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वक्फ कानून का विरोध बहाना था, पूरी प्लानिंग के साथ की गई हिंदू पिता-पुत्र की हत्या: बंगाल की अदालत ने 13 मुस्लिमों को दी उम्रकैद, ममता का प्रोपेगेंडा भी किया ध्वस्त

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के जंगीपुर की एक ट्रायल कोर्ट ने सोमवार (22 दिसंबर 2025) को 72 साल के हरगोबिंदो दास और उनके 40 साल के बेटे चंदन दास की हत्या के मामले में 13 मुस्लिमों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। यह घटना 12 अप्रैल 2025 को मुर्शिदाबाद के धुलिया जिले की है, जब भीड़ ने बाप और बेटे को घर से खींचकर बेरहमी से हत्या कर दी थी।

आरोपितों की पहचान दिलदार नदाब, अस्माउल नदाब उर्फ कालू नदाब, इंजामुल हक, जियाउल हक, फेकारुल शेख, अजफरुल शेख उर्फ बिलाई, मोनिरुल शेख, एकबाल शेख, नुरुल शेख, सबा करीम, हजरत शेख, हरजत अली, अकबर अली उर्फ एकबर शेख और यूसुफ शेख उर्फ शेख यूसुप के रूप में की गई।

इन सभी आरोपितों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103(2), 310(2), 331(5), 191(3), 115(2), 126(2), 332(a) और 3(5) के तहत मामला दर्ज कर दोषी ठहराया गया। जांगीपुर उपमंडल न्यायालय के न्यायाधीश अमिताभ मुखोपाध्याय ने 23 दिसंबर 2025 को इन सभी दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई।

विशेष लोक अभियोजक बिवास चटर्जी ने बताया, “सभी 13 आरोपितों को हत्या, डकैती, जबरन प्रवेश, घातक हथियार से दंगा, चोट पहुँचाने और अवैध रूप से बँधक बनाने सहित अन्य BNS धाराओं के तहत दोषी ठहराया गया है। बंगाल में दोहरे हत्याकांड के मामले में यह सबसे तेज सजाओं में से एक है।”

आरोपितों को हत्या, लूट, घर में घुसपैठ, घातक हथियारों से दंगा और मारपीट सहित भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं में दोषी पाया गया। मामले की जाँच 25 सदस्यीय SIT ने की थी, जिसने तीन राज्यों में छापेमारी कर 983 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की।

परिवार ने कलकत्ता HC का दरवाजा खटखटाया, फैसले के बाद BJP नेता ने दी प्रतिक्रिया

कलकत्ता हाईकोर्ट में इस मामले की जाँच CBI से कराने की माँग को लेकर पीड़ित परिवार की याचिका पहले से दाखिल है, जिस पर सुनवाई अभी लंबित है। हरगोबिंदो दास की पत्नी ने कहा है कि आरोपितों को सजा सुनाए जाने के बाद ही आगे की कानूनी कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा।

वहीं, फैसले के बाद BJP नेता अमित मालवीय ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ममता बनर्जी के शासन में पश्चिम बंगाल हिंदू बंगालियों के लिए लगातार असुरक्षित होता जा रहा है और उन्हें निशाना बनाकर हिंसा की जा रही है। उन्होंने पिता-पुत्र की भीड़ द्वारा की गई हत्या को इस गंभीर स्थिति का दुखद और चिंताजनक उदाहरण बताया।

यह दिल दहला देने वाली घटना इलाके में वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ हुई हिंसक आंदोलन के बाद सामने आई थी। हालाँकि, BJP नेता अमित मालवीय ने कहा कि कोर्ट के जज ने अपने फैसले में साफ तौर पर कहा है कि इस हत्या का वक्फ से कोई लेना-देना नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले को लेकर लोगों को गुमराह करने और असली जिम्मेदारी से ध्यान हटाने की कोशिश की गई।

मालवीय ने आगे कहा कि सजा मिलने से पीड़ित परिवार का नुकसान पूरा नहीं हो सकता और इससे राज्य में रह रहे हिंदुओं के मन से डर खत्म नहीं होता। उन्होंने जोर देकर कहा कि कानून-व्यवस्था, सभी को समान सुरक्षा और सच्चाई से किसी भी राजनीतिक फायदे के लिए समझौता नहीं किया जाना चाहिए।

हरगोबिंदो दास की पत्नी पारुल दास ने याद किया वो भयावह मंजर

दिवंगत हरगोबिंदो दास की पत्नी पारुल दास ने मई महीने में घटना का आँखों देखा हाल बताया था। उन्होंने कहा, “सबसे पहले भीड़ ने हमारी दुकान तोड़ी, सारा सामान लूट लिया और चली गई। बाद में लौटकर उन्होंने हमारी रसोई को तोड़ दिया। फिर छत पर पत्थर, काँच और बोतलें फेंकी गईं। बाड़ के दूसरी तरफ से ईंट-पत्थर बरसाए गए। तीसरी बार जब वे आए, तो उनके हाथों में फावड़े, बेलचे और धारदार हथियार थे।”

पारुल दास ने आगे बताया, “पिता और बेटा वहीं खड़े थे। भीड़ ने दोनों को घसीटकर बाहर निकाला। मेरे पति को नाले के पास मार डाला गया और मेरे बेटे को उस पेड़ के नीचे।” जब उनसे पूछा गया कि क्या पुलिस मदद के लिए आई थी, तो उन्होंने कहा, “नहीं, कुछ भी नहीं। अगर तीसरी बार पुलिस आ जाती, तो यह हत्या नहीं होती। पुलिस चार घंटे बाद आई।” उन्होंने बताया कि टीवी पर दिखाई गई तस्वीरों से ही वह हमलावरों को पहचान सकीं।

पारुल दास ने कहा, “हम डर के साए में जी रहे हैं। हमें यहाँ BSF कैंप चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें आज तक समझ नहीं आया कि उनके परिवार के साथ इतनी क्रूरता क्यों की गई, क्योंकि “हमारी किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी।” इसके साथ ही पारुल दास और उनकी बहू पिंकी दास ने पश्चिम बंगाल पुलिस और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के कुछ लोगों पर उन्हें परेशान करने का आरोप भी लगाया।

घटना के समय पश्चिम बंगाल में वक्फ संशोधन कानून को लेकर भारी हिंसा फैल रही थी और मुर्शिदाबाद जिला भी इससे बचा हुआ नहीं था। 11 और 12 अप्रैल को समसेरगंज के धुलियान नगरपालिका और तीनपाकुड़िया ग्राम पंचायत इलाके में हालात इतने बिगड़ गए कि कई लोगों को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा। इस दौरान घरों और गाड़ियों में आग लगा दी गई और जमकर तोड़फोड़ हुई।

इसी माहौल का फायदा उठाकर उसी इलाके के रहने वाले 13 आरोपितों ने इस वारदात को अंजाम दिया, जबकि यह हत्या सीधे तौर पर आंदोलन से जुड़ी नहीं थी। एक पुलिस अधिकारी के अनुसार, हमलावर तलवारों और लाठियों से लैस थे।

बाद में जो हथियार बरामद हुआ, वह तलवार जैसा एक धारदार औजार था, जिसके ऊपरी हिस्से में 90 डिग्री का मोड़ था। वहीं, SIT की चार्जशीट में बताया गया है कि पास की एक मस्जिद पर सुरक्षाबलों द्वारा फायरिंग की अफवाह फैल गई थी। इसी अफवाह के बाद नाराज भीड़ बेकाबू हो गई, घरों में आगजनी की गई और इसी हिंसा के दौरान पिता-पुत्र की बेरहमी से हत्या कर दी गई।

ममता बनर्जी की राजनीतिक साजिशें खोजने की कोशिश

यह साफ है कि यह हत्या एक नाराज और हिंसक भीड़ की दरिंदगी का नतीजा थी और इसका केंद्र सरकार के किसी कानून से सीधा कोई संबंध नहीं था। इसके बावजूद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने निर्दोष हिंदुओं की सुरक्षा में राज्य सरकार की नाकामी स्वीकार करने के बजाए इस संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी करना चुना।

इस्लामी इमामों के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी ने मुर्शिदाबाद की हिंसा को पूर्व-नियोजित बताया और इसके लिए BJP को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा, “कल मैंने ANI पर एक ट्वीट देखा, जिसमें गृह मंत्रालय के हवाले से कहा गया था कि इसमें बांग्लादेश की भूमिका है। अगर यह सच है, तो इसकी जिम्मेदारी केंद्र सरकार की बनती है। सीमा की सुरक्षा BSF करती है, राज्य सरकार नहीं। फिर आपने BJP के लोगों को बाहर से आकर यहाँ अशांति फैलाने और भाग जाने की इजाजत क्यों दी?”

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर जिम्मेदारी से बचने का आरोप लगाते हुए कहा कि हिंसा के लिए केंद्र दोषी है। उन्होंने दावा किया कि वह यह पता लगाएँगी कि सीमा क्षेत्रों में BSF ने किन स्थानीय युवकों को पैसे देकर पत्थरबाजी करवाई।

ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चेतावनी देते हुए कहा कि वक्फ संशोधन कानून खतरनाक है और देश को बांट देगा। उन्होंने प्रधानमंत्री से इस कानून को लागू न करने की अपील की। साथ ही, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर आरोप लगाया कि वह अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए देश को नुकसान पहुँचा रहे हैं और प्रधानमंत्री से उन्हें रोकने की माँग भी की। ममता ने यह भी दोहराया कि उनकी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस वक्फ कानून के खिलाफ लड़ाई में सबसे आगे है।

आलोचकों का कहना है कि बंगाल में फैली हिंसा को ममता बनर्जी और TMC नेताओं के भड़काऊ और विभाजनकारी बयानों ने और हवा दी। इसके बावजूद, ममता ने अशांति के लिए सभी को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन न तो कानून-व्यवस्था संभालने वाली पुलिस की जवाबदेही तय की और न ही अपनी सरकार की विफलता स्वीकार की।

राज्य सरकार की नाकामी SIT की चार्जशीट में भी साफ नजर आती है। प्रशासन न तो अफवाहों को रोक सका और न ही हिंसक तत्वों पर काबू पा सका, जो पूरे इलाके में उत्पात मचाते रहे। पीड़िता पारुल दास ने भी पुलिस की गंभीर लापरवाही की ओर इशारा करते हुए कहा था कि अगर पुलिस चार घंटे देर से नहीं आती, तो उनके पति और बेटे की जान बच सकती थी।

इसके बावजूद, वक्फ संशोधन कानून के नाम पर जब बंगाल में कट्टरपंथी हिंसा फैला रहे थे, तब भी TMC प्रमुख ममता बनर्जी लगातार ऐसे बयान देती रहीं जो इन तत्वों की भाषा से मेल खाते थे और साथ ही BJP पर हमले करती रहीं।

ममता बनर्जी ने RSS पर जमकर निशाना साधा

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा को लेकर BJP के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि BJP, उसके सहयोगी दल और RSS राज्य में हिंसा को लेकर झूठ और भ्रम फैलाने का काम कर रहे हैं।

ममता बनर्जी ने कहा, “BJP और उसके सहयोगी जो फैला रहे हैं, वह पूरी तरह गलत और संकीर्ण सोच पर आधारित है। उनकी बातें झूठ और गलत व्याख्याओं से भरी हैं। लोगों को उन पर भरोसा नहीं करना चाहिए। वे दंगे भड़काना चाहते हैं।” उन्होंने आगे कहा कि BJP पश्चिम बंगाल में अचानक बहुत आक्रामक हो गई है और RSS भी उनके साथ शामिल है। “पहले मैंने RSS का नाम नहीं लिया था, लेकिन अब कहना पड़ रहा है कि राज्य में फैलाए जा रहे इन बदसूरत झूठों की जड़ में RSS भी है,” उन्होंने कहा।

मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि BJP और RSS एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना का राजनीतिक फायदा उठाकर समाज को बाँटने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “वे विभाजन की राजनीति करना चाहते हैं और ‘फूट डालो, राज करो’ का खेल खेल रहे हैं, जो बेहद खतरनाक है।”

ममता बनर्जी ने यह भी दावा किया कि BJP और RSS उस सार्वभौमिक हिंदू धर्म को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें उनके अनुसार सभी धर्म शामिल हैं, हिंदू, इस्लाम, ईसाई, बौद्ध, जैन और यहूदी धर्म।

ममता की यह प्रतिक्रिया उस समय आई, जब पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सी वी आनंद बोस ने राज्य में फैली अराजकता को लेकर सरकार की कार्यप्रणाली की आलोचना करते हुए हालात को अजीब और बर्बर बताया था। वहीं, पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने भी कहा कि राज्य सरकार हिंसा को रोकने में पूरी तरह नाकाम रही।

निष्कर्ष

वक्फ संशोधन कानून के विरोध में हुई हिंसक प्रदर्शन को बहाना बनाकर दास परिवार के दो लोगों की हत्या की गई, जबकि उनका इस आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं था। इस दौरान नाराज भीड़ ने पिता और बेटे की जान ले ली।

लेकिन इस घटना के बाद पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाने या कानून-व्यवस्था पर सख्ती करने के बजाय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने BJP और RSS पर निशाना साधा। आलोचकों का कहना है कि वह अपने वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहती थीं, जबकि उसी दौरान राज्य में हिंसा और अराजकता फैली हुई थी।

राज्य में दंगे हो रहे थे, हिंदुओं की जान जा रही थी, लेकिन ममता बनर्जी और तृणमूल कॉन्ग्रेस के नेता व्यवस्था बहाल करने के बजाय वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ राजनीतिक बयानबाजी में लगे रहे।

बाद में जब हालात की गंभीरता सामने आई, तो मुख्यमंत्री ने अपनी सरकार और प्रशासन की कमियों पर ध्यान देने के बजाय BJP और RSS पर आरोप लगाना शुरू कर दिया, मानो जमीनी हालात उनकी सरकार की नाकामी का नतीजा न हों।

गूगल ने UP में शुरू की इमरजेंसी सर्विस, पुलिस-एम्बुलेंस तक पहुँचेगी आपकी लोकेशन: समझें- कैसे लोगों की जान बचाने में मिलेगी मदद

गूगल ने भारत में अपनी इमरजेंसी लोकेशन सर्विस (Google ELS) को चुपचाप लॉन्च कर दिया है। यह सर्विस आपातकालीन स्थितियों में लोगों की जान बचाने में बड़ा रोल निभाएगी। सबसे खास बात यह है कि इसे सबसे पहले उत्तर प्रदेश में शुरू किया गया है, जहाँ राज्य की 112 इमरजेंसी हेल्पलाइन से जोड़ा गया है। अब कोई भी एंड्रॉयड फोन यूजर यूपी में 112 डायल करेगा तो उसकी सटीक लोकेशन खुद-ब-खुद इमरजेंसी सेंटर तक पहुँच जाएगी।

यह फीचर एंड्रॉयड स्मार्टफोन में पहले से मौजूद है और अलग से कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती। जब यूजर 112 नंबर डायल करता है या इमरजेंसी मैसेज भेजता है, तो ELS अपने आप एक्टिव हो जाता है। यह GPS, वाई-फाई और मोबाइल नेटवर्क की मदद से लोकेशन का पता लगाता है और 50 मीटर के दायरे में सटीक जगह इमरजेंसी सर्विस को भेज देता है। भले ही कॉल कुछ सेकंड में कट जाए, लोकेशन फिर भी पहुँच जाती है।

फोन कटने के बाद भी पहुँच जाएगी सर्विस

उत्तर प्रदेश को पहले राज्य के तौर पर चुना गया क्योंकि यहाँ हर दिन लाखों इमरजेंसी कॉल और मैसेज आते हैं। पायलट टेस्टिंग के दौरान इस सर्विस ने 2 करोड़ से ज्यादा कॉल और मैसेज की लोकेशन सफलतापूर्वक पहचानने में मदद की। कई मामलों में कॉल कटने के बावजूद कंट्रोल रूम तक लोकेशन पहुँच गई। यह सर्विस उत्तर प्रदेश पुलिस और Pert Telecom Solutions के साथ मिलकर शुरू की गई है।

इमरजेंसी में परेशान लोग नहीं बता पाते सही जानकारी

अक्सर इमरजेंसी में लोग घबराहट या अनजान जगह होने की वजह से सही लोकेशन नहीं बता पाते। ऐसे में पुलिस या एम्बुलेंस को पहुँचने में देरी हो जाती है। Google ELS इसी समस्या का समाधान है। अब मदद माँगने वाले को लोकेशन बताने की टेंशन नहीं रहेगी। चाहे हादसा हो, मेडिकल इमरजेंसी हो या कोई खतरा, तुरंत सही जगह पर मदद पहुँच सकेगी।

नहीं होगा प्राइवेसी का हनन

प्राइवेसी को लेकर गूगल ने साफ किया है कि यह सर्विस पूरी तरह सुरक्षित है। ELS सिर्फ इमरजेंसी कॉल या मैसेज के समय ही एक्टिव होती है। लोकेशन फोन से सीधे इमरजेंसी सेंटर तक जाती है और गूगल खुद इसे नहीं देखता या स्टोर नहीं करता। यूजर्स की निजता का पूरा ख्याल रखा गया है। यह सर्विस मुफ्त है और कोई डेटा शेयर नहीं होता।

फिलहाल यह फीचर उत्तर प्रदेश में एंड्रॉयड 6.0 या उससे ऊपर वाले फोन पर उपलब्ध है। iOS यूजर्स के लिए अभी यह सर्विस नहीं आई है। गूगल ने कहा है कि जल्द ही इसे देश के बाकी राज्यों में भी लॉन्च किया जाएगा। राज्य सरकारों और लोकल अथॉरिटी के साथ मिलकर इसे धीरे-धीरे पूरे भारत में फैलाया जाएगा।

जान बचाने के मामले में गेम चेंजर साबित हो सकता है ये फीचर

ELS को ऑन करने के लिए यूजर्स को कुछ अलग नहीं करना पड़ता। जैसे ही 112 डायल करेंगे, फीचर खुद काम शुरू कर देगा। कोई ऐप डाउनलोड करने या सेटिंग बदलने की जरूरत नहीं। यह इनबिल्ट फीचर है जो बैकग्राउंड में रहता है और सिर्फ जरूरत पड़ने पर काम करता है।

सोशल मीडिया कंपनियाँ पहले से सुसाइड प्रिवेंशन जैसे मामलों में मदद करती रही हैं, लेकिन Google ELS फिजिकल इमरजेंसी के लिए सीधा और तेज समाधान है। खासकर ग्रामीण इलाकों या हाईवे पर जहाँ लोकेशन बताना मुश्किल होता है, यह जान बचाने वाली साबित होगी।

उत्तर प्रदेश पुलिस ने भी इस सर्विस का स्वागत किया है। इससे रिस्पॉन्स टाइम कम होगा और ज्यादा लोगों तक समय पर मदद पहुँच सकेगी। गूगल की यह पहल डिजिटल इंडिया के तहत सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है।

इसरो ने सफलतापूर्वक लॉन्च किया दुनिया का सबसे बड़ा कमर्शियल कम्युनिकेशन सैटेलाइट ब्लूबर्ड ब्लॉक-2: जानें- कैसे मोबाइल टॉवर-ऑप्टिकल फाइबर के दिन होंगे पूरे

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बुधवार (24 दिसंबर 2025) की सुबह सफलतापूर्वक अमेरिकी कंपनी एएसटी स्पेसमोबाइल के ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट को अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया।

यह लॉन्च इसरो के सबसे शक्तिशाली रॉकेट एलवीएम3-एम6 से सतीश धवन स्पेस सेंटर, श्रीहरिकोटा से हुआ। यह मिशन इसरो की कमर्शियल क्षमताओं का एक बड़ा प्रमाण है और भविष्य में इंटरनेट कनेक्टिविटी को पूरी तरह बदलने वाला साबित होगा।

लॉन्च की सफलता और तकनीकी विवरण

बुधवार की सुबह निर्धारित समय पर एलवीएम3 रॉकेट ने उड़ान भरी और लगभग 15 मिनट बाद ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट को पृथ्वी की निम्न कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट-एलईओ) में सफलतापूर्वक पहुँचा दिया। यह कक्षा पृथ्वी से करीब 520-600 किलोमीटर की ऊँचाई पर है। सैटेलाइट का वजन लगभग 6100 किलोग्राम है, जो इसरो के इतिहास में एलईओ में भेजा गया अब तक का सबसे भारी कमर्शियल पेलोड है। इससे पहले का रिकॉर्ड नवंबर 2025 में लॉन्च किए गए सीएमएस-03 सैटेलाइट का था, जो करीब 4400 किलोग्राम का था।

यह मिशन न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) और एएसटी स्पेसमोबाइल के बीच हुए कमर्शियल समझौते का हिस्सा है। एलवीएम3 रॉकेट की यह छठी ऑपरेशनल फ्लाइट है और यह पूरी तरह सफल रही। रॉकेट की तीन स्टेज दो सॉलिड बूस्टर, लिक्विड कोर स्टेज और क्रायोजेनिक अपर स्टेज ने बखूबी काम किया। इसरो की वेबसाइट और यूट्यूब चैनल पर लाइव स्ट्रीमिंग के जरिए लाखों लोग इस ऐतिहासिक पल के गवाह बने।

ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट की खासियतें

ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 दुनिया का सबसे बड़ा कमर्शियल कम्युनिकेशन सैटेलाइट है। इसमें 223 वर्ग मीटर का फेज्ड ऐरे एंटीना लगा है, जो लो अर्थ ऑर्बिट में तैनात होने वाला सबसे बड़ा कमर्शियल ऐरे है। यह सैटेलाइट सामान्य स्मार्टफोन को सीधे स्पेस से हाई-स्पीड 4जी/5जी इंटरनेट प्रदान करेगा। यूजर्स को कोई अतिरिक्त एंटीना या स्पेशल डिवाइस की जरूरत नहीं पड़ेगी।

यह तकनीक सेलुलर ब्रॉडबैंड को पूरी दुनिया में पहुँचाएगी। चाहे जंगल हो, समुद्र हो, रेगिस्तान हो या बिजली गुल होने की स्थिति में कहीं भी मोबाइल फोन से हाई-स्पीड इंटरनेट, वॉयस कॉल, वीडियो कॉल और डेटा उपलब्ध होगा। एएसटी स्पेसमोबाइल पहले ही सितंबर 2024 में पांच ब्लूबर्ड सैटेलाइट लॉन्च कर चुकी है, जो अमेरिका और कुछ अन्य देशों में कवरेज दे रहे हैं। ब्लॉक-2 इनसे कई गुना बड़ा और शक्तिशाली है, जो 10 गुना ज्यादा डेटा कैपेसिटी प्रदान करेगा।

टावर और ऑप्टिकल फाइबर के दिन लदने वाले हैं

यह सैटेलाइट भविष्य में मोबाइल टावर और ऑप्टिकल फाइबर केबल को पुराना बना देगा। दुनिया भर में समुद्र तल पर बिछी लाखों किलोमीटर लंबी केबल नेटवर्क की जरूरत कम हो जाएगी, क्योंकि डेटा का फ्लो जमीन से हटकर स्पेस की ओर शिफ्ट हो जाएगा। एएसटी स्पेसमोबाइल का लक्ष्य स्पेस-बेस्ड सेलुलर ब्रॉडबैंड नेटवर्क बनाना है, जो दुनिया के 50 से ज्यादा मोबाइल ऑपरेटर्स के साथ पार्टनरशिप में काम करेगा। इससे अरबों लोग जो अभी इंटरनेट से वंचित हैं, जुड़ सकेंगे।

इसरो के लिए कमर्शियल महत्व

पूर्व इसरो चेयरमैन एस सोमनाथ ने कहा था कि यह वजन के लिहाज से सबसे बड़ा सैटेलाइट है और भारत के लिए कमर्शियल दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण मिशन है। इसरो ने अब तक 33 देशों के 430 से ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च किए हैं, लेकिन ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सबसे भारी है। भारत का एलवीएम3 रॉकेट भारी पेलोड लॉन्च करने में सक्षम है, जो हमें ग्लोबल मार्केट में मजबूत बनाता है।

लॉन्चिंग का आखिरी चरण भी सफलतापूर्वक हुआ पूरा (फोटो साभार: YT/ISRO)

यह मिशन चंद्रयान-3 और वनवेब सैटेलाइट लॉन्च जैसी सफलताओं के बाद इसरो की विश्वसनीयता को और बढ़ाता है। भारत अब कमर्शियल लॉन्च में बड़ा खिलाड़ी बन रहा है।

ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 का सफल लॉन्च इंटरनेट की दुनिया में क्रांति लाने वाला कदम है। अब हर जगह, हर समय हाई-स्पीड कनेक्टिविटी संभव हो जाएगी। इसरो की इस उपलब्धि पर पूरे देश को गर्व है। आने वाले समय में ऐसे और सैटेलाइट लॉन्च होकर ग्लोबल डिजिटल डिवाइड को खत्म करेंगे।

गुजरात के जिस सेवेन्थ डे स्कूल में मुस्लिम ने हिंदू छात्र की हत्या की, उसे सरकार ने नियंत्रण में लिया: अभिभावकों ने ऑपइंडिया का जताया आभार

गुजरात में मुस्लिम नाबालिग द्वारा हिंदू छात्र की हत्या के बाद चर्चा में आए सेवेन्थ डे स्कूल का नियंत्रण सरकार ने आधिकारिक तौर पर अपने हाथ में ले लिया है। अहमदाबाद नगर जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) रोहित चौधरी को स्कूल का प्रशासक नियक्त किया गया है।

22 दिसंबर 2025 को जिला शिक्षा अधिकारी ने प्रशासक के रूप में कार्यभार संभाला। इस दौरान स्कूल के बाहर अभिभावक संघ और जनक संघर्ष समिति ने ढोल बजाकर और मिठाई बाँटकर जश्न मनाया। अभिभावकों ने नए प्रशासक का स्वागत किया और ऑपइंडिया को भी आभार व्यक्त किया।

DEO ने अभिभावकों को बताया कि अब से सरकार इस विद्यालय का प्रबंधन करेगी और छात्रों की शिक्षा और सुरक्षा संबंधी हितों को ध्यान में रखते हुए कार्य करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल इस विद्यालय में कोई नया प्रवेश नहीं दिया जाएगा।

अभिभावकों ने क्या कहा?

मौके पर पहुँचे ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए एक स्थानीय अभिभावक ने बताया कि सरकार ने शुरू से ही इस परियोजना का समर्थन किया है। शिक्षा अधिकारी समेत अन्य अधिकारी भी सहयोग कर रहे हैं। शिक्षा अधिकारी से हुई अपनी मुलाकात का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि शिक्षा अधिकारी ने आश्वासन दिया है कि किसी भी बच्चे का भविष्य बर्बाद नहीं होगा और किसी को भी चिंता करने की जरूरत नहीं है।

एक अन्य स्थानीय व्यक्ति ने भी प्रदेश की बीजेपी सरकार और स्थानीय नेताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। जनक संघर्ष समिति के अभिभावकों ने भी सरकार के इस फैसले का स्वागत किया और सरकार के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की है।

एक अन्य अभिभावक ने कहा कि सेवन्थ डे स्कूल में जो घटना घटी, वह बेहद गंभीर थी और सरकार ने कठोर कार्रवाई करते हुए स्कूलों को चेतावनी दी है कि अगर अन्य स्कूल भी ऐसी गंभीर घटनाओं में शामिल पाए गए तो सरकार उनके खिलाफ भी इसी तरह की कार्रवाई करेगी। सिंधी समुदाय के एक नेता ने भी इस फैसले को हिंदू समुदाय की जीत बताया है।

वहीं दूसरे स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि एक हिंदू छात्र की निर्मम हत्या का असर पूरे देश में फैल गया है, जिसके बाद पूरे हिंदू समुदाय ने आंदोलन किया। इन सभी मामलों पर विवाद बढ़ने पर सरकार ने भी कड़ी कार्रवाई शुरू की और स्कूल की जाँच के लिए एक समिति का गठन किया है।

इसके बाद जब अनियमितताएँ और कुप्रबंधन सामने आए, तो सरकार ने पूरे स्कूल का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया और मिसाल कायम करने वाली कार्रवाई की। उन्होंने यह भी कहा कि इस स्कूल में न केवल सिंधी समुदाय का बल्कि हिंदू समुदाय के एक बेटे की भी हत्या हुई है, इसीलिए पूरा हिंदू समुदाय एकजुट होकर लड़ा।

इसके अलावा, अभिभावक परिषद के सदस्यों ने ऑपइंडिया के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि हत्या की घटना से लेकर स्कूल के सरकार द्वारा अधिग्रहण किए जाने तक, ऑपइंडिया ने बहुत सराहनीय कार्य किया है और विशेष कवरेज प्रदान की है। एक अन्य अभिभावक ने कहा कि ऑपइंडिया समाज और लोगों तक सही जानकारी पहुँचाने में सफल रहा है और इसके लिए वे भी आभारी हैं।

(यह रिपोर्ट मूलरूप से गुजराती भाषा में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

हिंदू डॉक्टर पर निकाह और धर्मांतरण का दबाव बनाने वाले रमीज को KGMU ने किया सस्पेंड, CM योगी ने दी पीड़िता को सुरक्षा: FIR के बाद हुआ फरार, पहली बीवी को भी कबूल करवाया था इस्लाम

लखनऊ के केजीएमयू में ‘मुस्लिम बनो और निकाह करो’ कहने वाले डॉक्टर रमीजुद्दीन नायक उर्फ रमीज मलिक पर योगी सरकार का एक्शन शुरू हो गया है। रेजिंडेंट डॉक्टर रमीजुद्दीन को सस्पेंड कर दिया गया है। उसके केजीएमयू में एंट्री पर बैन लगा दिया गया है। इससे पहले पीड़िता की तहरीर पर KGMU के रेजिडेंट डॉक्टर रमीजुद्दीन के खिलाफ चौक कोतवाली में मुकदमा दर्ज किया गया। आरोपित केजीएमयू की जाँच कमेटी के सामने पेश होने के बाद फिलहाल फरार बताया जा रहा है।

सीएम योगी से पीड़िता ने माँगी सुरक्षा

सोमवार (22 दिसंबर 2025) को पीड़िता से सीएम योगी ने फोन पर बात की थी। सीएम योगी ने बातचीत में निष्पक्ष जाँच का आश्वासन दिया था। उन्होंने पूरे मामले पर केजीएमयू प्रशासन से रिपोर्ट भी माँगी है। घटना के बाद पीड़िता को सुरक्षा दी जा रही है। 24 घंटे उसके साथ सिपाही रहता है। वर्कप्लेस पर सेक्सुअल हैरेसमेंट के लिए बनी विशाखा कमेटी ने कॉलेज प्रशासन को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। इसके आधार पर ही डॉक्टर रमीजुद्दीन को सस्पेंड किया गया है।

पश्चिम बंगाल की रहने वाली है पीड़िता डॉक्टर

पीड़िता डॉक्टर पश्चिम बंगाल की रहने वाली है। वह एमडी पैथोलॉजी कर रही हैं। उसका सीनियर डॉक्टर रमीजुद्दीन है। वह केजीएमयू में एमडी पैथोलॉजी थर्ड ईयर का स्टुडेंट है। रमीजुद्दीन उत्तराखंड का रहनेवाला है। उसके खिलाफ शुरुआती रिपोर्ट में सबूत मिले हैं।

दरअसल 17 दिसंबर को पीड़िता डॉक्टर ने कमरे में दवा की ओवरडोज लेकर आत्महत्या की कोशिश की थी। उन्हें केजीएमयू में ही भर्ती किया गया। परिवार को खबर दी गई। इसके बाद परिवार के लोग 19 दिसंबर को लखनऊ पहुँचे। उसके पिता भी डॉक्टर हैं।

प्रेम जाल में फँसा कर इस्लाम कबूलने का दबाव

डॉक्टर रमीजुद्दीन से पीड़िता की मुलाकात 2023 में हुई थी। दोनों के बीच दोस्ती हुई और फिर डॉक्टर रमीजुद्दीन ने उसे प्रेम जाल में फँसाया, फिर धर्मांतरण का दबाव बनाया। उसने कहा कि मुस्लिम बनो और निकाह करो। लड़की के मना करने पर वह उसे टॉर्चर करने लगा। दरअसल लड़की को डॉक्टर रमीजुद्दीन के शादीशुदा होने का पता उसकी पहली बीवी से ही मिली थी।

डॉक्टर रमीजुद्दीन ने इतना प्रताड़ित किया कि पीड़िता दवा का ओवरडोज लेकर आत्महत्या करने कोशिश की। पीड़िता कहती है कि फरवरी 2025 में डॉक्टर रमीजुद्दीन ने दूसरी हिन्दू लड़की को फँसाकर धर्मांतरण करवाया और फिर निकाह कर लिया।

सोमवार (22 दिसंबर 2025) को डॉक्टर रमीजुद्दीन जाँच कमेटी के सामने पेश हुआ। दरअसल वह जाँच से बचने के लिए बीमारी का बहाना बना रहा था। जाँच कमेटी ने कई बार डॉक्टर रमीजुद्दीन को फोन किया, लेकिन उसने फोन नहीं उठाया। अंत में व्हाट्सएप के जरिेए उसे मैसेज किया गया। तब उसने बीमारी का बहाना बना कर जाँच कमेटी के सामने उपस्थित होने में असमर्थता जाहिर की, लेकिन कमेटी नही मानी और उसे आना पड़ा।

डॉक्टर रमीजुद्दीन अपने पिता के साथ वहाँ पहुँचा। उसने खुद को बेगुनाह बताया। उसने ये भी दावा किया कि वह शादीशुदा नहीं है। इस पर उसे एफिडेविट देने के लिए कहा गया यानी उसे साबित करना है कि वह शादीशुदा नहीं है।

जाँच कमेटी में शामिल डॉक्टर केके सिंह के मुताबिक, आरोपित डॉक्टर रजीमुद्दीन का निकाह हुआ है या नहीं इसकी जाँच की जा रही है। हालाँकि उसने एडमिशन के वक्त खुद को अविवाहित करार दिया था। डॉक्टर के के सिंह के मुताबिक, जाँच रिपोर्ट के आधार पर ही उसे 24 घंटे के भीतर सस्पेंड किया गया है। यहाँ तक कि विश्वविद्यालय आने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। दरअसल डीन एकेडमिक्स प्रोफेसर डॉक्टर वीरेन्द्र आतम ने सस्पेंड करने का आदेश जारी किया।

आदेश में कहा गया है कि जाँच पूरी होने तक डॉक्टर रमीजुद्दीन कैंपस में एंट्री नहीं कर पाएगा। लेकिन उसके लखनऊ छोड़ने पर रोक लगी हुई है। क्योंकि जब जब जाँच कमेटी उसे बुलाएगी, उसे हाजिर होना पड़ेगा। इस दौरान केजीएमयू मुख्यालय में वह रहेगा। लेकिन पुलिस कह रही है कि वह फरार हो गया है।

घटना के बाद केजीएमयू के पैथोलॉजी विभाग के पीजी स्टूडेंट्स विभाग के अंदर हलचल कम दिख रही है। विभाग का काम सामान्य रूप से चल रहा है। लेकिन लोग आपस में इस मामले को लेकर धीरे धीरे बातें कर रहे हैं।

वीएचपी के समरेन्द्रजी के मुताबिक, केजीएमयू के पैथोलॉजी विभाग में ये पहला मामला नहीं है। पैथॉलोजी के नर्सिंग विभाग में एक मुस्लिम महिला ने अपने हिन्दू रूम पार्टनर पर दबाव डालकर निकाह पैथोलॉजी विभाग के ही मोहम्मद नफीस अहमद से करा दिया। यहाँ तक कि पैथोलॉजी विभाग ने डॉक्टर बिटिया पर इतना दबाव बनाया कि वह अपनी जान देने की कोशिश की।

लव जिहादियों सुधर जाओ, वरना राख कर दिया जाएगा-अपर्णा यादव

22 दिसंबर 2025 को पीड़िता अपने परिवार के साथ महिला आयोग के दफ्तर में उपाध्यक्ष अपर्णा यादव से मुलाकात की।

पीड़िता ने आपबीती बताते हुए कहा कि उसे बहुत प्रताड़ित किया गया। वह काफी डर गई थी। वह जुलाई से आरोपित के साथ रिलेशनशिप में थी। इस दौरान पता चला कि वह शादीशुदा है। उसने कहा कि उसने जब डॉक्टर रमीजुद्दीन से दूरी बनाने की कोशिश की, तो उसका शोषण किया गया। अब वह काफी दहशत में हैं। खुद की और परिवार की सुरक्षा को लेकर भी डर गई हैं।

उसकी बातें सुनकर अपर्णा यादव को गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा कि लव जिहादियों सुधर जाओ, वरना एक-एक को राख कर दिया जाएगा। अपर्णा यादव ने आगे कहा कि लड़की को इतना प्रताड़ित किया गया कि वह अपनी जान लेने की कोशिश की।

अपर्णा यादव ने कहा, “जब माता सीता का अपहरण हुआ तो पूरे रावण कुल का नाश हो गया। जब द्रौपदी का चीरहरण हुआ तो कुरु वंश का नाश हुआ। हमारा दुर्भाग्य है कि भारत में लव जिहाद कर हिंदू बेटियों का जीवन बर्बाद किया जा रहा है। उन्होंने पीड़िता को न्याय दिलाने की बात कही और कहा कि कोर्ट में कड़ी सजा दिलवाने की कोशिश करेंगे।”

केजीएमयू के बाहर प्रदर्शन

एबीवीपी ने इस मुद्दे पर केजीएमयू के सामने धरना प्रदर्शन किया और कुलपति सोनिया नित्यानंद को ज्ञापन सौंपा। उसमें 15 दिनों के भीतर जाँच पूरी करने समेत कई माँगे हैं। इनके पूरी नहीं होने पर आंदोलन करने की धमकी दी गई है। मंगलवार (23 दिसंबर 2025) की शाम केजीएमयू कैंपस के गेट नंबर 1 पर नेशनल मेडिकोज संगठन यानी एनएमओ ने कैंडल मार्च निकाला है।

एबीवीपी की लखनऊ महानगर मंत्री सरिता पांडे ने कहा कि केजीएमयू जैसी संस्था में अगर धर्मांतरण के लिए दबाव डालकर लड़की को प्रताड़ित किया जा सकता है, तो दूसरे विश्वविद्यालय और शिक्षण संस्थान में क्या होता होगा।

SIR पर योगेंद्र यादव ने फिर फैलाया झूठ: जिनका हुआ निधन या जो चले गए उनके वोट कटने को बताया ‘अधिकार छीनना’, तमिलनाडु से 97 लाख नाम कटने पर रोना रोया

फेज-2 के बाद स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के तहत जैसे ही ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी हुई तो कुछ लोगों ने उस पर नाराजगी जतानी शुरू कर दी। इस कथित नाराजगी का पहले से ही अनुमान लगाया गया था। विरोध करने वालों ने इसे ऐसे दिखाने की कोशिश की मानो चुनाव आयोग ने बीजेपी के साथ मिलकर लोगों से उनका वोट देने का हक छीन लिया हो।

21 दिसंबर को, खुद को न्यूज पोर्टल बताने वाले यूट्यूब चैनल ‘द रेड माइक’ से बातचीत करते हुए कॉन्ग्रेस से जुड़े वकील योगेंद्र यादव ने दावा किया कि SIR की वजह से तमिलनाडु में 97 लाख मतदाताओं के वोटिंग अधिकार खत्म हो गए हैं।

यह बात भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा तमिलनाडु और गुजरात की ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी करने के बाद कही गई। ECI के आँकड़ों के अनुसार, तमिलनाडु में 97.3 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं जबकि गुजरात में 73.7 लाख नाम हटाए गए।

आँकड़े सामने आते ही योगेंद्र यादव जैसे लोग यह कहने लगे कि बड़ी संख्या में लोगों से मतदान का अधिकार छीन लिया गया है। हकीकत यह है कि ये दावे आँकड़ों को सही तरह से समझने पर नहीं बल्कि सिर्फ बड़ी संख्या दिखाकर लोगों को डराने और गुमराह करने पर आधारित हैं। तथ्यों को ईमानदारी से देखने के बजाय ऐसे बयान सिर्फ भ्रम फैलाते हैं।

ड्राफ्ट रोल असल में क्या दिखाते हैं

तमिलनाडु में मतदाताओं की संख्या पहले 6.4 करोड़ थी, जो मौजूदा ड्राफ्ट सूची में घटकर 5.4 करोड़ रह गई है। यानी कुल 97.3 लाख नाम हटाए गए हैं। इनमें से 26.9 लाख मतदाताओं को मृत पाया गया।

लगभग 66.4 लाख ऐसे लोग थे जो या तो दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके थे, लंबे समय से वहाँ नहीं रह रहे थे, या फील्ड जाँच के दौरान अपने पते पर नहीं मिले। वहीं, करीब 4 लाख नाम इसलिए हटाए गए क्योंकि वे एक से ज्यादा जगहों पर दर्ज पाए गए।

इसी तरह की स्थिति गुजरात में भी सामने आई। यहाँ मतदाताओं की संख्या 5.1 करोड़ से घटकर 4.3 करोड़ रह गई। कुल 73.7 लाख नाम सूची से हटाए गए। इनमें 18.1 लाख मतदाता मृत पाए गए जबकि करीब 51.8 लाख लोग अपने दर्ज पते पर नहीं मिले या दूसरी जगह जा चुके थे। इसके अलावा, लगभग 3.8 लाख नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज होने के कारण हटाए गए।

वहीं, तमिलनाडु में 1.2 करोड़ मतदाताओं के नाम नोटिस के लिए चिह्नित किए गए हैं। ये नाम मतदाता सूची से हटाए नहीं गए हैं। दरअसल, इनमें रिकॉर्ड से जुड़ी कुछ गड़बड़ियाँ पाई गई हैं, जैसे माता-पिता और बच्चों की उम्र में असामान्य अंतर या एक ही माता-पिता से बहुत अधिक बच्चों का दर्ज होना। ये केवल जाँच के संकेत हैं, न कि नाम हटाने की कोई कार्रवाई।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने की साजिश

चुनाव आयोग (ECI) ने जो डेटा स्पष्ट रूप से दिया है, उसके बावजूद योगेंद्र यादव जैसे कुछ एक्टिविस्ट जो अक्सर ऐसे मामलों पर डर फैलाते हैं, यह दावा कर रहे हैं कि मतदाता हटाने का काम जानबूझकर और बिना वजह किया गया। ऐसे दावे भ्रामक हैं और गंभीर खतरा पैदा करते हैं क्योंकि इससे आम लोगों के मन में यह गलत संदेश जाता है कि चुनाव आयोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने के इरादे से काम कर रहा है।

यादव का निष्कर्ष डेटा की सही व्याख्या से नहीं निकला है। नाम हटाने का मुख्य कारण यह रहा कि संबंधित मतदाता या तो अब मौजूद नहीं थे, अपने दर्ज पते पर नहीं रहते थे, या फिर एक से अधिक जगह पंजीकृत पाए गए। एक ही व्यक्ति के कई पंजीकरण होने की स्थिति में केवल एक वोटर ID ही मान्य होती है, बाकी को रद्द किया जाता है। यह प्रक्रिया ECI द्वारा मतदाता धोखाधड़ी रोकने के लिए जरूरी और तय नियमों के तहत की जाती है।

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन एक संवैधानिक प्रक्रिया है

SIR यानी मतदाता सूची का संशोधन कोई नई या असामान्य प्रक्रिया नहीं है। यह संविधान के तहत नियमित रूप से किया जाने वाला काम है, जिसका मकसद मतदाता सूची को सही और अपडेट रखना होता है। अगर ऐसी समीक्षा न हो, तो सूची में मृत मतदाताओं के नाम, दूसरी जगह जा चुके लोगों की एंट्री और डुप्लीकेट नाम लगातार बने रहते हैं। समय के साथ जब ऐसी गलतियाँ बढ़ती जाती हैं, तो चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगते हैं।

SIR को लोकतंत्र पर हमला कहना खतरनाक है। इससे लोगों का भरोसा उसी प्रक्रिया से उठ सकता है, जिसे चुनावों को निष्पक्ष, पारदर्शी और सुरक्षित बनाए रखने के लिए बनाया गया है।

समाधान पर ध्यान नहीं, समस्या पर गढ़ी जा रही कहानी

चुनाव आयोग ने साफ तौर पर बताया है कि 18 जनवरी 2026 तक मतदाता या राजनीतिक दलों के बूथ स्तर के एजेंट शिकायत और आपत्ति दर्ज करा सकते हैं। अगर कोई योग्य मतदाता मानता है कि उसका नाम गलत तरीके से चिह्नित किया गया है, तो उसे तय समय सीमा के भीतर शिकायत करने का पूरा अधिकार है। इसके बावजूद सार्वजनिक बहस में प्रक्रिया और तथ्यों पर बात करने के बजाय डर फैलाने और मनगढ़ंत कहानी गढ़ने को ज्यादा तरजीह दी जा रही है।

लोकतंत्र में सटीकता की जरूरत होती है, बढ़ा-चढ़ाकर बताने की नहीं

चुनावी सुधार कभी भी दिखावटी या आकर्षक नहीं होते और मतदाता सूची की जाँच को अक्सर गलत तरीके से पेश किया जाता है। कभी-कभी इसे जानबूझकर योगेंद्र यादव जैसे एक्टिविस्ट और राहुल गाँधी जैसे नेता गलत रंग से पेश करते हैं।

जब सामान्य प्रक्रिया के तहत होने वाले मतदाता सूची सुधार को जानबूझकर वोटरों को हटाने की साजिश बताया जाता है, तो सच और अफवाह के बीच फर्क मिटने लगता है। ऐसे बयान असली प्रक्रिया पर बेवजह शक पैदा करते हैं और लोगों को भ्रमित करते हैं और यही इनका मकसद होता है।

(मूल रूप से ये खबर अंग्रेजी टीम के अनुराग ने लिखी है, जिस इस लिंक पर क्लिक करे पढ़ सकते हैं)

बांग्लादेश में दीपू दास की निर्मम हत्या पर NYT ने गढ़ा पुराना नैरेटिव, दक्षिण एशिया को बताया ‘असहिष्णुता’ का गढ़: अपने मुस्लिम-पीड़ित एजेंडा में भारत को निशाना बनाना भी नहीं भूला

बांग्लादेश के मैमनसिंह में कपड़ा फैक्ट्री में काम करने वाले हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की मुस्लिम भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। इतना ही नहीं, उनके शरीर को पेड़ पर लटकाकर आग लगा दी गई। निर्मम घटना का वीडियो भी 18 दिसंबर 2025 को सामने आया। लेकिन मुस्लिम पीड़ित खबरों को हवा देने वाली विदेशी मीडिया चुप्पी साधे रही। अब कई दिनों बाद अमेरिकी मीडिया संस्थान न्यूयॉर्क टाइम्स (New York Times/NYT) जागा और दीपू चंद्र दास की हत्या पर लेख प्रकाशित किया है।

विदेशी मीडिया में NYT पहला संस्थान बना, जिसने बांग्लादेश में हिंदू युवक की बेरहमी से हत्या को कवरेज दी है। लेकिन यह कवरेज अपने नैरेटिव को ध्यान में रखते हुए की गई है, जिसमें मुस्लिम को अत्याचारी नहीं दिखाना है। NYT में सैफ हसनत और मुजिब मशाल द्वारा लिखे इस लेख में बड़ी चालाकी से भारत को भी निशाना बनाया है। एक हिंदू पर हुए अत्याचार को दिखाते-दिखाते वह भारत में हिंदू को अत्याचारी दिखाना बिल्कुल नहीं भूलता है।

NYT ने हेडलाइन में पूरे दक्षिण एशिया को घेरा

दीपू चंद्र दास की पीट-पीटकर हत्या बांग्लादेश में हुई और NYT ने यहाँ पूरे दक्षिण एशिया को घेरने शुरू कर दिया। NYT की हेडलाइन- Lynching of a Hindu in Bangladesh Fans Fears of Rising Intolerance से ही उसका एजेंडा साफ झलकता है। हिंदू युवक की बेरहमी से हत्या को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया और फिर उलटा दक्षिण एशिया को धार्मिक असहिष्णुता के एक बड़े पैटर्न का हिस्सा बताया गया।

NYT के लेख का स्क्रीनशॉट

यहाँ शब्दों का खेल करते हुए धार्मिक असहिष्णुता से पूरे दक्षिण एशिया में फैले डर की बात की गई। यानी अर्थ साफ है कि केवल मुस्लिम ही धार्मिक असहिष्णुता तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा दक्षिण एशिया इससे जूझ रहा है। यहाँ तक कि मुस्लिम खुद इसका शिकार हैं। पूरे लेख में मुस्लिम सहकर्मी द्वारा हिंदू युवक की हत्या को कम आँका गया और इसके बावजूद पूरे दक्षिण एशिया पर ऐसी घटनाओं का इल्जाम डाला गया।

हत्यारों को ‘मुस्लिम’ कहने से परहेज

मुस्लिम-पीड़ित एजेंडा को हवा देने वाले NYT ने बांग्लादेश में हिंदू युवक की क्रूरता से की गई हत्या के हत्यारों को ‘मुस्लिम’ बताने से परहेज किया है। NYT ने लिखा है कि दीपू दास की हत्या को उसके ‘को-वर्कर्स’ ने अंजाम दिया है। कथित तौर पर दीपू दास की पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने के कारण हत्या कर दी गई। NYT ने इसे फैक्ट के तौर पर इस्तेमाल किया है, क्योंकि यहाँ एक हिंदू ने उनके मजहब पर टिप्पणी की इसीलिए मुस्लिमों ने जवाब देते हुए उसकी हत्या कर दी, जो सही भी है।

NYT के लेख का स्क्रीनशॉट

NYT लिखता है, “लेकिन दंगों और भीड़ हिंसा की लहर के बीच हुई इस क्रूर हत्या ने बांग्लादेश में पिछले साल छात्रों के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों में सत्तावादी प्रधानमंत्री को सत्ता से हटाए जाने के बाद से बने तनावपूर्ण नेतृत्व के शून्य को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं।” यहाँ बड़ी आसानी से NYT ने मुस्लिमों के क्राइम को बांग्लादेश में विरोध-प्रदर्शनों के बीच छिपा दिया है। वह मानना ही नहीं चाहता है कि यह इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा का नतीजा है और बांग्लादेश में लगातार हिंदुओं पर अत्याचार हो रहे हैं।

भारत के हिंदुओं को बनाया निशाना

NYT ने भारत को भी अपने एजेंडा वाले लेख में घसीटा और दावा किया, “भारत में हिंदू सतर्कता समूहों ने मुस्लिमों और अन्य अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया है। खासकर गोमांस रखने के आरोपों पर।” NYT ने इस मनगढ़ंत दावे के साथ उदाहरण भी पेश किया- “भारत के दक्षिणी भाग में पिछले सप्ताह एक प्रवासी मजदूर की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। पुलिस का कहना है कि भीड़ ने उसे बांग्लादेशी समझ लिया था- भारत के सत्ताधारी हिंदू राष्ट्रवादी राजनेता मुस्लिम प्रवासियों को बांग्लादेशी कहकर पुकारते हैं। 31 वर्षीय राम नारायण बघेल भारत की कठोर जाति व्यवस्था में सबसे निचले पायदान से थे।”

NYT के लेख का स्क्रीनशॉट

यहाँ NYT ने सिर्फ एक उदाहरण देते हुए हिंदुओं को अत्याचारी होने का दावा किया, जबकि इस तथ्य को दरकिनार किया कि बांग्लादेशी घुसपैठिए कैसे भारत में घुसते हैं और नकली पहचान पत्र बना नागरिकता हासिल कर भारतवासियों की वह सारी सुविधा छीनकर अपनी झोली में डालते हैं। NYT जहाँ एकतरफ बांग्लादेश में हिंदू युवक की हत्या पर आरोपितों को मुस्लिम नहीं बता पा रही है, वहीं एक उदाहरण में उसने पूरे हिंदू समाज को बदनाम करने की कोशिश की है।

दीपू दास की हत्या पर देरी से उठी आवाज, लेकिन वही पुराना नैरेटिव

NYT ने बांग्लादेश में हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की निर्मम हत्या पर बहुत देर से खबर लिखी। लेकिन खबर लिखते समय अपने एजेंडा को नहीं भूले, जहाँ हिंदू समुदाय पर केंद्रित होकर बात करने के बजाए अपना तयशुदा नैरेटिव आगे बढ़ाया। रिपोर्ट में इसे पूरे दक्षिण एशिया में ‘असहिष्णुता के पैटर्न’ से जोड़ दिया गया।

विदेशी मीडिया को पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार अब दिखने लगे हैं, लेकिन भारत को लेकर NYT का वही पुराना रुख है, यहाँ उसे केवल मुस्लिम ही एकमात्र पीड़ित नजर आते हैं। बांग्लादेश में दीपू दास की हत्या पर भी NYT ने साफतौर पर ‘मुस्लिम भीड़’ कहने से बचता नजर आता है, जबकि असलियत कुछ और इशारा करती हैं।

यह रवैया कोई नया नहीं है, बल्कि विदेशी मीडिया का एक आम एजेंडा बन चुका है। भारत में मुस्लिमों के अपराधों या हिंदुओं के खिलाफ हिंसा पर अक्सर चुप्पी साध ली जाती है, लेकिन जैसे ही किसी मुस्लिम पर थोड़ी-सी भी आँच आती है तो यही मीडिया तुरंत मुखर हो जाता है।

नकली नहीं है यह कफ सिरप, न जहर है: तमिलनाडु की दवाई से मौत लेकिन UP को लेकर फैलाया भ्रम, कोडिन विवाद से जुड़े हर सवाल का जवाब पाइए एक साथ

उत्तर प्रदेश में कोडिन कफ सिरप विवाद में अब तक 128 FIR दर्ज हुई हैं। 280 ड्रग लाइसेंस रद्द किए गए हैं। सिरप की लाखों शीशियाँ जब्त की गईं हैं। साथ ही, इस मामले से जुड़े 32 प्रमुख आरोपित गिरफ्तार हो चुके हैं।

एक तरफ योगी सरकार इस सिंडिकेट को खत्म करने को लेकर ताबड़तोड़ कार्रवाई कर रही है तो दूसरी तरफ इस मामले को लेकर कई तरह के भ्रम भी फैलाए जा रहे हैं। देश के अलग अलग हिस्सों में कफ सिरप से जुड़ी हुई कई घटनाओं की सूचनाएँ संदर्भ से हटकर गलत ढंग से फैलाई जा रही हैं। हो सकता है ऐसी किसी अफवाह की चपेट में आप भी आए हों, इसलिए हम आपको बताएँगे वो सभी जरूरी बातें जो इस कफ सिरप विवाद के बारे में आपको जानना जरूरी है।

उत्तर प्रदेश का कफ सिरप मामला क्या है?

हमने पहले भी आपको विस्तार से एक लेख के मध्यम से इसके बारे में बताया है। संक्षिप्त में ये समझिए कि कुछ अपराधी तत्वों के द्वारा एक ऐसा रैकेट चलाया जा रहा था जो इन दवाओं की अवैध तस्करी कर रहा था। इसमें जिन सिरप को बिना डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन के नहीं बेचा जाना चाहिए, उन्हें बेचा जा रहा था। फर्जी कागजों के जरिए उसकी ओवर स्टॉकिंग की जा रही थी।

फिर शेल कंपनियों के जरिए उसकी तस्करी की जाती थी। जिसका रैकेट ना सिर्फ भारत के कश्मीर और पश्चिम बंगाल तक फैला था बल्कि सरहद पार बांग्लादेश तक फैला हुआ था। उत्तर प्रदेश STF के द्वारा सूचना मिलने पर लखनऊ में एक छापा मारा गया और वहाँ से ये पूरा मामला खुला।

क्या इस कफ सिरप को बेचना अवैध है या ये कफ सिरप मिलावटी है?

नहीं। FSDA (Food Safety and Drug Administration) कमिश्नर रौशन जैकब ने 8 दिसंबर को यूपी में हुई संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये स्पष्ट किया था कि अभी तक जितने मामले सामने आए हैं वो ओवर स्टॉकिंग और उसकी अवैध बिक्री और तस्करी के हैं।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जिन भी कफ सिरप को जब्त किया गया है उनको बेचना अवैध नहीं है। यह शेड्यूल एच की कफ सिरप है, जो मनुष्यों के उपयोग के लिए चिकित्सकीय परामर्श पर लेना सही है। इसकी जब्ती का आधार बगैर नियम-कायदे कानून के इसकी बिक्री करना है। साथ ही, इस कफ सिरप तस्करी का मामला नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (एनडीपीएस) ऐक्ट के दायरे में शामिल किया गया है जिसके चलते आरोपितों की जमानत नहीं हो पा रही है।

क्या तमिलनाडु कफ सिरप केस का इस मामले से है कनेक्शन?

तमिलनाडु में बनाई गई कफ सिरप पीने से मध्य प्रदेश और राजस्थान में बच्चों की मौत हुई थी वो मामला बिल्कुल अलग था। उत्तर प्रदेश में कफ सिरप पीने से बच्चों की मौत होने का कोई मामला सामने नहीं आया है। तमिलनाडु के मामले की केंद्र सरकार जाँच कर रही है। उत्तर प्रदेश से इसे जोड़कर केवल भ्रम फैलाया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश में जिस कफ सिरप के मामले की जाँच हो रही है वो वैध दवाओं के अवैध तस्करी से जुड़ा मामला है। अतः यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में होने वाली कार्रवाई का मध्य प्रदेश या राजस्थान के मामले से कोई संबंध नहीं है।

क्या इसका उपयोग नशे के तौर पर किया जाता है?

मूलतः यह सिरप खाँसी और उसके दर्द को ठीक करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह ओपियोइड है यानि इसमें अफीम से निकलने वाले पदार्थ का इस्तेमाल होता है। प्रति पाँच मिलीलीटर में दस से बीस मिलीग्राम कोडिन का उपयोग किया जाता है, जिससे या सिरप तैयार होती है।

चिकित्सकीय परामर्श पर जिस मात्रा में इसका उपयोग किया जाता है तब यह सामान्य दवा के तौर पर काम करता है। किंतु जाँच में सामने आया कि नशे के आदी लोगों के द्वारा इसकी काफी अधिक मात्रा का सेवन किया जाता है। और इसमें मौजूद कोडिन अधिक मात्रा में जब सेवन की जाती है तो छह से आठ घंटे तक के लिए नशे का काम करता है।

क्यों 120 रुपए की सिरप 1500 रुपए तक बिकती है?

बांग्लादेश जैसे मुस्लिम बहुल देशों और भारत में उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और सिक्किम के वे क्षेत्र जहाँ मुस्लिम आबादी अधिक है, वहाँ पर इसका उपयोग नशे के तौर पर किया जा रहा है। चूँकि, इस्लाम में शराब को हराम माना जाता है तो यह कफ सिरप नशे का एक ‘हलाल’ माध्यम बन गया। और इसी वजह से 120 से 160 रुपए में मिलने वाली ये कफ सिरप 1200 से 1500 रुपए तक के दामों पर बिक रही है।

स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश का जो कफ सिरप का मामला है वो पूरी तरह से अवैध भंडारण और बिक्री से जुड़ा है। दवाई के नकली होने या उससे मौत होने के मामले अभी तक सामने नहीं आए हैं। तमिलनाडु के कफ सिरप से हुई मौतों से इसे जोड़कर भ्रम फैलाया जा रहा है ताकि इस सिंडिकेट के खिलाफ कठोर कार्रवाई कर रही उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को बदनाम किया जा सके।

अरावली के संरक्षण को मजबूत बनाने वाला SC का ऐतिहासिक फैसला, लेकिन तेज हो गया ‘सेव अरावली’ आंदोलन: जानें- इस विवाद के पीछे हैं कौन से लोग

अरावली पर्वत श्रृंखला उत्तर-पश्चिम भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा की रीढ़ है। गुजरात से दिल्ली तक फैली यह प्राचीन पर्वतमाला थार मरुस्थल को रोकती है, भूजल स्तर बनाए रखती है, जैव विविधता को संरक्षण देती है और दिल्ली-एनसीआर समेत पूरे क्षेत्र की जलवायु को संतुलित करती है।

केंद्र सरकार लंबे समय से अरावली के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है और नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को इसे और मजबूत बनाने वाला कदम मानती है। इस फैसले ने अरावली की एक यूनिफॉर्म परिभाषा स्वीकार की, जिससे संरक्षण का दायरा स्पष्ट और वैज्ञानिक हो गया।

केंद्र सरकार का स्पष्ट कहना है कि नई परिभाषा से अरावली का 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र पूरी तरह संरक्षित रहेगा। केवल 0.19 प्रतिशत इलाके में ही सीमित और नियंत्रित खनन संभव होगा, जो पहले से चल रही वैध लीजों तक सीमित है।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इसे ‘अरावली के लिए सुरक्षा कवच’ बताया और कहा कि यह फैसला अवैध खनन पर लगाम लगाएगा तथा सस्टेनेबल डेवलपमेंट को बढ़ावा देगा। सरकार का मानना है कि यह कदम पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाता है।

हालाँकि इस फैसले के बाद राजस्थान में ‘सेव अरावली’ आंदोलन तेज हो गया। कुछ पर्यावरणविदों और विपक्षी दलों का कहना है कि नई परिभाषा से संरक्षण कमजोर होगा।

लोग डरते हैं कि नई परिभाषा से अरावली के बड़े हिस्से को सुरक्षा कवच से बाहर कर दिया जाएगा, जिससे खनन और व्यावसायिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी। लेकिन केंद्र सरकार इसे गलतफहमी करार देती है और तथ्यों के आधार पर स्पष्ट करती है कि यह फैसला अरावली को और मजबूत सुरक्षा देगा।

इस लेख में हम पूरी स्थिति समझेंगे कि ये फैसला क्या है, सरकार का पक्ष क्यों मजबूत है, ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट की भूमिका क्या है और आंदोलन में राजनीतिक रंग क्यों दिख रहा है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला काफी अहम, वैज्ञानिक परिभाषा के साथ संरक्षण पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की सिफारिश पर अरावली हिल्स की यूनिफॉर्म परिभाषा स्वीकार की, जिसमें 100 मीटर से ऊपर की ऊंचाई वाली पहाड़ियां मुख्य रेंज का हिस्सा मानी गईं। पहले अलग-अलग राज्यों में अलग परिभाषाएं थीं, जिससे अवैध खनन और अतिक्रमण को बढ़ावा मिलता था। अब स्पष्ट और वैज्ञानिक मानदंड अपनाए गए हैं।

केंद्र सरकार का दावा है कि इस परिभाषा से कानूनी तौर पर 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा संरक्षित रहेगा। केवल 0.19 प्रतिशत क्षेत्र में ही पहले से चल रही वैध माइनिंग लीजों के तहत सीमित खनन हो सकता है। नई माइनिंग लीज पर पूरी रोक लगा दी गई है और सस्टेनेबल माइनिंग प्लान बनाने का आदेश दिया गया है। पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि यह फैसला अवैध खनन करने वालों पर सख्त कार्रवाई का रास्ता खोलेगा, क्योंकि अब संरक्षित क्षेत्र की सीमाएँ बिल्कुल स्पष्ट हैं।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि अरावली की कम ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ भी पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं और उन्हें अन्य कानूनों जैसे फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट, वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट और इको-सेंसिटिव जोन नोटिफिकेशन के तहत संरक्षण मिलता रहेगा। नतीजतन कुल संरक्षित क्षेत्र पहले से ज्यादा प्रभावी होगा।

केंद्र सरकार का पक्ष- संरक्षण पहले, विकास संतुलित

केंद्र सरकार बार-बार जोर देती है कि अरावली उसकी प्राथमिकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में कई पहलें चल रही हैं। पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा, “हम अरावली को बचाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। नई परिभाषा से संरक्षण मजबूत हुआ है, अवैध खनन रुकेगा और केवल 0.19 प्रतिशत क्षेत्र में ही नियंत्रित खनन होगा। यह पर्यावरण और विकास का संतुलन है।”

सरकार का तर्क है कि पहले अस्पष्ट परिभाषा के कारण अवैध खनन फल-फूल रहा था। अब स्पष्ट सीमाओं से सैटेलाइट मॉनिटरिंग, ड्रोन सर्विलांस और सख्त कानूनी कार्रवाई आसान होगी। राजस्थान, हरियाणा और गुजरात में पहले से चल रही रिस्टोरेशन परियोजनाएं भी तेज होंगी।

ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट है अरावली को हरा-भरा बनाने की महत्वाकांक्षी योजना

केंद्र सरकार की सबसे बड़ी पहलों में से एक ‘अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट’ है। यह वैश्विक ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’ का भारतीय संस्करण है, जिसका उद्देश्य अरावली की 700 किलोमीटर लंबाई के आसपास 5 किलोमीटर बफर जोन में बड़े पैमाने पर हरियाली विकसित करना है। यह गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के 29 जिलों को कवर करेगा।

प्रोजेक्ट में लाखों पेड़ लगाने, जल संरक्षण संरचनाएँ बनाने और स्थानीय प्रजातियों को बढ़ावा देने की योजना है। सरकार का कहना है कि इससे मरुस्थलीकरण रुकेगा, कार्बन सिंक बढ़ेगा और जैव विविधता मजबूत होगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह प्रोजेक्ट और प्रभावी होगा, क्योंकि संरक्षित क्षेत्र स्पष्ट होने से फंड और संसाधन सही जगह लगेंगे।

केंद्र ने राज्यों के साथ मिलकर स्थानीय समुदायों को इसमें शामिल करने की योजना बनाई है, ताकि यह सिर्फ सरकारी प्रोजेक्ट न रहे बल्कि जन आंदोलन बने।

हालाँकि मौजूदा विवाद में लोग इसे सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा से जोड़कर देख रहे हैं। उनका डर है कि संरक्षित क्षेत्र कम होने से ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट सिर्फ नाम का रह जाएगा और खनन कंपनियाँ बफर जोन में भी घुस आएँगी। कुछ पर्यावरणविद कहते हैं कि ग्रीन वॉल को सिर्फ पौधारोपण नहीं, बल्कि पूरे इकोसिस्टम की रिस्टोरेशन बनाना चाहिए- रिज टू वैली ट्रीटमेंट, अवैध खनन पर सख्ती और स्थानीय समुदायों की भागीदारी। लेकिन फिलहाल यह प्रोजेक्ट भी विवाद की छाया में है

‘सेव अरावली’ आंदोलन, गलतफहमी या राजनीति?

फैसले के बाद राजस्थान में प्रदर्शन शुरू हो गए। जयपुर, अलवर, सीकर समेत कई शहरों में लोग सड़कों पर उतरे। #SaveAravalli सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है। आंदोलन में पर्यावरणविद जैसे राजेंद्र सिंह, नीलम अहलूवालिया और कुछ स्थानीय ग्रामीण शामिल हैं।

केंद्र सरकार इसे गलतफहमी मानती है और कहती है कि प्रदर्शनकारी नई परिभाषा के फायदों को नहीं समझ रहे। सरकार ने स्पष्ट किया कि 90% से ज्यादा क्षेत्र संरक्षित है और खनन सिर्फ 0.19% तक सीमित। कुछ प्रदर्शनों में कॉन्ग्रेस नेताओं की मौजूदगी से राजनीतिक रंग भी दिख रहा है।

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र पर खनन माफिया को फायदा पहुँचाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि 100 मीटर की सीमा सरकार के अपने रिकॉर्ड्स के खिलाफ है। लेकिन केंद्र और भाजपा का आरोप है कि गहलोत के कार्यकाल में भी अरावली में अवैध खनन चला और लैंड एक्सचेंज के प्रस्ताव आए, जिनसे 50 से ज्यादा मार्बल-डोलोमाइट खदानें फिर खुलने वाली थीं। सरिस्का टाइगर रिजर्व के आसपास क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट घोषित करने में भी देरी के आरोप लगे।

सरकार का कहना है कि राजनीतिक लाभ के लिए पर्यावरण के नाम पर भ्रम फैलाया जा रहा है। तथ्य बताते हैं कि वर्तमान सरकार ने अरावली संरक्षण के लिए सबसे ज्यादा कदम उठाए हैं।

संरक्षण और विकास का संतुलन

अरावली का मामला सिर्फ राजस्थान का नहीं, पूरे उत्तर भारत का है। अगर यह प्राचीन पर्वतमाला नष्ट हुई तो थार मरुस्थल दिल्ली तक पहुँच जाएगा, भूजल खत्म हो जाएगा और जैव विविधता का बड़ा नुकसान होगा। पर्यावरणविद कहते हैं कि अरावली को संवैधानिक पर्यावरणवाद के तहत मजबूत सुरक्षा दी जानी चाहिए।

हालाँकि केंद्र सरकार अरावली को लेकर पूरी तरह सजग है। नई परिभाषा से संरक्षण मजबूत हुआ है, अवैध गतिविधियां रुकेंगी और ग्रीन वॉल जैसे प्रोजेक्ट तेजी से आगे बढ़ेंगे। केवल 0.19 प्रतिशत क्षेत्र में सीमित खनन का प्रावधान भी सख्त नियंत्रण में होगा।

आंदोलन करने वालों से सरकार की अपील है कि तथ्यों को समझें और संवाद करें। अगर कोई वास्तविक चिंता है तो उसे दूर किया जाएगा। अरावली का संरक्षण राष्ट्रीय प्राथमिकता है और केंद्र सरकार इसे किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने देगी।

यह फैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए अरावली को सुरक्षित रखने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। पर्यावरण और विकास का संतुलन ही सच्चा विकास है और केंद्र सरकार इसी रास्ते पर चल रही है।

न्यूजीलैंड में भारत के साथ FTA का विरोध, डेयरी प्रोडक्ट्स और फार्मिंग का मुद्दा उठा रहा वहाँ का विपक्ष: US से भी इसी मुद्दे पर गतिरोध, समझिए- क्यों पीछे नहीं हट रही मोदी सरकार

भारत और न्यूजीलैंड के बीच FTA को लेकर सहमति बन गई है। इस पर 2026 के पहली तिमाही में हस्ताक्षर होने की उम्मीद है। इस समझौते के बाद न्यूजीलैंड का बाजार भारत के सारे सामानों के लिए खुल जाएगा और वह भी बगैर टैक्स के। अमेरिकी टैरिफ का भारत के जिन उद्योगों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है वे हैं कपड़ा, जूट, ज्वैलरी आदि। इन उद्योगों को भी नया बाजार मिलेगा, रोजगार बढ़ेंगे। 2047 तक विकसित भारत के संकल्प को इससे मजबूती मिलेगी।

भारत में अगले 5 सालों में होगा 1.6 लाख करोड़ का निवेश

न्यूजीलैंड से समझौते के बाद सभी प्रोडक्ट के लिए बाजार पूरी तरह खुल जाएगा। टैक्स नहीं होने पर ये सस्ते मिलेंगे। जाहिर है ये बिकेंगे भी। इससे इन उद्योगों को काफी फायदा होगा। इन उद्योगों में मजदूरों की ज्यादा जरूरत होती है इसलिए भारत में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। न्यूजीलैंड ने अगले 5 सालों में भारत में 20 बिलियन डॉलर यानी 1.6 लाख करोड़ रुपए से अधिक के निवेश का भरोसा दिया है। भारत से न्यूजीलैंड को जो भी सामान निर्यात होंगे उनपर टैरिफ नहीं लगेगा। इसका फायदा दूसरे उद्योगों को भी होगा।

मोदी सरकार ने अपनी पॉलिसी न बदलते हुए किसानों के हितों का पूरा ख्याल रखा है। भारत न्यूजीलैंड के ज्यादातर प्रोडक्ट पर टैरिफ नहीं लगाएगा, लेकिन डेयरी प्रोडक्ट जैसे घी,दूध, दही, बटर,पनीर आदि के अलावा सब्जी, चना, मटर, मीट, चीनी, ज्वैलरी, तांबा और एल्यूमीनियम जैसे सेक्टर्स पर कोई टैरिफ कम नहीं करेगा। भारत ऐसा कर किसानों के साथ- साथ व्यापारियों को भी राहत देना चाहता है।

50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने के बावजूद अमेरिका के साथ भी व्यापार समझौते को लेकर लगातार बातचीत हो रही है, लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि किसानों के हित को कभी भी अनदेखा नहीं किया जाएगा। जबकि अमेरिका अपने माँसाहार मवेशियों के दूध, चीज, बटर और दूसरे प्रोडक्ट भारत में खपाना चाहता है। भारत इसके लिए तैयार नहीं है।

न्यूजीलैंड के माँस, ऊन, कोयला, लकड़ी टैरिफ फ्री

कुछ ऐसी ही स्थिति न्यूजीलैंड के साथ भी है। यहाँ की डेयरी प्रोडक्ट के लिए भारत अपना टैरिफ कम करने को तैयार नहीं है। इसका न्यूजीलैंड में विरोध हो रहा है। लेकिन न्यूजीलैंड से आने वाले माँस, ऊन, कोयला और लकड़ी के सामान पर कोई टैरिफ नहीं लगेगा। इसके अलावा कीवी, सेब,चेरी, एवोकैडो और शहद पर भारत टैरिफ में छूट देगा, इसका न्यूजीलैंड को फायदा होगा। भारत में लोगों को ये चीजें सस्ती मिलेंगी।

छात्रों से लेकर पेशेवरों तक को फायदा

जो छात्र पढ़ाई के लिए न्यूजीलैंड जाना चाहते हैं, उन्हें काफी फायदा होने जा रहा है। साइंस और टेक की पढ़ाई करने वाले ग्रेजुएशन और मास्टर छात्रों को कोर्स के बाद 3 साल और पीएचडी करने के बाद 4 साल जॉब कम से कम कर सकेंगे। इसके अलावा हर साल करीब 5000 भारतीय प्रोफेशनल्स को अस्थायी नौकरी वीजा दिये जाएँगे। इससे आईटी, हेल्थकेयर, इंजीनियरिंग, आयुष डॉक्टर, संगीत के टीचर, योग के टीचर को खास तौर पर फायदा मिलेगा। न्यूजीलेंड सालाना 1000 वर्क एंड हॉलीडे वीजा भी देगा।

न्यूजीलेंड में क्यों हो रहा विरोध?

न्यूजीलैंड एक कृषि प्रधान देश है। यह दुनिया के सबसे बड़े डेयरी निर्यातक देशों में एक है। हालाँकि समझौते के तहत ऊन पर टैरिफ नहीं लगेगा, लेकिन माँस, दूध, दही, बटर वगैरह पर भारत ने अपनी नीति के अनुरूप टैरिफ कम नहीं की है। इसके अलावा भारतीयों को इमीग्रेशन छूट दिए जाने पर चिंता जताई जा रही है।

विदेश मंत्री विंस्टन पीटर ने भारत के साथ हुए नए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की आलोचना करते हुए इसे ‘बुरा सौदा’ करार दिया है। उनके मुताबिक, इसमें भारत को बहुत कुछ दिया गया है, खासकर इमिग्रेशन में और बदले में न्यूजीलैंड के लोगों को डेयरी सहित काफी क्षेत्रों में कुछ नहीं मिला है।

पीटर ने कहा कि उनकी पार्टी न्यूजीलैंड फर्स्ट इस समझौते के सख्त खिलाफ है। संसद में इससे संबंधित बिल के खिलाफ वोट करेंगे। पीटर्स का मानना है कि यह समझौता न तो ‘मुक्त’ है और न ही ‘निष्पक्ष’। उन्होंने चिंता जताई कि यह न्यूजीलैंड के आर्थिक और मजदूरों के हितों की ठीक से रक्षा नहीं करता।

पीटर्स ने आरोप लगाया कि नेशनल पार्टी ने समझौते को जल्दीबाजी में निपटाने के चक्कर में क्‍वालिटी से समझौता किया। उनकी पार्टी ‘न्यूजीलैंड फर्स्ट’ चाहती थी कि सरकार तीन साल का पूरा समय लेकर बेहतर शर्तों के साथ समझौता करे। बजाय इसके कि वे जल्दबाजी में ‘घाटे का सौदा’ कर लिया। पीटर्स ने कहा, ‘दुर्भाग्य से इन बातों पर ध्यान नहीं दिया गया।’ उन्होंने आगे कहा, ” प्रधानमंत्री की नेशनल पार्टी ने न्यूजीलैंड के लोगों और भारतीयों दोनों के लिए फायदेमंद हों, ऐसा निष्पक्ष सौदा करने के लिए काफी होमवर्क करना था, लेकिन प्रधानमंत्री की पार्टी ने ‘घाटे वाला सौदा’ करना पसंद किया।”

न्यूजीलेंड के विदेश मंत्री ने कहा कि इस टर्म में विदेश मंत्री के तौर पर ऑस्ट्रेलिया और पैसिफिक के बाहर हमारा पहला दौरा भारत का था और हम इस साल वहाँ से लौटे हैं। और हमारे कहने पर, विदेश मंत्रालय और व्यापार मंत्रालय ने भारत में हमारे पोस्ट और वेलिंगटन में हेड ऑफिस, दोनों जगह भारत-NZ रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए दिए जा रहे रिसोर्स में काफी बढ़ोतरी की है।

हम भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर को लंबे समय से जानते हैं, और एक इंटरनेशनल स्टेट्समैन और न्यूज़ीलैंड-भारत रिश्तों के चैंपियन के तौर पर उनके लिए बहुत सम्मान रखते हैं।

पीएम क्रिस्टोफर ने समझौते का किया समर्थन

न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने समझौते को न्यूजीलैंड के लिए फायदेमंद बताया। उन्होंने कहा कि भारत का विशाल बाजार न्यूजीलेंड की जनता के लिए नए अवसर लेकर आएगा। इससे आर्थिक विकास होगा, बेरोजगारी घटेगी और नए अवसर पैदा होंगे। उन्होंने कहा कि 2022 के चुनाव में जनता से किए गए वादे के मुताबिक उन्होंने इस समझौता के लिए अपनी सहमति दी है। इस पर 2026 के पहले तिमाही में हस्ताक्षर हो जाएगा।

पीएम मोदी ने एफटीए पर सहमति बनने के बाद न्यूजीलेंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर से बात की। पीएम मोदी ने एक्स पर इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि सिर्फ 9 दिनों में FTA पर सहमति बनना भारत के लिए बड़ी उपलब्धि है।

न्यूजीलैंड सातवाँ ऐसा देश होगा जिसके साथ भारत FTA करने जा रहा है। केन्द्रीय मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, यह भारत की पहली ऐसी डील है, जिसमें वार्ता करने वाली टीम में सभी महिलाएँ थी। ज्वाइंट सेक्रेटरी पेटल ढिल्लों ने इस टीम का नेतृत्व किया। ये भी एक रिकॉर्ड है कि मात्र 9 महीने में इस डील को फाइनल किया गया। अब तक भारत ने 7 देशों के साथ एफटीए किया है। साथ ही, कई देशों के अलावा यूरोपीय यूनियन, अफ्रीकन यूनियन के साथ बड़ी डील की है।