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शरजील इमाम के लिए दिल्ली प्रेस क्लब में फिर से वही रटा-रटाया रोना, फैलाया एकतरफ फर्जी नरेटिव: जानें- ‘सेक्युलर-लिबरल’ गैंग के दावों की हकीकत

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में गुरुवार (29 जनवरी 2026) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई, जो UAPA के तहत गिरफ्तार शरजील इमाम की गिरफ्तारी के छह साल पूरे होने के अवसर पर थी। इस मौके पर कई वक्ताओं ने उसके मामले को न्यायिक दुरुपयोग और असहमति को दबाने के लिए राज्य दमन का स्पष्ट उदाहरण बताया।

कार्यक्रम की शुरुआत सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने की, जिन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों के पतन की आलोचना की और इमाम की लंबी जेल यात्रा को नागरिकता संशोधन कानून जैसे कानूनों के विरोध करने वालों को चुप कराने की रणनीति बताया।

इसके बाद द वायर से जुड़ी वकील रश्मि सिंह ने अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि इमाम के भाषणों को गलत तरीके से देशद्रोही बताकर पेश किया गया, जबकि वे केवल शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का समर्थन करते थे। उन्होंने लंबित मामलों के बीच जमानत को एक मौलिक अधिकार के रूप में भी पेश किया।

शरजील इमाम के भाई मुजम्मिल इमाम ने अपने अनुभव साझा किए और कथित पुलिस क्रूरता की घटनाओं का जिक्र किया, जो उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय के खिलाफ लक्षित उत्पीड़न का प्रतिनिधित्व करती हैं।

राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने राजनीतिक दृष्टिकोण से टिप्पणी की और UAPA जैसे कानूनों के संसदीय दुरुपयोग की आलोचना करते हुए नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा के लिए बदलाव की आवश्यकता बताई।

पत्रकार सबा नकवी ने बताया कि किस तरह आतंकवाद विरोधी कानूनों का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों के खिलाफ हथियार के रूप में किया जा रहा है। पत्रकार आदित्य मेनन ने इमाम की शैक्षणिक पृष्ठभूमि पर जोर दिया और कहा कि उनकी जेल यात्रा से होने वाला बौद्धिक नुकसान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरनाक मिसाल पेश करता है। सेवानिवृत्त दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिता नारायण ने भी भाषण दिया, जिसमें न्यायिक प्रणाली में कथित अन्याय पर ध्यान केंद्रित किया गया।

कोर्ट के निर्णयों और पृष्ठभूमि की समीक्षा से यह संकेत मिलता है कि मामला पूरी तरह अन्याय का नहीं, बल्कि कानूनी जवाबदेही से जुड़ा है, हालाँकि उनके साझा किए गए कथन में इमाम को बदले की भावना वाले सिस्टम का पीड़ित दर्शाया गया है।

शरजील इमाम पर होने वाले कथित कार्यक्रम की जाँच

अपने उद्घाटन भाषण में, जो मानवाधिकारों की चिंता से प्रेरित था, हर्ष मंदर ने दिल्ली पुलिस पर 2020 की दंगों को आरोपित की साजिश के रूप में पेश करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अगर पुलिस जल्दी कार्रवाई करती तो हिंसा आसानी से रोकी जा सकती थी।

मंदर ने स्वीकार किया कि उन्होंने दिसंबर 2019 में जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों के कथित रूप से पुस्तकालय में पीटने के अगले दिन भी इसी तरह का भाषण दिया था, लेकिन उन्होंने बताया कि उमर खालिद ने समान विचारों को अधिक कुशलता से दिखाया और वह अभी भी स्वतंत्र हैं, जबकि खालिद जेल में हैं।

मंदर ने खालिद की सराहना की कि उन्होंने गाँधीवादी अहिंसा पर जोर दिया और सांप्रदायिक सद्भाव बढ़ाने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने ‘आतंक’ और ‘सांप्रदायिक हिंसा’ के बीच अस्पष्ट अंतर किया।

उन्होंने कहा कि अगर किसी मुस्लिम समूह ने हमला किया तो इसे आतंकवादी हमला कहा जा सकता है, जबकि हिंदू समूह को गौ रक्षक, रामभक्त या स्वयंसेवक कहकर नजरअंदाज किया जा सकता है।

मंदर ने खालिद के साथ उनकी अंतरिम जमानत के दौरान हुई हाल की फोन बातचीत का भी जिक्र किया, जिसमें खालिद ने देश की खराब स्थिति पर ईमानदार चर्चा करने की इच्छा व्यक्त की।

अंत में मंदर ने भारत के कुछ सबसे होशियार दिमागों और संवेदनशील लोगों की जेल यात्रा की आलोचना की और शरजील इमाम व खालिद को युवा पीढ़ी के लिए ‘रोल मॉडल’ बताया।

हालाँकि, यह विवरण गहन जाँच की माँग करता है। दिल्ली हाई कोर्ट के 2022 के दस्तावेजों से पता चलता है कि खालिद के भाषण, अहिंसा के दावे के बावजूद, तनाव बढ़ने पर सार्वजनिक अशांति पैदा करने की प्रवृत्ति रखते थे।

प्रारंभिक सबूत उनके अन्य साथियों के मामले में साजिश में उनकी भूमिका में अंतर को सामने लाते हैं, जिन्हें राहत मिली थी। न्यायपालिका द्वारा खालिद की जमानत लगातार अस्वीकृत करने से भाषण की सामग्री और संदर्भ में महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट होते हैं, जैसे कॉल लॉग जैसी फोरेंसिक कनेक्शन जो उनके उत्तेजक भाषण को 53 मौतों वाले दंगों से जोड़ती हैं।

पुलिस की प्रतिक्रिया के संदर्भ में, आधिकारिक दस्तावेज दावा करते हैं कि यह हिंसा एक संगठित ‘रेजिम चेंज ऑपरेशन’ थी, जो एंटी-CAA विरोध के दौरान की गई थी और इसे साधारण दमन के रूप में नहीं देखा जा सकता। खालिद की व्यक्तिगत चर्चा की आशाएँ सुप्रीम कोर्ट द्वारा जनवरी 2026 में उसकी जमानत खारिज करने के फैसले में स्थापित सबूतों को प्रभावित नहीं करतीं।

रश्मि सिंह का विश्लेषण, जिसमें उन्होंने बताया कि इमाम का ‘चक्का जाम’ का आह्वान किसी हिंसक उद्देश्य पर आधारित नहीं था और इसलिए इसे देशद्रोह नहीं माना जाना चाहिए, उनके द वायर में प्रकाशित लेखों पर आधारित है, जिसमें उन्होंने कहा कि इमाम गलत समझे जाने की कीमत चुका रहे हैं।

हालाँकि, यह दृष्टिकोण उनके बयानों के पूरे संदर्भ को नजरअंदाज करता है, जो साधारण विरोध प्रदर्शन से लेकर क्षेत्रों के रणनीतिक अलगाव (चिकन नेक) तक के सुझावों तक फैले थे और इसके जरिए अलगाववादी खतरे का भी संकेत दिया।

आरोपों की रूप रेखा

आरोपों की रूपरेखा बढ़ते तनाव की समयरेखा को सामने लाती है, जिसने फरवरी 2020 के हिन्दू विरोधी दिल्ली दंगों को जन्म दिया, जिसमें सांप्रदायिक झड़पों में 53 लोग मारे गए। अभियोजक कॉल रिकॉर्ड और चैट जैसी सबूतों का उपयोग करके इमाम को कथित साजिश से जोड़ते हैं, लेकिन रश्मि सिंह और अन्य इसे झूठा बताते हैं।

विडंबना यह है कि इस तरह की रक्षा में जमानत पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया जाता है, लेकिन उसी कोर्ट के मूल्यांकन को खारिज कर दिया जाता है कि इमाम और उनके सह-आरोपित उमर खालिद ‘मौजूदा सबूतों के आधार पर गुणात्मक रूप से अलग स्थिति’ में हैं। इससे साफ होता है कि चयनात्मक गुस्सा दिखाई देता है और अशांत समय में भाषणों के संभावित प्रभाव को नज़रअंदाज करना कानूनी वास्तविकता को सरल बना सकता है।

मुजम्मिल इमाम का 2020 के अपने पूछताछ का नाटकीय विवरण, जिसमें पुलिस ने कथित रूप से उन्हें निर्वस्त्र किया, पीटा, पिस्टल मुँह में ठूँस दी और अपमानजनक रिकॉर्डिंग की, परिवार की कठिनाइयों को व्यक्तिगत रूप देने और कथित मुसलमान विरोधी पक्षपात को उजागर करने के लिए था। हालाँकि, इन दावों की आधिकारिक रिकॉर्ड में पुष्टि नहीं हुई है।

मुजम्मिल की संक्षिप्त हिरासत दंगों के वित्तपोषण और समन्वय की जाँच के दौरान हुई, जिसमें इमाम पर डिजिटल सबूतों के आधार पर आरोप है। सुप्रीम कोर्ट ने जमानत खारिज करते समय प्रतिशोध पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि प्रारंभिक सबूतों पर ध्यान केंद्रित किया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि शुद्ध पीड़ित होने की कहानी प्रेस कॉन्फ्रेंस में अधिक आकर्षक हो सकती है।

लेकिन न्यायालय में उतनी प्रासंगिक नहीं है। यह एक पैटर्न को दर्शाता है जिसमें परिवार की गवाही नाटकीयता बढ़ाती है, लेकिन चल रही जाँच के दौरान निर्दोष साबित करने में कोई योगदान नहीं देती।

मनोज कुमार झा का हस्तक्षेप विधायी दृष्टिकोण वाला था। उन्होंने इमाम और खालिद को जमानत न देने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर सवाल उठाया और पाँच साल से अधिक समय तक हिरासत में रहने के बावजूद मामले में कोई महत्वपूर्ण न्यायिक प्रगति न होने को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए चिंता का विषय बताया, जिसे उन्होंने आपराधिक न्याय प्रणाली पर चोट के रूप में वर्णित किया। उन्होंने उदाहरण के तौर पर ‘चक्का जाम’ का जिक्र किया, जो गर्ल्स हॉस्टल की टूट चुकी दीवार को बदलने के काम में रोड़ा बन गया और इसे इमाम के मामले में सड़क अवरोध जैसी स्थिति के समान बताया।

हालाँकि, इस आपत्ति को न्यायिक तर्क के साथ संतुलित करना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में स्पष्ट कहा कि इमाम और खालिद ‘गुणात्मक रूप से अलग स्थिति’ में हैं, क्योंकि प्रारंभिक सबूत (prima facie evidence) मौजूद हैं और यही कारण है कि जमानत खारिज की गई, भले ही हिरासत का समय लंबा हो चुका हो।

कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, इमाम ने चिकन नेक मार्ग को ब्लॉक करने और असम एवं पूर्वोत्तर को अलग करने के संदर्भ में टिप्पणियाँ की थीं, जिसे कोर्ट ने संप्रभुता को खतरे में डालने वाला माना, न कि साधारण चक्का जाम, जिससे संवेदनशील भू-राजनीतिक स्थिति में सक्रियता की सीमाओं पर सवाल उठते हैं।

झा के शब्द इमाम के मामले में कुछ विशेष दावों, जैसे कि फोरेंसिक सबूतों से जुड़े दंगे की साजिश को कम महत्व देते हैं, जिसे कोर्ट ने पारंपरिक जमानत मिसालों को पलटने के लिए पर्याप्त माना।

सबा नकवी का भाषण मुख्य रूप से मुस्लिम असहमति पर आतंकवाद विरोधी कानूनों के प्रणालीगत हथियार के रूप में इस्तेमाल पर केंद्रित था। उन्होंने खालिद जैसे मामलों का हवाला देते हुए बताया कि अल्पसंख्यक ऐसी नीतियों (जैसे CAA) का विरोध करते समय असमान जाँच और कठोर दंड झेलते हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसे कानून वैध विरोध प्रदर्शनों को दंडित करते हैं, जिससे सामाजिक अलगाव और लोकतांत्रिक स्थानों की हानि होती है। नकवी ने यह भी स्वीकार किया कि भेदभाव 2014 के बाद शुरू नहीं हुआ, बल्कि उससे पहले भी मौजूद था।

उनके द्वारा अलगाव पर जोर, सामाजिक-राजनीतिक बहस में सही है, जटिल साजिश मामलों में जमानत निर्णयों को प्रभावित करने वाले साक्ष्य मानकों की भूमिका को नजरअंदाज कर सकता है।

आदित्य मेनन ने इमाम की विद्वत्ता और अकादमिक योग्यता की सराहना की और उनकी जेल यात्रा को विद्वान चर्चा के लिए भयावह नुकसान और युवा मनों में स्वतंत्र अभिव्यक्ति को दबाने वाली मिसाल बताया, खासकर उन लोगों में जो इस्लामोफोबिया पर सवाल उठाते हैं।

उन्होंने इमाम के बयानों की तुलना 2008 के अमरनाथ विरोध प्रदर्शन जैसी अहिंसक आंदोलनों से की, यह कहते हुए कि ये बयानों रणनीतिक ब्लॉकेड के रूपक थे, न कि देशद्रोह और इमाम को मुस्लिम राजनीतिक सक्रियता का प्रतीक बताया, जबकि लोकतांत्रिक स्थान सिकुड़ रहे हैं। मेनन ने बताया कि ऐसे हालात अल्पसंख्यकों की राजनीतिक प्रभावशीलता को सीमित करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने जमानत की खारिज

हालाँकि, इस प्रशंसात्मक दृष्टिकोण की न्यायिक व्याख्या के साथ तुलना आवश्यक है। 2022 में दिल्ली की कोर्ट ने देशद्रोह के आरोप तय किए, जिसमें ‘चिकन नेक’ का उदाहरण ऐसे बयानों के रूप में देखा गया जो देश की एकता के लिए हानिकारक थे, जबकि अमरनाथ का संदर्भ इसी प्रकार के भौगोलिक प्रभाव नहीं रखता।

अभियोजकों के सबूत, जैसे दंगों के समन्वय से जुड़े लिंक, प्रारंभिक सबूत के रूप में पर्याप्त माने गए, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने जमानत अस्वीकार करते हुए पुष्ट किया और गुणात्मक अंतर को को दिखाया। शरजील इमाम की अकादमिक योग्यता उन्हें ऐसे भाषणों के लिए न्यायिक जाँच से बचाती नहीं है, जिन्हें कोर्ट ने अशांति के समय में द्वेष पैदा करने वाला माना, खासकर जिन परिस्थितियों में मौतें हुईं।

नंदिता नारायण ने भारतीय सरकार की न्याय प्रणाली में कथित दोहरे मानकों का दावा किया, यह कहते हुए कि UAPA जैसे कानून मुस्लिम सक्रियकों और इमाम जैसे विद्वानों के खिलाफ ‘चयनात्मक रूप से लागू’ किए जाते हैं, जबकि बाकी कार्यों के लिए अन्य लोगों पर कार्रवाई नहीं होती।

उन्होंने इमाम की गिरफ्तारी को अल्पसंख्यकों की अकादमिक स्वतंत्रता और असहमति दबाने के पैटर्न का हिस्सा बताया। नारायण ने गाजा में इजराइल के कार्यों की तुलना भारत के अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार से की और हिटलर द्वारा शत्रुता की भावना का राजनीतिक लाभ उठाने के उदाहरण का हवाला दिया, वर्तमान प्रशासन की रणनीतियों की तुलना ऐसे विभाजनकारी प्रयासों से की। नारायण ने अन्याय का मुकाबला करने के लिए एकजुटता की अपील और इमाम को नैतिक विरोध का उदाहरण बताया।

इस आलोचना के लिए सावधानी जरूरी है, क्योंकि UAPA का उपयोग अल्पसंख्यकों के अलावा अन्य मामलों में भी किया गया है, जैसे एल्गर परिषद जाँच में गैर-मुस्लिम आरोपित। इमाम के क्षेत्रीय अवरोध पर किए गए विशेष बयानों को कोर्ट के दस्तावेजों, जैसे 2022 के दिल्ली कोर्ट के फैसले में, केवल अकादमिक अभिव्यक्ति नहीं बल्कि आरोप का आधार माना गया।

साजिश के आरोपों का समर्थन संपर्क ट्रेल जैसे सबूतों से होता है। जबकि अकादमिक स्वतंत्रता की चिंताएँ वैध हैं, भारत की बहुदलीय लोकतंत्र, जहाँ चुनाव, स्वतंत्र प्रेस और न्यायिक निगरानी जारी है, उसकी तुलना नाजी जर्मनी के तानाशाही या इजराइल की गाजा नीति जैसी भू-राजनीतिक स्थिति से करना आसान होगा।

निष्कर्ष

हर्ष मंदर की मानवाधिकार चिंताओं से लेकर नंदिता नारायण द्वारा प्रस्तुत ऐतिहासिक तुलना तक, प्रेस कॉन्फ्रेंस में दी गई भावुक अपीलें अक्सर इमाम के मामले में कोर्ट के निर्णयों और सबूतों के महत्व को कम करके दिखाती हैं। वास्तविक सच्चाई चाहे 2020 के दंगों से जुड़े फोरेंसिक सबूत हों या प्रारंभिक सबूत (prima facie) के लिए बार-बार न्यायिक पुष्टि संकेत देते हैं कि इस मामले में दुश्मनी नहीं, बल्कि जवाबदेही काम कर रही है।

भारत जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों के प्रति दृढ़ है, मजबूत संस्थानों, नियमित चुनावों और सतर्क न्यायपालिका के माध्यम से किसी भी दुरुपयोग की रोकथाम करता है। भारत की न्यायिक प्रणाली की स्थायी मजबूती ट्रायल्स के दौरान स्पष्ट होती है, जब सबूतों की गंभीरता से जाँच की जाती है।

यह विभाजन का उपकरण नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय एकता का रक्षक है। यह याद दिलाता है कि सच्चा न्याय संतुलित जाँच पर फलता-फूलता है, न कि अतिशयोक्तिपूर्ण भय की गूंज पर, जो अनजाने में उन्हीं स्वतंत्रताओं को कमजोर कर सकती है जिन्हें यह संरक्षित करने का दावा करता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

हनुमान चालीसा पाठ पर भड़के SC दबंग, प्रजापति माँ-बेटे को जूतों की माला पहनाकर निकाला जुलूस-अंबेडकर प्रतिमा के सामने रगड़वाई नाक: हापुड़ में 4 गिरफ्तार, पढ़ें FIR की अहम बातें

उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले से सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ने वाली एक रूह कंपा देने वाली वारदात सामने आई है। यहाँ शाहपुर चौधरी गाँव में एक माँ और उसके बेटे को जूतों की माला पहनाकर पूरे गाँव में घुमाया गया और उन्हें अमानवीय तरीके से अपमानित किया गया। इस पूरी घटना से जुड़ी FIR की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तत्काल कार्रवाई की है और अब तक चार आरोपितों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया है, जबकि अन्य की तलाश जारी है।

मंदिर में विवाद और जूतों की माला का ‘फरमान’

जानकारी के अनुसार, घटना की जड़ें अयोध्या में श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के समय से जुड़ी हैं। पीड़ित युवक दीपक चौधरी (प्रजापति समुदाय) के अनुसार, उस दौरान गाँव के मंदिर में हनुमान चालीसा का पाठ हो रहा था, तभी दलित समुदाय के एक युवक ने हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, जिसका दीपक ने विरोध किया था।

आरोप है कि इसी रंजिश के चलते 26 जनवरी 2026 को कुछ दलित युवकों ने दीपक को रास्ते में रोक लिया और गाली-गलौज की। इसके बाद उसकी माँ को भी मौके पर बुला लिया गया। गाँव की पंचायत ने कथित तौर पर एक ‘तालिबानी’ फरमान सुनाया कि दोनों को जूतों की माला पहनाकर घुमाया जाए ताकि धर्म पर टिप्पणी का बदला लिया जा सके।

प्रतिमा के सामने नाक रगड़वाई और निकाला जुलूस

पीड़ित ने FIR में आरोप लगाया कि उसे और माँ को जबरन बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के सामने ले जाया गया और वहाँ उनकी नाक रगड़वाई गई। इसके बाद भीड़ ने दोनों के गले में जूतों और चप्पलों की माला डाल दी और पूरे गाँव में उनका जुलूस निकाला।

इस दौरान माँ-बेटे के साथ मारपीट भी की गई और उन्हें हाथ जोड़कर माफी माँगने पर मजबूर किया गया। यह पूरी शर्मनाक घटना गाँव में लगे सीसीटीवी कैमरों में कैद हो गई, जिसका वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

पुलिस की कार्रवाई और गाँव में तनाव

वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। गढ़ कोतवाली पुलिस ने पीड़ित की तहरीर पर तत्काल 10 नामजद युवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए चार आरोपितों (अनिल, अमित, सागर और विनीत) को गिरफ्तार कर लिया है।

गढ़ कोतवाली प्रभारी इंस्पेक्टर देवेंद्र विष्ट ने बताया कि आरोपितों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जा रही है। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि एक आरोपित पुलिस विभाग से जुड़ा है, जिसकी जाँच की जा रही है। फिलहाल गाँव में तनावपूर्ण शांति बनी हुई है और एहतियातन पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

‘जानवरों की तरह नोंचा, मुँह में कपड़ा ठूँसा’: दिल्ली के भजनपुरा में 6 साल की मासूम से 3 मुस्लिम नाबालिगों ने किया गैंगरेप, पीड़ित परिवार की आपबीती का Video

देश की राजधानी दिल्ली में शाम ढलते ही मानवता को शर्मसार करने वाली एक रूह कंपा देने वाली वारदात सामने आई है। यहाँ के भजनपुरा थाना क्षेत्र में महज 6 साल की मासूम बच्ची के साथ पड़ोस में रहने वाले तीन नाबालिग मुस्लिम लड़कों ने सामूहिक दुष्कर्म (गैंगरेप) की घटना को अंजाम दिया। दरिंदगी इस कदर बर्बर थी कि जब बच्ची खून से लथपथ हो गई, तो उसे घर के दरवाजे पर एक आरोपित यह झूठ बोलकर छोड़ गया कि वह ‘ई-रिक्शा से टकराकर गिर गई’ है। दर्द से कराह रही वह नन्हीं जान जैसे ही कमरे के अंदर दाखिल हुई, अपनी माँ की आँखों के सामने ही बेहोश होकर गिर पड़ी। अपनी लाड़ली की यह हालत देख माँ के पैरों तले जमीन खिसक गई।

बेटी के कपड़ों को खून से सना देख माँ ममता के मारे उसे अस्पताल की ओर लेकर भागी, लेकिन रास्ते में ही उसने विचार बदला और वह बच्ची को लेकर सीधे जाफराबाद पुलिस थाने पहुँच गई। वहाँ उसने पुलिस को पूरी कहानी सुनाई। हैरानी की बात यह रही कि जिन आरोपितों को पकड़ने के लिए पुलिस को महज 10 मिनट का रास्ता तय करना था, वहाँ पहुँचने में पुलिस को 10 घंटे लग गए। इस देरी का नतीजा यह हुआ कि पुलिस केवल दो आरोपितों को ही हिरासत में ले सकी, जबकि गैंगरेप का मुख्य आरोपित घटना के 10 दिन बीत जाने के बाद भी दिल्ली पुलिस की गिरफ्त से मीलों दूर है।

ग्राउंड रिपोर्ट: बदबूदार गली के उस कमरे की कहानी जहाँ सिसक रही है मासूमियत

इस भयावह घटना की हकीकत जानने के लिए ऑपइंडिया की टीम बीते बुधवार (28 जनवरी, 2026) को पीड़ित परिवार के घर पहुँची। भजनपुरा इलाके की एक छोटी सी और बदबूदार गली के आखिरी छोर पर यह परिवार एक बड़े से कमरे में रहने को मजबूर है। यह गली आगे से बंद है, जो इलाके के घुटन भरे माहौल को दर्शाती है। कमरे के अंदर का दृश्य हृदयविदारक था। पीड़ित बच्ची कंबल ओढ़े बेड पर सुध-बुध खोकर लेटी थी, जबकि गहरी चिंता और बेबसी में डूबे माता-पिता बेड के अलग-अलग कोनों पर बैठे अपनी किस्मत और कानून व्यवस्था को कोस रहे थे।

पीड़िता के पिता ने बताया कि 18 जनवरी 2026 की शाम करीब 7 बजे जब वह बाजार सब्जी लेने जा रहे थे, तब उनकी बिटिया ने साथ चलने की जिद की। पिता ने उसे घर के बाहर एक दुकान से कुछ सामान दिलाया और बाजार चले गए। जब वह लौट रहे थे तो उन्होंने देखा कि एक आरोपित और उसका परिवार उनके सामने से ही भाग रहा था, लेकिन तब उन्हें अंदाजा नहीं था कि वह भागने वाला शख्स उनके परिवार की खुशियाँ लूट चुका है। घर पहुँचने पर उन्हें पता चला कि उसी लड़के और उसके दो साथियों ने मासूम बेटी के साथ घिनौनी हरकत की है। पिता का कहना है कि मुख्य आरोपित वर्तमान में बिहार के दरभंगा में खुलेआम घूम रहा है, लेकिन पुलिस उसे पकड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। इस सदमे के कारण न तो पिता रिक्शा चलाने जा पा रहे हैं और न ही माँ काम पर जा रही है। दोनों बारी-बारी से बस अपनी बेटी के घावों को सहला रहे हैं।

दरिंदों ने बच्ची को जानवरों की तरह नोंचा- माँ

पीड़ित माँ ने उस शाम का मंजर याद करते हुए बताया कि वह घर पर ही थीं तभी एक आरोपित लड़का उनकी बेटी को गोद में उठाकर लाया और एक्सीडेंट की झूठी कहानी गढ़ी। माँ ने जब देखा कि बच्ची के प्राइवेट पार्ट से खून बह रहा है तो उनका माथा ठनका। उन्होंने आरोपित से सवाल किया कि अगर टक्कर लगी तो चेहरे या सिर पर चोट क्यों नहीं है? इसके बाद वह आरोपित बच्ची को वहीं छोड़कर भाग निकला। माँ ने बताया कि दरिंदों ने बच्ची को जानवरों की तरह नोंचा था। उसके शरीर पर दांतों के निशान थे, कपड़े फटे हुए थे और कान पर गंभीर सूजन थी।

जब पुलिस को लेकर माँ घटनास्थल पर पहुँची तो वहाँ का नजारा देख रूह काँप गई। एक चूड़ी की फैक्ट्री की छत और दीवारों पर खून के धब्बे बिखरे हुए थे, जो चीख-चीख कर उस शाम की बर्बरता गवाही दे रहे थे। पुलिस ने मौके का वीडियो तो बनाया लेकिन दबिश देने में इतनी देरी की कि मुख्य आरोपित को फरार होने का पूरा मौका मिल गया। हद तो तब हो गई जब घटना के अगले दिन एक आरोपित की माँ ने पीड़ित परिवार के घर आकर सहानुभूति दिखाने के बजाय उन्हें धमकाया और कहा कि ‘तेरी बेटी के साथ जो हुआ वह ठीक ही हुआ, ऐसे ही होना चाहिए।’

तीन दरिंदों ने मुँह में कपड़ा ठूँस कर लूटी मासूमियत

बिस्तर पर लेटी उस 6 साल की बच्ची ने जब अपनी टूटी-फूटी जुबान से दर्द बयाँ किया, तो वहाँ मौजूद हर शख्स की आँखें नम हो गईं। बच्ची ने बताया कि वे तीन लड़के थे जिन्होंने उसके साथ गंदा काम किया। उसे डराया-धमकाया गया और उसकी चीखें दबाने के लिए उसके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया गया था। आरोपितों ने न केवल कानून का उल्लंघन किया, बल्कि मानवता के हर उस मापदंड को तोड़ दिया जो समाज को सुरक्षित बनाता है।

यह पीड़ित परिवार मूल रूप से उत्तराखंड के रुद्रपुर जिले का रहने वाला है और पिछले 15 सालों से दिल्ली में आजीविका की तलाश में संघर्ष कर रहा है। पिता पैडल वाला रिक्शा चलाकर अपने परिवार का पेट पालते हैं, जबकि माँ एक कागज बनाने वाली फैक्ट्री में मजदूरी करती है। यह परिवार पिछले तीन सालों से भजनपुरा के इस किराए के कमरे में रह रहा है। पिता बताते हैं कि उनके पाँच बच्चे थे (3 लड़की, 2 लड़का) लेकिन आठ महीने पहले 14 साल के सबसे बड़े बेटे की बीमारी के कारण मौत हो गई। गरीबी के चलते वह अपने बच्चों तक का इलाज नहीं करा सके। अब इस दरिंदगी ने उनकी बची-खुची हिम्मत भी तोड़ दी है।

पिता बताते हैं कि जिस गली में यह वारदात हुई, वहाँ उनका अकेला हिंदू परिवार रहता है, जबकि बाकी सभी पड़ोसी मुस्लिम समुदाय से हैं। हालाँकि, यह पूरा इलाका हिंदू बाहुल्य है, लेकिन उस विशेष गली में वे सामाजिक और सुरक्षा के लिहाज से खुद को बेहद कमजोर महसूस कर रहे हैं। 12 वर्ष की उनकी बड़ी बेटी अब घर पर रहकर छोटे भाई-बहनों की देखभाल करती है, क्योंकि माता-पिता इस सदमे से उबर नहीं पा रहे हैं।

पड़ोसी बोले- आरोपितों को हो फाँसी की सजा

इलाके के लोगों में भी इस घटना को लेकर भारी रोष व्याप्त है। गली में रहने वाली एक हिंदू महिला ने गुस्से में कहा कि आरोपितों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए कि किसी की रूह काँप जाए। उन्हें तड़पा-तड़पा कर चौराहे पर मारना चाहिए।

वहीं, बाजार में चाय बेचने वाली एक मुस्लिम महिला ने भी आरोपितों के लिए फाँसी की माँग की। उन्होंने कहा कि ‘आज उस बच्ची के साथ हुआ है, कल हमारी बेटियों के साथ भी हो सकता है।’

सबसे तेज अर्थव्यवस्था, मजबूत निर्यात, बढ़ता सर्विस सेक्टर… वैश्विक चुनौतियों और US टैरिफ के बीच भारत की शानदार तरक्की: पढ़ें- इकोनॉमिक सर्वे की अहम बातें

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार (29 जनवरी 2026) को संसद में आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 पेश किया। लगातार चौथे साल यह रिपोर्ट बताती है कि भारत सबसे तेज बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था है। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की अर्थव्यवस्था 6.8% से 7.2% के बीच बढ़ेगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मुख्य निष्कर्षों पर प्रतिक्रिया दी और कहा, “आज पेश किया गया आर्थिक सर्वेक्षण भारत के रिफॉर्म एक्सप्रेस की पूरी तस्वीर दिखाता है, जो मुश्किल वैश्विक माहौल में भी लगातार आगे बढ़ रहा है। इसमें मजबूत मैक्रोइकॉनॉमिक आधार, निरंतर विकास गति और राष्ट्र-निर्माण में नवाचार, उद्यमिता और इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती भूमिका को उजागर किया गया है।”

पीएम मोदी ने कहा कि आर्थिक सर्वेक्षण समावेशी विकास के महत्व पर ज़ोर देता है और इसमें एमएसएमई, किसानों, युवा रोज़गार और सामाजिक कल्याण को विशेष ध्यान दिया गया है। उन्होंने कहा, “यह विनिर्माण को मज़बूत करने, उत्पादकता बढ़ाने और विकसित भारत बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने का रोडमैप भी बताता है। इससे मिलने वाले विचार नीति-निर्माण में मदद करेंगे और भारत के आर्थिक भविष्य में विश्वास को और मजबूत करेंगे।”

यह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुमान से भी मेल खाता है, जिसने 2025-26 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान 7.3% कर दिया, जो अक्टूबर के 6.2% से 0.7 प्रतिशत अंक ज़्यादा है। साथ ही आईएमएफ ने 2026-2027 का अनुमान भी 6.2% से बढ़ाकर 6.4% कर दिया।

सर्वेक्षण में कहा गया कि वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर रही है। इसमें बताया गया कि व्यापार में रुकावटें, खासकर टैरिफ और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में धीमी वृद्धि, निर्यात और निवेशक विश्वास पर असर डाल सकती हैं। लेकिन भारत ने लगातार अनुमान से बेहतर जीडीपी आँकड़े दर्ज किए हैं।

अमेरिकी टैरिफ के बावजूद भारत का लगातार विकास

भारत का कुल निर्यात (माल और सेवाएँ) वित्त वर्ष 25 में रिकॉर्ड 825.3 अरब डॉलर तक पहुँचा और वित्त वर्ष 26 में भी वैश्विक व्यापार की अनिश्चितता के बीच बढ़ता रहा। सर्वेक्षण के अनुसार, अप्रैल-दिसंबर 2025 में माल निर्यात 2.4% बढ़ा जबकि सेवा निर्यात 6.5% बढ़ा, भले ही टैरिफ बढ़ाए गए थे।

सरकार ने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए विकास दर 7.4% रखी है, जो पिछले साल के 6.3-6.8% के अनुमान से ज़्यादा है। सर्वेक्षण में बताया गया कि बड़े टैरिफ बढ़ोतरी के बावजूद विकास तेज़ हुआ। इसमें लिखा है, “हालाँकि 2025 में अमेरिका द्वारा कई भारतीय निर्यातों पर कुल 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने के बाद विकास अनुमान कम किए गए थे, लेकिन वास्तविक प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर रहा।”

ट्रंप का मोदी सरकार को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन न करने और नई दिल्ली-इस्लामाबाद के बीच मध्यस्थता के उनके दावों का विरोध करने पर दंड देने का फैसला भारत की विकास गति को रोकने में नाकाम रहा लगता है।

अस्थाई आँकड़ों से पता चला कि भारत का बजट घाटा वित्त वर्ष 21 में जीडीपी के 9.2% से घटकर वित्त वर्ष 25 में 4.8% हो गया और वित्त वर्ष 26 में संभवतः 4.4% तक पहुँचेगा। राजस्व घाटा जीडीपी के हिस्से के रूप में लगातार कम हुआ और वित्त वर्ष 09 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया। पूँजीगत व्यय के लिए ज्यादा धन उपलब्ध होने से सरकारी खर्च की गुणवत्ता सुधरी है।

पहले अग्रिम अनुमानों के अनुसार, वित्त वर्ष 26 में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.4% रहने का अनुमान है, जो देश के लगातार मजबूत विकास को दिखाता है। सर्वेक्षण में कहा गया, “निजी खपत और पूँजी निर्माण विकास को सहारा दे रहे हैं, जबकि आपूर्ति पक्ष पर सेवाएँ मुख्य योगदानकर्ता बनी हुई हैं। विनिर्माण गतिविधि मज़बूत हुई है और कृषि ने संरचनात्मक बाधाओं के बावजूद स्थिरता दी है।”

वित्तीय संकेतक भी सुधरे हैं, केंद्र की आय प्राप्तियाँ वित्त वर्ष 25 में जीडीपी के 9.2% तक पहुँचीं। सावधानीपूर्ण वित्तीय प्रबंधन की वजह से 2025 में तीन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भारत की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग बढ़ाई। सितंबर 2025 में सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (जीएनपीए) कई दशकों के निचले स्तर 2.2% पर आ गईं, जो बैंकिंग क्षेत्र में परिसंपत्ति गुणवत्ता में शानदार सुधार दिखाता है। दिसंबर 2025 तक ऋण वृद्धि 14.5% थी, जो उधार गतिविधि में मजबूत गति दर्शाती है।

इस बीच, भारत का बाहरी कर्ज़ मार्च 2025 के अंत में 736.3 अरब डॉलर से बढ़कर सितंबर 2025 के अंत में 746 अरब डॉलर हो गया। बाहरी कर्ज़ का जीडीपी अनुपात 19.2% था। इसके अलावा, कुल कर्ज़ का पाँच प्रतिशत से भी कम बाहरी है, जिससे बाहरी क्षेत्र से जुड़े जोखिम कम होते हैं। दिसंबर 2024 तक भारत का वैश्विक बाहरी कर्ज़ में हिस्सा सिर्फ 0.69 प्रतिशत है, जो वैश्विक कर्ज़ में उसकी तुलनात्मक रूप से छोटी भूमिका दिखाता है।

मजबूत निर्यात आँकड़े, विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी, नियंत्रित महँगाई और अन्य फैक्टर

अमेरिकी टैरिफ बढ़ने के बावजूद अप्रैल-दिसंबर 2025 में भारत का माल निर्यात 2.4 प्रतिशत बढ़ा, जबकि सेवा निर्यात 6.5 प्रतिशत बढ़ा। माल और सेवाएँ मिलाकर कुल निर्यात वित्त वर्ष 25 में रिकॉर्ड 825.3 अरब डॉलर तक पहुँचा और वित्त वर्ष 26 में भी सुधार जारी है।

इसी अवधि में माल आयात 5.9% बढ़ा, लेकिन इसे सेवा व्यापार अधिशेष और मजबूत प्रेषणों (Remittances) ने संतुलित किया। नतीजतन, वित्त वर्ष 26 की पहली छमाही में चालू खाता घाटा जीडीपी के सिर्फ 0.8% पर कम रहा।

ग्राफ साभार: PIB

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार मार्च 2025 के अंत में 668 अरब डॉलर से बढ़कर 16 जनवरी तक 701.4 अरब डॉलर हो गया। यह भंडार सितंबर 2025 के अंत में बकाया बाहरी कर्ज़ का लगभग 94% और माल आयात के लगभग 11 महीनों का कवर देता है, जो आरामदायक तरलता बफर प्रदान करता है।

विदेशी मुद्रा भंडार उच्च स्तर पर (फोटो साभार: PIB)

केंद्रीय सरकार ने अस्थिर वैश्विक बाज़ारों और अभूतपूर्व बदलावों को देश के उपभोक्ताओं की जेब पर नकारात्मक असर नहीं पड़ने दिया, जो इस उपलब्धि को और बढ़ाता है। सर्वेक्षण के अनुसार, अप्रैल से दिसंबर 2025 तक भारत की औसत हेडलाइन महँगाई दर 1.7% रही, जो सीपीआई श्रृंखला शुरू होने के बाद सबसे कम है।

साल 2025 में प्रमुख उभरती बाज़ार और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं (ईएमडीई) में भारत में हेडलाइन महँगाई में सबसे बड़ी गिरावट आई, लगभग 1.8 प्रतिशत अंक। खास बात यह है कि यह महँगाई कम होना वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में 8% की मजबूत जीडीपी वृद्धि के साथ हुआ, जो भारत के ठोस मैक्रोइकॉनॉमिक आधार और बिना अर्थव्यवस्था के गर्म होने के कीमतों को कुशलता से नियंत्रित करते हुए विकास बनाए रखने की क्षमता को दिखाता है।

महँगाई पर नियंत्रण

सर्वेक्षण में यह भी बताया गया कि भारत का सेवा क्षेत्र स्थिरता का कारक बन गया है, जो देश के कुल मूल्य वर्धित (जीवीए) का आधे से ज्यादा देता है और रोजगार व निर्यात का प्रमुख चालक है। वित्त वर्ष 26 के पहले अग्रिम अनुमानों के अनुसार, पहली छमाही में इसका जीडीपी हिस्सा 53.6% हो गया और जीवीए हिस्सा अब तक के सबसे ऊँचे स्तर 56.4% पर पहुँचा। इससे आधुनिक, व्यापार योग्य और डिजिटल रूप से दी जाने वाली सेवाओं की बढ़ती अहमियत पता चलती है।

वैश्विक सेवा व्यापार में भारत का हिस्सा 2005 में 2% से दोगुना होकर 2024 में 4.3% हो गया, जिससे वह दुनिया का सातवाँ सबसे बड़ा सेवा निर्यातक बन गया। यह देश का मुख्य विकास इंजन है और जीडीपी का आधे से ज़्यादा हिस्सा देता है। क्षेत्र ने वित्त वर्ष 2025-2026 में 9.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की, जो कुल विकास को आगे बढ़ा रही है जबकि महामारी से पहले सेवा निर्यात वृद्धि 7-8 प्रतिशत थी जो हाल के वर्षों में लगभग 14 प्रतिशत हो गई।

वित्त वर्ष 23-25 में औसतन सभी एफडीआई का 80.2% हिस्सा (महामारी से पहले वित्त वर्ष 16-20 के 77.7% से ज़्यादा) सेवा क्षेत्र को मिला, जो इसे एफडीआई का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता बनाता है। खास बात यह है कि यह क्षेत्र सालाना औसतन 7-8% की दर से बढ़ा है।

भारत ने ग्रीनफील्ड डिजिटल निवेश में वैश्विक नेता की अपनी भूमिका भी मज़बूत की और 2024 में 1,000 से ज़्यादा परियोजनाओं के साथ ग्रीनफील्ड निवेश घोषणाओं में दुनिया में चौथा स्थान पाया। 2020 से 2024 तक यह ग्रीनफील्ड डिजिटल निवेश के लिए दुनिया का सबसे लोकप्रिय स्थान बना, जिसने 114 अरब डॉलर आकर्षित किए।

सर्वेक्षण के अनुसार, घरेलू अर्थव्यवस्था “वैश्विक अनिश्चितता के बीच स्थिर विकास वाली है, जिसमें सावधानी की ज़रूरत है लेकिन निराशावाद की नहीं।” इसमें यह भी कहा गया कि भारत के अगले दस साल के आर्थिक लक्ष्यों के लिए बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश की ज़रूरत है। भारत को अपने भविष्य के सपनों को पूरा करने के लिए कई चुनौतियाँ पार करनी हैं, लेकिन यह दिखाता है कि देश सही रास्ते पर है।

कई कैबिनेट मंत्रियों ने सर्वेक्षण की सराहना की, जिनमें गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल हैं। उन्होंने कहा, “यह पीएम मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारतीय अर्थव्यवस्था की उस ताकत की गवाही देता है जो चुनौतियों को पीछे छोड़ते हुए ज़ोरदार आगे बढ़ रही है।”

गृहमंत्री ने कहा कि जब दुनिया महामारी से आर्थिक अस्थिरता में डूब गई थी, तब हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत नेतृत्व के चलते सभी को साथ लेकर इन दोनों बाधाओं को पार करते हुए सहज रूप से आगे बढ़ती रही।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। अंग्रेजी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

दशकों पहले तमिलनाडु के मंदिरों से चोरी हुई थीं करोड़ों की 3 मूर्तियाँ, अब अमेरिका इज्जत से लौटाएगा: जानिए 12 साल में मोदी सरकार के नेतृत्व में कितनी धरोहरें भारत को मिलीं वापस

सांस्कृतिक विरासत केवल कला या संग्रहालय की वस्तुएँ नहीं होती, बल्कि किसी देश की इतिहास, धर्म और पहचान का प्रतीक होती हैं। दशकों से तमिलनाडु के मंदिरों से चोरी हुई पवित्र कांस्य मूर्तियों की कहानी इस बात की याद दिलाती है कि कला और धर्म के प्रतीकों की अवैध तस्करी कितनी गंभीर समस्या है। इसी संदर्भ में अमेरिका के वाशिंगटन स्थित स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय लिया है।

उसने भारत सरकार को तीन दक्षिण भारतीय कांस्य मूर्तियों, शिव नटराज, सोमस्कंद और संत सुंदरार विद परवई को लौटाने की घोषणा की। ये मूर्तियाँ तमिलनाडु के मंदिरों से दशकों पहले अवैध तरीके से हटाई गई थीं और बाद में अंतरराष्ट्रीय कला बाजार के जरिए अमेरिका तक पहुँचीं।

यह कदम न केवल भारत की सांस्कृतिक धरोहर की वापसी की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि दुनिया भर में लूटी गई विरासत को उनके मूल देशों तक लौटाने की वैश्विक मुहिम को भी मजबूती देता है।

कौन-कौन सी मूर्तियाँ भारत लौटाई जा रही हैं?

स्मिथसोनियन द्वारा जिन तीन मूर्तियों की पहचान की गई है, वे दक्षिण भारतीय कांस्य कला की उत्कृष्ट मिसाल हैं। इनमें चोल काल की प्रसिद्ध ‘शिव नटराज’ प्रतिमा शामिल है, जो लगभग 990 ईस्वी की मानी जाती है।

दसवीं शताब्दी की नटराज की कांस्य प्रतिमा (फोटो साभार: Special Arrangement)

संग्रहालय के निदेशक चेस एफ रॉबिन्सन ने कहा, “शिव नटराज की यह प्रतिमा तंजावुर जिले के श्री भाव औषधेश्वर मंदिर से संबंधित थी, जहाँ 1957 में इसकी तस्वीर ली गई थी। बाद में 2002 में न्यूयॉर्क स्थित डोरिस वीनर गैलरी से इस कांस्य प्रतिमा को राष्ट्रीय एशियाई कला संग्रहालय ने अधिग्रहित कर लिया।”

12वीं शताब्दी की सोमस्कंद प्रतिमा (फोटो साभार: Special Arrangement)

दूसरी मूर्ति ‘सोमस्कंद’ है, जो 12वीं शताब्दी की चोलकालीन कृति है और इसमें शिव को पार्वती के साथ दर्शाया गया है। शोध में पुष्टि हुई है कि ‘सोमस्कंद’ की तस्वीर 1959 में अलत्तूर गाँव के विश्वनाथ मंदिर में ली गई थी।

विजयनगर काल (16वीं शताब्दी) के संत सुंदरार अपने परवई के साथ (फोटो साभार: Special Arrangement)

तीसरी प्रतिमा ‘संत सुंदरार विद परवई’ है, जो विजयनगर काल की 16वीं शताब्दी की मूर्ति है। संत सुंदरर विद परावई की तस्वीर 1956 में वीरसोलापुरम गाँव के एक शिव मंदिर में ली गई थी।

ये तीनों मूर्तियाँ केवल कलात्मक वस्तुएँ नहीं थीं, बल्कि तमिलनाडु के मंदिरों में पूजनीय और पवित्र प्रतिमाएँ थीं। इन्हें धार्मिक उत्सवों के दौरान बाहर निकाला जाता था। इसलिए इनका मंदिरों से चोरी होना धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से गंभीर अपराध माना जाता है।

मंदिरों से चोरी और अवैध तस्करी का मामला

संग्रहालय अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि इन प्रतिमाओं को जिस समय हटाया गया, उस दौरान भी भारत में पुरावशेष संरक्षण कानून लागू थे। इसका मतलब यह है कि इनका निर्यात या बिक्री पहले से ही कानूनन प्रतिबंधित थी।

जाँच में सामने आया कि इन मूर्तियों को मंदिरों से हटाकर चोरी-छिपे अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुँचाया गया और फिर इन्हें निजी कलेक्शन व संग्रहालयों में शामिल कर लिया गया। शिव नटराज प्रतिमा को 2002 में न्यूयॉर्क की डोरिस वीनर गैलरी के जरिए खरीदा गया था।

जाँच में यह भी संकेत मिले कि इस बिक्री के लिए फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया गया। वहीं सोमस्कंद और संत सुंदरार विद परवई की प्रतिमाएँ 1987 में आर्थर एम सैकलर द्वारा दान की गई लगभग 1,000 वस्तुओं के संग्रह के साथ संग्रहालय में आई थीं।

प्रोवेनेंस रिसर्च से हुआ बड़ा खुलासा

इन मूर्तियों की वापसी का फैसला विस्तृत प्रोवेनेंस जाँच के बाद हुआ। प्रोवेनेंस रिसर्च का अर्थ है किसी कलाकृति के स्वामित्व और इतिहास की पूरी कड़ी को खंगालना। स्मिथसोनियन की टीम ने अधिग्रहण रिकॉर्ड, लेन-देन का इतिहास, डीलर दस्तावेज, शिपिंग व कस्टम पेपर्स, पुरानी तस्वीरें, पत्राचार और संग्रहालय के आर्काइव की गहन समीक्षा की।

इस प्रक्रिया में कई गंभीर ‘रेड फ्लैग’ सामने आए, जैसे 1973 से पहले मूर्तियों का कोई स्पष्ट इतिहास नहीं होना, अधिग्रहण को पीछे की तारीख में दिखाने की कोशिश और कुछ कस्टम दस्तावेजों में मूर्ति का स्रोत ‘थाईलैंड’ तक लिखा जाना।

फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पांडिचेरी की तस्वीरों ने निभाई निर्णायक भूमिका

साल 2023 में स्मिथसोनियन ने पांडिचेरी स्थित फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पांडिचेरी के फोटो आर्काइव्स के साथ मिलकर काम किया। इन अभिलेखों में दक्षिण भारतीय मंदिरों की दुर्लभ तस्वीरें मौजूद हैं। जाँच में पुष्टि हुई कि ये तीनों कांस्य मूर्तियाँ 1956 से 1959 के बीच तमिलनाडु के सक्रिय मंदिरों में मौजूद थीं और उनकी तस्वीरें उसी दौरान ली गई थीं।

इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इन निष्कर्षों की समीक्षा की और आधिकारिक रूप से माना कि मूर्तियों को भारतीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए हटाया गया था। इसी आधार पर स्मिथसोनियन ने इन्हें लौटाने का निर्णय लिया।

शिव नटराज की ‘लॉन्ग-टर्म लोन’ व्यवस्था पर विवाद

तीनों मूर्तियाँ भारत लौटाई जाएँगी, लेकिन इनमें से एक ‘शिव नटराज’ को भारत सरकार ने एक विशेष समझौते के तहत दीर्घकालिक ऋण (Long-term loan) पर संग्रहालय में प्रदर्शित रहने की अनुमति दी है। संग्रहालय का कहना है कि इससे वह मूर्ति का पूरा सच दुनिया के सामने रख सकेगा, जिसमें इसका मंदिर से संबंध, अवैध तस्करी, अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिक्री और अंततः भारत वापसी की कहानी शामिल होगी।

यह मूर्ति संग्रहालय की प्रदर्शनी ‘The Art of Knowing in South Asia, Southeast Asia, and the Himalayas’ में प्रदर्शित रहेगी। हालाँकि, कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि मंदिर की मूर्तियाँ पवित्र और अविभाज्य संपत्ति होती हैं, इसलिए उन्हें लोन पर रखना कानूनी और नैतिक रूप से विवादित है।

ऑपरेशन ‘Hidden Idol’ और अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई

इस घोषणा के साथ ही अमेरिका में सांस्कृतिक तस्करी के खिलाफ कार्रवाई भी तेज हुई है। उसी दिन ‘अमेरिकी आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन’ (ICE) ने ‘ऑपरेशन हिडन आइडल’ के तहत कई भारतीय कांस्य मूर्तियाँ जब्त कीं।

इनमें 14वीं शताब्दी की पार्वती प्रतिमा और तमिलनाडु की चार अन्य मूर्तियाँ शामिल थीं, जिनकी कुल अनुमानित कीमत 5 मिलियन डॉलर से अधिक बताई गई। यह प्रतिमा न्यू जर्सी के Port of Newark पर पकड़ी गई थी। जाँच में पता चला कि इसे कम से कम छह डीलरों के जरिए फर्जी प्रोवेनेंस के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में घुमाया गया था।

अमेरिकी एजेंसियों ने कई मामलों को कथित तस्कर सुभाष कपूर के नेटवर्क से जोड़ा है, जिस पर 100 मिलियन डॉलर से अधिक की सांस्कृतिक संपत्ति की तस्करी का आरोप है। कपूर 2011 में जर्मनी में गिरफ्तार हुआ था और 2012 में भारत प्रत्यर्पित किया गया।

अमेरिका ने 2007 से अब तक 24 देशों को 6600 से अधिक कलाकृतियाँ लौटाने में मदद की है, जो वैश्विक सहयोग के बढ़ते स्तर को दर्शाता है।

तमिलनाडु आइडल विंग और भारत की रिकवरी रणनीति

तमिलनाडु पुलिस की आइडल विंग-CID ने भी इस वापसी को बड़ी उपलब्धि बताया है। पूर्व डीजीपी के जयनथ मुरली ने कहा कि यह मामला भारत की MLAT (आपसी कानूनी सहायता संधि) आधारित रणनीति की सफलता है।

उन्होंने बताया कि सोमस्कंद मूर्ति थिरुवारूर जिले के अलत्तूर गाँव के विश्वनाथ मंदिर से चोरी हुई थी और इसके दस्तावेज भारत ने पहले ही 2022 में प्रस्तुत कर दिए थे।

2014 से अब तक 640+ धरोहर वापस आए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत लंबे समय से मंदिरों और पुरातात्विक स्थलों से चोरी हुई मूर्तियों की वापसी के लिए कदम उठाता रहा है। औपनिवेशिक काल और बाद के वर्षों में कमजोर सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय नीलामी बाजार ने तस्करी को बढ़ावा दिया। कई बार सही दस्तावेज और फोटोग्राफ रिकॉर्ड न होने के कारण मूर्तियों की पहचान और वापसी कठिन हो जाती है। फिर भी भारत सरकार लगातार प्रयास कर रही है और 2014 के बाद से अब तक 640 से अधिक चोरी की गई धरोहरें वापस लाई जा चुकी हैं।

स्मिथसोनियन का यह फैसला इसी श्रृंखला की एक बड़ी कड़ी है। यह केवल मूर्तियों की वापसी नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि अब संग्रहालयों को अपने संग्रह की पारदर्शिता और नैतिक जिम्मेदारी निभानी होगी। स्मिथसोनियन द्वारा तमिलनाडु के मंदिरों से चोरी हुई तीन पवित्र कांस्य मूर्तियों की वापसी भारत के लिए सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जीत है।

ईजी मनी के नाम पर करता था साइबर फ्रॉड, Wingo ऐप पर मोदी सरकार का एक्शन: सर्वर समेत सबकुछ ब्लॉक, समझिए- कैसे आम लोगों से कराता था अपराध

भारत में साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं, इसे देखते हुए अब सरकार ने Android यूजर्स को निशाना बनाने वाले एक बड़े फ्रॉड नेटवर्क पर कड़ा शिकंजा कसा है। गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाले Indian Cyber Crime Coordination Centre (I4C) ने ‘Wingo’ नाम की संदिग्ध Android ऐप के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है।

यह ऐप लोगों को जल्दी पैसा कमाने का लालच देकर फँसाता था और फिर उनके मोबाइल फोन का गलत इस्तेमाल करते हुए उनकी जानकारी के बिना फर्जी SMS भेजने जैसी गतिविधियों में शामिल था। सरकार ने इसके सर्वर, टेलीग्राम चैनलों और यूट्यूब प्रचार को ब्लॉक कर इस पूरे नेटवर्क पर बड़ा प्रहार किया है।

Wingo ऐप पर सरकार की डिजिटल स्ट्राइक और बड़ा बैन

Wingo ऐप के खिलाफ लगातार शिकायतें मिलने के बाद गृह मंत्रालय के साइबर विंग ने जाँच शुरू की। जाँच में यह सामने आया कि यह ऐप एक संगठित साइबर फ्रॉड नेटवर्क का हिस्सा है। इसके बाद सरकार ने इसके कमांड एंड कंट्रोल सर्वर को पूरी तरह जियो-ब्लॉक कर दिया, जिससे इसका संचालन बंद हो सके।

साथ ही Wingo से जुड़े चार बड़े टेलीग्राम चैनलों को भी ब्लॉक कर दिया गया, जिनसे करीब 1.53 लाख यूजर्स जुड़े हुए थे। इसके अलावा, यूट्यूब पर मौजूद 53 से ज्यादा वीडियो भी हटाए गए जो इस ऐप का प्रचार कर रहे थे या इसे डाउनलोड करने का तरीका बता रहे थे।

सरकार ने Android यूजर्स के लिए अलर्ट जारी करते हुए कहा है कि वे अनजान और गैर-आधिकारिक ऐप्स से सतर्क रहें।

क्या था Wingo ऐप और कैसे फैलाया जा रहा था ‘क्विक मनी’ का जाल?

जाँच में सामने आया कि Wingo ऐप लोगों को आसान कमाई और जल्दी रिटर्न का झाँसा देकर फँसाता था। यूजर्स को कहा जाता था कि वे छोटे-छोटे टास्क पूरे करें या निवेश करें और बदले में मोटा मुनाफा कमाएँ। शुरुआत में मामूली पैसे देकर भरोसा बनाया जाता था ताकि लोग इसे असली कमाई का जरिया समझ लें।

इसके बाद यूजर्स से पैसे जमा करवाए जाते थे और फिर अचानक ऐप बंद हो जाता था या यूजर अकाउंट ब्लॉक कर दिया जाता था। यह स्कीम रेफरल बेस्ड पोंजी मॉडल की तरह काम कर रही थी, जिसमें लोगों को दूसरों को जोड़ने के लिए भी प्रेरित किया जाता था।

यूजर्स के फोन से चोरी-छिपे भेजे जा रहे थे फर्जी SMS और डेटा चोरी का खतरा

सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि Wingo ऐप यूजर की जानकारी के बिना उसके मोबाइल नंबर से रोजाना 80 से 100 संदिग्ध SMS भेज रहा था। इन संदेशों का इस्तेमाल स्कैम मैसेज, फिशिंग लिंक और अन्य साइबर धोखाधड़ी के लिए किया जा रहा था।

पुलिस के अनुसार, यह ऐप ‘Telecom Mule as a Service’ प्लेटफॉर्म की तरह काम कर रहा था, जिसमें आम नागरिकों के मोबाइल नंबर और डिजिटल पहचान का गलत इस्तेमाल करके असली अपराधी कानून की पकड़ से बच रहे थे। इसके लिए ऐप कॉन्टैक्ट्स, गैलरी, लोकेशन और SMS जैसी संवेदनशील परमिशन माँगता था, जिससे निजी डेटा चोरी होने का खतरा बढ़ गया था।

Telegram-YouTube के जरिए स्कैम का प्रचार और 1.53 लाख यूजर्स का नेटवर्क

सरकारी एजेंसियों ने पाया कि यह फ्रॉड नेटवर्क सोशल मीडिया के जरिए बड़े स्तर पर फैलाया जा रहा था। टेलीग्राम पर बने चार बड़े चैनलों के माध्यम से इस ऐप को प्रमोट किया जा रहा था और दावा किया जा रहा था कि इससे जुड़े यूजर्स की संख्या एक लाख से ज्यादा है।

इन चैनलों के जरिए लोगों को ऐप डाउनलोड करने के निर्देश दिए जाते थे, जल्दी कमाई के दावे किए जाते थे और रेफरल के जरिए दूसरों को जोड़ने का लालच दिया जाता था। इसके अलावा यूट्यूब पर 53 से ज्यादा वीडियो मौजूद थे जो इस ऐप का प्रचार कर रहे थे। सरकार ने इन सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर कार्रवाई करते हुए चैनल ब्लॉक और वीडियो हटाने के निर्देश दिए।

Android स्कैम क्या है और पहले भी क्यों लग चुके हैं ऐसे ऐप्स पर बैन?

Android स्कैम दरअसल वह धोखाधड़ी है जिसमें अपराधी यूजर्स को नकली ऐप डाउनलोड करवाकर उनके फोन का कंट्रोल हासिल कर लेते हैं। ये ऐप्स अक्सर गारंटीड मुनाफा, डेली प्रॉफिट या जल्दी पैसा कमाने का दावा करते हैं।

एक बार इंस्टॉल होने के बाद ये ऐप्स फोन की परमिशन लेकर डेटा चोरी, फर्जी ट्रांजैक्शन और साइबर अपराधों को अंजाम देते हैं। भारत में इससे पहले भी कई फर्जी लोन ऐप्स, निवेश स्कीम ऐप्स और रेफरल बेस्ड फ्रॉड प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई हो चुकी है। Wingo ऐप भी उसी तरह का एक नया और बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है।

यूजर्स को सरकार की सख्त सलाह

सरकार ने साफ कहा है कि यूजर्स केवल आधिकारिक ऐप स्टोर से ही एप्लिकेशन डाउनलोड करें और अनावश्यक परमिशन देने से बचें। ऐसी ऐप्स से दूर रहें जो गारंटीड या डेली प्रॉफिट का दावा करती हैं। किसी भी अनजान UPI ID या QR कोड पर पैसे भेजने से बचें और कभी भी OTP या बैंक डिटेल्स शेयर न करें।

अगर किसी को शक हो कि वह ठगी का शिकार हुआ है तो तुरंत संदिग्ध ऐप को अनइंस्टॉल करें, साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करें और cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें। सरकार की इस कार्रवाई से यह साफ हो गया है कि साइबर अपराधियों के खिलाफ डिजिटल स्तर पर सख्ती लगातार जारी रहेगी।

यूजीसी का ब्रांड ‘हिट’ है, जैसे गैस रिसने पर यूनियन कार्बाइड का ब्रांड ‘हिट’ था!

किसी भी कंपनी का ब्रांड अचानक हेडलाइंस में और जन-जन की जुबान पर आ जाए तो कंपनी के मार्केटिंग और ब्रांडिंग वालों की बल्ले-बल्ले हो जाती है। UGC का नाम इतने कम समय में इतनी बार पहले कब जपा गया था? बीते 10 दिनों में डिजिटल मीडिया पर UGC एक वायरल ब्रांड बन गया है। बाजार की भाषा में UGC का ब्रांड हिट है। कुछ इस तर्ज पर जैसे भोपाल में प्राणलेवा MIC गैस रिसने पर यूनियन कार्बाइड का ब्रांड हिट था।

UGC के पूर्व चेयरमैन एम जगदीश कुमार को भोपाल में अभी जिस दिन पद्मश्री का शुभ समाचार मिला तब UGC ही ट्रेंड कर रहा था। वे विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों के अधिकारियों से विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल 2025 पर ही संवाद करने आए थे।

यह भारत में उच्च शिक्षा व्यवस्था में गुणात्मक और प्रभावी सुधार की दिशा में बनाया गया एक शानदार प्लान है। इसमें UGC, AICTE और NCTE के स्थान पर तीन स्वतंत्र परिषदों के साथ एक ही आयोग के गठन की तैयारी है। इसे तैयार करने में निश्चित ही कई सालों का अभ्यास किया गया होगा और अब इस पर व्यापक संवाद हो रहा है। पूर्व चेयरमैन से UGC की ताजा कुख्याति से जुड़े प्रश्न भी आए, जिनके उत्तर नहीं ही मिलने थे। वे केवल इसी बिल पर सीमित रहे, जिसे संक्षिप्त में VBSA-2025 कहा गया है।

एक तरफ, यह विधेयक बहुत स्पष्ट संकेत करता हुआ दिखाई दिया कि सरकार भारत के उच्च शिक्षा जगत के पूरे डिजाइन को एक नए स्वरूप में ढालने के लिए अच्छी तैयारी से अग्रसर है। इसका नामकरण ही ‘विकसित भारत’ के नाम पर है। मतलब साफ है कि उच्च शिक्षा संस्थानों, उनकी संरचना और उनके प्रबंधन को एक बड़े लक्ष्य के लिए एक नए स्वरूप में सामने लाया जाए और वह लक्ष्य है- विकसित भारत। यह ऐसे प्रयास हैं, जो किसी भी दूरदृष्टिवान सरकार से अपेक्षित हैं। पूर्व चेयरमैन के नाते एम जगदीश कुमार इस महात्वाकांक्षी लक्ष्य के लिए जुटे हैं। निश्चित ही एक बड़ी टीम यह काम कर रही होगी।

दूसरी तरफ, सुप्रीम कोर्ट में कुछ पुराने मामलों की फाइलें भी सरक रही हैं। यह विश्वविद्यालयों में घटे अप्रिय घटनाक्रमों की हैं, जो एक समय मीडिया में जातीय विवादों की सुर्खियाँ बने। विषय संवेदनशील है तो निश्चित ही सरकार का पक्ष रखने के लिए उच्च शिक्षा विभाग के ‘जिम्मेदार अधिकारियों’ को इसमें लगाया ही गया होगा।

सरकार के लिए असुविधाजनक स्थिति की आशंकाओं से जुड़े मामलों में कड़ी और बड़ी एहतियातें बरती ही जाती हैं। UGC के मनीषियों को जो ‘जातीय ज्ञान’ अचानक प्राप्त हुआ है, उसकी जड़ें ऐसे ही प्रकरणों की फाइलों में फैली हैं, जिसके बारे दिशा सूत्र सुप्रीम कोर्ट से मिले होंगे। तो जिम्मेदार अधिकारियों ने ‘अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए’ वह ऐतिहासिक रचना की, जिसने चाय की प्याली में तूफान नहीं ला दिया, पूरी गरम केतली ही अयोध्या से सोमनाथ तक उड़ेल दी। किए कराए पर पानी फिरना यही है।

अब कुछ प्रश्न हैं। अव्वल तो सिस्टम में कौन क्या देख रहा है? UGC में कौन क्या देख रहा है? सुप्रीम कोर्ट में कौन क्या देख रहा है? मंत्रालय में कौन क्या देख रहा है? मंत्रालय से UGC की ओर कौन क्या देख रहा है? UGC की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कौन क्या देख रहा है? जिसे जो भी दिखाई दे रहा है, वह अपने ऊपर किसे क्या दिखा रहा है?

प्रस्तुत प्रकरण में किसे क्या दिखाई दिया और उसने उसे क्या समझा, कागजों पर क्या लिखा और अंतिम रूप से जारी करने के पहले उसने किसको क्या दिखाया और समझाया? क्या किसी की बुद्धि में नहीं आया कि इसके क्या दुष्परिणाम अगले कुछ ही घंटों में सरकार के सारे अच्छे-किए कराए पर पानी फेरने वाले हैं? या UGC में सब यह मान रहे थे कि उनके सर्कुलरों को देखता ही कौन है। आए दिन कुछ न कुछ जारी करते हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों में ज्यादातर फाइलों में समाते रहते हैं। साफ कहें तो डस्टबिन में। क्या UGC के बुद्धिमानों ने यह सोचा था कि यह भी ऐसा ही एक रद्दी का कागज होगा?

एक और महत्वपूर्ण बात है। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष है। देश भर में सामाजिक समरसता के सम्मेलन हो रहे हैं। ये आयोजन बड़े सामाजिक धरातल के हैं, जिनमें जातियों के छोटे और संकीर्ण दायरों से परे जाने की प्रेरणा है। संघ की समग्र शक्ति इसमें लगी हुई है और ये कोई हजारों की भीड़भाड़ वाले विशाल सम्मेलन नहीं हैं। सक्रिय रूप से सघन आयोजनों की इस श्रृंखला में संघ समाज के हर कोने का सीधा स्पर्श कर रहा है। इनकी चहल-पहल गाँव और कस्बों में हैं। बड़े शहरों के छोटे मोहल्लों के समूहों में है।

प्रधानमंत्री सोमनाथ को रेखांकित कर रहे हैं और अतीत से सबक लेने का संदेश दे रहे हैं। एक ऐसा अतीत जिसमें हमारे लिए हर तरह के भेदभाव से मुक्त एक संगठित समाज के रूप में सामने आने के संकेत हैं। न हम बटेंगे, न हम कटेंगे। हमारे बटने की बहुत बड़ी कीमतें देश ने चुकाई हैं और समाज को भी गहरे आघात झेलने पड़े हैं। इसलिए सब एक बड़े कोष्ठक में स्वयं को एक रखें, न कि छोटे और मध्यम कोष्ठकों में और उस बड़े कोष्ठक का नाम है कि हम सब हिंदू हैं। हमारी एक जाति है और एक ही धर्म है।

अब टाइमिंग महत्वपूर्ण है। ठीक ऐसे ही समय अचानक UGC की प्रयोगशाला में बैठे वैज्ञानिक एक नया रसायन लेकर आते हैं और वह सारे वातावरण को कसैले धुएँ से भर देता है। इस प्रभाव का रँग भी है, गँध भी है और स्वाद भी है। यह रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन नहीं है। सामाजिक समरसता के सम्मेलनों में हिस्सा ले रहे करोड़ों लोग एकदम से सन्नाटे में आ गए हैं। सोमनाथ से सबक ग्रहण करने की प्रक्रिया को अचानक ग्रहण लग गया है। कोई हिसाब नहीं लगा सकता कि इसमें किस-किसके हिस्से की कितनी हानि हो चुकी है और किनके चेहरे इस अचानक खुली लॉटरी से चमके हुए हैं? वे अवसरवादी जो चाहते ही हैं कि सरकार की ताकत खत्म हो और उनके अच्छे दिन लौटें। समाज बिखरे, टूटे, लड़े, भिड़े, मरे, कटे अपनी बला से।

क्या UGC में या मंत्रालय में ऐसे लोग आज भी जमा हैं, जो यह रेखांकित कर रहे हैं कि सरकार किसी की भी हो, सिस्टम में वे ही हैं और वे वह करके रहेंगे, जो वे करना चाहते हैं। अगर दुश्मनों की जमीन पर आतंकियों को निपटा रहे अज्ञात हमलावरों के पीछे कहीं भारत की प्रेरक शक्ति काम कर रही है तो अपने घर में अपने ही दीए के नीचे पसरे इस अंधेरे पर गौर करना जरूरी है। इस अंधेरे में कौन किस शक्ल में घात लगाकर बैठा है?

घात में वो जो भी है, उसने UGC के एक कागज को आगे सरकाकर वह सब कर दिया है, जो नहीं होना चाहिए था। ऐसे तत्व किसी भी पद पर हों, किसी भी विभाग में हों, संगठन में हों या सरकार में हों, इनके रहते किसी दुश्मन की जरूरत नहीं है। वे कुल्हाड़ी हाथ में लिए ही बैठे हैं। एक कुल्हाड़ी पूरी ताकत से पैरों पर मार ली गई है।

पता नहीं UGC मुख्यालय के मनीषियों में ठीक इसी समय क्या चल रहा होगा, जब चारों तरफ उनका ही नाम जप हो रहा है। उनके चियर लीडर्स किस मुद्रा में क्या भाव प्रकट रहे होंगे। UGC के महामतियों ने बैठे-ठाले किस-किस के हिस्से की कितनी हानि कर दी है, इसका हिसाब लगाना कठिन है।

UGC दिल्ली में है और दिल्ली की नाक के नीचे ऐसा कैसे हो सकता है?

एक समाजसेवी या टेक उद्यमी… जानें कौन हैं राहुल दीवान? जिनकी याचिका के कारण UGC के नए नियमों पर SC ने लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (29 जनवरी 2026) को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा) विनियम, 2026 पर अस्थायी रोक लगा दी और इन नियमों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका की तत्काल सुनवाई पर विचार करने पर सहमति जताई।

यह कदम नए UGC नियमों को लेकर बढ़ते विवाद के बीच उठाया गया है। आलोचकों का कहना है कि ये नियम भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव की एकतरफा और कठोर (ड्रैकोनियन) परिभाषा प्रस्तुत करते हैं, जो संतुलन और निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है।

कोर्ट में यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता और उद्यमी राहुल दीवान की ओर से वकील पार्थ यादव ने CJI सूर्यकांत के सामने रखी। पार्थ यादव ने कोर्ट से अपील की कि इस मामले की जल्द से जल्द सुनवाई की जाए। उन्होंने तर्क दिया कि अगर ये UGC के नए नियम लागू रहे, तो वे भेदभाव रोकने के बजाए नया भेदभाव पैदा कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि यह मामला संविधान से जुड़े गंभीर सवाल उठाता है और इस पर तुरंत न्यायिक जाँच जरूरी है। इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिका की तत्काल सुनवाई पर विचार करने पर सहमति जताई, जिससे यह साफ संकेत मिला कि नए UGC नियमों को लेकर उठी चिंताओं की गहराई से जाँच होगी।

यह याचिका शुक्रवार (23 जनवरी 2026) को जारी किए गए UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा) नियम, 2026 की कुछ खास धाराओं को चुनौती देती है। याचिका में कहा गया है कि नियम 3(1)(c), 8(b) और 8(c) भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करते हैं, जो कानून के सामने समानता, भेदभाव से सुरक्षा और गरिमा के साथ जीवन के अधिकार की गारंटी देते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका किसने फाइल की?

यह याचिका व्यवसायी और समाजसेवी राहुल दीवान ने सेवानिवृत्त IAS अधिकारी संजय दीक्षित, अनुभव पांडे और रूबल पडालिया के साथ मिलकर दायर की है। इन सभी में राहुल दीवान इस कानूनी चुनौती का सबसे मुखर चेहरा बनकर उभरे हैं। वे UGC के नए नियमों का खुलकर विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि नए नियम खतरनाक हैं और समाज में विभाजन पैदा कर सकते हैं।

याचिका दायर करने के तुरंत बाद राहुल दीवान ने ऑपइंडिया से बातचीत की और सुप्रीम कोर्ट जाने के पीछे की अपनी चिंताएँ और वजहें बताईं। उनका कहना है कि UGC के ये नए नियम असली भेदभाव को खत्म करने के लिए नहीं हैं, बल्कि एक खास वैचारिक सोच को संस्थागत रूप देने की कोशिश हैं।

राहुल दीवान ने UGC नियमों की आलोचना की

ऑपइंडिया से बात करते हुए राहुल दीवान ने कहा कि UGC के इन नियमों की मंशा काफी चिंताजनक लगती है। उनका कहना है कि इन नियमों का उद्देश्य हिंदू समाज की अलग-अलग जातियों को ऊँची जातियों के खिलाफ खड़ा करना प्रतीत होता है और यह ढाँचा हिंदू समाज के भीतर टकराव और विभाजन बढ़ाने के लिए बनाया गया है।

राहुल दीवान ने UGC के नियमों पर सवाल उठाते हुए कहा कि इन नियमों में कुछ समुदायों को बिना ठोस सबूत के उत्पीड़क (शोषक) मान लिया गया है, जबकि यह साफ नहीं किया गया कि उत्पीड़क कौन है और इसका आधार क्या है। उन्होंने चेतावनी दी कि पीड़ितों को चुनिंदा तरीके से परिभाषित करने से इन नियमों का गलत इस्तेमाल बढ़ सकता है।

याचिका दायर करने के बाद LinkedIn पर अपनी राय साझा करते हुए, दीवान ने इन दिशानिर्देशों को विभाजनकारी बताया। उनका कहना है कि ये नियम इतिहास की कथित गलतियों के लिए पूरी-की-पूरी समुदायों को सजा देते हैं, जबकि व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय नहीं की जाती।

उन्होंने लिखा कि आज भारत में ब्राह्मण और सामान्य तौर पर ऊँची जातियों के लोग सबसे अधिक उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं और उन्हें हजार साल पहले उनकी जाति द्वारा किए गए माने जाने वाले कर्मों के लिए दंडित किया जा रहा है। उन्होंने इसे सामूहिक सजा करार दिया। राहुल दीवान का कहना है कि न्याय और समानता सुनिश्चित करने वाले कानून सभी के लिए बराबर होने चाहिए, न कि समाज के बड़े वर्गों को कानूनी सुरक्षा से बाहर करने वाले।

राहुल दीवान कौन है?

राहुल दीवान एक उद्यमी, सामाजिक कार्यकर्ता, ब्लॉगर, ओपन-सोर्स और एजाइल टेक्नोलॉजी के समर्थक, साथ ही शौकिया फोटोग्राफर हैं। वे योग और ध्यान को रोजाना की दिनचर्या की तरह अपनाते हैं। उन्होंने शुरुआत एक सॉफ्टवेयर सर्विस कंपनी खड़ी करके की, जिसे 20 सालों में लगभग 600 कर्मचारियों तक बढ़ाया और 2022 में उसे एक अमेरिकी कंपनी को बेच दिया।

अपनी कंपनी छोड़ने के बाद, वे एंजेल इन्वेस्टर बन गए और आयुर्वेद, सर्जिकल डिवाइस, सिंथेटिक बायोलॉजी, क्लीन टेक, फूड टेक और यहाँ तक कि फिल्मों और डॉक्यूमेंट्री प्रोजेक्ट्स में भी निवेश कर रहे हैं।

साल 2006 में उन्होंने ‘सारयू फाउंडेशन’ नाम की एक गैर-लाभकारी संस्था शुरू की, जो कमजोर और वंचित पृष्ठभूमि के बच्चों के लिए गैर-औपचारिक शिक्षा पर काम करती है। इस संस्था ने अब तक दिल्ली और पूर्वी भारत के गाँवों में 1000 से अधिक बच्चों की मदद की है।

फाउंडेशन बच्चों को मैथ्स, म्यूजिक, इंग्लिश और योग की आफ्टर-स्कूल क्लासेस देता है, साथ ही सुरक्षित और सहयोगी माहौल बनाता है, ताकि बच्चे आत्मविश्वास के साथ सीख सकें और आगे बढ़ सकें।

2016 में राहुल दीवान ने संगम टॉक्स नाम से एक यूट्यूब चैनल शुरू किया, जो आज भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge Systems), इतिहास, विज्ञान, गणित, अर्थशास्त्र, कला, संस्कृति, पर्यावरण और यात्रा जैसे विषयों का एक बड़ा मंच बन चुका है।

इस चैनल पर विद्वानों और शोधकर्ताओं के लगभग 1000 टॉक्स, 1600 से ज्यादा लंबे वीडियो और 6 भारतीय भाषाओं में कंटेंट उपलब्ध है, जिसमें हिंदी और अंग्रेजी सबसे प्रमुख हैं।राहुल दीवान इस पहल का अधिकांश खर्च खुद उठाते हैं और करीब 50 ऐसे लोगों या समूहों का समर्थन करते हैं, जो भारतीय सभ्यता के पुनर्निर्माण के लिए काम कर रहे हैं।

उन्होंने कंप्यूटर साइंस में B.Tech किया है, साथ ही पक्षी विज्ञान (ऑर्निथोलॉजी) और क्रिएटिव राइटिंग से जुड़े सर्टिफिकेट कोर्स भी किए हैं। राहुल दीवान खुद को इस सोच से प्रेरित बताते हैं “सही काम करो, तो सही चीजें अपने आप तुम्हारे साथ होंगी।” यह विचार उन्हें उनके आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु जग्गी वासुदेव से मिला है।

द हिंदू फंड और इसकी दूर-दृष्टि

राहुल दीवान का आने वाले 3–4 सालों का एक बड़ा लक्ष्य ‘1000 करोड़ हिंदू फंड’ बनाना है। यह पहल हिंदू नेटवर्क फाउंडेशन के तहत चलाई जा रही है, जिसे पहले सरयू फाउंडेशन के माध्यम से शुरू किया गया था।

इस फंड का उद्देश्य सनातन धर्म और भारतीय सभ्यता की रक्षा और प्रचार के लिए काम करने वाले व्यक्तियों और संगठनों को आर्थिक सहायता देना है। इसे सरल नाम हिंदू फंड दिया गया है और इसे कम नौकरशाही के साथ एक ग्रांट देने वाले मंच के रूप में तैयार किया गया है।

इस पहल की मूल सोच है, डिफ़ॉल्ट रूप से विश्वास (पहले भरोसा), यानी जो लोग धर्म और समाज के लिए काम कर रहे हैं, उन्हें अनावश्यक कागजी प्रक्रिया में उलझाने के बजाय सशक्त बनाया जाए।

यह फंड शिक्षा, संस्कृति, इतिहास, सभ्यतागत अध्ययन और सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली पहलों को समर्थन देता है। राहुल दीवान का मानना है कि हिंदू समाज को अपना ऐतिहासिक आत्मविश्वास और सभ्यतागत पहचान फिर से मजबूत करनी चाहिए।

बैकग्राउंड: UGC नियमों की वजह से विरोध क्यों हुआ?

UGC 2026 के नियमों को लेकर विवाद इसलिए बढ़ा है क्योंकि इनमें जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा बहुत सीमित रखी गई है। इन नियमों में सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) को जाति-आधारित उत्पीड़न का शिकार मानने से बाहर कर दिया गया है और केवल SC, ST और OBC वर्गों को ही पीड़ित की श्रेणी में रखा गया है। इसका मतलब यह है कि अगर सामान्य वर्ग के किसी छात्र के साथ जाति के आधार पर भेदभाव होता है, तो उसके लिए शिकायत दर्ज कराने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

आलोचकों का कहना है कि ये नियम यह मानकर चलते हैं कि जाति-आधारित भेदभाव केवल SC, ST और OBC के खिलाफ ही होता है और इस तरह सामान्य वर्ग को बाहर रखकर उल्टा भेदभाव (रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन) को बढ़ावा देते हैं। जबकि सामान्य वर्ग भी शैक्षणिक संस्थानों का एक बड़ा हिस्सा है।

नए नियमों को सामान्य छात्रों के खिलाफ पक्षपाती बताया जा रहा है, क्योंकि अगर इनका गलत इस्तेमाल हुआ, तो उनके पास किसी भी तरह की संस्थागत सुरक्षा या कानूनी रास्ता नहीं बचेगा। इसी वजह से 2026 के UGC नियमों को लेकर खासतौर पर छात्रों में भारी नाराजगी और विरोध देखने को मिल रहा है, क्योंकि इनका सीधा असर उनकी पढ़ाई, सुरक्षा और भविष्य पर पड़ सकता है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है,जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

भारत से बांग्लादेश तक सरस्वती पूजा के दौरान हिंसा: कहीं मूर्तियाँ तोड़ी गई तो कहीं पथराव-बमबाजी, पढ़ें- 24 घटनाएँ

2026 में हिंदू पर्व सरस्वती पूजा कई जगह विवाद, हिंसा और अवरोधों की चपेट में रहा। अलग-अलग राज्यों और इलाकों से आई रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरस्वती पूजा के आयोजनों पर कट्टरपंथियों द्वारा कई तरह के हमले और प्रतिबंध लगाए गए, जिससे श्रद्धालुओं को परेशानी झेलनी पड़ी।

कुछ स्थानों पर हिंदू बच्चों को पूजा में भाग लेने से रोका गया, तो कहीं देवी सरस्वती की मूर्तियों का अपमान किया गया। कई पंडालों में तोड़फोड़ की गई, सजावट को नुकसान पहुँचाया गया और आयोजकों को डराने की कोशिश की गई। कई जगहों पर पूजा में शामिल भक्तों पर धारदार हथियारों से हमले किए गए, जबकि कुछ जुलूसों पर पत्थरबाजी और बम फेंकने जैसी गंभीर घटनाएँ भी सामने आईं।

इन घटनाओं से यह सवाल उठता है कि क्या हिंदू त्योहारों को निशाना बनाकर व्यवस्थित तरीके से बाधित करने की कोशिश की जा रही है। लगातार हो रही ऐसी घटनाएँ धार्मिक स्वतंत्रता, कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द को लेकर गंभीर चिंता पैदा करती हैं। आगे इस तरह के 24 मामलों को सूचीबद्ध किया गया है।

1. बिहार के वैशाली में हिंदू श्रद्धालु को मुस्लिमों ने बेरहमी से पीटा

बिहार के वैशाली के नवागढ़ क्षेत्र में सरस्वती प्रतिमा विसर्जन के बाद लौट रहे हिंदू श्रद्धालुओं पर कथित रूप से एक मुस्लिम भीड़ द्वारा हमला किए जाने का मामला सामने आया। यहाँ सरस्वती पूजा के बाद श्रद्धालु प्रतिमा विसर्जन के लिए जुलूस निकाल रहे थे।

इस दौरान नवागढ़ बाजार क्षेत्र में मुस्लिमों ने जुलूस के मार्ग को बदलने का दबाव बनाया। इसी बात को लेकर दोनों पक्षों में कहासुनी हुई और कुछ देर के लिए धक्का-मुक्की भी हुई। हालाँकि बाद में जुलूस आगे बढ़ गया। लेकिन विसर्जन के बाद जब श्रद्धालु वापस लौट रहे थे, तब मस्जिद के पास एक बार फिर विवाद भड़क गया।

आरोप है कि रितेश कुमार उर्फ रामचंद्र को रास्ते में रोककर कुछ लोगों ने बेरहमी से पीटा। जब अन्य श्रद्धालु उसे बचाने के लिए आगे आए तो कथित तौर पर लाठी-डंडों और तलवारों से लैस भीड़ ने उनका पीछा किया। वहीं आसपास की छतों से पत्थरबाजी किए जाने से इलाके में अफरा-तफरी मच गई और लोग जान बचाकर इधर-उधर भागने लगे।

2. झारखंड: लोहरदगा में सरस्वती पूजा जुलूस को लेकर मुस्लिमों ने हिंदुओं पर किया हमला

झारखंड के लोहरदगा जिले के कुडू थाना क्षेत्र अंतर्गत बारीडीह गाँव में 25 जनवरी 2026 को सरस्वती पूजा विसर्जन के दौरान तनावपूर्ण स्थिति बन गई। गाँव में माँ सरस्वती की झाँकी निकाली जा रही थी और विसर्जन समारोह के लिए श्रद्धालु मूर्ति लेकर गुजर रहे थे। इसी दौरान मूर्ति ले जा रहा वाहन एक मुस्लिम परिवार के घर की छत से हल्का सा टकरा गया।

इसके बाद संबंधित मुस्लिम परिवार और आसपास के कुछ लोग एकत्र हो गए और वाहन चालक के साथ मारपीट की। देर रात से शुरू हुआ विवाद सुबह तक बढ़ गया और देखते ही देखते स्थिति हिंसक हो गई। आरोप है कि इसके बाद एक भीड़ ने हिंदुओं पर हमला कर दिया। घटना में तीन लोग घायल हो गए।

3. ‘जय श्री राम’ भजन बजाने पर पथराव

बिहार के दरभंगा जिले के अलीनगर क्षेत्र में सरस्वती पूजा की प्रतिमा विसर्जन यात्रा के दौरान तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो गई, जब विसर्जन जुलूस पर कथित तौर पर मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों द्वारा पथराव किया गया। इस घटना में कई हिंदू श्रद्धालुओं को चोटें आईं और इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, स्थानीय हिंदू समुदाय का कहना है कि विवाद की शुरुआत रविवार (25 जनवरी 2026) को हुई थी, जब डीजे पर ‘जय श्री राम’ के भजन बजाए जा रहे थे। इसी बात को लेकर कहासुनी हुई, जो बाद में हिंसा में बदल गई।

4. त्रिपुरा: कैलाशहर में सरस्वती पूजा के दौरान मुस्लिमों ने फैलाई हिंसा

त्रिपुरा के उनाकोटी जिले के कैलाशहर में सरस्वती पूजा के दौरान कथित तौर पर तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो गई। आरोप है कि करीब 16 मुस्लिम युवकों ने हथियारों और लाठियों के साथ पूजा आयोजन में बाधा डालने की कोशिश की, जिसके बाद इलाके में झड़पें शुरू हो गईं।

बीजेपी मंडल अध्यक्ष प्रीतम घोष ने आरोप लगाया कि करीब 16 युवक माचेती और डंडों के साथ सरस्वती पूजा स्थल पर पहुँचे और हिंदुओं पर हमला करने लगे। उन्होंने कहा, “जैसे ही हमें सूचना मिली और हम मौके पर पहुँचे, हम पर अंधाधुंध हमला किया गया। इसके बाद स्थिति और हिंसक हो गई। ये असामाजिक तत्व बांग्लादेश जैसी खतरनाक स्थिति यहाँ पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। हमें एकजुट होकर ऐसी ताकतों के खिलाफ लड़ना होगा।”

5. बिहार के हाजीपुर में आरती के दौरान जबरन बंद कराया डीजे

बिहार के हाजीपुर के टेकनारी पंचायत के वार्ड नंबर 7 में सरस्वती पूजा के दौरान धार्मिक अनुष्ठान में उस समय बाधा उत्पन्न हो गई, जब स्थानीय थाना प्रभारी आरती के दौरान पंडाल में पहुँचे और डीजे बंद कराने का निर्देश दिया।

समिति सदस्यों और श्रद्धालुओं का कहना है कि उस समय कोई डीजे नहीं बज रहा था, फिर भी पुलिस कार्रवाई के कारण आरती रोकनी पड़ी, जिससे लोगों में नाराजगी फैल गई। घटना के बाद सैकड़ों ग्रामीण पंडाल में एकत्र हो गए और विरोध जताते हुए पुलिस कर्मियों को घेर लिया। ग्रामीणों ने थाना प्रभारी पर अनावश्यक हस्तक्षेप कर माहौल बिगाड़ने का आरोप लगाया।

6. बिहार के कटिहार में स्कूल ने सरस्वती पूजा पर लगाया प्रतिबंध

बिहार के कटिहार जिले के बिंदटोली गाँव स्थित उन्नत मध्य विद्यालय में सरस्वती पूजा के आयोजन पर रोक लगाए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया। वर्षों से स्कूल परिसर में सरस्वती पूजा का आयोजन नियमित रूप से होता आ रहा था, लेकिन वर्ष 2026 में स्कूल प्रशासन ने इसे प्रतिबंधित कर दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वर्ष 2025 में सरस्वती प्रतिमा विसर्जन के दौरान छात्रों द्वारा शिक्षक शाहिल कुमार को अबीर लगाए जाने पर उन्होंने आपत्ति जताई थी। इसके बाद उनकी माँग पर स्कूल के स्टाफ और प्रधानाचार्य लक्ष्मण मंडल ने विद्यालय में सरस्वती पूजा के आयोजन पर रोक लगाने का निर्णय ले लिया।

इस प्रतिबंध के चलते हिंदू श्रद्धालुओं को माँ सरस्वती की पूजा-अर्चना करने में कठिनाई हुई और कई लोगों को आसपास के अन्य स्थानों पर जाकर पूजा करनी पड़ी। मामला बढ़ने पर स्कूल परिसर के पास विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया।

बाद में प्रधानाचार्य लक्ष्मण मंडल ने पूरे मामले में हुई गलती को स्वीकार किया और आश्वासन दिया कि अगले वर्ष से विद्यालय में नियमित रूप से माँ सरस्वती की पूजा का आयोजन फिर से शुरू किया जाएगा। प्रधानाचार्य के आश्वासन के बाद स्थिति सामान्य हुई और तनाव समाप्त हो गया।

7. झारखंड के हजारीबाग में विसर्जन जुलूस पर कट्टरपंथियों ने फेंके पत्थर

झारखंड के हजारीबाग जिले में सरस्वती पूजा विसर्जन जुलूस के दौरान हिंसा की घटना सामने आई। 24 जनवरी 2026 को केरेडारी प्रखंड के बेल्टू गाँव में माँ सरस्वती की प्रतिमा विसर्जन के लिए निकाले गए जुलूस पर अचानक एक मुस्लिम भीड़ ने पत्थरबाजी शुरू कर दी। इस अप्रत्याशित हमले के बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई और कई लोग घायल हो गए।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, विसर्जन जुलूस शांतिपूर्वक आगे बढ़ रहा था, तभी अचानक कुछ लोगों ने जुलूस पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया। इसके बाद जुलूस में शामिल कुछ लोगों ने भी जवाबी प्रतिक्रिया दी, जिससे दोनों पक्षों के बीच तनाव और बढ़ गया।

बताया जा रहा है कि विवाद की शुरुआत जुलूस के दौरान बजाए जा रहे गानों को लेकर हुई। मुस्लिम पक्ष ने कुछ गानों को ‘उकसाने वाला’ बताकर आपत्ति जताई और देखते ही देखते मामला हिंसा में बदल गया। पत्थरबाजी के कारण कई श्रद्धालु घायल हो गए और गाँव में तनावपूर्ण स्थिति बन गई।

8. झारखंड में विसर्जन जुलूस पर बमबाजी

झारखंड में सरस्वती पूजा के दौरान विसर्जन जुलूस में उस समय अफरा-तफरी मच गई जब असामाजिक तत्वों ने बमबाजी कर दी। यह घटना 24 जनवरी 2026 की देर रात लोधीपुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत गोहरियों गाँव के वार्ड नंबर 14 में हुई।

सरस्वती प्रतिमा विसर्जन के दौरान डीजे पर संगीत बजाने को लेकर दो पक्षों के बीच विवाद हुआ, जो देखते ही देखते हिंसक झड़प में बदल गया। इसी दौरान अचानक दो बम फेंके गए, जिससे मौके पर दहशत फैल गई और लोग इधर-उधर भागने लगे।

इस बमबाजी में नीरज कुमार, गौतम कुमार, मेघु मंडल और छोटू कुमार गंभीर रूप से घायल हो गए। प्राथमिक उपचार के बाद सभी घायलों को मायागंज अस्पताल में भर्ती कराया गया।

9. असम के डिब्रूगढ़ में तोड़ी माँ सरस्वती की प्रतिमा

असम के डिब्रूगढ़ में सरस्वती पूजा के अगले दिन देवी सरस्वती की प्रतिमा को कुछ अज्ञात असामाजिक तत्वों ने क्षतिग्रस्त कर अपमानित कर दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यह घटना 24 जनवरी 2026 को डिब्रूगढ़ के डिब्रूजन जालान नगर लेबर लाइन इलाके में हुई।  

स्थानीय निवासियों ने कहा कि इलाके में पहले कभी ऐसी घटना नहीं हुई थी। लोगों ने प्रशासन से माँग की है कि दोषियों की पहचान कर उन्हें सख्त सजा दी जाए ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाएँ दोबारा न हों और धार्मिक सौहार्द बना रहे।

10. बंगाल में TMC नेता दाउद आलम मोल्ला पर छात्रों को पूजा से रोकने का आरोप

पश्चिम बंगाल के सरकारी प्रायोजित जोगेश चंद्र चौधुरी कॉलेज में सरस्वती पूजा के आयोजन को लेकर हिंदू छात्रों को कथित रूप से धमकाए जाने का मामला सामने आया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ऑल इंडिया तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के मुस्लिम नेता दाउद आलम मोल्ला पर छात्रों को पूजा आयोजित न करने की चेतावनी देने का आरोप है।

घटना उस समय चर्चा में आई जब कॉलेज की एक हिंदू छात्रा ने आरोप लगाया कि मोल्ला ने उन्हें डराया-धमकाया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में छात्रा ने कहा कि आरोपित नेता कॉलेज के बाहर खड़ा था और उसने अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए धमकी दी।

गौरतलब है कि यह कॉलेज मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का अल्मा मेटर भी है। इससे पहले जनवरी 2025 में भी एक छात्र संगठन नेता द्वारा सरस्वती पूजा करने पर धमकी देने का मामला रिपोर्ट हुआ था।

11. बांग्लादेश में कट्टरपंथियों ने तोड़ी मूर्ति

बांग्लादेश के गोपालगंज जिले के मुक्षुदपुर उपजिला के पश्चिम उजानी कंदनिपारा गाँव में एक सार्वजनिक पूजा मंडप में आयोजित सरस्वती पूजा के बाद मुस्लिम हमलावरों ने मूर्ति को तोड़फोड़ कर उसके गर्दन को मोड़ दिया और सिर लटकाकर जानबूझकर अपवित्र करने का कृत्य किया। मुक्षुदपुर थाने के अधिकारी अब्दुल्ला अल मामुन ने बताया कि पूजा संपन्न होने के बाद जब भक्त मंडप से लौट रहे थे, तभी यह हमला किया गया।

12. बिहार के छपरा में हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अभद्र टिप्पणी

बिहार के छपरा जिले के सोनपुर में सरस्वती पूजा समारोह के दौरान एक शर्मनाक घटना सामने आई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 23 जनवरी 2026 को बाबा हरिहरनाथ मंदिर के पास सरस्वती पूजा पंडाल के नजदीक देव नारायण पांडे नामक व्यक्ति ने देवी सरस्वती और अन्य हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग किया।

बताया गया कि आरोपित नशे की हालत में था और पूजा स्थल के पास धूम्रपान भी कर रहा था। घटना स्थानीय पुलिस स्टेशन से करीब पाँच सौ मीटर की दूरी पर हुई। वायरल वीडियो में आरोपित को लोगों से बहस करते और देवी-देवताओं के लिए अपमानजनक टिप्पणी करते देखा गया।

स्थानीय लोगों ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन उसने आपत्तिजनक बयान जारी रखे। वीडियो वायरल होने के बाद अगले दिन आरोपी ने हाथ जोड़कर माफी माँगी।

13. गुजरात के सूरत में पूजा पंडाल में अश्लील गानों पर कराया डांस

गुजरात के सूरत में सरस्वती पूजा के दौरान एक विवादास्पद घटना सामने आई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 23 जनवरी 2026 को कटारगाम वड रोड स्थित आनंद पार्क सोसायटी में आयोजित पूजा पंडाल में महिलाओं से अश्लील भोजपुरी और हिंदी फिल्मी गानों पर नृत्य कराया गया।

इस दृश्य से कार्यक्रम में मौजूद हिंदू परिवार, बुजुर्ग और महिलाएँ असहज व शर्मिंदा महसूस करने लगे। खास तौर पर बड़ी संख्या में छोटे बच्चों की मौजूदगी को लेकर चिंता जताई गई।

स्थानीय लोगों ने कहा कि सरस्वती पूजा जैसे पवित्र अवसर पर इस तरह की अश्लीलता धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाती है। कुछ हिंदू संगठनों ने आयोजकों पर अश्लीलता फैलाने का आरोप लगाते हुए कड़ी कार्रवाई की माँग की।

14. बंगाल में TMC गुटों ने मंदिर पर लगाया ताला

पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के कमरहाटी शहर में सरस्वती पूजा समारोह उस समय बाधित हो गया जब सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के अंदरूनी गुटीय संघर्ष ने धार्मिक आयोजन को प्रभावित कर दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना शुक्रवार, 23 जनवरी 2026 को हुई। बताया गया कि बेलघड़िया सरबजनिन श्री दुर्गा चौक सोसायटी मंदिर को TMC के एक गुट ने ताला लगाकर बंद कर दिया, जिससे स्थानीय हिंदू महिलाएँ माँ सरस्वती की पूजा नहीं कर सकीं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि पार्षद इस विवाद का समाधान नहीं निकाल पाए हैं। वहीं पुलिस ने भी तब तक हस्तक्षेप से इनकार कर दिया जब तक दोनों गुट आपसी सहमति नहीं बनाते।

15. बंगाल के कूचबिहार में TMC गुटों ने बनाया हिंसक माहौल

पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले के दिनहाटा कॉलेज में सरस्वती पूजा समारोह उस समय बाधित हो गया, जब सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के दो गुटों के बीच आपसी झड़प हो गई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यह घटना 23 जनवरी 2026 को हुई।

कॉलेज परिसर में स्थापित सरस्वती पूजा मंडप के पास अचानक राजनीतिक गुटबाजी हिंसक रूप ले गई, जिससे माहौल तनावपूर्ण हो गया। पूजा में शामिल होने आए हिंदू श्रद्धालुओं को अपनी सुरक्षा के लिए जान बचाकर भागना पड़ा और पूरा परिसर रणक्षेत्र में बदल गया।

मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि झगड़े के कारण पूजा की पवित्रता भी प्रभावित हुई। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस को बुलाया गया। दिनहाटा थाना प्रभारी और सब-डिविजनल पुलिस अधिकारी कॉलेज पहुँचे और स्थिति को नियंत्रित किया।

16. छत्तीसगढ़ में शराब के नशे में पूजा कार्यक्रम में पहुँचे शिक्षक

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में बसंत पंचमी के अवसर पर आयोजित सरस्वती पूजा के दौरान एक सरकारी शिक्षक के नशे में स्कूल पहुँचने का मामला सामने आया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जुनापारा प्राथमिक शाला, गुमगरा में शिक्षक बुद्धेश्वर दास कथित रूप से शराब के नशे में पूजा कार्यक्रम में पहुँचे।

पूजा में मौजूद ग्रामीणों और अभिभावकों ने शिक्षक की हालत देखकर वीडियो रिकॉर्ड किया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि शिक्षक नियमित रूप से नशे की हालत में स्कूल आते थे। घटना के बाद ग्रामसभा में प्रस्ताव पारित कर शिक्षक को हटाने की माँग की गई। शिक्षा विभाग ने जाँच के बाद रिपोर्ट जिला शिक्षा अधिकारी को भेजते हुए निलंबन की सिफारिश की।

17. बंगाल के मुस्लिम बहुल स्कूल में हिंदू छात्रों को प्रवेश से रोका

पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के मोयनागाड़ी फ्री प्राइमरी स्कूल में बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा को लेकर विवाद सामने आया। रिपोर्ट्स के अनुसार, मुस्लिम बहुल इस स्कूल में केवल हिंदू छात्रों को प्रवेश से रोक दिया गया और स्कूल के गेट बंद कर दिए गए।

बताया गया कि छात्रों ने पहले पूजा आयोजन की अनुमति ली थी, जिसे स्कूल प्रशासन ने मंजूरी भी दी थी। लेकिन अगले ही दिन यह अनुमति वापस ले ली गई। प्रशासन की ओर से तर्क दिया गया कि स्कूल में 50 प्रतिशत से अधिक छात्र मुस्लिम हैं।

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में पुलिस अधिकारियों को छात्रों को पूजा करने से रोकते हुए देखा गया। मजबूर होकर हिंदू छात्रों ने स्कूल के बाहर फुटपाथ पर पूजा का आयोजन किया।

18. त्रिपुरा में स्कूल प्रशासन ने सरस्वती पूजा करने से रोका

त्रिपुरा के धर्मनगर स्थित सखाईबाड़ी में होली क्रॉस कॉन्वेंट स्कूल द्वारा सरस्वती पूजा से जुड़े हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों की अनुमति न दिए जाने पर विवाद खड़ा हो गया। विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने 16 जनवरी 2026 को स्कूल प्रबंधन से बसंत पंचमी के अवसर पर परिसर में पूजा आयोजन की अनुमति माँगी थी।

इसके बाद 22 जनवरी को भी परिषद ने दोबारा अनुरोध किया। बताया गया कि स्कूल में 70 प्रतिशत से अधिक छात्र हिंदू हैं और वे अपनी सांस्कृतिक परंपरा के अनुसार पूजा करना चाहते थे। हालाँकि स्कूल प्रशासन ने अनुमति देने से इनकार कर दिया।

इसके विरोध में वीएचपी ने स्कूल के बाहर प्रदर्शन किया, जिसमें कई अभिभावक भी शामिल हुए। प्रदर्शन के दौरान अभिभावकों ने प्राचार्य को घेरकर पूजा की अनुमति देने की माँग की। स्थिति तनावपूर्ण होने पर पुलिस बल तैनात किया गया।

19. MP के उज्जैन में 15 मुस्लिम युवकों ने किया जानलेवा हमला

मध्य प्रदेश के उज्जैन में 22 जनवरी 2026 को बजरंग दल सदस्य और विश्व हिंदू परिषद के पूर्णकालिक कार्यकर्ता सोहेल ठाकुर पर 10 से 15 मुस्लिम युवकों के समूह ने जानलेवा हमला कर दिया। यह घटना मालिपुरा क्षेत्र में संघ कार्यालय के पास एक होटल के बाहर हुई।

रिपोर्ट के अनुसार, मदरगढ़ और काजी मोहल्ला के युवकों ने ठाकुर को रोककर पहले बहस की और फिर अचानक लोहे की रॉड व अन्य हथियारों से हमला कर दिया। हमले में सोहेल ठाकुर के सिर पर गंभीर चोट आई और उन्हें नाजुक हालत में उज्जैन जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया।

ठाकुर ने बताया कि वे पहले भी इलाके में कथित ‘लव जिहाद’ मामलों के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं, जिससे वे आरोपितों के निशाने पर थे। उन्होंने कहा कि एक दिन पहले हुए बसंत पंचमी सरस्वती पूजा कार्यक्रम में उनकी सक्रिय भागीदारी भी हमले का कारण बनी।

20. बांग्लादेश में आधी रात को पूजा मंडप में घुसकर तोड़ी प्रतिमा

बांग्लादेश के सतखीरा जिले में सरस्वती पूजा से एक दिन पहले देवी सरस्वती की प्रतिमा के साथ तोड़फोड़ की घटना सामने आई। यह घटना 22 जनवरी 2026 की रात टेटुलिया क्षेत्र में हुई, जहाँ अज्ञात शरारती तत्वों ने आधी रात को चुपके से पूजा मंडप में प्रवेश कर प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया।

हमलावरों ने देवी की मूर्ति को तोड़कर टुकड़ों में बिखेर दिया। अगली सुबह स्थानीय लोगों को घटना की जानकारी मिली, इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल बन गया। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुँची और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन देते हुए जाँच शुरू कर दी।

21. ओडिशा में सरस्वती पूजा से कुछ दिन पहले तोड़फोड़ और मूर्तियों का अपमान

ओडिशा के रायगढ़ा जिले के अंबाडोला क्षेत्र में सरस्वती पूजा से कुछ दिन पहले एक शिक्षक पर हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों का अपमान और तोड़फोड़ करने का आरोप लगा। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जनजातीय क्षेत्र के एक स्कूल में गणेश और सरस्वती की मूर्तियाँ पूर्व छात्रों द्वारा 1999 और 1997 बैच की ओर से दान की गई थीं।

आरोप है कि शिक्षक एम कृष्णराजू अक्सर शराब के नशे में मूर्तियों का मजाक उड़ाता था और कहता था कि ये अंग्रेजी नहीं जानतीं तथा इनके पास कोई शैक्षणिक योग्यता नहीं है। घटना वाली रात भी वह नशे की हालत में स्कूल पहुँचा और मूर्तियों को अपमानजनक बातें कहकर तोड़ दिया।

अगली सुबह अन्य शिक्षकों ने मूर्तियों के टूटे हुए टुकड़े देखे और उन्हें ठीक करने का प्रयास किया। इस घटना से स्थानीय हिंदू समुदाय में आक्रोश फैल गया। हिंदू धर्मरक्षा समिति सहित कई संगठनों ने इसे धार्मिक भावनाओं पर हमला बताते हुए आरोपी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और कड़ी कार्रवाई की माँग की।

22. बंगाल में देवी सरस्वती और देवी काली की लगभग 70 से 80 मूर्तियाँ टूटी मिली

पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के शांतिपुर में 7 जनवरी 2026 को मूर्ति तोड़फोड़ की एक गंभीर घटना सामने आई। लोकनाथ मंदिर के पास स्थित स्थानीय मूर्तिकार जयंत दास की कार्यशाला के बाहर देवी सरस्वती और देवी काली की लगभग 70 से 80 मूर्तियाँ क्षतिग्रस्त अवस्था में पड़ी मिलीं।

ये मूर्तियाँ कई सप्ताह की मेहनत से तैयार की गई थीं, जिन्हें 23 जनवरी को सरस्वती पूजा और 21 जनवरी को काली पूजा के लिए बनाया जा रहा था। सुबह स्थानीय लोगों ने कार्यशाला के बाहर टूटी मूर्तियाँ देखीं। इस घटना से मूर्तिकारों की आजीविका पर भी गहरा असर पड़ा है, क्योंकि त्योहारों का मौसम उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण समय होता है।

23. बसंत पंचमी से पहले तोड़ी गईं हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ

पूर्वी मिदनापुर जिले के महिषादल क्षेत्र में 4 जनवरी 2026 की रात अज्ञात शरारती तत्वों द्वारा हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों को क्षतिग्रस्त किए जाने की घटना सामने आई। यह घटना सरस्वती पूजा पर्व से कुछ ही सप्ताह पहले हुई, जिससे स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश और चिंता व्याप्त है।

रिपोर्ट के अनुसार, गारकमालपुर पंचायत के अंतर्गत कांथाल पोट्टी इलाके में निर्माणाधीन मां बसंती और देवी सरस्वती की कई मूर्तियों को तोड़ दिया गया। 5 जनवरी की सुबह ग्रामीणों ने देखा कि कुछ प्रतिमाएँ आंशिक रूप से और कुछ पूरी तरह टूटी हुई थीं।

मूर्तियों के कुछ विशेष हिस्सों को निशाना बनाया गया, जिससे यह घटना दुर्घटना नहीं बल्कि सुनियोजित तोड़फोड़ प्रतीत होती है। स्थानीय निवासियों ने इसे धार्मिक आस्था पर हमला बताते हुए कहा कि यह केवल मूर्तियों का नुकसान नहीं, बल्कि विश्वास और सांप्रदायिक सौहार्द पर सीधा प्रहार है।

24. त्रिपुरा: हर साल होती थी सरस्वती पूजा, इस बार घोषित कर दिया अवकाश

त्रिपुरा के उनाकोटी जिले के कुमारघाट उपमंडल अंतर्गत पेचारथल स्थित नलकाटा हाई स्कूल में इस वर्ष (2026) सरस्वती पूजा का आयोजन न होने से विवाद और तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। स्कूल में वर्षों से परंपरागत रूप से बसंत पंचमी के अवसर पर सरस्वती पूजा होती रही है, लेकिन 23 जनवरी 2026 को स्कूल प्रबंधन समिति ने अवकाश घोषित कर विद्यालय बंद रखा।

स्थानीय हिंदू छात्रों और अभिभावकों के अनुसार, कई विद्यार्थी सुबह स्कूल पहुँचे तो मेन गेट पर ताला लगा मिला। इससे छात्रों में निराशा और आक्रोश फैल गया। आरोप है कि स्कूल प्रबंधन समिति और शिक्षकों ने पूजा आयोजन के लिए कोई पहल नहीं की। हिंदू छात्रों का कहना है कि समिति में ईसाई, चकमा (बौद्ध) और मुस्लिम सदस्य बहुमत में हैं, जिसके कारण इस बार पूजा नहीं हो सकी।

SC ने UGC इक्विटी नियम 2026 पर लगाई रोक, भाषा अस्पष्ट और दुरुपयोग की आशंका जताई: लागू रहेंगे 2012 के पुराने नियम, जानें दोनों में 10 प्रमुख अंतर

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (29 जनवरी 2026) को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने’ नियम 2026 पर रोक लगा दी। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमल्या बागची की बेंच ने कहा कि नियमों की भाषा अस्पष्ट है और इनके दुरुपयोग की संभावना है। कोर्ट ने केंद्र और UGC को नोटिस जारी कर मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च तय की है। तब तक 2012 के पुराने नियम लागू रहेंगे।

कोर्ट ने चिंता जताई कि नियमों से समाज में विभाजन हो सकता है और भारत की एकता को शिक्षा संस्थानों में प्रतिबिंबित होना चाहिए। बेंच ने कहा, “हम ऐसी स्थिति में नहीं पहुँचना चाहते जहाँ अमेरिका जैसे अलग-अलग स्कूल हों।” कोर्ट ने नियमों की परिभाषाओं, खासकर जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को संवैधानिक और सामाजिक चिंताओं से जोड़ा और विशेषज्ञ समीक्षा की जरूरत बताई।

इस फैसले से फिलहाल सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में 2012 के UGC (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम लागू रहेंगे। ये नियम 14 मार्च 2012 को अधिसूचित किए गए थे और UGC एक्ट 1956 की धारा 26 के तहत बनाए गए थे। इनका मकसद जाति, धर्म, पंथ, भाषा, जातीयता, लिंग और विकलांगता के आधार पर भेदभाव रोकना था।

2012 नियमों में भेदभाव की परिभाषा व्यापक है। इसमें किसी छात्र या समूह को शिक्षा से वंचित करना, मानव गरिमा के खिलाफ शर्तें थोपना, अलग शैक्षणिक व्यवस्था बनाना या समान अवसरों को कमजोर करने वाला कोई भी अंतर, बहिष्कार या प्राथमिकता को भेदभाव माना गया है। नियम सभी छात्रों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करते हैं और उत्पीड़न को लगातार अपमानजनक आचरण बताया गया है।

ये नियम संस्थानों से कहते हैं कि सभी छात्रों के हितों की रक्षा करें, भेदभाव और उत्पीड़न पूरी तरह खत्म करें, दोषियों को सजा दें और समाज के सभी वर्गों में समानता बढ़ाएँ। खास तौर पर SC/ST छात्रों के लिए आरक्षण का पालन, एडमिशन में बाधा न डालना, डिग्री रोकना निषेध, फीस वसूली में भेदभाव न करना, मूल्यांकन में शोषण न करना, रिजल्ट में देरी न करना, हॉस्टल-प्लेग्राउंड में अलगाव न करना और टारगेटेड रैगिंग रोकना अनिवार्य है।

हर संस्थान में इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेल और एंटी-डिस्क्रिमिनेशन ऑफिसर नियुक्त करना जरूरी है। ऑफिसर प्रोफेसर या एसोसिएट प्रोफेसर रैंक का होना चाहिए। शिकायत पर 60 दिनों में फैसला लेना और वेबसाइट पर सभी उपाय अपलोड करना अनिवार्य है।

2026 नियमों में बड़ा बदलाव था कि ये सिर्फ SC/ST तक सीमित नहीं थे, बल्कि OBC, EWS, दिव्यांग और महिलाओं को भी शामिल करते थे। इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर, इक्विटी कमेटी, इक्विटी स्क्वॉड और 24 घंटे हेल्पलाइन अनिवार्य थी। शिकायत निपटाने की सख्त समयसीमा (24 घंटे में बैठक, 15 दिन में रिपोर्ट) थी, लेकिन झूठी शिकायत पर कार्रवाई का प्रावधान नहीं था, जो 2012 में था।

2012 नियमों में भेदभाव की परिभाषा सभी छात्रों पर लागू थी और दंड प्रावधानों में सामान्य वर्ग भी शामिल हो सकता था, जबकि 2026 में SC/ST/OBC को स्पष्ट रूप से प्रोटेक्टेड बताया गया, जिससे सामान्य वर्ग को बाहर माना गया। यही विवाद की जड़ था।

2012 के नियम की कॉपी

दोनों कानूनों में 10 प्रमुख अंतर समझिए

  1. 2012 के नियमों में भेदभाव की परिभाषा को केवल चुनिंदा जाति समूहों तक सीमित नहीं किया गया था, जबकि 2026 दिशानिर्देशों में SC/ST/OBC का स्पष्ट उल्लेख था, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों को बाहर रखा गया।
  2. 2012 दिशानिर्देशों में OBC छात्रों का कोई उल्लेख नहीं था, तो 2026 के दिशानिर्देशों में OBC छात्रों को संरक्षित श्रेणी में शामिल किया गया।
  3. 2012 दिशानिर्देशों में SC/ST छात्रों के लिए प्रावधान थे, लेकिन जाति भेदभाव की बात करते समय ‘सभी छात्रों’ का विशेष उल्लेख था।
  4. ‘दंड अनुभाग’ में सभी छात्रों के खिलाफ भेदभाव का उल्लेख था – जिसमें सामान्य वर्ग के छात्र भी शामिल हो सकते थे। 2026 दिशानिर्देशों में ऐसा कोई उल्लेख नहीं।
  5. 2012 के नियम सलाहकारी (एडवाइजरी) प्रकृति के थे, जबकि 2026 के नियम अनिवार्य हैं और गैर-अनुपालन पर कड़ी सजा (जैसे फंडिंग रोकना, डिग्री मान्यता छीनना) का प्रावधान है।
  6. 2026 में संरक्षण का दायरा बढ़ाकर फैकल्टी, नॉन-टीचिंग स्टाफ और जेंडर माइनॉरिटी तक किया गया, जबकि 2012 में मुख्य फोकस केवल छात्रों पर था।
  7. 2026 में ज्यादा संस्थागत तंत्र अनिवार्य हैं – जैसे इक्विटी कमेटी, इक्विटी स्क्वॉड, इक्विटी एम्बेसडर और 24×7 हेल्पलाइन। वहीं, 2012 में सिर्फ इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेल और एंटी-डिस्क्रिमिनेशन ऑफिसर ही जरूरी थे।
  8. शिकायत निपटारे की समयसीमा 2012 में 60 दिन थी, जबकि 2026 में बहुत सख्त, जिसमें शिकायत के 24 घंटे में बैठक, 15 दिन में रिपोर्ट और 7 दिन में कार्रवाई।
  9. 2026 में भेदभाव की परिभाषा ज्यादा व्यापक है, जिसमें परोक्ष, अप्रत्यक्ष और संरचनात्मक भेदभाव भी शामिल हैं, जबकि 2012 में मुख्य रूप से प्रत्यक्ष भेदभाव पर फोकस था।
  10. 2026 में झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के खिलाफ कोई स्पष्ट दंड या सुरक्षा प्रावधान नहीं है (ड्राफ्ट से हटाया गया), जबकि 2012 में कम से कम ऐसा कोई विवादास्पद मुद्दा नहीं था।

पढ़ें- 2012 के नियम

ये अंतर 2012 नियमों को सभी छात्रों के लिए ज्यादा समावेशी और कम सख्त बनाते हैं, जबकि 2026 नियम संरक्षित वर्गों पर ज्यादा फोकस करते हैं लेकिन दुरुपयोग की आशंका भी बढ़ाते हैं।

बता दें कि साल 2026 नियम के रोहित वेमुला (2016) और पायल तडवी (2019) की आत्महत्या के बाद बने। इन मामलों में जातिगत भेदभाव के आरोप लगे थे। 2019 में दाखिल PIL में 2012 नियमों के कमजोर कार्यान्वयन पर सवाल उठे। 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने UGC को नए नियम जल्द अधिसूचित करने का निर्देश दिया था। 13 जनवरी 2026 को नियम नोटिफाई हुए।

नियमों के खिलाफ देशभर में विरोध हुआ। सामान्य वर्ग के लोग इसे सवर्णों के खिलाफ मान रहे थे। आरोप था कि अस्पष्ट परिभाषाएँ झूठी शिकायतों को बढ़ावा देंगी और अकादमिक स्वतंत्रता प्रभावित होगी।