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विकसित गुजरात का ग्रोथ इंजन बनेगा सौराष्ट्र-कच्छ: राजकोट VGRC में ₹5.78 लाख करोड़ के MoU हुए साइन, जानें- उद्योगों को कैसे होगा फायदा

गुजरात की धरती हमेशा से उद्यमिता और व्यापारिक समझ के लिए जानी जाती रही है। जब वर्ष 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘वाइब्रेंट गुजरात’ की नींव रखी थी, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि यह पहल एक दिन क्षेत्रीय स्तर तक पहुँचेगी और अरबों रुपये के निवेश को आकर्षित करेगी। जनवरी 2026 में राजकोट स्थित मारवाड़ी विश्वविद्यालय में आयोजित ‘वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस’ (VGRC) ने यह साबित कर दिया कि गुजरात का विकास इंजन अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहा बल्कि सौराष्ट्र और कच्छ के दूरदराज इलाकों तक फैल चुका है।

गौरतलब है कि वाइब्रेंट गुजरात समिट का 10वां संस्करण वर्ष 2024 में आयोजित हुआ था, जिसमें 41,299 परियोजनाओं के लिए कुल 26.33 लाख करोड़ रुपए के MoU (समझौता ज्ञापन) पर हस्ताक्षर किए गए थे। प्री-समिट और समिट को मिलाकर कुल 98,540 परियोजनाओं के लिए 45.2 लाख करोड़ रुपए से अधिक के निवेश प्रस्ताव आए थे, जिससे करीब 81 लाख रोजगार सृजित होने की संभावना बनी थी।

इसके बाद वाइब्रेंट गुजरात समिट का 11वाँ संस्करण वर्ष 2026 में प्रस्तावित था लेकिन राज्य सरकार ने क्षेत्रीय क्षेत्रों पर विशेष फोकस के लिए इस समिट को क्षेत्रीय स्तर तक विस्तार देने का फैसला किया। इसी कड़ी में सौराष्ट्र-कच्छ के लिए VGRC का आयोजन पहले अक्टूबर 2025 में उत्तर गुजरात के मेहसाणा में और फिर 11-12 जनवरी 2026 को राजकोट में किया गया। अब राज्य स्तरीय वाइब्रेंट गुजरात समिट वर्ष 2027 में आयोजित किया जाएगा।

अक्टूबर 2025 में आयोजित पहले VGRC में 1,212 MoU पर हस्ताक्षर हुए थे और इसमें 3.24 लाख करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए थे। वहीं हाल ही में सौराष्ट्र-कच्छ में आयोजित VGRC में ब्लू इकॉनमी, ग्रीन स्टार्टअप्स, शिपबिल्डिंग, सिरेमिक उद्योग और पर्यटन जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया। इंजीनियरिंग और ऑटो पार्ट्स के प्रमुख केंद्र के रूप में पहचान रखने वाले राजकोट को इस सम्मेलन के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने का प्रयास किया गया। यह सम्मेलन राजकोट-मोरबी हाईवे पर स्थित मारवाड़ी विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित किया गया, जहाँ 55 एकड़ क्षेत्र में 6 प्रदर्शनी डोम और एक मुख्य इनोवेशन हॉल तैयार किया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 जनवरी को इस वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन किया।

VGRC के खत्म होने के बाद सामने आए आँकड़े

यह कच्छ-सौराष्ट्र के 12 जिलों को कवर करने वाला पहला कॉन्फ्रेंस था, जिसमें 24 देशों के रिप्रेजेंटेटिव, 4,000 से ज्यादा एंटरप्रेन्योर, 450 से ज्यादा एग्जिबिटर और 29,000 रजिस्ट्रेशन आए। इसके अलावा 2,200 से ज्यादा B2B/B2G मीटिंग हुईं। इसके बाद ₹5.78 लाख करोड़ के 5,492 MoU साइन हुए हैं। राज्य के डिप्टी चीफ मिनिस्टर हर्ष सांघवी ने इस बारे में जानकारी देते हुए एक पोस्ट शेयर किया है।

सांघवी द्वारा साझा किए गए आँकड़ों के मुताबिक-

  1. ऑटो, इंजीनियरिंग और उससे जुड़े सेक्टर में 381 करोड़ रुपए के 5 MoU
  2. सिरेमिक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 1,460 करोड़ रुपए के 5 MoU
  3. एयरोस्पेस और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 1,650 करोड़ रुपए के 3 MoU
  4. स्किल डेवलपमेंट और MSME कैपेसिटी बिल्डिंग में 0.22 करोड़ रुपए के 4 MoU
  5. ब्लू बायोइकोनॉमी (बायोफ्यूल, फंक्शनल फूड और न्यूट्रास्यूटिकल्स) सेक्टर में 261 करोड़ रुपए के 13 MoU
  6. ग्रीन AI डेटा सेंटर और डीप टेक सेक्टर में 9 करोड़ रुपए के 2 MoU साइन किए गए हैं।

समापन समारोह में कैबिनेट मंत्री जीतू वाघाणी द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, वर्ष 2003 में आयोजित पहले वाइब्रेंट गुजरात के दौरान केवल 80 एमओयू पर हस्ताक्षर हुए थे, जिनकी कुल निवेश राशि 66,000 करोड़ रुपए थी। इसके मुकाबले राजकोट में आयोजित इस क्षेत्रीय वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन में 5,492 एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जिनकी कुल निवेश राशि 5.78 लाख करोड़ रुपए है।

उन्होंने कहा कि ये आँकड़े और कई देशों की भागीदारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर देश-विदेश के निवेशकों के अटूट विश्वास को दर्शाती है। जीतू वाघाणी ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में आत्मनिर्भर भारत, स्टार्टअप इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी पहलें जमीनी स्तर पर साकार हो रही हैं, जिसका सीधा लाभ गुजरात के उद्योगपतियों और औद्योगिक इकाइयों को मिलेगा।

सौराष्ट्र-कच्छ पर सरकार के फोकस के पीछे स्ट्रेटेजिक कारण

गुजरात सरकार जानबूझकर सौराष्ट्र और कच्छ क्षेत्र को आगे बढ़ा रही है, क्योंकि इन इलाकों में अपार संभावनाएं मौजूद हैं। गुजरात की कुल समुद्री तटरेखा लगभग 1,600 किलोमीटर लंबी है जिसमें से 70% से अधिक हिस्सा सौराष्ट्र और कच्छ में आता है। यह तटरेखा दुबई, यूरोप और अफ्रीका जैसे वैश्विक बाजारों तक पहुँच का भारत का प्रमुख प्रवेश द्वार मानी जाती है। अहमदाबाद या सूरत की तुलना में सौराष्ट्र और विशेष रूप से कच्छ में बड़े पैमाने पर जमीन उपलब्ध है, जो सोलर पार्क या स्टील प्लांट जैसे मेगा प्रोजेक्ट्स के लिए बेहद जरूरी है।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने कहा कि कच्छ-सौराष्ट्र के लोगों में उद्यमिता की मजबूत भावना है। सरकार अब इस उद्यमिता को ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर’ और ‘नीतिगत प्रोत्साहन’ के जरिए वैश्विक स्तर तक ले जा रही है। उन्होंने बताया कि मोरबी भारत के कुल सिरेमिक उत्पादन का 90% हिस्सा देता है और वैश्विक स्तर पर दूसरे स्थान पर है। इसी कारण इस क्षेत्र को VGRC में एक विशेष जोन के रूप में प्रदर्शित किया गया, जहाँ आयोजित सेमिनार में 1,460 करोड़ रुपए के एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए।

ये MoU एडवांस्ड टेक्नोलॉजी, ऑटोमेशन, एनर्जी एफिशिएंसी और वेस्ट रीसाइक्लिंग के जरिए प्रोडक्शन कॉस्ट कम करेंगे, ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ाएँगे और एक्सपोर्ट बढ़ाएँगे। इस सेक्टर में वर्तमान में 10,000 से 12,000 लोगों को रोजगार मिलता है, जिनमें करीब 60% महिलाएँ हैं, और इन नए निवेशों से इस रोजगार आधार को और मजबूती मिलेगी। इसके अलावा, प्रस्तावित नया सिरेमिक पार्क वैल्यू-एडेड उत्पादों और आधुनिक विनिर्माण को बढ़ावा देगा।

इंजीनियरिंग उद्योग से लेकर ग्रीन एनर्जी तक

राजकोट का इंजीनियरिंग उद्योग अब ‘न्यू एज टेक्नोलॉजी’ से जुड़ रहा है। अब तक राजकोट पंप और ऑटो पार्ट्स के लिए जाना जाता था लेकिन सेमीकंडक्टर हब बनने के साथ यहाँ की छोटी इकाइयाँ हाई-टेक चिप मैन्युफैक्चरिंग की सप्लाई चेन का हिस्सा बनेंगी। इससे इंजीनियरिंग के छात्रों को विदेश जाने के बजाय राजकोट में ही लाखों रुपए के पैकेज मिलने का रास्ता खुलेगा।

इसके अलावा गुजरात का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 100 GW रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता विकसित करने का है तो ऐसे में इस सेक्टर में हुए MoUs से बड़ा लाभ होगा। ग्रीन हाइड्रोजन, सोलर, विंड और ओशन एनर्जी से ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, कार्बन उत्सर्जन घटेगा और खासकर ग्रामीण इलाकों में हजारों कुशल रोजगार पैदा होंगे। गाँवों में बिजली की स्थिरता बढ़ेगी और आय के नए स्रोत बनेंगे। ग्रीन हाइड्रोजन सेक्टर में निवेश से भविष्य में कच्छ ‘एनर्जी कैपिटल’ के रूप में उभरेगा।

द्वारका, सोमनाथ और पोरबंदर के समुद्र तटों को ‘क्रूज टूरिज्म’ के लिए विकसित किया जा रहा है। इससे पर्यटन बढ़ेगा और स्थानीय हस्तशिल्प, परिवहन और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। इसके अलावा, कच्छ-सौराष्ट्र के बंदरगाह भारत के प्रमुख गेटवे हैं। निर्यात बढ़ने से परिवहन लागत घटेगी और वैश्विक व्यापार में भागीदारी बढ़ेगी। इससे ब्लू इकॉनमी और ग्रीन शिपिंग को बढ़ावा मिलेगा। मछली उद्योग में भी आधुनिक कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित होने से मछुआरों की आय बढ़ेगी।

5.78 लाख करोड़ रुपS के निवेश से लगभग 12 से 15 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे। इससे रोजगार के लिए होने वाला पलायन रुकेगा। उद्योगों के आने से नए हाईवे, रेलवे कनेक्टिविटी और स्मार्ट शहर विकसित होंगे। राजकोट का नया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा इस विकास को और गति देगा। यह भी उल्लेखनीय है कि जब कोई बड़ा प्लांट स्थापित होता है, तो उसके आसपास एमएसएमई इकाइयाँ भी विकसित होती हैं। इससे राजकोट और जामनगर के छोटे उद्योगपतियों को बड़ा बाजार मिलेगा।

सरकार उद्योगों की जरूरतों के अनुसार नए स्किल विश्वविद्यालय और ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ स्थापित कर रही है, जिससे युवा उद्योगों के लिए तैयार हो सकें। इस तरह गुजरात अब सिर्फ वाइब्रेंट ही नहीं बल्कि ‘रीजनली वाइब्रेंट’ भी बन रहा है।

(यह खबर गुजराती में प्रार्थना अमीन ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है)

पुस्तक, शौर्य और ज्ञान: विकसित भारत की वैचारिक आधारशिला

नई दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेला 2026 की थीम ‘भारतीय सैन्य इतिहास: शौर्य एवं प्रज्ञा’ महज एक विषय नहीं बल्कि भारत की सभ्यतागत स्मृतियों और राष्ट्रीय चेतना का सशक्त उद्घोष है। यह थीम भारतीय सैन्य इतिहास के उन स्वर्णिम अध्यायों को उजागर करती है, जहाँ रणभूमि में अदम्य साहस और निर्णयन में गहन बौद्धिक प्रज्ञा का अनुपम समन्वय दिखाई देता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संदेश में इस विषय को अत्यंत सराहनीय बताते हुए कहा कि यह भारत की गौरवशाली परंपराओं, अपराजेय साहस और समृद्ध बौद्धिक विरासत को रेखांकित करता है। वास्तव में, भारतीय सैन्य इतिहास केवल युद्धों, विजय या पराजय का वृत्तांत नहीं है बल्कि यह रणनीति, नैतिक मूल्यों, नेतृत्व क्षमता और कर्तव्यबोध की एक जीवंत पाठशाला रहा है, जिससे पीढ़ियों ने आत्मबोध और राष्ट्रबोध की प्रेरणा प्राप्त की है।

पुस्तक मेले की थीम ‘भारतीय सैन्य इतिहास: शौर्य और ज्ञान के 75 वर्ष’ आज के भारत के आत्मविश्वास और स्मृतिबोध को प्रतिबिंबित करती है। यह थीम स्पष्ट करती है कि भारत का सैन्य इतिहास केवल रणक्षेत्र की वीरता तक सीमित नहीं बल्कि रणनीतिक प्रज्ञा, नैतिक नेतृत्व और राष्ट्रनिर्माण में सेनाओं की निर्णायक भूमिका का समग्र आख्यान है। 75 वर्षों की इस यात्रा को पुस्तक, विमर्श और प्रदर्शनी के माध्यम से प्रस्तुत करना आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास को जीवंत अनुभव में बदल देता है।

प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक भारत की सैन्य परंपरा ने यह सिद्ध किया है कि शक्ति का वास्तविक स्वरूप विवेक से संचालित होता है। चाणक्य की अर्थनीति से लेकर शिवाजी महाराज की गुरिल्ला रणनीति, और स्वतंत्र भारत की सेनाओं की आधुनिक युद्ध-कुशलता—हर चरण में ‘शौर्य’ के साथ ‘प्रज्ञा’ की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। पुस्तक मेला 2026 की यह थीम विशेष रूप से युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। यह उन्हें इतिहास से सीख लेने, राष्ट्रभक्ति को भावनात्मक नारे से आगे बढ़ाकर कर्तव्य और अनुशासन के रूप में समझने की दिशा देती है। साथ ही, यह संदेश भी देती है कि सशक्त राष्ट्र वही होता है, जो अपने अतीत को जानता, समझता और उससे भविष्य की दिशा तय करता है।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा 12 जनवरी, 2026 को नई दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री संग्रहालय में चयनित 43 युवा लेखकों से संवाद किया गया। उन्हें सार्थक पुस्तकें लिखने के लिए मेंटरशिप अवधि का भरपूर लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित किया जो देश के युवाओं को पढ़ने, लिखने और ज्ञान के साथ गहराई से जुड़ने के लिए प्रेरित करें। उन्होंने शोध सामग्री तक पहुँच के महत्व पर जोर दिया और निर्देश दिया कि राष्ट्रीय पुस्तक ट्रस्ट (NBT) के माध्यम से भौतिक और डिजिटल दोनों संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि लेखकों को ‘एक राष्ट्र, एक सदस्यता’ (ONOS) पहल के तहत संसाधनों तक पहुँच प्रदान की जानी चाहिए। उनके अकादमिक और शोध संबंधी सहयोग को पुख्ता करने के लिए सुझाव दिया कि चयनित लेखकों को अपने-अपने क्षेत्रों के केंद्रीय विश्वविद्यालयों से संबद्ध किया जाए ताकि वे अपनी किताबों को तैयार कर सकें।

धर्मेंद्र प्रधान का यह जोर कि युवा लेखक मेंटरशिप अवधि का अधिकतम लाभ उठाकर सार्थक और प्रेरक पुस्तकें लिखें, अत्यंत प्रासंगिक है। आज के डिजिटल और त्वरित सूचना के युग में गहन शोध, तथ्यात्मक प्रामाणिकता और विचारों की स्पष्टता पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गई है। इसी संदर्भ में NBT के माध्यम से भौतिक और डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता तथा ONOS पहल के तहत शोध सामग्री तक पहुँच सुनिश्चित करने का निर्देश एक दूरदर्शी कदम है।

केंद्रीय विश्वविद्यालयों से चयनित लेखकों को जोड़ने का सुझाव इस योजना को अकादमिक मजबूती प्रदान करता है। इससे लेखन केवल व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित न रहकर शोध, विमर्श और बौद्धिक परंपरा से जुड़ सकेगा। यह प्रयास युवा लेखकों को वैश्विक मानकों के अनुरूप तैयार करने में सहायक होगा। सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पीएम-युवा 3.0 देश की विविधता को उसकी वास्तविक शक्ति के रूप में स्वीकार करता है। विभिन्न पृष्ठभूमियों से आए युवा लेखकों की ऊर्जा, आत्मविश्वास और आकांक्षाएँ ‘विकसित भारत’ के सपने को शब्दों का आधार देती हैं। यह योजना यह भी सिद्ध करती है कि सरकार केवल पाठ्यक्रम और परीक्षा तक सीमित नहीं बल्कि विचार, संवाद और सृजनशीलता को राष्ट्र की प्रगति का मूल मानती है।

10 जनवरी,2026 को नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला (NDWBF) 2026 का उद्घाटन केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं बल्कि भारत की बौद्धिक चेतना, बहुभाषी परंपरा और राष्ट्रबोध का सशक्त उत्सव है। धर्मेंद्र प्रधान द्वारा इस विश्वविख्यात मेले का उद्घाटन और वीर सुरेंद्र साई तथा संबलपुर के शहीदों को समर्पित पुस्तक ‘कुडोपाली की गाथा: 1857 की अनकही कहानी’ का बहुभाषी विमोचन, इस आयोजन को ऐतिहासिक और भावनात्मक दोनों स्तरों पर विशिष्ट बनाता है। कुडोपाली की गाथा पर एक वीडियो भी प्रदर्शित किया गया।

आज जब भारत आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर है, ऐसे समय में ‘भारतीय सैन्य इतिहास: शौर्य एवं प्रज्ञा’ जैसी थीम न केवल प्रासंगिक है बल्कि अत्यंत आवश्यक भी। यह पुस्तक मेले को केवल साहित्यिक आयोजन नहीं बल्कि राष्ट्रीय आत्मचिंतन का मंच बना देती है जहाँ कलम, विचार और इतिहास मिलकर राष्ट्रनिर्माण की चेतना को मजबूत करते हैं।

सिलेक्टिव है RJ सायमा का नारीवाद… हिजाब पर करनी थी बात, करने लगी मजहब का बचाव: पढ़िए 7 घटनाएँ और सोचिए क्या सच में इस्लाम में ‘मर्जी’ चला सकता है इंसान?

इस्लाम में इंसान की मर्जी की महत्वता है, जबरदस्ती की कोई जगह नहीं- मजहब की ये परिभाषा हाल में आरजे सायमा ने दी है। उन्होंने बड़ी चालाकी से हिजाब-बुर्का मुद्दे पर इस्लाम को डिफेंड किया है कि दुनियाभर में घटना कोई भी हो जाए, लेकिन बात मजहब की आलोचना पर न आए।

ये तरीका ऑस्ट्रेलिया आतंकी हमले के समय अरफा खानम शेरवानी ने भी अपनाया था। हालाँकि, उनकी स्ट्रैटेजी चली नहीं और उनके अपने ही समुदाय के लोग उनपर सवाल खड़ा करने लगे। सायमा के साथ भी यही हुआ है लेकिन वो आँख मूंदकर रखेंगी क्योंकि उन्हें नैरेटिव ये बनाना है कि जो लोग हिजाब पहनने को मजबूर कर रहे हैं वो अच्छे से इस्लाम को नहीं जानते।

दिलचस्प बात है कि सायमा जैसे बुद्धिजीवियों की हिजाब पर राय मौका, घटना और स्थान देखकर बदलती रहती है। जैसे भारत की बात आती है तो ये हिजाब पहनने को सीधा मजहबी अधिकार से जोड़ती हैं, शैक्षणिक संस्थानों में उसे पहने जाने की पैरवी करती हैं और किसी बाहर मुल्क में ये मुद्दा बनता है तो नारीवादी पक्ष निकल आता है, तब ये क्रांतिकारी भी बनती हैं, हिजाब को च्वाइस भी बताती हैं और इस्लाम को डिफेंड करने का लिबरल वर्जन भी खोजती हैं।

मगर, अफसोस उनका ये वर्जन जमीनी हकीकत और मीडिया में मौजूद तमाम उदाहरणों से बिलकुल निकलता है। बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं है। 2025 के दिसंबर माह में ही यूपी के शामली में एक मुस्लिम व्यक्ति ने अपनी बीवी और दो नाबालिग बेटियों की हत्या कर दी। कारण? तीनों बिना बुर्का पहने घर से बाहर निकल गई थीं। 2021 में असम से खबर आई थी एक महिला को दुकान से सिर्फ इसलिए बाहर निकाल दिया गया क्योंकि उसने जींस पहनी थी, बुर्का नहीं। 2022 में कर्नाटक से रिपोर्ट आई थी कि एक संगठित समूह मुस्लिम महिलाओं पर नजर रखने के लिए बनाया गया था, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी महिला सार्वजनिक स्थानों पर बिना हिजाब या बुर्का के न दिखें।

यह सब भारत की घटनाएँ हैं, किसी दूर-दराज के कट्टर इस्लामिक देश की नहीं। क्या इन पर कभी सायमा कि कोई प्रतिक्रिया या विरोध देखने को मिला? क्या ऐसी खबरों को सुनने के बाद कभी आरजे सायमा ये कहने गईं कि इस्लाम में तो मर्जी चलती है, जबरदस्ती नहीं।

इसी तरह विदेशों में महिलाओं के साथ हिजाब न पहनने पर क्या हुआ, इसके भी तमाम उदाहरण हैं। ईरान की महसा अमीनी याद है आपको? 22 साल की वह लड़की जिसे ‘ठीक से हिजाब न पहनने’ के आरोप में हिरासत में लिया गया और इतनी बेरहमी से पीटा गया कि उसकी मौत हो गई।

2014 में ईरान के इस्फाहान में महिलाओं पर तेजाब हमलों की घटनाएँ सामने आईं। जाँच में पता चला कि निशाना वे महिलाएँ थीं जो ‘ढंग से’ हिजाब या बुर्का नहीं पहन रही थीं।
इसी तरह कनाडा की अक्सा परवेज, महज 16 साल की लड़की, जिसकी हत्या उसके अपने परिवार ने इसलिए कर दी क्योंकि वह खुद को ढककर बाहर नहीं जाती थी।

ये तो सिर्फ वे मामले हैं जो मीडिया में आ सके। कितनी घटनाएँ चार-दीवारी के भीतर दबा दी जाती होंगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। आरजे सायमा क्या इन सभी मामलों में पीड़ित महिलाओं और बच्चियों को यह समझाने जाएँगी कि इस्लाम मर्जी का मजहब है, जबरदस्ती का नहीं? या फिर हमेशा की तरह यह कहकर पल्ला झाड़ लेंगी कि यह ‘असल इस्लाम’ नहीं है?

विडंबना यह है कि जिस इस्लाम की परिभाषा सायमा गढ़ती हैं, उसे बार-बार गलत उन्हीं लोगों ने साबित किया है जो इस मजहब को सबसे ज्यादा कट्टरता से मानते हैं। अगर आम लोगों को ‘नासमझ’ मान भी लिया जाए, तो उन मुल्ला-मौलानाओं की तकरीरों का क्या जवाब है, जिनकी बातें सुनकर समाज दिशा तय करता है?

खुले मंचों से बार-बार कहा जाता है कि कुरान में हिजाब का जिक्र है और लड़कियों को इसे पहनना ही चाहिए। कई बार तो ये भी बताया जाता है कि महिलाओं को आजादी देना ही गलत बात है। उनके स्कूल जाने से लेकर उनके खुले सर घूमने की चाह तक को इस्लाम के खिलाफ बता दिया जाता है। तब सवाल उठता है- क्या समस्या कुछ ‘भटके हुए लोगों’ की है, या फिर उस विचारधारा की, जिसे हर बार बचाने के लिए कभी आरफा को और कभी आरजे सायमा को नया नैरेटिव गढ़ना पड़ता है?

1979 की इस्लामी क्रांति से पहले कैसा था आज के कठमुल्लों का ईरान, 46 साल में कितना बदला: जानिए कैसे स्थापित की गई खामेनेई की सत्ता

ईरान के लोग एक बार फिर सड़कों पर हैं। इस बार विरोध इस्लामी हुकूमत के खिलाफ है। अयातुल्ला अली खामेनेई को सत्ता से हटाने की माँग को जारी इन प्रदर्शन में 2500 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। मुस्लिम महिलाएँ हिजाब उतारकर इस्लामी सत्ता का विरोध कर रही हैं। उधर, खामेनेई सरकार दमन, गिरफ्तारियों और फाँसी का रास्ता चुन रही है।

इन प्रदर्शनों की अगुवाई मुस्लिम महिलाएँ कर रही हैं, जो कभी हिजाब उतारकर, कभी खामेनेई की फोटो से सिगरेट सुलगाकर, तो कभी पुलिस के सामने डटकर खड़ी हो रही हैं। सड़कों पर ‘तानाशाह मुर्दाबाद’, ‘मुल्लाओं को ईरान छोड़ना होगा’ जैसे नारे सुनाई दे रहे हैं। यह नारे पूरी व्यवस्था के खिलाफ हैं, जो इस्लाम के नाम पर जीवन, कपड़े, सोच और बोलने की आजादी तय करती है।

ईरान के लोग सवाल पूछ रहे हैं कि क्या ‘इस्लामी क्रांति‘ ने वाकई आजादी दी थी या सिर्फ सत्ता का चेहरा बदला था। यही सवाल 1979 में भी उठा था, जब ईरान की जनता राजा मोहम्मद रजा शाह पहलवी के खिलाफ सड़कों पर उतरी थी। तब भी तानाशाही, दमन और सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ नारे लगे थे। फर्क बस इतना है कि तब जनता ने राजशाही से छुटकारा पाने के लिए मजहबी नेतृत्व पर भरोसा किया था। आज चार दशक बाद वही जनता उसी इस्लामी सत्ता को हटाने के लिए संघर्ष कर रही है, मानो किरदार बदलकर इतिहास ईरान में खुद को दोहरा रहा हो।

1979 से पहले ईरान में राजशाही

जिस ईरान ने 1979 में राजा के खिलाफ बगावत की, वह अचानक गुस्से में नहीं फूटा था। यह गुस्सा सालों से भीतर जमा हो रहा था। उस वक्त देश पर मोहम्मद रजा शाह पहलवी का शासन था। राजा पहलवी खुद को ईरान को पिछड़ेपन से निकालकर आधुनिक दुनिया में ले जाने वाला नेता मानता था। उस वक्त तेहरान जैसे शहरों में ऊँची इमारतें, वेस्टर्न लाइफस्टाइल, फैशन और विश्वविद्यालय दिखते थे। बाहर से ईरान एक प्रगतिशील देश लगता था, खासकर पश्चिमी दुनिया की नजरों में।

राजा मोहम्मद रजा शाह पहलवी (फोटो साभार: AajTak)

लेकिन यह तस्वीर अधूरी थी। सत्ता पूरी तरह राजा के हाथ में थी और जनता की भागीदारी लगभग शून्य थी। चुनाव औपचारिक थे, विपक्ष का नाम नहीं था। जो भी सरकार से सवाल करता, उसे SAVAK (साजमान-ए-इत्तिलाआत वा अम्नियत-ए-किश्वर) नाम की खुफिया एजेंसी का सामना करना पड़ता था। बोलने की आजादी, लिखने की आजादी और राजनीतिक असहमति तीनों पर कड़ा नियंत्रण था।

शाह के दौर में मुस्लिम महिलाओं की पहचान

1960 और 1970 के दशक में शाह के शासन में ईरान की मुस्लिम महिलाओं को आजादी थी। शहरों में महिलाएँ बिना हिजाब पढ़ाई करती थीं, नौकरी करती थीं और सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनती थीं। शाह के शासन में महिलाओं को वोट का अधिकार मिला, पारिवारिक कानूनों में कुछ सुधार हुए और शिक्षा के दरवाजे भी खोले गए।

लेकिन ग्रामीण इलाकों और मजहबी क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका अभी भी काफी सीमित थी। कई जगह अब भी महिलाओं को पढ़ाई और नौकरी करने की अनुमति नहीं थी। जहाँ एक तरफ शाह ने पश्चिमी संस्कृति और आधुनिकता को आगे बढ़ाया, यही मजहबी और सामाजिक मूल्यों के टकराव का कारण बना।

शाह की सत्ता में महिलाओं की आजादी को समाज और मजहबी समूहों के मानदंडों के खिलाफ मानी जाती थी। यही वजह थी कि मजहबी उलेमा और शिया मौलवी शाह की सत्ता के विरोध में थे। यही विरोधाभास अंत में 1979 की क्रांति में महिलाओं की भूमिका और उनके अधिकारों के सवाल का आधार बना।

शाह के खिलाफ विरोध को मौलवियों और उलेमाओं ने दी मजहबी पहचान

शाह की सत्ता में प्रगति को देख सबसे ज्यादा असंतुष्ट शिया मुस्लिम और उलेमा थे। ईरान में सदियों से शिया उलेमा केवल मजहबी नेता नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक और कानूनी जीवन में भी दखल करते थे। मोहम्मद रजा शाह पहलवी की आधुनिकता की परियोजना में इन मजहबी नेताओं के लिए जगह नहीं बची थी।

शाह की नीतियों से शिया उलेमा खफा थे। मजहबी अदालतों को कमजोर होते, शरिया कानूनों की जगह देश के अपने कानून लागू होते और वक्फ संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण होते देख मौलवी और उलेमा नाखुश थे। उस दौर में मस्जिदों और मदरसों का इस्तेमाल सरकार के खिलाफ बयानबाजी में होने लगा। कई मौलवियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया और कुछ को देश से बाहर निकाल दिया गया।

इस बीच सबसे प्रमुख चेहरा सामने आया अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी। 1963 में जब शाह ने ‘व्हाइट रेवोल्यूशन’ के नाम से भूमि सुधार, महिला अधिकार और पश्चिमीकरण से जुड़ी नीतियाँ लागू कीं, तो खुमैनी ने इन्हें इस्लाम विरोधी बताया। खुमैनी ने मस्जिदों से लोगों को शाह के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि 1964 में खुमैनी को पहले तुर्की और फिर इराक के नजफ शहर में डिपोर्ट कर दिया गया।

डिपोर्ट होने के बावजूद खुमैनी की आवाज ईरान के लोगों तक पहुँच रही थी। तब खुमैनी के भाषण को कैसेट टेप्स के जरिए ईरान में फैलने लगीं। शिया तौर-तरीकों में शहादत और अत्याचार के नाम पर खुमैनी ने ईरानी जनता का समर्थन हासिल किया। मस्जिदें, मदरसे और मजहबी जुलूसों से शाह सरकार के विरोध का केंद्र बनाया गया।

धीरे-धीरे शाह के खिलाफ गुस्सा सिर्फ राजनीतिक नहीं रहा, बल्कि मजहबी संघर्ष के रूप में देखा जाने लगा। शिया उलेमाओं ने ईरान में मजहबी पहचान को बचाने की लड़ाई शुरू की। यही भावना आगे चलकर 1979 की इस्लामी क्रांति की रीढ़ बनी।

1978-79 के आंदोलन से शाह के ईरान छोड़ने तक

मोहम्मद रजा शाह पहलवी के विरोध 1978 तक तेजी से फैलने लगा। महँगाई से शुरू हुए इस विरोध ने सरकार की आर्थिक नीतियों से लेकर शहरों में पश्चिमीकरण पर आवाज ऊँची की। अब सिर्फ तेहरान नहीं, बल्कि छोटे-छोटे शहरों और कस्बों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। जिस तेहरान विश्वविद्यालय ने विरोध को दिशा दी थी, ये अब सभाओं और नारेबाजियों का अड्डा बन गया। इसी दौरान अजरबादेगान यूनिवर्सिटी में भी बड़े स्तर पर प्रदर्शन हुए।

1979 में विरोध प्रदर्शन (फोटो साभार: AFP)

अब शाह सरकार ने भी प्रदर्शनकारियों को हटाने का मन बना लिया था। 08 सितंबर 1978 को तेहरान के जालेह चौक पर चल रहे विरोध प्रदर्शन में सरकार मार्शल लॉ (सेना का नियंत्रण) लगा दिया था। सेना ने बिना चेतावनी के प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलाईं। इस गोलीबारी में 64 लोग मारे गए और 200 से अधिक घायल हुए थे। इस घटना ने विरोध प्रदर्शन को क्रांति का रूप दिया।

इसके बाद से विरोध प्रदर्शनों में सुरक्षाबलों और लोगों की झड़पें आम हो गईं। कभी गोलीबारी, तो कभी लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस 1978-79 इस्लामी क्रांति में लगभग 2 से 3 हजार लोगों की मौत हुई थी। इन प्रदर्शनों के चलते शाह पर अंतरराष्ट्रीय दबाव तेज होने लगा।

अब मोहम्मद शाह रजा को समझ आ गया कि ईरान में सत्ता बनाए रखना मुश्किल हो गया है। 16 जनवरी 1979 को शाह ने ईरान छोड़ने का फैसला किया। शाह पहले मिस्र गए, फिर अमेरिका और बाद में बहरीन में कुछ समय बिताया। शाह के देश छोड़ने के बाद सरकार पूरी तरह खाली हो गई और देश में अस्थिरता चरम पर थी।

खुमैनी और इस्लामी क्रांति का उदय

शाह के देश छोड़ने के बाद ईरान सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन कर रहा था। शाह के विरोध में इस आंदोलन में शामिल छात्र, मजदूर, महिलाओं, वामपंथी और मजहबी नेताओं ने इसे इस्लामी क्रांति का नाम दिया। अब अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी को वापस बुलाने की माँग हर तरफ गूँज रही थी।

तभी 01 फरवरी 1979 को खुमैनी फ्रांस से ईरान वापस लौटे। खुमैनी की वतन वापसी में करोड़ो लोग सड़कों पर स्वागत करने उतरे। ईरान को खुमैनी से काफी उम्मीदें थीं। खुमैनी ने ईरान में सत्ता को मजहबी तौर-तरीकों से चलाने का संदेश दिया। इसके बाद खुमैनी और उनके शिया मुस्लिम उलेमा और मौलवियों ने सत्ता संभाली। संसद और अदालतें बनाई गईं, लेकिन उनका काम केवल प्रशासनिक फैसले लेना था, असली शक्ति अब ‘सुप्रीम लीडर’ और मजहबी नेतृत्व के हाथ में थी।

खुमैनी की ईरान में वापसी (फोटो साभार: BBC)

महिलाओं के लिए स्थिति तेजी से बदल गई। जो महिलाएँ शाह के दौर में शिक्षा और नौकरी करने को स्वतंत्र थीं, अब उन पर कड़ी पाबंदी लागू कर दी गई। सार्वजनिक जीवन में हिजाब को अनिवार्य कर दिया गया। पारिवारिक कानूनों में बदलाव कर महिलाओं के तलाक, गवाही औऱ अभिभावक अधिकार सीमित कर दिए गए। सरकार इसे ‘इस्लामी व्यवस्था’ के लिए जरूरी बताने लगी।

बदलाव सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं रहा। 1979 के बाद मजहबी संगठन जैसे मस्जिदें, मदरसे और इस्लामी संस्थान अब प्रशासन और कानून के प्रमुख केंद्र बन गए। हर नीति, हर कानून और हर सामाजिक गतिविधि मौलवियों और खुमैनी के निर्णयों के अनुसार नियंत्रित होने लगे।

1979 से 2026 तक, क्या ईरान में कुछ बदला?

1979 में ईरान की जनता ने राजा के खिलाफ बगावत की थी। लोगों को लगा था कि राजा के जाने के बाद उन्हें आजादी मिलेगी, अपनी बात कहने का हक मिलेगा और देश जनता की मर्जी से चलेगा। शाह चला गया, लेकिन उसी जगह एक ऐसी व्यवस्था आ गई, जिमें सत्ता फिर कुछ गिने-चुने लोगों के हाथ में चली गई। फर्क बस इतना था कि पहले ताज पहनने वाला राजा था, अब सत्ता पर मजहबी नेता बैठ गए।

1979 की इस्लामी क्रांति के बाद महिलाएँ (फोटो साभार: BBC)

खुमैनी के बाद ईरान में मजहब के नाम पर कानून बनने लगे। महिलाओं की आजादी सीमित हो गई, पहनावे से लेकर जिंदगी के फैसलों तक पर नियम लगाए गए। बोलने, लिखने और विरोध करने पर रोक लगती गई। जिन लोगों ने 1979 में बदलाव के सपने देखे थे, उन्होंने कुछ ही सालों में महसूस किया कि डर और दबाव खत्म नहीं हुआ, बस उसका चेहरा बदल गया।

आज 2026 में जब लोग फिर सड़कों पर हैं, तो उनके वही ‘तानाशाह मुर्दाबाद’ वाले पुराने नारे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब ये नारे राजा के खिलाफ नहीं, बल्कि खामेनेई और इस्लामी सत्ता के खिलाफ हैं। यह दिखाता है कि ईरान में 47 साल में सरकार बदली, चेहरे बदले, लेकिन आम लोगों की परेशानी वही रही। आज का विरोध सवाल खड़े करता है कि क्या 1979 की ‘इस्लामी क्रांति’ ने सच में लोगों को आजादी दी या बस एक तानाशाही से दूसरी तानाशाही तक का सफर तय हुआ।

यही वजह है कि ईरान का आज और उसका इतिहास एक-दूसरे से अगल नहीं हैं। 1979 में जो सवाल उठे थे, वही सवाल आज भी जिंदा हैं और शायद यही इस कहानी का सबसे कड़वा सच है।

उपजाऊ जमीन, पुश्तैनी घर और कुलदेवी का स्थान: हिमाचल सरकार की टाउनशिप के खिलाफ सड़कों पर ग्रामीण, जानें- क्या है ₹50000 करोड़ के ‘हिम चंडीगढ़’ प्रोजेक्ट का पूरा विवाद

हिमाचल प्रदेश की सरकार जठिया देवी सैटेलाइट टाउनशिप को विकसित करने के लिए 8 गाँवों की 249 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण कार्य शुरू करने जा रही है।

दरअसल शिमला शहर से करीब 14 km दूर चंडीगढ़ के नाम से जुड़ा ‘हिम चंडीगढ’ शहर बसाने की तैयारी है। कॉन्ग्रेस सरकार ने इसे मंजूरी दे दी है, लेकिन ग्रामीण पूरे प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं। इनका कहना है कि कृषि और फ्लोरीकल्चर के लिए ये इलाका काफी मशहूर है। ग्रामीणों की आजीविका इससे जुड़ी है। पहले बंजर जमीनों को लिया गया था लेकिन अब गाँवों को हटाने की तैयारी है। इसको लेकर ग्रामीणों ने जिला प्रशासन के सामने अपनी शिकायत दर्ज करा चुके हैं।

प्रस्तावित सैटेलाइट टाउनशिप के लिए केन्द्र को औपचारिक मंजूरी के लिए भेजा गया है लेकिन अभी इसकी मंजूरी नहीं मिली है। इसके बावजूद राज्य सरकार लैंड पूलिंग मॉडल के तहत काम कर रही है।

2014 में प्रोजेक्ट की प्लानिंग हुई

हिमाचल प्रदेश हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (HIMUDA) ने जाठिया देवी क्षेत्र में एक रिहायशी प्रोजेक्ट शुरू करने जा रही है। शिमला पर पड़ रहे जनसंख्या के भारी दबाव को देखते हुए इस प्रोजेक्ट को 2014 में राज्य सरकार ने शुरू करने की योजना बनाई थी। अब इसे लेकर काम तेजी से आगे बढ़ रहा है। जाठिया देवी पंचायत समेत पूरे इलाके में नोटिस चिपकाए गए हैं। इसमें लोगों से उनकी आपत्तियाँ और सुझाव माँगे गए हैं।

जाठिया देवी टाउनशिप प्रोजेक्ट क्या है

जाठिया देवी शिमला से 14 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत बागी में आने वाली जगह है। इसका नाम इलाके में एक पुराने जाठिया देवी मंदिर के नाम पर पड़ा है। प्रस्तावित टाउनशिप को शिमला पर दबाव कम करने, नए इकोनॉमिक हब बनाने और टिकाऊ, आपदा-रोधी शहरी विकास को बढ़ावा देने के लिए एक योजनाबद्ध सैटेलाइट माउंटेन टाउनशिप के तौर पर विकसित किए जाने का प्लान है।

स्टेट हाईवे 16 और नेशनल हाईवे 5 के पास मौजूद जाठिया देवी टाउनशिप बनेगा। यह जुब्बरहट्टी में शिमला एयरपोर्ट से 3–4 km और ISBT शिमला से करीब 22 km दूर है। यह इलाका समुद्र तल से 1,300 से 1,500 मीटर ऊपर है। यहाँ पहाड़ियाँ, घाटियाँ और छोटी-छोटी नदियाँ मौजूद हैं।

नवंबर 2025 में टाउनशिप से जुड़ी SIA रिपोर्ट सामने आई। इसके मुताबिक, टाउनशिप करीब 249 हेक्टेयर में फैला होगा, जिसमें से 35 हेक्टेयर सरकारी ज़मीन होगी। प्रस्तावित ज़मीन के इस्तेमाल में रेजिडेंशियल ज़ोन (55.16 हेक्टेयर) शामिल हैं। हाई इनकम ग्रुप (HIG), मीडियम इनकम ग्रुप (MIG), लो इनकम ग्रुप (LIG), और आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके (EWS) के लिए अलग अलग घर होगा।

कमर्शियल एरिया 13.36 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला होगा, जबकि नॉन-पॉल्यूशनिंग इंडस्ट्रियल ज़ोन 15.7 हेक्टेयर क्षेत्र में होगा। 16.42 हेक्टेयर भूमि पर ग्रीन जोन होगा। रिवर डेवलपमेंट एरिया 16.56 हेक्टेयर क्षेत्र में होगा। चौड़ी सड़कें 13.78 हेक्टेयर में होगी। यूटिलिटी सर्विस, स्मार्ट ट्रांसपोर्ट सिस्टम, हेलीपैड कनेक्टिविटी, और इको-सेंसिटिव प्लानिंग एरिया टाउनशिप की खासियत होगी। इस पूरे प्रोजेक्ट पर 50 हजार करोड़ रुपए खर्च आएँगे।

टाउनशिप के फेज 1 में HIG, MIG, LIG, और EWS कैटेगरी में 895 रेजिडेंशियल यूनिट्स का प्रस्ताव है। 84.22 हेक्टेयर में कमर्शियल और इंडस्ट्रियल हिस्से भी होंगे, जबकि ग्रीन और रिवर डेवलपमेंट जोन में और 33 हेक्टेयर जमीन होगी।

ग्रामीण कर रहे हैं विरोध

इस प्रोजेक्ट का कई गाँवों ने विरोध करना शुरू कर दिया है। 10 जनवरी 2026 को बागी ग्राम पंचायत ने अपने यहाँ के गाँवों के विस्थापन का विरोध करते हुए कहा है कि टाउनशिप बनाने के लिए वह अपना गाँव नहीं उजाड़ने देंगे। इस पंचायत में 11 में से 8 गाँव आते हैं, जिसका अधिग्रहण किया जाना है। ग्रामीणों ने एकमत होकर प्रस्ताव पास किया कि वे अपनी जमीन का अधिग्रहण नहीं होने देंगे।

SIA रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्राम पंचायत बागी के अंदर आने वाले 8 गाँवों के लगभग 249 हेक्टेयर (लगभग 2,959 बीघा) जमीन है, जिसे अधिग्रहण के लिए चुना गया है। ये गाँव हैं- चानन (568 बीघा), पन्टी (109 बीघा), आंजी (396 बीघा), शिल्ली बागी (699 बीघा), मझोला (78 बीघा), शिलरू (214 बीघा), धनोकरी (270 बीघा), और क्यारागी (303 बीघा)।

ये सभी गाँव ग्रामीण शिमला में आते हैं। इसके अलावा पड़ोसी सोलन जिले की ममलिग तहसील में मंजियारी गाँव (लगभग 441 बीघा) की भी पहचान की गई है। SIA रिपोर्ट के मुताबिक, 386 परिवार सीधे तौर पर इससे प्रभावित होंगे। साथ ही 158 परिवारों की सीधे रोजी-रोटी पर असर पड़ सकता है।

ग्रामीणों को विस्थापन का डर

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस अधिग्रहण से उपजाऊ खेती की जमीन, पुश्तैनी घरों और कुलदेवी-देवताओं के स्थान समेत सदियों पुरानी सामाजिक और धार्मिक इमारतों को हटाया जा सकता है।

ये केवल जमीन का मामला नहीं है, बल्कि पुर्वजों की इस निशानी से भावनाएँ जुड़ी हुई हैं। पुश्तैनी जमीन और अपने कुल देवताओं के मंदिर को छोड़ना इतना आसान नहीं है। आखिर बाहरी लोगों को बसाने के लिए उन्हें क्यों उजाड़ा जा रहा है?

29 दिसंबर 2025 की सुनवाई में प्रोजेक्ट का विरोध करने वाले नीरज ठाकुर ने कहा, “हमें बताया गया है कि खेती की जमीन और घरों समेत पूरे गाँव के लिए जाएँगे। सरकार पीढ़ियों से यहाँ रह रहे लोगों को हटाकर नए लोगों के लिए घर बनाना चाहती है।”

खेती ही आजीविका का एकमात्र साधन है- ग्रामीणों का कहना है कि वे बड़े किसान नहीं है। लेकिन खेती ही उनका जीवन जीने का साधन है। जब बंजर पहाड़ियाँ ली थी तो किसी ने विरोध नहीं किया, लेकिन अब गाँव माँग रहे हैं। आखिर गाँव से बेदखल करने के बाद ग्रामीण कैसे अपना पेट पालेंगे।

ग्रामीणों ने एक मत होकर प्रोजेक्ट का विरोध किया है। ग्राम पंचायत बागी के प्रधान नरेश कुमार ठाकुर ने कहा, “हालाँकि प्रस्ताव पास करने के लिए 418 घरों में से 120 घरों के समर्थन की जरूरत थी, लेकिन प्रस्ताव पर हर परिवार के 280 लोगों ने साइन किए।”

ग्रामीणों का कहना है कि बहुत पहले हिमुडा ने पहाड़ी टाउनशिप के लिए 250 बीघा से ज्यादा जमीन का अधिग्रहण किया था। अब तक अधिग्रहित जमीन पर एक भी ईंट नहीं रखी गई है। वह जमीन बंजर थी। लेकिन इस बार लोगों के घरों के साथ-साथ खेती-बाड़ी की जमीन भी लेने की बात है।

कम मुआवजे और पुनर्वास पर सवाल

ग्रामीणों का कहना है कि बिना सहमति और समाधान के उन्हें भूमि का अधिग्रहण स्वीकार नहीं होगा। ग्रामीण सोशल इंपेक्ट सर्वे टीम गो बैक के नारे लगाए थे।

लोगों से जमीन अधिग्रहण, पुनर्वास और फिर से बसाने के अधिकार एक्ट, 2013 के सेक्शन 5 और नियम 8 के तहत जारी किए गए नोटिस में अधिग्रहण पर राय माँगी गई है। HIMUDA और रेवेन्यू अधिकारियों के मुताबिक, मुआवजा इलाके में जमीन की मौजूदा कीमतों और कलेक्टर रेट के आधार पर दिया जाना है।

हालाँकि गाँववालों ने मुआवजे के तौर पर क्या दिया जाएगा, इस पर विचार किए बिना अधिग्रहण का बॉयकॉट करने का फैसला किया है। इनका कहना ​​है कि गाँवों की जमीनें जॉइंट प्रॉपर्टी हैं। इसलिए प्रॉपर्टी के मालिकों को मुआवजे के तौर पर ज्यादा पैसे नहीं मिलेंगे।

गाँववालों में से एक, 84 साल के हीरा सिंह ठाकुर ने कहा, “मेरे और मेरे भाइयों के पास कुल मिलाकर 12 बीघा जमीन है। बेटों और पोतों में बंटवारे के बाद, हर एक को कितना मिलेगा? खेती हमारी रोजी-रोटी है। आगे बढ़ने से पहले सरकार को मुआवजे के बारे में SIA रिपोर्ट में साफ करना चाहिए।”

दरअसल SIA के चैप्टर 3 में माना गया है कि जमीन अधिग्रहण से लोगों को हटाया जा सकता है। हटाए जाने वाली इमारतों में, सात मंदिर, पाँच स्कूल, करीब दो दर्जन दुकानें, नहरें, दूसरे एक्टिविटी से जुड़े संस्थान और घर शामिल हैं।

हालाँकि हिमुडा के CEO और सेक्रेटरी सुरेंद्र कुमार वशिष्ठ ने ग्रामीणों के डर को दूर करने की कोशिश करते हुए कहा है कि कोई भी जमीन जबरदस्ती नहीं ली जाएगी। उन्होंने कहा, “हम लोकल लोगों की मर्जी के खिलाफ कोई जमीन नहीं लेंगे। 29 दिसंबर की सुनवाई एक लंबे प्रोसेस का सिर्फ पहला कदम था। हमारे पास पहले से ही करीब 262 बीघा जमीन है, और हम इसे बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन लोगों को हटाकर नहीं।”

उन्होंने आगे कहा कि रिहायशी घरों को अधिग्रहण से बाहर रखा जाएगा और किचन गार्डनिंग और रोजी-रोटी की सुरक्षा के लिए प्रोविजन मौजूद हैं। सुरेन्द्र कुमार वशिष्ठ ने कहा, “एक बीच का रास्ता निकाला जा रहा है ताकि उपजाऊ जमीन और घरों को बाहर रखा जा सके।” उन्होंने यह भी दावा किया कि 8 गाँवों की जमीन बहुत उपजाऊ नहीं है।

प्रोजेक्ट की जरूरत क्यों पड़ी

शिमला में जबरदस्त भीड़भाड़ है। राजधानी होने की वजह से सरकारी ऑफिस और व्यावसायिक गतिविधियाँ भी काफी हैं। यातायात और जनसंख्या का भारी दबाव के चलते शहर से कुछ दूर रिहायशी इलाके बसाने की प्लानिंग हुई। इसे पिछली बीजेपी सरकार ने भी आगे बढ़ाया।

SIA रिपोर्ट में प्रोजेक्ट के फायदे गिनाए जा रहे हैं। इसमें दावा किया गया है कि टाउनशिप से रोजगार के मौके और इकोनॉमिक मोबिलिटी पैदा होगी, शिक्षा, हेल्थकेयर और मार्केट तक पहुँच बेहतर होगी, ग्रामीण इलाकों को बड़े इकोनॉमिक कॉरिडोर से जोड़ा जाएगा, सामाजिक सुधार, स्किल डेवलपमेंट और लोकल एंटरप्रेन्योरशिप को बढ़ावा मिलेगा और पर्यावरण के अनुकूल, कम इंधन खर्च वाहनों को प्रोत्साहन के साथ सबको साथ लेकर चलने वाली मनोरंजन की जगहों का विकास किया जाएगा।

बाजार को बूस्ट किया जाएगा। होटल और मॉल बनेंगे। इससे नौकरियाँ सृजित होगी। काम और लिविंग का हब होगा।

पिछले एक दशक से जाठिया देवी टाउनशिप का काम ठप पड़ा है। अब फेज़ I का काम शुरू किया जा रहा है। लेकिन जब तक ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। इस प्रोजेक्ट पर सवाल उठते रहेंगे। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अधिकारी स्थानीय विरोध, मुआवजे की चिंताओं और पर्यावरण सुरक्षा उपायों को कैसे सुलझाते हैं।

भारत भवन के घड़े में BLF के बखेड़े

पहले से विवादों में रहे भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल ने इस बार खुद को बचाने के लिए एक लेखक और उनकी किताब को ढाल बनाने की कोशिश की। मगर इस बार भी भारत भवन को बेवजह विवादों में घसीट ही दिया। क्या आठ साल बाद अब BLF का भारत भवन पर एकाधिकार खत्म होगा?

मैं पिछले दिनों कोलकाता-दिल्ली में था। भारत भवन का न्यासी होने के नाते अनेक मित्रों ने दिल्ली में रूबरू और फोन पर एक ही तरह के सवाल किए- “आपके भारत भवन में यह क्या चलता रहता है?” लौटकर मीडिया और सोशल मीडिया पर वही दुखी करने वाले एक जैसे विवाद बिखरे हुए देखे, जो बीते वर्षों में होते रहे।

दो कारणों से मेरा सरोकार केवल भारत भवन से है। पहला, मैं यहाँ का न्यासी हूँ और दूसरा, पिछले तीस सालों में अपने पत्रकारीय जीवन के आरंभ से देश के इस प्रतिष्ठित बहुकला केंद्र से एक श्रोता-दर्शक के रूप में जुड़ा ही रहा हूँ।

भारत भवन में होने वाले BLF का विवादों और सवालों से चोली-दामन का साथ उसी दिन से है, जब से भारत भवन के दरवाजे इनके लिए खोले गए। दो साल पहले भी ऐसे ही किसी विषय पर बवाल हो चुका है। तब तत्कालीन संस्कृति मंत्री ने काफी सख्त रुख दिखाया था। मध्य प्रदेश की साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय संस्थाओं के यह सवाल ध्यान देने योग्य हैं कि जब किसी और निजी संस्था को भारत भवन उपलब्ध नहीं है तो BLF को क्यों वंदनवार सजते हैं और वह भी ‘अज्ञात कारणों’ से हर साल मोटी सरकारी आर्थिक मदद सहित।

2021 में शासन की ओर से मुझे न्यास मंडल में सम्मिलित किया गया। साल-डेढ़ साल में होने वाली दो-तीन औपचारिक बैठकों में मैं उपस्थित भी रहा। आखिरी बार 2024 में कभी बैठक हुई थी। मुझे नहीं पता था कि न्यास अभी कार्यशील है या उसका कार्यकाल पूरा हो गया है। ताजा विवाद पर जब मीडिया के मित्रों ने प्रश्न किए तो मैंने सबसे पहले भारत भवन के प्रशासनिक अधिकारी प्रेमशंकर शुक्ला से इसकी जानकारी ली। मुझे बताया गया कि न्यास का अस्तित्व अभी है। कहा गया, “जब तक आपको सूचना न मिले कि आप नहीं हैं, तब तक मानकर चलें कि आप हैं।’

जब न्यास का पुनर्गठन हुआ तो ऐसी अनेक संस्थाओं ने हमसे संपर्क किया और चाहा कि या तो सभी संस्थाओं को यह महत्वपूर्ण कला केंद्र उपलब्ध होना चाहिए या एक ही नीति पर सबके साथ अमल होना चाहिए। यह पक्षपात क्यों? BLF के आयोजन में भारत भवन के कौन से या किसके हित जुड़े हैं जबकि इतने वर्षों में भी भोपाल के लेखक, दर्शक और श्रोताओं से उसका कोई तारतम्य तक नहीं बन पाया है और लिटरेचर फेस्टिवलों में उमड़ने वाली भीड़ आश्चर्यजनक रूप से यहाँ गायब रही है।

मुझे याद है कि न्यास मंडल की आरंभिक बैठकों में प्रसिद्ध रंगकर्मी राजीव वर्मा ने यह विषय बहुत प्रमुखता से उठाया था कि भारत भवन में बाहरी आयोजनों को लेकर हमारी नीति ‘एक और स्पष्ट’ होनी चाहिए। भारत भवन या तो सभी को उपलब्ध कराएँ या किसी को भी नहीं। बाकी न्यासियों को भी पहली ही बार पता चला था कि भोपाल की किसी एक संस्था के लिए भारत भवन में स्वागत द्वार सजते हैं और बाकियों के लिए ‘नो एंट्री’ का साइनबोर्ड है। स्वाभाविक रूप से सभी सहमत थे कि यह अनुचित है।

संभव है कि जनता से जुड़ाव न होने के कारण ही जानबूझकर ऐसे विषय और सत्र रखे जाते हों, जिनसे अनावश्यक भ्रम पैदा हो और विवाद खड़े हों। भीड़ जुटाने के लिए आयोजकों की ओर से प्रचार की यह एक सुनियोजित नीति के तहत किया जाता हो। मैं प्रसंगवश इंदौर लिटरेचर फेस्टिवल (ILF) को याद करना चाहूँगा। 11 साल से इंदौर में वह लोकप्रिय आयोजन के रूप में प्रतिष्ठित हुआ है, जहाँ इंदौर से बाहर के अनेक साहित्य और संस्कृतिप्रेमी केवल श्रोता के रूप में तीन दिन आकर शामिल होते हैं। हर सत्र में विषय से जुड़े श्रोताओं का एक समर्पित वर्ग इस आयोजन ने बना लिया है। बीते वर्षों में तारेक फतह और तसलीमा नसरीन जैसे चर्चित लेखक भी अनेक बार शामिल हुए हैं और कभी किसी विषय या पुस्तक को लेकर विवाद की एक लकीर नहीं देखी गई। तब लगता है कि BLF भारत भवन के लिए एक अपशगुन क्यों बना?

जो भी हो, यह स्पष्ट है कि भारत भवन को साधन संपन्न सरकारी प्रायोजक संस्थाओं से लैस शक्तिशाली BLF के आयोजकों ने विवादों का एक मैदान बना दिया गया है। इससे प्रचार या दुष्प्रचार BLF को जो भी मिला हो मगर भारत भवन की साख अनावश्यक ही चौपट हुई। एक न्यासी के रूप में मेरी चिंता केवल भारत भवन को लेकर है, जो हमारी पीढ़ी को विरासत में मिला है। वह हमने बनाया नहीं है। अगर हम उसको बहुकलाओं का एक निरंतर सक्रिय और जनता से जुड़ा हुआ केंद्र नहीं बना सकते तो कम से कम उसकी छवि को धूमिल करने वाले ऐसे विवादों के अवसर तो पैदा न करें। समय रहते संभलें। नीतियों और निर्णयों पर पुनर्विचार करें। यह जाँच का भी विषय है कि लगातार इतनी बदनामियों के बावजूद BLF को ढोने में दिलचस्पी किसकी है?

मेरा विनम्र सुझाव है कि हर साल पैदा होने वाले ऐसे कटुतापूर्ण प्रसंग का अब पटाक्षेप हो जाना चाहिए। शासन को निर्णय करना चाहिए कि अगले वर्ष से BLF के लिए भारत भवन उपलब्ध नहीं है। लाखों की मदद उन्हें शासन देता ही है। वे चाहें किसी भी बड़े होटल या रिसॉर्ट या धर्मशाला में यह आयोजन कर सकते हैं। भोपाल में जम्बूरी मैदान से लेकर लाल परेड ग्राउंड तक असीमित स्थान हैं। समाज में नेरेटिव बनाने के लिए जैसे भी विषय उन्हें चुनने हों, वे स्वतंत्र हैं, अभिव्यक्ति की अपार स्वतंत्रता अबाधित है और वे धन-साधन संपन्न तो हैं ही। किंतु भारत भवन को बचाना जरूरी है। यह भारत भवन के सभी पाँच प्रभागों को रिस्ट्रक्चर करने का बिल्कुल सही समय है।

मध्य प्रदेश भारत का ह्दय प्रदेश है। यहाँ भारत केंद्रित और स्थानीय प्रासंगिक विषयों की क्या कमी है? मध्य प्रदेश की सामाजिक, सांस्कृतिक विरासत, राजा भोज, विक्रमादित्य, रानी कमलापति, भीम बैठका और हाल ही में देश भर की चर्चा में आए विदिशा के ऐतिहासिक उदयपुर जैसे विषय अनेक हैं, जिन पर विमर्श किया जा सकता था। इनकी जगह पर बाबर जैसे आक्रांता की चर्चा भोपाल में समझ के परे है जबकि अयोध्या आस्था और विकास के मार्ग पर उजाले से भर रही है। नई शिक्षा नीति में इतिहास के पाठ्यक्रमों से भी बाबर-औरंगजेब समेटे जा रहे हैं। तब हम क्यों इतिहास के इन प्रेतों को अपने विमर्श में जिंदा रखना चाहते हैं? यह समय रामायण से राष्ट्रीय पुनर्जागरण तक भारत की अपनी महान गाथाएँ कहने का है। स्वयं प्रधानमंत्री बार-बार यही दोहरा रहे हैं।

मुझे लगता है, ऐसे संवेदनशील और ऊर्जा से भरे अनुकूल समय में बाबर जैसे आक्रमणकारी को विमर्श–केंद्र में लाना न केवल मूर्खतापूर्ण है, बल्कि भारत की आत्मा के वर्तमान प्रवाह के बिल्कुल विपरीत भी। कम से कम शासन के प्रांगण में शासन की सहायता से होने वाले वैचारिक अनुष्ठान को इनसे बचा जाना ही उचित था मगर अत्यंत दुख की बात है कि एक कर्कश विवाद एक बार फिर भारत भवन से जुड़ गया। BLF ने एक लेखक और उसकी किताब को अपनी ढाल बनाकर यह खेल भारत भवन के पवित्र परिसर से किया। यह असहनीय है।

मैं स्वयं लेखक हूँ और भारत में इस्लाम के फैलाव पर दो किताबें मेरी हैं। मैं स्पष्ट करना चाहूँगा कि किसी किताब या किसी लेखक से न्यास का कोई विरोध नहीं है। किंतु मध्य प्रदेश की साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय संस्थाओं को यह संदेश बिल्कुल नहीं जाना चाहिए कि भारत भवन में किसी भी संस्था विशेष या आयोजन विशेष के पक्ष में निर्णय लेने की अलग और मनमानी नीति है। आठ साल से यह एक परंपरा ही बन गई है। BLF की ओर से प्रस्तुत ताजा कटु प्रसंग यह बता रहा है कि घड़ा भर चुका है।

शक्सगाम घाटी पर नहीं है पाकिस्तान-चीन का अधिकार, 1963 में हुआ समझौता एकदम बकवास: पढ़िए कैसे ये हिमालयी क्षेत्र है सिर्फ भारत का हिस्सा

चीन ने एक बार फिर भारत को उकसाने की कोशिश की है। उसने भारतीय इलाके शक्सगाम घाटी पर अपना दावा किया है। 5180 वर्ग किमी का ये क्षेत्र पीओके में पड़ता है, जो भारत का अभिन्न अंग है। इस पर पाकिस्तान ने 1948 में कब्जा किया था और 1963 में चीन को सौंप दिया।

चीन की प्रवक्ता ने बताया ‘अपना क्षेत्र’

चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने जम्मू-कश्मीर में शक्सगाम घाटी पर भारत के दावे को खारिज करते हुए कहा है कि ये चीन का इलाका है इसलिए ‘अपने’ इलाके में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना पूरी तरह से सही है।

चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि जिस इलाके को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वह चीन का ही हिस्सा है। अपने इलाके में इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाना चीन का अधिकार है और इस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता।

माओ निंग ने आगे कहा कि चीन और पाकिस्तान ने 1963 में भारत के विरोध के बावजूद पीओके के क्षेत्र को लेकर समझौता किया था। इस दौरान दोनों देशों ने सीमा तय की थी। चीन इस क्षेत्र से सीपीईसी के तहत आर्थिक गलियारा बनाना चाहता है। हालाँकि चीन ने साफ कहा है कि चीन पाक सीमा समझौते और सीपीईसी का कश्मीर मुद्दे से कोई लेना देना नहीं है। इस पर चीन का रुख पहले जैसा ही है।

कश्मीर को चीन इतिहास से जुड़ा जटिल मुद्दा मानता है और भारत-पाकिस्तान के आपसी बातचीत से सुलझाने का हिमायती है। हालाँकि चीन यह भी कहता है कि वह संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों और अंतरराष्ट्रीय समझौतों का सम्मान करता है।

चीन- पाकिस्तान सीमा समझौते का भारत ने किया विरोध

शक्सगाम घाटी भारतीय इलाका है। भारत ने 1963 में साइन किए गए तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी। भारत ने लगातार इस समझौते को गैर-कानूनी और अमान्य करार दिया है। भारत चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर को भी मान्यता नहीं देता है, क्योंकि ये आर्थिक गलियारा उस भारतीय इलाके से होकर गुजरता है, जिस पर पाकिस्तान ने जबरदस्ती और गैर-कानूनी तरीके से कब्जा किया हुआ है। इसमें कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे इलाके भी शामिल हैं।

भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 9 जनवरी 2026 को कहा है कि CPEC के तहत चीन PoK की शक्सगाम घाटी में इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहा है जो पूरी तरह गलत है। उन्होंने कहा, ” हम चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को मान्यता नहीं देते, क्योंकि यह भारत के उस इलाके से होकर गुजरता है, जो पाकिस्तान के जबरन और अवैध कब्जे में है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा हैं। यह बात पाकिस्तान और चीन दोनों को कई बार साफ-साफ बताई जा चुकी है।”

रणधीर जायसवाल ने कहा कि शक्सगाम घाटी भारत का हिस्सा है और भारत 1963 में हुए तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी है और समझौते को हमेशा अवैध माना है।

1962 में चीन से भारत की जंग के बाद पाकिस्तान और चीन में ‘दोस्ती’ हो गई। चीन और पाकिस्तान में सीमा का निर्धारण किया। इसमें भारतीय क्षेत्र, जो पाकिस्तान के कब्जे में था, उसे भी बाँटा गया। पाकिस्तान ने 1948 में कब्जाए शक्सगाम घाटी के 5180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चीन को दे दिया।

समझौते के तहत घाटियों, नदियों आदि को सीमा के निर्धारण का आधार बनाया गया। हालाँकि भारत ने इसका पुरजोर विरोध किया। इस तरह से शक्सगाम घाटी जैसे भारतीय क्षेत्र चीन के कब्जे में आ गए।

CPEC का भारत करता रहा है विरोध

चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा चीन के शिंजियांग प्रांत से पाकिस्तान के बलूचिस्तान स्थित ग्वादर बंदरगाह तक बनाया जा रहा आर्थिक गलियारा है। इस पर करीब 5 लाख करोड़ रुपए चीन खर्च कर रहा है। इसका मकसद चीन की पहुँच को अरब सागर तक पहुँचाना है।

CPEC के तहत चीन सड़क, बंदरगाह, रेलवे और ऊर्जा प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है। ये आर्थिक गलियारा पीओके के गिलगिट-बाल्टिस्तान से होकर गुजरता है। ये क्षेत्र भारत का है, जिस पर पाकिस्तान ने कब्जा कर रखा है।

ये प्रोजेक्ट भारत को घेरने की कोशिश भी है। चीन की विस्तारवादी नीति जगजाहिर है। भारत के अक्साई चिन पर चीन ने कब्जा कर रखा है। पीओके के कुछ क्षेत्रों को पाकिस्तान ने अवैध तरीके से चीन को दे दिया है। अरुणाचल के कुछ हिस्सों पर चीन ने कब्जा कर रखा है। ऐसे में अरब सागर तक चीन की जबरदस्ती पहुँच से भारत के गुजरात जैसे राज्यों के लिए नई मुसीबत पैदा होगी।

वहीं चीन को नए कॉरिडोर से क्रूड ऑयल ले जाना आसान होगा क्योंकि अभी चीन की 80 फीसदी क्रूड ऑयल मलक्का की खाड़ी से होते हुए चीन तक पहुँचता है, जिससे उस पर खर्च काफी आता है। ये रास्ता 16 हजार किलोमीटर का है।

अगर कॉरिडोर से चीन का व्यापार हुआ तो दूरी 5 हजार किलोमीटर कम हो जाएगी। चीन मालदीप, श्रीलंका, बांग्लादेश समेत तमाम हिंद महासागर के देशों से अपनी दोस्ती बढ़ा रहा है। इस रास्ते से इन तक पहुँचने की दूरी भी कम हो जाएगी। दूसरी ओर चीनी नौसेना अरब सागर से लेकर हिंद महासागर पर नजर रखेगी। उत्तर में तिब्बत पर कब्जा कर चीन वैसे ही भारतीय सीमा पर खड़ा है।

कई सालों से शक्सगाम घाटी में इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहा चीन

अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन ने शक्सगाम घाटी में 10 मीटर चौड़ी सड़क का लगभग 75 किलोमीटर हिस्सा पहले ही बना लिया है, जबकि आगे भी कंस्ट्रक्शन जारी है। इससे पहले, चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने सड़क का 36 किलोमीटर हिस्सा बनाया था। इस सड़क के लगातार कंस्ट्रक्शन से चीन भारत के सियाचिन के करीब पहुँच रहा है।

सैटेलाइट इमेज से पता चलता है कि यह सड़क शक्सगाम घाटी के बाहर दो चीनी मिलिट्री पोस्ट से जुड़ी है। इनमें से एक इस इलाके में काम कर रही PLA यूनिट का हेडक्वार्टर हो सकता है। यह सड़क इसलिए अहम है क्योंकि यह ट्रांस-काराकोरम इलाके में है, जो ऐतिहासिक रूप से कश्मीर का हिस्सा है। PoK और शक्सगाम घाटी समेत पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा है, जिसे पाकिस्तान ने गैर-कानूनी तरीके से चीन को दे दिया था।

POK के गिलगित-बाल्टिस्तान में अवैध तरीके से 2021 में एक सड़क बनाने का प्लान किया गया था जो मुज़फ़्फ़राबाद को मुस्तग दर्रे से जोड़ती। मुस्तग दर्रा पाकिस्तान बॉर्डर पर शक्सगाम घाटी से लगता है। बताया गया था कि यह सड़क शिनजियांग में यारकंद से जुड़ेगी, जिसका मतलब है कि यह सड़क शक्सगाम घाटी से होकर चीन के नेशनल हाईवे G219 से जुड़ेगी।

हालाँकि यह सड़क पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में यूरेनियम जैसे मिनरल्स के परिवहन के लिए बनाई गई है, लेकिन भारत के खिलाफ जंग में चीन और पाकिस्तान इस सड़क का इस्तेमाल मिलिट्री ऑपरेशन के लिए कर सकते हैं।

खास बात यह है कि जिस सड़क की बात हो रही है, वह अघिल दर्रे में है। यह दर्रा पहले से तिब्बत के साथ कश्मीर का बॉर्डर रहा है। 1960 में भारत-चीन बॉर्डर पर बातचीत के दौरान चीनी पक्ष से कहा कि भारत सरकार के आधिकारिक मैप में ये इलाका भारत में दिखाते हैं। इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया के 1907 एडिशन मैप और सर्वे ऑफ इंडिया के पब्लिश किए गए पॉलिटिकल मैप मे भी ये भारत का हिस्सा है।”

पाकिस्तान ने चीन को वह इलाका दिया, जो कभी उसका था ही नहीं

शक्सगाम घाटी काराकोरम पहाड़ों की रेंज में एक ऊँचाई वाला इलाका है, जो करीब 5,180 किलोमीटर तक फैला है। यह घाटी सियाचिन ग्लेशियर के उत्तर में है। खास दर्रों के पास होने और PoK में चीन के शिनजियांग के साथ इसके कनेक्शन को देखते हुए इसका सामरिक महत्व बहुत है। हालाँकि 1963 के चीन-पाकिस्तान का अवैध समझौता इसके जड़ में है, हालाँकि ये विवाद 1947 से ही चला आ रहा है।

1947 में इस्लामिक तरीके से भारत के बंटवारे से पहले, शक्सगाम घाटी जम्मू और कश्मीर रियासत का हिस्सा थी। इस सियासत के राजा हरि सिंह थे। यह इलाका हुंजा के लोकल सरदार मीर के राज में आता था। हुंजा ने हिंदू महाराजा के अधिकार को माना। इतिहास गवाह है कि शक्सगाम घाटी और रस्कम घाटी जम्मू और कश्मीर की सीमाओं में शामिल थी। 19वीं सदी के आखिर और 20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश सर्वे ने भी इसे माना था। हालाँकि चीन ने किंग राजवंश के नाम पर ऐतिहासिक संबंधों के आधार पर इस पर दावे किए, लेकिन उन्हें औपचारिक रूप नहीं दिया गया।

भारत के बंटवारे और 1947 में पाकिस्तान के बनने के बाद, पाकिस्तान के सपोर्ट वाले कबायली हमलावरों ने जम्मू और कश्मीर पर हमला किया, जिससे पहला भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हो गया। युद्ध के बीच, महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन यानी विलय पत्र पर साइन किए, जिससे शक्सगाम घाटी सहित पूरा जम्मू और कश्मीर औपचारिक रूप से भारत का हिस्सा बन गया।

लेकिन, लड़ाई के दौरान पाकिस्तान ने उत्तरी कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया, जिसमें शक्सगाम घाटी तक जाने वाले इलाके भी शामिल थे, क्योंकि यह कब्जा गैर-कानूनी था, इसलिए शक्सगाम घाटी समेत पूरा इलाका इंटरनेशनल कानून के मुताबिक आज भी भारतीय इलाका है।

यह माना जाता है कि चीन-पाकिस्तान के रिश्ते तभी मजबूत हुए, जब पाकिस्तान और चीन ने गैर-कानूनी CPEC के लिए हाथ मिलाया। लेकिन, पाकिस्तान लंबे समय से चीन को मना रहा है। चीन-पाकिस्तान के रिश्तों में छह दशकों का मिलिट्री सहयोग, आर्थिक और डिप्लोमैटिक तालमेल, 1963 में शक्सगाम घाटी पर समझौता, 1970 के दशक में न्यूक्लियर सहयोग की शुरुआत, 2013 में ग्वादर का ट्रांसफर और CPEC का ऑफिशियल लॉन्च शामिल है।

1962 में चीन-भारत युद्ध के बाद, पाकिस्तान ने चीन के साथ रिश्ते मज़बूत करने का मौका हाथ से जाने नहीं दिया। 2 मार्च 1963 को, चीन और पाकिस्तान ने चीन-पाकिस्तान फ्रंटियर एग्रीमेंट पर साइन किए। इस एग्रीमेंट के तहत पाकिस्तान ने दूसरे इलाकों में ‘सीमा एडजस्ट’ करने के बदले शक्सगाम वैली का कंट्रोल चीन को दे दिया। हालाँकि, यह एग्रीमेंट कंडीशनल था, जिसमें कहा गया था कि दिया गया इलाका कश्मीर मुद्दे पर भविष्य में भारत-पाकिस्तान के बीच होने वाले किसी भी सेटलमेंट में फाइनल रेजोल्यूशन के अधीन होगा।

गैर-कानूनी होने के अलावा यह समझौता बहुत गलत था। चीन शक्सगाम वैली पर कंट्रोल कैसे कर सकता है, इसे अपने शिनजियांग प्रांत में कैसे मिला सकता है, जबकि यह भी दावा कर सकता है कि यह इलाका कश्मीर पर फाइनल रेजोल्यूशन के अधीन होगा? मान लीजिए, अगर भारत और पाकिस्तान कश्मीर पर सहमत हो जाते हैं, और शक्सगाम वैली को भारत को वापस करने का फैसला किया जाता है, तो क्या चीन, वहां इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी इन्वेस्टमेंट करने के बाद, स्ट्रेटेजिक रूप से महत्वपूर्ण वैली को भारत को सौंप देगा?

भारत ने 1963 के चीन-पाकिस्तान एग्रीमेंट को लगातार इस आधार पर खारिज किया है कि पाकिस्तान ने जम्मू और कश्मीर के उन हिस्सों पर गैर-कानूनी कब्जा कर लिया है जिन्हें अब PoK कहा जाता है, और इस तरह उसके पास भारत के इलाके पर बातचीत करने या उसे सौंपने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। क्योंकि विलय के समय शक्सगाम घाटी जम्मू और कश्मीर का हिस्सा थी, इसलिए PoK पर पाकिस्तान का कंट्रोल एक गैर-कानूनी कब्जा है।

पाकिस्तान को चीन के साथ भारतीय इलाके के बारे में द्विपक्षीय समझौता करने का कोई हक नहीं था। यह नहीं भूलना चाहिए कि हुंजा के मीर ने महाराजा हरि सिंह के अधिकार को मान्यता दी थी, और महाराजा ने कानूनी तौर पर और अपनी मर्जी से पूरा जम्मू और कश्मीर भारत को दे दिया था।

PoK सरकार ने 1949 में पाकिस्तान सरकार के साथ कराची एग्रीमेंट किए, जिसमें गिलगित-बाल्टिस्तान के सभी ज़मीनी अधिकार पाकिस्तान को दे दिए गए थे। खबर है कि इस एग्रीमेंट पर मुश्ताक अहमद गुरमानी (कश्मीर मामलों के मंत्री), सरदार मोहम्मद इब्राहिम खान (तथाकथित ‘आजाद कश्मीर’ के प्रेसिडेंट) और चौधरी गुलाम अब्बास ने साइन किए थे।

समझौते में तथाकथित ‘आजाद कश्मीर’ ने गिलगित-बाल्टिस्तान का पूरा एडमिनिस्ट्रेशन पाकिस्तान को सौंप दिया (जिसने इस इलाके का कुछ हिस्सा चीन को दे दिया)। इसी इलाके से पाकिस्तान ने 5000 स्क्वायर किलोमीटर (शक्सगाम घाटी) चीन को सौंप दिया था।

असल में सरदार इब्राहिम ने बाद में बताया कि उनके साइन नकली किए गए थे। दरअसल उनका साइन मुहम्मद दीन तासीर ने किए थे। कराची एग्रीमेंट पर साइन करने के तुरंत बाद इब्राहिम को पद से हटा दिया गया।

चाहे PoK पर कब्जा हो या शक्सगाम घाटी को सौंपना, पाकिस्तान पहले से ही एक गैर-कानूनी कब्जा करने वाला रहा है, जिसके पास पूरे जम्मू-कश्मीर इलाके के बारे में किसी भी देश के साथ कोई भी एग्रीमेंट करने का कोई कानूनी हक नहीं है।

भारत ने शक्सगाम घाटी में जमीनी हकीकत को बदलने की कोशिशों के खिलाफ चीन के सामने लगातार विरोध जताया है। अभी भी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का पुरजोर विरोध कर रहा है और 1963 में शक्सघाटी को चीनी कब्जे में दिए जाने का विरोध किया था। भारत अपने हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने का अधिकार भी रखता है। पड़ोसियों के रवैये पर भारत का स्टैंड हमेशा साफ रहा है।

‘बॉनफायर’ हो जाता है हजम, लोहड़ी की अलाव में दिखता है ‘प्रदूषण’: हिंदू त्योहारों पर ही क्यों मीडिया देता है ज्ञान, विदेशी तौर-तरीके बताए जाते हैं ‘संस्कृति’ की पहचान

भारत में त्यौहार केवल छुट्टियाँ नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक जीवंत माध्यम हैं। मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाया जाने वाला लोहड़ी का पर्व उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब और हरियाणा की आत्मा है। कड़कड़ाती ठंड, ढोल की थाप और अग्नि के चारों ओर नाचते-गाते लोग… यह दृश्य भाईचारे और नई फसल के स्वागत का प्रतीक है।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों से एक अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। जिस तरह दिवाली और होली को ‘प्रदूषण’ और ‘पानी की बर्बादी’ के नाम पर निशाना बनाया गया, अब वही नैरेटिव लोहड़ी के साथ भी जोड़ा जा रहा है। मीडिया और सोशल मीडिया के एक वर्ग के जरिए लोहड़ी की पवित्र अग्नि को ‘वायु प्रदूषण’ का कारण बताकर बदनाम किया, जबकि उसी समय पश्चिमी देशों से आए ‘बॉनफायर’ (Bonfire) को एक आधुनिक और कूल ‘कल्चर’ के रूप में पेश किया। इस दोहरी मानसिकता के पीछे का सच और लोहड़ी के वास्तविक महत्व को समझने का प्रयास करते हैं।

लोहड़ी और बॉनफायर: केवल नाम का अंतर नहीं, बल्कि नीयत और इतिहास का फर्क है

आजकल के दौर में किसी भी त्यौहार पर अपनी राय बनाने या उसे सही-गलत ठहराने से पहले हमें यह समझना चाहिए कि वह त्यौहार शुरू क्यों हुआ था। आज हम ‘लोहड़ी’ और ‘बॉनफायर’ दोनों को एक ही तराजू में तौल देते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इन दोनों के बीच का अंतर सिर्फ भाषा का नहीं है।

इनके पीछे की भावना, इनका इतिहास और इनका मकसद एक-दूसरे से पूरी तरह अलग है। जहाँ एक तरफ लोहड़ी हमारी मिट्टी और किसान की मेहनत से जुड़ी है, वहीं बॉनफायर का इतिहास कुछ ऐसा है जिसके बारे में जानकर आप हैरान रह जाएँगे।

लोहड़ी: क्यों यह किसान की मुस्कान और प्रकृति का धन्यवाद है?

लोहड़ी का नाम सुनते ही हमारे मन में आग की लपटें और उसके चारों ओर नाचते-गाते लोगों की तस्वीर आती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह शब्द कहाँ से आया? जानकारों का मानना है कि लोहड़ी शब्द ‘लोह’ और ‘ड़ी’ के मेल से बना है। यहाँ ‘लोह’ का अर्थ उस लोहे के तवे से है जिस पर रोटियाँ सिंकती हैं और ‘ड़ी’ का संबंध ‘रेवड़ी’ से है। यह त्यौहार उस समय आता है जब उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड अपने चरम पर होती है और किसान की रबी की फसल (जैसे गेहूँ और सरसों) खेतों में लहलहाने लगती है।

किसानों के लिए लोहड़ी का मतलब है ‘आर्थिक आजादी’ और ‘समृद्धि’। महीनों की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद जब फसल कटने को तैयार होती है, तो किसान सबसे पहले अग्नि देवता का आभार व्यक्त करता है। वह अग्नि में तिल, गुड़, गजक और मक्का अर्पित करता है। यह केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि यह कहना है कि ‘हे ईश्वर, आपकी कृपा से हमारे घर में अन्न आया है, इसे स्वीकार करें और आगे भी हमें खुशहाल रखें।’ यह त्यौहार इंसान और प्रकृति के गहरे रिश्ते को दर्शाता है।

लोहड़ी का वैज्ञानिक और सामाजिक आधार

अगर हम वैज्ञानिक नजरिए से देखें, तो लोहड़ी के समय उत्तर भारत (खासकर पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली) में तापमान गिरकर 3 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। इतनी भयानक ठंड में शरीर को ऊष्मा (Heat) की जरूरत होती है। प्राचीन समय से ही, जब बिजली या हीटर नहीं होते थे, तब ‘सामूहिक अग्नि’ ही वह जरिया थी जो लोगों को ठंड से बचाती थी।

सामाजिक रूप से भी इसका बड़ा महत्व है। लोहड़ी के बहाने पूरा मोहल्ला या गाँव एक ही आग के पास बैठता है। इसमें कोई अमीर या गरीब नहीं होता। ऊँच-नीच का भेद मिटाकर लोग साथ बैठते हैं, मूँगफली खाते हैं और दुख-सुख बाँटते हैं। यानी यह आग केवल लकड़ी नहीं जलाती, बल्कि समाज के बीच की कड़वाहट को जलाकर भाईचारे की मिठास पैदा करती है।

बॉनफायर का ‘स्याह’ इतिहास: जिसे हम मजा समझते हैं, उसका सच क्या है?

अब बात करते हैं उस ‘बॉनफायर’ की, जिसे आज की पीढ़ी और मीडिया बहुत ‘कूल’ और ‘मॉडर्न’ मानता है। अक्सर हम देखते हैं कि बड़े होटलों या फार्म हाउसों में ‘बॉनफायर पार्टी’ होती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह शब्द कहाँ से आया? बॉनफायर असल में अंग्रेजी के शब्द ‘Bone-fire’ से बना है, जिसका सीधा मतलब है ‘हड्डियों की आग‘।

प्राचीन और मध्यकालीन यूरोप में इस आग का इतिहास बड़ा डरावना था। उस समय जब बड़े पैमाने पर युद्ध होते थे या ऐसी बीमारियाँ (महामारी) फैलती थीं जिनसे हजारों लोग मर जाते थे, तो लाशों के ढेर लग जाते थे। उन लाशों और उनकी हड्डियों को ठिकाने लगाने के लिए जो विशाल आग जलाई जाती थी, उसे ‘बोन-फायर’ कहा जाता था। इतना ही नहीं, जो लोग धर्म या समाज के खिलाफ कुछ बोलते थे (जिन्हें हैरिटिक्स कहा जाता था) या जिन महिलाओं को ‘चुड़ैल’ करार दिया जाता था, उन्हें भी सजा के तौर पर इन्हीं विशाल आग के ढेरों में जिंदा जला दिया जाता था।

आधुनिक दौर की विडंबना: सजा वाली आग ‘मजा’ बन गई

समय बदला और धीरे-धीरे इस ‘बोन-फायर’ को ‘बॉनफायर’ कहा जाने लगा। फ्रेंच भाषा में ‘Bon’ का मतलब ‘अच्छा’ होता है, तो लोगों ने मान लिया कि यह एक ‘अच्छी आग’ है। आज इसे मनोरंजन, शराब और संगीत के साथ जोड़ दिया गया है। इसमें न तो कोई धार्मिक भावना है, न ही प्रकृति के प्रति कोई सम्मान।

सबसे बड़ी विडंबना देखिए- मीडिया और सोशल मीडिया के ‘ज्ञानियों’ का दोहरा मापदंड यहाँ साफ दिखता है। जिस बॉनफायर का इतिहास ‘मौत, सजा और लाशों की हड्डियों’ से जुड़ा है, उसे आज का मीडिया ‘एंजॉयमेंट’ और ‘हाई-फाई कल्चर’ का हिस्सा बताता है। उसके खिलाफ कभी कोई खबर नहीं छपती कि यह पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहा है।

देसी मीडिया में ‘बॉनफायर’ को ‘कल्चर’ बताने का चलन

लेकिन जिस लोहड़ी का आधार ‘जीवन, नई फसल, किसान की खुशी और प्रकृति का पूजन’ है, उसे तुरंत ‘प्रदूषण’ से जोड़ दिया जाता है। उसे बंद करने या रोकने के लिए हर साल अखबारों में लंबी-चौड़ी रिपोर्ट्स छापी जाती हैं। यह सोचना बेहद जरूरी है कि हमारी अपनी पावन परंपरा को ‘विलेन’ और विदेशी ‘सजा वाली आग’ को ‘हीरो’ बनाकर पेश करने के पीछे आखिर मानसिकता क्या है?

बॉनफायर जैसी चीजों को हाइप देने का कार्य मीडिया में इस तरह किया गया कि आजकल ट्रैवल एजेंसियाँ कहीं अगर छुट्टियों का पैकेज बनाती हैं तो उसमें बॉनफायर नाइट का एक अलग इवेंट की तरह बताया जाता है।

परंपरा के विरुद्ध नैरेटिव: लोहड़ी को बदनाम करने की कोई साजिश

पिछले कुछ सालों में एक अजीब सा चलन देखने को मिला है। जैसे ही कोई हिंदू त्यौहार करीब आता है, अचानक से ‘पर्यावरण प्रेमियों’ की बाढ़ आ जाती है। दिवाली पर पटाखों और होली पर पानी की बर्बादी का नैरेटिव सेट करने के बाद, अब लोहड़ी को निशाना बनाया जा रहा है।

इसे ‘इको-फ्रेंडली’ बनाने के नाम पर असल में त्यौहार की रस्मों को ही खत्म करने का एक सुनियोजित प्रयास किया। मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए लोगों के मन में यह बात बिठाने की कोशिश की जाती है कि आपकी आस्था पर्यावरण की दुश्मन है।

निशाने पर त्यौहार: एक रात की अग्नि बनाम साल भर का प्रदूषण

अखबारों और बड़े न्यूज पोर्टल्स में ऐसी खबरें बड़ी चालाकी से पेश की जाती हैं, जिनसे लगे कि लोहड़ी जलते ही शहर की हवा जहरीली हो गई। वे AQI (हवा की गुणवत्ता मापने वाला पैमाना) के आँकड़े दिखाते हैं। जबकि सच यह है कि दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे शहरों में प्रदूषण का स्तर (PM 2.5 और PM 10) पहले से ही सुरक्षित सीमा से कई गुना ज्यादा होता है।

पूरे साल चलने वाले कारखानों, सड़कों पर दौड़ती करोड़ों गाड़ियों और बड़े-बड़े निर्माण कार्यों से जो धुआँ निकलता है, उस पर चुप्पी साध ली जाती है। लेकिन जैसे ही लोहड़ी की एक रात सांकेतिक अग्नि जलती है, उसे पूरे साल के प्रदूषण का विलेन बनाकर पेश कर दिया जाता है।

मीडिया का दोहरा चरित्र: लोहड़ी ‘धुआँ’ है और बॉनफायर ‘स्टाइल’

मीडिया की दोहरी मानसिकता यहाँ एकदम साफ हो जाती है। जब बात लोहड़ी की आती है, तो हेडलाइंस होती हैं- ‘धुएँ से घुट रहा दम’, ‘पेड़ काटने से पर्यावरण का नुकसान’, या ‘इस बार धुएँ वाली नहीं, स्मॉक-फ्री लोहड़ी मनाएँ’।

लेकिन जैसे ही कोई हाई-प्रोफाइल ‘बॉनफायर नाइट’ होती है, तो वही मीडिया लिखता है- ‘कड़कड़ाती ठंड में बॉनफायर पार्टी का मजा लें’, ‘शहर के वो खास ठिकाने जहाँ आप बॉनफायर का आनंद ले सकते हैं’।

यही काम सोशल मीडिया के ‘इनफ्लुएंसर्स’ भी करते हैं। वे लोहड़ी पर तो ज्ञान देंगे कि लकड़ियाँ नहीं जलानी चाहिए, लेकिन अपनी न्यू ईयर पार्टी या हिल स्टेशन की वेकेशन में बॉनफायर के सामने बैठकर शराब के गिलास के साथ फोटो डालेंगे। वहाँ वह आग ‘लक्जरी’ और ‘स्टेटस सिंबल’ बन जाती है, लेकिन वही आग लोहड़ी के आँगन में जलती है तो ‘पिछड़ापन’ और ‘प्रदूषण’ कहलाने लगती है।

इतिहास के साथ छेड़छाड़: राजाओं की चाटुकारिता या जनता का विद्रोह?

कुछ ‘बुद्धिजीवी’ तो एक कदम और आगे निकल जाते हैं। वे यह भ्रामक बात फैलाते हैं कि लोहड़ी का त्यौहार पुराने समय में राजाओं को खुश करने के लिए शुरू हुआ था। यह सरासर गलत और इतिहास को दबाने की कोशिश है। लोहड़ी का सीधा संबंध दुल्ला भट्टी की बहादुरी से है। मुगल शासन के दौरान दुल्ला भट्टी ने उन गरीब हिंदू लड़कियों को बचाया था जिन्हें गुलामी के बाजार में बेचा जा रहा था।

दुल्ला भट्टी ने उन लड़कियों का पिता बनकर उनका कन्यादान किया और आग जलाकर उनके फेरे करवाए। इसलिए लोहड़ी ‘चाटुकारिता’ का नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ ‘विद्रोह’, ‘न्याय’ और ‘भाईचारे’ का त्यौहार है। इसे केवल एक ‘फैशनेबल कल्चर’ कहना इसकी महानता को कम करना है।

एजेंडे से बड़ी है आस्था

राहत की बात यह है कि अब देश की जनता इन प्रोपेगेंडा फैलाने वालों से ज्यादा समझदार हो गई है। लोग त्यौहार छोड़ नहीं रहे, बल्कि उसे अधिक जिम्मेदारी के साथ मना रहे हैं। चंडीगढ़ और दिल्ली-NCR में बहुत से लोग पेड़ की लकड़ियों की जगह ‘गौकाष्ठ’ (गाय के गोबर से बनी लकड़ी) का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे प्रदूषण भी नहीं होता और हमारी धार्मिक मान्यता के अनुसार अग्नि पूजन और शुद्ध हो जाता है।

इसके अलावा, लोग अब घर-घर छोटी आग जलाने के बजाय पूरे मोहल्ले में एक सामूहिक लोहड़ी जला रहे हैं। इससे लकड़ी भी कम लगती है और आपसी भाईचारा भी बढ़ता है। जनता की यह सजगता उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो पर्यावरण के बहाने हमारी संस्कृति को खत्म करना चाहते थे।

पर्यावरण के नाम पर त्यौहारों को नीचा दिखाना एक ‘फैशन’ बन गया है। आज लोग ओपिनियन के नाम पर यह ज्ञान तो आसानी से दे देते हैं कि दीवाली-होली या लोहड़ी कैसे मनाई जाए, लेकिन वे अपनी जीवनशैली में कोई बदलाव नहीं करते। लोहड़ी के जश्न को रोकने की कोशिश सिर्फ इसलिए की गई ताकि हमारे मन में अपनी ही जड़ों के प्रति अपराध बोध पैदा हो सके।

लेकिन लोहड़ी की आँच को बुझाने वाले यह भूल गए कि इसे मनाने वाले वर्ग (विशेषकर पंजाब और हरियाणा) ने इन्हें कभी मौका ही नहीं दिया। आज जनता तथाकथित ‘एक्टिविस्ट’ से कहीं ज्यादा जागरूक है। लोहड़ी की यह पावन अग्नि हमें याद दिलाती है कि हमारी परंपराएँ प्रकृति का सम्मान करना सिखाती हैं, नुकसान पहुँचाना नहीं। हमें अपनी जड़ों पर गर्व करना चाहिए और ऐसे हर एजेंडे को लोहड़ी की इसी अग्नि में भस्म कर देना चाहिए जो हमें अपनी पहचान से दूर ले जाना चाहता है।

बच्चे अपना जेंडर चुनने पर कर पाएँ विचार इसलिए लड़के-लड़कियों का यौवन रोकने के प्रयास: जानिए क्या है ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’, UK में जिसके ट्रायल के खिलाफ उतरीं हस्तियाँ

यूनाइटेड किंगडम में इस समय बच्चों और युवाओं के जेंडर डिस्फोरिया के इलाज को लेकर बहस चल रही है। जेंडर डिस्फोरिया का मतलब होता है कि कोई बच्चा या युवा अपने जन्म के समय दिए गए जेंडर से खुद को असहज महसूस करता है। ऐसे मामलों में कुछ समय से ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’ नाम की दवाओं का इस्तेमाल किया जाता रहा है जो शरीर में यौवन (प्यूबर्टी) की प्रक्रिया को कुछ समय के लिए रोक देती हैं। 2024 में आई ‘कैस रिव्यू’ नाम की एक सरकारी रिपोर्ट में कहा गया कि इन दवाओं के फायदे और नुकसान को लेकर पुख्ता वैज्ञानिक सबूत नहीं हैं। इसके बाद ब्रिटेन की सरकारी स्वास्थ्य सेवा NHS ने बच्चों पर इन दवाओं के सामान्य इस्तेमाल पर रोक लगा दी।

अब विवाद इसलिए फिर बढ़ गया है क्योंकि जनवरी 2026 से ‘पाथवे’ नाम का एक नया क्लिनिकल ट्रायल शुरू किया जा रहा है, जिसमें इन प्यूबर्टी ब्लॉकर्स को दोबारा बच्चों पर आजमाया जाएगा। Christian Today की रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें 10 से 16 साल की उम्र के लगभग 220 बच्चों को प्यूबर्टी ब्लॉकर्स दिए जाएँगे। इसी के विरोध में एक ऑनलाइन पिटीशन शुरू की गई है, जिस पर अब तक 1 लाख से ज्यादा लोग साइन कर चुके हैं और सरकार से इस ट्रायल को रोकने की माँग कर रहे हैं।

याचिका में की गई है क्या माँग?

8 जनवरी 2025 को संसद की आधिकारिक वेबसाइट पर यह याचिका डाली गई थी। हैरी पॉटर की लेखिका जे.के. रोलिंग जैसी हस्तियों द्वारा समर्थन के बाद इसे भारी समर्थन मिला। जे.के. रोलिंग ने कहा कि उन्होंने इस याचिका पर हस्ताक्षर किए हैं और यह बच्चों पर किया जा रहा एक अनैतिक प्रयोग है।

इस याचिका को डालने वाले थेरेपिस्ट जेम्स ऐस्स ने बताया कि इस याचिका पर एक लाख लोगों का समर्थन जुटाने के लिए 6 महीनों का समय था लेकिन ऐसे 4 दिन में ही हो गया।

इस याचिका में माँग की गई है, “सरकार जानती है कि ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’ से बच्चों के शरीर और मन पर ऐसे असर पड़ सकते हैं जो बाद में पूरी तरह ठीक न हों। ‘कैस रिव्यू’ के बाद खुद सरकार ने माना है कि इनमें जोखिम हैं। इसके बावजूद सरकार की अनुमति से होने वाले एक ट्रायल के तहत सैकड़ों बच्चों को ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’ दिए जाने की तैयारी की जा रही है।”

याचिका में कहा गया है, “इस ट्रायल को रद्द किया जाए। जो बच्चे अपने शरीर को लेकर असहज महसूस करते हैं, जिनमें से कई ऑटिज़्म से भी प्रभावित होते है उनके लिए सही रास्ता समय देना, प्यूबर्टी को स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ने देना और उन्हें समझने-सहजने वाली थैरेपी देना है। समाधान यह नहीं हो सकता कि बच्चों को ऐसी मेडिकल प्रक्रिया में डाल दिया जाए जो दिमाग के विकास, हड्डियों की बढ़त, यौन क्षमता को नुकसान पहुँचा सकती है और भविष्य में बाँझपन तक का खतरा पैदा कर सकती है।”

‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’ क्या हैं?

प्यूबर्टी ब्लॉकर्स जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में गोनाडोट्रोपिन-रिलीजिंग हार्मोन (GnRH) एनालॉग्स कहा जाता है, ऐसी दवाएँ हैं जो शरीर में सेक्स हार्मोन्स (एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरॉन) के उत्पादन को दबाती हैं। ये प्यूबर्टी से जुड़े शारीरिक बदलावों को रोकती हैं जिनमें लड़कियों में स्तनों का विकास, मासिक धर्म, कूल्हों का चौड़ा होना और लड़कों में वृषण का बड़ा होना, आवाज का गहरा होना, चेहरे पर बाल आना जैसे बदलाव शामिल हैं। ये दवाएँ इंजेक्शन, इम्प्लांट या नेजल स्प्रे के रूप में दी जाती हैं, और आमतौर पर हर 1-3 महीने में दोहराई जाती हैं।

अमेरिकी सरकार के स्वास्थ्य विभाग से जुड़े नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, आमतौर पर प्यूबर्टी लड़कियों में 8 से 13 साल की उम्र के बीच और लड़कों में 9 से 14 साल की उम्र के बीच शुरू होती है और यह 5 चरणों में आगे बढ़ती है। इन दवाओं को शुरुआत में उन बच्चों के इलाज के लिए बनाया गया था जिनमें प्यूबर्टी सामान्य उम्र से बहुत पहले शुरू हो जाती थी। बाद के वर्षों में इनका इस्तेमाल जेंडर डिस्फोरिया से जूझ रहे बच्चों और युवाओं में भी किया जाने लगा। यह माना गया कि प्यूबर्टी को रोककर उन्हें समय मिलेगा ताकि वे बिना शरीर में होने वाले अनचाहे बदलावों के तनाव के अपनी जेंडर पहचान को समझ सकें और बाद में यह फैसला कर सकें कि आगे जेंडर-अफर्मिंग हार्मोन थेरेपी लेनी है या नहीं।

‘जेंडर आइडेंटिटी’ को लेकर बढ़ रहा है भ्रम!

UK में NHS की एक विशेष सेवा है जिसे ‘जेंडर आइडेंटिटी डेवलपमेंट सर्विस’ (GIDS) कहा जाता है। यह उन बच्चों और युवाओं की मदद करती है जिन्हें अपनी जेंडर पहचान को लेकर भ्रम, असहजता या मानसिक परेशानी महसूस होती है। नवंबर 2023 में यूके की संसद में एक रिपोर्ट पेश की गई जिसमें बताया गया कि साल 2011–12 में इस सेवा के पास केवल 210 बच्चों और युवाओं को भेजा गया था लेकिन 2021–22 तक यह संख्या बढ़कर 5,000 से भी ज्यादा हो गई।

यानी लगभग दस सालों में जेंडर पहचान से जुड़ी समस्याओं के लिए मदद लेने वाले बच्चों और युवाओं की संख्या में तेज बढ़ोतरी हुई है। GIDS पूरे UK के बच्चों और युवाओं की देखभाल करता है। इनमें से कुछ बच्चे और युवा ट्रांसजेंडर होते हैं जबकि कई ऐसे भी होते हैं जो केवल अपनी पहचान को लेकर उलझन या तनाव से गुजर रहे होते हैं।

जेंडर डिस्फोरिया और युवाओं में इसका इलाज

जेंडर डिस्फोरिया एक मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने जन्म के समय मिले जेंडर को लेकर असहज महसूस करता है। इससे तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। ब्रिटेन में ऐसे मामलों की संख्या तेजी से बढ़ी है और विशेषज्ञ बताते हैं कि इन बच्चों में से कई ऑटिज्म या अन्य मानसिक समस्याओं से भी जूझ रहे होते हैं।

जेंडर डिस्फोरिया के इलाज के दो मुख्य तरीके हैं। इसमें पहला है- ‘एफर्मेटिव केयर’ जिसमें बच्चे की बताई गई जेंडर पहचान को स्वीकार कर हार्मोन या सर्जरी जैसे मेडिकल इलाज दिए जाते हैं। दूसरा है- ‘एक्सप्लोरेटिव थेरेपी’ जिसमें बच्चे की मानसिक स्थिति, परिवार, समाज और भावनात्मक कारणों को समझने की कोशिश की जाती है।

ब्रिटेन में पहले NHS की टैविस्टॉक क्लिनिक, जिसे GIDS भी कहते हैं, में प्यूबर्टी ब्लॉकर्स का खूब इस्तेमाल होता था लेकिन 2020 में कीरा बेल नामक मरीज का केस के बाद यह सवाल उठा कि क्या बच्चे इसके जोखिम समझ सकते हैं। इसके बाद ऐसे इलाजों पर रोक लगी। दूसरे देशों में भी रुख बदल रहा है। फिनलैंड और स्वीडन ने इन दवाओं पर पाबंदी लगाई है।

‘कैस’ रिव्यू में क्या सामने आया?

2020 में NHS ने एक रिव्यू शुरू करवाया जिसकी अुगआई डॉ. हिलेरी कैस ने की थी। इसका उद्देश्य युवाओं के लिए दी जा रही जेंडर आइडेंटिटी सेवाओं की गहराई से जाँच करना था, क्योंकि ऐसे मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही थी और इलाज से जुड़े ठोस सबूत कमजोर माने जा रहे थे। अप्रैल 2024 में इसकी फाइनल रिपोर्ट पब्लिश की गई।

इसमें पाया गया कि प्यूबर्टी ब्लॉकर्स के पीछे का वैज्ञानिक आधार अभी स्पष्ट नहीं है। जेंडर डिस्फोरिया, मानसिक स्वास्थ्य या सामाजिक-मनोवैज्ञानिक स्थिति पर इसके प्रभावों को लेकर ठोस सबूत बहुत कम हैं। दिमागी विकास और यौन-मनोवैज्ञानिक विकास पर इसके क्या असर पड़ते हैं, यह भी अभी ठीक से पता नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया कि इन दवाओं से हड्डियों की मजबूती, दिमाग के विकास और प्रजनन क्षमता पर संभावित प्रभाव हो सकता है

रिपोर्ट में कहा गया, “18 साल से कम उम्र के बच्चों और युवाओं में मर्दाना या औरतों वाले हार्मोन देने को लेकर भी कई सवाल बने हुए हैं। कम उम्र में इलाज शुरू करने वालों पर लंबे समय तक किए गए अध्ययन उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए इसके भविष्य के नतीजों को पूरी तरह समझना संभव नहीं है। डॉक्टर भी यह भरोसे से नहीं बता सकते कि कौन-से बच्चे आगे चलकर स्थाई रूप से ट्रांसजेंडर पहचान अपनाएँगे।”

ट्रायल के समर्थन और विरोध में तर्क

इस ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर’ ट्रायल को लेकर कई तरह की चिंताएँ सामने आई हैं। आलोचकों का कहना है कि यह ट्रायल नैतिक रूप से सही नहीं है और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े करता है। जेनस्पेक्ट जैसे समूहों के अनुसार, ट्रायल की योजना में उन बच्चों का जिक्र नहीं है जो बाद में अपना फैसला बदल सकते हैं। उनका कहना है कि लगभग 98 प्रतिशत बच्चे आगे चलकर हार्मोन इलाज पर चले जाते हैं, जिससे भविष्य में संतान पैदा करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। ट्रायल केवल दो साल का है, जबकि पछतावे के मामले कई बार 7-11 साल बाद सामने आते हैं। इन समूहों ने दिसंबर 2025 में विरोध प्रदर्शन किए और सांसदों से इस ट्रायल को रोकने की माँग की।

वहीं, ट्रायल के समर्थकों का कहना है कि इससे ठोस जानकारी मिलेगी और परिवार बेहतर फैसले ले पाएँगे। सरकार ने इसे मंजूरी दी है लेकिन कई दलों के नेता इसके खिलाफ हैं। दूसरे देशों में भी ऐसे इलाजों को रोका जा रहा है। कुल मिलाकर यह बहस बच्चों की सुरक्षा और सही इलाज को लेकर है और फैसला इसी आधार पर होना चाहिए।

सोमनाथ, नेहरू और 17 चिट्ठियाँ: मंदिर पुनर्निर्माण के समय ‘सेक्युलर’ जवाहरलाल को एक नहींं कई दिक्कतें थी, पचा नहीं पा रहे थे सनातन धाम की भव्य दिव्य वापसी

सोमनाथ मंदिर के रेनोवेशन के बाद मई 1951 में उद्घाटन कार्यक्रम के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को बुलाया गया था। हमने पिछले हिस्से में देखा कि कैसे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इतना हंगामा किया कि राष्ट्रपति खुद कार्यक्रम में जाएँ, फिर भी राजेंद्र प्रसाद कार्यक्रम में शरीक हुए। सोमनाथ मामले को लेकर नेहरू के कुछ और लेटर देखते हैं।

सोमनाथ मंदिर का प्रोग्राम पास आ रहा था। इसी बीच, अप्रैल 1951 में, ट्रस्ट के अध्यक्ष जामसाहेब दिग्विजय सिंह जडेजा ने कुछ पड़ोसी देशों में इंडियन एम्बेसी को लेटर लिखकर वहाँ की नदियों का पानी भेजने का आग्रह किया। इनका इस्तेमाल उद्घाटन के मौके पर किया जाना था। ‘सेक्युलर’ जवाहरलाल ने इस पर एतराज जताया। दर्द इतना ज़्यादा था कि नेहरू ने एक साथ कई लेटर फाड़ दिए।

नेहरू आगे कहते हैं, ‘मुझे समझ नहीं आता कि हम इस बात की चिंता क्यों नहीं करते कि दूसरे हमारे कामों, हमारी एक्टिविटीज के बारे में क्या सोचते हैं।’ वे आगे कहते हैं, ‘मुझे यह भी समझ नहीं आता कि चीन से नदी का पानी भारत कैसे लाया जाएगा? मैं इन सब से बहुत परेशान हूँ।’ चिट्ठी में आगे नेहरू मुंशी से पूछते हैं कि अगर ऐसी चिट्ठियाँ दूसरे उच्चायोग को भेजी गई हैं तो उन्हें बताया जाए, ताकि वे उन्हें भी चिट्ठी लिख सकें।

अगर आप इस चिट्ठी को देखें, तो यह साफ है कि पहले प्रधानमंत्री को एक हिंदू मंदिर के जीर्णोद्धार से ज्यादा इस बात की चिंता थी कि कोई दूसरा देश क्या सोचेगा। वे कहते रहते थे कि तुम ऐसा मत करो, नहीं तो दूसरे देश हमारे बारे में क्या सोचेंगे। मोदी जैसे युगपुरुष की तुलना नेहरू जैसे व्यक्ति से नहीं हो सकती। ऐसा इरादा भी नहीं है, क्योंकि अब तो विदेशी राष्ट्राध्यक्ष भी मंदिरों में जाने लगे हैं। मोदी के आने के बाद यह बदलाव आया है।

सौराष्ट्र सरकार के पाँच लाख के फंड खर्च करने पर दिक्कत

अब बात करते हैं पाँच लाख के फंड की। नेहरू इस बात से परेशान थे कि सौराष्ट्र सरकार (उस समय गुजरात नहीं था) इस प्रोग्राम पर खर्च क्यों कर रही थी। जवाहरलाल ने इस गुस्से में कई चिट्ठियाँ लिखी थीं।

21 अप्रैल को सौराष्ट्र के उस समय के मुख्यमंत्री यू. एन. ढेबर को लिखे एक लेटर में नेहरू कहते हैं कि उन्हें खबरों से पता चला कि सौराष्ट्र सरकार ने सोमनाथ मंदिर में उद्घाटन कार्यक्रम के लिए 5 लाख की रकम मंजूर की है।

नेहरू कहते हैं, ‘मैं यह पढ़कर हैरान रह गया और मैं जानना चाहता हूँ कि क्या यह सच है। सोमनाथ मंदिर की जो भी अहमियत हो, यह सरकार का काम नहीं है और मंदिर के लिए पैसे इकट्ठा करना गैर-सरकारी लोगों का काम है। मुझे नहीं लगता कि आम लोगों के पैसे का सही इस्तेमाल हो रहा है।’

22 अप्रैल को नेहरू ने उस समय के जामसाहेब दिग्विजय सिंह जडेजा को एक चिट्ठी लिखी। पत्र में नेहरू बिना किसी औपचारिकता के सीधे अपनी बात शुरू की।

नेहरू कहते हैं, ‘मैं सोमनाथ मंदिर में होने वाले इस प्रोग्राम को लेकर बहुत परेशान हूँ। अगर यह कोई पर्सनल/प्राइवेट मामला होता तो ठीक था, लेकिन ऐसी बातें फैल रही हैं कि सरकार भी इसमें शामिल है। कुछ लोगों को लगता है कि भारत सरकार भी इसमें शामिल है और सौराष्ट्र सरकार को 100 परसेंट ऐसा लगता है। खबरों में कहा गया है कि सौराष्ट्र सरकार इस प्रोग्राम के लिए पाँच लाख रुपए खर्च करेगी।’

नेहरू के मुताबिक, ‘जहाँ तक भारत सरकार की बात है, मैं पार्लियामेंट में साफ-साफ कह दूँगा कि सरकार का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन मुझे सौराष्ट्र सरकार पर शक है और मुझे लगता है कि सरकार होने के नाते उन्हें इसमें शामिल नहीं होना चाहिए और पैसे का खर्च भी गलत है। मैंने चीफ़ मिनिस्टर (ढेबर) को भी बता दिया है।’

यहाँ नेहरू फिर से राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद का मुद्दा उठाते हैं। वे लिखते हैं, ‘मेरी दिक्कत यह है कि राष्ट्रपति प्रोग्राम में जा रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि इससे गलत मैसेज जाएगा, लेकिन अब यह उनका पर्सनल मामला है, इसलिए मैं इसमें दखल नहीं देना चाहता।’

इसके बाद, नदियों के पानी के बारे में नेहरू जाम साहेब से कहते हैं, ‘मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि आपने अलग-अलग उच्चायोग से अपनी नदियों का पानी भेजने के लिए कहा था। कुछ उच्चायोग ने इस पर एतराज जताया है और इससे हम मुश्किल में पड़ गए हैं। याद रखें कि आप सिर्फ सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टी ही नहीं हैं, बल्कि सौराष्ट्र के राजप्रमुख भी हैं।’

एक बार फिर नेहरू कहते हैं, ‘मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं इसमें क्या कर सकता हूँ। लेकिन प्रोग्राम जो भी हो, मुझे यह साफ करना है कि भारत सरकार का इस कार्यक्रम से कोई लेना-देना नहीं है। पाकिस्तान इस मामले का फायदा उठा रहा है और यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि हम ‘सेक्युलर देश’ नहीं हैं। ‘गरीब’ (जवाहरलाल ने यहाँ इंग्लिश में ‘गरीब’ शब्द का इस्तेमाल किया है) अफगानिस्तान को भी इसमें घसीटा जा रहा है।’

खुद नेहरू का लिखा यह लेटर दिखाता है कि नेहरू पाकिस्तान से धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट लेने के लिए कितने बेचैन थे। पहले PM को इस बात की चिंता थी कि अफगानिस्तान से लेकर बर्मा और चीन तक सभी देश क्या कहेंगे, उनकी चिंता सिर्फ सोमनाथ मंदिर के प्रोग्राम की नहीं थी। उनके साथ जो होगा, सो होगा!

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को चिट्ठी

अब बात करते हैं एक जरूरी चिट्ठी की, जो 21 अप्रैल, 1951 को लिखी गई थी। किसे? पाकिस्तान के उस समय के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को ‘मेरे प्यारे नवाबजादा’ कहकर बुलाते हुए, नेहरू लिखते हैं, ‘मैं आम तौर पर रेडियो पाकिस्तान के ब्रॉडकास्ट की तरफ़ आपका ध्यान नहीं खींचता। लेकिन मैंने यह भी कहा है कि कुछ ब्रॉडकास्ट, खासकर पश्तो भाषा में, अक्सर पूरी तरह से झूठे आरोप लगाते हैं। 17 अप्रैल को पेशावर से पश्तो में किया गया ब्रॉडकास्ट इसका एक उदाहरण है और अगर आप इस मामले पर ध्यान देंगे तो मैं आभारी रहूँगा।’

आगे, ‘यह कहानी कि सोमनाथ मंदिर के दरवाजे अफगानिस्तान से भारत लाए जाएँगे, पूरी तरह झूठी है। इसमें ज़रा भी सच्चाई नहीं है। इसे सार्वजनिक तौर पर मना किया जा चुका है। असलियत यह है कि किसी को नहीं पता कि ऐसे कोई दरवाज़े हैं भी या नहीं और अफ़गानिस्तान से ऐसा कुछ भी भारत नहीं भेजा जा रहा है। फिर भी यह सब पाकिस्तानी प्रेस में चल रहा है। ब्रॉडकास्ट या रिपोर्ट्स कितना सच कह रहे हैं, यह तय करना मैं आप पर छोड़ता हूँ।’

नेहरू इस बात को लेकर कितने परेशान थे कि ‘प्यारे नवाबज़ादा’ का देश क्या सोचेगा, वहाँ का प्रेस क्या कह रहा है। यह लेटर इसका सबूत है।

22 अप्रैल को एक तरफ नेहरू ने जाम साहेब को लेटर भेजा और दूसरी तरफ जाम साहेब का लेटर नेहरू के पास पहुँचा। जाम साहेब ने प्रोग्राम के लिए प्राइम मिनिस्टर को एक औपचारिक आमंत्रण पत्र भेजा था। लेटर के जवाब में, नेहरू ने जाम साहेब को एक और लेटर लिखा। तारीख 24 अप्रैल, 1951।

इसमें नेहरू आमंत्रण के लिए शुक्रिया अदा करते हुए कहते हैं कि वह अभी दिल्ली नहीं छोड़ सकते। फिर प्रोग्राम को लेकर अपना गुस्सा निकालने लगते हैं।

सेक्युलर नेहरू ‘पुनरुत्थान’ से परेशान थे

17 अप्रैल, 1951 को विदेश मंत्रालय के सेक्रेटरी जनरल और विदेश सचिव को भेजे एक नोट में नेहरू लिखते हैं, “मैंने प्रेसिडेंट और मुंशी दोनों से कहा है कि मुझे ये सब एक्टिविटीज़ बिल्कुल पसंद नहीं हैं। क्या विदेश मंत्रालय को पता है कि ऐसे लेटर (नदी के पानी के बारे में) विदेश में हमारी एम्बेसी को भेजे जा रहे हैं? मैं चाहता हूँ कि आप (विदेश मंत्रालय) एम्बेसी को लिखकर बता दें कि वे इन आग्रह पर कोई ध्यान न दें।”

नेहरू ने उसी दिन चीन में भारतीय राजदूत के. एम. पनीकर को एक चिट्ठी लिखी। इस चिट्ठी में PM नेहरू लिखते हैं, ‘मैंने प्रेसिडेंट से कहा था कि इस प्रोग्राम में शामिल न हों, लेकिन उन्होंने पहले ही न्योता स्वीकार कर लिया था और तब से मैं ज़्यादा दखल नहीं दे सकता था। इसलिए अब मैं उनके दौरे और वहाँ जो कुछ भी हो रहा है, उसे जितना हो सके कम करने की कोशिश कर रहा हूँ।’

17 तारीख को, उस समय के होम मिनिस्टर सी. राजगोपालाचारी को एक और चिट्ठी लिखी गई। इस चिट्ठी में, नेहरू चीन में भारत के राजदूत पनीकर की एक चिट्ठी को कोट करते हैं और कहते हैं, ‘मैं आपका ध्यान उस ओर दिला रहा हूँ, जो उन्होंने (पनीकर) सोमनाथ मंदिर के बारे में लिखा है। मैं यह सब देखकर परेशान हो रहा हूँ और समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या करूँ। अपनी एम्बेसी को चिट्ठी लिखना और किसी प्रोग्राम के लिए उनकी नदी से पानी माँगना कितना अजीब है!’ इस चिट्ठी में नेहरू इस बात को लेकर भी परेशान दिखते हैं कि बर्मा की कम्युनिस्ट पार्टी क्या कहेगी। नेहरू इस बात को लेकर भी परेशान थे कि पाकिस्तान क्या सोचेगा। इस पर आगे बात होगी।

17 तारीख को केएम मुंशी को एक और लेटर लिखा जाता है। लेटर में नेहरू कहते हैं कि उन्हें चीन में भारतीय एम्बेसडर (पानीकर) का एक लेटर मिला है, जिसमें सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टियों ने उन्हें लिखा है और नदी का पानी भेजने के लिए कहा है। इसका इस्तेमाल मंदिर में धार्मिक समारोहों के लिए किया जाएगा। नेहरू लिखते हैं, ‘इस लेटर ने हमारी एम्बेसी को मुश्किल में डाल दिया है और मैं भी उतना ही परेशान हूँ। अगर किसी और ने यह आग्रह की होती, तो बात अलग होती। अगर सरकार से जुड़े लोग ऐसा लेटर भेजते हैं और उसमें प्रेसिडेंट का नाम भी है, तो इससे विदेश में हमारे लिए शर्मिंदगी वाली स्थिति पैदा होगी।’

नेहरू लिखते हैं, ‘मैंने इस बारे में आपको पहले भी लिखा है। मैं इस ‘पुनरुत्थान’ से बहुत परेशान हूँ और इस बात से भी कि राष्ट्रपति, कुछ मंत्री और आप राजप्रमुख के तौर पर इस प्रोग्राम में शामिल हो रहे हैं। मुझे लगता है कि यह हमारी सरकार के उसूलों के खिलाफ है। इसके नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर बुरे नतीजे हो सकते हैं। निजी तौर पर, हर कोई जो चाहे कर सकता है, लेकिन हम सार्वजनिक तौर पर ऐसा नहीं कर सकते।’

केएम मुंशी को एक और लेटर लिखा गया।

लेटर में नेहरू लिखते हैं, ‘मैं इस बात से बहुत परेशान हूँ कि सरकार विदेश में सोमनाथ प्रोग्राम से जुड़ी हुई है। इस मामले पर पार्लियामेंट में सवाल उठाए जाएँगे और मैं यह साफ कर दूँगा कि सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन मैं सौराष्ट्र सरकार के बारे में ऐसा नहीं कह सकता, जो इस प्रोग्राम पर पाँच लाख खर्च कर रही है। मुझे लगता है कि इस हालत में सरकार का यह खर्च उठाना पूरी तरह से गलत है।’

जामसाहेब पर अप्रत्यक्ष आरोप

जामसाहेब का जिक्र करते हुए नेहरू लिखते हैं, ‘मैंने इस मामले पर प्रेसिडेंट और जामसाहेब को लेटर लिखे हैं। जामसाहेब न सिर्फ सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टियों के चेयरमैन हैं, बल्कि सौराष्ट्र के राजप्रमुख भी हैं।’ यहाँ नेहरू जामसाहेब पर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि उन्होंने एम्बेसी को जो लेटर लिखे, उन्होंने हमें मुश्किल में डाल दिया है! यह उन लेटर के बारे में है, जिनमें नदियों के पानी के बारे में रिक्वेस्ट की गई थी।

24 अप्रैल को मृदुला साराभाई को लिखे अपने लेटर में भी नेहरू इन सभी बातों का जिक्र करते हैं और अपने दिल की बात कहते हैं। वह प्रेसिडेंट के प्रोग्राम में शामिल होने, उन्हें सौराष्ट्र सरकार द्वारा फंड के इस्तेमाल से कैसे नहीं रोक पाए, और भी बहुत कुछ बताते हैं। वह आगे कहते हैं कि मृदुला को प्रेसिडेंट से मिलकर उन्हें समझाना चाहिए और गुजराती प्रेस में हो रही बुराई के बारे में बताना चाहिए।

प्रोग्राम का कवरेज कम करने की कोशिशें

सारी कोशिशें नाकाम होने के बाद, 28 अप्रैल को नेहरू ने उस समय के सूचना और प्रसारण मंत्री आर. आर. दिवाकर को एक चिट्ठी लिखी। वजह? यह निर्देश देने के लिए कि प्रोग्राम का कवरेज कम किया जाए और ऐसा न लगे कि सरकार किसी भी तरह से इसमें शामिल है।

नेहरू दिवाकर को लिखते हैं, ‘इस सोमनाथ प्रोग्राम में सरकार को शामिल करने से देश और विदेश में हमें नुकसान होगा। मुझे कई शिकायतें भी मिल रही हैं। लोग पूछ रहे हैं कि क्या एक ‘सेक्युलर’ सरकार इस तरह से बर्ताव कर सकती है? मैं बस इतना कह सकता हूँ कि यह कोई ‘सरकारी प्रोग्राम’ नहीं है।’

इसके बाद नेहरू कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि अगर हालात ऐसे बने, तो हमारे रेडियो ब्रॉडकास्ट को सोमनाथ प्रोग्राम का कवरेज पूरी तरह से कम कर देना चाहिए, ताकि किसी भी तरह से ऐसा न लगे कि यह कोई सरकारी प्रोग्राम है।’

सोमनाथ प्रोग्राम की तारीख पास आ रही थी। इसी बीच 2 मई, 1951 को नेहरू ने सभी मुख्यमंत्रियों को एक लेटर लिखा। लेटर में 19 अलग-अलग बिन्दू थे। इनमें 17वां पॉइंट सोमनाथ मंदिर से जुड़ा था।

नेहरू एक बार फिर मुख्यमंत्रियों के सामने साफ करते हैं कि सरकार इसमें किसी भी तरह से शामिल नहीं है। वह यह भी चेतावनी देते हैं कि भले ही इसके लिए पब्लिक सपोर्ट हो, हमें याद रखना होगा कि ऐसा कुछ भी नहीं किया जा सकता, जिससे सेक्युलरिज्म को नुकसान हो। उन्होंने आगे यह डर भी जताया कि देश में कई कम्युनल ताकतें एक्टिव हैं और हमें उनसे लड़ना होगा। एक समझदारी भरी सलाह देते हुए नेहरू ने लिखा, ‘सरकारों के लिए हमेशा सेक्युलर और नॉन-कम्युनल रुख अपनाना जरूरी है।’

कार्यक्रम से दो दिन पहले, 9 मई को नेहरू ने विदेश मंत्रालय को एक नोट भेजा, जिसमें यह सारी भावनाएँ हैं, इसलिए अलग से चर्चा की कोई ज़रूरत नहीं है।

13 जून, 1951 को नेहरू ने सर्वपल्ली राधाकृष्णन को एक चिट्ठी लिखी। तब तक सोमनाथ का कार्यक्रम पूरा हो चुका था।

इस चिट्ठी में नेहरू लिखते हैं, ‘आपने सोमनाथ कार्यक्रम में कुछ मंत्रियों के होने का ज़िक्र किया। मैं सहमत हूँ। सच तो यह है कि मैंने उन्हें रोकने की कई कोशिशें कीं, लेकिन वे जाने के लिए तैयार थे। सोमनाथ में जो हुआ, उससे मैं बहुत दुखी था। मैंने यह कहने की बहुत कोशिश की कि सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन सरदार पटेल के कुछ फैसलों की वजह से सरकार पहले ही कुछ हद तक इसमें शामिल हो चुकी थी।

आखिरी चिट्ठी 1 अगस्त, 1951 को लिखी गई थी, जो मुख्यमंत्रियों को भेजी गई चिट्ठी थी। यहाँ भी नेहरू ने एक बार फिर सोमनाथ प्रोग्राम का जिक्र किया और कहा कि इससे भारत की इमेज खराब हुई और पाकिस्तान ने इसका पूरा फ़ायदा उठाकर प्रोपेगैंडा फैलाया।

कुल मिलाकर, नेहरू ने सोमनाथ मुद्दे पर सत्रह चिट्ठियाँ लिखीं। उनको एतराज था कि सरकार भी किसी न किसी तरह से इसमें शामिल थी, जबकि सच तो यह था कि पैसा लोगों ने इकट्ठा किया था। नेहरू की धर्मनिरपेक्षता आड़े आ रही थी। नेहरू को इस बात की ज्यादा चिंता थी, कि दूसरे देश क्या कहेंगे, पड़ोसी आतंकवादी देश पाकिस्तान क्या कहेगा।

इन देशों से मान्यता पाने की इतनी ज्यादा इच्छा थी कि उन्होंने हजारों साल बाद फिर से बनाए जा रहे हिंदू मंदिर के गर्व को एक तरफ रख दिया, लेकिन इस बात पर जोर देते रहे कि सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है। मानो सरकार को इस प्रोग्राम पर शर्म आ रही हो! नेहरू की बातें कम से कम इसी ओर इशारा करती हैं।

अगर एक हिंदू देश में हिंदू मंदिर बन रहा है, तो हिंदुओं द्वारा चुनी गई सरकार इसमें क्यों शामिल नहीं होनी चाहिए? नेहरू ने सेक्युलरिज़्म की इम्पोर्टेड परिभाषाओं के असर में आकर बहुसंख्यक के साथ खराब बर्ताव करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई। एक तरह से इन चिट्ठियों के जरिए कहा जा सकता है कि उन्होंने बार-बार बहुसंख्यक का अपमान किया।

आज समय बदल गया है। आज सरकार ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ मना रही है। चलिए उसी मुद्दे पर बात खत्म करते हैं जिससे हमने पहला हिस्सा शुरू किया था। यह सब करने में मौजूदा सरकार को सेक्युलरिज़्म परेशान नहीं करता। यह 2014 में बदली सोच की हवा का सुखद नतीजा है। राम मंदिर भी इसी का नतीजा था। दो आर्टिकल की यह सीरीज़ इस शुभकामना के साथ खत्म करते हैं कि कुछ सालों बाद इसमें काशी-मथुरा भी जुड़ जाएगा।

(ये लेख मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। )