जर्मनी दौरे के वक्त भारत विरोधी तत्वों से मुलाकात करने के कारण राहुल गाँधी इस समय हर जगह से घिरे हुए हैं। ऐसे में गाँधी परिवार के वफादार व सैम पित्रौदा ने उनके बचाव में मीडिया में बयान दिया है। पित्रौदा ने कहा कि कॉन्ग्रेस को इससे फर्क ही नहीं पड़ता कि उनके नेता जहाँ जा रहे हैं वहाँ उनसे कौन लोग मिलेंगे। पित्रौदा ने यह बयान इंडिया टुडे की पत्रकार मौसमी सिंह के साथ बातचीत में दिया।
पित्रौदा से ऑन कैमरा पत्रकार ने जब पूछा कि जर्मनी में राहुल गाँधी सेंट्रल यूरोपियन यूनिवर्सिटी (CEU) में कॉर्नलिया वोल से मिले, जो संस्थान की ट्रस्टी हैं और इस यूनिवर्सिटी को जॉर्ज सोरोस की फंडिंग भी है। उस समय पित्रौदा भड़क गए। इस बातचीत को 12.00 मिनट पर देख सकते हैं। आगे मौसमी सिंह ने यह भी पूछा कि अक्सर कॉन्ग्रेस का जॉर्ज सोरोस से नाम जुड़ता है।
सवाल पूरा होने से पहले ही सैम पित्रौदा कहते हैं, “सब बकवास है। बिल्कुल बकवास है।” राहुल गाँधी के बचाव में पित्रौदा कहते हैं, “जब हम यूनिवर्सिटी जाते हैं, तो हम नहीं देखते कि कौन-किसके साथ जुड़ा हुआ है। इससे हमारा कोई मतलब नहीं है। हम यूनिवर्सिटी जाते हैं, हम एक सार्वजनिक जगह जाते हैं। अगर उनका जोर्ज सोरोस के साथ संबंध हुआ भी, तो हमे पता नहीं है। और हमे कोई फर्क भी नहीं पड़ता है।”
मौसमी सिंह फिर सीधे तौर पर पूछती हैं कि राहुल गाँधी अक्सर भारत-विरोधी लोगों से मुलाकात करते हैं, यह कितना सही है? सवाल पर सैम पित्रौदा चिढ़ जाते हैं और कहते हैं कि सब ‘झूठ’ है। वह कहते हैं, “हम ऐसा क्यों ही करेंगे, हमे इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है।” पित्रौदा यहाँ तक कहते हैं कि ऐसा कौन ही करेगा। वह फिर दोहराते हैं, “अगर हम किसी यूनिवर्सिटी जाते हैं, तो वहा बैठे दर्शक का किसी से ऐसे किसी व्यक्ति से कनेक्शन है, तो हमारा उस पर नियंत्रण नहीं है। हमें फर्क नहीं पढ़ता है।”
सैम पित्रौदा का जॉर्ज सोरोस के समर्थन में बयान
1984 में हुए सिखों के नरसंहार को भी ‘हुआ तो हुआ’ कह कर जायज ठहरा चुके सैम पित्रौदा ने जॉर्ज सोरोस और कॉन्ग्रेस कनेक्शन के आरोपों का बचाव पहली बार नहीं किया है। जॉर्ज सोरोस, जिसपर भारत-विरोधी गतिविधियों को फंड करने वाले लोगों से जुड़े होने के आरोप है, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ नैरेटिव फैलाता है। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस के सैम पित्रौदा ने पहले भी कई बार सार्वजनिक तौर पर जॉर्ज सोरोस के समर्थन में बयान दे चुके हैं।
04 जनवरी 2025 को ओवरसीज कॉन्ग्रेस के वेस्ट कोस्ट महासचिव शन्मुगवेल शंकरन द्वारा आयोजित एक वर्चुएल बैठक में सैम पित्रौदा ने कहा कि भारत में ‘सिविल सोसाइटी’ यानी सामाजिक संगठनों को काम करने की आजादी नहीं दी जा रही है। उन्होंने दावा किया कि कई मामलों में सिविल सोसाइटी को काम करने से रोका जाता है।
पित्रौदा ने कहा कि अगर अमेरिका से भारत के किसी NGO को दान भेजना हो, तो यह बहुत मुश्किल काम बन गया है। उन्होंने कहा कि उन्हें समझ नहीं आता कि यह प्रक्रिया इतनी जटिल क्यों है, लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि हर कोई डरा हुआ है।
यहाँ जॉर्ज सोरोस पर हो रहे हमलों का जिक्र करते हुए पित्रौदा ने कहा कि उन्हें यह सब समझ में नहीं आता। उनके मुताबिक, सोरोस अपना काम कर रहे हैं और बाकी लोग अपना काम करें। अगर किसी को उनसे सहमति नहीं है तो यह ठीक है, लेकिन यह कहना कि वह भारत में दखल दे रहे हैं, सही नहीं है। पित्रौदा ने कहा कि भारत में इस तरह की बहस और चर्चा का माहौल बन गया है।
यहाँ सैम पित्रौदा की बातों से लगता है कि वे चाहते हैं कि भारत जॉर्ज सोरोस को भारत-विरोधी गतिविधियों की फंडिंग करने और भारत-विरोधी नैरेटिव को बेरोकटोक आगे बढ़ाने की अनुमति दे दें। साथ ही लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई मोदी सरकार के शासन को कमजोर करने की भी अनुमति दी जानी चाहिए।
जर्मनी में जाकर राहुल गाँधी का भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमला
जॉर्ज सोरोस का कॉन्ग्रेस से कनेक्शन पर सवाल एक बार फिर राहुल गाँधी की हाल ही में पाँच दिवसीय जर्मनी यात्रा के बाद उठने शुरू हुए हैं। जहाँ राहुल गाँधी भारत-विरोधी जॉर्ज सोरोस की फंडेड यूनिवर्सिटी पहुँचते हैं और उस अंतरराष्ट्रीय मंच का इस्तेमाल वह भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर तीखी बयानबाजी के लिए करते हैं।
बर्लिन और बाद में हर्टी स्कूल में संबोधित करते हुए राहुल गाँधी भारत में ‘निष्पक्ष’ चुनाव न होने का दावा करते हैं। वे कहते हैं कि हरियाणा विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने जीता था और 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में गड़बड़ी की गई। इन बयानों से विदेश की धरती का इस्तेमाल कर भारत को ही निशाना बनाते हैं।
हालाँकि, राहुल गाँधी के ये दावे कई बार गलत साबित हो चुके हैं। खास तौर पर ऑपइंडिया चुनाव आयोग के आधिकारिक आँकड़ों और रिकॉर्ड के आधार पर इन दावों को विस्तार से खारिज कर चुकी है। जर्मनी में वही पुराने दावे दोहराते हैं, क्योंकि वहाँ की जनता भारत की चुनावी प्रक्रिया से परिचित नहीं है।
जॉर्ज सोरोस और कॉन्ग्रेस का कनेक्शन
सैम पित्रौदा ने जॉर्ज सोरोस के साथ कॉन्ग्रेस के जिस कनेक्शन का इनकार किया है, उसकी सच्चाई जगजाहिर है। हंगरी-अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस भारत-विरोधी नैरेटिव, खासकर मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव बनाने में सक्रिय है और इस पूरे मामले में कॉन्ग्रेस के कुछ नेताओं की भूमिका भी सामने आती है। लेकिन कॉन्ग्रेस इसे मानने को तैयार ही नहीं है।
जॉर्ज सोरोस की संस्था ओपन सोसायटी फाउंडेशन (OSF) दुनिया के कई देशों में NGO, मीडिया संस्थानों और सामाजिक संगठनों को फंडिंग देती रही है। इनमें से ही भारत में भी कुछ ऐसे संगठन और मीडिया प्लेटफॉर्म्स हैं, जिन्हें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सोरोस नेटवर्क से फंडिंग मिली है। और ये भारत सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा रचने में सक्रिय हैं।
हंगरी-अमेरिकी सोरोस खुद भी कई बार सार्वजनिक मंचों से भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर सवाल उठा चुका है। संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कई बीजेपी नेताओं ने भी OCCRP की रिपोर्ट के हवाले से बताया कि इनमें भारत के उद्योगपतियों के खिलाफ नैगेटिव नैरेटिव होते हैं।
BJP का आरोप है कि कॉन्ग्रेस, खास तौर पर राहुल गाँधी इन OCCRP रिपोर्टों का राजनीतिक फायदा उठाते हैं और उन रिपोर्टों को आधार बना कर सरकार को बदनाम करते हैं। इसका उदाहरण उन्होंने अडानी समूह और कोविड-19 जैसे मुद्दों पर उठाई गई रिपोर्टों को बताया।
संसद हंगामे के दौरान BJP ने यह भी कहा कि OCCRP की रिपोर्टों का समय-समय पर संसद सत्र के साथ तालमेल है, जिससे लगता है कि जैसे विदेशी प्रभाव और कॉन्ग्रेस मिलकर सरकार के कामकाज को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष पर यह आरोप लगाया गया कि राहुल गाँधी और OCCRP के बयानों में एक ‘त्रिकोणीय गठजोड़’ (Triangle Nexus)- सोरोस, OCCRP और कॉन्ग्रेस। इसका लक्ष्य भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करना है।
क्रिसमस पर अमेरिका ने नाइजीरिया में आतंकवादियों के ठिकानों को निशाना बनाते हुए घातक एयर स्ट्राइक की। अमेरिकी सेना का दावा है कि इस स्ट्राइक में कई ISIS आतंकवादी मारे गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मुताबिक, यह स्ट्राइक नाइजीरिया के आग्रह पर की गई है, जहाँ लगातार ईसाइयों को निशाना बनाया जा रहा था। इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने नाइजीरिया में ईसाइयों की लगातार हत्या को लेकर नाइजीरिया को चेतावनी दी थी।
नाइजीरिया के विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार (26 दिसंबर 2025) को कहा कि अमेरिका के सटीक हमलों में देश के उत्तर-पश्चिम में ‘आतंकवादी ठिकानों’ को निशाना बनाया है। साथ ही कहा कि नाइजीरिया वॉशिंगटन के साथ संरचित सुरक्षा सहयोग में लगा हुआ है। अमेरिकी सेना के अफ्रीका कमांड ने भी बताया कि यह हमला नाइजीरियाई अधिकारियों के अनुरोध पर किया गया था और इसमें कई ISIS आतंकवादी मारे गए हैं।
एयर स्ट्राइक पर डोनाल्ड ट्रंप का बयान
स्ट्राइक की जानकारी देते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने एक्स पर कहा, “आज रात कमांडर इन चीफ के रूप में मेरे निर्देश पर अमेरिका ने उत्तर-पश्चिम नाइजरिया में ISIS के आतंकवादी कचरे पर एक शक्तिशाली और घातक हमला किया, जो मुख्य रूप से निर्दोष ईसाइयों को निशाना बना रहे थे और उनकी क्रूरता से हत्या कर रहे थे, जो कई वर्षों और सदियों में नहीं देखी गई थी।”
— Commentary Donald J. Trump Posts From Truth Social (@TrumpDailyPosts) December 25, 2025
डोनाल्ड ट्रंप ने आगे कहा, “मैंने पहले भी इन आतंकवादियों को चेतावनी दी थी कि अगर उन्होंने ईसाइयों का नरसंहार नहीं रोका तो उन्हें इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ेगा और आज रात वही हुआ।” आतंकवाद पर सख्त नीति को लेकर उन्होंने कहा, “अमेरिकी सेना ने कई सटीक हमले किए, जैसा कि केवल अमेरिका की कर सकता है। मेरे नेतृत्व में हमारा देश कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद को पनपने नहीं देगा।”
अंत में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, “सभी को क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाएँ, जिनमें मारे गए आतंकवादी भी शामिल हैं, जिनकी संख्या और भी अधिक होगी अगर वे ईसाइयों का नरसंहार जारी रखते हैं।”
डोनाल्ड ट्रंप की नाइजीरिया को चेतावनी
नाइजीरिया में ईसाइयों के नरसंहार पर डोनाल्ड ट्रंप पहले भी आतंकवादियों को चेतावनी दे चुके हैं। दो महीने पहले ही अक्टूबर 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति ने नाइजीरियन सरकार पर ईसाइयों के खिलाफ हो रहे सामूहिक नरसंहार को नहीं रोक पाने का आरोप लगाते हुए सैन्य संघर्ष के संकेत दिए थे।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा था, “अगर नाइजीरियाई सरकार ईसाइयों की हत्या की इजाजत देती रही, तो अमेरिका नाइजीरिया को दी जाने वाली सभी तरह की मदद तुरंत बंद कर देगा, और हो सकता है कि उस बदनाम देश में ‘गोलियाँ बरसाकर’ उन इस्लामी आतंकवादियों का सफाया कर दे, जो ये भयानक अत्याचार कर रहे हैं।”
US President Donald Trump posts, "If the Nigerian Government continues to allow the killing of Christians, the U.S.A. will immediately stop all aid and assistance to Nigeria, and may very well go into that now disgraced country, 'guns-a-blazing,' to completely wipe out the… pic.twitter.com/7mn9vG7aM3
डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी कहा था कि अगर नाइजीरियन सरकार इन आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करती है, तो अमेरिका घातक हमले के लिए तैयार है। उन्होंने कहा, “मैं अपने युद्ध विभाग को संभावित कार्रवाई के लिए तैयार रहने का निर्देश दे रहा हूँ। अगर हम हमला करेंगे, तो वह तेज, क्रूर और तीखा होगा, ठीक वैसे ही जैसे आतंकवादी गुंडे हमारे प्यारे ईसाइयों पर हमला करते हैं।”
नाइजीरिया में ईसाइयों का नरसंहार
डोनाल्ड ट्रंप नाइजीरिया में ईसाइयों के नरसंहार की जो बात कर रहे हैं, उसकी असलियत जानते हैं। नाइजीरिया में बोको हराम और फुलानी चरवाहों जैसे इस्लामी कट्टरपंथी संगठन सक्रिय हैं, जो लगातार ईसाइयों के गाँवों और चर्च को निशाना बना रहे हैं। ईसाइयों और इस्लामी कट्टरपंथियों के बीच यह टकराव साल 1950 के दशक से चला आ रहा है।
साल 2025 की बात करें तो 14 अक्टूबर को नाइजीरिया के प्लेटू राज्य के रचास और रावुरु गाँव में फुलानी मिलिटेंट्स ने हमला कर 13 लोगों को मौत के घाट उतार दिया।
23 सितंबर 2025 को बोको हराम ने अदमवा राज्य के वाग्गा मोंगारो गाँव में 4 ईसाइयों की हत्या कर दी, घरों और चर्च को नेस्तनाबूद कर दिया। इस हमले में कई लोग घायल भी हुए। वहीं 5 सितंबर को इसी संगठन ने बोर्नो राज्य के दरुल जमाल गाँव में हमला कर 63 लोगों को मार डाला।
13-14 जून की रात बेन्युए राज्य के इएलेवाटा गाँव में फुलानी चरवाहों ने 100 से ज्यादा ईसाइयों की हत्या कर दी और उनके घरों में आग लगा दी। इससे पहले 24 मई को फुलानी चरवाहों ने ही ताराबा राज्य के करिम लामिदो पर हमला कर 42 ईसाइयों की हत्या कर दी और 60 से ज्यादा घर जला दिए।
गाँव के आसपास के करीब 5000 लोग अपना घर-बार छोड़ कर विस्थापित होने के लिए मजबूर हुए हैं। अमेरिका स्थित काउंसिल ऑफ फॉरेन रिलेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, 2011 से अब तक अलग-अलग वजहों से 60000 लोगों की मौत हो चुकी है।
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2009 से बोको हराम ने 40000 से ज्यादा ईसाइयों की यहाँ हत्या कर दी। हजारों बच्चे मारे गए हैं और करोड़ों लोग विस्थापित हुए हैं। 2011 से अभी तक बोको हराम और इस्लामिक स्टेट इन वेस्ट अफ्रीका प्रोविंस ने 37500 से अधिक लोगों की हत्या कर दी।
अल-कायदा का कनेक्शन और इस्लामी कट्टरपंथ पर पकड़
ईसाइयों को निशाना बना रहा ये इस्लामी संगठन बोको हराम का अल-कायदा और उत्तरी अफ्रीका के कई आतंकी संगठन के साथ कनेक्शन है। नाइजीरिया में इसने राजनीतिक रूप से पैर पहले ही जमा लिए हैं। यहीं वजह है कि ईसाइयों की हत्या करने वाले इस संगठन के समर्थक नाईजीरिया में ऊँचे पदों पर हैं।
करीब 22 करोड़ की आबादी वाले इस देश में करीब करीब आधी-आधी आबादी मुस्लिम और ईसाइयों की है। जनमत सर्वेक्षणों से पता चलता है कि नाइजीरियाई आबादी का बड़ा हिस्सा इस्लामी कट्टरपंथ का समर्थक है । प्यू ग्लोबल एटीट्यूड्स प्रोजेक्ट द्वारा 2009 में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक नाइजीरिया में 43 फीसदी मुसलमान आत्मघाती बम विस्फोट को सही मानते हैं। सर्वेक्षण में शामिल आधे से ज्यादा मुसलमानों ने आतंकी ओसामा बिन लादेन पर ‘विश्वास’ था।
इस्लामी कट्टरपंथियों ने नाइजीरिया में दो रास्ते अपनाए हैं- पहला, बोको हराम जैसे कट्टरपंथियों द्वारा चलाया गया मार काट का रास्ता। इसका मकसद गैर इस्लामी जनसंख्या को कम करना है। दूसरा, कानूनी और संवैधानिक रास्ता यानी शरिया कानून लागू करने की कोशिश करना। ऐसा उत्तरी राज्यों में हो रहा है।
1999 और 2002 के बीच, 12 उत्तरी नाइजीरियाई राज्यों में शरिया कानून लागू किया गया था। इसका असर इन राज्यों में दिखता है। नाइजीरिया की सरकार भले ही इससे इनकार करे, लेकिन इस्लामिक कट्टरवाद नाइजीरिया की हकीकत बन गई है और गैरमुस्लिमों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।
नाइजीरिया में मस्जिद में फटा बम
डोनाल्ड ट्रंप की क्रिसमस पर एयर स्ट्राइक से एक दिन पहले ही नाइजीरिया में मस्जिद में विस्फोटक बम फटने की खबर सामने आई थी। नाइजीरिया के उत्तर-पूर्वी शहर मैदुगुरी में बुधवार (24 दिसंबर 2025) की शाम नमाज के दौरान एक मस्जिद में हुए जोरदार विस्फोट में कम से कम 7 लोगों की मौत, जबकि 35 से ज्यादा लोग घायल हुए।
हमले के बाद सामने आए वीडियो में खून से लथपथ लोग और चादरों से ढके शव देखे गए हैं। हालाँकि, हमले की किसी भी संगठन ने जिम्मेदारी नहीं ली। पुलिस की शुरुआती जाँच में इसे आत्मघाती बम हमला बताया गया, क्योंकि मौके पर आत्मघाती जैकेट के टुकड़े मिले।
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में रविवार (21 दिसंबर 2025) को पुलिस ने एक बड़े धर्मांतरण रैकेट का खुलासा किया। यह मामला रोजा थाना क्षेत्र की कैलाशनगर कॉलोनी का है, जहाँ एक मकान में ईसाईयत में धर्मांतरण कराने के लिए गुप्त रूप से सभा आयोजित की जा रही थी। पुलिस ने इस मामले में एक महिला समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मकान में करीब 200 लोग इकट्ठा हुए थे, जिन्हें पैसों और शादी का लालच देकर बुलाया गया था। विश्व हिंदू परिषद (VHP) के कार्यकर्ताओं की शिकायत के बाद पुलिस ने मौके पर छापा मारा। छापेमारी के दौरान वहाँ चंगाई सभा के नाम पर प्रार्थना सभा चल रही थी, जिसका उद्देश्य हिंदू धर्म के लोगों को ईसाई बनाना था।
इस पूरे मामले से जुड़ी FIR की एक कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है, जिसमें धर्मांतरण से जुड़े गंभीर आरोप दर्ज किए गए हैं। पुलिस अब इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों और इसके पीछे की पूरी साजिश की जाँच में जुटी हुई है।
FIR में क्या लिखा है?
इस मामले में विश्व हिंदू परिषद (VHP) के पदाधिकारी अशनील सिंह की शिकायत पर FIR दर्ज की गई है। पुलिस ने यह FIR भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 131, 197, 352 और 351(3) के तहत दर्ज की है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 5(1) भी लगाई गई हैं।
इस FIR में एंजेल, विवेक, विपिन, मोनू और रमादेवी को आरोपी बनाया गया है। आरोप है कि ये सभी मिलकर अवैध तरीके से धर्म परिवर्तन कराने की गतिविधियों में शामिल थे। पुलिस मामले की जाँच कर रही है और आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
स्रोत: यूपी पुलिस
अपनी शिकायत में अशनील सिंह ने बताया कि रविवार दोपहर करीब 1 बजे वह मोहम्मदी रोड से गुजर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने रोजा थाना क्षेत्र की कैलाशनगर कॉलोनी में रमादेवी के घर पर भारी भीड़ देखी। शक होने पर जब वह वहाँ पहुँचे, तो पाया कि रमादेवी के मकान में ईसाई प्रार्थना सभा चल रही थी।
शिकायत के अनुसार, वहाँ मौजूद लोग हिंदू धर्म के खिलाफ आपत्तिजनक बातें कर रहे थे और हिंदू देवी-देवताओं के बारे में अपमानजनक और अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे। अशनील सिंह ने इसे धार्मिक भावनाएँ ठेस पहुँचाने वाला मामला बताया और इसकी शिकायत पुलिस से की।
स्रोत: यूपी पुलिस
शिकायत में आगे बताया गया है कि जब अशनील सिंह ने इस गतिविधि का विरोध किया, तो एंजेल, विवेक, विपिन, मोनू और रमादेवी उन पर गाली-गलौज करने लगे और आक्रामक हो गए। आरोप है कि इन लोगों ने अशनील सिंह के साथ मारपीट करने की कोशिश की और उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी।
किसी तरह अशनील सिंह वहाँ से जान बचाकर निकलने में सफल रहे और उन्होंने तुरंत पुलिस को इसकी सूचना दी। पुलिस के मौके पर पहुँचते ही वहाँ मौजूद करीब 150 महिलाएँ वहाँ से भाग गईं। अशनील सिंह ने इस पूरी सभा का एक वीडियो भी पुलिस को सबूत के तौर पर सौंपा है।
स्रोत: यूपी पुलिस
जब अशनील सिंह ने सभा में मौजूद लोगों से सवाल किया, तो उन्होंने बताया कि उन्हें धर्म बदलने पर मोटी रकम देने और शादी कराने में मदद का लालच दिया गया था।
मीडिया से बातचीत में पुलिस ने बताया कि रमादेवी के घर में एक मंच बना हुआ था, जिस पर क्रॉस और ईसाईयत से जुड़ी अन्य सामग्री रखी हुई थी। इस मामले में अब तक चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि मुख्य आरोपित रमादेवी मौके से फरार हो गई। पुलिस उसकी तलाश में लगातार दबिश दे रही है।
पुलिस इस पूरे मामले में कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) की जाँच कर रही है और फंडिंग के स्रोतों की भी पड़ताल की जा रही है। इसमें विदेशी फंडिंग की आशंका भी जताई गई है। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि इससे पहले जुलाई महीने में भी शाहजहांपुर में इसी तरह का एक नेटवर्क पकड़ा गया था, जिसमें कई लोगों की गिरफ्तारी हुई थी।
उस मामले में करीब 4 करोड़ रुपए की फंडिंग सामने आई थी, जिसमें विदेश से आने वाला पैसा भी शामिल था। पुलिस के अनुसार, उस केस में मुख्य आरोपित को रोजाना लगभग 48 हजार रुपए (अमेरिकी डॉलर में) की विदेशी फंडिंग मिल रही थी।
शाहजहांपुर में 5 FIR, 4 करोड़ की विदेशी फंडिंग, तमिलनाडु से जुड़े ईसाई धर्मांतरण रैकेट का भंडाफोड़
शाहजहांपुर के सिंधौली क्षेत्र में 13 जुलाई को इसी तरह का एक और मामला सामने आया था। संदिग्ध गतिविधियों की सूचना मिलने पर हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं ने एक गुरुद्वारे के पास एक मकान पर छापा मारा। वहाँ पहुँचने पर पता चला कि उस जगह पर धर्म परिवर्तन कराने की गतिविधियाँ चल रही थीं।
हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं के पहुँचते ही कई लोग मौके से फरार हो गए, लेकिन छह लोगों को पकड़ लिया गया, जिन्हें बाद में पुलिस के हवाले कर दिया गया। इस मामले की पुष्टि करते हुए तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (SP) राजेश द्विवेदी ने बताया कि हिरासत में लिए गए लोगों से पूछताछ की गई और उनके बैंक खातों की जाँच की गई, ताकि पैसों के लेन-देन और संभावित विदेशी फंडिंग का पता लगाया जा सके।
पुलिस की शुरुआती जाँच में सामने आया कि लोगों को धार्मिक आधार पर संगठित किया जा रहा था और लालच देकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित किया जा रहा था। इसके बाद मामले की गहराई से जाँच शुरू की गई।
13 जुलाई का यह मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। इसके बाद जुड़े मामलों में अगले कुछ दिनों के भीतर कम से कम पाँच FIR दर्ज की गईं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस पूरे रैकेट के मुख्य आरोपित को करीब 4 करोड़ रुपए की फंडिंग मिली थी और यह धर्मांतरण नेटवर्क तमिलनाडु से चलाया जा रहा था।
ऑपइंडिया ने इस मामले से जुड़ी तीन FIR और कोर्ट के दस्तावेज हासिल किए थे और उस समय हिंदू युवा वाहिनी के जिला संयोजक ठाकुर राघवेंद्र सिंह से बातचीत भी की थी।
केस कैसे सामने आया – FIRs की पड़ताल
इस पूरे मामले की शुरुआत 13 जुलाई 2025 को सिंधौली थाना क्षेत्र में दर्ज पहली FIR से हुई थी। यह FIR राघवेंद्र सिंह की शिकायत पर दर्ज की गई थी। पुलिस ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया।
अपनी शिकायत में राघवेंद्र सिंह ने बताया कि उन्हें सूचना मिली थी कि सिंधौली गुरुद्वारे के सामने, पूर्व दिशा की ओर स्थित एक मकान में ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन की गतिविधियाँ चलाई जा रही हैं। शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामले की जाँच शुरू की, जिसके बाद पूरे धर्मांतरण नेटवर्क का खुलासा होना शुरू हुआ।
स्रोत: यूपी पुलिस
मिली सूचना के आधार पर राघवेंद्र सिंह तुरंत हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं के साथ मौके पर पहुँचे और इसकी जानकारी पुलिस को दी। सूचना मिलते ही पुलिस भी मौके पर पहुँची और उस मकान के अंदर से धर्म परिवर्तन कराने या उसमें सहयोग करने वाले कई लोगों को पकड़ लिया।
इस मामले में दर्ज FIR में प्रह्लाद सिंह, मुकेश बाल्मीकि, गुरदास बाल्मीकि, अंशनीत कुमार राठौर, किरण, अंशी देवी, सना, बिमला देवी, आरती, राजवती सहित अन्य लोगों को आरोपी बनाया गया है। पुलिस सभी आरोपियों की भूमिका की जाँच कर रही है और आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
स्रोत: यूपी पुलिस
राघवेंद्र सिंह ने बताया कि आरोपित अंशनीत के पास से बरामद बैग में एक बाइबिल, ईसाईयत से जुड़ी अन्य सामग्री, आधार कार्ड और कुछ फोटो मिले थे। मौके से कई अन्य सहयोगी आरोपित भागने में सफल हो गए।
हालाँकि इस FIR में पद्मनमन का नाम सीधे तौर पर आरोपी के रूप में दर्ज नहीं है, लेकिन वह आरोपित किरण का पति और अंशी देवी का पिता है। पुलिस ने पद्मनमन को गिरफ्तार किया, क्योंकि जाँच में सामने आया कि वह तमिलनाडु स्थित ईसाई मिशनरी संगठनों से फंडिंग प्राप्त कर रहा था।
FIR दर्ज होने के बाद इस मामले में जमानत से जुड़ा एक आदेश भी सामने आया है, जिसमें पद्मनमन की भूमिका और धर्मांतरण से जुड़ी फंडिंग का पूरा विवरण विस्तार से बताया गया है।
स्रोत: यूपी पुलिस
दूसरी FIR
इस क्रम की दूसरी FIR 27 जुलाई को खुटार थाना क्षेत्र में दर्ज की गई। यह FIR हिंदू युवा वाहिनी के सदस्य अवनीश मिश्रा की शिकायत पर दर्ज हुई थी। पुलिस ने यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 352 और 351(3) के साथ-साथ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 5(1) के तहत दर्ज किया। इस FIR में हरिश्चंद्र जाटव और उसके बेटे शैलेश को आरोपित बनाया गया है।
स्रोत: यूपी पुलिस
अपनी शिकायत में अवनीश मिश्रा ने बताया कि उन्हें सूचना मिली थी कि कुंबिया माफी गाँव के एक मकान में धर्म परिवर्तन की गतिविधियाँ चल रही हैं। जानकारी के अनुसार, वहाँ हिंदू महिलाओं और पुरुषों को पैसों का लालच देकर ईसाईयत अपनाने के लिए उकसाया जा रहा था।
सूचना मिलते ही अवनीश मिश्रा अपने संगठन के अन्य सदस्यों के साथ मौके पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि हरिश्चंद्र अपने घर पर प्रार्थना सभा आयोजित कर रहा था। इस सभा में करीब 30 से 40 हिंदू महिलाएँ और पुरुष मौजूद थे। आरोप है कि इन लोगों को हिंदू धर्म छोड़कर ईसाईयत अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा था।
स्रोत: यूपी पुलिस
जब अवनीश और उनके साथियों ने इसका विरोध किया, तो आरोपी उन्हें गाली देने लगे और जान से मारने की धमकी दी। अवनीश ने बताया कि आरोपी खुद कह रहे थे कि उन्हें धर्मांतरण कराने के लिए विदेशी फंडिंग मिल रही है और उन्होंने पहले ही कई सैकड़ों हिंदू लोगों को धर्मांतरित कर दिया है। स्थानीय निवासी ने भी अवनीश को बताया कि उसे ईसाईयत अपनाने के लिए 50,000 रुपये की पेशकश की गई थी।
स्रोत: यूपी पुलिस
छापेमारी के दौरान पुलिस ने मौके से बाइबिल, ईसाई प्रार्थना सामग्री और ईसाईयत से जुड़ी अन्य किताबें और साहित्य बरामद किया। मामले की जाँच शुरू कर दी गई है, जिसमें आरोपित से जुड़े संभावित बाहरी या विदेशी फंडिंग की भी छानबीन की जा रही है।
तीसरी FIR
इस मामले की तीसरी FIR भी 27 जुलाई को दर्ज की गई। यह FIR राघवेंद्र सिंह की शिकायत पर दर्ज की गई थी। पुलिस ने यह FIR भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 131 और 351(3) और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 5(1) के तहत दर्ज की। इस FIR में हेमराज पासी, ओम पाल, लौंगश्री, लाडली और 20 से 25 अज्ञात व्यक्तियों को आरोपित बनाया गया है।
स्रोत: यूपी पुलिस
राघवेंद्र सिंह के अनुसार, उन्हें चेना रुरिया क्षेत्र में धर्म परिवर्तन की गतिविधियों के बारे में सूचना मिली थी। सूचना मिलने के बाद वह अपने संगठन के अन्य सदस्यों के साथ मौके पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि हेमराज, ओम पाल, लौंगश्री, लाडली और अन्य लोग हिंदू लोगों को लालच और दबाव देकर ईसाईयत में परिवर्तित कर रहे थे।
स्रोत: यूपी पुलिस
जब राघवेंद्र और उनके साथियों ने इसका विरोध किया, तो आरोपित लकड़ी से हमला करने लगे और हिंदू युवा वाहिनी के कई सदस्यों को घायल कर दिया। आरोपित यह भी दावा कर रहे थे कि उन्हें 2 लाख से 3 लाख रुपए मिल रहे हैं और भविष्य में और अधिक कमाने का वादा किया गया है।
उन्होंने उन ग्रामीणों को धमकी दी जो हिंदू युवा वाहिनी के सदस्यों के साथ थे, कि उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाया जाएगा। आरोपित खुलेआम कह रहे थे कि उनका पुलिस के साथ सेटिंग है और कोई उन्हें कुछ नहीं कर सकता। इन सभी आरोपों के आधार पर पुलिस ने FIR दर्ज की और नामजद और अज्ञात सभी आरोपित के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी।
स्रोत: यूपी पुलिस
राघवेंद्र ने ऑपइंडिया को क्या बताया
ऑपइंडिया से बातचीत में राघवेंद्र सिंह ने बताया कि सिंधौली में हो रहे धर्मांतरण के मामले हाल ही के नहीं हैं, बल्कि यह लंबे समय से संगठित तरीके से चल रहे हैं। उन्होंने कहा, “यह कोई अचानक शुरू हुआ मामला नहीं है। यह लगभग एक साल से चल रहा है और कुछ मामलों में तो चार से छह साल से भी अधिक समय से चल रहा है।”
राघवेंद्र के अनुसार, शुरुआत में आरोपित किराए के स्थानों पर बैठकें आयोजित करते थे। लेकिन बाद में उन्होंने जमीन खरीदकर खास तौर पर इस उद्देश्य के लिए मकान बना लिया। उन्होंने कहा, “लोगों को बताया जाता था कि यह एक सत्संग है। गरीब और कम पढ़े-लिखे मजदूर परिवारों, खासकर महिलाओं को जानबूझकर चुना जाता था क्योंकि उन पर आसानी से असर किया जा सकता था।”
उन्होंने आगे बताया कि इन बैठकों में महिलाओं को जुटाने के लिए उन्हें पैसे का लालच दिया जाता था। राघवेंद्र ने कहा, “महिलाओं को बैठकों में आने के लिए 500 रुपए दिए जाते थे और जो अन्य महिलाओं को लाती थीं उन्हें भी 500 रुपए मिलते थे।” इसके अलावा, इन बैठकों में महिलाओं से कहा जाता था कि यीशु मसीह की पूजा करने से उन्हें संतान की प्रापति होगी। उन्होंने बताया, “जब बच्चा पैदा होता था, तो इसे उस विश्वास का प्रमाण बताया जाता था।”
‘एंटरटेनमेंट क्लासेस’ का चौंकाने वाला आरोप
राघवेंद्र सिंह ने इस क्षेत्र में धर्मांतरण नेटवर्क के बारे में एक चौंकाने वाला खुलासा भी किया। उन्होंने बताया कि युवाओं को मनोरंजन क्लास या एंटरटेनमेंट क्लास में बुलाया जाता था, जहाँ उन्हें डांस और इसी तरह की गतिविधियों में भाग लेने के लिए कहा जाता था, ताकि धीरे-धीरे उनका मानसिक दृष्टिकोण बदल सके। उन्होंने कहा, “जो जानकारी हमें शुरू में मिली थी, वह इन एंटरटेनमेंट क्लास के बारे में थी।” ये क्लासें धर्मांतरण प्रक्रिया का हिस्सा थीं।
राघवेंद्र ने बताया कि ये सत्र प्रार्थना सभाओं से अलग आयोजित किए जाते थे और केवल युवा प्रतिभागियों के लिए होते थे। लड़कों और लड़कियों को नृत्य करने के लिए कहा जाता था और उन्हें यह बताया जाता था कि वे कपड़े या शिष्टाचार की चिंता किए बिना स्वतंत्र रूप से डांस करें।
उनके अनुसार, प्रतिभागियों को अपनी रोक-टोक छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था, जिससे भावनात्मक और नैतिक रूप से वे कमजोर हो जाते थे। राघवेंद्र ने कहा, “एक बार जब वह अवस्था पहुँच जाती थी, तो उन्हें बताया जाता था कि वे जो चाहें वह करें। यह पूरी तरह गलत और अस्वीकार्य था।”
उन्होंने बताया कि इन गतिविधियों का उद्देश्य धीरे-धीरे उपस्थित लोगों को प्रभावित करना और उन्हें नियंत्रित करना था। हालाँकि, जब पुलिस ने उस स्थान पर छापा मारा, तो इस तरह की गतिविधियाँ उस समय नहीं चल रही थीं और न ही इनका जिक्र FIR या कोर्ट के दस्तावेजों में था। ऑपइंडिया यह स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं कर पाया कि इन गतिविधियों का आयोजन उन लोगों की गिरफ्तारी से पहले हो रहा था या नहीं।
करोड़ों की फंडिंग का खुलासा
राघवेंद्र सिंह ने आगे बताया कि गिरफ्तार व्यक्तियों के बैंक खातों की जाँच में लगभग 4.25 करोड़ रुपए के लेन-देन का पता चला। उन्होंने कहा, “जैसे-जैसे हम गहराई में गए, यह सामने आया कि ऐसे गतिविधियाँ जिले के लगभग 200 स्थानों पर हो रही थीं।” उन्होंने यह भी बताया कि मामला फिलहाल अदालत में विचाराधीन है, लेकिन “ऐसी गतिविधियों की जानकारी समय-समय पर लगातार सामने आती रहती है।”
राघवेंद्र ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भी प्रशंसा की और कहा कि उन्होंने अवैध धर्मांतरण के खिलाफ प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से मजबूत रुख अपनाया है। उन्होंने कहा, “यह केवल महाराज योगी आदित्यनाथ जी की वजह से संभव हुआ। उनका स्पष्ट रुख जमीनी स्तर पर कार्रवाई को मजबूत बनाता है।” उन्होंने यह भी कहा कि पहले ऐसे मामलों को नजरअंदाज किया जाता था, लेकिन अब जाँच एजेंसियाँ इन्हें गंभीरता से ले रही हैं।
हाल ही की न्यायिक टिप्पणियों का जिक्र करते हुए राघवेंद्र ने बताया कि उच्च न्यायालय ने राज्य में धर्मांतरण के मुद्दे पर भी कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा, “हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि यदि कोई धर्मांतरण करता है, तो उसे आरक्षण या सरकारी सुविधाओं का हक नहीं होना चाहिए। उन्हें कोई सुविधा नहीं दी जानी चाहिए।”
राघवेंद्र के अनुसार, इन घटनाओं और न्यायिक रुख की वजह से लोग आगे आकर जानकारी देने और ऐसी गतिविधियों का विरोध करने के लिए प्रेरित हुए हैं। उन्होंने कहा, “संदेश अब स्पष्ट है। सनातन धर्म की रक्षा प्राथमिकता है और जहाँ भी उल्लंघन पाया जाएगा, कार्रवाई की जाएगी।”
कोर्ट ने पद्मनाभन उर्फ पादरी जोशुआ को जमानत देने से इनकार कर दिया
ऑपइंडिया को एक जमानत आदेश भी मिला, जिसमें शाहजहांपुर जिला और सत्र न्यायालय ने पद्मनमन उर्फ पास्टर जोशुआ को जमानत देने से इनकार किया। यह जमानत 11 अगस्त 2025 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश आशिष वर्मा, शाहजहांपुर की कोर्ट ने खारिज की।
कोर्ट ने नोट किया कि जमानत अर्जी पद्मनमन उर्फ पद्मनवन उर्फ पास्टर जोशुआ और उनकी पत्नी किरण जोशुआ ने दाखिल की थी, जो इस मामले में जिला जेल में बंद हैं। आदेश में दर्ज अभियोजन मामले के अनुसार, यह मामला सीधे 13 जुलाई 2025 को हिंदू युवा वाहिनी जिला अध्यक्ष राघवेंद्र सिंह की शिकायत पर दर्ज पहली FIR से शुरु हुआ है।
FIR में बताया गया था कि सिंधौली गुरुद्वारे के सामने स्थित एक मकान में ईसाई मिशनरियों द्वारा पैसों का लालच देकर धर्मांतरण कराया जा रहा था। इसके बाद पद्मनमन, उनकी पत्नी किरण और कई अन्य लोगों को मौके से गिरफ्तार किया गया था।
जमानत आदेश में दर्ज है कि छापेमारी के दौरान पद्मनमन और उनकी पत्नी किरण के पास से एक बैग बरामद हुआ, जिसमें बाइबिल, अन्य ईसाईयत से जुड़ी सामग्री, आधार कार्ड और कुछ फोटो थे।
कोर्ट ने केस डायरी पर भी भरोसा किया, जिसमें बताया गया कि तमिलनाडु निवासी पद्मनमन ने धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों के लिए काफी फंडिंग प्राप्त की थी। बैंक रिकॉर्ड से पता चला कि पद्मनमन के बैंक ऑफ बड़ौदा खाते में कुल ₹25,75,642.99 जमा हुए, जो जीजस रिडीम्स मिशनरी, मिशनरी यूपी होल्डर ट्रस्ट और द पॉकेट टेस्टामेंट लीग जैसी संस्थाओं से आए। आदेश में कई हाई-वैल्यू लेन-देन का भी जिक्र है, जिसमें मुंबई स्थित डिजिटल खातों से UPI ट्रांसफर भी शामिल हैं।
स्रोत: शाहजहांपुर जिला न्यायालय
इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पद्मनमन की पत्नी किरण जोशुआ के बैंक खाते में भी इन मिशनरी संस्थाओं से ₹4,76,029 जमा हुए थे। आदेश में यह भी दर्ज है कि किरण मूल रूप से एक हिंदू महिला थीं और पद्मनमन से संपर्क में आने के बाद उन्होंने ईसाईयत अपनाया। यह तथ्य केस डायरी और सहायक दस्तावेजों में भी दर्ज है।
आदेश में उद्धृत स्वतंत्र गवाहों के बयानों के अनुसार, पद्मनमन, किरण और अन्य आरोपित अंशनीत कुमार राठौर सप्ताहिक प्रार्थना सभाओं का आयोजन हिंदू बहुलता वाले क्षेत्रों में कर रहे थे, जिसका उद्देश्य गरीब और कमजोर ग्रामीणों को लालच देकर धर्मांतरित करना था।
आरोपों की गंभीरता, वित्तीय लेन-देन का रिकॉर्ड और कथित गतिविधियों के सामाजिक प्रभाव को देखते हुए अदालत ने यह माना कि अपराध गंभीर प्रकृति का है। मामले की सार्थकता पर जाए बिना, कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि आरोपितों को जमानत देने के पर्याप्त आधार नहीं हैं और इसलिए पद्मनमन उर्फ पास्टर जोशुआ और किरण जोशुआ की जमानत अर्जी को खारिज कर दिया।
किन संगठनों से फंडिंग मिली?
शाहजहांपुर के धर्मांतरण मामलों में फंडिंग ट्रेल में एक संगठन का नाम सामने आया है, जो है जीजस रिडीम्स मिनिस्ट्रीज। यह एक ईसाई प्रचारक संगठन है, जिसका नेतृत्व तमिलनाडु स्थित प्रचारक मोहन सी लाजरस करते हैं।
संगठन की अपनी साहित्यिक सामग्री में दावा किया गया है कि लाजरस ने ईसाईयत अपनाने के बाद चमत्कारिक रूप से स्वस्थ होने का अनुभव किया। यह कथा संगठन के प्रचार और अभियान की विचारधारा की नींव बनाती है।
संगठन की सामग्री बार-बार बीमारी, कष्ट, इलाज और मुक्ति जैसे विषयों को प्रमुखता से प्रस्तुत करती है, जो कई धर्मांतरण मामलों में कमजोर और संवेदनशील लोगों को भावनात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल किए गए हैं।
संगठन का दावा है कि वह बड़े पैमाने पर प्रार्थना अभियान, उपवास प्रार्थनाएँ, रातभर प्रार्थना सत्र और तथाकथित मुक्ति महोत्सव आयोजित करता है और ईसाईयत का प्रचार पत्रिकाओं, टीवी प्रसारण, ईमेल और अन्य आयोजनों के माध्यम से करता है।
संगठन खासकर बच्चों, किशोरों, युवाओं और महिलाओं को अपने प्रचार के लक्षित समूह के रूप में चुनता है। बच्चों को धर्मांतरण केंद्रित अभियानों में शामिल करना उनकी सहमति, संवेदनशीलता और नैतिक सीमाओं पर गंभीर सवाल उठाता है, खासकर ऐसे देश में जहाँ धार्मिक स्वतंत्रता कानून स्पष्ट रूप से लालच, दबाव या अल्पसंख्यकों का शोषण करके धर्मांतरण को निषिद्ध करता है।
शाहजहांपुर मामले में पुलिस रिकॉर्ड और कोर्ट के दस्तावेज दिखाते हैं कि जीजस रिडीम्स मिनिस्ट्रीज से जुड़े फंड उन लोगों के बैंक खातों में आए, जो अवैध धर्मांतरण में शामिल थे।
संगठन का दावा है कि वह पूरे भारत में वर्ल्ड रिवाइवल प्रेयर सेंटर का एक व्यापक नेटवर्क चलता है। इसका नेटवर्क आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, झारखंड, पंजाब, पुडुचेरी, दिल्ली और तमिलनाडु तक फैला हुआ है।
इसके केंद्र चित्तूर और तिरुपति, सिकंदराबाद, बेंगलुरु के कई स्थान, हासन, मैसूरु, तुमकुर, KGF, कोट्टायम, तिरुवनंतपुरम, मुंबई के धारावी और मलाड, रांची, चंडीगढ़, पुडुचेरी और नई दिल्ली जैसी जगहों में हैं।
केवल तमिलनाडु में ही संगठन के कम से कम दस केंद्र हैं, जिनमें आदम्बक्कम, अंबत्तूर, चेंगलपट्टू, कांचीपुरम, एग्मोर, पुरासावल्कम, रॉयपुरम, शांति निलयम, ताम्बरम और तिरुवल्लूर शामिल हैं।
मिशन अपहोल्डर्स ट्रस्ट
शाहजहांपुर के धर्मांतरण मामलों की जाँच के दौरान एक और संगठन सामने आया है, जो है मिशन अपहोल्डर्स ट्रस्ट। यह तमिलनाडु स्थित संगठन वेलोर में मुख्यालय रखता है। ट्रस्ट खुद को मिशनरियों और पादरियों का समर्थन करने वाला संगठन बताता है और अपने मिशन बयान में कहता है कि यह मिशनरी समुदाय की जरूरतों को पूरा करने का काम करता है।
इनमें स्वास्थ्य देखभाल, परेशान और संकट की देखभाल, भावनात्मक और नए अध्यात्म से जुड़ना,आराम, तथा मिशनरियों के बच्चों और सेवानिवृत्त मिशनरियों के सामाजिक और आध्यात्मिक सुदृढ़ीकरण शामिल हैं।
अपने उद्देश्यों के अनुसार, मिशन अपहोल्डर्स ट्रस्ट का लक्ष्य है कि मिशनरियों को सुसज्जित, सक्रिय और प्रोत्साहित किया जाए ताकि वे हमेशा समाज में नमक और प्रकाश की तरह काम कर सकें।
हालाँकि भाषा कल्याणकारी दिखाई देती है, लेकिन जब ऐसे संगठन अवैध धर्मांतरण मामलों के वित्तीय ट्रेल में सामने आते हैं, तो यह सवाल उठता है कि इसका उद्देश्य केवल मिशनरी गतिविधियों को बढ़ावा देना और उन्हें मजबूत करना है। ट्रस्ट का ध्यान आम जन कल्याण पर नहीं है, बल्कि मिशनरियों को उनके धार्मिक प्रचार को जारी रखने और गहराई तक पहुँचाने में सक्षम बनाना है।
आधिकारिक रिकॉर्ड दिखाते हैं कि मिशन अपहोल्डर्स ट्रस्ट FCRA पंजीकृत है, जिससे यह कानूनी रूप से विदेशी योगदान प्राप्त कर सकता है। वित्तीय विवरणों के अनुसार, ट्रस्ट ने वित्तीय वर्ष 2023–24 में ₹49,52,936 और 2022–23 में ₹56,53,856.76 की विदेशी फंडिंग प्राप्त की।
कुल मिलाकर, गिरफ्तारियाँ, कई FIR, कोर्ट के फैसले और वित्तीय ट्रेल यह दर्शाते हैं कि यह केवल एक धर्मांतरण का मामला नहीं है, बल्कि एक गहन और संगठित ऑपरेशन है।
शाहजहांपुर के मामलों से यह पैटर्न सामने आता है कि इसमें लालच, बार-बार आयोजित सभा, विभिन्न थाना क्षेत्रों में समन्वित गतिविधियाँ और तमिलनाडु स्थित मिशनरी संगठनों से विदेशी फंडिंग के जरिए पैसा शामिल है।
जिले में धर्मांतरण नेटवर्क में शामिल मिशनरियों के खिलाफ अधिकारियों द्वारा त्वरित कार्रवाई की जा रही है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर हो रहे धर्मांतरण गंभीर चिंता का विषय हैं और इसके जाँच की आवश्यकता है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
क्रिसमस ईसाईयों का अहम त्यौहार है, जो जीसस क्राइस्ट के जन्म की याद में मनाया जाता है। दुनिया भर में फैले ईसाइयत को मानने वाले इस त्योहार को पूरे जोर-शोर से मनाते हैं। जब पतझड़ की जगह सर्दी आ जाती है और जमीन बर्फ से ढक जाता है, तो दुनियाभर में क्रिसमस का माहौल बनने लगता है।
इस दौरान शॉपिंग, घूमना-फिरना, खाना-पीना और सजावट पर होने वाले खर्च में बढ़ोतरी होती है। इसका पर्यावरण पर असर पड़ता है।
इस लेख में क्रिसमस पर होने वाले पर्यावरण के नुकसान का आंकलन किया गया है। साथ ही जंगलों की कटाई, कचरे का पहाड़ और खाने पीने की बर्बादी पर चर्चा की गई है। यहाँ क्रिसमस के जश्न पर सवाल उठाने के बजाय, फोकस इस बात पर है कि क्रिसमस से जुड़ी कंजम्पशन-ड्रिवन प्रैक्टिस कैसे इकोसिस्टम को बर्बाद कर रही हैं।
क्रिसमस और पेड़ों की कटाई का दबाव
क्रिसमस के जिन असर पर कम बात होती है, उनमें से एक है पेड़ों की कटाई में इसका अप्रत्यक्ष योगदान। त्योहारों के मौसम में नैचुरल क्रिसमस ट्री, पेपर-बेस्ड प्रोडक्ट, गिफ्ट पैकेजिंग, फर्नीचर और सजावटी चीज़ों की बढ़ती माँग के साथ, पेड़ों को सबसे ज़्यादा नुकसान होता है। जब पेड़ बागानों से लिए जाते हैं, तब भी इन कामों के लिए जमीन, पानी, खाद और ज्यादा एनर्जी वाले ट्रांसपोर्ट की जरूरत होती है। पेड़ों के अलावा, कार्डबोर्ड, पेपर बैग और रैपिंग मटीरियल की बढ़ती माँग से दुनिया भर में जंगल के संसाधनों पर दबाव पड़ता है।
अमेरिकन फार्म ब्यूरो के अनुसार, यूनाइटेड स्टेट्स में हर साल लगभग 25 मिलियन नैचुरल क्रिसमस ट्री काटे और बेचे जाते हैं। इसके अलावा, UK सरकार के अनुसार, हर साल लगभग 6-8 मिलियन क्रिसमस ट्री काटे और बेचे जाते हैं।
अकेले नॉर्थ अमेरिका और यूरोप में, क्रिसमस मनाने के लिए हर साल लाखों पेड़ काटे जाते हैं। वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (WWF) ने अपनी लिविंग फॉरेस्ट्स रिपोर्ट में, बढ़ती कंज्यूमर डिमांड और लाइफस्टाइल को दुनिया भर में जंगलों की कटाई के लिए जिम्मेदार बताया है।
कचरा बनना और प्लास्टिक प्रदूषण
क्रिसमस के साथ सॉलिड वेस्ट भी तेज़ी से बढ़ता है। त्योहारों के समय डिस्पोजेबल डेकोरेशन, बहुत ज़्यादा पैकेजिंग और रैपिंग पेपर की वजह से घरेलू और कमर्शियल कचरा काफी बढ़ जाता है। यूनाइटेड किंगडम में एनवायरनमेंटल ऑडिट के मुताबिक, हर क्रिसमस पर लगभग 227,000 मील रैपिंग पेपर इस्तेमाल होता है, जो धरती को लगभग 9 बार लपेटने के लिए काफी है, और इसमें से ज़्यादातर नॉन-रीसायकल होता है।
त्योहारों में रैप करने में इस्तेमाल सामान नॉन-रीसायकल होता है क्योंकि वे लैमिनेटेड, डाई किए हुए या प्लास्टिक और ग्लिटर से कोट किए हुए होते हैं। इन्हें फेंका या जलाया जाता है, तो दोनों से ही प्रदूषण होता है और ग्रीनहाउस गैस निकलते हैं।
प्लास्टिक की समस्या
क्रिसमस पर गिफ्ट देना भी कचरे को बढ़ाता है। UK सरकार और वेस्ट- मैनेजमेंट डेटा से पता चलता है कि त्योहारों के समय साल के बाकी समय की तुलना में लगभग 30% ज़्यादा कचरा पैदा होता है, जिसमें से ज़्यादातर पैकेजिंग और कम समय तक चलने वाले कंज्यूमर गुड्स से जुड़ा होता है।
डिपार्टमेंट फॉर एनवायरनमेंट, फूड एंड रूरल अफेयर्स के अनुसार, UK में £40 मिलियन से ज़्यादा के फालतू क्रिसमस गिफ्ट फेंक दिए जाते हैं, जिनमें से कई ट्रेड होने के कुछ ही महीनों बाद लैंडफिल में चले जाते हैं। पैकेजिंग इस समस्या को और बढ़ा देती है।
WRAP के डेटा के अनुसार, प्लास्टिक कोटिंग, ग्लिटर, रिबन और मिले-जुले मटीरियल से होने वाले कंटैमिनेशन के कारण हर साल लगभग 114,000 टन रीसायकल पैकेजिंग गलत तरीके से फेंक दी जाती है।
कंज्यूमर सर्वे के अनुसार, सोशल गिफ्ट देना खास तौर पर बेकार है। काम करने वालों और जान-पहचान वालों से मिले गिफ्ट को नापसंद किए जाने की संभावना ज्यादा होती है। ये इस्तेमाल भी नहीं किए जाते और पर्यावरण को भी अंत में नुकसान पहुँचाते हैं।
पेड़ों का कटना और सड़ना दोनों पर्यावरण के लिए नुकसानदेह
क्रिसमस का पर्यावरण पर असर दिखने वाले कचरे से कहीं ज्यादा है। पेडों को काट कर उन्हें बर्बाद होने के लिए छोड़ दिया जाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, UK में हर साल लगभग 7-8 मिलियन असली क्रिसमस ट्री बर्बाद होते हैं, जिन्हें फेंक दिया जाता है, जिससे लगभग 12000 टन ग्रीन वेस्ट पैदा होता है।
मीथेन (CH₄) एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है, जो कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) की तुलना में कम समय में कहीं अधिक ग्लोबल वार्मिंग की क्षमता रखती है। लैंडफिल में जैविक सामग्री, जैसे कि पेड़ जब सड़ती है, तो बड़ी मात्रा में मीथेन उत्पन्न होती है, जिससे हर साल हज़ारों टन एमिशन हो सकता है।
खाने की बर्बादी इस समस्या को और बढ़ा देती है। WRAP के मुताबिक, अनुमान है कि क्रिसमस के दौरान UK में 200,000 टन से ज्यादा खाना बर्बाद हो जाता है। यह बर्बादी न सिर्फ खाने की होती है, बल्कि प्रोडक्शन में इस्तेमाल होने वाले संसाधनों की भी है। जब बचे खाने को लैंडफिल में फेंका जाता है, तो यह मीथेन गैस छोड़ती है।इसका जलवायु पर असर पड़ता है।
कुल मिलाकर जंगलों की कटाई, बायोडायवर्सिटी के नुकसान और क्लाइमेट में अस्थिरता पैदा करती है। क्रिसमस जैसे त्यौहारों में उत्सव कई दिनों तक चलते हैं। इस दौरान सामानों का इस्तेमाल ज्यादा होती है और बर्बादी भी ज्यादा होती है। हर साल इनमें बढ़ोतरी हो रही है, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुँच रहा है।
पर्यावरण और उपभोक्तावाद में संतुलन जरूरी
क्रिसमस से जुड़ी पर्यावरण की चिंता का सेलिब्रेशन या सांस्कृतिक परंपरा से कोई लेना देना नहीं है। बल्कि ये उपभोक्तावाद को उजागर करता है। पर्यावरण की कीमत पर कई ग्लोबल त्यौहार मनाए जा रहे हैं। रिसर्च से पता चलता है कि जंगल, जलवायु परिवर्तन और इकोसिस्टम को दुरुस्त रखने के लिए हाई मानदंड बनाने की जरूरत है। दुनिया के चकाचौध में ये काफी पीछे छूटते जा रहे हैं। कम कचरा, खपत की जरूरत और पर्यावरण के प्रति जागरूकता पर फोकस करने वाले उत्सवों पर बल दिया जाना चाहिए ताकि संतुलन बना रहे।
(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
मान लीजिए एक शिक्षक है, जो कक्षा में सबसे शांत और सहनशील बच्चे को बार-बार समझाता है कि उसे और सहनशील बनना चाहिए, उसे और झुकना चाहिए और चुप रहना चाहिए। लेकिन वही शिक्षक कक्षा में दूसरे कोने में हो रहे शोर पर आँखे मूँद लेता है। वजह यह नहीं कि उसे दिखता नहीं, बल्कि इसलिए कि वहाँ बोलना असहज है। यही रवैया सार्वजनिक विमर्श में भी दिखता है, जहाँ उपदेश हमेशा सहनशील पक्ष को ही दिए जाते हैं।
यहाँ शिक्षक का उदाहरण देना जरूरी हो गया था। क्योंकि ‘सेकुलर’ सागरिका घोष की भूमिका उसी शिक्षक की हो गई है। जो ईसाइयों का मसीहा बनकर कक्षा के सबसे शांत बच्चे ‘हिंदू धर्म’ पर उपदेश दे रही हैं। इन्होंने क्रिसमस पर ईसाइयों की हक की लड़ाई लड़ने का प्रण लिया है। तो अब जहाँ भी ईसाइयों पर बदसलूकी होती देखती है, पहुँच जाती अपना ट्विटर/एक्स अकाउंट लेकर ‘शांत बच्चे’ को डाँटने। आप देख सकते हैं कि 24 से 25 दिसंबर के उनके पोस्ट केवल ईसाइयों के हित को लेकर ही हैं।
हमे क्या ही करना? यह जरूर कहा जा सकता था। अगर बात केवल सागरिका घोष और ईसाइयों (शोर) की होती। लेकिन ईसाइयों के लिए लड़ते हुए सागरिका घोष बार-बार ‘शांत बच्चे’ को घसीट रही हैं। सागरिका ने हिंदू धर्म को मानने वाले लोगों को ‘गुंडा’ बताया है। क्योंकि सागरिका को लगता है कि इसे सुनकर सहिष्णु धर्म का ‘शांत बच्चा’ क्या ही कर लेगा? इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ थोड़ी है, जो बेरहमी से पीट-पीटकर पेड़ पर टाँगकर जिंदा जला देगा।
सागरिका घोष ने क्रिसमस पर यजुर्वेद का दिया ज्ञान
तो इस ‘सहिष्णु धर्म’ को सागरिका घोष ‘गुंडे’ समझती हैं। यह उनके क्रिसमस की संध्या पर ईसाइयों की हक की लड़ाई लड़ते हुए किए गए एक पोस्ट में लिखा हुआ है। सागरिका कहती हैं, “प्रिय हिंदुत्व के गुंडो, आज दूसरे धर्मों पर हिंसा करने से पहले मुझे बताइए कि क्या आपने यजुर्वेद का शांति मंत्र पढ़ा है? अगर नहीं, तो इसे आज जरूर पढ़ें।”
Dear Hindutva thugs . Before you wreak violence on other religions today tell me if you’ve read the peace chant from the Yajur Veda. If not make it your essential reading for the day. #MerryChristmas2025
यहाँ सागरिका घोष ने यजुर्वेद के शांति मंत्र को एक समुदाय को नीचा दिखाने के लिए इस्तेमाल किया है। सागरिका को जानना होगा कि यह मंत्र सभी के लिए शांति की कामना करता है। बावजूद यजुर्वेद के शांति मंत्र को तंज और दूसरे धर्म के लोगों को अपमान करने के लिए इस्तेमाल किया।
अगर सागरिका घोष सच में यजुर्वेद की भावना को समझतीं, तो शांति की यह सीख केवल क्रिसमस तक सीमित नहीं रहती। तब यह शांति बांग्लादेश में मंदिरो पर हो रहे हमलों पर भी दिखाई देती, हिंदुओं पर अत्याचार और पलायन पर भी उनकी आवाज उठती। लेकिन वहाँ यजुर्वेद नहीं आता, वहाँ शांति मंत्र की जरूरत महसूस नहीं होती।
क्रिसमस पर सागरिका घोष की हिंदू-विरोधी और ईसाई-हित की लड़ाई
सिर्फ यह अकेला पोस्ट नहीं है, जिसका इस्तेमाल सागरिका घोष ईसाइयों के हित की लड़ाई में इस्तेमाल कर रही है। बल्कि उनके ट्विटर/एक्स अकाउंट पर ऐसे पोस्ट की भरमार लगी हुई है। खुद को ‘सेकुलर’ बताने वालीं सागरिका घोष खुलकर ईसाइयों की आवाज बन रही हैं, वो भी हिंदुओं को निशाना बनाते हुए।
यहाँ सागरिका घोष भारतीय कैथोलिक बिशप सम्मेलन (CBCI) के संदेश का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर फोटो खींचने को लेकर तंज कस कर रही हैं। उन्हें लगता है कि केवल क्रिसमस ही शांति और मिलने-बाँटने का संदेश देने वाला त्योहार है। वह कहती हैं, ” पीएम मोदी, फोटो खिंचवाने से समुदाय एक साथ नहीं आएँगे।” पीएम से ईसाइयों के लिए न्याय भी माँगा।
A Christmas message that every Indian should embrace. This is a land that embraces ALL and embraces Christmas with its unique message of love and goodwill. This Christmas is not for photo ops by @narendramodi . Posing for photos will NOT bring communities together only STERN…
इसके बाद सागरिका घोष को पीएम नरेंद्र मोदी का क्रिसमस पर चर्च जाना भी पसंद नहीं आया। जबकि क्रिसमस की बधाई देते हुए, उन्होंने खुद कहा कि यह त्योहार सबके लिए और त्योहार का संदेश सब तक पहुँचना चाहिए। तो पीएम मोदी के क्रिसमस पर चर्च जाने से तो यह संदेश और ज्यादा फैलेगा।
पीएम मोदी की एक्स पोस्ट पर सागरिका घोष के कमेंट का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: X-sagarikaghose)
लेकिन सागरिका घोष को देश के प्रधानमंत्री का चर्च जाना इसीलिए पसंद नहीं आया, क्योंकि यह उनके नैरेटिव पर पानी फेरने वाला काम हो गया। सागरिका को मुद्दा नहीं मिला, तो वो प्रधानमंत्री की तस्वीरें खिंचाने को लेकर ही बरस गईं। भाषा की मर्यादा लाँघते हुए सागरिका कहती हैं, “पीएम मोदी पाखंड और छल को एक कला की तरह पेश कर रहे हैं।”
यहाँ सागरिका किस पाखंड और छल की बात कर रही हैं? वही पाखंड, जिसमें ईसाई मिशनरी हिंदुओं को धर्मांतरण का लालच देती हैं या वही छल जहाँ मिशनरी स्कूलों में हिंदुओं का कलावा काट दिया जाता है। क्या सागरिका को यह नहीं पता था? इसके बावजूद एक सेकुलर देश का प्रधानमंत्री क्रिसमस पर चर्च जाते है पर इसमें भी सागरिका को परेशानी हो रही है।
इतना ही नहीं सागरिका घोष ने अपने ‘प्रोपेगेंडा पत्रकार’ पति राजदीप सरदेसाई के साथ मिलकर अपने नैरेटिव की खबरों को हवा भी दी। क्रिसमस से पहले राजदीप सरदेसाई के वीडियो को रीशेयर करते हुए दावा करती हैं कि BJP की नेता अंजू भार्गव एक दृष्टिबाधित लड़की पर चिल्ला रही हैं। लेकिन इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि BJP ने उन्हें कारण बताओ नोटिस भी जारी कर दिया है।
Why is the Church leadership in India not speaking out on these horrifying attacks? https://t.co/KEt3LuTWId
राजदीप सरदेसाई का कहना है कि क्रिसमस के आसपास ईसाइयों को धमकाया जा रहा है, बल्कि वह भूल गए कि ईसाई धर्मांतरण का मुद्दा सालभर रहता है। यहाँ सरदेसाई ने सालभर के मुद्दे को तो नजरअंदाज कर दिया, लेकिन क्रिसमस पर ईसाइयों के प्रति प्रेम दिखाने में कोई कमी नहीं छोड़ी।
सागरिका घोष का दूसरे धर्म पर ज्ञान और हिंदू-विरोधी बयान
क्रिसमस पर जो सागरिका घोष ईसाइयों का मसीहा बनकर हिंदुओं को निशाना बना रही हैं, यह उनका कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी वह कई बार हिंदुओं और हिंदू परंपराओं को लेकर ऐसे निचले स्तर के बयान दे चुकी हैं।
लव जिहाद के मुद्दे पर सागरिका घोष का रवैया जानिए। इसे गंभीर सामाजिक चिंता को खारिज करते हुए ‘मानसिक उन्माद‘ की तरह दुनिया के सामने पेश करती हैं। और इससे निपटने का नया तरीका इजाद करते हुए इसका हल तुर्की के टीवी शो ‘एर्टुग्रेल’ को बताती हैं। मानो यह कोई सीरियल देखने से पैदा हुआ भ्रम हो, न कि जमीनी हकीकत।
यही नहीं, जब सेना से जुड़े एक जवाब पर लोगों ने सवाल उठाए, तो सागरिका घोष ने उस सैनिक को ही ‘मूर्ख‘ बता दिया। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिन इस्लामी आक्रांताओं ने इतिहास में हिंदुओं का नरसंहार किया, मंदिर तोड़े और जबरन धर्मांतरण कराए, वही सागरिका घोष को ‘देशभक्त’ और ‘नायक’ नजर आते हैं।
दिलचस्प यह है कि जब दूसरे धर्म से जुड़े संवेदनशील मुद्दे सामने आते हैं, तो या तो सागरिका पूरी तरह चुप्पी साध लेती हैं या दुनिया के सामने महान और शांति का प्रतीक बताकर पेश करती हैं। उनके लिए समस्या तभी समस्या है, जब उसमें हिंदू शामिल हों।
यजुर्वेद का शांति मंत्र हिंदुओं को नहीं, सागरिका घोष को पढ़ने की जरूरत
आखिर में सागरिका घोष को यह बताने की जरूरत है कि हिंदुओं ने यजुर्वेद का शांति मंत्र पहले से पढ़ रखा है। उसे पढ़ने और समझने की जरूरत आपको है, जो शांति का अर्थ भी अपने नैरेटिव के हिसाब से तय करती हैं। आज जब क्रिसमस के नाम पर हिंदुओं को यह समझ आने लगा है कि क्रिसमस उन पर थोपा जा रहा है, और वे इसके खिलाफ जागरुक हो रहे हैं, तो इससे सागरिको घोष को इतनी परेशानी क्यों हो रही है?
सागरिका घोष को यह समझना होगा कि हिंदू अब जान चुका है, यह वही शुरुआती दबाव का हिस्सा होता है, जो पहले त्योहार मनवाने से शुरू होता है और धीरे-धीरे धर्मांतरण की ओर आकर्षित करता है। फिर गरीब हिंदू परिवारों को निशाना बनाते हैं। कहीं दवा के लालच में तो कहीं इलाज के नाम पर। यह सब पैसों से होता है। हाल ही में शाहजहाँपुर में सामने आए ईसाई धर्मांतरण के मामलों से यह साफ है, जिसमें मिशनरियों को विदेशों से फंडिंग मिलती थी।
क्रिसमस पर हिंदुओं को सागिरका घोष का ज्ञान खूब दिखता है, लेकिन यह ज्ञान तब सामने नहीं आता जब बांग्लादेश में एक हिंदू युवक को इस्लामी कट्टरपंथी बेरहमी से पीट-पीटकर पेड़ से लटका कर जिंदा जला देते हैं। तब आपके ट्विटर अकाउंट पर न्याय की माँग करती एक भी पोस्ट नहीं दिखती। तब आपकी संवेदना अचानक गायब हो जाती है।
यही आपकी चयनात्मक न्याय के लिए आवाज है। कब हिंदुओं को निशाना बनाना है और कब ईसाइयों के लिए मसीहा बनकर खड़ा होना है। इसी चयन के सहारे देश में सेकुलरिज्म की एक नकली मानसिकता फैलानी की कोशिश की जाती है। इसीलिए यजुर्वेद का शांति मंत्र सागिरका घोष आप भी जरूर पढ़ें, ताकि शांति की बात हर धर्म के त्योहार पर की जा सके।
‘इंडियाज गॉट लेटेंट’ शो से चर्चित स्टैंड अप कॉमेडियन शैरन वर्मा का एक वीडियो इस समय सोशल मीडिया पर बहस का मुद्दा बना हुआ है। इस वायरल वीडियो में शैरन वर्मा दर्शकों के सोशल मीडिया कमेंट्स पढ़ रही थीं। कमेंट्स पढ़ते हुए उन्होंने एक ऐसे यूजर का जिक्र किया, जिसके प्रोफाइल बायो में ‘Free Palestine’ लिखा था। शैरन ने बताया कि उसी यूजर ने उन्हें कमेंट में रसोई में जाकर बर्तन धोने जैसी बात कही थी।
Bihari Style Sharon Verma
"कमेंट आता है – जाओ किचन में बर्तन धोओ।
वाह! कॉल टू एक्शन।
और बायो में लिखा होता है… Free Palestine, Free Palestine…
लेकिन शैरोन को किचन में रखो।
मेरी कॉमेडी थोड़ी डेंजरस हो रही है ना? खुद के बर्तन नहीं धुल रहे, हम करेंगे Free Palestine!
इस विरोधाभास पर शैरन ने तंज कसते हुए एक जोक किया और महिलाओं के प्रति ऐसी सोच पर कटाक्ष किया। उनका मजाक उस मानसिकता को लेकर था, जिसमें खुद को प्रगतिशील दिखाने वाले लोग भी महिलाओं के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते हैं।
वीडियो सामने आते ही क्यों भड़का विवाद?
यह वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, वैसे ही विवाद शुरू हो गया। कुछ यूजर्स ने आरोप लगाया कि शैरन ने ‘Free Palestine’ जैसे संवेदनशील नारे को मजाक का हिस्सा बना दिया है। इसके बाद उनके खिलाफ पोस्ट्स की बाढ़ आ गई और मामला X पर ट्रेंड करने लगा। कई लोगों ने इसे राजनीतिक और धार्मिक भावनाओं से जोड़कर देखा, जबकि कुछ अकाउंट्स की ओर से तीखी भाषा और ट्रोलिंग भी देखने को मिली।
विरोध करने वालों की आपत्ति क्या है?
वहीं, विरोध करने वाले लोग इस बात पर आपत्ति जता रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय और संवेदनशील मुद्दों से जुड़े शब्दों को कॉमेडी में शामिल करना ठीक नहीं है। उनका कहना है कि ऐसे संदर्भ भावनाओं को ठेस पहुँचा सकते हैं, भले ही इरादा कुछ और हो।
एक यूजर ने लिखा, “वह बिहार की रहने वाली है, लेकिन उसने अपनी पूरी जिंदगी मुंबई में आराम और अमीरी में बिताई है। शुरू में, उसने ध्यान खींचने और फॉलोअर्स पाने के लिए ‘पारिवारिक संघर्षों’ का कार्ड खेला। अब? उसने सारी हदें पार कर दी हैं, खुलेआम नरसंहार का मजाक उड़ा रही है और अकल्पनीय इंसानी दुख को एक तमाशा बना रही है। यह सोची-समझी परफॉर्मेंस है, इज्जत और इंसानियत की भावना की कीमत पर एक खास ऑडियंस को खुश करने की रणनीति है।”
Comedian Sharon Verma – The Mask Slips.
She hails from Bihar but has lived her entire life in Mumbai, privileged, rich, and comfortable. Initially, she played the “family struggles” card to gain attention and followers. Now? She has crossed the line, openly mocking genocide,… pic.twitter.com/UweLfFuj0C
वहीं एक अन्य यूजर ने लिखा, “नरसंहार को मजाक बनाना कॉमेडी नहीं है, यह घटियापन है। शैरन वर्मा ने दर्शकों को खुश करने के लिए फिलिस्तीनियों की मौत का मजाक उड़ाया। इतिहास ऐसे लोगों को याद रखता है।”
Turning genocide into a joke is not comedy, it’s depravity.
Sharon Verma mocked Palestinian deaths to please an audience.
एक अन्य ने लिखा, “वह शैरन वर्मा हैं, जो मूल रूप से बिहार की रहने वाली हैं। कोई बुरा न माने, लेकिन जोकरों के ग्रुप से समझदारी या हमदर्दी की उम्मीद करना बेकार है। वह पूरी जिंदगी मुंबई में रही हैं, उन्हें सारी सुविधाएँ मिली हैं, वह अमीर और आरामदायक जिंदगी जीती हैं।”
She is Sharon Verma, originally from Bihar. No offence, but expecting intellect or empathy from a group of jokers ? is pointless. She has lived in Mumbai all her life privileged, rich, and comfortable pic.twitter.com/OTiCWZSCm6
शैरन वर्मा के समर्थन में उतरे लोगों का कहना है कि इस पूरे जोक को गलत संदर्भ में देखा जा रहा है। उनके मुताबिक, शैरन ने न तो फिलिस्तीन पर कोई टिप्पणी की और न ही किसी समुदाय या धर्म को निशाना बनाया।
समर्थकों का तर्क है कि शैरन का इशारा केवल उस दोहरी मानसिकता की ओर था, जिसमें एक व्यक्ति समानता और इंसानियत की बात करता है, लेकिन महिलाओं को लेकर पुरानी और अपमानजनक सोच रखता है। इसी पाखंड को उजागर करना उनके जोक का असली मकसद था।
एक यूजर ने शैरन का समर्थन करते हुए पोस्ट में लिखा, “शैरन वर्मा ने फिलिस्तीन का मजाक नहीं उड़ाया, उन्होंने ‘फ्री फिलिस्तीन’ बायो के पाखंड को उजागर किया। @Muslim_ITCell जैसे इस्लामी ट्रोलर्स ने उसी तरीके से जवाब दिया जो वे जानते हैं, यानी गाली-गलौज, धमकियाँ, सिर्फ नफरत। याद है जब मुनव्वर फारुकी ने गोधरा दंगों पर मजाक बनाया था लेकिन मुनव्वर फारुकी एक सेलिब्रिटी हैं, शैरन वर्मा लगातार खतरे में हैं। इस्लाम का अपमान करना ईशनिंदा है, हिंदू धर्म का अपमान करना कॉमेडी है। सभ्य दुनिया को उनके समर्थन में आना चाहिए, नहीं तो कोई सभ्यता नहीं बचेगी याद रखें नूपुर शर्मा के साथ क्या हुआ था।”
Sharon Verma didn’t mock Palestine she exposed ‘Free Palestine’ bio hypocrisy. Islamist trolls like @Muslim_ITCell replied with the only way they know that is abuse, threats, Just hate.
Remeber When munawar Faruqui made a joke on godhra riots but
इसी तरह एक अन्य यूजर ने शैरन का समर्थन करते हुए लिखा, “शैरन वर्मा ने अपने वीडियो में किसी भी समुदाय का मजाक नहीं उड़ाया। वह बस उन नेगेटिव कमेंट्स के खिलाफ़ अपना स्टैंड ले रही हैं जो उन्हें रोजाना अपने वीडियो पर मिलते हैं। लेकिन लेफ्ट लॉबी के अकाउंट्स और पेड आईटी सेल ने उस हिस्से को एडिट किया और बिना किसी वजह के उनका मजाक उड़ाना शुरू कर दिया।”
Sharon Verma didn't mock any community in her videos. She is just taking her stand against negative comments she gets in her videos on daily basis But the left lobby accounts and paid it cells edited that part and started mocking her without any reason@donsharone ❤️
एक यूजर ने लिखा, “इस्लामवादी उसे निशाना बना रहे हैं लेकिन शैरन वर्मा ने कभी फिलिस्तीन का मजाक नहीं उड़ाया, उसने बस बायो में ‘फ्री फिलिस्तीन’ का पाखंड उजागर किया, जो महिलाओं को कोसने वाले महिला विरोधी लूजर हैं।”
Islamist are targeting her but sharon verma never made fun of palestine she just exposed hypocrisy of free palestine in bio misogynist losers who curse women https://t.co/TzqU1akKBs
इस पूरे मामले में दिलचस्प बात यह है कि शैरन वर्मा के पीछे वो इस्लामी कट्टरपंथी पड़े है, जिन्हें मुनव्वर फारूकी की हिंदू घृणा से सनी बातें कभी कॉमेडी लगा करती थी। इसी इकोसिस्टम ने मुनव्वर फारूकी को तब सपोर्ट किया था, जब उसने सरेआम गोधरा पर कारसेवकों के नरसंहार पर मजाक उड़ाया और जब माता सीता को लेकर अभद्र बातें कही थी।
उस वक्त इन्हें फ्रीडम ऑफ स्पीच जैसे अधिकार याद आ रहे थे, लेकिन शैरन के मामले में जहाँ उन्होंने किसी का मजाक नहीं उड़ाया। सिर्फ एक ट्रोलर को अपनी भाषा में पलटकर जवाब दिया है, वहाँ इस भीड़ को ऐसा लग रहा है कि उन्होंने गाजा में मारे जा रहे लोगों का मखौल उड़ा दिया।
कट्टरपंथी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के 60 साल के कार्यकारी चेयरमैन तारिक रहमान की वतन वापसी हुई है। रहमान को इस्लामी ग्रुप जमात-ए-इस्लामी का समर्थन मिल रहा है। देश में फरवरी 2026 के चुनाव में बीएनपी उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने जा रही है। इसको देखते हुए 25 दिसंबर 2025 को वे ढाका पहुँच गए हैं। वह लगभग 17 साल तक लंदन में अपनी इच्छा से ‘निर्वासन’ की जिंदगी जीते रहे हैं।
तारिक रहमान बांग्लादेश एयरलाइंस की फ्लाइट BG-202 से हीथ्रो एयरपोर्ट से बांग्लादेश पहुँचे। उनकी पत्नी डॉ. जुबैदा रहमान और बेटी जैमा रहमान भी उनके साथ थी। उनके स्वागत के लिए बड़ी संख्या में समर्थक एयरपोर्ट पर मौजूद थे। हालाँकि तारिक ने 16 दिसंबर को लंदन में विक्ट्री डे इवेंट में लोगों से आग्रह किया था कि वे एयरपोर्ट पर न आएँ। उन्होंने कहा था कि जो लोग इस रिक्वेस्ट का सम्मान करेंगे, वे पार्टी और देश का सम्मान करेंगे।”
बांग्लादेश की राजनीति का ‘क्राउन प्रिंस’
तारिक देश के आर्मी कमांडर और पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान और पूर्व प्राइम मिनिस्टर खालिदा ज़िया के सबसे बड़े बेटे हैं। खालिदा तीन बार प्रधानमंत्री बनीं और फिलहाल BNP की चेयरमैन हैं। तारिक को बांग्लादेशी पॉलिटिक्स का ‘क्राउन प्रिंस’ कहा जाता है।
तारिक का जन्म 20 नवंबर 1967 को हुआ था। उस वक्त बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था। 1971 की आज़ादी की लड़ाई के दौरान उन्हें बचपन में कुछ समय के लिए जेल में रखा गया था। BNP अक्सर उनकी तारीफ में बचपन में जेल जाने पर जोर देती है। उन्हें ‘सबसे कम उम्र के युद्धबंदियों में से एक’ कहती है।
उनके पिता जियाउर रहमान 1975 में बांग्लादेश में हुए तख्तापलट के बाद सत्ता में आए। उस वक्त वे सेना प्रमुख थे। उन्होंने शेख हसीना के पिता और राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान की तख्तापलट की थी। इस दौरान उनकी हत्या की गई थी। इस हत्या ने जिया और शेख हसीना के बीच दशकों से चली आ रही दुश्मनी को जन्म दिया। इस दुश्मनी को ‘बैटल ऑफ द बेगम्स’ भी कहा जाता है।
जिया उर रहमान 1977 से 1981 तक राष्ट्रपति रहे। उन्होंने बीएनपी की स्थापना की थी। 1981 में चटगाँव के एक सैन्य विद्रोह के दौरान उनकी हत्या कर दी गई।
तारिक 15 साल के थे जब जियाउर रहमान की हत्या हुई थी। 1980 के दशक में BAF शाहीन कॉलेज से अपनी अंडरग्रेजुएट पढ़ाई पूरी करने के बाद ढाका यूनिवर्सिटी के उन्होंने इंटरनेशनल रिलेशंस डिपार्टमेंट में एडमिशन लिया। फिर वह 23 साल की उम्र में BNP में शामिल हो गए। उन्होंने हुसैन मुहम्मद इरशाद के मिलिट्री शासन के खिलाफ प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। हालाँकि उनका करियर काफी विवादों में रहा और कई गंभीर आरोप भी लगे।
2006 के यूनाइटेड स्टेट्स एम्बेसी केबल के मुताबिक, तारिक को BNP का ‘उत्तराधिकारी’ कहा गया था, जिससे पार्टी का ही एक धड़ा सहमत नहीं था। क्योंकि तारिक रहमान को ‘बहुत ज्यादा भ्रष्ट’ और ‘पीछे से सरकार चलाने वाला’ कहा जाता था। देश में हुए हिंसक वारदातों में भी उसका नाम आया।
1991 के नेशनल इलेक्शन कैंपेन में तारिक ने माँ खालिदा जिया के लिए काफी मेहनत की और जीत में अहम भूमिका निभाई थी। शेख हसीना के शासनकाल में 1996 से 2001 तक अवामी लीग के शासन के दौरान दबे-कुचले लोगों को न्याय दिलाने के बहाने सरकार के खिलाफ़ कई रैलियाँ कीं।
खुद से ‘देश निकाला देने वाला’ राजनीतिक वारिस
तारिक BNP के कार्यकारी चेयरपर्सन हैं। 2000 के दशक की शुरुआत से ही उन्हें अपनी मां का राजनीतिक वारिस माना जाता है। हालाँकि बांग्लादेश के राजनीतिक उथल-पुथल की वजह से उनका करियर बिखर गया था। 2007 में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें 18 महीने जेल में रहना पड़ा। BNP नेता को 3 सितंबर 2008 को जमानत मिली, जिसके बाद वह तुरंत इलाज के लिए UK चले गए और तब से अपने परिवार के साथ वहीं रह रहे हैं। उन्हें कई मामलों में दोषी माना गया।
मनी लॉन्ड्रिंग से लेकर शेख हसीना की रैली में ग्रेनेड फेंकने का आरोप
2016 में बांग्लादेश के हाई कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग के लिए उन पर 200 मिलियन टका यानी 14.50 करोड़ से ज्यादा का जुर्माना लगाया गया और 7 साल जेल की सजा हुई। इस फ़ैसले ने ढाका कोर्ट के 2013 के उस फ़ैसले को पलट दिया, जिसमें तारिक को बरी कर दिया गया था। उन पर आरोप था कि सिंगापुर में उन्होंने और उनके एक साथी ने 2003 और 2007 के बीच $2.5 मिलियन यानी करीब 20 करोड़ रुपए से ज्यादा का गबन किया था।
एंटी-करप्शन कमीशन ने उनके और उनके करीबी दोस्त गियासुद्दीन अल मामून के ख़िलाफ़ 12 शिकायतें दर्ज की थीं। ढाका की एक स्पेशल कोर्ट ने 10 अक्टूबर 2018 को उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने उन्हें 21 अगस्त 2004 को ढाका में हुए एक ग्रेनेड धमाके के सिलसिले में मर्डर और क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी के कई आरोपों में दोषी पाया था, इसमें 24 लोग मारे गए थे और शेख हसीना घायल हो गई थीं। यह हमला उस समय हुआ जब खालिदा जिया देश की प्रधानमंत्री थीं।
दिलचस्प बात यह है कि बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट के अपील डिवीज़न ने पिछले साल 5 अगस्त को हसीना सरकार गिरने के एक महीने से भी कम समय में तारिक और दूसरों को इस मामले में बरी करने वाले हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया।
हिंदुओं से नफ़रत और भारत में आतंकियों को हथियार सप्लाई में भूमिका
लंदन में रहते हुए तारिक रहमान ने सोशल मीडिया और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए BNP के कामकाज में बतौर कार्यकारी चेयरपर्सन, अहम भूमिका निभाते रहे हैं।
BNP के इस वारिस ने अपनी राजनीति कार्यकलाओं में हिंदूफोबिया दिखाया है और पवित्र ग्रंथों का अपमान किया है। उन्होंने 2023 में एक फेसबुक लाइव में कहा, “हिंदू धर्म के ग्रंथ कोई नैतिक शिक्षा नहीं देते… सभी धार्मिक ग्रंथ अश्लील हैं।” तारिक के गोनो अधिकार परिषद के संयोजक नूरुल हक नूर के साथ अच्छे रिश्ते थे। नुरुल हर हाल में शेख हसीना को हटाना चाहते थे।
नूर ने सऊदी अरब से एक Facebook Live में कहा था, “हाँ, मैंने मोसाद समेत विदेशी इंटेलिजेंस एजेंसियों के साथ मिलकर साज़िश की है। सरकार को हटाने की अपनी कोशिश में, मैंने मोसाद के एजेंट मेंडी एन सफादी के साथ मीटिंग की, ताकि इस सरकार को हटाने की साजिश रची जा सके।” शेख हसीना की सरकार के खिलाफ षड़यंत्र करने और अमेरिका की भूमिका पर अक्सर सवाल उठते हैं।
भारत की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) के रिटायर्ड डिप्टी डायरेक्टर जनरल मेजर जनरल गगनजीत सिंह ने खुलासा किया कि अप्रैल 2004 में चटगाँव में हथियारों से भरे दस ट्रक ज़ब्त किए गए। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात गठबंधन भारत में मिलिटेंट ग्रुप्स की इन हथियारों से मदद कर रहे थे।
ढाका जेल में बंद ULFA लीडर अनूप चेतिया उर्फ़ गोलाप बरुआ ने खुलासा किया कि यह भारी गोला-बारूद बैन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम (ULFA) और उत्तर-पूर्वी भारत में इसी तरह के दूसरे संगठनों के लिए देश को अस्थिर करने के लिए था।
इंडिया टुडे से बात करते हुए सिंह ने कहा कि चेतिया ‘डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ़ फोर्सेज़ इंटेलिजेंस’ (DGFI) और कुछ नेशनल सिक्योरिटी इंटेलिजेंस (NSI) अधिकारियों के साथ मिलकर काम कर रहा था। चेतिया के तारिक रहमान (BNP के मौजूदा एक्टिंग चेयरमैन) और उनके साथियों के साथ करीबी रिश्ते थे।
2001-2006 के बीच बीएनपी सत्ता में थी। उस वक्त भारत विरोधी गतिविधियों को बांग्लादेश में अंजाम दिया गया। आतंकवादियों को पनाह देने की वजह से भारत-बांग्लादेश के रिश्तों में खटास आई थी। दरअसल 2004 में जो 10 ट्रक चटगाँव में मिले थे। उनमें हथियार भरे हुए थे।
BNP-जमात गठबंधन सरकार (2001–2006) के दौरान हवा भवन (BNP का पॉलिटिकल ऑफिस) आतंकियों की मदद के लिे सबसे सुरक्षित, ताकतवर और दूसरे पावरहाउस के तौर पर जाना जाता था। तारिक ने अपने बहुत ध्यान से चुने हुए ‘धोखेबाज़’ भरोसेमंद लोगों के ग्रुप के साथ मिलकर कई गलत योजनाओं को अंजाम दिया, जिसमें उस समय विपक्ष की नेता शेख हसीना पर ग्रेनेड हमला भी शामिल था।
इसके अलावा लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों की मदद करने और उन्हें हथियारों की खेप पहुँचाने के लिए पाकिस्तानी आईएसआई के साथ मिलकर काम किया था। प्लानिंग स्टेज की मीटिंग्स में भी बीएनपी नेता मौजूद थे।
भारत समेत पूरी दुनिया की नजर
अशांति के बीच 17 साल बाद तारिक रहमान की वापसी से बांग्लादेश की पॉलिटिक्स में बड़े बदलाव की झलक दिख रही है। भारत समेत पूरी दुनिया देख रही है कि इलेक्शन के बाद बांग्लादेश की फॉरेन पॉलिसी में कितना बदलाव हो सकता है। उस्मान हादी की मौत के बाद बांग्लादेश में राजनीति हालात काफी खराब हैं। हादी के परिवार और समर्थकों ने भी उसकी मौत के लिए यूनुस प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया है।
कई पॉलिटिकल एनालिस्ट्स के मुताबिक, अगले साल बांग्लादेश इलेक्शन में BNP की वापसी लगभग तय है। अगर BNP जीतती है तो तारिक रहमान प्राइम मिनिस्टर होंगे। हालाँकि, राजनीतिक, आर्थिक और संस्थागत तनावों के बीच बांग्लादेश को आगे ले जाने में उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।
तारिक रहमान की वतन वापसी को देखते हुए बांग्लादेश में काफी हलचल है। अपने तीन दिवसीय कार्यक्रम में तारिक अपनी बीमार माँ और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया से मिलने जाएँगे। इसके अलावा उस्मान हादी की कब्र पर भी जा सकते हैं। इसलिए राजनीतिक विश्लेषक तारिक रहमान की इस वापसी को चुनावी रणनीति के तौर पर भी देख रहे हैं।
(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में प्रस्तावित 450 करोड़ रुपए की एथेनॉल फैक्ट्री अब नहीं लगेगी। चंडीगढ़ की कंपनी ड्यून एथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड द्वारा लगाई जानी यह परियोजना एक समय राजस्थान के औद्योगिक विकास की मिसाल बनने वाली थी। लेकिन कॉन्ग्रेस पार्टी की विध्वंसक नीतियों और राजनीतिक खेल ने इसे विवाद की भेंट चढ़ा दिया।
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने इस परियोजना को मंजूरी दी थी, लेकिन सत्ता से बाहर होते ही कॉन्ग्रेस नेताओं ने इसे राजनीतिक हथियार बना लिया। नतीजा यह हुआ कि किसानों के नाम पर हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए, तोड़फोड़ हुई और अब यह बड़ा निवेश राजस्थान से भाग गया। इससे न केवल हनुमानगढ़ का इंडस्ट्रियल हब बनने का सपना टूट गया, बल्कि पूरे राज्य के विकास को गहरा झटका लगा है।
कॉन्ग्रेस की नीतियों से ₹450 करोड़ का प्रोजेक्ट राजस्थान से बाहर
यह परियोजना हनुमानगढ़ के टिब्बी क्षेत्र के राठीखेड़ा गाँव (चक 5 आरके राठीखेड़ा) में लगभग 45 एकड़ भूमि पर स्थापित होने वाली थी। कंपनी का प्लान था कि यहाँ 1,320 किलोलीटर प्रति दिन (केएलपीडी) क्षमता वाला अनाज-आधारित एथेनॉल संयंत्र और 24.5 मेगावाट का बिजली संयंत्र लगेगा।
यह फैक्ट्री चावल के भूसे से एथेनॉल बनाती, जो पर्यावरण के लिए फायदेमंद है क्योंकि एथेनॉल पेट्रोल का साफ-सुथरा विकल्प माना जाता है। इससे स्थानीय किसानों को भूसा बेचने का अच्छा दाम मिलता, सैकड़ों नौकरियाँ पैदा होतीं और क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि आती। लेकिन कॉन्ग्रेस की राजनीति ने सब कुछ बर्बाद कर दिया।
कॉन्ग्रेस सरकार से शुरू हुआ प्रोजेक्ट, कॉन्ग्रेस की राजनीति ने निगला
यह पूरी कहानी 2022 से शुरू होती है। उस समय अशोक गहलोत की कॉन्ग्रेस सरकार सत्ता में थी। ‘राइजिंग राजस्थान’ अभियान के दौरान इस परियोजना के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर हुए। 2023 में कॉन्ग्रेस सरकार ने ही सभी कानूनी औपचारिकताएँ पूरी कीं। औद्योगिक रूपांतरण, भूमि पंजीकरण और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड समेत सभी विभागों से मंजूरी ली गई। सब कुछ ठीक चल रहा था। कंपनी ने निवेश की तैयारी शुरू कर दी थी। लेकिन जैसे ही 2023 के अंत में भाजपा सरकार आई, कॉन्ग्रेस ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया।
विपक्ष में बैठी कॉन्ग्रेस ने इस परियोजना को किसानों के खिलाफ बताकर विरोध शुरू करवा दिया। अगस्त 2024 से राठीखेड़ा गाँव में किसानों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किए। लेकिन असल में यह विरोध किसानों की वाजिब चिंताओं से ज्यादा कॉन्ग्रेस की राजनीति से प्रेरित था। 19 नवंबर 2025 को प्रशासन और पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर किया, तो तनाव बढ़ गया। कुछ लोग गिरफ्तार हुए।
फिर 10 दिसंबर 2025 को टिब्बी में एक महापंचायत हुई, जो हिंसक हो गई। प्रदर्शनकारियों ने वाहनों में आग लगाई, तोड़फोड़ की। पुलिस के साथ झड़प हुई। इस घटना में कॉन्ग्रेस के विधायक, सांसद और सीपीआई के पूर्व विधायक समेत 100 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई।
कॉन्ग्रेस नेता जैसे संगरिया के विधायक अभिमन्यु पूनिया और बलवान पूनिया ने इस घटना को ‘सरकारी साजिश’ बताकर भाजपा सरकार पर हमला बोला। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि भाजपा कॉरपोरेट्स की गुलाम है और किसानों पर लाठियाँ चलवा रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि कॉन्ग्रेस खुद इस एथेनॉल फैक्ट्री प्रोजेक्ट की जड़ है। गहलोत सरकार ने मंजूरी दी और फिर सत्ता खोते ही इसे राजनीतिक मुद्दा बना दिया। बाहरी तत्वों और कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने मिलकर आंदोलन को हिंसक बनाया, ताकि भाजपा सरकार बदनाम हो।
किसानों को पानी और हवा के प्रदूषित होने का डर, लेकिन समाधान भी मौजूद
किसान विरोध के मुख्य कारण बताते हैं पानी की कमी और प्रदूषण का खतरा। हनुमानगढ़ सूखाग्रस्त क्षेत्र है। यहाँ भूजल स्तर 100 फीट से नीचे चला गया है। किसान कुओं और नहरों पर निर्भर हैं। फैक्ट्री को रोजाना 50-60 लाख लीटर पानी की जरूरत पड़ती। चावल आधारित एथेनॉल प्लांट में प्रति लीटर एथेनॉल के लिए काफी पानी खर्च होता है। किसानों का डर है कि इससे खेत सूख जाएँगे, फसलें मरेंगी।
दूसरा मुद्दा प्रदूषण का। एथेनॉल प्लांट्स को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने ‘रेड कैटेगरी’ में रखा है। प्रक्रिया में ‘स्पेंट वॉश’ नाम का जहरीला तरल निकलता है, जो अगर ठीक से ट्रीट न हो तो भूजल और मिट्टी को बर्बाद कर सकता है। बॉयलर से धुआँ और राख निकलती है, किण्वन से दुर्गंध फैलती है। किसान कहते हैं कि हवा में जहर घुलेगा, साँस की बीमारियाँ और कैंसर बढ़ेगा। उनका आरोप है कि पर्यावरण जाँच (ईआईए) में गड़बड़ी हुई।
न खेती खराब होगी, न जल दूषित होगा- बस योजनाओं के सही से लागू होने की जरूरत
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ये समस्याएँ हल हो सकती हैं। सरकार ने एथेनॉल प्लांट्स के लिए जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (जेडएलडी) तकनीक अनिवार्य कर दी है। इसका मतलब है कि फैक्ट्री से एक बूँद भी गंदा पानी बाहर नहीं निकलेगा। पानी को रिसाइकिल किया जाएगा, बचा ठोस कचरा पशु आहार बनाकर बेचा जाएगा। हवा के लिए इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर्स (ईएसपी) लगाए जाते हैं, जो राख रोकते हैं। ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम से केंद्रीय बोर्ड सीधे निगरानी करता है। अगर ईमानदारी से नियम मानें तो न खेती खराब होगी, न पानी दूषित होगा।
समस्या यह है कि कॉन्ग्रेस ने इन समाधानों पर बात करने की बजाय विरोध को भड़काया। अगर स्थानीय लोग निगरानी समिति बनाते और कंपनी से स्थानीय नौकरियाँ माँगते, तो यह परियोजना सफल हो सकती थी। लेकिन राजनीति ने सब बिगाड़ दिया।
सत्ता में मंजूरी, विपक्ष में विरोध: कॉन्ग्रेस की दोहरी नीति उजागर
अशोक गहलोत की कॉन्ग्रेस सरकार ने 2023 में इस परियोजना को पूरी मंजूरी दी। तब कॉन्ग्रेस इसे विकास का प्रतीक बताती थी। लेकिन चुनाव हारते ही रुख बदल गया। कॉन्ग्रेस नेता अब कहते हैं कि भाजपा किसानों की दुश्मन है। लेकिन एफआईआर में कॉन्ग्रेसियों के ही नाम हैं। यह साफ दिखाता है कि कॉन्ग्रेस ने बाहरी तत्वों के साथ मिलकर आंदोलन को हिंसक बनाया। उनका मकसद सिर्फ भाजपा सरकार को बदनाम करना था, विकास नहीं।
इस राजनीति की वजह से कंपनी ने फैक्ट्री कहीं और लगाने का फैसला किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, परियोजना अब राजस्थान से बाहर जा रही है।
एक फैक्ट्री गई, दस नहीं आएँगी… ये राजस्थान का ही बड़ा नुकसान
यह सिर्फ एक फैक्ट्री का मामला नहीं है। उद्योग जगत में कहावत है कि एक फैक्ट्री आने से दस और आती हैं। हनुमानगढ़ इंडस्ट्रियल हब बन सकता था। यहाँ कृषि अवशेष भरपूर हैं, एथेनॉल प्लांट के लिए परफेक्ट जगह। इससे हजारों नौकरियाँ, किसानों को अतिरिक्त आय और राज्य को राजस्व मिलता। लेकिन कॉन्ग्रेस की विध्वंसक नीतियों ने सब चौपट कर दिया।
टिब्बी के प्रधान का दावा है कि इसी जगह पर कोको-कोला या पेप्सी जैसी बड़ी कंपनी भी फैक्ट्री लगाने वाली थी। इसके लिए हनुमानगढ़ के डीएम से संपर्क हुआ था। एथेनॉल फैक्ट्री के प्रोजेक्ट की फाइल पर भी इन्हीं प्रधान का नाम और नंबर दर्ज है। लेकिन एथेनॉल फैक्ट्री के बवाल की वजह से प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए। ऐसे में जो कंपनियाँ हनुमानगढ़ आने वाली थी, अब वो कंपनियाँ भी नहीं आएंगी। इस एक प्रोजेक्ट के बाहर जाने से कई अन्य निवेश रुक जाएँगे। इससे पूरे राजस्थान की अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा। राज्य में बेरोजगारी बढ़ेगी तो युवा भी पलायन को मजबूर होंगे
राजनीति छोड़कर विकास पर दें ध्यान
हनुमानगढ़ एथेनॉल फैक्ट्री विवाद कॉन्ग्रेस की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का शिकार बना है। अशोक गहलोत और उनकी पार्टी ने सत्ता में रहते मंजूरी दी, बाहर रहते विरोध भड़काया। नतीजा यह निकला कि ₹450 करोड़ का निवेश चला गया। राजस्थान को इंडस्ट्रियल ग्रोथ का मौका खोना पड़ा।
जरूरत है कि राजनीतिक पार्टियाँ किसानों की वाजिब समस्याओं का समाधान निकालें, न कि उन्हें भड़काएँ। निगरानी समिति बनाकर, नियमों का सख्त पालन सुनिश्चित करके ऐसे प्रोजेक्ट्स को सफल बनाया जा सकता है। लेकिन कॉन्ग्रेस जैसी विध्वंसक सोच जबतक ताकतवर बनी रहेगी, तबतक राजस्थान का इंडस्ट्रियल ग्रोथ पीछे जाता रहेगा।
यह घटना सबक है कि राजनीति विकास के रास्ते में रोड़ा न बने। उम्मीद है कि राज्य सरकार इस नुकसान से सीख लेगी और भविष्य में ऐसे निवेशों को सुरक्षित रखेगी।
महाराजा बिजली पासी की जयंती हर साल 25 दिसंबर को धूम-धाम से मनाई जाती है। उन्हें उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में बहुजन नायक और दलित गौरव का प्रतीक माना जाता है। उनकी जयंती पर लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके शौर्य, पराक्रम और सनातन परंपरा की रक्षा में दिए गए योगदान को याद करते हैं।
लखनऊ के महान योद्धा महाराजा बिजली पासी ने विदेशी आक्रांताओं और हुकूमतों के खिलाफ डटकर संघर्ष किया और सनातन संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। अब यूपी सरकार महाराजा बिजली पासी के किलों के पुनरुद्धार के लिए निरंतर कार्य कर रही है और उनसे जुड़ी वीर परंपरा को आगे बढ़ाने वाले सभी महापुरुषों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रही है।
'भारत रत्न' महामना पंडित मदन मोहन मालवीय एवं महान योद्धा महाराजा बिजली पासी की जयंती पर उनकी पावन स्मृतियों को नमन करते हुए उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं… pic.twitter.com/tjtEFzDmXj
अवध के स्वतंत्र शासक: 12वीं सदी के स्वाभिमानी राजा
इतिहासकारों के अनुसार, महाराजा बिजली पासी 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अवध प्रांत के बिजनौरगढ़ के शक्तिशाली और स्वतंत्र शासक थे। उनका शासनकाल लगभग 1148 ईस्वी से 1184 ईस्वी तक माना जाता है। उस समय अवध का यह क्षेत्र राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।
महाराजा बिजली पासी ने किसी भी बड़े साम्राज्य या राजा की अधीनता स्वीकार नहीं की और एक स्वतंत्र सत्ता के रूप में अपने राज्य का संचालन किया। उनका शासन इस बात का प्रमाण है कि उस दौर में दलित समाज केवल शोषण का शिकार नहीं था, बल्कि उसने शासन किया, युद्ध जीते और अपनी राजनीतिक पहचान बनाई।
माता-पिता की स्मृति में नगर और किलों की स्थापना
महाराजा बिजली पासी के पिता का नाम नथावन देव और माता का नाम बिजना था। उन्होंने सबसे पहले अपनी माता की स्मृति में ‘बिजनागढ़’ की स्थापना की, जो आगे चलकर बिजनौरगढ़ कहलाया और आज के बिजनौर क्षेत्र के रूप में जाना जाता है।
इसके बाद उन्होंने अपने पिता की याद में बिजनौरगढ़ से लगभग तीन किलोमीटर उत्तर दिशा में ‘नथवागढ़’ की स्थापना की। यह केवल नगर निर्माण नहीं था, बल्कि अपने वंश, परिवार और सांस्कृतिक जड़ों को सम्मान देने की उनकी सोच को दर्शाता है। इन नगरों और किलों के माध्यम से उन्होंने अपने राज्य को संगठित और सुदृढ़ किया।
12 किले और सैन्य शक्ति का विस्तार
इतिहास में उल्लेख मिलता है कि महाराजा बिजली पासी ने अपने शासनकाल में कुल 12 किलों का निर्माण कराया था। ये किले उनकी मजबूत सैन्य रणनीति और दूरदर्शिता का प्रमाण थे। उस दौर में किलों का निर्माण किसी भी राज्य की शक्ति, सुरक्षा और प्रभाव का प्रतीक माना जाता था।
राजा बिजली पासी किला, कर्नल हडसन द्वारा बनाया गया चित्र (फोटो साभार: everybodywiki)
इन किलों ने न केवल उनके राज्य की सीमाओं की रक्षा की, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में उनके प्रभाव को भी स्थापित किया। आज भी इन किलों के अवशेष पासी समाज और दलित वर्ग के लिए स्वाभिमान और गौरव का केंद्र हैं।
राजा जयचंद को चुनौती और वीरगति की कथा
महाराजा बिजली पासी की वीरता का सबसे चर्चित अध्याय कन्नौज के शक्तिशाली राजा जयचंद के साथ हुए युद्ध हैं। लोक कथाओं और ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उन्होंने जयचंद की विशाल सेना को दो बार पराजित किया था। उस समय जयचंद ने कौशांबी के कड़ा क्षेत्र में किले का निर्माण कर कुछ समय तक वहाँ निवास भी किया था।
इसके बावजूद महाराजा बिजली पासी ने अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी। माना जाता है कि वर्ष 1184 ईस्वी में गांजर के युद्ध के दौरान उन्होंने मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की, हालाँकि इस विषय पर इतिहासकारों में मतभेद भी हैं। फिर भी उनका संघर्ष और पराक्रम आज भी प्रेरणा का स्रोत है।
दलित अस्मिता का प्रतीक और सरकारी सम्मान
महाराजा बिजली पासी का महत्व केवल एक योद्धा तक सीमित नहीं है। वह दलित समाज के गौरवशाली अतीत और आत्मसम्मान के प्रतीक हैं। बहुजन नायक कांशीराम के सुझाव और प्रयासों से उनकी योद्धा छवि को राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर नई पहचान मिली।
भारत सरकार ने वर्ष 2000 में उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया, जो उनके योगदान की राष्ट्रीय मान्यता का प्रतीक है। इसके अलावा योगी आदित्यनाथ सरकार ने 27 अगस्त 2024 को निहालगढ़ रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर ‘महाराजा बिजली पासी रेलवे स्टेशन’ कर दिया था। यह कदम उनके इतिहास और योगदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
हर वर्ष 25 दिसंबर को महाराजा बिजली पासी की जयंती पर उनके किलों और ऐतिहासिक स्थलों पर श्रद्धांजलि सभाएँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामाजिक आयोजन होते हैं। यह दिन न केवल अतीत को याद करने का अवसर है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि स्वाभिमान, साहस और स्वतंत्रता की लड़ाई हर दौर में प्रासंगिक रहती है। महाराजा बिजली पासी की विरासत आज भी वंचित और दलित समाज को अपने अधिकारों और सम्मान के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देती है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर कुछ सोशल मीडिया हैंडल झूठ फैलाने का काम कर रहे हैं। एक वीडियो शेयर करते हुए कहा जा रहा है कि सीएम योगी ने विधानसभा में अखंड भारत राष्ट्र की माँग की है और डर दिखाया है कि आसिम मुनीर के रहते ऐसा नहीं हो सकता। इसके साथ इस वीडियो में उन्हें बांग्लादेश और आसिम मुनीर को धमकाते व प्रधानमंत्री मोदी से इस्तीफा माँगते दिखाया गया है।
देख सकते हैं कि वायरल वीडियो में योगी आदित्यनाथ का चेहरे के साथ ऑडियो चल रही है जिसमें ऐसे दिखाया जाता है जैसे वह कह रहे हैं-
“अगर बंगलादेश पाकिस्तान नहीं बना होता इस तरीके से हिंदूओं को नहीं जलाया गया होता और अगर ऐसा करता तो उसकी क्या दुर्गति होती ये वो भी जानता है। प्रधानमंत्री मोदी जी अगर आप बंगलादेश पर आक्रमण नहीं कर सकते तो प्रधानमंत्री के पद को छोड़ दीजिए। हम धर्म सैनिक अपने धर्म युद्ध से बंगलादेश को वापस अखंड भारत का हिस्सा बनाएँगे। ये सब पाकिस्तान का मुल्ला आसिम मुनीर करवा रहा है जब तक आसिम मुनीर पाकिस्तान में रहेगा तब तक भारत संकट में है हमारा आदेश है कि आसिम मुनीर को किसी भी तरह से हानी भी जानी चाहिए ताकि पाकिस्तान अपनी औकात में रहेगा”
Yogi Adityanath, CM UP and high priest at Goraknath Temple! Unique mixture of hypocrisy & terrorism.
He is accusing Pakistan for interfering in Bangladesh and in the same breath also announcing to making Bangladesh a part of Akhand Bharat while wishing harm to CDF Asim Munir. pic.twitter.com/qkRcmPPp55
हकीकत ये है कि योगी आदित्यनाथ ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार का मुद्दा उठाया जरूर था लेकिन उन्होंने इस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया ही नहीं। न उन्होंने अखंड हिंदू राष्ट्र पर कुछ कहा, न पीएम को लेकर ऐसी भाषा बोली। अब सवाल ये है कि जब सीएम योगी आदित्यनाथ ने ऐसा कहा ही नहीं, तो फिर इसे एडिट करके कौन वायरल कर रहा है?
ट्वीट और अकॉउंट की लोकेशन
असल में ये हरकत पाकिस्तानी और बांग्लादेशी नेटीजन्स की है। ऊपर की वीडियो जिस अकॉउंट से शेयर हुई है उसका नाम Global Conflict Watch है। अगर इस अकॉउंट की लोकेशन पर क्लिक करके देखेंगे तो पता चलता है कि इसे पाकिस्तान से संचालित किया जा रहा था।
इसी तरह से अन्य कट्टरपंथियों के भी ट्वीट हैं। नीचे ट्वीट पाकिस्तान के ही मुहम्मद अली तुराल का है। देख सकते हैं कि ये अकॉउंट भी सीएम योगी की एडिट वीडियो शेयर करके कैसे झूठ और भ्रम फैलाता है। तुराल लिखता है कि योगी ने कहा है कि आसिम मुनीर के रहते भारत ‘अखंड हिंदू राष्ट्र’ नहीं बन सकता।
तुराल का ट्वीट और उसके अकॉउंट की लोकेशन
एक अगला ट्वीट इगल क्लॉ का है। ये अकॉउंट भी पाकिस्तान से संचालित होता है। इसने सीएम योगी की फर्जी वीडियो साझा करके कहा है कि योगी आदित्यनाथ के बयान से पता चल रहा है कि आसिम मुनीर के कारण दिल्ली दबाव में है।
इसी तरह एक अन्य ट्वीट जाशिम का देखिए। जाशिम इस वीडियो को शेयर करते हुए इल्जाम लगाता है कि सीएम योगी सरेआम सदन में अखंड हिंदू भारत की माँग कर रहे हैं। ये जाशिम है कहाँ का, इसे भी अकॉउंट की लोकेशन से जाना जा सकता है।
ट्वीट और अकॉउंट की लोकेशन
योगी आदित्यनाथ ने कहा क्या था?
बता दें कि एक तरफ ये पाकिस्तानी और बांग्लादेशी सोशल मीडिया हैंडल्स सीएम योगी आदित्यनाथ के बयान को एडिट करके झूठ फैलाकर इस्लामी कट्टरपंथियों को केवल और अधिक उकसाने का काम कर रहे हैं। वहीं हकीकत में सीएम ने हिंदुओं का मुद्दा उठाते हुए क्या कहा है इसे लेकर भारतीय मीडिया में व्यापक रिपोर्टिंग हो चुकी है।
सीएम योगी ने विधानसभा में बांग्लादेश के हिंदुओं का मुद्दा उठाते हुए अपने भाषण में कुछ लोगों की चुप्पी पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा- “गाजा के मुद्दे पर कैंडल मार्च निकालते हैं, लेकिन पाकिस्तान, बांग्लादेश में हिंदू मारा जाता है तो आपका मुँह बंद हो जाता है। मरने वाला हिंदू है इसीलिए आप नहीं बोलेंगे। बल्कि आपके लोगों को निंदा का प्रस्ताव लाना चाहिए था।”
#WATCH | Lucknow: In the Assembly, Uttar Pradesh CM Yogi Adityanath says, "Look how a Dalit youth was burned alive in Bangladesh. You people shed tears over everything that happens in the Gaza Strip, but not a single word comes out of your mouths when a Dalit youth was killed in… pic.twitter.com/zCoTUZHdQ1
सीएम योगी ने आगे कहा था, “नोट कर के रख लेना और याद रखिएगा जब बांग्लादेशी और रोहिंग्या को यहाँ से निकालेंगे तो उनके समर्थन में मत आना। बहुत से बांग्लादेशियों के आधार कार्ड आप लोगों ने बनवाने का पाप किया है। बहुत प्रभावी कार्रवाई करेंगे। हमारे ही देश में रहकर हमारे लोगों के ही खिलाफ अपराध और वहाँ निर्दोष हिंदू, सिखों के साथ अत्याचार हो रहा है।”
AI जनरेट है वीडियो
अब इस बयान को सुन ये तो साफ है कि वायरल वीडियो में झूठे बयान जोड़े गए हैं। इसमें अखंड भारत की बात के साथ हिंसा, युद्ध की धमकी, प्रधानमंत्री से इस्तीफ़ा की माँग, और असीम मुनीर से डर जैसी कोई बात है ही नहीं। कृत्रिम वीडियो की भाषा और अंदाज़ साफ़ बताते हैं कि यह वीडियो एआई से बदला गया है। इस कुत्सित प्रयास का मकसद सिर्फ बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों से ध्यान हटाना है।
हाल ही में बांग्लादेश में एक हिंदू व्यक्ति, दीपु दास, को झूठे ईशनिंदा के आरोप में मार दिया गया। ऐसे मामले मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के लिए एक गंभीर शर्म की बात हैं। इसीलिए अब इस तरह के फर्जी वीडियो इसलिए फैलाए जा रहे हैं ताकि इस्लामी हिंसा से लोगों का ध्यान हटकर भारत पर आ टिके।