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मुंडन समारोह में अनुसूचित जाति की गरीब महिलाओं को बुलाया: लालच देकर ईसाइयत अपनाने के लिए उकसाया, पुलिस ने एक महिला समेत दो लोगों को गिरफ्तार किया, गोरखपुर की घटना

गोरखपुर पुलिस ने शुक्रवार (5 दिसंबर 2025) को दो लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें एक महिला भी शामिल है। इनलोगों ने घर में मुंडन कार्यक्रम बोल कर गरीब महिलाओं को बुलाया था। महिलाओं को लालच देकर ईसाइयत अपनाने के लिए प्रेरित किया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मामले में दर्ज FIR की कॉपी ओपइंडिया के पास है।

गुरुवार (4 दिसंबर 2025) को दो आरोपित गाँव में पहुँचे और करीब 30 आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को अपने झाँसे में लेने लगे। उन्होंने महिलाओं से कहा कि यदि वे ईसाइयत अपना लें, तो उन्हें बेहतर जीवन, नकद, कष्टों से छुटकारा और हर परेशानी से मुक्ति मिलेगी। जब कुछ महिलाओं ने इसका विरोध किया, तो आरोपितों ने उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश की।

घटना की जानकारी बजरंग दल के सदस्यों को दी गई, जो तुरंत मौके पर पहुँचे। पुलिस को बुलाया गया और बजरंग दल के एक कार्यकर्ता की शिकायत पर FIR दर्ज हुई। पुलिस ने देवरिया के रहने वाले दो आरोपितों प्रदीप कुमार और रीना देवी को गिरफ्तार कर लिया। दोनों को शुक्रवार (5 दिसंबर 2025) को कोर्ट में पेश किया गया, जहाँ से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

FIR में क्या लिखा है?

FIR बजरंग दल गोरखपुर ग्रामीण के जिला सह-समन्वयक बिट्टू जायसवाल की शिकायत पर दर्ज की गई है। इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318, 61 और 351(2) तथा उत्तर प्रदेश अवैध धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम 2021 की धारा 3 और 5(1) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

स्रोत – यूपी पुलिस

अपनी शिकायत में बिट्टू जायसवाल ने बताया कि उन्हें विश्व हिंदू परिषद (VHP) के विभागीय संगठन मंत्री निखिल तोमारी से जानकारी मिली थी कि ब्रह्मसरी गाँव के हरिजन बस्ती में धर्मांतरण की गतिविधि चल रही है।

शिकायत में बताया गया कि प्रदीप और रीना ने सीता देवी के घर 25 से 40 महिलाओं को इकट्ठा किया और उन्हें आरामदायक जीवन, नकद, ईश्वरीय आशीर्वाद और सभी परेशानियों से मुक्ति का लालच देकर मानसिक दबाव बनाया।

आरोपित बाइबल दिखाकर ईसाई धर्म का प्रचार कर रहे थे, घर में प्रार्थना करा रहे थे और जो महिलाएँ मानने से इंकार करतीं, उन्हें धमका रहे थे। वहाँ मौजूद ज्यादातर महिलाएँ अनुसूचित जाति से थीं।

स्रोत – यूपी पुलिस

जायसवाल ने कहा कि आरोपित समाज सेवा का दिखावा कर रहे थे, जबकि असल में उनका मकसद महिलाओं का धर्मांतरण कराना था। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी गतिविधियाँ कमजोर वर्ग की महिलाओं को हिंदू धर्म छोड़ने के लिए लालच दिया जाता है, जो समाज और राष्ट्रहित दोनों के लिए नुकसानदायक है।

मीडिया से बात करते हुए बेलघाट थाने के SHO विकासनाथ ने बताया कि मामला बेहद संवेदनशील है और आरोप गंभीर हैं। पुलिस यह भी जाँच कर रही है कि क्या इस धर्मांतरण प्रयास में और लोग भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि जाँच जारी है और जो भी जानकारी सामने आएँगे, उनके आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

(मूल रूप से ये खबर अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

धधकाई राष्ट्रप्रेम की ज्वाला, पर इस्लामवादियों ने नहीं किया कबूल: नेहरू ने हटवाए माँ दुर्गा की स्तुति वाले छंद, ‘वंदे मातरम के 150 साल’ पर संसद में बेनकाब होगा लिबरल गैंग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार (8 दिसंबर 2025) को लोकसभा में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगाँठ पर ऐतिहासिक डिबेट की शुरुआत करने जा रहे हैं। यह पहला अवसर है जब संसद में इस गीत के इतिहास, उसके महत्व और स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका पर इतने व्यापक स्तर पर चर्चा होगी।

सरकार इस बहस को विशेष रूप से युवाओं तक वंदे मातरम् के संदेश को पहुँचाने का अवसर मान रही है। यह वही गीत है, जिसने स्वतंत्रता की अलख जगाई और भारतीय स्वाभिमान की नींव रखी।

संसद में ऐतिहासिक डिबेट की शुरुआत

लोकसभा की कार्यसूची में सोमवार (8 दिसंबर 2025) को ‘राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर चर्चा’ शामिल की गई है और इसके लिए दस घंटे का समय निर्धारित किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बहस की शुरुआत करेंगे और उनके बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अपने विचार रखेंगे।

विपक्ष की ओर से कॉन्ग्रेस ने प्रियंका गाँधी वाड्रा और सांसद गौरव गोगोई को इस बहस में हिस्सा लेने के लिए चुना है। वहीं राज्यसभा में मंगलवार (9 दिसंबर 2025) को गृह मंत्री अमित शाह इस बहस का नेतृत्व करेंगे और उनके बाद स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा बोलेंगे। यह चर्चा उस समय हो रही है, जब हाल ही में चुनाव सुधारों और एसआईआर को लेकर संसद में कई बार गतिरोध देखने को मिला था।

वंदे मातरम् की रचना: साहित्य से राष्ट्रगीत बनने की यात्रा

वंदे मातरम् की रचना बंगाल के महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में की थी। यह पहली बार 7 नवंबर 1875 को उनकी प्रसिद्ध पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ। बाद में 1882 में उन्होंने इसे अपने उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया।

यह गीत केवल कविता नहीं था, बल्कि माँ और मातृभूमि दोनों की आराधना का एक अद्भुत संगम था। इसमें भारत की धरती, प्रकृति और संस्कृति को देवी रूप में प्रस्तुत किया गया। 1950 में संविधान सभा ने इसे भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया।

स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की गूँज

1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में जब स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ, तब वंदे मातरम् एक साधारण गीत से आगे बढ़कर आंदोलन की आवाज बन गया। स्कूलों, कॉलेजों, जनसभाओं और रैलियों में युवा इसे गाते थे और ब्रिटिश राज के खिलाफ संघर्ष को नई ऊर्जा देते थे।

रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार संगीत में ढालकर जनता के सामने प्रस्तुत किया। इसके बाद अरविंदो घोष, बिपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक और अनेक नेताओं ने इसे स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बना दिया। उस समय यह गीत हर भारतीय के हृदय में साहस और प्रेरणा की अग्नि जलाने वाला एक मन्त्र बन चुका था।

अंग्रेजों का भय और प्रतिबंध

ब्रिटिश सरकार इस गीत को विद्रोह और स्वतंत्रता की भावना बढ़ाने वाला मानती थी। इसलिए 1910 के बाद प्रशासन ने स्कूलों, सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् बोलने या गाने पर प्रतिबंध लगा दिया।

छात्रों को स्कूलों से निकाला गया, नेताओं को जेल भेजा गया और कई लोगों को सजाएँ दी गईं, लेकिन फिर भी इस गीत की आवाज को दबाया नहीं जा सका। प्रतिबंध जितना कड़ा होता गया, वंदे मातरम् उतनी ही ताकत के साथ जनमानस में गूँजता रहा।

विदेशों में भारतीय पहचान का प्रतीक

1907 में जर्मनी के स्टटगार्ट में मैडम भीकाजी कामा ने भारत का पहला तिरंगा फहराया और उस तिरंगे पर वंदे मातरम् लिखा हुआ था। यह वह क्षण था जब यह गीत भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर विश्वभर में भारत की आजादी और अस्मिता का प्रतीक बन गया।

मुस्लिम लीग ने किया विरोध और नेहरू ने की काँट-छाँट

जब यह गीत स्वतंत्रता की पहचान बन रहा था, 1908 में मुस्लिम लीग ने इसके विरोध की शुरुआत की। अमृतसर अधिवेशन में सैयद अली इमाम ने कहा कि यह गीत इस्लाम विरोधी है, क्योंकि इसमें मातृभूमि की तुलना देवी-देवताओं से की गई है। बाद में खिलाफत आंदोलन के दौरान यह भावना और गहरी होती गई।

इस विरोध के बीच, 1937 में कॉन्ग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे। आजाद ने गीत का अध्ययन किया और निष्कर्ष दिया कि इसके शुरुआती दो पद केवल मातृभूमि की वंदना करते हैं और इनमें किसी मजहबी भावना का विरोध नहीं है।

नतीजतन, कॉन्ग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया कि राष्ट्रगीत के रूप में केवल दो ही पद स्वीकार किए जाएँ। नेहरू की अध्यक्षता में कॉन्ग्रेस ने संक्षिप्त संस्करण अपनाने का फैसला किया था, जिसमें से जानबूझकर माँ दुर्गा की स्तुति करने वाले छंद हटा दिए गए थे। ऐसा करते हुए कॉन्ग्रेस ने अपने सांप्रदायिक एजेंडे के लिए फैजपुर अधिवेशन में वंदे मातरम् के छोटे स्वरूप को अपनाया।

कट्टरपंथियों ने हमेशा ही खड़ा किया विवाद

आज भी समय के साथ नाम और बहाने बदल गए हैं, लेकिन मानसिकता वही है। कभी इसे इस्लाम विरोधी कहा जाता है, तो कभी सेकुलरिज्म के नाम पर अस्वीकार किया जाता है। बिहार विधानसभा में ओवैसी की पार्टी के विधायकों ने वंदे मातरम् गाने से इनकार किया, तो समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने संसद में इसे ‘इस्लाम के खिलाफ’ बताया।

बर्क का यह रवैया नया नहीं था, 1997, 2013 और 2019 में भी उन्होंने यही तर्क दोहराया। इसी तरह राजद नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने कहा, “जो एकेश्वर में विश्वास रखता है, वह वंदे मातरम् नहीं गा सकता।”

यह सोच केवल राजनीति तक सीमित नहीं रही। 2019 में देवबंद के मदरसे जामिया हुसैनिया के मुफ्ती तारिक कासमी ने आदेश जारी कर वंदे मातरम् और भारत माता की जय बोलने पर पाबंदी लगा दी, यह कहते हुए कि ‘इस्लाम में केवल अल्लाह की इबादत होती है।”

आज का वंदे मातरम्: भावना, पहचान और राष्ट्रगौरव

150 वर्ष बीत जाने के बाद भी वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं है। यह राष्ट्रगौरव, समर्पण और मातृभूमि के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति है। यह गीत धर्म या राजनीति की सीमाओं में कैद नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की आवाज है।

प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में संसद में होने वाली यह चर्चा केवल इतिहास याद करने का अवसर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देने का क्षण है कि राष्ट्र के प्रति प्रेम ही सच्चा राष्ट्रधर्म है।

जहाँ कभी लाल आतंकी करते थे बारूद की खेती, वहाँ की जमीनें अब पैदा कर रही हरियाली: सुकमा में ‘आम बगीचा-लखपति दीदी’ से आम लोग लिख रहे विकास की गाथाएँ

कभी नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ का सुकमा अब बदलते दौर की नई कहानी लिख रहा है। घने जंगल, मुश्किल भौगोलिक हालात और सीमित सरकारी पहुँच के चलते यहाँ लंबे समय तक ‘लाल आतंक’ पनपता रहा लेकिन अब हालात बदलने लगे हैं।

केंद्र और राज्य सरकार की पहल पर शुरू हुई ‘आम बगीचा योजना’ ने इलाके की नक्सली पहचान को पलट देना शुरू कर दिया है। छोटे-छोटे बागानों ने ग्रामीणों की आमदनी बढ़ाई है, महिलाओं ने व्यवसाय में कदम रखा है और कुछ तो ‘लखपति दीदी’ बनने की ओर अग्रसर हैं।

यह सिर्फ आर्थिक बदलाव नहीं है बल्कि सुरक्षा, आत्मविश्वास और सामाजिक सोच में भी स्पष्ट सुधार दिख रहा है। जब विकास यहाँ तक पहुँचता है, तो असर केवल पैसों तक सीमित नहीं रहता, यह लोगों की उम्मीदें, हौसला और भविष्य की चुनौतियों से निपटने की शक्ति भी बढ़ाता है।

‘आम बगीचा परियोजना’ का उद्देश्य

‘आम बगीचा परियोजना’ का मुख्य उद्देश्य यह है कि ग्रामीण लोग खेती के अलावा स्थायी और टिकाऊ तरीकों से आय हासिल कर सकें। अस्थिरता के बीच छोटे-मोटे खेत और बारहमासी फसलें जोखिम भरी होती हैं।

फलों के पेड़, खासकर संकर किस्में, कुछ सालों के भीतर नियमित फल देने लगती हैं और कई वर्षों के लिए आय का स्रोत बन जाता हैं। प्रशासन ने देखा कि सुकमा की मिट्टी और जलवायु फलों के लिए अनुकूल है, इसलिए यहाँ बागवानी को बढ़ावा देना मतलब लोगों को लंबे समय के लिए आर्थिक सुरक्षा देना है। साथ ही महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ जैसी योजनाओं से जोड़कर उनकी आर्थिक भागीदारी बढ़ाने की भी कोशिश की जा रही है।

स्थानीय लोगों की भागीदारी

जब भी किसी योजना की सफलता की बात आती है, तो सबसे जरूरी चीज होती है लोगों की भागीदारी। सुकमा में कलेक्टर और उनकी टीम ने गाँव-गाँव जाकर सीधे लोगों से बात की, उनके सवाल सुने और पौधारोपण के फायदों की अच्छी तरह जानकारी दी।

‘आम बगीचा’ जैसी नई विकास योजनाओं का जमीन पर असर अब साफ दिखाई देने लगा है। इस स्कीम के लाभार्थियों में शामिल स्थानीय निवासी मर्काम धूला बताते हैं कि कैसे प्रशासन की पहल ने उनकी आमदनी और जीवन दोनों को बदल दिया है।

धूला कहते हैं, “एक दिन प्रशासन के लोग हमारे घर आए और नींबू, आम और नारियल के पौधे लगाने के बारे में पूछा। हमने हामी भर दी। अब दो साल हो गए हैं… फसल आने वाली है। यहाँ करीब 350 पौधे लगे हैं और इन्हें हमने कमाई के लिए ही लगाया था।”

‘आम बगीचा परियोजना’ न सिर्फ ग्रामीणों की आय बढ़ा रही है बल्कि खेती के प्रति उनकी समझ और जिम्मेदारी भी मजबूत कर रही है। इस स्कीम के लाभार्थी मर्काम शंतु बताते हैं कि कैसे वे पौधों की देखभाल पूरी सावधानी से कर रहे हैं और प्रशासन ने उन्हें हर कदम पर सहयोग दिया है।

शंतु कहते हैं, “हम पौधों की पूरी देखभाल कर रहे हैं। जड़ों या पत्तों में अगर सूखापन दिखता है, तो हम उन्हें तुरंत साफ कर देते हैं…कलेक्टर साहब से हमें बहुत मदद मिली है।” सरकारी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और नियमित फील्ड विज़िट्स की वजह से ग्रामीण अब बागवानी को आय के स्थाई स्रोत के रूप में देख रहे हैं।

प्रशासन कर रहा लोगों की मदद

कलेक्टर और स्थानीय प्रशासन सिर्फ योजनाएँ घोषित नहीं करते बल्कि वे मैदान में आकर लोगों से मिलते हैं। प्रशासन का रोल कई तरह का है जैसे योजना बनाना, बजट का इंतजाम करना, जरूरी तकनीकी और यांत्रिक सहायता देना और लोगों को बाजार तक पहुँचने में मदद करना।

उदाहरण के लिए, अगर किसी गाँव में धान की बजाय फलों की बिक्री के लिए एक छोटी मंडी लगाई जा सके, तो प्रशासन उससे भी जोड़ता है। इसी तरह प्रशिक्षण सत्रों में कृषि विशेषज्ञ भी आते हैं जो बताते हैं कि किस मौसम में कौन-सा काम करना है। इससे गाँव वालों को आत्मनिर्भर होने में मदद मिलती है और परियोजना की सफलता की संभावना बढ़ती है।

क्या है लखपति दीदी योजना

लखपति दीदी योजना भारत सरकार द्वारा शुरू की गई एक महत्वाकांक्षी पहल है, जिसका उद्देश्य देश की ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है। इस योजना के तहत महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण देकर उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया जाता है, ताकि वे खुद का व्यवसाय शुरू कर सकें और स्थायी आजीविका स्थापित कर सकें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं कई मंचों पर इस योजना का उल्लेख कर चुके हैं, जिससे इसकी महत्ता और बढ़ जाती है।

लखपति दीदी योजना की बेसिक कान्सेप्ट ‘स्वयं सहायता समूहों’ (Self Help Groups – SHGs) को मजबूत करना है। इस योजना के तहत पहले महिलाओं को किसी SHG से जोड़ा जाता है, जहाँ उन्हें सिलाई, पेंटिंग, डेयरी, खेती, खाद्य प्रसंस्करण, छोटे बिजनेस, ब्यूटी पार्लर, पैकेजिंग आदि जैसे विभिन्न क्षेत्रों का प्रशिक्षण दिया जाता है।

प्रशिक्षण पूरा होने के बाद महिलाएँ अपना बिजनेस प्लान तैयार करती हैं और SHG के माध्यम से यह प्लान सरकार तक पहुँचाया जाता है। योजना की खास बात यह है कि व्यवसाय शुरू करने के लिए महिलाओं को 5 लाख रुपए तक का बिना किसी ब्याज के लोन दिया जाता है।

इस योजना का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक तौर पर सशक्त बनाना, उनकी आमदनी में वृद्धि करना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और उन्हें रोजगार देने वाले व्यक्तियों के रूप में विकसित करना है। सरकार चाहती है कि हर महिला अपनी क्षमता के अनुसार काम करे और लखपति दीदी बनकर सालाना कम से कम 1 लाख रुपए की आय प्राप्त कर सके।

नक्सलवाद में आई भारी कमी

नक्सलवाद के पीछे कई कारण होते हैं। गरीबी, बेरोजगारी, असमानता और कई मौकों पर सरकार की उपस्थिति का अभाव। जब सरकार ना केवल सुरक्षा बल भेजती है बल्कि विकास-कार्य भी दिखाती है, जैसे सड़क का बनाना, बिजली का पहुँचना, स्कूल और स्वास्थ्य केन्द्र का खुलना, तो लोगों का भरोसा सरकार पर बनता है और सरकार से लोगों को दूर करने की नक्सलियों की कोशिशें टूटने लगती हैं।

साथ ही, जब ग्रामीणों को सीधी आय के अवसर मिलते हैं, युवाओं को रोजगार मिलता है और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ती है, तब सामुदायिक समर्थन भी बदलता है। सुकमा में सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ इन विकास कदमों ने मिलकर नक्सल असर को घटाया है, लोग अब आपराधिक रास्ता छोड़कर सामान्य जीवन चुन रहे हैं और मुख्य धार से जुड़ रहे है।

नेहरू ने किया कबाड़ा, पर सनातन का उपहास उड़ाने के लिए गढ़ दिया ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’: यूँ ही PM मोदी ने नहीं कहा ‘गुलाम मानसिकता का प्रतीक’

प्रधानमंत्री मोदी ने ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ शब्दावली का इस्तेमाल कर गुलाम मानसिकता का परिचय देने वाले लोगों की क्लास लगाई है। हिन्दू सभ्यता और संस्कृति को कमतर दिखाने वाले लोगों ने इस शब्दावली का इस्तेमाल तब किया था, जब देश गरीबी की गर्त में था और 2-3 फीसदी ग्रोथ रेट पाने के लिए भी लालायित था।

1950 से तीन दशक का वह दौर, जब भारत में नेहरू जी के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार थी और फिर उनकी बेटी इंदिरा ने देश की कमान लंबे अर्से तक संभाली। अर्थव्यवस्था के लिए इस्तेमाल होने वाले ग्रोथ रेट को हिन्दू सभ्यता और संस्कृति से जोड़ना दरअसल गुलामी मानसिकता को दर्शाता है। ऐसे लोगों को अब देश की प्रगति नहीं दिखती।

दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था की ग्रोथ रेट को अब ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ नहीं कहते, बल्कि इन्हें हर बात पर सांप्रदायिकता दिखने लगी है। यानी देश तरक्की करे तो सरकार का हर काम ‘सांप्रदायिक’ हो गया और जब देश बदहाल था, तो इसके लिए हिन्दू सभ्यता और संस्कृति दोषी था।

पीएम ने साफ हा है कि भारत की अर्थव्यवस्था को ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ तब कहा गया जब भारत 2-3% की ग्रोथ के लिए तरस गया था। आज जब देश की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ रही है, लेकिन आज कोई इसे ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ नहीं कहता है।

उन्होंने कहा कि किसी देश की इकोनॉमी ग्रोथ को वहाँ रहने वाले बहुसंख्यक लोगों की आस्था से जोड़ना गुलामी की मानसिकता का परिचायक था, क्योंकि इसके माध्यम से पूरे समाज को गरीब दिखाने की कोशिश की गई।

उन्होंने पूछा , “भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था है…लेकिन क्या आज कोई इसे हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ कहता है क्या?” उन्होंने कहा कि हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ शब्द का इस्तेमाल कर पूरे समाज और पूरी परंपरा को गरीबी का पर्याय बना दिया गया। ये साबित करने का प्रयास किया गया कि भारत की धीमी विकास दर का कारण हमारी हिंदू सभ्यता और हिंदू संस्कृति है। आज जो बुद्धिजीवी हर बात में सांप्रदायिकता ढूंढते हैं, उन्हें ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ में ये नहीं दिखा?

पीएम मोदी ने आर्थिक विकास के ताजा आंकड़ों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत दुनिया की सबसे तेज गति से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन गया है। हाल ही जारी आंकड़ों के मुताबिक, मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में भारत की विकास दर 8.2 फीसदी रही है। ये काफी उत्साहित करने वाली है, जो चीन से भी ज्यादा है।

पीएम की भावना को बल देते हुए मशहूर वकील महेश जेठमलानी ने कहा कि दशकों से इस्तेमाल किया गया ‘हिन्दू ग्रोथ रेट’ दरअसल औपनिवेशक भारत का मजाक उड़ाने और भारतीय सभ्यता और संस्कृति को नीचा दिखाने के लिए किया गया। दरअसल सरकार की नीति की कमियों को सांस्कृतिक कमी के तौर पर पेश किया गया।

भारतीय संस्कृति का अपमान- महेश जेठमलानी

जेठमलानी ने एक्स पर ट्वीट किया, “प्रधानमंत्री मोदी ने दशकों पुराने तथाकथित ‘हिंदू विकास दर’ के कलंक को वही बताया जो यह हमेशा से था…। यह अर्थशास्त्र में लिपटा एक अपमान था, एक कहानी जो भारतीयों को यह विश्वास दिलाने के लिए डिज़ाइन की गई थी कि ठहराव हमारी नियति है…। पिछले 11 वर्षों ने हमने दिखाया है कि हम कैसे भारतीय खराब नीति और उधार के निराशावाद दौर से मुक्त हुए हैं और वैश्विक औसत से ज्यादा तेज गति से आगे बढ़ रहे हैं। यह हमारा स्वाभाविक रास्ता है।”

‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ क्या है?

भारत का 6000+ साल का शानदार सभ्यता का इतिहास रहा है और इस लंबे समय के दौरान, भारत गर्व से ग्लोबल इकॉनमी में सबसे ऊपर रहा है। इस बात को अमेरिकी इतिहासकार विल डुरंट की किताब ‘द केस फॉर इंडिया’ में बहुत अच्छे से दिखाया गया है।

सत्रहवीं सदी तक, भारत की GDP दुनिया की GDP की एक-तिहाई थी। इस्लामी हमलावरों की 800 साल की लूट भी इस महान देश के रिसोर्स को खत्म नहीं कर पाई। अंग्रेजों के आने के बाद ही असली दौलत का नुकसान शुरू हुआ, और भारत में साल दर साल लगातार अकाल पड़ने लगे।

हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ शब्द 1978 में एक तथाकथित इकोनॉमिस्ट राज कृष्ण ने 1950 से 1980 के दशक तक 3.5 परसेंट GDP ग्रोथ रेट के लिए किया था। यह सोच अपने आप में गलत है क्योंकि इस समय और उसके बाद भी इकोनॉमी में हिंदुओं का मुख्य योगदान था।

भारत में सभी धर्मों के लोग रहते हैं, इकोनॉमिक प्लानर्स ने ग्रोथ का भार हिंदुओं पर डाल दिया और इसलिए ‘हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ’ शब्द बना कि उन्होंने जो कुछ भी करने का दावा किया, उसके बावजूद ग्रोथ लगभग स्थिर थी और वह भी लगभग 3.5% पर। हिंदू कोई पॉलिसी मेकर नहीं थी ऐसे में अर्थव्यवस्था की विकास को हिन्दू से जोड़ना सरासर हिन्दू धर्म और संस्कृति का उपहास उड़ाना था

आजादी के बाद कई दशकों तक कॉन्ग्रेस की सरकार की नीतियाँ देश के विकास की रफ्तार तय कर रही थी। बुनियादी सुविधाओं की कमी, तेज गति से बढ़ रही जनसंख्या और गरीबी मुख्य दिक्कतें थी, इसकी जिम्मेदारी सरकार की थी, न कि भारत की सभ्यता और संस्कृति इसके लिए जिम्मेदार थी।

इसे ‘नेहरू रेट ऑफ ग्रोथ’ कहें, ना कि ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’

नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री थे, वे 1964 तक इस पद पर रहे। देश की आर्थिक नीति नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार ने ही तय की थी। इसलिए शुरुआती दशकों की आर्थिक ग्रोथ को ‘नेहरू रेट ऑफ ग्रोथ’ कहना ज्यादा सही है। नेहरू राज और इंदिरा राज के सालों के आर्थिक ग्रोथ को हिन्दू संस्कृति से जोड़ना सरासर गलत है।

नेहरू समाजवादी के समर्थक थे। उसके वक्त में सरकार होटल भी चलाती थी। बिड़ला और टाटा जैसे उद्योगपतियों को बिजनेस बढ़ाने के लिए उतनी आजादी नहीं दी गई। नेहरू की इस ‘सोच’ को ही ग्रोथ की धीमी रफ्तार के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

नेहरू की इकोनॉमिक पॉलिसी इतनी गलत थीं कि देश लगभग हमेशा खाद्यान संकट से जुझता रहा। इतना ही नहीं, उनकी छोटी सोच ने उन्हें नदी के बांधों को ‘मॉडर्न इंडिया के मंदिर’ कहने पर मजबूर किया। नेहरू की पॉलिसी को फिर उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने आगे बढ़ाया, जिन्होंने बैंकिंग, टेक्सटाइल, कोयला, स्टील, कॉपर जैसे सेक्टर्स का राष्ट्रीयकरण कर दिया। ये पूरा कार्यकाल ही ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ कहलाया

रघुराम राजन ने 2023 में कहा ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’

आरबीआई के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन ने 2023 में ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ शब्दावली का इस्तेमाल किया था। उन्होंने सरकार को चेतावनी दी थी कि कमजोर निवेश, उच्च ब्याज दर और धीमी वैश्विक विकास के कारण भारत ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ के करीब है।

राजन ने कहा था कि नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (NSO) द्वारा जारी नेशनल इनकम का अनुमान चिंताजनक है। 2023 के फ़ाइनेंशियल ईयर की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GDP) दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) के 6.3% से घटकर 4.4% हो गई थी। पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में यह 13.2% थी।

उन्होंने कहा था कि भारत को कोविड से हुई आर्थिक मंदी से उबरने में कई साल लगेंगे, लेकिन भारत एक साल में ही अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में कामयाब रहा। उन्होंने कभी माफ़ी नहीं माँगी।

उन्होंने आर्थिक विकास में मंदी के लिए ‘हिंदू ग्रोथ रेट’ शब्द का इस्तेमाल किया है। रघुराम राजन 2013 से 2016 तक RBI के गवर्नर थे। यह समय स्थिर फॉरेक्स रिज़र्व और कई दूसरे विवादों से भरा रहा। उनके पद से हटाए जाने के बाद, RBI का फॉरेक्स रिजर्व बढ़कर 600 बिलियन+ के ऑल-टाइम हाई पर पहुँच गया। राजन पिछले 5 सालों से लगातार भारत के लिए ‘गंभीर आर्थिक संकट’ की भविष्यवाणी करते हैं और मुँह की खाते हैं।

फिर भी ऐसे लोग भारत-विरोधी ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ से चिपके हुए हैं। वे आंकड़ों का बचाव नहीं कर रहे हैं। वे एक ऐसे विश्वदृष्टि का बचाव कर रहे हैं जो एक आत्मविश्वासी, सुधारवादी, आत्मनिर्भर भारत को स्वीकार नहीं करना चाहता।

ये लोग देश की ‘आत्मा’ को नहीं जानते, अर्थव्यवस्था के विकास को गाँव के रास्ते पर बढ़ते नहीं पहचान पाते और सरकार की आलोचना विदेशी मापदंडों के आधार पर करते हैं। आज भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रहा है।

दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था 2023 तक तीसरी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है। ये न सिर्फ खुद बढ़ रहा है, बल्कि वैश्विक गति को भी आगे बढ़ा रहा है। दुनिया में भारत का महत्व दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है। सरकार की नीति, उद्यमशीलता और सुधार लगातार देश को ऊँचाई दे रहे हैं। ये झूठा प्रचार नहीं बल्कि वह सच्चाई है, जिसे पूरी दुनिया मान रही है।

PM मोदी पर आपत्तिजनक पोस्ट, PAK से समर्थन और बीमारी के बहाने बचने की कोशिश: जानें नेहा सिंह राठौर की जमानत याचिका खारिज करने वाले इलाहाबाद HC के आदेश में क्या लिखा है?

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने लोक गायिका नेहा सिंह राठौर द्वारा दायर अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। दरअसल, नेहा सिंह राठौर के खिलाफ प्रधानमंत्री मोदी और पहलगाम आतंकी हमले को लेकर आपत्तिजनक पोस्ट करने के आरोप में FIR दर्ज की गई थी। इसी मामले में गिरफ्तारी से बचने के लिए नेहा होईकोर्ट पहुँची थीं।

नेहा सिंह राठौर पर क्या हैं आरोप?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 11 पन्नों के आदेश में नेहा पर लगाए आरोपों की जानकारी दी गई है। आदेश के मुताबिक, 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने धर्म पूछकर हिंदू पर्यटकों को गोली मार दी थी जिसमें 26 पर्यटकों की मौत हो गई। भारत सरकार भी इस हमले का बदला लेने की तैयारी करते हुए इंडस वॉटर ट्रीटी को रोकने समेत पाकिस्तान पर कई कड़े कदम उठाए।

आदेश में कहा गया है, “इसी माहौल में लोकगायिका और स्वयं को कवयित्री बताने वाली नेहा सिंह राठौर अपने X अकाउंट (Neha Singh Rathore @nehafolksinger) से लगातार ऐसे आपत्तिजनक पोस्ट कर रही थीं जो राष्ट्रीय एकता के खिलाफ थे और जो लोगों को धर्म और जाति के आधार पर एक-दूसरे के खिलाफ अपराध करने के लिए भड़का सकते हैं। सोशल मीडिया पर उनके द्वारा कई वीडियो भी शेयर किए जा रहे हैं।”

साथ ही, पाकिस्तान में नेहा सिंह राठौर के वायरल बयानों का भी जिक्र किया गया है। आदेश में लिखा है, “नेहा राठौर के सभी भारत विरोधी बयान पाकिस्तान में लगातार वायरल हो रहे हैं और वहाँ उनकी तारीफ की जा रही है। पाकिस्तान की मीडिया इन देश-विरोधी बयानों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर रही है और भारत पर सवाल उठाए जा रहे हैं। नेहा सिंह राठौर के भारत विरोधी बयानों से भारत के कवि समुदाय की प्रतिष्ठा ही नहीं बल्कि पूरे देश का सम्मान भी आहत हो रहा है।”

नेहा सिंह राठौर के वकील ने दीं क्या दलीलें?

नेहा सिंह राठौर के वकील ने अपने पक्ष में दलीलें देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाल दिया। वकील ने 2001 के आनंद चिंतामणि दिघे और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य फैसले का हवाला दिया। इसमें कहा गया है, “भारत के संविधान के आर्टिकल 19(1)(a) के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी की गारंटी को मौजूदा नजरिए से पढ़ा जाना चाहिए और सरकार के काम के खिलाफ आवाज उठाने का मतलब यह नहीं है कि एप्लीकेंट (नेहा) ने देश के खिलाफ कोई अपराध किया है।”

साथ ही, वकील ने 2025 के इमरान प्रतापगढ़ी बनाम गुजरात राज्य और अन्य फैसले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का भी हवाला दिया है। इसमें कहा गया है, “विचारों और नजरियों को व्यक्त करने की आजादी के बिना, भारत के संविधान के आर्टिकल 21 के तहत सम्मानजनक जीवन जीना नामुमकिन है।” वकील ने कहा, “एप्लीकेंट द्वारा इस्तेमाल किया गया ट्विटर हैंडल अभिव्यक्ति की आज़ादी की गारंटी देता है और उसने जो कुछ भी कहा है, वह सरकार के खिलाफ उसकी असहमति वाली आवाज़ है और इसे देशद्रोह के आरोप के तौर पर नहीं माना जाना चाहिए।”

सरकार के वकील ने क्या कहा?

वहीं, सरकार के वकील ने नेहा सिंह राठौर द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट में ही दायर की गई इसी केस से जुड़ी FIR रद्द करने की पुरानी याचिका का हवाला दिया। वकील ने बताया कि कोर्ट ने लोक गायिका की पुरानी याचिका खारिज कर उन्हें मामले में सहयोग देने को कहा गया था। हालाँकि, इसके खिलाफ नेहा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था और वहाँ भी उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी। वकील ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी हवाला दिया।

वकील ने नेहा की अग्रिम जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें FIR में लगे आरोपों से जुड़े मुद्दों को आरोप तय किए जाते समय उठाने की आजादी दी थी। अगर चार्जशीट दाखिल हो चुकी है तो उचित समय पर अदालत में डिस्चार्ज की माँग कर सकती थीं। इसलिए हाई कोर्ट को अभी इस मामले पर विचार नहीं करना चाहिए।

सरकारी वकील ने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद आवेदक को जाँच अधिकारी के सामने पेश होना चाहिए था लेकिन वह पुलिस जाँच से बच रही हैं। इसलिए, उन्हें किसी भी तरह की राहत नहीं मिलनी चाहिए। साथ ही, इस आदेश में नेहा का कुछ ट्वीट्स को भी जिक्र किया गया है।

नेहा सिंह राठौर के ट्वीट्स (फोटो साभार: इलाहाबाद हाईकोर्ट)

बीमारी का बहाना कर जाँच से बच रहीं नेहा

कोर्ट के आदेश में हजरतगंज के थाना प्रभारी द्वारा 27 नवंबर 2025 को भेजे गए लिखित निर्देशों का भी जिक्र किया गया है। इसमें लिखा है, “नेहा सिंह राठौर की गिरफ्तारी के प्रयास जारी हैं। नेहा को उपस्थित होने के निर्देश दिए गए थे लेकिन वह बीमारी का बहाना बनाते हुए उपस्थित नहीं हुई। उनके ठिकानों पर दबिश दी गई है लेकिन उनकी कोई जानकारी नहीं मिली है। नेहा सिंह राठौर बार-बार अपना निवास बदल रही है।”

पाकिस्तान में नेहा का समर्थन

सरकारी वकील ने आगे कहा कि आवेदक का ट्विटर अकाउंट दुनिया भर में खासकर पाकिस्तान में बहुत प्रसिद्ध हो चुका है और जाँच के दौरान पाकिस्तान से भी बहुत सारे पोस्ट मिले हैं जो आवेदक के ट्वीट्स का समर्थन कर रहे हैं। वकील के मुताबिक, पहलगाम आतंकी हमले के बाद उस समय देश की सुरक्षा और अखंडता खतरे में थी और सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए हर संभव कदम उठाए थे लेकिन नेहा ने संवेदनशील स्थिति में ही ट्वीट करने शुरू कर दिए थे। ऐसे ट्वीट लोगों की भावनाओं को भड़का सकते थे।

सरकारी वकील ने यह भी दावा किया कि ऐसा लगता है कि नेहा की भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं जैसे प्रधानमंत्री के प्रति मंशा सही नहीं थी। वकील ने कहा, “उन्होंने (नेहा) हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच बीच नफरत पैदा करने की भी कोशिश की ताकि देश का बुनियादी सामाजिक ताना-बाना बिगड़ सके।”

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने कहा कि FIR को दर्ज हुए 7 महीने से अधिक का समय बीत गया है लेकिन नेहा अभी भी जाँच में सहयोग नहीं कर रही हैं। कोर्ट ने कहा, “जहाँ तक अग्रिम जमानत का सवाल है, संविधान के अनुच्छेद 19 से नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार मिलता है लेकिन यह अधिकार लोक व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता के लिए लगाए गए उचित प्रतिबंधों के अधीन होता है।”

जस्टिस सिंह ने कहा कि आवेदक ने कुछ ट्वीट उस संवेदनशील समय पर किए थे जब पहलगाम का दुर्भाग्यपूर्ण हमला हुआ था। कोर्ट ने कहा, “केस डायरी और FIR दोनों से यह पता चलता है कि आवेदक द्वारा किए गए ट्वीट भारत के प्रधानमंत्री के खिलाफ थे। प्रधानमंत्री का नाम अनादरपूर्ण तरीके से इस्तेमाल किया गया था।”

जस्टिस ब्रज लाल ने कहा कि 27 नवंबर के निर्देश और रिकॉर्ड देखने के बाद पता चलता है कि आवेदक (नेहा) जाँच में सहयोग नहीं कर रही हैं। उन्होंने कहा, “नेहा की FIR के खिलाफ दर्ज की गई रिट याचिका को इसी कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज किया था कि वहा जाँच में सहयोग करेंगी और जाँच अधिकारी के सामने पेश होंगी।” साथ ही, उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी SLP पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है।

हाईकोर्ट ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने आवेदक द्वारा दायर की गई स्पेशल लीव पिटिशन में यह कहा कि उस समय याचिकाकर्ता के वकील की दलीलें सुनने के बाद भी बगावत (mutiny) और अन्य धाराओं के तहत लगे आरोपों को रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता था। इससे साफ है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि जिस FIR को आवेदक ने हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच में चुनौती दी थी, उसमें उसकी दलीलों में दम नहीं है।”

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नेहा सिंह राठौर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी और कहा कि वह कानून के दायरे में कोई भी दूसरा उपाय अपना सकती हैं।

नुपूर शर्मा के समय थे लाडले, रोहिंग्या घुसपैठियों की बात आई तो हो गए विलेन: CJI सूर्यकांत के खिलाफ वामपंथियों का ओपन लेटर दोगलई का अप्रतिम नमूना

भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने 2 दिसंबर 2025 को रोहिंग्या शरणार्थियों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने रोहिंग्याओं को ‘अवैध घुसपैठिए’ करार देते हुए कहा कि क्या देश में सीमा तोड़कर घुसने वालों को ‘रेड कार्पेट वेलकम’ देना चाहिए?

यह टिप्पणी रोहिंग्या हेबियस कॉर्पस याचिका पर आई, जिसमें 5 रोहिंग्या हिरासत में लापता होने का मामला उठाया गया था और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध किया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि सरकार ने उन्हें शरणार्थी घोषित नहीं किया है, तो उन्हें रखने का कोई दायित्व नहीं है और अवैध प्रवेश करने वालों को भोजन, आश्रय या शिक्षा का अधिकार नहीं मिल सकता।​

पूर्व जजों और वकीलों की आपत्ति

पूर्व जजों, वकीलों और कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल एकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (सीजेएआर) ने 4-5 दिसंबर 2025 को सीजेआई सूर्यकांत को खुला पत्र लिखा, जिसमें टिप्पणियों को ‘अनकॉन्शिएनेबल’ और संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध बताया।

पत्र में कहा गया कि रोहिंग्याओं को ‘टनल खोदकर घुसने वाले घुसपैठिए बताना उनके मानवीय अधिकारों का अपमान है। उन्होंने अनुच्छेद 21 का हवाला दिया जिसके तहत जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को सभी को प्रदान करता है, भले ही वे विदेशी हों।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने ये भी कहा कि ऐसी टिप्पणियाँ न्यायिक पूर्वाग्रह पैदा करती हैं और गरीबी का हवाला देकर शरणार्थियों के अधिकारों को नकारना खतरनाक मिसाल है।​

रोहिंग्याओं के समर्थक

भारत में रोहिंग्याओं के लिए वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने वालों के साथ कुछ एनजीओ, मानवाधिकार कार्यकर्ता और कुछ सिविल सोसाइटी संगठन काम करते हैं। ये रोहिंग्या ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (आरओएचआरइनग्या) जैसे संगठने के तले उन्हें शिक्षा, राहत और कानूनी सहायता देने तक की पैरवी करते हैं।

यूएनएचसीआर, एमनेस्टी इंटरनेशनल और रिफ्यूजी इंटरनेशनल जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन रोहिंग्याओं को शरणार्थी मानते हैं और भारत में उनके हिरासत और निर्वासन का विरोध करते हैं।

वामपंथी समूह रोहिंग्याओं को शरणार्थी मानते हैं और भारत की निर्वासन नीति को मोदी सरकार का ‘इस्लामोफोबिक’ रुख बताते हैं, जबकि राष्ट्रवादी इसे अवैध घुसपैठ से जोड़ते हैं। 2018 में गृह मंत्रालय द्वारा रोहिंग्या समर्थकों की सूची में पूर्व राजदूत, वकील, प्रोफेसर और संगठन जैसे वर्किंग ग्रुप ऑन अल्टरनेटिव स्ट्रैटजीज शामिल थे।​

रोहिंग्या संकट का इतिहास और भारत की नीति

रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय म्यांमार के रखाइन राज्य से है, जहाँ 2017 के बाद जातीय सफाए के कारण 40,000 से अधिक भारत पहुँचे, हालाँकि भारत उन्हें अवैध प्रवासी मानता है।

सरकार ने उन्हें निर्वासित करने की योजना बनाई, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गई, लेकिन 2018 में कोर्ट ने निर्वासन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। भारत ने गैर-हस्तक्षेप सिद्धांत अपनाया है, लेकिन बीजेपी सरकार के सत्ता में आने के बाद रोहिंग्या विरोध बढ़ा।​

क्या है शरणार्थी होने की परिभाषा

भारत की विदेशी नागरिकों के लिए शरणार्थी होने का दावा करने संबंधी मानक संचालन प्रक्रिया (2011, संशोधित 2019) अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप मानी जाती है। इस प्रक्रिया में शरणार्थी को उस व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जिसे नस्ल, धर्म, लिंग, राष्ट्रीयता, जातीय पहचान, किसी सामाजिक समूह की सदस्यता या राजनीतिक विचारों के आधार पर उत्पीड़न का सच में डर हो। यह परिभाषा प्रचलित अंतरराष्ट्रीय कानून और भारत की घरेलू नीतियों के बीच सामंजस्य को दर्शाती है।

पत्र में हस्ताक्षर करने वालों का कहना है कि भारत में लंबे समय से शरणार्थियों को प्रवासी (migrants) से अलग एक विशिष्ट श्रेणी के रूप में मान्यता देने की परंपरा रही है। देश ने पहले भी तिब्बतियों, श्रीलंकाई तमिलों और ऐतिहासिक रूप से 1970-71 में पूर्वी पाकिस्तान से उत्पीड़न के कारण भागकर आए लाखों लोगों को मानवीय संरक्षण प्रदान किया है।

नुपूर शर्मा मामले में वामपंथी प्रोपेगेंडा का दोहरा मापदंड

2022 में नुपूर शर्मा विवाद पर जस्टिस सूर्यकांत ने उन्हें ‘आग लगाने वाली जीभ’ कहा था, जिसे वामपंथी और उदारवादी समूहों ने जमकर सराहा था। लेकिन अब रोहिंग्या टिप्पणी पर वे इसी जस्टिस सूर्यकांत का विरोध कर रहे हैं।

नुपूर मामले में कोर्ट की मौखिक टिप्पणियों को वामपंथियों ने मोदी सरकार पर हमले के रूप में इस्तेमाल किया। अब वही लोग सीजेआई की रोहिंग्या टिप्पणियों को ‘डीह्यूमनाइजिंग’ बता रहे हैं। यह दोगलापन सोशल मीडिया पर सामने आया, तो लोगों ने इसे हिपोक्रेसी करार दिया।

पानी पर तैरते ‘न्यूक्लियर प्लांट’ बदलेंगे भारत के ऊर्जा क्षेत्र की तस्वीर, जानें कैसे काम करते हैं रूस के ‘स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर’?

दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बैठक के बाद भारत और रूस ने कुल 19 बड़े समझौते किए। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) की है। इसमें सहयोग और भारत में फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाने का प्रस्ताव शामिल है। रूस ने भारत को न सिर्फ SMR टेक्नोलॉजी देने की पेशकश की है, बल्कि भारत के समुद्री क्षेत्रों में एक तैरता हुआ न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाने की भी बात कही है।

कुडनकुलम के बाद भारत अब न्यूक्लियर ऊर्जा के अगले दौर में कदम रखना चाहता है। एक ऐसा दौर जिसमें छोटे, सुरक्षित, मोबाइल और किफायती परमाणु रिएक्टर भारत की बिजली जरूरतें पूरी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। अब हम समझेंगे कि ये स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर क्या होते हैं, कैसे काम करते हैं, फ्लोटिंग प्लांट क्यों खास हैं और भारत को इससे क्या मिलने वाला है।

SMR क्या है: छोटे लेकिन शक्तिशाली परमाणु रिएक्टर

भारत और रूस के बीच इस बार सहयोग का सबसे बड़ा और नया कदम है ‘SMR’ यानी स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर पर साथ काम करना। दुनिया तेजी से ऐसी न्यूक्लियर तकनीक की ओर बढ़ रही है जो आकार में छोटी हो, लेकिन सुरक्षा, लागत और समय तीनों मामलों में बड़ी सुविधाएँ दे। SMR को आप बड़े न्यूक्लियर प्लांट का छोटा, स्मार्ट और अधिक सुरक्षित संस्करण समझ सकते हैं। ये परंपरागत रिएक्टरों से लगभग एक-तिहाई आकार के होते हैं, लेकिन बिजली उतनी ही भरोसेमंद और साफ पैदा करते हैं।

SMR की सबसे खास बात यह है कि इन्हें फैक्ट्री में पहले से तैयार मॉड्यूल के रूप में बनाया जाता है और बाद में साइट पर जोड़ दिया जाता है। इससे इनकी इंस्टॉलेशन में वर्षों का इंतजार नहीं करना पड़ता। इन्हें उन जगहों पर भी लगाया जा सकता है जहाँ बड़े न्यूक्लियर प्लांट बनाना न तो संभव है और न ही आर्थिक रूप से ठीक। छोटे शहरों, दूर-दराज के इलाकों और कम जगह वाले औद्योगिक क्षेत्रों में SMR आसानी से फिट हो सकते हैं।

रूस इस तकनीक में दुनिया का सबसे अनुभवी देश है। उसका बनाया ‘अकादमिक लोमोनोसोव’ दुनिया का पहला फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर प्लांट है। एक ऐसा जहाज जो समुद्र में तैरते हुए आर्कटिक इलाके को बिजली और हीटिंग देता है। अब यही मॉडल भारत के लिए भी प्रस्तावित किया गया है।

भारत के लिए SMR इसलिए और भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि आने वाले वर्षों में देश के औद्योगिक क्षेत्रों- जैसे रेल प्रोजेक्ट, डेटा सेंटर, खनन क्षेत्र, बड़े पोर्ट, तटीय उद्योग और पहाड़ी राज्यों को स्थानीय, भरोसेमंद और क्लीन बिजली की बड़ी जरूरत पड़ेगी। SMR इस जरूरत को सीधे यहीं पर पूरा कर सकते हैं, बिना किसी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की माँग किए।

सीधे शब्दों में कहें तो SMR भारत को तेज, सुरक्षित, स्थानीय और भविष्य के लिए तैयार ऊर्जा देने वाली तकनीक है और रूस इसके लिए सही साझेदार है।

SMR कैसे काम करते हैं?

स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर सामान्य न्यूक्लियर प्लांट की तरह ही परमाणु ईंधन का उपयोग करके गर्मी पैदा करते हैं, लेकिन उनका पूरा ढाँचा सोचा-समझा और कॉम्पैक्ट होता है। यह पारंपरिक VVER या PHWR जैसे बड़े रिएक्टरों की तुलना में छोटे होते हैं, इसलिए इनकी सुरक्षा और नियंत्रण प्रणाली भी अधिक प्रभावी होती है। इनके अंदर कई पैसिव सेफ्टी फीचर होते हैं, यानि बिना बिजली या इंसानी दखल के भी ये खुद को सुरक्षित तरीके से बंद कर सकते हैं। यह उन्हें ज्यादा भरोसेमंद बनाता है।

भारत ऐसे समय में SMR अपनाना चाहता है जब देश बड़े पैमाने पर अक्षय ऊर्जा (सौर और पवन) जोड़ रहा है। लेकिन इन स्रोतों में एक समस्या है, ये हमेशा एक समान उत्पादन नहीं देते। ऐसे में बैकअप के लिए एक भरोसेमंद ‘बेस लोड’ बिजली चाहिए जो हमेशा स्थिर चले। यही काम SMR कर सकते हैं। भारत के लिए यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि 2047 तक 100 गीगावॉट न्यूक्लियर क्षमता का लक्ष्य रखा गया है और अकेले बड़े प्लांट इस लक्ष्य तक पहुँचने में समय ले सकते हैं। SMR कम समय में स्थापित होकर इस रोडमैप को तेज कर सकते हैं।

कई भारतीय संस्थान पहले से ही SMR के उपयोग पर विचार कर रहे हैं- जैसे कि भारतीय रेलवे की परियोजनाएँ, ऊर्जा-भूखे डेटा सेंटर और महाराष्ट्र में मजगांवकों–रॉसएटम परियोजना। भारत का एक लक्ष्य यह भी है कि इन SMR में थोरियम आधारित ईंधन का उपयोग हो सके, जिसके विशाल भंडार भारत के पास हैं। इस दिशा में रूस, भारत के साथ तकनीकी साझेदारी को आगे बढ़ाना चाहता है। SMR भारत को ऊर्जा में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण बढ़त दे सकते हैं।

फ्लोटिंग न्यूक्लियर प्लांट: समुद्र में तैरता बिजलीघर कैसे काम करता है?

फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर प्लांट सुनने में किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा लगता है, लेकिन रूस ने इसे सच में बनाकर चला भी लिया है। ‘अकादमिक लोमोनोसोव’ दुनिया का पहला ऐसा न्यूक्लियर प्लांट है जो एक बड़ी बार्ज पर बनाया गया है और जिसे जहाज की तरह पानी में खींचकर आर्कटिक तट पर लगा दिया गया। यह वहाँ बिजली भी देता है और कड़ाके की ठंड में हीटिंग भी करता है।

अब रूस यही तकनीक भारत को देने की पेशकश कर रहा है। भारत जैसे बड़े तटीय देश के लिए यह आइडिया काफी उपयोगी हो सकता है, खासकर तब जब जमीन पर नया प्लांट लगाने में दिक्कत आती है। ऐसे तैरते हुए प्लांट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें जरूरत के हिसाब से कहीं भी ले जाया जा सकता है, लगाया जा सकता है और काम पूरा होने पर हटाया भी जा सकता है। यानी यह एक तरह का ‘मोबाइल न्यूक्लियर पावर स्टेशन’ बन जाता है।

यह मॉडल उन इलाकों के लिए बेहद फायदेमंद हो सकता है जहाँ बिजली की कमी रहती है, जहाँ उद्योग तेजी से फैल रहे हैं या जहाँ प्राकृतिक कारणों से स्थिर बिजली उपलब्ध कराना मुश्किल होता है। भारत का तटीय क्षेत्र बहुत लंबा और व्यापक है। केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और भविष्य में पोर्ट आधारित उद्योगों के लिए ऐसे फ्लोटिंग प्लांट नई ऊर्जा उपलब्ध कराने का नया रास्ता खोल सकते हैं।

हालाँकि, पर्यावरण से जुड़े संगठनों ने इस मॉडल को लेकर चिंता भी जताई है। ग्रीनपीस ने तो लोमोनोसोव (Lomonosov) को ‘Chernobyl on Ice’ यानि ‘बर्फ पर चेरनोबिल’ तक कहा। लेकिन रूस का कहना है कि इस प्लांट को बेहद सख्त सुरक्षा मानकों के साथ बनाया गया है और इसे प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखने के खास इंतजाम किए गए हैं। भारत किसी भी ऐसे प्रस्ताव पर आगे बढ़ने से पहले इसकी पूरी तकनीकी जाँच और सुरक्षा समीक्षा जरूर करेगा।

भारत–रूस न्यूक्लियर साझेदारी का भविष्य: SMR से VVER-1200 तक

कुडनकुलम प्लांट भारत-रूस न्यूक्लियर साझेदारी की रीढ़ की हड्डी है। दोनों देश कई सालों से मिलकर यहाँ रिएक्टर बना रहे हैं। पहले दो रिएक्टर चल रहे हैं, तीसरे–चौथे पर काम तेज है और अब पाँचवे-छठे यूनिट के लिए भी बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है। इसी के साथ रूस ने भारत को अगली पीढ़ी के VVER-1200 रिएक्टर देने की भी पेशकश की है। ये दुनिया में सबसे सुरक्षित, आधुनिक और ज्यादा बिजली बनाने वाले रिएक्टरों में गिने जाते हैं।

अब साझेदारी सिर्फ रिएक्टर सप्लाई तक सीमित नहीं है। भारत और रूस मिलकर न्यूक्लियर उपकरण बनाने, ईंधन असेंबली तैयार करने और पूरी हाई-टेक सप्लाई चेन को भारत में ही स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे समय में ‘SMR’ यानी छोटे लेकिन ताकतवर मॉड्यूलर रिएक्टर, इस पूरे विजन को गति दे सकते हैं। रूस इस तकनीक को आज की तारीख में सबसे बेहतर तरीके से समझता है, क्योंकि वही दुनिया का पहला देश है जिसने SMR और फ्लोटिंग न्यूक्लियर प्लांट दोनों को वास्तविक रूप से चलाया है और भारत वह बड़ा देश है जिसे आने वाले दशकों में भारी मात्रा में साफ, सस्ती और लगातार मिलने वाली बिजली की जरूरत पड़ेगी। इसलिए यह सहयोग दोनों देशों के लिए बिल्कुल स्वाभाविक, संतुलित और फायदेमंद है।

भारत ने 2047 तक 100 GW न्यूक्लियर क्षमता हासिल करने का जो बड़ा लक्ष्य रखा है, उसमें SMR एक तरह से ‘फास्ट ट्रैक रास्ता’ हैं। बड़े रिएक्टरों को बनाने में कई साल लगते हैं, लेकिन SMR को कम समय में इंस्टॉल किया जा सकता है और इन्हें जरूरत के हिसाब से कहीं भी लगाया जा सकता है। इसी वजह से विशेषज्ञ मान रहे हैं कि SMR और रूस के साथ नया सहयोग भारत-रूस न्यूक्लियर इतिहास का सबसे अहम मोड़ बन सकता है।

भारत का भविष्य: सुरक्षित, स्वच्छ, स्थिर न्यूक्लियर ऊर्जा की ओर

रूस के SMR और फ्लोटिंग न्यूक्लियर प्लांट भारत को एक ऐसी राह दिखाते हैं, जहाँ बिजली न सिर्फ लगातार और किफायती होगी, बल्कि साफ ऊर्जा के मिशन का मजबूत आधार भी बनेगी। भारत की सबसे बड़ी जरूरत ‘सुरक्षित, भरोसेमंद और बड़े पैमाने पर उपलब्ध ऊर्जा है। न्यूक्लियर ऊर्जा इसका सबसे टिकाऊ रास्ता मानी जाती है। ऐसे में रूस के साथ यह नई साझेदारी भारत को न सिर्फ नई ऊर्जा तकनीक देगी, बल्कि उसे एक उभरती हुई तकनीकी ताकत के रूप में भी आगे बढ़ाएगी।

भारत अब उस दौर में कदम रख रहा है, जहाँ न्यूक्लियर ऊर्जा सिर्फ बड़े-बड़े प्लांट तक सीमित नहीं रहेगी। छोटे, तेजी से स्थापित होने वाले, स्थानीय जरूरतों के लिए बने SMR आने वाले समय की ऊर्जा व्यवस्था का केंद्र बनने वाले हैं। रूस के साथ हुए नए समझौते इसी बड़े बदलाव की शुरुआत हैं, जो आने वाले वर्षों में भारत के ऊर्जा ढाँचे को पूरी तरह बदल सकते हैं।

भारत और रूस का यह SMR और फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर वाला सहयोग ऐसा है जैसे देश एक ही जगह बने विशाल बिजलीघरों से हटकर छोटे, पोर्टेबल और बेहद सुरक्षित बिजलीघरों की ओर बढ़ रहा हो, जिन्हें जरूरत के हिसाब से कहीं भी लगाया जा सके। भारत में जिस तेजी से बिजली की माँग बढ़ रही है, SMR उसी जरूरत को समझदारी और सुरक्षित तरीके से पूरा करने की क्षमता रखते हैं। रूस इस तकनीक में सबसे आगे है और भारत इसका उपयोग कर अपनी क्षमता कई गुना बढ़ा सकता है। आने वाले 10-20 वर्षों में भारत की ऊर्जा कहानी का बड़ा हिस्सा इसी नई तकनीक से लिखा जाएगा।

हिंदुओं पर अत्याचार के 1000+ मामलों के साथ UN में एक्टिविस्ट ने खोला बांग्लादेश सरकार का काला चिट्ठा: ऑपइंडिया से कहा- इस्लामी कट्टरपंथी कहर बनकर टूटे- उनके साथ यूनुस प्रशासन, भारत आखिरी उम्मीद

5 अगस्त 2024 वह दिन था जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को बिना किसी औपचारिकता के सत्ता से हटा दिया गया। यही दिन हिंदुओं और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और गरिमा के अंत का प्रतीक भी बन गया क्योंकि इस्लामी भीड़ ने हिंदुओं को चुन‑चुनकर मारने, लूटने और बलात्कार करने के लिए निशाना बनाना शुरू कर दिया। साथ ही उनके मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ा‑फोड़ा और अपवित्र किया गया।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (UNHRC) द्वारा आयोजित ‘फोरम ऑन माइनॉरिटी इश्यूज’ के 18वें सत्र में बोलते हुए बांग्लादेशी हिंदू अधिकार कार्यकर्ता दिपन मित्रा ने इस्लामियों द्वारा बांग्लादेशी हिंदुओं पर किए गए अत्याचारों की घटनाओं को उजागर किया।

28 नवंबर को आयोजित इस सम्मेलन में अपने भाषण के दौरान, ब्यूरो ऑफ ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस (BHRJ) के अध्यक्ष दिपन मित्रा ने कहा कि 1971 में बांग्लादेश की आजादी के बाद से ही हिंदू, बौद्ध, ईसाई और आदिवासी अल्पसंख्यक समुदाय लगातार राज्य और समाजिक स्तरों पर भेदभाव का सामना करते रहे हैं।

हालाँकि अब स्थिति ने ‘भयावह रूप’ ले लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि अल्पसंख्यक हिंदू, बौद्ध, ईसाई और आदिवासी समुदायों के ‘जातीय सफाए’ की एक व्यवस्थित प्रक्रिया चल रही है।

हजारों हिंदुओं की हत्या, महिलाओं का रेप और जबरन धर्मांतरण

बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हो रहे इस्लामी अपराधों को उजागर करते हुए दिपन मित्रा ने बताया कि पिछले एक वर्ष में 183 से अधिक हिंदुओं की हत्या की गई है। 219 हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ है।

हजारों हिंदू घरों और व्यवसायों पर हमले हुए, उन्हें तोड़ा‑फोड़ा गया और आग के हवाले कर दिया गया। इसके अलावा, हिंदू और बौद्ध समुदाय की 78 लड़कियों का जबरन इस्लाम में धर्मांतरण कराया गया।

उन्होंने कहा कि ईशनिंदा के आरोप लगाकर हिंदुओं पर हमले, हिंदू मठों और मंदिरों पर कब्जा और हिंदू व्यापारियों से वसूली बांग्लादेश में रोजमर्रा की घटनाएँ बन चुकी हैं। उन्होंने कहा, “ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब हिंदुओं की संपत्ति जब्त न की जाए, घरों पर हमला न हो, तोड़फोड़ और आगजनी न की जाए।”

अगस्त 2024 में ऑपइंडिया ने कई मामलों पर रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिनमें मुस्लिम भीड़ ने हिंदू मंदिरों और घरों पर हमले किए थे। उस समय, अल जजीरा, न्यूयॉर्क टाइम्स और DW जैसे वामपंथी मीडिया संस्थानों ने हिंदुओं के खिलाफ हो रही हिंसा को ‘राजनीतिक बदला’ बताकर कमतर दिखाने की कोशिश की थी, यह कहते हुए कि हिंदू समुदाय ने अवामी लीग का समर्थन किया था।

हालाँकि वास्तविकता यह है कि कुछ घटनाओं में भीड़ ने अवामी लीग के हिंदू नेताओं को निशाना बनाया, लेकिन हमले केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता या बदले तक सीमित नहीं थे। हिंदू मंदिरों पर नाटोर, ढाका के धामराई, पाटुआखाली के कलापारा, शरियतपुर और फरीदपुर में हमले हुए।

जेसोर, नोआखाली, मेहरपुर, चांदपुर और खुलना में हिंदू घरों को निशाना बनाया गया। दिनाजपुर में 40 हिंदू दुकानों को तोड़ा‑फोड़ा गया। ये घटनाएँ तब सामने आईं जब 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना को भारत भागने पर मजबूर होना पड़ा।

इसके बाद से जब से मोहम्मद यूनुस ने गैर‑निर्वाचित अंतरिम सरकार के सलाहकार के रूप में पदभार संभाला है, हिंदुओं पर नफरत, उत्पीड़न, हत्या, बलात्कार और लूट के मामले लगातार बढ़ते गए हैं। इस्लामवादी समूह पहले से कहीं अधिक साहस के साथ हिंदुओं को निशाना बना रहे हैं।

बांग्लादेश में हिंदुओं को जबरन नौकरियों से हटाया जा रहा

सम्मेलन में दिपन मित्रा ने यह भी बताया कि हिंदू अधिकारियों और शिक्षकों को व्यवस्थित रूप से नौकरी से हटाने का अभियान चल रहा है। उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग के सचिव अशोक कुमार देबनाथ, प्राथमिक शिक्षा विभाग के अतिरिक्त महानिदेशक उत्तम कुमार दास, प्रेस काउंसिल के सचिव श्यामल चंद्र कर्मकार, कोलकाता स्थित उप‑राजदूतावास के प्रेस सचिव रंजन सेन और कनाडा स्थित उच्चायोग की काउंसलर अपर्णा रानी पाल को पद से हटा दिया गया है।”

BHRJ अध्यक्ष ने आगे कहा कि पिछले एक वर्ष में 176 हिंदू शिक्षकों को स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से इस्तीफा देने या हटाए जाने पर मजबूर किया गया। उन्होंने कहा, “इसके अलावा, 100 से अधिक हिंदू पुलिस अधिकारियों को बर्खास्त किया गया, जिनमें कृष्णपद रॉय भी शामिल हैं। 2024 में राजशाही सरदा पुलिस अकादमी में चुने गए 252 सब‑इंस्पेक्टरों में से 99 हिंदू, 2 बौद्ध और 1 ईसाई को हटा दिया गया।”

उन्होंने बताया कि मोहम्मद युनुस की सरकार में गृह मंत्रालय ने पुलिस प्रमुख बहारुल आलम को निर्देश दिया है कि किसी भी हिंदू को पुलिस में नियुक्त न किया जाए। भेदभाव अर्धसैनिक बलों तक भी पहुँच गया है। 2025 में बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) में 693 लोगों की भर्ती हुई, लेकिन उनमें एक भी अल्पसंख्यक नहीं था।

हिंदू डॉक्टरों को भी अस्पतालों के महत्वपूर्ण पदों से हटाया जा रहा है। यहाँ तक कि प्रसिद्ध डॉक्टर समंतलाल सेन पर झूठा हत्या का मामला दर्ज किया गया। उन्होंने कहा, “यहाँ तक कि बांग्लादेश के प्रसिद्ध डॉक्टर समंतालाल सेन को भी झूठे मर्डर केस में फँसा दिया गया है।”

पिछले वर्ष ऑपइंडिया ने रिपोर्ट किया था कि इस्लामी समूहों ने हिंदू बुद्धिजीवियों और पेशेवरों को परेशान कर नौकरी छोड़ने पर मजबूर किया। कई लोगों को सिर्फ अपनी धार्मिक पहचान के कारण बांग्लादेश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। सिर्फ अगस्त 2024 में ही 60 हिंदू शिक्षक, प्रोफेसर और सरकारी अधिकारी इस्तीफा देने पर मजबूर हुए।

समय के साथ स्थिति और भी खराब होती गई। अक्टूबर में हिंदू पत्रकार लिटन कुमार चौधरी पर सिटाकुंडा में भीड़ ने हमला किया। उस पर असद बहिनी के ग्रुप के लोगों ने हमला किया था। मुस्लिम हमलावरों ने लिटन कुमार चौधरी को ‘अवामी लीग एजेंट’ कहकर बदनाम किया और उन पर ‘फेक न्यूज फैलाने’ का आरोप लगाया।

इस वर्ष जुलाई में, बांग्लादेश के चिटगाँग विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले मुस्लिम छात्रों ने एक हिंदू प्रोफेसर डॉ. कुशल बरन चक्रवर्ती को परेशान किया और उनकी पदोन्नति रोक दी। छात्र पहले से योजना बनाकर कार्यालय भवन के बाहर इकट्ठा हुए और हंगामा शुरू कर दिया।

इनमें से कई छात्र इस्लामी छात्र शिबिर (ICS) के सदस्य थे, जो बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी का छात्र संगठन है। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लगातार दबाई जा रही है। नास्तिकों, लेखकों और ब्लॉगर्स की हत्या की जा रही है या उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर किया जा रहा है।

ब्यूरो ऑफ ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस (BHRJ) के अध्यक्ष ने आगे कहा कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई अधिकार नहीं है। संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को रोकने के लिए दबाव डाला जा रहा है और सभी प्रकार की सांस्कृतिक गतिविधियों को बंद कराया जा रहा है।

नवंबर में यह रिपोर्ट किया गया कि मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने प्राथमिक विद्यालयों में संगीत और शारीरिक शिक्षा के सहायक शिक्षकों के पदों को खत्म कर दिया। यूनुस शासन का यह फैसला साफ तौर पर मुस्लिमों को खुश करने का प्रयास था, क्योंकि बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी संगठन लंबे समय से संगीत शिक्षकों की जगह इस्लामी स्कॉलर्स की भर्ती की माँग कर रहे थे।

ब्यूरो ऑफ ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस (BHRJ) के विश्लेषण के अनुसार, 2013 से अब तक बांग्लादेश में कई धर्मनिरपेक्ष नास्तिकों, लेखकों, ब्लॉगर्स और प्रकाशकों की आतंकवादियों द्वारा हत्या की गई है या वे गंभीर रूप से घायल हुए हैं।

2023 से अब तक कम से कम 12 स्वतंत्र विचारकों और ब्लॉगर्स की हत्या की गई है। सैकड़ों धर्मनिरपेक्ष नास्तिक, लेखक और ब्लॉगर्स अपनी जान बचाने के लिए देश छोड़कर विदेश भागने पर मजबूर हुए हैं।

चिन्मय कृष्णा दास को फर्जी मामले में जेल भेजा गया

UNHCR फोरम में दिपन मित्रा ने चिन्मय कृष्ण दास के मामले को विशेष रूप से उठाया। चिन्मय कृष्ण दास एक ISKCON भिक्षु हैं, बांग्लादेश के सनातन जागरण मंच के प्रवक्ता हैं और चिटगाँग स्थित पुंडरीक धाम के प्रमुख भी हैं।

उन्हें संदिग्ध और मनगढ़ंत ‘राजद्रोह’ के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। जबकि असलियत यह है कि उन्हें इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वे हिंदू अधिकारों की वकालत कर रहे थे और देश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। मित्रा ने फोरम का ध्यान हिंदुओं और अन्य गैर‑मुस्लिम समुदायों के धार्मिक स्थलों पर हो रहे हमलों की ओर भी आकर्षित किया।

उन्होंने कहा, “एक निर्दोष ISKCON भिक्षु, चिन्मय कृष्ण दास प्रभु, को बिना किसी आरोप के एक साल से जेल में रखा गया है। उनका एकमात्र ‘अपराध’ यह था कि उन्होंने अल्पसंख्यक हिंदुओं और बौद्धों पर हो रहे अत्याचारों का विरोध किया। बांग्लादेश में गैर‑मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं बची है। पिछले एक वर्ष में सैकड़ों मठों और धार्मिक स्थलों पर हमले हुए हैं, उन्हें तोड़ा‑फोड़ा गया है और आग के हवाले किया गया है। 23 जनवरी को वर्ल्ड सूफी ऑर्गनाइजेशन ने नेशनल प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि अगस्त 2024 से अब तक कम से कम 99 धार्मिक स्थलों पर हमले हुए हैं।”

दिपन मित्रा ने चिन्मय कृष्ण दास प्रभु की तत्काल और बिना शर्त रिहाई की माँग की। उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब चुप नहीं रह सकता। दुनिया को आगे आकर बांग्लादेश में हिंदू, बौद्ध, ईसाई और आदिवासी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए आवाज़ उठानी होगी और उनके सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक अधिकारों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

नवंबर में, मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने बांग्लादेश के प्रसिद्ध बाउल गायक अबुल सरकार को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने एक संगीत प्रस्तुति के दौरान इस्लाम और अल्लाह के खिलाफ ‘ईशनिंदा’ वाले बयान दिए।

यह गिरफ्तारी मुफ़्ती मोहम्मद अब्दुल्ला की शिकायत पर हुई। गिरफ्तारी के बाद, अबुल सरकार को ‘तौहीदी जनता’ और ‘आलिम‑उलमा’ जैसे संगठनों से जुड़े उग्र मुस्लिम भीड़ों ने अदालत परिसर के बाहर घेर लिया। माणिकगंज की सड़कों पर ‘एकটা দুইটা বাউল ধর, ধইরা ধইরা জবাই কর’ (एक‑एक बाउल को पकड़ो और मार डालो) जैसे नारे गूंजते रहे।

एक अन्य घटना बांग्लादेश में बढ़ती इस्लामी कट्टरता और असहिष्णुता को दर्शाती है। कट्टरपंथी इस्लामवादी समूहों ने 19वीं सदी के महान सूफी‑संत और लोककवि फकीर लालन शाह के सम्मानित समाधि‑स्थल को ध्वस्त करने की सार्वजनिक धमकी दी। लालन शाह की समन्वयवादी (syncretic) दर्शनशैली लंबे समय से इस क्षेत्र में सांस्कृतिक सद्भाव का प्रतीक रही है।

बांग्लादेश में बढ़ता ‘आतंकवाद’

बांग्लादेश में बढ़ती कट्टरता और उग्रवाद पर भी हिंदू अधिकार कार्यकर्ता ने आगे बात की। उन्होंने बताया कि 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश की विभिन्न जेलों से सैकड़ों उग्रवादी और अपराधी फरार हो गए थे। उन्होंने कहा, भागे हुए कैदियों में से 70 आतंकियों के साथ 700 अपराधियों को अब तक गिरफ्तार नहीं किए जा सका है।

पहाड़ी जनजातियों को मिटाने के एजेंडे पर काम कर रहे इस्लामवादी

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि इस्लामी जिहादी और बांग्लादेशी सेना मिलकर आदिवासी समुदायों को उनकी पैतृक भूमि से बेदखल करने की कोशिश कर रहे हैं। दिपन मित्रा ने एक विशेष घटना का उल्लेख किया, जिसमें बंगाली मुस्लिम बसने वालों और सेना ने खागड़चारी और रंगामाटी में पहाड़ी जनजातियों पर हिंसक हमला किया।

उन्होंने कहा, “इस बर्बर हमले में 8 आदिवासी लोगों की हत्या कर दी गई और 100 से अधिक घायल हुए। सभी पहाड़ी जनजातियों से थे।” उन्होंने आगे बताया कि दीघिनाला में 175 दुकानें और रंगामाटी में कम से कम 200 छोटे‑बड़े व्यवसाय क्षतिग्रस्त हुए।

इस्लामवादियों ने रंगामाटी स्थित चिटगाँग हिल ट्रैक्ट्स रीजनल काउंसिल के कार्यालय पर भी हमला किया और 9 कारों और 1 मोटरसाइकिल को आग लगा दी। इसके अलावा, इस्लामवादियों ने बौद्ध धार्मिक संस्था मैत्री विहार में तोड़फोड़ और लूटपाट की।

यूनुस जमात-ए-इस्लामी के साथ मिलकर बांग्लादेश को इस्लामी देश बनाना चाहते हैं, भारत ही आखिरी उम्मीद”- ऑपइंडिया से बोले BHRJ अध्यक्ष

ऑपइंडिया से बातचीत में दिपन मित्रा ने कहा कि बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति दिन‑प्रतिदिन खराब होती जा रही है। उनके अनुसार, यूनुस सरकार के तहत हिंदू ‘सबसे अधिक असुरक्षित’ स्थिति में हैं।

उन्होंने बताया कि पिछले एक वर्ष में एक भी हिंदू को किसी महत्वपूर्ण सरकारी पद पर नियुक्त नहीं किया गया। मित्रा ने कहा कि इस्लामवादी हिंदुओं और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बना रहे हैं, जबकि मोहम्मद यूनुस बार‑बार भारत और भारतीय मीडिया को दोष देते हैं और हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों को ‘प्रोपेगेंडा’ और ‘बढ़ा‑चढ़ाकर पेश करने’ की बात कहकर खारिज करते हैं।

उन्होंने कहा, “यूनुस पूरी तरह इस्लामवादी समूहों के साथ मिलकर हिंदुओं को निशाना बना रहा है। मुझे नहीं लगता कि वह अगले साल चुनाव होने देगा और अगर होने भी दिए, तो वह सुनिश्चित करेगा कि जमात‑ए‑इस्लामी और उसके सहयोगी सत्ता में आएँ। उसका लक्ष्य बांग्लादेश को एक इस्लामी देश बनाना है।”

यूनुस के इस्लामी एजेंडे पर आगे कहते हुए मित्रा ने ऑपइंडिया को बताया कि शेख हसीना की अवामी लीग को अगले चुनावों से प्रतिबंधित करने के बाद, अंतरिम सरकार का सलाहकार अब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को भी सत्ता की दौड़ से बाहर करने की कोशिश कर रहा है।

गौरतलब है कि यूनुस के कार्यकाल में प्रतिबंधित, भारत‑विरोधी और इस्लामवादी संगठन जमात‑ए‑इस्लामी को फिर से वैध कर दिया गया, इस्लामवादी नेताओं को जेल से रिहा किया गया, जबकि अवामी लीग के नेताओं पर कार्रवाई और तेज कर दी गई।

दिपन मित्रा ने यह भी कहा कि यूनुस ने बीमार पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के बेटे और BNP के कार्यकारी अध्यक्ष तारीक रहमान को अपनी माँ से मिलने के लिए बांग्लादेश आने की अनुमति नहीं दी।

रहमान वर्तमान में ब्रिटेन में रहते हैं। मित्रा के अनुसार, यूनुस शासन केवल दिखावे के लिए उनकी वापसी की बात करता है, लेकिन असल में उनकी वापसी को कभी संभव नहीं होने देता।

मित्रा ने भारतीय सरकार से अपील की कि वह यूनुस शासन पर दबाव बनाए और हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करे, बजाय इसके कि वह इस्लामवादियों के साथ खड़ा हो या जवाबदेही से बचता रहे। उन्होंने कहा कि बांग्लादेशी हिंदुओं के लिए अब भारत और भारतीय सरकार ही अंतिम आशा हैं।

उन्होंने कहा, “भारत हमारी आखिरी उम्मीद है। भारत चुप नहीं रह सकता। बहुत देर होने से पहले भारत को बांग्लादेशी हिंदुओं की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। इस्लामवादी या तो सभी हिंदुओं को मारना चाहते हैं या उन्हें धर्मांतरित करना चाहते हैं। अफगानिस्तान कभी हिंदू था, पाकिस्तान में हिंदू आज भी जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और अब बांग्लादेश भी उसी दिशा में जा रहा है। भारत को बांग्लादेशी हिंदुओं को बचाने के लिए पहल करनी ही होगी।”

दिपन मित्रा के बारे में

दिपन मित्रा एक बांग्लादेशी हिंदू हैं जो वर्तमान में फ्रांस में रहते हैं। वे ब्यूरो ऑफ ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस के अध्यक्ष हैं। वे वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन- बांग्लादेश चैप्टर के महासचिव भी रह चुके हैं। इसके अलावा, वे WEF- यूरोपीय संघ चैप्टर के समन्वयक और साउथ एशियन पीपल्स फोरम के कार्यकारी सदस्य भी हैं।

इस खबर को मूल रूप से श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। अंग्रेजी में इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ

Indigo की उड़ानें चौथे दिन भी प्रभावित, दिल्ली-बेंगलुरु में सैकड़ों फ्लाइट रद्द: जानें- क्यों आई ऐसी नौबत कि सरकार को लेना पड़ा एक्शन

भारत की सबसे बड़ी कम लागत वाली एयरलाइन ‘इंडिगो’ पिछले चार दिनों से उड़ान संकट से जूझ रही है। शुक्रवार (5 दिसंबर 2025) को देशभर के कई प्रमुख हवाई अड्डों पर इंडिगो की उड़ानें रद्द होने की घटनाओं ने यात्री और अधिकारी दोनों को हैरान कर दिया।

दिल्ली के इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से सभी घरेलू उड़ानों को आधी रात तक रद्द कर दिया गया, जबकि बेंगलुरु के केम्पेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से कम से कम 102 उड़ानें रद्द हुईं। यह स्थिति उस दिन आई, जब इंडिगो ने नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) को बताया कि 8 दिसंबर 2025 से उड़ानों को सीमित किया जाएगा ताकि उड़ान हो रही रुकावट को कम किया जा सके।

एयरलाइन ने चेतावनी दी कि अगले दो-तीन दिनों तक विलंब और रद्द होने वाली उड़ानों की स्थिति बनी रहेगी। हालाँकि, एयरलाइन ने यह भी कहा कि फरवरी 10, 2026 तक संचालन पूरी तरह से स्थिर होने की उम्मीद है। इस दौरान, इंडिगो ने नई फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (FDTL) नियमों के तहत रात की उड़ानों में कमी के नियमों से छूट माँगी है। उसने कहा है कि अभी और फ्लाइट्स कैंसिल होंगी और सबकुछ सही होने में करीब 10 दिन का समय लग जाएगा।

वहीं, DGCA ने कहा है कि वो इस छूट पर विचार करेगी, लेकिन इसके लिए एयरलाइन को विस्तृत रोडमैप प्रस्तुत करना होगा। उसमें पायलट और क्रू की भर्ती, प्रशिक्षण, रोस्टर पुनर्गठन और सुरक्षा योजनाओं का विवरण होगा।

केंद्र सरकार ने इंडिगो की लगातार उड़ान रद्द होने की स्थिति में DGCA के नए FDTL नियमों को तुरंत रोक दिया है और मामले में उच्च-स्तरीय जाँच के आदेश दिए हैं। जाँच यह पता लगाएगी कि इंडिगो ने नए नियमों की तैयारी क्यों नहीं की और इतनी बड़ी अव्यवस्था कैसे हुई। मंत्रालय ने निर्देश दिए हैं कि उड़ान सेवाएँ जल्द सामान्य हों और जहाँ भी लापरवाही मिले, कार्रवाई की जाएगी।

घटना के बाद सरकार की प्रतिक्रिया

देश भर में इंडिगो की बड़ी संख्या में उड़ानें रद्द होने और शेड्यूल बिगड़ने के बाद केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने DGCA द्वारा लागू किए गए नए फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (FDTL) नियमों को तुरंत प्रभाव से रोक दिया है। मंत्रालय का कहना है कि यह फैसला यात्रियों की सुविधा को देखते हुए लिया गया है, ताकि समय पर यात्रा पर निर्भर बुजुर्गों, छात्रों और मरीजों को राहत मिल सके।

सरकार ने साफ कहा है कि FDTL आदेशों को रोका गया है, लेकिन सुरक्षा से जुड़ी किसी भी बात पर कोई समझौता नहीं किया गया है। मंत्रालय ने एयरलाइंस को निर्देश दिए हैं कि वे तुरंत ऐसे कदम उठाएँ, जिससे उड़ानें जल्द से जल्द सामान्य हो सकें और यात्रियों को काम से काम परेशानी हो।

इसी के साथ, इंडिगो में हुई भारी अव्यवस्था पर सरकार ने उच्च-स्तरीय जाँच के आदेश भी जारी कर दिए हैं। जाँच में यह पता लगाया जाएगा की आखिर इतनी बड़ी संख्या में फ्लाइट कैंसिल क्यों हुईं और इंडिगो ने DGCA के नए नियम लागू होने के बावजूद पर्याप्त तैयारी क्यों नहीं की। आरोप है कि जहाँ बाकी एयरलाइंस ने समय रहते नए क्रू और पायलटों की भर्ती की, वहीं इंडिगो ने भर्ती के बिना अपने ऑपरेशन लगातार बढ़ाए, जिसके कारण यात्रियों को भारी दिक्कतें झेलनी पड़ीं।

जाँच में इंडिगो के आंतरिक प्लानिंग, स्टाफ मैनेजमेंट और DGCA के नियमों को लागू करने की तैयारी की डीटेल से समीक्षा की जाएगी। सरकार ने कहा है कि जहाँ भी लापरवाही या जिम्मेदारी तय होगी, कार्रवाई की जाएगी, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न पैदा हो।

मंत्रालय ने 24×7 कंट्रोल रूम भी बनाया है, ताकि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा सके और यात्रियों की शिकायतों का तुरंत समाधान किया जा सके। सरकार ने उम्मीद जताई है कि अगले एक-दो दिनों में उड़ानें सामान्य होने लगेंगी और तीन दिनों के भीतर स्थिति पूरी तरह ठीक कर दी जाएगी।

क्या है समस्या का कारण ?

इस समस्या के पीछे मुख्य कारण DGCA के नए FDTL नियम हैं, जो पायलटों और उड़ान कर्मचारियों के लिए अधिक आराम करने और थकान को कम करने के उद्देश्य से बनाए गए हैं।

इन नियमों के तहत सात दिनों में पायलटों को 36 से 48 घंटे का आराम देना होगा, जिसके कारण लगातार काम करने वाले घंटे कम किए गए हैं। जुलाई और नवंबर 2025 में दो चरणों में लागू हुए इन नियमों के कारण इंडिगो ने अपनी उड़ान योजनाओं का सही अंदाज नहीं लगा सके।

एयरलाइन ने मान लिया कि उनके पास पर्याप्त पायलट और क्रू नहीं हैं, क्योंकि जिन पायलटों को पहले रोस्टर में ऑन ड्यूटी दिखाया गया था, उन्हें अब उड़ान भरने की अनुमति नहीं थी। इंडिगो सामान्य परिस्थितियों में हर दिन 2,200 से अधिक घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानें संचालित करती है, जिनमें कई रात की उड़ानें शामिल हैं।

ऐसे में नए FDTL नियमों के कारण रात की उड़ानों की सीमा और पायलटों के आराम के लिए आवश्यक समय ने पूरे सिस्टम में समस्या पैदा कर दी। जिस वजह से पिछले चार दिनों में लगभग 1,300 उड़ानें रद्द हो चुकी हैं और 8 दिसंबर तक इस स्थिति में सुधार की उम्मीद नहीं है।

एयरलाइन ने यह भी माना कि FDTL नियमों के दूसरे चरण को लागू करते समय उनकी प्लानिंग और गिनती में गलती हो गई। असल में उन्हें जितने पायलट और क्रू की जरूरत थी, वह उनकी उम्मीद से ज़्यादा निकली।

अधिकारिक बयान और एयरलाइन की प्रतिक्रिया

इस पूरे परेशानी के दौरान इंडिगो ने कई बार यात्रियों और अधिकारियों से माफी माँगी है। एयरलाइन ने एक्स पर कहा कि पिछले दो दिनों में उनके नेटवर्क में काफी समस्याएँ देखने को मिला है और उन्होंने प्रभावित सभी यात्रियों से माफी माँगी।

इंडिगो के CEO पीटर एल्बर्स ने कर्मचारियों और यात्रियों से कहा कि सेवाओं और टाइम पर काम करने की व्यवस्था फिर से ठीक करना आसान नहीं होगा, लेकिन उनकी टीम सरकार और DGCA के सहयोग से स्थिति को सामान्य बनाने में पूरी मेहनत कर रही है।

एयरलाइन ने यह भी कहा कि 8 दिसंबर 2025 से उड़ानों की संख्या कम कर दी जाएगी ताकि व्यवधान कम हो सके और संचालन को स्थिर किया जा सके। DGCA ने एयरलाइन को निर्देश दिए हैं कि वह क्रू भर्ती और प्रशिक्षण, रोस्टर पुनर्गठन, सुरक्षा उपायों और तत्काल सुधारात्मक योजनाओं का विस्तृत रोडमैप प्रस्तुत करे।

इसके साथ ही एयरलाइन को हर 15 दिन में प्रगति रिपोर्ट देनी होगी। DGCA इस पूरे नेटवर्क पर कड़ी निगरानी रखेगी और यात्रियों की मदद सुनिश्चित करने के लिए एयरपोर्ट अथॉरिटीज को निर्देशित किया गया है।

DGCA (नागर विमानन महानिदेशालय) ने क्रू मेंबर्स को मिलने वाले साप्ताहिक अवकाश से जुड़ी अपनी पुरानी गाइडलाइन वापस ले ली है। यह फैसला ऐसे समय पर आया है, जब पायलट और क्रू की भारी कमी की वजह से IndiGo समेत कई एयरलाइनों के संचालन में बड़ा संकट उत्पन्न हो गया है और हजारों यात्री एयरपोर्ट पर फंसे हुए हैं।

नई अधिसूचना में DGCA ने कहा है कि मौजूदा ऑपरेशनल अव्यवस्था और एयरलाइनों से मिली शिकायतों को देखते हुए यह बदलाव किया गया है। अब पहले वाला नियम, जिसमें कहा गया था कि क्रू के साप्ताहिक आराम की जगह कोई छुट्टी नहीं लगाई जा सकती, तुरंत प्रभाव से हटा दिया गया है।

इस फैसले का मतलब यह है कि एयरलाइंस अब पायलटों और क्रू की कमी को देखते हुए शेड्यूल को थोड़ी छूट के साथ चला सकेंगी, ताकि उड़ानों का संचालन स्थिर रहे और अव्यवस्था कम हो सके। यह कदम मौजूदा संकट को संभालने के लिए तत्काल राहत देने जैसा माना जा रहा है।

जनता की प्रतिक्रिया और व्यापक असर

इसका असर यात्रियों पर सबसे अधिक हुआ है। दिल्ली में अकेले शुक्रवार (5 दिसंबर 2025) को 220 से अधिक उड़ानें रद्द हुईं, बेंगलुरु में लगभग 100 और हैदराबाद में लगभग 90 उड़ानें रद्द हुईं।

यात्रियों ने सोशल मीडिया पर अपने अनुभव साझा किए, जिसमें लम्बी प्रतीक्षा, भोजन और पानी की कमी और सही जानकारी न मिलने जैसी समस्याओं का जिक्र था। कई यात्री 12 से अधिक घंटे तक हवाई अड्डों पर फंसे रहे।

इंडिगो ने यात्रियों को सलाह दी है कि वे उड़ान की स्थिति की जाँच करें, समय से पहले हवाई अड्डे पहुँचें और आवश्यक वस्तुएँ जैसे पानी, स्नैक्स और दवाइयाँ साथ रखें। इस दौरान पायलट संघों ने कहा कि एयरलाइन की प्लानिंग ठीक नहीं थी।

उनके हिसाब से यह पूरा सँकट इसलिए हुआ क्योंकि कंपनी ने समय पर लोगों की भर्ती नहीं की और स्टाफ को संभालने की रणनीति भी ठीक नहीं थी। एयरलाइन पायलट संघों का कहना है कि FDTL नियमों की तैयारी के दो साल का समय मिला, लेकिन एयरलाइन ने इसे सही तरीके से लागू नहीं किया। हालाँकि नियम सुरक्षा बढ़ाने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन एयरलाइन के संचालन और बड़ी संख्या में उड़ानों के कारण समस्या इतनी बढ़ गई।

टैंकों और टेक्नोलॉजी की चर्चाओं के बीच PM मोदी ने ‘भगवद्गीता’ को बनाया भारत की सॉफ्ट पावर और सांस्कृतिक विरासत का ग्लोबल प्रतीक

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत दौरे पर हैं। इस दौरे पर अमेरिका से लेकर चीन तक सबकी नजरें हैं। एक और दो पुराने सहयोगियों का यह मिलन कई लोगों की आँखों में खटक रहा है तो दूसरी तरफ भारत में इसे लेकर उत्साह है। पुतिन के दौरे के साथ-साथ उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए गिफ्ट पर भी खूब चर्चा हो रही है।

दरअसल, पीएम मोदी ने पुतिन को रूसी भाषा में लिखी ‘भगवद्गीता’ गिफ्ट की है। दुनिया की सबसे अधिक भाषाओं में अनुवादित ग्रंथों में शामिल ‘भगवद्गीता’ भारतीय सांस्कृतिक विरासत का आधार मानी जाती रही है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा युद्धक्षेत्र में अर्जुन को दिया गया यह दिव्य ज्ञान हजारों वर्षों बाद भी लोगों को जीवन की प्रेरणा देता है।

2014 में नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत की विदेश नीति को भी सांस्कृतिक मोड़ दिया है और ‘भगवद्गीता’ इसके केंद्र में रही है। यह केवल धार्मिक ग्रंथ के रूप में ही नहीं बल्कि भारत की सभ्यता-परंपरा के प्रतीक के रूप में विदेश नीति का हिस्सा बन गई है। पिछले एक दशक में यह साफ दिखा है कि मोदी सरकार ने गीता को सॉफ्ट-डिप्लोमेसी के जरिए के तौर पर इस्तेमाल किया है।

सितंबर 2014 में पीएम मोदी जापान के दौरे पर गए थे और वहाँ उन्होंने सम्राट अकीहितो को ‘भगवद्गीता’ की एक प्रति भेंट की थी। साथ ही, उन्होंने इसे सबसे शानदार उपहार बताया था और उन्होंने वहीं साफ कर दिया था कि इस पर बेशक बहस होती रहे लेकिन वह आगे भी ‘भगवद्गीता’ भेंट करते रहेंगे। इसके कुछ ही दिनों बाद वह अमेरिकी दौरे पर गए और वहाँ तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा को भी ‘भगवद्गीता’ भेंट की थी और तब से अब तक यह सिलसिला लगातार जारी है।

PM मोदी द्वारा राष्ट्रपति ट्रंप को भेंट की गई ‘भगवद्गीता’

जब मोदी किसी विदेशी नेता को गीता भेंट करते हैं तो वह सिर्फ एक किताब देने भर का काम नहीं करते बल्कि यह संदेश भी देते हैं कि भारत की पहचान उसकी जड़ों, उसकी आध्यात्मिक विरासत से ही आती है। भारत सिर्फ एक राजनीति शक्ति नहीं बल्कि हजारों वर्षों से सभ्यता और संस्कृति का केंद्र रहा है और गीता जैसा ज्ञान-दर्शन ही उसकी जड़े हैं।

PM मोदी यह मानते हैं कि यह पुस्तक किसी धर्म तक सीमित नहीं बल्कि जीवन को समझने और सही निर्णय लेने का मार्ग दिखाती है। यही वजह है कि जब वे जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे हों या चीन, अमेरिका और रूस के राष्ट्रपति किसी भी बड़े नेता को ‘भगवद्गीता’ देते हैं, तो वह भारत की सांस्कृतिक सोच को उस देश या व्यक्ति से जोड़ने का एक तरीका बन जाता है। इसे वे एक तरह का ‘सांस्कृतिक संवाद’ मानते हैं।

इस पूरे दृष्टिकोण को भारत की प्राचीन सभ्यता पर आधारित कूटनीति कहा जा सकता है। भारत की सदियों से योग, आयुर्वेद, अध्यात्म और लोकतांत्रिक मूल्यों की वजह से दुनिया में एक प्रतिष्ठा रही है। जैसे योग आज पूरे विश्व में एक स्वीकार्य प्रतीक बन चुका है, उसी तरह गीता को भी एक वैश्विक नैतिक और दार्शनिक ग्रंथ के रूप में पेश करने का प्रयास पीएम मोदी द्वारा नजर आता है।

इन प्रयासों के नतीजे भी दिखते हैं। अब गीता सिर्फ पूजा में रखी जाने वाली किताब नहीं रह गई बल्कि भारत की सॉफ्ट पावर का एक सरल और सम्मानित प्रतीक बन गई है। PM मोदी की इस पहले के समर्थकों का तर्क है कि भारत को अपने प्रतीकों और परंपराओं को छिपाकर नहीं रखना चाहिए बल्कि आत्मविश्वास के साथ दुनिया के सामने रखना चाहिए।

कुल मिलाकर पीएम मोदी के दौर में गीता एक धार्मिक ग्रंथ से आगे बढ़कर भारत की विदेश नीति की एक सांस्कृतिक पहचान बन गई। यह बताती है कि भारत अपनी जड़ों और अपनी आधुनिक सोच को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहता है।

ऐसी बैठकों में या उनके पहले-बाद में जहाँ डिफेंस से लेकर टेक्नोलॉजी तक की डील होती हैं, 21वीं सदी के विज्ञान पर चर्चा होती है। वहाँ गीता का उपहार देना सिर्फ सांस्कृतिक कदम नहीं है बल्कि इसके पीछे एक राजनीतिक संदेश भी नजर आता है।

पीएम मोदी यह दिखाना चाहते हैं कि भारत सिर्फ तकनीक, विकास और सैन्य शक्ति से नहीं बल्कि अपने मूल्यों और दर्शन से भी मजबूत है। यह एक तरह का ब्रांड इंडिया है, जो बताता है कि भारत अपनी आधुनिक उपलब्धियों और प्राचीन ज्ञान, दोनों को साथ लेकर चलता है।