Home Blog Page 169

नेल्ली नरसंहार 1983 की रिपोर्ट हिमंता सरकार ने की सार्वजनिक, डेमोग्राफी में बदलाव और मुस्लिमों के जमीन अतिक्रमण की वजह से फूटा था गुस्सा: पढ़ें- तिवारी आयोग में किसे ठहराया गया जिम्मेदार

असम सरकार ने मंगलवार (25 नवंबर, 2025) को ऑफिशियल त्रिभुवन प्रसाद तिवारी कमीशन की रिपोर्ट की कॉपी 126 मेंबर वाले हाउस के मेंबर और दूसरे लोगों में बांटी। इसके अलावा नॉन-गवर्नमेंट जस्टिस (रिटायर्ड) टी.यू. मेहता कमीशन की रिपोर्ट भी असेंबली में पेश की। दोनों ही रिपोर्ट 1983 हिंसा को लेकर थी। लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार ने कभी भी रिपोर्ट को सदन के पटल पर नहीं रखा।

40 साल बाद असम की हिमंत सरकार ने रिपोर्ट रख कर कॉन्ग्रेस के सियासत की पोल खोल दी। चार महीने चली इस हिंसा में हजारों लोग मारे गए और लाखों बेघर हुए

कब हुआ तिवारी आयोग का गठन

तिवारी आयोग का गठन 21 अगस्त 1983 को किया गया था। माना गया कि 6 महीने में आयोग अपनी रिपोर्ट सौंप देगी। आयोग ने 1983 में जनवरी से अप्रैल तक राज्य में फैली अशांति और हालात को लेकर जाँच की। मई 1984 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार को सौंपा। आयोग में एस मनोहरन आईएएस, को सेक्रेटरी बनाया गया जबकि सीएक वर्मा और आरसी जैन दोनों रिटायर आईएएस थे, उन्हें सदस्य के तौर पर शामिल किया गया। 9 फरवरी 1984 तक 257 गवाहों से पूछताछ की गई। इनमें 106 आधिकारिक और 151 गैर आधिकारिक थे।

आयोग ने एडवोकेट जनरल एसएन भुइयां, वकील एसएल लश्कर, असम सरकार के वकील बुरागोहे समते कई लोगों का पक्ष भी सुना। असम पुलिस की भी राय जानी। कमीशन ने पहले राउंड में सभी जिलों में घूमकर स्थिति को परखा। दूसरे दौर में हर जिले के गणमान्य लोगों और न्यूज पेपर्स के एडिटर्स, पुलिस वगैरह से जानकारी ली। वजह क्या था? क्यों सैकड़ों की संख्या में लोग जमा हुए? घटनास्थल से हजारों सबूत आयोग ने जमा किए। इसके बाद रिपोर्ट तैयार की।

रिपोर्ट में कहा गया कि किछार और नॉर्थ कछार हिल्स को छोड़कर पूरे राज्य में हिंसा फैली और लोग प्रभावित हुए।

हिंसा की शुरुआत फरवरी 1983 में हुए विवादित तीन-चरण के विधानसभा चुनावों के दौरान हुआ, जब असम में राष्ट्रपति शासन था। इसमें हजारों लोग मारे गए। इसके बावजूद चुनाव हुए और हितेश्वर सैकिया के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी। मुख्यमंत्री सैकिया ने ही त्रिभुवन प्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में जाँच आयोग बनाया था।

1984 में जस्टिस मेहता के नेतृत्व में भी एक न्यायिक आयोग का गठन किया गया था जिसने असम हिंसा की जाँच की। दोनों रिपोर्ट सीएम सैकिया को सौंपे गए। लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं किया गया। 1985 में प्रफुल्ल महंत सरकार ने कोशिश की, लेकिन सदन के पटल पर नहीं रख सकी। करीब 40 साल बाद बीजेपी की हिमंत सरमा सरकार ने रिपोर्ट विधानसभा में पेश की है, जिस पर बवाल मचा हुआ है।

चुनाव कराने का फैसला हिंसा का कारण नहीं- रिपोर्ट

नेल्ली हिंसा के दौर में ही तत्कालीन इंदिरा गाँधी की सरकार ने असम में चुनाव कराने का फैसला लिया। इसपर विपक्ष पार्टियों ने सत्ता हासिल करने के लिए कॉन्ग्रेस पर चुनाव कराने का आरोप लगाया। लेकिन तिवारी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इसे खारिज कर दिया है। रिपोर्ट कहता है कि चुनाव कराने का फैसला हिंसा का कारण नहीं था। रिपोर्ट में 1950,1954,1960, 1968 1972 1977,1978, 1979, 1980, 1981 और 1982 में हुए हिंसा का जिक्र किया। ज्यादातर हिंसा का चुनाव से कोई संबंध नहीं था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर यह बात मान ली जाती है कि हिंसा का खतरा होने पर चुनाव नहीं होना चाहिए, तो यह राजनीतिक ब्लैकमेलिंग होता और उसके गंभीर नतीजे होंगे। ये पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को खतरे में डालने जैसा है। इसमें कहा गया है कि “हमारा देश एक गरीब और विकासशील देश है। यहाँ रोज कई मुद्दे आते हैं । भारत जैसे देश में क्षेत्रीय और दूसरे मुद्दे हावी हैं। राज्यों के बीच पानी और नदियों के जल बंटवारे की समस्या है। सरकारी सेवा से जुड़े लोगों को पे स्केल की दिक्कत है। फैक्ट्री कर्मचारी वेज और वर्किंग कंडीशन से परेशान हैं। छात्रों के यूनियन परीक्षा और पढ़ाई को लेकर परेशान हैं। किसानों को फसल का उचित मूल्य नहीं मिलने की समस्या है।”

1983 हिंसा में हजारों लोग मारे गए

त्रिभुवन प्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में बनी तिवारी आयोग ने 1983 के शुरुआती 4 महीनों की परिस्थितियों के बारे में बताया है। उस समय विधानसभा चुनाव हो रहे थे और राज्य में बड़े आंदोलन का दौर जारी था। राज्य में बाहरी लोगों के खिलाफ आंदोलन चल रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में इस दौरान 8019 हिंसक घटनाएँ हुई। 248292 लाख लोगों को राहत शिविरों में रहना पड़ा, जबकि 225951 लोग बेघर हुए। करीब 22 रेलवे की संपत्तियों का नुकसान हुआ और 85 रेलवे ट्रैक प्रभावित हुए। 22436 प्राइवेट घरों को आग के हवाले कर दिया गया।

रिपोर्ट में हिंसा को ‘गैर सांप्रदायिक’ बताते हुए ‘मुस्लिम हिंसा’ की चर्चा

रिपोर्ट में उस दौर की हिंसा को ‘गैर सांप्रदायिक’ बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंसक घटनाओं को सांप्रदायिक रंग देना गलत है। पूरा समाज हिंसा का दंश भुगत रहा है। आरोपित किसी एक समुदाय के नहीं है। कई जगह असमिया लोग आरोपित हैं, लेकिन वे बांग्लाभाषी हैं।

कई जगहों पर मुस्लिम भीड़ ने असमिया लोगों पर आक्रमण किया। इस दौरान मुस्लिम भीड़ ने अपने समुदाय के लोगों का साथ दिया। नेल्लई के चमरिया और नलबारी और कामपुर पुलिस स्टेशन क्षेत्र में ऐसा हुआ। चोलखोवा इलाके में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों ने अप्रवासियों पर हमले में साथ दिया। कई इलाकों में पीड़ित और आक्रमणकारी दोनों बहुसंख्यक समुदाय के थे। इसलिए इसे सांप्रदायिक हिंसा की तरह नहीं देखा जा सकता।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जनसंख्या का वितरण असम में इस तरह का है जिससे एक समुदाय एक इलाके में बहुसंख्यक है, वही दूसरे इलाके में अल्पसंख्यक है। जब हिंसा फैली तो इसकी प्रतिक्रिया भी हुई और पूरा इलाका इस ‘पागलपन’ का शिकार हुआ।

हिंसा के लिए AASU और AAGSU को जिम्मेदार ठहराया

रिपोर्ट में हिंसा की जिम्मेदारी असम गण संग्राम परिषद और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन पर डाली गई। इसमें कहा गया AASU और AAGSU दोनों इसके लिए जिम्मेदार हैं। इस बात के बहुत सारे सबूत हैं कि चुनाव रोकने के लिए, आगजनी, दंगे करवाए गए।

बिल्डिंग,पुल, रेलवे संपत्ति को नुकसान और बंद के दौरान हिंसक घटनाएँ योजनाबद्ध तरीके से की गई। आयोग के अनुसार, बंद, विरोध और संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने जैसी गतिविधियां पहले से तय थीं, लेकिन बाद में हालात आंदोलनकारी नेताओं के नियंत्रण से बाहर हो गए।

चुनाव कराना काफी मुश्किल भरा फैसला था

तिवारी आयोग ने भी माना कि तत्कालीन डीजीपी (स्पेशल ब्रांच) ने चुनाव में मशीनरी को होनेवाली कठिनाइयों के बारे में जानकारी दी थी। इसमें कहा गया कि असम में कानून व्यवस्था की स्थिति काफी सालों से एक चुनौती बनी हुई है। सालों से प्रशासन को पंगू बनाने की कोशिश की गई। यहाँ चुनाव करना खुद में काफी मुश्किल काम है।

राज्य के सरकारी कर्मचारी चुनाव प्रक्रिया का बायकॉट करने वाले हैं और बाहर से आए पोलिंग एजेंट को ये काम करना है। लोकल प्रेस में बैलेट पेपर प्रिंट करने से मना कर दिया है। राज्य में दूसरे अरेंजमेंट बाहर से करने होंगे।

इसमें कहा गया कि पोलिंग स्टेशन, परिवहन के रास्ते और पुल पर हमले हो सकते हैं। इसके अलावा दूसरी जरूरतों को पूरा करना भी नामुमकिन-सा है। काफी लोगों की जान जा सकती है और संपत्ति बर्बाद हो सकते हैं।

असमिया लोगों का अल्पसंख्यक बनने का डर ‘काल्पनिक’ नहीं

तिवारी रिपोर्ट में कहा गया है कि असमी लोगों के अंदर का ‘भय’ कोई ‘काल्पनिक’ नहीं है। कई ज़िम्मेदार गवाहों ने इस बात की गवाही दी है और जनगणना के आंकड़े और रिपोर्ट इस बात को साबित करते हैं। असमिया पहचान पर खतरा बहुत पहले से है। ब्रिटिश एडमिनिस्ट्रेटर और जनगणना कमिश्नर ने भी देखा था, जिन्हें न तो कोई मतलब था और न ही कोई भेदभाव और न ही इस मामले में उनका कोई पर्सनल या ग्रुप इंटरेस्ट था। आयोग के सामने पेश किए गए सबूतों से पता चलता है कि विदेशी, भाषा आदि मुद्दे दशकों से लोगों के मन में उथल-पुथल मचा रहे थे। ये पहले भी कई बार हिंसा की वजह बने।

असमिया पहचान को बचाने जाने की जरूरत

बाहर से आए प्रवासियों की ओर से जमीन कब्जा करने को अहम वजह बताते हुए कहा गया है कि असमिया लोगों के मन में इसको लेकर डर घुस गया है, इसका समाधान होना चाहिए। रिपोर्ट में कश्मीर की तर्ज पर भूमि सुरक्षा कानून लागू करने की सिफारिश की गई। इसके अलावा गैर-असमिया लोगों को भूमि हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगाने की भी सलाह दी गई है। NRC की पैरवी की गई है और किसे ‘असमिया’ माना जाएगा, इसको लेकर भी सुझाव दिए गए हैं।

कैसे बदली डेमोग्राफी?

असम की डेमोग्राफी में जबरदस्त बदलाव देखा गया है। राज्य में 1872 में देश के दूसरे राज्यों के साथ जनगणना कराया गया। 1901 से 1971 के बीच यहाँ जनसंख्या वृद्धि ने सबका ध्यान खींचा। 1901 में 32.90 लाख यहाँ की जनसंख्या थी, वहीं 1971 में 146.25 लाख हो गई।

तिवारी रिपोर्ट पेज नंबर 37

असम में अप्रवासियों की बात करें तो इसका पता 1951, 1961 और 1971 में चलता है। 1951 में 12.86 लाख अप्रवासी थे। इनमें से सिर्फ पाकिस्तानी अप्रवासियों की संख्या 8.02 लाख थी। जबकि दूसरे राज्यों के 4.35 लाख लोग थे।

1971 की जनगणना के मुताबिक, 15.03 लाख प्रवासियों में से 8.96 लाख सिर्फ पाकिस्तानी थे। जबकि दूसरे राज्यों से 5.25 लाख और नेपाल से 75866 थे। 1981 में असम में जनगणना नहीं किया गया था।

इससे पता चलता है कि असमिया लोगों को अपनी संस्कृति और जमीन की चिंता क्यों हुई। लगातार पाकिस्तानी भीड़ राज्य के संसाधनों पर कब्जा जमाने लगा और लोगों को सांस्कृतिक रक्षा की जरूरत महसूस हुई। इसलिए तिवारी आयोग ने एनआरसी की जरूरत महसूस की थी।

धर्मांतरण के खिलाफ छत्तीसगढ़ में भी आएगा कानून, 10 साल की सजा-लाखों के जुर्माने का प्रावधान: कई नियमों से कट्टरपंथियों पर कसी जाएगी नकेल, जानें अब तक किन राज्यों में है लागू

छत्तीसगढ़ सरकार आने वाले शीतकालीन सत्र में एक नया धर्मांतरण निषेध कानून लाने वाली है। सरकार यह कदम इसलिए उठा रही है क्योंकि बस्तर, जशपुर और रायगढ़ जैसे जनजातीय इलाकों में काफी समय से धर्मांतरण को लेकर विवाद और तनाव बढ़ रहा है। कई बार हालात इतने खराब हुए कि पुलिस और प्रशासन को दखल देना पड़ा। अभी राज्य में मध्य प्रदेश का पुराना कानून लागू है, जिसमें धर्म बदलने से पहले DM की अनुमति लेनी होती है। लेकिन सरकार का मानना है कि यह कानून अब पर्याप्त नहीं है और इसे मजबूत करने की जरूरत है।

नए कानून का उद्देश्य साफ है- कोई भी व्यक्ति बिना पूरी कानूनी प्रक्रिया के धर्म नहीं बदल सकेगा। अगर किसी को डर दिखाकर, लालच देकर, दबाव डालकर या धोखे से धर्म परिवर्तन कराया जाता है तो ऐसे मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान होगा। सरकार चाहती है कि हर धर्मांतरण की जानकारी कानूनी रूप से दर्ज हो, ताकि आगे किसी तरह का विवाद न हो और जनजातीय इलाकों में शांति बनी रहे। यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करेगा, लेकिन जबरन या अवैध धर्मांतरण पर सख्त रोक लगाएगा।

नए कानून में क्या-क्या बदलाव हो सकते हैं?

सरकार के नए ड्राफ्ट में सबसे बड़ी बात यह है कि अब धर्म बदलना पहले की तरह आसान नहीं होगा। किसी भी व्यक्ति को धर्म बदलने से पहले पूरी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। उसे तय समय पर जिला मजिस्ट्रेट (DM) को लिखित जानकारी देनी होगी, ताकि सरकार को पता रहे कि धर्म परिवर्तन अपनी इच्छा से हो रहा है या किसी दबाव में। अगर कोई व्यक्ति बिना जानकारी दिए धर्म बदल लेता है, तो ऐसे धर्मांतरण को मान्य नहीं माना जाएगा। यानी कागजों पर वह धर्म परिवर्तन वैध नहीं होगा।

इसके साथ ही ड्राफ्ट में यह भी साफ कहा गया है कि अगर किसी ने किसी को लालच देकर, डर दिखाकर, धमकाकर या धोखा देकर धर्म बदलवाने की कोशिश की, तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होगी। ऐसे मामलों में जेल की सजा भी हो सकती है और भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है। सरकार का मानना है कि जब तक प्रक्रिया को मजबूत और सख्त नहीं बनाया जाएगा, तब तक अवैध धर्मांतरण पर रोक लगाना मुश्किल है।

एक और अहम मुद्दा ‘शादी के बहाने धर्म परिवर्तन कराना’, जिसे कई राज्यों में लव जिहाद कहा जाता है। नए कानून में छत्तीसगढ़ भी इस तरह के मामलों पर सख्ती बढ़ा सकता है। अगर कोई व्यक्ति केवल शादी करवाने के मकसद से धर्म परिवर्तन करवाता है या किसी को ऐसा करने पर मजबूर करता है, तो ऐसी शादी को कोर्ट अवैध घोषित कर सकेगी। यानी सिर्फ शादी के लिए धर्म परिवर्तन की कोशिश अब गंभीर अपराध माना जा सकता है।

इस कानून का मकसद यह नहीं है कि किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनी जाए। हर व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म अपनाने का अधिकार रहेगा, लेकिन यह अधिकार कानून के दायरे में रहकर ही मिलेगा। नए प्रावधान यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी व्यक्ति दबाव, धोखे या लालच का शिकार न बने। सरकार का मानना है कि इससे खासकर जनजातीय इलाकों में फैल रहा तनाव कम होगा, वहाँ होने वाले झगड़े और सामाजिक विभाजन थमेगा और समाज में स्थिरता बनी रहेगी।

भारत के किन राज्यों में पहले से लागू है धर्मांतरण विरोधी कानून?

भारत में धर्मांतरण विरोधी कानून की शुरुआत बहुत पहले ओडिशा से हुई। ओडिशा ने 1967 में पहला कानून बनाया था, जिसमें जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन करवाने पर सजा का प्रावधान रखा गया। इसके एक साल बाद मध्य प्रदेश ने भी ऐसा ही कानून लागू किया। समय बीतने के साथ, अलग-अलग राज्यों ने महसूस किया कि धर्मांतरण के मामलों में नए तरीके सामने आ रहे हैं, इसलिए उन्होंने कानूनों को और सख्त बनाना शुरू किया।

हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और राजस्थान ने अपने कानूनों में और कड़े नियम जोड़े हैं। इन राज्यों का साफ कहना है कि अगर कोई व्यक्ति किसी को डर दिखाकर, पैसा या नौकरी का लालच देकर, या शादी का झाँसा देकर धर्म परिवर्तन करवाने की कोशिश करता है, तो यह एक गंभीर अपराध माना जाएगा। ऐसे मामलों में दोषी को 3 साल से लेकर 10 साल तक जेल हो सकती है। इसके साथ ही लाखों रुपए का जुर्माना भी देना पड़ सकता है।

अधिकतर राज्यों में यह अपराध गैर-जमानती है। इसका मतलब है कि पुलिस बिना वारंट के भी आरोपित को गिरफ्तार कर सकती है और जमानत आसानी से नहीं मिलती। अगर पीड़ित व्यक्ति नाबालिग हो, महिला हो, या अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) समुदाय से हो, तो सजा और अधिक कड़ी कर दी जाती है, क्योंकि ये वर्ग ज्यादा संवेदनशील माने जाते हैं।

कई राज्यों में तो स्वेच्छा से, यानी अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन पर भी नियम बहुत साफ हैं। जिसे खुद से धर्म परिवर्तन करवाना है, उसे पहले जिला मजिस्ट्रेट (DM) को 30 से 60 दिन पहले लिखित रूप से बताना होता है। यह इसलिए किया जाता है ताकि अधिकारियों को पता रहे कि धर्म परिवर्तन पूरी तरह अपनी इच्छा से किया जा रहा है और इसके पीछे कोई दबाव या लालच नहीं है।

इन सभी कानूनों का मुख्य उद्देश्य एक ही है कि लोगों को सुरक्षा देना, उन्हें धोखे से बचाना और धार्मिक स्वतंत्रता को सही अर्थों में सुरक्षित रखना।

अवैध धर्मांतरण का गलत इस्तेमाल कैसे होता है?

धर्मांतरण को लेकर सबसे बड़ी चिंता तब पैदा होती है जब इसे किसी योजना के तहत, संगठित तरीके से किया जाता है। खासकर तब, जब कमजोर या सरल-सहज लोगों को निशाना बनाया जाता है। कई जगहों पर देखा गया है कि कुछ समूह धीरे-धीरे किसी इलाके में बड़ी संख्या में लोगों का धर्म बदलवाते हैं।

इसका असर सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं रहता। इससे उस क्षेत्र की जनसंख्या का संतुलन बदलने लगता है। जब किसी एक समुदाय की संख्या अचानक बढ़ जाती है, तो स्थानीय राजनीति, पंचायतों के फैसले, प्रशासनिक ढाँचा और सामाजिक माहौल पर भी बड़ा असर पड़ सकता है। कई बार यह बदलाव वहाँ रहने वाले पुराने समुदायों के लिए चिंता और असुरक्षा की भावना पैदा कर देता है।

दूसरा बड़ा नुकसान तब होता है जब बाहरी या संगठित समूह जनजातीय समुदायों को उनकी अपनी परंपराओं, देवी-देवताओं और जीवनशैली से दूर करने की कोशिश करते हैं। जनजातीय समाज की अपनी विशिष्ट पहचान होती है, और जब उन्हें तेजी से किसी नए मजहब की ओर मोड़ा जाता है, तो समाज में विभाजन बढ़ता है। कई गाँवों में परिवार आपस में बँट जाते हैं, त्यौहार अलग-अलग हो जाते हैं और सामाजिक रिश्तों में तनाव पैदा हो जाता है।

कुछ मामलों में ऐसे धर्मांतरित व्यक्तियों का इस्तेमाल संगठन अपने प्रचार, अपनी संख्या बढ़ाने या गलत गतिविधियों के लिए भी करते हैं। कमजोर या भावनात्मक रूप से टूटे लोगों को प्रभावित करना आसान होता है और ऐसे लोग अनजाने में कट्टरपंथी सोच के शिकार बन सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट भी इस खतरे को समझ चुका है। कोर्ट ने साफ कहा है कि जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन करवाना देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकता है। इसलिए कई राज्य सरकारें कानूनों को और सख्त कर रही हैं, ताकि कोई भी व्यक्ति दबाव, डर, दिखावे या चालाकी से लोगों का धर्म परिवर्तन ना करवा सके। सरकारों का उद्देश्य यह नहीं है कि किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनी जाए, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हर धर्म परिवर्तन साफ, सुरक्षित और पूरी तरह अपनी इच्छा से हो, न कि किसी चाल या दबाव का नतीजा।

कोई बता रहा नौटंकी तो किसी को सता रही मुस्लिमों की चिंता: राम मंदिर ध्वजारोहण देख PAK से वामपंथी तक सब परेशान, ‘धर्म ध्वज’ कर रहा सांस्कृतिक पुनर्जागरण का उद्घोष

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राम मंदिर के मुख्य शिखर पर धर्म ध्वज की स्थापना एक रस्म से आगे बढ़कर एक ऐतिहासिक घटना है। यह वह क्षण है, जिसमें सदियों की प्रतीक्षा, संघर्ष और करोड़ों-करोड़ राम भक्तों की भावनाएँ एक प्रतीक के रूप में आसमान में लहरा उठीं।

भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के उद्घोष इस ध्वज को देश का बड़ा वर्ग गर्व, आस्था और सभ्यता के पुनरुत्थान के रूप में देख रहा है तो वहीं तथाकथित लिबरल वर्ग इससे दुखी है। वामपंथी गुटों से लेकर लिबरल्स और पाकिस्तान तक सब परेशान हैं।

लिबरल्स की एक जमात इस बात से दुखी हो गई है कि राम मंदिर पर ध्वज फहराने के लिए खुद प्रधानमंत्री क्यों चले गए। जब प्रधानमंत्री मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम में पहुँचे थे, तब भी इस जमात के पेट में मरोड़ उठने लगी थीं। वामपंथी पार्टी CPI के महासचिव डी राजा भी इन दुखी लोगों की जमात में शामिल हैं। राजा ने इसके विरोध में X पर एक लंबा पोस्ट लिखा है।

राजा ने लिखा, “प्रधानमंत्री मोदी देश के सामने अयोध्या में भगवा झंडा फहरा रहे हैं और इसे ‘भारतीय सभ्यता के पुनरुत्थान’ का प्रतीक बता रहे हैं। यह सिर्फ संशोधनवाद नहीं है बल्कि यह एक संकीर्ण, बहिष्कारवादी विचारधारा के साथ हमारे संवैधानिक इतिहास को फिर से लिखने का एक बेशर्म प्रयास है। यह बेहद चिंताजनक है कि देश के सर्वोच्च पद का इस्तेमाल हमारे संविधान में निहित बहुलवाद का जश्न मनाने के बजाय RSS के वैचारिक एजेंडे को वैध बनाने के लिए किया जा रहा है।”

उन्होंने कहा कि हम सबका झंडा तिरंगा है और इस घटना को तमाशा बताया है। यकीनन तिरंगा इस राष्ट्र की पहचान है जो आजादी के बाद आया है। उसका सम्मान है और पूरा राष्ट्र उसके सम्मान में नतमस्तक है। पर डी राजा ये क्यों भूल गए कि भगवा झंडा और राम राज्य का प्रतीक ध्वज हजारों वर्ष पुराने इस राष्ट्र की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतिनिधि है। हिंदुओं के मन में उसके लिए अपार श्रद्धा है।

डी राजा हिंदुओं की आस्था की तुलना तमाशे से कर सकते हैं, उन्हें कोई कुछ नहीं कहने वाला है। क्योंकि इस देश का बहुसंख्यक हिंदू समाज सहिष्णुता को अपने मन में, अपनी आत्मा में आत्मसात किए हुए है। डी राजा को समझने की जरूरत है कि क्या वो ऐसा किसी और मजहब के प्रतीक के लिए कहने की हिम्मत जुटा पाएँगे। जवाब सीधा सा है नहीं, और इसकी वजह आप-हम सब जानते हैं। डी राजा ऐसे कहने वाले अकेले नहीं है।

वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने वाले ‘द हिंदू’ की पत्रकार सुहासिनी हैदर भी इससे दुखी हैं और लोगों को भी भ्रम में डालने की कोशिश कर रही हैं। हैदर ने X पर पोस्ट कर प्रधानमंत्री मोदी पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने लिखा, “विचित्र विरोधाभास – पिछले कुछ वर्षों से अन्य सभी धर्मों के धार्मिक स्थलों पर राष्ट्रीय तिरंगा फहराने के लिए कहा गया है लेकिन संविधान की शपथ लेने वाले प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आज धार्मिक ध्वज फहराएँगे।”

सुहासिनी हैदर जिस संविधान की दुहाई दे रही हैं क्या वो प्रधानमंत्री को अपना धर्म मानने से रोकता है? क्या वो देश के हर नागरिक को अपना धर्म मानने की आजादी का अधिकार नहीं देता है। सुहासिनी को मतलब ना संविधान से ना धर्म उन्हें बस मतलब अपने प्रोपेगेंडा से है। जाहिर है कि राष्ट्रीय पर्वों पर तिरंगा सभी जगह फहराया जाता है, खुद राम मंदिर के परिसर में भी बीते 15 अगस्त 2025 को तिरंगा फहराया गया था।

रामजन्मभूमि परिसर में तिरंगा (फोटो साभार: दैनिक जागरण)

इन वामपंथियों द्वारा तिरंगे को भगवा का विरोधी साबित करने की कोशिशें की जा रही हैं लेकिन वो भूल गए हैं कि भगवा हमेशा से इस राष्ट्र कि चेतना का आधार था, है और रहेगा। हालाँकि, इसके होने से तिरंगा की शान में ना कमी आती है और ना होगी।

सोशल मीडिया पर एक बड़ा तबका कथित ‘बाबरी मस्जिद’ को फिर से बनाए जाने की वकालत भी कर रहा है। अयोध्या से करीब 850 किलोमीटर दूर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में तो सत्तारूढ़ TMC के एक विधायक हुमायूँ कबीर ने 6 दिसंबर 2025 को बाबरी नाम की मस्जिद बनाने का एलान भी कर दिया है। सोशल मीडिया पर भी ऐसे स्वर दिखे हैं। ‘इंडियन मुस्लिम आर्काइव’ नाम के एक हैंडल ने फिर ‘बाबरी’ बनाने की बात कही है।

राम मंदिर के धर्म ध्वज से जुड़ी एक पोस्ट पर जवाब देते हुए हैंडल ने लिखा, “बाबरी का विनाश न तो हिंदुओं के लिए कोई सभ्यतागत उपलब्धि है और न ही व्यापक उम्माह के लिए, यह तो बस एक प्रतीक है जिसे हागिया सोफिया की तरह उलटा जा सकता है।” हैंडल से आगे लिखा गया, “इस बीच, पंजाब, सिंध, बंगाल और कश्मीर जैसे हिंदू सभ्यता के उद्गम स्थलों से हिंदू धर्म का सफाया हो चुका है, जिसे उलटा नहीं जा सकता।”

राजीव निगम नाम के एक यूजर ने धर्म ध्वज की स्थापना को नौटंकी बताया है। अभिनेता अनुपम खेर ने X पर एक पोस्ट में लिखा कि हमारे जीते जी अयोध्या में हमें श्री राम मंदिर पर ध्वजारोहण समारोह का शुभ अवसर प्राप्त हुआ इससे बड़े सौभाग्य की बात क्या हो सकती है। इस पर राजीव निगम से लिखा, “फुल नौटंकी चालू आहे” यानी पूरी तरह से नौटंकी चल रही है।

सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट की भरमार है जो प्रभु राम के धर्म ध्वज की स्थापना किए जाने से दुखी हैं। भारत में वामपंथी और लिबरल तो दुखी हैं ही, साथ में ही पड़ोसी देश पाकिस्तान भी रो रहा है। वो भारत पर आरोप लगाते हुए UN तक से गुहार लगाने पहुँच गया है।

पाकिस्तान भी परेशान, UN तक लगाई गुहार

देश में तो प्रोपेगेंडा फैलाने वाले परेशान हैं हीं, पड़ोसी देश पाकिस्तान भी परेशान है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बाकायदा बयान जारी कर राम मंदिर के धर्म ध्वज की स्थापना पर सवाल उठाए हैं।

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है, “पाकिस्तान ने अयोध्या में ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद की जगह पर बने तथाकथित ‘राम मंदिर’ पर झंडा फहराने पर गहरी चिंता जताई है। सदियों पुरानी इबादत गाह बाबरी मस्जिद को 6 दिसंबर 1992 को फासीवादी सोच से प्रेरित कट्टरपंथी भीड़ ने गिरा दिया था।”

पाकिस्तान ने आगे कहा, “भारत में बाद की कानूनी प्रक्रिया, जिसमें जिम्मेदार लोगों को बरी कर दिया गया और गिराई गई मस्जिद की जगह पर मंदिर बनाने की इजाज़त दी गई, अल्पसंख्यकों के प्रति भारतीय सरकार के भेदभाव वाले रवैये के बारे में बहुत कुछ बताती है।” पाकिस्तान ने कहा, “भारतीय मुसलमान लगातार बढ़ते सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हाशिए पर धकेले जाने का सामना कर रहे हैं।”

पाक ने कहा, “UN और संबंधित इंटरनेशनल संस्थाओं को इस्लामिक विरासत की सुरक्षा और सभी माइनॉरिटीज के धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा पक्का करने में एक कंस्ट्रक्टिव भूमिका निभानी चाहिए। पाकिस्तान भारत सरकार से अपील करता है कि वह मुसलमानों समेत सभी धार्मिक समुदायों की सुरक्षा पक्का करे।”

पाकिस्तान के दुख को समझा भी जा सकता है। वो खुद भुखमरी और गृह युद्ध जैसी स्थितियों से जूझ रहा है और फौज हर तरफ से पिट रही है। ऐसे में आवाम का ध्यान भटकाने के लिए ऐसी हरकतों का सहारा लेना पड़ रहा है। भारत के वामपंथियों की आदत ही खराब हो गई है। इस वर्ग को हर ऐसे क्षण में खामी तलाशने की आदत सी हो गई है, जैसे उन्हें भारत की आत्मा को समझना ही नहीं बल्कि उससे स्वयं को अलग रखना है।

यह वही विचारधारा है जिसने 2019 में राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी निराशा ही जताई थी। तब भी तर्कों की लंबी फेहरिस्त पेश की गई कभी सेक्युलरिज्म खतरे में है, कभी राजनीति धर्म के बिना भी चल सकती है और कभी इतिहास मिटाया जा रहा है। पर सच यह है कि जो इतिहास मिटाया गया था, वह अब फिर से स्थापित हुआ है। जिनकी स्मृति सैकड़ों वर्षों तक दबा दी गई थी, आज वह फिर सबके हृदय में प्रफुल्लित हो रही है। यह धर्म ध्वज उसी स्मृति का प्रत्यक्ष रूप है।

आज जब ध्वज फहरा रहा है, तभी यह सदा पीड़ित लिबरल समूह उसमें भी राजनीति, बहुसंख्यक वर्चस्व, राजनीतिक हिंदुत्व जैसी चीजें ढूँढ रहा है। सवाल यह है कि जब किसी समुदाय की सांस्कृतिक जड़ों का सम्मान होता है तो यह वर्ग असंतोष क्यों महसूस करता है?

ऐसा लगता है कि भारत की प्राचीन पहचान को स्वीकार करना उन्हें असुविधाजनक लगता है। यह वर्ग भूल जाता है कि राम मंदिर का निर्माण किसी सत्ता की इच्छा से कहीं आगे बढ़कर समाज की सामूहिक स्मृति और सैकड़ों वर्षों के संघर्ष का परिणाम है। आज राम मंदिर पर स्थापित धर्म ध्वज से कुछ लोगों को समस्या है, क्योंकि उन्हें यह मानना मुश्किल लगता है कि भारत का सांस्कृतिक चरित्र जाग रहा है और वह भी आत्मविश्वास के साथ। यह काल भारत के स्व: के बोध का काल है। राम मंदिर के शिखर पर फहराया यह ध्वज ‘भारत माँ’ के मस्तक पर तिलक की तरह है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने की मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकी संगठन घोषित करने की शुरुआत, जानिए कतर के चैनल अल-जजीरा से इसके संबंधों के बारे में सबकुछ

इस्लामी आतंकवाद को एक बड़ा झटका देते हुए, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 24 नवंबर 2025 को एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए। इसमें उनके प्रशासन को निर्देश दिया गया है कि मुस्लिम ब्रदरहुड (MB) की कुछ शाखाओं को विदेशी आतंकी संगठन/फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन (FTO) और खासतौर पर स्पेशली डेजिगनेटेड ग्लोबल टेररिस्ट्स (SDGTs) घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की जाए।

इस कार्यकारी आदेश में कहा गया है कि विदेश मंत्री मार्को रुबियो और वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट राष्ट्रपति को एक ज्वाइंट रिपोर्ट सौंपेंगे। इसमें मुस्लिम ब्रदरहुड की किसी भी शाखा या सब-डिविजन जैसे लेबनान, जॉर्डन और मिस्र में सक्रिय चैप्टर्स को FTO और SDGT घोषित करने की बात भी शामिल होगी।

ट्रंप के पहले कार्यकाल की महत्वाकांक्षाओं को ये कदम पूरा करता है। उस दौरान उन्होंने इस आतंकी संगठन के खिलाफ समीक्षा का आदेश दिया था, लेकिन नौकरशाही विरोध के कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई थी।

ट्रंप की ओर से मुस्लिम ब्रदरहुड की समीक्षा के आदेश को गति देने का काम कॉन्ग्रेस के दोनों पार्टियों के प्रयासों ने किया। इसमें मुस्लिम ब्रदरहुड टेररिस्ट डेजिग्नेशन एक्ट-2025 और रिपब्लिकन नेताओं का यह तर्क शामिल था कि मुस्लिम ब्रदरहुड एक ‘अंतरराष्ट्रीय इस्लामवादी संगठन’ है।

व्हाइट हाउस ने कहा है कि पूरे मुस्लिम ब्रदरहुड को एक साथ आतंकी संगठन घोषित नहीं किया जाएगा, पर ट्रंप का ये कदम अमेरिका की नीति में एक बड़ा बदलाव हो सकता है। ट्रंप का ये कदम इस समय में काफी अहम है जब वे गाजा में शांति बहाल करने की कोशिश में लगे हैं।

इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि इजरायल-फिलीस्तीन संघर्ष महज जमीन का विवाद नहीं है, बल्कि मूल रूप से धार्मिक संघर्ष है, जहाँ दोनों पक्षों के क्षेत्रीय दावे युद्ध का कारण बने हैं।

ऑपइंडिया ने पहले भी रिपोर्ट किया था कि फिलीस्तीनी इस्लामी आतंकी संगठन हमास ने 1988 के अपने चार्टर में इजरायल को ‘वक्फ’ संपत्ति बताया और यहूदियों के खिलाफ तब तक जिहाद जारी रखने का संकल्प लिया जब तक कि आखिरी यहूदी की हत्या न हो जाए। हमास को मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन मिलता रहा है और उसने 7 अक्टूबर 2023 के नरसंहार के बाद इजरायली नागरिकों और सेना पर हवाई हमले किए।

2017 के दस्तावेजों में हमास ने खुद को मुस्लिम ब्रदरहुड से दूर दिखाने की कोशिश की, ताकि मिस्र के साथ संबंध बेहतर हो सकें। उसने यहूदियों और जायोनिस्टों में फर्क करने की बात भी कही। लेकिन 2023 की हिंसा ने उसकी दोहरी नीति और यहूदियों के प्रति नफरत को सामने ला दिया। 7 अक्टूबर 2023 को यहूदियों की अंधाधुंध हत्या ने हमास के पाखंड और नफरत को पूरी तरह उजागर कर दिया।

गौरलतब है कि मुस्लिम ब्रदरहुड को औपचारिक रूप से आतंकी संगठन घोषित करना अमेरिकी सरकार के लिए हमेशा ही कठिन रहा है। यह संगठन डिसेंट्रलाइज्ड है और अलग-अलग देशों में इसकी शाखाएँ हैं। इसी कारण कानूनी विशेषज्ञों और खुफिया अधिकारियों के लिए पूरे संगठन पर एक साथ आतंकी ठप्पा लगाना चुनौतीपूर्ण रहा है।

इसी वजह से ट्रम्प के हस्ताक्षरित कार्यकारी आदेश में कहा गया है कि जरूरत पड़ने पर केवल विशिष्ट शाखाओं को ही FTO या SDGT घोषित किया जाएगा।

मुस्लिम ब्रदरहुड: सोशियो-पॉलिटिकल मूवमेंट से वैश्विक इस्लामी नेटवर्क तक

1928 में मिस्र के इस्माइलिया में स्थापित मुस्लिम ब्रदरहुड या ‘इखवान अल-मुस्लिमीन’ आज भी दुनिया के सबसे प्रभावशाली इस्लामी राजनीतिक आंदोलनों में से एक है। इसकी स्थापना एक शिक्षक और इस्लामी विद्वान हसन अल-बन्ना ने की थी।

उसने इसे पश्चिमी उपनिवेशवाद के विरोध और उस्मानी साम्राज्य के बाद इस्लामी मूल्यों के खत्म होने की आशंका के आधार पर शुरू किया था। अल-बन्ना ने मुस्लिम ब्रदरहुड को एक पैन-इस्लामिक आंदोलन के रूप में शुरू किया। ये चैरिटी और इस्लामी वकालत पर केंद्रित था।

अपने शुरुआती वर्षों में मुस्लिम ब्रदरहुड ने कमजोर और उदासीन सरकारों की ओर से पैदा की गई खाइयों को भरा। इसने मिस्र में गरीब और अशिक्षित लोगों के लिए स्कूल, अस्पताल और मस्जिदें बनाईं, साथ ही इस्लाम और ‘तौहीद’ (अल्लाह की एकता और सर्वोच्चता) को सेक्यूलेरिज्म (धर्मनिरपेक्षता) और साम्राज्यवाद का इलाज बताया।

मुस्लिम ब्रदरहुड का मकसद में एक बात साफ है कि भले ही इसकी शुरुआत हिंसा से जुड़ी न रही हो, लेकिन ‘जिहाद’ हमेशा इसका रास्ता रहा है।

मुस्लिम ब्रदरहुड का मोटो कहता है- “अल्लाह हमारा मकसद है, पैगंबर हमारे मार्गदर्शक हैं; क़ुरान हमारा कानून है; जिहाद हमारा रास्ता है; अल्लाह की राह में मरना हमारी सबसे बड़ी तवक्को है।”

1930 के दशक तक मुस्लिम ब्रदरहुड (MB) के सदस्य लाखों की संख्या में पहुँच गए और उन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध किया। 1936 में यह इस्लामी संगठन राजनीति में उतरा, धर्मनिरपेक्ष वफ्द पार्टी का विरोध किया और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विरोध-प्रदर्शन किए।

हालाँकि MB की पैरामिलिट्री विंग (अर्धसैनिक शाखा) ‘सीक्रेट अप्परैटस’, जिसे स्पेशल अप्परैटस या अल-निजाम अल-खास भी कहा जाता है, ने हिंसा, राजनीतिक हत्याओं और विध्वंसक गतिविधियों को अंजाम दिया।

1948 में सीक्रेट अप्परैटस के सदस्यों ने प्रधानमंत्री महमूद एल नोकराशी पाशा की हत्या कर दी क्योंकि उन्होंने इस्लामी संगठन पर बैन लगाया था। 1949 में मिस्र की गुप्त पुलिस ने पाशा की हत्या का बदला लेने के लिए अल-बन्ना की हत्या कर दी।

मुस्लिम ब्रदरहुड के सीक्रेट अप्परैटस के सदस्य कठिन शारीरिक और सैन्य प्रशिक्षण लेते थे। उन्हें हथियारों का इस्तेमाल और अंडरग्राउंड ऑपरेशंस को अंजाम देने की ट्रेनिंग दी जाती थी।

धोखे और गोपनीयता (तकिय्या) में खुद को पारंगत करके, इस अप्परैटस से जुड़े जिहादी राजनीतिक दलों, सेनाओं, खुफिया एजेंसियों, मीडिया, शैक्षिक संस्थानों और यहाँ तक कि एनजीओ में भी घुसपैठ और उसे अलग-थलग करते थे।

1966 में फाँसी की सजा पाने वाले सैयद कुत्ब के नेतृत्व में मुस्लिम ब्रदरहुड और अधिक कट्टरपंथी हो गया। अपनी लेखों, खासतौर पर माइलस्टोन्स (मा’आलिम फि अल-तारीक) के जरिए, कुत्ब ने तकफीर (मुसलमानों को धर्मत्यागी/काफिर घोषित करना) जैसी बातों को बढ़ावा दिया और कहा कि नए राष्ट्र-राज्य ‘गैर-इस्लामी’ हैं।

कुत्ब ने यह प्रोपेगेंडा भी फैलाया कि इस्लामी शरीयत कानून को पूरी तरह लागू करने में नेताओं और सरकारों की असफलता के कारण मुस्लिम दुनिया फिर से प्री-इस्लाम ‘अज्ञानता’ (जाहिलियत) की स्थिति में लौट गई है।

कुत्ब के कट्टर या अधिक शुद्ध इस्लामी कहा जाने वाला दृष्टिकोण जिहादियों के बीच व्यापक रूप से गूँजा और कई तकफीरी समूहों को प्रेरित किया। इन समूहों ने तकफीर का इस्तेमाल उन मुसलमानों की हत्या को जायज ठहराने के लिए किया जिन्हें वे धर्मत्यागी या पूरा मुसलमान नहीं मानते थे।

चाहे मिस्र का इस्लामिक जिहाद हो या बाद में अल-कायदा, सभी ने कुत्ब के जाहिलियत, तकफीर और जिहाद के उसूलों से प्रेरणा ली और गैर-मुसलमानों के साथ उन मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को जायज ठहराया जिन्हें वे काफिर मानते थे।

मुस्लिम ब्रदरहुड की महत्वाकांक्षाओं को बढ़ाने में अरब स्प्रिंग काफी कारगर रहा। 2012 में MB ने चुनाव जीते और मोहम्मद मोर्सी को राष्ट्रपति चुना। लेकिन 2013 में तत्कालीन जनरल अब्देल फत्ताह अल-सीसी के नेतृत्व में सैन्य तख्तापलट हुआ और मोर्सी को हटा दिया गया। इस्लामी संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया और इसे आतंकी संगठन घोषित कर दिया गया।

मुस्लिम ब्रदरहुड भले ही यह कहता हो कि उसने हिंसा का रास्ता छोड़कर अपने उद्देश्यों के लिए लोकतांत्रिक तरीका अपना लिया है, लेकिन वरिष्ठ स्तर पर संगठन छोड़ चुके सदस्यों और स्वतंत्र विशेषज्ञों के आकलन से संकेत मिलता है कि उसका गुप्त तंत्र अब भी छिपे हुए नेटवर्क के जरिये काम कर रहा है।

मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के कई सरकारें मुस्लिम ब्रदरहुड को राजनीतिक स्थिरता के लिए खतरा मानती हैं। हाल ही में टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबॉट ने घोषणा की कि मुस्लिम ब्रदरहुड, जिसमें काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस भी शामिल है, को ‘विदेशी आतंकी और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक संगठन’ माना जाएगा।

यूएई, सऊदी अरब, मिस्र, बहरीन और रूस पहले ही ब्रदरहुड को आतंकी संगठन घोषित कर चुके हैं। जॉर्डन ने रॉकेट और ड्रोन का इस्तेमाल कर हमले की साजिश रचने वाले आंदोलन से जुड़े लोगों को गिरफ्तार करने के बाद अप्रैल में इस समूह पर बैन लगा दिया। इसी साल जनवरी में यूएई ने यूनाइटेड किंगडम-आधारित 8 संगठनों को मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध होने के कारण ब्लैकलिस्ट कर दिया।

मुस्लिम ब्रदरहुड की बाहरी अव्यवस्थित संरचना के कारण ये अपना अस्तित्व और संचालन बनाए रखती है, जबकि इस्लामी आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ खड़े देशों के लिए ठोस कार्रवाई करना कठिन हो जाता है। कुल मिलाकर, मुस्लिम ब्रदरहुड ‘सोशल वेलफेयर’, राजनीति और आतंकवाद को अपनी जरूरत के अनुसार जोड़कर चलाते रहने से ही अस्तित्व में है।

मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकी संगठन घोषित करने के लिए ट्रंप की कोशिशें चुनौतियों से भरी हैं। 2013 में मिस्र के MB पर लगाए गए प्रतिबंध भले ही तुरंत राहत देने वाला कदम लगा हो, लेकिन आखिरकार इसने हिंसक और उग्रपंथी समूहों में भारी इजाफा किया। सिनाई प्रायद्वीप में सलाफी-जिहादी समूह उभर कर सामने आए, जिनमें आईएसआईएस से जुड़े गुट भी शामिल थे।

मुस्लिम ब्रदरहुड और अल जजीरा कनेक्शन

दोहा स्थित अल-जजीरा भले ही मुस्लिम ब्रदरहुड की ओर से घोषित शाखा न हो, लेकिन इसे इस्लामी संगठन का चेहरा (मेगाफोन) माना जाता है। 2017 में सऊदी अरब, यूएई और मिस्र का कतर के साथ राजनयिक विवाद हुआ क्योंकि कतर पर मुस्लिम ब्रदरहुड और हमास का समर्थन करने का आरोप था।

सऊदी अरब ने अल-जजीरा और उसके सहयोगी चैनलों को बंद करने की माँग भी की थी, क्योंकि उसका आरोप था कि कतर अल-जजीरा का इस्तेमाल इस्लामी उग्रवाद भड़काने और मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे जिहादी संगठनों को समर्थन देने के लिए करता है। उस समय अल-जजीरा ने निर्वासित मुस्लिम ब्रदरहुड नेता यूसुफ अल-करदावी की बातें ब्रॉडकास्ट की थी।

अरब स्प्रिंग के दौरान अल-जजीरा की पक्षपाती और प्रोपेगेंडा से भरी रिपोर्टिंग को भी भूला नहीं जा सकता। जनवरी 2024 में एक यमनी-ब्रिटिश पत्रकार अदनान अल-अमेरी ने खुलासा किया कि अल-जजीरा कतर सरकार के इशारे पर मुस्लिम ब्रदरहुड का एजेंडा चलाता है।

अल-अमेरी ने इजरायली अखबार द जेरूसलम पोस्ट को बताया कि उसने दोहा में अल-जजीरा के युवा चैनल जीम (Jeem) TV के लिए काम किया। शुरुआत में उन्हें कतर मुखपत्र के इस खतरनाक एजेंडे के बारे में पता नहीं था, लेकिन 2010 के दशक के मध्य में उन्हें इसका एहसास हुआ।

उस समय अल-अमीरी का अपना देश यमन, हूतियों के कब्जे में था और यूएई और सऊदी अरब के नेतृत्व वाले खाड़ी देश मिलकर बमबारी कर रहे थे। यही दोनों देश अन्य खाड़ी देशों से कतर को अलग-थलग करने के पीछे भी थे। जब यमन में गृहयुद्ध छिड़ा, तो देश का दक्षिणी हिस्सा यूएई और सऊदी अरब दोनों के प्रति सहानुभूति रखता था।

यमनी-ब्रिटिश पत्रकार ने बताया कि अल-जजीरा में काम करने के लिए व्यक्ति को मुस्लिम ब्रदरहुड के प्रचार को दोहराना पड़ता है। उन्होंने कहा, “जब आप उनके न्यूज़ चैनल के लिए काम करते हैं, तो उन्हें जरूरत होती है कि आप उनके मुस्लिम ब्रदरहुड एजेंडे को बढ़ावा दें और अगर आप वैचारिक रूप से उनके साथ नहीं हैं, तो वे आपको खरीदने की पूरी कोशिश की जाएगी।” अदनान अल-अमेरी ने यह भी कहा कि अल-जजीरा हमास का समर्थन करता है।

अल-जजीरा का लगातार चलता भारत विरोधी प्रोपेगेंडा

कतर स्थित इस्लामी प्रोपेगेंडा चलाने वाला अल-जजीरा भारत और हिंदुओं के खिलाफ लगातार पक्षपाती बयानबाजी करता रहता है। चाहे 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगे हों, नागरिकता संशोधन अधिनियम या अयोध्या राम मंदिर मुद्दा, अल-जजीरा लगातार मुस्लिम पीड़ित होने के नैरेटिव को गढ़ता रहा है और भारतीय हिंदू बहुमत को दोषी ठहराता रहा है।

अल-जजीरा को मुस्लिम पीड़ितत्व (विक्टिमहुड) की नकली कहानियाँ गढ़ने की आदत है जबकि वह इस्लामी आतंकवाद और उग्रवाद की असल घटनाओं को कम आंककर दिखाता है।

ऑपइंडिया ने पहले ही रिपोर्ट किया था कि अल-जजीरा ने 2002 के गोधरा नरसंहार को कम महत्व दिया, जबकि असल में 31 मुस्लिमों को साबरमती एक्सप्रेस को आग लगाने का दोषी पाया गया था। इस अग्निकांड में 59 हिंदू (ज्यादातर महिलाएँ और बच्चे) मारे गए थे।

2024 में बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी हमलों के दौरान भी अल-जजीरा ने मुस्लिम भीड़ के हिंदुओं की हत्या, बलात्कार, घरों की लूटपाट और मंदिरों की तोड़फोड़ को ‘राजनीतिक बदला’ बताने की कोशिश की।

इस इस्लामी प्रोपेगेंडा संगठन ने भारतीय मीडिया पर भी आरोप लगाया कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों की रिपोर्टिंग करने वाले इस्लामोफोबिक हैं। अल-जजीरा कश्मीर मुद्दे पर भी भारत विरोधी भूमिका निभाता है और कश्मीरी पंडितों के कष्टों को कम आंकता रहा है।

अल-जजीरा भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भी झूठ फैलाता रहा है, खासकर 2002 के गुजरात दंगों को लेकर, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मोदी को पहले ही क्लीन चिट दे दी है।

इस प्रोपेगेंडा आउटलेट ने भारत और हिंदुओं के प्रति नफरत करने वाले व्यक्तियों को भी मंच दिया है। अल-जजीरा का कश्मीर पर विशेष पेज है, जहाँ वे भारत को अत्याचारी के रूप में दिखाते हैं और युद्धग्रस्त फिलीस्तीन की स्थिति के साथ इसे समानांतर दिखाने की कोशिश करते हैं।

हाल के महीनों में, अल-जजीरा ने भारत में ‘आई लव मुहम्मद’ विवाद की रिपोर्ट करते हुए तथ्य छिपाए और मुस्लिमों को उत्पीड़न का शिकार साबित करने की कोशिश की। इस वर्ष अप्रैल में, जब वक्फ संशोधन बिल के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे मुस्लिम भीड़ ने पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में हिंदुओं पर हमले किए तो अल-जजीरा ने इस्लामी अत्याचारों को कमतर बताया और हिंसा को वक्फ कानून के खिलाफ ‘प्रदर्शन’ के रूप में पेश करने का प्रयास किया।

इसके अलावा, मई में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब भारत ने पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान के अंदर इस्लामी आतंकवादी ठिकानों पर हमला किया तब अल-जजीरा ने पाकिस्तान के नैरेटिव को आगे बढ़ाया।

इसने फेक न्यूज भी चलाई कि पाकिस्तान ने भारतीय वायु सेना की पायलट स्क्वाड्रन लीडर शिवानी सिंह को पकड़ लिया। इेसे दोनों पक्षों ने खारिज किया और बाद में शिवानी सिंह की तस्वीर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ सोशल मीडिया पर आई, जिससे कतर के इस्लामी प्रोपेगेंडा वाले मीडिया आउटलेट के झूठ सबके सामने उजागर हो गए।

भारत में मुस्लिम ब्रदरहुड की छाया

हालाँकि मुस्लिम ब्रदरहुड का भारत में प्रत्यक्ष तौर पर कोई अस्तित्व नहीं है, लेकिन इसकी विचारधारा का भारत में इस्लामी संगठनों पर काफी असर पड़ा है। ध्यान देने वाली बात ये है कि मुस्लिम ब्रदरहुड ने 1940 के दशक में मौलाना अबुल आला मौदूदी की जमात-ए-इस्लामी को भी प्रेरण दी थी।

प्रतिबंधित इस्लामी आतंकी संगठन जैसे स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) और पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), जो हिंदुओं पर जिहादी हमलों में शामिल रहे हैं और भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं, मुस्लिम ब्रदरहुड की रणनीतियों का सहारा लेते हैं।

दोनों ने युवाओं को कट्टरपंथी बनाने, धर्मनिरपेक्ष एजेंडे का विरोध करने और बहुसंख्यक समुदाय के साथ मुख्यधारा सरकार को ‘मुसलमानों का उत्पीड़न करने वाले’ के तौर पर पेश करने पर भरोसा किया।

कई कश्मीरी इस्लामी आतंकी संगठन भी मुस्लिम ब्रदरहुड से प्रभावित बताए जाते हैं, जिसने ऐतिहासिक रूप से अलगाववादी आंदोलनों का समर्थन किया है और भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा दिया है। बौद्धिक ढाँचा उपलब्ध कराने के अलावा, मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े समूहों के बारे में यह भी बताया गया है कि वे भारत-विरोधी जिहादी लोगों को आर्थिक और प्रोपेगेंडा को बढ़ाने वाली सहायता देते हैं।

2021 में मुस्लिम ब्रदरहुड ने भारत के खिलाफ़ #BoycottIndianProducts अभियान शुरू किया, जिसका लक्ष्य भारत के आर्थिक हितों को नुकसान पहुँचाना था। यह अभियान सोशल मीडिया पर उस समय शुरू हुआ जब असम में अतिक्रमणकारियों के खिलाफ चलाए गए बेदखली अभियान के दौरान हिंसा हुई थी, क्योंकि कुछ अतिक्रमणकारियों ने पुलिस पर हमला कर दिया था।

इस घटना के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए, पाकिस्तान और तुर्की, मिस्र और इराक जैसे मध्य पूर्वी देशों के लोगों ने भारत में बने उत्पादों का बहिष्कार करने का अभियान शुरू किया।

जाहिर तौर पर मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े कई मीडिया संस्थानों ने इस भारत-विरोधी अभियान को बढ़ावा देने वाले ‘समाचार लेख’ भी प्रकाशित किए। इनमें अल-जजीरा भी शामिल है।

2023 में मुस्लिम ब्रदरहुड ने इस्लामी पैगंबर मोहम्मद के सम्मान की रक्षा के बहाने भारत की छवि खराब करने की साजिश रची। उस समय डिजिटल फॉरेंसिक्स, रिसर्च एंड एनालिटिक्स सेंटर (DFRAC) ने रिपोर्ट किया कि मुस्लिम ब्रदरहुड खाड़ी देशों में काम करने वाले हिंदुओं के खिलाफ भी बदनाम करने वाला अभियान चलाता है।

इस्लामी आतंकवाद से निपटने में डोनाल्ड ट्रम्प का दोहरा रवैया साफ दिखाई देता है। वह सीरिया के नामित आतंकी-से-राजनीतिज्ञ बने शारा और पाकिस्तान की इस्लामी आतंकवाद को समर्थन देने वाली फौज द्वारा चलने वाली व्यवस्था को समर्थन देते हैं, जबकि मुस्लिम ब्रदरहुड के खिलाफ कार्रवाई करते हैं।

हालाँकि, मुस्लिम ब्रदरहुड पर समीक्षा के बाद ट्रम्प की कार्रवाई भारत को इस्लामी आतंकवाद और उसे समर्थन देने वाले विदेशी नेटवर्क के खिलाफ लड़ाई में मदद कर सकती है।

ये रिपोर्ट मूल रूप से श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। अंग्रेजी में इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ

संविधान की शक्ति ने मुझ जैसे गरीब परिवार से निकले व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाया: संविधान दिवस पर PM मोदी का खुला खत, कहा- राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का निर्वाह करना होगा

प्रिय…..

26 नवंबर हर भारतीय के लिए बहुत गौरवशाली दिन है। इसी दिन 1949 में संविधान सभा ने भारत के संविधान को अंगीकार किया था। इसलिए एक दशक पहले, साल 2015 में NDA सरकार ने 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया था।

हमारा संविधान एक ऐसा पवित्र दस्तावेज है, जो निरंतर देश के विकास का सच्चा मार्गदर्शक बना हुआ है। ये भारत के संविधान की ही शक्ति है जिसने मुझ जैसे गरीब परिवार से निकले साधारण व्यक्ति को प्रधानमंत्री के पद पर पहुँचाया है। संविधान की वजह से मुझे 24 वर्षों से निरंतर सरकार के मुखिया के तौर पर काम करने का अवसर मिला है। मुझे याद है, साल 2014 में जब मैं पहली बार संसद भवन में प्रवेश कर रहा था, तो सीढ़ियों पर सिर झुकाकर मैंने लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर को नमन किया। साल 2019 में जब चुनाव परिणाम के बाद मैं संसद के सेंट्रल हॉल में गया था, तो सहज ही मैंने संविधान को सिर माथे लगा लिया था।

संविधान दिवस पर हम डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद समेत उन सभी महान विभूतियों का स्मरण करते हैं, जिन्होंने भारत के संविधान के निर्माण में अपना अहम योगदान दिया है। डॉक्टर बाबासाहेब अम्बेडकर की भूमिका को भी हम सभी याद करते हैं, जिन्होंने असाधारण दूरदृष्टि के साथ इस प्रक्रिया का निरंतर मार्गदर्शन किया। संविधान सभा में कई प्रतिष्ठित महिला सदस्य भी थीं, जिन्होंने अपने प्रखर विचारों और दृष्टिकोण से हमारे संविधान को समृद्ध बनाया।

साल 2010 में जब संविधान के 60 वर्ष हुए थे, तब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था। हमने संविधान के प्रति कृतज्ञता और निष्ठा प्रकट करने के लिए एक प्रयास किया। 2010 के उस साल में गुजरात में ‘संविधान गौरव यात्रा’ निकाली गई थी। इस पवित्र ग्रंथ की प्रतिकृति को एक हाथी के ऊपर रखकर मैंने उस भव्य यात्रा की अगुवाई की थी।

जब संविधान के 75 वर्ष पूरे हुए, तो ये हमारी सरकार के लिए ऐतिहासिक अवसर बनकर आया। हमें देशभर में विशेष अभियान चलाने का सौभाग्य मिला। संविधान के 75 वर्ष होने पर हमारी सरकार ने संसद का विशेष सत्र आयोजित किया और राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान भी चलाया। ये अभियान जन-भागीदारी का बड़ा उत्सव बन गया।

इस वर्ष का संविधान दिवस कई कारणों से विशेष है:

यह वर्ष सरदार पटेल जी और भगवान बिरसा मुंडा जी की 150वीं जयंती का है। सरदार पटेल जी के नेतृत्व और सूझबूझ ने देश का राजनीतिक एकीकरण सुनिश्चित किया। ये सरदार पटेल जी की ही प्रेरणा है जिसने हमारी सरकार को जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 की दीवार गिराने के लिए प्रेरित किया। आर्टिकल 370 हटने के बाद वहां भारत का संविधान पूरी तरह लागू हो गया है और लोगों को संविधान प्रदत्त सभी अधिकार मिले हैं।

भगवान बिरसा मुंडा जी का जीवन आज भी हमें जनजातीय समुदाय के लिए न्याय, गरिमा और सशक्तिकरण सुनिश्चित करने की प्रेरणा देता है।

इस साल हम वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने का उत्सव भी मना रहे हैं। वंदे मातरम हर दौर में प्रासंगिक रहा है। इसके शब्दों में हम भारतीयों के सामूहिक संकल्प की गूंज निरंतर सुनाई देती रही है। इस वर्ष हम श्री गुरु तेग बहादुर जी की शहादत के 350वें वर्ष को भी मना रहे हैं। उनका जीवन और शहादत की गाथा आज भी हमें प्रेरित करती है।

इन सभी का जीवन हमें उस कर्तव्य को सर्वोपरि रखने की प्रेरणा देता है, जिसे हमारे संविधान ने भी सबसे अहम बताया है। हमारे संविधान का आर्टिकल 51A मौलिक कर्तव्यों को समर्पित है। ये कर्तव्य हमें सामाजिक और आर्थिक प्रगति प्राप्त करने का रास्ता दिखाते हैं। महात्मा गाँधी ने हमेशा नागरिकों के कर्तव्यों पर बल दिया था। वे मानते थे कि जब हम ईमानदारी से कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं, तो हमें अधिकार भी स्वत: मिल जाते हैं।

देखते ही देखते इस सदी के 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं। अब आने वाला समय हमारे लिए और भी महत्वपूर्ण है। साल 2047 तक आजादी के 100 वर्ष हो जाएँगे। साल 2049 में संविधान निर्माण के 100 वर्ष पूरे हो जाएँगे। हम आज जो नीतियाँ बनाएँगे, जो निर्णय लेंगे, उसका प्रभाव आने वाले वर्षों पर…आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा। हमारे सामने विकसित भारत का लक्ष्य है इसलिए हमें राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को सर्वोपरि रखते हुए ही आगे बढ़ना है।

हमें राष्ट्र के प्रति, समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना होगा। देश ने हमें कितना कुछ दिया है। इसके लिए हम सबके मन में कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। जब हम इस भावना से जीवन जीते हैं, तो कर्तव्य अपने आप जीवन का स्वभाव बन जाता है। अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए हमें अपने हर काम को पूरी क्षमता और पूरी निष्ठा से करने का प्रयास करना होगा। हमारा हर कार्य संविधान की शक्ति बढ़ाने वाला हो। हमारा हर कार्य देशहित से जुड़े उद्देश्यों को पूरा करने वाला हो। हमारे संविधान निर्माताओं ने जो सपने देखे थे, उन्हें पूरा करने का दायित्व हम सबका है। जब हम अपने काम को कर्तव्य की भावना के साथ करेंगे तो देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति कई गुना बढ़ जाएगी।

संविधान ने हमें मतदान का अधिकार दिया है। एक नागरिक के तौर पर हमारा कर्तव्य है कि मतदान का कोई अवसर छोड़े नहीं। हमें 26 नवंबर को स्कूलों में, कॉलेजों में उन युवाओं के लिए विशेष सम्मान समारोह आयोजित करने चाहिए, जो 18 वर्ष के हो रहे हैं। हमें उन्हें यह महसूस कराना चाहिए कि वे अब केवल छात्र या छात्रा नहीं, बल्कि नीति निर्माण की प्रक्रिया के सक्रिय सहभागी हैं। स्कूलों में हर वर्ष 26 नवंबर को फर्स्ट-टाइम वोटर्स का सम्मान करने की परंपरा विकसित होनी चाहिए। जब हम इस तरह युवाओं में जिम्मेदारी और गर्व का भाव जगाएंगे, तो वे जीवनभर लोकतंत्र के मूल्यों के प्रति समर्पित रहेंगे। यही समर्पण एक सशक्त राष्ट्र की नींव बनता है।

आइए, इस संविधान दिवस पर हम अपने महान राष्ट्र के कर्तव्यनिष्ठ नागरिक के रूप में अपने दायित्वों का पालन करने का संकल्प दोहराएँ। ऐसा करके ही हम विकसित और सशक्त राष्ट्र के निर्माण में अपना अहम योगदान दे सकेंगे।

आपका,
नरेन्द्र मोदी

फाइटर जेट के इंजन से Hammer मिसाइल तक, भारत में बनेंगे हाईटेक हथियार: Katana सिस्टम से मजबूत होगी सेना, जानिए कैसे रक्षा क्षेत्र में गेमचेंजर साबित हो रहा ‘मेक इन इंडिया’

ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल किया गया घातक हथियार Hammer का उत्पादन अब भारत में होगा। मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के तहत ये रक्षा उपक्रम के क्षेत्र में बड़ा कदम माना जा रहा है। इसके अलावा Katana weapon भारतीय सेना को मिलने वाला है। इसके लिए भारत की एक रक्षा कंपनी ने फ्रांस-जर्मनी की रक्षा कंपनी KNDS के साथ समझौता किया है। ये दोनों हथियार अचूक निशाना लगाने के लिए मशहूर हैं।

भारत ने कई ऐसे समझौते किए हैं जिसका मकसद तकनीक हासिल करना और भारत में हथियारों का निर्माण है। राफेल के पार्ट्स ‘फ्यूजलाज’ के उत्पादन के लिए हैदराबाद में संयंत्र लग रहे हैं। इसके लिए डसॉल्ट एविएशन और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड के बीच समझौता हुआ है।

फ्रांस की कंपनी सेफ्रान और डीआरडीओ के बीच 120 KN शक्ति वाला स्वदेशी जेट इंजन विकसित करने पर समझौता हुआ है, जिसकी तकनीकि भारत को ट्रांसफर की जाएगी। यानी निकट भविष्य में भारत में ऐसे इंजन का उत्पादन भी शुरू हो जाएगा, जो पाँचवी पीढ़ी के फाइटर जेट में इस्तेमाल होगा।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ में दिखा Hammer का जलवा

पहले बात करते हैं Hammer की। भारत और फ्रांस के बीच राफेल के सबसे खुँखार हथियार Hammer को लेकर डील पक्की हो गई है।
भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड यानी BEL और फ्रांस की साफ्रान इलेक्ट्रॉनिक्स एंड डिफेंस ने मिलकर Hammer को भारत में ही बनाने का फैसला किया है।

एयरो इंडिया 2025 के दौरान फरवरी में दोनों कंपनियों ने एमओयू साइन किया था। लेकिन अब दोनों ने मिलकर ज्वाइंट वेंचर कंपनी यानी जेवीसी बनाने पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। ये कंपनी प्राइवेट लिमिटेड होगी जिसमें दोनों का शेयर 50-50 फीसदी होगा। नई कंपनी हैमर के निर्माण, आपूर्ति और दीर्घकालिक रखरखाव की जिम्मेदारी संभालेगी।

BEL के सीएमजी मनोज जैन और साफ्रान के एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट अलेक्जेंडर जिग्लर ने समझौते पर साइन किए। इस दौरान रक्षा उत्पादन सचिव संजीव कुमार और सफरान के सीईओ ओलिवियर एंड्रीज मौजूद थे।

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में ये एक अहम कदम है।

अचूक निशाने के साथ जरूरत के मुताबिक बदल लेता है टारगेट

HAMMER यानी Highly Agile Modular Munition Extended Range का इस्तेमाल ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में भारतीय सेना ने किया। इसके सटीक टारगेट से पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया गया। इसकी बनावट ऐसी है कि इसे हल्के फाइटर प्लेन तेजस से लेकर राफेल तक में आसानी से फिट किया जा सकता है। ये बेहद सटीक और लंबी दूरी का एयर टू ग्राउंड हथियार है।

खराब मौसम, धुंध हो या देर रात का अंधेरा, हैमर की गाइडेंस तकनीक उसे टारगेट पर निशाना लगाने में मदद करती है। राफेल के साथ इसे ज्यादातर फिट किया गया है। फ्रांस का ये सबसे आधुनिक एयर टू ग्राउंड स्मार्ट बम है। ये दुश्मन के बंकर, कमांड सेंटर, रडार और पुलों को 70 किलोमीटर दूर से भी उड़ा सकता है। ये उड़ते हुए भी अपना रास्ता बदल सकता है और जैमिंग की परवाह नहीं करता।

HAMMER (फोटो साभार- NDTV)

इसकी खासियत यह भी है कि कम ऊँचाई से छोड़े जाने पर भी ये उतने ही घातक तरीके से टारगेट पर हिट करता है। भारत में इसका उत्पादन होने पर सेना को जल्दी जल्दी ये हथियार मिल पाएगी और लागत भी कम आएगा।

HAMMER के 60 फीसदी स्वदेशीकरण का टारगेट

शुरुआत में कुछ पार्ट्स फ्रांस से आएँगे। धीरे-धीरे हैमर के 60 फीसदी पार्ट्स का उत्पादन भारत में ही होगा। इनमें इलैक्ट्रॉनिक्स, मैकेनिकल और सब एसेम्बली से जुड़े पार्ट्स शामिल हैं। इसकी क्वालिटी, एसेम्बली और टेस्टिंग BEL करेगी। इसका फायदा ये होगा कि सेना को सप्लाई करना आसान होगा। खर्च कम लगेंगे। भारत में पार्ट्स के बनने पर नई नौकरियाँ निकलेंगी। भारत का पैसा विदेश नहीं जाएगा। तेजस को भी हैमर का साथ आसानी से मिल जाएगा।

भविष्य में कटाना हथियार भी भारतीय बेड़े में शामिल होगा। भारत की रक्षा और एयरोस्पेस कंपनी ने सेना को आधुनिकतम हथियार उपलब्ध कराने के मकसद से फ्राँस-जर्मन रक्षा समूह के साथ 20 नवंबर 2025 को समझौता किया। समझौते के मुताबिक, दोनों कंपनियाँ भारतीय सेना को कटाना हथियार की आपूर्ति करेगी।

कटाना प्रिसिजन-गाइडेड हथियार मिलेगा सेना को

कटाना एक 155 मिमी का प्रिसिजन-गाइडेड हथियार है, जिसे फ्रांस‑जर्मनी की रक्षा कंपनी KNDS ने विकसित किया है। भविष्य में भारतीय सेना को एडवांस और सटीक तोपखाना गोला‑बारूद उपलब्ध कराने के लिए केएनडीएस के साथ भारत की रक्षा कंपनी SMPP ने समझौता किया है। कटाना की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सटीकता है, यानी यह दूर बैठे दुश्मन के ठिकानों पर सटीक वार कर सकता है। इसमें लगा नेविगेशन सिस्टम इसे राह दिखाता है।

कंपनी आधुनिक तोपखाना सिस्टम का भी निर्माण करेगी। बताया गया है कि एसएमपीपी और उसकी सहयोगी कंपनियाँ मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के लिए कटाना हथियार भारतीय सेना को उपलब्ध कराएँगे। साथ ही देश में आधुनिक तोपखाना, गोला-बारूद बनाएँगे।

कटाना बैलिस्टिक रेंज, एक्सटेंडेड रेंज और हाई प्रिसिजन जैसे अलग‑अलग मॉडल में उपलब्ध है। इसका तोपखाना और गोला-बारूद भारतीय सेना की मौजूदा 155 मिमी तोपों के साथ आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे सेना की आक्रामक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। ये समझौता ऐसे वक्त हुआ है, जब सेना को आधुनिक तोपखाना और गोला- बारूद की सख्त जरूरत है।

‘राफेल सपोर्ट हब’ बन सकता है भारत

यूरेशियन टाइम्स में भारत के पूर्व एयर मार्शल अनिल चोपड़ा का एक लेख छपा है। इसमें भारत के राफेल फाइटर जेट के ग्लोबल हब बनने की संभावनाओं पर चर्चा की गई है। अनिल चोपड़ा के मुताबिक, भारतीय सेना ने 114 ‘मेक इन इंडिया’ राफेल खरीदने का प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय को भेजा है। भारत अगर 114 राफेल खरीदता है तो वो एफ4 वैरिएंट होंगे। भारत के पास फिलहाल राफेल F3R वैरिएंट है, जिसे और अपग्रेड किया गया है।

इसमें करीब 2 लाख करोड़ रुपए यानी 22 अरब डॉलर का खर्च होगा। अगर ये ऑर्डर दे दिया जाता है तो देश के इतिहास में ये सबसे बड़ा डिफेंस डील होगा। वायुसेना के पास फिलहाल 36 राफेल हैं और 26 मरीन राफेल का ऑर्डर नौसेना के लिए कर दिया गया है। ये मरीन परमाणु हथियारों को ढोने में सक्षम होंगे।

एयर मार्शल अनिल चोपड़ा के मुताबिक, राफेल विमानों के फ्यूजलाज का भारत में निर्माण शुरू होने वाला है। इसके लिए डसॉल्ट एविएशन और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड यानी टीएएसएल के बीच जून 2025 में समझौता हुआ। हैदराबाद में फ्यूजलाज बनाने के लिए संयंत्र लगाया जा रहा है। ये पहला मौका है जब राफेल से जुड़ा कोई पार्ट्स फ्रांस के बाहर बन रहा है।

राफेल का फ्यूजलाज (फोटो साभार-Thibaud MORITZ / AFP)

बताया जा रहा है कि साल 2028 तक हर महीने 2 फ्यूजलाज बनने यहाँ शुरू हो जाएँगे। इससे ‘मेक इन इंडिया’ को नई ताकत मिलेगी। डसॉल्ट पहले ही टाटा के साथ मिलकर हर साल 25 फ्यूजलाज बनाने पर सहमत हो चुका है। इसके अलावा भारत में एक एमआरओ प्लांट, एम-88 इंजनों के ओवरहॉल की सुविधा भी विकसित की जा चुकी है।

दुनियाभर में राफेल की बढ़ती माँगों को देखते हुए माना जा रहा है कि निकट भविष्य में भारत एशिया में ‘राफेल सपोर्ट हब’ बन जाएगा

फ्रांस के साथ मिलकर एडवांस इंजन बनाने की तैयारी

अनिल चोपड़ा के मुताबिक, फ्रांस की कंपनी सेफ्रान और डीआरडीओ ने संयुक्त इंजन कार्यक्रम शुरू करने पर सहमति जताई है। इसके तहत 120 KN शक्ति वाला स्वदेशी जेट इंजन विकसित किया जाएगा। भारत इसका इस्तेमाल पाँचवी पीढ़ी के फाइटर प्लेन AMCA के लिए करेगा।

सफ्रान ने 100 फीसदी तकनीक ट्रांसफर को मंजूरी दे दी है। इसमें अहम क्रिस्टल ब्लेड तकनीक भी शामिल है। धीरे धीरे इंजन की क्षमता 140KM तक किया जाएगा। दुनियाभर में अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस के पास ऐसे इंजन वाले फाइटर जेट हैं। चीन भी अब तक पाँचवी पीढ़ी का फाइटर जेट नहीं बना पाया है। उसे भी 5-7 साल अभी और लग सकते हैं।

‘ब्राह्मण की बेटी से शादी या संबंध बनने तक आरक्षण’: IAS संतोष वर्मा का नफरती बयान Viral, जानें- फर्जीवाड़े में जेल जा चुका ये जातिवादी विक्षिप्त आखिर है कौन?

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के अंबेडकर मैदान में रविवार (23 नवंबर 2025) को एक ऐसा आयोजन हुआ, जो सामाजिक सद्भाव की बजाय नफरत की आग भड़काने वाला साबित हो गया। अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारी-कर्मचारी संघ (अजाक्स) के नवनिर्वाचित प्रांताध्यक्ष और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा ने आरक्षण के मुद्दे पर एक ऐसा बयान दिया, जिसने पूरे समाज को झकझोर दिया। संतोष वर्मा ने कहा, “जब तक कोई ब्राह्मण अपनी बेटी को मेरे बेटे को दान नहीं कर दे या उसके साथ संबंध नहीं बना ले, तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए।”

यह बयान न केवल आपत्तिजनक है, बल्कि यह समाज के मूल्यों को खोखला करने की एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा लगता है। एक तरफ जहाँ आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बहस होनी चाहिए, वहीं इस तरह की टिप्पणियाँ जातिगत खाई को और गहरा करने का काम करती हैं।

क्या यह महज एक अधिकारी की व्यक्तिगत कुंठा है या फिर समाज को कमजोर करने की बड़ी चाल का हिस्सा? इस रिपोर्ट में हम पूरी घटना की गहराई से पड़ताल करेंगे और यह समझने की कोशिश करेंगे कि ऐसे बयान कैसे हमारे समाज को अंदर से खा रहे हैं।

संतोष वर्मा ने कहाँ दिया विवादित बयान?

अजाक्स का प्रांतीय अधिवेशन तुलसीनगर के सेकंड स्टॉप स्थित अंबेडकर मैदान में आयोजित हुआ था। यह संगठन एससी-एसटी वर्ग के सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के हितों की रक्षा के लिए काम करता है। इस संगठन के प्रदेश अध्यक्ष बने संतोष वर्मा मंच से आर्थिक आधार पर आरक्षण की बहस छेड़ी। लेकिन उनकी बातें जल्द ही विवादास्पद हो गईं।

वायरल वीडियो में वे स्पष्ट कहते दिख रहे हैं कि आरक्षण का अंत तभी होना चाहिए, जब सवर्ण समाज (खासकर ब्राह्मण) अपने बच्चों के रिश्तों में एससी वर्ग को शामिल करना शुरू कर दे। संतोष वर्मा ने कहा, “आरक्षण तब तक जारी रहना चाहिए जब तक मेरे बेटे को कोई ब्राह्मण अपनी बेटी दान में नहीं देता या उससे संबंध नहीं बनता।”

संतोष ने बेटी को ‘दान’ देने जैसी पुरानी प्रथा का जिक्र किया, जो आज के आधुनिक समाज में पूरी तरह अप्रासंगिक और अपमानजनक है। यह बयान न केवल महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुँचाता है, बल्कि यह संदेश देता है कि आरक्षण को जातिगत बदले की भावना से जोड़ा जाए। क्या डॉ. बी.आर. आंबेडकर के संघर्ष के प्रतीक आरक्षण को इस तरह की निजी और संकीर्ण सोच से जोड़ना उचित है? यह सवाल हर संवेदनशील नागरिक के मन में उठ रहा है।

संतोष वर्मा के ब्राह्मण विरोधी बयान पर तीखी प्रतिक्रिया

बयान के तुरंत बाद तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आई। अखिल भारतीय ब्राह्मण समाज के प्रदेश अध्यक्ष पुष्पेंद्र मिश्रा ने इसे ‘घोर निंदनीय’ बताते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से तत्काल कार्रवाई की माँग की। उन्होंने कहा कि संतोष वर्मा को न केवल पद से हटाया जाए, बल्कि उनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हो। मिश्रा ने चेतावनी दी कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो ब्राह्मण समाज पूरे प्रदेश में आंदोलन करेगा।

ब्राह्मण सभा मध्य प्रदेश के अध्यक्ष डॉ. शैलेंद्र व्यास ने इसे ‘तुच्छ सोच’ करार दिया। उन्होंने कहा, “ऐसी मानसिकता वाले लोगों पर सरकार को तुरंत एक्शन लेना चाहिए। वरना परशुराम जी के वंशज ब्राह्मण समाज के लोग दंड देने से नहीं चूकेंगे।” यह बयान समाज में तनाव पैदा करने वाला था, लेकिन व्यास का जवाब भी उसी तेवर का था, जो दिखाता है कि कैसे एक गलत टिप्पणी पूरे समुदाय को भड़का सकती है।

कर्मचारी संगठनों ने भी संतोष वर्मा की कड़ी निंदा की। मंत्रालय सेवा अधिकारी-कर्मचारी संघ के अध्यक्ष इंजीनियर सुधीर नायक ने कहा कि यह बयान न केवल आपत्तिजनक है, बल्कि पूरे सवर्ण समुदाय का अपमान है। उन्होंने जोर देकर कहा, “शादी-विवाह निजी जिंदगी का मामला है। हर वयस्क व्यक्ति अपनी पसंद से जीवनसाथी चुन सकता है। बेटी कोई वस्तु नहीं है जो दान की जाए।”

नायक ने उदाहरण देते हुए बताया कि समाज बदल चुका है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सविता अंबेडकर (ब्राह्मण परिवार से) से विवाह किया था, जबकि रामविलास पासवान ने रीना शर्मा से शादी की। तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ के महामंत्री उमाशंकर तिवारी ने कहा, “कर्मचारी संगठन के मंच पर ऐसी बयानबाजी से बचना चाहिए। सभी जाति-धर्म के लोग मिलकर काम करते हैं। ऐसे बयान मतभेद बढ़ाते हैं।”

इन प्रतिक्रियाओं से साफ है कि संतोष वर्मा का बयान न केवल व्यक्तिगत स्तर पर गलत था, बल्कि यह कार्यस्थलों पर सद्भाव को भी खतरे में डाल रहा है। जहाँ एक तरफ अधिकारी और कर्मचारी एक ही छत के नीचे काम करते हैं, वहाँ जातिगत टिप्पणियां विश्वास की दीवारें तोड़ सकती हैं।

बेहद विवादित रहा है संतोष वर्मा का अतीत, जा चुके हैं जेल

संतोष वर्मा का अतीत इस घटनाक्रम को और गंभीर बनाता है। साल 2021 में वे फर्जीवाड़े के आरोप में जेल जा चुके हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इंदौर में उन्हें गिरफ्तार किया गया था। मामला एक महिला के खिलाफ ‘क्रिमिनल इंटिमिडेशन’ (धमकी) का था, जिसमें वर्मा पर जानबूझकर चोट पहुँचाने, अश्लील सामग्री फैलाने जैसे आरोप थे। लेकिन विवाद तब बढ़ा जब उन्होंने प्रमोशन के लिए मध्य प्रदेश कोर्ट के फर्जी आदेश पेश किए।

संतोष वर्मा ने राज्य कैडर से आईएएस कैडर में प्रमोट होने के लिए दो नकली कोर्ट ऑर्डर बनवाए- एक सेटलमेंट ऑर्डर और दूसरा एक्विटल ऑर्डर। ये दस्तावेज 6 अक्टूबर 2020 के थे, लेकिन उस दिन जज छुट्टी पर थे। विभाग ने जाँच की तो फर्जीवाड़ा पकड़ा गया। जिला अभियोजन कार्यालय ने पुष्टि की कि केवल एक ही ऑर्डर था, जबकि वर्मा ने दो पेश किए।

महिला ने चीफ सेक्रेटरी को शिकायत की, जिससे केस खुला। पुलिस ने 12 घंटे की पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ्तार किया। जज दिलीप परमार ने उन्हें पुलिस कस्टडी में भेज दिया। वर्मा ने आरोप लगाया कि महिला ने ही फर्जी दस्तावेज दिए, लेकिन जाँच में यह झूठ साबित हुआ।

यही नहीं, संतोष वर्मा का चरित्र भी रसिया किस्म का रहा है, उसके कई महिलाओं से संबंध रहे हैं और इस बारे में कई केस भी हो चुके हैं। कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि ये जहाँ भी तैनात रहा, शादीशुदा होते हुए भी दूसरी महिलाओं से संबंध बनाता रहा। इसकी कई शादियों के चर्चे आम हैं।

जब नेता ही ऐसा हो, तो समाज कैसे संगठित होगा?

यह घटना संतोष वर्मा के चरित्र पर सवाल उठाती है। समाज के कमजोर वर्ग का प्रतिनिधित्व करने का दावा एक आईएएस अधिकारी खुद फर्जीवाड़े से अपनी कुर्सी हासिल करने की कोशिश करता है। महिला के शीलभंग का मामला भी उनके ऊपर था, जो दिखाता है कि उनकी मानसिकता में महिलाओं के प्रति सम्मान की कमी रही है। अब जब वे अजाक्स जैसे संगठन के अध्यक्ष हैं, तो उनका यह बयान और भी खतरनाक लगता है।

अगर नेता ही फर्जी और घटिया सोच वाला हो, तो उसके पीछे खड़े होने वाले लोग क्या सीखेंगे? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अजाक्स एससी-एसटी कर्मचारियों की आवाज है। लेकिन वर्मा जैसे व्यक्ति के नेतृत्व में यह संगठन विभाजनकारी बन सकता है।

समाज को खोखला करने की साजिश

संतोष वर्मा का बयान समाज को खोखला करने की साजिश क्यों लगता है? देखिए, भारत एक विविधतापूर्ण देश है, जहाँ जाति, धर्म और वर्ग की जटिलताएँ हैं। स्वतंत्रता के बाद डॉ. आंबेडकर ने संविधान में आरक्षण दिया ताकि सदियों की असमानता दूर हो। लेकिन इसका उद्देश्य था एकता… न कि विभाजन। संतोष वर्मा का बयान आरक्षण को बदले की भावना से जोड़ता है- जैसे सवर्णों को दंडित किया जाए।

यह सोच समाज को तोड़ने वाली है। कल्पना कीजिए, एक सरकारी कार्यालय में जहाँ ब्राह्मण, दलित, ओबीसी सब मिलकर काम करते हैं, वहाँ अगर अध्यक्ष ऐसा बोल दे, तो अधीनस्थों में डर और नफरत फैलेगी। सवर्ण अधिकारी अपने दलित सहकर्मियों को शक की नजर से देखेंगे और दलित वर्ग को लगेगा कि उनका संघर्ष अब निजी रिश्तों पर टिका है। यह खाई गहरी होगी और समाज का मूल – परिवार, विवाह, विश्वास खोखला हो जाएगा।

यह साजिश इसलिए लगती है क्योंकि ऐसे बयान अक्सर सुनियोजित होते हैं। राजनीतिक पार्टियाँ या संगठन वोट बैंक के लिए जातिवाद भड़काते हैं। अजाक्स का यह अधिवेशन चुनावी माहौल में हुआ, जहाँ आरक्षण पर बहस चल रही है। वर्मा का बयान आरक्षण के पक्ष में तर्कों की कमी को छिपाने का प्रयास लगता है। लेकिन असली खतरा यह है कि यह साजिश समाज के हर स्तर को प्रभावित करेगी। स्कूलों में बच्चे जाति के नाम पर लड़ेंगे, कार्यालयों में भेदभाव बढ़ेगा और अंततः राष्ट्र की एकता कमजोर होगी।

संतोष वर्मा के अतीत को जोड़कर देखें, तो साजिश का चेहरा साफ होता है। फर्जी प्रमोशन के लिए कोर्ट को ठगना, महिला को धमकाना और अब सवर्ण बेटियों पर टिप्पणी… यह एक पैटर्न है। एक व्यक्ति जो कानून तोड़ता है, वह समाज को बाँटकर अपनी पहचान बनाता है। अजाक्स के पिछले अध्यक्षों ने कभी ऐसी बातें नहीं कीं, जो दिखाता है कि वर्मा की सोच व्यक्तिगत है, लेकिन इसका असर सामूहिक है।

वामपंथी संगठन ‘The Himkhand’ का उतरा मुखौटा, ‘प्रदूषण’ के बहाने नक्सलियों को बढ़ावा और हिंसा भड़काने की कोशिश: अर्बन नक्सल ‘क्रांति’ की भूमिका पर बड़ा खुलासा

अर्बन नक्सल्स ने बीते रविवार (23 नवंबर 2025) को ‘प्रदूषण विरोध’ के नाम पर इंडिया गेट को घेर लिया। ‘प्रदूषण’ की बात करते हुए इन कथित प्रदर्शनकारियों ने मारे गए नक्सली कमांडर माड़वी हिड़मा के समर्थन में नारे लगाए और पुलिस पर मिर्च स्प्रे से हमला भी किया।

इस सोची-समझी प्रदर्शन की कमान दो कट्टर वामपंथी संगठनों के हाथ में थी। इसका मकसद ‘प्रदूषण’ के नाम पर लाल आतंक की विचारधारा का प्रचार करना और लोगों का समर्थन हासिल करना था। इन संगठनों में भगत सिंह छात्र एकता मंच (bsCEM) और ‘द हिमखंड’ शामिल थे।

भारत में अर्बन नक्सल अब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण आंदोलन को हथियार बनाकर वामपंथी चरमपंथ को बढ़ावा दे रहे हैं और देश की संप्रभुता और अखंडता को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।

‘द हिमखंड’ इंस्टाग्राम पर दो अकाउंट चलाता है- एक ‘thehimkhand‘ नाम से और दूसरा ‘the.himkhand‘ के नाम से। इनके पोस्ट देखने से पता चलता है कि यह वामपंथी समूह मई 2024 से सक्रिय है।

शुरुआत में यह ग्रुप खुद को ‘क्लाइमेट चेंज’ और ‘पर्यावरणीय असंतुलन’ के खिलाफ लड़ने वाला संगठन बताता था लेकिन जल्द ही इसने क्षेत्रीय राजनीति और सरकार-विरोधी नैरेटिव को भी अपने एजेंडे में शामिल कर लिया।

लद्दाख प्रशासन द्वारा सोनम वांगचुक की संस्था Himalayan Institute of Alternative Learning (HIAL) का जमीन आवंटन उसमें भारी गड़बड़ियों के चलते रद्द कर दिया गया था। इसके कुछ दिनों बाद, वांगचुक ने लद्दाख को ‘राज्य का दर्जा’ दिए जाने का मुद्दा उठाकर अराजकता और तनाव पैदा करने की कोशिश की और लोगों को भड़काया।

इसी दौरान यानी इस साल अक्टूबर में ‘द हिमखंड’ भी ‘लद्दाख आंदोलन’ का समर्थन कर रहा था। इतना ही नहीं, यह समूह हिंसा को सही ठहराने की कोशिश भी कर रहा था।

5 अक्टूबर को डाले गए एक पोस्ट में लिखा था, “प्रदर्शनकारियों द्वारा बीजेपी ऑफिस में आग लगाना, पार्टी के हिमालय-विरोधी विकास मॉडल को खारिज करना है। लद्दाख के लोगों ने अपना फैसला सुना दिया है।”

The Himkhand की इंस्टा पोस्ट का स्क्रीनग्रैब

एक दूसरे पोस्ट में, इस वामपंथी समूह ने हिंसा को सही ठहराने की कोशिश की और इसे सिर्फ ऐसी धारणा बताया, जिन्हें कथित तौर पर ‘शासक वर्ग लोगों की कार्रवाई पर रोक लगाने के लिए बनाता है।’

‘The Himkhand’ ने 2020 में दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों को उकसाने वाले प्रशांत भूषण को ‘वायू प्रदूषण’ के खिलाफ अपने एक इवेंट में स्पीकर बताया था।

ऑपइंडिया ने पता लगाया कि इस कट्टर वामपंथी ग्रुप को आगे बढ़ाने वालों में से एक एक्टिविस्ट का नाम ‘क्रांति’ है।

उसे भगत सिंह छात्र एकता मंच (bsCEM) के ‘कार्यकर्ता’ रवजोत के साथ देखा गया था, जिसने ‘कॉमरेड हिड़मा अमर रहे’ जैसा भड़काऊ नारा लगाया था।

यह साफ दिखाई देता है कि bsCEM और ‘The Himkhand’ मिलकर हिंसा भड़काने और जलवायु आंदोलन की आड़ में लाल आतंक को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं।

The Himkhand की इंस्टा पोस्ट का स्क्रीनग्रैब

यहाँ यह बताना भी जरूरी है कि ‘द हिमखंड’ लगातार चार धाम रेलवे प्रोजेक्ट जैसे विकास कार्यों का विरोध करता रहा है और इसे वह ‘पर्यावरण संरक्षण’ के नाम पर रोकने की कोशिश करता रहा है।

अब जबकि ‘ऑपरेशन कगार’ अपने अंतिम चरण में है और ‘लाल आतंक’ का खात्मा हो रहा है, ऐसे में अर्बन नक्सल और उनसे जुड़े संगठन अब लोगों को भ्रमित और कट्टरपंथी बनाने के लिए अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को हथियार की तरह उपयोग कर रहे हैं।

दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के पीछे ‘अर्बन नक्सलियों’ का हाथ, bsCEM मानता है ‘नक्सलबाड़ी ही एकमात्र रास्ता’: जाने कौन है हिडमा और नक्सलियों की समर्थक रवजोत कौर

दिल्ली में रविवार (23 नवंबर 2025) को एक प्रदूषण के खिलाफ एक प्रदर्शन हुआ लेकिन इसमें पुलिस पर हिंसा हुई, चिली स्प्रे तक इस्तेमाल किया गया। इस मामले में FIR दर्ज हुई और 15 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।

ये प्रदर्शन साफ हवा के लिए था लेकिन जल्द ही सामने आ गया कि ये bsCEM (भगत सिंह छात्र एकता मंच) का लेफ्टिस्ट एजेंडा था। इसके लीडर जैसे रवजोत कौर और द हिमखंड ने कुछ दिनों पहले मारे गए नक्सली कमांडर माड़वी हिड़मा की तारीफ की थी।

इस पूरे प्रदर्शन में भी इसकी छाप दिखी और प्रदर्शनकारियों ने उसके पोस्टर लगाए और ‘कॉमरेड हिड़मा अमर रहे’ जैसे नारे लगाए। प्रदर्शन में सिर्फ नक्सलियों की तारीफ नहीं हुई बल्कि उनके टेरर ग्रुप्स को ‘लोगों की सरकार’ कहा गया।

ट्राइबल इलाकों में धमकियों, डर और हिंसा से अपनी बात मनवाने की कोशिश करने वाले नक्सलियों को देश की चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार का विकल्प बताया गया। इनके समर्थक ‘अर्बन नक्सलियों’ ने उस विचारधारा के समर्थकों द्वारा फैलाए गए आतंक को ‘अधिकारों और कल्याण’ की आड़ में बढ़ावा दिया है।

मजेदार बात ये है कि bsCEM और द हिमखंड ने 14 नवंबर को ‘साफ हवा के आंदोलन पर प्रेस कॉन्फ्रेंस’ नाम का इवेंट किया था। इसमें प्रशांत भूषण स्पीकर थे। ये प्रोग्राम दिल्ली यूनिवर्सिटी की AISA (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) और ‘साइंटिस्ट्स फॉर सोसाइटी’ ने होस्ट किया था।

रवजोत, दिल्ली प्रदर्शन और ‘कॉमरेड हिड़मा अमर रहे’

bsCEM की रवजोत इस इवेंट के पोस्टर में थी। वही रवजोत कल दिल्ली प्रदर्शन में आतंकी हिड़मा की तारीफ करती दिखी, भारतीय सरकार को बुरा भला कहा और ट्राइबल इलाकों में नक्सलों की हुकूमत को ‘आदर्श’ बताया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, रवजोत गुरु गोबिंद सिंह इंदिरा प्रस्थ विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस ग्रेजुएट है और bsCEM की एक्टिव मेंबर है। वो दिल्ली में रेगुलर ‘आंदोलनजीवी’ है, और रविवार (23 नवंबर 2025) को उसे चिली स्प्रे लेकर पुलिस पर हमले का आरोपित बनाया गया।

4 पुलिसवाले आँखों से घायल हुए और RML हॉस्पिटल में भर्ती हैं। इधर, इन रैडिकल ग्रुप्स का ओवरव्यू देखें तो पता चलता है कि वो रेड टेरर की खुली तारीफ करते हैं। हर बंदूकधारी नक्सली, जो देश के खिलाफ जंग लड़ता है, उनके लिए या तो ट्राइबल हक का फाइटर है या बेकसूर।

‘चुनावों का बहिष्कार करो और देश के खिलाफ हिंसा करो’

पिछले साल लोकसभा चुनावों से पहले bsCEM ने दिल्ली यूनिवर्सिटी की दीवारों पर ग्राफिटी लिखी, जिसमें लोगों से वोट न डालने को कहा। उन्होंने लिखा, एक ही रास्ता नक्सलबाड़ी (नक्सलबाड़ी ही एकमात्र रास्ता है), वो जगह जहाँ भारत में रेड टेरर की शुरुआत हुई।

दूसरे नारे जैसे चुनावों का बहिष्कार करो, न्यू डेमोक्रेसी जॉइन करो लिखे और इलेक्शन कमीशन पर हमला बोला। फिर डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (नॉर्थ) सागर सिंह कलसी ने कहा, “डिफेसमेंट एक्ट के तहत दो FIR दर्ज हुई हैं और जाँच चल रही है।” ये 23 मई को हुआ, जब bsCEM ने यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैंपस पर मैसेज पेंट किए।

जब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने शिकायत की, तो आरोपित पकड़े गए। ग्रुप ने दावा किया कि नारे लिखना “देश के स्टूडेंट मूवमेंट्स की हिस्ट्री में हमेशा डेमोक्रेटिक तरीका रहा है।”

bsCEM की मेंबर गुरकीरत ने कहा, “1947 के बाद भारत में इम्पीरियलिस्ट एक्सप्लॉइटेशन जारी रहा, जब देश कॉलोनियल से सेमी-कॉलोनियल हो गया। हम सोचते हैं चुनाव धोखा हैं, कोई असली बदलाव नहीं होगा। आदिवासी हर पार्टी के हाथों पीड़ित रहेंगे।”

उन्होंने आरोप लगाया, “भारत की डेमोक्रेसी सिर्फ स्टेटस क्वो (मौजूदा स्थिति) बनाए रखने के लिए है। असली स्ट्रगल के लिए कोई जगह नहीं, इसलिए हमारे खिलाफ इतनी तेज कार्रवाई हुई।” ये विशुद्ध हिपोक्रिसी है। ये लोग भारत की डेमोक्रेटिक सिस्टम को यूज करके उसे नक्सलवाद से बदलना चाहते हैं और बेशर्मी से अपना हक बताते हैं। डेमोक्रेसी में खामियाँ हैं लेकिन वो लोगों की इच्छा दिखाती है।

हर कम्युनिटी, ट्राइबल्स, माइनॉरिटीज सब संविधान के मुताबिक अपना गवर्नमेंट चुन सकती हैं। लेकिन ये लोग हिंसा और खूनखराबे की आइडियोलॉजी को रोमांटिक बनाते हैं, जहाँ बंदूक की धमकी से लोगों की आवाज दब जाती है और वे इसे चुनावों से बेहतर बताते हैं।

ब्राह्मणिकल हिंदुत्व की बकवास और माओइस्टों को हीरो बनाना

जैसा उम्मीद थी, bsCEM ने पुलिस की कार्रवाई को ‘ब्राह्मणिकल हिंदुत्व फासीस्ट RSS-BJP (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भारतीय जनता पार्टी)’ का बताया और पुलिस पर हमले जैसी अपनी गलतियों को ढकने की कोशिश की है।

उन्होंने अपने ‘कॉमरेड्स’ और आइडियोलॉजी शेयर करने वालों को बड़ी तादाद में इकट्ठा होने का सिग्नल दिया, साफ तौर पर और बवाल भड़काने का इरादा। ये प्रदर्शन 2020 के दिल्ली के एंटी-हिंदू दंगों की शुरुआत जैसा था लेकिन इसे रेगुलर आंदोलन बताया गया, न कि नक्सलिजम को मेनस्ट्रीम करने और भारत के दुश्मनों को सेलिब्रेट करने का प्रोग्राम।

ग्रुप ने हिड़मा के मारे जाने को फेक एनकाउंटर कहा और भारतीय सरकार पर सेंट्रल इंडिया के मिनरल रिच इलाकों को ‘अपने बेटे-बेटियों के खून से रंगने’ का आरोप लगाया। जो नक्सली सुरक्षाबलों पर लगातार हमले करते हैं, लोकतंत्र को निशाना बनाते हैं और लोगों को स्थानीय या समानांतर सरकार के नाम पर बरगलाते हैं, उन्होंने हीरो दिखाने की कोशिश की गई है।

दूसरी तरफ, एडमिनिस्ट्रेशन और अथॉरिटीज़, जो इन अत्याचारों को खत्म करने और गरीब इलाकों को डेवलपमेंट के लिए भारत से जोड़ने की कोशिश करते हैं, उन्हें विलेन बनाकर बेवकूफ जनता को धोखा देने और सहानुभूति बटोरने की कोशिश की गई।

इसी तरह, बार-बार सरकार पर ट्राइबल कम्युनिटीज के हक के लिए लड़ने वालों की मौत का आरोप लगाने के बाद, bsCEM ने नक्सली कमांडर मल्लौजुला वेणुगोपाल राव उर्फ सोनू के सरेंडर को बड़ी कंपनियों को खुश करने वाला बताया है।

फिर सरकार से जिनेवा कन्वेंशन का पालन करने को कहा, जो नॉन-इंटरनेशनल आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट के लिए है। साथ ही कई डिमांड्स रखीं, जैसे ऑपरेशन कागार बंद करना, जो नक्सलियों के खिलाफ है।

ऑपरेशन कागार का जिक्र साफ बताता है कि ये कितना सफल रहा है माओइस्ट थ्रेट को खत्म करने में। इसी तरह, ब्राह्मणिकल हिंदुत्व फासीस्ट RSS-BJP पर पहले हिड़मा की टॉर्चर और किलिंग का आरोप लगाया गया, जिसे साधारण आदिवासी बताया है।

हिंसा से चलने वाले नक्सलियों को निरस्त्र क्रांतिकारी कहा और सरकार के खिलाफ हथियार उठाने को डेमोक्रेटिक डिसेंट बताया। माओवाद को आम लोगों के दमन और शोषण का हल बताया गया। बैन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) को लोगों की वैध आवाज कहा।

सभी पोस्ट्स सिर्फ नक्सलियों के लिए सहानुभूति और याद करने के लिए, बिना एक शब्द उनके टारगेट्स के, जिसमें ट्राइबल पॉपुलेशन शामिल है। ये दिखाता है कि bsCEM और ऐसे ग्रुप्स लोकल पॉपुलेशन को कितना महत्व देते हैं। उनकी लॉयल्टी सिर्फ खूनखराबे वाली आइडियोलॉजी की तरफ है, अनगिनत बेकसूर जिंदगियों की कीमत पर।

भारतीय राज्य का डेमोनाइजेशन, और फिलिस्तीन का सपोर्ट

bsCEM ने भारतीय राज्य को ‘अपने बच्चों को मारने वाली रिपब्लिक’ कहा, ये भूलकर कि माओवादी न बच्चों को मानते हैं, न भारत को अपना देश। इसलिए वे हथियार उठाते हैं। इसीलिए ‘ऑपरेशन कागार’ बंद करने की पोस्ट्स ग्रुप शेयर करता रहता है।

इसके अलावा, कई पोस्ट्स दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व इंग्लिश प्रोफेसर GN साईंबाबा को समर्पित है, जिन्हें माओवादियों से रिश्तों के चलते उम्रकैद की सजा मिली थी। बाद में उन्हें बरी कर दिया गया और इस फैसले के जिम्मेदार बॉम्बे हाईकोर्ट के जज रोहित बी डियो ने 2023 में व्यक्तिगत कारणों से रिजाइन कर दिया था।

साईंबाबा की मौत पिछले साल 12 अक्टूबर को हुई। उनकी डेथ एनिवर्सरी को bsCEM ने उनके शहादत का मेमोरियल मीट के रूप में मनाया, जिसमें मौजूदा सरकार के खिलाफ बकवास दोहराई है।

ग्रुप ने मुंबई पुलिस द्वारा TISS (टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज) के कम से कम 10 स्टूडेंट्स के खिलाफ FIR पर गुस्सा जताया, जो साई बाबा की ‘डेथ एनिवर्सरी’ मना रहे थे। महत्वपूर्ण ये कि इन छात्रों ने इंस्टीट्यूशन या अथॉरिटीज से परमिशन नहीं ली थी और प्रोग्राम में दिल्ली दंगों के आरोपित उमर खालिद और शरजील इमाम के पक्ष में नारे लगाए।

जैसे bsCEM ने भारत में माओवादी हिंसा को रेवोल्यूशनरी बताया, वैसे ही प्रो-हमास प्रोपगैंडा फैलाया और फिलिस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन आयोजित किए। सिर्फ bsCEM और देश में ऐसे एलिमेंट्स के एंटी-इंडिया और कट्टरपंथी मानसिकता की एक झलक है, जो संविधान और देश की आजादी का फायदा उठाकर सरकार हथियाना चाहते हैं और क्रांति व आइडियोलॉजी के नाम पर बड़े पैमाने पर खूनखराबा फैलाना चाहते हैं।

लाल किले पर प्रदर्शन के दौरान पुलिस पर हमला इसका साफ सबूत है। ये लोग अपने खतरनाक एजेंडा के लिए हर भारतीय संस्था को कमजोर करने की कोशिश करते हैं और जब रोका जाता है तो विक्टिम बन जाते हैं।

इथियोपिया में 12000 साल बाद फटा ज्वालामुखी, दिल्ली तक पहुँची ‘काँच वाली’ राख: फ्लाइट्स के लिए बनी संकट, जानें इसे क्यों माना जा रहा ‘साइलेंट किलर’ ?

अफ्रीका के इथियोपिया में एक बड़ा ज्वालामुखी फटा है। इस ज्वालामुखी का नाम है हायली गुब्बी। यह ज्वालामुखी करीब 10 से 12 हजार साल बाद फटा है। विस्फोट के बाद राख का एक बड़ा बादल उठा। यह राख लगभग 4000 किलोमीटर दूर भारत तक आ गया है।

राख का यह बादल 130 किलोमीटर प्रति घंटे की बहुत तेज रफ्तार से आया। यह लाल सागर और अरब सागर को पार करते हुए आया। सोमवार (24 नवंबर 2025) रात करीब 11 बजे यह राख दिल्ली पहुँचा। सबसे पहले यह पश्चिमी राजस्थान के जोधपुर और जैसलमेर के ऊपर देखी गई। इसके बाद यह दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के बड़े हिस्सों में फैल गई।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह राख जमीन से 25,000 से 45,000 फीट की बहुत ऊँचाई पर है। इसलिए, अभी लोगों की सेहत को खास खतरा नहीं है। लेकिन इस राख से हवाई उड़ानों पर असर पड़ा है। अकासा एयर, इंडिगो और KLM जैसी कई एयरलाइंस ने अपनी उड़ानें रद्द कर दी हैं या उनके रास्ते बदल दिए हैं। भारत सरकार के विमानन नियामक DGCA ने सभी एयरलाइंस को चेतावनी दी है। उन्हें राख वाले खतरनाक इलाकों से दूर रहने को कहा गया है।

इथियोपिया में ज्वालामुखी कैसे फटा और राख इतनी दूर कैसे पहुँची?

राख बादल ने सबसे पहले राजस्थान के जोधपुर और जैसलमेर के आसमान को ढका, फिर धीरे-धीरे दिल्ली, हरियाणा और पंजाब की ओर बढ़ गया। क्योंकि यह राख जमीन से लगभग 25,000 से 45,000 फीट की ऊँचाई पर थी, इसलिए लोगों को यह सीधे दिखाई नहीं दी, लेकिन इसके असर ने हवा को भारी और जहरीली बना दिया।

दिल्ली के आनंद विहार में AQI 400 के ऊपर चला गया और यह ‘सीवियर’ श्रेणी में पहुँच गया। एम्स और सफदरजंग के आसपास भी घना जहरीला स्मॉग दिखाई दिया। हवा में चुभन, सांस लेने में भारीपन और आँखों में जलन महसूस होने लगी। यह स्थिति स्थानीय प्रदूषण और ज्वालामुखी राख के ऊपरी परत में मिलने से बनी।

सुबह का सूरज सामान्य से ज्यादा लाल और चमकीला दिखा क्योंकि राख के सूक्ष्म कण रोशनी को अलग तरह से मोड़ते हैं। इस तरह का दृश्य बड़े ज्वालामुखी विस्फोटों के बाद आम होता है।

उड़ानों पर असर क्यों पड़ा और क्या खतरा है?

ज्वालामुखी राख विमान के लिए बेहद खतरनाक मानी जाती है। राख दिखती भले धूल जैसी हो, लेकिन असल में यह बारीक कांच और जली चट्टानों के कण होते हैं। ये गर्म इंजन में जाते ही पिघलकर कांच जैसी परत बना देते हैं, जिससे इंजन बंद हो सकता है। इसके अलावा राख विंडशील्ड को धुंधला कर देती है, सेंसर खराब कर सकती है और पंखों की सतह पर चिपककर विमान की लिफ्ट भी प्रभावित कर सकती है।

1982 में ब्रिटिश एयरवेज की एक फ्लाइट ऐसे ही राख के कारण चारों इंजन फेल होने के बाद 25,000 फीट नीचे गिर गई थी, हालांकि बाद में पायलट इंजन को दोबारा स्टार्ट करने में कामयाब रहे थे।

यही कारण है कि अकासा एयर, इंडिगो, KLM और कई एयरलाइंस को उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। कुछ उड़ानों को बीच में डायवर्ट किया गया। DGCA ने तत्काल एडवाइजरी जारी करके एयरलाइंस को राख वाले क्षेत्रों से बचकर उड़ान भरने और पोस्ट-फ्लाइट इंजन जाँच अनिवार्य करने को कहा। एयर इंडिया और इंडिगो ने भी यात्रियों को सतर्क करते हुए कहा कि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।

क्या राख भारत में जमीन पर गिरेगी और सेहत को कितना खतरा है?

अच्छी बात यह है कि राख अभी ऊपरी वायुमंडल में है। जमीन पर यह भारी मात्रा में गिरने की संभावना बहुत कम है। मौसम विभाग ने कहा है कि कुछ इलाकों में हल्की परत दिख सकती है, लेकिन फिलहाल इसका सीधा खतरा मामूली है। हालाँकि, हवा की गुणवत्ता पहले से खराब होने के कारण दिल्ली-NCR में स्मॉग और भारी हो गया है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, जिन लोगों को अस्थमा, सीओपीडी, दिल की बीमारी या एलर्जी की समस्या है, उन्हें ज्यादा सावधानी रखनी चाहिए। आँखों में जलन, गले में खराश, सांस फूलना और सिरदर्द जैसे लक्षण बढ़ सकते हैं।

क्या आगे भी खतरा हो सकता है?

यह पूरा राख का गुबार हवा के साथ पूर्व की ओर खिसकता रहेगा और धीरे-धीरे बंटकर खत्म हो जाएगा। अगर ज्वालामुखी में दूसरा बड़ा विस्फोट होता है या राख की ऊँचाई और बढ़ती है, तो उड़ानों पर असर लंबे समय तक रह सकता है। मौसम विभाग और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ लगातार इसकी निगरानी कर रही हैं।

राख का वैज्ञानिक असर: आखिर यह हवा और मौसम को कैसे बदलती है?

ज्वालामुखी राख सूर्य की रोशनी को रोकती है, इसलिए जिस क्षेत्र में यह पहुँचती है, वहाँ अस्थायी रूप से धुंध जैसा माहौल बन जाता है। बड़े विस्फोटों में तापमान तक गिर सकता है, हालाँकि इस बार ऐसा असर नहीं दिखेगा क्योंकि राख की मात्रा बहुत बड़ी वैश्विक स्तर की नहीं है।

राख में मौजूद सल्फर डाइऑक्साइड गैस बाद में सल्फेट एयरोसोल बनाती है, जो हवा की गुणवत्ता खराब कर सकते हैं। UP के तराई इलाके और नेपाल के ऊपर इन गैसों का असर थोड़ा बढ़ सकता है क्योंकि राख वाले बादल हिमालय से टकराकर दिशा बदलेंगे।

कैसे करें बचाव और क्या है लोगों के लिए जरूरी सलाह?

अगर हवा में चुभन या भारीपन महसूस हो तो सुबह बाहर निकलने से बचें। N-95 मास्क मददगार है क्योंकि यह सूक्ष्म कणों को फिल्टर करता है। आँखों में जलन हो तो साफ पानी से धोएँ और बच्चों या बुजुर्गों को अनावश्यक यात्रा से बचाएँ। हवाई यात्रा करने वाले लोग उड़ानों की स्थिति लगातार चेक करते रहें क्योंकि रूट बदलने या देरी होने की संभावना बनी रहेगी।

ज्वालामुखी दूर, असर पास तक आया

इथियोपिया के ज्वालामुखी में हुआ विस्फोट भले अफ्रीका में हुआ हो, लेकिन उसकी राख भारत के आसमान तक पहुँचकर यह दिखा चुकी है कि प्रकृति की घटनाएँ सीमाओं की मोहताज नहीं होतीं। दिल्ली-NCR में स्मॉग बढ़ा, कई उड़ानें बाधित हुईं और मौसम का रंग बदल गया। फिलहाल खतरा गंभीर नहीं है, लेकिन निगरानी और सावधानी जरूरी है, क्योंकि ऐसी राख हवा और उड़ानों पर बड़ा असर डाल सकती है।