जब परिधि में खड़े देश केंद्र की भाषा बोलने लगते हैं, तभी वैश्विक शक्ति संतुलन बदलता है। 2026 वही वर्ष है, क्योंकि 1 जनवरी से भारत ब्रिक्स (BRICS) की अध्यक्षता सँभालने जा रहा है।
औपचारिक रूप से यह दायित्व एक वर्ष- यानी 31 दिसंबर 2026 तक भारत के पास रहेगा। लेकिन इसे केवल कैलेंडर आधारित जिम्मेदारी समझना भारी भूल होगी। भारत की यह अध्यक्षता कोई रूटीन कूटनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सभ्यतागत और भू-राजनीतिक नेतृत्व परिवर्तन है। यह दायित्व भारत को उस समय मिल रहा है, जब वह वैश्विक शक्ति संतुलन के खेल में मूकदर्शक नहीं, बल्कि नियम लिखने की स्थिति में खड़ा है।
वह समय बीत चुका है जब पश्चिमी मीडिया ‘ढीला-ढाला क्लब’ कहकर ब्रिक्स का उपहास करता था। अब वह केवल ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका तक सीमित नहीं है। सऊदी अरब, यूएई, ईरान और मिस्र जैसे देशों के प्रवेश ने इसे पेट्रो-डॉलर व्यवस्था के वास्तविक विकल्प के रूप में खड़ा कर दिया है। इस समूह ने 2024 में दुनिया का लगभग 42 प्रतिशत तेल का उत्पादन किया है।
आज वैश्विक GDP में ब्रिक्स का लगभग 40 प्रतिशत योगदान है, जो पश्चिम के कथित एलीट क्लब G-7 से काफी अधिक है। यह समूह दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी का घर है। ऊर्जा, कच्चा माल, मैन्युफैक्चरिंग और उपभोक्ता बाजार- चार मोर्चों पर निर्णायक भूमिका निभा रहा है। ब्रिक्स देशों के पास दुनिया का 20 प्रतिशत स्वर्ण भंडार है।
भारत: ध्रुवों के बीच की धुरी
इस ऐतिहासिक मोड़ पर ब्रिक्स का नेतृत्व सँभालने जा रहा भारत किसी एक धड़े का प्रतिनिधि नहीं है। यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। वह रूस का भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार है। अमेरिका के साथ उसके गहरे आर्थिक और तकनीकी संबंध हैं। वह चीन का प्रतिस्पर्धी भी है और उसे उसकी औकात में रखने की ताकत भी। सबसे बढ़कर भारत आज ग्लोबल साउथ की स्वाभाविक आवाज है।
यानी, भारत ध्रुवों के बीच की धुरी है। यह भूमिका न रूस निभा सकता है, न चीन। यह केवल भारत ही कर सकता है और यही पश्चिम की सबसे बड़ी चिंता है। भारत ब्रिक्स को जो वैचारिक संतुलन दे रहा है, उससे आने वाले समय में संभव है कि पश्चिम का नैरेटिव सुनने वाला कोई बचे ही नहीं।
लंबे समय तक पश्चिम भारत को एक ‘सॉफ्ट स्टेट’ के रूप में देखता रहा। निर्धन, अव्यवस्थित और वैश्विक सहायता पर निर्भर देश के तौर पर। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते एक दशक में भारत ने इस भ्रम को पूरी तरह चकनाचूर कर दिया है।
आज का भारत आत्मनिर्भर है। उसके पास विश्व-स्तरीय डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर है। वैक्सीन डिप्लोमेसी के जरिए उसने वैश्विक भरोसा अर्जित किया है। G20 में उसने ग्लोबल साउथ को केंद्र में रखा और अब वही दृष्टि BRICS तक पहुँच रही है।
यह वस्तुतः भारतीय राष्ट्रवाद का वैश्विक विस्तार है। अब भारत का राष्ट्रवाद सीमाओं में कैद नहीं। यह सभ्यतागत नेतृत्व का दावा है।
पश्चिमी प्रभुत्व पर सबसे बड़ा प्रहार
यह केवल भारत की कहानी नहीं है। विश्व व्यवस्था के केंद्र से बाहर खड़े देश अब सवाल पूछ रहे हैं- हमारी नीतियाँ वॉशिंगटन क्यों तय करे? हमारी संस्कृति पिछड़ी क्यों कहलाए? हमारी संप्रभुता IMF की फाइलों में क्यों कैद रहे?
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत इन प्रश्नों का उत्तर बनकर खड़ा है- बिना झुके, बिना पश्चिमी प्रमाण पत्र माँगे।
पश्चिम यह जानता है कि भारत के बिना ब्रिक्स न तो विस्तार पा सकता है, न विश्वसनीयता। चीन की वैश्विक छवि आक्रामक है। बेल्ट रोड इनिशिएटिव (BRI) के जरिए उस पर कर्ज जाल में कई देशों को फँसाने के आरोप हैं। दक्षिण एशिया और इंडो-पैसिफिक में उसे संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।
भारत इसके उलट है। उस पर ट्रस्ट डेफिसिट नहीं है। यही कारण है कि चीन भी जानता है कि यदि ब्रिक्स को पश्चिम के समकक्ष एक नैतिक और राजनीतिक विकल्प बनाना है, तो भारत के साथ चलना उसकी मजबूरी है, कृपा नहीं।
डॉलर की अनिवार्यता टूट रही है
पश्चिम को किसी सेना से सबसे अधिक डर नहीं लगता। उसे डर लगता है डॉलर के विकल्प से। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान तंत्र और ऊर्जा लेन-देन में डॉलर से दूरी- ये सभी उस व्यवस्था को कमजोर कर रहे हैं, जिस पर अमेरिकी शक्ति टिकी है।
याद रखिए, अमेरिका की ताकत उसकी सेना से नहीं, डॉलर की अनिवार्यता से आती है। भारत के नेतृत्व में BRICS उसी अनिवार्यता को खत्म करने की प्रक्रिया को गति देगा। इसी साल अगस्त में भारत ने अमेरिकी डॉलर (USD) के प्रभुत्व को चुनौती देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए एक आधिकारिक परिपत्र जारी किया है, जिसके तहत ब्रिक्स देशों को अपना 100% व्यापार भारतीय रुपए में करने की अनुमति दी गई है।
पश्चिम दशकों से दुनिया को तीन हिस्सों में बाँटकर देखता रहा- उपभोक्ता, कच्चा माल और संयुक्त राष्ट्र में वोट बैंक। लेकिन BRICS देशों ने इस भूमिका से बाहर निकलने का निर्णय कर लिया है। इसका विस्तार इसी विद्रोह की पहली संगठित अभिव्यक्ति है। यह कोई ‘एंटी-वेस्ट क्लब’ नहीं, बल्कि ‘पोस्ट वेस्ट वर्ल्ड’ का घोषणा पत्र है।
2026: केवल भारत की BRICS अध्यक्षता ही नहीं, दिशा-निर्धारण का भी वर्ष
2026 केवल भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का वर्ष नहीं है। यह वह समय है जब अमेरिका आंतरिक ध्रुवीकरण से जूझ रहा होगा, यूरोप ऊर्जा और जनसांख्यिकीय संकट में होगा और ग्लोबल साउथ पश्चिमी मॉडल पर निर्णायक प्रश्न खड़े कर चुका होगा।
इस पृष्ठभूमि में यदि भारत ब्रिक्स को विकास, संप्रभुता और बहुध्रुवीयता के साझा मंच के रूप में स्थापित करता है, तो अमेरिका की ‘हम ही नियम बनाएँगे’ वाली मोनोपॉली स्वतः कमजोर होगी। यह अमेरिका-विरोध नहीं, बल्कि अमेरिका-केंद्रित विश्व व्यवस्था के अंत की प्रक्रिया है।
आज भारत न सफाई देता है, न प्रमाण पत्र माँगता है, न उधार के नैरेटिव पर निर्भर है। BRICS की अध्यक्षता भारत को यह अवसर देगी कि वह विकासशील देशों को बताए- आधुनिकता का रास्ता पश्चिम की नकल नहीं, अपनी शर्तों पर आगे बढ़ना है।
भारत अब उभरती शक्ति नहीं, निर्धारक शक्ति बनने की ओर
2026 में भारत ब्रिक्स का अध्यक्ष होगा, लेकिन असल प्रश्न यह नहीं है कि वह कितने सम्मेलन कराएगा। असल प्रश्न यह है कि- क्या भारत वैश्विक विमर्श को दिशा देगा? क्या वह डॉलर के विकल्पों को वैधता देगा? क्या वह चीन की आक्रामकता और पश्चिम के दंभ- दोनों के बीच संतुलन बना पाएगा?
उत्तर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का वैश्विक उभार देता है। यह बताता है कि अब वह उभरती शक्ति नहीं, निर्धारक शक्ति बनने की ओर है। यही तथ्य दुनिया के पुराने प्रभुओं को असहज कर रहा है।
2026 के बाद सवाल यह नहीं रहेगा कि पश्चिम गिरेगा या नहीं। सवाल यह होगा- वह इस गिरावट को कितनी गरिमा से स्वीकार करता है? क्योंकि भारत इतिहास के उस मोड़ पर खड़ा है, जहाँ राष्ट्रवाद पहली बार मानवता के साथ खड़ा दिखाई देता है। यही भारत का उभार है। यही BRICS का अर्थ है।
वाम-लिबरल विमर्श से गढ़े गए पश्चिमी प्रभुत्व के नैरेटिव को भले यह सत्य असहज लगे, पर 2026 का सत्य यही है।
भारत हमेशा से धार्मिक चर्चाओं का देश रहा है और ‘ईश्वर के अस्तित्व’ जैसे विषय पर एक हाई-प्रोफाइल बहस लोगों को आकर्षित करने का सबसे मारक हथियार मानी जा सकती है। बीते 20 दिसंबर 2025 को गीतकार, लेखक और घोषित ‘इस्लामिक नास्तिक’ जावेद अख्तर ने इस्लामी विद्वान मुफ्ती शमाइल नदवी के साथ एक लाइव चर्चा में हिस्सा लिया, जिसका शीर्षक था ‘क्या ईश्वर का अस्तित्व है?’। करीब 2 घंटे की इस डिबेट के मॉडरेटर ‘द लल्लनटॉप’ के एडिटर सौरभ द्विवेदी थे।
इस बहस ने नदवी को स्पॉटलाइट में ला दिया। उनके समर्थकों ने सोशल मीडिया पर उनके रील्स खूब शेयर किए और दावा किया कि जावेद अख्तर को नदवी ने हरा दिया है। जैसा कि प्रोपेगेंडा होता है, यह भी दावा किया जाना लगा कि इस बहस के बाद लोग इस्लाम की और आने लगे हैं। हालाँकि, प्रोपेगेंडा ज्यादा देर तक टिकता नहीं है और ऐसा ही नदवी के साथ भी हुआ। सोशल मीडिया पर नदवी के पुराने वीडियो शेयर होने लगे। इन वीडियो में नदवी किसी इस्लामी कट्टरपंथी की तरह भाषण देते दिखे और सोशल मीडिया पर लोगों ने उन्हें ‘अगला जाकिर नाईक’ तक बता दिया।
कौन हैं शमाइल नदवी?
नदवी की बहस और वायरल वीडियो पर चर्चा से पहले जानते हैं कि शमाइल नदवी का बैकग्राउंड क्या है। मुफ्ती शमाइल नदवी का पूरा नाम शमाइल अहमद अब्दुल्ला है। उनका जन्म जून 1998 में पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में हुआ। उनकी शुरुआती तालीम कोलकाता में ही हुई, जहाँ अपने अब्बू की सरपरस्ती और रहनुमाई में उन्होंने इस्लामी उलूम की बुनियादी शिक्षा हासिल की।
कोलकाता में कुरआन की शुरुआती तालीम पूरी करने के बाद शमाइल ने 2014 में उत्तर प्रदेश के लखनऊ स्थित प्रसिद्ध इस्लामी शिक्षण संस्था दारुल उलूम नदवतुल उलेमा में दाखिला लिया। यहाँ से उन्होंने मुफ्ती की डिग्री हासिल की। इस दौरान उन्होंने कुरआन, हदीस और फिक्ह यानी इस्लामी कानून जैसे विषयों की पढ़ाई की थी।
दारुल उलूम नदवतुल उलेमा से तालीम हासिल करने के कारण शमाइल अब्दुल्ला ने अपने नाम के साथ नदवी उपनाम जोड़ा। नदवा से पढ़ने वाले छात्रों के लिए अपने नाम के साथ नदवी लिखना एक परंपरागत पहचान मानी जाती है।
नदवा से इस्लामी शरीयत की उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद शमाइल नदवी ने आगे की तालीम के लिए मलेशिया का रुख किया। वे वर्तमान में वहाँ इस्लामी शिक्षा के विषय में पीएचडी कर रहे हैं। मलेशिया वही देश है जहाँ भगोड़ा इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाईक रह रहा है।
शमाइल नदवी मरकज-अल-वहयैन नामक एक ऑनलाइन शैक्षिक संस्थान के संस्थापक और प्रधानाचार्य हैं। इसके अलावा वर्ष 2024 में उन्होंने वाहियान फाउंडेशन नाम से एक धार्मिक ट्रस्ट की स्थापना की। उनके ट्रस्ट द्वारा अरबी भाषा और बुनियादी इस्लामी शिक्षा जैसे कुरआन, हदीस और फिक्ह की ऑफलाइन पढ़ाई भी कराई जाती है।
क्यों शमाइल नदवी की जाकिर नाईक से हो रही तुलना?
शमाइल नदवी के बहस के वीडियो तो खूब वायरल हुए ही, साथ ही उनके कुछ पुराने वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आए। इन पुरानी वीडियो में इस्लाम के कट्टरपंथी रुख को लेकर नदवी के विचार खूब वायरल है और इन्हीं के कारण उनकी तुलना सोशल मीडिया पर जाकिर नाईक के साथ की जा रही है।
सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में शमाइल नदवी देश को सबसे ऊपर रखने और सेक्युलर व्यवस्था के खिलाफ इस्लामी लोगों को भड़का रहे हैं। मेजर सुरेंद्र पूनिया ने X पर यह वीडियो शेयर किया है। पूनिया ने लिखा, “भारत का नया जाकिर नाईक, यह भी कह रहा है कानून संविधान कुछ नहीं…शरीयत ही सब कुछ है। एक दिन यह भी देश छोड़ कर भाग जाएगा।”
इस वीडियो में शमाइल नदवी कह रहे हैं, “अगर हम चाहते हैं कि हमारे मौजूदा हालात सही हो जाएँ तो हालात का हल किसी सियासी पार्टी के पास नहीं है। हालात का हल दीन (इस्लाम) में है। इस मुल्क में हमारा अप्रोच गलत रहा। हम ये कहते फिरते रहे कि हमारा वतन, हमारे दीन से ज्यादा मुकद्दस (पाक-पवित्र) है। हमने ये एहतराफ किया कि सेक्युलर निजाम (व्यवस्था-शासन), हमारे निजाम से ज्यादा मुकद्दस है।”
नदवी आगे कहते हैं, “हम कुफ्रिया अल्फाज कहते रहे। हम ऐसे जुमले अपनी जुबान से निकालते रहे कि फलाँ दरबार से जो फैसला हो जाएगा, हम खामोशी से तस्लीम कर लेंगे। क्या फलाँ दरबार अगर शरीयत के खिलाफ हुक्म दे, क्या तुम तस्लीम करोगे? किसी भी मुस्लिम मर्द या औरत के लिए यह जायज नहीं है कि अगर अल्लाह ने किसी मामले में फैसला कर दिया तो अब अल्लाह को छोड़कर गैर-अल्लाह को हुक्म बनाएँ।”
New Zakir Naik of India यह भी कह रहा है कानून सविंधान कुछ नहीं …शरीयत ही सब कुछ है एक दिन यह भी देश छोड़ कर भाग जायेगा pic.twitter.com/zMOOtephJf
इस वीडियो को मोटे तौर पर समझें तो नदवी दरअसल ये बता रहे हैं कि हर समस्या का हल इस्लाम के भीतर है और किसी भी मुस्लिम को खुद को सेक्युलर या देश को मजहब से पहले रखने की जरूरत नहीं है। साथ ही वो शरीयत को किसी भी फैसले से ऊपर बता रहे हैं। यहाँ उन्होंने सीधे तौर पर नाम नहीं लिया लेकिन सोशल मीडिया पर लोग दावा कर रहे हैं कि असल में वो अदालतों या किसी संस्था के फैसला को शरीयत की कसौटी पर कसने और अगर फैसला शरीयत के हिसाब से ना हो तो उसका विरोध करने के लिए कह रहे हैं।
इस्लाम में हराम है म्यूजिक: नदवी
नदवी के ऐसे वीडियो की भरमार है। जिसमें वो इस्लामिक कायदों की जानकारी दे रहे हैं। एक वीडियो में उन्होंने म्यूजिक सुनने को हराम बताया है। इस वीडियो में वह कह रहे हैं, “जिस नशीद में हल्का-हल्का म्यूजिक आता है उसे सुनना जायज है क्या? वह कहते हैं कि म्यूजिक तेज हो या हल्का हो इससे फर्क नहीं पड़ता है। जो चीज शरीयत में हराम है, वो हराम है। म्यूजिक को सुनना जायज नहीं है, चाहे वो म्यूजिक किसी भी चीज में इस्तेमाल किया जाए।”
You are an RJ. Your job fundamentally revolves around music. Curating playlists, introducing songs, setting the mood, and shaping listeners’ musical taste.
This Maulana is branding your entire profession as haram. I hope you respond firmly with a befitting… pic.twitter.com/PP0h2d9ecO
‘भगवा लव ट्रैप’ से लेकर ‘इस्लाम ही इकलौता सच’ तक का प्रोपेगेंडा
शमाइल नदवी ने कथित ‘भगवा लव ट्रैप’ को लेकर भी प्रोपेगेंडा फैलाया था और उसके वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। यह लव जिहाद के खिलाफ इस्लामी कट्टरपंथियों का प्रोपेगेंडा का एक प्रयास था। वायरल वीडियो में नदवी कह रहे हैं, “तुम अपनी मुस्लिम औरतों को मुशरिकीन (मूर्तिपूजक या अल्लाह के अलावा किसी और को मानने वाले) के निकाह में ना दो। एक गुलाम मुस्लिम वो मुशरिक से बेहतर है अगर वो मुशरिक तुम्हें पसंद ही क्यों ना आ रहा हो।”
शमाइल नदवी ने इस वीडियो में मुस्लिम लड़कियों को यह कहकर भी भड़काने की कोशिश की कि मुशरिकीन से निकाह जायज नहीं है और यह जहन्नम यानी नर्क का रास्ता है।
— Mufti Shamail Nadwi (@muftishamail) May 28, 2023
एक अन्य वायरल वीडियो में सिर्फ इस्लाम को सच्चा बताते हुए नजर आ रहे हैं। सर्वधर्म समभाव की भारतीय अवधारणा से इतर मुफ्ती कह रहे हैं, “ये जो दीन-ए-इस्लाम है, ये वाहिद वो दीन है। जो बरहक (‘सच्चा’) है और इसके अलावा जो भी नजरिया है दुनिया में वो सब बातिल (असत्य-झूठ) हैं। उन्होंने आगे कहा, “कोई भी शख्स तब तक कामयाब नहीं हो सकता है, जब तक वो दीन-ए-इस्लाम में दाखिल ना हो। इस बात को दिमाग में बैठा लें।”
देखिये कैसे हिन्दू ईसाई बौद्ध नास्तिक के खिलाफ जहर उगल रहा है ये नींच / आतंकवादी
नदवी एक वीडियो में नमस्ते कहने को भी नाजायज बता रहे हैं। नदवी ने कहा कि नमस्ते संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ‘मैं आपके सामने झुकता हूँ’ और एक मुसलमान अल्लाह के अलावा किसी का आगे नहीं झुकता है। वो कहते हैं कि यह शब्द कहना जायज नहीं है। एक अन्य वीडियो में वो हिजाब को लेकर कह रहे हैं कि मुस्लिम महिलाओं को लिए पूरे शरीर को ढँकना जरूरी है। उन्होंने साफ कहा कि हिजाब कोई विकल्प नहीं है बल्कि इसे पहनना जरूरी है।
शमाइल नदवी की छवि शुरू में एक पढ़े-लिखे, तार्किक इस्लामी विद्वान की बनाई गई लेकिन उनके पुराने और लगातार सामने आ रहे बयानों ने इस छवि की परतें खोल दीं। जिन वीडियो में वे संविधान, सेक्युलर व्यवस्था और न्यायिक फैसलों को शरीयत के अधीन मानने की बात करते हैं, वे सीधे-सीधे लोकतांत्रिक ढाँचे को नकारने की सोच को दर्शाते हैं। किसी भी देश में कानून से ऊपर किसी धार्मिक व्यवस्था को रखने की वकालत अपने आप में कट्टरपंथ का स्पष्ट संकेत है।
नदवी का यह कहना कि देश या संविधान को दीन से ऊपर रखना ‘गलत अप्रोच’ है, यह बताता है कि वे नागरिक पहचान से पहले धार्मिक पहचान थोपना चाहते हैं। यही सोच आगे चलकर सामाजिक विभाजन और टकराव की जमीन तैयार करती है। म्यूजिक को हराम बताना, नमस्ते जैसे सामान्य अभिवादन को नाजायज कहना, या यह दावा करना कि इस्लाम के अलावा सभी धर्म ‘बातिल’ हैं, ये बयान केवल आस्था नहीं बल्कि सांस्कृतिक असहिष्णुता को बढ़ावा देते हैं।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के 100 साल पूरे होने पर इसके नेता और समर्थक जश्न और पुरानी यादों के साथ इस मौके को मना रहे हैं। हालाँकि, सौ साल का सफर सिर्फ यादें ताजा करने के लिए नहीं होता, बल्कि यह समय आत्म-मंथन और गंभीर मूल्यांकन का भी है। राजनीतिक आंदोलन केवल अपनी उम्र से प्रासंगिक नहीं बनते, बल्कि वे अपने परिणामों (कामयाबियों) से अपनी अहमियत साबित करते हैं।
पिछली एक सदी में, भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन ने खुद को गरीबों, मजदूरों और किसानों की आवाज के रूप में पेश किया है। इसने हमेशा यह दावा किया कि वह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक लंबी अवधि का समाधान है और नैतिक रूप से अन्य राजनीतिक परंपराओं से बेहतर है। हालाँकि, अपनी इस छवि के बावजूद, आज कम्युनिस्ट आंदोलन चुनावी रूप से सिमट गया है, विचारधारा के मामले में काफी सख्त (जड़) हो गया है और भारत की सामाजिक व आर्थिक सच्चाइयों से पूरी तरह कटता जा रहा है।
इससे एक ऐसा अनिवार्य सवाल खड़ा होता है जिसे महज नारों या अतीत की पुरानी यादों के सहारे टाला नहीं जा सकता:
क्या भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन ने वाकई भारत की सेवा की, या फिर इसने देश के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचाया?
यह लेख इस सवाल का जवाब किसी खोखली बयानबाजी या वैचारिक भेदभाव के आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड, राजनीतिक व्यवहार और ठोस परिणामों के जरिए देने की कोशिश करता है। क्योंकि 100 साल बीत जाने के बाद, कोई भी विचारधारा न तो बिना सोचे-समझे सम्मान की हकदार है और न ही बिना सोचे-समझे तिरस्कार की, बल्कि वह एक ईमानदार ऑडिट (सच्चे मूल्यांकन) की हकदार है।
साम्यवाद का क्षेत्र: भारतीय नहीं, स्वदेशी कभी नहीं
कम्युनिज्म (Communism) का उदय भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक या आर्थिक हकीकत से नहीं हुआ था। यह एक यूरोपीय वैचारिक उत्पाद था, जो 19वीं सदी के यूरोप की खास परिस्थितियों में पैदा हुआ था। वे परिस्थितियाँ थीं- तेजी से होता औद्योगिकीकरण, फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर और पूंजीपतियों व औद्योगिक श्रमिकों के बीच गहरी वर्गीय खाई।
इस सिद्धांत को कार्ल मार्क्स ने विकसित किया था, जिन्होंने यूरोपीय पूंजीवाद का विश्लेषण किया, और बाद में इसे व्लादिमीर लेनिन ने अपनाया, जिन्होंने सत्ता हथियाने के लिए एक कड़े नियंत्रण वाले और ‘हरावल दस्ते’ (vanguard) के नेतृत्व वाली क्रांति की वकालत की थी।
इन दोनों विचारकों (मार्क्स और लेनिन) ने ऐसे समाजों में काम किया जो एक जैसे थे और जहाँ उद्योग मुख्य थे। वहाँ इंसान की असली पहचान उसकी आर्थिक स्थिति या ‘क्लास’ से होती थी। उनके काम करने का तरीका इन तीन बातों पर टिका था।
शोषक और शोषित की साफ पहचान: यानी समाज में एक पक्ष हमेशा जुल्म करने वाला और दूसरा जुल्म सहने वाला होता है।
न्याय के लिए हिंसा का रास्ता: यानी इंसाफ पाने के लिए पुरानी व्यवस्था को हिंसक तरीके से तोड़ना जरूरी है।
कड़ा सरकारी नियंत्रण: यानी गैर-बराबरी को खत्म करने के लिए सारी ताकत एक जगह (सरकार के हाथ में) रखना ही समाधान है।
लेकिन भारत की बनावट कभी ऐसी नहीं रही। भारतीय समाज हजारों साल पुरानी एक सभ्यता है, जो विविधताओं (अलग-अलग तरह के लोगों) से भरी हुई है। यहाँ समाज सिर्फ अमीर-गरीब (आर्थिक क्लास) से नहीं, बल्कि समुदायों, क्षेत्रों, धर्मों, भाषाओं और परंपराओं से बना है। इतिहास गवाह है कि भारत में सामाजिक बदलाव हमेशा सुधार आंदोलनों और आपसी तालमेल से आए हैं, न कि पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह तबाह करके।
भारत की इसी खूबी और कम्युनिस्ट विचारधारा के बीच मेल न होना ही वह कारण है, जिसकी वजह से कम्युनिज्म को यहाँ गहराई से नहीं अपनाया गया। एक ऐसी विचारधारा जो केवल ‘दो पक्षों’ (शोषक और शोषित) की लड़ाई पर टिकी हो, वह उस सभ्यता में नहीं टिक सकती जो विविधता और सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखती है। भारतीय समाज लचीला और सबको साथ जोड़ने वाला है, जबकि कम्युनिज्म सख्त और बँटा हुआ है। यही विरोध भारत में कम्युनिज्म की असफलता की सबसे बड़ी वजह है।
देश से ऊपर विचारधारा: भारत छोड़ो आंदोलन और चीन युद्ध
नतीजे देने में फेल होने के साथ-साथ, भारतीय कम्युनिस्टों पर यह आरोप भी लगता है कि उन्होंने हमेशा देश के हित से ऊपर अपनी विचारधारा को रखा। इस विरोधाभास के दो बड़े उदाहरण गौर करने लायक हैं।
भारत छोड़ो आंदोलन (1942): जब CPI देश के साथ खड़ी नहीं हुई
अगस्त 1942 में, भारत ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा जन-आंदोलन देखा, जिसे ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ कहा गया। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में शुरू हुए इस आंदोलन में देश के हर कोने और हर समुदाय के लोग शामिल हुए थे। लेकिन ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ (CPI) ने इस आंदोलन का विरोध करने का फैसला किया।
CPI ने इस आंदोलन का साथ क्यों नहीं दिया? इसकी वजह जानकर आपको हैरानी हो सकती है। यह फैसला भारत के लिए नहीं, बल्कि उनकी विचारधारा से जुड़ा था। उस समय दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सोवियत संघ (रूस) पर जर्मनी ने हमला कर दिया था, जिसके बाद रूस ने ब्रिटेन के साथ हाथ मिला लिया। चूंकि ब्रिटेन अब रूस का साथी बन चुका था, इसलिए CPI ने इस युद्ध को फासीवाद के खिलाफ ‘जनता का युद्ध‘ (People’s War) घोषित कर दिया।
उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे अंग्रेजों के खिलाफ कोई रुकावट पैदा न करें और हड़ताल या विरोध प्रदर्शनों को रोकें। यहाँ तक कि कई मामलों में कम्युनिस्ट नेताओं ने ब्रिटिश सरकार का सहयोग भी किया। जब लाखों भारतीय अंग्रेजों की गोलियाँ खा रहे थे और जेल जा रहे थे, तब CPI हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। ऐसा इसलिए नहीं था कि भारत आजादी के लिए तैयार नहीं था, बल्कि इसलिए था क्योंकि उनकी प्राथमिकता भारत नहीं, बल्कि ‘मॉस्को’ (रूस) के हित थे।
1962 का चीन युद्ध: चुप्पी, उलझन और चीन के प्रति लगाव
ठीक 20 साल बाद 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान फिर से वही पुरानी बात दोहराई गई। जब चीनी सेना ने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सीमाओं को पार किया, तब पूरे देश को राजनीतिक एकता और स्पष्टता की उम्मीद थी। लेकिन इसके बजाय, कम्युनिस्ट आंदोलन के एक बड़े हिस्से ने चीन के प्रति हमदर्दी दिखाई और इस मामले पर गोल-मोल बात की। इसी विवाद की वजह से आगे चलकर CPI के दो टुकड़े हो गए और चीन का समर्थन करने वाले गुट ने अलग होकर ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)’ यानी CPM बना ली।
देशहित से अलग हटकर सोचना तो कम्युनिज्म की असफलता का सिर्फ एक हिस्सा था। इससे भी ज्यादा नुकसानदेह वह तरीका था, जिसमें कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ हिस्सों ने लोकतांत्रिक राजनीति का रास्ता ही छोड़ दिया और हथियारों के दम पर बगावत शुरू कर दी। 1960 के दशक के आखिर से, भारत में कम्युनिस्ट विचारधारा ने न केवल सरकार का विरोध किया, बल्कि उसके खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।
इसके बाद जो कुछ हुआ, वह मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई नहीं थी, बल्कि हिंसा का एक लंबा दौर था। इसमें हत्याएँ की गईं, नरसंहार हुए, सरकारी संपत्तियों को तबाह किया गया और आम जनता को डराया-धमकाया गया। इस हिंसा के शिकार कोई विदेशी शासक या बड़े पूंजीपति नहीं थे, बल्कि भारत के आम लोग थे। जनजातीय (आदिवासी), किसान, जनप्रतिनिधि, पुलिसकर्मी और दिहाड़ी मजदूर। भारतीय कम्युनिज्म की असली मानवीय कीमत को समझने के लिए नारों या किताबों को नहीं, बल्कि कम्युनिस्ट उग्रवाद द्वारा छोड़े गए खून के निशानों को देखना होगा।
भारत में कम्युनिस्ट उग्रवादियों द्वारा किए गए 10 सबसे बड़े नरसंहार
दंतेवाड़ा नरसंहार (2010), छत्तीसगढ़– 6 अप्रैल 2010 को, ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (नक्सली)’ के लड़ाकों ने छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में बहुत ही सोची-समझी साजिश के तहत हमला किया। इस हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के 76 जवान शहीद हो गए थे। उग्रवादियों ने पहले बारूदी सुरंगों (landmines) का इस्तेमाल किया और फिर ऑपरेशन से लौट रहे जवानों पर अँधाधुँध गोलियाँ बरसा दीं। आजादी के बाद भारतीय सुरक्षा बलों पर हुआ यह अब तक का सबसे बड़ा और भयानक हमला माना जाता है। इस घटना के बाद देश में ‘नक्सलवाद’ के खिलाफ लड़ने के तरीके में बड़ा बदलाव आया।
झीरम घाटी नरसंहार (2013), छत्तीसगढ़- 25 मई 2013 को, नक्सली उग्रवादियों ने बस्तर के झीरम घाटी इलाके में कॉन्ग्रेस पार्टी के काफिले पर हमला किया था। इस हमले में वरिष्ठ राजनेताओं समेत 27 लोगों की जान चली गई। नक्सलियों ने यह हमला उस समय किया जब नेता जनता के बीच जा रहे थे। इस घटना ने यह साफ कर दिया कि माओवादी चुनाव लड़ने या लोकतंत्र में भरोसा रखने के बजाय, जनता द्वारा चुने गए नेताओं को खत्म करने की रणनीति पर काम करते हैं। इस हमले की पूरी देश में निंदा हुई और इसे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा हमला माना गया।
नयागढ़ शस्त्रागार हमला (2008), ओडिशा- फरवरी 2008 में, नक्सली लड़ाकों ने ओडिशा के नयागढ़ में पुलिस के शस्त्रागार (जहाँ हथियार रखे जाते हैं) पर एक साथ मिलकर रात में हमला बोला। इस हमले में 15 पुलिसकर्मी मारे गए, भारी मात्रा में हथियार लूट लिए गए और सरकारी इमारतों को तबाह कर दिया गया। इस घटना ने दिखाया कि उग्रवादी कितने खतरनाक और बड़े हमले करने की ताकत रखते हैं। इस लूट के बाद उस इलाके में नक्सलियों के पास हथियारों की ताकत काफी बढ़ गई।
सुकमा हमला (2017), छत्तीसगढ़- 24 अप्रैल 2017 को, सुकमा जिले के चिंतालनार इलाके में नक्सलियों ने CRPF की एक टीम पर अचानक हमला कर दिया, जिसमें 25 जवान शहीद हो गए। उग्रवादियों ने इस हमले में देशी बमों (IED) और बहुत करीब से गोलीबारी का इस्तेमाल किया। उन्होंने वहाँ के मुश्किल रास्तों और खुफिया जानकारी के लीक होने का फायदा उठाया। इस घटना ने यह दिखाया कि सालों से चल रहे अभियानों के बावजूद, नक्सली उग्रवाद की ताकत अभी भी खत्म नहीं हुई है।
अरनपुर IED हमला (2023), छत्तीसगढ़- अप्रैल 2023 में, नक्सली उग्रवादियों ने दंतेवाड़ा के अरनपुर इलाके में एक प्रेशर IED (बारूदी सुरंग) में धमाका किया। इस हमले में ‘डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड’ (DRG) के 10 जवान और एक नागरिक ड्राइवर की जान चली गई। उग्रवादियों ने एक ऐसे वाहन को निशाना बनाया जो उग्रवाद विरोधी अभियान से लौट रहा था। यह घटना एक बार फिर नक्सलियों की उस रणनीति को दिखाती है, जिसमें वे सार्वजनिक सड़कों पर बिना सोचे-समझे बमों का इस्तेमाल करते हैं।
सेनारी गाँव नरसंहार (1999), बिहार- मार्च 1999 में, ‘माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर’ (MCC) ने बिहार के सेनारी गाँव में 34 आम लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। मरने वाले ज्यादातर लोग आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के थे। उग्रवादियों ने इन लोगों को कतार में खड़ा करके गोलियों से भून दिया था और इसे ‘अमीर-गरीब की लड़ाई’ (क्लास स्ट्रगल) बताकर सही ठहराया। इस घटना ने नक्सलियों के नारों और उनकी असलियत के बीच के अंतर को साफ कर दिया।
बारा नरसंहार (1992), बिहार- फरवरी 1992 में, नक्सली उग्रवादियों ने गया जिले के बारा गाँव पर हमला किया और 37 ग्रामीणों की जान ले ली। निहत्थे ग्रामीणों के खिलाफ वामपंथी चरमपंथी हिंसा की यह शुरुआती बड़ी घटनाओं में से एक थी। इसी घटना के बाद बिहार में हिंसा और बदले का एक लंबा दौर शुरू हुआ जिसने राज्य को अस्थिर कर दिया।
लातेहार पुलिस वैन ब्लास्ट (2016), झारखंड- जुलाई 2016 में, नक्सलियों ने झारखंड के लातेहार जिले में एक लैंडमाइन धमाका किया, जिसमें गश्ती वाहन में सवार आठ पुलिस अधिकारी शहीद हो गए। यह हमला ग्रामीण इलाकों में पुलिस और सरकारी व्यवस्था को कमजोर करने की उनकी सोची-समझी कोशिश का हिस्सा था।
सुकमा रोड-ओपनिंग पार्टी हमला (2018), छत्तीसगढ़- मार्च 2018 में, सुकमा जिले में नक्सलियों ने CRPF की उस टीम पर हमला किया जो सड़क निर्माण की सुरक्षा में लगी थी। इस हमले में नौ जवान शहीद हुए। उग्रवादियों ने विकास के कामों को रोकने के लिए जानबूझकर सुरक्षा बलों को निशाना बनाया, क्योंकि वे जनजातीय क्षेत्रों में सड़कों और बुनियादी ढाँचे के विस्तार के खिलाफ हैं।
गिरिडीह लैंडमाइन ब्लास्ट (2007), झारखंड- अक्टूबर 2007 में, नक्सलियों ने गिरिडीह जिले में एक आम नागरिक वाहन के नीचे लैंडमाइन धमाका किया, जिसमें 14 लोग मारे गए। इस घटना ने दिखाया कि नक्सली हिंसा कितनी अंधी है, जहाँ सरकार को निशाना बनाने के चक्कर में अक्सर आम नागरिक अपनी जान गँवा देते हैं।
निष्कर्ष: सौ साल, कोई सुधार नहीं
100 साल पूरे होने के बाद, भारतीय कम्युनिज्म का मूल्यांकन सिर्फ उनके इरादों, सिद्धांतों या भाषणों से नहीं किया जा सकता। इसका फैसला उनके रिकॉर्ड से होना चाहिए। वह रिकॉर्ड बताता है कि यह एक ऐसी विचारधारा है जो भारत के बाहर से आई, जिसने भारतीय समाज को कभी नहीं समझा, देश के हितों से ऊपर विदेशी ताकतों को रखा और देश से ऊपर हमेशा अपनी विचारधारा को चुना। जब चुनावों में उनकी ताकत कम हुई, तो इस आंदोलन के कुछ हिस्सों ने लोकतंत्र का रास्ता छोड़ दिया और हिंसा अपना ली। पीछे रह गए हजारों मृत नागरिक, शहीद जवान और तबाह हुए परिवार।
यह कहानी किसी ऐसी विचारधारा की नहीं है जो परिस्थितियों की वजह से हार गई। यह उस विचारधारा की कहानी है जो इसलिए फेल हो गई क्योंकि वह भारत की हकीकत, यहाँ की विविधता और लोकतांत्रिक सोच के साथ तालमेल नहीं बिठा सकी। इसलिए, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल पूरे होना जश्न का नहीं, बल्कि हिसाब-किताब का मौका है। इन 100 सालों में कम्युनिज्म ने न तो गरीबों को आजाद किया, न लोकतंत्र को मजबूत किया और न ही देश की रक्षा की। इसने सिर्फ एक बात साबित की है, एक बाहर से आई विचारधारा जो खुद को देश से ऊपर रखती है, वह आखिर में देश और खुद- दोनों को नुकसान ही पहुँचाती है।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में ध्रुव मिश्रा ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)
खुद को भीम कथा वाचक बताने वाली अर्चना सिंह बौद्ध कथा के मंच से हिंदुओं के खिलाफ नफरत का पाठ पढ़ाकर वैचारिक जहर परोस रही है। अर्चना सिंह का एक वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है जिसमें वह भगवान हनुमान, भगवान गणेश, माँ दुर्गा और माँ काली को लेकर आपत्तिजनक और अभद्र टिप्पणियाँ करती नजर आ रही है।
इस वायरल वीडियो में वह माँ दुर्गा के आठ हाथ, भगवान गणेश के सिर, माँ काली के रुप और भगवान हनुमान के चेहरे का ना केवल मखौल उड़ा रही है बल्कि वह लोगों से कह रही है कि इससे अच्छा तो घर में हीरो-हीरोइन की फोटो लगाओ। हिंदू आस्था को नीचा दिखाकर सस्ती तालियाँ बटोरने की कोशिश कर रही अर्चना का यह वीडियो उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जिले के रसूलाबाद क्षेत्र का बताया जा रहा है। यहाँ मलखानपुर गाँव में अंबेडकर पार्क में भीम कथा का आयोजन किया गया था।
जैसे ही यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, हिंदू संगठनों में भारी आक्रोश फैल गया। संगठनों का कहना है कि इस तरह के बयान सीधे तौर पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले हैं और इसे किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वायरल वीडियो के आधार पर हिंदू संगठनों के कार्यकर्ता बड़ी संख्या में रसूलाबाद कोतवाली पहुँचे और जमकर विरोध प्रदर्शन किया। बताया जा रहा है कि इस कार्यक्रम का आयोजन गुलाब राम नामक व्यक्ति द्वारा कराया गया था।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तत्काल कार्रवाई की और कथावाचक अर्चना सिंह बौद्ध और कार्यक्रम आयोजक गुलाब राम को हिरासत में ले लिया। पुलिस ने दोनों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, इस आयोजन की अनुमति जिला प्रशासन से ली गई थी लेकिन कथा के दौरान तय की गई मर्यादाओं और शर्तों का कथित तौर पर पालन नहीं किया गया। हालाँकि, सोशल मीडिया पर दावे किए जा रहे हैं कि उसे जमानत भी दे दी गई है।
काली किसी बच्चे के सामने आ जाए तो एक महिने तक उसका बुखार ना उतरे: अर्चना सिंह बौद्ध
वायरल वीडियो में वह कह रही है, “आठ हाथ हैं दुर्गा महारानी के, हमें तो यहीं नहीं पता है भईया आठ हाथ वाली देवी पैदा हुई होंगी तो कैसे पैदा हुईं होंगी। जिस समय दुर्गा महारानी की मम्मी ने उनको जनम दिया होगा, पता नहीं उनके प्राण कहा रहें होंगे? पता नहीं कौन सा हॉस्पिटल बना है, उस हॉस्पिटल में आठ हाथ वाली देवी का जन्म हुआ होगा। इनके अम्मा-दादा तक का पता नहीं है कि इनके अम्मा-दादा हैं कौन? अगर आठ हाथ वाली देवी तुम्हारे घर में पैदा हो जाए फिर तुम्हें कैसी लगेगी?”
धत्त तेरी ……..! देवी दुर्गा, माँ काली,भगवान गणेश जी और हनुमान जी पर बेहद अभद्र और आपत्तिजनक टिप्पणी की जा रही है, खुलेआम सरेआम हिंदू देवी देवताओं का अनादर हो रहा है। और चारों तरफ़ चुप्पी है? सब मौन हैं, क्यों?
वीडियो में वह आगे कहती है, “तुम लोगों को तो दो हाथ वाले पैदा हों तो दो-दो महिना उठती नहीं, अरे आठ-आठ हाथ वाली देवी मईया कैसे पैदा हुईं होंगी? दिमाग लगाओ तुमलोग अपना, अगर आठ हाथ वाली देवी, ऐसी लड़की तुम्हारे घर में आ जाए तो अच्छी लगेगी? अच्छी नहीं लगेगी ना तो फिर इनकी अपने घर में फोटो और इनकी पूजा भी नहीं करनी चाहिए आप लोगों को। अब हनुमान की कोई सूरत है? हनुमान का मुँह कैसा है? अगर हनुमान जैसा संतान तुम्हारे घर में मिल जाए तो तुम्हें कैसी लगेगी वो संतान? ऐसा गलफुल्ला जैसा हो जाए तुम्हारे घर में तो तुम्हें वो बेटा कैसा लगेगा, अच्छा लगेगा? अच्छा लगेगा आपको हनुमान जैसा लड़का नहीं अच्छा लगेगा ना।”
माँ काली पर अपमानजनक टिप्पणी करते हुए वह कह रही है, “काली मईया का तो रूप ही ऐसा है कि बच्चे को बुखार इतनी जोर का आएगा कि एक महीने तक बुखार नहीं जाएगा उसका है ना? और आप ऐसी काली मईया की पूजा करती हो…अरे अच्छे लोगों का अपने घर में फोटो लगाओ, बाबा साहब का लगाओ, बड़े सुंदर थे बाबा साहब।”
भगवान गणेश का मजाक उड़ाते हुए हीरो-हीरोइन की फोटो लगाने की कही बात
अर्चना बौद्ध की यह घटिया बातें यहीं नहीं रुकी, वह आगे भगवान गणेश का भी मजाक उड़ाती है और कहती है, “अब गणेश भगवान हैं हमे तो यहीं समझ में नहीं आता कि गणेश भगवान आधे इंसान हैं और आधे जानवर हैं अब हमे यहीं नहीं पल्ले पड़ता है कि देखो हाथी का बच्चा भले छोटा हो लेकिन गर्दन उसकी छोटे पर भी मोटी होती है? अब गणेश की गर्दन और हाथी की गर्दन कैसे मैच खाई होगी?”
आगे कहती है, “इंसान की गर्दन तो इतनी सी होती है चार इंची की और गणेश भगवान के ऊपर का जो सर है वो हाथी का लगा है। अब हाथी का बच्चा भी तुम समझ लो तो गर्दन उसकी मोटी होती, लेकिन गणेश भगवान से कैसे मैच खा गया हाथी का सर? सोचने वाली बात है ना। अब हाथी का सर है और पेट इंसान का है अब हमें यहीं नहीं समझ आता है कि वो भोजन कौन सा करते होंगे हाथी वाला करते होंगे या इंसान वाला भोजन खाते होंगे? इन देवी-देवताओं की ना सूरत है, ना अकल है ना शक्ल है, इनसे अच्छा तो आप हीरो-हीरोइन की फोटो लगा लो ताकि अच्छे-अच्छे बच्चे तो पैदा हों।”
कौन है अर्चना सिंह बौद्ध?
अर्चना सिंह हाथरस की रहने वाली है। उसके वीडियोज यूट्यूब पर कई चैनल्स ने अपलोड किए है। हालाँकि, उसका अपना भी एक चैनल है जिसका नाम ‘Archana Singh Buddh Hathras’ है। इस चैनल पर उसके ऐसे ही कुल 554 वीडियोज अपलोड हैं। उसके करीब 4,000 सब्सक्राइबर्स हैं। उसका यह चैनल 25 सितंबर 2019 से चल रहा है।
इसके अलावा एक और चैनल है, जिससे उसके वीडियो शेयर किए गए हैं। इस चैनल का नाम ‘Gautam Studio Gyanpurwa’ है। इस पर अर्चना के अलावा ज्ञानसिंह बौद्ध कासगंज नाम के एक व्यक्ति का भी वीडियो शेयर किया गया है।
वीडियो में वह कह रहा है, “पूड़ी-कचौरी करे गोलगुला और करो गुलभत्ता और पथरा पूज के आई ढोकरिया, ओन्हें चाट गए कुत्ता।” इस वीडियो के थंबनेल में माँ काली की फोटो है, जिसके सामने एक कुत्ते को उन्हें चाटते हुए दिखाया गया है।
इस चैनल पर अर्चना का एक और वीडियो भी है, जिसके थंबनेल में लिखा है, ‘मूतादेवी का अविष्कार’ और नीचे लिखा है ‘कैसे मू**ने वाली देवी का जन्म हुआ।’ वीडियो मे वह माँ दुर्गा के बारे में उल्टी-सीधी बातें कर रही है।
महिषासुर को बताया राजा, माँ दुर्गा को बताया राक्षस की पत्नी
इस लड़की का इसी तरह का एक वीडियो यूट्यूब पर भी अपलोड है। इस वीडियो में वह कह रही है, “हमारा एक राजा हुआ यादव वंश में, जिनका नाम था महिषासुर राजा। जो हमारे समाज के लोग नौ दुर्गा मनाया करते हैं, आखिर ये नौ दुर्गा क्यों मनाया जाता है? कौन थी वो नौ दुर्गा? क्योंकि हमारी माताओं बहनों जो बिहार का राजा था बड़ा वीर बलवान, यादव समाज में जन्मा महिषासुर महाराज।”
वह कहती है, “महिषासुर राजा जब पहाड़ों से कूदा करते थे तो ऐसा लगता था, जमीन चटक जाती थी, ऐसा बल था उनके अंदर। इन मनुवादी लोगों को अच्छा नहीं लगा, इनलोगों को हमारे राजाओं का राज-पाठ अच्छा नहीं लगा तो इनलोगों ने क्या काम किया? ब्राह्मण समाज ने लड़की थी, जिसका नाम था दुर्गा। दुर्गा की शादी, इन्होंने सुंदर-सुंदर लड़कियाँ हमारे राजाओं-पुरखों को लाकर दी, हमारे राजा-पुरखे उन सुंदर-सुंदर लड़कियों में मस्त हो गए लेकिन ये नहीं पता था हमारे राजाओं को कि हमारे साथ में दुर्घटना भी घट सकती है।”
महिषासुर को माँ दुर्गा ने शराब पिलाकर मारा: अर्चना सिंह बौद्ध
वीडियो में वह आगे कहती है, “अपनी लड़की ब्राह्मण लोगों ने महाराज महिषासुर के साथ में शादी कर दी और उस लड़की से कहा देखो हम तुम्हारी शादी कर रहे हैं, लेकिन तुम्हें वहाँ घर नहीं पालना है तुम्हें पानी नहीं पीना है जब तक वो राजा मर ना जाए। दुर्गा की जब शादी महिषासुर के साथ हुई, यादव वंश का राजा था महिषासुर। महिषासुर महाराज के साथ में शादी होने के बाद ये मनुवादी विदेश से शराब बनाकर के लेते आए।”
उसने कहा, “जब शराब बनाकर लेते आए, वो अपनी लड़कियों को शराब दे दी बनाकर के और कहा कि इसे भगवान का प्रसाद बताकर के तुम्हें पिलाना होगा तो महिषासुर से वो लड़की दुर्गा बोली कि ये देखिए ये हमारे यहाँ भगवानों का प्रसाद है। ये प्रसाद तो पी लीजिए तो तुम्हें भगवान की तरफ से आराम मिलेगा। दुर्गा ने उसे इतना नशा करा दिया कि राजा को होश नहीं रहने दिया। एक दिन हाथों में तलवार उठाकर के राजा महिषासुर का बेहोशी में कत्ल कर दिया। कत्ल करने के बाद मेरे धम्मबंधुओं उससे पहले दुर्गा ने क्या काम किया था?”
माँ दुर्गा और महिषासुर के बेटे ने किए दुर्गा के नौ टुकड़े
वह कह रही है, “कत्ल करने के बाद दुर्गा ने महाराजा महिषासुर को मारने के बाद ये महिषासुर की गर्भवती हो गई थी, इसके बाद इसको एक लड़का पैदा हुआ, उसी लड़के का नाम था लांगुरिया। बड़े होने के बाद वो लड़का पूछने लगा कि माँ आज तक तुमने मेरे पिता का नाम नहीं बताया, मेरे पिता कहाँ हैं? तो दुर्गा बताया नहीं करती थी। एक दिन वो लड़का पीछे पड़ गया, आज मेरे पिता जी का पता बताओ।”
अर्चना आगे कहती है, “दुर्गा ने बताया कि तेरे पिता को मैंने मार दिया, जब मारने की खबर सुनी तो उसी लड़के ने हाथों में तलवार उठाकर के दुर्गा के नौ टुकड़े नौ दिशा में जब फेंक दिए, नौ टुकड़े कर के फेंके तब भी मनुवादी लोगों ने अपनी लड़की का पीछा नहीं छोड़ा, तब भी उन नौ टुकड़ों को इकट्ठा कर के नौ नाम दे दिए और कहा इसकी पूजा करो। उसे कहा गया नौ दुर्गा। उसकी हमारी माता-बहनें नौ दुर्गा कह कर पूजा करती हैं यानी तुम्हारे पुरखों का कत्ल किया गया और आप लोगों से उनकी पूजा करवाई गई।”
हिंदुओं के त्यौहार ना मनाने के लिए भड़काया
वीडियो में वह लोगों को भड़काते हुए कहती है, “मेरे समाज के लोगों आप जितने हिंदूवादी सनातनी त्यौहार करते हैं वो हमारे त्यौहार नहीं हैं याद रखना जो जो त्यौहार आता है, उसमें कोई ना कोई तुम्हारे राजाओं-पुरखों का कोई ना कोई रहस्य जरूर छिपा हुआ है। हमारे राजाओं को छल-कपट से मारने का काम किया। धीरे-धीरे इनलोगों ने हमारे दस राजा मार दिए गए, दस राजा मारने के बाद इन लोगों ने भारत पर कब्जा किया।”
वह सबको बताते हुए कहती है, “भारत भूमि बौद्धों की धरती थी, यहाँ हमारे राजा-पुरखों का राज रहा हमेशा और कोई दूसरा व्यक्ति नहीं था लेकिन हमारी माताओं-बहनों 85% ज्यादा है, 15% कम है लेकिन भारत देश में शासन सत्ता किसका होना चाहिए 15% का होना चाहिए, लेकिन अभी किसका सत्ता चल रहा है? ये लोग ताक में है कि संविधान को खत्म कर दिया जाए। लोगों के दिल में संविधान चुभता है, जैसे काँटा पैर में चुभता है।”
मणिपुर हिंसा पर गीत गाते सत्ता चलाने वालों को कहा दुष्ट
इसी तरह मणिपुर हिंसा को लेकर भी उसका एक वीडियो यूट्यूब पर अपलोड है, जिसमें वह मणिपुर हिंसा का दोष उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी दे रही है और कह रही कि इन दुष्टों को धूल चटाना होगा। इस वीडियो में वो गाना गा रही है, “आग लगी है भारत में और सत्ता सो रही दिल्ली में, चप्पा-चप्पा राख हुआ है जाकर देखो मणिपुर में।” इस वीडियो के थंबनेल में प्रधानमंत्री मोदी और सीएम योगी की फोटो लगी हुई है।
अर्चना ने सरोज सरगम से सीखा माँ दुर्गा का अपमान करना?
गौरतलब है कि इससे पहले मिर्जापुर पुलिस ने माँ दुर्गा पर आपत्तिजनक गाने के मामले में मुख्य आरोपित गायिका सरोज सरगम और उनके पति राममिलन बिंद को गिरफ्तार किया था। यह गिरफ्तारी लोगों के भारी विरोध और सोशल मीडिया पर उठी माँगों के बाद की गई थी। सरोज सरगम ने अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो अपलोड किया था, जिसमें उसने माँ दुर्गा के लिए वै$% और रं₹$ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था।
इस वीडियो के वायरल होने के बाद लोगों में भारी आक्रोश था। वह भी अर्चना की तरह ही हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ भड़काऊ और अभद्र टिप्पणी कर के पैसे बटोर रही थी। दरअसल इन लोगों का एक उद्देश्य तो ये होता है कि ये लोगों के अंदर से भगवान के प्रति आस्था को खत्म कर सकें और दूसरा उद्देश्य होता है पैसे कमाना, वो भी इस तरह की ओछी हरकतें कर के, क्योंकि ऐसे थंबनेल से ये लोगों को मजबूर करते है कि लोग इनके वीडियो को ओपन करें।
केरल में आयोजित 30वें इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ केरल (IFFK) को लेकर राजनीतिक और वैचारिक विवाद पिछले दिनों काफी चर्चा में था। मामला तब सामने आया जब पता चला कि केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और सामाजिक सौहार्द से जुड़े मामलों के कारण कुछ फिल्मों को सेंसर छूट देने से इनकार कर दिया और केरल की वामपंथी सरकार ने फिर भी उन फिल्मों को दिखाने का ऐलान किया।
दरअसल, IFFK 2025 में दिखाने के लिए केंद्र सरकार ने 178 फिल्मों को सेंसर छूट दी थी। वहीं 19 के करीबन फिल्म ऐसी थीं जिन्हें दिखाने से रोका गया था। इनमें से भी 6 ऐसी थी जिन्हें लेकर कहा गया कि ये देश के हित में नहीं हैं। केंद्र के इस निर्णय को सुनकर केरल सरकार ने इसे फासीवाद, तानाशाही और अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला करार देना शुरू कर दिया। बाद में खबर आई कि केंद्र द्वारा रोकी गई फिल्मों से कुछ को पिनरई विजयन सरकार की अनुमति से फिल्म फेस्टिवल में चला दिया गया है।
केंद्र सरकार ने किन फिल्मों पर आपत्ति जताई
बता दें कि जिन छह फिल्मों को सेंसर छूट नहीं दी गई, उनमें यस (इजराइल, 2025), ऑल दैट’स लेफ्ट ऑफ यू (फ़िलिस्तीन, 2025), क्लैश (इजिप्ट, 2016), ए पोएट (कोलंबिया, 2025), ईगल्स ऑफ द रिपब्लिक (इजिप्ट, 2025) और फ़्लेम्स (इंडिया, 2025) शामिल हैं।
ऑल दैट’स लेफ्ट ऑफ यू एक पैलेस्टाइनियन ड्रामा फिल्म है, जो तीन पीढ़ियों के परिवार की कहानी दिखाती है। 1948 के नकबा से 2022 तक फैली यह फिल्म इजरायली कब्जे के कारण विस्थापन, आघात और संघर्ष को दिखती है। भारत में इसे थिएटर रिलीज के लिए बैन नहीं किया गया, लेकिन दिसंबर 2025 के केरला इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (IFFK) में स्क्रीनिंग की अनुमति नहीं मिली। केंद्र सरकार ने सेंसर छूट देने से इनकार कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार कूटनीतिक संवेदनशीलता और भारत-इजरायल मजबूत संबंधों के कारण पैलेस्टाइन समर्थक कंटेंट को रोका गया।
यस 2025 की एक इजरायली ड्रामा फिल्म है। इसे निर्देशक नदव लापिद ने बनाया है। फिल्म की कहानी 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद की है। इसमें एक जाज संगीतकार और उसकी डांसर पत्नी की कहानी को दिखाया गया है, जो अमीर लोगों का मनोरंजन करते हैं।
उसी समय पूरा देश युद्ध और दुख की मार झेल रहा होता है। फिल्म इजरायली समाज की आलोचना करती दिखाती है कि कैसे लोग नैतिक रूप से गिरते जा रहे हैं और युद्ध की वजह से समाज में क्या बदलाव आ रहे हैं। जिसके कारण कूटनीतिक संवेदनशीलता, विदेशी संबंध और भारत-इजरायल की मजबूत दोस्ती के चलते पैलेस्टाइन-इजरायल संघर्ष से जुड़े कंटेंट को रोका गया।
क्लैश 2016 की एक इजिप्टियन ड्रामा फिल्म है। इसे निर्देशक मोहम्मद दीब ने बनाया है। फिल्म पूरी तरह एक पुलिस वैन के अंदर सेट है। यह 2013 में मोहम्मद मुर्सी को हटाए जाने के बाद काहिरा में हुए दंगों की कहानी दिखाती है। वैन में मुस्लिम ब्रदरहुड समर्थक, सेना समर्थक, पत्रकार और आम लोग फंस जाते हैं। यह समाज के विभाजन, पुलिस क्रूरता और मानवीयता को दर्शाती है। भारत में इसे दिसंबर 2025 के केरला इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (IFFK) में स्क्रीनिंग से रोका गया था। केंद्र सरकार ने इसे कूटनीतिक संवेदनशीलता के चलते मध्य पूर्व संघर्ष से जुड़े कंटेंट को रोका था।
ए पोएट एक कोलंबियन ड्रामा-कॉमेडी फिल्म है। फिल्म की कहानी एक बूढ़े, असफल कवि की है, जो शराब पीकर सड़कों पर घूमता है और अपनी जिंदगी से हताश है। वह एक गरीब लड़की को कविता सिखाता है, लेकिन अच्छे इरादों से शुरू हुई यह दोस्ती गलत फैसलों में बदल जाती है। फिल्म कलाकारों की जिंदगी की मुश्किलों पर हल्की-फुल्की आलोचना करती है। केंद्र सरकार ने इसे कूटनीतिक संवेदनशीलता के चलते इस विवादास्पद थीम वाली फिल्मों को रोका गया दिखने से।
फ़्लेम्स एक भारतीय फिल्म है, जिसमें मूक प्रवासी खेत मजदूर और उसके नाबालिग बेटे की कहानी है, जिसमें बेटे पर हत्या का आरोप लगता है और पिता न्याय की लड़ाई लड़ता है। फिल्म जातिवाद, सामाजिक अन्याय, पुलिस हिंसा और प्रवासी मजदूरों के मुद्दों को छूती है।
केंद्र सरकार (सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय) ने इसे इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ केरला (IFFK) में स्क्रीनिंग के लिए मना किया था। क्यूकी इस फिल्म में जातिवाद जैसे संवेदनशील सामाजिक मुद्दों पर फोकस किया गया है।
केंद्र सरकार का कहना था कि इन फिल्मों में संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय और घरेलू मुद्दों को एकतरफा, भड़काऊ और वैचारिक प्रोपेगेंडा के रूप में पेश किया गया है। खासकर इजरायल-फ़िलीस्तीन संघर्ष से जुड़ी फिल्मों को लेकर विदेश मंत्रालय ने गंभीर आपत्ति जताई थी।
जानकारी के मुताबिक, यस और ऑल दैट स लेफ्ट ऑफ यू जैसी फिल्में या तो इजरायलियों के नरसंहार का मजाक उड़ाती हैं या फिर नकबा जैसी ऐतिहासिक घटनाओं को तोड़-मरोड़कर दिखती हैं।
मौजूदा वैश्विक हालात में, जब पश्चिम एशिया पहले से ही तनावपूर्ण स्थिति में है, ऐसी फिल्मों का दिखाना भारत को अंतरराष्ट्रीय विवादों में घसीट सकता है। इसी तरह फ्लेम नामक भारतीय फिल्म पर जाति व्यवस्था को लेकर एकतरफा और भड़काऊ नैरेटिव फैलाने का आरोप है।
ईगल्स ऑफ द रिपब्लिक को लेकर भी विदेश मंत्रालय ने आपत्ति जताई थी, क्योंकि इसका असर भारत और मिस्र के रिश्तों पर पड़ सकता है। ऐसे समय में जब पाकिस्तान पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर सक्रिय है, तब भारत किसी भी ऐसे कदम से बचना चाहता है जो उसके रणनीतिक फायदे को नुकसान पहुँचा सकता है। केंद्र सरकार का साफ कहना था कि इन फिल्मों को दिखाना देशहित के खिलाफ हो सकता है।
सेंसर छूट का नियम और IFFK आयोजकों की लापरवाही
मालूम हो कि भारत में किसी भी फिल्म फेस्टिवल में बिना CBFC सर्टिफिकेट या सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से विशेष सेंसर छूट के फिल्मों को दिखाना नियमों के खिलाफ है। यह कोई नई व्यवस्था नहीं है और दशकों से यही प्रक्रिया चली आ रही है।
सरकारी अधिकारियों के मुताबिक IFFK आयोजकों ने न केवल समय पर आवेदन नहीं किया, बल्कि अधूरी जानकारी भी दी। नियमों के अनुसार सेंसर छूट के लिए कम से कम 15 दिन पहले आवेदन करना जरूरी होता है, लेकिन आयोजकों ने केवल 9 दिन पहले आवेदन किया।
इसके अलावा कई फिल्मों के सिनॉप्सिस, ट्रेलर और अन्य जरूरी दस्तावेज समय पर जमा नहीं किए गए, जिसकी वजह से प्रक्रिया में देरी हुई। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने तेजी दिखाते हुए 178 फिल्मों को छूट दे दी। इससे साफ होता है कि केंद्र का उद्देश्य फिल्म फेस्टिवल को रोकना नहीं, बल्कि केवल उन फिल्मों पर आपत्ति जताना था जिनसे राष्ट्रीय हितों को खतरा हो सकता था।
केरल सरकार की जिद्द
मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए केंद्र सरकार पर संघ परिवार की तानाशाही का आरोप लगाया और कहा कि केरल ऐसी सेंसरशिप के सामने नहीं झुकेगा। संस्कृति मंत्री साजी चेरियन और IFFK चेयरमैन रेसुल पुकुट्टी ने भी इसी लाइन को आगे बढ़ाया।
पुकुट्टी ने इसे संविधान के तहत अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल बताया, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में राज्य सरकार को मनमानी करने का अधिकार मिल जाता है।
संविधान के तहत विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध और राष्ट्रीय सुरक्षा पूरी तरह से केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इसके बावजूद केरल सरकार ने साफ कहा कि सेंसर छूट मिले या न मिले, फिल्में दिखाई जाएँगी। यह रवैया बताता है कि मामला कला से ज़्यादा वैचारिक मतभेद और केंद्र से टकराव की राजनीति का है।
लेफ्ट-लिबरल समर्थन और सवालों से बचने की रणनीति
इस पूरे विवाद में लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम पूरी तरह से केरल सरकार के समर्थन में खड़ा नजर आया। कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने IFFK में फिल्मों की स्क्रीनिंग को लेकर उठे विवाद पर कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव केरल में दिखाई जाने वाली 19 फिल्मों को केंद्र सरकार द्वारा मंजूरी न देने के कारण एक अनावश्यक और शर्मनाक विवाद खड़ा हो गया है।
It is most unfortunate that an unseemly controversy has arisen over the central government's denial of clearance to 19 films which were scheduled to be screened at the International Film Festival of Kerala in Thiruvananthapuram.
थरूर के मुताबिक, शुरुआत में प्रतिबंधित फिल्मों की संख्या इससे कहीं अधिक थी, लेकिन महोत्सव के अध्यक्ष रेजुल पी के अनुरोध पर उन्होंने सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव से हस्तक्षेप कर कई फिल्मों को मंजूरी दिलवाई। हालाँकि, बाकी बची फिल्मों को लेकर अब भी विदेश मंत्रालय की स्वीकृति का इंतजार है।
उन्होंने आरोप लगाया कि जिन 19 फिल्मों को मंजूरी नहीं दी गई है, उनकी सूची नौकरशाही की सिनेमाई निरक्षरता को दर्शाती है। थरूर ने कहा कि 1928 की क्लासिक फिल्म बैटलशिप पोटेमकिन, जिसे दुनिया भर में करोड़ों लोग देख चुके हैं, उसको अनुमति न देना हास्यास्पद है। वहीं, कुछ फिलिस्तीनी फिल्मों पर रोक को उन्होंने सांस्कृतिक समझ की कमी नहीं, बल्कि जरूरत से ज्यादा सतर्क नौकरशाही सोच का नतीजा बताया।
हैरानी की बात यह है कि जिन छह फिल्मों को सेंसर छूट नहीं मिली थी, उनमें से ईगल्स ऑफ द रिपब्लिक, ए पोएट और फ़्लेम्स को केरल सरकार पहले ही दिखा चुकी है। यानी चेतावनी और संभावित कानूनी कार्रवाई की बात सामने आने के बावजूद राज्य सरकार जानबूझकर टकराव को आगे बढ़ा रही है।
फिल्म फेस्टिवल की आड़ में चलाया जा रहा एजेंडा
IFFK की शुरुआत एक सांस्कृतिक आयोजन के रूप में हुई थी, लेकिन अब यह धीरे-धीरे वैचारिक राजनीति का मंच बनता जा रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी लोकतंत्र का अहम हिस्सा है, लेकिन यह आजादी निरंकुश नहीं होती। जब बात देश की सुरक्षा, सामाजिक सौहार्द और विदेश नीति की हो, तब जिम्मेदारी सबकी होती है और उतनी ही जरूरी होती है।
IFFK विवाद में केरल सरकार के रवैया से यह दिखाता है कि यहाँ उद्देश्य कला का संरक्षण नहीं, बल्कि केंद्र सरकार से टकराव और वैचारिक संदेश देना है। आज IFFK एक फिल्म फेस्टिवल से ज्यादा लेफ्ट-लिबरल प्रोपेगेंडा का मंच बनता दिखाई दे रहा है।
ऑक्सफोर्ड यूनियन में 27 नवंबर 2025 को हुई एक डिबेट में एक भारतीय छात्र ने पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा को सटीक और करारे तथ्यों (Hard-Hitting Facts) से चूर-चूर कर दिया। इस डिबेट के कुछ क्लिप अब इंटरनेट पर वायरल हो रहे हैं।
भारतीय छात्र विरांश भानुशाली मुंबई के रहने वाले हैं और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में कानून की पढ़ाई कर रहे हैं। वे इस डिबेट में भारत का पक्ष रखने वाली टीम का हिस्सा थे। यह डिबेट 26 नवंबर यानी 26/11 मुंबई आतंकी हमलों की बरसी के ठीक एक दिन बाद आयोजित की गई थी।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में भारतीय छात्र विरांश भानुशाली ने बेनकाब किया कांग्रेस का असली चेहरा
कहा- 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के बाद जब देश चाहता था बदला तब कांग्रेस सरकार पाकिस्तान को भेज रही थी Dossiers pic.twitter.com/wAwuQJEeGX
26/11 मुंबई हमलों के सर्वाइवर विरांश भानुशाली ने पाकिस्तान पर हमला बोलते हुए कहा, “आप उस देश को शर्मिंदा नहीं कर सकते जिसमें खुद कोई शर्म ही नहीं है।” ऑपइंडिया ने विरांश भानुशाली से बात की, जिसमें उन्होंने डिबेट का अपना अनुभव साझा किया और भारत-पाकिस्तान संघर्ष और भारत की वैश्विक छवि पर भी अपने विचार रखे।
मैं खुद को मानता हूँ भारत का राजदूत: विरांश भानुशाली
ऑपइंडिया की पत्रकार रितिका चंदोला ने विरांश से पूछा कि विदेशी जमीन पर पाकिस्तान के खिलाफ भारत का पक्ष रखने का अनुभव कैसा रहा। जवाब में विरांश ने कहा कि वे खुद को देश का राजदूत मानते हैं और भारत की तरफ से बोलकर उन्हें गर्व महसूस हुआ।
दिलचस्प बात यह है कि विरांश ऑक्सफोर्ड यूनियन के अध्यक्ष मूसा हर्राज के दोस्त हैं, जो पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्री मुहम्मद रजा हयात हर्राज के बेटे हैं। मूसा ने डिबेट में पाकिस्तान का पक्ष रखा था।
डिबेट के बाद के हालात पर पूछे जाने पर ऑक्सफोर्ड यूनियन में चीफ ऑफ स्टाफ विरांश ने कहा, “मूसा और मेरा रिश्ता ऐसा है कि हम दोनों अच्छी तरह जानते हैं कि मैं भारतीय हूँ और वह पाकिस्तानी। हम दोनों संस्थान में इतने अहम पद पर हैं कि घर में सुर्खियाँ बन सकती हैं। इसलिए जहाँ जरूरी है हम सहयोग करते हैं, लेकिन अपनी सीमाएँ तय करते हैं और कहते हैं कि इस पर हमें गर्व है, इस पर समझौता नहीं करेंगे और हमारे अपने विचार हैं। मैं एक फ्री स्पीच सोसाइटी से हूँ। मुझ पर फ्री स्पीच को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी है।”
मुझे उम्मीद नहीं थी कि मेरा भाषण वायरल होगा: भानुशाली
डिबेट के क्लिप वायरल होने और भारत में मिल रहे प्यार पर विरांश ने कहा कि उन्हें ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी। उन्होंने कहा कि उन्हें तो उल्टा लग रहा था क्योंकि डिबेट को पाकिस्तानी चैनल जियो न्यूज और एआरवाई ने कवर किया था। विरांश को अपने हिस्से के बाद चुनाव की वजह से डिबेट छोड़नी पड़ी थी। पाकिस्तानी मीडिया ने इसे भारतीय पक्ष का वॉकआउट बता दिया।
विरांश ने कहा, “हमारे पास जियो न्यूज और एआरवाई के प्रतिनिधि थे, जिन्होंने इसे लाइव दिखाया या अगले दिन टेलीकास्ट किया और बड़े हेडलाइन में लिखा कि भारतीय पक्ष ने वॉकआउट किया, जो सच नहीं है।” उन्होंने आगे कहा, “लेकिन लोग यह नहीं देखते कि हमारे वीडियो आने से पहले पूरे महीने कवरेज सिर्फ पाकिस्तानी पक्ष की थी। भारतीय पक्ष ने तो कवरेज ही नहीं की थी। मुझे अपने भाषण पर भरोसा था। मुझे पता था कि लोग सुनेंगे, लेकिन इतना वायरल होने की कल्पना नहीं थी।”
हम दुनिया के सामने सबसे बेहतर प्रतिनिधि भेजने में पीछे: भानुशाली
विरांश ने कहा कि पाकिस्तान ग्लोबल फोरम पर अपनी बात रखने में कामयाब रहा है, लेकिन भारत का पक्ष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ठीक से नहीं रखा जा रहा।
भानुशाली ने कहा, “मैंने देखा है कि हमें अपनी कम्युनिकेशन में बदलाव करना चाहिए। हम पाकिस्तान के साथ नहीं जोड़े जाना चाहते, हमारे मुकाबले चीन, अमेरिका और विकसित देश हैं। लेकिन जब हम अपने सबसे अच्छे प्रतिनिधि नहीं भेजते और ऐसे फोरम होते हैं जिनका दूसरा पक्ष इस्तेमाल करता है, तो सिर्फ एक ही कहानी चलती है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय प्रतिनिधित्व नहीं हुआ है।”
पाकिस्तान भारत के साथ लड़ाई को बहाना बनाता है: भानुशाली
ऑपइंडिया की पत्रकार के सवाल पर कि भारत का मुकाबला पाकिस्तान से नहीं है, विरांश ने सहमति जताई। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के लिए भारत से लगातार संघर्ष में रहना फायदेमंद है क्योंकि इसी बहाने वहाँ की गरीबी और महंगाई को जायज ठहराया जाता है।
विरांश ने कहा, “पाकिस्तान के लिए भारत से संघर्ष में रहना फायदेमंद है, क्योंकि भारत बिना पाकिस्तान के भी जी सकता है, लेकिन मौजूदा पाकिस्तानी सत्ता बिना भारत के शायद टिक न पाए। कम से कम भारतीय खतरे के बिना नहीं। अगर पॉपुलिज्म देखना है तो दूसरी तरफ है, क्योंकि उन्हें भारतीय खतरे की जरूरत है। इसी से वे आटे की कीमत, बड़ी गरीबी और हत्याओं को जायज ठहराते हैं।”
26/11 मुंबई आतंकवादी हमलों की याद के बारे में पूछे जाने पर, भानुशाली ने कहा कि उन्हें उस समय का डर और घबराहट अभी भी याद है। भानुशाली उस समय केवल 4 साल के थे। उन्होंने कहा कि वह अपने हिस्सेदार और सुरक्षित पीढ़ी का हिस्सा होने के लिए आभारी हैं, जिसने बड़े आतंकवादी हमले नहीं देखे।
भानुशाली ने याद किया, “मैं चार साल का था। लेकिन वे कहानियाँ और यादें, जो अभी भी मेरे दिमाग में हैं, हमें यह सिखाती हैं कि सीमा पार आतंकवाद जैसी समस्याओं से कैसे निपटा जाए।” उन्होंने जोड़ा कि आतंकवाद समाज को व्यापक रूप से प्रभावित करता है, चाहे व्यक्ति किसी भी वर्ग या स्थिति का हो।
कुछ समुदाय धर्म को शोषण का जरिया बनाते हैं: भानुशाली
इस्लामिक कट्टरता और पश्चिम में मल्टीकल्चरलिज्म के खिलाफ बढ़ते मूड पर विरांश ने कहा कि कुछ लोग धर्म को निजी फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने शशि थरूर का हवाला देते हुए कहा कि भारत ने दुनिया को सिर्फ सहनशीलता नहीं बल्कि स्वीकृति सिखाई है।
यूके में इस्लामोफोबिया पर विरांश ने कहा कि यह जटिल मुद्दा है। कुछ समुदायों ने धर्म को सामाजिक शोषण का जरिया बनाया है, जैसे ग्रूमिंग गैंग्स। उन्होंने मल्टीकल्चरलिज्म का समर्थन किया लेकिन कहा कि अगर कोई इसका निजी फायदा उठाता है तो गलत है।
Oxford University Union Debate से चर्चा में आए Viraansh Bhanushali ने OpIndia पर @RitikaChandola को दिए गए Exclusive Interview में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखी है।
उनके अनुसार Multicultural Society होना अच्छी बात है लेकिन सभी को उसका सम्मान करना चाहिए।… pic.twitter.com/KaNi4hbvQt
मल्टीकल्चरलिज्म के साथ आत्मसात भी होना चाहिए: भानुशाली
यूके में बहुसांस्कृतिकता (मल्टीकल्चरलिज्म) के सामने चुनौतियों के बारे में बात करते हुए, भानुशाली ने कहा कि इस्लाम को यूके में कभी-कभी प्रचार का जरिया बनाया गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बहुसांस्कृतिकता को टिकाऊ बनाने के लिए समाज में एकीकरण जरूरी है।
भानुशाली ने कहा, “मैं हमेशा यह कहता रहा हूँ कि कुछ लोग इस्लाम को प्रचार के लिए इस्तेमाल करते हैं। कुछ लोग राजनीतिक बदलाव के लिए जलवायु परिवर्तन जैसी चीजों का इस्तेमाल करते हैं। यह सब दबाव बनाने के लिए होता है। बहुसांस्कृतिकता जैसी अच्छी चीज का इस्तेमाल जब दबाव बनाने के लिए किया जाता है तो समस्या होती है। भारत एक बहुत ही बहुसांस्कृतिक समाज है और हम इसकी स्थापना से ही ऐसे रहे हैं, बल्कि उससे पहले भी। हम बहुसांस्कृतिकता की आलोचना तब नहीं करते जब यह हमें एक पहचान में जोड़ती है। लेकिन अगर लोग एकीकरण नहीं करते, अपनी पहचान में शामिल नहीं होते, तो यह एक समस्या बन जाती है।”
बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या भयानक और निंदनीय: भानुशाली
ऑपइंडिया की पत्रकार ने भानुशाली से पूछा कि वह बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों और हाल ही में हुए हिंदू व्यक्ति की लिंचिंग के बारे में क्या सोचते हैं। भानुशाली ने बांग्लादेश में हिंदू समुदाय के उत्पीड़न की निंदा की और कहा, “मैंने बांग्लादेश में हिंदू जनता पर किए जा रहे अत्याचारों के कुछ बहुत ही भयानक वीडियो देखे हैं। लिंचिंग, किसी को जिंदा जलाया जाना। मुझे ऐसे वीडियो भी दिखे जिनमें किसी को भीड़ के हवाले किया गया, जो उन्हें मार देती। यह पूरी तरह निंदनीय और भयानक है।”
भानुशाली ने कहा कि बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए देश में लोकतंत्र लौटना जरूरी है, ताकि ऐसे कामों के लिए जवाबदेही हो। उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की।
मैं मोदी से प्यार करता हूँ लेकिन उनकी आलोचना भी करता हूँ: भानुशाली
पीएम मोदी पर विरांश ने कहा कि उन्हें मोदीजी से बहुत लगाव है लेकिन कुछ मतभेद भी हैं। उन्होंने कहा कि सरकार की आलोचना घरेलू मामला है, बाहर देश को पहले रखना जिम्मेदारी है।
भानुशाली ने कहा, “मुझे मोदी जी के बारे में अपनी आलोचनाएँ हैं। मैं उन्हें कई तरीकों से पसंद करता हूँ। मेरी अपनी आलोचनाएँ भी हैं, लेकिन मैं उन्हें केवल देश में ही रखता हूँ, क्योंकि यह हमारा मामला है। हम लोकतंत्र में रहते हैं और यहाँ अपनी आलोचना व्यक्त कर सकते हैं। जब आप बाहर होते हैं, तो आपकी जिम्मेदारी होती है कि देश को पहले रखें। मेरे भाषण में भी देखें, आपत्तियाँ किसी ने मोदी के लिए नहीं कीं, बल्कि भारत के लिए कीं।”
(मूल रूप से यह खबर अंग्रेजी टीम की अदिति ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
भारत के लिए वर्ष 2026 केवल एक कैलेंडर वर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर उसकी आर्थिक और कूटनीतिक ताकत के नए अध्याय की शुरुआत है। इसकी बुनियाद उस फैसले से पड़ी है, जिसके तहत भारत को संयुक्त राष्ट्र समर्थित किम्बर्ली प्रोसेस (Kimberley Process – KP) का अध्यक्ष चुना गया है।
यह निर्णय ऐसे समय आया है, जब वैश्विक हीरा व्यापार भूराजनैतिक तनावों, प्रतिबंधों और नैतिक व्यापार की बढ़ती माँग के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में भारत का नेतृत्व सँभालना अंतरराष्ट्रीय समुदाय के भरोसे और भारत की साख का स्पष्ट संकेत है।
किम्बर्ली प्रोसेस के अध्यक्ष के रूप में भारत का चयन क्यों है खास?
किम्बर्ली प्रोसेस की प्लेनरी बैठक में यह तय किया गया कि भारत 1 जनवरी 2026 से इस वैश्विक मंच का अध्यक्ष बनेगा, जबकि गुरुवार (25 दिसंबर 2025) से वह उपाध्यक्ष की भूमिका निभाएगा। यह भारत के लिए तीसरा अवसर है, जब उसे किम्बर्ली प्रोसेस की अध्यक्षता सौंपी जा रही है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत केवल एक बड़ा हीरा प्रोसेसिंग केंद्र नहीं, बल्कि नियम आधारित वैश्विक व्यापार व्यवस्था को आगे बढ़ाने वाला जिम्मेदार देश भी है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस फैसले को अंतरराष्ट्रीय हीरा व्यापार में भारत की नेतृत्व क्षमता का प्रमाण बताया है।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, यह चयन वैश्विक स्तर पर मोदी सरकार की पारदर्शी और ईमानदार व्यापार नीति पर बढ़ते भरोसे को दर्शाता है। भारत की यह भूमिका इसलिए भी अहम मानी जा रही है, क्योंकि दुनिया के लगभग 90 प्रतिशत कच्चे हीरों की कटिंग और पॉलिशिंग भारत में होती है, जिससे भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का केंद्रीय स्तंभ बन चुका है।
आखिर क्या है किम्बर्ली प्रोसेस और क्यों पड़ी इसकी जरूरत ?
किम्बर्ली प्रोसेस एक अंतरराष्ट्रीय और बहुपक्षीय पहल है, जिसमें सरकारें, अंतरराष्ट्रीय हीरा उद्योग और सिविल सोसाइटी एक साथ मिलकर काम करती हैं। इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य ‘संघर्ष हीरों’ (Conflict Diamonds) यानी अवैध हीरों के व्यापार पर रोक लगाना है। संघर्ष हीरे (Conflict Diamonds) वे कच्चे हीरे होते हैं, जिनका इस्तेमाल विद्रोही समूह या सशस्त्र संगठन युद्ध, हिंसा और अस्थिरता को वित्तपोषित करने के लिए करते हैं।
1990 के दशक में अफ्रीका के कई देशों में गृहयुद्ध और विद्रोह के पीछे हीरों से होने वाली अवैध कमाई एक बड़ी वजह बनी। इसी पृष्ठभूमि में संयुक्त राष्ट्र के समर्थन से किम्बर्ली प्रोसेस की नींव रखी गई, ताकि हीरों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित किया जा सके और यह सुनिश्चित हो सके कि हीरा हिंसा और रक्तपात का माध्यम न बने।
किम्बर्ली प्रोसेस सर्टिफिकेशन स्कीम की भूमिका और प्रभाव
किम्बर्ली प्रोसेस सर्टिफिकेशन स्कीम यानी KPCS को 1 जनवरी 2003 से लागू किया गया। इसके तहत यह अनिवार्य किया गया कि किसी भी देश से दूसरे देश में निर्यात या आयात होने वाले कच्चे हीरों के साथ प्रमाणपत्र होना चाहिए, जो यह साबित करे कि वे संघर्ष-रहित हैं। समय के साथ यह व्यवस्था इतनी प्रभावी हो गई कि आज यह दुनिया के 99 प्रतिशत से अधिक कच्चे हीरा व्यापार को नियंत्रित करती है।
वर्तमान में किम्बर्ली प्रोसेस में 60 प्रतिभागी शामिल हैं, जिनमें यूरोपीय संघ और उसके सदस्य देशों को एक इकाई के रूप में गिना जाता है। यह व्यवस्था हीरा उद्योग के लिए सबसे व्यापक और संगठित अंतरराष्ट्रीय नियामक ढाँचा बन चुकी है, जिसने अवैध हीरों की बाजार में एंट्री को काफी हद तक रोका है।
हीरा उद्योग के लिए किम्बर्ली प्रोसेस क्यों है इतना जरूरी?
हीरा उद्योग केवल लग्जरी या गहनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई देशों की अर्थव्यवस्था और लाखों लोगों की रोजी-रोटी से जुड़ा हुआ है। यदि संघर्ष हीरे खुले बाजार में प्रवेश कर जाते हैं, तो इससे न केवल युद्ध और हिंसा को आर्थिक मदद मिलती है, बल्कि उपभोक्ताओं का भरोसा भी टूटता है। किम्बर्ली प्रोसेस ने यह सुनिश्चित किया है कि ग्राहक जो हीरा खरीद रहा है, वह खून और हिंसा से सना हुआ न हो।
किम्बर्ली प्रोसेस के प्रयासों के चलते सिएरा लियोन, अंगोला, लाइबेरिया, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और कोट डी’वोआर जैसे देशों में संघर्ष हीरों की भूमिका काफी हद तक समाप्त हुई है। KP के अनुसार, आज संघर्ष हीरे वैश्विक उत्पादन का 0.1 प्रतिशत से भी कम रह गए हैं, जो इस पहल की सफलता को दर्शाता है।
2026 में भारत की अध्यक्षता से क्या बदल सकता है?
2026 में अध्यक्ष बनने के बाद भारत का फोकस किम्बर्ली प्रोसेस को और आधुनिक, पारदर्शी और प्रभावी बनाने पर रहेगा। भारत शासन और नियमों के सख्त अनुपालन के साथ-साथ डिजिटल सर्टिफिकेशन और हीरों की ट्रेसबिलिटी को बढ़ावा देने की दिशा में काम करेगा। डेटा आधारित निगरानी तंत्र के जरिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि हीरों की सप्लाई चेन में किसी भी तरह की गड़बड़ी को समय रहते पकड़ा जा सके।
इसके साथ ही भारत उपभोक्ताओं के बीच संघर्ष-रहित हीरों को लेकर भरोसा और मजबूत करने पर जोर देगा। भारत यह भी प्रयास करेगा कि किम्बर्ली प्रोसेस को अधिक समावेशी बहुपक्षीय मंच बनाया जाए, जहाँ सभी प्रतिभागियों और पर्यवेक्षकों की आवाज सुनी जाए और निर्णय प्रक्रिया अधिक विश्वसनीय बने।
वैश्विक तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और भारत की परीक्षा
भारत की अध्यक्षता ऐसे दौर में आने वाली है, जब वैश्विक हीरा व्यापार कई संवेदनशील मुद्दों से घिरा हुआ है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूसी हीरों पर G7 और यूरोपीय संघ द्वारा लगाए गए प्रतिबंध, मानवाधिकार उल्लंघन, जबरन श्रम और पर्यावरणीय नुकसान जैसे मुद्दों ने किम्बर्ली प्रोसेस की भूमिका को और जटिल बना दिया है।
रूसी कच्चे हीरे वैश्विक आपूर्ति का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा हैं, जबकि उनकी कटिंग-पॉलिशिंग का बड़ा केंद्र भारत है। ऐसे में भारत से अपेक्षा की जा रही है कि वह संतुलित और निष्पक्ष नेतृत्व के जरिए नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था को मजबूत करे और किम्बर्ली प्रोसेस की साख को बनाए रखे।
भारत का किम्बर्ली प्रोसेस का अध्यक्ष बनना केवल एक औपचारिक उपलब्धि नहीं, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि भारत अब वैश्विक व्यापार व्यवस्था में नियम बनाने और दिशा तय करने की स्थिति में है। 2026 में भारत की भूमिका यह तय करेगी कि आने वाले समय में हीरा उद्योग कितना पारदर्शी, नैतिक और भरोसेमंद बनता है। यही वजह है कि पूरी दुनिया की नजरें भारत के नेतृत्व पर टिकी होंगी।
क्रिसमस के दौरान देश के कई हिस्सों में इस पार्टी के नाम पर चल रही गतिविधियों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। बीते कुछ दिनों में राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से लगातार ऐसी खबरें आई हैं, जहाँ क्रिसमस कार्यक्रमों के दौरान धर्मांतरण के आरोप लगे, विरोध हुए और हालात तनावपूर्ण हो गए। कहीं लोगों को भोजन, इलाज या आर्थिक मदद का लालच देकर बुलाया गया, तो कहीं महिलाओं और बच्चों को हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ भड़काने की बातें सामने आईं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ये आयोजन केवल मजहबी प्रार्थनाएँ थीं, या फिर इनके पीछे कोई एजेंडा काम कर रहा था? क्या गरीब, अशिक्षित और जरूरतमंद लोगों को उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित किया जा रहा है? हिंदू संगठनों का दावा है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि लोगों की मजबूरी का उनकी गरीबी और उनके लालच का फायदा उठाना है।
राजस्थान के बूंदी में बढ़ा तनाव
राजस्थान के बूंदी जिले में चित्तौड़ रोड के एक चर्च के बाहर उस समय तनाव फैल गया, जब विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने धर्मांतरण की घटना का विरोध करते हुए प्रदर्शन शुरू कर दिया। संगठनों का कहना था कि चर्च में आयोजित कार्यक्रम के दौरान मिशनरी गतिविधियों के तहत लोगों का धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था। सूचना मिलते ही बड़ी संख्या में कार्यकर्ता मौके पर पहुँचे और चर्च का घेराव कर नारेबाजी की।
स्थिति बिगड़ती देख पुलिस मौके पर पहुँची और समझा कर हालात पर काबू पाया और दोनों पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील की। संगठनों ने प्रशासन को चेतावनी दी कि यदि ऐसे कार्यक्रम नहीं रुके, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।
बीकानेर में धर्मांतरण, 34 लोग हिरासत में
इसी तरह बीकानेर के श्रीडूंगरगढ़ क्षेत्र के मोमासर गाँव में क्रिसमस की रात एक घर में चल रही मजहबी गतिविधि पर पुलिस ने दबिश दी। सूचना थी कि बाहर से आए लोग बाइबल पाठ और धर्मांतरण में शामिल हैं। पुलिस ने 34 लोगों को हिरासत में लिया और चार गड़िया जब्त की। प्रशासन यह जाँच कर रहा है कि यह सामान्य प्रार्थना सभाथी या सोची समझी धर्मांतरण की कोशिश।
मध्य प्रदेश के विदिशा में क्रिसमस कार्यक्रम में धर्मांतरण की कोशिश
मध्य प्रदेश के विदिशा में एक होटल में आयोजित क्रिसमस कार्यक्रम के दौरान धर्मांतरण की कोशिश की। संगठन का कहना था कि लोगों को खाना और अन्य सुविधाओं का लालच देकर बुलाया गया और बाइबल के जरिए ईसाई बनने के लिए प्रेरित किया गया। मंत्री सारंग ने कहा कि धर्मांतरण की कोशिशें पूरी नहीं हो पाएँगी। ऐसे लोगों पर कार्रवाई का जाएगी।
जबलपुर में दिव्यांग बच्चों का धर्मांतरण, विरोध के बाद मारपीट
वहीं जबलपुर के कटंगा में हवाबाग चर्च परिसर में दिव्यांग बच्चों के लिए आयोजित भोज कार्यक्रम के दौरान गुपचुप धर्मांतरण का कार्यक्रम चलाया जा रहा था। दोनों पक्षों में मारपीट हुई, कई लोग घायल हुए और पुलिस को सख्ती करनी पड़ी।
हरियाणा के फतेहाबाद में धर्मांतरण
हरियाणा के भूना शहर में क्रिसमस पर्व के दौरान धर्म परिवर्तन के आरोप लगने से तनाव की स्थिति बन गई। वार्ड नंबर 5 और 3 में आयोजित कार्यक्रमों का पड़ोसियों ने विरोध किया, जिसके बाद पुलिस ने हस्तक्षेप किया। एक स्थान पर कार्यक्रम रोकना पड़ा, जबकि दूसरे स्थान पर पुलिस की मौजूदगी में शांतिपूर्वक कार्यक्रम संपन्न हुआ। पुलिस ने स्थिति को नियंत्रण में किया और निवासियों ने धर्म परिवर्तन की गतिविधियों पर रोक लगाने की मांग की।
उत्तर प्रदेश के घरों में धर्मांतरण कार्यक्रम, मोहल्लों में विरोध
उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में क्रिसमस के दौरान घरों में आयोजित कार्यक्रमों में धर्मांतरण कराया जा रहा था, जिसका पड़ोसियों ने विरोध किया, जिसके बाद पुलिस मौके पर पहुँची। कहीं कार्यक्रम रोकने पड़े, तो कहीं पुलिस की मौजूदगी में उन्हें पूरा कराया गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन घरों में लंबे समय से संदिग्ध गतिविधियाँ चल रही थीं और महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा था।
धर्मांतरण का वीडियो वायरल, महिला ने पोंछ दिया माँग का सिंदूर
धर्मांतरण के ऐसे ही एक खुलासे का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वायरल वीडियो में सुजीत मुखिया नाम के एक शख्स बताते हुए कह रहे है, “यहाँ पर जो भी महिलाएँ और बच्चियाँ दिख रहीं हैं इनलोगों का ऐसा माइंडवॉश किया गया है कि ये लोग कहते हैं कि हमारा जीवन परिवर्तन हो रहा है।” वे कह रहे हैं, “हमारे पंचायत में एक भी ईसाई समुदाय से नहीं हैं तो यहाँ चर्च हम नहीं चलने देंगे।”
पोछ दिए। हमारे पति को क्या हो गया। हम सिंदूर नहीं लगाएंगे। सिंदूर लगाने से क्या होता है।
ब्रेनवॉश का स्तर देखिए और कपार पीटिए। उम्मीद है इन मुखिया से और भी जन प्रतिनिधियों को प्रेरणा मिलेगी।
वह एक महिला से धर्मांतरण के नाम पर सवाल करते हैं कि ने सिंदूर क्यों लगाया है फिर, इस पर वह तुरंत अपना सिंदूर पोंछ लेती है। महिला कहती है, “पोछ दिए, पोछ दिए तो हमारे पति को क्या हो गया? सिंदूर लगाने से होता क्या है हम सिंदूर नहीं लगाएँगे”? वे बाकि महिलाओं से सवाल करते हुए कहते हैं हम भी बड़े कष्ट में हैं क्या धर्मांतरण करने से हमारा कष्ट दूर हो जाएगा?” इस पर वे सब कहने लगती हैं कि हाँ दूर हो जाएगा। सुजित साफ-साफ कहते हैं कि वे यहाँ चर्च नहीं चलने देंगे और वे सभी को वहाँ से निकलने के लिए कहते हैं, लेकिन महिलाएँ अड़ी रहती हैं।
नजर अंदाज नहीं की जा सकती ये घटनाएँ
क्रिसमस के नाम पर देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आई घटनाएँ अब महज गलतफहमी या स्थानीय विवाद कहकर टाली नहीं जा सकतीं। जब बार-बार एक ही पैटर्न सामने आए, जिसमें भोजन, इलाज, आर्थिक मदद या मनोरंजन के नाम पर लोगों को बुलाया जाए और फिर धर्मांतरण की घटनाएँ सामने आए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। राजस्थान के बूंदी-बीकानेर से लेकर मध्य प्रदेश के विदिशा और जबलपुर तक और उत्तर प्रदेश के मोहल्लों तक हर जगह तस्वीर लगभग एक जैसी दिखाई देती है।
हिंदू संगठनों का आरोप है कि समाज के सबसे कमजोर वर्ग गरीब, महिलाएँ, बच्चे और दिव्यांग को निशाना बनाया जा रहा है। अगर यह सच है, तो यह धार्मिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि मजबूरी का शोषण है। धर्म वह होना चाहिए जिसे व्यक्ति बिना लालच, डर या दबाव के अपनाए। खाना, दवा या किसी अन्य सुविधा के बदले आस्था बदल वाना न सेवा है, न ही संवैधानिक अधिकारों की सही व्याख्या।
यदि आयोजन पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के भीतर हैं, तो फिर विरोध और पुलिस कार्रवाई की नौबत क्यों आ रही है? बार-बार पुलिस का दखल, हिरासत और झड़पें इस बात का संकेत हैं कि जमीनी हकीकत कुछ और है।
बॉलीवुड अभिनेत्री जाह्नवी कपूर ने हाल में बांग्लादेश में हो रहे हिंदुओं के उत्पीड़न मामले पर आवाज उठाई तो इससे वामपंथी धड़ा और कट्टरपंथी जमात उनसे नाराज हो बैठी। कुछ ने सोशल मीडिया पर उनकी होती तारीफ के लिए निशाना बनाया तो वहीं ध्रुव राठी जैसे प्रोपगेंडाबाजों ने तो उन्हें फेक ब्यूटी के नाम पर घेरने का प्रयास किया।
क्या कहा था जाह्नवी कपूर ने?
जाह्नवी कपूर ने बांग्लादेश में हिंदू व्यक्ति दीपू चंद्र दास की भीड़ द्वारा हत्या की निंदा करते हुए इंस्टाग्राम स्टोरी पोस्ट की थी। गुरुवार (25 दिसंबर 2025) की रात जाह्नवी कपूर ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी में बांग्लादेश में हुई इस हत्या को ‘बर्बर’ बताया। उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक हिंसा और कट्टरता के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए और इसमें किसी तरह की नाराजगी नहीं होनी चाहिए।
जाह्नवी की स्टोरी का स्क्रीनशॉट
जाह्नवी कपूर ने इस घटना का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी हिंसक घटनाएँ कोई अकेली या अलग-थलग घटना नहीं हैं। उन्होंने लोगों को दोहरे मापदंड (मोरल हिपोक्रेसी) से सावधान रहने को कहा और यह सवाल उठाया कि जब अपने ही भाई-बहनों के साथ अत्याचार होता है, तो उस पर चुप्पी क्यों रहती है, जबकि दुनिया के दूसरे हिस्सों के मुद्दों पर जोर-शोर से आवाज उठाई जाती है।
इस पूरी घटना पर जाह्नवी कपूर के पोस्ट के कुछ ही घंटों बाद, ध्रुव राठी ने इंस्टाग्राम पर एक स्टोरी शेयर की। इसमें उसने अपने यूट्यूब वीडियो ‘Dark Side of Beauty’ का प्रचार किया, जिसकी थंबनेल में जाह्नवी कपूर की तस्वीर को प्रमुखता से दिखाया गया। वीडियो में ध्रुव राठी ने बॉलीवुड एक्टर-एक्ट्रेस द्वारा करवाए जाने वाले कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट पर भले फोकस किया था लेकिन उनके थंबनेल से साफ समझा जा सकता था कि उन्होंने उसमें जाह्नवी कपूर को ही क्यों चुना। राठी ने इसमें जाह्नवी के पहले और अब के चेहरे को दिखाकर मजाक उड़ाने की कोशिश की।
ध्रुव राठी की वीडियो का थंबनेल
ध्रुव राठी ने जाह्नवी के इंस्टा स्टोरी के चंद घंटे बाद ही ये वीडियो पब्लिक की तो लोगों को ध्रुव का प्रोपगेंडा समझने में समय नहीं लगा। उन्होंने इस तरह की हरकत करने के लिए ध्रुव को खूब लताड़ा। कई यूजर्स ने आरोप लगाया कि ध्रुव राठी, जाह्नवी कपूर द्वारा हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी हिंसा की निंदा किए जाने से ध्यान हटाने के लिए उनसे जुड़ा हुआ कोई और, असंबंधित कंटेंट फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।
एक यूजर ने लिखा, “जाह्नवी कपूर ने बांग्लादेशी हिंदुओं के समर्थन में पोस्ट किया और तुरंत मैक्रोहार्ड ध्रुव राठी ने उन पर हमला करना शुरू कर दिया। मुझे पूरा यकीन है कि वह हिंदू बनकर छिपा हुआ एक कटवा है।”
Jhanvi Kapoor posted in support of Bangladeshi Hindus and immediately MACROHARD @dhruv_rathee started attacking her.
एक यूजर ने लिखा, “जाह्नवी कपूर ने बांग्लादेशी हिंदुओं के समर्थन में पोस्ट किया। जर्मन यूट्यूबर ध्रुव राठी ने उन पर हमला करना शुरू कर दिया। अब यह कोई राज नहीं रहा कि वह जिहादियों के लिए काम कर रहा है। वह अब इसे छिपाने की कोशिश भी नहीं कर रहा है….और उसके फॉलोअर्स भी जिहादी हैं।”
Janhvi Kapoor posted in support of Bangladeshi Hindus. German Youtuber #DhruvRathee started attacking her It’s not a secret anymore that he is working for Jihadis. He isn’t even trying to hide it now….and his followers are also jihadis ? #BangladeshViolence#JhanviKapoorpic.twitter.com/zHi9cHMTyc
एक यूजर ने लिखा, “जाह्नवी कपूर ने बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ नरसंहार और अपराधों की निंदा की, कुछ घंटों बाद ध्रुव राठी ने जाह्नवी को टारगेट करते हुए एक वीडियो बनाया, क्या ये संकेत नेशनैलिटी साबित करने के लिए काफी हैं?”
Janhvi Kapoor calls out the slaughter and crimes against Hindus in Bangladesh ? hours later Dhruv Rathee made a video targeting Janhvi, this signs are enough to prove nationality? pic.twitter.com/nOrK7QRUH5
इसी तरह एक अन्य यूजर ने लिखा, “जाह्नवी कपूर ने अभी-अभी बांग्लादेशी हिंदुओं के मुद्दे पर एक स्टोरी पोस्ट की, और यह मैक्रोहार्ड जर्मन शेफर्ड ध्रुव राठी ने अपने अब्दुल फैन बेस को खुश करने के लिए तुरंत उन्हें इंसानियत से गिरा दिया।”
Jahnavi Kapoor just posted a story on Bangladeshi Hindus issue and this Macrohard German Shepherd @dhruv_rathee was quick to dehumanise her just to appease his Abdul fan base pic.twitter.com/wmpyo4ya3n
इन यूजर्स के अलावा बीजेपी नेता राधिका खेड़ा ने भी जाह्नवी के समर्थन में पोस्ट करते हुए लिखा, “जाह्नवी कपूर के बांग्लादेशी हिंदुओं पर दो शब्द ध्रुव राठी को काँटे जैसे चुभे और जाह्नवी की तस्वीर का घटिया आपत्तिजनक वीडियो बना डाला। इस ध्रुव राठी के वीडियों कॉन्ग्रेस अपने प्रचार में चलाती है। राहुल-प्रियंका गाँधी उन्हें पसंद करते है, जो महिला को नीचा दिखाते और हिंदुओं से नफरत।”
राधिका खेड़ा का ट्वीट और शमीम इकबाल की प्रतिक्रिया
राधिका की तरह तमाम नामी यूजर्स ने भी सोशल मीडिया पर वीडियो थंबनेल के स्क्रीनशॉट शेयर किए। आखिर में स्थिति ये आई कि आलोचनाओं से किनारा करने के लिए ध्रुव राठी ने अपना थंबनेल ही बदल दिया। अब इस वीडियो के ऊपर टाइगर श्रॉफ की पुरानी और अब की तस्वीर है। मगर, लोग प्रोपगेंडा करने की आदत के कारण ध्रुव को लताड़ रहे हैं। वहीं इस्लामी कट्टरपंथी हैं जो ध्रुव के समर्थन में हैं और जाह्नवी के पोस्ट पर अपनी घृणा दिखा रहे हैं। जाह्नवी को ट्रोल करते हुए उनका चेहरा देखने और मुस्लिमों के लिए आवाज उठाने को बोला जा रहा है।
सोशल मी़डिया पर शेयर होती तस्वीर
इस्लामी कट्टरपंथी भी पड़े पीछे
नीचे के पोस्टों में देख सकते हैं कि जब लोगों ने जाह्नवी ने पोस्ट की सराहना की तो इस्लामी कट्टरपंथियों ने यहाँ मजहब को घुसा दिया। राधिका के ट्वीट के नीचे ही शमीम इकबाल ने कमेंट किया कि जाह्नवी से दिक्कत इसलिए हुई है क्योंकि उन्होंने भारत में होने वाली मुस्लिमों की मॉब लिंचिंग को लेकर कभी कुछ नहीं कहा।
इसी तरह एक पोस्ट जहाँ पर जाह्नवी कपूर को सराहने की बात कही जा रही थी। वहाँ एक यूजर ने लिखा, “जब भारत में मुस्लिमों को लगभग रोज लिंचिंग का शिकार बनाया जा रहा था, तब वह गुस्सा और हिम्मत कहाँ थी?”
इसी तरह एक यूजर ने जाह्नवी के समर्थन में पोस्ट किया तो उसके कमेंट में एक वामपंथी ने लिखा, “उसने बस यह कोड क्रैक कर लिया है कि अंधभक्त को अपने साथ कैसे लाया जाए।”
मोहम्मद फुरकानुद्दीन ने लिखा, “जब इंडिया में मुस्लिमों के साथ मॉब लिंचिंग हुई थी तब तेरी जुबान क्यों बंद थी ???? बात अपने धर्म के लोगों की आई तब बहुत पुकार रहा है तू।”
इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि जब भी हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की बात होती है, तो इस्लामी कट्टरपंथी, वामपंथी सोच और उनके समर्थक तंत्र को असहजता होने लगती है। जाह्नवी कपूर ने मानवता के पक्ष में खड़े होकर बांग्लादेश में हुई बर्बर हत्या की निंदा की, लेकिन सच के समर्थन के बजाय उन्हें निशाना बनाया गया। वहीं ध्रुव राठी जैसे लोग इसको और बढ़ावा देते हैं। बता दें कि इससे पहले जाह्नवी कपूर ने फिल्म धुरंधर की भी सराहना की थी, जबकि ध्रुव राठी ने इस फिल्म को लेकर भी जहर घोलने और मुस्लिमों को खुश करने की कोशिश की थी। उनके अपराध को धो-पोंछने का प्रयास किया था।
कॉन्ग्रेस पार्टी ने अरावली पहाड़ियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार की गई संशोधित 100 मीटर वाली परिभाषा पर कड़ा विरोध जताया है। कॉन्ग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार इस नई परिभाषा के जरिए अरावली क्षेत्र के लगभग 90% हिस्से को संरक्षण से बाहर कर रही है, जिससे इस पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील इलाके में बड़े पैमाने पर खनन का रास्ता खुल सकता है।
इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस नेता और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला करते हुए इसे एक सुनियोजित साजिश बताया। गहलोत ने कहा कि अरावली की परिभाषा को 100 मीटर तक सीमित करना कोई अलग फैसला नहीं है, बल्कि यह संस्थानों पर कब्जा कर अरावली को खनन माफिया के हवाले करने की बड़ी योजना का हिस्सा है।
गहलोत ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के उस दावे को भी खारिज किया, जिसमें कहा गया है कि केवल 0.10% अरावली क्षेत्र ही खनन के लिए खुलेगा। उन्होंने इसे भ्रामक और तथ्यहीन बताया।
साथ ही, उन्होंने सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) पर भी सवाल उठाए और कहा कि 2002 में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में बनी यह समिति अब केंद्र सरकार के नियंत्रण में आकर रबर स्टैम्प बन चुकी है, जिससे अरावली के संरक्षण पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
VIDEO | Jaipur: Former Rajasthan CM and Congress leader Ashok Gehlot, on changing definition of Aravalli Hills and Ranges, said, "27,200 new legal and illegal mines may open in 0.19 percent of Aravallis, govt’s decision will destroy 90 percent of the range."
2002 में अरावली खनन का समर्थन, अब कॉन्ग्रेस का यू-टर्न
कॉन्ग्रेस पार्टी पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि वह सरकार में रहते हुए जिन नीतियों और फैसलों का समर्थन करती है, विपक्ष में आते ही उन्हीं का विरोध करने लगती है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इस दोहरे रवैये की एक और मिसाल पेश कर रहे हैं।
आज गहलोत केंद्र और राजस्थान की बीजेपी सरकारों पर अरावली पहाड़ियों को खनन माफिया के हवाले करने की साजिश का आरोप लगा रहे हैं और केंद्र सरकार के सिर्फ 0.019% क्षेत्र में खनन वाले तर्क पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि 2002 में गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार खुद अरावली क्षेत्र को खनन के लिए खोलना चाहती थी।
यानी जो फैसला उस समय कॉन्ग्रेस सरकार को सही लग रहा था, वही आज बीजेपी सरकार के दौर में गलत और जनविरोधी बताया जा रहा है। इसी वजह से कॉन्ग्रेस और अशोक गहलोत पर मौका देखकर रुख बदलने और राजनीतिक पाखंड का आरोप लगाया जा रहा है।
आज मैं अपनी प्रोफाइल पिक्चर (DP) बदलकर #SaveAravalli अभियान का हिस्सा बन रहा हूँ। यह सिर्फ एक फोटो नहीं, एक विरोध है उस नई परिभाषा के खिलाफ जिसके तहत 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को 'अरावली' मानने से इंकार किया जा रहा है। मेरा आपसे अनुरोध है कि अपनी प्रोफाइल पिक्चर बदलकर… pic.twitter.com/pt9u1O8UpX
साल 2002 में राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा (एफिडेविट) दाखिल किया था। इस हलफनामे में राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया था कि उसने खनन के लिए जंगल (वन) भूमि के उपयोग की अनुमति लेने के लिए केंद्र सरकार को 1543 मामलों में प्रस्ताव भेजे थे। यानी उस समय कॉन्ग्रेस सरकार खुद अरावली और वन क्षेत्रों में खनन की इजाजत देने की प्रक्रिया में शामिल थी और इसके लिए उसने औपचारिक रूप से केंद्र से मंजूरी माँगी थी।
वर्तमान में अशोक गहलोत और कॉन्ग्रेस पार्टी अरावली पहाड़ियों में खनन पर पूरी तरह प्रतिबंध की माँग कर रहे हैं। लेकिन इसके उलट, साल 2002 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार ने खनन क्षेत्र के महत्व को रेखांकित किया था।
उस समय सरकार ने कोर्ट को बताया था कि राज्य में बड़ी संख्या में लोगों की रोज़ी-रोटी खनन पर निर्भर है और अगर अरावली क्षेत्र में पूरी तरह खनन पर रोक लगा दी जाती है, तो इससे हजारों लोगों की आजीविका छिन जाएगी। यानी आज जिस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस सख्त रुख अपना रही है, उसी पर वह पहले विपरीत और व्यावहारिक तर्क दे चुकी है।
साल 2002 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में अशोक गहलोत की सरकार ने साफ तौर पर कहा था कि खनन क्षेत्र राज्य में बड़ी संख्या में लोगों को रोज़गार देता है। सरकार ने बताया था कि अगर पूरी अरावली पहाड़ियों में खनन पर रोक लगा दी जाती है, तो इस कठिन समय में हजारों लोग अपनी रोजी-रोटी नहीं चला पाएँगे।
हलफनामे में यह भी कहा गया था कि अरावली क्षेत्र में बड़ी संख्या में जनजातीय आबादी रहती है, जिनकी आजीविका का एक बड़ा स्रोत खनन है। खनन बंद होने से जनजातीय समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित होगा।
राज्य सरकार ने आगे बताया कि सभी खनन गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध से राज्य की अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुँचेगा, क्योंकि इन क्षेत्रों से निकलने वाले खनिज और उनसे जुड़ी आर्थिक गतिविधियाँ राजस्थान की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाती हैं।
हलफनामे के अनुसार, अरावली क्षेत्र में 5,000 से अधिक खनन पट्टे और 641 खदान के पास लाइसेंस थे। इनसे सीधे तौर पर करीब 1.75 लाख लोगों को रोज़गार मिलता था। इसके अलावा, खनन से जुड़े कामों जैसे खनिज परिवहन, मशीनरी संचालन, खनिज प्रसंस्करण और व्यापार के जरिए 14 जिलों में लगभग 6 लाख लोगों को रोजगार मिलता था।
सरकार ने यह भी चेतावनी दी थी कि अगर अरावली में खनन बंद किया गया, तो करीब 9,700 औद्योगिक इकाइयाँ, जिनमें लगभग 884 करोड़ रुपए का निवेश है और जो 64,000 लोगों को सीधा रोजगार देती हैं, वे गंभीर रूप से प्रभावित होंगी। साथ ही, राज्य की अन्य खनिज-आधारित उद्योग इकाइयाँ, जो इन खदानों से कच्चा माल लेती हैं, उन पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।
संबंधित एफिडेविट से लिए गए कुछ हिस्से
आज कॉन्ग्रेस और अशोक गहलोत पर्यावरण और अरावली संरक्षण की बात कर रहे हैं, लेकिन 2002 में सत्ता में रहते हुए उनकी सरकार का रुख बिल्कुल अलग था। उस समय कॉन्ग्रेस सरकार ने अरावली क्षेत्र में मौजूद रॉक फॉस्फेट, जिंक, वोलास्टोनाइट और अन्य खनिजों के बड़े भंडार को प्राथमिकता दी थी और दलील दी थी कि खनन पर रोक लगाने से कई उद्योगों को नुकसान होगा। यानी तब कॉन्ग्रेस ने अरावली की पारिस्थितिकी नहीं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को ज्यादा जरूरी माना।
उस दौर में अशोक गहलोत ने खनन से मिलने वाले राजस्व को प्राथमिकता दी, न कि उस पर सख्त प्रतिबंध को। आज गहलोत यह दावा कर रहे हैं कि 2002 में उनकी सरकार ने CEC द्वारा सुझाई गई 100 मीटर की परिभाषा को रोज़गार के नजरिये से अपनाया था। लेकिन यह सवाल उठता है कि जो रोज़गार का तर्क तब सही था, वह आज अचानक गलत कैसे हो गया?
हकीकत यह है कि अगर अरावली में सिर्फ 0.019% क्षेत्र, वह भी गैर-संरक्षित जोन में खनन की अनुमति दी जाती है, तो इससे बड़े पैमाने पर रोज़गार पैदा हो सकता है। लेकिन चूँकि आज कॉन्ग्रेस सत्ता में नहीं है, इसलिए वही खनन उसे गलत और खनन माफिया को अरावली सौंपने की साजिश नजर आ रहा है।
दरअसल, कॉन्ग्रेस का नजरिया इस बात पर बदलता दिखता है कि वह सत्ता में है या विपक्ष में जो कदम सत्ता में रहते हुए सही लगता है, वही विपक्ष में जाकर विनाश की साजिश बताया जाता है।
यह भी अहम है कि अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने अरावली की 100 मीटर परिभाषा के आधार पर सबसे ज्यादा 700 से अधिक खनन अनुमतियाँ दी थीं, जिसका वह आज विरोध कर रहे हैं।
इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने बताया कि राजस्थान में चल रही 1,008 खदानों में से करीब 700 खदानें अशोक गहलोत के कार्यकाल में शुरू हुईं। उन्होंने यह भी कहा कि कॉन्ग्रेस सरकार के समय बिना रोक-टोक खनन पट्टे दिए गए, जिस पर बाद में सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप कर रोक लगानी पड़ी।
इसके अलावा, मार्च 2024 की CEC रिपोर्ट में यह सामने आया कि अरावली क्षेत्र में अवैध खनन सालों से एक गंभीर समस्या बना हुआ है। रिपोर्ट में यह भी याद दिलाया गया कि 2010 में कोर्ट ने पाया था कि कई खनन पट्टाधारक, लीज़ खत्म होने के बाद भी खनन जारी रखे हुए थे। अरावली को लेकर कॉन्ग्रेस का रुख सिद्धांत से ज्यादा सत्ता की स्थिति पर निर्भर करता दिखाई देता है।
अशोक गहलोत के दोहरे रवैये पर सवाल उठाते हुए बीजेपी नेता अरुण चतुर्वेदी ने कहा, “मुझे हैरानी है कि 2002 में जब अशोक गहलोत खुद मुख्यमंत्री थे और उनकी सरकार सत्ता में थी, तब उन्होंने इसी मुद्दे पर अपनी सहमति दी थी। लेकिन आज वही गहलोत इस मुद्दे को फिर से उठा रहे हैं और बेवजह विवाद खड़ा कर रहे हैं।”
#WATCH | Ajmer: On court order regarding Aravalli mountain range, Rajasthan State Finance Commission Chairman Arun Chaturvedi says, "A few days ago, former Rajasthan CM Ashok Gehlot tweeted about granting permission for mining within a 100-meter radius, turning this judicial… pic.twitter.com/15AQHBnGLb
बीजेपी नेता अरुण चतुर्वेदी ने आगे कहा कि जब अरावली के लगभग 98% क्षेत्र में पहले से ही खनन पर प्रतिबंध है, तो इस मुद्दे पर अब राजनीति करने का कोई औचित्य नहीं है।
इस बीच, यह भी कहा जा रहा है कि वोट चोरी का मुद्दा, जिसे कॉन्ग्रेस खासतौर पर राहुल गाँधी, जोर-शोर से उठा रही थी, जब जनता में असर नहीं दिखा पाया, तो अब कॉन्ग्रेस ने अरावली पहाड़ियों के नाम पर एक नया डर पैदा करने वाला नैरेटिव गढ़ना शुरू कर दिया है, ताकि बीजेपी को घेरा जा सके।
इस मुद्दे पर इस बार सोनिया गाँधी खुद सामने आईं। उन्होंने 3 दिसंबर को द हिंदू अखबार में एक लेख लिखकर दावा किया कि मोदी सरकार ने अरावली पहाड़ियों के लिए मृत्युदंड पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। सोनिया गाँधी ने आरोप लगाया कि 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ खनन से सुरक्षित नहीं रहेंगी, और इससे अरावली का करीब 90% हिस्सा अवैध खनन और माफिया के लिए खुल जाएगा।
सोनिया गाँधी ने अपने लेख में लिखा कि, “मोदी सरकार ने अब लगभग इन पहाड़ियों के लिए मृत्यु वारंट पर दस्तखत कर दिए हैं, जो पहले ही अवैध खनन से उजड़ चुकी हैं। सरकार ने यह घोषित कर दिया है कि 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों पर खनन रोक के नियम लागू नहीं होंगे। यह अवैध खनन करने वालों और माफिया के लिए खुला न्योता है कि वे अरावली के उस 90% हिस्से को खत्म कर दें, जो सरकार द्वारा तय ऊँचाई सीमा से नीचे आता है।”
कॉन्ग्रेस नेता और उनसे जुड़े वैचारिक रूप से समर्थक मीडिया व सोशल मीडिया इकोसिस्टम अरावली पहाड़ियों के भविष्य को लेकर डर फैलाने वाला नैरेटिव लगातार बढ़ा रहे हैं।
इस पूरे विवाद की शुरुआत 20 नवंबर 2025 को हुई, जब सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय द्वारा दी गई अरावली की ऑपरेशनल परिभाषा को मंजूरी दी।
संशोधित परिभाषा के अनुसार, अरावली पहाड़ी वह भू-आकृति होगी जो अरावली जिलों में स्थित हो और स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक ऊँची हो।
वहीं, अरावली रेंज की परिभाषा यह तय की गई कि 100 मीटर या उससे अधिक ऊँचाई वाली दो या अधिक अरावली पहाड़ियाँ, जो एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर स्थित हों, उन्हें मिलाकर अरावली रेंज माना जाएगा।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह पूरे क्षेत्र की सटीक मैपिंग करे और सस्टेनेबल माइनिंग के लिए एक मैनेजमेंट प्लान (MPSM) तैयार करे।
इसके बाद लेफ्ट लिबरल इकोसिस्टम ने #SaveAravalli अभियान चलाया, मानो केंद्र सरकार कुछ ही दिनों में अरावली को खत्म कर देने वाली हो। इस पर मोदी सरकार ने साफ किया कि न तो अरावली को खनन माफिया के हवाले किया जा रहा है, न ही 90% अरावली अपनी पहचान खोने वाली है। सरकार ने यह भी खारिज किया कि मौजूदा पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को कमजोर किया जा रहा है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि 100 मीटर का नियम पहाड़ियों की ऊँचाई के ऊपरी 100 मीटर से नहीं, बल्कि स्थानीय भू-स्तर से ऊँचाई से जुड़ा है, जिसे लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है।
यह भी अहम है कि राजस्थान सरकार ने खुद 2002 की समिति रिपोर्ट के आधार पर अरावली की परिभाषा तय की थी, जो रिचर्ड मर्फी की लैंडफॉर्म क्लासिफिकेशन पर आधारित थी। इसके तहत स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर ऊँची सभी संरचनाओं को पहाड़ी माना गया और उन पर तथा उनकी ढलानों पर खनन प्रतिबंधित किया गया। राजस्थान 9 जनवरी 2006 से इसी परिभाषा का पालन कर रहा है।
केंद्र सरकार पहले ही यह कह चुकी है कि 100 मीटर या उससे अधिक ऊँची पहाड़ियों को घेरने वाली सबसे निचली कंटूर लाइन के भीतर आने वाला पूरा क्षेत्र, उसकी ऊँचाई या ढलान चाहे जो हो, खनन पट्टे से बाहर रहेगा।
सरकार ने यह भी साफ किया कि जब तक ICFRE द्वारा MPSM को अंतिम रूप नहीं दिया जाता, तब तक कोई नया खनन पट्टा नहीं दिया जाएगा। भविष्य में भी खनन केवल उन्हीं क्षेत्रों में होगा, जहाँ वैज्ञानिक आधार पर सस्टेनेबल माइनिंग संभव होगी।
यह साफ है कि कॉन्ग्रेस अनावश्यक विवाद खड़ा करने की कोशिश कर रही है, जबकि यह परिभाषा सिर्फ प्रशासनिक (ऑपरेशनल) है और सुप्रीम कोर्ट ने नए खनन पट्टों पर रोक लगाकर पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित कर दी है। 21 दिसंबर को पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) ने साफ कहा था कि संरक्षित क्षेत्र, इको-सेंसिटिव जोन, टाइगर रिजर्व, वेटलैंड और CAMPA प्लांटेशन क्षेत्रों में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। इसके बावजूद विपक्ष के शोर को देखते हुए मंत्रालय ने 24 दिसंबर को एक और बयान जारी कर अरावली में किसी भी नए खनन पट्टे पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
मंत्रालय ने कहा कि यह प्रतिबंध पूरी अरावली श्रृंखला पर समान रूप से लागू होगा, जिसका उद्देश्य गुजरात से लेकर दिल्ली-NCR तक फैली अरावली की भौगोलिक अखंडता को बचाना और अवैध व अनियंत्रित खनन को रोकना है।
MoEFCC ने ICFRE को यह जिम्मेदारी भी दी कि वह पूरे अरावली क्षेत्र में ऐसे अतिरिक्त इलाके चिन्हित करे, जहाँ पर्यावरण, भू-गर्भीय संरचना और लैंडस्केप के आधार पर खनन पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए, भले ही वे पहले से प्रतिबंधित क्षेत्रों में न आते हों।
इतना ही नहीं, ICFRE द्वारा तैयार किया गया MPSM भी सीधे लागू नहीं किया जाएगा। उसे पहले सार्वजनिक किया जाएगा, ताकि सभी हितधारकों से सुझाव लिए जा सकें। यानी जब तक वैज्ञानिक अध्ययन, पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन, इकोलॉजिकल क्षमता, संरक्षण योग्य क्षेत्रों की पहचान और पुनर्स्थापन की स्पष्ट योजना तैयार नहीं हो जाती, तब तक कोई नया खनन पट्टा नहीं मिलेगा। इसके बाद भी सिर्फ गैर-संरक्षित क्षेत्रों में ही सीमित खनन की अनुमति दी जाएगी।
अंत में, केंद्र सरकार ने गुजरात, राजस्थान और हरियाणा की राज्य सरकारों को सख्त निर्देश दिए हैं कि जो भी वैध खनन चल रहा है, वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश और सभी पर्यावरणीय नियमों का पूरी तरह पालन करते हुए ही किया जाए।
माइनिंग माफिया से अरावली को बचाने वाले अशोक गहलोत ने अपने रिश्तेदारों को माइनिंग के ठेके दिए
विडंबना यह है कि कॉन्ग्रेस ने अरावली खनन नीति को लेकर बीजेपी पर हमला करने के लिए अशोक गहलोत को आगे किया। हालाँकि, गहलोत खुद कई करोड़ के खनन घोटाले में संदेह के दायरे में रहे हैं।
2015 में, गहलोत और उनके एक रिश्तेदार का नाम एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की चार्जशीट में आया था, हालाँकि उन्हें आरोपित नहीं बनाया गया। इसमें कहा गया कि IAS अधिकारी अशोक सिंहवी ने एक अन्य आरोपित को बताया कि गहलोत का रिश्तेदार एक खनन कारोबारी के लिए काम करता था ताकि राजनीतिक वर्ग से लाभ लिया जा सके। सिंहवी और तीन खनन अधिकारियों पर किकबैक गिरोह चलाने का आरोप था। ये लोग अनुबंधों को मनमाने ढंग से रद्द कर खनन रोककर मालिकों से पैसे वसूलते थे।
2013 में, गहलोत पर यह आरोप था कि उन्होंने सैंडस्टोन खनन के ठेके अपने रिश्तेदारों को दिए थे और कुल 37 खदानों में से 19 खदानें अपने रिश्तेदारों को आवंटित कीं।
2022 में, गहलोत के नेतृत्व में राजस्थान के माइन डिपार्टमेंट ने चूना पत्थर की खदानों को मार्बल ग्रेड में बदल दिया, जिससे राज्य को लगभग 1,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।
इसके अलावा, 2014 में रिपोर्ट हुई कि गहलोत के रिश्तेदारों की कंपनी गोटन लाइमस्टोन खनिज उद्योग लिमिटेड (GKUPL) ने नागौर जिले के गोतन क्षेत्र में 10 वर्ग किलोमीटर खनन क्षेत्र को अल्ट्रा टेक सीमेंट को अवैध रूप से बेच दिया। गहलोत के रिश्तेदारों में राम वल्लभ चौहान, सुरेश चौहान, रमेश चौहान और राम अवतार चौहान (चौहान ब्रदर्स) शामिल थे।
ACB ने पाया कि यह खनन पट्टा नियमों का उल्लंघन था। पहले, 1997 में 2 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जेके सीमेंट को बेचा गया था और जब इसका स्थानांतरण आवेदन खान विभाग में लंबित था, तब 2012 में गहलोत के रिश्तेदारों ने पूरा 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र अल्ट्रा टेक को बेच दिया। सार यह है कि अशोक गहलोत ने खुद खनन से जुड़े कई विवादों और आरोपों के बीच, अब बीजेपी पर अरावली खनन नीति को लेकर हमला करने का नेतृत्व लिया है।
अरावली पहाड़ियाँ क्यों जरूरी हैं?
लगभग 2.5 अरब साल पुराने अरावली पहाड़ गुजरात से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैले हुए हैं। माउंट आबू का गुरु शिखर (1,722 मीटर) इसकी सबसे ऊँची चोटी है। दिल्ली की रिज, जिसे अक्सर राजधानी की हरी दीवार या हरी फेफड़े कहा जाता है, उसे भी अरावली श्रृंखला का ही हिस्सा है।
अरावली पहाड़ियों के बिना, थार रेगिस्तान धीरे-धीरे पूर्व की ओर बढ़ सकता है, जो हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैल सकता है। यही वजह है कि अरावली को मरुस्थलीकरण के खिलाफ प्राकृतिक ढाल माना जाता है।
अरावली की पहाड़ियाँ और पहाड़ों की कतारे जीवन देने वाली हैं। ये गर्म हवाओं के प्रवाह को नियंत्रित करती हैं और भूजल स्तर बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। अरावली क्षेत्र खनिज संपदा का भंडार है, जहाँ सैंडस्टोन, लाइमस्टोन, मार्बल, ग्रेनाइट के साथ-साथ सीसा, जिंक, तांबा, सोना और टंग्स्टन जैसे खनिज पाए जाते हैं।
इसके अलावा, अरावली में अलग-अलग वनस्पति और जीव-जंतु पाए जाते हैं, जो जैव विविधता को समृद्ध बनाते हैं। यही नहीं, चंबल, साबरमती और लूणी जैसी महत्वपूर्ण नदियों का उद्गम भी अरावली क्षेत्र से होता है। इन सभी कारणों से अरावली पहाड़ियाँ पर्यावरण, जल और जीवन के लिए बेहद जरूरी मानी जाती हैं।
कॉन्ग्रेस की सुविधा की राजनीति
इसलिए यह साफ है कि अरावली के संरक्षित क्षेत्रों में अवैध खनन और गैर-वन गतिविधियों की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन अरावली की संशोधित परिभाषा और खनन नीति को लेकर विपक्ष जिस तरह डर फैलाने की राजनीति कर रहा है, उससे यह संकेत मिलता है कि कॉन्ग्रेस के लिए अरावली न तो भावनात्मक मुद्दा है और न ही कोई वास्तविक चिंता। यह सिर्फ राजनीतिक विरोधियों पर हमला करने का एक और मौका बन गया है।
यह पहली बार नहीं है जब सत्ता से बाहर होने के बाद कॉन्ग्रेस उसी फैसले पर नाराज़गी जता रही है, जिसे वह खुद सत्ता में रहते हुए मंजूरी दे चुकी थी। खासतौर पर अशोक गहलोत इस राजनीति के माहिर खिलाड़ी रहे हैं। इसका उदाहरण न सिर्फ 2002 के हलफनामे में खनन के समर्थन से आज पूर्ण प्रतिबंध की माँग में दिखता है, बल्कि हनुमानगढ़ एथेनॉल प्लांट विवाद में भी साफ नजर आता है।
ध्यान देने वाली बात है कि हनुमानगढ़ का एथेनॉल प्लांट 2023 में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने ही मंजूर किया था। लेकिन जब सत्ता बदली और बीजेपी सरकार ने उसी परियोजना का निर्माण जारी रखा, तो वही गहलोत और कॉन्ग्रेस उसके खिलाफ खड़े हो गए।
यह विवाद तब शुरू हुआ था जब कॉन्ग्रेस सरकार ने 2023 में पंजाब की कंपनी ड्यून एथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड के एथेनॉल प्लांट प्रोजेक्ट को करीब 450 करोड़ रुपए की फंडिंग के लिए चुना। चुनाव तक सब कुछ ठीक चलता रहा, लेकिन जैसे ही कॉन्ग्रेस सत्ता से बाहर हुई, वही परियोजना, जो रोजगार पैदा करने और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाली बताई जा रही थी, कॉन्ग्रेस के लिए बीजेपी की कॉरपोरेटपरस्ती की योजना बन गई। कुल मिलाकर, आलोचकों का कहना है कि कॉन्ग्रेस के विरोध नीति या पर्यावरण के आधार पर नहीं, बल्कि सत्ता में होने या न होने पर आधारित नजर आता है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)