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BBC ने वामपंथी नैरेटिव गढ़ने के लिए ट्रंप के भाषण से की छेड़छाड़, 5 साल बाद करतूत खुली: जानिए कैसे गलती मानने से बच रहा ब्रिटिश मीडिया, हरकत देख उठी लाइसेंस रद्द की माँग

ब्रिटिश मीडिया संस्थान BBC News अब आए दिन सवालों के घेरे में रहता है। कारण है उसका अपना नैरेटिव, जिसे आगे बढ़ाने के लिए मीडिया संस्थान तथ्यों के साथ छेड़छाड़ कर भ्रमित कंटेन्ट लोगों तक पहुँचाने को भी तैयार है। ऐसा ही कुछ हाल ही में BBC ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भाषण के साथ किया है, जिसे वॉशिंगटन डीसी के कैपिटल हिल्स में दंगा भड़काने को उकसाते हुए पेश किया गया।

पहली नजर में BBC के पैनोरामा प्रोग्राम के इस संपादित वीडियो को देखने में लगता है कि डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के कैपिटल हिल्स में भड़काऊ भाषण दे रहे हैं, जिसमें वह कहते हैं, “हम कैपिटल हिल्स तक चलेंगे और मैं वहाँ तुम्हारे साथ रहूँगा। और हम लड़ेंगे, हम जी-जान से लड़ेंगे।” BBC के संपादित वीडियो में ट्रंप के भाषण को तोड़-मरोड़ कर दिखाया, जो दर्शकों को गुमराह कराने का मकसद है। जबकि वीडियो की असलियत कुछ और है।

BBC के एडिटेड वीडियो कैसे हुए खुलासा?

खुद को निष्पक्ष बताने वाले BBC ने अपने संपादित वीडियो दिखाकर कैपिटल हिल्स में हुए दंगो की एकतरफा सच्चाई दिखाने की कोशिश की है। असलियत में यह वीडियो को BBC ने अपने नैरेटिव के मुताबिक एडिट किया है, जिसका सच अब दुनिया के सामने है। इसका खुलासा BBC में कथित पक्षपात पर 19 पन्नों के डोजियर में हुआ है, जिसे अक्टूबर 2025 में BBC के संपादकीय गाइडलाइंस एवं मानक समिति के पूर्व एक्सटर्नल एडवाइजर माइकल प्रेस्कॉट ने लिखा था। हाल ही में नवंबर 2025 में इस डोजियर को BBC बोर्ड को सबमिट किया गया है।

इस डोजियर में कहा गया है कि BBC के पैनोरामा प्रोग्राम में अमेरिकी राष्ट्रपति से ऐसी बातें कहलवाई गईं जो उन्होंने वास्तव में कभी नहीं कहीं। इसमें ट्रंप के भाषण की शुरुआत के फुटेज को उनके द्वारा लगभग एक घंटे बाद कही गई बातों के साथ जोड़ दिया गया है। डोजियर में कहा गया कि BBC के वरिष्ठ अधिकारियों और अध्यक्ष ने संस्था के अपने मानक निगरानी अधिकारी (Watchdog) द्वारा उठाई गई कई गंभीर शिकायतों को नजरअंदाज कर इसे खारिज कर दिया।

BBC के एडिटेड वीडियो पर अमेरिका से निकालने की धमकी?

अब दुनिया के सामने सच आने के बाद BBC की खूब आलोचना हुई। जिस निष्पक्षता का नैरिटिव बनाकर मीडिया संस्थान ने एडिटेड वीडियो चलाया, अब उसपर पक्षपात के आरोप लगे। यहाँ तक कि BBC को ‘फर्जी खबरें’ फैलाने वाला मीडिया संस्थान बताते हुए अमेरिका से बाहर निकालने की भी माँगे उठीं।

खुद अमेरिकी राष्ट्रपति के बड़े बेटे डोनाल्ड ट्रंप जूनियर ने भी BBC के एडिटेड वीडियो के जरिए फर्जी सूचना फैलाने पर गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, “ब्रिटेन में फर्जी समाचार ‘रिपोर्टर’ उतने ही बेईमान और बकवास से भरे हुए हैं, जितने यहाँ अमेरिका में हैं!!”

अमेरिका के कई मीडिया संस्थान ने भी BBC के एडिटेड वीडियो पर सवाल खड़े किए। यहाँ तक कि BBC को अमेरिका में रद्द करने की भी माँगे उठीं। अमरिकी मीडिया संस्थान GB News से जुड़े लियो हैरिस ने इसे ‘पागलपन’ कहते हुए लिखा, “BBC के ट्रंप-विरोधी वामपंथियों ने अमेरिकी चुनाव से एक हफ्ते पहले यह कार्यक्रम प्रसारित किया। लाइसेंस शुल्क रद्द करो।”

कोलिन वॉल्टर्स नाम के एक एक्स यूजर ने लिखा, “मैं राष्ट्रपति ट्रंप से आग्रह करता हूँ कि वे BBC को अमेरिका से बाहर निकाल दें और उन पर मुकदमा चलाएँ।”

क्या है BBC के एडिटेड वीडियो की असलियत?

BBC की यह वीडियो मीडिया संस्थान के पक्षपात नैरेटिव को दर्शाता है। कैपिटल हिल्स पर ट्रंप के भाषण को तोड़-मरोड़कर पेश करने से BBC ने अपने नैरेटिव को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। जबकि वीडियो की असलित कुछ और है। इस एडिटेड वीडियो की The Telegraph ने BBC के ही मुखबिर के हवाले से सबसे पहले पोल खोली है।

The Telegraph के अनुसार, BBC ने वीडियो में जो ट्रंप का भाषण दिखाया है, वह साल 2021 में हुए अमेरिकी चुनावों का है। BBC के एडिटेड वीडियो के नजरिए से देखें तो डोनाल्ड ट्रंप का कैपिटल हिल्स में हुए दंगों को भड़काने में हाथ है। जबकि असलियत में यह वीडियो ट्रंप के भाषण के दो हिस्सा का जुड़ाव है।

भाषण में डोनाल्ड ट्रंप पहले कहते हैं, “हम कैपिटल हिल्स तक चलेंगे और मैं वहाँ तुम्हारे साथ रहूँगा।” इसी भाषण में 54 मिनट बाद ट्रंप ने कहा, “और हम लड़ेंगे, हम जी-जान से लड़ेंगे।” एक ही समय पर दिए गए ट्रंप के इस भाषण के बीच के अंतराल को जोड़ दिया गया है, जिससे इस बयान को भडकाऊ का रूप दे दिया गया है।

असल में ट्रंप ने कहा था, “हम कैपिटल तक पैदल चलेंगे। और हम अपने बहादुर सीनेटरों, कॉन्ग्रेसियों और महिलाओं का उत्साहवर्धन करेंगे।” The Telegraph अपनी रिपोर्ट में लिखता है, “अमेरिकी चुनाव से एक सप्ताह पहले प्रसारित पैनोरमा कार्यक्रम में दर्शकों को ‘पूरी तरह से गुमराह’ किया गया।”

करतूत पर BBC ने क्या दी प्रतिक्रिया?

दुनिया के सामने BBC के एडिटेड वीडियो का सच उजागर होने के बाद मीडिया संस्थान ने प्रतिक्रिया दी। काफी हल्के शब्दों में संस्थान के बोर्ड सदस्यों ने मामले पर जाँच करने की बात कही। इस संबंध ने BBC ने एक लंबे-चौड़े आर्टकल में एडिटेड वीडियो की हिस्ट्री से लेकर जियोग्राफी तक बता दी। लेकिन न तो माफी माँगी और न ही वीडियो को डिलीट करने जैसे कोई आदेश दिए।

रिपोर्ट में BBC का एक प्रवक्ता कहता है, “हम लीक हुए दस्तावेजों पर टिप्पणी नहीं करते लेकिन जब BBC को फीडबैक मिलता है तो वह उसे गंभीरता से लेता है और उस पर सावधानीपूर्वक विचार करता है।” यहाँ BBC के पक्षपात वाले 19 पन्नों के डोजियर की बात की जा रही है, जिसके लीक होने से BBC के ‘फर्जीवाड़े’ का खुलासा हुआ।

BBC का ‘एथिकल जर्नलिज्म’ की आड़ में पक्षपात

इस घटना से BBC ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि ‘फेक न्यूज़’ फैलाने में उसकी कोई बराबरी नहीं। जो संस्था खुद को निष्पक्ष और विश्वसनीय बताने का दावा करती है, वही अपने एजेंडे के लिए सच्चाई को मरोड़ने से भी नहीं हिचकती। ट्रंप के भाषण को इस तरह तोड़-मरोड़कर पेश करना सिर्फ एक ‘एडिटिंग मिस्टेक’ नहीं बल्कि एक सुनियोजित नैरेटिव का हिस्सा है।

माइकल प्रेस्कॉट के 19 पन्नों वाले डोजियर ने BBC की पोल खोलकर रख दी है। BBC की ‘एथिकल जर्नलिज़्म’ की आड़ में पक्षपात, झूठ और प्रोपेगेंडा का जो जाल बुना गया है, वह अब दुनिया के सामने उजागर हो चुका है। लेकिन सबसे शर्मनाक बात यह है कि BBC ने न तो माफी माँगी, न ही किसी जिम्मेदारी का एहसास दिखाया। उल्टा ‘हम फीडबैक को गंभीरता से लेते हैं’ जैसी रटी-रटाई लाइन बोलकर खुद को बचाने की कोशिश की।

साफ है कि BBC अब पत्रकारिता नहीं, एजेंडा चलाने वाली संस्था बन चुकी है। जो दूसरों को फेक न्यूज फैलाने का पाठ पढ़ाती थी। आज वही अपने झूठ में बुरी तरह फँस गई है। जनता अब समझ चुकी है, ‘BBC के लिए अब एजेंडा ही असली धर्म है।’

खेसारी लाल यादव की मार्केट क्यों हो गई खराब? छपरा में RJD का बुरा हाल

बिहार चुनाव की सरगर्मी में छपरा पहुँची ऑपइंडिया टीम ने पाया कि भोजपुरी सुपरस्टार खेसारी लाल यादव की चमक फीकी पड़ गई है। RJD ने उन्हें टिकट दिया, लेकिन लोग कहते हैं, “ये तो पैराशूट से उतरे हैं, छपरा को जानते तक नहीं।”

एक दुकानदार बोले, “जंगलराज को अच्छा बता रहे हैं, लालू के समय की लूट-मार भूल गए क्या?” खेसारी के पुराने फैन भी नाराज हैं। एक युवक ने कहा, “फिल्मों में हीरो थे, अब वोट माँगने आए तो जंगलराज का बचाव कर रहे। सेलिब्रिटी स्टेटस सिर्फ रीलों तक था, रियल में फेल रहेगा सब।”

इस दौरान महिलाओं ने कहा कि खेसारी की बातों से आम जनता की बातें गायब है, वो सिर्फ स्टारडम बेच रहे। अनुराग मिश्रा की ग्राउंड रिपोर्ट में साफ है – छपरा में खेसारी की मार्केट डाउन होने से RJD को नुकसान पहुँच रहा है।

देखें छपरा से ग्राउंड रिपोर्ट

सिवान का ‘मसीहा’ या माफिया? शहाबुद्दीन की मौत के बाद भी जिंदा है डर

बिहार के सिवान में लालू यादव के जंगलराज के दौर में RJD के बाहुबली शहाबुद्दीन का खौफ इतना था कि लोग दिनदहाड़े काँपते थे। 2021 में कोविड से मौत के बाद भी उनके मुस्लिम समर्थक उन्हें गरीबों का मसीहा और देश का रक्षक बताते नहीं थकते। ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया कि प्रतापपुर गाँव में शहाबुद्दीन के घर के बाहर समर्थक जुटते हैं और उसके अपराधों को भूलकर तारीफ करते हैं।

एक समर्थक ने कहा, “साहेब ने गरीबों के लिए स्कूल-हॉस्पिटल बनवाए, ऊँची जातियों के गुंडों से मुस्लिमों को बचाया। वो देश के मसीहा थे।” जबकि हकीकत ये है कि शहाबुद्दीन पर हत्या, फिरौती, तेजाब डालने जैसे दर्जनों केस थे। उनके गुर्गों ने चंदा बाबू के बेटों को तेजाब से नहलाया था।

रिपोर्टर अनुराग मिश्रा से बातचीत में युवकों ने ओसामा (शहाबुद्दीन का बेटा) की जीत के लिए धमकी भरे अंदाज में कहा, “पोस्टर फाड़ने वालों को जिंदा जला देंगे।” आम लोग डरते हैं कि जंगलराज लौट रहा है, लेकिन समर्थक गुनाहों पर सफेदी पोत रहे हैं।

देखें ग्राउंड रिपोर्ट

भागलपुर में ‘I Love Muhammad’ पोस्टर विवाद: ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट के बाद पुलिस ने कार्रवाई कर मोहम्मद इफ्तेखाल को किया गिरफ्तार, हिंदुओं को निशाना बनाकर की गई थी हिंसा

बिहार के भागलपुर के हबीबपुर इलाके में ‘I Love Muhammad’ पोस्टर को लेकर भड़की सांप्रदायिक हिंसा के कुछ दिनों बाद पुलिस ने मुख्य आरोपित मोहम्मद इफ्तेखाल उर्फ शेखू को गिरफ्तार कर लिया है। शेखू, मोहम्मद कासिम का बेटा है और हबीबपुर थाना क्षेत्र के चामलीचक मोहल्ले का रहने वाला है।

यह गिरफ्तारी हबीबपुर थाने में दर्ज केस नंबर 188/25 के तहत की गई है, जो 22 अक्टूबर 2025 को दर्ज हुआ था। इस केस में भारतीय दंड संहिता की कई धाराएँ लगाई गई हैं, जिनमें 191(2)(3), 190, 126(2), 115(2), 109, 329(4), 324(4)(5), 299, 351(2)(3) और 352 शामिल हैं।

पुलिस के अनुसार, 20 और 21 अक्टूबर 2025 को स्टेशन रोड इलाके में एक दुकान पर जबरन ‘I Love Muhammad’ लिखा पोस्टर चिपकाने को लेकर विवाद बढ़ गया था। इस पोस्टर को लेकर स्थानीय लोगों ने आपत्ति जताई थी, जिसके बाद हिंसा भड़क उठी। पुलिस ने पहले ही इस मामले में तीन अन्य लोगों को गिरफ्तार किया था।

घटना के बाद DSP (टाउन) के नेतृत्व में एक विशेष जाँच टीम बनाई गई, जिसमें थानाध्यक्षों और सर्किल इंस्पेक्टरों को शामिल किया गया। इस टीम ने कई जगहों पर छापेमारी की और संदिग्धों से पूछताछ की। जाँच में पता चला कि इलाके में मजहबी नारों और संदेशों के जरिए माहौल को सांप्रदायिक बनाने की कोशिश की गई थी।

हबीबपुर, जहाँ मुस्लिम आबादी अधिक है, वहाँ हिंसा के दौरान हिंदू परिवारों और व्यापारियों को निशाना बनाए जाने की शिकायतें सामने आईं। कई दुकानदारों ने बताया कि उन्हें दुकानें बंद करने और कुछ मजहबी नारे लगाने के लिए मजबूर किया गया, ताकि उन पर हमला न हो।

फिलहाल इलाके में भारी पुलिस बल तैनात है और लगातार गश्त की जा रही है, ताकि दोबारा तनाव न बढ़े। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि हालात अब नियंत्रण में हैं, लेकिन जाँच जारी है और आगे और गिरफ्तारियाँ हो सकती हैं।

भागलपुर पुलिस ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है और कहा है कि किसी भी अफवाह या भड़काऊ संदेश पर विश्वास न करें, खासकर सोशल मीडिया पर फैल रही गलत सूचनाओं से बचें।

भागलपुर से ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट

भागलपुर के हबीबपुर इलाके में भड़की हिंसा के पीछे डर, अकेलेपन और लगातार हो रहे उत्पीड़न की दर्दनाक कहानी छिपी है। ऑपइंडिया की टीम जब घटनास्थल पर पहुँची, तो उन्हें एक ऐसे हिंदू परिवार की व्यथा सुनने को मिली जो अब मुस्लिम बहुल इलाके में लगभग अकेला रह गया है।

परिवार की मुखिया गौरी देवी ने अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि उनका परिवार पीढ़ियों से यहीं रह रहा है, लेकिन अब हालात ऐसे हो गए हैं कि उन्हें बार-बार घर बेचकर जाने की धमकियाँ दी जाती हैं। उन्होंने कहा, “हम तो यहीं के हैं, लेकिन 2013 से लगातार कहा जा रहा है कि घर बेच दो, यहाँ हिंदुओं की जगह नहीं है।”

गौरी देवी ने बताया कि साल 2022 में जब वे पूजा के लिए बाहर गई थीं, तब उनके घर पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी गई। करीब 9 लाख की संपत्ति जलकर खाक हो गई। उन्होंने कहा, “जब हमने घर फिर से बनाना शुरू किया, तो उन्होंने 10,000 या 20,000 रुपए माँगे, सिर्फ इसलिए कि हम दीवार खड़ी कर सकें। पैसे देने के बाद भी हम पर हमला करते रहे।”

उनकी बहू, जो सदमे में थी, उन्होंने बताया कि काली पूजा के दौरान जब उन्होंने काली माँ का बैनर लगाया, तो कुछ लोगों ने उसे फाड़ दिया और कहा, “यहाँ कोई हिंदू त्योहार नहीं मनाया जाएगा।”

उन्होंने बताया, “जब हमने विरोध किया, तो उन्होंने हमारे घर पर पत्थर फेंके। मेरी चाची के दाँत भी टूट गए।” यह कहानी हबीबपुर में एक हिंदू परिवार के उस संघर्ष को दिखाती है जो अपने ही घर में डर और असुरक्षा के साये में जीने को मजबूर है।

‘हम कैदियों की तरह रहते हैं’: हबीबपुर के साए में जीवन

हबीबपुर में गौरी देवी और उनका परिवार अब एक किले में रहने जैसी जिंदगी जी रहा है। उनका घर अब एक मजबूत चौकी की तरह बन गया है, चारों ओर सीसीटीवी कैमरे, लोहे के गेट और ऊँची दीवारें। गौरी देवी के बेटे ने बताया, “हमने अपने घर को किला बना लिया है। हर रात डर के साए में सोते हैं, बाहर जरा सी आवाज आती है तो दिल की धड़कन तेज हो जाती है।”

घर के पीछे बने एक छोटे से तहखाने की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, “अगर भीड़ जुटती है तो हम वहीं छिप जाते हैं। ये कोई आराम की जगह नहीं, बल्कि बचने की जगह है।”

उनका पुराना ढाबा, जो कभी सांप्रदायिक सह-अस्तित्व का प्रतीक था, अब बंद पड़ा है। गौरी देवी ने उदास होकर कहा, “उन्होंने धमकी दी, अगर फिर से खाना बेचा तो गोली मार देंगे। अब तो लोगों को खिलाना भी पाप हो गया है, सिर्फ इसलिए कि हम हिंदू हैं।”

हबीबपुर की गलियाँ तंग हैं और ज्यादातर इलाका मुस्लिम बहुल है। चारों ओर मस्जिदें और मजारें हैं और लगभग हर छत पर इस्लामिक झंडे लहराते हैं। ऐसे माहौल में जब कोई हिंदू घर दीवाली पर दीये जलाता है या काली पूजा की सजावट करता है, तो वो जैसे विरोध का प्रतीक बन जाता है।

गौरी देवी ने बताया, “जब हम अपने त्योहार मनाते हैं, तो हमें चिढ़ाते हैं। बच्चे पटाखे जलाते हैं तो वे छीन लेते हैं और कहते हैं, ‘तुम हिंदू बहुत हिम्मती हो गए हो।’ लेकिन ये हमारा घर है, हम क्यों छोड़ें?”

अक्टूबर 2025 में ‘I Love Muhammad’ पोस्टर के विवाद के बाद डर और बढ़ गया। उस रात तनाव के बीच एक भीड़ ने उनके घर पर पथराव किया। तब से यह परिवार लगातार भय में जी रहा है, चारों ओर धर्म के प्रतीक हैं, लेकिन उन्हें अपने धर्म का पालन करने की आजादी नहीं।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

राहुल गाँधी के ‘वोट चोरी’ प्रोपेगेंडा का निकला दम, जिन पोस्टल बैलट पर मचाया जोर उसका EC के डाटा से जानिए सच: हवा में तीर चला रहे नेता प्रतिपक्ष

राहुल गाँधी ने बुधवार (5 नवंबर 2025) को दावा किया कि हरियाणा विधानसभा चुनाव में जिन सीटों पर पोस्टल बैलट में कॉन्ग्रेस आगे थी, वहाँ वोट चोरी हुई क्योंकि फाइनल रिजल्ट में हार गए। उनका कहना था कि पोस्टल बैलट काउंटिंग में कॉन्ग्रेस कुछ सीटों पर बीजेपी से आगे थी, लेकिन ईवीएम वोटिंग के बाद बीजेपी जीत गई। अगर उनका दावा सही होता तो हर सीट पर यही होता। लेकिन सच इससे बहुत दूर है।

ऑपइंडिया ने हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 के सभी सीटों के फाइनल रिजल्ट चेक किए और पाया कि चार सीटें ऐसी थीं जहाँ बीजेपी पोस्टल बैलट में आगे थी लेकिन फाइनल में कॉन्ग्रेस से हार गई।

चुनाव आयोग की वेबसाइट के डेटा के मुताबिक जुलाना, हाथिन, नाँगल चौधरी और आदमपुर में बीजेपी पोस्टल बैलट में कॉन्ग्रेस से आगे थी। लेकिन अंत में पार्टी कॉन्ग्रेस से हार गई।

चुनाव आयोग द्वारा जारी डाटा का स्क्रीनशॉट

राहुल गाँधी के दावों पर विचार करते हुए सिर्फ वो उदाहरण चुनना जहाँ कॉन्ग्रेस पोस्टल बैलट में आगे थी और जहाँ पीछे थी उन्हें नजरअंदाज करना… जैसा राहुल गाँधी ने किया। यह दिखाता है कि पोस्टल बैलट फाइनल रिजल्ट एनालिसिस के लिए भरोसेमंद आधार नहीं हैं।

फाइनल रिजल्ट एनालिसिस के लिए भरोसेमंद आधार नहीं पोस्टल बैलट

अब जब राहुल गाँधी के दावे गलत साबित हो गए हैं, तो समझना जरूरी है कि पोस्टल बैलट को फाइनल रिजल्ट एनालिसिस का आधार क्यों नहीं बनाया जा सकता। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा, “दूसरी हैरान करने वाली बात यह थी कि हरियाणा में पहली बार पोस्टल वोट रिजल्ट से अलग थे। पोस्टल बैलट में कॉन्ग्रेस को 73 सीटें मिलीं जबकि बीजेपी को 17 सीटें।”

सबसे पहले ज्यादातर विधानसभा क्षेत्रों में पोस्टल बैलट की संख्या कुल वोटों की तुलना में बहुत कम होती है। ज्यादातर मामलों में यह 1% से भी कम होती है। इसलिए कुल रिजल्ट पर इनका कोई खास असर नहीं पड़ता जब तक जीत-हार का अंतर बहुत कम न हो।

उदाहरण के लिए गुहला सीट पर कुल पोस्टल बैलट 589 थे, जबकि ईवीएम वोट 1,33,287 थे, यानी पोस्टल बैलट सिर्फ 0.44% थे। कॉन्ग्रेस के देवेंद्र हंस ने 22,880 वोटों के अंतर से बीजेपी के कुलवंत राम बाजीगर को हराया। ऐसे सीटों पर पोस्टल बैलट का बड़ा रोल बताना बेवकूफी होगी।

उदाहरण के लिए गुहला सीट पर कुल पोस्टल बैलट 589 थे, जबकि ईवीएम वोट 1,33,287 थे, यानी पोस्टल बैलट सिर्फ 0.44% थे। कॉन्ग्रेस के देवेंद्र हंस ने 22,880 वोटों के अंतर से बीजेपी के कुलवंत राम बाजीगर को हराया। ऐसे सीटों पर पोस्टल बैलट का बड़ा रोल बताना बेवकूफी होगी।

तीसरे पोस्टल बैलट पहले गिने जाते हैं, लेकिन ये ग्राउंड लेवल वोटर टर्नआउट पैटर्न या बूथों पर देर से होने वाले उछाल को नहीं दिखाते जहाँ लोकल फैक्टर बहुत असर डालते हैं।

‘वोट चोरी’ की कहानी फर्जी

इन उदाहरणों और पोस्टल बैलट की प्रकृति को नजरअंदाज न करें। जिसमें राहुल गाँधी की ‘वोट चोरी’ कहानी सिर्फ कहानी ही लगेगी, न कि फैक्ट बेस्ड। वही डेटा पॉइंट्स जिनका वे जिक्र करते हैं, आसानी से उल्टा साबित करने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जिससे उनका तर्क आँकड़ों के आधार पर भी खोखला हो जाता है।

मूल रूप से ये खबर अंग्रेजी में प्रकाशित है। पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

रेप और ड्रग्स केस में घिरे रैपर को केरल सरकार ने किया सम्मानित, प्रकाश राज थे ज्यूरी के चीफ: बचाव पर भड़के आम लोग

केरल राज्य फिल्म पुरस्कारों की 55वीं घोषणा सोमवार (3 नवंबर 2025) को हुई, जिसमें रैपर हीरंदास मुरली ‘वेदन’ को सर्वश्रेष्ठ गीतकार (Best Lyricist) का पुरस्कार दिया गया। इस फैसले का सोशल मीडिया पर विरोध तेज हो गया है।

इस पुरस्कार का चयन जिस ज्यूरी ने किया, उसकी अध्यक्षता विवादित और हिंदू-विरोधी बयानों के लिए चर्चित अभिनेता प्रकाश राज ने की। वेदन को यह सम्मान फिल्म ‘मंजुम्मेल बॉयज’ के गीत ‘कुथंत्रम’ के लिए मिला है।

लेकिन उस पर बलात्कार और यौन शोषण के कई गंभीर आरोप हैं। मेडिकल छात्रा रही पीड़िता ने आरोप लगाया कि वेदन ने वित्तीय शोषण किया और कोच्चि व कोझिकोड में उसके साथ कई बार दुष्कर्म किया।

इन आरोपों के चलते अब लोगों ने पुरस्कार की नैतिकता और वैधता पर सवाल उठाए हैं, खासकर इसलिए क्योंकि पहले ऐसे मामलों में आरोपित कलाकारों को चयन प्रक्रिया से बाहर रखा जाता था।

प्रकाश राज ने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि समिति वेदन के गीतों में झलकती ऊर्जा और संघर्ष को अनदेखा नहीं कर सकती थी। उन्होंने कहा, “वेदन का संगीत आज की पीढ़ी की आवाज है। रैप विद्रोह और जज़्बे की आधुनिक अभिव्यक्ति है और उसे पहचान मिलनी चाहिए।”

इस बार की ज्यूरी में निर्देशक रंजन प्रमोद, जिबू जैकब, स्क्रीनराइटर संतोष एचिक्कनम, साउंड डिजाइनर नितिन लूकोस, प्लेबैक सिंगर गायत्री अशोकन और एक्ट्रेस व डबिंग आर्टिस्ट भाग्यलक्ष्मी शामिल थीं।

इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। कई यूजर्स ने राज्य सरकार और प्रकाश राज दोनों पर सवाल उठाते हुए नाराजगी जताई। लोगों ने पूछा कि जब राज्य की नीति के अनुसार किसी भी आपराधिक आरोप वाले व्यक्ति को पुरस्कार की दौड़ से बाहर रखा जाता है, तो फिर वेदन को नामांकित ही क्यों किया गया? नेटिजन्स ने इस निर्णय को पक्षपाती और अनैतिक बताते हुए कहा कि इससे पुरस्कारों की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है।

एक अन्य यूजर ने राज्य सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि वेदन को कोर्ट के फैसले से पहले ही सम्मान देना गलत संदेश देता है। उसने यह भी पूछा कि इस मामले में महिला अधिकारों की बात करने वाली फेमिनिस्ट कार्यकर्ता चुप क्यों हैं। यूजर का कहना था कि सरकार का यह कदम न्याय प्रक्रिया और महिलाओं की सुरक्षा के प्रति लापरवाही दर्शाता है।

एक यूजर ने दोहरा मापदंड (हिपोक्रेसी) पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब मलयालम फिल्म इंडस्ट्री की कई महिलाओं ने यौन शोषण के आरोपी वैरामुथु को सम्मान देने का विरोध किया था, तो फिर अब वेदन को पुरस्कार देने पर किसी ने प्रकाश राज से सवाल क्यों नहीं किया। यूजर ने कहा कि दोनों पर समान आरोप हैं, लेकिन इस बार सब चुप हैं, जो स्पष्ट पक्षपात दिखाता है।

एक व्यक्ति ने कहा कि कई महिलाओं के यौन शोषण से जुड़े आपराधिक मामले लंबित होने के बावजूद वेदान को सम्मान देना एक खतरनाक उदाहरण है। उसने नाराज़गी जताते हुए लिखा, “केरल सरकार को शर्म आनी चाहिए।”

एक यूजर ने लिखा कि रेप और एमडीएमए रखने के आरोप में हाल ही में गिरफ्तार रैपर वेदान को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार मिला, जबकि हिजाब पहनने वाली मुस्लिम अभिनेत्री को अपनी पहली फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का सम्मान दिया गया। यूजर ने आरोप लगाया कि इन पुरस्कारों में प्रतिभा से ज्यादा वामपंथी राजनीति का असर दिख रहा है।

कॉन्ग्रेस सांसद हिबी ईडन ने खुलकर रैपर वेदान का समर्थन किया, जबकि कई लोगों ने इस पर कड़ी नाराजगी और असहमति जताई। उनका कहना था कि यह फैसला समाज को गलत संदेश देता है। साथ ही, महिला संगठनों और फेमिनिस्ट समूहों पर भी आरोप लगाया गया कि वे इस मुद्दे पर जानबूझकर चुप्पी साधे हुए हैं।

वेदान का विवादास्पद इतिहास गंभीर आरोपों से जुड़ा है

पुलिस शिकायत के अनुसार, एक महिला ने रैपर वेदन पर 2021 से 2023 के बीच शादी का झांसा देकर यौन शोषण करने का आरोप लगाया। कोच्चि पुलिस ने बताया, “विशेष पूछताछ के बाद उसकी गिरफ्तारी दर्ज की गई है। हमारे पास डिजिटल सबूत भी हैं जो आरोपों की पुष्टि करते हैं।”

मामला एक महिला डॉक्टर की शिकायत से शुरू हुआ, जिसने कहा कि वेदन ने दोस्ती का नाटक किया, संबंध बनाए और फिर दो साल में पाँच बार शादी का वादा करके उसका यौन शोषण किया। उसने यह भी बताया कि वेदान ने गीत रिलीज करने के नाम पर उससे पैसे भी लिए।

वेदन कई हफ्तों तक पुलिस से बचता रहा, जिसके बाद देश छोड़ने से रोकने के लिए लुकआउट नोटिस जारी किया गया। उसके खिलाफ दो और महिलाओं ने भी ऐसे ही आरोप लगाए।

पहली महिला ने बताया कि वह संगीत पर शोध के दौरान वेदान से मिली थी, जिसने होटल में उसके साथ गलत हरकत की, जिससे वह मानसिक आघात के कारण अपना काम छोड़ने को मजबूर हुई। दूसरी महिला ने कहा कि वह अपने दोस्त के घर वेदान से मिली थी और उसके संगीत व राजनीतिक विचारों से प्रभावित होकर करीब आई, लेकिन बाद में वेदन ने कई बार उसका यौन शोषण किया।

इन सभी शिकायतों की कॉपी मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को ईमेल के जरिए भेजी गई। आरोपों के अनुसार, पहली घटना 2020 में और दूसरी 2021 में हुई थी। इसके अलावा, अप्रैल 2025 में वेदान को कोच्चि के वायटिला इलाके से गांजा रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। हिल पैलेस पुलिस की छापेमारी में लगभग 6 ग्राम गांजा बरामद हुआ।

पुलिस ने बताया कि वेदन ने ड्रग्स लेने की बात कबूल की है और मामूली मात्रा होने के कारण उसे स्टेशन बेल पर छोड़ा गया। सितंबर में पुलिस ने चार्जशीट अदालत में दाखिल की। एर्नाकुलम वन विभाग ने भी उसे बाघ के दाँत का लॉकेट पहनने के मामले में पकड़ा, जिसके लिए उसे दो दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया और कोडनाड मलयाटूर डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिस में पूछताछ की गई।

इसके अलावा, पलक्काड नगर परिषद की सदस्य वी एस मिनीमोल ने उस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपमान करने और जातीय भेदभाव फैलाने के आरोप में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने कहा, “वेदन ने प्रधानमंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक और असत्य बयान दिए हैं, जो देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं।”

वेदन ने 2020 में अपना करियर ‘वॉइस ऑफ द वॉइसलेस’ एल्बम से शुरू किया था और वह एंटी-कास्ट (जातिवाद विरोधी) रैप्स के लिए जाना गया। उसने कई स्वतंत्र गाने और फिल्मी गीत बनाए।

दिलचस्प बात यह है कि पुरस्कारों की घोषणा कुछ ही दिन बाद हुई, जब केरल हाईकोर्ट ने उसकी अग्रिम जमानत की शर्तें ढीली कीं, जिससे उसे विदेश में प्रदर्शन की अनुमति मिल गई। थ्रिक्कक्कारा पुलिस ने इस मामले में अंतिम रिपोर्ट भी जमा कर दी है। गौरतलब है कि हाल के समय में मलयालम फिल्म इंडस्ट्री (मॉलीवुड) में बलात्कार और यौन शोषण के गंभीर आरोपों ने पूरे उद्योग को हिला कर रख दिया है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

तमिलनाडु में हिंदुओं को अन्नदान के लिए जाना पड़ा HC, फिर भी सड़क जाम कर बैठे 500 ईसाई: स्टालिन प्रशासन ने भी इजाजत देने से किया था इनकार

तमिलनाडु में एक सार्वजनिक भूमि को लेकर विवाद बढ़ गया है, जिससे धार्मिक समुदायों के बीच तनाव पैदा हो गया है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब कोर्ट ने हिन्दू समुदाय को उस जमीन पर भोज आयोजित करने की अनुमति दी। इस फैसले से नाराज स्थानीय ईसाई समुदाय ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया।

डिंडीगुल में क्या हुआ?

तमिलनाडु के डिंडीगुल शहर में सोमवार (4 नवंबर 2025) को भारी अव्यवस्था देखने को मिली। पंचमपट्टी गाँव के ईसाई समुदाय के 500 से अधिक लोगों ने सड़क जाम कर बड़ा प्रदर्शन किया। उनका विरोध उस ‘अन्नदानम’ कार्यक्रम के खिलाफ था, जो सरकारी जमीन पर आयोजित किया जा रहा था।

यह अन्नदानम एक हिन्दू मंदिर के कुंभाभिषेक का हिस्सा था। प्रदर्शनकारियों ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ विरोध जताया, जिसमें हिन्दू समुदाय को इस भोज की अनुमति दी गई थी।

सुबह के समय सैकड़ों ईसाई पुरुष और महिलाएँ डिंडीगुल कलेक्टर कार्यालय के पास इकट्ठा हुए। वे कोर्ट के फैसले से नाराज थे और विरोध के रूप में अपने सरकारी पहचान पत्र जैसे आधार कार्ड और वोटर आईडी वापस करने की बात कह रहे थे।

प्रदर्शनकारियों ने कलेक्टर कार्यालय जाने वाले मुख्य मार्ग को जाम कर दिया और ज़िला प्रशासन के अधिकारियों के खिलाफ नारेबाज़ी की। हालात तनावपूर्ण हो गए, जिसके बाद कानून-व्यवस्था संभालने के लिए 100 से अधिक पुलिसकर्मियों को तैनात करना पड़ा।

बाद में डिंडीगुल के जिला कलेक्टर एस सरवनन और पुलिस अधीक्षक ए प्रदीप ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत की। बातचीत के बाद भीड़ शांत हो गई और प्रदर्शन वापस ले लिया गया।

हालाँकि मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। पुलिस ने बताया कि रविवार (2 नवंबर 2025) की रात कार्यक्रम स्थल पर काले झंडों के साथ हुए विरोध प्रदर्शन के मामले में 100 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है।

विवाद कैसे शुरू हुआ

यह घटना पंचमपट्टी गाँव से शुरू हुई, जहाँ स्थानीय हिन्दू समुदाय अपने मंदिर का कुंभाभिषेक समारोह आयोजित कर रहा था। इस पूजा के बाद वे सरकारी जमीन के एक खाली टुकड़े पर अन्नदानम करना चाहते थे। यह जमीन मंदिर और एक स्थानीय चर्च दोनों के पास ही स्थित है।

जब उन्होंने इसकी अनुमति माँगी, तो स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने मंजूरी देने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि इससे तनाव या कानून-व्यवस्था की समस्या हो सकती है।

इस फैसले को एक ग्रामीण ने अनुचित मानते हुए कोर्ट में चुनौती दी। मामला मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ में पहुँचा। पुलिस ने कोर्ट में दलील दी कि उन्होंने अनुमति इसलिए नहीं दी क्योंकि उन्हें कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका थी।

सार्वजनिक भूमि किसी एक धर्म के लिए आरक्षित नहीं

कोर्ट में यह मामला जस्टिस जी आर स्वामीनाथन के सामने आया। उन्होंने सबसे पहले यह पूछा कि जमीन का मालिकाना हक किसके पास है। जाँच में पता चला कि वह खाली जमीन ग्राममथम के रूप में दर्ज है, यानी यह पंचायत और सरकार की संपत्ति है।

इस आधार पर जस्टिस स्वामीनाथन ने फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि अगर जमीन सरकारी है, तो उसका उपयोग सभी समुदायों के लोग कर सकते हैं, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। उनके शब्दों में, “सार्वजनिक भूमि या तो सभी के लिए खुली होनी चाहिए या किसी के लिए नहीं।”

उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर कोई सार्वजनिक जगह सबके लिए खुली है, तो किसी एक समुदाय को केवल धर्म के आधार पर वहाँ से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है। साथ ही, उन्होंने कहा कि इस तरह का धार्मिक आयोजन करने का अधिकार अनुच्छेद 25 के अंतर्गत आता है।

जस्टिस ने पुलिस की कानून-व्यवस्था बिगड़ने वाली दलील को सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि पुलिस का कर्तव्य लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है न कि संभावित परेशानी से बचने के लिए कार्यक्रम पर रोक लगाना।

ईसाई समुदाय का तर्क

सुनवाई के दौरान ईसाई समुदाय की दलीलें भी सुनी गईं। उनका कहना था कि करीब 100 साल पहले मैदान के एक हिस्से में एक मंच बनाया गया था, जिसका उपयोग हर साल ईस्टर त्योहार के कार्यक्रमों के लिए होता है। परंपरागत रूप से इस जगह का इस्तेमाल केवल ईसाई समुदाय करता आया है और हिन्दुओं को यहाँ धार्मिक कार्यक्रम करने की अनुमति कभी नहीं दी गई।

उन्होंने 2017 की शांति समिति की बैठक का भी जिक्र किया, जिसमें यह तय किया गया था कि इस मैदान पर कोई नया कार्यक्रम नहीं होगा, सिर्फ वही आयोजन होंगे जो पिछले 100 सालों से होते आ रहे हैं। रविवार (2 नवंबर 2025) की रात हुए विरोध प्रदर्शन में भी यही माँग उठी थी कि इस जमीन को पाश्का ग्राउंड (ईस्टर ग्राउंड) कहा जाए, ताकि यह स्पष्ट हो कि यह ईसाई समुदाय की परंपरागत जगह है।

जस्टिस स्वामीनाथन ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि अगर ईसाई समुदाय को ईस्टर के लिए इस मैदान का उपयोग करने की अनुमति है, तो हिन्दू समुदाय को भी उसी जगह पर अन्नदानम करने से नहीं रोका जा सकता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब ईस्टर का कार्यक्रम हो, उस दिन मैदान का उपयोग केवल ईसाई समुदाय को ही करने दिया जाए।

जस्टिस ने यह भी बताया कि गाँव में लगभग 2,500 ईसाई परिवार और करीब 400 हिन्दू परिवार रहते हैं। उन्होंने कहा कि केवल ईसाई समुदाय के विरोध को कानून-व्यवस्था की समस्या बताना पुलिस की बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण सोच है। कोर्ट ने प्रशासन के इनकार वाले आदेश को रद्द कर दिया और अन्नदानम कार्यक्रम के लिए अनुमति देने के निर्देश दिए।

सरकारी जमीन पर अधिकार का सवाल

हाई कोर्ट का आदेश बिल्कुल स्पष्ट था, लेकिन उसके बाद हुए विरोध ने यह दिखा दिया कि दोनों समुदायों के बीच गहरा तनाव मौजूद है। इस घटना ने यह बड़ा सवाल खड़ा किया कि हिन्दू समुदाय को सिर्फ एक दिन का सामुदायिक अन्नदान सरकारी जमीन पर करने के लिए कोर्ट तक क्यों जाना पड़ा?

कोर्ट से अनुमति मिलने के बाद भी उन्हें बड़े पैमाने पर सड़क जाम और विरोध का सामना करना पड़ा। कई लोगों का कहना है कि यह एकाधिकार की मानसिकता का मामला है, जहाँ एक समूह सार्वजनिक संपत्ति को केवल अपना अधिकार मानता है।

असल बात यह है कि वह जमीन किसी चर्च की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि सरकारी भूमि है। सिद्धांत रूप में सरकारी जमीन देश के सभी नागरिकों की होती है, चाहे वे हिन्दू हों, ईसाई हों, मुसलमान हों या कोई और। जब तक कोई कार्यक्रम शांतिपूर्वक और दूसरों को बिना नुकसान पहुँचाए आयोजित किया जाता है, तब तक किसी भी समुदाय को इसका उपयोग करने का अधिकार है।

भारत जैसे विविधता भरे देश में जहाँ कई धर्म और समुदाय साथ रहते हैं, पारस्परिक सम्मान ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है। साथ ही, विरोध का तरीका भी सवालों में है। विरोध जताना सबका अधिकार है, लेकिन मुख्य सड़कों को जाम करना और आम जनता की आवाजाही रोकना गलत है। इससे आम लोग जो इस विवाद से जुड़े भी नहीं हैं सबसे ज्यादा परेशानी झेलते हैं।

ऐसा ही मामला: विशालगढ़ किले पर बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला

डिंडीगुल की घटना अपने आप में अकेली नहीं है। तमिलनाडु में ही एक और ऐसा मामला तिरुपरंकुंद्रम मुरुगन मंदिर पहाड़ी पर सामने आया था। यह पहाड़ी हिन्दुओं के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है, क्योंकि यह भगवान मुरुगन के छह प्रमुख तीर्थ स्थलों (अरुपदै वेडु) में से एक है।

विवाद 27 दिसंबर 2024 को शुरू हुआ, जब कुछ मुस्लिम श्रद्धालु सिखंदर बादूशा दरगाह जो इसी पहाड़ी पर स्थित है उस पर बकरों और मुर्गों की बलि देने के लिए उन्हें लेकर आए।

मंदिर प्रशासन और पुलिस ने उन्हें रोक दिया, यह कहते हुए कि इतने पवित्र स्थल के पास पशु बलि की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसके बाद करीब 20 मुसलमानों ने पहाड़ी के नीचे विरोध प्रदर्शन किया। यह मामला भी मद्रास हाईकोर्ट पहुँच गया।

जस्टिस विजयकुमार ने सरकारी और पुरातात्विक अभिलेखों की जाँच की, जो 1908 तक के थे। उन्होंने निर्णय दिया कि इस स्थल का आधिकारिक और ऐतिहासिक नाम तिरुपरंकुंद्रम हिल है। इसे सिखंदर मलै कहने की कोशिश को उन्होंने भ्रामक और पहचान बदलने की कोशिश बताया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दरगाह पर पशु बलि की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा साबित नहीं हुई। साथ ही कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम समुदाय को नेल्लीथोप्पु क्षेत्र के एक छोटे हिस्से में रमजान और बकरीद के दौरान नमाज अदा करने का अधिकार है, लेकिन वहाँ तक जाने वाली सीढ़ियाँ और पहाड़ी पर स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर मंदिर प्रशासन की संपत्ति हैं और उन्हें अवरुद्ध नहीं किया जा सकता।

हिंदू समुदाय के अधिकारों का हो रहा हनन

डिंडीगुल अन्नदान विवाद और तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी मामले को देखें तो एक स्पष्ट पैटर्न दिखाई देता है। दोनों ही घटनाओं में हिन्दू समुदाय के अधिकारों को चुनौती दी गई, डिंडीगुल में सार्वजनिक जमीन पर अन्नदान करने के अधिकार को और तिरुपरंकुंद्रम में पवित्र स्थल की पवित्रता की रक्षा के अधिकार को। डिंडीगुल में विरोध एक सामुदायिक भोज को लेकर हुआ, जबकि तिरुपरंकुंद्रम में पवित्र हिन्दू पहाड़ी पर पशु बलि देने की कोशिश की गई।

दोनों मामलों में हिन्दू समुदाय को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी। खास बात यह रही कि डिंडीगुल में कोर्ट का साफ आदेश आने के बाद भी बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ, जिससे यह साफ दिखता है कि जमीनी स्तर पर हालात अब भी बेहद नाजुक हैं।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट दिव्या भारती ने अंग्रेजी में लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

हिन्दुओं पर I Love Muhammad वालों का हमला, भागलपुर में हिन्दू अल्पसंख्यक?

बिहार में ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए ऑपइंडिया की टीम भागलपुर पहुँची। यहाँ ‘इस्लामी मोहल्ला’ खौफ की दास्तान सुना रहा था। इस गाँव में Muslims ने हिन्दुओं के एक घर पर हमला किया। यह इलाका मुस्लिम बहुल है। यहाँ आसपास सारे घरों पर हरे झन्डे हैं।

हिन्दू परिवार का इसी के चलते जीना मुहाल है। हाल ही में I Love Muhammad विवाद के दौरान एक हिन्दू घर को घेर कर पत्थर बरसाए गए। ऑपइंडिया इन्हीं पीड़ितों की कहानी लेकर आया है।

देखिए ग्राउंड रिपोर्ट

शहाबुद्दीन के गढ़ सिवान में AIMIM लगा रही सेंध, उसी के पुराने शूटर को टिकट देकर ओवैसी ने खींचा वोटबैंक: पुराने माफिया के समर्थक बौखलाए

आरजेडी के मुस्लिम माफिया शहाबुद्दीन के गढ़ सिवान में असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM अपने हाथ पैर पसार रही है। सिवान के मुसलमानों का कहना है कि वे आरजेडी के गमछे को पसीना पोंछने के लिए इस्तेमाल करते हैं।

वहीं शहाबुद्दीन के समर्थक इससे बौखलाए हुए दिखे और अपने प्रतिस्पर्धी को औकात दिखाने की बात करने लगे। एम-वाय राजनीति करनेवाली आरजेडी के हाथ से मुस्लिम वोट बैंक फिसलती नजर आती है।

देखें- सिवान से ग्राउंड रिपोर्ट

बेगूसराय में बोले लोग- PM मोदी और NDA सरकार ने बदली बिहार की सूरत: राहुल-INDI गठबंधन से फेरा मुँह, कहा- नहीं चाहिए जंगलराज

बिहार विधानसभा चुनाव में ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्टिंग की टीम बेगूसराय पहुँची। इस दौरान बेगूसराय की जनता ने साफ-साफ NDA को समर्थन दिया। चाय की टपरी से लेकर घर-घर तक लोग मोदी-नीतीश की तारीफ करते नहीं थक रहे। एक बुजुर्ग ने कहा, “सड़कें बनीं, बिजली आई, स्कूल-हॉस्पिटल सुधरे, पहले तो जंगलराज में डर लगता था।”

बेगूसराय में राहुल गाँधी और INDI गठबंधन पर कोई चर्चा नहीं होती। एक महिला ने हंसकर कहा, “राहुल जी तो वादे करते हैं, फिर गायब हो जाते हैं। RJD आया तो अपराध लौटेगा, हमें विकास चाहिए, डर नहीं।”

बिहार के बेगूसराय से ग्राउंड रिपोर्ट