पहले से विवादों में रहे भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल ने इस बार खुद को बचाने के लिए एक लेखक और उनकी किताब को ढाल बनाने की कोशिश की। मगर इस बार भी भारत भवन को बेवजह विवादों में घसीट ही दिया। क्या आठ साल बाद अब BLF का भारत भवन पर एकाधिकार खत्म होगा?
मैं पिछले दिनों कोलकाता-दिल्ली में था। भारत भवन का न्यासी होने के नाते अनेक मित्रों ने दिल्ली में रूबरू और फोन पर एक ही तरह के सवाल किए- “आपके भारत भवन में यह क्या चलता रहता है?” लौटकर मीडिया और सोशल मीडिया पर वही दुखी करने वाले एक जैसे विवाद बिखरे हुए देखे, जो बीते वर्षों में होते रहे।
दो कारणों से मेरा सरोकार केवल भारत भवन से है। पहला, मैं यहाँ का न्यासी हूँ और दूसरा, पिछले तीस सालों में अपने पत्रकारीय जीवन के आरंभ से देश के इस प्रतिष्ठित बहुकला केंद्र से एक श्रोता-दर्शक के रूप में जुड़ा ही रहा हूँ।
भारत भवन में होने वाले BLF का विवादों और सवालों से चोली-दामन का साथ उसी दिन से है, जब से भारत भवन के दरवाजे इनके लिए खोले गए। दो साल पहले भी ऐसे ही किसी विषय पर बवाल हो चुका है। तब तत्कालीन संस्कृति मंत्री ने काफी सख्त रुख दिखाया था। मध्य प्रदेश की साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय संस्थाओं के यह सवाल ध्यान देने योग्य हैं कि जब किसी और निजी संस्था को भारत भवन उपलब्ध नहीं है तो BLF को क्यों वंदनवार सजते हैं और वह भी ‘अज्ञात कारणों’ से हर साल मोटी सरकारी आर्थिक मदद सहित।
2021 में शासन की ओर से मुझे न्यास मंडल में सम्मिलित किया गया। साल-डेढ़ साल में होने वाली दो-तीन औपचारिक बैठकों में मैं उपस्थित भी रहा। आखिरी बार 2024 में कभी बैठक हुई थी। मुझे नहीं पता था कि न्यास अभी कार्यशील है या उसका कार्यकाल पूरा हो गया है। ताजा विवाद पर जब मीडिया के मित्रों ने प्रश्न किए तो मैंने सबसे पहले भारत भवन के प्रशासनिक अधिकारी प्रेमशंकर शुक्ला से इसकी जानकारी ली। मुझे बताया गया कि न्यास का अस्तित्व अभी है। कहा गया, “जब तक आपको सूचना न मिले कि आप नहीं हैं, तब तक मानकर चलें कि आप हैं।’
जब न्यास का पुनर्गठन हुआ तो ऐसी अनेक संस्थाओं ने हमसे संपर्क किया और चाहा कि या तो सभी संस्थाओं को यह महत्वपूर्ण कला केंद्र उपलब्ध होना चाहिए या एक ही नीति पर सबके साथ अमल होना चाहिए। यह पक्षपात क्यों? BLF के आयोजन में भारत भवन के कौन से या किसके हित जुड़े हैं जबकि इतने वर्षों में भी भोपाल के लेखक, दर्शक और श्रोताओं से उसका कोई तारतम्य तक नहीं बन पाया है और लिटरेचर फेस्टिवलों में उमड़ने वाली भीड़ आश्चर्यजनक रूप से यहाँ गायब रही है।
मुझे याद है कि न्यास मंडल की आरंभिक बैठकों में प्रसिद्ध रंगकर्मी राजीव वर्मा ने यह विषय बहुत प्रमुखता से उठाया था कि भारत भवन में बाहरी आयोजनों को लेकर हमारी नीति ‘एक और स्पष्ट’ होनी चाहिए। भारत भवन या तो सभी को उपलब्ध कराएँ या किसी को भी नहीं। बाकी न्यासियों को भी पहली ही बार पता चला था कि भोपाल की किसी एक संस्था के लिए भारत भवन में स्वागत द्वार सजते हैं और बाकियों के लिए ‘नो एंट्री’ का साइनबोर्ड है। स्वाभाविक रूप से सभी सहमत थे कि यह अनुचित है।
संभव है कि जनता से जुड़ाव न होने के कारण ही जानबूझकर ऐसे विषय और सत्र रखे जाते हों, जिनसे अनावश्यक भ्रम पैदा हो और विवाद खड़े हों। भीड़ जुटाने के लिए आयोजकों की ओर से प्रचार की यह एक सुनियोजित नीति के तहत किया जाता हो। मैं प्रसंगवश इंदौर लिटरेचर फेस्टिवल (ILF) को याद करना चाहूँगा। 11 साल से इंदौर में वह लोकप्रिय आयोजन के रूप में प्रतिष्ठित हुआ है, जहाँ इंदौर से बाहर के अनेक साहित्य और संस्कृतिप्रेमी केवल श्रोता के रूप में तीन दिन आकर शामिल होते हैं। हर सत्र में विषय से जुड़े श्रोताओं का एक समर्पित वर्ग इस आयोजन ने बना लिया है। बीते वर्षों में तारेक फतह और तसलीमा नसरीन जैसे चर्चित लेखक भी अनेक बार शामिल हुए हैं और कभी किसी विषय या पुस्तक को लेकर विवाद की एक लकीर नहीं देखी गई। तब लगता है कि BLF भारत भवन के लिए एक अपशगुन क्यों बना?
जो भी हो, यह स्पष्ट है कि भारत भवन को साधन संपन्न सरकारी प्रायोजक संस्थाओं से लैस शक्तिशाली BLF के आयोजकों ने विवादों का एक मैदान बना दिया गया है। इससे प्रचार या दुष्प्रचार BLF को जो भी मिला हो मगर भारत भवन की साख अनावश्यक ही चौपट हुई। एक न्यासी के रूप में मेरी चिंता केवल भारत भवन को लेकर है, जो हमारी पीढ़ी को विरासत में मिला है। वह हमने बनाया नहीं है। अगर हम उसको बहुकलाओं का एक निरंतर सक्रिय और जनता से जुड़ा हुआ केंद्र नहीं बना सकते तो कम से कम उसकी छवि को धूमिल करने वाले ऐसे विवादों के अवसर तो पैदा न करें। समय रहते संभलें। नीतियों और निर्णयों पर पुनर्विचार करें। यह जाँच का भी विषय है कि लगातार इतनी बदनामियों के बावजूद BLF को ढोने में दिलचस्पी किसकी है?
मेरा विनम्र सुझाव है कि हर साल पैदा होने वाले ऐसे कटुतापूर्ण प्रसंग का अब पटाक्षेप हो जाना चाहिए। शासन को निर्णय करना चाहिए कि अगले वर्ष से BLF के लिए भारत भवन उपलब्ध नहीं है। लाखों की मदद उन्हें शासन देता ही है। वे चाहें किसी भी बड़े होटल या रिसॉर्ट या धर्मशाला में यह आयोजन कर सकते हैं। भोपाल में जम्बूरी मैदान से लेकर लाल परेड ग्राउंड तक असीमित स्थान हैं। समाज में नेरेटिव बनाने के लिए जैसे भी विषय उन्हें चुनने हों, वे स्वतंत्र हैं, अभिव्यक्ति की अपार स्वतंत्रता अबाधित है और वे धन-साधन संपन्न तो हैं ही। किंतु भारत भवन को बचाना जरूरी है। यह भारत भवन के सभी पाँच प्रभागों को रिस्ट्रक्चर करने का बिल्कुल सही समय है।
मध्य प्रदेश भारत का ह्दय प्रदेश है। यहाँ भारत केंद्रित और स्थानीय प्रासंगिक विषयों की क्या कमी है? मध्य प्रदेश की सामाजिक, सांस्कृतिक विरासत, राजा भोज, विक्रमादित्य, रानी कमलापति, भीम बैठका और हाल ही में देश भर की चर्चा में आए विदिशा के ऐतिहासिक उदयपुर जैसे विषय अनेक हैं, जिन पर विमर्श किया जा सकता था। इनकी जगह पर बाबर जैसे आक्रांता की चर्चा भोपाल में समझ के परे है जबकि अयोध्या आस्था और विकास के मार्ग पर उजाले से भर रही है। नई शिक्षा नीति में इतिहास के पाठ्यक्रमों से भी बाबर-औरंगजेब समेटे जा रहे हैं। तब हम क्यों इतिहास के इन प्रेतों को अपने विमर्श में जिंदा रखना चाहते हैं? यह समय रामायण से राष्ट्रीय पुनर्जागरण तक भारत की अपनी महान गाथाएँ कहने का है। स्वयं प्रधानमंत्री बार-बार यही दोहरा रहे हैं।
मुझे लगता है, ऐसे संवेदनशील और ऊर्जा से भरे अनुकूल समय में बाबर जैसे आक्रमणकारी को विमर्श–केंद्र में लाना न केवल मूर्खतापूर्ण है, बल्कि भारत की आत्मा के वर्तमान प्रवाह के बिल्कुल विपरीत भी। कम से कम शासन के प्रांगण में शासन की सहायता से होने वाले वैचारिक अनुष्ठान को इनसे बचा जाना ही उचित था मगर अत्यंत दुख की बात है कि एक कर्कश विवाद एक बार फिर भारत भवन से जुड़ गया। BLF ने एक लेखक और उसकी किताब को अपनी ढाल बनाकर यह खेल भारत भवन के पवित्र परिसर से किया। यह असहनीय है।
मैं स्वयं लेखक हूँ और भारत में इस्लाम के फैलाव पर दो किताबें मेरी हैं। मैं स्पष्ट करना चाहूँगा कि किसी किताब या किसी लेखक से न्यास का कोई विरोध नहीं है। किंतु मध्य प्रदेश की साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय संस्थाओं को यह संदेश बिल्कुल नहीं जाना चाहिए कि भारत भवन में किसी भी संस्था विशेष या आयोजन विशेष के पक्ष में निर्णय लेने की अलग और मनमानी नीति है। आठ साल से यह एक परंपरा ही बन गई है। BLF की ओर से प्रस्तुत ताजा कटु प्रसंग यह बता रहा है कि घड़ा भर चुका है।
चीन ने एक बार फिर भारत को उकसाने की कोशिश की है। उसने भारतीय इलाके शक्सगाम घाटी पर अपना दावा किया है। 5180 वर्ग किमी का ये क्षेत्र पीओके में पड़ता है, जो भारत का अभिन्न अंग है। इस पर पाकिस्तान ने 1948 में कब्जा किया था और 1963 में चीन को सौंप दिया।
चीन की प्रवक्ता ने बताया ‘अपना क्षेत्र’
चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने जम्मू-कश्मीर में शक्सगाम घाटी पर भारत के दावे को खारिज करते हुए कहा है कि ये चीन का इलाका है इसलिए ‘अपने’ इलाके में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना पूरी तरह से सही है।
#BREAKING: China provoked India yet again, claiming Indian territory as their own. Chinese Foreign Minister Spokesperson has rejected India's claim to the Shaksgam Valley in Jammu & Kashmir.
"The territory you mentioned belongs to China. It’s fully justified for China to conduct… pic.twitter.com/HY2yBekBZ7
चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि जिस इलाके को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वह चीन का ही हिस्सा है। अपने इलाके में इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाना चीन का अधिकार है और इस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता।
माओ निंग ने आगे कहा कि चीन और पाकिस्तान ने 1963 में भारत के विरोध के बावजूद पीओके के क्षेत्र को लेकर समझौता किया था। इस दौरान दोनों देशों ने सीमा तय की थी। चीन इस क्षेत्र से सीपीईसी के तहत आर्थिक गलियारा बनाना चाहता है। हालाँकि चीन ने साफ कहा है कि चीन पाक सीमा समझौते और सीपीईसी का कश्मीर मुद्दे से कोई लेना देना नहीं है। इस पर चीन का रुख पहले जैसा ही है।
कश्मीर को चीन इतिहास से जुड़ा जटिल मुद्दा मानता है और भारत-पाकिस्तान के आपसी बातचीत से सुलझाने का हिमायती है। हालाँकि चीन यह भी कहता है कि वह संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों और अंतरराष्ट्रीय समझौतों का सम्मान करता है।
चीन- पाकिस्तान सीमा समझौते का भारत ने किया विरोध
शक्सगाम घाटी भारतीय इलाका है। भारत ने 1963 में साइन किए गए तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी। भारत ने लगातार इस समझौते को गैर-कानूनी और अमान्य करार दिया है। भारत चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर को भी मान्यता नहीं देता है, क्योंकि ये आर्थिक गलियारा उस भारतीय इलाके से होकर गुजरता है, जिस पर पाकिस्तान ने जबरदस्ती और गैर-कानूनी तरीके से कब्जा किया हुआ है। इसमें कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे इलाके भी शामिल हैं।
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 9 जनवरी 2026 को कहा है कि CPEC के तहत चीन PoK की शक्सगाम घाटी में इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहा है जो पूरी तरह गलत है। उन्होंने कहा, ” हम चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को मान्यता नहीं देते, क्योंकि यह भारत के उस इलाके से होकर गुजरता है, जो पाकिस्तान के जबरन और अवैध कब्जे में है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा हैं। यह बात पाकिस्तान और चीन दोनों को कई बार साफ-साफ बताई जा चुकी है।”
रणधीर जायसवाल ने कहा कि शक्सगाम घाटी भारत का हिस्सा है और भारत 1963 में हुए तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी है और समझौते को हमेशा अवैध माना है।
1962 में चीन से भारत की जंग के बाद पाकिस्तान और चीन में ‘दोस्ती’ हो गई। चीन और पाकिस्तान में सीमा का निर्धारण किया। इसमें भारतीय क्षेत्र, जो पाकिस्तान के कब्जे में था, उसे भी बाँटा गया। पाकिस्तान ने 1948 में कब्जाए शक्सगाम घाटी के 5180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चीन को दे दिया।
समझौते के तहत घाटियों, नदियों आदि को सीमा के निर्धारण का आधार बनाया गया। हालाँकि भारत ने इसका पुरजोर विरोध किया। इस तरह से शक्सगाम घाटी जैसे भारतीय क्षेत्र चीन के कब्जे में आ गए।
CPEC का भारत करता रहा है विरोध
चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा चीन के शिंजियांग प्रांत से पाकिस्तान के बलूचिस्तान स्थित ग्वादर बंदरगाह तक बनाया जा रहा आर्थिक गलियारा है। इस पर करीब 5 लाख करोड़ रुपए चीन खर्च कर रहा है। इसका मकसद चीन की पहुँच को अरब सागर तक पहुँचाना है।
CPEC के तहत चीन सड़क, बंदरगाह, रेलवे और ऊर्जा प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है। ये आर्थिक गलियारा पीओके के गिलगिट-बाल्टिस्तान से होकर गुजरता है। ये क्षेत्र भारत का है, जिस पर पाकिस्तान ने कब्जा कर रखा है।
ये प्रोजेक्ट भारत को घेरने की कोशिश भी है। चीन की विस्तारवादी नीति जगजाहिर है। भारत के अक्साई चिन पर चीन ने कब्जा कर रखा है। पीओके के कुछ क्षेत्रों को पाकिस्तान ने अवैध तरीके से चीन को दे दिया है। अरुणाचल के कुछ हिस्सों पर चीन ने कब्जा कर रखा है। ऐसे में अरब सागर तक चीन की जबरदस्ती पहुँच से भारत के गुजरात जैसे राज्यों के लिए नई मुसीबत पैदा होगी।
वहीं चीन को नए कॉरिडोर से क्रूड ऑयल ले जाना आसान होगा क्योंकि अभी चीन की 80 फीसदी क्रूड ऑयल मलक्का की खाड़ी से होते हुए चीन तक पहुँचता है, जिससे उस पर खर्च काफी आता है। ये रास्ता 16 हजार किलोमीटर का है।
अगर कॉरिडोर से चीन का व्यापार हुआ तो दूरी 5 हजार किलोमीटर कम हो जाएगी। चीन मालदीप, श्रीलंका, बांग्लादेश समेत तमाम हिंद महासागर के देशों से अपनी दोस्ती बढ़ा रहा है। इस रास्ते से इन तक पहुँचने की दूरी भी कम हो जाएगी। दूसरी ओर चीनी नौसेना अरब सागर से लेकर हिंद महासागर पर नजर रखेगी। उत्तर में तिब्बत पर कब्जा कर चीन वैसे ही भारतीय सीमा पर खड़ा है।
कई सालों से शक्सगाम घाटी में इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहा चीन
अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन ने शक्सगाम घाटी में 10 मीटर चौड़ी सड़क का लगभग 75 किलोमीटर हिस्सा पहले ही बना लिया है, जबकि आगे भी कंस्ट्रक्शन जारी है। इससे पहले, चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने सड़क का 36 किलोमीटर हिस्सा बनाया था। इस सड़क के लगातार कंस्ट्रक्शन से चीन भारत के सियाचिन के करीब पहुँच रहा है।
सैटेलाइट इमेज से पता चलता है कि यह सड़क शक्सगाम घाटी के बाहर दो चीनी मिलिट्री पोस्ट से जुड़ी है। इनमें से एक इस इलाके में काम कर रही PLA यूनिट का हेडक्वार्टर हो सकता है। यह सड़क इसलिए अहम है क्योंकि यह ट्रांस-काराकोरम इलाके में है, जो ऐतिहासिक रूप से कश्मीर का हिस्सा है। PoK और शक्सगाम घाटी समेत पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा है, जिसे पाकिस्तान ने गैर-कानूनी तरीके से चीन को दे दिया था।
POK के गिलगित-बाल्टिस्तान में अवैध तरीके से 2021 में एक सड़क बनाने का प्लान किया गया था जो मुज़फ़्फ़राबाद को मुस्तग दर्रे से जोड़ती। मुस्तग दर्रा पाकिस्तान बॉर्डर पर शक्सगाम घाटी से लगता है। बताया गया था कि यह सड़क शिनजियांग में यारकंद से जुड़ेगी, जिसका मतलब है कि यह सड़क शक्सगाम घाटी से होकर चीन के नेशनल हाईवे G219 से जुड़ेगी।
In a significant development, 🇨🇳 road has breached the border at Aghil Pass (4805 m) and entered the lower Shaksgam valley of Kashmir, 🇮🇳 with the road-head now less than 30 miles from 🇮🇳 Siachen
This permanently answers the question of Shaksgam for 🇮🇳
हालाँकि यह सड़क पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में यूरेनियम जैसे मिनरल्स के परिवहन के लिए बनाई गई है, लेकिन भारत के खिलाफ जंग में चीन और पाकिस्तान इस सड़क का इस्तेमाल मिलिट्री ऑपरेशन के लिए कर सकते हैं।
खास बात यह है कि जिस सड़क की बात हो रही है, वह अघिल दर्रे में है। यह दर्रा पहले से तिब्बत के साथ कश्मीर का बॉर्डर रहा है। 1960 में भारत-चीन बॉर्डर पर बातचीत के दौरान चीनी पक्ष से कहा कि भारत सरकार के आधिकारिक मैप में ये इलाका भारत में दिखाते हैं। इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया के 1907 एडिशन मैप और सर्वे ऑफ इंडिया के पब्लिश किए गए पॉलिटिकल मैप मे भी ये भारत का हिस्सा है।”
पाकिस्तान ने चीन को वह इलाका दिया, जो कभी उसका था ही नहीं
शक्सगाम घाटी काराकोरम पहाड़ों की रेंज में एक ऊँचाई वाला इलाका है, जो करीब 5,180 किलोमीटर तक फैला है। यह घाटी सियाचिन ग्लेशियर के उत्तर में है। खास दर्रों के पास होने और PoK में चीन के शिनजियांग के साथ इसके कनेक्शन को देखते हुए इसका सामरिक महत्व बहुत है। हालाँकि 1963 के चीन-पाकिस्तान का अवैध समझौता इसके जड़ में है, हालाँकि ये विवाद 1947 से ही चला आ रहा है।
1947 में इस्लामिक तरीके से भारत के बंटवारे से पहले, शक्सगाम घाटी जम्मू और कश्मीर रियासत का हिस्सा थी। इस सियासत के राजा हरि सिंह थे। यह इलाका हुंजा के लोकल सरदार मीर के राज में आता था। हुंजा ने हिंदू महाराजा के अधिकार को माना। इतिहास गवाह है कि शक्सगाम घाटी और रस्कम घाटी जम्मू और कश्मीर की सीमाओं में शामिल थी। 19वीं सदी के आखिर और 20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश सर्वे ने भी इसे माना था। हालाँकि चीन ने किंग राजवंश के नाम पर ऐतिहासिक संबंधों के आधार पर इस पर दावे किए, लेकिन उन्हें औपचारिक रूप नहीं दिया गया।
भारत के बंटवारे और 1947 में पाकिस्तान के बनने के बाद, पाकिस्तान के सपोर्ट वाले कबायली हमलावरों ने जम्मू और कश्मीर पर हमला किया, जिससे पहला भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हो गया। युद्ध के बीच, महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन यानी विलय पत्र पर साइन किए, जिससे शक्सगाम घाटी सहित पूरा जम्मू और कश्मीर औपचारिक रूप से भारत का हिस्सा बन गया।
लेकिन, लड़ाई के दौरान पाकिस्तान ने उत्तरी कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया, जिसमें शक्सगाम घाटी तक जाने वाले इलाके भी शामिल थे, क्योंकि यह कब्जा गैर-कानूनी था, इसलिए शक्सगाम घाटी समेत पूरा इलाका इंटरनेशनल कानून के मुताबिक आज भी भारतीय इलाका है।
यह माना जाता है कि चीन-पाकिस्तान के रिश्ते तभी मजबूत हुए, जब पाकिस्तान और चीन ने गैर-कानूनी CPEC के लिए हाथ मिलाया। लेकिन, पाकिस्तान लंबे समय से चीन को मना रहा है। चीन-पाकिस्तान के रिश्तों में छह दशकों का मिलिट्री सहयोग, आर्थिक और डिप्लोमैटिक तालमेल, 1963 में शक्सगाम घाटी पर समझौता, 1970 के दशक में न्यूक्लियर सहयोग की शुरुआत, 2013 में ग्वादर का ट्रांसफर और CPEC का ऑफिशियल लॉन्च शामिल है।
1962 में चीन-भारत युद्ध के बाद, पाकिस्तान ने चीन के साथ रिश्ते मज़बूत करने का मौका हाथ से जाने नहीं दिया। 2 मार्च 1963 को, चीन और पाकिस्तान ने चीन-पाकिस्तान फ्रंटियर एग्रीमेंट पर साइन किए। इस एग्रीमेंट के तहत पाकिस्तान ने दूसरे इलाकों में ‘सीमा एडजस्ट’ करने के बदले शक्सगाम वैली का कंट्रोल चीन को दे दिया। हालाँकि, यह एग्रीमेंट कंडीशनल था, जिसमें कहा गया था कि दिया गया इलाका कश्मीर मुद्दे पर भविष्य में भारत-पाकिस्तान के बीच होने वाले किसी भी सेटलमेंट में फाइनल रेजोल्यूशन के अधीन होगा।
गैर-कानूनी होने के अलावा यह समझौता बहुत गलत था। चीन शक्सगाम वैली पर कंट्रोल कैसे कर सकता है, इसे अपने शिनजियांग प्रांत में कैसे मिला सकता है, जबकि यह भी दावा कर सकता है कि यह इलाका कश्मीर पर फाइनल रेजोल्यूशन के अधीन होगा? मान लीजिए, अगर भारत और पाकिस्तान कश्मीर पर सहमत हो जाते हैं, और शक्सगाम वैली को भारत को वापस करने का फैसला किया जाता है, तो क्या चीन, वहां इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी इन्वेस्टमेंट करने के बाद, स्ट्रेटेजिक रूप से महत्वपूर्ण वैली को भारत को सौंप देगा?
भारत ने 1963 के चीन-पाकिस्तान एग्रीमेंट को लगातार इस आधार पर खारिज किया है कि पाकिस्तान ने जम्मू और कश्मीर के उन हिस्सों पर गैर-कानूनी कब्जा कर लिया है जिन्हें अब PoK कहा जाता है, और इस तरह उसके पास भारत के इलाके पर बातचीत करने या उसे सौंपने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। क्योंकि विलय के समय शक्सगाम घाटी जम्मू और कश्मीर का हिस्सा थी, इसलिए PoK पर पाकिस्तान का कंट्रोल एक गैर-कानूनी कब्जा है।
पाकिस्तान को चीन के साथ भारतीय इलाके के बारे में द्विपक्षीय समझौता करने का कोई हक नहीं था। यह नहीं भूलना चाहिए कि हुंजा के मीर ने महाराजा हरि सिंह के अधिकार को मान्यता दी थी, और महाराजा ने कानूनी तौर पर और अपनी मर्जी से पूरा जम्मू और कश्मीर भारत को दे दिया था।
PoK सरकार ने 1949 में पाकिस्तान सरकार के साथ कराची एग्रीमेंट किए, जिसमें गिलगित-बाल्टिस्तान के सभी ज़मीनी अधिकार पाकिस्तान को दे दिए गए थे। खबर है कि इस एग्रीमेंट पर मुश्ताक अहमद गुरमानी (कश्मीर मामलों के मंत्री), सरदार मोहम्मद इब्राहिम खान (तथाकथित ‘आजाद कश्मीर’ के प्रेसिडेंट) और चौधरी गुलाम अब्बास ने साइन किए थे।
समझौते में तथाकथित ‘आजाद कश्मीर’ ने गिलगित-बाल्टिस्तान का पूरा एडमिनिस्ट्रेशन पाकिस्तान को सौंप दिया (जिसने इस इलाके का कुछ हिस्सा चीन को दे दिया)। इसी इलाके से पाकिस्तान ने 5000 स्क्वायर किलोमीटर (शक्सगाम घाटी) चीन को सौंप दिया था।
असल में सरदार इब्राहिम ने बाद में बताया कि उनके साइन नकली किए गए थे। दरअसल उनका साइन मुहम्मद दीन तासीर ने किए थे। कराची एग्रीमेंट पर साइन करने के तुरंत बाद इब्राहिम को पद से हटा दिया गया।
चाहे PoK पर कब्जा हो या शक्सगाम घाटी को सौंपना, पाकिस्तान पहले से ही एक गैर-कानूनी कब्जा करने वाला रहा है, जिसके पास पूरे जम्मू-कश्मीर इलाके के बारे में किसी भी देश के साथ कोई भी एग्रीमेंट करने का कोई कानूनी हक नहीं है।
भारत ने शक्सगाम घाटी में जमीनी हकीकत को बदलने की कोशिशों के खिलाफ चीन के सामने लगातार विरोध जताया है। अभी भी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का पुरजोर विरोध कर रहा है और 1963 में शक्सघाटी को चीनी कब्जे में दिए जाने का विरोध किया था। भारत अपने हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने का अधिकार भी रखता है। पड़ोसियों के रवैये पर भारत का स्टैंड हमेशा साफ रहा है।
भारत में त्यौहार केवल छुट्टियाँ नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक जीवंत माध्यम हैं। मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाया जाने वाला लोहड़ी का पर्व उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब और हरियाणा की आत्मा है। कड़कड़ाती ठंड, ढोल की थाप और अग्नि के चारों ओर नाचते-गाते लोग… यह दृश्य भाईचारे और नई फसल के स्वागत का प्रतीक है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों से एक अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। जिस तरह दिवाली और होली को ‘प्रदूषण’ और ‘पानी की बर्बादी’ के नाम पर निशाना बनाया गया, अब वही नैरेटिव लोहड़ी के साथ भी जोड़ा जा रहा है। मीडिया और सोशल मीडिया के एक वर्ग के जरिए लोहड़ी की पवित्र अग्नि को ‘वायु प्रदूषण’ का कारण बताकर बदनाम किया, जबकि उसी समय पश्चिमी देशों से आए ‘बॉनफायर’ (Bonfire) को एक आधुनिक और कूल ‘कल्चर’ के रूप में पेश किया। इस दोहरी मानसिकता के पीछे का सच और लोहड़ी के वास्तविक महत्व को समझने का प्रयास करते हैं।
लोहड़ी और बॉनफायर: केवल नाम का अंतर नहीं, बल्कि नीयत और इतिहास का फर्क है
आजकल के दौर में किसी भी त्यौहार पर अपनी राय बनाने या उसे सही-गलत ठहराने से पहले हमें यह समझना चाहिए कि वह त्यौहार शुरू क्यों हुआ था। आज हम ‘लोहड़ी’ और ‘बॉनफायर’ दोनों को एक ही तराजू में तौल देते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इन दोनों के बीच का अंतर सिर्फ भाषा का नहीं है।
इनके पीछे की भावना, इनका इतिहास और इनका मकसद एक-दूसरे से पूरी तरह अलग है। जहाँ एक तरफ लोहड़ी हमारी मिट्टी और किसान की मेहनत से जुड़ी है, वहीं बॉनफायर का इतिहास कुछ ऐसा है जिसके बारे में जानकर आप हैरान रह जाएँगे।
लोहड़ी: क्यों यह किसान की मुस्कान और प्रकृति का धन्यवाद है?
लोहड़ी का नाम सुनते ही हमारे मन में आग की लपटें और उसके चारों ओर नाचते-गाते लोगों की तस्वीर आती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह शब्द कहाँ से आया? जानकारों का मानना है कि लोहड़ी शब्द ‘लोह’ और ‘ड़ी’ के मेल से बना है। यहाँ ‘लोह’ का अर्थ उस लोहे के तवे से है जिस पर रोटियाँ सिंकती हैं और ‘ड़ी’ का संबंध ‘रेवड़ी’ से है। यह त्यौहार उस समय आता है जब उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड अपने चरम पर होती है और किसान की रबी की फसल (जैसे गेहूँ और सरसों) खेतों में लहलहाने लगती है।
किसानों के लिए लोहड़ी का मतलब है ‘आर्थिक आजादी’ और ‘समृद्धि’। महीनों की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद जब फसल कटने को तैयार होती है, तो किसान सबसे पहले अग्नि देवता का आभार व्यक्त करता है। वह अग्नि में तिल, गुड़, गजक और मक्का अर्पित करता है। यह केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि यह कहना है कि ‘हे ईश्वर, आपकी कृपा से हमारे घर में अन्न आया है, इसे स्वीकार करें और आगे भी हमें खुशहाल रखें।’ यह त्यौहार इंसान और प्रकृति के गहरे रिश्ते को दर्शाता है।
लोहड़ी का वैज्ञानिक और सामाजिक आधार
अगर हम वैज्ञानिक नजरिए से देखें, तो लोहड़ी के समय उत्तर भारत (खासकर पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली) में तापमान गिरकर 3 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। इतनी भयानक ठंड में शरीर को ऊष्मा (Heat) की जरूरत होती है। प्राचीन समय से ही, जब बिजली या हीटर नहीं होते थे, तब ‘सामूहिक अग्नि’ ही वह जरिया थी जो लोगों को ठंड से बचाती थी।
सामाजिक रूप से भी इसका बड़ा महत्व है। लोहड़ी के बहाने पूरा मोहल्ला या गाँव एक ही आग के पास बैठता है। इसमें कोई अमीर या गरीब नहीं होता। ऊँच-नीच का भेद मिटाकर लोग साथ बैठते हैं, मूँगफली खाते हैं और दुख-सुख बाँटते हैं। यानी यह आग केवल लकड़ी नहीं जलाती, बल्कि समाज के बीच की कड़वाहट को जलाकर भाईचारे की मिठास पैदा करती है।
बॉनफायर का ‘स्याह’ इतिहास: जिसे हम मजा समझते हैं, उसका सच क्या है?
अब बात करते हैं उस ‘बॉनफायर’ की, जिसे आज की पीढ़ी और मीडिया बहुत ‘कूल’ और ‘मॉडर्न’ मानता है। अक्सर हम देखते हैं कि बड़े होटलों या फार्म हाउसों में ‘बॉनफायर पार्टी’ होती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह शब्द कहाँ से आया? बॉनफायर असल में अंग्रेजी के शब्द ‘Bone-fire’ से बना है, जिसका सीधा मतलब है ‘हड्डियों की आग‘।
प्राचीन और मध्यकालीन यूरोप में इस आग का इतिहास बड़ा डरावना था। उस समय जब बड़े पैमाने पर युद्ध होते थे या ऐसी बीमारियाँ (महामारी) फैलती थीं जिनसे हजारों लोग मर जाते थे, तो लाशों के ढेर लग जाते थे। उन लाशों और उनकी हड्डियों को ठिकाने लगाने के लिए जो विशाल आग जलाई जाती थी, उसे ‘बोन-फायर’ कहा जाता था। इतना ही नहीं, जो लोग धर्म या समाज के खिलाफ कुछ बोलते थे (जिन्हें हैरिटिक्स कहा जाता था) या जिन महिलाओं को ‘चुड़ैल’ करार दिया जाता था, उन्हें भी सजा के तौर पर इन्हीं विशाल आग के ढेरों में जिंदा जला दिया जाता था।
आधुनिक दौर की विडंबना: सजा वाली आग ‘मजा’ बन गई
समय बदला और धीरे-धीरे इस ‘बोन-फायर’ को ‘बॉनफायर’ कहा जाने लगा। फ्रेंच भाषा में ‘Bon’ का मतलब ‘अच्छा’ होता है, तो लोगों ने मान लिया कि यह एक ‘अच्छी आग’ है। आज इसे मनोरंजन, शराब और संगीत के साथ जोड़ दिया गया है। इसमें न तो कोई धार्मिक भावना है, न ही प्रकृति के प्रति कोई सम्मान।
सबसे बड़ी विडंबना देखिए- मीडिया और सोशल मीडिया के ‘ज्ञानियों’ का दोहरा मापदंड यहाँ साफ दिखता है। जिस बॉनफायर का इतिहास ‘मौत, सजा और लाशों की हड्डियों’ से जुड़ा है, उसे आज का मीडिया ‘एंजॉयमेंट’ और ‘हाई-फाई कल्चर’ का हिस्सा बताता है। उसके खिलाफ कभी कोई खबर नहीं छपती कि यह पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहा है।
देसी मीडिया में ‘बॉनफायर’ को ‘कल्चर’ बताने का चलन
लेकिन जिस लोहड़ी का आधार ‘जीवन, नई फसल, किसान की खुशी और प्रकृति का पूजन’ है, उसे तुरंत ‘प्रदूषण’ से जोड़ दिया जाता है। उसे बंद करने या रोकने के लिए हर साल अखबारों में लंबी-चौड़ी रिपोर्ट्स छापी जाती हैं। यह सोचना बेहद जरूरी है कि हमारी अपनी पावन परंपरा को ‘विलेन’ और विदेशी ‘सजा वाली आग’ को ‘हीरो’ बनाकर पेश करने के पीछे आखिर मानसिकता क्या है?
बॉनफायर जैसी चीजों को हाइप देने का कार्य मीडिया में इस तरह किया गया कि आजकल ट्रैवल एजेंसियाँ कहीं अगर छुट्टियों का पैकेज बनाती हैं तो उसमें बॉनफायर नाइट का एक अलग इवेंट की तरह बताया जाता है।
परंपरा के विरुद्ध नैरेटिव: लोहड़ी को बदनाम करने की कोई साजिश
पिछले कुछ सालों में एक अजीब सा चलन देखने को मिला है। जैसे ही कोई हिंदू त्यौहार करीब आता है, अचानक से ‘पर्यावरण प्रेमियों’ की बाढ़ आ जाती है। दिवाली पर पटाखों और होली पर पानी की बर्बादी का नैरेटिव सेट करने के बाद, अब लोहड़ी को निशाना बनाया जा रहा है।
इसे ‘इको-फ्रेंडली’ बनाने के नाम पर असल में त्यौहार की रस्मों को ही खत्म करने का एक सुनियोजित प्रयास किया। मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए लोगों के मन में यह बात बिठाने की कोशिश की जाती है कि आपकी आस्था पर्यावरण की दुश्मन है।
निशाने पर त्यौहार: एक रात की अग्नि बनाम साल भर का प्रदूषण
अखबारों और बड़े न्यूज पोर्टल्स में ऐसी खबरें बड़ी चालाकी से पेश की जाती हैं, जिनसे लगे कि लोहड़ी जलते ही शहर की हवा जहरीली हो गई। वे AQI (हवा की गुणवत्ता मापने वाला पैमाना) के आँकड़े दिखाते हैं। जबकि सच यह है कि दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे शहरों में प्रदूषण का स्तर (PM 2.5 और PM 10) पहले से ही सुरक्षित सीमा से कई गुना ज्यादा होता है।
पूरे साल चलने वाले कारखानों, सड़कों पर दौड़ती करोड़ों गाड़ियों और बड़े-बड़े निर्माण कार्यों से जो धुआँ निकलता है, उस पर चुप्पी साध ली जाती है। लेकिन जैसे ही लोहड़ी की एक रात सांकेतिक अग्नि जलती है, उसे पूरे साल के प्रदूषण का विलेन बनाकर पेश कर दिया जाता है।
मीडिया का दोहरा चरित्र: लोहड़ी ‘धुआँ’ है और बॉनफायर ‘स्टाइल’
मीडिया की दोहरी मानसिकता यहाँ एकदम साफ हो जाती है। जब बात लोहड़ी की आती है, तो हेडलाइंस होती हैं- ‘धुएँ से घुट रहा दम’, ‘पेड़ काटने से पर्यावरण का नुकसान’, या ‘इस बार धुएँ वाली नहीं, स्मॉक-फ्री लोहड़ी मनाएँ’।
लेकिन जैसे ही कोई हाई-प्रोफाइल ‘बॉनफायर नाइट’ होती है, तो वही मीडिया लिखता है- ‘कड़कड़ाती ठंड में बॉनफायर पार्टी का मजा लें’, ‘शहर के वो खास ठिकाने जहाँ आप बॉनफायर का आनंद ले सकते हैं’।
यही काम सोशल मीडिया के ‘इनफ्लुएंसर्स’ भी करते हैं। वे लोहड़ी पर तो ज्ञान देंगे कि लकड़ियाँ नहीं जलानी चाहिए, लेकिन अपनी न्यू ईयर पार्टी या हिल स्टेशन की वेकेशन में बॉनफायर के सामने बैठकर शराब के गिलास के साथ फोटो डालेंगे। वहाँ वह आग ‘लक्जरी’ और ‘स्टेटस सिंबल’ बन जाती है, लेकिन वही आग लोहड़ी के आँगन में जलती है तो ‘पिछड़ापन’ और ‘प्रदूषण’ कहलाने लगती है।
इतिहास के साथ छेड़छाड़: राजाओं की चाटुकारिता या जनता का विद्रोह?
कुछ ‘बुद्धिजीवी’ तो एक कदम और आगे निकल जाते हैं। वे यह भ्रामक बात फैलाते हैं कि लोहड़ी का त्यौहार पुराने समय में राजाओं को खुश करने के लिए शुरू हुआ था। यह सरासर गलत और इतिहास को दबाने की कोशिश है। लोहड़ी का सीधा संबंध दुल्ला भट्टी की बहादुरी से है। मुगल शासन के दौरान दुल्ला भट्टी ने उन गरीब हिंदू लड़कियों को बचाया था जिन्हें गुलामी के बाजार में बेचा जा रहा था।
दुल्ला भट्टी ने उन लड़कियों का पिता बनकर उनका कन्यादान किया और आग जलाकर उनके फेरे करवाए। इसलिए लोहड़ी ‘चाटुकारिता’ का नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ ‘विद्रोह’, ‘न्याय’ और ‘भाईचारे’ का त्यौहार है। इसे केवल एक ‘फैशनेबल कल्चर’ कहना इसकी महानता को कम करना है।
एजेंडे से बड़ी है आस्था
राहत की बात यह है कि अब देश की जनता इन प्रोपेगेंडा फैलाने वालों से ज्यादा समझदार हो गई है। लोग त्यौहार छोड़ नहीं रहे, बल्कि उसे अधिक जिम्मेदारी के साथ मना रहे हैं। चंडीगढ़ और दिल्ली-NCR में बहुत से लोग पेड़ की लकड़ियों की जगह ‘गौकाष्ठ’ (गाय के गोबर से बनी लकड़ी) का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे प्रदूषण भी नहीं होता और हमारी धार्मिक मान्यता के अनुसार अग्नि पूजन और शुद्ध हो जाता है।
इसके अलावा, लोग अब घर-घर छोटी आग जलाने के बजाय पूरे मोहल्ले में एक सामूहिक लोहड़ी जला रहे हैं। इससे लकड़ी भी कम लगती है और आपसी भाईचारा भी बढ़ता है। जनता की यह सजगता उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो पर्यावरण के बहाने हमारी संस्कृति को खत्म करना चाहते थे।
पर्यावरण के नाम पर त्यौहारों को नीचा दिखाना एक ‘फैशन’ बन गया है। आज लोग ओपिनियन के नाम पर यह ज्ञान तो आसानी से दे देते हैं कि दीवाली-होली या लोहड़ी कैसे मनाई जाए, लेकिन वे अपनी जीवनशैली में कोई बदलाव नहीं करते। लोहड़ी के जश्न को रोकने की कोशिश सिर्फ इसलिए की गई ताकि हमारे मन में अपनी ही जड़ों के प्रति अपराध बोध पैदा हो सके।
लेकिन लोहड़ी की आँच को बुझाने वाले यह भूल गए कि इसे मनाने वाले वर्ग (विशेषकर पंजाब और हरियाणा) ने इन्हें कभी मौका ही नहीं दिया। आज जनता तथाकथित ‘एक्टिविस्ट’ से कहीं ज्यादा जागरूक है। लोहड़ी की यह पावन अग्नि हमें याद दिलाती है कि हमारी परंपराएँ प्रकृति का सम्मान करना सिखाती हैं, नुकसान पहुँचाना नहीं। हमें अपनी जड़ों पर गर्व करना चाहिए और ऐसे हर एजेंडे को लोहड़ी की इसी अग्नि में भस्म कर देना चाहिए जो हमें अपनी पहचान से दूर ले जाना चाहता है।
यूनाइटेड किंगडम में इस समय बच्चों और युवाओं के जेंडर डिस्फोरिया के इलाज को लेकर बहस चल रही है। जेंडर डिस्फोरिया का मतलब होता है कि कोई बच्चा या युवा अपने जन्म के समय दिए गए जेंडर से खुद को असहज महसूस करता है। ऐसे मामलों में कुछ समय से ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’ नाम की दवाओं का इस्तेमाल किया जाता रहा है जो शरीर में यौवन (प्यूबर्टी) की प्रक्रिया को कुछ समय के लिए रोक देती हैं। 2024 में आई ‘कैस रिव्यू’ नाम की एक सरकारी रिपोर्ट में कहा गया कि इन दवाओं के फायदे और नुकसान को लेकर पुख्ता वैज्ञानिक सबूत नहीं हैं। इसके बाद ब्रिटेन की सरकारी स्वास्थ्य सेवा NHS ने बच्चों पर इन दवाओं के सामान्य इस्तेमाल पर रोक लगा दी।
अब विवाद इसलिए फिर बढ़ गया है क्योंकि जनवरी 2026 से ‘पाथवे’ नाम का एक नया क्लिनिकल ट्रायल शुरू किया जा रहा है, जिसमें इन प्यूबर्टी ब्लॉकर्स को दोबारा बच्चों पर आजमाया जाएगा। Christian Today की रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें 10 से 16 साल की उम्र के लगभग 220 बच्चों को प्यूबर्टी ब्लॉकर्स दिए जाएँगे। इसी के विरोध में एक ऑनलाइन पिटीशन शुरू की गई है, जिस पर अब तक 1 लाख से ज्यादा लोग साइन कर चुके हैं और सरकार से इस ट्रायल को रोकने की माँग कर रहे हैं।
याचिका में की गई है क्या माँग?
8 जनवरी 2025 को संसद की आधिकारिक वेबसाइट पर यह याचिका डाली गई थी। हैरी पॉटर की लेखिका जे.के. रोलिंग जैसी हस्तियों द्वारा समर्थन के बाद इसे भारी समर्थन मिला। जे.के. रोलिंग ने कहा कि उन्होंने इस याचिका पर हस्ताक्षर किए हैं और यह बच्चों पर किया जा रहा एक अनैतिक प्रयोग है।
I've signed. This is an unethical experiment on children who can't give meaningful consent.https://t.co/zHvzVIyq7g
इस याचिका को डालने वाले थेरेपिस्ट जेम्स ऐस्स ने बताया कि इस याचिका पर एक लाख लोगों का समर्थन जुटाने के लिए 6 महीनों का समय था लेकिन ऐसे 4 दिन में ही हो गया।
इस याचिका में माँग की गई है, “सरकार जानती है कि ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’ से बच्चों के शरीर और मन पर ऐसे असर पड़ सकते हैं जो बाद में पूरी तरह ठीक न हों। ‘कैस रिव्यू’ के बाद खुद सरकार ने माना है कि इनमें जोखिम हैं। इसके बावजूद सरकार की अनुमति से होने वाले एक ट्रायल के तहत सैकड़ों बच्चों को ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’ दिए जाने की तैयारी की जा रही है।”
याचिका में कहा गया है, “इस ट्रायल को रद्द किया जाए। जो बच्चे अपने शरीर को लेकर असहज महसूस करते हैं, जिनमें से कई ऑटिज़्म से भी प्रभावित होते है उनके लिए सही रास्ता समय देना, प्यूबर्टी को स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ने देना और उन्हें समझने-सहजने वाली थैरेपी देना है। समाधान यह नहीं हो सकता कि बच्चों को ऐसी मेडिकल प्रक्रिया में डाल दिया जाए जो दिमाग के विकास, हड्डियों की बढ़त, यौन क्षमता को नुकसान पहुँचा सकती है और भविष्य में बाँझपन तक का खतरा पैदा कर सकती है।”
‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’ क्या हैं?
प्यूबर्टी ब्लॉकर्स जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में गोनाडोट्रोपिन-रिलीजिंग हार्मोन (GnRH) एनालॉग्स कहा जाता है, ऐसी दवाएँ हैं जो शरीर में सेक्स हार्मोन्स (एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरॉन) के उत्पादन को दबाती हैं। ये प्यूबर्टी से जुड़े शारीरिक बदलावों को रोकती हैं जिनमें लड़कियों में स्तनों का विकास, मासिक धर्म, कूल्हों का चौड़ा होना और लड़कों में वृषण का बड़ा होना, आवाज का गहरा होना, चेहरे पर बाल आना जैसे बदलाव शामिल हैं। ये दवाएँ इंजेक्शन, इम्प्लांट या नेजल स्प्रे के रूप में दी जाती हैं, और आमतौर पर हर 1-3 महीने में दोहराई जाती हैं।
अमेरिकी सरकार के स्वास्थ्य विभाग से जुड़े नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, आमतौर पर प्यूबर्टी लड़कियों में 8 से 13 साल की उम्र के बीच और लड़कों में 9 से 14 साल की उम्र के बीच शुरू होती है और यह 5 चरणों में आगे बढ़ती है। इन दवाओं को शुरुआत में उन बच्चों के इलाज के लिए बनाया गया था जिनमें प्यूबर्टी सामान्य उम्र से बहुत पहले शुरू हो जाती थी। बाद के वर्षों में इनका इस्तेमाल जेंडर डिस्फोरिया से जूझ रहे बच्चों और युवाओं में भी किया जाने लगा। यह माना गया कि प्यूबर्टी को रोककर उन्हें समय मिलेगा ताकि वे बिना शरीर में होने वाले अनचाहे बदलावों के तनाव के अपनी जेंडर पहचान को समझ सकें और बाद में यह फैसला कर सकें कि आगे जेंडर-अफर्मिंग हार्मोन थेरेपी लेनी है या नहीं।
‘जेंडर आइडेंटिटी’ को लेकर बढ़ रहा है भ्रम!
UK में NHS की एक विशेष सेवा है जिसे ‘जेंडर आइडेंटिटी डेवलपमेंट सर्विस’ (GIDS) कहा जाता है। यह उन बच्चों और युवाओं की मदद करती है जिन्हें अपनी जेंडर पहचान को लेकर भ्रम, असहजता या मानसिक परेशानी महसूस होती है। नवंबर 2023 में यूके की संसद में एक रिपोर्ट पेश की गई जिसमें बताया गया कि साल 2011–12 में इस सेवा के पास केवल 210 बच्चों और युवाओं को भेजा गया था लेकिन 2021–22 तक यह संख्या बढ़कर 5,000 से भी ज्यादा हो गई।
यानी लगभग दस सालों में जेंडर पहचान से जुड़ी समस्याओं के लिए मदद लेने वाले बच्चों और युवाओं की संख्या में तेज बढ़ोतरी हुई है। GIDS पूरे UK के बच्चों और युवाओं की देखभाल करता है। इनमें से कुछ बच्चे और युवा ट्रांसजेंडर होते हैं जबकि कई ऐसे भी होते हैं जो केवल अपनी पहचान को लेकर उलझन या तनाव से गुजर रहे होते हैं।
जेंडर डिस्फोरिया और युवाओं में इसका इलाज
जेंडर डिस्फोरिया एक मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने जन्म के समय मिले जेंडर को लेकर असहज महसूस करता है। इससे तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। ब्रिटेन में ऐसे मामलों की संख्या तेजी से बढ़ी है और विशेषज्ञ बताते हैं कि इन बच्चों में से कई ऑटिज्म या अन्य मानसिक समस्याओं से भी जूझ रहे होते हैं।
जेंडर डिस्फोरिया के इलाज के दो मुख्य तरीके हैं। इसमें पहला है- ‘एफर्मेटिव केयर’ जिसमें बच्चे की बताई गई जेंडर पहचान को स्वीकार कर हार्मोन या सर्जरी जैसे मेडिकल इलाज दिए जाते हैं। दूसरा है- ‘एक्सप्लोरेटिव थेरेपी’ जिसमें बच्चे की मानसिक स्थिति, परिवार, समाज और भावनात्मक कारणों को समझने की कोशिश की जाती है।
ब्रिटेन में पहले NHS की टैविस्टॉक क्लिनिक, जिसे GIDS भी कहते हैं, में प्यूबर्टी ब्लॉकर्स का खूब इस्तेमाल होता था लेकिन 2020 में कीरा बेल नामक मरीज का केस के बाद यह सवाल उठा कि क्या बच्चे इसके जोखिम समझ सकते हैं। इसके बाद ऐसे इलाजों पर रोक लगी। दूसरे देशों में भी रुख बदल रहा है। फिनलैंड और स्वीडन ने इन दवाओं पर पाबंदी लगाई है।
‘कैस’ रिव्यू में क्या सामने आया?
2020 में NHS ने एक रिव्यू शुरू करवाया जिसकी अुगआई डॉ. हिलेरी कैस ने की थी। इसका उद्देश्य युवाओं के लिए दी जा रही जेंडर आइडेंटिटी सेवाओं की गहराई से जाँच करना था, क्योंकि ऐसे मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही थी और इलाज से जुड़े ठोस सबूत कमजोर माने जा रहे थे। अप्रैल 2024 में इसकी फाइनल रिपोर्ट पब्लिश की गई।
इसमें पाया गया कि प्यूबर्टी ब्लॉकर्स के पीछे का वैज्ञानिक आधार अभी स्पष्ट नहीं है। जेंडर डिस्फोरिया, मानसिक स्वास्थ्य या सामाजिक-मनोवैज्ञानिक स्थिति पर इसके प्रभावों को लेकर ठोस सबूत बहुत कम हैं। दिमागी विकास और यौन-मनोवैज्ञानिक विकास पर इसके क्या असर पड़ते हैं, यह भी अभी ठीक से पता नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया कि इन दवाओं से हड्डियों की मजबूती, दिमाग के विकास और प्रजनन क्षमता पर संभावित प्रभाव हो सकता है
रिपोर्ट में कहा गया, “18 साल से कम उम्र के बच्चों और युवाओं में मर्दाना या औरतों वाले हार्मोन देने को लेकर भी कई सवाल बने हुए हैं। कम उम्र में इलाज शुरू करने वालों पर लंबे समय तक किए गए अध्ययन उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए इसके भविष्य के नतीजों को पूरी तरह समझना संभव नहीं है। डॉक्टर भी यह भरोसे से नहीं बता सकते कि कौन-से बच्चे आगे चलकर स्थाई रूप से ट्रांसजेंडर पहचान अपनाएँगे।”
ट्रायल के समर्थन और विरोध में तर्क
इस ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर’ ट्रायल को लेकर कई तरह की चिंताएँ सामने आई हैं। आलोचकों का कहना है कि यह ट्रायल नैतिक रूप से सही नहीं है और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े करता है। जेनस्पेक्ट जैसे समूहों के अनुसार, ट्रायल की योजना में उन बच्चों का जिक्र नहीं है जो बाद में अपना फैसला बदल सकते हैं। उनका कहना है कि लगभग 98 प्रतिशत बच्चे आगे चलकर हार्मोन इलाज पर चले जाते हैं, जिससे भविष्य में संतान पैदा करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। ट्रायल केवल दो साल का है, जबकि पछतावे के मामले कई बार 7-11 साल बाद सामने आते हैं। इन समूहों ने दिसंबर 2025 में विरोध प्रदर्शन किए और सांसदों से इस ट्रायल को रोकने की माँग की।
वहीं, ट्रायल के समर्थकों का कहना है कि इससे ठोस जानकारी मिलेगी और परिवार बेहतर फैसले ले पाएँगे। सरकार ने इसे मंजूरी दी है लेकिन कई दलों के नेता इसके खिलाफ हैं। दूसरे देशों में भी ऐसे इलाजों को रोका जा रहा है। कुल मिलाकर यह बहस बच्चों की सुरक्षा और सही इलाज को लेकर है और फैसला इसी आधार पर होना चाहिए।
सोमनाथ मंदिर के रेनोवेशन के बाद मई 1951 में उद्घाटन कार्यक्रम के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को बुलाया गया था। हमने पिछले हिस्से में देखा कि कैसे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इतना हंगामा किया कि राष्ट्रपति खुद कार्यक्रम में जाएँ, फिर भी राजेंद्र प्रसाद कार्यक्रम में शरीक हुए। सोमनाथ मामले को लेकर नेहरू के कुछ और लेटर देखते हैं।
सोमनाथ मंदिर का प्रोग्राम पास आ रहा था। इसी बीच, अप्रैल 1951 में, ट्रस्ट के अध्यक्ष जामसाहेब दिग्विजय सिंह जडेजा ने कुछ पड़ोसी देशों में इंडियन एम्बेसी को लेटर लिखकर वहाँ की नदियों का पानी भेजने का आग्रह किया। इनका इस्तेमाल उद्घाटन के मौके पर किया जाना था। ‘सेक्युलर’ जवाहरलाल ने इस पर एतराज जताया। दर्द इतना ज़्यादा था कि नेहरू ने एक साथ कई लेटर फाड़ दिए।
नेहरू आगे कहते हैं, ‘मुझे समझ नहीं आता कि हम इस बात की चिंता क्यों नहीं करते कि दूसरे हमारे कामों, हमारी एक्टिविटीज के बारे में क्या सोचते हैं।’ वे आगे कहते हैं, ‘मुझे यह भी समझ नहीं आता कि चीन से नदी का पानी भारत कैसे लाया जाएगा? मैं इन सब से बहुत परेशान हूँ।’ चिट्ठी में आगे नेहरू मुंशी से पूछते हैं कि अगर ऐसी चिट्ठियाँ दूसरे उच्चायोग को भेजी गई हैं तो उन्हें बताया जाए, ताकि वे उन्हें भी चिट्ठी लिख सकें।
अगर आप इस चिट्ठी को देखें, तो यह साफ है कि पहले प्रधानमंत्री को एक हिंदू मंदिर के जीर्णोद्धार से ज्यादा इस बात की चिंता थी कि कोई दूसरा देश क्या सोचेगा। वे कहते रहते थे कि तुम ऐसा मत करो, नहीं तो दूसरे देश हमारे बारे में क्या सोचेंगे। मोदी जैसे युगपुरुष की तुलना नेहरू जैसे व्यक्ति से नहीं हो सकती। ऐसा इरादा भी नहीं है, क्योंकि अब तो विदेशी राष्ट्राध्यक्ष भी मंदिरों में जाने लगे हैं। मोदी के आने के बाद यह बदलाव आया है।
सौराष्ट्र सरकार के पाँच लाख के फंड खर्च करने पर दिक्कत
अब बात करते हैं पाँच लाख के फंड की। नेहरू इस बात से परेशान थे कि सौराष्ट्र सरकार (उस समय गुजरात नहीं था) इस प्रोग्राम पर खर्च क्यों कर रही थी। जवाहरलाल ने इस गुस्से में कई चिट्ठियाँ लिखी थीं।
21 अप्रैल को सौराष्ट्र के उस समय के मुख्यमंत्री यू. एन. ढेबर को लिखे एक लेटर में नेहरू कहते हैं कि उन्हें खबरों से पता चला कि सौराष्ट्र सरकार ने सोमनाथ मंदिर में उद्घाटन कार्यक्रम के लिए 5 लाख की रकम मंजूर की है।
नेहरू कहते हैं, ‘मैं यह पढ़कर हैरान रह गया और मैं जानना चाहता हूँ कि क्या यह सच है। सोमनाथ मंदिर की जो भी अहमियत हो, यह सरकार का काम नहीं है और मंदिर के लिए पैसे इकट्ठा करना गैर-सरकारी लोगों का काम है। मुझे नहीं लगता कि आम लोगों के पैसे का सही इस्तेमाल हो रहा है।’
22 अप्रैल को नेहरू ने उस समय के जामसाहेब दिग्विजय सिंह जडेजा को एक चिट्ठी लिखी। पत्र में नेहरू बिना किसी औपचारिकता के सीधे अपनी बात शुरू की।
नेहरू कहते हैं, ‘मैं सोमनाथ मंदिर में होने वाले इस प्रोग्राम को लेकर बहुत परेशान हूँ। अगर यह कोई पर्सनल/प्राइवेट मामला होता तो ठीक था, लेकिन ऐसी बातें फैल रही हैं कि सरकार भी इसमें शामिल है। कुछ लोगों को लगता है कि भारत सरकार भी इसमें शामिल है और सौराष्ट्र सरकार को 100 परसेंट ऐसा लगता है। खबरों में कहा गया है कि सौराष्ट्र सरकार इस प्रोग्राम के लिए पाँच लाख रुपए खर्च करेगी।’
नेहरू के मुताबिक, ‘जहाँ तक भारत सरकार की बात है, मैं पार्लियामेंट में साफ-साफ कह दूँगा कि सरकार का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन मुझे सौराष्ट्र सरकार पर शक है और मुझे लगता है कि सरकार होने के नाते उन्हें इसमें शामिल नहीं होना चाहिए और पैसे का खर्च भी गलत है। मैंने चीफ़ मिनिस्टर (ढेबर) को भी बता दिया है।’
यहाँ नेहरू फिर से राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद का मुद्दा उठाते हैं। वे लिखते हैं, ‘मेरी दिक्कत यह है कि राष्ट्रपति प्रोग्राम में जा रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि इससे गलत मैसेज जाएगा, लेकिन अब यह उनका पर्सनल मामला है, इसलिए मैं इसमें दखल नहीं देना चाहता।’
इसके बाद, नदियों के पानी के बारे में नेहरू जाम साहेब से कहते हैं, ‘मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि आपने अलग-अलग उच्चायोग से अपनी नदियों का पानी भेजने के लिए कहा था। कुछ उच्चायोग ने इस पर एतराज जताया है और इससे हम मुश्किल में पड़ गए हैं। याद रखें कि आप सिर्फ सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टी ही नहीं हैं, बल्कि सौराष्ट्र के राजप्रमुख भी हैं।’
एक बार फिर नेहरू कहते हैं, ‘मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं इसमें क्या कर सकता हूँ। लेकिन प्रोग्राम जो भी हो, मुझे यह साफ करना है कि भारत सरकार का इस कार्यक्रम से कोई लेना-देना नहीं है। पाकिस्तान इस मामले का फायदा उठा रहा है और यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि हम ‘सेक्युलर देश’ नहीं हैं। ‘गरीब’ (जवाहरलाल ने यहाँ इंग्लिश में ‘गरीब’ शब्द का इस्तेमाल किया है) अफगानिस्तान को भी इसमें घसीटा जा रहा है।’
खुद नेहरू का लिखा यह लेटर दिखाता है कि नेहरू पाकिस्तान से धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट लेने के लिए कितने बेचैन थे। पहले PM को इस बात की चिंता थी कि अफगानिस्तान से लेकर बर्मा और चीन तक सभी देश क्या कहेंगे, उनकी चिंता सिर्फ सोमनाथ मंदिर के प्रोग्राम की नहीं थी। उनके साथ जो होगा, सो होगा!
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को चिट्ठी
अब बात करते हैं एक जरूरी चिट्ठी की, जो 21 अप्रैल, 1951 को लिखी गई थी। किसे? पाकिस्तान के उस समय के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को ‘मेरे प्यारे नवाबजादा’ कहकर बुलाते हुए, नेहरू लिखते हैं, ‘मैं आम तौर पर रेडियो पाकिस्तान के ब्रॉडकास्ट की तरफ़ आपका ध्यान नहीं खींचता। लेकिन मैंने यह भी कहा है कि कुछ ब्रॉडकास्ट, खासकर पश्तो भाषा में, अक्सर पूरी तरह से झूठे आरोप लगाते हैं। 17 अप्रैल को पेशावर से पश्तो में किया गया ब्रॉडकास्ट इसका एक उदाहरण है और अगर आप इस मामले पर ध्यान देंगे तो मैं आभारी रहूँगा।’
आगे, ‘यह कहानी कि सोमनाथ मंदिर के दरवाजे अफगानिस्तान से भारत लाए जाएँगे, पूरी तरह झूठी है। इसमें ज़रा भी सच्चाई नहीं है। इसे सार्वजनिक तौर पर मना किया जा चुका है। असलियत यह है कि किसी को नहीं पता कि ऐसे कोई दरवाज़े हैं भी या नहीं और अफ़गानिस्तान से ऐसा कुछ भी भारत नहीं भेजा जा रहा है। फिर भी यह सब पाकिस्तानी प्रेस में चल रहा है। ब्रॉडकास्ट या रिपोर्ट्स कितना सच कह रहे हैं, यह तय करना मैं आप पर छोड़ता हूँ।’
नेहरू इस बात को लेकर कितने परेशान थे कि ‘प्यारे नवाबज़ादा’ का देश क्या सोचेगा, वहाँ का प्रेस क्या कह रहा है। यह लेटर इसका सबूत है।
22 अप्रैल को एक तरफ नेहरू ने जाम साहेब को लेटर भेजा और दूसरी तरफ जाम साहेब का लेटर नेहरू के पास पहुँचा। जाम साहेब ने प्रोग्राम के लिए प्राइम मिनिस्टर को एक औपचारिक आमंत्रण पत्र भेजा था। लेटर के जवाब में, नेहरू ने जाम साहेब को एक और लेटर लिखा। तारीख 24 अप्रैल, 1951।
इसमें नेहरू आमंत्रण के लिए शुक्रिया अदा करते हुए कहते हैं कि वह अभी दिल्ली नहीं छोड़ सकते। फिर प्रोग्राम को लेकर अपना गुस्सा निकालने लगते हैं।
सेक्युलर नेहरू ‘पुनरुत्थान’ से परेशान थे
17 अप्रैल, 1951 को विदेश मंत्रालय के सेक्रेटरी जनरल और विदेश सचिव को भेजे एक नोट में नेहरू लिखते हैं, “मैंने प्रेसिडेंट और मुंशी दोनों से कहा है कि मुझे ये सब एक्टिविटीज़ बिल्कुल पसंद नहीं हैं। क्या विदेश मंत्रालय को पता है कि ऐसे लेटर (नदी के पानी के बारे में) विदेश में हमारी एम्बेसी को भेजे जा रहे हैं? मैं चाहता हूँ कि आप (विदेश मंत्रालय) एम्बेसी को लिखकर बता दें कि वे इन आग्रह पर कोई ध्यान न दें।”
नेहरू ने उसी दिन चीन में भारतीय राजदूत के. एम. पनीकर को एक चिट्ठी लिखी। इस चिट्ठी में PM नेहरू लिखते हैं, ‘मैंने प्रेसिडेंट से कहा था कि इस प्रोग्राम में शामिल न हों, लेकिन उन्होंने पहले ही न्योता स्वीकार कर लिया था और तब से मैं ज़्यादा दखल नहीं दे सकता था। इसलिए अब मैं उनके दौरे और वहाँ जो कुछ भी हो रहा है, उसे जितना हो सके कम करने की कोशिश कर रहा हूँ।’
17 तारीख को, उस समय के होम मिनिस्टर सी. राजगोपालाचारी को एक और चिट्ठी लिखी गई। इस चिट्ठी में, नेहरू चीन में भारत के राजदूत पनीकर की एक चिट्ठी को कोट करते हैं और कहते हैं, ‘मैं आपका ध्यान उस ओर दिला रहा हूँ, जो उन्होंने (पनीकर) सोमनाथ मंदिर के बारे में लिखा है। मैं यह सब देखकर परेशान हो रहा हूँ और समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या करूँ। अपनी एम्बेसी को चिट्ठी लिखना और किसी प्रोग्राम के लिए उनकी नदी से पानी माँगना कितना अजीब है!’ इस चिट्ठी में नेहरू इस बात को लेकर भी परेशान दिखते हैं कि बर्मा की कम्युनिस्ट पार्टी क्या कहेगी। नेहरू इस बात को लेकर भी परेशान थे कि पाकिस्तान क्या सोचेगा। इस पर आगे बात होगी।
17 तारीख को केएम मुंशी को एक और लेटर लिखा जाता है। लेटर में नेहरू कहते हैं कि उन्हें चीन में भारतीय एम्बेसडर (पानीकर) का एक लेटर मिला है, जिसमें सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टियों ने उन्हें लिखा है और नदी का पानी भेजने के लिए कहा है। इसका इस्तेमाल मंदिर में धार्मिक समारोहों के लिए किया जाएगा। नेहरू लिखते हैं, ‘इस लेटर ने हमारी एम्बेसी को मुश्किल में डाल दिया है और मैं भी उतना ही परेशान हूँ। अगर किसी और ने यह आग्रह की होती, तो बात अलग होती। अगर सरकार से जुड़े लोग ऐसा लेटर भेजते हैं और उसमें प्रेसिडेंट का नाम भी है, तो इससे विदेश में हमारे लिए शर्मिंदगी वाली स्थिति पैदा होगी।’
नेहरू लिखते हैं, ‘मैंने इस बारे में आपको पहले भी लिखा है। मैं इस ‘पुनरुत्थान’ से बहुत परेशान हूँ और इस बात से भी कि राष्ट्रपति, कुछ मंत्री और आप राजप्रमुख के तौर पर इस प्रोग्राम में शामिल हो रहे हैं। मुझे लगता है कि यह हमारी सरकार के उसूलों के खिलाफ है। इसके नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर बुरे नतीजे हो सकते हैं। निजी तौर पर, हर कोई जो चाहे कर सकता है, लेकिन हम सार्वजनिक तौर पर ऐसा नहीं कर सकते।’
केएम मुंशी को एक और लेटर लिखा गया।
लेटर में नेहरू लिखते हैं, ‘मैं इस बात से बहुत परेशान हूँ कि सरकार विदेश में सोमनाथ प्रोग्राम से जुड़ी हुई है। इस मामले पर पार्लियामेंट में सवाल उठाए जाएँगे और मैं यह साफ कर दूँगा कि सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन मैं सौराष्ट्र सरकार के बारे में ऐसा नहीं कह सकता, जो इस प्रोग्राम पर पाँच लाख खर्च कर रही है। मुझे लगता है कि इस हालत में सरकार का यह खर्च उठाना पूरी तरह से गलत है।’
जामसाहेब पर अप्रत्यक्ष आरोप
जामसाहेब का जिक्र करते हुए नेहरू लिखते हैं, ‘मैंने इस मामले पर प्रेसिडेंट और जामसाहेब को लेटर लिखे हैं। जामसाहेब न सिर्फ सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टियों के चेयरमैन हैं, बल्कि सौराष्ट्र के राजप्रमुख भी हैं।’ यहाँ नेहरू जामसाहेब पर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि उन्होंने एम्बेसी को जो लेटर लिखे, उन्होंने हमें मुश्किल में डाल दिया है! यह उन लेटर के बारे में है, जिनमें नदियों के पानी के बारे में रिक्वेस्ट की गई थी।
24 अप्रैल को मृदुला साराभाई को लिखे अपने लेटर में भी नेहरू इन सभी बातों का जिक्र करते हैं और अपने दिल की बात कहते हैं। वह प्रेसिडेंट के प्रोग्राम में शामिल होने, उन्हें सौराष्ट्र सरकार द्वारा फंड के इस्तेमाल से कैसे नहीं रोक पाए, और भी बहुत कुछ बताते हैं। वह आगे कहते हैं कि मृदुला को प्रेसिडेंट से मिलकर उन्हें समझाना चाहिए और गुजराती प्रेस में हो रही बुराई के बारे में बताना चाहिए।
प्रोग्राम का कवरेज कम करने की कोशिशें
सारी कोशिशें नाकाम होने के बाद, 28 अप्रैल को नेहरू ने उस समय के सूचना और प्रसारण मंत्री आर. आर. दिवाकर को एक चिट्ठी लिखी। वजह? यह निर्देश देने के लिए कि प्रोग्राम का कवरेज कम किया जाए और ऐसा न लगे कि सरकार किसी भी तरह से इसमें शामिल है।
नेहरू दिवाकर को लिखते हैं, ‘इस सोमनाथ प्रोग्राम में सरकार को शामिल करने से देश और विदेश में हमें नुकसान होगा। मुझे कई शिकायतें भी मिल रही हैं। लोग पूछ रहे हैं कि क्या एक ‘सेक्युलर’ सरकार इस तरह से बर्ताव कर सकती है? मैं बस इतना कह सकता हूँ कि यह कोई ‘सरकारी प्रोग्राम’ नहीं है।’
इसके बाद नेहरू कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि अगर हालात ऐसे बने, तो हमारे रेडियो ब्रॉडकास्ट को सोमनाथ प्रोग्राम का कवरेज पूरी तरह से कम कर देना चाहिए, ताकि किसी भी तरह से ऐसा न लगे कि यह कोई सरकारी प्रोग्राम है।’
सोमनाथ प्रोग्राम की तारीख पास आ रही थी। इसी बीच 2 मई, 1951 को नेहरू ने सभी मुख्यमंत्रियों को एक लेटर लिखा। लेटर में 19 अलग-अलग बिन्दू थे। इनमें 17वां पॉइंट सोमनाथ मंदिर से जुड़ा था।
नेहरू एक बार फिर मुख्यमंत्रियों के सामने साफ करते हैं कि सरकार इसमें किसी भी तरह से शामिल नहीं है। वह यह भी चेतावनी देते हैं कि भले ही इसके लिए पब्लिक सपोर्ट हो, हमें याद रखना होगा कि ऐसा कुछ भी नहीं किया जा सकता, जिससे सेक्युलरिज्म को नुकसान हो। उन्होंने आगे यह डर भी जताया कि देश में कई कम्युनल ताकतें एक्टिव हैं और हमें उनसे लड़ना होगा। एक समझदारी भरी सलाह देते हुए नेहरू ने लिखा, ‘सरकारों के लिए हमेशा सेक्युलर और नॉन-कम्युनल रुख अपनाना जरूरी है।’
कार्यक्रम से दो दिन पहले, 9 मई को नेहरू ने विदेश मंत्रालय को एक नोट भेजा, जिसमें यह सारी भावनाएँ हैं, इसलिए अलग से चर्चा की कोई ज़रूरत नहीं है।
13 जून, 1951 को नेहरू ने सर्वपल्ली राधाकृष्णन को एक चिट्ठी लिखी। तब तक सोमनाथ का कार्यक्रम पूरा हो चुका था।
इस चिट्ठी में नेहरू लिखते हैं, ‘आपने सोमनाथ कार्यक्रम में कुछ मंत्रियों के होने का ज़िक्र किया। मैं सहमत हूँ। सच तो यह है कि मैंने उन्हें रोकने की कई कोशिशें कीं, लेकिन वे जाने के लिए तैयार थे। सोमनाथ में जो हुआ, उससे मैं बहुत दुखी था। मैंने यह कहने की बहुत कोशिश की कि सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन सरदार पटेल के कुछ फैसलों की वजह से सरकार पहले ही कुछ हद तक इसमें शामिल हो चुकी थी।
आखिरी चिट्ठी 1 अगस्त, 1951 को लिखी गई थी, जो मुख्यमंत्रियों को भेजी गई चिट्ठी थी। यहाँ भी नेहरू ने एक बार फिर सोमनाथ प्रोग्राम का जिक्र किया और कहा कि इससे भारत की इमेज खराब हुई और पाकिस्तान ने इसका पूरा फ़ायदा उठाकर प्रोपेगैंडा फैलाया।
कुल मिलाकर, नेहरू ने सोमनाथ मुद्दे पर सत्रह चिट्ठियाँ लिखीं। उनको एतराज था कि सरकार भी किसी न किसी तरह से इसमें शामिल थी, जबकि सच तो यह था कि पैसा लोगों ने इकट्ठा किया था। नेहरू की धर्मनिरपेक्षता आड़े आ रही थी। नेहरू को इस बात की ज्यादा चिंता थी, कि दूसरे देश क्या कहेंगे, पड़ोसी आतंकवादी देश पाकिस्तान क्या कहेगा।
इन देशों से मान्यता पाने की इतनी ज्यादा इच्छा थी कि उन्होंने हजारों साल बाद फिर से बनाए जा रहे हिंदू मंदिर के गर्व को एक तरफ रख दिया, लेकिन इस बात पर जोर देते रहे कि सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है। मानो सरकार को इस प्रोग्राम पर शर्म आ रही हो! नेहरू की बातें कम से कम इसी ओर इशारा करती हैं।
अगर एक हिंदू देश में हिंदू मंदिर बन रहा है, तो हिंदुओं द्वारा चुनी गई सरकार इसमें क्यों शामिल नहीं होनी चाहिए? नेहरू ने सेक्युलरिज़्म की इम्पोर्टेड परिभाषाओं के असर में आकर बहुसंख्यक के साथ खराब बर्ताव करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई। एक तरह से इन चिट्ठियों के जरिए कहा जा सकता है कि उन्होंने बार-बार बहुसंख्यक का अपमान किया।
आज समय बदल गया है। आज सरकार ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ मना रही है। चलिए उसी मुद्दे पर बात खत्म करते हैं जिससे हमने पहला हिस्सा शुरू किया था। यह सब करने में मौजूदा सरकार को सेक्युलरिज़्म परेशान नहीं करता। यह 2014 में बदली सोच की हवा का सुखद नतीजा है। राम मंदिर भी इसी का नतीजा था। दो आर्टिकल की यह सीरीज़ इस शुभकामना के साथ खत्म करते हैं कि कुछ सालों बाद इसमें काशी-मथुरा भी जुड़ जाएगा।
(ये लेख मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। )
राजनीति सर्कस है या नहीं, यह अलग बहस का विषय हो सकता है। लेकिन इसमें जोकरों की संख्या अच्छी-खासी है। ऐसा कहना बिल्कुल भी बढ़ा-चढ़ाकर नहीं होगा। जब किसी नेता का राजनीतिक करियर खत्म हो जाता है और वह पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाता है, तब भी मीडिया और सोशल मीडिया में चर्चा बने रहने के लिए उसे उलटे-सीधे और अजीबो-गरीब बयान देने पड़ते हैं।
गुजरात में ऐसे लोगों की संख्या कितनी है, इसके लिए कोई जनगणना हुई हो ऐसा तो ध्यान में नहीं आता, लेकिन शंकरसिंह वाघेला इस सूची में अपना नाम काफी समय से शामिल करवाने में लगे हुए हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके शंकरसिंह ने कुछ साल पहले कॉन्ग्रेस से नाता तोड़ने के बाद मुख्यधारा की राजनीति से लगभग दूरी बना ली है। अब तो वे चुनाव भी नहीं लड़ते। यह अलग बात है कि हर चुनाव से पहले ‘बापू’ एक नई पार्टी लेकर आते हैं, उनकी पार्टी थोड़ी-बहुत हलचल मचाती है और नतीजों के बाद फिर शांत हो जाती है।
काफी समय से ‘बापू’ चर्चा में नहीं थे। हाल ही में वे अचानक सक्रिय हो गए हैं। उनसे ज्यादा सक्रिय उनका सोशल मीडिया हो गया है। आजकल अगर आप शंकरसिंह की फेसबुक वॉल देखें, तो रोज दो-पाँच रील पोस्ट की हुई मिलेंगी। यह सब बिल्कुल हाल ही में शुरू हुआ है। इनमें से ज्यादातर क्लिप अलग-अलग चैनलों को दिए गए इंटरव्यू से ली गई हैं।
इन इंटरव्यू में शंकरसिंह हमेशा अलग-अलग मुद्दों पर बीजेपी, मोदी-शाह और गुजरात सरकार पर हमला करते रहते हैं। और इसमें कोई आपत्ति भी नहीं है। विपक्ष के नेता के तौर पर यह उनका काम ही माना जाता है। लेकिन अब उन्होंने दिशा बदल ली है और एक खतरनाक रास्ता अपना लिया है। बीजेपी और मोदी पर हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण करने का आरोप लगाने के लिए वे गोधरा हिंदू हत्याकांड को बीच में ले आए हैं।
गोधरा हिंदू हत्याकांड पर शंकरसिंह के एक इंटरव्यू की क्लिप चार दिन पहले यानी 8 जनवरी 2026 को पोस्ट की गई थी। उस क्लिप में बेहद घिनौनी, अपमानजनक और बेबुनियाद बातें कही गई हैं।
शंकरसिंह का कहना है कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस का डिब्बा बाहर से नहीं, बल्कि अंदर से जलाया गया था। उनका यह भी कहना है कि स्थानीय मुस्लिमों को तो यह तक पता नहीं था कि ट्रेन किस समय आएगी और किस डिब्बे में कौन लोग सवार हैं।
इतना ही नहीं, शंकरसिंह आगे दलील देते हैं कि डिब्बे को अंदर मौजूद किसी व्यक्ति ने ही आग लगा दी थी। वे यह भी कहते हैं कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि बीजेपी हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच दुश्मनी पैदा कर सके और चुनाव में इसका फायदा उठा सके।
शंकरसिंह कहते हैं, “हिंदुओं को बाँटो, मुस्लिमों को बाँटो, लोगों को धर्म के आधार पर बाँटो। अगर आप लोगों को धर्म के आधार पर बाँटना चाहते हैं तो क्या होगा? ऐसा करने का एक प्लान था, मैं कहूँगा कि एक साजिश थी, इस साजिश में गोधरा में कारसेवकों की गाड़ी जला दी गई… यह इन कारसेवकों के लौटने का समय नहीं था, बल्कि अयोध्या जाकर कारसेवा करने का समय था।”
वे आगे कहते हैं, “उन्हें वापस आना था, यह किसे पता था? यह तो अंदर का आदमी ही जान सकता था। गोधरा के मुस्लिमों को कहाँ पता था कि कौन कहाँ है? किस डिब्बे पर लिखा था कि इसमें कारसेवक हैं? उस डिब्बे को साजिश के तहत अंदर से जलाया गया। उसमें सभी हिंदू थे। इतना ही नहीं, उन शवों को सफेद कपड़ों में लपेटकर अहमदाबाद में शोक यात्रा निकालने की भी योजना बनाई गई। यह कितना राक्षसी दिमाग वाला प्लान होगा। गुजरात में बीजेपी को सत्ता में लाने के लिए गोधरा में डिब्बा जलाया गया। इतना ही नहीं, रक्षक ही भक्षक बन गए।”
गोधरा में क्या हुआ था, इसकी स्वतंत्र जाँच हो चुकी है। देश की सर्वोच्च अदालत फैसला सुना चुकी है। कई मुस्लिम दोषियों को सजा भी दी जा चुकी है। इसके बावजूद दो दशक बाद भी ऐसी बेबुनियाद बातें सामने आती रहती हैं। लेकिन यहाँ गंभीरता इसलिए ज्यादा है, क्योंकि ये बातें किसी आम व्यक्ति ने नहीं, बल्कि उसी राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ने कहीं हैं, जहाँ यह घटना घटी थी
क्या शंकरसिंह इतने मूर्ख हैं कि उन्हें 27 फरवरी को वास्तव में क्या हुआ था, इसकी जानकारी ही नहीं है? क्या उन्हें नहीं पता कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में इस घटना के बारे में क्या लिखा गया है? क्या उन्हें यह भी नहीं मालूम कि स्थानीय मुस्लिमों ने एक दिन पहले बकायदा योजना बनाकर, साजिश रचकर, पत्थर और पेट्रोल इकट्ठा किया था और अगले दिन जब साबरमती एक्सप्रेस स्टेशन पर आई तो उसके दो डिब्बों को बाहर से बंद करके आग लगा दी गई थी? इन सभी सवालों का जवाब स्वाभाविक रूप से ‘नहीं’ ही है।
क्या एक राजनेता, वह भी पूर्व मुख्यमंत्री स्तर का व्यक्ति, इतनी नीचे की सोच तक गिर सकता है कि हत्याकांड में मारे गए 59 कारसेवकों का अपमान करे? यह कहना कि डिब्बा अंदर से जलाया गया था, क्या उन कारसेवकों के बलिदान, उनकी शहादत और उनके परिवारजनों का अपमान नहीं है?
ट्रेन किस समय आएगी, यह किसे पता था- ऐसी बचकानी दलीलें शंकरसिंह ने दी हैं। लेकिन क्या उन्हें नहीं पता कि साजिश पहले से रची जा चुकी थी और एक दिन पहले एक गेस्ट हाउस में बैठक भी हुई थी? “मुस्लिमों को कैसे पता होता कि ट्रेन कब आएगी और किस डिब्बे में कौन बैठे हैं।” ऐसा सवाल उठाने वाले शंकरसिंह को क्या यह पता नहीं है कि इन्हीं मुस्लिम अपराधियों ने पहले से पेट्रोल इकट्ठा कर रखा था और यह सब अदालत में साबित हो चुका है। अदालत दोषियों को सजा सुना चुकी है और उनकी जमानत भी खारिज कर चुकी है।
27 फरवरी को साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे जलाए जाने की घटना में जिन 59 हिंदुओं की मौत हुई थी, वे सभी कारसेवक थे। इनमें 27 महिलाएँ और 10 बच्चे शामिल थे। उनका इतना ही ‘अपराध’ था कि वे अपने आराध्य के जन्मस्थान से कारसेवा करके लौट रहे थे। अपनी आस्था को प्रकट करने की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। और इतना ही नहीं, इसके बाद भी सालों तक उन पर यह आरोप लगाए जाते रहे कि डिब्बा अंदर से जलाया गया था या फिर कोई नेता अपनी राजनीतिक चमकाने और किसी खास समुदाय को खुश करने के लिए उन्हीं कारसेवकों पर आरोप थोप देता है।
शंकरसिंह की यह रील, यह लिखे जाने तक, 10 लाख से ज्यादा बार देखी जा चुकी है। कमेंट बॉक्स में लोग उनकी बातों को सच मानकर आगे बढ़ा रहे हैं- यही हमारा सामूहिक दुर्भाग्य है। हम यही प्रार्थना कर सकते हैं कि शंकरसिंह को सदबुद्धि मिले। और एक और प्रार्थना करें कि जीवन में कभी शंकरसिंह की मुलाकात उन 59 कारसेवकों के परिवारजनों से न हो। क्योंकि उस समय उन परिवारों का सामना करना उन्हें जिस कठिनाई में डालेगा, वैसी कठिनाई एक 80 वर्ष से ऊपर के वरिष्ठ राजनेता को झेलनी पड़े, यह हम नहीं चाहते।
(मूलरूप से यह रिपोर्ट गुजराती भाषा में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
ईरान में इस वक्त इस्लामी शासन के खिलाफ बड़े पैमाने पर सड़क पर प्रदर्शन हो रहे हैं। लोग खामेनेई की सरकार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। उधर, खामेनेई सरकार इन प्रदर्शनकारियों पर हिंसक कार्रवाई कर रही है। खामेनेई सरकार ने पूरे देश में इंटरनेट तक बंद कर दिया है।
इस बीच प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए स्पेसएक्स(SpaceX) ने ईरान में अपनी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा ‘स्टारलिंक’ को चालू किया था। लेकिन अब स्टारलिंक को भी बंद किया जा रहा है। इसके लिए रूस की तकनीक और चीन के शोध का इस्तेमाल किया जा रहा है।
Russia supplied the hardware. China published the playbook. Iran just proved it works.
Starlink: 80% packet loss.
Expert monitoring Iranian internet for 20 years: “I have never seen such a thing in my life.”
खामेनेई सरकार के इंटरनेट बंद करने के बाद स्टारलिंक ने चौंकाया
ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों के बीच आपस में बात करने और प्रदर्शन को संगठित करने में इंटरनेट और सोशल मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका रही है। इसका असर देखकर इस्लामी शासन ने 08 जनवरी 2026 को पूरे देश में इंटरनेट बंद कर दिया। यह इंटरनेट बंदी गुरुवार शाम 6.45 बजे से लागू हुई। क्लाउडफेयर रडार की रिपोर्ट के अनुसार, इसके बाद ईरान में इंटरनेट ट्रैफिक लगभग ‘पूरी तरह शून्य’ हो गया।
पूरी तरह इंटरनेट बंद करने से पहले IPv6 ट्रैफिक में तेज गिरावट दर्ज की गई थी। इससे संकेत मिलता है कि जैसे-जैसे प्रदर्शन तेज हो रहे थे, ईरान की इस्लामी सरकार धीरे-धीरे और चुनकर इंटरनेट बंद कर रही थी।
ईरान का यह पूरी तरह इंटरनेट बंद बहुत उन्नत और योजनाबद्ध तरीके से हुआ है। सरकार अपने खास सरकारी संचार को चालू रख रही है, लेकिन आम लोगों के लिए बाहरी दुनिया से जुड़ने वाला इंटरनेट पूरी तरह काट दिया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, VPN और प्रॉक्सी सेवाएँ भी इस बार ज्यादातर काम नहीं कर रही हैं, जबकि पहले ईरान के लोग इन्हीं तरीकों से इंटरनेट बंदी को पार करते रहे हैं।
Proton VPN sessions originating in Iran are dipping, confirming the infrastructure which allows people to access the internet is being shut down.
सरकार की निगरानी वाले लोकप्रीय ऐप रूबिका(Rubika) और ईता(Eita) को भी बंद कर दिया गया है। इसके अलावा ईरान में बैंकिंग सेवाएँ, कैब बुकिंग ऐप्स जैसे स्नैप(Snapp) और टैप्सी(Tapsi), ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म और अंतरराष्ट्रीय फभोन कॉल पर भी रोक लगा दी गई है।
सरकार का मानना है कि इन कदमों से प्रदर्शन शांत हो जाएँगे, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि इससे गुस्सा और बढ़ गया है। इसी वजह से पहले से ज्यादा लोग खामेनेई सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं।
इस बीच 09 जनवरी 2026 को एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने ईरान में स्टारलिंग इंटरनेट सेवा मुफ्त में चालू कर दी। जिन प्रदर्शनकारियों के पास तस्करी से लाए गए स्टारलिंग टर्मिनल थे, उन्होंने सरकार की पाबंदियों को पार कर बिना सेंसर वाला इंटरनेट इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
यह याद दिलाना जरूरी है कि साल 2022 के महसा अमीनी आंदोलन और 2019 के सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान भी स्टारलिंक एक बड़ा सहारा बना था। ईरान में स्टारलिंग डिवाइस रखने और इसके सैटेलाइट इंटरनेट का इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध है, फिर भी हजारों की संख्या में स्टारलिंग टर्मिनल चोरी-छिपे देश में लाए गए।
अनुमान लगाया गया कि ईरान में इस समय लगभग 40 से 50 हजार स्टारलिंग सब्सक्राइबर्स मौजूद हैं।
ईरानी सरकार ने स्टारलिंक सिग्नल को किया जाम
ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों पर हो रही हिंसक कार्रवाई के बीच खबर है कि ईरानी अधिकारियों ने कई इलाकों में स्टारलिंक के सिग्नल जाम करने में सफलता पा ली है, जिससे बड़े स्तर पर इंटरनेट में दिक्कतें पैदा हुई हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, ईरानी सरकार सेना में इस्तेमाल होने वाले शक्तिशाली जैमर का उपयोग कर रही है। इससे स्टारलिंक के अपलिंक और डाउनलिंक डेटा में भारी नुकसान हो रहा है। यह नुकसान 30 प्रतिशत से बढ़कर 09 जनवरी 2026 तक 80 प्रतिशत तक पहुँच गया।
ईरानी अधिकारियों की इस कार्रवाई में GPS सिग्नल में भी दखल शामिल है, जबकि स्टारलिंग को टर्मिनल और सैटेलाइट को जोड़ने के लिए GPS पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके कारण ईरान के कई प्रदर्शन वाले इलाकों में इंटरनेट या तो बहुत कमजोर हो गया या लगभग पूरी तरह बंद हो गया।
इंटरनेट शोधकर्ता और मियान ग्रुप में इंटरने सुरक्षा और डिजिटल अधिकारों के निदेशक आमिर रशिदी ने कहा कि अपने 20 साल के शोध अनुभव में उन्होंने कबी ऐसे सेना-स्तर के जैमर नहीं देखे, जिनका इस्तेमाल ईरानी सरकार स्टारलिंक को रोकने के लिए कर रही है। रशिदी ने कहा कि इतनी उन्नत तकनीक या तो ईरान ने खुद विकसित की है, या फिर यह रूस या चीन ने ईरान को दी है।
यह बात समझना जरूरी है कि स्टारलिंक को ब्लॉक करना नामुमकिन नहीं है। पहले भी रूस यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट को जाम कर चुका है। लेकिन ईरान का इतनी बड़े स्तर पर ऐसा कर पाना हैरान करने वाला है। इससे यह टूटती है कि LEO(Low Earth Orbit) सैटेलाइट सिस्टम को जाम करना लगभग असंभव है।
हालाँकि, रूस, ईरान या चीन की तरफ से कोई अधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान का यह ‘किल स्विच’ तरीका रूस के हार्डवेयर, चीन की तकनीकी जानकारी और ईरान में किए गए परीक्षणों का नतीजा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान सरकार द्वारा अपनाया गया यह ‘किल स्विच’ तरीका देश की पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचा रहा है। अनुमान है कि हर एक घंटे के इंटरनेट बंद रहने से ईरान को करीब 15.6 लाख डॉलर का नुकसान हो रहा है।
खास बात यह है कि जैमिंग की तकनीक बहुत उन्नत और नई है, और रिपोट्स के अनुसार इसमें रूस के इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (EW) सिस्टम इस्तेमाल होते हैं। खासकर Murmansk-BN और Krasukha-4 सिस्टम। रूस दशकों से EW सिस्टम विकसित कर रहा है और उसने तीन बड़े EW सिस्टम बनाए हैं: रडार जाम करने के लिए Krasukha-4, मोबाइल नेटवर्क को बाधित करने के लिए Leer-3 और रणनीतिक इलेक्ट्रॉनिक रुकावट के लिए Murmansk-BN शामिल हैं।
रूस ने इस सिस्टम का इस्तेमाल यूक्रेन के साथ जारी युद्ध में किया, जिससे यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट को प्रभावित किया। हालाँकि, यह हमेशा के लिए बंद नहीं हुआ। रूस की इस सफलता के बाद स्पेसएक्स ने स्टारलिंक में सॉफ्टवेयर अपडेट किए ताकि इसे रोक सकें।
रूस के अलावा, कभी भी ताइवान पर हमला करने वाले चीन ने भी स्टारलिंग को बाधित करने की तकनीक पर रिसर्च की है। उन्होंने कई ग्राउंड स्टेशन से एक साथ जैमिंग करने का तरीका खोजा है। नवंबर 2025 में चीन के शोधकर्ताओं ने ताइवान में संभावित संघर्ष की स्थिति में स्टारलिंक इंटरनेट को जाम करने का सिमुलेशन किया था।
चीन ने अपने Simulation research of distributed jammers against mega-constellation downlink communication transmissions नाम के रिसर्च में पाया कि स्टारलिंक इंटरनेट सिस्टम को प्रभावी रूप से जाम करने के लिए लगभग 1000 से 2000 एयरबोर्न डिवाइस की जरूरत होगी।
रिसर्च में लिखा है,”स्टारलिंक के ऑर्बिटल प्लेन स्थिर नहीं हैं और इस कंस्ट्रलेशन की मूवमेंट ट्रैजेक्ट्री बहुत जटिल है। दृश्य क्षेत्र में आने वाले सैटेलाइट्स की संख्या लगातार बदलती रहती है। यह समय और जगह दोनों में अनिश्चितता किसी भी तीसरे पक्ष के लिए स्टारलिंक कंस्ट्रलेशन को मॉनिटर या कंट्रोल करने में बड़ी चुनौती पैदा करती है।”
यह भी लिखा, “जैमर्स को ग्रिड-आधारित तरीके से तैनात किया जाता है ताकि विरोधी पक्ष के पास जगह के हिसाब से लचीलापन बढ़े। इसके साथ ही जैमिंग की संभावना और प्रभावशीलता मापने का तरीका भी अपनाया गया है। असली सैटेलाइट ऑपरेशन डेटा के आधार पर स्टारलिंक सिस्टम को उदाहरण मानकर, रेडियो फ्रीक्वेंसी पावर, ग्रिड की दूरी और एंटेना की रेडिएशन पैटर्न के अलग-अलग हालात में जैमिंग कवरेज रेंज निकाली गई।”
आगे कहा गया, “सिमुलेशन के नतीजे दिखाते हैं कि जब नोड ट्रांसमिशन पावर 26 dBW है, तो हर नोड का औसत जैमिंग कवरेज 38.5 km² तक पहुँच सकता है। यह मेगा-कंस्ट्रलेशन्स के नियमन और प्रबंधन में मदद करता है।” यह अध्ययन Zheijang University और Beijing Institute of Technology के शोधकर्ताओं Gu Hanqing, Yang Zhuo, Zhang Peng और Wen Xiaowen ने किया है।
भारी प्रतिबंध और लगातार अमेरिका और इजरायल के साथ टकराव में रहने के अलावा बढ़ती घरेलू नाराजगी के चलते ईरान में इस्लामी शासन कई सालों से अपनी इंटरनेट नियंत्रण क्षमताओं को बढ़ा रहा है। ईरानी सरकार एक राष्ट्रीय इंटरनेट विकसित करने की योजना बना रही है, जो चीन के ग्रेट फायरवॉल जैसी होगी।
पिछले साल इजरायल और ईरान संघर्ष के दौरान इंटरनेट बंद होने के बावजूद ईरानी लोगों ने स्टारलिंक का इस्तेमाल किया, लेकिन इस बार पहली बार ईरानी अधिकारी इस सैटेलाइट इंटरनेट सेवा को देश में बड़े स्तर पर प्रभावी रूप से निशाना बना रहे हैं।
बोलने की जरूरत नहीं कि स्पेसएक्स भी इसका जवाब देने के लिए उपाय करेगी। जैसे कि फ्रीक्वेंसी होपिंग या बीम एडजस्टमेंट आदि। ताकि ईरानी अधिकारियों द्वारा पैदा की गई रुकावट को रोका जा सके।
आर्थिक संकट, भारी महँगाई और दबावपूर्ण इस्लामी शासन के खिलाफ ईरान में विरोध प्रदर्शन तेज
28 दिसंबर 2025 को तेहरान में दुकानदारों और बाजार व्यापारियों की एक स्थानीय हड़ताल से शुरू हुए विरोध देखते ही देखते पूरी ईरान के लगभग सभी 31 प्रांतों में फैल गए। ईरान की सड़कों पर सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामेनेई के खिलाफ ‘तानाशाह मौत के काबिल हैं’ जैसे नारे लगाए जा रहे हैं, जबकि इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स अभी भी प्रदर्शनकारियों को पकड़ने में लगे हैं।
लोग निर्वासित शाह रजा पहलवी की वापसी की भी माँग कर रहे हैं। अब तक 500 से ज्यादा लोग मार जा चुके हैं, इनमें बच्चे भी शामिल हैं। इसके अलावा लगभग 48 सुरक्षाकर्मियों की भी जान गई हैं। अमेरिका के ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट न्यूज (HRANA) के अनुसार, इस्लामी शासन ने अब तक 10,600 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया है।
बता दें कि ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से गंभीर आर्थिक संकट के कारण हैं। हालाँकि सत्ता परिवर्तन की आवाजे भी काफी तेज हैं। कारण ईरानी रियाल का अचानक ढहना है, जो अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक रूप से लगभग 1.42 से 1.45 मिलियन तक गिर गया है। केवल 2025 में ही रियाल अपनी आधी कीमत खो चुका है।
यह भी उल्लेखनीय है कि रियाल कभी भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले बहुत मजबूत मुद्रा नहीं रही। जब मोहम्मद रजा फर्जिन ने सेंट्रल बैंक का नेतृत्व संभाला, उस समय रियाल का एक्सचेंज रेट 4,30,000 प्रति डॉलर था। हालाँकि, अचानक गिरकर 1.42 मिलियन हो जाने से यह साफ दिखा कि ईरानी मुद्रा कितनी गहरी मुश्किल में पहुँच गई है।
ईरानी मुद्रा की इस रिकॉर्ड गिरावट के पीछे लंबे समय से चल रहे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, जून 2025 में इजरायल के साथ संघर्ष के बाद तेल आय में कटौती और घरेलू आर्थिक खराब प्रबंधन मुख्य कारण हैं। इसके अलावा सरकार की उदारीकरण नीतियों ने भी इस गिरावट को काफी बढ़ावा दिया है।
इसका नतीजा यह हुआ कि ईरान उच्च स्तर की महँगाई से जूझ रहा है। दिसंबर 2025 में आधिकारिक महँगाई दर 42.2 प्रतिशत तक पहुँच गई। खाद्य वस्तुओं की कीमतें सालाना आधार पर 72 प्रतिशत तक बढ़ गईं, जबकि मेडिकल सामान की कीमते 50 प्रतिशत तक बढ़ीं।
आयात पर बढ़ती निर्भरता, विदेशों में फँसे हुए फंड और विदेशी मुद्रा तक पहुँच में असफलता के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था गहरी मुसीबत में है। IMF के अनुसार, देश की GDP ग्रोथ 2023 में 5.7 प्रतिशत से गिरकर 2024 में 3.7 प्रतिशत हो गई और 2026 में अनुमानित रूप से केवल 0.6 प्रतिशत रह जाएगी।
खरीदने की शक्ति कम होने के कारण लाखों लोग बुनियादी जरूरत की चीजें, खाना और स्वास्थ्य सेवाएँ भी मुश्किल से खरीद पा रहे हैं। असहनीय जीवन यापन की लागत के अलावा नई ईरानी साल में होने वाले संभावित टैक्स बढ़ोतरी ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। ईरानी करदाता डर रहे हैं कि टैक्स बढ़ाए जाने के बाद उनकी हालत और भी खराब हो जाएगी।
(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में यूँ तो शोध और बीमारियों का इलाज होता है लेकिन पिछले कुछ समय में इसमें फैल रहा इस्लामी कट्टरपंथ का कैंसर अब सामने आने लगा है। हिंदू महिला डॉक्टर को लव जिहाद में फँसाकर उसका डॉ. रमीजुद्दीन द्वारा उत्पीड़न किए जाने का मामले सामने आने के बाद परत-दर-परत कट्टरपंथियों की साजिश सामने आती गई। इस कहानी में महिलाओं के उत्पीड़न का दर्द है, रमीज जैसे कट्टरपंथियों की साजिश है और सपा-बसपा जैसे राजनीतिक दलों का संरक्षण भी है।
इस कहानी की जड़ें पीलीभीत से शुरू होती हैं। रमीजुद्दीन और उसके अब्बा सलीमुद्दीन मूल रूप से पीलीभीत के रहने वाले थे। बाद में सलीमुद्दीन, खटीमा जाकर बस गया और उसने अपना सरनेम ‘मलिक’ रख लिया। वहाँ जाकर उसने एक होम्योपैथिक मेडिकल स्टोर खोला और इसके जरिए ही महिलाओं से नजदीकियाँ बढ़ानी शुरू कीं। सलीमुद्दीन ने 4 हिंदू महिलाओं से निकाह किया और उन्हें मुस्लिम बनने पर मजबूर किया।
सूत्रों के मुताबिक, सलीमुद्दीन असल में पीलीभीत के एक काजी के संपर्क में था और देवबंद में आता-जाता रहा था। परिवार के भीतर मजबही कट्टरता बढ़ती चली गई और वही हिंदू घृणा उनके बेटे रमीजुद्दीन तक पहुँची। रमीजुद्दीन पढ़ाई में तेज था। उसका चयन 2012 में आगरा मेडिकल कॉलेज में हो गया। यहीं से कहानी एक नया मोड़ लेती है।
आगरा मेडिकल कॉलेज में ‘इस्लामिक मेडिकोज मीट’: धर्मांतरण का अड्डा
KGMU में डॉक्टर रहे भूपेंद्र सिंह बताते हैं कि यह बात 2012 की है जब रमीज ने आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज में MBBS में दाखिला लिया। तब तक प्रदेश में सपा की सरकार आ चुकी थी और कट्टरपंथी सोच रखने वाले लोगों का हौसला बढ़ गया था। आगरा मेडिकल कॉलेज में ‘इस्लामिक मेडिकोज मीट’ नाम से बैठके होने लगीं और इन बैठकों में मौलाना और सीनियर छात्र जूनियर्स को यह सिखाने लगे कि हिंदू लड़कियों से कैसे नजदीकी बढ़ाई जाए। इस्लामिक मेडिकोज नाम का एक वॉट्सऐप ग्रुप भी था जिसमें ये कट्टरपंथी जुड़े हुए थे।
डॉक्टर भूपेंद्र ने कहा, “उस कॉलेज में कई मुस्लिम डॉक्टरों ने हिंदू लड़कियों को प्रेम-जाल में फँसाया और बाद में उनका धर्म परिवर्तन कराया। रमीज के भी चार–पाँच करीबी मुस्लिम दोस्त थे, जो इसी सोच के साथ काम कर रहे थे। KGMU में उसका एक दोस्त पिछले एक साल से इसी तरह की गतिविधियों में लगा हुआ है।”
परिवार से भी उसे समर्थन मिलता था, अब्बा सलीमुद्दीन उसे धर्मांतरण के लिए लगातार प्रेरित करते थे। इतना ही नहीं रमीजुद्दीन लड़कियों को सेक्स पॉवर दिखाने के लिए सलीमुद्दीन के अनुमति से अमेरिकन गाँजा मँगवाता था। इसके बाद लड़कियों को अपनी सेक्स पॉवर को अल्लाह की नेमत बताता था।
KGMU का जाकिर नाइक कनेक्शन
अब आगरा से वापस लौटते हैं KGMU पर। डॉक्टर भूपेंद्र बताते हैं कि 2004 के आसपास KGMU में कुछ मेडिकल छात्र भगौड़े इस्लामी कट्टरपंथी डॉ. जाकिर नाइक के संपर्क में आ गए। धीरे-धीरे कैंपस के कुछ हिस्सों में बकरदाढ़ी रखना और हिजाब पहनना आम होने लगा। इसी दौर में जाकिर नाइक की विचारधारा से जुड़े कट्टरपंथी हिंदू लड़कियों को फँसाने लगे थे। बताया जाता है कि इसमें BDS के छात्र ज्यादा सक्रिय थे।
डॉक्टर भूपेंद्र ने कहा, “सपा-बसपा के समय इन लोगों का हौसला बढ़ा। तीन-चार साल में यही छात्र सीनियर बने और खुद तकरीर करने लगे। यह गैंग 2011-12 तक सक्रिय रहा।” उसी समय आगरा में भी ‘इस्लामिक मेडिकोज मीट’ के नाम पर मुस्लिम मेडिकल छात्रों को इकट्ठा कर उनका ब्रेनवॉश किया जाने लगा। आगरा मेडिकल कॉलेज में मुस्लिम डॉक्टरों और हिंदू लड़कियों के निकाह का पैटर्न काफी ज्यादा दिखने लगा।
यह साफ नहीं है कि KGMU और आगरा के ये समूह आपस में जुड़े थे या अलग-अलग काम कर रहे थे। इतना जरूर है कि मेडिकल कॉलेजों में मौलानाओं का आना-जाना धीरे-धीरे सामान्य होता गया। बस्ती मेडिकल कॉलेज में पिछले एक साल से मौलाना आने लगे। बुलंदशहर मेडिकल कॉलेज में तो एक फर्स्ट-ईयर के HOD पर मेडिकल साइंस पढ़ाते समय हदीस के उदाहरण देने का आरोप लगा, जिसे बाद में साथी फैकल्टी ने समझाकर रोका।
बुलंदशहर में मुस्लिम छात्रों की संख्या अधिक होने के कारण नमाज की व्यवस्था के लिए प्रिंसिपल पर दबाव भी बनाया गया। हालाँकि, विरोध के बाद यह संभव नहीं हो पाया। कुल मिलाकर, मौलानाओं की मौजूदगी अब कई मेडिकल कॉलेजों में आम हो गई है।
सूत्र बताते हैं कि एक पूर्व मेडिकल कॉलेज की प्रिंसिपल जो अब पूर्वांचल के एक कॉलेज की प्राचार्य हैं अपने एक मुस्लिम छात्र के साथ लिव-इन में रह रही हैं। उन्होंने अपने पति से तलाक लेने का फैसला किया है और मामला कोर्ट में है।
वर्षों से KGMU में चल रहा धर्मांतरण और लव जिहाद का खेल
डॉ भूपेंद्र बताते हैं कि आज से करीब 10-15 साल पहले भी KGMU धर्मांतरण का बड़ा अड्डा बना हुआ था। उस समय सपा-बसपा की सरकारें थीं और आसपास की मस्जिदों से मौलाना अक्सर कैंपस में आते-जाते थे। बाद में योगी सरकार आने के बाद काफी समय तक हालात शांत रहे। पिछले कुछ सालों से यह गतिविधियाँ फिर से शुरू हो गई हैं।
वे बताते हैं कि कुछ मुस्लिम नर्सें योजनाबद्ध तरीके से हिंदू नर्सों और मुस्लिम स्टाफ के बीच दोस्ती करवाती हैं। धीरे-धीरे बात शारीरिक संबंधों तक पहुँचाई जाती है और फिर धर्म परिवर्तन की दिशा में दबाव बनाया जाता है। KGMU के गाँधी वार्ड में नर्सिंग स्टाफ की एक महिला का धर्मांतरण कराकर निकाह कराया गया। एक अन्य मामले में धर्मांतरण हो चुका है और निकाह की तैयारी बताई जा रही है।
इसी तरह माइक्रोबायोलॉजी विभाग में भी एक संविदाकर्मी महिला को एक अधेड़ मुस्लिम कर्मचारी द्वारा अपने प्रभाव में लेने की कोशिश का आरोप सामने आया है। बताया जाता है कि रमीज के गैंग से जुड़े लोग भी ऐसी ही गतिविधियों में शामिल हैं।
हाल ही में, KGMU का एक इंटर्न डॉक्टर मोहम्मद आदिल पर नर्सिंग छात्रा से के बलात्कार का आरोप लगा। इससे पहले उसके कई संबंध हिंदू लड़कियों के साथ थे। बाद में उसने उन्हें छोड़ दिया और एक बेहद कम उम्र की मुस्लिम नर्सिंग छात्रा के करीब चला गया। उसने अपनी एक मुस्लिम महिला मित्र से कहा कि हिंदू लड़कियों के साथ उसके पुराने रिश्तों को गलत नहीं समझना चाहिए क्योंकि उसके मुताबिक यह ‘अच्छा काम’ था।
सिर्फ छात्र नहीं, VC से प्रोफेसर तक: KGMU में कट्टरपंथ के कई चेहरे
यह मामला सिर्फ छात्रों या जूनियर डॉक्टरों तक सीमित नहीं है। आरोप है कि KGMU में नीचे से ऊपर तक यानी VC से लेकर प्रोफेसर स्तर तक इस कट्टर सोच का असर दिखता रहा है। किस तरह पीड़ितों पर भी ये कट्टरपंथी दबाव बनाते हैं, डॉ. रमीज का मामला उसका एक उदाहरण है।
जब डॉ. रमीज का मामला तब सामने आया तब पीड़िता के पिता उसी दिन विभागाध्यक्ष सुरेश बाबू के पास पहुँचे जिस दिन उनकी बेटी ने आत्महत्या की कोशिश की थी। लेकिन आरोप है कि विभाग की दो कट्टर फैकल्टी डॉ. सुमायरा कयूम और डॉ. वाहिद अली ने फैकल्टी मीटिंग में विभागाध्यक्ष सुरेश बाबू पर दबाव बना दिया। इसके बाद सुरेश बाबू ने फैकल्टी और रेजिडेंट डॉक्टरों से कह दिया कि लड़की मानसिक रूप से अस्थिर है और लड़का अच्छा है।
इतना ही नहीं रेजिडेंट डॉक्टरों पर यह लिखने का दबाव डाला गया कि लड़की ठीक नहीं है। हालाँकि, रेजिडेंट डॉक्टरों ने ऐसा लिखने से इनकार कर दिया। पीड़िता के पिता ने बेहद दयनीय हालत में बस इतना कहा कि वह नहीं चाहते कि वह लड़का उनकी बेटी के सामने आए। उन्होंने चीफ प्रॉक्टर से भी मुलाकात की लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
आरोप है कि सुमायरा कयूम और वाहिद अली सीधे तौर पर छात्र को बचाने की कोशिश कर रहे थे जबकि पूरा विश्वविद्यालय प्रशासन मामले को टालता रहा। बाद में जब हिंदू संगठनों का दबाव बढ़ा तब जाकर कुलपति ने अपने भरोसेमंद लोगों की एक समिति बना दी।
इसी तरह प्रशासन पर भी गंभीर सवाल हैं। आरोप है कि KGMU के वीसी सोनिया नित्यानंद ने नियमों को दरकिनार कर एक मुस्लिम संविदाकर्मी को अपना सलाहकार बना लिया और उसे गलत तरीके से स्थायी पद व पेंशन तक दिलवा दी। कहा जाता है कि यही सलाहकार वीसी कार्यालय में बैठकर मुस्लिम कर्मचारियों को संरक्षण देता है।
बताते हैं कि क्रिटिकल केयर विभाग में भी सपा सरकार के समय बड़ी संख्या में मुस्लिम फैकल्टी की नियुक्ति कर ली गई। कहा जाता है कि विभाग में रोज कोई न कोई नियम तोड़ा जाता है। जब हिंदू विभागाध्यक्ष (HOD) शिकायत के पत्र कुलपति कार्यालय भेजते हैं, तो आरोप है कि वही सलाहकार उन पत्रों को कूड़े में फेंक देता है।
बीजेपी के प्रवक्ता और वकील प्रशांत उमराव ने भी KGMU के VC ऑफिस के मुस्लिम समर्थक होने का दावा किया है। प्रशांत ने लिखा, “KGMU का वाइस चांसलर ऑफिस मुस्लिमों के समर्थन में लगा हुआ है। जिहाद के मामले हो या कट्टरपंथ के सबमें वाइस चांसलर ने ढीला ढाला रवैया अपनाया हुआ है।”
उन्होंने लिखा, “इसी तरह से यह भी सूचना आ रही है कि विश्वविद्यालय के क्रिटिकल केयर विभाग में कुछ कट्टरपंथी डॉक्टर बिना विश्वविद्यालय को सूचना दिए विदेश यात्रा कर आए तो कुछ मध्य एशिया के देशों में इंटरव्यू भी दे आए लेकिन जब हिंदू विभागाध्यक्ष ने कार्रवाई के लिए चिट्ठी लिखी तो उसे कूड़े के ढेर में डाल दिया गया और वाइस चांसलर ऑफिस ने इन लोगों पर विशेष दयादृष्टि बनाई।”
#KGMU से बड़ी खबर है कि KGMU का वाईस चांसलर ऑफिस ही विशेष रूप से मुस्लिमों के समर्थन में लगा हुआ है। इसीलिए जेहाद के मामले हो या कट्टरपंथ के, सबमें वाईस चांसलर ने ढीला ढाला रवैया अपनाया हुआ है।
खबर आ रही है कि केजीएमयू के वाईस चांसलर प्रो सोनिया नित्यानंद ने अपने ऑफिस में एक…
दिल्ली ब्लास्ट के आरोपित से लव जिहादी रमीज का कनेक्शन
डॉ रमीज के दिल्ली में लाल किले के बाहर हुए बम धमाके के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए डॉ. परवेज अंसारी से भी कनेक्शन सामने आया है। दोनों ने एसएन मेडिकल कॉलेज में मेडिकल कॉलेज में छात्राओं को फँसाकर धर्मांतरण का नेटवर्क बनाया था। ये दोनों जिहादी हॉस्टल में साथ रहते थे और दोनों ने साथ मिलकर हिंदू लड़कियों फँसाने का प्लान बनाया था। इन्होंने मिलकर ग्रुप बनाया था जिसमें कई मौलानाओं को भी जोड़ा गया था। जो भी नया मुस्लिम छात्र आता उसे ये लोग अपने ग्रुप में जोड़ लेते थे।
मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले के बताया गया है कि धर्मांतरण के मकसद से मेडिकल छात्र और जूनियर डॉक्टर पहले अपनी साथी छात्राओं से दोस्ती करते थे। वे उनकी हर गतिविधि पर नजर रखते हुए लेक्चर थिएटर से लेकर लाइब्रेरी तक लगातार साथ रहते। धीरे-धीरे नजदीकियाँ बढ़ाने के बाद उनके आपत्तिजनक वीडियो बना लिए जाते और फिर इन्हीं के जरिए धर्म परिवर्तन का दबाव डाला जाता। बताया जाता है कि इस तरीके से कई छात्राएँ उनके जाल में फँस गईं।
जब KGMU में बनी थी मजार
KGMU में सामने आया लव जिहाद का मामला कोई अपवाद नहीं है। यह संस्थान पहले भी कट्टरपंथ से जुड़े विवादों का केंद्र रहा है। बीते वर्ष अप्रैल में भी ऐसा ही एक गंभीर मामला सामने आया था, जब परिसर में बनी एक अवैध मजार को हटाने की कार्रवाई हिंसा में बदल गई थी।
दरअसल, किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के नेत्र विभाग के पीछे एक मजार बना दी गई थी, जिसके आसपास धीरे-धीरे अवैध बस्ती और पान-बीड़ी समेत कई अनधिकृत दुकानें खड़ी हो गईं। प्रशासन की ओर से इस अतिक्रमण को हटाने के लिए कई बार नोटिस जारी किए गए लेकिन अतिक्रमणकारियों ने परिसर खाली करने से इनकार कर दिया।
स्थिति तब और बिगड़ गई जब 26 अप्रैल 2025 को KGMU प्रशासन ने पुलिस बल के साथ मिलकर अवैध कब्जा हटाने की कार्रवाई शुरू की। जैसे ही मजार को तोड़ने की प्रक्रिया आगे बढ़ी, वहां मौजूद भीड़ ने अचानक पथराव शुरू कर दिया। हालात इतने बेकाबू हो गए कि हमलावरों ने एक डॉक्टर को भी पकड़ लिया, जिससे पूरे परिसर में अफरा-तफरी मच गई।
KGMU में इस तरह की घटनाएँ यह बताती हैं कि परिसर के भीतर अवैध अतिक्रमण और कट्टरपंथ से जुड़ी गतिविधियाँ समय-समय पर कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बनती रही हैं, जिन्हें लेकर प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियाँ लगातार दबाव में रही हैं।
साफ शब्दों में कहें तो KGMU की यह कहानी किसी एक आरोपित या एक घटना की नहीं है। यह सालों से चल रहे उस गंदे और संगठित खेल की परतें खोलती है, जिसमें लव जिहाद, धर्मांतरण, संस्थागत संरक्षण, राजनीतिक चुप्पी और राजनीतिक शह तक भी एक साथ दिखाई देती है। जिस मेडिकल यूनिवर्सिटी का काम लोगों की जान बचाना है अगर वही कट्टरपंथियों का अड्डा बनती जाए तो यह बल्कि समाज और देश के लिए गंभीर खतरा है। बार-बार सामने आए मामलों ने साफ कर दिया है कि यह समस्या ऊपरी नहीं बल्कि जड़ों तक फैली हुई है।
योगी प्रशासन इस पूरे मसले को लेकर गंभीर है और पुलिस जाँच में जुटी हुई है। आगे और भी नाम, चेहरे और कड़ियाँ सामने आएँगी। कट्टरपंथ के इस कैंसर की अगर समय रहते सर्जरी नहीं की गई तो यह पूरे सिस्टम को खोखला कर देगा। इसकी सर्जरी जितनी जल्दी और जितनी सख्त होगी, उतना ही उत्तर प्रदेश और देश की सेहत के लिए बेहतर होगा।
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने 10 जनवरी 2026 को ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ के उद्घाटन समारोह में युवाओं से प्रेरित करने के लिए शब्द कहे, उससे इस्लामी कट्टरपंथियों और वामपंथियों का धड़ा आहत होकर बैठा है।
नतीजतन NSA को सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक, नफरत फैलाने वाला, देश को बाँटने वाला व इनसिक्योर बताकर सेकुलर भारत के लिए खतरा बताया जा रहा है। उन्हें घेरने वालों में इस्लामी पत्रकारिता के लिए कुख्यात आरफा खानम, अलगाववादियों का समर्थन करने वाली जम्मू-कश्मीर की पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती जैसों के नाम हैं।
नीचे देख सकते हैं महबूबा मुफ़्ती ने ट्वीट किया, “यह बहुत दुखद है कि डोभाल जैसे उच्च पद के अधिकारी, जिनका काम देश को अंदरूनी और बाहरी खतरों से बचाना है, उन्होंने नफरत फैलाने वाली सांप्रदायिक विचारधारा को अपनाया और मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को सामान्य बनाने की कोशिश की। 21वीं सदी में सदियों पुराने घटनाओं के लिए Revenge लेने की बात करना केवल एक इशारा है, जो गरीब और अशिक्षित युवाओं को एक पहले से ही परेशान और लक्ष्य बन रही अल्पसंख्यक समुदाय पर हमला करने के लिए उकसाता है।”
It is deeply unfortunate that a high ranking officer like Mr Doval, whose duty is to guard the nation against internal and external nefarious designs, has chosen to join a communal ideology of hate and normalise violence against Muslims. Calling for REVENGE in the 21st century… https://t.co/cKRvuXdavu
इनके अलावा कंचना यादव जैसे लोग भी अजीत डोभाल के बयान को तोड़-मरोड़कर अपना एंगल देने में लगे हैं। वो अपने फॉलोवर्स को ये बता रहे हैं कि डोभाल अपने बच्चों को तो विदेशों में पढ़ा रहे हैं और आपके बच्चों को भड़का रहे हैं। कंचना का ट्वीट देखिए-
ऐसे ही लिबरल धड़े का जाना-माना नाम स्वाति चतुर्वेदी- लिखती हैं- आपके बच्चे मंदिर तोड़ने वालों से बदला लेंगे और डोभाल के बच्चे बाहर विदेश में बिजनेस करके लक्जरी जीवन जीएँगे।
ऊपर दिए सारे ट्वीट को देख ऐसा लग रहा है मानो डोभाल ने देश के युवाओं से बदला लेने की बात कही है, उन्होंने मुस्लिमों के खिलाफ युवाओं को भड़काया है। जबकि हकीकत इससे पूरी अलग है। अजीत डोभाल ने कार्यक्रम में युवाओं से जो कहा, उसका कहीं से कहीं तक अर्थ हिंसा से जुड़ा नहीं था।
क्या कहा था अजीत डोभाल ने?
कार्यक्रम में अजीत डोभाल ने देश के युवाओं को देश के इतिहास के प्रति जागरूक किया था। उन्होंने युवाओं से ये कहा था स्वतंत्रता हमें आसानी से नहीं मिली, बल्कि इसके लिए पीढ़ियों ने अपार बलिदान दिए। इतिहास की सच्चाइयों को समझ कर युवाओं को देश के पुनर्निर्माण में जुटना चाहिए।
उनके जिस शब्द पर वामपंथी और कट्टरपंथी ने बवाल मचाया हुआ है उसे भी उन्होंने किस संदर्भ में कहा था इसे उनके पूरे बयान से समझिए। डोभाल ने कहा था-
भारत के अतीत को सिर्फ दुख के साथ याद नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उससे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि इतिहास में कई लोगों को फाँसी दी गई, गाँव जला दिए गए, हमारी सभ्यता को नुकसान पहुँचाया गया। मंदिर लूटे गए और लोग बेबस होकर यह सब होते देखते रहे। यह इतिहास हमें चुनौती देता है कि हर युवा के भीतर आग होनी चाहिए। ‘बदला’ शब्द आदर्श नहीं है, लेकिन बदला एक शक्तिशाली ताकत है। हमें अपने इतिहास का बदला लेना होगा और भारत को उसके अधिकारों, विचारों और विश्वासों के आधार पर फिर महान बनाना होगा।
डोभाल के बयान से साफ है कि वो कहीं भी ‘बदले’ शब्द को हिंसा से जोड़कर नहीं बोल रहे थे बल्कि एक मजबूत और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण की बात कर रहे हैं। उन्होंने इतिहास से सीख लेकर राष्ट्र को पुनर्निर्मित करने की बात कही, न कि किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा भड़काने की। उनका मकसद अपने श्रोता युवाओं में देशभक्ति जगाने का था, द्वेष फैलाने का नहीं।
हालाँकि, उनके बयान को वामपंथी और कट्टरपंथी अपने एजेंडे के अनुसार तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे हैं। उन्हें शायद डर है कि कहीं सच में लोग उस इतिहास को लेकर सजग न हो जाएँ जहाँ देश को तोड़ने वालों और संपत्तियों को लूटने वालों का जिक्र है। इनकी दिक्कतें इसलिए हैं क्योंकि जिन्होंने भारत को समय-समय पर नष्ट करने का प्रयास किया वो ही इनके पसंदीदा ‘नायक’ हैं।
इस्लामी आक्रांताओं को क्यों कर रहे हो बदनाम- लिबरल और कट्टरपंथियों का तर्क
दिलचस्प बात ये है कि डोभाल के बयान को विकृत ढंग से पेश करने के चक्कर में ये लोग खुद ही इसको स्वीकार कर बैठे कि देश के मंदिर को लूटने वाली घटनाएँ बिलकुल सच हैं। महबूबा मुफ्ती के ट्वीट से स्पष्ट है कि वह मान रही हैं कि 21वीं सदी से पहले ये घटनाएँ हुईं थीं। लेकिन फिर भी वो इससे मुँह इसलिए मोड़ रही हैं क्योंकि वो नहीं चाहती इतिहास को बार-बार उकेरा जाए जिससे पता चले सच क्या था।
वहीं आरफा खानम हैं, जिनकी पत्रकारिता का केंद्र हमेशा ये बताने-समझाने पर रहता है कि मुगलों ने देश के लिए क्या किया… उनके लिए अगर कोई ये बता दे कि उन्होंने देश में और देश के लोगों के साथ क्या किया तो उन्हें इससे आपत्ति होने लगती है।
कंचना यादव और स्वाति चतुर्वेदी का भी यही पैटर्न है। वह अच्छे से जान-समझ रही हैं कि डोभाल ने क्या बोला है, लेकिन उनकी बात चूँकि वामपंथी एजेंडे पर सही नहीं बैठ रही इसलिए उन्होंने उस बयान के खुद ही मायने गढ़ लिए।
असली गलती किसकी?
ऐसे ‘बुद्धिजीवी’ वर्ग लोगों को समझने की जरूरत है कि इतिहास को इनके हिसाब से पेश करने का एक दौर बीत चुका है। अब वो समय नहीं है कि इस्लामी आक्रांताओं के कुकृत्यों को महिमामंडन करने का काम हो। इतिहास का अर्थ वही होता है जो बीता समय का सच हो। अगर उसे बताने से एक समुदाय पर सवाल उठ रहे हैं, तो समस्या उस रिलिजन या मजहब में है न कि इतिास में।
आज अगर देश को लूटे जाने के इतिहास को गहराई से पढ़ने पर ‘लुटेरे’ इस्लामी आक्रांता ही निकलकर आ रहे हैं तो इसमें इतिहास बताने वाले की क्या गलती है? गलती उसकी है जिसने ये किया, गलती उसकी है जिसने हमेशा ये समझा कि दुनिया वही इतिहास पढ़ेगा जो वो वर्ग पढ़ाना चाहेगा। गलती उस वर्ग की है जिसे लगा कि उन्होंने कह दिया तो अकबर हमेशा ‘महान’ बना रहेगा और औरंगजेब को लोग हमेशा ‘मंदिर का निर्माण’ कराने वाले के तौर पर जानेंगे।
स्वामी विवेकानंद की जयंती पूरी दुनिया में 12 जनवरी को मनाई जाती है। भारत में इस दिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। साल 1984 में भारत सरकार ने यह निर्णय लिया ताकि युवाओं को स्वामी जी की शिक्षाओं से प्रेरणा मिले।
स्वामी विवेकानंद ने न केवल भारत को नई दिशा दिखाई, बल्कि पूरी दुनिया में सनातन धर्म की महिमा फैलाई। उन्होंने पश्चिमी देशों को भारतीय संस्कृति, वेदांत दर्शन और योग से परिचित कराया। उनके ओजस्वी भाषणों और कार्यों से हजारों लोग उनके शिष्य बने। आज भी उनकी शिक्षाएँ युवाओं को मजबूत बनाती हैं।
स्वामी विवेकानंद का प्रारंभिक जीवन और आध्यात्मिक जागरण
स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ था। उनका बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्ता था। वे एक संपन्न बंगाली परिवार से थे। पिता विश्वनाथ दत्ता वकील थे और माँ भुवनेश्वरी देवी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला। नरेंद्र बचपन से ही बुद्धिमान, निडर और जिज्ञासु थे। वे पढ़ाई में तेज थे और खेलकूद में भी आगे। लेकिन उनका मन हमेशा बड़े सवालों में उलझा रहता- ईश्वर कहाँ है? जीवन का उद्देश्य क्या है?
युवावस्था में नरेंद्र ब्रह्म समाज से जुड़े, जहाँ एकेश्वरवाद की बात होती थी। लेकिन उन्हें संतुष्टि नहीं मिली। 1881-82 में उनकी मुलाकात श्री रामकृष्ण परमहंस से हुई। रामकृष्ण एक सरल संत थे, जो दक्षिणेश्वर काली मंदिर में रहते थे। नरेंद्र पहले तो उनके विचारों से असहमत थे, लेकिन रामकृष्ण की दिव्य अनुभूति ने उन्हें प्रभावित किया।
रामकृष्ण ने कहा, “ईश्वर को देखा जा सकता है, जैसे मैं तुम्हें देख रहा हूँ।” धीरे-धीरे नरेंद्र उनके शिष्य बन गए। रामकृष्ण ने उन्हें वेदांत का गहरा ज्ञान दिया और कहा कि सभी धर्म सत्य की ओर ले जाते हैं।
1886 में रामकृष्ण का महासमाधि हो गया। नरेंद्र और उनके गुरुभाइयों ने बारानगर में मठ स्थापित किया। नरेंद्र ने संन्यास लिया और नाम हुआ स्वामी विवेकानंद। इसके बाद वे पूरे भारत भ्रमण पर निकल पड़े। कन्याकुमारी में उन्होंने समुद्र तट पर ध्यान किया और भारत की दशा पर विचार किया। उन्हें लगा कि भारत को आध्यात्मिक ज्ञान तो है, लेकिन गरीबी और अज्ञानता से मुक्ति चाहिए। यहीं से उन्हें विचार आया कि विश्व मंच पर भारत की आवाज उठानी चाहिए।
शिकागो विश्व धर्म संसद के मंच से विश्व में फहराई सनातन की पताका
साल 1893 में अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म संसद का आयोजन हुआ। यह पहला मौका था जब दुनिया के सभी प्रमुख धर्मों के प्रतिनिधि एक मंच पर आए। स्वामी विवेकानंद भारत का प्रतिनिधित्व करने गए। यात्रा कठिन थी- पैसे नहीं थे, लेकिन कुछ शुभचिंतकों की मदद से वे पहुंचे।
11 सितंबर 1893 को उनका पहला भाषण हुआ। मंच पर खड़े होकर उन्होंने कहा, “मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों!” पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा। उन्होंने हिंदू धर्म की उदारता बताई- सभी धर्मों का सम्मान, संप्रदायवाद का विरोध और कहा कि जैसे नदियाँ अलग-अलग रास्तों से समुद्र में मिलती हैं, वैसे ही सभी धर्म ईश्वर तक पहुँचाते हैं। उन्होंने सहिष्णुता की बात की और कहा कि हिंदू धर्म कभी दूसरे धर्मों को नष्ट करने की बात नहीं करता।
यह भाषण इतना प्रभावशाली था कि अखबारों ने उन्हें ‘साइक्लोन मॉन्क’ कहा। स्वामी जी ने कई भाषण दिए और वेदांत दर्शन समझाया। पश्चिमी लोग पहली बार भारतीय आध्यात्म को वैज्ञानिक और तार्किक रूप में सुन रहे थे। इससे सनातन धर्म की पताका पूरी दुनिया में लहरा गई।
पश्चिम में भारतीय संस्कृति की स्थापना
शिकागो के बाद स्वामी विवेकानंद अमेरिका और यूरोप में कई वर्ष रहे। उन्होंने हजारों व्याख्यान दिए। न्यूयॉर्क में वेदांत सोसाइटी स्थापित की। योग और ध्यान की क्लासें शुरू की। पश्चिमी लोग योग को केवल शारीरिक व्यायाम समझते थे, लेकिन स्वामी जी ने बताया कि यह मन की शुद्धि और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग है।
स्वामी विवेकानंद ने राजयोग, कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग की किताबें लिखीं। इनसे वेदांत दर्शन पश्चिम में घर-घर पहुंचा। अमेरिका में कई वेदांत केंद्र खुले। इंग्लैंड में भी उन्होंने व्याख्यान दिए। पश्चिमी बुद्धिजीवी हैरान थे कि एक युवा भारतीय संन्यासी इतना गहरा ज्ञान कैसे रखता है। स्वामी जी ने भारतीय संस्कृति की महानता बताई- त्याग, सेवा, एकता। उन्होंने गीता और उपनिषदों को सरल भाषा में समझाया। इससे पश्चिम में भारतीयता का सम्मान बढ़ा।
स्वामी विवेकानंद को चाहने लगे पश्चिमी दुनिया के विद्वान
स्वामी विवेकानंद की वाणी और व्यक्तित्व इतना आकर्षक था कि हजारों लोग उनके मुरीद हो गए। भारत में उनके गुरुभाई जैसे स्वामी ब्रह्मानंद, स्वामी तुरीयानंद उनके साथी बने। लेकिन पश्चिम में भी कई शिष्य बने। सबसे प्रसिद्ध हैं मार्गरेट नोबल, जो सिस्टर निवेदिता बनीं। मार्गरेट आयरिश मूल की थीं, लंदन में स्वामी जी से मिलीं। उनके विचारों से इतनी प्रभावित हुईं कि भारत आ गईं और शिक्षा और सेवा कार्य में लग गईं। उन्होंने कलकत्ता में लड़कियों का स्कूल खोला।
अमेरिका में कई महिलाएँ और पुरुष उनके शिष्य बने। जैसे मैरी हेल, सराह बुल आदि। स्वामी जी महिलाओं की शिक्षा और सम्मान पर बहुत जोर देते थे। उन्होंने कहा कि जब तक महिलाएँ मजबूत नहीं होंगी, राष्ट्र मजबूत नहीं होगा। उनके चाहने वाले प्रोफेसर, वैज्ञानिक और आम लोग थे। निकोला टेस्ला जैसे वैज्ञानिक भी उनके विचारों से प्रभावित हुए। स्वामी जी की सादगी, ओज और प्रेम ने लोगों को बांध लिया।
रामकृष्ण मिशन की स्थापना और सेवा कार्य
साल 1897 में स्वामी विवेकानंद जी भारत लौटे। लाखों लोगों ने उनका स्वागत किया। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इसका उद्देश्य था- आत्मा की खोज और दूसरों की सेवा। उनका सूत्र था- “शिव ज्ञान में जीव सेवा”। मिशन ने शिक्षा, स्वास्थ्य और आपदा राहत में काम शुरू किया। आज दुनिया भर में इसके केंद्र हैं।
भारत के राष्ट्रवाद को दिखाई राह
स्वामी विवेकानंद ने भारत को गुलामी की नींद से जगाया। उन्होंने कहा, “उठो, जागो और तब तक न रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” स्वामी विवेकानंद ने भारत के युवाओं से कहा कि तुममें असीम शक्ति है। भारत को आध्यात्मिक गुरु बनना है। उन्होंने हिंदू धर्म के पुनरुत्थान की बात की, लेकिन संकीर्णता का विरोध किया।
स्वामी विवेकानंद ने कहा कि भारत की संस्कृति सभी को जोड़ने वाली है। उनके विचारों से बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गाँधी, सुभाष चंद्र बोस जैसे नेता प्रभावित हुए। स्वामी जी ने राष्ट्रवाद को आध्यात्मिक आधार दिया – सेवा ही राष्ट्रभक्ति है।
उन्होंने युवाओं से कहा, “मुझे सौ युवा दो, मैं भारत बदल दूँगा।” उनकी शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक हैं-मजबूत बनो, निडर बनो, दूसरों की मदद करो।
स्वामी विवेकानंद ने छोड़ी अमर विरासत
स्वामी विवेकानंद केवल 39 वर्ष जिए, लेकिन उनका योगदान अमर है। केवल 39 साल की उम्र में 4 जुलाई 1902 को उन्होंने महासमाधि ली। स्वामी विवेकानंद ने सनातन धर्म को विश्व मंच पर स्थापित किया, पश्चिम को भारतीयता से जोड़ा और भारत को आत्मविश्वास दिया। राष्ट्रीय युवा दिवस हमें याद दिलाता है कि युवा ही राष्ट्र की शक्ति हैं। स्वामी जी के शब्दों में “सबसे बड़ा धर्म है अपने देश से प्रेम करना।” उनकी जयंती पर संकल्प लें कि हम उनकी शिक्षाओं पर चलेंगे और भारत को विश्व गुरु बनाएँगे।