृत्व वाले समुद्री नेटवर्क को लगभग समाप्त कर दिया।

11वीं से 16वीं सदी के बीच यह प्रक्रिया चरणबद्ध रही यानी पहले प्रतीक टूटे, फिर संस्थान कमजोर हुए, फिर प्रशासन बदला और अंततः समुद्र हाथ से निकल गया। महमूद गजनी ने जिसे प्रतीकात्मक रूप से शुरू किया उसे यूरोपीय शक्तियों ने संरचनात्मक रूप से पूरा किया। यह दो नेटवर्कों की टक्कर थी- एक विकेंद्रीकृत हिंदू टेम्पल नेटवर्क और दूसरा राज्य‑समर्थित, केंद्रीकृत इस्लामिक नेटवर्क। नतीजा यह हुआ कि भारत को धीरे‑धीरे उसके ही समुद्र से काट दिया गया और सदियों का समुद्री प्रभुत्व खो गया।

1951 में सोमनाथ का पुनर्निर्माण उस समुद्री भारत की स्मृति को वापस लाने का प्रयास था, जिसे सदियों पहले रणनीतिक रूप से मिटा दिया गया था। सरदार वल्लभभाई पटेल इसे सभ्यतागत आत्मविश्वास की वापसी मानते थे जबकि जवाहरलाल नेहरू तो इसे भारत के सेक्युलर ढाँचे के लिए खतरा मानते थे। इस करण वो हमेशा आशंकित ही रहे और यह आशंका दरअसल उस आत्मविश्वास की थी, जो समुद्र के रास्ते फिर लौट सकता था।

अल-बरूनी ने बहुत पहले लिखा था कि हिंदू अपने राज्य हार सकते हैं, अपने देवता नहीं। आज इसे थोड़ा और आगे बढ़ाकर कहा जा सकता है कि हिंदू सभ्यता को समुद्र से काटा जा सकता है लेकिन समुद्र की स्मृति उससे छीनी नहीं जा सकती। सोमनाथ से गोवा तक की यह कहानी सिर्फ मंदिर बनाम मस्जिद की नहीं है। यह उस क्षण की कहानी है जब एक सभ्यता को समझ में आ गया कि उसे हराने के लिए पहले उसे उसके समुद्र से अलग करना होगा।

Indo-Pacific में भारत की वापसी: एक अधूरी सभ्यता का पुनरागमन

मुगलों के आक्रमणों और उसके बाद की राजनीतिक प्रक्रियाओं ने सोमनाथ से गोवा तक भारत को धीरे-धीरे उसके समुद्र से काट दिया। लेकिन इतिहास कभी सीधी रेखा में नहीं चलता- सभ्यताएँ गिरती नहीं बल्कि लंबी अवधि में बदलाव के दौर लेती हैं। इसलिए आज जब हम ‘इंडो-पैसिफिक’ में भारत की मौजूदगी देखते हैं तो यह कोई अचानक बनी रणनीति नहीं बल्कि उस यात्रा की वापसी जैसी है जो लगभग हजार साल से अधूरी रही।

अक्सर ‘इंडो-पैसिफिक’ को अमेरिकी रणनीति या चीन-विरोधी गठबंधन के नजरिए से देखा जाता है, लेकिन यह अधूरा दृष्टिकोण है। यह क्षेत्र वही है जहाँ कभी भारतीय व्यापार, संस्कृति और नौसैनिक प्रभाव बिना औपनिवेशिक हस्तक्षेप के फैला हुआ था। चोल साम्राज्य की नौसैनिक यात्राएँ, दक्षिण-पूर्व एशिया में मौजूद भारतीय मंदिर और संस्कृत-तमिल शिलालेख इस बात के प्रमाण हैं कि भारत कभी केवल एक महाद्वीपीय राज्य नहीं बल्कि एक समुद्री सभ्यता था।

इतिहासकार के.ए. नीलकांत शास्त्री और आर.सी. मजूमदार बताते हैं कि चोल नौसेना ने श्रीलंका, सुमात्रा और मलय प्रायद्वीप तक सैन्य अभियान तो चलाए ही, साथ ही साथ व्यापारिक और सांस्कृतिक मार्गों को भी सुरक्षित किया। यह कोई औपनिवेशिक कब्ज़ा नहीं था बल्कि ये कनेक्टिविटी और सिक्योरिटी का मॉडल था।

यही मॉडल पश्चिमी भारत में मंदिर-आधारित समुद्री नेटवर्क के रूप में दिखता है। समुद्र यहाँ अधिकार थोपने का साधन नहीं था बल्कि नियंत्रण का माध्यम था। इसीलिए भारत की मौजूदगी समुद्रों में थी लेकिन भारतीय साम्राज्य समुद्रों पर नहीं थोपे गए। भारत का समुद्री स्वभाव वर्चस्व का नहीं, प्रवाह का था।

गजनी से गोवा तक की ऐतिहासिक प्रक्रिया ने भारत को समुद्र से काट दिया और इसका सबसे गहरा असर यह हुआ कि भारत ने अपनी समुद्री कल्पना ही खो दी मुगल काल में शक्ति जमीन पर केंद्रित रही समुद्र को या तो अनदेखा किया गया या दूसरों के भरोसे छोड़ दिया गया अंग्रेजों के आने के साथ यह दूरी स्थायी हो गई और समुद्र भारतीय चेतना से लगभग अलग हो गया यही कारण है कि आजादी के बाद भी भारत दशकों तक एक जमीन-केंद्रित राज्य बना रहा

21वीं सदी में हालात बदल गए चीन का समुद्री विस्तार साउथ चाइना सी का सैन्यीकरण और हिंद महासागर में बढ़ती चीनी मौजूदगी ने भारत को वही सवाल फिर याद दिलाया जो सोमनाथ के बाद धीरे-धीरे भुला दिया गया था समुद्र किसका है यही सवाल भारत की इंडो-पैसिफिक सोच को सही संदर्भ में समझने की कुंजी है।

भारत आज हिंद महासागर क्षेत्र में नौसैनिक साझेदारियाँ बना रहा है, QUAD जैसे ढाँचों में शामिल हो रहा है और अपनी नौसेना को कैरियर केंद्रित बना रहा है यह किसी पश्चिमी एजेंडे की नकल नहीं बल्कि हमारी सभ्यतागत स्मृति की वापसी है INS विक्रांत या अंडमान-निकोबार कमान केवल सैन्य ठिकाने नहीं हैं वे उस टूटे हुए समुद्री भारत के प्रतीक हैं जो दोबारा खड़ा हो रहा है

इंडो-पैसिफिक हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाला विशाल क्षेत्र है जहाँ आज दुनिया का आधे से ज्यादा व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक गतिविधियाँ केंद्रित हैं भारत इसे स्वतंत्र, खुला और समावेशी इंडो-पैसिफिक कहता है इसका मतलब यह नहीं कि भारत प्रभुत्व चाहता है बल्कि यह कि कोई एक ताकत समुद्र को अपनी जागीर न बना ले 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शांग्री-ला डायलॉग में इसी दृष्टि को स्पष्ट किया था उन्होंने इंडो-पैसिफिक को वह जगह बताया जहाँ सभी देश प्रगति और समृद्धि के लिए साथ आ सकते हैं

यह कोई संयोग नहीं कि भारत आज नियम-आधारित व्यवस्था की बात करता है इसका अर्थ है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में नियम लागू हों मनमानी नहीं यह वही मॉडल है जो कभी हिंदू मंदिर नेटवर्क में था जहाँ व्यापार नियमों से चलता था तलवार से नहीं जहाँ समुद्र संपर्क का माध्यम था वर्चस्व का नहीं भारत की कोशिश यही है कि क्षेत्र में शांति बनी रहे व्यापार बढ़े और कोई दबंगई न करे।

यही कारण है कि भारत का इंडो-पैसिफिक दृष्टिकोण अमेरिकी या चीनी मॉडल से अलग दिखता है। चीन जहाँ समुद्र को शक्ति और ऋण के जरिए नियंत्रित करना चाहता है तो वहीं भारत सांस्कृतिक परिचितता, व्यापार की निरंतरता और रणनीतिक संयम पर जोर देता है। यह कोई नई नीति नहीं है बल्कि प्राचीन समुद्री सभ्यता की घर वापसी है।

अगर सोमनाथ उस क्षण का प्रतीक था जब भारत को समुद्र से काटा गया, तो इंडो-पैसिफिक में भारत की वापसी उस क्षण का संकेत है जब एक सभ्यता अपनी अधूरी कहानी को फिर से लिखना शुरू करती है। यह कहानी अभी पूरी नहीं हुई है लेकिन इतना तय है कि जो सभ्यता कभी हिंद महासागर की धड़कन थी, वह हमेशा के लिए किनारे पर नहीं रह सकती।

और शायद इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है। सोमनाथ का टूटना भारत की समुद्री हार नहीं था लेकिन उसी क्षण से समुद्र भारत की कहानी से बाहर होना शुरू हो गया। आज जो लौट रहा है, वह समुद्र नहीं बल्कि भारत की वही भूली हुई सभ्यतागत आदत है। यही हमारी समुद्री स्मृति है और शायद इसी स्मृति का पर्व हम आज सोमनाथ में मना रहे हैं।

कर्नाटक के विज्ञापन का 69% हिस्सा सिर्फ कॉन्ग्रेस की नेशनल हेराल्ड को, रीडरशिप-O: जानें- कैसे जनता की गाढ़ी कमाई रिश्वतखोरी में उड़ा रही सिद्धारमैय्या सरकार

कर्नाटक सरकार ने कथित तौर पर विवादित अखबार नेशनल हेराल्ड को किसी भी अन्य राष्ट्रीय दैनिक अखबार से ज्यादा विज्ञापन के लिए पैसे दिए हैं, जिससे जनता के पैसों के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई जा रही है। आधिकारिक दस्तावेजों से पता चला है कि नेशनल हेराल्ड को सरकार के विज्ञापन बजट से करोड़ों रुपए मिले, जबकि राज्य में इसका डिस्ट्रीब्यूशन लगभग नहीं के बराबर है और पाठक संख्या भी लगभग शून्य है।

डेटा से सामने आया है कि नेशनल हेराल्ड को 2023–2024 में 1.90 करोड़ रुपए दिए गए और 2024–2025 में लगभग 1 करोड़ रुपए (यानी 99 लाख रुपए), जबकि प्रतिष्ठित राष्ट्रीय अखबारों को काफी कम रकम मिली, कई को तो दिए गए राशि का आधा से भी कम मिला।

सरकार ने 2024–2025 में राष्ट्रीय प्रकाशनों पर विज्ञापन के लिए 1.42 करोड़ रुपए खर्च किए, जिसमें से अकेले 69% हिस्सा नेशनल हेराल्ड को दिया गया। वहीं, उसी समय प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक अखबार खाली हाथ रहे। पिछले तीन सालों में सरकार ने नेशनल हेराल्ड के लिए विज्ञापन पर 4.31 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए हैं, जो किसी भी राष्ट्रीय मीडिया पर हुए खर्च से सबसे ज्यादा है।

सरकार ने 2025–2026 के लिए पहले ही 99 लाख रुपए जारी कर दिए हैं। दिलचस्प बात यह है कि सूचना विभाग की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के पास है। पिछले दो वित्तीय वर्षों में नेशनल हेराल्ड राष्ट्रीय अखबारों में कर्नाटक के विज्ञापन बजट का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता रहा है, भले ही इसके पाठकों की संख्या बेहद कम हो।

खुली लूट, दिनदहाड़े डकैती: बीजेपी का हमला, कॉन्ग्रेस ने किया बचाव

कर्नाटक सरकार के इस कारनामे का खुलासा होने के बाद से राज्य में राजनीतिक हंगामा मच गया है। विपक्ष ने इस फैसले की कड़ी निंदा की है, जबकि सत्ताधारी दल ने इसका बेबाकी से बचाव किया। बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री डॉ. सीएन अश्वथ नारायण ने इसे “टैक्सपेयर्स के पैसे की खुली लूट” करार दिया। उन्होंने कहा कि नेशनल हेराल्ड पहले से ही प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जाँच के दायरे में है।

नारायण ने कहा, “कर्नाटक या कहीं और सर्कुलेशन न होने वाले अखबार को जनता का पैसा क्यों दिया जाए? ऐसी संस्था से, जो पहले से गंभीर आर्थिक जाँच का सामना कर रही है, सरकारी फंड क्यों जोड़े जाएँ?”

केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने भी इसी तरह हमला बोला और कहा कि नेशनल हेराल्ड को किसी भी स्थापित अखबार से ज्यादा विज्ञापन राजस्व मिलना अपने आप में एक घोटाला है। उन्होंने कहा, “इस तथाकथित मालिक सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी इस घोटाले में जाँच के दायरे में हैं और फिलहाल जमानत पर हैं।”

हालाँकि, कर्नाटक के मंत्री ईश्वर खंद्रे ने ईडी की जाँच को ही ‘एंटी-नेशनल’ बता दिया और सवालिया लहजे में पूछा, “नेशनल हेराल्ड को विज्ञापन देने में क्या गलत है?” उन्होंने बीजेपी पर मामले को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया। हैरानी की बात ये है कि उन्होंने सीधे-सीधे लूट-खसोट के आरोपों को देशभक्ति से जोड़ दिया, जबकि सारी दुनिया को पता है कि नेशनल हेराल्ड के मालिकान कौन हैं और उन पर कैसे आरोप दर्ज हैं।

ईश्वर खंद्रे ने ही नहीं, कर्नाटक के एक और मंत्री ने भी सिद्धारमैय्या सरकार के इस फैसले का बचाव किया। कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के सुपुत्र और कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक खड़गे ने आरएसएस तक को मामले में घसीट लिया। उन्होंने बीजेपी से ‘ऑर्गनाइजर’ मैगजीन की फाइनेंशियल डिटेल्स भी माँग ली।

खड़गे ने कहा, “बीजेपी को आरएसएस की मैगजीन ऑर्गनाइजर की फंडिंग के बारे में चिंता करनी चाहिए, न कि नेशनल हेराल्ड की। उनके पास बैंक अकाउंट्स नहीं हैं और वे रजिस्टर्ड तक नहीं हैं। यहाँ सब क्लियर है। नेशनल हेराल्ड नाम का संस्थान कानूनी तौर पर रजिस्टर्ड है। उसे सरकारी और कॉरपोरेट संस्थान भी विज्ञापन देते हैं। ऐसे में इस तरह की बातों को लेकर क्या कोई कानून है कि नेशनल हेराल्ड को विज्ञापन न दिया जाए। अगर ऐसा कोई कानून है, तो हमें भी बताया जाए कि हम कौन से कानून का उल्लंघन कर रहे हैं।”

उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने भी बढ़ती आलोचना के बीच सरकार के फैसले का बचाव किया। उन्होंने जोर देकर कहा, “कोई भी सरकार किसी भी मीडिया संस्था को विज्ञापन दे सकती है जिसे वो अपना काम करते हुए लगे। हमने कई अन्य राज्यों को कन्नड़ अखबारों को विज्ञापन देते देखा है। वो क्या कर रहे हैं? क्या हम उनसे सवाल करेंगे? इसमें कुछ गलत नहीं है।”

राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता ने इसका जवाब देते हुए कहा कि शिवकुमार खुद नेशनल हेराल्ड मामले में जमानत पर हैं, फिर भी सिद्धारमैया कॉन्ग्रेस से जुड़ी संस्था को सरकारी खजाने से पैसे पहुँचा रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया, “कर्नाटक सरकार का विज्ञापन राजस्व नेशनल हेराल्ड की कुल कमाई का 69% बनता है, जबकि बाकी सभी स्रोतों से सिर्फ 31% योगदान है। यह दिनदहाड़े डकैती है।”

शिवकुमार ने पिछले साल माना था कि उन्होंने नेशनल हेराल्ड को 25 लाख रुपए दिए थे, यह दावा करते हुए कि यह पार्टी द्वारा संचालित प्रकाशन है। यह बयान तब आया जब उनके भाई डीके सुरेश और तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को ईडी की चार्जशीट में शामिल किया गया।

बीजेपी ने फिलहाल सिद्धारमैया सरकार से अपने इस कदम का जवाब देने और विज्ञापन फंड वितरण के मानदंडों की पूरी व्याख्या करने की माँग की है।

इस बीच कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा (पार्टी के मीडिया एवं प्रचार विभाग के प्रमुख भी हैं) ने कहा, “नेशनल हेराल्ड आजादी के समय से राष्ट्रीय धरोहर है। अगर मीडिया को ही फंड दिए जाते हैं तो मीडिया को क्या समस्या है।” यह बात उन्होंने सीएनएन-न्यूज18 को दिए इंटरव्यू में कही और पुरानी संस्थाओं को समर्थन देना उचित बताया।

नेशनल हेराल्ड का इतिहास और घोटाले की शुरुआत

नेशनल हेराल्ड प्रवर्तन निदेशालय की मनी लॉन्ड्रिंग जाँच के केंद्र में है, जो इसके मूल कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) से जुड़ी है। सोनिया गाँधी और उनके बेटे राहुल गाँधी इस मामले में आरोपित बनाए गए हैं, साथ ही अन्य कॉन्ग्रेस नेताओं के नाम भी हैं।

पंडित जवाहरलाल नेहरू और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने 1938 में नेशनल हेराल्ड की स्थापना की थी, जो भारत की आजादी के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी का मुखपत्र बन गया। नेशनल हेराल्ड अखबार एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) द्वारा प्रकाशित किया जाता था। अप्रैल 2008 तक एजेएल पर कॉन्ग्रेस का 90.26 करोड़ रुपए का बकाया था। पार्टी ने समय-समय पर एजेएल को शून्य प्रतिशत ब्याज पर लोन दिए ताकि यह चलता रहे, लेकिन 2008 में यह अस्थिरता के कारण बंद हो गया।

इसके बाद 2010 में यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड (वाईआईएल) नाम से एक नई कंपनी बनाई गई। इसमें सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, मोटीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडिस जैसे प्रमुख कॉन्ग्रेसी शामिल थे। पार्टी ने अपने 90 करोड़ रुपए के बकाए की वसूली के अधिकार इस नई कंपनी को मात्र 50 लाख रुपए में ट्रांसफर कर दिए, जिससे यंग इंडियन को एजेएल की बहुमत हिस्सेदारी मिल गई।

एजेएल अपने कर्ज चुकाने में असमर्थ रहा और यंग इंडियन ने अधिकांश शेयर खरीदकर अंततः पूरी कंपनी हासिल कर ली। इसके परिणामस्वरूप सभी संपत्तियां गाँधी परिवार के नियंत्रण वाली संस्था के पास चली गईं। इसमें मुंबई, नई दिल्ली, लखनऊ, भोपाल, इंदौर, पटना आदि प्रमुख शहरों में स्थित अचल संपत्तियाँ शामिल थीं, जिनकी कीमत 2000 करोड़ रुपए से ज्यादा बताई जाती है।

यंग इंडियन ने बाद में घोषणा की कि अखबार प्रकाशित करना उसका उद्देश्य नहीं है, लेकिन फिर भी इस गैर-लाभकारी संस्था ने 2016 में डिजिटल फॉर्मेट में नेशनल हेराल्ड सहित तीन अखबार दोबारा प्रकाशित करना शुरू किया। 2011 में सुब्रमण्यम स्वामी ने दावा किया कि गाँधी परिवार ने यंग इंडियन बनाकर एजेएल की अचल संपत्तियों पर कब्जा करने की योजना बनाई।

उन्होंने इस मामले को अदालत में ले जाकर राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी पर अपनी पार्टी को ठगने का आरोप लगाया। स्वामी ने कहा कि यंग इंडियन ने 90.26 करोड़ रुपए का कर्ज मात्र 50 लाख रुपए में खत्म कर दिया। उनके अनुसार, पार्टी का एजेएल को व्यावसायिक आधार पर ऋण देना गैरकानूनी था।

कई सालों से चल रही जाँच

साल 2014 में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और अन्य को समन जारी किया। इसमें देखा गया कि यंग इंडियन एक ‘नकली ढाँचा’ लगता है जिसके जरिए सार्वजनिक संपत्तियों को निजी उपयोग में लाया गया। उसी साल ईडी और इनकम टैक्स विभाग ने अलग-अलग प्रारंभिक जाँच शुरू की। दिल्ली हाईकोर्ट ने गाँधी परिवार की अपील खारिज कर समन को बरकरार रखा। सोनिया और राहुल को कोर्ट में पेश होना पड़ा और जमानत मिली।

कुछ साल बाद, इनकम टैक्स विभाग की रिपोर्ट और स्वामी की शिकायत के आधार पर 2018 में ईडी ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत औपचारिक मामला दर्ज किया।

साल 2022 में जाँच और तेज हुई जब जुलाई में सोनिया से कई दौर की पूछताछ हुई और जून में राहुल से पाँच दिनों में 50 घंटे से ज्यादा पूछताछ की गई। यंग इंडियन और एजेएल से जुड़ी जगहों पर छापे मारे गए। 2022 में एक ट्रायल जज ने स्वामी की 2013 की शिकायत पर यंग इंडियन के खिलाफ इनकम टैक्स जाँच पर संज्ञान लिया, जिसके बाद ईडी ने पीएमएलए के आपराधिक प्रावधानों के तहत नया केस दर्ज किया।

साल 2023 में ईडी ने दिल्ली, मुंबई और लखनऊ में एजेएल की संपत्तियों को अस्थायी रूप से जब्त किया, जिनकी अनुमानित कीमत 750 करोड़ रुपए से ज्यादा थी। 2024 में कॉन्ग्रेस पदाधिकारियों और पूर्व एजेएल कर्मचारियों से और पूछताछ हुई और एजेंसी ने एक और पीएमएलए शिकायत दर्ज की।

पिछले साल ईडी ने दिल्ली की स्पेशल एमपी/एमएलए कोर्ट में सोनिया और राहुल को मुख्य आरोपित बनाते हुए पीएमएलए चार्जशीट दाखिल की। ईडी ने दिल्ली पुलिस के इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (ईओडब्ल्यू) को भी पत्र लिखकर नई एफआईआर दर्ज करने का अनुरोध किया।

इसके बाद आधिकारिक शिकायत दर्ज हुई जिसमें सोनिया और राहुल के साथ कॉन्ग्रेस नेता सुमन दुबे, सैम पित्रोदा और अज्ञात व्यक्तियों के नाम शामिल थे। हालाँकि, दिल्ली कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप खारिज कर दिए क्योंकि वे स्वामी की निजी शिकायत पर आधारित थे।

कोर्ट ने कहा कि दिल्ली पुलिस के ईओडब्ल्यू ने औपचारिक शिकायत दी है और जज ने ईडी के दावों की सत्यता पर विचार करना उचित नहीं समझा। फिर भी, कोर्ट ने कहा कि केंद्रीय एजेंसी अपनी जाँच जारी रख सकती है क्योंकि दिल्ली पुलिस ने औपचारिक शिकायत दर्ज की है।

यह ध्यान देने योग्य है कि नेशनल हेराल्ड मामले में आपराधिक साजिश, पार्टी फंड का दुरुपयोग, मनी लॉन्ड्रिंग, टैक्स चोरी, सार्वजनिक रूप से पट्टे पर दी गई जमीन का व्यावसायिक दुरुपयोग, धोखाधड़ी से कब्जा और जमीन हड़पने जैसे गंभीर आरोप हैं।

कॉन्ग्रेस के लिए कैश काउ बना कर्नाटक

कॉन्ग्रेस ने न केवल कर्नाटक के संसाधनों को अपनी सत्ता बरकरार रखने वाली मुफ्तखोरी की राजनीति के लिए खाली किया है, बल्कि राज्य की संपत्तियों का इस्तेमाल नेशनल हेराल्ड जैसी भ्रष्ट संस्था को सहारा देने के लिए भी किया है। यह सरकार द्वारा निजी हितों के लिए कमजोर खजाने का फायदा उठाने का एक और संदिग्ध कदम बनकर उभरा है।

कॉन्ग्रेस द्वारा ‘धरोहर संस्था’ कहा जाने वाला यह प्रकाशन तब तक शायद ऐसा कहलाने लायक होता, यदि कॉन्ग्रेस की भ्रष्ट प्रथाओं का इतिहास न होता। लेकिन अब गंभीर आरोपों के चलते यह उससे बहुत दूर हो चुका है। सरदार वल्लभभाई पटेल ने भी नेशनल हेराल्ड के भीतर की चालाकी पर प्रकाश डाला था, जिसे नेहरू ने हमेशा की तरह खारिज कर दिया। इस मामले में भी ग्रैंड ओल्ड पार्टी ने साबित कर दिया है कि “जितना बदलाव होता है, उतना ही सब कुछ पहले जैसा रहता है।”

इसके अलावा कॉन्ग्रेस नेताओं ने इस कदम का बचाव किया और आरएसएस को घसीटने की कोशिश की, यह भूलकर कि आरएसएस का प्रकाशन ‘ऑर्गनाइजर’ न तो किसी भ्रष्टाचार में फंसा है और न ही ऐसे किसी आरोप का सामना कर रहा है।

कॉन्ग्रेस से निष्पक्षता और ईमानदारी की उम्मीद करना यूनिकॉर्न की तलाश करने जैसा है। लेकिन उस पौराणिक जीव को ढूँढने की संभावना इससे ज्यादा है जितनी कॉन्ग्रेस से ईमानदारी की। इसके अलावा कॉन्ग्रेस के भ्रष्टाचार से भरे ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए ये कदम हैरान करने वाले नहीं हैं।

वह पार्टी जो कभी ‘Iron Hand’ से शासन करती थी, 2014 में अपने घोटालों की भयानक मात्रा के कारण सत्ता से बाहर हो गई और तब से देश के कुछ ही हिस्सों तक सीमित रह गई है। अब यह जहाँ-जहाँ सत्ता में है, वहाँ से अपनी भ्रष्ट विरासत को बनाए रखने के लिए जो कुछ कर सकती है, कर रही है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

US ने 64 साल पहले वियतनाम में शुरू किया था ‘ऑपरेशन रैंच हैंड’, अब भी दोनों तरफ दिखते हैं तबाही के निशान: जानें- पीढ़ियों को दिए किस तरह के जख्म

अमेरिका ने 10 जनवरी 1962 को वियतनाम में चलाया था ऐसा सैन्य अभियान, जिसमें उसने पूरी ताकत लगा दी और सारी दुनिया में उस ताकत की नुमाइश भी की, लेकिन उस लड़ाई में अमेरिका को मिली हार। ऐसी हार, जिसका असर आज तक दिखता है। अमेरिका ने इस लड़ाई को जीतने के लिए जो सबसे बड़ा अभियान चलाया था, उसने वियतनाम को ऐसे घाव दिए जिसके जख्म आज तक दिखते हैं। ये ऑपरेशन था ‘रैंच हैंड’।

यूँ तो ‘ऑपरेशन रैंच हैंड’ का उद्देश्य था जंगलों को उजाड़ना, ताकि वो वियत कॉन्ग और उत्तरी वियतनामी बलों पर हावी हो सके, लेकिन इसमें न सिर्फ उसे करारी हार का मुँह देखना पड़ा, बल्कि उसने वियतनाम की जल, जंगल, जमीन… सबकुछ तबाह करके रख दिया।

क्या था ऑपरेशन रैंच हैंड?

अमेरिकी रणनीतिकारों का मानना था कि घने जंगल और फसलें वियत कॉन्ग (कम्युनिस्ट गुरिल्ला लड़ाकों ) की सबसे बड़ी ताकत हैं। इसलिए ‘एरिया-डिनायल’ के नाम पर पेड़-पौधों को खत्म कर दिया जाए।

1962 में शुरू हुआ ऑपरेशन ‘रैंच हैंड’ 1971 तक चला। इसको काफी बड़े पैमाने पर किया गया था, जिसमें दक्षिणी वियतनाम के बड़े हिस्से, मैंग्रोव वन, नदियों के किनारे और कृषि भूमि निशाने पर रहे।

एजेंट ऑरेंज सबसे तेज असर दिखाने वाला रसायन था, इसलिए उसका इस्तेमाल सबसे ज्यादा हुआ। समस्या यह भी थी कि T- 2,4,5 के निर्माण में डाइऑक्सिन मिला, जो काफी ज्यादा मात्रा मिला था, जो दीर्घजीवी और जैव-श्रृंखला में जमा होने वाला जहर है। तत्काल प्रभाव जंगलों के पत्ते झड़ना था, लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव इंसानों और पर्यावरण पर पड़े, जिनकी कीमत कई पीढ़ियों ने चुकाई।

रसायनकि हथियारों ने वियतनाम की पीढ़ियाँ कर दी बर्बाद

अमेरिकी वायुसेना के C-123 विमानों से 1962 से 1971 के बीच वियतनाम, लाओस और कंबोडिया के हिस्सों में लगभग 1.9 करोड़ गैलन शाकनाशी रसायनों का छिड़काव किया गया। इनमें सबसे ज्यादा इस्तेमाल हुआ एजेंट ऑरेंज, जो 2,4-D और 2,4,5-T का मिश्रण था और इसी के साथ आया घातक डाइऑक्सिन (TCDD)।

जंगल नष्ट हुए, खेत उजड़े, लेकिन दुश्मन नहीं रुका। बल्कि इसके विपरीत इस अभियान ने दशकों तक चलने वाली मानवीय और पर्यावरणीय त्रासदी को जन्म दिया। जन्मजात विकृतियाँ, कैंसर, त्वचा रोग, मानसिक-शारीरिक अपंगता, इन सबका असर वियतनामी नागरिकों और अमेरिकी सैनिकों ने झेला।

समय बीतने के साथ 2021 जब दुनिया ने काबुल में अमेरिकी दूतावास से हेलिकॉप्टरों द्वारा निकालने की तस्वीरें देखीं, तो 1975 के साइगोन पतन की याद ताजा हो गई। तकनीक, ताकत और दावे, सब धरे रह गए।

ऑपरेशन रैंच हैंड अमेरिका की उसी कहानी का अध्याय है, जहाँ सैन्य प्रयोग ने नैतिकता, राजनीति और मानवता, तीनों मोर्चों पर अमेरिका को निचोड़ कर रख दिया था।

पर्यावरण पर क्या पड़ा प्रभाव?

रैंच हैंड ने वियतनाम की प्रकृति और जीवों को गहरी चोट पहुँचाई। लाखों एकड़ जंगल और खेती योग्य जमीन बंजर हो गई। तटीय इलाकों के मैंग्रोव वन, जो तूफानों से रक्षा करते थे, बड़े पैमाने पर नष्ट हो गए। मिट्टी से पोषक तत्व खत्म हो गए, जैव-विविधता घटी और कई क्षेत्रों में आज भी खेती कठिन है।

डाइऑक्सिन मिट्टी और तलछट (नदी के अंदर) दशकों तक बना रहता है। यह पानी और भोजन के जरिये इंसानी शरीर में पहुँचता है, खासकर पशुओं के माध्यम से। नतीजा ये रहा कि युद्ध खत्म होने के बाद भी जहर खत्म नहीं हुआ।

वियतनाम और अमेरिकी सैनिक के स्वास्थ्य पर प्रभाव  

वियतनामी आँकलनों के मुताबिक लाखों लोग एजेंट ऑरेंज के संपर्क में आए और लाखों आज भी इसके स्वास्थ्य प्रभाव झेल रहे हैं। जन्मजात विकृतियाँ, अतिरिक्त उँगलियाँ, स्पाइना बिफिडा, कैंसर, हृदय दोष, विकासात्मक विकार आदि ये सब देखने को मिले। रेड क्रॉस और अन्य अध्ययनों ने गंभीर मामलों की संख्या बहुत बड़ी बताई।


वहीं 26 से 38 लाख अमेरिकी सैनिकों के संपर्क में आने का अनुमान है। वियतनाम में तैनात रहे सैनिकों में कई प्रकार के कैंसर, पार्किंसन, इस्केमिक हृदय रोग जैसे जोखिम बढ़े पाए गए।

अमेरिका में वेटरन्स अफेयर्स विभाग ने कई बीमारियों को एजेंट ऑरेंज से जोड़कर इलाज और लाभ मान्य किए, लेकिन सैनिकों के बच्चों में जन्मजात विकारों के मामले में मान्यता सीमित रही, जिससे पीड़ित परिवारों में असंतुष्ट रहा।

डाइऑक्सिन का रहा पीढ़ियों तक असर

डाइऑक्सिन ऐसा जहरीला रसायन है जो चर्बी में घुल जाता है और शरीर में 11 से 15 सालों तक बना रह सकता है, पर्यावरण में यह 100 साल से भी ज्यादा टिक सकता है।

यह DNA की अभिव्यक्ति को प्रभावित कर सकता है, यानी बिना DNA को नुकसान पहुँचाए भी अगली पीढ़ियों में इसका असर दिख सकता है। यही कारण है कि युद्ध के दशकों बाद भी नवजात शिशुओं में विकृतियाँ दिखीं। स्तन-दूध और रक्त में डाइऑक्सिन के निशान मिले। यह केवल एक समय की दुर्घटना नहीं, बल्कि पीढ़ीगत त्रासदी बन गई।

अमेरिका की जिम्मेदारी

युद्ध के बाद अमेरिका ने लंबे समय तक जिम्मेदारी से दूरी बनाए रखी। 1970 के दशक के अंत में सैनिकों ने कंपनियों पर मुकदमे किए। 1984 में रसायन बनाने वाली कंपनियों ने समझौता किया पर मुआवज़ा सीमित रहा और अपनी गलती को स्वीकार नहीं किया गया।

राजनयिक रिश्ते 1995 में बहाल हुए। 2006 के बाद एजेंट ऑरेंज पर औपचारिक सहयोग शुरू हुआ। अमेरिका ने सफाई और विकलांग सहायता के लिए धन दिया लेकिन यह नुकसान की तुलना में कम था।

वियतनाम में कई हॉटस्पॉट जैसे दा नांग और बिएन होआ एयरबेस आज भी चुनौती हैं। दा नांग में बड़ा प्रोजेक्ट पूरा हुआ पर बिएन होआ में लंबी सफाई अभी भी जारी है।
इस बीच विदेशी सहायता में कटौती की आशंकाओं ने चिंता बढ़ाई, क्योंकि आधा-अधूरा काम जहर को और फैलने का मौका देता है।

साइगोन का पतन और अमेरिका की बदनामी

30 अप्रैल 1975 को साइगोन का पतन हुआ और वियतनाम युद्ध खत्म हो गया। अमेरिकी दूतावास की छत से हेलीकॉप्टरों की मदद से लोगों को निकालने की तस्वीरें पूरी दुनिया में छा गईं। यह अमेरिका की सैन्य और नैतिक हार का प्रतीक बन गया।

ऑपरेशन रैंच हैंड अपने घोषित लक्ष्य में पूरी तरह विफल रहा। जंगल तो उजड़ गए, लेकिन वियत कॉन्ग नहीं रुका। ऑपरेशन रैंच हैंड उस युद्ध का प्रतीक बन गया जहाँ लक्ष्य पाने की कोशिश में नैतिकता को भूला दिया गया और अंतरराष्ट्रीय आलोचना, घरेलू विरोध और नैतिक पतन का शिकार हो गया।

ऑपरेशन रैंच हैंड ने दिखाया कि रासायनिक युद्ध केवल तत्काल रणनीति नहीं, बल्कि लंबे समय तक असर डालने वाला अपराध है। जंगल उखड़ गए लेकिन विरोध नहीं खत्म हुआ। बल्कि इसका सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका को हुआ और उसकी नैतिकता पर सवाल उठने लगे।

आज वियतनाम और अमेरिका के संबंध बेहतर हैं। पर्यटन बढ़ा, रणनीतिक साझेदारी बनी। लेकिन जमीन के नीचे दबा जहर आज भी मौजूद है। पीड़ित परिवार न्याय, इलाज और साफ-सफाई की माँग आज भी  कर रहा हैं।

भारत में होते लाहौर और सियालकोट, कॉन्ग्रेस की दब्बू नीतियों ने सब बिगाड़ा: जानिए- 60 साल पहले हुए ताशकंद समझौते को, जिसकी कीमत अब तक भुगत रहा है हिंदुस्तान

भारत के इतिहास में 10 जनवरी 1966 का दिन एक ऐसा काला अध्याय है जो आज भी हमें चुभता है। इसी दिन ताशकंद में भारत और पाकिस्तान के बीच एक समझौता हुआ था, जिसे ताशकंद समझौता कहा जाता है। इस समझौते के तहत हमारे बहादुर सैनिकों ने 1965 के युद्ध में अपनी जान की बाजी लगाकर और दुश्मनों का खून बहाकर जो इलाके जीते थे, उन्हें बातचीत की मेज पर बस यूँ ही लौटा दिया गया।

सोचिए अगर ताशकंद समझौता न होता तो आज लाहौर शहर पाकिस्तान का नहीं, बल्कि भारत का हिस्सा होता। हमारा नक्शा कितना अलग और मजबूत दिखता। लेकिन ऐसा नहीं हो सका और इसके लिए जिम्मेदार थी उस समय की कॉन्ग्रेस सरकार की कमजोर और दबाव में झुक जाने वाली विदेश नीति। इस एक फैसले ने देश को सदियों का नुकसान पहुँचाया, जिसकी कीमत हम आज भी चुकाते हैं।

कश्मीर में घुसपैठ, आतंकवाद की घटनाएँ, पुलवामा जैसे हमले… ये सब उस भूल की देन हैं। इस रिपोर्ट में हम उस दौर की पूरी कहानी को विस्तार से समझेंगे, ताकि इतिहास से सबक लिया जा सके और ऐसी गलतियाँ दोबारा न हों।

1965 में भारत से बुरी तरह हारा था पाकिस्तान

साल 1965 का भारत-पाक युद्ध मुख्य रूप से कश्मीर मुद्दे पर शुरू हुआ था। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान ने एक महत्वाकांक्षी योजना बनाई थी, जिसे ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ नाम दिया गया। इस ऑपरेशन के तहत पाकिस्तान ने हजारों घुसपैठिए और फौजियों को जम्मू-कश्मीर में भेजा, ताकि स्थानीय लोगों को भड़काकर विद्रोह कराया जा सके और कश्मीर पर कब्जा कर लिया जाए। अयूब खान इतने घमंड में थे कि उन्होंने कहा था कि वह दिल्ली पर कब्जा करके ‘दिल्ली में डिनर’ करेंगे। लेकिन भारतीय सेना ने उनके इस सपने को चकनाचूर कर दिया।

हमारे सैनिकों ने न सिर्फ घुसपैठियों को पकड़ा, बल्कि पाकिस्तान पर पलटवार किया। उस समय भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे, जो एक सादगी भरे लेकिन मजबूत इरादों वाले नेता थे। उन्होंने अपने सैनिकों से कहा था, “कल का नाश्ता हम लाहौर में करेंगे।”

यह बात सिर्फ एक नारा नहीं थी, बल्कि भारतीय सेना की हिम्मत का प्रतीक थी। और सच में युद्ध के दौरान यह काफी हद तक सच साबित होने वाला था, क्योंकि हमारे जवान लाहौर की सीमाओं तक पहुँच गए थे। इस युद्ध ने दिखाया कि भारत की सेना कितनी तैयार और बहादुर थी, लेकिन राजनीतिक फैसलों ने सब कुछ बदल दिया।

कश्मीर से लेकर कच्छ तक भारी पड़े भारतीय सैनिक, लाहौर सेक्टर में भी घुसे

युद्ध कई मोर्चों पर लड़ा गया और हर जगह भारतीय सेना का दबदबा रहा। लाहौर सेक्टर में तो भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी रक्षा लाइनों को ध्वस्त कर दिया। हम इच्छोगिल नहर तक पहुँच गए थे, जो लाहौर शहर की आखिरी रक्षा लाइन मानी जाती थी। अगर थोड़ा और आगे बढ़ते तो लाहौर पर कब्जा हो जाता। इसी तरह कश्मीर में हाजी पीर दर्रा जैसे रणनीतिक महत्व के इलाके पर भारत का कब्जा हो गया, जो पाकिस्तान के लिए बहुत बड़ा झटका था। क्योंकि यह दर्रा घुसपैठ के रास्ते को नियंत्रित करता था।

पाकिस्तानी सेना बुरी तरह हार रही थी। उनके हजारों सैनिक मारे गए, उनके सबसे आधुनिक पैटन टैंक तबाह हो गए और हवाई जहाज गिरा दिए गए। भारत ने स्पष्ट रूप से बढ़त बना ली थी। युद्ध के दौरान पाकिस्तान को इतना नुकसान हुआ कि उनके पास लड़ने की ताकत ही कम हो गई थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत को विजेता माना जा रहा था, क्योंकि हमने न सिर्फ अपनी रक्षा की, बल्कि दुश्मन की जमीन पर कदम रखा। लेकिन अफसोस यह जीत अधर में लटक गई।

भारतीय जवानों की बहादुरी के किस्से आज भी सुनाए जाते हैं और वे हमें गर्व से भर देते हैं। मिसाल के तौर पर असल उत्तर की लड़ाई को याद कीजिए। वहाँ पाकिस्तान के सबसे उन्नत पैटन टैंकों को भारतीय सेना ने नेस्तनाबूद कर दिया। हमारे शेरमन टैंकों ने उन पर भारी पड़कर दिखाया कि हिम्मत हथियारों से बड़ी होती है।

इस लड़ाई में मेजर भूपिंदर सिंह जैसे अधिकारी बलिदान हुए, लेकिन उन्होंने दुश्मन को पीछे धकेल दिया। इसी तरह चंब सेक्टर में हमारे जवानों ने पाकिस्तानी हमलों को रोका और कब्जा कर लिया। पाकिस्तान को भारी नुकसान हुआ, उसके करीब 4,000 से ज्यादा फौजी मारे गए, जबकि भारत के लगभग 3,000 जवान वीरगति को प्राप्त हुए।

पाकिस्तान के 200 से ज्यादा टैंक तबाह हुए, जबकि हमारे सिर्फ 80। हवाई युद्ध में भी भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के कई एफ-86 सेबर जेट गिराए। अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी भारत की जीत की बात कर रहा था। लेकिन यहीं से कहानी बदल गई, क्योंकि राजनीतिक हस्तक्षेप हो गया और युद्ध का फैसला मैदान से निकलकर मेज पर आ गया।

शीत युद्ध के दौर में बंटी हुई थी दुनिया, सोवियत संघ के बुलावे पर बातचीत

शीत युद्ध का दौर था, जब दुनिया दो खेमों में बँटी हुई थी, एक तरफ अमेरिका था तो दूसरी तरफ सोवियत संघ। दोनों ही महाशक्तियाँ भारत-पाक युद्ध को रोकना चाहती थीं, क्योंकि इससे एशिया में अस्थिरता फैल रही थी। अमेरिका ने पाकिस्तान को हथियार दिए थे, लेकिन युद्ध शुरू होने पर दोनों देशों पर हथियार सप्लाई रोक दी। सोवियत संघ ने मध्यस्थता की पहल की। सोवियत प्रधानमंत्री एलेक्सी कोसिगिन ने भारत और पाकिस्तान को ताशकंद बुलाया।

हमारे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने न्योता स्वीकार किया और ताशकंद गए। पाकिस्तान की ओर से अयूब खान थे। बातचीत शुरू हुई और दबाव का दौर चल पड़ा। सोवियत संघ शांति चाहता था, क्योंकि वह भारत को अपना सहयोगी मानता था, लेकिन पाकिस्तान को भी नहीं खोना चाहता था। अमेरिका भी पीछे से दबाव डाल रहा था। शास्त्री जी पर यह दबाव इतना बढ़ गया कि वे मजबूत होने के बावजूद झुकने को मजबूर हो गए।

अंतर्राष्ट्रीय दबाव में झुड़ी सरकार, नेहरू ने ही की थी शुरुआत

कॉन्ग्रेस सरकार अंतरराष्ट्रीय दबाव में आ गई और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई। अमेरिका ने हथियारों पर एम्बार्गो लगा दिया था, जिससे पाकिस्तान को तो ज्यादा नुकसान पहुँच रहा था, क्योंकि वे अमेरिकी हथियारों पर निर्भर थे, लेकिन भारत भी कुछ हद तक प्रभावित था। सोवियत संघ शांति चाहता था और उसने शास्त्री जी को समझाया कि युद्ध जारी रखना दोनों देशों के लिए घातक होगा।

शास्त्री जी एक मजबूत नेता थे, लेकिन कॉन्ग्रेस पार्टी और उसकी ब्यूरोक्रेसी की कमजोर कूटनीति ने उन्हें अकेला छोड़ दिया। पार्टी के नेता और सलाहकार दबाव में झुक गए, क्योंकि कॉन्ग्रेस की पुरानी नीति ही थी कि अंतरराष्ट्रीय दबाव में झुककर शांति कायम की जाए। नेहरू जी के समय से यह सिलसिला चला आ रहा था, जब उन्होंने 1948 के युद्ध में भी जीत के करीब पहुँचकर संयुक्त राष्ट्र में मामला ले जाकर पाकिस्तान को फायदा दे दिया था। शास्त्री जी पर इतना दबाव पड़ा कि वे समझौते के लिए राजी हो गए, जबकि मैदान में जीत हमारी थी।

हमने दुश्मन को सौंप दिए अपनी जीत के इलाके

10 जनवरी 1966 को ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर हुए और यह दिन भारत के लिए एक दुखद मोड़ साबित हुआ। समझौते के मुख्य बिंदु थे कि दोनों देश युद्ध के दौरान कब्जाए गए सभी क्षेत्रों को खाली करेंगे और 5 अगस्त 1965 से पहले की स्थिति को बहाल करेंगे। इसके अलावा दोनों देश शांतिपूर्ण तरीके से अपने विवाद सुलझाएँगे और बल का इस्तेमाल नहीं करेंगे। राजनयिक संबंध सामान्य किए जाएँगे, व्यापार और संचार के रास्ते खोले जाएंगे। एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं होगा और युद्धबंदियों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाएगा।

यह सब सुनने में तो अच्छा लगता है, जैसे शांति का एक बड़ा कदम हो, लेकिन हकीकत में भारत ने अपनी जीती हुई रणनीतिक बढ़त को पूरी तरह गँवा दिया। हमने लाहौर सेक्टर, सियालकोट और कश्मीर के महत्वपूर्ण इलाकों को लौटा दिया, जबकि पाकिस्तान ने कुछ नहीं दिया। यह समझौता एकतरफा था, जो भारत के लिए नुकसानदेह साबित हुआ।

हाजी पीर दर्रा वापस करना भारत की सबसे बड़ी गलती

हाजी पीर दर्रा वापस करना सबसे बड़ी गलती थी और यह फैसला आज तक हमें सताता है। यह दर्रा कश्मीर में घुसपैठ रोकने के लिए बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह पाकिस्तान से भारत में आने वाले रास्तों को नियंत्रित करता था। युद्ध में हमारे सैनिकों ने इसे जीता था, लेकिन समझौते में लौटा दिया गया। नतीजा क्या हुआ?

पाकिस्तान ने बाद में इसी रास्ते से आतंकवादियों को भेजना शुरू कर दिया। 1980 और 1990 के दशक में कश्मीर में जो आतंकवाद फैला, उसके पीछे हाजी पीर जैसे क्षेत्रों का वापस होना एक बड़ा कारण था। इसी तरह, लाहौर सेक्टर में जीते क्षेत्र भी लौटा दिए गए। अगर हम इन्हें रखते, तो पाकिस्तान की रक्षा लाइनें कमजोर हो जातीं और कश्मीर पर उसका दावा और भी कमजोर पड़ जाता। लाहौर शहर की सुरक्षा पर असर पड़ता और पाकिस्तान कभी इतना आक्रामक नहीं होता। लेकिन कॉन्ग्रेस की कमजोर नीति ने यह सब लौटा दिया, जिससे पाकिस्तान को नई ताकत मिली।

विदेश नीति में भारत की कमजोरी का फायदा पाकिस्तान ने उठाया

कॉन्ग्रेस की यह दब्बू नीति नेहरू जी के समय से चली आ रही थी और यह भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी कमजोरी रही है। नेहरू जी ने 1947-48 के कश्मीर युद्ध में भी जीत के करीब पहुंचकर युद्ध रोक दिया और मामला संयुक्त राष्ट्र में ले गए, जिससे पाकिस्तान को फायदा हुआ और कश्मीर समस्या आज तक लटकी हुई है। 1962 के चीन युद्ध में भी कॉन्ग्रेस की कमजोर तैयारी और नीति का नतीजा भुगता। 1965 में भी यही हुआ, जीत के मुहाने पर खड़े होकर कॉन्ग्रेस ने सब लौटा दिया। यह राजनीतिक कमजोरी थी, क्योंकि पार्टी अंतरराष्ट्रीय दबाव में झुक जाती थी।

नेहरू जी की ‘अहिंसा’ और ‘शांति’ की नीति अच्छी थी, लेकिन दुश्मन के सामने इतनी कमजोर साबित हुई कि देश को नुकसान हुआ। शास्त्री जी जैसे मजबूत नेता भी इस नीति के शिकार हो गए। अगर कॉन्ग्रेस ने कड़ा रुख अपनाया होता, तो इतिहास अलग होता।

हार कर भी हीरो बन गया अयूब खान

युद्ध में भारत ने कम नुकसान उठाया था और यह साबित करता है कि हमारी जीत कितनी स्पष्ट थी। पाकिस्तान के 4,000 से ज्यादा सैनिक मारे गए, जबकि भारत के करीब 3,000। पाकिस्तान के 200 से ज्यादा टैंक तबाह हुए, उनके एफ-86 सेबर जेट गिराए गए। हमारे सैनिकों ने सियालकोट, लाहौर और कच्छ के रण में दुश्मन को पीछे धकेला। लेकिन ताशकंद समझौते से सब बराबर हो गया। पाकिस्तान को नई जिंदगी मिल गई, जबकि वे हार चुके थे। अयूब खान घर लौटकर हीरो बन गए, क्योंकि उन्होंने कुछ नहीं खोया। भारत ने अपनी जीती जमीन लौटाकर खुद को कमजोर साबित किया। यह फैसला कॉन्ग्रेस की कमजोर नेतृत्व का नतीजा था।

आज भी होती है शास्त्री की मौत की जाँच की माँग

समझौते के अगले दिन 11 जनवरी को शास्त्री जी की रहस्यमय मौत हो गई, जो आज तक एक पहेली बनी हुई है। आधिकारिक रूप से इसे हार्ट अटैक बताया गया, लेकिन कई सवाल उठे। उनका शरीर नीला पड़ गया था, जो जहर के असर जैसा लगता था। पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ, जो संदेह बढ़ाता है। परिवार ने जहर देने की आशंका जताई और कहा कि शास्त्री जी समझौते से खुश नहीं थे। कुछ लोग सोवियत संघ या पाकिस्तानी साजिश कहते हैं, क्योंकि सोवियत को समझौता चाहिए था और पाकिस्तान को शास्त्री जी की मौत से फायदा हुआ। यह मौत समझौते से जुड़ी कई थ्योरी पैदा करती है और आज भी जाँच की माँग होती है। शास्त्री जी की मौत ने पूरे देश को सदमे में डाल दिया।

शास्त्री जी मजबूत नेता थे और उनका ‘जय जवान जय किसान’ नारा आज भी गूँजता है। उन्होंने देश को खाद्यान्न संकट से उबारा और युद्ध में सेना का मनोबल बढ़ाया। लेकिन कॉन्ग्रेस की पुरानी नीति ने उन्हें दबाव में डाल दिया। अगर वे और समय माँगते या कड़ा रुख अपनाते, तो शायद नतीजा अलग होता। उनकी मौत ने देश को शोक में डुबो दिया और समझौते की आलोचना बढ़ गई। लोग कहते हैं कि शास्त्री जी समझौते से दुखी थे और इसी तनाव से उनकी मौत हुई।

भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में आलोचना

भारत में ताशकंद समझौते की कड़ी आलोचना हुई और यह स्वाभाविक था। लोग सड़कों पर उतर आए, प्रदर्शन हुए। सेना में भी निराशा फैल गई, क्योंकि जवानों ने खून बहाकर जीती जमीन लौटाना किसी को स्वीकार नहीं था। विपक्षी दलों ने कॉन्ग्रेस पर कमजोरी का आरोप लगाया और कहा कि यह देशद्रोह जैसा है। यह साबित करता है कि कॉन्ग्रेस की विदेश नीति हमेशा दबाव में झुकने वाली रही और राष्ट्रीय हितों की रक्षा नहीं कर पाई।

पाकिस्तान में भी समझौते की आलोचना हुई, क्योंकि कश्मीर पर कुछ हासिल नहीं हुआ। लेकिन उन्हें भारत की जीती जमीन मिल गई, जो उनके लिए बड़ी राहत थी। ताशकंद ने पाकिस्तान को आतंकवाद फैलाने का मौका दिया। हाजी पीर वापस देने से घुसपैठ आसान हो गई और कश्मीर में दशकों तक अशांति रही।

आज तक कॉन्ग्रेस की गलतियों की सजा भुगत रहा है भारत

आज जब पुलवामा, उरी जैसे हमले होते हैं, तो ताशकंद की याद आती है। अगर वो क्षेत्र भारत के पास होते, तो पाकिस्तान इतना मजबूत नहीं होता और आतंकवाद की जड़ें इतनी गहरी न होतीं। कॉन्ग्रेस की यह गलती देश आज तक भुगत रहा है और हजारों जानें गई हैं। वर्तमान सरकार ने नीति बदली है। सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट जैसे ऑपरेशन दिखाते हैं कि अब दबाव में नहीं झुकते। दुश्मन को जवाब दिया जाता है। यह बदलाव जरूरी था। ताशकंद जैसी भूल दोबारा न हो, इसके लिए मजबूत कूटनीति चाहिए।

ताशकंद समझौता न होता तो हिंदुस्तान के होते लाहौर-सियालकोट

अगर ताशकंद समझौता न होता, तो नक्शा अलग होता। लाहौर, सियालकोट जैसे शहर भारत के होते और पाकिस्तान इतना बड़ा खतरा न बनता।

आज 60 साल बाद भी यह सबक है कि युद्ध जीतकर भी सतर्क रहना चाहिए। बातचीत अच्छी है, लेकिन राष्ट्रीय हित पर समझौता नहीं। कॉन्ग्रेस की पुरानी नीतियों से सीख लेकर आज मजबूत भारत बन रहा है और दुश्मन को मुँहतोड़ जवाब दिया जा रहा है। यह इतिहास की वो घटना है जो दर्द देती है। हमारे जवानों का बलिदान सम्मान चाहिए, लौटाना नहीं। ताशकंद समझौता इसकी याद दिलाता है और हमें बताता है कि कमजोरी की कीमत कितनी भारी होती है।

लाखों की फौज के साथ सोमनाथ मंदिर तोड़ने पहुँचा जफर खान, 16 साल के योद्धा ने 11 दिन बहाया खून: पढ़ें- सिर कटने पर भी म्लेच्छों से लड़ने वाले वीर की शौर्यगाथा

भारत का कण-कण अपनी शूरवीरता कहानी कहती है। इसके पग-पग पर बलिदान की गाथा है। विदेशी आक्रांताओं से लड़ते हुए यहाँ से वीरों ने ना समय देखा और ना उम्र, ना परिवार और ना परिणाम, बस राष्ट्र और धर्म को बचाने के अपने सनातन कर्तव्यों के लिए खुद को बलि वेदी पर न्योछावर कर दिए। ऐसे लाखों शूरवीरों की कहानी भारत की इस पवित्र भूमि में समाहित है। ऐसे ही एक शूरवीर का नाम हमीर सिंहजी गोहिल हैं।

गहलोत राजवंश के क्षत्रिय कुल में जन्म लेने वाले महाप्रतापी हमीर सिंहजी गोहिल एक ऐसे शख्सियत हैं, जिन्होंने सनातन परंपरा के मान्य द्वादशलिंगों में से प्रथम लिंग सोमनाथ मंदिर को बचाने के लिए अपने प्राणों की चिंता नहीं की। अब हमीर सिंह गोहिल पर ‘केसरी वीर’ नाम से एक बॉलीवुड फिल्म भी आ चुकी है, जिसमें उनके पराक्रम को दिखाया गया है।

वीर हमीर सिंह जी गोहिल पर गुजराती में कई किताबें लिखी गई हैं और साल 2012 में एक गुजराती फिल्म ‘वीर हमीरजी- सोमनाथ नी सखाते’ बनी है। इस फिल्म को अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म की श्रेणी में भारतीय प्रस्तुति के रूप में भी चुना गया था। हालाँकि, अंतिम कट में यह फिल्म पिछड़ गई।

हमीर सिंह गोहिल और जफर खान का आक्रमण

भारत के इतिहास में वीर हमीर सिंह गोहिल को पराक्रम और उनके साहस के लिए याद किया जाता रहेगा। उन्होंने दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद तुगलक-II के गर्वनर जफर खान की सेना से युद्ध करते हुए अद्वितीय साहस का परिचय दिया था। उन्होंने अपने भील दोस्त वेगड़ा जी के साथ अपनी अंतिम साँस तक युद्ध किया और सोमनाथ मंदिर को बचाते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।

वीर हमीर सिंह गोहिल की समाधि (साभार: nirvandiaries)

बात 14वीं शताब्दी की है। गुजरात के अमरेली जिले के अर्थिला के राजा थे भीमजी सिंह गोहिल। उनके तीन बेटे थे। दुदाजी, अर्जुनजी और हमीरजी। एक बार अपने मझले भाई अर्जुन जी के साथ वे मुर्गों की लड़ाई के चक्कर में दोनों भाई के बीच विवाद हो गया और अर्जुन जी ने उन्हें सौराष्ट्र छोड़कर जाने का आदेश दे दिया। वे 200 क्षत्रियों को लेकर मारवाड़ की ओर चले गए।

कुछ समय के बाद अर्जुन जी अपनी गलती का अहसास हुआ और अपने छोटे भाई हमीर जी बुलवा भेजा। वे आपस आ गए। घर पहुँचकर वे अपने भाइयों और भाभी से मिले। इस तरह पूरी प्रजा हमीर जी के वापस आने पर खुश थी। तीनों भाई जंगलों में जाकर शिकार खेलने और युद्ध का लगातार अभ्यास करते। उनकी उम्र 16 साल थी, लेकिन अभी शादी नहीं हुई थी।

उधर, गुजरात के हालात बदल रहे थे। दिल्ली का सुल्तान मोहम्मद तुगलक द्वितीय जूनागढ़ में अपने गवर्नर शम्ससुद्दीन को हटाकर जफर खान को गवर्नर नियुक्त किया था। जफर खान बेहद ही क्रूर और धर्मांध था। वह गुजरात में हिंदुओं पर तरह-तरह से अत्याचार करता था और मंदिरों को ध्वस्त करता। जफर खान का अगला निशाना हिंदुओं का प्रसिद्ध तीर्थस्थल सोमेश्वर धाम यानी सोमनाथ मंदिर था।

उसने सोमनाथ में रसूल खान को थानेदार नियुक्त किया और आदेश दिया को मंदिर में हिंदुओं को इकट्ठा ना होने दे। कहा जाता है कि उस दिन महाशिवरात्रि था और हर कोई भगवान शिव का अभिषेक करना चाहता था। रसूल खान ने उन्हें रोकने के लिए श्रद्धालुओें के साथ मारपीट शुरू कर दी। इसे आक्रोशित हिंदू श्रद्धालुओं ने रसूल खान को मार डाला। इससे जफर खान को सोमनाथ मंदिर पर हमला करने का मौका मिल गया।

उधर, भीमजी सिंह गोहिल और उनके दोनों बेटे बदले हालात के लिए तैयार हो रहे थे, जबकि हमीर सिंह जी को इसके बारे में जानकारी नहीं थी। एक दिन वे दरबारगढ़ आए और अपने सबसे बड़े भाई दूदाजी की पत्नी से भोजन माँगा। तब उनकी बड़ी भाभी ने कहा, “क्यों देवर जी, इतनी जल्दी क्या है? भोजन करके सोमनाथ मंदिर की रक्षा के लिए साका करने जाना है?”

हमीर सिंह जी को पहली बार सोमनाथ मंदिर पर संकट के बारे में पता चला। उन्होंने अपनी भाभी से पूछा कि ‘क्या सोमनाथ पर संकट है?’ तब उनकी भाभी ने बताया कि दिल्ली का सूबेदार जफर खान अपने दल के साथ हमले के लिए रास्ते में है। यह बात सुनकर हमीर सिंह जी बिना खाना खाए ही खड़े हो गए। वे अपने 200 साथियों को लेकर जफर खान से लड़ने के लिए तैयारी करने लगे।

मंदिर के बाहर लगी वीर हमीर सिंह जी गोहिल की विशाल प्रतिमा (साभार: nirvandiaries)

कहा जाता है कि रास्ते में हमीर सिंह जी को अंधेरी रात में किसी महिला के शोक गीत गाते हुए आवाज सुनाई दी। एक झोंपड़ी में एक वृद्ध चारण यह शोक गीत गा रही थी। हमीर सिंह ने वहाँ जाकर पूछा तो महिला ने कहा कि वह अपने मृत पुत्र के लिए शोकगीत गा रही है। इसके बाद वीर हमीर सिंह ने लाखबाई चारण नाम की वृद्धा से अपने लिए भी शोकगीत गाने को कहा और बताया कि वह सोमनाथ के लिए साका करने जा रहे हैं।

वेगड़ा भी हमीर सिंह जी के साथ जफर खान के खिलाफ युद्ध के लिए अपनी 1200 सैनिकों को लेकर निकल गए। वे सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में पहुँचकर जफर खान की सेना का इंतजार करने लगे। जफर खान अपनी सेना के साथ जैसे सोमनाथ मंदिर की ओर बढ़ा, दोनों ओर के सैनिकों में भीषण युद्ध हुआ। जफर खान के सैनिक गाजर-मूली की तरह काटे जाने लगे। आखिरकार जफर खान ने हाथियों पर लाए तोपों का इस्तेमाल शुरू कर दिया।

इससे हमीर सिंह जी की सेना को भारी नुकसान हुआ। वेगड़ा अपनी सेना के साथ बाहरी रक्षा कवच के रूप में जफर खान से लड़ रहे थे। वहीं, हमीर सिंह मंदिर और गर्भगृह को बचा रहे थे। इसी बीच जफर खान के एक महावत ने अपनी हाथी को इशारा करके वेगड़ा को रौंद दिया। हमीर सिंह के साथी वीर वेगड़ा वीरगति को प्राप्त हो गए। जफर खान ने मंदिर को तीन तरफ से घेर रखा था और चौथी तरफ समुद्र था।

जफर खान की विशाल सेना को 200 राजपूतों की सेना ने रात भर उलझा कर रखा। रात में निर्णय हुआ कि सुबह होते ही जफर खान की सेना पर हमला किया जाएगा। ऐसा ही हुआ। सिर पर केसरिया साफा बाँधे शौर्यवान राजपूतों की सेना ने जफर खान पर हमला कर दिया। दोनोें से तरफ से भीषण युद्ध हुआ था। जफर खान की विशाल सेना के बीच राजपूत वीरगति को प्राप्त होने लगे।

इसी बीच जफर खान ने भी हमीर सिंह जी पर पीछे से हमला कर दिया। उनका सिर कट कर धरती पर गिर गया, लेकिन धड़ युद्ध करता रहा। आखिरकार बेजान धड़ कब तक लड़ता? वीर हमीर सिंह गोहिल सोमनाथ को बचाते हुए भगवान शिव के धाम चले गए। अकेले 9 दिनों तक वे जफर खान को मंदिर में घुसने नहीं दिए। उधर वृद्धा चारण हमीर सिंह जी गोहिल के लिए शोकगीत गाती रहीं। ऐसा रहा है हमीरसिंह जी का स्वर्णिम इतिहास।

सोमनाथ मंदिर का बार-बार विध्वंस

सोमनाथ मंदिर, जिसे सोमेश्वर भी कहा जाता है, भगवान शंकर को समर्पित हिंदुओं का प्रसिद्ध मंदिर है। कपिला, हिरण और सरस्वती नामक तीन नदियों का संगम पर यह स्थित है। कहा जाता है कि इस मंदिर को स्वयं चंद्रदेव ने बनवाया था। कालांतर में इस मंदिर का 649 ईस्वी में वल्लभी के यदुवंशी क्षत्रियों ने इसका निर्माण कराया। इस मंदिर पर पहला हमला अरब का सूबेदार अल जुनैद ने 725 ईस्वी में किया था।

इसके बाद प्रतिहार वंश के क्षत्रिय महाराजा नागभट्ट-II ने 815 ईस्वी में इस मंदिर का फिर से निर्माण कराया था। उन्होंने अपने आलेखों में इसका जिक्र किया है। उन्होंने इतिहास में लिखवाया है कि उन्होंने सोमेश्वर सहित सौराष्ट्र के कई तीर्थों का दौरा किया था। अरब यात्री अलबरूनी ने अपने संस्मरण में इस मंदिर के वैभव के बारे में विस्तार से बताया था। इससे गजनी का कबायली शासक महमूद आक्रर्षित हो गया।

उसने सोमनाथ पर आक्रमण कर लूटने की योजना बनाई और अपने 5000 सैनिकों को लेकर गुजरात की ओर चल पड़ा। सन 1026 में महाराजा भीमदेव सिंह सोलंकी-I का शासन था। उस समय तुर्क मुस्लिम शासक महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर हमला कर दिया और लूटपाट करके इस ज्योतिर्लिंग को तोड़ दिया। कहा जाता है कि मंदिर से उसने उस समय वह 2 करोड़ दीनार लूटकर ले गया था।

एक शिलालेख के अनुसार, महाराजा कुमारपाल (शासनकाल 1143-72) ने ‘उत्कृष्ट पत्थरों से और रत्नों’ से सन 1169 में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण किया। उन्होंने लकड़ी के इस मंदिर को पूरी तरह बदल दिया। सन 1299 में उलुग खान के नेतृत्व में अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने गुजरात पर फिर हमला किया। इसमें क्षत्रिय राजा कर्ण सिंह मंदिर को बचाते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए।

उसके बाद मंदिर का पुनर्निर्माण सौराष्ट्र के चूड़सामा वंश के क्षत्रिय राजा महिपाल-I ने सन 1308 में करवाया। बाद में उनके बेटे खेंगारा गद्दी पर बैठे तो उन्होंने शिवलिंग की की स्थापना करवाई। यह कार्य उन्होंने सन 1331 और 1351 के बीच की थी। सन 1395 में इस मंदिर को तीसरी बार ज़फ़र खान ने नष्ट कर दिया। वह मोहम्मद बिन तुलगक-II का सेनापति था। बाद में वह गुजरात का सुल्तान बन गया था।

इसके बाद 1451 में गुजरात के सुल्तान मोहम्द बेगड़ा ने इसे फिर से नष्ट कर दिया। इसके बाद आजाद भारत में इस मंदिर के पुनर्निर्माण का काम शुरू हुआ। मंदिर के निर्माण की देखरेख और धन इकट्ठा करने के लिए सोमनाथ ट्रस्ट की स्थापना की गई थी। इस मंदिर की स्थापना के लिए 11 मई 1951 को भारत के राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने स्थापना समारोह आयोजित किया था।

वीर हमीर सिंह जी गोहिल की समाधि (nirvandiaries)

हमीर सिंह की समाधि पर चढ़ाकर मंदिर के शिखर पर चढ़ाया जाता है ध्वज

वर्तमान में इस ट्रस्ट के आजीवन अध्यक्ष भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। इस मंदिर को बचाने के लिए अपना प्राण उत्सर्ग करने वाले वीर हमीर सिंह गोहिल की प्रतिमा मंदिर में स्थापित है, जिसे मंदिर में आने वाले श्रद्धालु बड़े भक्तिभाव से पूजते हैं। वीर हमीर सिंह गोहिल के साथ भील समुदाय के उनके साथी वीर वेगड़ा की प्रतिमा भी मंदिर में स्थित है।

इसके अलावा, सोमनाथ मंदिर के बाहर घोड़े पर सवार और हाथ में भाला लिए वीर हमीर सिंह जी गोहिल की आदमकद प्रतिमा स्थापित की गई है। इसका मंदिर और श्रद्धालुओं में विशेष महत्व है। सोमनाथ मंदिर के शिखर पर फहराया जाने वाला झंडा पहले वीर हमीर सिंह गोहिल के स्मारक पर चढ़ाया जाता है। उसके बाद मंदिर के शिखर पर लगाया जाता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट 23 फरवरी 2025 को लिखी गई थी। इसे कुछ बदलावों के साथ फिर से प्रकाशित किया गया है।)

नौकरी के बदले जमीन हड़पने का खेल: कोर्ट ने लालू-राबड़ी समेत 41 लोगों पर किए आरोप तय, जानिए कौन सी थीं वो 7 डील जिसने पूरे नेटवर्क की पोल खोली

बिहार की राजनीति में दशकों से अपनी धाक जमाने वाले लालू प्रसाद यादव के परिवार के लिए ‘लैंड फॉर जॉब’ घोटाला एक ऐसा चक्रव्यूह बन गया है, जिससे निकलना उनके लिए अब और भी कठिन होता जा रहा है। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार समेत 41 लोगों पर आरोप तय कर दिए हैं। कोर्ट ने माना है कि यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि सत्ता का दुरुपयोग कर चलाया गया एक संगठित नेटवर्क था।

एक संगठित आपराधिक नेटवर्क का उदय

यह कहानी शुरू होती है साल 2004 में, जब देश में यूपीए-1 की सरकार बनी और लालू प्रसाद यादव को रेल मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण विभाग सौंपा गया। 2004 से 2009 के अपने इस पाँच साल के कार्यकाल के दौरान लालू यादव ने रेलवे के विकास के कई दावे किए, लेकिन पर्दे के पीछे कुछ और ही खेल चल रहा था। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने हाल ही में टिप्पणी की कि यह मामला पहली नजर में किसी साधारण भ्रष्टाचार जैसा नहीं, बल्कि एक ‘संगठित आपराधिक नेटवर्क‘ जैसा दिखाई देता है।

अदालत का मानना है कि सत्ता, पद और प्रभाव का ऐसा दुरुपयोग कम ही देखने को मिलता है, जहाँ सरकारी नियुक्तियों को एक निजी सौदेबाजी की वस्तु बना दिया गया। कोर्ट ने इस मामले में लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी, उनकी बेटियों मीसा भारती और हेमा यादव, और उनके बेटों तेजस्वी और तेज प्रताप यादव समेत कुल 41 आरोपितों के खिलाफ आरोप (Charges) तय कर दिए हैं। यह एक ऐसा पड़ाव है जहाँ से अब लालू परिवार को कोर्ट में लंबे ट्रायल का सामना करना होगा।

नौकरी के बदले जमीन: सरकारी पद का निजी इस्तेमाल

जाँच एजेंसियों (CBI और ED) का दावा है कि लालू यादव ने रेल मंत्री रहते हुए एक बेहद शातिर तरीका अपनाया। रेलवे में ग्रुप-डी (चतुर्थ श्रेणी) की नौकरियों के लिए कोई विज्ञापन नहीं निकाला गया, न ही कोई पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई गई। इसके बजाय, उन लोगों को चुना गया जो नौकरी के बदले अपनी जमीन लालू परिवार के नाम करने को तैयार थे।

इस घोटाले का पैमाना इतना बड़ा है कि लालू परिवार ने इसके जरिए बिहार के पटना जैसे महत्वपूर्ण इलाकों में 1 लाख स्क्वायर फीट से ज्यादा जमीन अपने कब्जे में ले ली। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इन बेशकीमती जमीनों के लिए जो कागजी भुगतान दिखाया गया, वह महज 26 लाख रुपए था। जबकि सीबीआई के मुताबिक, उस समय के सरकारी सर्कल रेट के हिसाब से भी इनकी कीमत 4.39 करोड़ रुपए से ज्यादा थी। अगर बाजार भाव की बात करें, तो यह कीमत सर्कल रेट से भी चार से छह गुना ज्यादा थी। यानी करोड़ों की संपत्ति को सिर्फ कुछ लाख रुपए में, और कई बार तो ‘गिफ्ट’ के नाम पर हथिया लिया गया।

बिना विज्ञापन और अधूरे आवेदनों पर मेहरबानी

जाँच में यह बात भी सामने आई कि नियमों की जमकर धज्जियाँ उड़ाई गईं। आमतौर पर सरकारी नौकरियों के लिए विज्ञापन जारी किए जाते हैं, परीक्षाएँ होती हैं और इंटरव्यू होते हैं, लेकिन यहाँ मामला उल्टा था। उम्मीदवारों ने मुंबई, जबलपुर, कोलकाता, जयपुर और हाजीपुर जैसे रेलवे जोनों के लिए आवेदन दिए।

कई मामलों में तो आवेदन मिलने के महज तीन दिन के भीतर ही नौकरी को मंजूरी दे दी गई। आश्चर्य की बात यह है कि कई उम्मीदवारों के आवेदन फॉर्म अधूरे थे, उनके पते तक साफ नहीं थे, फिर भी उन्हें रेलवे में ‘नियुक्त’ कर दिया गया। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि उनके परिवार की जमीन की रजिस्ट्री लालू परिवार के किसी न किसी सदस्य के नाम हो चुकी थी।

7 बड़ी डील्स: जिनसे खुला भ्रष्टाचार का पूरा काला चिट्ठा

सीबीआई ने इस पूरे घोटाले को साबित करने के लिए सात प्रमुख डील्स का हवाला दिया है।

डील-1 (किशुन देव राय और राबड़ी देवी): 6 फरवरी 2008 को पटना के रहने वाले किशुन देव राय ने अपनी 3,375 वर्ग फीट की जमीन राबड़ी देवी को सिर्फ 3.75 लाख रुपए में बेच दी। इस रजिस्ट्री के होते ही उसी साल किशुन देव राय के परिवार के तीन सदस्यों ‘राज कुमार सिंह, मिथिलेश कुमार और अजय कुमार’ को मध्य रेलवे मुंबई में नौकरी दे दी गई।

डील-2 (संजय राय और राबड़ी देवी): फरवरी 2008 में ही पटना के महुआबाग के संजय राय ने अपनी 3,375 वर्ग फीट जमीन फिर से राबड़ी देवी के नाम कर दी। कीमत वही 3.75 लाख रुपए रखी गई। इस जमीन के ‘सौदे’ के बदले संजय राय के परिवार के दो सदस्यों को रेलवे में ग्रुप-डी की नौकरी मिल गई।

डील-3 (किरण देवी और मीसा भारती): नवंबर 2007 का मामला और भी बड़ा था। किरण देवी ने अपनी 80,905 वर्ग फीट की विशाल जमीन महज 3.70 लाख रुपए में लालू की बेटी मीसा भारती के नाम कर दी। इसके ठीक बाद 2008 में उनके बेटे अभिषेक कुमार को मुंबई सेंट्रल रेलवे में नियुक्त कर दिया गया।

डील-4 (हजारी राय और एके इन्फोसिस्टम): फरवरी 2007 में हजारी राय ने अपनी 9,527 स्क्वायर फीट जमीन ‘एके इन्फोसिस्टम प्राइवेट लिमिटेड’ नामक कंपनी को बेची। इसके बदले उनके भतीजों दिलचंद कुमार और प्रेम चंद कुमार को रेलवे में नौकरी मिली। दिलचस्प बात यह है कि 2014 में इस पूरी कंपनी का मालिकाना हक और नियंत्रण राबड़ी देवी और मीसा भारती ने अपने हाथ में ले लिया, जिससे जमीन सीधे उनके पास आ गई।

डील-5 (लाल बाबू राय और राबड़ी देवी): पटना के लाल बाबू राय के बेटे लाल चंद कुमार को 2006 में जयपुर रेलवे में नौकरी मिली थी। इसकी ‘फीस’ के तौर पर मई 2015 में लाल बाबू राय ने अपनी 1,360 वर्ग फीट जमीन 13 लाख रुपए में राबड़ी देवी के नाम कर दी।

डील-6 (बृज नंदन राय, हृदयानंद चौधरी और हेमा यादव): इस डील में एक बिचौलिए का इस्तेमाल दिखा। 2008 में बृज नंदन राय ने अपनी जमीन हृदयानंद चौधरी को बेची। हृदयानंद वही व्यक्ति थे जिन्हें 2005 में हाजीपुर रेलवे में नौकरी मिली थी। 2014 में हृदयानंद ने यह जमीन एक ‘गिफ्ट डीड’ के जरिए लालू की दूसरी बेटी हेमा यादव को दान (Gift) कर दी।

डील-7 (विशुन देव राय, ललन चौधरी और हेमा यादव): यहाँ भी वही तरीका अपनाया गया। विशुन देव राय ने अपनी जमीन ललन चौधरी को दी। ललन के पोते पिंटू कुमार को 2008 में मुंबई रेलवे में नौकरी मिली। बाद में 2014 में ललन चौधरी ने वह जमीन हेमा यादव को ट्रांसफर कर दी।

नाबालिग बच्चों के नाम पर संपत्ति का खेल

CBI की चार्जशीट में सबसे चौंकाने वाला खुलासा तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव को लेकर है। 14 जून 2005 की एक डील का जिक्र है, जहाँ एक पिता ने अपने बेटे को नौकरी दिलाने के बदले महज 5,700 रुपए (पाँच हजार सात सौ) में दो कीमती जमीनें राबड़ी देवी के संरक्षण में तेजस्वी और तेज प्रताप के नाम कर दीं।

उस समय ये दोनों भाई नाबालिग थे। जाँच एजेंसी का कहना है कि यह इस बात का सबूत है कि भ्रष्टाचार की योजना कितनी पहले से और कितनी गहराई तक तैयार की गई थी कि बच्चों के भविष्य के नाम पर तब से ही संपत्तियाँ बटोरना शुरू कर दिया गया था।

कानूनी कार्रवाई का सफर: 2022 से 2026 तक

इस घोटाले पर कानूनी शिकंजा 2022 में कसना शुरू हुआ, जब CBI ने लालू परिवार के खिलाफ एक नई FIR दर्ज की और दिल्ली-बिहार के 17 ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की। इसके बाद ED (प्रवर्तन निदेशालय) ने मनी लॉन्ड्रिंग के कोण से भी जाँच शुरू की।

मई 2025 तक आते-आते CBI ने पुख्ता सबूतों के साथ चार्जशीट दाखिल की, जिसमें लालू यादव को मुख्य साजिशकर्ता बताया गया। 24 अगस्त को हुई छापेमारी के बाद जाँच एजेंसियों ने स्पष्ट किया कि नौकरी पाने वाले कई उम्मीदवार अयोग्य थे और उन्होंने फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया था।

राजनीतिक भविष्य पर मंडराते बादल

राउज एवेन्यू कोर्ट द्वारा आरोप तय किए जाने का मतलब है कि अब यह मामला ‘प्रथम दृष्टया’ (Prima Facie) सही पाया गया है और अब गवाहों के बयान और जिरह शुरू होगी। लालू प्रसाद यादव पहले से ही चारा घोटाले के कई मामलों में सजायाफ्ता हैं और खराब स्वास्थ्य के चलते जमानत पर हैं। अब उनके साथ उनके दोनों बेटों (तेजस्वी और तेज प्रताप) और बेटियों पर भी जेल जाने की तलवार लटक रही है।

कोर्ट की टिप्पणियों ने यह साफ कर दिया है कि लोकतंत्र में जब पद का इस्तेमाल ‘प्राइवेट प्रॉपर्टी’ बनाने के लिए किया जाता है, तो कानून की नजरों से बचना नामुमकिन होता है। अब सबकी नजरें कोर्ट के ट्रायल पर टिकी हैं, जो तय करेगा कि बिहार का यह शक्तिशाली राजनीतिक परिवार इस कानूनी भंवर से निकल पाएगा या नहीं।

‘UK यूनिवर्सिटीज में पल रहा कट्टरपंथ, हमारे बच्चे नहीं पढ़ेंगे वहाँ’: जानिए क्या है ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ जिसे ब्रिटेन में बैन कराना चाहता है UAE, सुनवाई न होने पर छात्रों की स्कॉलरशिप रद्द की

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने युवाओं के बीच इस्लामी कट्टरपंथ को रोकने के मकसद से एक बड़ा कदम उठाया है। यूएई ने ब्रिटेन (UK) में पढ़ाई करने के इच्छुक अपने नागरिकों को दी जाने वाली फंडिंग में भारी कटौती कर दी है। यूएई का यह फैसला उस समय आया है जब ब्रिटेन ने इस्लामी आतंकवादी संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ पर प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया।

ब्रिटेन (UK) के साथ बिगड़ते संबंधों के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने एक बड़ा फैसला लेते हुए ब्रिटिश संस्थानों को उन ग्लोबल यूनिवर्सिटीज की लिस्ट से बाहर कर दिया है, जिनके लिए स्कॉलरशिप और डिग्री सर्टिफिकेशन की अनुमति दी जाती थी। ‘फाइनांशियल टाइम्स’ (FT) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अबू धाबी का यह कड़ा कदम उन चिंताओं से उपजा है कि ब्रिटिश यूनिवर्सिटी कैंपसों में इस्लामी कट्टरपंथ का गंभीर खतरा बढ़ रहा है।

‘फाइनेंशियल टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, जब ब्रिटिश अधिकारियों ने यूएई से विदेशी विश्वविद्यालयों की संशोधित सूची में से अपने संस्थानों के नाम गायब होने पर सवाल किया, तो यूएई के अधिकारियों ने पुष्टि की कि यह कटौती जानबूझकर की गई है। इस चर्चा की जानकारी रखने वाले एक सूत्र के हवाले से बताया गया कि यूएई प्रशासन नहीं चाहता कि उनके बच्चे ब्रिटिश यूनिवर्सिटी कैंपसों में जाकर कट्टरपंथ का शिकार हों।

आँकड़ों से पता चलता है कि शैक्षणिक वर्ष 2023-24 के दौरान ब्रिटेन की यूनिवर्सिटीज में ‘इस्लामी कट्टरपंथ’ के लक्षण दिखने की वजह से 70 छात्रों के नाम ‘प्रिवेंट डी-रेडिकलाइजेशन प्रोग्राम’ (कट्टरपंथ विरोधी कार्यक्रम) के पास भेजे गए थे। हालाँकि, ब्रिटेन में पढ़ने वाले कुल 30 लाख छात्रों की तुलना में यह संख्या बहुत छोटी है, लेकिन पिछले साल के मुकाबले यह आँकड़ा लगभग दोगुना हो गया है।

पिछले 10 सालों में यूएई ने अपने देश के भीतर कट्टरपंथियों पर बहुत कड़ा शिकंजा कसा है और 2014 में ही ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ को एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। यूएई लंबे समय से यह माँग कर रहा है कि ब्रिटेन को भी मुस्लिम ब्रदरहुड पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए, लेकिन ब्रिटेन अब तक ऐसा करने से कतरा रहा है।

ब्रिटेन की ढिलाई से बढ़े कट्टरपंथियों के हौसले: UAE ने मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े संगठनों को किया ब्लैकलिस्ट

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने जनवरी 2025 में ब्रिटेन में मौजूद 8 संगठनों को ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ जैसे इस्लामी आतंकी संगठन से संबंध रखने के कारण ब्लैकलिस्ट कर दिया। इन संगठनों की पहचान ‘कैंब्रिज एजुकेशन एंड ट्रेनिंग सेंटर लिमिटेड’, ‘IMA6INE लिमिटेड’, ‘वेम्बली ट्री लिमिटेड’, ‘वस्ला फॉर ऑल’, ‘फ्यूचर ग्रेजुएट्स लिमिटेड’, ‘यास फॉर इन्वेस्टमेंट एंड रियल एस्टेट’, ‘होल्डको यूके प्रॉपर्टीज लिमिटेड’ और ‘नफेल कैपिटल’ के रूप में हुई है।

हैरानी की बात यह है कि कट्टरपंथी संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ पर मिस्र, सऊदी अरब और खुद यूएई जैसे प्रमुख मुस्लिम देशों ने भी बैन लगा रखा है। इसके विपरीत, ब्रिटेन जैसा ‘धर्मनिरपेक्ष’ देश इस संगठन के खिलाफ नरम रुख अपनाए हुए है। उसने अब तक न तो इसे बैन किया है और न ही इसे आधिकारिक तौर पर आतंकवादी संगठन घोषित किया है।

ब्रिटेन इन दिनों तेजी से बढ़ते इस्लामी कट्टरपंथ और धर्मांतरण की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ ने ब्रिटेन में अपना नेटवर्क उन छात्रों और कट्टरपंथी निर्वासितों के जरिए फैलाया है, जो अपने देशों में हुई कार्रवाई के बाद वहाँ शरण लेने पहुँचे थे। ये संगठन दक्षिण एशिया के उन कट्टरपंथियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जो जमात-ए-इस्लामी का प्रतिनिधित्व करते हैं और अबुल आला मौदूदी के विचारों को बढ़ावा देने के लिए बने हैं।

साल 2024 में, पूर्व कम्युनिटी सेक्रेटरी माइकल गोव ने ‘मुस्लिम एसोसिएशन ऑफ ब्रिटेन’ (MAB) को स्पष्ट रूप से मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़ा संगठन बताया था। इससे पहले 2015 में भी ब्रिटिश सरकार की एक समीक्षा में यह खुलासा हुआ था कि MAB पर पूरी तरह से मुस्लिम ब्रदरहुड का वर्चस्व है।

एक सरकारी समीक्षा में विस्तार से बताया गया है कि कैसे ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ ने पिछले पाँच दशकों के दौरान धीरे-धीरे ब्रिटेन में अपना आधार मजबूत किया है। 1980 के दशक के उत्तरार्ध तक, इस संगठन ने इराक और फिलिस्तीन जैसे मुद्दों का इस्तेमाल करके ब्रिटेन में बसे दूसरी पीढ़ी के मुस्लिमों को एकजुट करना और उन्हें अपने साथ जोड़ना शुरू कर दिया था।

1990 के दशक तक, मुस्लिम ब्रदरहुड ने अपनी जिहादी विचारधारा को फैलाने और नए समर्थकों को लुभाने के लिए कई तरह के संगठन खड़े कर लिए थे। 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से किसी भी संगठन ने खुलकर अपनी पहचान मुस्लिम ब्रदरहुड के रूप में नहीं बताई और इस संगठन की सदस्यता हमेशा की तरह एक ‘राज’ ही बनी रही।

इसके बावजूद, मुस्लिम ब्रदरहुड ने कई सालों तक ‘इस्लामिक सोसाइटी ऑफ ब्रिटेन’ (ISB) को अपने हिसाब से चलाया, ‘मुस्लिम एसोसिएशन ऑफ ब्रिटेन’ (MAB) पर अपना दबदबा बनाए रखा और ‘मुस्लिम काउंसिल ऑफ ब्रिटेन’ (MCB) को स्थापित करने व चलाने में अहम भूमिका निभाई। MAB ने फिलिस्तीन और इराक जैसे मुद्दों के जरिए राजनीति में सक्रियता बढ़ाई और चुनावों में अपने उम्मीदवार उतारे। वहीं, MCB ने सरकार के साथ बातचीत का रास्ता साफ किया। इतना ही नहीं, MAB ने सुरक्षा मुद्दों पर पुलिस के साथ मिलकर काम किया और उत्तरी लंदन की एक मस्जिद से कट्टरपंथी प्रचारक अबू हमजा को बाहर निकालने में मदद की, जिसके बाद से उस मस्जिद के प्रबंधन में MAB की अहम भूमिका बनी हुई है।

2015 की रिपोर्ट से लिया गया अंश जिसका टाइटल है: मुस्लिम ब्रदरहुड रिव्यू: मुख्य निष्कर्ष

समीक्षा में यह भी सामने आया कि ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ अपने विभिन्न संगठनों के जरिए ब्रिटेन में बड़े पैमाने पर चंदा (फंड) इकट्ठा कर रहा है। ‘यूके इस्लामिक मिशन’ (UKIM) और ‘इस्लामिक फोरम फॉर यूरोप’ (IFE) जैसे ब्रदरहुड के नियंत्रण वाले संगठन ब्रिटेन में दर्जनों मस्जिदें चला रहे हैं। ये संगठन फिलिस्तीनी आतंकी समूह ‘हमास’ के खुले समर्थक रहे हैं।

2015 की इस रिपोर्ट में आगे बताया गया कि भले ही ब्रिटेन में मुस्लिम ब्रदरहुड खुद को ‘अल-कायदा’ और कट्टरपंथी सलाफवाद का विरोधी बताता हो, लेकिन सच्चाई कुछ और है। ब्रिटिश सरकार की जाँच में पाया गया कि यह संगठन प्रतिबंधित आतंकी समूहों का समर्थन करता है और आतंकवाद पर इसके विचार ब्रिटेन के राष्ट्रीय हितों, मूल्यों और सुरक्षा के बिल्कुल खिलाफ हैं।

हैरानी की बात यह है कि 2015 की समीक्षा में मुस्लिम ब्रदरहुड की जिहादी प्रवृत्तियों का कच्चा चिट्ठा सामने आने के बावजूद, ब्रिटिश सरकार ने इसे बैन नहीं किया। सरकार का तर्क था कि ब्रिटेन के भीतर इस संगठन की किसी आतंकी गतिविधि में शामिल होने का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है।

‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की पूरी काला-चिट्ठा: खौफनाक इतिहास से लेकर ग्लोबल जिहाद तक

‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ या ‘इखवान अल-मुस्लिमीन’ की स्थापना साल 1928 में मिस्र के एक शिक्षक और इस्लामी विद्वान हसन अल-बन्ना ने की थी। इस संगठन की नींव पश्चिमी उपनिवेशवाद के विरोध और ओटोमन साम्राज्य के पतन के बाद खत्म होते इस्लामी मूल्यों को बचाने के नाम पर रखी गई थी। अल-बन्ना ने इसे एक ‘पैन-इस्लामिस्ट’ आंदोलन के रूप में शुरू किया था, जिसका शुरुआती जोर समाज सेवा और इस्लामी वकालत पर था।

अपने शुरुआती सालों में, मुस्लिम ब्रदरहुड ने मिस्र की कमजोर सरकारों की कमियों का फायदा उठाकर गरीबों और अनपढ़ लोगों के लिए स्कूल, अस्पताल और मस्जिदें बनवाईं। इसके साथ ही, उसने धर्मनिरपेक्षता और साम्राज्यवाद के ‘इलाज’ के रूप में इस्लाम और ‘तौहीद’ (अल्लाह की सर्वोच्चता) का प्रचार करना शुरू किया। मुस्लिम ब्रदरहुड का नारा (मोटो) यह साफ कर देता है कि भले ही शुरुआत में यह सीधे तौर पर हिंसा से न जुड़ा रहा हो, लेकिन ‘जिहाद’ हमेशा से इसका मूल रास्ता रहा है।

‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ का मूल नारा (मोटो) उनके इरादों को पूरी तरह साफ करता है, “अल्लाह हमारा उद्देश्य है; पैगंबर हमारे नेता हैं; कुरान हमारा कानून है; जिहाद हमारा रास्ता है; और अल्लाह की राह में मरना हमारी सर्वोच्च इच्छा है।”

1930 के दशक तक, हज़ारों सदस्यों के साथ यह संगठन राजनीति में कदम रख चुका था। हालाँकि, इस कट्टरपंथी संगठन की ‘सीक्रेट अपैरेटस’ (al-Nizam al-Khas) नाम की एक पैरामिलिट्री विंग भी थी, जो राजनीतिक हत्याओं और जिहादी हिंसा को अंजाम देती थी। साल 1948 में, इस संगठन पर प्रतिबंध लगाने के कारण ‘सीक्रेट अपैरेटस’ के सदस्यों ने मिस्र के प्रधानमंत्री महमूद अल-नोकराशी पाशा की हत्या कर दी थी। इसके बदले में, 1949 में मिस्र की गुप्त पुलिस ने संगठन के संस्थापक हसन अल-बन्ना की हत्या कर दी।

‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की गुप्त शाखा (Secret Apparatus) के सदस्यों को कड़ा शारीरिक और सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता था, जिसमें हथियार चलाना और गुप्त अभियानों को अंजाम देना शामिल था। धोखे और गोपनीयता (तक़िया) का सहारा लेकर ये जिहादी राजनीतिक दलों, सेना, खुफिया एजेंसियों, मीडिया, शिक्षण संस्थानों और एनजीओ तक में घुसपैठ कर उन्हें भीतर से खोखला कर देते हैं। ब्रिटेन जैसे देशों में भले ही वे सीधे तौर पर हिंसा न कर रहे हों, लेकिन मीडिया, राजनीति और चैरिटी के जरिए अपना जिहादी एजेंडा आगे बढ़ाना आज भी जारी है।

मिस्र में साल 2012 में इस संगठन ने चुनाव जीता और मोहम्मद मुर्सी राष्ट्रपति बने, लेकिन 2013 में जनरल अब्दुल फतह अल-सीसी के नेतृत्व में हुए सैन्य तख्तापलट ने उन्हें सत्ता से हटा दिया। इसके बाद मिस्र में इस संगठन को बैन कर ‘आतंकवादी संगठन’ घोषित कर दिया गया। आज भी मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका की कई सरकारें इसे अपनी स्थिरता के लिए खतरा मानती हैं। हाल ही में, टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबॉट ने भी मुस्लिम ब्रदरहुड और ‘काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस’ को ‘विदेशी आतंकवादी और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक संगठन’ मानने का ऐलान किया है।

यूएई, सऊदी अरब, मिस्र, बहरीन और रूस जैसे देश पहले ही ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ को एक आतंकवादी संगठन घोषित कर चुके हैं। अप्रैल 2025 में जॉर्डन ने भी इस समूह पर तब बैन लगा दिया, जब उसने रॉकेट और ड्रोन के जरिए हमलों की साजिश रचने वाले इसके सदस्यों को गिरफ्तार किया।

मुस्लिम ब्रदरहुड की विचारधारा ने 1940 के दशक में मौलाना अबुल आला मौदूदी की ‘जमात-ए-इस्लामी’ को भी प्रभावित किया था। भारत में प्रतिबंधित आतंकी संगठन जैसे सिमी (SIMI) और पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), जो हिंदुओं के खिलाफ जिहादी हमलों और भारत को एक इस्लामी राष्ट्र बनाने की साजिशों में शामिल रहे हैं, वे भी मुस्लिम ब्रदरहुड की रणनीतियों से प्रेरणा लेते हैं। भारत में सक्रिय आतंकी समूहों को उकसाने के अलावा, इस संगठन ने 2021 में भारत के आर्थिक हितों को चोट पहुँचाने के लिए ‘भारतीय उत्पादों के बहिष्कार‘ (#BoycottIndianProducts) का अभियान चलाया था। वहीं 2023 में, पैगंबर मुहम्मद के सम्मान की रक्षा के बहाने इस संगठन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने की गहरी साजिश रची थी।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है। इसको पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें)

CBI का छापा, सोनिया का पास्ता मेकर और इंदिरा गाँधी: ममता बनर्जी के ‘दखल’ से चर्चा में 49 साल पुराना किस्सा

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस के चुनावी प्रबंधन का काम देखने वाली I-PAC कंपनी पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) के छापे के दौरान जो ड्रामा हुआ, उसे ऑन टीवी हर किसी ने देखा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद कंपनी के मालिक के घर पहुँची और जरूरी फाइलें, लैपटॉप और अन्य दस्तावेज लेकर निकल गईं। उनका यह रवैया देख हर कोई हैरान रह गया कि मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए ऐसा कैसे किया जा सकता है।

यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े राजनीतिक नाम ने जाँच एजेंसियों से बचने के लिए असामान्य कदम उठाए हों। इतिहास में ऐसा एक बड़ा उदाहरण 1977 का है जिसका जिक्र कैथरीन फ्रैंक की किताब- इंदिरा- द लाइन ऑफ इंदिरा नेहरू में पढ़ने को मिलता है।

फ्रैंक कैथरीन की किताब, जिसमें घटना का जिक्र है (फोटो साभार: अमेजन)

जब इंदिरा गाँधी के घर पड़ी CBI की रेड

ये वो समय था जब 1977 में आपातकाल के बाद जाँच के लिए शाह आयोग का गठन किया गया। आयोग का उद्देश्य इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादतियों और दुरुपयोग की जाँच करना था। आयोग ने इंदिरा गाँधी को कई बार पूछताछ के लिए बुलाया, लेकिन वह हर बार अपने वकील फ्रैंक एंथनी की सलाह पर आयोग के समक्ष पेश होने से इनकार करती रहीं और इसे असंवैधानिक और गैरकानूनी भी ठहरा दिया।

एक तरफ इंदिरा गाँधी लगातार शाह कमीशन से बचने की कोशिशों में लगी हुईं थीं। दूसरी तरफ जाँच एजेंसियों की पड़ताल शुरू थी। किताब में लिखे अंश के अनुसार, 3 अक्तूबर 1977 का दिन आया। उनके घर 12 विलिंगडन क्रेसेंट पर सीबीआई की रेड पड़ी। उनके बेटे संजय और बहू मेनका लॉन पर बैडमिंटन खेल रहे थे। दो सीबीआई अधिकारी उन्हें गिरफ्तार करने आए और इंदिरा गाँधी से कहा कि वे हिरासत में ली जाती हैं। हालाँकि, इंदिरा ने ऐसा होने की उम्मीद लगाई हुई थी और शायद इससे निपटने की उनकी रणनीति भी तैयार थी।

सीबीआई अधिकारियों से उस समय इंदिरा गाँधी ने पैकिंग के लिए समय माँगा और घर के भीतर चली गईं। करीबन 5 घंटे वह घर में रहीं और शाम के 8 बजे वह सफेद साड़ी (हरी बॉर्डर वाली) पहनकर भीड़ के आगे आईं। बताया जाता है कि इन पाँच घंटों में इंदिरा गाँधी ने घर के भीतर बहुत कुछ किया। उन्होंने अपने समर्थकों को बुलाया, प्रेस को सूचित किया, परिजनों से बात की और सामान बाँधा, जिसमें सबसे हैरान करने वाली चीज थी सोनिया गाँधी का एक पास्ता मेकर।

कैथरीन फ्रैंक की किताब में लिखे अंश का स्क्रीनशॉट

किताब में एक अफवाह के तौर पर ही सही, लेकिन ये बताया गया है इंदिरा गाँधी के सामान में उस समय पास्ता मेकर मिलने की कोई वजह नहीं थी सिवाय इसके कि उन्होंने इससे उन दस्तावेजों को नष्ट किया जो उनके लिए समस्या बन सकते थें।

कैथरीन फ्रैंक की किताब में लिखे अंश का स्क्रीनशॉट

इसके बाद क्या सब हुआ ये इतिहास में दर्ज है। इंदिरा गाँधी ने तब इस गिरफ्तारी को अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए भुनाया। बाद में सुनवाई हुई। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने ठोस सबूत न मिलने पर उन्हें रिहा कर दिया। और ये चर्चा कभी नहीं हुई कि वो कागज क्या थे जिन्हें इंदिरा गाँधी ने पास्ता मेकर में डालकर काट दिया।

आज जब मीडिया में ममता बनर्जी से जुड़ी खबरें आई है तो ये किस्सा और भी प्रांसगिक हो गया कि कैसे इंदिरा गाँधी ने चालाकी से न केवल 5 घंटे में अपने लिए समर्थन बटोरा बल्कि अपने खिलाफ रखें सबूतों को भी नष्ट कर दिया। ये सच है कि उस समय इंदिरा के पक्ष में जैसे लोग आए 1978 में उन्हें उसका सीधा फायदा हुआ, मगर बंगाल में स्थिति ऐसी नहीं देखने को मिल रही। लोग ममता बनर्जी की हरकत पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। ईडी उनकी हरकत के खिलाफ हाई कोर्ट चला गया है। वहीं बंगाल सीएम ने भी इस मामले में अधिकारियों के विरुद्ध शिकायत दी है। देखना यही है कि इस घटना को बंगाल की जनता कैसे लेगी?

अब AI बनेगा आपका सेहत का साथी: OpenAI ने लॉन्च किया ChatGPT Health, आपके मेडिकल रिकॉर्ड से देगा सटीक सलाह, जानें कैसे काम करेगा यह नया फीचर

कैलिफोर्निया में सैन फ्रांसिस्को की कंपनी OpenAI ने बुधवार (7 जनवरी 2026) को ChatGPT Health पेश किया है। यह खास फीचर लोगों के हेल्थ ऐप्स और मेडिकल रिकॉर्ड्स को सुरक्षित तरीके से जोड़ने की सुविधा देता है। इसे दुनिया के 60 देशों के 260 से ज्यादा डॉक्टरों ने मिलकर तैयार किया है ताकि यूजर्स को सेहत से जुड़ी बेहतर जानकारी मिल सके।

यूजर्स अब ChatGPT के एक सुरक्षित और अलग हिस्से में सेहत से जुड़े सवाल पूछ सकेंगे। खास बात यह है कि आप इसमें अपने मेडिकल रिकॉर्ड और फिटनेस ऐप्स को जोड़ सकते हैं, ताकि AI आपकी अपनी जानकारी के आधार पर सटीक जवाब दे सके।

OpenAI का कहना है, “आप सुरक्षित तरीके से अपना हेल्थ डेटा लिंक कर सकते हैं ताकि आपको काम की सलाह मिले। इसे डॉक्टरों की मदद से बनाया गया है ताकि लोग अपनी सेहत का बेहतर ख्याल रख सकें। पर ध्यान रहे, यह डॉक्टरों का साथ देने के लिए है, उनकी जगह लेने के लिए नहीं।”

डॉक्टर की जगह नहीं, बस मदद के लिए है यह सिस्टम

OpenAI ने साफ किया है कि यह नया फीचर डॉक्टरों की जगह लेने के लिए नहीं, बल्कि उनकी मदद के लिए है। कंपनी के मुताबिक, लोग पहले से ही सेहत से जुड़ी जानकारी के लिए ChatGPT का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। एक स्टडी में सामने आया है कि दुनिया भर में हर हफ्ते करीब 23 करोड़ लोग अपनी बीमारियों के बारे में सवाल पूछते हैं। अक्सर लोग देर रात, क्लिनिक बंद होने के बाद यहाँ आते हैं, क्योंकि उस वक्त कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं होता और गूगल पर जानकारी ढूँढना उलझन भरा हो जाता है।

OpenAI की अधिकारी फिजी सिमो का कहना है कि इस नए फीचर का मकसद यूजर्स को अपनी सेहत के प्रति जागरूक और भरोसेमंद बनाना है। उन्होंने बताया कि आज के समय में हेल्थकेयर सिस्टम इतना उलझा हुआ है कि अच्छी सुविधा मिलने के बाद भी लोग परेशान रहते हैं। ऐसे में AI डॉक्टर और मरीज दोनों के लिए एक मददगार साथी साबित हो सकता है।

सिमो ने जोर देकर कहा कि “AI इलाज की जगह नहीं ले सकता”, लेकिन यह पेचीदा मेडिकल सिस्टम को समझने में बहुत काम आ सकता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह ढेर सारी मुश्किल जानकारियों को इकट्ठा करके उन्हें बहुत आसान भाषा में समझा देता है।

सेहत का डेटा रहेगा सुरक्षित, आपकी मर्जी से होगा लिंक

OpenAI ने साफ किया है कि आपकी सेहत से जुड़ी जानकारी पूरी तरह सुरक्षित रहेगी। यूजर्स अपनी पसंद के मुताबिक Apple Health, इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड्स (फिलहाल सिर्फ अमेरिका में) और MyFitnessPal, Peloton या Weight Watchers जैसे ऐप्स को लिंक कर पाएँगे। जब आप इसकी इजाजत देंगे, तभी ChatGPT आपकी लैब रिपोर्ट, नींद का पैटर्न, कसरत और खान-पान के आधार पर आपको सलाह देगा।

कंपनी ने बताया कि कोई भी डेटा अपने आप लिंक नहीं होगा। कंपनी ने बताया कि कोई भी डेटा अपने आप लिंक नहीं होगा। यूजर्स को एक-एक करके खुद उन ऐप्स को चुनना होगा जिन्हें वे लिंक करना चाहते हैं। इस काम के लिए OpenAI ने अमेरिकी कंपनी b.well के साथ हाथ मिलाया है। यह कंपनी लाखों डॉक्टरों और अस्पतालों से मेडिकल रिकॉर्ड इकट्ठा करती है और उन्हें इस तरह तैयार करती है कि AI उन्हें आसानी से समझ सके। सबसे खास बात यह है कि डेटा पर पूरा कंट्रोल आपका होगा। अगर आप कभी भी अपना रिकॉर्ड डिस्कनेक्ट करना चाहें, तो कर सकते हैं। जैसे ही आप डिस्कनेक्ट करेंगे, कंपनी आपके सारे डेटा को अपने सिस्टम से पूरी तरह डिलीट कर देगी।

OpenAI ने इस सिस्टम को इस तरह तैयार किया है कि यह बातचीत के दौरान आपकी निजी जानकारी को सेव नहीं करेगा। आप जब चाहें अपनी चैट डिलीट कर सकते हैं और 30 दिनों के अंदर उसे सर्वर से पूरी तरह हटा दिया जाएगा। आपकी सारी चैट और डेटा हमेशा सुरक्षित (encrypted) रहता है, और सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए आप ‘मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन’ (MFA) भी ऑन कर सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपकी सेहत से जुड़ी जानकारी ChatGPT के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग रखी जाएगी। ChatGPT हेल्थ का अपना अलग सिस्टम, मेमोरी और फाइलों का रिकॉर्ड होगा। कंपनी ने साफ किया है कि आपकी सेहत से जुड़ी बातचीत का इस्तेमाल उनके मुख्य AI मॉडल को ट्रेनिंग देने के लिए नहीं किया जाएगा। सुरक्षा के लिहाज से, अगर आप सामान्य चैट में सेहत से जुड़ा कोई सवाल पूछते हैं, तो खुद ChatGPT आपको सुरक्षित ‘हेल्थ चैट’ वाले हिस्से में जाने की सलाह दे सकता है।

बिना डराए सही जानकारी देने वाला प्लेटफॉर्म

OpenAI के मुताबिक, ChatGPT Health को इस तरह तैयार किया गया है कि यह आपको डराने के बजाय सही जानकारी दे और जरूरत पड़ने पर आपको डॉक्टर के पास जाने की सलाह दे। कंपनी की अधिकारी फिजी सिमो ने भरोसा दिलाया है कि मॉडल को जानकारीपूर्ण बनाया गया है ताकि यह ‘अलार्मिंग’ या डरावना न लगे। इस फीचर को धीरे-धीरे रोलआउट किया जाएगा ताकि अनुभव के आधार पर इसमें सुधार होता रहे। फिलहाल इसके लिए आपको वेटलिस्ट (Waitlist) में शामिल होना होगा।

यह सुविधा उन यूजर्स के लिए है जो यूरोपीय आर्थिक क्षेत्र, स्विट्जरलैंड और यूके से बाहर रहते हैं। इसमें ChatGPT फ्री, गो, प्लस और प्रो प्लान वाले सभी यूजर्स शामिल हो सकेंगे। शुरुआत में यह सुविधा बीटा टेस्टिंग के लिए एक छोटे ग्रुप को दी जाएगी, लेकिन कंपनी का लक्ष्य इसे जल्द ही सभी यूजर्स (फ्री यूजर्स समेत) के लिए उपलब्ध कराना है।

ChatGPT Health की लॉन्चिंग ठीक उसी समय हुई है जब रेगुलेटर्स (सरकारी निगरानी संस्थाएँ) हेल्थ टेक्नोलॉजी की जाँच-परख कर रहे हैं। इसकी लॉन्चिंग से एक दिन पहले, अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के कमिश्नर मार्टी मकारी ने एक बड़ी घोषणा की थी। उन्होंने कहा कि एजेंसी अब उन वियरेबल गैजेट्स (जैसे स्मार्टवॉच) और सॉफ्टवेयर की निगरानी कम करेगी जिनका मकसद लोगों को स्वस्थ जीवन के लिए प्रोत्साहित करना है।

मार्टी मकारी ने ChatGPT का जिक्र करते हुए इसे एक ऐसा प्रोडक्ट बताया जिसका प्रचार किया जाना चाहिए। हालाँकि, इसके साथ ही उन्होंने एक चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि इस तरह की तकनीक के साथ सुरक्षा से जुड़ी गंभीर चिंताओं का भी ध्यान रखना बहुत जरूरी है।

सुविधा के साथ प्राइवेसी का बड़ा खतरा

पिछले कुछ सालों में तकनीक और AI की दुनिया पूरी तरह बदल गई है। एक तरफ तो इन बदलावों ने हमारी जिंदगी बहुत आसान बना दी है, लेकिन दूसरी तरफ हमारी प्राइवेसी (निजी जानकारी) पर बड़ा खतरा पैदा कर दिया है।

दुनिया की बड़ी टेक कंपनियाँ प्राइवेसी के मामले में अक्सर विवादों में रहती हैं। जैसे Meta (Facebook) का ‘कैम्ब्रिज एनालिटिका’ स्कैंडल, जहाँ करोड़ों लोगों की जानकारी उनकी मर्जी के बिना ले ली गई थी। इसी तरह, TikTok जैसे चीनी ऐप्स पर भी डेटा चोरी के आरोप लगे हैं, जिसकी वजह से कई देशों में इन्हें बैन कर दिया गया। यहाँ तक कि YouTube पर भी यूजर्स की निजी जानकारी इकट्ठा करने के आरोप लगते रहे हैं।

अब OpenAI ने भी ‘ChatGPT Health’ को लेकर बड़े दावे किए हैं कि वे सेहत से जुड़ी जानकारी को सुरक्षित रखेंगे। लेकिन इतिहास गवाह है कि कई कंपनियाँ ऐसे वादे करती रही हैं जो बाद में खोखले साबित हुए। हो सकता है कि OpenAI इस मामले में अलग साबित हो, लेकिन जब तक वे अपने वादे को पूरी तरह निभाकर नहीं दिखाते, तब तक सुरक्षा को लेकर डर बना ही रहेगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। इसको पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें)