मध्य प्रदेश के रीवा में शनिवार (27 सितंबर 2025) देर रात बिछिया थाना क्षेत्र के लक्ष्मण बाग मोहल्ले में एक अजीब और डराने वाली घटना सामने आई है। मोहल्लेवासियों को बीच सड़क पर एक गाय का कटा हुआ सिर मिला।
सुबह होते ही गुस्साए लोगों ने सिर सड़क पर रखकर चक्का जाम कर दिया और आरोपितों की तत्काल गिरफ्तारी की माँग उठाई। स्थानीय लोगों का कहना है कि 27 सितंबर की रात दो अज्ञात व्यक्ति पहले इलाके में रेकी करते दिखाई दिए थे।
कुछ लोगों ने बताया कि वे संदिग्ध रात में मोहल्ले के आस-पास घूमते हुए देखे गए थे। सुबह मोहल्ले में घूमने वाली गाय गायब पाई गई और बाद में उसका कटा हुआ सिर मिला। जिसके बाद लोगों ने कार्रवाई की माँग करते हुए सड़क पर गाय का कटा हुआ सिर रख कर सड़क जाम कर दिया।
स्थानीयों लोगों ने बताया कि इलाके में कई बार ऐसी घटनाएँ हुई हैं, इसलिए लोग पहले से ही सतर्क थे और संदिग्ध गतिविधि पर ध्यान दे रहे थे। कुछ लोगों ने यह भी दावा किया कि रात में मोहल्ले में घूमते हुए लोगों को देखा गया और बाद में CCTV फुटेज चेक करने पर कुछ अज्ञात शख्स संदिग्ध लग रहे थे।
एक वीडियो में तो गाय संदिग्धों से डरकर भागती हुई नजर आ रही हैं, जिसे स्थानीय निवासी विशाल सिंह परिहार ने ऑपइंडिया के साथ साझा की।
पुलिस की कार्रवाई
पुलिस ने सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया है और आरोपितों की तलाश में जुटी है। ऑपइंडिया के पास मौजूद मामले की FIR कॉपी के मुताबिक, घटना वाले दिन ही अज्ञात आरोपितों के खिलाफ बीएनएस की धारा 196(2), 299 और 365, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 की धारा 11(1) और मध्य प्रदेश गोवंश वध प्रतिषेध नियम 2004 की धारा 6/9 के तहत FIR दर्ज की गई है।
रीवा के मुख्य पुलिस अधीक्षक राजीव पाठक ने मौके का जायजा लिया और लोगों को आश्वासन दिया कि दोषियों के खिलाफ कड़ी और जल्द कार्रवाई की जाएगी। पुलिस सीसीटीवी फुटेज की जाँच कर रही है ताकि आरोपितों की पहचान की जा सके।
बिछिया थाने की एसएचओ, मनिधा उपाध्याय ने बताया कि पुलिस लगातार आरोपितों की तलाश कर रही है और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने लोगों से सहयोग करने और शांति बनाए रखने की अपील की है। इस बीच, पुलिस ने मामले में दो लोगों मोहम्मद इस्माइल और एक नाबालिग को हिरासत में लिया है।
विश्व हिंदू परिषद के स्थानीय नेता बालकृष्ण द्विवेदी ने कहा, “हमारी धार्मिक भावनाएँ आहत हुई हैं। अगर प्रशासन ने आरोपितों को जल्दी गिरफ्तार नहीं किया तो बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया जाएगा।”
घटना के बाद एक स्थानीय महिला अकबरी बेगम ने बताया कि उनके झोपड़ियों तक 100-200 रुपए में गोमांस पहुँचाया जाता है। पुलिस फिलहाल मामला दर्ज कर CCTV फुटेज, स्थानीय बयानों और फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर जाँच कर रही है।
कभी आपने सुना की सेक्युलरिज्म के नाम पर किसी मस्जिद में हनुमान चालीसा का पाठ किया गया हो। कभी ये सुना है कि मुस्लिमों के किसी मजहबी जुलूस में भगवान राम या कृष्ण के नाम की जय-जयकार की गई हो। ऐसा इसलिए नहीं होता क्योंकि सेक्युलरिज्म के नाम पर सारे प्रयोगों की ठेकेदारी हिंदू त्योहारों की ही है।
हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि कला-संस्कृति से लेकर आधुनिकता और विविधता पर हिंदुओं के त्योहारों पर तमाम तरह के प्रयोग किए जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे हिंदुओं के हर त्योहार से पहले या उनके दौरान पानी में कंकड़ मारकर यह परखा जाता है कि हिंदुओं की सहनशीलता कितनी है, वे कहाँ तक बर्दाश्त कर सकते हैं।
इसे अब कुछ उदाहरणों से समझने की कोशिश करते हैं, इन दिनों नवरात्रि चल रही हैं और देशभर में दुर्गा पंडाल लगे हैं। कुछ दिनों पहले ममता बनर्जी एक पंडाल में पहुँची, साथ में मदन मित्रा समेत पार्टी के अन्य नेता भी थे। पंडाल में जाकर पूजा-अर्चना करनी चाहिए थे लेकिन हुआ क्या?
मदन मित्रा ने दुर्गा पंडाल में ‘मेरे दिल में काबा है और आँखों में मदीना है’ गाना शुरू कर दिया। जाहिर है, दुर्गा पंडाल में इसे गाए जाने का कोई मतलब, कोई तुक नहीं है। ऐसे में ममता को अपने नेता को रोकना चाहिए था लेकिन वो क्या कर रही थीं? वो अपने नेता के इस गीत पर ताली बजा रही थीं। यह सब तमाशा खुद को सेक्युलर दिखाने के लिए किया जा रहा है।
अब सोचिए, ममता बनर्जी और उनके नेता ने जो किया अगर वही काम किसी अन्य मजहब के कार्यक्रम में हुआ होता तो क्या होता, क्या पूरे देश में हंगामा खड़ा नहीं हो गया होता? क्या सेक्युलरिज्म के सूरमा सड़कों पर नहीं आ गए होते?
After Mamata Banerjee inaugurated several puja pandals wearing a hijab during the inauspicious Pitru Paksha, Madan Mitra, one of her sidekicks, sang, “There’s the Kaaba in my heart and Medina in my eyes,” inside a Durga Puja pandal in Kolkata, West Bengal.
ये हुआ बस एक उदाहरण, एक और देखिए, झारखंड की राजधानी राँची में तो बात इससे भी आगे बढ़ गई, वहाँ दुर्गा पूजा पंडाल को ही ‘वेटिकन सिटी’ की थीम पर बना दिया गया। सेक्युलरिज्म में कमी ना रह जाए इसलिए इस पंडाल में बाकायदा ईसा मसीह की मूर्तियाँ और क्रॉस तक लगाए गए थे।
और आगे बढ़िए, कर्नाटक में दशहरे के उत्सव की शुरुआत करने के लिए एक मुस्लिम महिला बानू मुश्ताक को बुलाया गया। मुश्ताक ने चामुंडेश्वरी मंदिर में प्रवेश कर मैसूर के विश्व प्रसिद्ध दशहरा महोत्सव का प्रारंभ किया है।
कभी आपने सोचा है कि कॉन्ग्रेस सरकार ने ऐसा क्यों किया होगा? क्या यह हिंदुओं के पर्व को किसी और धर्म के चेहरों से जोड़ने की सोची-समझी कोशिश नहीं लगती है? क्या यह हिंदुओं की परंपराओं के साथ प्रयोग नहीं है?
ऐसी प्रयोगधर्मिता गरबा में भी नजर आती है, गरबा में मुस्लिम युवकों को प्रवेश मिल जाए, इसका माहौल एक जमात द्वारा बनाया जा रहा है। जो लोग इन्हें रोकने की कोशिश कर रहे हैं, उन पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
अब इसके उल्ट दूसरी स्थिति देखिए, गुजरात के गाँधीनगर में ‘I Love Mahadev’ का वॉट्सऐप स्टेटस लगाने पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने एक युवक की पिटाई कर दी। यानी आप उनके ‘I Love Muhammad’ जैसा कुछ करने की कोशिश करेंगे तो आप मारे-पीटे जाएँगे। यही नए जमाने का सेक्युलरिज्म है।
इन सारी चीजों को क्रमवार देखने पर लगता है कि यह स्वत: नहीं हो रहा है। बल्कि यह एक चाल है, पहले धीरे-धीरे हिंदुओं की आस्था पर चोट करो, उनकी सीमा जाँचो, उनकी प्रतिक्रिया को तौलो और फिर अगला कदम बढ़ाओ।
हिंदुओं से उम्मीद की जाती है कि वे हमेशा चुपचाप सब सह लें। उन्हें हमेशा समझौता करना है, हमेशा दूसरों को जगह देनी है, हमेशा अपने त्योहारों-परंपराओं को बदलने की आदत डालनी है।
इस मानसिकता को अब बदलने जाने की जरूरत है। हिंदू अगर चुप रहेंगे तो यह सिलसिला कभी नहीं रुकेगा। हर बार नए प्रयोग होंगे, हर बार नई चोट लगेगी और धीरे-धीरे पूरी आस्था खोखली कर दी जाएगी। शायद कुछ लोगों की कोशिश भी यही है।
लद्दाख में अस्थिरता के बीच सोनम वांगचुक पर गंभीर आरोप, असली जनआंदोलन और राजनीतिक हेरफेर के बीच की रेखाएँ धुँधली होने का खतरा।
लद्दाख में जारी अशांति ने अब एक नया और चिंताजनक मोड़ ले लिया है। जिस समय यह क्षेत्र पहले से ही तनाव और हिंसक झड़पों के कारण अशांत है, उसी समय कुछ ऐसे आरोप सामने आए हैं, जो इसकी राजनीतिक और सामाजिक दिशा को बदल सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इनोवेटर और पर्यावरणविद् के रूप में पहचाने जाने वाले सोनम वांगचुक, जिन्हें लद्दाख के आंदोलनों का चेहरा माना जाता है, अब गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के केंद्र में हैं।
आंदोलन की आड़ में भावनाओं से खिलवाड़- बीजेपी
भाजपा के शीर्ष सूत्रों द्वारा लगाए गए ये आरोप महज गड़बड़ी का मामला नहीं हैं, बल्कि यह संकेत देते हैं कि वांगचुक ने आंदोलन की आड़ में जनता की भावनाओं को भड़काकर निजी और संगठनात्मक हित साधने का प्रयास किया। सबसे बड़ा और ताज़ा घटनाक्रम गृह मंत्रालय का वह निर्णय है, जिसमें उसने सोनम वांगचुक द्वारा स्थापित स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) की एफसीआरए (FCRA) रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया।
यह फैसला विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act), 2010 के तहत कई गंभीर उल्लंघनों के बाद लिया गया। यह कोई साधारण प्रशासनिक कदम नहीं है- इसका सीधा असर SECMOL की विदेशी चंदा प्राप्त करने की वैधता पर पड़ा है। इसके अलावा, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने भी जाँच शुरू कर दी है ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं विदेशी चंदा का दुरुपयोग तो नहीं हुआ। जाँच से जो आँकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं।
संस्थाओं के फंडिंग में गड़बड़ी और नियम तोड़ना
सोनम वांगचुक की प्रमुख संस्था हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स लद्दाख (HIAL) के फंडिंग में अचानक से होने वाली बढ़ोतरी देखी गई। वित्तीय वर्ष 2023-24 में जहाँ यह राशि 6 करोड़ रुपए थी, वहीं अगले वर्ष यह बढ़कर 15 करोड़ रुपए से अधिक हो गई। पहली नजर में इसे जनता के बढ़ते समर्थन का नतीजा माना जा सकता है, लेकिन जाँच एजेंसियों का दावा है कि यह वित्तीय प्रवाह पूरी तरह पारदर्शी नहीं है।
HIAL से जुड़े सात बैंक खातों में से चार खाते कथित रूप से घोषित नहीं किए गए। और भी गंभीर बात यह है कि इस संस्था ने 1.5 करोड़ रुपए से अधिक विदेशी पैसा बिना FCRA रजिस्ट्रेशन के प्राप्त की, जो कि कानून की धारा 11 का सीधा उल्लंघन है।
9 बैंक खातों में से 6 की अधिकारियों को जानकारी नहीं
गड़बड़ी यहीं तक सीमित नहीं है। SECMOL के पास कुल नौ बैंक खाते बताए जा रहे हैं, जिनमें से छह खातों को अधिकारियों से छिपाया गया। इससे यह संदेह और गहरा हो गया है कि कहीं सुनियोजित तरीके से वित्तीय लेन-देन को छुपाने का प्रयास तो नहीं हुआ।
इसके साथ ही एक निजी कंपनी शेष्योन इनोवेशंस प्राइवेट लिमिटेड (SIPL) भी जाँच के दायरे में आई है, जिसमें सोनम वांगचुक निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। आरोप है कि HIAL से इस निजी कंपनी में 6.5 करोड़ रुपए ट्रांसफर किए गए। इससे हितों के टकराव (Conflict of Interest) और फंड के दुरुपयोग के सवाल खड़े हो गए हैं। इतना ही नहीं, इस कंपनी का शुद्ध लाभ (Net Profit) एक वर्ष में 6.13% से गिरकर सिर्फ 1.14% रह गया, जिससे संदेह और गहरा हो गया कि कहीं धनराशि को गलत तरीके से बाहर तो नहीं निकाला गया। सबसे गंभीर आरोप सोनम वांगचुक की व्यक्तिगत वित्तीय स्थिति पर हैं।
सोनम वांगचुक ने ₹2.3 करोड़ विदेश भेजा
भाजपा सूत्रों का कहना है कि उनके पास कुल 9 व्यक्तिगत बैंक खाते हैं, जिनमें से 8 खातों का खुलासा नहीं किया गया। इन खातों में ज्यादा संख्या में विदेशी पैसा आने का दावा किया गया है। और भी चिंताजनक बात यह है कि 2021 से अब तक सोनम वांगचुक ने 2.3 करोड़ रुपए से अधिक की पैसा विदेश भेजी, जिनके प्राप्तकर्ताओं की पहचान ‘अज्ञात संस्थाओं’ के रूप में बताई जा रही है।
यह सीधे तौर पर मनी लॉन्ड्रिंग की आशंका पैदा करता है। विडंबना यह है कि सोनम वांगचुक अक्सर कॉरपोरेट जगत और सरकारों की आलोचना करते रहे हैं, लेकिन आरोप है कि उनकी संस्थाओं ने सरकारी उपक्रमों (PSUs) और निजी कंपनियों से बड़ी मात्रा में CSR (कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) फंड प्राप्त किए हैं। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह उनके सार्वजनिक बयानों और निजी कार्यों के बीच भारी विरोधाभास को उजागर करेगा।
इन आरोपों के असर बहुत दूरगामी हो सकते हैं। अब तक लद्दाख के आंदोलन को एक जमीनी स्तर का संघर्ष माना जाता था, जो स्थानीय लोगों की स्वायत्तता (खुद निर्णय लेने वाले), पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक पहचान की माँगों पर आधारित था। लेकिन अगर ये वित्तीय अनियमितताएँ साबित हो जाती हैं, तो यह आंदोलन एक व्यक्ति के निजी लाभ और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का माध्यम बनकर रह जाएगा। इसका सीधा नुकसान लद्दाख के आम लोगों की वैध माँगों को होगा, जो कमजोर पड़ सकती हैं।
यह भी सच है कि आरोप और सच्चाई में फर्क होता है। सोनम वांगचुक का काम और योगदान, विशेषकर शिक्षा और सतत विकास के क्षेत्र में, अस्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन जब कोई व्यक्ति सरकार और उद्योगों से पारदर्शिता की माँग करता है, तो उसे स्वयं भी उतनी ही पारदर्शिता दिखानी चाहिए। CBI की जाँच के परिणाम दो कहानियों में से एक को सामने लाएँगे या तो यह एक दूरदर्शी नेता के खिलाफ राजनीतिक साजिश का मामला होगा, या फिर एक आंदोलनकारी नेता के मुखौटे के पीछे छिपे वित्तीय घोटाले का पर्दाफाश होगा। लद्दाख और देश की जनता को अब सत्य की प्रतीक्षा है, क्योंकि यही सच न केवल सोनम वांगचुक की छवि बल्कि लद्दाख के भविष्य को भी निर्धारित करेगा।
प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बात के 126वें एपिसोड में नौसेना के दो जांबाज महिला अधिकारियों का जिक्र किया है। ये हैं लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना और लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा। ये पाल नौकायन से पृथ्वी की परिक्रमा करने वाली भारत और एशिया की पहली इंसान हैं।
दुनिया की पहली महिलाएँ हैं, जिन्होंने छोटी-सी नौका से पूरी दुनिया के चक्कर लगाए। इनके उत्साह, लगन, मेहनत की तारीफ करते हुए पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ के माध्यम से दोनों महिलाओं के साथ संवाद किया। इस दौरान दोनों नेवी की अधिकारियों ने अपने अद्भुत यात्रा का अनुभव साझा किया।
मैं ‘मन की बात’ के श्रोताओं को इन दो जांबाज़ officers से मिलवाना चाहता हूँ। एक हैं Lieutenant commander दिलना और दूसरी हैं Lieutenant commander रूपा। ये दोनों officers हमारे साथ फोन लाइन पर जुड़ी हुई हैं।
नौसेना में लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना (logistics) लोजिस्टिक्स कैडर से हैं। 2014 में वह इंडियन नेवी में अफसर बनीं थी। केरल की कोझिकोड की रहने वाली दिलना के पिता देवदासन भी आर्मी में जवान थे। लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना को सेना में जाने की प्रेरणा उन्हीं से मिली। उनकी माता कुशल गृहणी हैं और पति इंडियन नेवी में ही अधिकारी हैं। यहाँ तक कि एनसीसी से जुड़ी हुई हैं।
लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा को जानिए
लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा इंडियन नेवी से 2017 में जुड़ी। उन्होंने नौसेना आयुध निरीक्षण (armament inspection) कैडर ज्वाइंन किया। रूपा के पिता अलागिरीसामी जीपी तमिलनाडु के हैं, जबकि माँ पुद्दुचेरी की हैं। पिता एयरफोर्स में थे, वहीं से डिफेंस में आने की प्रेरणा मिली। जबकि माँ कुशल गृहणी हैं।
दुनिया की परिक्रमा करने वाली दिलना और रूपा का कहना है कि जिंदगी में ऐसा मौका सिर्फ एक बार मिलता है, जो जिंदगी बदल देती है। (circimnavigation) पूरे संसार की जल से यात्रा एक ऐसा अवसर था, जो इंडियन नेवी और भारत सरकार ने दिया।
जल यात्रा से पहले की तैयारियाँ
लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा और लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना ने पूरे संसार की जलयात्रा करने के दौरान 47500 किलोमीटर समुद्र में यात्रा की। 2 अक्टूबर 2024 को गोवा से दोनों निकलीं और 29 मई 2025 को वापस आई। यानी पूरे 238 दिन लगे। उस नौका में सिर्फ ये दोनों थीं। इस यात्रा की तैयारी दोनों ने 3 साल पहले शुरू कर दी थी। इसके लिए मार्गदर्शन से लेकर कम्यूनिकेशन डिवाइस को कैसे ओपरेट करना है, गोताखोरी कैसे करते हैं और बोट में कुछ भी इमरजेंसी हो, जैसे मेडिकल इमरजेंसी तो कैसे मैनेज करना है, इन सबकी ट्रेनिंग इंडियन नेवी से ली थी।
नौका में सिर्फ दोनों थीं और दोनों को एक साथ मेहनत करना पड़ता था। वहाँ बोट रिपेयर से इंजन मेकेनिक तक के काम मिल कर करती थीं। वो नौका में आई तकनीकी खराबी से लेकर मेडिकल एसिस्टेंट, कुक, क्लिनर, ड्राइवर, मार्गदर्शक और सबकुछ वही एक दूसरे के लिए थीं। इसके लिए इंडियन नेवी ने ट्रेनिंग में सबकुछ सिखाया था।
‘प्वांइट निमो’ पर फहराया तिरंगा
लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना और लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा प्वाइंट निमो (point Nemo) तक गईं और भारत का झंडा फहराया। ‘प्वाइंट निमो’ दुनिया की सबसे दूरतम जगह (remolest location) है जो दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित है। इस जगह के सबसे नजदीक कोई इंसान है तो वह इंटरनेशनल स्पेस सेंटर में है। वहाँ से नजदीक अगर कोई जमीन है, तो वह करीब 2,688 किलोमीटर दूर है। इसका नाम लैटिन शब्द “निमो” से बना है, जिसका अर्थ होता है ‘कोई नहीं’। एक पाल नौका से इस प्वाइंट तक पहुँचने वाला पहला भारतीय, पहला एशियन और दुनिया का पहला इंसान बनने का मौका भारत की इन दो नेवी की महिला अधिकारियों को मिला।
समुद्री यात्रा के दौरान चुनौतियाँ
लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना और लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा पिछले 5 सालों से एक-दूसरे को अच्छी तरह जानती हैं। तीन सालों तक साथ में ट्रेनिंग लीं है। जब यात्रा शुरू हुई तो छोटे से नौका में दोनों गोवा से समुद्र की लंबाई मापने निकलीं और वह भी 17 मीटर लंबी और 5 मीटर चौड़ी अपनी छोटी सी पाल नौका ‘आईएनएसवी तारिणी’ से।
कभी- कभी कुछ लहरें तीन मंजिला मकान जितनी ऊँची आती थी, तो कभी हवा रुक जाती और नौका नीचे चली जाती। कभी बहुत ज्यादा गर्मी और कभी बहुत ज्यादा सर्दी, हर तरह की परिस्थितियों का इनदोनों ने मिलकर सामना किया। दोनों एक-दूसरे के सहारे थे, कभी हँस कर एक दूसरे को मोटिवेट करते तो कभी एक-दूसरे का संबल बनते। एक दूसरे की मजबूती और कमजोरियों से दोनों वाकिफ थीं, इसलिए कोई भी दिक्कत आ जाए, टीम वर्क कभी फेल नहीं हुआ।
घने अंधेरे में मशीन ने दिया धोखा
एक बार घने अंधेरे में जीपीएस, ऑटोपायलट और हवा की दिशा बताने वाला नेविगेशनल पैनल अचानक काम करना बंद कर दिया। प्रशांत महासागर के बीचो बीच इन्हें लगा जैसे ये समुद्र में खो गए। मदद की उम्मीद करना बेकार था, क्योंकि कोई भी मदद 4-5 दिनों से पहले नहीं मिल सकती थी। दोनों ने मिलकर अपने सिस्टम को 3 घंटे की कड़े मेहनत के बाद ठीक किया और आगे बढ़ीं समुद्र के माउंट एवरेस्ट यानी केप हॉर्न को पार किया
यात्रा के दौरान पहली रात में केप हॉर्न को पार किया। ये समुद्र का माउंट एवरेस्ट कहलाता है। यहाँ मौसम कभी भी खराब हो सकता है। समुद्र में काफी उथल-पुथल मचा रहता था। बड़ी बड़ी लहरें इससे टकराती है। पूरा समुद्र सफेद झाग से भरा रहता है। इस दौरान कई बार पॉल की रॉड पानी से टकरा गई और नौका एक तरफ झुक गई। ट्रेनिंग इस वक्त काफी काम आया और दोनों ने इसे पार किया। समुद्र का ऐसा रौद्र रूप उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। ऐसा लग रहा था कि पहाड़ों पर नौका चल रही है और फिर घाटियों में उतर रही है।
खराब मौसम और शरीर पड़ा सुन्न
यात्रा में बहुत सारी विपरीत परिस्थितियाँ थी। खास कर दक्षिणी सागर में हमेशा मौसम खराब रहता हैं। इस दौरान तीन तूफानों का सामना करना पड़ा। 57 डिग्री दक्षिण की ओर जाने पर तापमान 2 डिग्री तक पहुँच गई। शरीर सुन्न पड़ गए। इस दौरान नौका में एक छेद हो गया, जिससे पानी अंदर आने लगा। इससे कई इलेक्ट्रिकल उपकरण खराब हो गया और शॉर्ट सर्किट हो गया। इसे ठीक करने में काफी वक्त लगा।
अंटार्कटिका में नौकायन के दौरान 1 डिग्री तापमान और 90 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से आ रही हवा, दोनों का सामान एक साथ करना पड़ा। इससे बचने के लिए 7 लेयर वाली कपड़े पहने थे। पूरे दक्षिणी सागर में नौकायन के दौरान इसे पहनना पड़ा। कभी-कभी गैस स्टोव को लेकर हाथ गरम करना पड़ा।
कभी कभी ऐसी परिस्थिति भी आई थी जब हवा बिल्कुल भी नहीं चलता था। नौका पूरी तरह नीचे करके drift होता रहता था। इस वक्त सब्र की काफी जरूरत होती है।
सबसे यादगार पल रहा Comet A3 देखना
दोनों कमांडर कहती हैं कि दुर्लभ धुमकेतु Comet A3 देखना उनके लिए सबसे अद्भुत पल था। ये करीब 80000 साल बाद आता है। इसे दोनों ने एक हफ्ते तक आसमान में इसे चमकते देखा और मोबाइल के कैमरे में कैद किया। इसको लेकर दोनों काफी उत्साहित दिखीं। समुद्र से दिख रहा नीला आसमान और उसमें अद्भुत खगोलीय नजारा देखने का मौका मिलने पर ये ईश्वर को भी धन्यवाद कर रही हैं।
यात्रा में 4 जगहों पर रुकी नौका
पूरे 8 महीने में 4 जगहों पर नौका रूकी थी। ये जगह हैं- ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और पोर्ट स्टेनली। हर एक जगह पर 14 दिनों तक ये रुकी थीं। इस दौरान पूरी दुनिया में इनलोगों ने भारतीय को देखा। लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना का कहना है कि भारतीय हर जगह बहुत एक्टिव और आत्मविश्वास से भरे मिले। भारत का नाम रौशन कर रहे हैं। हमारी जो सफलता है वो उसे अपनी सफलता मानते हैं।
लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा का कहना है कि हर जगह उन्हें अलग-अलग अनुभव मिला। जैसे ऑस्ट्रेलिया में, वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया पार्लियामेंट के स्पीकर ने मुलाकात की। उन्होंने काफी मोटिवेट किया। वहीं न्यूजीलैंड में माउरी लोगों ने स्वागत किया। उनके मन में भारतीय संस्कृति को लेकर काफी इज्जत था।
पोर्ट स्टेनले एक रिमोट आइसलैंड है, जो दक्षिण अमेरिका के पास है। वहाँ पर जनसंख्या मात्र 3500 है। लेकिन वहाँ हमने एक मिनी इंडिया देखा। वहाँ 45 भारतीय थे। उन्होंने अपने जैसा समझा और वहाँ घर जैसा महसूस हुआ।
देश का नाम रौशन करें बेटियाँ- लेफ्टिनेंट रूपा
पीएम मोदी ने जब पूछा कि देश के बेटियों के लिए क्या कहना चाहेंगी, तो लेफ्टिनेंट कमांडर रूपा ने कहा कि अगर दिल लगाकर मेहनत किया जाए, तो इस दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है। वहीं लेफ्टिनेंट कमांडर दिलना का कहना है कि आप कहाँ से हैं, कहाँ पैदा हुए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। हम चाहते हैं कि भारत के युवा और महिलाएँ बड़े-बड़े सपने देखें और भविष्य में महिलाएँ बड़ी संख्या में डिफेंस ज्वाइंन करें। स्पोर्ट्स और एडवेंचर में शामिल हों और देश का नाम रौशन करें।
पीएम मोदी ने देश की इन दो बेटियों से कहा कि निश्चित तौर पर आप दोनों की मेहनत, सफलता और एचिवमेंट देश के युवाओं और युवतियों को प्रेरित करेगी। देश का झंडा तिरंगा इसी तरह लहराते रहिए।
लोकसभा में विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस के सांसद राहुल गाँधी एक बार फिर विदेश यात्रा पर निकल गए हैं। इस बार वे दक्षिण अमेरिका के चार देशों का दौरा करेंगे। कॉन्ग्रेस का कहना है कि इस यात्रा के दौरान उनका उद्देश्य राजनीतिक नेताओं, विश्वविद्यालय के छात्रों और व्यापारिक समुदाय से मुलाकात करना है।
कॉन्ग्रेस के मीडिया और प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा के अनुसार, राहुल गाँधी ब्राजील और कोलंबिया जाएँगे। वहाँ वे विश्वविद्यालयों में छात्रों को संबोधित करेंगे, राष्ट्रपति और शीर्ष नेताओं से मुलाकात करेंगे और व्यापार और तकनीक जैसे मुद्दों पर व्यवसायियों से बातचीत करेंगे।
Leader of the Opposition in Lok Sabha, Shri Rahul Gandhi, has embarked on a visit to South America. He is scheduled to engage with political leaders, university students, and members of the business community across four countries.
कॉन्ग्रेस ने इस दौरे को दक्षिण अमेरिका के साथ भारत के रिश्तों को मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। खासकर जब भारत और दक्षिण अमेरिका के बीच गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) और ग्लोबल साउथ के जरिए ऐतिहासिक संबंध भी रहे हैं।
कॉन्ग्रेस पार्टी इस यात्रा को लोकतांत्रिक और रणनीतिक साझेदारी बनाने के प्रयास के रूप में पेश कर रही है, लेकिन राहुल गाँधी की इस यात्रा की टाइमिंग को लेकर फिर से देश में सवाल खड़े हो रहे हैं।
बिहार चुनाव नजदीक आने पर विदेश यात्रा
लोकसभा में विपक्षी नेता राहुल गाँधी देश के प्रधानमंत्री नहीं हैं और न ही किसी सरकारी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा हैं। फिर भी, इसके बावजूद वे विदेशों में भाषण देने की भूमिका निभा रहे हैं और वो भी ऐसे समय में जब बिहार में महत्वपूर्ण चुनाव नजदीक है।
इस पर आलोचना भी हो रही है कि उनकी प्राथमिकताएँ गलत हैं। एक जिम्मेदार नेता इतने बड़े चुनाव से पहले, अपना समय चुनाव की रणनीति बनाने, जनता से संपर्क करने और अपने दल को मजबूत करने में लगाता लेकिन राहुल गाँधी ने एक और विदेशी यात्रा को चुना है।
विदेशी विश्वविद्यालयों के छात्रों से मिलने का उनका निर्णय भी सवालों के घेरे में है। वे न तो कोई शैक्षणिक विशेषज्ञ हैं और न ही किसी विषय के जानकार, फिर भी उन्होंने छात्रों और विचारकों के साथ लेक्चर और बहसें तय की हैं। आलोचक कहते हैं कि कोलंबिया और ब्राजील में भाषण देने के बजाय उन्हें बिहार के मतदाताओं से मिलकर कॉन्ग्रेस की स्थिति मजबूत करनी चाहिए।
ऐसे वक्त पर फिर से वही आलोचना सामने आता है कि राहुल गाँधी राजनीति को गंभीरता से नहीं लेते और इसे पार्ट-टाइम काम की तरह देखते हैं, जबकि इसे पूर्णकालीन जिम्मेदारी की तरह संभालना चाहिए।
कुछ सप्ताह पहले मलेशिया में मौज करते हुए दिखे थे राहुल
इस धारणा को और मजबूत करता है उनका हालिया मलेशिया दौरा। इसी महीने की शुरुआत में राहुल गाँधी ने बिहार में अपनी तथाकथित ‘वोटर अधिकार यात्रा’ पूरी की थी। इसके बाद राजनीतिक संपर्क को आगे बढ़ाने के बजाय, यात्रा खत्म होते ही वे मलेशिया छुट्टियों पर चले गए।
उनकी यह यात्रा तब विवादों में आ गई, जब सोशल मीडिया पर उनकी लंगकावी, मलेशिया में छुट्टियाँ बिताते हुए तस्वीरें वायरल हुईं। भाजपा नेताओं और सोशल मीडिया यूजर्स ने उन पर एक बार फिर महत्वपूर्ण राजनीतिक समय में गायब होने का आरोप लगाया।
भाजपा IT सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने X पर लिखा, “राहुल गाँधी फिर से लापता हो गए, इस बार लंगकावी, मलेशिया में गुप्त छुट्टी पर। लगता है बिहार की राजनीति का दबाव कॉन्ग्रेस के युवराज के लिए ज्यादा था, इसलिए उन्हें आराम के लिए भागना पड़ा। या फिर यह कोई ऐसा गुप्त मीटिंग थी, जिसे किसी को पता नहीं होना चाहिए था। किसी भी तरह, जब लोग असली मुद्दों से जूझ रहे हैं, राहुल गाँधी गायब होने और छुट्टियाँ बिताने की कला में व्यस्त हैं।”
Rahul Gandhi has slipped away yet again—this time on a clandestine vacation in Langkawi, Malaysia.
Looks like the heat and dust of Bihar’s politics was too much for the Congress Yuvraj, who had to rush off for a break. Or is it another one of those secret meetings that no one is… pic.twitter.com/NdiA4TP2bT
साथ ही, राहुल गाँधी की मलेशिया यात्रा को लेकर यह भी अटकलें थीं कि उन्होंने वहाँ इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाइक से मिलने के लिए जा सकते हैं, जिन्होंने भारत छोड़ने के बाद मलेशियाई नागरिकता ले ली थी। एक X यूजर ने लिखा, “वे अपने गुरु जाकिर नाइक से मिलने मलेशिया गए हैं।”
बिहार यात्रा के तुरंत बाद की यह मलेशिया यात्रा इस बात को और पुष्ट करती है कि राहुल गाँधी राजनीतिक कार्यक्रमों को जैसे असाइनमेंट की तरह देखते हैं, जिन्हें जल्दी पूरा करके विदेश जाकर आराम करना जरूरी है।
राज्य चुनावों से पहले उज़्बेकिस्तान की गुप्त यात्रा
यह पहला मौका नहीं है जब राहुल गाँधी ने चुनावों से पहले विदेश यात्रा करना चुना हो। अक्टूबर 2023 में, उन्होंने कई राज्यों में महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों से पहले गुप्त रूप से भारत छोड़कर उज़्बेकिस्तान की यात्रा की थी।
जब वे वापस लौटे, तो मीडिया को इसके बारे में तब ही पता चला जब उन्हें दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर देखा गया। उन्होंने यात्रा का उद्देश्य अभी तक सार्वजनिक नहीं किया। उनकी विदेश यात्राएँ अक्सर गोपनीयता में होती हैं और यह उनकी आदत जैसी बन गई है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह का व्यवहार एक वरिष्ठ विपक्षी नेता के लिए ठीक नहीं है।
कॉन्ग्रेस के राजकुमार का चुनाव के दौरान विदेश जाने का इतिहास रहा है
राहुल गाँधी की आदत रही है कि वे चुनावी समय या तब भी विदेश यात्रा पर चले जाते हैं जब उनकी पार्टी को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। उन्हें पार्टी में संकट के दौरान विदेशी यात्राओं और भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी दखल को बढ़ावा देने के लिए भी जाना जाता है।
उनका 2019 का बैंकॉक दौरा भी उतना ही विवादित रहा। उस समय भी वे चुनावों के बीच विदेश यात्रा पर निकल गए थे। उनकी विदेश यात्राओं पर उठने वाले सवाल बेबुनियाद नहीं हैं, क्योंकि कई बार ऐसी यात्राओं के दौरान उनकी मुलाकात भारत विरोधी तत्वों से भी हुई है।
उदाहरण के लिए, 2023 में अमेरिका यात्रा के दौरान उन्होंने हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) की सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ से मुलाकात की। HfHR एक इस्लामी समूह है, जो भारत में हिंदुओं पर भेदभाव का आरोप लगाता है।
अप्रैल 2022 में, जब कॉन्ग्रेस को नेतृत्व की जरूरत थी और पार्टी में प्रशांत किशोर को शामिल करने की अटकलें थीं, राहुल गाँधी विदेश चले गए। इसके बाद जब प्रशांत किशोर ने कॉन्ग्रेस जॉइन करने से मना कर दिया, तो राहुल गाँधी लगभग 10 दिन अचानक गायब रहे, बिना किसी जानकारी दिए। इस दौरान, कॉन्ग्रेस को नेतृत्व के बिना ही काम करना पड़ा।
दिसंबर 2021 में, जब पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को भारी हार का सामना करना पड़ा तो राहुल गाँधी इटली की व्यक्तिगत यात्रा पर थे। उनकी यात्रा के कारण पंजाब में चुनावी गतिविधियों में बड़ी बाधा आई और अधिकांश रैलियाँ उनकी वापसी तक टाल दी गईं। यह यात्रा आम आदमी पार्टी की जीत और कॉन्ग्रेस की हार का कारण भी बनी।
सितंबर 2021 में, जब पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफे के बाद कॉन्ग्रेस मुश्किल में थी, गाँधी परिवार शिमला में छुट्टी मना रहा था।
दिसंबर 2020 में, कॉन्ग्रेस पार्टी के 136वें स्थापना दिवस के दौरान भी राहुल गाँधी इटली चले गए। इसी तरह अक्टूबर 2019 में, हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव से केवल 15 दिन पहले, वे बैंकॉक गए।
इसी तरह, 2019 के लोकसभा चुनावों के तुरंत बाद वे नतीजों का इंतजार किए बिना लंदन छुट्टियाँ मनाने चले गए। यहाँ तक कि उन्होंने अपनी माँ सोनिया गाँधी द्वारा बुलाई गई अहम बैठक में भी हिस्सा नहीं लिया।
इसके अलावा, राहुल गाँधी अक्सर विदेश यात्राओं के दौरान SPG सुरक्षा (विशेष सुरक्षा समूह) नहीं लेते थे और सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करते रहे। इसी वजह से सरकार ने उनकी SPG सुरक्षा वापस ले ली थी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में भी इस पर सवाल उठाए थे।
गलत प्राथमिकताओं को दिखाने वाला पैटर्न
बिहार चुनाव नजदीक हैं लेकिन राहुल गांधी का दक्षिण अमेरिका दौरा पुरानी आलोचनाओं को फिर से उभार रहा है। राजनीतिक समय बिहार में बिताने के बजाय वे विदेश में छात्रों और नेताओं से बातें कर रहे हैं जबकि उनकी पार्टी के लिए राज्य में बहुत कुछ दाँव पर है।
कई विशेषज्ञों के लिए यह उनकी प्राथमिकताओं की गलत दिशा को दर्शाता है। जब कांग्रेस पार्टी भारत के सबसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों में से एक में अपनी पकड़ बनाने के लिए संघर्ष कर रही है, उसका नेता हजारों किलोमीटर दूर है। राहुल गाँधी का चुनावों से पहले विदेश चले जाने का यह पैटर्न उनके राजनीतिक गंभीरता पर सवाल उठाता है और यह भी कि क्या वे खुद को पूर्णकालिक नेता मानते हैं या नहीं।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रीति सागर ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)
विदेशी मीडिया गिद्धों की तरह इस ताक में रहती है कि कहीं भारत में कुछ हो और वो अपना प्रोपेगेंडा फैला सकें। लद्दाख में बीते 24 सितंबर को हिंसा हुई, इस हिंसा को भड़काने के आरोप में केंद्र सरकार ने ‘एक्टिविस्ट’ सोनम वांगचुक को गिरफ्तार कर लिया है। इसके बाद ‘द गार्जियन’ ने अपनी एक रिपोर्ट में लद्दाख हिंसा पर आँख मूंदकर इस गिरफ्तारी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की ‘असहमति’ के खिलाफ कार्रवाई का हिस्सा बताया है।
द गार्जियन की रिपोर्ट का अंश
द गार्जियन की रिपोर्ट के शुरुआती हिस्से पढ़ने पर ही समझ आ जाता है कि असल में यह कोई रिपोर्ट ना होकर भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में प्रोपेगेंडा है। रिपोर्ट के शुरुआती हिस्से में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि मोदी सरकार ‘असहमति’ की आवाज, साधारण शब्दों में समझें तो अपना विरोध, नहीं सुन सकती है इसलिए वांगचुक की गिरफ्तारी हुई है।
अब इस दावे के बाद ठीक आगे की ही लाइन में गार्जियन ने वांगचुक का परिचय देते हुए लिखा कि वह मोदी सरकार के खिलाफ ‘लंबे आंदोलन‘ का नेतृत्व कर रहे हैं। बात सही है, वह लंबे आंदोलन का नेतृत्व नहीं कर रहे हैं, और इस नेतृत्व में माँगे भी मोदी सरकार से ही कर रहे थे। तो क्या मोदी सरकार ने वांगचुक को जेल में डाल दिया था नहीं, बल्कि उनसे बातचीत करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया था।
भारत सरकार की कोशिश यह नहीं थी कि ‘असहमति’ की आवाज दबा दी जाए बल्कि यह थी कि उनकी आवाज को सुना जाए, कार्रवाई की जाए। उन्हें लद्दाख में हुई हिंसा के बाद गिरफ्तार किया गया है जिसमें 4 लोगों की मौत हुई है। यह बात गार्जियन ने जानबूझकर अपने खबर की शुरुआत जानकारी में छिपा ली है।
और यह केवल इकलौता प्रोपेगेंडा नहीं है। इसके आगे भी मनगढ़ंत कहानी लिखने की कोशिश की गई है।
द गार्जियन की रिपोर्ट का अंश
इस रिपोर्ट में हिंसा तक को सही ठहराने के भी तर्क दिए गए हैं। गार्जियन ने लिखा, “यह क्षेत्र (लद्दाख) पहले जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था लेकिन इसे मोदी सरकार ने एकतरफा तरीके से भंग कर दिया जिससे स्थानीय लोगों में गुस्सा और निराशा फैल गई।”
गार्जियन को लोगों का गुस्सा और निराशा तो दिखी लेकिन वह यह बताना भूल गया कि इसी लद्दाख में दशकों तक केंद्र शासित प्रदेश बनने के लिए प्रदर्शन हुए थे। जिस दिन इसे UT बनाया गया, उस दिन लद्दाख में लोग ढोल-नगाड़े बजाकर नाच रहे थे। आज पूर्ण राज्य की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे सोनम वांगचुक खुद मोदी सरकार का धन्यवाद करते नहीं थक रहे थे।
साफ है कि गार्जियन का मकसद सच बताना नहीं बल्कि मोदी सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा सैट करना है। एक नैरेटिव बनना है कि 2019 के बाद से जब से लद्दाख UT बना है, लोग परेशान हैं। इसका मतलब होता है कि यही परेशानी लोगों की हिंसा की वजह बनी है।
द गार्जियन की रिपोर्ट का अंश
गार्जियन ने अपनी रिपोर्ट में आगे भारत के लद्दाख में सैन्य निर्माण और बुनियादी ढांचे के निर्माण पर भी अपना दुखड़ा रोया है। गार्जियन को चिंता है कि भारत के सैन्य निर्माण से पर्यावरण पर प्रभाव पड़ रहा है। चीन की आक्रामकता की गार्जियन को सोनम वांगचुक की तरह ही कोई चिंता नहीं है।
गार्जियन जैसे विदेशी मीडिया संस्थान बार-बार भारत के सैन्य निर्माण और इन्फ्रास्ट्रक्चर को पर्यावरणीय संकट बताकर निशाना बनाते हैं। लेकिन यही मीडिया अन्य देशों के विशाल सैन्य अड्डों, सड़कों, सुरंगों और एयरबेस निर्माण को लेकर शायद ही कभी सवाल उठाता है।
भारत का सैन्य और इन्फ्रास्ट्रक्चर कोई अपनी छाती ठोकने के लिए नहीं किया जा रहा है बल्कि सैन्य जरूरतों और चीन की आक्रामकता को देखते हुए किया जा रहा है। इस पर रोने के बजाय इसकी जरूरत को समझना चाहिए।
मोदी सरकार ने नक्सलवाद को खत्म करने के लिए देशभर में अब तक का सबसे बड़ा अभियान शुरू किया है। गृह मंत्री अमित शाह ने कई बार कहा है कि 31 मार्च 2026 तक भारत को पूरी तरह से नक्सलवाद से मुक्त कर दिया जाएगा।
सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई से नक्सलियों की संख्या और उनके शीर्ष नेतृत्व में बड़ी कमी आई है। इसके साथ ही कई नक्सली सरकार की नो-टॉलरेंस पॉलिसी और विकास कार्यों से प्रभावित होकर आत्मसमर्पण भी कर चुके हैं।
इसी बीच नक्सली संगठन के भीतर गंभीर मतभेद सामने आए हैं। तेलंगाना खुफिया विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, माओवादी पार्टी के दो गुट इस बात को लेकर आपस में भिड़े हुए हैं कि क्या हथियार छोड़कर समाज में शामिल होना चाहिए या फिर ‘सशस्त्र संघर्ष’ को जारी रखना चाहिए।
यह विवाद दो बड़े नेताओं के बीच है। मल्लोजुला वेंगुपाल राव उर्फ सोनू पार्टी का वैचारिक नेता है और वह आत्मसमर्पण करने और मुख्यधारा में लौटने के पक्ष में है। वहीं सेंट्रल मिलिट्री कमीशन का महासचिव थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवुजी अब भी लड़ाई जारी रखना चाहता है। देवुजी तेलंगाना के जगतियाल का रहने वाला है जबकि सोनू पेद्दापल्ली से है। दोनों पर 1-1 करोड़ रुपए का इनाम घोषित है।
जहाँ एक तरफ मोदी सरकार नक्सलवाद के खात्मे का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ नक्सली संगठन के भीतर भी आत्मसमर्पण और हथियार छोड़ने को लेकर खींचतान बढ़ती जा रही है।
तीन पत्रों से महत्वपूर्ण विभाजन का चला पता
नक्सली संगठन के भीतर मतभेद की असली तस्वीर हाल ही में सामने आई तीन चिट्ठियों से उजागर हुई है। पहली चिट्ठी सोनू ने 15 अगस्त को लिखी थी, जो 17 सितंबर को सार्वजनिक हुई। इसमें सोनू ने केंद्र सरकार से शांति वार्ता की इच्छा जताते हुए कहा कि पार्टी अस्थायी रूप से हथियार डालने के लिए तैयार है।
उसने यह भी बताया कि पार्टी के पूर्व महासचिव बसवराजू भी हथियार छोड़ने के पक्ष में थे। बसवराजू पर 1.5 करोड़ रुपए का इनाम था और मई महीने में छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के अबुझमाड़ इलाके में 26 अन्य नक्सलियों के साथ एक बड़े ऑपरेशन में मारा गया था।
सोनू की चिट्ठी में लिखा था, “बदलते वैश्विक और राष्ट्रीय हालातों को देखते हुए और प्रधानमंत्री, गृह मंत्री व वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की अपील को मानते हुए हम हथियार डालकर मुख्यधारा में शामिल होने के लिए तैयार हैं।”
इसके जवाब में 19 सितंबर को माओवादी पार्टी की तेलंगाना राज्य समिति ने दूसरी चिट्ठी जारी की। इसमें प्रवक्ता जगन ने साफ किया कि सोनू की यह राय सिर्फ उनकी निजी सोच है। इसके बाद पार्टी की सेंट्रल कमेटी, पोलित ब्यूरो और दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी की ओर से तीसरी चिट्ठी जारी की गई। इसमें सोनू के रुख को ‘देशद्रोह’ करार दिया गया और कहा गया कि पूरी तरह से आत्मसमर्पण करना हमारी नीति नहीं है।
इस चिट्ठी में आगे लिखा गया, “बदलते अंतरराष्ट्रीय और घरेलू हालात इस बात का संकेत नहीं देते कि सशस्त्र संघर्ष को छोड़ दिया जाए। बल्कि यह परिस्थितियाँ साबित करती हैं कि सशस्त्र संघर्ष को जारी रखना और भी जरूरी है।”
आधिकारिक सूत्रों ने कहा- ‘दो गुटों के आपसी संघर्ष’
खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों का कहना है कि नक्सली संगठन के भीतर जारी चिट्ठियों से पार्टी की असली स्थिति साफ हो रही है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “ये चिट्ठियाँ पार्टी के भीतर चल रही ‘दो गुटों के आपसी संघर्ष’ को दिखाती हैं। एक धड़ा कह रहा है कि अब हथियार डालने का समय है, जबकि दूसरा कह रहा है कि और जोश से लड़ाई जारी रखनी चाहिए।” अधिकारी के मुताबिक, केंद्रीय समिति की ओर से आई चिट्ठी दरअसल देवुजी की मर्जी से जारी हुई है, जिसमें सशस्त्र संघर्ष जारी रखने का समर्थन किया गया।
सूत्रों के अनुसार, संगठन के भीतर यह टकराव पिछले 12 महीनों से चल रहा है। एक साल पहले सोनू की पत्नी तारक्का ने महाराष्ट्र में आत्मसमर्पण कर दिया था और सितंबर में उसके भाई किशनजी की पत्नी पी पद्मावती ने भी तेलंगाना में हथियार डाल दिए। 2024 में पार्टी की पोलित ब्यूरो की ओर से जारी एक नोट में भी यह स्वीकार किया गया था कि संगठन कमजोर हो रहा है और उसे पीछे हटने पर विचार करना चाहिए।
एक अन्य अधिकारी ने कहा “पार्टी का एक धड़ा, जो वैचारिक रूप से मजबूत माना जाता है, आत्मसमर्पण कर लोकतांत्रिक रास्ता अपनाने पर विचार कर रहा है। वहीं दूसरा धड़ा लगातार सशस्त्र संघर्ष का समर्थन कर रहा है।” उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पहले कई सशस्त्र संगठन लोकतांत्रिक रास्ता अपना चुके हैं, जिनमें सबसे बड़ा उदाहरण भाकपा (माले) है।
यह आंतरिक विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब सुरक्षा बल नक्सलियों के खिलाफ अभियान और तेज कर चुके हैं। कभी 19 सदस्यीय रही केंद्रीय समिति अब घटकर सिर्फ 10 सदस्यों तक रह गई है। एक अधिकारी ने स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा, “संगठन संकट में है और इसके दो धड़े इस संकट का सामना अलग-अलग तरीकों से कर रहे हैं।”
वामपंथी आतंकवाद के खिलाफ मोदी सरकार का युद्ध
केंद्र सरकार की सख़्त कार्रवाई के बाद नक्सलवाद को बड़ा झटका लगा है। जनवरी 2024 में मोदी सरकार ने ‘ऑपरेशन कागर’ शुरू किया, जो नक्सलवाद पर ज़ीरो टॉलरेंस नीति का हिस्सा है। इस अभियान के तहत सुरक्षा बलों ने नक्सल गढ़ों को तोड़ने के लिए बड़े स्तर पर सैन्य अभियान चलाए, केंद्र और राज्य की सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल बनाया और विकास कार्यों को भी तेज किया।
इन प्रयासों का असर यह हुआ कि जो इलाके कभी माओवादी हिंसा के बड़े केंद्र थे, वहाँ अब विकास लौट रहा है और लोग मुख्यधारा से फिर से जुड़ रहे हैं। कई नक्सली भी अब अपनी जान बचाने और आंदोलन के पूरी तरह खत्म होने के डर से सरकार से बातचीत की माँग कर रहे हैं।
सीपीआई (माओवादी) के दो गुटों के बीच जारी टकराव भी इस बात का संकेत है कि संगठन के बड़े नेता खुद भविष्य को लेकर असमंजस में हैं। कई नेता अब आत्मसमर्पण के पक्ष में हैं, जिससे पार्टी के भीतर गहरा संकट और वैचारिक कमजोरी साफ दिख रही है।
नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या भी लगातार घट रही है। 2015 में 10 राज्यों के लगभग 106 जिले नक्सल प्रभावित माने जाते थे। यह संख्या पहले घटकर 38 हुई और 2024 में केवल 18 जिले रह गए। इनमें भी 12 जिले सबसे ज्यादा प्रभावित थे, लेकिन अब यह घटकर सिर्फ 6 रह गए हैं। यह सरकार और सुरक्षा बलों की रणनीति और प्रयासों की बड़ी सफलता मानी जा रही है।
वामपंथी आतंकवाद के खिलाफ मोदी सरकार का युद्ध
केंद्र सरकार की सख़्त कार्रवाई के बाद नक्सलवाद को बड़ा झटका लगा है। जनवरी 2024 में मोदी सरकार ने ‘ऑपरेशन कागर’ शुरू किया, जो नक्सलवाद पर ज़ीरो टॉलरेंस नीति का हिस्सा है। इस अभियान के तहत सुरक्षा बलों ने नक्सल गढ़ों को तोड़ने के लिए बड़े स्तर पर सैन्य अभियान चलाए, केंद्र और राज्य की सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल बनाया और विकास कार्यों को भी तेज किया।
इन प्रयासों का असर यह हुआ कि जो इलाके कभी माओवादी हिंसा के बड़े केंद्र थे, वहाँ अब विकास लौट रहा है और लोग मुख्यधारा से फिर से जुड़ रहे हैं। कई नक्सली भी अब अपनी जान बचाने और आंदोलन के पूरी तरह खत्म होने के डर से सरकार से बातचीत की माँग कर रहे हैं।
सीपीआई (माओवादी) के दो गुटों के बीच जारी टकराव भी इस बात का संकेत है कि संगठन के बड़े नेता खुद भविष्य को लेकर असमंजस में हैं। कई नेता अब आत्मसमर्पण के पक्ष में हैं, जिससे पार्टी के भीतर गहरा संकट और वैचारिक कमजोरी साफ दिख रही है।
नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या भी लगातार घट रही है। 2015 में 10 राज्यों के लगभग 106 जिले नक्सल प्रभावित माने जाते थे। यह संख्या पहले घटकर 38 हुई और 2024 में केवल 18 जिले रह गए। इनमें भी 12 जिले सबसे ज्यादा प्रभावित थे, लेकिन अब यह घटकर सिर्फ 6 रह गए हैं। यह सरकार और सुरक्षा बलों की रणनीति और प्रयासों की बड़ी सफलता मानी जा रही है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)
जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती एक बार फिर इतिहास को झुठलाने और आतंकियों के लिए ‘घड़ियाली आँसू’ बहाने के अपने पुराने एजेंडे पर उतर आई हैं। ‘द वायर’ पर महबूबा मुफ्ती ने एक लेख छपवाया है। इस लेख ही हेडलाइन ‘Betrayed: The Tragedy of Two Kashmiris and the Crisis of Indian Justice’ है। इसमें महबूबा मुफ्ती दो कुख्यात चेहरों ‘अफजल गुरु और यासीन मलिक‘ को ‘सिस्टम के छल’ का शिकार बताया है।
इसके अलावा लेख में महबूबा मुफ्ती ने अफजल गुरु को ‘बलि का बकरा’ और यासीन मलिक को ‘शांतिदूत’ बताया है। महबूबा मुफ्ती न केवल इतिहास को झुठला रही है, बल्कि उन नागरिकों के बलिदान का अपमान भी कर रही है, जिन्होंने इन आतंकियों की वजह से अपनी जान गँवाई है। महबूबा मुफ्ती जिन दो चेहरों के लिए घड़ियाली आँसू बहा रही हैं, उनकी असली करतूत क्या थी, यह जानना जरूरी है।
अफजल गुरु: संसद हमले का मास्टरमाइंड, ‘बलि का बकरा’ नहीं
महबूबा मुफ्ती का दावा: ‘द वायर’ के लेख में अफजल गुरु को एक ‘मुखबिर’ बताया गया है जिसे दविंदर सिंह नामक अधिकारी के कहने पर काम करने के बाद ‘गुपचुप तरीके से फाँसी’ दी गई और ‘बलि का बकरा’ बना दिया गया।
हमारा जवाब: मुफ्ती जी, यह आधी-अधूरी और झूठी कहानी है। जिस अफजल गुरु को आप ‘बलि का बकरा’ बता रही हैं, वह आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का सदस्य और 13 दिसंबर 2001 को भारतीय संसद पर हुए सबसे बड़े हमले का मास्टरमाइंड था। उसकी योजना के तहत पाँच आतंकियों ने हमारे लोकतंत्र के मंदिर पर अँधाधुँध फायरिंग की थी, जिसमें 9 लोगों की मौत हुई थी।
भारत की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने उसके संगठित अपराध और देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की मंशा को देखते हुए 2002 में मौत की सज़ा सुनाई थी। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया के तहत हुआ था, किसी ‘सामूहिक चेतना’ को शांत करने के लिए नहीं। अफजल को उसके आतंकवादी कृत्यों के लिए दंड मिला, न कि किसी ‘षड्यंत्र’ के लिए।
यासीन मलिक: शांतिदूत नहीं, आतंक और टेरर फंडिंग का दोषी
महबूबा मुफ्ती का दावा: मुफ्ती ने यासीन मलिक को ‘शांति का दूत’ बताया जिसने 1994 में हिंसा त्याग दी और विभिन्न प्रधानमंत्रियों के साथ संवाद किया। मुफ्ती का दावा है कि उसे ‘शांति प्रयासों’ के लिए जेल भेजा गया।
यासीन मलिक ‘शांतिदूत’ नहीं, बल्कि आतंकवादी गतिविधियों का प्रमुख चेहरा रहा है। उसका इतिहास खून और हिंसा से भरा है। उसने पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) जाकर आतंक की ट्रेनिंग ली थी। यासीन मलिक पर 1989 में गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण में शामिल होने का गंभीर आरोप था, जिसके बदले में आतंकियों को रिहा करना पड़ा।
इससे भी बड़ा जुर्म, जनवरी 1990 में श्रीनगर में चार वायुसेना जवानों की हत्या करना था, जिसका वह मुख्य साजिशकर्ता था। इसके अलावा, वह 1990 में कश्मीरी पंडितों के पलायन के लिए भी जिम्मेदार माना जाता है। दिल्ली की NIA कोर्ट ने उसे ‘शांति प्रयासों’ के लिए नहीं, बल्कि 2022 में टेरर फंडिंग (आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए पैसा जुटाने) के मामले में उम्रकैद की सज़ा सुनाई। हाफिज सईद जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी से मिलना ‘शांति प्रयास’ नहीं, बल्कि देश से विश्वासघात था।
महबूबा मुफ्ती का दोमुँहापन
महबूबा मुफ्ती का यह दावा कि यासीन मलिक को ‘शांति प्रयासों’ के लिए जेल भेजा गया, एक झूठा नैरेटिव है। भारत की सुरक्षा एजेंसियों के साथ बातचीत करना एक अलग बात है, लेकिन हाफिज सईद जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी से मिलना और टेरर फंडिंग करना शांतिदूत का काम नहीं हो सकता। महबूबा मुफ्ती का बयान आतंकियों को बचाने और उनके कारनामों पर पर्दा डालने की एक शर्मनाक कोशिश है। देश यह जानता है कि न्याय हुआ है, बलिदान नहीं।
क्या भारतीय न्यायपालिका बड़े बदलावों की ओर बढ़ रही है? हाँ। वरना न तो भारत की राष्ट्रपति और न ही प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार न्यायप्रणाली की खामियों पर इतना खुलकर बोलते।
इस महीने की शुरुआत में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने एक बार फिर न्यायपालिका को आड़े हाथों लिया। 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट के 75वें स्थापना दिवस समारोह में उन्होंने कहा, “न्यायपालिका में सुधार की प्रक्रिया को तेज किया जाना चाहिए।”
इस समारोह में देशभर की जिला अदालतों से आए लगभग 800 जज मौजूद थे। राष्ट्रपति ने आगे कहा, “लोगों को लगता है कि न्यायपालिका में संवेदनशीलता नहीं है।” यानी, भारत की न्यायिक प्रणाली कठोर और अकड़ू बन चुकी है।
यह पहली बार नहीं है जब राष्ट्रपति मुर्मू ने जजों की नियुक्ति प्रणाली पर सवाल उठाए। कॉलेजियम का नाम लिए बिना उन्होंने बार-बार सुझाव दिया है कि जजों की नियुक्ति भी उसी तरह होनी चाहिए, जैसे आईएएस अधिकारियों की होती है।
राष्ट्रपति के सुझाव का थोड़ा बैकग्राउन्ड देखें। 1958 में भारत के लॊ कमिशन की 14वीं रिपोर्ट ने ऑल इंडिया ज्यूडिशियल सर्विस (AIJS) बनाने का प्रस्ताव रखा था। इसके बाद 1978 की 77वीं रिपोर्ट, 1986 की 116वीं रिपोर्ट और हाल ही में 2012 में भी यह सुझाव दोहराया गया। लेकिन 1958 से आज तक छह दशकों से अधिक समय बीत गया और एक भी ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
क्यों?, क्योंकि हर बार खुद जजों ने इसका विरोध किया। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों ने लगातार कहा कि इससे हमारे अधिकार क्षेत्र में दखल होगा।
यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (UPSC) और सिविल सर्विस एग्जाम (CSE) के माध्यम से सरकार की 64 शीर्ष सेवाओं में नियुक्तियाँ होती हैं—IAS, IPS और IRS इनमें सबसे ऊपर हैं। इन्हीं परीक्षाओं से विदेश सेवा, वन सेवा, रक्षा खातों के हिसाब विभाग, रेलवे के कुछ विभागों, डाक विभाग और कई अन्य विभागों के उच्च अधिकारी चुने जाते हैं। कानून के क्षेत्र के लिए ICLS ( इंडियन सिविल लॉ सर्विस) और ILS (इंडियन लॉ सर्विस) जैसी सेवाएँ हैं, लेकिन इनमें से कोई भी जजों का चयन नहीं करती।
जरूरी है कि जजों की नियुक्ति भी IAS जैसी सख्त परीक्षा और गहन प्रशिक्षण से हो। और यह केवल हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के लिए नहीं बल्कि फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट, सिटी सिविल कोर्ट और सेशन्स कोर्ट के लिए हो। आखिरकार, इन्हीं स्तरों से आगे चलकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज बनते हैं।
कोलेजियम प्रणाली के चलते उच्च न्यायालयों में जजों की कुर्सियाँ कुछ चुनिंदा परिवारों के सदस्यों के लिए आरक्षित हो गईं हैं। नजदीकी रिश्तेदार न हों तो जज साहब अपने दोस्तों या खास लोगों के बच्चों को प्राथमिकता देते हैं। इसी भाई-भतीजावाद और भ्रष्ट व्यवस्था को खत्म करने के लिए नेशनल ज्यूडिशियल अप्वॉइंटमेंट्स कमीशन (NJAC) बना। मोदी सरकार ने 2014 में संसद के दोनों सदनों में 99वाँ संवैधानिक संशोधन पास कराया, NJAC अधिनियम बना और 16 राज्यों ने भी इसे मंजूरी दे दी। 31 दिसम्बर 2014 को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने हस्ताक्षर कर दिए।
13 अप्रैल 2015 को यह कानून लागू हो गया। फिर क्या हुआ? 16 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 4-1 के बहुमत से इसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने NJAC को असंवैधानिक करार दिया और कॉलेजियम प्रणाली बहाल कर दी।
यह वैसा ही था जैसे जंगल के दरबार में शेर से पूछा जाए कि क्या वह ऐसा कानून मंजूर करेगा जिसमें शेरों को मनमाने शिकार से रोका जाए और हर शिकार का हिसाब देना पड़े। शेर का जवाब क्या होगा?
कॉलेजियम प्रणाली ही न्यायपालिका के शेरों का पेट भरती है। NJAC लागू होता तो शेर भूखे मरते। यह कहानी का एक हिस्सा है। अब दूसरा हिस्सा।
संजीव सान्याल भारत के इतिहास पर लिखने वाले बेस्टसेलर लेखक हैं , जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अहम सदस्य हैं उन्होंने हाल ही में एक कानून विषयक सम्मेलन में 12 मिनट का सटीक भाषण दिया। इस दौरान उन्होंने तीन महत्वपूर्ण बातें कहीं:-
“मुझे डर है कि न्यायिक प्रणाली और कानूनी इको-सिस्टम, खासतौर से न्यायिक प्रणाली, आज भारत को विकसित भारत बनाने में सबसे बड़ी बाधा है। जब तक यहाँ भारी परिवर्तन नहीं होता, सबसे मजबूत आर्थिक नीतियाँ भी बेकार साबित होंगी।”
उन्होंने पूछा- जजों को ‘माई लॉर्ड’ क्यों कहा जाए? आखिर वे भी हमारे जैसे नागरिक हैं, सामंती शासक नहीं। (आज भले ही ‘सर’ या ‘योर ऑनर’ स्वीकार्य हैं, लेकिन सन्याल की चिंता सही है। ज़्यादातर वकील अब भी ‘माई लॉर्ड’ कहकर ही जजों को सिर पर चढ़ाते हैं।)
उन्होंने अदालतों की लंबी छुट्टियों पर सवाल उठाया। इन लंबे वेकेशन के दौरान अदालतों का पूरा कामकाज ठप हो जाता है। पुलिस, सरकारी अस्पताल या नौकरशाही में भी छुट्टियाँ होती हैं, लेकिन वहाँ काम कभी बंद नहीं होता। अदालतों को ही क्यों ‘वेकेशन बेंच’ की जरूरत पड़े?
आप की जानकारी के लिए बता दें कि संजीव सान्याल महान क्रांतिकारी शचींद्रनाथ सान्याल के पोते हैं- जिनके शिष्य राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे वीर हैं जिन्होने काकोरी साहस में राम प्रसाद बिस्मिल का साथ दिया था और अंग्रेजों ने उन्हें फांसी दे दी थी। संजीव सान्याल प्रधानमंत्री के भरोसेमंद व्यक्ति हैं।
परंपरा रही है कि राष्ट्रपति के सार्वजनिक बयान अक्सर प्रधानमंत्री की मूक सहमति से ही होते हैं। इसलिए इन दोनों दिग्गजों की बातें साफ इशारा करती हैं कि मोदी सरकार न्यायप्रणाली में कुछ बड़े परिवर्तन की तैयारी कर रही है। आने वाले महीनों में जज साहबान को ‘मुलजिम’ के कटघरे में खड़ा कर जवाब माँगा जाएगा और कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और प्रशांत भूषण जैसे वकीलों द्वारा खड़ी की गई ‘लीगल इको-सिस्टम’ को भी तोड़ा जाएगा।
आवश्यक सुधारों के साथ-साथ न्यायालयों की रिपोर्टिंग प्रणाली में भी बदलाव जरूरी है। अभी LiveLaw और Bar & Bench सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई कवर करते हैं, लेकिन ये भी उसी इको-सिस्टम का हिस्सा हैं। जरूरत है एक तीसरे, मजबूत और राष्ट्रवादी लीगल डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म की, जो बेबाकी से इस किले में प्रवेश कर सके और न्यायपालिका को खोखला कर रही दीमकों का ‘पेस्ट कंट्रोल’ कर सके।
मोदी सरकार का कामकाज कुछ कुछ भगवान के कारोबार जैसा ही है- कभी कभार देर है, पर अंधेर नहीं।
उत्तर प्रदेश के बरेली में जुमे की नमाज के बाद 26 सितंबर 2025 को ‘I Love Muhammad’ को लेकर फिर हिंसा हुई है। यह देश भर के कई शहरों में जारी इस्लामी कट्टरपंथियों के हिंसक प्रदर्शनों की बस एक झलक भर है।
कानपुर से एक मनगढ़ंत कहानी के आधार पर ‘I Love Muhammad’ को लेकर शुरू हुए बवाल के बाद इस्लामी कट्टरपंथियों ने अपनी आक्रामकता साबित करने के लिए पथराव, आगजनी और तोड़फोड़ का सहारा लिया है तो हिंदुओं की तरफ से उसका उत्तर सिर्फ ‘I Love Mahadev’ है।
कानपुर से शुरू हुए ‘I Love Muhammad’ के बवाल को लेकर गुजरात के गोधरा, उत्तर प्रदेश के उन्नाव, कर्नाटक के देवानगेरे और उत्तराखंड के काशीपुर समेत देश के कई शहरों में इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिंसक प्रदर्शन किए हैं।
मुस्लिमों का आक्रामकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पुलिस को कई राज्यों में 1300 से ज्यादा मुस्लिमों के खिलाफ FIR दर्ज करनी पड़ी है और करीब 40 लोगों को अब तक गिरफ्तार किया जा चुका है। हिंसा का आलम यह है कि गुजरात के गाँधीनगर में तो ‘I Love Mahadev’ का स्टेट्स लगाने पर एक हिंदू की कट्टरपंथियों की भीड़ ने बेतहाशा पिटाई कर दी है।
इस हिंसा, पथराव के जवाब में हिंदुओं ने वही रास्ता चुना जो वो हमेशा से चुनते आए हैं, शांति का रस्ता, आदियोगी का रास्ता, ‘I Love Mahadev’ का रास्ता। देश के अलग-अलग शहरों में संत समाज समेत सामान्य लोग ‘I Love Mahadev’ के पोस्टर लगा रहे हैं। बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में कई साधु-संत यह पोस्टर पकड़े नजर आए।
वाराणसी के अलावा देश के कई शहरों में भी यह ट्रेंड दिखा है। कहीं चौराहे पर ‘I Love Mahadev’ के पोस्टर लगाए हए हैं तो कहीं गलियों में बड़े-बड़े बैनर लगे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम को देखे तो साफ पता चलता है कि यह लड़ाई इन दो नारों से अधिक दो विचारधाराओं की हैं। एक तरफ हिंसा, आक्रोश और उन्माद का है, तो दूसरी तरफ सहिष्णुता, श्रद्धा और शांति का रास्ता है। हिंदुओं का रास्ता ही असल में भारत की सहिष्णुता, शिवत्व और एकात्मता का रास्ता है।
जब कट्टरपंथी ‘I Love Muhammad’ के नाम पर समाज में डर और आतंक फैलाने की कोशिश कर रहे थे, तब साधु-संतों और युवाओं ने ‘I Love Mahadev’ लिखकर यह दिखाया कि यह देश किसी एक धर्म का बंधक नहीं है। यहाँ हर कोई अपनी आस्था रख सकता है लेकिन इसकी शर्त यही है कि वह दूसरों पर खुद की आस्था को ना थोपे।
हिंदुओं के इस जवाबी अहिंसक आंदोलन का एक पहलू यह भी है कि यह हिंदुओं की एकता का प्रतीक भी है। सोशल मीडिया से लेकर गलियों और चौक-चौराहों तक जिस तरह ‘I Love Mahadev’ का संदेश फैल रहा है और लोग इसे अपनी पहचान और संस्कृति के गर्व के रूप में अपना रहे हैं। यह दिखाता है कि जब-जब सनातन संस्कृति को मजबूती की जरूरत होती है तब समाज एकजुट होकर खड़ा हो जाता है।
भारत का बहुसंख्यक हिंदू समाज अपनी सहिष्णुता से दिखा रहा है कि चार पत्थर लेकर किसी पर हमला कर देना असली ताकत नहीं है। असली ताकत शांति के साथ समाज की चेतना को जागृत करने में ही है।