भारत सरकार ने साइबर फ्रॉड रोकने के लिए कड़ा कदम उठाया है। अब WhatsApp, Telegram, Signal, Snapchat, ShareChat, JioChat, Arattai और Josh जैसे मैसेजिंग ऐप्स सिर्फ तभी चलेंगे जब फोन में उसी नंबर की एक्टिव सिम लगी हो। इसके अलावा वेब लॉगिन भी समय-समय पर री-वेरिफाई होगा। दूरसंचार विभाग (DoT) द्वारा यह नियम टेलीकम्युनिकेशन साइबरसिक्योरिटी अमेंडमेंट रूल्स 2025 (Telecommunication Cybersecurity Amendment Rules 2025) के तहत लागू किया है।
पूरी तरह बदल जाएगा ऐप चलाने का तरीका
सरकार के नए आदेश के बाद अब देश के करोड़ों ऐप यूजरों को अपनी आदतें बदलनी होंगी। पहले मैसेजिंग ऐप्स सिर्फ इंस्टॉलेशन के समय मोबाइल नंबर माँगती थीं और बाद में चाहें सिम स्लॉट में हो या नहीं, ऐप चलता रहता था। लाखों लोग टैबलेट, सेकेंडरी फोन या सिर्फ वाई-फाई से बिना सिम के WhatsApp और Telegram चला लेते थे लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।
अब यह ऐप तभी खुलेगा जब फोन में वही सिम लगी हो जिससे ऐप रजिस्टर हुआ है और वह सिम एक्टिव और नेटवर्क में हो। अगर सिम बंद है, नंबर ब्लॉक है या फोन में नहीं लगा, तो ऐप खुलना बंद हो जाएगा। सरकार का कहना है कि इससे फेक नंबरों और विदेश से चल रहे धोखाधड़ी वाले अकाउंट को रोका जा सकेगा।
क्यों लिया गया यह फैसला?
पिछले कुछ समय में भारत में साइबर धोखाधड़ी तेजी से बढ़ी है। कई ठग विदेशी नंबर, ऑनलाइन VIP कॉल और बिना सिम वाले ऐप अकाउंट का इस्तेमाल करके लोगों को फँसा रहे थे। क्योंकि ऐप सिम हटाने के बाद भी चलती रहती थी, इसलिए यूजर की पहचान ट्रैक करना बहुत मुश्किल हो जाता था।
ठग एक नंबर से धोखाधड़ी करते और तुरंत सिम या डिवाइस बदल देते। इस लूपहोल का इस्तेमाल आतंकवादी नेटवर्क, स्कैमर्स, फर्जी कस्टमर केयर एजेंट और डेटा चोरी करने वाले गिरोह कर रहे थे। इसलिए सरकार ने अब साफ कर दिया है कि ऐसी कोई सुविधा नहीं मिलेगी जो ठगों को छुपने का मौका दे।
नए नियम कैसे करेंगे काम: SIM-Binding और ऑटो लॉगआउट सिस्टम
अब मैसेजिंग ऐप्स पर वह सिस्टम लागू होगा जो फिलहाल बैंकिंग और UPI ऐप्स में इस्तेमाल होता है, यानी SIM-Binding। मतलब ऐप को लगातार यह जाँचना होगा कि फोन में वही सिम लगी है या नहीं। अगर ऐप को 24×7 नेटवर्क में वही सिम डिटेक्ट नहीं हुई तो ऐप बंद हो जाएगी और दोबारा वेरिफिकेशन करना होगा।
यही नहीं, जिन यूजर्स के पास WhatsApp Web या Telegram Web खुले रहते थे, अब उनके लिए बड़ा बदलाव है। हर 6 घंटे में वेब सेशन अपने आप लॉगआउट हो जाएगा और दोबारा QR कोड स्कैन करना पड़ेगा। इससे अगर कोई अपराधी आपका वेब लॉगिन चुरा ले, तो भी नुकसान लंबे समय तक नहीं हो पाएगा।
कंपनियों के लिए जरूरी कदम: 120 दिनों में देनी होगी रिपोर्ट
सरकार ने इस आदेश को टेलीकम्यूनिकेशन साइबरसिक्योरिटी अमेंडमेंट रूल्स 2025 के तहत लागू किया है। अब WhatsApp, Telegram, Signal, Snapchat, JioChat, ShareChat, Josh जैसे सभी प्लेटफॉर्म Telecommunication Identifier User Entities (TIUE) की श्रेणी में आ गए हैं।
इन सभी कंपनियों को 90 दिन में SIM-Binding सिस्टम लागू करना होगा और 120 दिन में लिखित रिपोर्ट जमा करनी होगी कि नियम लागू हो चुका है।
अगर कंपनियाँ पालन नहीं करतीं तो उन पर टेलीकम्यूनिकेशन एक्ट 2023, आईटी रूल्स और साइबरसिक्योरिटी लॉज (Cybersecurity laws) के तहत कड़ी कार्रवाई होगी। पहली बार ऐसा हुआ है कि मैसेजिंग ऐप्स को टेलीकॉम स्तर की सख्त निगरानी में लाया गया है।
आम लोगों पर असर: क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स
इस नियम के बाद अधिकांश सामान्य यूजर को शुरुआत में ज्यादा परेशानी नहीं होगी, खासकर जिन्हें हमेशा अपने नंबर वाले फोन में ऐप चलाने की आदत है। लेकिन जिन यूजर्स का फोन खराब है, जिनके पास दूसरा फोन है, टैबलेट है, या जिन्होंने बिना सिम वाले डिवाइस में ऐप चलाने की आदत बना रखी थी, अब उन्हें बदलाव करना पड़ेगा।
वेब यूजर्स के लिए बार-बार लॉगिन करना थोड़ी झुँझलाहट पैदा करेगा। हालाँकि, एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इससे फर्जी अकाउंट, नकली लिंक, स्पैम और डरावने फ्रॉड संदेशों में कमी आएगी। आम यूजर सुरक्षित महसूस करेगा और सरकार को लगता है कि डिजिटल सुरक्षा बढ़ेगी।
वहीं, कई साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट इस बात से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि ठग फर्जी या उधार लिए गए डॉक्यूमेंट से आसानी से नया सिम कार्ड ले सकते हैं, इसलिए यह उपाय बहुत ज्यादा फायदा नहीं देगा बल्कि सिर्फ सीमित सुरक्षा ही प्रदान करेगा।
दूसरी तरफ टेलीकॉम सेक्टर इस फैसले का समर्थन कर रहा है। उनका कहना है कि मोबाइल नंबर भारत में सबसे भरोसेमंद डिजिटल पहचान हैं और यह नियम मौजूदा वेरिफिकेशन सिस्टम को और मजबूत बनाकर साइबर सुरक्षा और पहचान की जिम्मेदारी को बढ़ाएगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि वॉट्सऐप, टेलीग्राम जैसे ऐप्स इसे कैसे लागू करेंगे। अगर यह नियम पूरी तरह लागू हुआ, तो लाखों यूजर्स को ब्राउजर पर लॉगिन रहने की सुविधा खोनी पड़ सकती है और अगर उनका सिम बंद या इनएक्टिव हो गया, तो वे अपने पसंदीदा मैसेजिंग ऐप्स का एक्सेस भी खो सकते हैं।
यानि, यह कदम सुरक्षा तो बढ़ाएगा लेकिन इसके साथ यूजर की सुविधा और प्राइवेसी पर असर पड़ने की चिंता भी बनी हुई है। यह फैसला सिर्फ तकनीकी बदलाव नहीं बल्कि डिजिटल सुरक्षा की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। इससे भले उपयोग में थोड़ी दिक्कत बढ़े लेकिन साइबर अपराधों पर बड़ी रोक लगाने की उम्मीद जताई जा रही है।
भारत में भूकंप का खतरा अब पहले से कहीं ज्यादा गंभीर हो गया है। ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) द्वारा जारी किए गए नए सीस्मिक जोनेशन मैप ने पूरे देश को हिला दिया है। इस नक्शे के मुताबिक, हिमालय की पूरी श्रृंखला कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक अब सबसे ऊँचे खतरे वाले जोन VI में आ गई है।
यह बदलाव इतना बड़ा है कि देश का 61 फीसदी इलाका मध्यम से उच्च जोखिम वाले जोन III से VI में चला गया है, जबकि 75 फीसदी आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है जहाँ भूकंप का असर जानलेवा साबित हो सकता है। पुराने नक्शे में हिमालय को जोन IV और V में बाँटा गया था, लेकिन नई रिसर्च ने साफ कर दिया कि यहाँ 200 साल से प्लेट्स लॉक हैं, यानी तनाव जमा हो रहा है और अगला बड़ा झटका 8.0 या उससे ज्यादा तीव्रता का हो सकता है।
यह नक्शा ‘IS 1893 (Part 1): 2025’ कोड का हिस्सा है, जो जनवरी 2025 से पूरे देश में लागू हो चुका है। इसका मकसद नई इमारतों, पुलों और हाईवे को भूकंप-रोधी बनाना है, ताकि जान-माल का नुकसान कम हो।
सीस्मिक जोनेशन मैप क्या है?
सरल शब्दों में समझें तो यह देश को भूकंप के खतरे के आधार पर चार मुख्य जोनों में बाँटता है- जोन II (कम खतरा), जोन III (मध्यम), जोन IV (उच्च) और जोन V (बहुत उच्च) और अब नया जोन VI (अल्ट्रा-हाई) जोड़ा गया है। यह मैप पीक ग्राउंड एक्सेलरेशन (PGA) पर आधारित है, जो जमीन के हिलने की तीव्रता को ग्रेविटी (g) के प्रतिशत में मापता है।
उदाहरण के लिए, 2.5 फीसदी संभावना के साथ 50 साल में जोन II में PGA 0.10g से कम होता है, जबकि जोन VI में यह 0.45g या इससे ज्यादा हो सकता है। पुराना नक्शा 2002 का था, जिसे 2016 में थोड़ा अपडेट किया गया, लेकिन वह ऐतिहासिक डेटा पर निर्भर था।
नया मैप प्रोबेबिलिस्टिक सीस्मिक हेजर्ड असेसमेंट (PSHA) तरीके से बना है, जो GPS डेटा, सैटेलाइट इमेजरी, सक्रिय फॉल्ट्स और लाखों सिमुलेशन का इस्तेमाल करता है। यह जापान और न्यूजीलैंड जैसे देशों का मानक है, जो खतरे की सटीक भविष्यवाणी करता है।
BIS द्वारा जारी जोन वाइज मैप
धरती पर भूकंप क्यों आते हैं?
पृथ्वी चार परतों से बनी है: सबसे अंदरूनी इनर कोर (ठोस लोहा-निकल), उसके बाहर आउटर कोर (तरल धातु), फिर मेंटल (अर्ध-तरल चट्टानें) और सबसे ऊपरी क्रस्ट (पतली ठोस परत, औसतन 30-50 किमी मोटी)। क्रस्ट में ही टेक्टोनिक प्लेट्स तैरती हैं-ये विशाल चट्टानी टुकड़े हैं जो मेंटल की गर्मी से धीरे-धीरे हिलती रहती हैं। जब ये प्लेट्स आपस में टकराती हैं, अलग होती हैं या फिसलती हैं, तो ऊर्जा रिलीज होती है, जो भूकंप का रूप ले लेती है।
दुनिया में 15 बड़ी प्लेट्स हैं, और भारत इंडियन प्लेट पर है, जो उत्तर की ओर यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है-हर साल करीब 5 सेंटीमीटर की रफ्तार से। यही टक्कर 4.6 अरब साल पहले पृथ्वी के बनने के बाद हिमालय जैसे पहाड़ पैदा करने वाली ताकत है।
भारत की भूगर्भीय स्थिति इसे भूकंप-प्रवण बनाती है। लगभग 50 मिलियन साल पहले इंडियन प्लेट ने एशियन प्लेट से जोरदार टक्कर ली, जिससे हिमालय उभरा – दुनिया का सबसे ऊँचा पर्वत श्रृंखला। लेकिन यह प्रक्रिया आज भी जारी है: प्लेट्स नीचे धंस रही हैं (सबडक्शन), जिससे फॉल्ट लाइन्स जैसे मेन फ्रंटल थ्रस्ट (MFT), मेन बाउंड्री थ्रस्ट (MBT) और मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) पर तनाव बढ़ रहा है।
हिमालय युवा पर्वत है, इसलिए चट्टानें अभी भी ढलान-तोड़ रही हैं। सेंट्रल हिमालय में कई सेगमेंट्स 200-300 साल से लॉक हैं। इसका मतलब है कि प्लेट्स हिल नहीं पा रही, तनाव जमा हो रहा। जब ये लॉक खुलेगा, तो मैग्निट्यूड 8+ का भूकंप आ सकता है, जो नेपाल से उत्तराखंड तक फैल सकता है।
पुराने नक्शे में क्या कमियाँ थीं
हिमालय को जोन IV (PGA 0.16-0.24g) और V (0.24g से ऊपर) में बाँटा गया था, लेकिन यह टेक्टोनिक एकरूपता को नजरअंदाज करता था। नया मैप PSHA से बना, जो ऐतिहासिक डेटा के अलावा फॉल्ट-विशिष्ट विश्लेषण करता है। अब 59 फीसदी से बढ़कर 61 फीसदी इलाका जोन III-VI में है। बाउंड्री टाउन्स को अब हाई रिस्क जोन में डाल दिया गया, जैसे देहरादुन के पास मोहंद, जहाँ रप्चर प्रोपगेशन दक्षिण की ओर फैल सकता है।
भूकंप को लेकर 5 जोन बनाए गए
जोन II: कम खतरा (PGA <0.10g)-यहाँ भूकंप दुर्लभ और हल्के होते हैं। मुख्यतः दक्षिण भारत जैसे तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल का आंतरिक हिस्सा। जोखिम: मामूली हिलाव, लेकिन पुरानी इमारतें प्रभावित हो सकती हैं। नया मैप यहाँ मामूली बदलाव लाया, क्योंकि पेनिनसुलर इंडिया स्थिर है-इंट्राप्लेट क्वेक्स संभव, लेकिन कम।
जोन III: मध्यम खतरा (PGA 0.10-0.16g)-मध्यम तीव्रता के झटके, 5-6 मैग्निट्यूड तक। गुजरात, महाराष्ट्र के कुछ हिस्से, पूर्वोत्तर के बाहरी इलाके। जोखिम: इमारतों में दरारें, लेकिन मजबूत संरचनाएँ सुरक्षित। 75 फीसदी आबादी यहीं या ऊँचे जोन्स में रहती है, इसलिए जागरूकता जरूरी।
जोन IV: उच्च खतरा (PGA 0.16-0.24g)—मजबूत झटके, 6-7 मैग्निट्यूड। दिल्ली-एनसीआर, बिहार के मैदान, पश्चिम बंगाल। जोखिम: पुरानी बिल्डिंग्स ढह सकती हैं, लैंडस्लाइड्स। नया मैप ने यहां रिफाइनमेंट किया, खासकर गंगा प्लains में।
जोन V: बहुत उच्च खतरा (PGA 0.24-0.36g)—तीव्र भूकंप, 7+ मैग्निट्यूड। पूर्वोत्तर (असम, मेघालय), अंडमान-निकोबार। जोखिम: व्यापक तबाही, सुनामी संभावना। लेकिन हिमालय के कुछ हिस्से अब VI में शिफ्ट हो गए।
जोन VI: अल्ट्रा-हाई (PGA >0.36g, संभावित 0.45g+)—सबसे घातक, 8+ मैग्निट्यूड। पूरा हिमालयन आर्क अब यहाँ।
वाडिया इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर विनीत गहलौत कहते हैं, “पुराना नक्शा लॉक सेगमेंट्स को ठीक से नहीं समझता था, जहाँ 200 साल से तनाव जमा है।” जोखिम: भारी हिलाव, लिक्विफैक्शन (मिट्टी गलना), लैंडस्लाइड्स, फॉल्ट रप्चर। देहरादून, हरिद्वार जैसे मैदानी इलाके भी प्रभावित।
हिमालय में यह बदलाव क्यों?
इंडियन प्लेट उत्तर की ओर धंस रही है, लेकिन सेंट्रल सेगमेंट्स लॉक हैं। गहलौत के अनुसार, “ये सेगमेंट्स तनाव जमा कर रहे हैं, अगला बड़ा भूकंप नेपाल से उत्तराखंड तक फैल सकता है।” PSHA ने लाखों सिमुलेशन से साबित किया कि रप्चर प्रोपगेशन दक्षिण की ओर फैलेगा, गंगा के मैदानी इलाकों को हिला देगा।
भूकंप कैसे मापे जाते हैं?
रिक्टर स्केल (ML) 1935 का पुराना तरीका है, जो सिस्मोग्राफ से अम्प्लिट्यूड मापता है, लेकिन बड़े भूकंप (>7) में सैचुरेट हो जाता है। अब मोमेंट मैग्निट्यूड (Mw) इस्तेमाल होता है-यह फॉल्ट स्लिप, एरिया और रिगिडिटी से ऊर्जा की गणना करता है, सटीक अनुमान देता है। उदाहरण: 2001 भुज के भूकंप की तीव्रता- ML 6.9 थी, लेकिन Mw 7.7। इसकी वजह से तबाही ज्यादा हुई।
निर्माण कार्यों में होंगे महत्वपूर्ण बदलाव
नया कोड सभी नई बिल्डिंग्स को जोन-विशिष्ट डिजाइन अनिवार्य करता है। जोन VI में डक्टाइल स्टील, एनर्जी डिसिपेशन डिवाइसेस (जैसे डैम्पर्स) लगानी होंगी। नॉन-स्ट्रक्चरल पार्ट्स (लाइट्स, AC) 1% ड्रिफ्ट पर एंकर लगाती होगी, तो पुरानी इमारतों के लिए रेट्रोफिटिंग- फाउंडेशन स्ट्रेंग्थनिंग, बीम कॉलम जॉइंट्स लगाने होंगे। इसके अलावा हाईवे, डैम, मेट्रो पर सख्ती बरतते हुए सॉफ्ट सॉइल पर पाइल फाउंडेशन करना होगा।
बहरहाल, कल्पना करिए कि हिमालय की वो ऊँची चोटियाँ, जहाँ हम घूमने जाते हैं, वही अब भूकंप के सबसे बड़े खतरे की चपेट में हैं। BIS का नया मैप आया है, जो कहता है कि कश्मीर से अरुणाचल तक पूरा हिमालय जोन VI में आ गया, मतलब अल्ट्रा हाई रिस्क। और डरावनी बात? देश की 75% आबादी ऐसे इलाकों में रहती है जहाँ झटका जानलेवा साबित हो सकता है। देहरादून-हरिद्वार जैसे मैदानी इलाके भी लिक्विफैक्शन से गल सकते हैं, लैंडस्लाइड्स हो सकते हैं। हालाँकि प्रकृति की मार को इंसान की समझदारी से रोका जा सकता है।
थैंक्सगिविंग की शाम गुरुवार (27 नवंबर 2025) को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया हैंडल Truth पर एक पोस्ट किया। इसमें उन्होंने प्रवासियों पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई की घोषणा करने का संकेत दिया।
ट्रंप का ये बयान उस घटना के तुरंत बाद आया जिसमें व्हाइट हाउस के पास एक अफगान नागरिक रहमानुल्लाह लाकनवाल ने दो नेशनल गार्ड सैनिकों पर गोली चलाई थी। बताया जाता है कि वह बाइडेन प्रशासन के एक रीसेटलमेंट प्रोग्राम के तहत अमेरिका आया था।
अपनी पोस्ट में ट्रंप ने लिखा कि वह थर्ड वर्ल्ड देशों से आने वाले माइग्रेशन को स्थायी रूप से रोक देंगे ताकि अमेरिकी सिस्टम को ठीक होने का समय मिल सके। उन्होंने कहा कि बाइडेन सरकार के दौरान जो लाखों लोग अमेरिका में दाखिल हुए हैं, उन्हें वापस भेजा जाएगा और जो लोग अमेरिका के लिए फायदेमंद नहीं हैं या देश से प्यार नहीं करते, वे यहाँ नहीं रह पाएँगे।
ट्रंप के अनुसार, गैर-नागरिकों को अब कोई सरकारी लाभ या सुविधा नहीं मिलेगी, और अगर कोई प्रवासी अमेरिका की शांति को बिगाड़ता है या देश के मूल्यों के खिलाफ जाता है, तो उसकी नागरिकता भी छीनकर उसे डिपोर्ट किया जा सकता है।
ट्रंप के अनुसार, कोई भी विदेशी नागरिक जो सरकार पर बोझ है, सुरक्षा के लिए खतरा है या पश्चिमी सभ्यता के मूल्यों के अनुरूप नहीं है, उसे अमेरिका में रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए। उनके इस बयान को आने वाली इमिग्रेशन नीति में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
तीसरी दुनिया का देश क्या है?
‘थर्ड वर्ल्ड’ शब्द की शुरुआत शीत युद्ध (Cold War) के समय हुई थी, जब 1950 के दशक में अमेरिका और सोवियत संघ (USSR) के बीच भारी राजनीतिक और वैचारिक टकराव था और इस मुकाबले ने दुनिया को तीन हिस्सों में बाँट दिया था।
पहला हिस्सा फर्स्ट वर्ल्ड कहलाता था, जिसमें अमेरिका, NATO और उनके सहयोगी देश थे, जैसे जापान और पश्चिमी यूरोपीय राष्ट्र। दूसरा हिस्सा सेकंड वर्ल्ड था, जिसमें सोवियत संघ, ईस्ट जर्मनी और क्यूबा जैसे देश आते थे, यानी वे देश जो USSR के पक्ष में थे।
बाकी बचा समूह तीसरा माना गया और उसे थर्ड वर्ल्ड कहा गया। इसमें भारत, चीन और एशिया-अफ्रीका के वे नए स्वतंत्र देश थे जिन्होंने अमेरिका या USSR किसी भी पक्ष में शामिल होने से इंकार किया और खुद को गुटनिरपेक्ष (Non-Aligned) कहा।
इस शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले फ्रांसीसी जनसांख्यिकी विशेषज्ञ अल्फ्रेड सौवी (Alfred Sauvy) ने किया था। उन्होंने इसे फ्रांस की क्रांति के समय के थर्ड एस्टेट से जोड़कर बताया था। उनके अनुसार, ये समूह गरीब, अनदेखा और शोषित माना जाता था। उसी भाव से उन्होंने कहा कि ये देश भी शक्तिशाली ताकतों के बीच अनदेखे हैं।
लेकिन समय के साथ जब शीत युद्ध खत्म हुआ, तो इस शब्द का असली राजनीतिक मतलब धीरे-धीरे खत्म हो गया और मीडिया तथा बुद्धिजीवियों ने इसे एक नए अर्थ में गरीब, पिछड़े, संघर्षरत और कम आय वाले देशों के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया।
कम औद्योगिकरण, कमजोर शासन व्यवस्था, राजनीतिक अस्थिरता, गरीबी और विकास की कमी इन देशों की पहचान बन गई। इस कारण ‘थर्ड वर्ल्ड’ शब्द धीरे-धीरे अपमानजनक और पुराने जमाने का माना जाने लगा। इसीलिए आज अधिकतर संस्थाएँ और विशेषज्ञ इसकी जगह नए शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जैसे, ग्लोबल नॉर्थ बनाम ग्लोबल साउथ, हाई-इनकम, मिडिल-इनकम और लो-इनकम देश।
संयुक्त राष्ट्र (UN) अब ‘थर्ड वर्ल्ड’ शब्द का उपयोग नहीं करता। उसकी अपनी एक सूची है- Least Developed Countries (LDC), जिसमें दुनिया के 46 सबसे गरीब और संघर्षरत देशों के नाम हैं।
हालाँकि समय के साथ कई देशों ने तेज विकास और मजबूत अर्थव्यवस्था के कारण इस ‘थर्ड वर्ल्ड’ वाली पहचान से बाहर निकलने में सफलता पाई है। चीन, भारत, सिंगापुर, साउथ कोरिया और इंडोनेशिया जैसे देश अब तेजी से विकसित माने जाते हैं और उनकी वैश्विक स्थिति पहले से कहीं बेहतर है।
हालाँकि आज भी कई देश अत्यधिक गरीबी, युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता और मानवीय संकट में फँसे हुए हैं जैसे, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, नाइजर, चाड, मलावी, बुरुंडी, हैती, सोमालिया, अफगानिस्तान, यमन और साउथ सूडान। दुनिया में इन्हें अब भी अस्थिर, गरीब और संघर्षग्रस्त देशों के रूप में देखा जाता है।
नवीनतम घोषणापत्र 2017 के ‘मुस्लिम प्रतिबंध’ से किस प्रकार भिन्न है?
यह घोषणा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले वाले रुख का ही विस्तार है, जहाँ उन्होंने ‘उच्च-जोखिम वाले देशों’ से बड़े पैमाने पर यात्रा प्रतिबंध लगाया था। उन देशों में अफगानिस्तान, सोमालिया, वेनेजुएला और यमन जैसे देश शामिल थे। उस समय इस कदम को लेफ्ट मीडिया ने ‘मुस्लिम बैन’ कहा था, हालाँकि इसमें वेनेजुएला जैसे गैर-मुस्लिम देश भी शामिल थे।
लेकिन इस बार ट्रंप सिर्फ ट्रैवल बैन की बात नहीं कर रहे। अब उनका लक्ष्य इन थर्ड वर्ल्ड देशों से आने वाले हर तरह के इमिग्रेशन को पूरी तरह रोकने का है। इसका मतलब है कि अब वीजा, असाइलम, रिफ्यूजी रीसेटलमेंट, परिवार वाले को बुलाना हर तरह की इमिग्रेशन प्रोसेस अनिश्चित समय के लिए बंद हो सकती है।
ट्रंप ने अपनी Truth पोस्ट में ‘Reverse Migration’ का जिक्र भी किया है। इसका मतलब है कि गैर-नागरिकों की बड़े स्तर पर वापसी (deportation) और जो लोग नागरिकता पाने की प्रक्रिया में हैं, उस प्रक्रिया को रोक देना। हाल ही में ट्रंप ने सोमाली समुदाय को निशाना बनाते हुए कहा, “सोमालियों ने हमें बहुत परेशानी दी है और वे हमें बहुत महँगे पड़ते हैं। हम सोमालिया को आखिर क्यों पैसा दे रहे हैं?”
TRUMP: If you look at Somalia, they are taking over Minnesota.
REPORTER: What do the Somalians have to do with this Afghan guy who shot the National Guard members?
TRUMP: Ah, nothing. But Somalians have caused a lot of trouble. They're ripping us off. pic.twitter.com/zbIUr03EWU
अपनी बातों और बयानबाजी में ट्रंप साफ कर रहे हैं कि वे सिर्फ ऐसे लोगों को अमेरिका आने देना चाहते हैं जो मूल्यों में संगत हों और अमेरिका के लिए काम के हों। उनके अनुसार दुश्मन मानसिकता वाले, कम-शिक्षित और कम-क्षमता वाले लोगों का बड़े पैमाने पर अमेरिका आना देश पर बोझ है। यह रुख उनके Make America Great Again (MAGA) एजेंडा के अनुरूप है।
क्या यह प्रतिबंध वास्तव में प्रभावी हो सकता है?
अल्पकालिक कदम जैसे यात्रा प्रतिबंध लगाना, वीजा प्रोसेसिंग रोकना और जाँच सख्त करना तुरंत असर दिखा सकते हैं। USCIS पहले ही उन देशों के नागरिकों के ग्रीन कार्ड की समीक्षा शुरू कर चुका है जिन्हें ‘चिंताजनक देश’ कहा जा रहा है। 2017 में ट्रंप सरकार द्वारा लगाए गए ट्रैवल बैन को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी थी, इसलिए इस बार भी USCIS के कदमों के सफल होने की संभावना ज्यादा है।
फिलहाल जिन देशों को ‘चिंताजनक देश’ की सूची में रखा गया है, वे हैं- अफगानिस्तान, बुरुंडी, चाड, कांगो गणराज्य, क्यूबा, म्यांमार, इक्वेटोरियल गिनी, इरीट्रिया, हैती, ईरान, लाओस, लीबिया, सिएरा लियोन, सोमालिया, सूडान, टोगो, तुर्कमेनिस्तान, वेनेज़ुएला और यमन।
डिपोर्टेशन, Immigration and Customs Enforcement (ICE) की फंडिंग बढ़ाना, और वीजा रिजेक्ट करना, ये सब मिलकर इन देशों से आने वाले अधिकांश नए या संभावित प्रवासियों को रोक सकते हैं। USCIS के निदेशक जोसेफ बी एडलो ने भी पोस्ट किया है कि राष्ट्रपति के आदेश पर उन्होंने ‘चिंताजनक देशों के हर प्रवासी के हर ग्रीन कार्ड की पूरी और सख्त दोबारा जाँच’ का निर्देश दिया है।
At the direction of @POTUS, I have directed a full scale, rigorous reexamination of every Green Card for every alien from every country of concern.
हालाँकि लंबी अवधि में, नागरिकता रद्द करना और पहले से रह रहे ग्रीन कार्ड होल्डर्स को वापस भेजना सरकार के लिए चुनौती बन सकता है। इस तरह के कदमों पर भेदभाव के आरोप लग सकते हैं और मुकदमे भी हो सकते हैं। इसके अलावा, परिवारों को अलग करना और शरणार्थियों को वापस भेजना राजनीतिक विवाद और कानूनी रुकावटें पैदा कर सकता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि बड़े पैमाने पर डिपोर्टेशन करना बहुत महँगा होता है। हिरासत, व्यवस्था, विमान या जहाजों से निर्वासन, ये सब करने के लिए भारी पैसे और बहुत से कर्मचारियों की आवश्यकता होती है।
अमेरिका में सोमाली समुदाय: धोखाधड़ी की योजनाएँ और बहुत कुछ
पिछले कुछ दिनों में डोनाल्ड ट्रंप ने खुले तौर पर सोमालिया और अमेरिका में रहने वाली सोमाली प्रवासी कम्युनिटी पर बयान दिए हैं, खासकर मिनेसोटा की सोमाली आबादी पर। मिनेसोटा में अमेरिका की सबसे बड़ी सोमाली कम्युनिटी रहती है, जिसकी संख्या लगभग 80,000 से 1 लाख के बीच मानी जाती है।
इनमें से बहुत से लोग 1990 के दशक में सोमालिया के गृहयुद्ध और अल-शबाब आतंकवाद के कारण शरणार्थी के तौर पर अमेरिका आए थे।
हाल ही में एक बड़े घोटाले का खुलासा हुआ है। अमेरिकी अभियोजकों ने दर्जनों लोगों पर आरोप लगाए हैं कि उन्होंने सरकारी योजनाओं, जैसे बच्चे पोषण योजना, ऑटिज्म सहायता, हाउसिंग और कोविड राहत से लगभग 250 से 300 मिलियन डॉलर की धोखाधड़ी की है।
जिन लोगों पर आरोप लगे हैं, उनमें कई सोमाली प्रवासी भी शामिल हैं। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इस धोखाधड़ी का कुछ हिस्सा सोमालिया भेजा गया और संभव है कि यह पैसा या तो वसूली के जरिए या सीधी फंडिंग के रूप में आतंकवादी संगठन अल-शबाब तक भी पहुँचा हो।
इसी पृष्ठभूमि में पिछले हफ्ते ट्रंप ने घोषणा की कि वह तुरंत 700 से अधिक सोमाली नागरिकों की Temporary Protected Status (TPS) समाप्त कर रहे हैं। इनमें से लगभग 430 लोग केवल मिनेसोटा से हैं। इस फैसले को मिनेसोटा के गवर्नर टिम वॉल्ज और कॉन्ग्रेस सदस्य इल्हान ओमर, जो खुद सोमालिया से आई प्रवासी हैं, उन्होंने अवैध और भेदभावपूर्ण बताया है।
सोमालिया ट्रंप की इमिग्रेशन नीतियों में पहले से ही विवाद का केंद्र रहा है। इससे पहले उनके प्रशासन ने सोमालिया को उन देशों की सूची में डाला था, जिन पर यात्रा प्रतिबंध था। इसे उस समय ‘मुस्लिम बैन’ कहा गया था, क्योंकि यह प्रतिबंध ISIS और अल-शबाब जैसे संगठनों से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं के आधार पर लगाया गया था।
अमेरिका में लाखों सोमाली लोग कैसे आ गए?
सोमालिया कई दशकों से दुनिया के सबसे पिछड़े देशों में गिना जाता है। इसके पीछे कई वजहें हैं। असल में, वह लगभग हर उस समस्या से जूझता है जो किसी देश को पूरी तरह असफल बना सकती है।
यह देश प्राकृतिक रूप से नहीं बना था, बल्कि विदेशी शक्तियों ने नक्शे पर सीधी रेखाएँ खींचकर अलग-अलग कबीलों को एक देश में जोड़ दिया। इनमें न साझा संस्कृति थी, न अर्थव्यवस्था और न ही कोई राजनीतिक एकता।
1991 में जब सोमालिया के तानाशाह सियाद बर्रे का शासन खत्म हुआ, तब तक हालत पहले से ही खराब थी। देश में इस्लाम और कम्युनिज्म के मिले-जुले एक असफल शासन मॉडल ने सेना, सरकार और संस्थानों को पूरी तरह खत्म कर दिया था।
उनके हटते ही कबीलों में लड़ाइयाँ शुरू हो गईं और देश अराजकता में डूब गया। इसी अव्यवस्था से अल-शबाब जैसे आतंकी संगठन उभरे, जो आज भी सोमालिया के लगभग आधे हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं।
लगातार सूखे, अकाल और लड़ाइयों ने पशुपालन और खेती, जो सोमालिया की मुख्य अर्थव्यवस्था थी, उसे लगभग नष्ट कर दिया। शिक्षित लोग पहले ही देश छोड़ चुके थे और आज स्थिति यह है कि वहाँ की अधिकांश आबादी सिर्फ मानवीय सहायता पर जिंदा है।
आज अमेरिका में लगभग 2.5 लाख सोमाली प्रवासी रह रहे हैं। इसमें उनके अमेरिका में पैदा हुए बच्चे शामिल नहीं हैं। 1990 के दशक में गृहयुद्ध और अकाल के बाद, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी कार्यक्रमों के तहत सोमालियों को अमेरिका लाया जाने लगा। सबसे पहले महिलाओं, अल्पसंख्यक समुदायों और उन लोगों को प्राथमिकता मिली जिन्होंने अमेरिकी सरकार या सहायता संस्थाओं के लिए काम किया था।
कुछ साल बाद, जो सोमाली पहले आ चुके थे उन्होंने अपने परिवारों को भी बुलाना शुरू कर दिया। ईसाई मिशनरी संगठनों ने भी हजारों सोमालियों की मदद की।
ओबामा प्रशासन (2008–2016) के दौरान P-3 ‘परिवार पुनर्मिलन’ कार्यक्रम के तहत बड़ी संख्या में सोमालियों को प्रवेश मिला। बाद में यह रिपोर्ट भी सामने आई कि कई मामलों में DNA टेस्ट में धोखाधड़ी हुई थी, लेकिन फिर भी उस दौरान लगभग 12,000 सोमाली प्रति वर्ष अमेरिका में आ रहे थे और उनमें से ज्यादातर वहीं रह गए।
बाइडन प्रशासन द्वारा शरणार्थी सीमा बढ़ाने के बाद एक नया प्रवासी समूह आया। अनुमान है कि केवल इसी सरकार के दौरान 30,000–40,000 सोमाली और अमेरिका पहुँचे। आज मिनियापोलिस और सेंट पॉल (Minnesota) दुनिया में सोमालिया के बाहर सबसे बड़ा सोमाली समुदाय हैं।
ट्रंप ने प्रवासियों को लेकर लिए कई फैसले
डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार कहा है कि कुछ प्रवासी समुदाय अमेरिका में अपराध बढ़ा रहे हैं, संसाधनों पर बोझ हैं और कानून व्यवस्था बिगाड़ रहे हैं। उनके समर्थकों में यह चिंता काफी लोकप्रिय है।
पहले वह H-1B वीजा रोकने की बात भी करते थे, जिससे भारत के पेशेवर प्रभावित हो सकते थे, लेकिन उस पर अब वह नरम हो चुके हैं। अब उनका ध्यान उन देशों से आने वाले अकुशल और उच्च-जोखिम प्रवासियों को रोकने पर है, और इस फैसले को अमेरिका में काफी समर्थन मिल सकता है।
सोमालिया एक ऐसा देश है जहाँ राजनीतिक अस्थिरता, आतंकवाद, गरीबी और अकाल ने एक पूरी पीढ़ी को तबाह कर दिया है। वहीं अमेरिका में बसे सोमालियों के बढ़ते प्रभाव और संख्या ने अब अमेरिकी राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है, खासतौर पर ट्रंप की इमिग्रेशन नीतियों के संदर्भ में।
यह रिपोर्ट अंग्रेजी में संघमित्रा ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
सिंधु घाटी सभ्यता के पतन की कहानी अपने भीतर कई रहस्य समेटे हुए है। अब इसके पतन को लेकर नया दावा सामने आया है। Communications Earth & Environment में छपे एक नए शोध में कहा गया है कि सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के पीछे लगातार आने वाले लंबे सूखे सबसे बड़ा कारण हो सकते हैं। इनमें 85 वर्ष और उससे अधिक समय तक चले सूखे भी शामिल हैं।
यह सभ्यता आधुनिक भारत–पाकिस्तान सीमा क्षेत्र में बसती थी और प्राचीन मिस्र के समय की या उससे भी पुरानी मानी जाती रही है। शोध के अनुसार, यह सभ्यता अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे खत्म हुई क्योंकि लगातार सूखे ने शहरों और समाज की मजबूती को नुकसान पहुँचाया था। यह निष्कर्ष न सिर्फ इतिहास की एक महत्वपूर्ण पहेली को समझने में मदद करता है बल्कि यह भी बताता है कि पर्यावरणीय बदलाव किसी भी सभ्यता को खत्म तक कर सकते हैं।
शोध में क्या कहा गया है?
IIT गाँधीनगर में PhD के छात्र हीरेन सोलंकी ने 4 अन्य लोगों के साथ मिलकर इस शोध को लिखा है। शोध के मुताबिक, उच्च-गुणवत्ता वाले पुरा-जलवायु अभिलेखों (paleoclimate archives) को प्राचीन नदी प्रवाह के पुनर्निर्माण और जलवायु मॉडल सिम्युलेशन के साथ जोड़कर शोधकर्ताओं ने यह संकेत पाया कि सिंधु नदी क्षेत्र में लगभग 4400 से 3400 वर्ष पहले दशकों से लेकर सदियों तक चलने वाले गंभीर और लगातार रहने वाले नदी-सूखे (river droughts) आए थे।
शोध में बताया गया है कि नदी प्रवाह में कमी के व्यापक संकेत यह भी बताते हैं कि ये लंबे सूखे उस समय क्षेत्र में बारिश की कमी के साथ जुड़े हुए थे, जिससे मीठे पानी की उपलब्धता और कम हो गई। पानी की उपलब्धता में आई इस कमी और क्षेत्र में बढ़ती सूखी परिस्थितियों ने बड़े हड़प्पा शहरों से लोगों के बिखराव (migration) में भूमिका निभाई होगी।
सिंधु नदी और सिंधु घाटी सभ्यता (IVC)
सिंधु नदी, प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) की रीढ़ मानी जाती थी। इसी नदी ने खेती, व्यापार और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए लगातार पानी उपलब्ध कराया, जिससे यह सभ्यता आगे बढ़ती और मजबूत होती गई। लगभग 5000 साल पहले यह सभ्यता सिंधु और उसकी सहायक नदियों के किनारे बसकर आकार लेती रही और परिपक्व हड़प्पा काल (4500–3900 वर्ष पूर्व) में अपने विकास के उच्चतम स्तर पर पहुँची। इस दौर में बड़े-बड़े सुनियोजित नगर, जल-निकास और प्रबंधन प्रणाली और लेखन प्रणाली देखने को मिलती है।
करीब 3900 वर्ष पूर्व के आसपास इसके पतन की शुरुआत हो गई और समय बीतने के साथ यह महान सभ्यता इतिहास का हिस्सा बनकर रह गई। इसके पतन के कारण आज भी शोध का विषय हैं। माना जाता है कि जलवायु परिवर्तन, समुद्र स्तर में कमी, लंबे सूखे और बाढ़, नदियों के मार्ग बदलने जैसे प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ सामाजिक व राजनीतिक बदलाव भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।
शोध के मुताबिक, हड़प्पा क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन गर्मी के मानसून (ISM) और शीतकाल के मानसून (IWM) दोनों से प्रभावित होता था। होलोसीन (Holocene) काल के शुरुआती और मध्य चरण में ये दोनों मानसून एक-दूसरे से जुड़े हुए थे लेकिन मध्य से अंतिम होलोसीन में ये अलग-अलग प्रभाव डालने लगे। पुरा-जलवायु प्रमाणों से पता चलता है कि अलग-अलग समय पर अलग-अलग कारकों ने जलवायु में परिवर्तन उत्पन्न किया है।
शोधकर्ताओं ने सूखे का प्रभाव समझने के लिए कई तरह के प्रयास किए हैं। वैज्ञानिकों ने झीलों के तलछट (Sediment), गुफाओं में बने स्पेलियोथेम (गुफा-खनिज) और पौधों के अवशेष जैसी चीजों का अध्ययन किया है। वैज्ञानिकों ने त्सो मोरीरी झील (उत्तर-पश्चिम हिमालय) के 4500 वर्ष पुराने तलछटों का अध्ययन करके पाया कि इस समय के आसपास मानसून में क्षेत्रीय बदलाव हुए और लगभग 4350 से 3450 वर्ष पूर्व तक का समय लंबे सूखे से जुड़ा हो सकता और इससे सिंधु सभ्यता में जल की कमी बढ़ी होगी।
वैज्ञानिकों ने प्राचीन सूखे की पहचान के लिए शोधकर्ताओं ने सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) के एक निर्धारित क्षेत्र का अध्ययन किया, जिसमें जलवायु और जल उपलब्धता में समय के साथ हुए बदलावों को समझने के लिए ट्रांजिएंट क्लाइमेट सिमुलेशन और पुरामानविकी (paleoclimate) अभिलेखों का उपयोग किया गया।
सिंधु घाटी क्षेत्र में 6000 वर्ष ईसा पूर्व से लेकर वर्तमान (1850 ई.) तक बारिश में बदलाव (फोटो साभार:Nature)
सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान पहला बड़ा सूखा D1 परिपक्व हड़प्पा काल की शुरुआत में करीब 4000 वर्ष पहले हुआ और इस दौरान 65% क्षेत्र सूखे की चपेट में था। यह सूखा लगभग 88 वर्षों तक चला लेकिन इसकी तीव्रता बाद के सूखों की तुलना में दो से तीन गुना कम थी।
दूसरे सूखे D2 की तीव्रता तीसरे सूखे D3 से कम थी। इस दौरान मध्य सिंधु क्षेत्र पर असर अधिक पड़ा जबकि निचले और ऊपरी सिंधु क्षेत्र की तुलना में गन्वेरिवाला और कालीबंगा क्षेत्रों पर प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहा। D4 सूखा लगभग 3531 वर्ष पूर्व शुरू हुआ और लगभग 114 वर्षों तक चला जिसमें लगभग 13% वर्षा में कमी दर्ज की गई।
विभिन्न सूखों के दौरान IVC की स्थिति (फोटो साभार: Nature)
शोध के मुताबिक, D1 से लेकर D4 तक आते-आते वार्षिक और ग्रीष्मकालीन वर्षा में लगातार कमी होती गई। साथ ही, शीतकालीन वर्षा में कमी तो D3 तक रही लेकिन D4 के दौरान इसमें कुछ सुधार देखा गया और इस दौरान D1 से D4 तक औसत वार्षिक तापमान भी बढ़ता रहा। जिससे वातावरण में जल की माँग बढ़ी होगी। 4000 से 3000 वर्ष पूर्व के बीच IVC क्षेत्र में शुष्कता अधिक स्पष्ट रूप से बढ़ी और विशेषकर अंतिम 3 सूखों के दौरान इसका प्रभाव सबसे ज्यादा केंद्रीय सिंधु क्षेत्र में देखा गया।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इसी बदलती जलवायु परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए संभव है कि इसी समय में बस्तियों का झुकाव गंगा के मैदानी क्षेत्रों तथा सौराष्ट्र क्षेत्र की ओर बढ़ गया हो। शोध के अनुसार, पूर्व-हड़प्पा काल (PreH) के दौरान सिंधु घाटी सभ्यता के पश्चिमी क्षेत्र तथा ऊपरी गंगा मैदानों में बस्तियों की संख्या अधिक थी और यह उसी समय अधिक जल उपलब्धता से मेल खाती है। इस समय अधिकतर बस्तियाँ नदियों से दूर बनी थीं, जिससे पता चलता है कि उस दौर में वर्षा अधिक होती थी और पूरे क्षेत्र में मीठा पानी आसानी से मिल जाता था। उस काल में वर्षा आज की तुलना में 40–60% अधिक थी।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, हड़प्पा क्षेत्र में सूखे की शुरुआत लगभग 4440 वर्ष पहले हुई और इसी समय बस्तियों के पैटर्न तथा संस्कृति में भी बदलाव दिखने लगते हैं। जलवायु सिमुलेशन और हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग दर्शाते हैं कि इस अवधि में 85 वर्ष से अधिक लंबे, कई गंभीर सूखे पड़े, जिनकी तीव्रता समय के साथ और बढ़ती गई। 4500–3000 वर्ष पूर्व तक गर्मी का मानसून कमजोर होता गया और सर्दी की वर्षा बढ़ती रही लेकिन 3300 वर्ष पूर्व के बाद सर्दी की वर्षा में भी गिरावट आई, जिससे हड़प्पा बस्तियों का बिखराव तेज हुआ।
पहले दो सूखों के दौरान कुछ इलाकों में सर्दी की वर्षा थोड़ी राहत देती थी पर जब सर्दी की वर्षा भी कम होने लगी तो स्थिति और बिगड़ गई। जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ हड़प्पावासी पूर्व और दक्षिण की ओर (गंगा मैदान और सौराष्ट्र) बढ़ते गए। ऊपरी सिंधु क्षेत्र में नदी प्रवाह घटने से बस्तियों को नए इलाकों में जाना पड़ा जबकि सौराष्ट्र और हिमालय के निचली क्षेत्र में नमी अधिक स्थिर थी जिससे वहाँ कृषि लायक स्थितियाँ थीं।
शोध में कहा गया है कि IVC का अंत अचानक नहीं था बल्कि धीरे-धीरे हुआ लंबा परिवर्तन, जिसमें जलवायु, कृषि अनुकूलन, व्यापार और सांस्कृतिक बदलाव सभी शामिल थे। कई प्रमाण दिखाते हैं कि सभ्यता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई बल्कि विकसित रूप बदलकर छोटे समुदायों और नई सांस्कृतिक पहचानों में विभाजित होकर आगे बढ़ी गई।
अगर मैं आपको बताऊँ कि बिहार के 2025 विधानसभा चुनाव में जंगल राज वापस आ गया था तो क्या आप मानेंगे? क्या आप यह मानेंगे कि बिहार में जंगल राज चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा था?
दरअसल, जंगल राज को बिहार से बाहर लोग सिर्फ अपराध के राज तक सीमित करके कई बार देखते हैं। लेकिन बिहार में लालू प्रसाद यादव का पर्याय जंगलराज है। 2025 के विधानसभा चुनाव में जितनी बार महागठबंधन के लोग इस बात का दावा करते थे कि उनकी सरकार बनने जा रही है उतनी बार लोगों को लगता था कि जंगलराज आने वाला है। महागठबंधन का अहम हिस्सा राष्ट्रीय जनता दल और राष्ट्रीय जनता दल का मतलब लालू प्रसाद यादव। और जिसने भी पिछले 20 वर्षों का बिहार देखा है वह लालू प्रसाद यादव की सरकार के आने की आहट से भी डरता है।
हालाँकि, विधानसभा चुनाव से दो महीने पहले यह लगने लगा था कि एक ऐसी पीढ़ी भी अब मतदाता बन चुकी है जिसे उसे (जंगलराज का) दूर का कुछ भी नहीं मालूम है। उसे फर्क नहीं पड़ता है कि कितना बड़ा चारा घोटाला हुआ, कितनी महिलाओं का सुहाग लुटा, कितनों का घर और कितनों की इज्जत।
तेजस्वी प्रसाद यादव ने अपने प्रचार के माध्यम से यह कोशिश की कि राष्ट्रीय जनता दल के साथ एक फील गुड फैक्टर जोड़ा जाए। लेकिन तेजस्वी यादव जिस सियासत के वारिस है, उसका वसीयतनामा ही उनका सियासी मर्सिया भी है। और बिहार विधानसभा चुनाव में वही हुआ। तेजस्वी यादव जिन फर्स्ट टाइम वोटर्स के साथ कनेक्ट बनाने के चक्कर में रील बनाने लगे थे, वही ऐन वक्त पर पलट गया।
जंगलराज की वापसी
बिहार विधानसभा चुनावों की कवरेज के लिए ऑपइंडिया की टीम एक महीने बिहार में थी। हमारी यात्रा की शुरुआत गोपालगंज जिले से हुई। वहाँ से निकालकर हम सिवान पहुँचे। उसी दिन राष्ट्रीय जनता दल ने अपना टिकट बाँटते हुए सिवान की रघुनाथपुर विधानसभा सीट से मृतक माफिया शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शाहब को टिकट दिया। सिवान शहर में ही घूमते हुए आई लव मोहम्मद के कई पोस्टर दिखाई दिए। और बगल में ही एक बड़ा सा शहाबुद्दीन का भी पोस्टर लगा था।
लोगों से बात करनी शुरू की तो अधिकतर लोग मुसलमान थे और वह राष्ट्रीय जनता दल के समर्थक थे। पोस्टर क्यों लगा, कैसे लगा? इस तरह का सवाल पूछ ही रहे थे कि एक नौजवान मुसलमान लड़के ने बोलते हुए यहाँ तक कह दिया कि अगर किसी ने पोस्टर को हाथ लगाने की भी कोशिश की तो भइया(ओसामा) ने कहा कि उसे लेकर आओ बाँधकर मारेंगे। उसने आगे कहा कि अगर साहब (शहाबुद्दीन) होते तो पोस्टर को छूने वाले को जिंदा जला देते।
इतना सुनने के बाद मुझे अंदाजा हो गया कि मैं किस तरह के इलाके में खड़ा हूँ। और लोगों से बात करते हुए मैं बाहर की तरफ निकल गया। जब यह रिपोर्ट हमारे यूट्यूब चैनल पर पब्लिश हुई तो इसकी क्लिप निकल कर सर्कुलेट होना शुरू हुई। हजारों लोगों ने निजी फेसबुक और इंस्टाग्राम आईडी से इसको शेयर किया। कुछ क्लिप्स मेरे सामने भी आई तो मैं उनके कमेंट पढ़ने लगा। और यह पहला मौका था जब मुझे समझ में आया कि बिहार के लोगों के मन से अभी भी 90 के दशक के जंगलराज का खौफ गया नहीं है।
देखिए, सिवान से ऑपइंडिया ग्राउंड रिपोर्ट
इसके बाद आपइंडिया की टीम आगे की बिहार यात्रा के लिए बढ़ गई। रास्ते में यूँ ही यूट्यूब शॉर्ट में एक क्लिप आई। उस क्लिप में लालू प्रसाद यादव के चारा घोटाले को विजय शंकर दुबे नामक एक IAS अधिकारी के द्वारा पहली बार पकड़े जाने की कहानी बताई जा रही थी। बोलने वाले व्यक्ति का नाम था मृत्युंजय शर्मा। मैंने इनकी पुस्तक Broken Promises: Caste, Crime and Politics in Bihar भी पढ़ी हुई थी। एक पत्रकार के तौर पर इंटरव्यू भी किया था, लेकिन मुझे ये अंदाजा नहीं था कि ये पुस्तक अब इंटरव्यू के क्लिप के तौर पर बिहार के युवा देख रहे हैं।
एक बड़े यूट्यूब चैनल को मृत्युंजय शर्मा का दिया गया इंटरव्यू और उसमें बोली गई हर एक बात पूरे बिहार में वायरल थी। लालू प्रसाद यादव के जंगल राज पर एकेडमिक रूप से सबसे अच्छी लिखी गई किताबों में से एक ही किताब थी। लेकिन किताब की अपनी सीमा होती है। लेकिन लेखक ने इस किताब के कंटेंट को इंटरव्यूज में जिस तरह से एक्सप्लेन किया हो बिहार की युवाओं के लिए इतिहास के सबक जैसा था।
जब मैंने इंटरनेट पर देखना शुरू किया कि यह वीडियो कहाँ तक जा रहा है तो सुदूर बिहार के रहने वाले लोगों की निजी फेसबुक आईडी पर वीडियो के क्लिप तैरते हुए मिले। और नीचे कमेंट में युवा जिस तरह से इन बातों से स्तब्ध हो रहे थे और उम्र दराज लोग समर्थन कर रहे थे कि इसी तरह का सच बोलने की जरूरत है। यह देखकर मुझे दूसरी बार यकीन हुआ कि जंगलराज कहीं नहीं गया है।
मोदी, गमछा, कट्टा, भड़काऊ गीत और जंगलराज
इन सब के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी रैलियों में लालू प्रसाद यादव के दौर की कट्टा उद्योग की चर्चा करनी शुरू की। 24 अक्टूबर 2025को प्रधानमंत्री मन नरेंद्र मोदी ने समस्तीपुर और बेगूसराय की चुनावी रैली जिसमें मैं खुद भी मौजूद था। वहाँ अपने भाषण में 30 बार जंगलराज शब्द का उपयोग किया। उन्होंने नारा दिया कि ‘फिर एक बार एनडीए सरकार, फिर एक बार सुशासन सरकार, जंगल राज वालों को दूर रखेगा बिहार।’
मुजफ्फरपुर की रैली में भी मैं मौजूद था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहाँ अलग ही तैयारी के साथ आए हुए थे। उन्होंने राजद समर्थकों द्वारा गाए गए गीतों के बोल के साथ तंज कसना शुरू किया। पहला गाना था ‘जब तेजस्वी सरकार बनतो, यादव रंगदार बन तो’ इसपर एक वायरल रील का भी जिक्र प्रधानमंत्री ने किया। दूसरे गाने के बारे में जिक्र करते हुए उसके भी बोल पढ़े ‘भैया के आवे दे सत्ता में, रे उठा लेब सटा के कट्टा घरा से रे।’आगे प्रधानमंत्री ने कहा कि आप राजद और कॉन्ग्रेस के खतरनाक नारे सुन रहे होंगे उनके गानों में छर्रा कट्टा और दुनाली शामिल है। यह इनकी सोच का प्रतिबिंब है।
भारतीय जनता पार्टी के बाकी नेताओं और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी अपने मंचों से जंगलराज का जिक्र करना नहीं भूल रहे थे। पूरे बिहार में भाजपा ने चुनाव की आखिरी कुछ दिनों में जंगल राज का नैरेटिव इतना मजबूत कर दिया कि राजद के रंगा सियार वाले चोले का चीथड़ा बन गया।
राजनीतिक अभियानों की अपनी ताकत होती है, पर बिहार के 2025 चुनाव में ‘जंगलराज’ केवल एक चुनावी जुमला नहीं रह गया था। यह एक भावना बन चुकी थी- एक ऐसी भावना जो 20–25 साल पुराने दौर की यादों से बनी, नए मतदाताओं तक वायरल क्लिप्स के जरिए पहुँची और नेताओं के भाषणों से गूँजते हुए पूरे चुनाव को संचालित करती चली गई।
जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे थे, सोशल मीडिया पर 90 के दशक के वीडियो, शहाबुद्दीन के किस्से, किडनैपिंग की खबरें और लालू-राबड़ी के दौर की कहानियाँ लगातार घूम रही थीं। आपइंडिया की टीम के द्वारा पकड़ा गया वह सिवान वाला क्लिप- जिसमें पोस्टर छूने पर ‘ज़िंदा जला देने’ वाले बयान जैसा माहौल था- वह सिर्फ़ एक वीडियो भर नहीं था। वह बहुत से लोगों के लिए 90 का भय फिर से जी उठने जैसा था। हजारों लोगों ने इसे अपने फेसबुक वॉल पर शेयर किया।
और आपको पता है, यह सब कुछ बहस नहीं थे- ये यादें और डर थे, जिन्हें किसी तथ्य-जाँच की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि लोग इन्हें अपने अनुभवों से पहचानते हैं।
उधर मृत्युंजय शर्मा के इंटरव्यू क्लिप बिहार भर में वायरल हो गए। चारा घोटाले का ब्यौरा, अफ़सरों का ट्रांसफ़र, डर का वातावरण- ये सब बातें पहली बार बिहार के नए मतदाताओं ने इतने विस्तार से सुनीं। किताबें सीमित पाठकों तक पहुँचती हैं, लेकिन इंटरव्यूज़ लाखों के मोबाइल में पहुँच जाते हैं।
इतिहास का यह ‘रीटेल’ वर्जन जंगलराज की छवि को और मजबूत करता गया।
इसके बाद जब प्रधानमंत्री मोदी अपनी रैलियों में कट्टा, छर्रा, गमछा और रंगदारों के दौर का तंज कसने लगे और हर सभा में 25–30 बार जंगलराज शब्द को दोहराने लगे, तो माहौल पूरी तरह बदल गया।
नीतीश कुमार ने भी पहली सभा से ही रात में घर से न निकल पाने वाले दिनों को याद दिलाना शुरू कर दिया।
अमित शाह ने भीड़ से पूछा- “विकास चाहिए या जंगलराज?”
और हर तरफ़ से उठी आवाज़- ‘विकास’ ने संकेत साफ़ कर दिया कि यह मुद्दा अब केवल भाषणों का हिस्सा नहीं, बल्कि जनता की प्राथमिक चिंता बन चुका है।
AI से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI_ChatGPT)
2025 का चुनाव एक अजीब विरोधाभास था-नए युवाओं ने वायरल वीडियो देखकर जंगलराज को जाना और बूढ़ी पीढ़ी ने अपने अनुभवों की पुष्टि पाई।
दोनों की आशंकाएँ एक जगह आकर मिलीं और यही वह क्षण था जब जंगलराज सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया।
दुनियाभर में हजारों उड़ानों पर असर पड़ने की आशंका है क्योंकि यूरोपीय एयरोस्पेस कंपनी एयरबस ने शुक्रवार (28 नवंबर 2025) को बताया कि उसकी सबसे ज्यादा बिकने वाली A320 फैमिली के विमानों को तुरंत सॉफ्टवेयर अपडेट और कुछ मामलों में हार्डवेयर बदलाव की जरूरत है।
दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली जेट सीरीज Airbus A320 को एक गंभीर तकनीकी समस्या का सामना करना पड़ रहा है, जिससे वैश्विक एविएशन सेक्टर में हड़कंप मच गया है। भारत समेत कई देशों की एयरलाइंस इस संकट का सामना कर रही हैं। एयरबस ने अचानक A320 मॉडल के लगभग 6,000 विमानों को तुरंत रिपेयर के लिए बुलाने का आदेश दिया है।
यह एविएशन इतिहास में सबसे बड़े रीकॉल में से एक माना जा रहा है। इंडिगो, एअर इंडिया और दुनिया की कई अन्य एयरलाइंस को अपनी फ्लाइटें रद्द करनी पड़ीं और कई हवाई अड्डों पर अफरातफरी की स्थिति बन गई।
#WATCH | Delhi: Several airlines, including IndiGo and Air India, will face disrupted operations as Airbus' analysis of a recent event involving an A320 Family aircraft has revealed that intense solar radiation may corrupt data critical to the functioning of flight controls.… pic.twitter.com/UFOLklFGyJ
एयरबस के अनुसार, सूर्य से आने वाली तेज रेडिएशन (Solar Radiation) फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम के अहम कंप्यूटर में डेटा को नष्ट कर सकती है। इससे विमान के ‘नोज एंगल’ को नियंत्रित करने वाली प्रणाली गलत संकेत दे सकती है, जो उड़ान के दौरान गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है।
हालिया जाँच में पता चला कि A320 के फ्लाइट कंट्रोल डेटा में गड़बड़ी (data corruption) सौर विकिरण के कारण हो सकता है। यह समस्या मुख्यतः विमान के क्रूजिंग फेज के दौरान सामने आती है।
एयरबस ने तुरंत सभी प्रभावित विमानों के लिए सॉफ्टवेयर अपडेट अनिवार्य कर दिया है। एयरलाइंस और ऑपरेटर्स को निर्देश दिया गया है कि वे अपडेटेड सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करें और उड़ान के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतें। इस अपडेट के कारण कुछ समय के लिए वैश्विक उड़ानों में व्यवधान हो सकता है लेकिन एयरबस का कहना है कि यह कदम सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बेहद जरूरी है।
कंपनी ने चेतावनी दी है कि यह अपडेट अगली उड़ान से पहले करना जरूरी होगा, क्योंकि हाल ही में सामने आई जानकारी के मुताबिक तेज सौर विकिरण (Solar Radiation) उड़ान नियंत्रण से जुड़े महत्वपूर्ण डेटा को प्रभावित कर सकता है। शुरुआती अनुमान के अनुसार यह फैसला दुनियाभर में हजारों विमानों और भारत में लगभग 300 विमानों को प्रभावित करेगा।
भारत में असर: IndiGo और Air India की सबसे ज्यादा उड़ानें प्रभावित
भारत में A320 फैमिली का सबसे बड़ा ऑपरेटर IndiGo है, जिसके पास लगभग 370 विमान हैं। वहीं Air India के पास 127 और उसकी सस्ती सेवा Air India Express के पास 40 A320 विमान हैं। इनका बड़ा हिस्सा अपडेट की जरूरत वाली सूची में शामिल है।
चूँकि, यह विमान एक दिन में कई उड़ानें संचालित करते हैं, इसलिए कुछ घंटों की ग्राउंडिंग का असर तुरंत शेड्यूल पर पड़ेगा। भारतीय एयरलाइंस का अनुमान है कि सभी प्रभावित विमानों में सॉफ्टवेयर बदलाव 2–3 दिनों में पूरा हो जाएगा।
सौर विकिरण से उड़ान नियंत्रण सिस्टम पर खतरा
Airbus के अनुसार, हाल ही में एक A320 विमान में अचानक अनचाहे तरीके से विमान के पिच (Pitch) में गिरावट दर्ज की गई, हालाँकि ऑटोपायलट चालू था और विमान सुरक्षित लैंड हो गया। जाँच के दौरान यह पाया गया कि ELAC (Elevator Aileron Computer) में खराबी आई थी, जो उड़ान के दौरान पायलट के नियंत्रण आदेशों को प्रोसेस करता है।
Airbus ने चेतावनी दी कि यह समस्या अगर ठीक नहीं की गई, तो किसी उड़ान में अनचाहे तरीके से विमान के पिछले हिस्से की मूवमेंट हो सकती है, जिससे विमान की संरचनात्मक सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
दुनियाभर की एयरलाइंस पर कितना असर?
Airbus की घोषणा के तुरंत बाद European Union Aviation Safety Agency (EASA) ने एक आपात निर्देश जारी कर सभी ऑपरेटरों को यह बदलाव अगली उड़ान से पहले लागू करने का आदेश दिया। दुनियाभर में 11,000 से अधिक A320 फैमिली विमान सेवा में हैं और अनुमान है कि इनमें से आधे से ज्यादा प्रभावित होंगे।
भारत से लेकर यूरोप, अमेरिका और न्यूजीलैंड तक एयरलाइंस इस प्रक्रिया में शामिल हैं। एअर इंडिया ने स्वीकार किया है कि उनके कई विमानों में अपडेट किए जा रहे हैं, जिससे turnaround time बढ़ेगा और शेड्यूल प्रभावित होगा।
अमेरिका की सबसे बड़ी ऑपरेटर अमेरिकन एयरलाइंस ने बताया कि उसके 480 A320 में से 340 विमान जल्द अपडेट हो जाएँगे। वहीं दक्षिण अमेरिका की एवियांका एयरलाइन ने बताया कि उसका 70% बेड़ा प्रभावित है और उसने कुछ तारीखों पर टिकट बिक्री रोक दी है।
लुफ्थांसा, ईजीजेट और अन्य एयरलाइंस भी अपडेट के दौरान अस्थायी रूप से विमान ग्राउंड कर रही हैं। यह पूरी स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब कुछ हफ्ते पहले ही A320 ने बोइंग 737 को पीछे छोड़ते हुए दुनिया में सबसे ज्यादा डिलीवर किए जाने वाले विमान का खिताब हासिल किया था। अब यह समस्या वैश्विक विमानन उद्योग के लिए एक बड़ी परीक्षा बन चुकी है।
एयरलाइंस की प्रतिक्रिया: सुरक्षा सर्वोच्च, यात्रियों से माफी
एयरलाइंस ने स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सुरक्षा सर्वोपरि है और वे Airbus के निर्देशों का पालन कर रही हैं। IndiGo ने कहा कि वह Airbus के साथ मिलकर सभी तकनीकी प्रक्रियाओं को लागू कर रहा है और कोशिश की जा रही है कि यात्रियों को कम से कम असुविधा हो।
कंपनी ने बताया कि यह स्थिति अप्रत्याशित है और इससे कुछ उड़ानों में देरी संभव है, लेकिन यात्रियों की सुरक्षा किसी भी अन्य चीज से पहले आती है। इसी तरह Air India ने भी बताया कि यह तकनीकी बदलाव उनकी फ्लीट के एक हिस्से को प्रभावित करेगा और इससे turnaround समय बढ़ेगा, जिसके कारण देरी और शेड्यूल प्रभावित होना तय है।
हालाँकि कंपनी ने कहा कि वह स्थिति को सँभालने और यात्रियों को अपडेट रखने के लिए सभी कदम उठा रही है और जितनी जल्दी हो सके बदलाव पूरे किए जाएँगे। Air India Express ने भी कहा कि उसने तुरंत तकनीकी जाँच और अपडेट की प्रक्रिया शुरू कर दी है और जहाँ जरूरत होगी वहाँ उड़ानों में बदलाव या उसे अस्थाई रुप से रद्द किया जाएगा।
यह स्थिति अस्थाई है लेकिन जब तक सभी विमान अपडेट नहीं हो जाते, तब तक वैश्विक और भारतीय उड़ानों पर असर जारी रहने की संभावना है।
चक्रवात ‘दितवाह’ (Cyclone Ditwah) एक शक्तिशाली तूफानी चक्रवात है जो बंगाल की खाड़ी में बना है। इसने सबसे पहले पड़ोसी देश श्रीलंका को बुरी तरह प्रभावित किया, जहाँ इसने अभूतपूर्व तबाही मचाई है। श्रीलंका में 120 से ज्यादा लोगों की जान गई है और बहुत बड़ा नुकसान हुआ है।
जानकारी के अनुसार, अब यह तूफान भारत के तटीय इलाकों यानी तमिलनाडु, पुडुचेरी और दक्षिण आंध्र प्रदेश की ओर बढ़ रहा है। भारत के मौसम विभाग (IMD) ने इन राज्यों में भारी बारिश और तूफानी हवाओं का रेड अलर्ट जारी किया है और लोगों को सुरक्षित रहने की सलाह दी गई है।
#WATCH | Rameswaram, Tamil Nadu | Strong winds, rain and rough sea conditions in Pamban as a result of cyclonic storm 'Ditwah' moving north-northwest across Sri Lanka and the southwest Bay of Bengal.
चक्रवात को अंग्रेजी में साइक्लोन कहते हैं, असल में समंदर के ऊपर पैदा होने वाला एक बहुत बड़ा और ताकतवर तूफान होता है जो हवा के तेजी से गोल घूमने के कारण बनता है। आप इसे एक विशाल, घूमती हुई हवा की मशीन समझ सकते हैं, जो अपने साथ तेज हवा, मूसलाधार बारिश और ऊँची लहरें लेकर आती है। यह तूफान ख़ासतौर पर हिंद महासागर जैसे गर्म पानी वाले इलाकों में बनता है और जमीन पर आकर भारी तबाही मचाता है।
चक्रवात बनने के लिए कुछ खास चीजों का एक साथ होना बहुत जरूरी है और यह सब समंदर के ऊपर ही शुरू होता है। सबसे पहले, चक्रवात बनने के लिए समंदर की सतह का पानी बहुत ज्यादा गर्म होना चाहिए (करीब 26.5°C या उससे ज़्यादा)। यह गर्मी ही तूफान की ताकत होती है।
जब पानी गर्म होता है, तो उसके ऊपर की हवा भी गर्म होकर हल्की हो जाती है और तेजी से ऊपर उठने लगती है। हवा के ऊपर उठने से समंदर की सतह के पास एक खाली जगह बन जाती है। इस जगह पर हवा का दबाव (Pressure) बहुत कम हो जाता है। यही वह ‘केंद्र’ है जहाँ तूफान बनता है।
इस खाली जगह (कम दबाव वाले केंद्र) को भरने के लिए आस-पास की ठंडी हवा बहुत तेजी से दौड़कर अंदर आती है। जब ये हवाएँ केंद्र की तरफ आती हैं, तो पृथ्वी के घूमने की ताकत (जिसे कोरिओलिस बल कहते हैं) के कारण ये सीधा न आकर, गोल-गोल घूमने लगती हैं। यह गोल घूमना ठीक वैसा ही होता है जैसे आप वॉश बेसिन से पानी निकालते हैं तो वह गोल घूमता है।
यह गोल घूमती हुई हवा लगातार ऊपर उठती रहती है और भाप बनकर बड़े-बड़े बादल बनाती है। जब हवा की रफ्तार 119 किलोमीटर प्रति घंटा से ऊपर पहुँच जाती है, तो यह एक पूरा चक्रवाती तूफान (साइक्लोन) कहलाता है। चक्रवात ‘दितवाह’ भी बंगाल की खाड़ी में ऐसे ही बना है, और अब यह श्रीलंका के पास से घूमते हुए भारत के तटों की तरफ आ रहा है।
चक्रवात इतना खतरनाक क्यों होता है?
चक्रवात सिर्फ हवा या बारिश नहीं होते, बल्कि ये तीन चीजों से मिलकर सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाते हैं। तूफान में हवा की रफ्तार इतनी ज्यादा होती है कि यह पेड़ों को जड़ से उखाड़ देती है, मकानों और इमारतों को तोड़ देती है। इससे बिजली के खंभे भी गिर जाते हैं, जिससे सब जगह अंधेरा छा जाता है।
चक्रवात अपने साथ बहुत ज्यादा बारिश लाते हैं। यह बारिश इतनी होती है कि कुछ ही घंटों में बाढ़ आ जाती है। बाढ़ का पानी घरों और खेतों को डुबो देता है, जिससे बहुत नुकसान होता है। यह सबसे बड़ा खतरा होता है। तेज हवाएँ समंदर के पानी को बहुत ऊँचा उठा देती हैं और ये ऊँची लहरें (जैसे एक चलती हुई दीवार) तेजी से जमीन की तरफ आती हैं। इससे तटीय इलाके पल भर में पानी में डूब जाते हैं, जिससे जान-माल का सबसे ज्यादा नुकसान होता है।
चक्रवात इन तीनों चीजों से मिलकर खेती को, जानवरों को और पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था को बहुत बुरी तरह बर्बाद कर देते हैं। इसलिए, जैसे ही मौसम विभाग ‘रेड अलर्ट’ जारी करे, हमें तुरंत सुरक्षित जगह पर चले जाना चाहिए।
श्रीलंका पर चक्रवात ‘दितवाह’ का भयानक असर
साइक्लोन ‘दितवाह’ श्रीलंका के लिए एक बड़ी आफत बनकर आया। वहाँ की सरकार ने इसे ‘ऐसी तबाही जो पहले कभी नहीं देखी’ बताया है। इस तूफान की वजह से 120 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 130 लोग अभी भी लापता हैं। जोरदार बारिश के कारण कई जगहों पर बाढ़ आ गई और पहाड़ों या मिट्टी वाली जगहों पर जमीन खिसकने (Landslides) की घटनाएँ हुईं।
हालात इतने खराब थे कि सरकार को करीब 44 हजार लोगों को उनके घरों से निकालकर स्कूलों और दूसरी सुरक्षित जगहों पर बने कैंपों में पहुँचाना पड़ा। राजधानी कोलंबो और उसके आस-पास के इलाकों में पानी बहुत बढ़ गया था, इसलिए लोगों को तुरंत सुरक्षित जगह जाने को कहा गया। तूफान के कारण वहाँ स्कूल बंद कर दिए गए, ट्रेनें रोक दी गईं, और यहाँ तक कि शेयर बाजार को भी जल्दी बंद करना पड़ा।
PM मोदी के विजन ‘SAGAR’ से जुड़ा ‘ऑपरेशन सागर बंधु’
‘ऑपरेशन सागर बंधु’ सिर्फ श्रीलंका को मदद पहुँचाने का काम नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि भारत अपने पड़ोसियों के लिए कितना भरोसेमंद दोस्त है। भारत यह दिखाना चाहता है कि वह हिंद महासागर में ‘सबसे पहले’ खड़ा होने वाला देश और सुरक्षा देने वाला है।
मुश्किल समय में मदद करके भारत ने श्रीलंका के साथ अपने रिश्ते को और मजबूत किया है। यह दुनिया को दिखाता है कि भारत के पास आपदा में सहायता (HADR) पहुँचाने की कितनी अच्छी क्षमता है। भारत ने इस राहत काम में INS विक्रांत जैसे अपने बड़े-बड़े और आधुनिक युद्धपोतों को लगाया। इससे दुनिया भर में यह संदेश गया कि भारत की समुद्री ताक़त कितनी ज्यादा है और वह कितनी तेजी से किसी भी हालात में काम कर सकता है।
#OperationSagarBandhu unfolds. @IAF_MCC C-130 J plane carrying approx 12 tons of humanitarian aid including tents, tarpaulins, blankets, hygiene kits, and ready-to-eat food items lands in Colombo.
जब भी किसी पड़ोसी देश पर संकट आता है तो चीन भी वहाँ अपनी पैठ बनाने की कोशिश करता है। लेकिन भारत ने तेजी से और बिना किसी स्वार्थ के मदद भेजकर यह साबित किया कि वह इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा भरोसेमंद दोस्त है। यह चीन के बढ़ते असर को भी संतुलित करता है। यह ऑपरेशन प्रधानमंत्री मोदी के एक बड़े विजन ‘SAGAR’ (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) से जुड़ा है। इसका मतलब है कि भारत पूरे हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा और तरक्की के लिए हमेशा तैयार है।
चक्रवात ‘दितवाह’ का भारत पर क्या असर होगा?
श्रीलंका में तबाही मचाने के बाद, चक्रवात ‘दितवाह’ अब भारत की तरफ बढ़ रहा है। मौसम विभाग (IMD) का कहना है कि यह 30 नवंबर 2025 की सुबह तक हमारे किनारे वाले इलाकों यानी उत्तरी तमिलनाडु, पुडुचेरी और दक्षिण आंध्र प्रदेश के पास पहुँच सकता है। तूफान के खतरे को देखते हुए, मौसम विभाग ने तमिलनाडु के कई जिलों जैसे कुड्डालोर में ‘रेड अलर्ट’ यानी सबसे बड़ी चेतावनी जारी की है।
इसका मतलब है कि यहाँ बहुत-बहुत ज्यादा बारिश हो सकती है। इन इलाकों में अगले दो दिनों (शनिवार और रविवार) तक बाढ़ आ सकती है और निचले इलाके पानी में डूब सकते हैं। हवा की रफ्तार 70 से 90 किलोमीटर प्रति घंटा तक जा सकती है, जिससे पेड़ गिर सकते हैं, बिजली के खंभे टूट सकते हैं, और मकानों को नुकसान हो सकता है।
इसके अलावा, चेन्नई और आसपास के जिलों में भी तेज बारिश होगी, जिससे फ्लाइट सेवाएँ रुक गई हैं और रोजमर्रा के काम पर बुरा असर पड़ेगा, इसलिए ‘ऑरेंज अलर्ट’ जारी कर दिया गया है। इस खतरे से निपटने के लिए, प्रशासन ने पूरी तैयारी कर ली है। अकेले कुड्डालोर जिले में 1.5 लाख लोगों को रखने के लिए 233 राहत कैंप तैयार किए गए हैं। पानी निकालने के लिए मोटर और टीमें भी तैयार हैं और सभी सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर 24 घंटे काम कर रहे हैं।
#WATCH कुड्डालोर, तमिलनाडु: चक्रवात 'दितवाह' पर जिला कलेक्टर सिबी अधित्या सेंथिल कुमार ने कहा, "चक्रवात दितवाह को देखते हुए IMD ने कुड्डालोर जिले के लिए बहुत भारी बारिश की चेतावनी जारी की है। जिला प्रशासन ने तैयारी के लिए कई कदम उठाए हैं…हमने 233 राहत सेंटर भी पहचाने हैं जहां… pic.twitter.com/YOMBX4DZ0S
लोगों को बहुत जरूरी सलाह दी गई है कि वे अगले कुछ दिनों तक घर के अंदर ही रहें। समंदर में जाने वाले मछुआरों को 1 दिसंबर 2025 तक समंदर में जाने से साफ मना किया गया है। साथ ही, चेन्नई और श्रीलंका के बीच की फ्लाइटों पर असर पड़ा है। अगर किसी को कोई परेशानी हो तो वे सरकार के हेल्पलाइन नंबर 1077 पर फोन कर सकते हैं।
पहलगाम हमला हो या दिल्ली कार ब्लास्ट भारत में जब भी किसी इस्लामिक आतंकी हमले की बात होती है, आम लोग जब हमले के मजहबी उद्देश्यों पर सवाल उठाते हैं, तो इसे इस्लामोफोबिया कहकर मुद्दा बदलने की कोशिश की जाती है। इस बीच, संयुक्त राष्ट्र के आठ विशेष प्रतिवेदकों (UN Special Rapporteurs) ने एक संयुक्त बयान जारी कर जम्मू-कश्मीर में भारत की आतंकवाद-रोधी कार्रवाइयों पर चिंता जताई है।
UN मानवाधिकार परिषद द्वारा नियुक्त इन स्वतंत्र विशेषज्ञों ने पाकिस्तान समर्थित पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की और पीड़ितों व भारत सरकार के प्रति संवेदना जताई। उन्होंने कहा, “हम इस जघन्य आतंकवादी हमले की स्पष्ट शब्दों में निंदा करते हैं लेकिन आतंकवाद से लड़ते समय सरकारों को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का सम्मान करना चाहिए।”
इन विशेषज्ञों ने भारत द्वारा किए गए कदम जैसे अस्थायी मीडिया प्रतिबंध, इंटरनेट बंद करना और 8,000 सोशल मीडिया अकाउंट ब्लॉक करने को ‘असंगत’ और अभिव्यक्ति, संगठन और शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने की की स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया है।
संयुक्त बयान में दावा किया गया कि पहलगाम हमले के बाद चलाए गए व्यापक अभियान में भारतीय अधिकारियों ने 2,800 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया, जिनमें पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता भी शामिल बताए गए।
कई लोगों को PSA और UAPA जैसे कठोर कानूनों में बुक किया गया, जिन्हें UN ने लंबे समय तक बिना मुकदमे के हिरासत की अनुमति देने वाले और आतंकवाद की अस्पष्ट परिभाषाएँ रखने वाले कानून कहा है।
रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया कि कई बंदियों को परिवार और वकीलों से मिलने नहीं दिया गया, कुछ को प्रताड़ित किया गया, हिरासत में संदिग्ध मौतें हुईं, भीड़ द्वारा उग्रवादियों या उनके समर्थकों की हत्या हुई और कश्मीरी व मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भेदभावपूर्ण कार्रवाई की गई।
UN-OHCHR की इस रिपोर्ट में शामिल विशेषज्ञों में बेन सॉल, मॉरिस टिडबाल-बिन्ज, नजीला घनेआ, बालकृष्णन राजगोपाल, निकोलस लेव्राट, पाउला गवीरिया, मैरी लॉरल, गैब्रिएला सिट्रोनी (चेयर-रिपोर्टर), ग्राजीना बरानोव्स्का (वाइस-चेयर), आउआ बाल्डे, एना लोरेना डेलगाडिलो पेरेज, मोहम्मद अल-ओबैदी और ऐलिस जिल एडवर्ड्स शामिल हैं।
हिंदुओं पर हुए आतंकी हमले के बावजूद UN विशेषज्ञों की चिंता इस्लामोफोबिया पर ज्यादा
UN विशेषज्ञों ने अपने पुराने इस्लामो-लेफ्ट नैरेटिव को दोहराते हुए दावा किया कि भारतीय अधिकारियों ने संदिग्ध आतंकियों से जुड़े परिवारों के घर, दुकानें और संपत्तियाँ बिना कोर्ट आदेश और कानूनी प्रक्रिया के तोड़ दीं। उन्होंने इसे सामूहिक सजा करार दिया।
UN रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पहलगाम हमले के बाद कई कश्मीरी छात्रों को निगरानी और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। उनके अनुसार, विश्वविद्यालयों द्वारा सरकार के निर्देश पर छात्रों की जानकारी माँगना भी हैरासमेंट है।
पाकिस्तान समर्थित जिहादियों ने इस हमले में स्पष्ट रूप से हिंदू और अन्य गैर-मुस्लिम पर्यटकों को ही निशाना बनाया, जिसके कारण सोशल मीडिया पर हमले के धार्मिक उद्देश्य पर खुलकर चर्चा हुई। कई लोगों ने कहा कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता जैसे घिसे-पिटे तर्कों से जिहादी आतंकवाद की जड़ तक पहुँचना संभव नहीं।
UN विशेषज्ञों ने इन चर्चाओं को ही मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने और हिंसा के लिए उकसाने की श्रेणी में रखा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह माहौल सत्ता पक्ष के राजनीतिक नेताओं की टिप्पणियों से और भड़काया गया।
UN प्रतिवेदकों ने असम-गुजरात के अतिक्रमण विरोधी अभियान को भी पहलगाम की आतंक विरोधी कार्रवाई से जोड़ दिया
UN प्रतिवेदकों ने यह दावा भी किया कि असम और गुजरात में चले अवैध अतिक्रमण विरोधी अभियान को अधिकारियों ने पहलगाम हमले के बाद हुई देशव्यापी कार्रवाई से जोड़ दिया, ताकि यह दिखाया जा सके कि आतंकवाद से असंबंधित मुसलमान भी केवल धर्म के आधार पर निशाना बनाए जा रहे हैं।
आठ UN विशेषज्ञों के संयुक्त बयान में कहा गया, “गुजरात और असम में बड़ी संख्या में मुस्लिमों के घर, मस्जिदें और कारोबार तोड़े जाने की खबरें मिलीं।” उन्होंने यह भी दावा किया कि करीब 1,900 मुस्लिमों और रोहिंग्या शरणार्थियों को बिना कानूनी प्रक्रिया के बांग्लादेश और म्यांमार भेज दिया गया।
UN प्रतिवेदकों के अनुसार, ऐसे निष्कासन अंतरराष्ट्रीय कानून में तय नॉन-रिफाउलमेंट सिद्धांत का उल्लंघन हैं, जो किसी व्यक्ति को उस देश में वापस भेजने से रोकता है जहाँ उसे उत्पीड़न, मौत, यातना या किसी गंभीर खतरे का सामना करना पड़ सकता है।
असम और गुजरात में पिछले एक साल से अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई चल रही है, जिसमें सरकारी जमीन पर कब्जा कर बनाए गए मजार-दरगाह, अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों द्वारा कब्जाई गई जमीन तथा अन्य गैरकानूनी निर्माणों को हटाया जा रहा है।
ये अभियान पाहलगाम हमले से काफी पहले शुरू हो चुके थे और इनका उससे कोई सीधा संबंध नहीं था। गुजरात में हमले के कुछ दिन बाद जो एकमात्र बड़ी कार्रवाई हुई, वह चांडोला झील के आसपास अवैध ढाँचों को हटाने की थी, वह भी इसलिए क्योंकि गुजरात हाई कोर्ट ने इसकी अनुमति दी थी।
UN रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि निर्दोष कश्मीरी नागरिकों के घर गिराए गए, जबकि जमीन पर हुई कार्रवाई केवल प्रमाणित आतंकियों के घरों पर थी, जैसे अहमद कुट्टे का शोपियाँ वाला घर, कुलगाम के सक्रिय आतंकी जाकिर का घर, पुलवामा के अहसान-उल-हक शेख का घर जो 2018 में पाकिस्तान गया था, 90 के दशक में पाकिस्तान भागा और कभी लौटा नहीं फारूक टिवडा का घर और लश्कर से जुड़े आदिल हुसैन ठोकर (बिजबेहड़ा) तथा आसिफ शेख (त्राल) का घर, जिन्हें सुरक्षा बलों ने विस्फोटकों की मदद से उड़ा दिया।
इनमें से कोई भी साधारण नागरिक नहीं था। पहलगाम हमले के बाद अवैध विदेशी नागरिकों की पहचान, हिरासत और निर्वासन की प्रक्रिया तेज जरूर हुई लेकिन इसे मुसलमानों के खिलाफ प्रतिशोध बताना तथ्यहीन और पक्षपातपूर्ण है।
रोहिंग्या मुद्दे पर भी UN की बात वास्तविकता से मेल नहीं खाती, क्योंकि भारत में UNHCR कार्ड को कानूनी मान्यता नहीं है और म्यांमार रोहिंग्याओं को अपना नागरिक नहीं मानता, इसलिए ड्यू प्रोसेस का पालन वैसा संभव नहीं जैसा UN चाहता है।
भारत रोहिंग्याओं को स्थायी रूप से बसाने के लिए बाध्य नहीं है, क्योंकि वे बांग्लादेश के रास्ते भारत आते हैं और यहाँ आकर उत्पीड़ित समूह की श्रेणी में नहीं रहते। ऑपइंडिया ने ऐसे बहुत से केस का खुलासा किया है जिनमें बांग्लादेशी मुस्लिम अवैध घुसपैठिए भी शरणार्थी नहीं बल्कि आर्थिक लाभ या अवैध गतिविधियों के लिए भारत आने वाले घुसपैठिए हैं, जो कई बार फर्जी दस्तावेज बनाकर सरकारी योजनाओं का लाभ लेते, अपराधों में भी शामिल पाए गए हैं।
ऐसी स्थिति में इनका पता लगाना, हिरासत में लेना और देश से बाहर भेजना ही एकमात्र उचित उपाय है और गैर-वापसी (non-refoulement) सिद्धांत का मतलब यह नहीं है कि भारत उन्हें हमेशा अपने देश में रखे या नागरिकता दे।
UN एक्सपर्ट्स ने टेरर फंडिंग आरोपितों इरफान मेहराज और खुर्रम परवेज को ‘ह्यूमन राइट्स डिफेंडर’ बताकर उनकी बिना शर्त रिहाई माँगी
अपने संयुक्त बयान में UN एक्सपर्ट्स ने कहा कि तथाकथित ‘ह्यूमन राइट्स डिफेंडर’ इरफान मेहराज और खुर्रम परवेज को कड़े कानूनों के तहत सालों से मनमाने तरीके से हिरासत में रखा गया है। उन्होंने माँग की, “जम्मू-कश्मीर में मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए सभी लोगों को तुरंत और बिना शर्त रिहा किया जाए।”
UN मानवाधिकार विशेषज्ञों में से एक, मैरी लॉरल, एक वीडियो बयान में खुर्रम परवेज की खुलकर तारीफ करती दिखीं और उन्हें बेहतरीन मानवाधिकार रक्षक बताया।
हालाँकि, इन विशेषज्ञों ने यह नहीं बताया कि इरफान मेहराज और खुर्रम परवेज को मानवाधिकार बचाने के लिए गिरफ्तार नहीं किया गया था। इरफान मेहराज, जो टू सर्कल्स से जुड़ा हैं, उनको अवार्ड-विनिंग पत्रकारिता के लिए नहीं, बल्कि आतंकवादी फंडिंग मामले में कथित संलिप्तता के कारण गिरफ्तार किया गया था।
UNHCR के रिपोर्टर्स द्वारा जारी बयान से लिया गया अंश
इरफान मेहराज का नजदीकी संबंध एक्टिविस्ट खुर्रम परवेज से था और वह जम्मू-कश्मीर कोएलिशन ऑफ सिविल सोसायटीज (JKCCS) का सदस्य भी था। NIA ने कहा था कि JKCCS घाटी में आतंकवादी गतिविधियों को फंडिंग कर रहा था और मानवाधिकार संरक्षण का बहाना करके अलगाववादी एजेंडा भी चला रहा था। जून 2020 में फेसबुक पोस्ट में इरफान मेहराज ने विवादित एक्टिविस्ट खुर्रम परवेज की सराहना की और लिखा, आप हमें हर दिन प्रेरित करते रहते हैं।
UN विशेषज्ञों ने भारतीय सरकार से कहा कि वह अपने आतंकवाद विरोधी कानून और कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के अनुरूप बनाए और सभी कथित उल्लंघनों की स्वतंत्र जाँच कर जवाबदेही सुनिश्चित करे। उन्होंने भारत और पाकिस्तान से जम्मू-कश्मीर विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने की भी अपील की।
UN मानवाधिकार विशेषज्ञों ने अपने बयान में पाकिस्तान की निंदा नहीं की और न ही पाकिस्तान स्थित इस्लामी आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का नाम लिया, जिसका ही एक ग्रुप पाहलगाम हमले के पीछे था। साफ है कि UN विशेषज्ञ सीमा पार हिंसा के विनाशकारी चक्र को खत्म करना चाहते हैं, लेकिन जिहादी हिंसा के पाकिस्तान समर्थित अपराधियों, उनके मददगारों और संरक्षकों का नाम लेने से बच रहे हैं।
कारवाँ मैगजीन ने UN रिपोर्टर्स के बयान से महीनों पहले के प्रोपेगैंडा को सही ठहराया
हिन्दुओं और भारत के खिलाफ प्रोपेगैंडा के लिए कुख्यात कारवाँ मैगज़ीन ने बुधवार (26 नवंबर 2025) को X पर एक पोस्ट में UN मानवाधिकार विशेषज्ञों के बयान का हवाला दिया। मैगजीन ने लिखा कि इस साल जून में उसने वही रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जो अब UN विशेषज्ञों ने हाइलाइट की है।
कारवाँ ने लिखा, “कम से कम आठ संयुक्त राष्ट्र विशेष Rapporteurs ने सोमवार (24 नवंबर 2025) को चेतावनी दी कि 22 अप्रैल 2025 को पाहलगाम में हुए घातक हमले के बाद भारतीय अधिकारियों ने कश्मीर में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन किए।”
कारवाँ ने जून 2025 में ‘कस्टोडियल किलिंग्स, हिरासत और ध्वंस ने शोकग्रस्त कश्मीर को कैसे प्रभावित किया’ शीर्षक से रिपोर्ट प्रकाशित की थी। @jatinder_tur ने लिखा कि कथित आतंकियों के घरों का ध्वंस कश्मीर में नया अभ्यास है जबकि हिरासत, गुमशुदगी और संदिग्ध फौजी हत्याएँ समाज ने धीरे-धीरे स्वीकार करना सीख लिया था।”
मैगजीन ने आगे लिखा, “यह एक घटिया तौर पर इस्तेमाल की गई रणनीति है, जो मुख्यभूमि की राजनीति से आयातित है और पहलगाम हमले के बाद कश्मीर में अपनाई गई। फर्क इतना था कि कश्मीर में यह ध्वंस पुलिस या नगरपालिका अधिकारियों ने नहीं किया, बल्कि सेना ने किया और घरों को बुलडोजर से नहीं बल्कि सैन्य स्तर के विस्फोटकों से ढहाया गया।”
कारवाँ और UN के कुछ रिपोर्टर्स द्वारा फैलाए गए दावों के विपरीत, भारतीय सुरक्षा एजेंसियाँ किसी भी मुस्लिम व्यक्ति को यूँ ही पकड़कर प्रताड़ित नहीं करतीं और न ही बदले की भावना से कार्रवाई करती हैं।
पहलगाम हमले की जाँच जब राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को सौंपी गई, तो उसने सबूतों के आधार पर गिरफ्तारियाँ कीं। जून में दो ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) बशीर अहमद जोठात और परवेज अहमद को पकड़ा गया था, जो पाकिस्तान के लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े तीन आतंकियों को पनाह देने के आरोप में पकड़े गए। नवंबर में NIA की विशेष कोर्ट ने उनकी रिमांड बढ़ाई और कानूनी सहायता देने में किसी तरह की रुकावट नहीं हुई।
कारवाँ की रिपोर्ट, जिसे जतिंदर कौर तुर ने लिखा था, इसमें तीन कश्मीरी महिलाओं दिलशादा और अमीना का मामला उठाया गया है। रिपोर्ट ने दावा किया कि इन्हें पुलिस की ओवरग्राउंड वर्कर्स वाली वॉचलिस्ट में एक दशक से भी पहले जोड़ा गया था।
यह कार्रवाई तब हुई थी जब दिलशादा के पति तालीब लाली और अमीना के पति अल्ताफ लाली को सुरक्षा बलों ने गिरफ्तार किया था। उन पर हिजबुल मुजाहिदीन को फंडिंग देने का आरोप था।
कारवाँ ने अपने लेख में इन लोगों को इस तरह पेश किया जैसे वे किसी अन्याय के शिकार हों। उसमें लिखा है कि तालीब लाली की गिरफ्तारी बारह साल पहले हुई थी और जाँच एजेंसियों ने उसे हिजबुल मुजाहिदीन का बड़ा फाइनेंसर बताया था।
तब से तालीब दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है और मामला अभी भी चल रहा है। लेख में इस बात को ‘संवेदनात्मक शैली’ में लिखा गया है, मानो वह किसी निर्दोष व्यक्ति की पीड़ा बता रहा हो जबकि मामला गंभीर आतंकी फंडिंग के आरोपों से जुड़ा है।
कारवाँ ने अपनी रिपोर्ट में यह नहीं बताया कि अल्ताफ लाली भी आतंकियों का सहयोगी था। पहलगाम हमले के कुछ दिनों बाद बांदीपोरा में सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ में वह मारा गया था। इस दौरान दो सुरक्षा कर्मी भी घायल हुए थे। सर्च ऑपरेशन के दौरान आतंकियों ने गोलीबारी शुरू की, जिसके जवाब में पुलिस ने कार्रवाई की और अल्ताफ लाली ढेर हुआ।
कारवाँ ने यह भी नहीं बताया कि तालीब लाली केवल आतंकी फंडिंग का आरोपित नहीं था बल्कि 2013 में मुठभेड़ में मारे जाने से पहले वह कश्मीर का सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाला आतंकी और हिजबुल मुजाहिदीन का टॉप कमांडर था। जब किसी परिवार के दो सदस्य आतंक में लिप्त हों वह भी एक टॉप कमांडर तो सुरक्षा एजेंसियाँ स्वाभाविक रूप से सतर्क रहती हैं।
कारवाँ पहले भी भारतीय सुरक्षा बलों की छवि खराब करने की कोशिश कर चुका है। उसने इससे पहले भी एक भ्रामक और आपत्तिजनक लेख छापा था, जिसमें भारतीय सेना पर यातना और हत्या के आरोप लगाए गए थे। यह लेख भी जतिंदर कौर तुर ने लिखा था और बाद में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) के आदेश पर हटा दिया गया। यह मामला अब अदालत में लंबित है।
पहलगाम हमले की शुरुआती जाँच में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने करीब एक हजार से अधिक लोगों से पूछताछ और हिरासत में लिया था। ये कार्रवाइयाँ अंधाधुंध नहीं थीं बल्कि खुफिया इनपुट और आतंकियों की सप्लाई चेन तोड़ने के उद्देश्य से की गई थीं। बाद में कई लोगों को छोड़ भी दिया गया।
इस्लामो-वामपंथी मीडिया और अब UN के कुछ प्रतिनिधि UAPA और PSA जैसी कानूनों को कठोर बता रहे हैं जबकि कोर्ट कई मामलों में इन्हें सही ठहरा चुकी हैं।
कस्टोडियल किलिंग के दावे भी झूठे साबित हुए। पहलगाम हमले के बाद कुछ मीडिया समूहों और श्रीनगर के सांसद रुहुल्ला मेहदी ने कहा था कि इम्तियाज अहमद मागरे को सेना ने उठा लिया था और बाद में उसकी लाश मिली। बाद में पता चला कि 23 साल मागरे खुद आतंकियों की मदद करता था और हाईड आउट दिखाने के दौरान उसने खुद ही नदी में छलांग लगाकर आत्महत्या की। न उसे सेना ने मारा, न यातना दी।
कारवाँ का यह दावा भी गलत है कि मारे गए आतंकियों के शव परिवारों को न देना मानवाधिकार उल्लंघन है। पहले आतंकियों के अंतिम संस्कार में भारी भीड़ जमा होती थी, जहाँ उन्हें बलिदानियों, हीरो और मासूम बताकर महिमामंडित किया जाता था, जिससे नए लड़कों की भर्ती बढ़ती थी और पत्थरबाजी भी होती थी।
सरकार ने इन उग्र भीड़-एकत्रीकरण को रोकने के लिए शव परिवारों को न देने का निर्णय लिया, जिससे आतंकी महिमा-मंडन काफी कम हुआ है। फिर भी शवों को मजहबी रीति-रिवाजों के अनुसार, परिवार, मौलवी और प्रशासन की उपस्थिति में दफनाया जाता है। इसके बावजूद कारवाँ इस नीति को दंडात्मक बताकर आतंकियों के प्रति सहानुभूति दिखाता है।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)
नेपाल राष्ट्र बैंक (NRB) ने गुरुवार (27 नवंबर 2025) को नया 100 रुपए का नोट जारी किया, जिसमें नेपाल का संशोधित नक्शा शामिल किया गया है। इस नक्शे में भारत के तीन क्षेत्रों, कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा बताकर गलत तरीके से दिखाया गया है। यह डिजाइन नेपाल सरकार के पुराने फैसले के अनुसार बदला गया है और पहली बार नोट पर लागू हुआ है।
नए नोट पर पूर्व गवर्नर महाप्रसाद अधिकारी के हस्ताक्षर हैं और जारी वर्ष 2081 विक्रम संवत (2024) दर्ज है। नोट के बाईं तरफ माउंट एवरेस्ट की तस्वीर है और दाईं तरफ नेपाल के राष्ट्रीय फूल लालीगुराँस (Rhododendron) का वॉटरमार्क दिया गया है। बीच में हल्के हरे रंग में नेपाल का नक्शा और उसके पास अशोक स्तंभ की छवि छपी है, जबकि नीचे ‘लुम्बिनी, भगवान बुद्ध की जन्मस्थली’ लिखा है।
गौरतलब है कि नक्शे का डिजाइन नहीं बदला गया है, यह कई सालों से प्रचलन में है। लेकिन नोट पर दिए गए नक्शे को नेपाल सरकार द्वारा देश के नक्शे में संशोधन करके उसमें तीन भारतीय क्षेत्रों को शामिल करने के फैसले के तहत बदल दिया गया है।
नोट के पीछे की ओर एक-सींग वाला गैंडा और उसका बच्चा छपा हुआ है। इसके साथ ही सिक्योरिटी थ्रेड और दृष्टिबाधित लोगों के लिए उभरा हुआ काला बिंदु भी दिया गया है।
NRB के एक प्रवक्ता के अनुसार, नए 100 रुपए के नोट पर नेपाल का नक्शा पहले से ही मौजूद था और सरकार के निर्णय के अनुसार इसे संशोधित किया गया है। उन्होंने आगे बताया कि 10 रुपए, 50 रुपए, 500 रुपए और 1,000 रुपए जैसे विभिन्न मूल्यवर्ग के बैंक नोटों में से केवल 100 रुपए के नोट पर ही नेपाल का नक्शा अंकित है।
नेपाल ने ओली के नेतृत्व वाली सरकार के तहत अपने मानचित्र को किया था संशोधित
जून 2020 में, उस समय की नेपाल की के पी शर्मा ओली सरकार ने संसद की मंजूरी के बाद देश का नया नक्शा जारी किया था। इस नए नक्शे में भारत के तीन क्षेत्रों, कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल की सीमा में दिखाया गया था।
भारत ने इस कदम पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और भारत के विदेश मंत्रालय ने इस बदले हुए नक्शे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि नेपाल द्वारा की गई यह ‘कृत्रिम सीमा विस्तार’ ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं है, इसलिए मान्य नहीं है।
नेपाल का यह कदम उस समय आया जब भारत ने मई 2020 में उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग को जोड़ने वाली लिपुलेख लिंक रोड का उद्घाटन किया था। नेपाल ने इस पर आपत्ति जताई और दावा किया कि यह सड़क नेपाल की भूमि से होकर गुजरती है।
नेपाल लंबे समय से इन क्षेत्रों को लेकर भारत से कूटनीतिक बातचीत की माँग करता रहा है, जबकि भारत यह मानता है कि इन इलाकों को लेकर कोई विवाद नहीं है और नेपाल का दावा ऐतिहासिक प्रमाणों से साबित नहीं होता।
इसके बाद अगस्त में जब भारत ने चीन के साथ लिपुलेख व्यापार मार्ग को फिर से शुरू करने की घोषणा की, तो नेपाल ने एक बार फिर इस मामले को उठाया और अपना दावा दोहराते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी।
नेपाल अपने मूल्यवान पड़ोसी से कर रहा है झगड़ा
हाल ही में पूर्व हिंदू राष्ट्र नेपाल ने राजनीतिक अस्थिरता का दौर देखा, जिसके चलते ओली सरकार को सत्ता से बाहर होना पड़ा। वर्तमान में देश का संचालन एक गैर-निर्वाचित सरकार द्वारा किया जा रहा है। ऐसे समय में भारत के साथ काल्पनिक सीमा विवाद उठाना नेपाल का बेहद कमजोर और असफल कूटनीतिक कदम माना जा रहा है।
जब देश भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़े पैमाने पर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौट रहा है, तब नेपाल को अपनी राजनीतिक स्थिरता और विकास पर ध्यान देना चाहिए था। इसके बजाय वह भारत जैसे पड़ोसी और सहयोगी देश के साथ अनावश्यक तनाव पैदा कर रहा है, एक ऐसा देश जिसने हमेशा संकट की घड़ी में नेपाल का साथ दिया है।
नेपाल की भौगोलिक स्थिति और भारत के साथ साझा सुरक्षा हितों को देखते हुए, उसे घरेलू शांति और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना चाहिए। लेकिन पारंपरिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों को नज़रअंदाज करते हुए नेपाल की मौजूदा सरकार भारत के प्रति आक्रामक रवैया अपना रही है। माना जा रहा है कि यह रुख अमेरिका के दबाव में अपनाया गया है।
क्या है लिपुलेख विवाद?
लिपुलेख दर्रा भारत, नेपाल और चीन के संगम क्षेत्र में स्थित है और इस क्षेत्र को लेकर भारत और नेपाल के बीच विवाद बना हुआ है। नेपाल अपने आधिकारिक नक्शों और संविधान में लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को शामिल करता है।
नेपाल का दावा है कि 1815 के सुगौली संधि के अनुसार काली नदी सीमा तय करती है और यह विवादित क्षेत्र काली नदी के पश्चिम में आता है, इसलिए यह नेपाल का हिस्सा होना चाहिए। लेकिन भारत नेपाल के दावे को अस्वीकार करता है।
भारत का कहना है कि काली नदी का वास्तविक उद्गम स्थान नेपाल द्वारा बताए गए स्थान से नीचे है, इसलिए यह क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा है।
भारत का यह भी कहना है कि नेपाल के दावे ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और वह बातचीत के माध्यम से समाधान चाहता है, जबकि इस क्षेत्र पर नियंत्रण भारत के पास बना हुआ है। रणनीतिक दृष्टि से लिपुलेख दर्रा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत और चीन को जोड़ने वाला मार्ग है, जो दोनों देशों की संवेदनशील हिमालयी सीमा के पास स्थित है।
इसके अलावा, लिपुलेख भारत और चीन के बीच प्राचीन व्यापार मार्ग का हिस्सा रहा है और इस व्यापार समझौते को हाल ही में फिर से नवीनीकृत किया गया है। सुगौली संधि 2 दिसंबर 1815 को नेपाल राजशाही और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हस्ताक्षरित हुई और 4 मार्च 1816 को लागू हुई थी।
इस संधि के तहत नेपाल ने अपने कई क्षेत्र, खासकर काली नदी के पश्चिम में आने वाले इलाके, जिनमें आज विवादित क्षेत्र भी शामिल हैं, सौंप दिए थे। नेपाल अब संधि की अपनी व्याख्या के आधार पर काली नदी के पश्चिम में स्थित कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा के क्षेत्रों पर अपना दावा ठोक रहा है।
यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अदिति ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
अपनी इस्लामी पत्रकारिता के लिए कु्ख्यात आरफा खानम शेरवानी एक बार फिर सोशल मीडिया पर रोना-धोना मचाए हुए हैं। आरफा खानम का दुख ये है कि आखिर ये जो टीवी पर दिखने वाले पत्रकार हैं इनका चेहरा क्यों बदल रहा है। क्यों ये लोग हिंदू त्योहारों पर भारतीय परिधान पहन पहनकर टीवी कार्यक्रम करने लगे हैं। क्यों इनके माथे पर तिलक, हाथ में कलावा दिखाई देता है…?
आरफा ने इस दुख के बारे में अब तक कई लोगों के साथ साझा कर दिया है। वो खुलकर बता रही हैं कि पत्रकारों का ‘हिंदू’ रूप देखकर उन्हें कितनी पीड़ा है। कभी वो संविधान की तस्वीर साझा करके अपने जख्म पर मलहम लगा रही हैं। कभी वामपंथी ‘बुद्धिजीवियों’ से चर्चा करके।
दिलचस्प बात ये है कि आरफा खानम जिन्हें समस्या इस बात से है कि अन्य पत्रकार आखिर क्यों हिंदुत्व की ओर झुकाव दिखाने लगे हैं, उन आरफा को ये एहसास ही नहीं है कि उनकी पत्रकारिता कितनी एकतरफा है। पिछले कुछ सालों में अगर आरफा खानम द्वारा उठाए मुद्दों का विश्लेषण किया जाए तो समझ आएगा कि आरफा खानम सोते-जागते सिर्फ इस्लाम और मुसलमान करती हैं। और ऐसा करता देख जो लोग उनपर सवाल उठाते हैं उन्हें वो कम्युनल मानती है, उनके सेकुलर होने पर सवाल उठाती हैं।
आप आरफा का एक्स हैंडल देखेंगे तो पता चलेगा कि इस बार वह राम मंदिर के ध्वजारोहण कार्यक्रम की कवरेज देखकर बिलबिलाई हैं। उनकी प्रतिक्रिया देखकर समझ ये नहीं आ रहा कि उनकी समस्या मुसलमानों का दुख है या हिंदुओं के प्रति घृणा।
देख सकते हैं कि शुभांकर मिश्रा के एक पोस्ट जिसमें उन्होंने बताया था कि अयोध्या में 500 वर्ष बाद राम मंदिर पर केसरिया फहरा है। उन्होंने खुशी जताई थी कि वो उस युग में जन्मे हैं जब रामललाल को टेंट से निकलकर सिंहासन पर बैठते देखा गया। इस ट्वीट ने आरफा को ऐसा जख्म दिया कि उन्होंने शुभांकर के लिए लानत भेज दी। उन्होने लिखा “और देखते-ही-देखते हिंदी पत्रकारिता, ‘हिंदू पत्रकारिता’ में बदल गई। पत्रकार, क़लम के सिपाहियों से धर्म के सैनिक बन बैठे। और देखते-ही-देखते… लानत है!”
इसके बाद द वायर का एक वीडियो देखिए। आरफा रोने वाले अंदाज में भारतीय नागरिकों को बता रही हैं कि देखिए अयोध्या में ध्वाजारोहण हो रहा है लेकिन हमेशा इस बात को याद रखा जाए कि भारत का झंडा केसरिया नहीं बल्कि तिरंगा है। और संविधान की प्रस्तावना वो कसम है जो हम लोगों ने खाई थी जब देश आजाद हुआ था।
आरफा खानम
राम मंदिर ध्वजारोहण के दिन सविधान की बात कर रही थी
एक अन्य वायरल होती क्लिप में आरफा हिंदी मीडिया को टारगेट करती इसलिए नजर आ रही हैं क्योंकि वो राममंदिर की कवरेज करता है। वह सिद्धार्थ वरदराजन और सीमा चिश्ती से बात करते हुए अपनी पीड़ा जाहिर करती हैं। उनका कहना कि जो महिल पत्रकार स्टूडियो में कोट पेंट पहनकर आती थीं वो भगवा पहनकर और तिलक लगाकर क्यों आ रही हैं। वो गीता के श्लोक और भक्ति के भजन पढ़ रही हैं।
वह इस वीडियो में साफ बोल रही हैं कि जो कुछ हो रहा है उनसे वो देखा नहीं जा रहा। उनसे भजन श्लोक नहीं सुने जा रहे। उन्हें पता नहीं चल रहा कि वो कैसे इस वक्त को काटें। आरफा के ये चेहरे के भाव हो सकता है उन लोगों को भावुक कर रहे हों जिनके लिए असल में वह पत्रकारिता करती हैं, मगर बाकियों के लिए ये सब सिर्फ हास्यासपद है। कारण- आरफा की पत्रकारिता ही है।
आज आपको संविधान की प्रस्तावना पढ़कर सुनाने वाली आरफा खानम के बारे में कोई सेकुलर राय बनाने से पहले याद रखिएगा कि आरफा सालों से इस्लामी की कुरीतियों को मजहबी अधिकार दिखाकर उन्हें सपोर्ट करती रही हैं। उनके लिए पत्रकारिता निष्पक्ष सिर्फ तब तक है जब वो इस्लामी पक्ष रखे, अगर देश की हिंदू आबादी की कोई चर्चा होगी तो उससे हिंदी पत्रकारिता के हिंदू पत्रकारिता में तब्दील हो जाने का डर रहेगा।
मेरे साथ पढ़िये – हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता सुनिश्चित… pic.twitter.com/0SJ0tKhDxw
उनके लिए हलाला, पॉलीगेमी और तीन तलाक जैसे मुद्दे कभी भी चर्चा लायक नहीं लगे। उन्हें दिक्कत हुई तो सिर्फ अयोध्या में राम मंदिर से, वहाँ फहराते केसरिया झंडे से और भगवा कपड़ों में वहाँ पहुँचे भक्तों। अजीब बात ये है कि अपने आपको निष्पक्ष प याद करिए यही वो आरफा खानम हैं जिन्होने कर्नाटक में जब स्कूलों में हिजाब पहनने का मुद्दा गरमाया था उस समय स्कूल के यूनिफॉर्म कोड की जगह हिजाब पहनने वाली लड़कियों का समर्थन किया था। जो जायरा वसीम के एक्टिंग छोड़ने के फैसले पर सवाल उठाने वालों पर भड़की थीं।
क्या उस समय पर उन्हें याद नहीं आया कि देश का शैक्षणिक संस्थान अपने नियम मानने को अगर कह भी रहा है तो उसमें समस्या क्या है। तब क्यों नहीं आरफा ने ये रोना रोया मुस्लिम छात्राएँ क्यों हिजाब पहन-पहनकर स्कूल-कॉलेज को मदरसा जैसा बनाने का प्रयास कर रही हैं।
इसी तरह राम मंदिर पर जो आरफा रह रहकर अपना दुख बयान करती हैं क्या आप जानते हैं कि यही आरफा बामियान बुद्ध के विनाश को जस्टिफाई कर चुकी हैं। साल 2021 में आरफा ने ये बताना चाहा था कि तालिबान ने ‘हिन्दुत्व के गुंडों’ से प्रेरित होकर बामियान बुद्ध की विशाल मूर्ति को विस्फोटक से उड़ा दिया था। शेरवानी ने ट्वीट में लिखा कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस ने ही अफगानिस्तान में बौद्ध स्मारक के तालिबान द्वारा विनाश को प्रेरित किया था।
सोचकर देखिए कि जिन आरफा को बामिया बुद्ध की मूर्ति उड़ाने वालों के कृत्य का बचाव करने के लिए तक तर्क मिल रहा है। उन्हें कभी ये समझ क्यों नहीं आया कि राम मंदिर हिंदू के लिए क्या था? उनके लिए बाबरी का वह ढाँचा देश में सेकुलरिज्म,लोकतंत्र और संविधान के होने का प्रतीक था जिसे करोड़ों सनातनियों की भावना रौंदते हुए खड़ा किया गया था। हैरानी नहीं है कि आज जब उसी जगह, एक लंबी कानूनी लड़ाई जीतकर हिंदुओं ने अपने रामलला का मंदिर बना लिया है तो आरफा को क्यों सेकुलरिज्म,लोकतंत्र और संविधान खतरे में लगते हैं।