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‘कचरा’ बोलने पर भड़के सोमालियाई शरणार्थी, डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ सड़कों पर उतरे: जानें- सिनेसोटा में अचानक कैसे बढ़ गई इस अफ्रीकी देश के लोगों की आबादी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार (2 दिसंबर 2025) को व्हाइट हाउस की कैबिनेट मीटिंग के दौरान सोमाली प्रवासियों को ‘गारबेज’ (कचरा) करार दिया और कहा कि वे अमेरिका में नहीं रहना चाहिए। उन्होंने सोमालिया को ‘मुश्किल से एक देश’ बताते हुए कहा, “हम उन्हें अपने देश में नहीं चाहते, वे वापस जाएँ और अपना देश ठीक करें।”

ट्रंप का ये बयान मिनेसोटा की बड़ी सोमाली आबादी पर केंद्रित था, जहाँ उन्होंने कांग्रेसवुमन इल्हान उमर को भी निशाना बनाया।​ ट्रंप ने कहा कि इल्हान उमर को देश से बाहर फेंक देना चाहिए। 2019 की रैली में भी ट्रंप के भाषण के दौरान भीड़ ने ‘Send her back’ के नारे लगाए थे।

ट्रंप ने सोमाली समुदाय पर धोखाधड़ी और अपराध के आरोप लगाए, खासकर कोविड-19 के दौरान बच्चों के भोजन कार्यक्रम से करोड़ों डॉलर की हेराफेरी का हवाला दिया। उन्होंने टेम्परेरी प्रोटेक्टेड स्टेटस (टीपीएस) समाप्त करने की घोषणा की, जो सोमाली प्रवासियों को निर्वासन से बचाता है।

डेमोक्रेटिक सांसदों ने ट्रंप की टिप्पणियों को ‘नफरतपूर्ण और अस्वीकार्य’ कहा और सोमाली समुदाय के योगदान पर जोर दिया। ट्रंप प्रशासन में कैबिनेट सदस्यों ने तालियाँ बजाईं, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने मुक्का लहराया। बयान पर रिपब्लिकन नेताओं ने चुप्पी साधे रखी, आलोचकों ने इसे नस्लीय टिप्पणियों का नॉर्मलाइजेशन कहा।

सोमालिया के लोगों पर भड़कने का कारण

ट्रंप का गुस्सा मुख्य रूप से मिनेसोटा के सोमाली समुदाय पर हो रही फेडरल जाँच से आया है, जिसमें कई सोमाली-अमेरिकियों पर सरकारी फंडिंग में धोखाधड़ी के आरोप लगे हैं। उन्होंने दावा किया कि सोमाली मिनेसोटा पर कब्जा कर रहे हैं और गैंग्स सड़कों पर घूम रहे हैं। इसके अलावा, इल्हान उमर की आलोचना और राज्यपाल टिम वाल्ज पर सोमाली प्रवासियों को स्वीकार करने का आरोप भी कारण बना।​​

कांग्रेसवुमन इल्हान उमर ने ट्रंप के बयानों को ‘नस्लवादी, इस्लामोफोबिक और भेदभावपूर्ण’ कहा। उन्होंने कहा कि सोमाली-अमेरिकी स्थायी रूप से अमेरिका में बस चुके हैं। ट्रंप अपनी असफलताओं से ध्यान भटकाने के लिए ये बयान दे रहे हैं। उमर ने ट्रंप पर सोमाली समुदाय को खतरे में डालने का भी आरोप लगाया।

ट्रंप प्रशासन ने सोमालिया समेत 19 गैर-यूरोपीय देशों से ग्रीन कार्ड और नागरिकता आवेदनों पर रोक लगा दी है। असल में ट्रंप का ये कदम नेशनल गार्ड सदस्यों की हत्या जैसी घटनाओं के बाद इमिग्रेशन सुधारों का हिस्सा था। व्हाइट हाउस के पास एक अफगान नागरिक रहमानुल्लाह लाकनवाल ने दो नेशनल गार्ड सैनिकों पर गोली चलाई थी।

बताया जाता है कि वह बाइडेन प्रशासन के एक रीसेटलमेंट प्रोग्राम के तहत अमेरिका आया था। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर भी मिनेसोटा को धोखाधड़ी का केंद्र बताते हुए सोमालियों को ‘वापस भेजने’ की बात कही।​​

ट्रंप के अनुसार, गैर-नागरिकों को अब कोई सरकारी लाभ या सुविधा नहीं मिलेगी, और अगर कोई प्रवासी अमेरिका की शांति को बिगाड़ता है या देश के मूल्यों के खिलाफ जाता है, तो उसकी नागरिकता भी छीनकर उसे डिपोर्ट किया जा सकता है।

ट्रंप बयान के बाद प्रदर्शन

ट्रंप के बयान के तुरंत बाद मिनेसोटा के मिनियापोलिस–सेंट पॉल क्षेत्र में सोमाली-अमेरिकी समुदाय ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। मोगादिशू से लेकर मिनियापोलिस तक लोग ट्रंप की टिप्पणियों की निंदा कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने ICE (इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट) की कार्रवाइयों के खिलाफ भी रैलियाँ कीं।

समुदाय के नेताओं ने डर और गुस्सा व्यक्त किया। कुछ रिपब्लिकन समर्थक सोमाली-अमेरिकी भी विरोध में शामिल हुए, जो 2024 में ट्रंप का समर्थन करने के बावजूद निराश हैं। सोमालिया के प्रधानमंत्री ने आधिकारिक प्रतिक्रिया न देने की सलाह दी, लेकिन स्थानीय स्तर पर प्रतिक्रियाएँ तेज हैं।

प्रदर्शनकारी क्या कह रहे हैं

ट्रंप के बयान पर प्रदर्शनकारियों का कहना है, “हम कचरा नहीं, बल्कि व्यवसाय, स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवहन में योगदान दे रहे हैं।” समुदाय टीपीएस समाप्ति और निर्वासन के खिलाफ अब एकजुट हो गया है।​​

आइस की ओर से हो रही पासपोर्ट जाँच जैसी घटनाओं का हवाला देते हुए कई सोमाली-अमेरिकी डर और असुरक्षा के साए में जी रहे हैं। वे शांति की अपील कर रहे हैं। हालाँकि स्थानीय सरकार से सुरक्षा की माँग कर रहे हैं। कुछ ने ट्रंप की कुछ बातों को सही माना, लेकिन अधिकांश निंदा कर रहे हैं।​

सोमालिया से अमेरिका प्रवास का इतिहास

सोमालिया से अमेरिका प्रवास 1991 के गृहयुद्ध के बाद तेज हुआ, जब लाखों लोग शरणार्थी बने। मिनेसोटा पहला बड़ा केंद्र बना क्योंकि वहाँ नौकरियाँ मिल रही थीं और मौसम सोमाली संस्कृति से काफी मेल खाता था। वर्तमान में लगभग 80,000 सोमाली मिनेसोटा में रहते हैं, जो अमेरिका का सबसे बड़ा सोमाली समुदाय है।​

परिवार नेटवर्क, मस्जिदों, हलाल दुकानों और सामुदायिक समर्थन ने बसावट को आसान बनाया। अधिकांश लोग TPS या शरणार्थी स्टेटस के तहत आए। मिनेसोटा की प्रगतिशील संस्कृति और ‘मार्टिसूर’ (अतिथि सत्कार) ने भी उन्हें आकर्षित किया।

सोमाली प्रवासियों की संख्या अधिक क्यों

मिनेसोटा में सोमाली आबादी इसलिए बढ़ी क्योंकि शुरुआती शरणार्थी मांस पैकिंग प्लांट्स में नौकरियाँ पा गए। इसके अलावा सामाजिक नेटवर्क ने आने वाले लोगों के लिए रास्ते आसान किए गए। राज्य की कल्याणकारी नीतियाँ और सांस्कृतिक समानता ने भी उनके रहने के लिए इसे पसंदीदा जगह बनाया।​

संयुक्त राष्ट्र और यूएस प्रोग्राम्स ने केन्या के शरणार्थी कैंपों से रिसेटलमेंट किया। अब सोमाली-अमेरिकी टैक्सी, ट्रकिंग, स्वास्थ्य और शिक्षा में सक्रिय हैं। कुल 2.6 लाख सोमाली मूल के लोग अमेरिका में हैं।​

सोमालिया दशकों से अस्थिर रहा। यहाँ गृहयुद्ध, अल-शबाब आतंकवाद और सूखा ने लाखों को विस्थापित किया। बहुत से लोग 1990 के दशक में सोमालिया के गृहयुद्ध और अल-शबाब आतंकवाद के कारण शरणार्थी के तौर पर अमेरिका आए थे। ट्रंप ने इसी अराजकता का हवाला देकर प्रवासियों को ‘समस्या’ बताया।​

ओबामा प्रशासन (2008–2016) के दौरान P-3 ‘परिवार पुनर्मिलन’ कार्यक्रम के तहत बड़ी संख्या में सोमालियों को प्रवेश मिला। बाद में यह रिपोर्ट भी सामने आई कि कई मामलों में DNA टेस्ट में धोखाधड़ी हुई थी, लेकिन फिर भी उस दौरान लगभग 12,000 सोमाली प्रति वर्ष अमेरिका में आ रहे थे और उनमें से ज्यादातर वहीं रह गए।

मिनेसोटा के सोमाली समुदाय ने रेमिटेंस भेजकर सोमालिया को सहायता दी, लेकिन धोखाधड़ी आरोपों ने विवाद को बढ़ाया। ट्रंप की नीतियों के खिलाफ इसी के चलते प्रदर्शन किए जा रहे हैं।

नए घोषणापत्र 2017 के ‘मुस्लिम प्रतिबंध’ से किस प्रकार भिन्न है? 

यह घोषणा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले वाले रुख का ही विस्तार है, जहाँ उन्होंने ‘उच्च-जोखिम वाले देशों’ से बड़े पैमाने पर यात्रा प्रतिबंध लगाया था। उस समय इस कदम को लेफ्ट मीडिया ने ‘मुस्लिम बैन’ कहा था, हालाँकि इसमें वेनेजुएला जैसे गैर-मुस्लिम देश भी शामिल थे।

जिन देशों को ‘चिंताजनक देश’ की सूची में रखा गया है, वे हैं- अफगानिस्तान, बुरुंडी, चाड, कांगो गणराज्य, क्यूबा, म्यांमार, इक्वेटोरियल गिनी, इरीट्रिया, हैती, ईरान, लाओस, लीबिया, सिएरा लियोन, सोमालिया, सूडान, टोगो, तुर्कमेनिस्तान, वेनेज़ुएला और यमन।

हालाँकि इस बार ट्रंप सिर्फ ट्रैवल बैन की बात नहीं कर रहे। अब उनका लक्ष्य थर्ड वर्ल्ड देशों से आने वाले हर तरह के इमिग्रेशन को पूरी तरह रोकने का है। इसका मतलब है कि अब वीजा, असाइलम, रिफ्यूजी रीसेटलमेंट, परिवार वाले को बुलाना हर तरह की इमिग्रेशन प्रोसेस अनिश्चित समय के लिए बंद हो सकती है।

ट्रंप ने अपनी Truth पोस्ट में ‘Reverse Migration’ का जिक्र भी किया है। इसका मतलब है कि गैर-नागरिकों की बड़े स्तर पर वापसी (deportation) और जो लोग नागरिकता पाने की प्रक्रिया में हैं, उस प्रक्रिया को रोक देना। हाल ही में ट्रंप ने सोमाली समुदाय को निशाना बनाते हुए कहा, “सोमालियों ने हमें बहुत परेशानी दी है और वे हमें बहुत महँगे पड़ते हैं। हम सोमालिया को आखिर क्यों पैसा दे रहे हैं?”

ट्रंप के फैसले कैसे बने चिंता का विषय

डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार कहा है कि कुछ प्रवासी समुदाय अमेरिका में अपराध बढ़ा रहे हैं, संसाधनों पर बोझ हैं और कानून व्यवस्था बिगाड़ रहे हैं। उनके समर्थकों में यह चिंता काफी लोकप्रिय है।

पहले वह H-1B वीजा रोकने की बात भी करते थे, जिससे भारत के पेशेवर प्रभावित हो सकते थे, लेकिन उस पर अब वह नरम हो चुके हैं। अब उनका ध्यान उन देशों से आने वाले अकुशल और उच्च-जोखिम प्रवासियों को रोकने पर है, और इस फैसले को अमेरिका में काफी समर्थन मिल सकता है।

सोमालिया एक ऐसा देश है जहाँ राजनीतिक अस्थिरता, आतंकवाद, गरीबी और अकाल ने एक पूरी पीढ़ी को तबाह कर दिया है। वहीं अमेरिका में बसे सोमालियों के बढ़ते प्रभाव और संख्या ने अब अमेरिकी राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है, खासतौर पर ट्रंप की इमिग्रेशन नीतियों के संदर्भ में।

असम में ‘जिहादी साहित्य’ पर स्ट्राइक, बांग्लादेशी आतंकी संगठनों का डिजिटल कंटेंट भी बैन: जानें- कैसी किताबों के जरिए युवाओं का ब्रेनवॉश करते हैं इस्लामी कट्टरपंथी

असम सरकार ने राज्य की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने और युवाओं को कट्टरपंथी विचारधारा से बचाने के लिए एक बहुत बड़ा और कड़ा कदम उठाया है। सरकार ने जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB), अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT), अंसार-अल-इस्लाम/प्रो-AQIS और इनसे जुड़े सभी आतंकी संगठनों से संबंधित किसी भी तरह के कट्टरपंथी या ‘जिहादी’ साहित्य, दस्तावेज और डिजिटल सामग्री के प्रकाशन, छपाई, बिक्री, वितरण, प्रदर्शन, रखने और संग्रह करने पर पूरी तरह रोक लगा दी है।

यह प्रतिबंध केवल किताबों या पत्रिकाओं पर ही नहीं, बल्कि वेबसाइटों, सोशल मीडिया पेजों, एन्क्रिप्टेड चैनलों और ऑनलाइन ग्रुपों पर भी लागू होगा। सरकार का कहना है कि यह सामग्री भारत की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही थी।

राज्य सरकार ने यह प्रतिबंध भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 98 के तहत लगाया है। असम पुलिस की खुफिया रिपोर्ट और हाल की जाँचों में यह साफ हुआ कि ये प्रतिबंधित संगठन अभी भी राज्य में अपनी प्रचार सामग्री फैला रहे थे, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द को बड़ा खतरा था।

अधिसूचना में असम पुलिस, CID और साइबर क्राइम यूनिट को निर्देश दिए गए हैं कि वे इस आदेश का सख्ती से पालन करवाएँ और उल्लंघन करने वालों के खिलाफ तुरंत कानूनी कार्रवाई करें। यह कार्रवाई राज्य में बढ़ते कट्टरपंथी प्रचार पर लगाम कसने की एक बड़ी कोशिश मानी जा रही है।

प्रतिबंधित जिहादी साहित्य में क्या था? आतंकी कैसे फैला रहे थे विचारधारा?

असम सरकार ने जिन सामग्रियों पर प्रतिबंध लगाया है, वे मुख्यतः हिंसक जिहाद को महिमामंडित करती थीं और सीधे तौर पर युवाओं को कट्टर बनाने की कोशिश करती थीं। सुरक्षा एजेंसियों ने पाया कि इन साहित्य में न सिर्फ आतंकी विचारधारा का प्रशिक्षण दिया जाता था, बल्कि भर्ती और आतंकी ऑपरेशन की ट्रेनिंग से जुड़ी गाइडेंस भी होती थी।

ये सामग्री भारत की संप्रभुता के खिलाफ खुलकर भड़काती थी और युवाओं को आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रेरित करती थी। अधिकारियों ने बताया कि इस तरह के संदेश ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से आसानी से युवाओं तक पहुँच रहे थे।

कई डिजिटल चैनल, वेबसाइटें और वॉट्सऐप जैसे एन्क्रिप्टेड ग्रुप्स का इस्तेमाल कर ये समूह हिंसक भाषा और उग्र विचारधारा को वैध ठहराने की कोशिश कर रहे थे, जिससे अलग-अलग समुदायों के बीच अविश्वास और तनाव बढ़ रहा था।

सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक सीधा और तत्काल खतरा माना। यह प्रतिबंध इसलिए भी जरूरी हो गया था, क्योंकि इंटेलिजेंस रिपोर्टों में यह बात सामने आई थी कि यह डिजिटल प्रचार राज्य के सौहार्दपूर्ण वातावरण को नुकसान पहुँचा रहा था और युवाओं को गुमराह करने की कोशिशें लगातार जारी थीं।

कौन से आतंकी संगठनों का खुलासा हुआ और क्या था उनका भारत प्लान?

असम में इस प्रतिबंध के जरिए जिन तीन मुख्य आतंकी संगठनों के साहित्य और एजेंडे का खुलासा हुआ है, वे सभी बांग्लादेश में सक्रिय हैं और भारत को निशाना बनाने की फिराक में थे। ये संगठन हैं जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB), अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT) और अंसार-अल-इस्लाम/प्रो-AQIS। इन सभी को केंद्र सरकार पहले ही UAPA, 1967 के तहत आतंकी संगठन घोषित कर चुकी है।

JMB का जिहादी साहित्य: क्या था इसमें और कैसे फैलाया जाता था

जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) दक्षिण एशिया के सबसे संगठित सुन्नी जिहादी नेटवर्कों में से एक माना जाता है। इसका साहित्य दो हिस्सों में बाँटा जाता है, ‘पहला वैचारिक और दूसरा ऑपरेशनल’। वैचारिक साहित्य में ‘हिंसक जिहाद को मजहबी कर्तव्य’ की तरह पेश किया जाता था। इसमें लोकतंत्र, उदारवाद और सेकुलरिज्म को ‘शैतानी व्यवस्था’ बताकर युवाओं में एक अलग पहचान और हिंसक संघर्ष का भाव पैदा किया जाता था। ऑपरेशनल सामग्री में बम बनाने से लेकर भर्ती करने की रणनीति और गुप्त सेल चलाने तक की तकनीक बताई जाती थी।

ये साहित्य कभी खुले मंचों पर नहीं मिलता था। इन्हें खास एन्क्रिप्टेड ऐप, टेलीग्राम चैनल, व्हाट्सऐप ग्रुप, और विदेशी सर्वरों पर होस्ट किए गए PDF के रूप में साझा किया जाता था। असम पुलिस की जाँच में ऐसे सैकड़ों डिजिटल दस्तावेज मिले जिनमें JMB का प्रचार था, और इन्हें मुख्यत: सीमावर्ती जिलों में फैला हुआ पाया गया।

JMB का इतिहास और भारत में उसका ‘दीर्घकालिक प्लान’

1998 में बने JMB ने खुद को शुरू से बांग्लादेश में इस्लामी शासन स्थापित करने वाले आंदोलन की तरह पेश किया। लेकिन 2005 के 63 जिलों में 459 ब्लास्ट इसकी कट्टरपंथी हिंसा की सबसे बड़ी मिसाल है। भारत में इसका मुख्य मकसद दो तरह का रहा, ‘पहला, पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में जिहादी सेल बनाना और दूसरा रोहिंग्या मुद्दे को भड़का कर भावनात्मक भर्ती करना।’

JMB का योजना स्पष्ट थी। सीमा पार मौजूद असंतोष का फायदा उठाते हुए भारत में ‘वार-प्रेडिक्शन मॉडल’ तैयार करना, यानी धीरे-धीरे गुप्त सेल बनाकर भारत को भविष्य में हमलों का मैदान बनाना। JMB ने असम और पश्चिम बंगाल में कई मॉड्यूल बनाए और इन मॉड्यूलों के पास जो सामग्री मिली, उनमें भारत को ‘इस्लामी संघर्ष का अगला मैदान’ बताने वाली जरूरत से ज्यादा कट्टर और उकसाने वाली बातें शामिल थीं।

युवाओं को कैसे जाल में फँसाया जाता था

JMB अपनी भर्ती का तरीका बहुत सोच-समझकर बनाता था। पहले हल्की मजहबी सामग्री भेजी जाती, फिर धीरे-धीरे कथित ‘अन्याय’ की कहानियाँ और अंत में हिंसक विचारधारा वाले दस्तावेज। असम में पकड़े गए कई युवक इन्हीं चरणों से गुजरकर कट्टर बने थे। उनमें से कई को JMB के डिजिटल हैंडलरों ने भारत के अंदर ‘स्लीपर सेल’ की तरह तैयार किया था।

ABT का साहित्य: अल-कायदा से प्रेरित संगठन का युवाओं के दिमाग पर डिजिटल कब्जा

अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT) बांग्लादेश के उन संगठनों में से है जो सीधे तौर पर अल-कायदा की विचारधारा से प्रभावित हैं। ABT का साहित्य बेहद आक्रामक होता है और इसमें खासकर ‘काफिर’, ‘नास्तिक’ और ‘धर्म-विरोधी’ लोगों को निशाना बनाने की खुली बातें लिखी जाती थीं।

उनकी डिजिटल किताबों में अल-अवलाकी के भाषण, अल-कायदा के वैचारिक संदेश और ऑनलाइन ‘लोन वुल्फ अटैक’ जैसी रणनीतियाँ बताई जाती थीं। ABT की खासियत यह थी कि वह अपने साहित्य को युवाओं के लिए प्रेरणादायक भाषण या ‘आध्यात्मिक ज्ञान’ की तरह प्रस्तुत करता था, जिससे कई अनभिज्ञ युवाओं को लगता था कि यह सिर्फ धार्मिक शिक्षा है, जबकि अंदर छिपा संदेश धीरे-धीरे उन्हें हिंसक कट्टरपंथ की तरफ धकेल देता था।

ABT के भारत में नेटवर्क का खुलासा कैसे हुआ

असम STF द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन प्रघट‘ ने पूरे नेटवर्क की असल तस्वीर उजागर की। जाँच में पता चला कि ABT के कई सदस्य बांग्लादेश से भारत आए और असम, बंगाल, झारखंड और केरल में गुप्त सेल बनाने लगे। इनसे जो डिजिटल दस्तावेज मिले, उनमें अल-कायदा की विचारधारा, स्लीपर सेल तैयार करने की गाइड और भारतीय नेताओं, RSS सदस्यों को निशाना बनाने की योजनाओं का उल्लेख था।

ABT का साहित्य राज्य में इतना फैल चुका था कि कई युवाओं ने इसे बिना समझे डाउनलोड किया और बाद में संपर्क भी स्थापित किया। STF ने 13 से ज्यादा ABT सदस्यों को गिरफ्तार किया, और सभी के पास भारी मात्रा में डिजिटल जिहादी साहित्य मिला।

अंसार-अल-इस्लाम/प्रो-AQIS का साहित्य: आतंकवाद का ‘यूनिवर्सिटी मॉडल’

अंसार-अल-इस्लाम को पहले जुंद-अल-इस्लाम कहा जाता था। यह उन संगठनों में से है जिन्हें सीधे अल-कायदा ने पोषित किया। इसका साहित्य बेहद व्यवस्थित होता है, जिसे कई आतंकवाद विशेषज्ञ ‘टेक्स्टबुक ऑफ जिहाद’ कहते हैं। इसमें वैचारिक, राजनीतिक, सैन्य और मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण की सामग्री होती है।

इस साहित्य में ओसामा बिन लादेन, जर्कावी और अल-कायदा के अन्य नेताओं की रणनीतियों पर विस्तृत चर्चाएँ होती हैं। असम पुलिस को पता चला कि कई दस्तावेज इस संगठन के ‘प्रशिक्षण मैनुअल’ थे, जिनमें जहर बनाने, विस्फोटक तैयार करने और गुप्त नेटवर्क संभालने जैसी जानकारी थी। यही वजह है कि राज्य ने इसे सबसे खतरनाक माना।

इसका भारत में उद्देश्य क्या था

अंसार-अल-इस्लाम का उद्देश्य सिर्फ हमले करना नहीं बल्कि भारत जैसे बड़े देश में ‘आइडियोलॉजिकल पेनिट्रेशन’ यानी विचारधारा की धीरे-धीरे पैठ जमाना था। संगठन का मानना था कि अगर साहित्य भरोसेमंद हाथों तक पहुँचा दिया जाए, तो नेटवर्क बिना किसी प्रत्यक्ष आदेश के खुद बन सकता है। खुफिया रिपोर्ट में पाया गया कि असम के कुछ युवक इस संगठन के साहित्य पढ़कर खुद को ‘डिजिटल मुजाहिदीन’ कहने लगे थे।

युवाओं का कट्टरपंथ की ओर बढ़ना: असम सरकार क्यों हुई अलर्ट

असम सरकार का कहना है कि यह सिर्फ कुछ पुस्तकों का मामला नहीं बल्कि एक बड़ी डिजिटल लड़ाई है। प्रतिबंधित संगठनों ने इंटरनेट को हथियार की तरह इस्तेमाल किया और आसानी से प्रभावित होने वाले युवाओं को अपना लक्ष्य बनाया।

कई गिरफ्तारियों में यह खुलासा हुआ कि छात्र, मजदूर, ड्राइवर, यहाँ तक कि बेरोजगार युवक भी जिहादी समूहों से डिजिटल रूप से जुड़े हुए थे। उनके फोन में जो साहित्य मिला, वह एक पूरी विचारधारा को तैयार कर रहा था। इसमें भारत को ‘दुश्मन राज्य’, पुलिस को ‘जालिम’ और लोकतंत्र को ‘हराम’ बताया गया था।

सरकार को यह भी डर था कि यदि यह सामग्री समय रहते रोकी नहीं गई तो राज्य में स्लीपर सेल बन सकते हैं, सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है, और पड़ोसी देशों के आतंकी संगठनों को भारत में जमीन मिल सकती है।

असम सरकार ने बैन क्यों लगाया और आगे क्या होगा

असम सरकार ने यह प्रतिबंध सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों की चेतावनी के बाद नहीं बल्कि जमीन पर देखे गए बदलावों के आधार पर लगाया। सरकार ने साफ कहा कि यह साहित्य ‘भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और आंतरिक शांति’ के खिलाफ है।

अब राज्य में पुलिस, CID और साइबर यूनिट मिलकर दुकानों, लाइब्रेरी, ऑनलाइन ग्रुप और सोशल मीडिया पेजों की निगरानी करेंगे। सरकार का लक्ष्य है कि युवाओं तक ऐसा कोई भी साहित्य न पहुँचे जो उन्हें गलत रास्ते पर ले जाए। यह अभियान लंबे समय तक चलने वाला है और किसी भी उल्लंघन पर तुरंत गिरफ्तारी की जाएगी।

हिडमा को ‘हीरो’ मानता था अक्षय, नक्सल समर्थन के मिले लिंक: इंडिया गेट प्रोटेस्ट में दिल्ली पुलिस ने खोला प्रदर्शनकारियों का कच्चा चिट्ठा, जानें ‘चिली स्प्रे गैंग’ का क्या था असली प्लान?

दिल्ली पुलिस की जाँच में सामने आया है कि इंडिया गेट पर वायु प्रदूषण के खिलाफ किए गए विरोध प्रदर्शन के पीछे नक्सली एजेंडा छिपा था। पुलिस का दावा है कि प्रदर्शनकारियों का मुख्य समूह ‘भगत सिंह छात्र एकता मंच’ (BSCEM) था, जिसका मकसद मारे गए नक्सली माडवी हिडमा का समर्थन करना था।

जानकारी के अनुसार, मिर्च स्प्रे से पुलिसकर्मी पर हमला करने वाला अक्षय ईआर इस साजिश का मुख्य आरोपित है, जिसके फोन से नक्सलियों से जुड़े सबूत मिले हैं। पुलिस ने इस मामले में 23 प्रदर्शनकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है, जो अभी जेल में हैं।

मुख्य आरोपित और उसका नक्सली कनेक्शन

पुलिस दस्तावेजों के मुताबिक, जाँच में सामने आया है कि इस विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों की भूमिकाएँ क्या थीं और उनके क्या कनेक्शन थे।

अक्षय ईआर मिर्च स्प्रे से हमला करने वाला- अक्षय ईआर मुख्य साजिशकर्ता समूह BSCEM का एक एक्टिव मेंबर है। विरोध के दौरान, उसने कांस्टेबल ईशांत की आँखों में मिर्च स्प्रे कर दिया था। वीडियो में वह यह करते हुए साफ दिखा है, और पुलिस ने उसके पास से मिर्च स्प्रे की बोतल भी बरामद की है।

पुलिस ने जब उसका फोन जब्त करके जाँच की, तो उसमें नक्सलियों से संबंधित वीडियो और लिंक मिले। उसके फोन पर BSCEM की अध्यक्ष गुरकीरत का एक मैसेज भी मिला, जिसमें वे नक्सली माडवी हिडमा को हीरो बताकर उसके बारे में बात कर रहे थे। अक्षय वीडियो में हिडमा के समर्थन में नारे लगाता और उससे जुड़ा पोस्टर पकड़े हुए भी दिखा है।

गुरकीरत BSCEM की अध्यक्ष और मुख्य साजिशकर्ता- गुरकीरत भगत सिंह छात्र एकता मंच (BSCEM) की अध्यक्ष है। पुलिस ने कहा है कि BSCEM ही वह मुख्य समूह था जिसने इस प्रदर्शन को आयोजित किया था। पुलिस का दावा है कि प्रदूषण के नाम पर बुलाए गए इस प्रदर्शन में उनका एजेंडा साफ था कि वे माडवी हिडमा के समर्थन में नारे लगाएँगे।

हिडमा के समर्थन वाले पोस्टरों पर भी ‘BSCEM’ का नाम साफ तौर पर लिखा था। BSCEM के इंस्टाग्राम पेज पर भी हिडमा को महिमामंडित करने वाली पोस्ट मिली हैं। गुरकीरत इस वॉट्सऐप ग्रुप की एडमिन भी है। उसने अपनी बहन रवजोत और आयशा वाफियाथ के साथ हैदराबाद में प्रतिबंधित नक्सली समूह ‘रेडिकल स्टूडेंट यूनियन’ (RSU) के एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था और वहाँ नक्सल समर्थक नारे लगाए थे।

पुलिस का मानना है कि वह इस मामले में मुख्य साजिशकर्ता है और समूह को चला रही है। जब कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया तो वह भी दूसरों के साथ पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने पहुँची और पुलिस अधिकारियों को काम करने से रोका।

रवजोत कौर, गुरकीरत की बहन और ग्रुप एडमिन- रवजोत कौर, गुरकीरत की सगी बहन है और BSCEM समूह की मुख्य सदस्य है, जो ग्रुप चलाने में मदद करती है। वह BSCEM वॉट्सऐप ग्रुप की एडमिन भी है। वीडियो में वह हिडमा के समर्थन में नारे लगाती साफ दिख रही है।

रवजोत कौर ने भी गुरकीरत और आयशा के साथ प्रतिबंधित RSU के कार्यक्रम में जाकर नक्सल समर्थक नारे लगाए थे। उसने भी BSCEM के नाम से हिडमा को महिमामंडित करने वाले पोस्टर बनाए थे। वॉट्सऐप और इंस्टाग्राम पर भी हिडमा के एनकाउंटर की निंदा करने वाली बातचीत मिली है। वह भी मुख्य साजिशकर्ता है, जिसने थाने जाकर पुलिस के काम में बाधा डाली।

आयशा वाफियाथ मिधाथ और श्री इलक्किया- ये दोनों भी BSCEM समूह की एक्टिव मेंबर हैं। आयशा भी BSCEM वॉट्सऐप ग्रुप की सदस्य है और वीडियो में हिडमा के समर्थन में नारे लगाते दिखी है। उसने और श्री इलक्किया ने भी गुरकीरत और रवजोत के साथ प्रतिबंधित RSU के कार्यक्रम में भाग लिया और नक्सल समर्थक नारे लगाए।

इलक्किया को वीडियो में जोर-जोर से यह नारा लगाते देखा गया कि ‘हिडमा अमर रहे, कितने हिडमा मारोगे, हर घर से हिडमा निकलेगा, हिडमा जी को लाल सलाम’। ये दोनों भी मुख्य साजिशकर्ता हैं जिन्होंने थाने जाकर पुलिस के काम में रुकावट पैदा की।

क्रांति उर्फ प्रियांशु सिंह, गुमराह करने का आरोप- क्रांति को भी हिडमा के समर्थन में नारे लगाते देखा गया। उसने ‘हिमखंड ग्रुप’ बनाया और उस वॉट्सऐप ग्रुप की एडमिन है, जहाँ प्रदर्शन के लिए लोगों को बुलाया गया था। वह प्रदर्शन को आयोजित करने वालों में से थी और रवजोत और गुरकीरत के संपर्क में थी। पुलिस ने यह भी आरोप लगाया है कि वह जाँच को गुमराह कर रही है और उसने अपना मोबाइल फोन नंबर नहीं दिया है।

विष्णु तिवारी, फर्जी जानकारी फैलाने का आरोप- विष्णु तिवारी से मिर्च स्प्रे की एक बोतल मिली है। वीडियो में वह प्रदर्शनकारियों को ट्रैफिक रोकने और सड़क जाम करने के लिए उकसाता हुआ दिखा है। उसके फोन की चैट से पता चला कि वह क्रांति उर्फ प्रियांशु सिंह के संपर्क में था, जिसने नक्सल समर्थक नारे लगाए थे।

विष्णु तिवारी के फोन में एक स्क्रीनशॉट मिला, जिससे पता चला कि ये लोग यह फर्जी खबर फैला रहे थे कि हिडमा को आत्मसमर्पण के बहाने मार दिया गया। उस पर महिला पुलिसकर्मियों के साथ अभद्रता और हमला करने का भी आरोप है।

अन्य साजिशकर्ता

अभिनाश सत्यपाथी को भी हिडमा के समर्थन में नारे लगाते और हिडमा को हीरो बताने वाला पोस्टर पकड़े देखा गया। उसने बैरिकेडिंग को तोड़ने की कोशिश की। प्रकाश कुमार गुप्ता और समीर फायरीस भी हिडमा के समर्थन में नारे लगाते दिखे, उन्होंने सड़क भी रोकी और उन पर महिला पुलिसकर्मियों के साथ अभद्रता और हमला करने का आरोप है।

आहान अरुण उपाध्याय ने क्रांति और रवजोत को प्रदर्शन के लिए डिजिटल पोस्टर बनाने और सोशल मीडिया पर मैसेज एडिट करने में मदद की। वागीशा अनुदीप भी हिडमा के समर्थन में नारे लगाती दिखी।

इसके अलावा करीना सुंदरानी, प्रीति रानी चंद्रकेत, आत्रेय चौधरी, श्रेष्ठ मुकुंद, सत्यम यादव, मेहुल झुंझुनवाला, सिमरन सिंह, तान्या श्रीवास्तव, काजल कुमारी, बंका आकाश और नोई मेबुंग भी प्रदर्शन में शामिल थे। ये सभी लोग भी उन प्रदर्शनकारियों में शामिल थे जिन्होंने थाने जाकर पुलिस के काम में बाधा डाली।

दिल्ली पुलिस ने इन सभी 23 प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दो अलग-अलग FIR दर्ज की हैं और ये सभी अभी न्यायिक हिरासत में हैं।

कार्तिगई दीपम विवाद पर मद्रास HC ने फटकारा, फिर भी हिंदुओं की खिलाफत से बाज नहीं आई तमिलनाडु की DMK सरकार: जानें- क्यों अदालत ने लिया अवमानना पर एक्शन

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने बुधवार (3 दिसंबर 2025) को डिडीगुल और मदुरै जिला प्रशासन के खिलाफ दो अलग-अलग कंटेम्प्ट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सख्त रुख अपनाया। ये याचिकाएँ हाईकोर्ट के उन आदेशों की अवहेलना के खिलाफ दाखिल की गई थीं, जिनमें हिंदू भक्तों को कार्तिगई दीपम उत्सव मनाने और दीप जलाने की अनुमति दी गई थी।

पहला मामला डिंडीगुल के पेरुमल कोविलपट्टी गाँव में स्थित मंदु कोविल से जुड़ा है, जहाँ स्थानीय हिंदू समुदाय को उत्सव मनाने की अनुमति दी गई थी, लेकिन जिला प्रशासन ने कानून-व्यवस्था के नाम पर इसे रोक दिया। दूसरा मामला मदुरै के थिरुप्परनकुंद्रम हिल से संबंधित है, जहाँ हाईकोर्ट ने दीपथून स्तंभ पर कार्तिगई दीपम जलाने का आदेश दिया था, लेकिन प्रशासन ने इसे लागू नहीं किया।

हाईकोर्ट ने दोनों मामलों में कंटेम्प्ट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए अधिकारियों को फटकार लगाई और कहा कि कोर्ट के आदेश की अवहेलना लोकतंत्र की नींव को कमजोर करती है।

हाईकोर्ट के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन ने इन मामलों में सुनवाई की और अपने आदेश में साफ कहा कि जब तक सिंगल बेंच का फैसला डिवीजन बेंच या सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द या स्थगित नहीं किया जाता, तब तक इसे पूरी तरह लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने अधिकारियों की इस हरकत को ‘नियम कानून की अवहेलना’ करार दिया और कहा कि यह संवैधानिक मूल्यों पर हमला है।

आइए, दोनों मामलों में कोर्ट के आदेश की प्रमुख बातों और फैसलों को विस्तार से समझते हैं।

डिंडीगुल के मांडू कोविल (पेरुमल कोविलपट्टी) का मामला और कोर्ट का आदेश

डिंडीगुल जिले के पेरुमल कोविलपट्टी गाँव में स्थित मंदु कोविल (सर्वे नंबर 780/12) में कार्तिगई दीपम उत्सव मनाने की अनुमति माँगने वाली याचिका पर हाईकोर्ट ने 2 दिसंबर 2025 को फैसला सुनाया था। दरअसल, डिंडीगुल जिले के अथूर तालुक के पेरुमल कोविलपट्टी गाँव में स्थित मांडू करुप्पसामी मंदिर (राजस्व रिकॉर्ड में मांडू कोविल के नाम से दर्ज) परिसर में हिंदू समुदाय कार्तिगई दीपम मनाना चाहता था। गाँव में ईसाई बहुसंख्यक हैं और हिंदू अल्पसंख्यक।

2 दिसंबर 2025 को जस्टिस स्वामीनाथन ने रिट याचिका (WP(MD)No.32468 of 2025) स्वीकार करते हुए हिंदुओं को बुधवार-गुरुवार (3-4 दिसंबर) को कुछ घंटे के लिए दीपम जलाने और झाड़ियाँ साफ करने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने साफ कहा था कि कोई स्थायी निर्माण नहीं होगा और ईसाई समुदाय के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

लेकिन अगले ही दिन डिंडीगुल के जिलाधकारी ए. सरवनन (IAS) ने धारा 163 BNSS के तहत आदेश जारी कर गाँव में 5 या उससे अधिक लोगों के इकट्ठा होने और बाहरी लोगों के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगा दी। इसका सीधा मतलब था कि कोर्ट के आदेश के बावजूद हिंदू दीपम नहीं जला सकेंगे।

कोर्ट ने इसे ‘खुली अवमानना’ और ‘हिंदुओं के मौलिक अधिकारों का घोर उल्लंघन’ बताया। जज ने कहा-

“मैंने सिंगल बेंच में आदेश दिया था। जब तक डिवीजन बेंच या सुप्रीम कोर्ट उसे स्थगित या रद्द नहीं करता, उसे अक्षरशः मानना होगा। जिलाधकारी मुझ पर अपीलीय अधिकार नहीं रखते। वह मेरे आदेश को रद्द करने वाला आदेश जारी करने की हिम्मत कैसे कर सकते हैं?”


“कानून-व्यवस्था का बहाना देकर नागरिकों के वैध अधिकारों को कुचलना प्रशासन की लाचारी की स्वीकारोक्ति है। पुलिस अधिकार सुरक्षित रखने के लिए है, उन्हें छीनने के लिए नहीं।”

“पेरुमल कोविलपट्टी के किसी भी हिंदू का पूजा और उत्सव मनाने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-25 के तहत मौलिक अधिकार है। जिलाधकारी ने सामान्य धार्मिक उत्सव तक रोक दिया। इससे बड़ा मौलिक अधिकारों का हनन और क्या हो सकता है?”

कोर्ट ने जिलाधकारी सरवनन और पुलिस अधीक्षक प्रतीप (IPS) को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर सफाई देने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि उनकी सफाई के बाद तय होगा कि अवमानना हुई है या नहीं।

पढ़ें कोर्ट के फैसले की कॉपी

थिरुप्परनकुंद्रम हिल मामले में कोर्ट का फैसला और प्रमुख बातें

मदुरै के थिरुप्परनकुंद्रम हिल पर स्थित अरुलमिगु सुब्रमण्या स्वामी मंदिर के प्रबंधन को दीपथून स्तंभ पर कार्तिगई दीपम जलाने का आदेश हाईकोर्ट ने 1 दिसंबर 2025 को दिया था। दरअसल, मदुरै के प्रसिद्ध अरुलमिगु सुब्रमण्या स्वामी मंदिर के पास थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी है। इस पहाड़ी के निचले शिखर पर एक प्राचीन पत्थर का स्तंभ है जिसे ‘दीपथून’ कहते हैं। सदियों से कार्तिगई दीपम के दिन यहाँ विशाल दीप जलाने की परंपरा रही है। ऊपरी शिखर पर कथित तौर पर दरगाह है।

1 दिसंबर 2025 को जस्टिस स्वामीनाथन ने रिट याचिका (WP(MD)No.32317 of 2025) में मंदिर प्रशासन को 3 दिसंबर शाम ठीक 6 बजे दीपथून पर कार्तिगई दीपम जलाने का स्पष्ट आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि यह केवल निचले शिखर पर होगा, इससे दरगाह या मुस्लिम समुदाय के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

लेकिन 3 दिसंबर को शाम 6 बजे तक कोई तैयारी नहीं हुई। मंदिर के कार्यकारी अधिकारी यज्ञ नारायणन फोन नहीं उठा रहे थे। मंदिर प्रशासन ने 2 दिसंबर को ही खामीपूर्ण अपील दाखिल की थी, जिसे रजिस्ट्री ने बताया कि वकील ने कागजात वापस ले लिए। दरगाह की ओर से कोई अपील नहीं की गई। कोर्ट ने इसे ‘आदेश की अवहेलना करने की चाल’ बताया।

जज स्वामीनाथन ने कहा-

“मंदिर को मेरे आदेश से कोई शिकायत कैसे हो सकती है? शिकायत सिर्फ दरगाह को हो सकती थी। अपील खामीयुक्त दाखिल करना और फिर वापस लेना साफ तौर पर आदेश नहीं मानने की तरकीब है।”

“घड़ी पीछे नहीं की जा सकती। अधिकारी स्पष्ट कर चुके हैं कि वे कोर्ट का आदेश नहीं मानेंगे।”

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट (मई 2025) और केरल हाईकोर्ट (2020) के कड़े फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कोर्ट का आदेश न मानना लोकतंत्र की बुनियाद पर हमला है। कोई अधिकारी, चाहे कितना ऊँचा हो, कानून से ऊपर नहीं है।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को खुद दीप जलाने की दी अनुमति

इस मामले में सजा देने के बजाय कोर्ट ने अपने मूल आदेश को तुरंत लागू करवाने का रास्ता चुना। जज ने कहा कि अवमानना का मकसद सिर्फ सजा नहीं, बल्कि कोर्ट के आदेश को बहाल करना भी है। इसलिए-

  • याचिकाकर्ता रामा रविकुमार को खुद पहाड़ी पर चढ़कर दीपथून पर दीप जलाने की अनुमति दी गई।
  • वे 10 अन्य लोगों (अन्य याचिकाकर्ताओं सहित) को साथ ले जा सकते हैं।
  • मद्रास हाईकोर्ट मदुरै बेंच की CISF यूनिट को आदेश दिया गया कि वह सुरक्षा टीम भेजकर याचिकाकर्ताओं की पूरी सुरक्षा करे और दीप जलाने में मदद करे।

कोर्ट ने माना कि यह ‘प्रतीकात्मक कदम’ है, लेकिन प्रतीकात्मकता का बहुत महत्व है। हालाँकि इसके बावजूद डीएमके सरकार ने मूल जगह पर दीपथून की अनुमति नहीं दी

पढ़ें- फैसले की कॉपी

ये फैसले दिखाते हैं कि हाईकोर्ट न्यायपालिका की गरिमा और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए कितना सख्त है। जस्टिस स्वामीनाथन ने बार-बार जोर दिया कि कार्यपालिका कोर्ट के आदेश पर फैसला नहीं सुना सकती। कानून-व्यवस्था का बहाना बनाकर धार्मिक अधिकारों को दबाना असंवैधानिक है। मंदु कोविल मामले में अल्पसंख्यक हिंदुओं के अधिकारों पर जोर दिया गया, जबकि थिरुप्परनकुंद्रम में प्रतीकात्मक अनुपालन से कोर्ट ने अपनी शक्ति दिखाई।

ये फैसले तमिलनाडु की डीएमके सरकार को चेतावनी हैं कि धार्मिक मामलों में तटस्थ रहें और कोर्ट आदेशों का पालन करें। अगर अधिकारी स्पष्टीकरण नहीं देते, तो सजा हो सकती है। हालाँकि डीएमके सरकार की तानाशाही के सामने हाई कोर्ट भी बेबस दिखी। ऐसे में अब हाई कोर्ट ने दोनों मामलों में अवमानना की याचिकाएँ स्वीकार कर ली है। अब देखना ये है कि हिंदू विरोधी डीएमके सरकार हाई कोर्ट को कब तक अँगूठा दिखाती है, या फिर कानून इन मामलों में कोई अलग रास्ता अपनाएगा, ये भी देखने वाली बात होगी।

अर्थव्यवस्था में तेजी से तरक्की, फिर भी डॉलर के मुकाबले कमजोर पड़ रहा रुपया: इन 3 बिंदुओं से समझिए, क्यों कमजोर पड़ रही भारत की करेंसी

भारतीय रुपया (INR) पहली बार डॉलर के मुकाबले 90 रुपये के निम्नतम स्तर को पार कर गया है। रुपए 3 दिसंबर 2025 को 90.19 रुपये पर बंद होने से पहले 90.30 रुपये के निचले स्तर पर पहुँच गया। यह हाल के दिनों में लगातार तीसरा निम्नतम स्तर है। भारतीय रुपया 2025 में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली एशियाई मुद्राओं में से एक रहा है, जिसमें लगभग 4-5% की गिरावट आई है।

यह गिरावट अचानक नहीं आई है। 2 दिसंबर को 89.9475 रुपए प्रति डॉलर से और 1 दिसंबर को 89.76 रुपए प्रति डॉलर के बाद तीसरे दिन लगातार 90 रुपए प्रति डॉलर का मनोवैज्ञानिक गिरावट दर किया गया। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अत्यधिक अस्थिरता को रोकने के लिए जून और अक्टूबर के बीच लगभग 30 बिलियन डॉलर की USD बिक्री करके स्थिति सुधारने की कोशिश की थी।

रुपए में आई ऐतिहासिक गिरावट के बाद विपक्ष को भी बोलने का मौका मिल गया। विपक्षी पार्टियों और मोदी विरोधियों ने मोदी सरकार पर हमला करने और उस पर बड़े पैमाने पर फाइनेंसियल मिसमैनेजमेंट का आरोप लगाया। मोदी के विरोधी डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट को सरकार की नाकामी के तौर पर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे बेरोजगारी, महँगाई बढ़ने और PM मोदी के नेतृत्व में निवेशकों का भरोसा कम होने की आशंका जता रहे हैं।

लेकिन आर्थिक हालात का ऐसा मतलब निकालना बेईमानी है और यह सरकार को टारगेट करने की रणनीति है, न कि इंडियन इकॉनमी और करेंसी को लेकर असली चिंताओं पर बात करने की। क्योंकि ‘बाहरी कारकों’ को समझे बिना हालात को ठीक से समझना मुश्किल है।

दरअसल भारतीय रुपये की कमजोरी पूरी तरह से घरेलू वजहों या पॉलिसी की गलतियों की वजह से नहीं है, बल्कि यह काफी हद तक ग्लोबल मुश्किलों और स्ट्रक्चरल ट्रेड इम्बैलेंस की वजह से है।

यह न भूलें कि भारत का मूलभूत आर्थिक ढाँचा मजबूत बना हुआ है। FY26 की तीसरी तिमाही में, देश की GDP 7.3% के अनुमान से कहीं ज्यादा 8.2% रही। महँगाई भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर है, और कॉर्पोरेट कमाई भी सुधर रही है।

भारतीय रुपए में गिरावट की तीन बड़ी वजह

ऐसे समय में जब देश US राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ धमकियों के डर से अपनी सॉवरेनिटी और आत्मसम्मान का सौदा कर रहे हैं, भारत अकेला ऐसा देश है जो प्रेशर पॉलिटिक्स के आगे नहीं झुका है और किसी भी एकतरफा सौदे के लिए सहमत नहीं हुआ। आर्थिक और जियोपॉलिटिकल दबाव का सामना करने की एक कीमत चुकानी पड़ती है। ट्रंप ने बेतुके दावे किए कि भारत किसी तरह रूसी वॉर मशीन को ‘फंडिंग’ कर रहा है और न जाने क्या-क्या, ताकि 50% टैरिफ लगाया जा सके।

ट्रंप ने भारत की इकॉनमी को ‘डेड इकॉनमी’ कहा, जबकि इंडियन इकॉनमी मज़बूत, स्थिर और बढ़ रही है, लेकिन सब कुछ ठीक नहीं हो सकता। टैरिफ बढ़ाने की घोषणा के बाद से, भारतीय रुपया USD के मुकाबले 5.5% कम हो गया है।

डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में तेजी से आई गिरावट तब और बढ़ गई जब इस साल की शुरुआत में US में ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन ने इंडियन एक्सपोर्ट पर 50% टैरिफ लगा दिए। इससे अलग-अलग सेक्टर में सालाना लगभग $45 बिलियन के एक्सपोर्ट पर सीधा असर पड़ा।

US दुनिया के सबसे बड़े एक्सपोर्ट मार्केट में से एक है। इसमें भारी कमी की वजह से भारत का एक्सपोर्ट तेजी से गिरा। अक्टूबर 2025 में मर्चेंडाइज़ एक्सपोर्ट साल-दर-साल 11.8% गिरकर $34.4 बिलियन के ग्यारह महीने के सबसे निचले स्तर पर आ गया। इसकी वजह US के बढ़े हुए टैरिफ और खराब बेस थे। यह याद रखना चाहिए कि अक्टूबर 2024 में, एक्सपोर्ट में 16.6% की मजबूत बढ़ोतरी हुई थी।

गौरतलब है कि US एक्सपोर्ट में गिरावट को कम करने के लिए, भारत नए मार्केट की तलाश कर रहा है। जुलाई 2025 में इंडिया-UK FTA इस दिशा में काफी अहम है, जो टैक्स में कटौती और एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन और एक्सपोर्टर्स के लिए क्रेडिट गारंटी जैसे सरकारी सपोर्ट उपायों को लागू करके घरेलू डिमांड को बढ़ा रहा है।

ग्लोबल क्रूड की कीमतों में गिरावट के कारण तेल की कीमतों में 10.5% की गिरावट आई, जो नौ महीने के सबसे निचले स्तर $3.9 बिलियन पर आ गई। नॉन-ऑयल एक्सपोर्ट में भी यही हाल रहा है, जो 12% घटकर $30.4 बिलियन रह गया, जो ग्यारह महीने का सबसे निचला स्तर है। इलेक्ट्रॉनिक सामान, जिसमें इंजीनियरिंग सामान, जेम्स एंड ज्वेलरी, केमिकल्स और रेडीमेड गारमेंट्स शामिल हैं, को छोड़कर लगभग हर एक्सपोर्ट कैटेगरी में साल-दर-साल गिरावट देखी गई।

एक तरफ एक्सपोर्ट कम हुआ, वहीं दूसरी ओर मर्चेंडाइज और सोने जैसे कुछ सेगमेंट में आयात बढ़ा है। संक्षेप में, एक्सटर्नल सेक्टर पर दबाव बढ़ रहा है। टैरिफ, बड़े मार्केट से डिमांड में कमी, और इंपोर्टेड सामान की लगातार डिमांड ने एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस के लिए चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। यह कुछ ऐसा है जिस पर स्टेकहोल्डर्स और सरकार को ध्यान देना चाहिए, क्योंकि आने वाले समय में ट्रेड डेफिसिट की और बढ़ने से INR डेप्रिसिएशन बढ़ सकता है और बैलेंस ऑफ पेमेंट्स में दिक्कत हो सकती है।

(साभार-रॉयटर्स)

इसके अलावा, फॉरेन पोर्टफोलियो आउटफ्लो ने इस साल अब तक इंडियन इक्विटीज से 16.78 बिलियन रुपये निकाले हैं। इसका मुख्य कारण US और इंडिया के बीच इंटरेस्ट-रेट का अंतर है, जो 2.5% से कम हो गया है। इससे डॉलर की डिमांड तेजी से बढ़ी है। SBI के एनालिसिस के मुताबिक, जुलाई और अक्टूबर के बीच, एक रेयर इम्बैलेंस दर्ज किया गया जब स्पॉट और फॉरवर्ड मर्चेंट मार्केट में कुल एक्स्ट्रा डिमांड $102.5 बिलियन तक पहुँच गई।

INR की कीमत कम होने में NDF की भूमिका के बारे में बात करते हुए, मेकलाई फाइनेंशियल सर्विसेज़ के डिप्टी चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर रितेश भंसाली ने कहा, “NDF मार्केट में, हमने रुपये की बहुत शॉर्टिंग देखी है, जिससे रुपये पर दबाव बन रहा है। अगर आप स्पेक्युलेटिव एक्टिविटीज को शामिल न भी करें, तो डिमांड-सप्लाई के आधार पर, डॉलर की डिमांड सप्लाई के मुकाबले ज्यादा है।”

उन्होंने आगे कहा कि रुपये की कीमत कम होने की वजह से इंपोर्टर्स अपने इंपोर्ट पेमेंट पहले ही कर रहे हैं, जबकि एक्सपोर्टर्स सख्ती से हेजिंग नहीं कर रहे हैं। रेड्डी ने कहा, “घरेलू फंडामेंटल्स अपनी मुश्किलें खुद खड़ी कर रहे हैं, बढ़ता करंट अकाउंट डेफिसिट और बैलेंस ऑफ पेमेंट्स (BoP) की नरम स्थिति करेंसी के लिए खराब डिमांड-सप्लाई डायनामिक में योगदान दे रही है।”

X पर बात करते हुए, पुराने बैंकर उदय कोटक ने बताया कि डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में चल रही गिरावट सीधे विदेशी निवेशकों के व्यवहार से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि INR में गिरावट की वजह विदेशी निवेशकों का पोर्टफोलियो फ्लो और FDI के तहत प्राइवेट इक्विटी से बाहर निकलना है।

कोटक ने लिखा, “₹@90. इसका सबसे बड़ा कारण: FDI के तहत FPI और PE दोनों तरह के भारतीय स्टॉक्स की विदेशी बिक्री। भारतीय निवेशक खरीद रहे हैं। समय बताएगा कि कौन ज़्यादा स्मार्ट है। अभी के लिए, विदेशी ज़्यादा स्मार्ट लग रहे हैं। 1 साल का निफ्टी $ रिटर्न 0 है। लेकिन यह एक लंबा खेल है। भारतीय बिज़नेस के लिए कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलने का समय आ गया है।”

खास तौर पर, फॉरेन पोर्टफोलियो इनफ्लो (FPI) में भारी गिरावट आई है और बाहरी उधार भी कम हुए हैं, जो मुश्किल ग्लोबल फिस्कल हालात का संकेत है। इस साल जनवरी से, FPI ने घरेलू इक्विटी से 1.48 लाख करोड़ रुपये निकाले हैं। यह बड़ी गिरावट तब आई जब भारत का मैक्रोइकोनॉमिक बैकग्राउंड काफी हद तक स्थिर है।

इस बीच, करूर वैश्य बैंक के ट्रेजरी डिप्टी जनरल मैनेजर राम चंद्र रेड्डी का मानना ​​है कि ग्लोबल कैरी-ट्रेड कैपिटल के पारंपरिक सप्लायर, US और जापान, ‘बढ़ी हुई ब्याज दरों से जूझ रहे हैं, उभरते बाजारों में कम लागत वाली कैपिटल का फ्लो काफी कम हो गया है।’

रेड्डी का कहना है कि इस माहौल ने न केवल भारत में नए कैरी-ट्रेड इनफ्लो को सीमित किया है, बल्कि मौजूदा पोजीशन को खत्म करने का जोखिम भी बढ़ा दिया है, जिससे भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ रहा है।

खास तौर पर, इस साल अक्टूबर में, भारत ने $41.68 बिलियन का अपना अब तक का सबसे बड़ा मंथली ट्रेड डेफिसिट दर्ज किया। यह इंपोर्ट में 16.6% की बढ़ोतरी, खासकर क्रूड ऑयल (85% इंपोर्टेड), कमोडिटीज़, और त्योहारों के मौसम में सोने की खरीद में बढ़ोतरी की वजह से हुआ। करेंट अकाउंट डेफिसिट बढ़कर $12.3 बिलियन, या GDP का 1.3% हो गया, जिसकी वजह ट्रेड डेफिसिट का बढ़ना था, जो GDP का 9% तक बढ़ गया। इसकी कई वजहें थीं, जिसमें ग्लोबल कीमतों के बीच सोने के इंपोर्ट में बढ़ोतरी भी शामिल थी। इन वजहों से इंपोर्टर्स की तरफ से लगातार डॉलर की डिमांड बनी रही।

हालाँकि डॉलर इंडेक्स खुद इस साल अब तक 8.5% गिरा है और 3 दिसंबर को 99.22 पर बंद हुआ, लेकिन भारतीय रुपया ज्यादातर एशियाई देशों की तुलना में ज्यादा कमजोर हुआ। इसकी वजह भारत के लिए खास बाहरी झटके और RBI का जानबूझकर किसी खास डेप्रिसिएशन लेवल का सख्ती से बचाव करने के बजाय उतार-चढ़ाव को मैनेज करने की तरफ झुकाव है। RBI ने 2025 में सिर्फ़ लगभग $30 बिलियन बेचे हैं, जबकि अपने फ़ॉरेक्स रिज़र्व को आराम से लगभग $690 बिलियन पर रखा है। एक कमजोर और गिरती हुई अर्थव्यवस्था ऐसा नहीं कर सकती।

जिस इंडिया-US ट्रेड डील या द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) अब तक नहीं हुई है। इसका भी असर पड़ा है। पिछले कई महीनों से इंडिया और US इस डील को आगे बढ़ाने के लिए बातचीत कर रहे हैं, लेकिन, एग्रीकल्चर और डेयरी मार्केट खोलने की माँग अमेरिका कर रहा है, भारत इसके लिए तैयार नहीं है। एकतरफा ट्रेड डील पर साइन करने के लिए भारत पर दबाव डालने की ट्रंप की जिद की वजह से समझौते में देरी हो रही है। यह कन्फ्यूजन इन्वेस्टर्स का भरोसा कम कर रहा है। हालाँकि, हाल ही में भारत और अमेरिका की तरफ से जो बयान सामने आए हैं, उससे पता चलता है कि दोनों देश इंडिया-US ट्रेड डील करने के करीब हैं। अगर ये डील हो जाता है तो भारत पर अमेरिकी टैरिफ कम हो जाएगा और व्यापार संबंधों को मजबूती मिलेगी। इससे इंडियन रुपया बाजार में स्थिर होगा।

क्या सिर्फ मजबूत करेंसी ही मजबूत इकॉनमी का सबूत है? अगर ऐसा होता, तो अफ़गानिस्तान एक इकॉनमिक पावरहाउस होता।
जबकि भारत अपने सामने आने वाली मुश्किलों से निपट रहा है, वहीं आम लोग मोदी सरकार पर “अफ़गानिस्तान की करेंसी भी हमारी करेंसी से ज़्यादा मज़बूत है” जैसी बेतुकी बातें कहकर हमला कर रहे हैं। हालाँकि, ये बचकानी बातें हैं जो इकॉनमिक्स कैसे काम करती है, इसकी पूरी तरह से समझ की कमी या जानबूझकर की गई नासमझी से पैदा हुई हैं।

तालिबान के राज वाले अफगानिस्तान की करेंसी, ‘अफगानी’, दुनिया की सबसे मज़बूत और सबसे स्टेबल करेंसी में से एक है। ऐसा इसलिए नहीं है कि देश आर्थिक रूप से मजबूत हुआ है, बल्कि इसलिए है कि तालिबान ने US डॉलर और पाकिस्तानी रुपये के इस्तेमाल पर रोक लगा रखी है। इससे विदेशी करेंसी की माँग खत्म हो गई है। अफगानिस्तान में ज्यादातर लेन-देन अफगानी करेंसी में होती है।

लिमिटेड एक्सपोर्ट, थोड़ा विदेशी इन्वेस्टमेंट, और न के बराबर इंटरनेशनल ट्रेड, हालांकि तालिबान इस मामले में थोड़ा खुल रहा है, ये मुख्य वजहें हैं जिनकी वजह से अफ़गानिस्तान की करेंसी बनावटी तौर पर स्टेबल बनी हुई है। हालांकि, यह ‘स्टेबिलिटी’ ज़रूरी तौर पर इकोनॉमिक स्टेबिलिटी में नहीं बदलती। अफ़गानिस्तान की इकोनॉमी के उलट, इंडियन इकोनॉमी न तो छोटी है और न ही अलग-थलग है।

अफगानिस्तान में इंडस्ट्रियल एक्टिविटी और इन्वेस्टमेंट बहुत कम है। इसके विपरीत इंडिया एक बड़ी इकोनॉमिक ताकत है और इंडस्ट्रियल एक्टिविटी और इन्वेस्टमेंट का हब है। अफगानिस्तान की करेंसी जापान से ज्यादा मजबूत है। हालाँकि इकोनॉमिक ग्रोथ, स्टेबिलिटी, इन्वेस्टमेंट और ग्लोबल मार्केट शेयर के मामले में अफगानिस्तान जापान के आस-पास भी नहीं है।

हालांकि डेप्रिसिएशन चिंता की बात है, लेकिन इंडियन करेंसी वोलाटाइल नहीं है; बल्कि, इस समय, यह ग्लोबल मुश्किलों के खिलाफ एक शॉक एब्जॉर्बर की तरह काम कर रही है। HSBC समेत कई एक्सपर्ट्स का मानना ​​है कि ‘इंडियन रुपया इकॉनमी के लिए एक शॉक एब्जॉर्बर है, और एक्सटर्नल फाइनेंस के लिए एक ऑटोमैटिक स्टेबलाइजर है।’ डॉलर के मुकाबले रुपए का डेप्रिसिएशन जरूरी नहीं कि पॉलिसी फेलियर का नतीजा हो और इसका मतलब पूरी तरह से इकॉनमिक वीकनेस नहीं है।

(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

तमिलनाडु में कार्तिगई दीपम विवाद में समझिए DMK सरकार की हिंदू विरोधी मानसिकता, क्यों HC के आदेश के बाद भी नहीं मनाने दिया उत्सव: जानें- पूरा विवाद

तमिलनाडु के प्राचीन थिरुप्परनकुंद्रम मंदिर में कार्तिगई दीपम उत्सव के दौरान एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने 1 दिसंबर 2025 को स्पष्ट आदेश दिया था कि थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी के शिखर पर स्थित प्राचीन ‘दीपाथून’ स्तंभ पर पवित्र दीप जलाया जाए। लेकिन डीएमके सरकार ने इस आदेश की खुलेआम अवहेलना की।

बुधवार (3 दिसंबर 2025) की शाम 6 बजे दीप जलाने का समय था, लेकिन मंदिर प्रशासन ने पारंपरिक तरीके से उचीपिल्लैयार मंदिर के पास ही दीप जला दिया, जो पहाड़ी के नीचे है। इससे नाराज हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच झड़पें हो गईं। कोर्ट ने सरकार को ‘जानबूझकर अवज्ञा’ का दोषी ठहराया और कहा कि यह लोकतंत्र के लिए खतरा है।

यह घटना सिर्फ एक धार्मिक रस्म का मामला नहीं है। यह तमिलनाडु की सांस्कृतिक विरासत, अदालती आदेशों की मर्यादा और राजनीतिक साजिशों का मिश्रण है। डीएमके सरकार पर हिंदू विरोधी होने का पुराना आरोप लगता रहा है। विपक्षी भाजपा और हिंदू संगठन इसे सनातन धर्म के खिलाफ साजिश बता रहे हैं।

याचिकाकर्ता राम रविकुमार ने कोर्ट में कहा कि मंदिर प्रशासन ने दीपाथून पर कोई इंतजाम नहीं किया। जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन ने 1 दिसंबर 2025 को आदेश दिया कि दीप जलाया जाए, क्योंकि यह मंदिर की संपत्ति है। उन्होंने साल 1923 के एक कोर्ट डिक्री का हवाला दिया, जिसपर प्रिवी काउंसिल ने भी मुहर लगाई थी।

हाई कोर्ट के आदेश के बाद बुधवार (03 दिसंबर 2025) की शाम को जब हिंदू कार्तिगई दीपम के लिए पहाड़ी पर चढ़ने लगे, तो उन्हें रोक लिया गया। हाई कोर्ट के आदेश की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई। सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (सीआईएसएफ) को सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था, लेकिन स्थानीय प्रशासन ने धारा 144 लगा दी। हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने बैरिकेड तोड़े, पत्थर फेंके और नारेबाजी की।

एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, दर्जनों लोग घायल हुए। कोर्ट ने इसे ‘अवमानना’ करार दिया और कहा, “यह आदेश की खुली अवहेलना है। लोकतंत्र का अंत हो जाएगा अगर अधिकारी कानून से ऊपर समझें।” जस्टिस स्वामीनाथन ने याचिकाकर्ता को 10 लोगों के साथ प्रतीकात्मक रूप से दीप जलाने की इजाजत दी और सीआईएसएफ को सुरक्षा का आदेश दिया। लेकिन अपील के बाद पुलिस ने सबको रोक लिया। हालाँकि अब गुरुवार (04 दिसंबर 2025) को कोर्ट ने इस मामले में अवमानना की कार्रवाई शुरू कर दी है।

सरकार के सूत्रों ने सफाई दी कि वे हिंदुओं के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि शांति बनाए रखना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि कोई सच्चा भक्त कोर्ट नहीं गया और 100 साल पुरानी परंपरा का पालन हो रहा है। लेकिन भाजपा नेता के.अन्नामलई ने कहा, “डीएमके का सनातन धर्म से दुश्मनी अब छिपी नहीं। हिंदू धार्मिक निधि विभाग खुद भक्तों के खिलाफ अपील कर रहा है।”

कार्तिगई दीपम को लेकर विवाद क्या? क्यों DMK सरकार कर रही हिंदुओं का दमन

कार्तिगई दीपम तमिलनाडु का एक प्रमुख हिंदू त्योहार है, जो कार्तिगई मास की पहली पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह प्रकाश के विजय का प्रतीक है। थिरुप्परनकुंद्रम सुब्रमण्या स्वामी मंदिर भगवान मुरुगन के छह प्रमुख निवास स्थान में से पहला है, इस उत्सव का केंद्र रहा है।

थिरुप्परनकुंद्रम सुब्रमण्या स्वामी मंदिर छठी शताब्दी में पांड्य राजाओं द्वारा बनाया गया था और पहाड़ी को काटकर तराशा गया है। मंदिर के पुजारी रोजाना तीन बार पूजा करते हैं, जिसमें अभिषेक, अलंकरण, नैवेद्य और दीप आराधना शामिल है। ये प्रक्रिया अब भी जारी है।

लेकिन बीते कुछ समय से इस्लामी कट्टरपंथी इस पहाड़ी पर कब्जे और इसके नाम बदलने की कोशिश में हैं। कुछ समय पहले मुस्लिम प्रदर्शनकारियों ने पहाड़ी पर नमाज की माँग की, लेकिन पुलिस ने रोक दिया।

प्रिवी काउंसिल का फैसला और ‘सिकंदर हिल्स’ का दावा

थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी का इतिहास संगम युग तक जाता है। संत नक्कीरार ने भगवान मुरुगन के 6 पवित्र निवासों में इसे पहला बताया है। यह तेवर स्थलम भी है, जहाँ शिव और मुरुगन की पूजा होती है। पहाड़ी 500 फुट ऊँची है और मंदिर चट्टान को काटकर बनाया गया। भक्त घिरी वीधी (परिक्रमा पथ) पर चक्कर लगाते हैं, जो मंदिर की संपत्ति है।

विवाद की जड़ 19वीं-20वीं शताब्दी के मुस्लिम दावों में है। कुछ लोग इसे ‘सिकंदर हिल्स’ कहते हैं, लेकिन 1931 में प्रिवी काउंसिल ने साफ किया कि यह मंदिर की संपत्ति है। पाँच सदस्यीय पैनल ने कहा, “पहाड़ी का खाली हिस्सा समय से परे मंदिर के कब्जे में है।”

प्रिवी काउंसिल ने 1923 के अधीनस्थ जज के फैसले को बहाल किया, जिसमें मस्जिद स्थल को छोड़कर पूरी पहाड़ी मंदिर की बताई गई। प्रिवी काउंसिल ने ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला दिया, जिसमें 1144 का दस्तावेज ‘मलाईप्रकरम’ (पहाड़ी परिक्रमा) का जिक्र है।

फैसले में कहा गया कि मुगल आक्रमणकारियों ने राजस्व भूमि छीनी, लेकिन मंदिर या पहाड़ी कभी धर्मनिरपेक्ष हाथों में नहीं गई। कुछ मस्जिदें और घर बने, लेकिन वे हिंदुओं पर जबरन कब्जे का परिणाम था। इसके अलावा ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी मंदिर के अधिकार मान्य किए थे। फैसले में प्रिवी काउंसिल ने लिखा, “कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने पवित्र पहाड़ी में हस्तक्षेप किया।” यह फैसला 2025 में भी प्रासंगिक है, क्योंकि जस्टिस स्वामीनाथन ने इसे ही आधार बनाया।

जस्टिस स्वामीनाथन के फैसले को नहीं मान रही डीएमके सरकार

हालाँकि हिंदू-विरोधी मिजाज वाली सत्ताधारी द्रविड़ मुनेत्र कढ़गम (डीएमके) सरकार ने कानून-व्यवस्था के नाम पर 1 दिसंबर 0025 के कोर्ट के निर्देश को चुनौती दी है। मामला तब और बिगड़ा जब याचिकाकर्ता राम रविकुमार सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (सीआईएसएफ) के जवानो के साथ कोर्ट के फैसले पर पहाड़ी चढ़ने लगे।

लेकिन मदुरै के पुलिस कमिश्नर जे. लोगनाथन के नेतृत्व वाली राज्य पुलिस ने हस्तक्षेप किया और उन्हें रोक दिया। मदुरै जिला कलेक्टर ने रोकथाम वाले आदेश जारी किए थे, दावा किया कि जनता की सुरक्षा और मौजूदा कानून-व्यवस्था की स्थिति खतरे में है।

हिंदू मुननेत्र मंड्रम संगठन के सदस्यों और अन्य कार्यकर्ताओं ने मंदिर के सामने इकट्ठा होकर मांग की कि कोर्ट के निर्देशित स्थान पर दीप जलाया जाए। कुछ लोग पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़ने की कोशिश में लगे। इससे धक्का-मुक्की हुई और एक पुलिसकर्मी घायल हो गया। हिंदू मुननेत्र मंड्रम के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि मंदिर प्रशासन ने हाईकोर्ट के फैसले का पालन करने के लिए बिल्कुल कोई इंतजाम नहीं किया।

खास बात ये है कि मंदिर प्रबंधन ने पहले ही कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी, दावा किया कि इससे सांप्रदायिक सौहार्द खतरे में पड़ जाएगा। लेकिन जज स्वामीनाथन ने सख्त हिदायत दी थी कि शाम 6 बजे तक दीप जलाना है, वरना 6:05 बजे अवमानना की कार्रवाई शुरू हो जाएगी। इसके बावजूद डीएमके सरकार और प्रशासन ने कोर्ट की नहीं सुनी।

हिंदुओं को नीचा दिखाकर मुस्लिमों का पक्ष ले रही DMK सरकार

डीएमके सरकार का ये रवैया चिंताजनक तो है, लेकिन हैरान करने वाला नहीं, क्योंकि हिंदू-नफरत करने वाली द्रविड़ पार्टी का इतिहास यही है। राज्य सरकार और हिंदू धार्मिक तथा चैरिटेबल एंडोमेंट्स विभाग ने पहले ही फैसले के खिलाफ अपील कर दी है। ऊपर से डीएमके और उसके सहयोगी जिला प्रशासन से कह रहे हैं कि कोर्ट के आदेश का पालन न करें।

डीएमके कोर्ट के आदेश तोड़ने के लिए बिना झिझक तैयार है, सिर्फ हिंदू धर्म के प्रति अपनी घृणा दिखाने के लिए। न्यायपालिका ने तथ्यों और सबूतों के आधार पर हिंदुओं का साथ दिया है, लेकिन सरकार सांप्रदायिक सौहार्द का विकृत कथा चलाने पर तुली है। उनकी टेढ़ी नजर में सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता तभी बनी रहती है जब हिंदुओं के खर्च पर हो और उनके धार्मिक अधिकारों पर कब्जा हो।

वहीं, जब डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) (बैन हो चुके पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के राजनीतिक विंग) ने जब इस पवित्र स्थान पर जानवरों की कुर्बानी की कोशिश की, तो ये मूल्य कभी खतरे में नहीं पड़े। जब इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) के नेता और रामनाथपुरम सांसद के. नावास कानी (आईएमयूएल) ने एक अन्य विधायक और समर्थकों के साथ पवित्र पहाड़ी पर नॉन-वेज बिरयानी खाई, तो भी खतरा नहीं था। कानी ने यहाँ तक घोषणा कर दी कि जगह वक्फ बोर्ड की है।

दिल्ली के सुल्तानों के प्रतिनिधि के नाम पर इसे सिक्कंदर हिल्स नाम देने की कोशिशें भी चल रही थीं, जो मदुरै पर शासन करते थे, जिससे हिंदुओं ने विरोध किया। डीएमके ने इन उकसाने वाली हरकतों को सौहार्द और शांति के लिए खतरा नहीं माना, सिर्फ इसलिए क्योंकि हिंदू धर्म का एक बड़ा हिस्सा अपमानित हो रहा था, जिसे पार्टी चुपचाप समर्थन देती है। लेकिन जब हिंदू कानूनी तरीके से अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं, तो इनपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है।

इसी तरह, हाईकोर्ट द्वारा इसे हिंदू मंदिर घोषित करने के बाद भी मुस्लिमों का पहाड़ी पर अवैध कब्जा जारी है और डीएमके सरकार ने इन उल्लंघनों को बर्दाश्त किया है।

द्रविड़वाद के झंडाबरदार हमेशा थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी से जुड़े झूठे मुस्लिम दावों का साथ देते रहे हैं और असली हिंदू चिंताओं तथा वैध अधिकारों का विरोध करते रहे हैं। यहाँ तक कि अपने प्रभाव वाले मीडिया आउटलेट्स के जरिए मामले को राजनीतिक रंग भी देने की कोशिश करती है, ताकि मुस्लिम उसके पक्ष में लामबंद हो सकें।

ऐसे ही एक मामले में तमिलनाडु सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद हिंदुओं को अन्नदान करने से रोक दिया, जबकि कोर्ट ने सरकार को स्पष्ट तौर पर कहा था कि वो इस काम में अड़ंगा न लगाए। क्योंकि इसकी वजह ये थी कि डीएमके सरकार अपने ईसाई समर्थकों को खुश करने में जुटी रही। ये मामला कुछ ही समय पहले का है।

HC के आदेश का पालन न करने पर DMK पर क्यों उठाई जा रही उंगली?

आप सोच रहे होंगे कि ऐसा सिर्फ सरकार कर रही है, इसका सत्ताधारी डीएमके पार्टी से कोई लेना देना नहीं है। तो हम बता दें कि तमिलनाडु सरकार में हिंदू धार्मिक तथा चैरिटेबल एंडोमेंट्स विभाग नाम से अलग मंत्रालय है। ये मंत्रालय ही हिंदू मंदिरों से जुड़े तमाम फैसले करता है।

मौजूदा समय में थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित मुरुगन मंदिर में भी प्रशासकों की तैनाती है, जो तमिल नाडु की डीएमके सरकार की तरफ से की गई है। ऐसे में वो डीएमके के निर्देश पर ही हाई कोर्ट तक के फैसले को नहीं मान रहे। यहाँ तक कि हाई कोर्ट की कार्यवाही तक से गैर-हाजिर रहे। फिर यहाँ खुद मंदिर के प्रशासक को आगे बढ़कर हिंदुओं के हित में काम करना चाहिए था और हाई कोर्ट का आदेश भी था, लेकिन यहाँ सरकार द्वारा बिठाया मंदिर प्रशासक ही हिंदू विरोधी डीएमके सरकार के लक्ष्य को पूरा करने में जुटा रहा।

इतना ही नहीं, एक तरफ तो वो खुलकर हिंदू विरोध करती है, तो दूसरी तरह हिंदू मंदिरों के पैसों को डकार भी जाती है। इन सब बातों को जानते हुए भी डीएमके को कब तक नजरअंजाद किया जाए? जब उसका अतीत ही हिंदू और सनातन विरोध से भरा पड़ा है।

सनातन का बार-बार अपमान करती रही है डीएमके

बीते कुछ समय के घटनाक्रम को देखें तो डीएमके सांप्रदायिक सौहार्द या कानून-व्यवस्था के पीछे छिप जाती है, लेकिन हिंदू धर्म और उसके अनुयायियों के प्रति अपनी नफरत जाहिर करने से कभी नहीं हिचकिचाई। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के उपमुख्यमंत्री बेटे और ‘गर्वित ईसाई’ उदयनिधि स्टालिन ने 2023 में सनातन धर्म के विनाश की खुली अपील की।

डीएमके सांसद ए राजा ने तो और आगे बढ़कर कहा कि उदयनिधि की अपमानजनक टिप्पणियाँ तो काफी हल्की थीं। सनातन धर्म की तुलना तो एचआईवी और कुष्ठ रोग से तुलना करनी चाहिए। यही नहीं, हिंदू धर्म को जंजीर कहने वाले कमल हासन को डीएमके ने बाकायदा राज्यसभा भी भेजा है। वहीं, डीएमके सरकार के मंत्री ने तो हिंदू धर्म को लेकर सेक्स पोजिशन तक की घटिया टिप्पणी की थी।

डीएमके ने न सिर्फ हिंदू धर्म को निशाना बनाया है, बल्कि ऐसे कदम भी उठाए हैं जो धर्म का अपमान करते हैं। तमिलनाडु सरकार ने जुलाई में चेन्नई के किलपुक में वाडेल्स रोड का नाम बदलकर आर्चबिशप एज्रा सरगुनम रोड रख दिया, जो मृत एंटी-हिंदू ईसाई प्रचारक और बिशप एज्रा सरगुनम को सम्मान देने के लिए था। उसने हिंदुओं को मारने का सार्वजनिक आदेश भी दिया था। यही नहीं, डीएमके सरकार में तो दुर्दांत आतंकियों की भव्य आखिरी यात्रा भी निकलती है, जो कोर्ट से सजा पाए हो।

हिंदुओं से नफरत करने वालों की डीएमके में होती है पूछ

हिंदू धर्म से नफरत करने वाले लोग डीएमके में जगह पाते हैं, क्योंकि पूरी पार्टी अपनी खतरनाक धर्मनिरपेक्षता के बहाने हिंदू-विरोध को मूर्त रूप देती है। वे (डीएमके के लोग) सनातन के कट्टर आलोचक ईवी पेरियार की पूजा करते हैं और अब्राहमिक मजहबों खासकर इस्लाम और ईसाई धर्म को आदर देते हैं।

थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर बार-बार होने वाले टकराव इसी का हिस्सा हैं। डीएमके सरकार हिंदुओं के अधिकारों पर कुचलने के लिए तुली है, भले ही इसके लिए कोर्ट के आदेश तोड़ने पड़ें या उन्हें चुनौती देनी पड़े। इसके अलावा डीएमके या ‘धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ’ कभी मुस्लिमों या अन्य मजहबों के अनुयायियों के साथ ऐसा हौसला नहीं दिखातीं, जो उनकी असली मंशा और मकसद बयान करता है।

मोबाइल चोरी, फर्जी सिम और IMEI ब्लॉकिंग में क्यों गेम-चेंजर बना संचार साथी? स्टेप-टू-स्टेप गाइड से जानें- कैसे इस्तेमाल करें Sanchar Sathi App

संचार साथी (Sanchar Saathi) एक सरकारी मोबाइल ऐप और पोर्टल है जिसे दूरसंचार विभाग (DoT) ने मोबाइल-सुरक्षा और साइबर-धोखाधड़ी से बचाने के लिए जारी किया है। 17 जनवरी 2025 के बाद से इस ऐप के 1.4 करोड़ से अधिक लोगों ने डाउनलोड किया हैं।

इसने 42 लाख से अधिक चोरी/खोए हुए मोबाइल डिवाइस ब्लॉक किए, 26 लाख से अधिक फोन ट्रेस किए और 7.23 लाख फोन मालिकों को वापस दिलाने में मदद की। ऐप पूरी तरह स्वयंसेवी (voluntary) और गोपनीयता पहचान पहला है।

सिर्फ यूजर की सहमति पर ही सक्रिय होता है। हालाँकि सरकार ने एक समय प्री-इंस्टॉल के निर्देश दिए थे, उन पर बहस हुई और बाद में स्थिति में बदलाव आया अब ऐप अनिवार्य नहीं है और यूजर इसे अपने अनुसार इंस्टॉल/रिमूव कर सकते हैं।

संचार साथी क्या है और क्यों जरूरी है?

अगर इसे सीधे तौर पर आसान भाषा में कहे तो, यह आपका डिजिटल सुरक्षा साथी है। मोबाइल आज बैंकिंग, पढ़ाई, स्वास्थ्य और सरकारी सेवाओं के लिये बहुत जरूरी हो गया है। वही, फोन खोना, क्लोन-डिवाइस, बैंकिंग-स्कैम और फर्जी सिम जैसी घटनाएँ बढ़ रही हैं।

संचार साथी की मदद से चोरी हुए फोन का IMEI ब्लॉक कर देता है (CEIR के जरिये) ताकि फोन किसी नेटवर्क पर काम न कर सके। नकली/क्लोन डिवाइस की पहचान (Know Your Mobile – KYM) करवाता है।

संदिग्ध कॉल/मैसेज रिपोर्ट करने की सुविधा देता है (Chakshu)। अपने नाम पर एक्टिव नंबर चेक करने देता है ताकि फ्रॉड सिम को पकड़ा जा सके। वित्तीय धोखाधड़ी के जोखिम संकेतक (FRI) शेयर कर बैंक/UPI-सेवाओं को मदद करता है।

होम-स्क्रीन – पहला विकल्प: KYM, Block Lost/Stolen, Report Fraud, Check Connections आदि।

रजिस्ट्रेशन / OTP- मोबाइल नंबर डालें, डुप्लीकेट सिम पर आए OTP से वेरीफाई करें।

ब्लॉक-फॉर्म (CEIR)- IMEI, FIR, खरीद रसीद आदि अपलोड करने का फॉर्म।

Request Status / Unblock- Request ID से स्टेटस देखें, फोन मिलने पर अनब्लॉक कराएँ।

अगर आपका फोन खो जाए या चोरी हो जाए तो

Sanchar Saathi /CEIR पर ये प्रक्रिया करनी पड़ती है

1) FIR दर्ज कराएँ

फोन खोने या चोरी होने जैसी इसथिति में सबसे पहले नजदीकी पुलिस स्टेशन जाकर चोरी/खोने की रिपोर्ट (FIR/Complaint) दर्ज कराएँ या राज्य पुलिस की वेबसाइट पर ऑनलाइन शिकायत करें। जिसके बाद FIR नंबर और उसकी डिजिटल कॉपी अपने पास रखें, जिसका इस्तेमाल बाद में ऑनलाइन फॉर्म में किया जाएगा।

2) डुप्लीकेट सिम लें

अपने मोबाइल नंबर का डुप्लीकेट सिम अपने ऑपरेटर से लें। यह इसलिए जरूरी है क्योंकि CEIR में ब्लॉक/अनुरोध के समय OTP उसी नंबर पर जाएगा और इस बात का ध्यान रखे की कई ऑपरेटरों में डुप्लीकेट सिम मिलने के बाद SMS सेवाएँ 24 घंटे बाद शुरु हो सकती हैं।  

3) संचार साथी ऐप/वेब खोलें और रजिस्टर करें

सबसे पहले ऐप Play Store या App Store से डाउनलोड करें या अगर फोन में पहले से है तो उसे खोलें। उसके बाद मोबाइल नंबर डालें जिसके बाद OTP आएगा फिर OTP लिख करके लॉगिन कर लें। रजिस्ट्रेशन के बाद Citizen-centric services में CEIR/Block Lost/Stolen ऑप्शन को चुनें।

4) Block Lost/Stolen Mobile

अगली प्रक्रिया में फॉर्म में माँगे गए फील्ड में सबसे पहले मोबाइल नंबर लिखे फिर 15-अंकीय IMEI नंबर (एक या कई), ब्रांड/मॉडल, खोने/चोरी का डेट व स्थान, राज्य/जिला/पुलिस स्टेशन, FIR नंबर लिखे।

FIR की कॉपी, खरीद रसीद/इन्वाइस, पहचान-पत्र (Aadhaar/Driving Licence) की स्कैन कॉपी या फोटो अपलोड करें। आपके डुप्लीकेट सिम पर आए OTP से वेरिफिकेशन करें और फॉर्म सबमिट कर दें। फिर सबमिट होने पर सिस्टम एक Request ID देगा इसको अपने पास सेव रखें।

5) क्या होता है सबमिट करने के बाद?

आपका IMEI national blacklist (CEIR) में जुड़ जाता है, मतलब वह डिवाइस किसी भी भारतीय नेटवर्क पर काम नहीं करेगा। सिस्टम जब भी वह IMEI किसी नेटवर्क से जुड़ने की कोशिश करेगा, संबंधित लोकेशन-मेटाडाटा व रिपोर्ट पुलिस को भेजता है।

यूजर को लाइव लोकेशन नहीं मिलता, घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस जाँच करेगी। आप CEIR में जाकर Request Status में Request ID डालकर अपडेट देख सकते हैं।

6) फोन मिलने पर Unblock कैसे कराएँ

अगर फोन मिल जाए तो संचार साथी ऐप  के ‘Unblock Found Mobile’ के ऑप्शन में जाएँ। रिक्वेस्ट आईडी डालें, कारण बताकर और OTP वेरिफाइ कराकर अनब्लॉक रिक्वेस्ट भेजें। मंजूरी पर IMEI हटाकर फोन फिर से नेटवर्क पर काम करने लगेगा।

ऐप क्या-क्या माँगता है (Documents / Inputs)

  • FIR/Complaint नंबर और उसकी डिजिटल कॉपी।
  • डुप्लीकेट सिम का नंबर (OTP इसी पर आता है)।
  • पहचान-प्रमाण (Aadhaar/Driving Licence/Passport)।
  • डिवाइस की खरीद रसीद/invoice (IMEI अक्सर बॉक्स/रसीद पर लिखी होती है)।
  • IMEI नंबर (Settings → About phone या बॉक्स पर देखें) – 15 अंकों का ध्यान रखें।

संचार साथी सरकार द्वारा उपलब्ध कराया गया एक सरल और उपयोगी सुरक्षा प्लेटफ़ॉर्म है, जिसका उद्देश्य नागरिकों के मोबाइल सुरक्षा, नकली डिवाइस की पहचान, धोखाधड़ी की रोकथाम और चोरी या गुम हुए फोन की रिकवरी में मदद देना है।

यह ऐप और पोर्टल नागरिकों और कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के बीच एक सुरक्षित पुल की तरह काम करता है। अगर आपका फोन खो जाता है या चोरी हो जाता है, तो सबसे पहले अपने पास के थाने में FIR दर्ज कराएँ, फिर अपने मोबाइल नंबर का डुप्लिकेट सिम जारी करवाएँ।

इसके बाद संचार साथी/CEIR के माध्यम से फोन का IMEI ब्लॉक कर दें ताकि डिवाइस किसी भी नेटवर्क पर इस्तेमाल न हो सके। IMEI ब्लॉक करते समय मिला Request ID सुरक्षित रखें, क्योंकि यही बाद में अनब्लॉकिंग और पुलिस ट्रैकिंग के दौरान काम आती है। ऐप का KYM फीचर सेकेंड-हैंड मोबाइल खरीदते समय नकली या क्लोन डिवाइस से बचने में मदद करता है।

संचार साथी का ही हिस्सा FRI है, जो डिजिटल भुगतान प्रणाली को सुरक्षित रखने के लिए बनाया गया एक महत्वपूर्ण सुरक्षा तंत्र है। यदि किसी मोबाइल नंबर का उपयोग साइबर ठगी, फिशिंग, UPI फ्रॉड या अन्य वित्तीय अनियमितताओं में पाया जाता है, तो उस नंबर को हाई-रिस्क के रूप में टैग किया जा सकता है।

यह जानकारी बैंक, UPI, भुगतान ऐप्स तक पहुँचती है, जिससे वे उस नंबर पर होने वाले लेन-देन को रोक सके या ध्यान से कर सके। इससे संदिग्ध गतिविधियों को शुरुआती चरण में ही रोका जा सकता है और उपयोगकर्ताओं के बैंक खाते तथा डिजिटल पेमेंट डेटा सुरक्षित रहते हैं।

पुतिन के दौरे से सेना को मिलेगी डबल ताकत: S-500 से लेकर Su-57 और एडवांस ब्रहोस पर होगी बातचीत, जानें ‘RELOS’ समझौता कैसे उड़ा देगा पाकिस्तान की नींद

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की 30 घंटे की सरकारी यात्रा दोनों देशों के लिए अहम हैं, साथ ही इस पर पूरी दुनिया टकटकी लगाई हुई है। रूस की संसद डूमा ने पहले ही ‘RELOS’ का तोहफा भारत को दे दिया है। Reciprocal Exchange of Logistics Support के तहत दोनों देशों की सेनाएँ एक-दूसरे के मिलिट्री बेस, फैसिलिटीज और संसाधनों का इस्तेमाल और एक्सचेंज कर सकेंगी।

दोनों देशों के बीच SU 57 पर समझौता होगा और ऑपरेशन सिंदूर के वक्त कमाल दिखाने वाला एयर डिफेंस सिस्टम S-400 को लेकर भी डील होने वाली है। S-500 दरअसल S-400 का एडवांस वर्जन है, जिसने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान सीमा के अंदर एक परिंदा को भी पर नहीं मारने दिया था।

इसके अलावा भारत रूस शिखर सम्मेलन में दोनों देश इकोनॉमिक पार्टनरशिप बढ़ाने पर जोर देंगे। इसके तहत 10 इंटर-गवर्नमेंटल एग्रीमेंट और 15 कमर्शियल डील पर साइन होने वाला है। व्यापार बढ़ाने और निवेश के लिए जिन सेक्टर पर फोकस किया गया है, उनमें फार्मा, एग्रीकल्चर, एग्रो-प्रोडक्ट्स, फर्टिलाइजर, इंजीनियरिंग गुड्स और IT शामिल हैं।

सहयोग के पारंपरिक सेक्टर में से सिविल न्यूक्लियर एनर्जी और स्पेस के क्षेत्र में नए समझौते होंगे। रूस भारत में छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर को सपोर्ट कर सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरुवार 4 सितंबर को राष्ट्रपति पुतिन के साथ वन-ऑन-वन ​​डिनर लोक कल्याण मार्ग स्थित प्रधानमंत्री आवास पर किया है। इस दौरान रक्षा संबंधों, यूरेशियन स्थिरता, यूक्रेन और फाइनेंशियल सहयोग जैसे द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है। पीएम मोदी के पिछले साल किए गए मॉस्को दौरे के दौरान राष्ट्रपति पुतिन ने भी समिट से पहले एक प्राइवेट डिनर होस्ट किया था।

पुतिन के साथ सात मंत्री और एक बड़ा बिज़नेस डेलीगेशन पहले ही भारत पहुँच चुका है, जिसमें रूस के डिफेंस मिनिस्टर, फाइनेंस मिनिस्टर और सेंट्रल बैंक के गवर्नर शामिल हैं।

भारत के अपने सरकारी दौरे से पहले, पुतिन ने कहा है कि वह रूसी बाज़ारों में भारतीय इंपोर्ट बढ़ाने पर चर्चा करेंगे, और कहा कि मॉस्को भारत और चीन समेत अपने खास पार्टनर्स के साथ आर्थिक जुड़ाव को और गहरा करना चाहता है।

मंगलवार (3 दिसंबर 2025) शाम को मॉस्को में VTB इन्वेस्टमेंट फोरम में बोलते हुए, पुतिन ने कहा, “मैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आने वाले दौरे के दौरान भारतीय इंपोर्ट पर चर्चा करेंगे”, उन्होंने कहा कि पिछले तीन सालों में भारत और चीन दोनों के साथ बाइलेटरल ट्रेड वॉल्यूम तेज़ी से बढ़ा है।

रक्षा क्षेत्र में बड़ा समझौता

यूक्रेन युद्ध के बाद पहली बार भारत आए पुतिन का राजकीय दौरा दोनों देशों के मजबूत रिश्ते का परिचायक है। इस और मजबूती देने के लिए कई अहम सौगात लेकर पुतिन आए हैं। रूस ने भारत को ‘नो-लिमिट्स’ स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप का ऑफर दिया है। ये समझौता रूस ने चीन के साथ भी किया है। रूस का कहना है कि भारत के साथ भी हमारे सहयोग की कोई लिमिट नहीं है। रूस भी उतनी ही दूर जाने को तैयार है, जितनी दूर भारत जाने को तैयार है।

ब्रह्मोस मिसाइल अपग्रेडेशन

रूस के साथ ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को अपग्रेड करने पर समझौता होगा। इस मिसाइल ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के छक्के छुड़ा दिए थे। एक- एक पाकिस्तानी टारगेट पर अचूक निशाना लगाया था। रूस के साथ ब्रह्मोस के हल्के और ज्यादा काम आने वाले मॉडल जैसे ब्रह्मोस एनजी को लेकर भी समझौता होगा। ये 400 किलोमीटर से दूर से भी टारगेट पर अटैक कर सकते हैं।

ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग का एक बहुत ही सफल प्रमाण है। भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना चाहता है इसलिए रक्षा सौदों में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर जोर देता है। इसलिए रूस से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर भी बातचीत होगी।

SU-57 स्टेल्थ फाइटर जेट डील

रूस ने भारत को SU-57 स्टेल्थ फाइटर जेट डील और S-500 ऑफर किया है। ये हथियार हवा जमीन और स्पेस में भी दुश्मन के हर चाल पर सटीक निशाना लगा सकता है। इस डील से भारत की वायुशक्ति और रक्षा कवच मजबूत होगी।

सुखोई Su-57 रूस का पाँचवाँ जेनरेशन का स्टेल्थ मल्टी रोल फाइटर है। रूस ने Su-57E की सप्लाई के साथ-साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करने और लाइसेंस निर्माण का प्रस्ताव रखा है। इसके निर्माण की शुरुआत रूस की फैक्ट्री में होगी, लेकरिन आगे चलकर HAL नासिक में इसका उत्पादन होगा।

Indian Defence News के मुताबिक, SU-57 में ट्विन सैटर्न AL-41F1 इंजन हैं। इसका रेंज, स्पीड और ताकत की कोई सानी नहीं है। ये भारत की हवा में ताकत को कई गुणा बढ़ा देगा।

स्टेल्थ डिजाइन, इंटरनल वेपन बे, आधुनिक रडार और एवियोनिक्स मिलकर फाइटर जेट को नई ऊँचाई देता है, जो मल्टी-रोल में माहिर है। यानी दुश्मन के सोचने से पहले , SU-57 हवा-जमीन और हर मुमकिन जगह से अटैक कर चुका होगा।

हाइपरसोनिक मिसाइल S-500 को लेकर समझौता

S-500 Prometheus का ऑफर भी रूस ने किया है। पुतिन के दौरे के दौरान ये भी भारत को मिलने वाला है। S-500 मिसाइल इंटरसेप्ट और एयर डिफेंस का ड्यूल कवच है। ये बैलिस्टिक मिसाइल, स्टेल्थ फ्लाइट, तेजी से उड़ रहे लक्ष्य चाहे वह स्पेस में हों या स्पेस के नजदीक हों और आक्रमण करने वाले हों, उन्हें S-500 की दीवार से होकर गुजरना होगा यानी ये एयर डिफेंस सिस्टम को आधुनिकतम बनाने वाला है।

सबसे बड़ी बात ये है कि रूस भारत की शर्तों को भी स्वीकार करता है। चाहे वह टेक्नोलॉजी ट्रांसफर हो या कोड शेयरिंग हो, साझा निर्माण हो या तकनीक के क्षेत्र में रिसर्च की बात हो। यानी भारत की ‘मेक इन इंडिया’ के साथ-साथ ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में एक अहम कदम होगा। S-400 का एडवांस वर्जन है S-500। S-400 ने ही ऑपरेशन सिंदूर के वक्त भारत के लिए ‘रक्षा कवच’ साबित हुआ।

2030 इकोनॉमिक कोऑपरेशन प्रोग्राम

भारत और रूस के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है। 2030 तक इसे बढ़ाकर 100 अरब डॉलर यानी 899460.40 करोड़ रुपए तक पहुँचाने का लक्ष्य है। पिछले कुछ सालों से भारत रूस से क्रूड ऑयल तेजी से खरीद रहा है। दोनों देशों के बीच कारोबार बढ़ने में इसका अहम रोल रहा है। फिर भी भारत निर्यात के मुकाबले 13 गुना ज्यादा आयात करता है।

भारत रूस से 63.8 अरब डॉलर का सामान मँगवाता है, जबकि रूस भारत से 4.8 अरब डॉलर का सामान खरीदता है। ऐसे में रूस अब भारत के साथ व्यापार संतुलित करने को लेकर पहल करने वाला है ताकि द्विपक्षीय संबंधों पर बाहरी देशों का असर नहीं पड़े।

भारत दौरे के दौरान राष्ट्रपति पुतिन क्रूड ऑयल को लेकर भी बड़ा ऑफर दे सकते हैं। इसके अलावा परमाणु ऊर्जा, पेट्रो केमिकल्स सहित अहम ऊर्जा क्षेत्रों में सहयोग के साथ साथ तकनीक और उपकरणों के क्षेत्र में सहयोग और साझेदारी का विस्तार होगा। इससे पारस्परिक और इंटरनेशनल ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।

भारत की करेंसी का इस्तेमाल ज्यादा से ज्यादा व्यापार में हो, इसके लिए सिस्टम बनाए जाएँगे।

उत्तर- दक्षिण के बीच अंतरराष्ट्रीय परिवहन को प्रोत्साहित करने, समुद्री मार्ग को बढ़ावा देने को लेकर भी समझौता हो सकता है। चेन्नई व्लादिवोस्तोक समुद्री मार्गों से व्यापार में वृद्धि का प्रस्ताव भी है। यानी व्यापार में किसी तरह की रुकावट न आए, इसका भी ध्यान रखा जा रहा है।

कृषि उत्पादों, खाद्य और उर्वरकों द्विपक्षीय व्यापार को आगे बढ़ाने पर समझौता होगा। मानवीय सहायता, शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, संस्कृति, पर्यटन, खेल, स्वास्थ्य देखभाल और दूसरे क्षेत्रों में बातचीत को विस्तार मिलेगा।

‘मोदी गौमांस एक्सपोर्ट करते हैं’: AAP नेता इसुदान का वीडियो वायरल, समझें कि प्रधानमंत्री को ‘गैर-हिंदू’ बताने वाले नेता को बोलने से पहले पढ़ने की जरूरत क्यों है?

आम आदमी पार्टी की गुजरात ईकाई के प्रमुख इसुदान गढ़वी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में इसुदान PM मोदी को ‘नॉन-हिंदू’ होने का सर्टिफिकेट देते हुए यह दावा कर रहे हैं कि मोदी सरकार गायों और गौ वंशों को काटकर उनका मीट विदेश में एक्सपोर्ट करती है।

हालाँकि, समझदार लोग हमेशा कहते हैं कि कोई भी स्पीच या स्टेटमेंट देने से पहले एक बार पढ़ना जरूरी है। आम आदमी पार्टी (AAP) के नेताओं और उनके समर्थकों को इससे बाहर रखा गया है क्योंकि उन्हें प्रोपेगैंडा चलाने में दिलचस्पी है।

इसुदान गढ़वी वीडियो में कह रहे हैं, “मैं नरेंद्र मोदी को यह भी बताना चाहता हूं कि मैं उन्हें हिंदू नहीं मानता। मैं पब्लिकली कह रहा हूं कि मैं उन्हें हिंदू नहीं मानता। क्योंकि जो आदमी गायों को स्लॉटरहाउस भेजता है, उनका मीट एक्सपोर्ट करता है, उससे कमाता है और उस इनकम से मोटी कमाई करता है, वह हिंदू नहीं हो सकता।”

इसके साथ ही उन्होंने BJP कार्यकर्ताओं को भड़काने की भी कोशिश की। उन्होंने कहा कि BJP वर्कर्स को प्रायश्चित करना चाहिए क्योंकि जिस कमल का वे उद्घाटन करने जाते हैं, वह गाय के मीट से बना है।

इसुदान गढ़वी के इस वीडियो की तारीख के बारे में कोई पक्की जानकारी सामने नहीं आई है। एक बात बिल्कुल साफ है कि इस वीडियो में कई झूठे दावे किए गए हैं। आम आदमी पार्टी के नेता साफ-साफ कहते दिख रहे हैं कि नरेंद्र मोदी बीफ का निर्यात करते हैं और उसे विदेश भेजते हैं। हालाँकि, फैक्ट्स के हिसाब से उनके ये दावे पूरी तरह बेबुनियाद और बेतुके हैं। आइए इसे विस्तार से समझते हैं।

भारत में गाय की हत्या और बीफ एक्सपोर्ट पर बैन

सबसे पहले मूल बात समझ लेते हैं। भारत में ‘गाय की हत्या’ कोई आम कमर्शियल काम नहीं है बल्कि इसे संवैधानिक स्तर पर रोका गया है। भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों के अनुच्छेद 48 में राज्यों को स्पष्ट रूप से कहा गया है कि वे गायों और गौ वंश की हत्या पर रोक लगाने के लिए कदम उठाएँ।

इसी संवैधानिक निर्देश के आधार पर आज भारत में गायों और गौ वंश (बैल, बछड़ों आदि) की हत्या पर कानूनी प्रतिबंध है। हाल ही की एक रिपोर्ट के अनुसार, कई राज्यों ने अलग-अलग स्तर पर कानून बनाकर गाय की हत्या पर पूरी तरह रोक लगा दी है। गुजरात, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में गायों और गौ वंश की हत्या पूरी तरह प्रतिबंधित है।

गुजरात में, जहाँ से इसुदान गढ़वी स्वयं राजनीति करते हैं, वहाँ बॉम्बे एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट और उसके 2011 तथा 2017 के संशोधन न केवल गाय, बछड़ों और बैलों की हत्या को पूरी तरह प्रतिबंधित करते हैं बल्कि 2017 के संशोधन के बाद अवैध गौ-हत्या के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान भी है। हाल ही में अमरेली की एक अदालत ने अवैध गौ-हत्या के एक मामले में तीन आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है।

इसुदान गढ़वी का आरोप मुख्य रूप से दो बातों पर आधारित है: भारत ‘बीफ निर्यात’ में दुनिया के अग्रणी देशों में से एक है। उन्होंने सीधे ‘बीफ’ को ‘गौमांस’ कह दिया और फिर उसे मोदी सरकार की ‘गौ-हत्या नीति’ बना दिया। विदेशी व्यापार नीति और DGFT (डायरेक्टरेट जनरल ऑफ़ फ़ॉरेन ट्रेड) के निर्यात नीति दस्तावेजों में साफ लिखा है कि बीफ (गाय, बैल और वील) के निर्यात पर प्रतिबंध है और इसके निर्यात की कोई अनुमति नहीं दी जाती।

यही बात संसद में बार-बार दोहराई गई है। 14 मार्च 2016 को लोकसभा में ‘EXPORT OF BEEF’ पर पूछे गए एक सवाल के लिखित उत्तर में तत्कालीन कॉमर्स राज्य मंत्री (निर्मला सीतारमण) ने कहा था, “वर्तमान विदेश व्यापार नीति के अनुसार बीफ (गाय, बैल और वील का मांस) के निर्यात पर प्रतिबंध है। केवल भैंस, बकरा और मटन के निर्यात की अनुमति है और आँकड़ों में इन्हें ही बीफ़ माना जाता है।”

2015, 2017, 2019 और 2020 में भी सरकार ने अलग-अलग सवालों के जवाब में यही बात दोहराई है कि बीफ, वील यानी गाय-बीफ निर्यात नीति में ‘प्रतिबंधित’ श्रेणी में है जबकि निर्यात में केवल भैंस, बकरे और मटन के कानूनी व्यापार की ही अनुमति है।

इसुदान गढ़वी जैसे अन्य विपक्षी नेता और ध्रुव राठी जैसे कई यूट्यूबर दावा करते हैं कि ‘भारत दुनिया का सबसे बड़ा बीफ निर्यातक है’। आँकड़ों के स्तर पर यह आंशिक रूप से सही है लेकिन यहाँ भाषा और डेफिनिशन की एक ट्रिक है। भारत की एपीडा (APEDA) की आधिकारिक वेबसाइट और रेड मीट मैनुअल में साफ लिखा है कि भारत केवल deboned & deglanded frozen buffalo meat का निर्यात करता है। गाय का मांस नहीं बल्कि भैंस का मांस जिसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में कैराबीफ (carabeef) कहा जाता है।

भारत में जो ‘बीफ निर्यात’ के आँकड़े दिखते हैं, वे गाय-बीफ नहीं बल्कि भैंस के मांस के हैं। कानूनी रूप से गाय का मांस निर्यात सूची में है ही नहीं, इसलिए ‘मोदी गाय कटवा कर बीफ बेच रहे हैं’ जैसा दावा पूरी तरह गैर-जिम्मेदाराना और बेबुनियाद साबित होता है।

‘बीफ’ शब्द का भ्रम

अब एक और भ्रम देखिए- ‘बीफ’ शब्द की चालाकी। आम लोग बीफ का मतलब सिर्फ गौमांस समझते हैं। भारतीय कानून और FSSAI की आधिकारिक परिभाषा में ऐसा नहीं है। FSSAI के अनुसार, बीफ का मतलब बोवाइन जानवरों के खाने योग्य हिस्से से है, जिसमें भैंस भी शामिल है। (Beef is the edible portion of bovine animals (including buffaloes).

इसलिए कानूनी भाषा में ‘बीफ’ में गाय और भैंस दोनों का मांस शामिल होता है। अंतरराष्ट्रीय आँकड़े (UN, FAO) भी ‘Beef’ की श्रेणी में गाय और भैंस के मांस में अंतर नहीं करते। परिणामस्वरूप, भारत 100% भैंस का मांस (carabeef) निर्यात करता है, जो ग्राफ में ‘Beef Export’ के रूप में दिखाया जाता है।

और फिर राजनीति में, इन्हीं आँकड़ों को ‘बीफ’ कहकर प्रचार करने में उपयोग किया जाता है। इसुदान भी इसी प्रचार को हवा देने का काम कर रहे हैं। संक्षेप में, शॉर्ट में, शब्दों की यह चालाकी लोगों की भावनाओं से खेल रही है।

एक नेता (AAP के) का बयान है, जो जानबूझकर इन सभी तथ्यों को नजरअंदाज करके सीधे इस नतीजे पर पहुँच जाता है कि ‘मोदी हिंदू नहीं हैं, क्योंकि वे बीफ एक्सपोर्ट करते हैं’। राजनीति में आरोप–प्रत्यारोप होते रहते हैं, लेकिन जब कोई नेता गौमाता जैसी संवेदनशील भावना को निशाना बनाकर अधूरी सच्चाई के आधार पर पूरी बहस खड़ी करता है, तो उसे राजनीति नहीं बल्कि साफ-साफ ‘प्रोपेगैंडा’ कहा जाता है।

जहाँ तक ‘हिंदू होने या न होने का सर्टिफिकेट’ का सवाल है, तो इसुदान गढ़वी को गोपाल इटालिया के पुराने कामों और बयानों को देखना चाहिए, केजरीवाल के राम मंदिर पर दिए गए बयानों को देखना चाहिए। मोदी को ‘हिंदू न मानने’ से असलियत नहीं बदलेगी। आज देश में करोड़ों हिंदू PM मोदी के साथ खड़े हैं और इसका कारण भी हिंदुओं की आस्था है।

विरोध के आगे झुके पादरी: गुजरात के उमरपाड़ा में अवैध धर्मांतरण को बढ़ावा देने वाली चर्च निर्माण योजना रुकी- ग्राउंड रिपोर्ट

गुजरात के पूर्वी और दक्षिणी इलाकों, खासकर डांग और तापी जिलों में जबरन या अवैध धर्मांतरण (ईसाई मजहब में बदलने) का मुद्दा हमेशा गरमाया रहता है। पिछले कुछ सालों में इन क्षेत्रों में चर्चों की संख्या भी बहुत बढ़ गई है और आरोप लगते रहे हैं कि इनमें से ज्यादातर चर्च अवैध हैं।

ऐसा ही एक नया मामला हाल ही में सूरत के उमरपाड़ा स्थित वहार गाँव से सामने आया। इस गाँव में बिना किसी की परमिशन (अनुमति) लिए एक चर्च बनाने की तैयारी की जा रही थी। जब गाँव के हिंदू लोगों को इसकी खबर लगी तो उन्होंने इसका जोरदार विरोध किया और सरकारी अधिकारियों से शिकायत की। इस विरोध और शिकायत के बाद, चर्च का निर्माण कार्य फिलहाल रोक दिया गया है।

वहार गाँव में हिंदू आबादी बहुत ज़्यादा है और हिंदू से ईसाई बने लोगों की संख्या लगभग न के बराबर है। इसके बावजूद, गाँव के बाहर एक खेत में चर्च बनाने की तैयारी शुरू कर दी गई थी। जब वहार गाँव के हिंदू लोगों को इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने जाँच-पड़ताल की। जाँच में यह पता चला कि चर्च के निर्माण कार्य के लिए न तो पंचायत से कोई अनुमति (परमिशन) ली गई थी और न ही इस बारे में गाँव के लोगों को सूचित किया गया था।

चर्च बनने के कारण गाँव में धर्मांतरण की गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की संभावना को देखते हुए, गाँव के हिंदुओं ने इसका कड़ा विरोध किया। इसके बाद, पिछले काफी समय से जनजातीय क्षेत्रों में सक्रिय देव बिरसा सेना की भी इस मामले में एंट्री हुई। देव बिरसा सेना ने गाँव के प्रमुख हिंदू नेताओं के साथ मिलकर उमरपाड़ा के मामलतदार (राजस्व अधिकारी) को एक ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में उन्होंने चर्च के निर्माण के खिलाफ अपनी बात रखी और मांग की कि इसे तुरंत रोका जाए। उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि अगर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो वे उग्र आंदोलन शुरू कर देंगे।

एक्शन पर रिएक्शन: चर्च न बनाने का कमिटमेंट

ज्ञापन दिए जाने के बाद, उमरपाड़ा के मामलतदार (राजस्व अधिकारी) ने इस मामले को आगे की कार्रवाई के लिए कलेक्टर के पास भेज दिया। दूसरी तरफ, जब गाँव के हिंदू लगातार सक्रिय हो गए और विरोध बढ़ गया, तो चर्च का निर्माण शुरू करने की तैयारी कर रहे ईसाई पादरियों ने हार मान ली। उन्होंने गाँव के सरपंच और अन्य प्रमुख लोगों से मुलाकात की और चर्च न बनाने की लिखित गारंटी दी। इसके साथ ही, पादरियों ने गाँव वालों से विरोध में दिया गया ज्ञापन वापस लेने की भी माँग की।

गाँव में किसी भी तरह का अवैध चर्च निर्माण नहीं होगा, इसकी गारंटी मिलने के बाद गाँव के प्रमुख लोगों ने पहले विरोध में दिया गया ज्ञापन (आवेद्नपत्र) वापस ले लिया।

इस मामले पर ऑपइंडिया से बात करते हुए गाँव के एक प्रमुख व्यक्ति ने बताया कि गाँव में ईसाई आबादी बहुत कम होने के बावजूद, एक खेत में बिना परमिशन के चर्च बनाया जा रहा था, जिसका हमने विरोध किया। विरोध के बाद, उन्हें यह आश्वासन दिया गया है कि अब ऐसा कोई निर्माण नहीं किया जाएगा। इसके बाद ही, उन्होंने पहले दिया गया ज्ञापन वापस लिया है।

वहर गाँव के नेता आवेदन देने के लिए मामलातदार के ऑफिस पहुँचे

उमरपाड़ा के मामलतदार आरके चौधरी ने ऑपइंडिया को बताया कि यह गाँव का आपसी मामला था, जो अब समाप्त हो गया है। उन्होंने कहा कि ग्राम पंचायत के दखल से यह विवाद खत्म हुआ है, इसलिए प्रशासन के स्तर पर अब कोई कार्रवाई करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि पहले जो विरोध ज्ञापन कलेक्टर को भेजा गया था, उसके साथ अब इस मामले के समाप्त होने की रिपोर्ट भी भेज दी जाएगी।

वहीं, देव बिरसा सेना के उमरपाड़ा अध्यक्ष चिराग वसावा ने एक बयान में कहा, “हम पूरे जनजातीय क्षेत्र में जनजातीय संस्कृति और रीति-रिवाजों के अस्तित्व को बचाने के लिए काम करते हैं।” उन्होंने आगे बताया कि वहार गाँव के लोगों ने उनके ध्यान में यह बात लाई थी कि गाँव में अवैध रूप से चर्च बन रहा है और भविष्य में वहाँ धर्मांतरण की गतिविधियाँ बढ़ सकती हैं।

चिराग वसावा, उमरपाड़ा, देव बिरसा सेना

देव बिरसा सेना के अध्यक्ष चिराग वसावा ने आगे बताया, “मामला हमारे पास आने के बाद, हमने गाँव वालों की मदद से ही मामलतदार को ज्ञापन सौंपा था। इसके बाद ग्राम पंचायत की बैठक में यह गारंटी दी गई है कि अब कोई चर्च नहीं बनाया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि अगर भविष्य में भी इस तरह की कोई अवैध गतिविधि की गई, तो देव बिरसा सेना इस मुद्दे को ज़ोर-शोर से उठाएगी।”

गौरतलब है कि पहले भी ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जहाँ पहले गाँव में अवैध रूप से चर्च बना दिया जाता है और फिर धीरे-धीरे वहाँ धर्मांतरण की गतिविधियाँ शुरू कर दी जाती हैं। तापी और डांग जैसे कई गाँवों में इसी तरह से लोगों की आबादी का स्वरूप बदल गया है। अब यह समस्या उत्तरी गुजरात की तरफ भी बढ़ रही है। लेकिन, इस बार स्थानीय हिंदुओं और संगठनों की सक्रियता के कारण, यह गाँव धर्मांतरण की चपेट में आने से फिलहाल बच गया है।

ये लेख मूल रूप से गुजराती भाषा में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।