भारत में जब भी कोई बड़ा संकट आता है चाहे पहाड़ धंस जाएँ, नदियाँ उफनाएँ, चक्रवात तांडव मचाएँ या जातीय हिंसा से पूरा क्षेत्र अशांत हो जाए, सबसे पहला फोन भारतीय सेना के पास जाता है। यह कोई संयोग नहीं है, न ही कोई पुरानी आदत। यह एक मजबूत, विश्वसनीय और तेज प्रतिक्रिया वाली संस्था की पहचान है। भारतीय सेना की गतिशीलता, इंजीनियरिंग कौशल, चिकित्सा सुविधाएँ, लॉजिस्टिक्स व्यवस्था और अनुशासित कमांड स्ट्रक्चर ने इसे देश का ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ बना दिया है।
पिछले कई दशकों से यह पैटर्न दोहराया जा रहा है। प्राकृतिक आपदाओं से लेकर आंतरिक सुरक्षा के संकट तक, सेना हमेशा सबसे आगे खड़ी मिलती है। रक्षा मंत्रालय की रिपोर्टों से लेकर जमीनी हकीकत तक, हर जगह यही तस्वीर उभरती है कि जब सिविल प्रशासन की क्षमता कम पड़ जाती है, तो सेना ही वह मजबूत कंधा बनती है जिस पर पूरा राज्य टिकता है।
सेना की संकटमोचक भूमिका को समझना जरूरी
भारतीय सेना की ‘एड टू सिविल अथॉरिटी’ की भूमिका नई नहीं है। आजादी के बाद से ही सेना को आपात स्थितियों में सिविल प्रशासन की मदद के लिए बुलाया जाता रहा है। 2001 का गुजरात भूकंप इसका बड़ा उदाहरण है, जहाँ सेना ने हजारों लोगों को मलबे से निकाला और राहत सामग्री पहुँचाई। लेकिन पिछले दो दशकों में यह भूमिका और ज्यादा स्पष्ट और संस्थागत हो गई है।
साल 2004 के हिंद महासागर सुनामी के बाद भारत ने अपनी HADR (ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिसास्टर रिलीफ) क्षमताओं को मजबूत किया। फिर 2013 की उत्तराखंड आपदा ने इसे नया आयाम दिया। उसके बाद से हर साल सेना की यह भूमिका बढ़ती गई। आज सेना न सिर्फ देश के अंदर बल्कि पड़ोसी देशों में भी फर्स्ट रिस्पॉन्डर के रूप में उभर रही है नेपाल भूकंप, श्रीलंका चक्रवात, तुर्की भूकंप, थाईलैंड भूकंप जैसी घटनाओं में भारत की मदद सबसे पहले पहुँची।
यह बदलाव इसलिए हुआ क्योंकि सेना की ट्रेनिंग और संरचना ही ऐसी है कि वह सबसे कठिन परिस्थितियों में भी काम कर सकती है। जहाँ सिविल एजेंसियाँ बुनियादी ढाँचे पर निर्भर रहती हैं, वहीं सेना अपने साथ सब कुछ लेकर आती है खाना, दवा, संचार, इंजीनियरिंग उपकरण और अनुशासन।
सेना की पहुँच को बताने वाले आँकड़े
रक्षा मंत्रालय की 2025 की सालाना समीक्षा के अनुसार, अकेले 2025 में भारतीय सेना ने 10 राज्यों के 80 से ज्यादा स्थानों पर 141 कॉलम तैनात किए। इनमें विशेष इंजीनियर टास्क फोर्स भी शामिल थीं। इन अभियानों में 28,000 से अधिक लोगों को बचाया गया, 7,000 से ज्यादा को चिकित्सा सहायता दी गई और हजारों प्रभावितों तक राहत सामग्री पहुँचाई गई।
साल 2024 में भी यही पैटर्न था। पूरे साल में 83 से ज्यादा डिसास्टर रिलीफ टीमें 14 राज्यों में तैनात की गईं, जिन्होंने 30,000 से अधिक नागरिकों को बचाया और लाखों को राहत दी। पिछले दस सालों में यह संख्या हर साल औसतन 100 कॉलम से ऊपर रही है। ये कॉलम बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन, चक्रवात और आंतरिक अशांति के लिए तैनात किए जाते हैं।
ये आँकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं। ये एक ऐसी व्यवस्था की कहानी कहते हैं जो पहले से तैयार रहती है। सेना की टुकड़ियाँ उन इलाकों में पहले से तैनात रहती हैं जहाँ आपदाएँ सबसे ज्यादा आती हैं- हिमालय, पूर्वोत्तर, तटीय क्षेत्र। जब राज्य सरकार रिक्विजिशन भेजती है, तो घंटों में कॉलम निकल पड़ते हैं।
वायनाड भूस्खलन 2024: सबसे ताजा और मार्मिक उदाहरण
30 जुलाई 2024 को केरल के वायनाड में आए भयानक भूस्खलन ने सैकड़ों जिंदगियाँ छीन लीं। गाँव मलबे में दफन हो गए, सड़कें-पुल बह गए, पूरा क्षेत्र अलग-थलग पड़ गया। राज्य सरकार ने तुरंत मदद माँगी और सेना सबसे पहले पहुँची।
कुछ ही घंटों में दो फ्लड रिलीफ कॉलम कन्नूर से रवाना हो गए। फिर 6 बड़े HADR कॉलम तैनात किए गए, जिसमें लगभग 500 जवान, मेडिकल टीमें, स्निफर डॉग्स और भारी उपकरण शामिल थे। सेना ने करीब 1,000 लोगों को मलबे से जिंदा निकाला, प्राथमिक उपचार दिया और सुरक्षित जगहों पर पहुँचाया। दर्जनों शवों को सम्मान के साथ बरामद किया गया।
सबसे बड़ी चुनौती थी पहुँच। नदियाँ उफन रही थीं, पुल टूट चुके थे। मद्रास इंजीनियर ग्रुप ने 190 फीट लंबा क्लास-24 बेली ब्रिज बनाया, जो मुंडक्कई को बाहर की दुनिया से जोड़ता है। एक अस्थायी पैदल पुल तो रातोंरात तैयार हो गया। हेलिकॉप्टरों से भारी मशीनें नदियों के उस पार पहुँचाई गईं।
सेना ने कोझिकोड में कमांड-कंट्रोल सेंटर स्थापित किया। नौसेना, वायुसेना, कोस्ट गार्ड, एनडीआरएफ और राज्य पुलिस के साथ मिलकर 1,500 से ज्यादा रेस्क्यू वर्कर्स ने काम किया। लेकिन शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण घंटों में सेना ही थी जिसने स्थिति को संभाला।
सिक्किम फ्लैश फ्लड 2023, ऊँचाई पर चुनौतीपूर्ण अभियान
अक्टूबर 2023 में सिक्किम में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड ने तबाही मचाई। तीस्ता नदी उफनाई, पुल बह गए, 23 सैनिक लापता हो गए। सेना ने तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। एनडीआरएफ के साथ मिलकर हजारों पर्यटकों और स्थानीय लोगों को बचाया गया।
सेना के जवान खुद प्रभावित थे, फिर भी उन्होंने रिलीफ कैंप लगाए, राहत सामग्री पहुँचाई और सड़कें बहाल कीं। यह दिखाता है कि सेना कितनी कठिन परिस्थितियों में भी काम करती है।
उत्तराखंड आपदा 2013 में ऑपरेशन सूर्य होप
जून 2013 की उत्तराखंड बाढ़ को कौन भूल सकता है? केदारनाथ सहित पूरा क्षेत्र तबाह हो गया। हजारों तीर्थयात्री फँस गए। सेना ने ऑपरेशन सूर्य होप शुरू किया। 2,223 सॉर्टीज उड़ान भरीं, 1,700 टन राहत सामग्री पहुँचाई गई। 10,000 कंबल, दवाइयाँ, खाना… सब कुछ सेना ने पहुँचाया।
लाखों लोगों को बचाया गया। यह ऑपरेशन दुनिया भर में सराहा गया और इसने सेना की HADR भूमिका को नई ऊँचाई दी।
असम की बाढ़ में हर साल संघर्ष
असम में हर साल बाढ़ आती है। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियाँ लाखों लोगों को प्रभावित करती हैं। सेना हर साल दर्जनों कॉलम तैनात करती है। बोट्स, हेलिकॉप्टर, मेडिकल टीमें सब कुछ सेना तैनात करती है। साल 2025 में भी असम को बाढ़ राहत के लिए बड़ी राशि दी गई और सेना ने मुख्य भूमिका निभाई।
सेना की संस्थागत ताकत का कोई अन्य विकल्प नहीं
सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज के ADG मेजर जनरल RPS भदौरिया (VSM-रि) ने कहा कि सेना की सबसे बड़ी ताकत उसकी सेल्फ-कंटेन्ड यूनिट्स हैं। हर कॉलम में कम्युनिकेशन, लॉजिस्टिक्स, इंजीनियर्स और मेडिकल टीम होती है। कॉम्बैट इंजीनियर्स बेली ब्रिज, अस्थायी रोड सब बना सकते हैं। मेडिकल टीमें फील्ड हॉस्पिटल लगा सकती हैं।
लॉजिस्टिक्स इतनी मजबूत है कि हवाई, सड़क, नदी हर रास्ते से सामग्री पहुँचाई जा सकती है। कमांड स्ट्रक्चर साफ है- मिशन टाइप ऑर्डर्स दिए जाते हैं और जवान बिना देरी के अमल करते हैं।
संकटमोचक भूमिका की हमेशा तैयारी करती रहती है सेना
सेना की यह क्षमता रिहर्सल से आती है। 2024 में गुजरात में संयुक्त विमोचन अभ्यास हुआ। चक्रवात की कल्पना की गई, सभी एजेंसियों ने मिलकर प्लान परखे। स्वदेशी तकनीक भी दिखाई गई। ऐसे अभ्यास से इंटर-एजेंसी फ्रिक्शन कम होता है।
सिविलियन क्षमता को बढ़ाना जरूरी
यह निर्भरता एक चेतावनी भी है। सेना की मुख्य जिम्मेदारी देश की रक्षा है। सेना को हर प्रशासनिक कमी या संरचनात्मक कमजोरी के लिए यूनिवर्सल फायर ब्रिगेड नहीं बनने दिया जा सकता। हर संकट में उसे बुलाना उसकी युद्ध तैयारी को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सिविलियन क्षमताएँ मजबूत करनी होंगी, जिसमें एनडीआरएफ को और बड़ा करना, राज्य फोर्स को बेहतर उपकरण, इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना शामिल है।
सेना का फर्स्ट रिस्पॉन्डर होना गर्व की बात
भारतीय सेना का फर्स्ट रिस्पॉन्डर बनना देश के लिए गर्व की बात है। यह नागरिकों को भरोसा देता है कि सबसे बुरे समय में भी कोई है जो आएगा। अब जरूरत है कि इस भरोसे को एक मजबूत सिविलियन इकोसिस्टम से पूरा किया जाए, ताकि सेना अपनी मुख्य जिम्मेदारी पर फोकस कर सके और जरूरत पड़ने पर फिर सबसे पहले पहुँचे।
सही तरीके से इस्तेमाल की जाए तो सेना की फर्स्ट रिस्पॉन्डर की भूमिका एक राष्ट्रीय संपत्ति है। यह नागरिकों को आश्वासन देती है कि जब आपदा आएगी, तो राज्य अपनी सबसे सक्षम संस्था को उनकी रक्षा के लिए सबसे पहले भेजेगा। अब चुनौती यह है कि इस आश्वासन के साथ एक व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र तैयार किया जाए जो उन वर्दीधारी जवानों के योग्य हो जो बार-बार सबसे पहला फोन उठाते हैं और सबसे पहले पहुँचते हैं।


