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ममता बनर्जी का ‘दारू घोटाला’: 55 होलसेलर बाहर, चुनिंदा बिचौलियों की एंट्री; पढ़ें- कैसे WBSBCL मॉडल ने पैदा किया ‘शराब सिंडिकेट’

दिल्ली की पूर्व केजरीवाल सरकार की शराब नीति के बाद अब पश्चिम बंगाल की 2017 में लागू नई आबकारी नीति को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बवाल मचा हुआ है। राज्य की तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार ने वेस्ट बंगाल स्टेट बेवरेजेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (WBSBCL) का गठन किया गया।

एजेंसी ने राज्य के सभी 55 प्राइवेट शराब होलसेलर्स की जगह लेकर शराब वितरण पर सीधा राज्य का नियंत्रण स्थापित कर दिया। इसने वितरण और थोक विक्रेता दोनों के रूप में काम करने की कोशिश की, जिससे सप्लाई चेन प्रभावित हुआ। खुदरा विक्रेताओं और उपभोक्ताओं से ज्यादा पैसे वसूले गए।

दरअसल टीएमसी सरकार के कार्यकाल में हुए राज्य में शराब व्यापार से जुड़ी एक रिपोर्टें सामने आई है। इसमें उत्पाद शुल्क विभाग के एक गोपनीय दस्तावेज से पता चलता है कि शराब वितरण नेटवर्क का इस तरह से पुनर्गठन किया गया था, जिससे कुछ खास प्राइवेट शराब विक्रेताओं को लाभ हुआ और इस तरह सिस्टम काम कर रहा था, जिससे उनका एकाधिकार स्थापित हुआ।

रिपोर्ट से पता चलता है कि 2017 में शराब वितरण नीति में टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के इशारे पर ये बदलाव किए गए।

ऑपइंडिया को एक रिपोर्ट की कॉपी मिली है, जिसमें दावा किया गया है कि नए सिस्टम में धीरे-धीरे थोक वितरण के पुराने मॉडल को खत्म कर दिया गया। उसकी जगह ऐसी व्यवस्था की गई जिससे चुनिंदा बिचौलियों की शराब वितरण के सिस्टम में एकाधिकार हो गया।


इससे पता चलता है कि जिसे आधिकारिक तौर पर शराब वितरण को सुव्यवस्थित करने के लिए एक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया था, वह वास्तव में निजी बोतलबंद शराब विक्रेताओं और शराब निर्माताओं से पैसा वसूलने का एक सिस्टम बन गया।

आबकारी विभाग ने जो रिपोर्ट तैयार की उसमें इन बदलावों का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में लागू हुए राज्य की नई आबकारी नीति के बाद शराब निर्माताओं से उपभोक्ताओं तक पहुँचने के तरीका बदल गया। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि मुक्त प्रतिस्पर्धा और विकेंद्रीकृत वितरण के पारंपरिक सिद्धांतों को एक कड़े नियंत्रण वाले नेटवर्क से बदल दिया गया, जिसने कुछ चुनिंदा वितरकों के हाथों में पूरा सिस्टम आ गया।

टीएमसी ने शराब वितरण की पूरी प्रक्रिया को सेंट्रलाइज कर दिया

रिपोर्ट में एक चार्ट दिखाया गया है, जो बताता है कि शराब उत्पाद पारंपरिक रूप से बाजार में कैसे पहुँचते थे और पिछली ममता सरकार के तहत पश्चिम बंगाल में यह प्रणाली कैसे विकसित हुई।

(रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट)

यह चार्ट निर्माता के गोदाम यानी ‘मदर गोदाम’ से शुरू होता है, जहाँ से उत्पाद कैरिंग एंड फॉरवर्डिंग एजेंसी (C&FA) को भेजे जाते हैं। C&FA माल को सिस्टम में आगे बढ़ने से पहले भंडारण और लॉजिस्टिक्स केंद्र के रूप में कार्य करती है।

वहाँ से उत्पाद आमतौर पर वितरकों या सुपर स्टॉकिस्टों को आपूर्ति किए जाते हैं। ये वितरक कंपनी के अधिकृत व्यावसायिक भागीदार होते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उत्पाद विभिन्न क्षेत्रों में खुदरा विक्रेताओं और थोक विक्रेताओं तक कैसे पहुँचे।

यह चार्ट दर्शाता है कि वितरक, निर्माताओं और खुदरा विक्रेताओं के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। वे बिक्री टीमों का प्रबंधन करते हैं, बाजार से ऑर्डर प्राप्त करते हैं, स्टॉक की आवाजाही को संभालते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उत्पाद सभी खुदरा दुकानों पर उपलब्ध हों। कई उद्योगों में, वितरक खुदरा विक्रेताओं और थोक विक्रेताओं को लोन भी मुहैया कराते हैं, जिससे बाजार में नकदी की कमी नहीं होती है।

थोक विक्रेता इस सिस्टम में एक और अहम कड़ी हैं। वे वितरकों से थोक में उत्पाद खरीदते हैं और फिर उनको खुदरा विक्रेताओं तक छोटी-छोटी खेप में पहुँचाते हैं। छोटे विक्रेताओं का लाभ खरीद मूल्य और उपभोक्ताओं को बेचने के मूल्य में अंतर से मिलता है।

एक बाजार के निर्माण में निर्माता, वितरक, थोक विक्रेता और खुदरा विक्रेता सबकी अलग-अलग भूमिकाएँ होती हैं। कई बार वितरकों और थोक विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा का फायदा भी बाजार को मिलता है।

रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में किए गए बदलावों ने वितरण व्यवस्था पर एक छोटे- से ग्रुप का कब्जा हो गया। प्रतिस्पर्धा कम हो गया और उनका एकाधिकार होने से ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने का उन्हें अवसर मिला। इसकी वजह से पारंपरिक बाजार सिद्धांतों को काफी नुकसान हुआ।

वितरक और थोक विक्रेता क्यों महत्वपूर्ण हैं?

रिपोर्ट में वितरकों और थोक विक्रेताओं के बीच अंतर को विस्तार से बताया गया है। वितरक आम तौर पर निर्माताओं के साथ समझौते करते हैं और आधिकारिक चैनल पार्टनर के रूप में कार्य करते हैं। वितरक न केवल उत्पादों की बिक्री के लिए बल्कि उनकी मार्केटिंग, आपूर्ति नेटवर्क के रखरखाव और बाजार तक पहुँच के लिए भी जिम्मेदार होते हैं। वे आमतौर पर बड़े क्षेत्रों में काम करते हैं और खुदरा विक्रेताओं, थोक विक्रेताओं और कभी-कभी सीधे उपभोक्ताओं से भी संपर्क करते हैं।

दूसरी ओर, थोक विक्रेता मुख्य रूप से बड़ी मात्रा में उत्पाद खरीदते हैं और उन्हें खुदरा विक्रेताओं को बेचते हैं। वे मध्यस्थ के रूप में कार्य करते हैं ,जिनका उद्देश्य भंडारण, प्रबंधन और थोक खरीद के माध्यम से लाभ कमाना होता है। वितरक आमतौर पर वितरण से जुड़े व्यावसायिक जोखिमों को वहन करते हैं, जबकि थोक विक्रेता माल की आवाजाही पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में लागू किए गए शराब वितरण सुधारों ने इन भेदों को धुंधला कर दिया और एक ऐसा मॉडल तैयार किया, जो स्थापित व्यावसायिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था।

2017 में सरकार द्वारा नियंत्रित वितरण संरचना में बदलाव

2017 को पश्चिम बंगाल स्टेट बेवरेजेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (डब्ल्यूबीएसबीसीएल) का गठन हुआ, जो एक सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी थी और जिसने राज्य में पैकेटबंद शराब के थोक वितरण का कार्यभार संभाला। डब्ल्यूबीएसबीसीएल के माध्यम से ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी सरकार ने शराब के कारोबार में कदम रखा।

(रिपोर्ट से लिया गया स्क्रीनशॉर्ट)

डब्ल्यूबीएसबीसीएल के अस्तित्व में आने से पहले, थोक वितरण का काम बड़े पैमाने पर 1909 के बंगाल उत्पाद शुल्क अधिनियम के तहत संचालित निजी लाइसेंस धारकों द्वारा किया जाता था। ये निजी थोक विक्रेता निर्माताओं से उत्पाद खरीदते थे और उन्हें पूरे राज्य में खुदरा विक्रेताओं को आपूर्ति करते थे।

डब्ल्यूबीएसबीसीएल के गठन के बाद निगम शराब खरीदने वाला और वितरण करने वाला दोनों बन गया। इसने पंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं से शराब खरीदना शुरू किया और इसे पूरे पश्चिम बंगाल में लगभग 5200 खुदरा दुकानों को बेचना शुरू किया।

बंगाल उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 20 के तहत शराब की बिक्री के लिए लाइसेंस अनिवार्य है, लेकिन विदेशी शराब क्षेत्र के कई आपूर्तिकर्ता कथित तौर पर लाइसेंस प्राप्त विक्रेताओं के बजाय केवल पंजीकृत ब्रांड मालिक या आयातक के रूप में काम कर रहे थे। इसके बावजूद उन्हें निगम को उत्पाद बेचने और बिल जारी करने की अनुमति दी गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, इससे ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई, जो अधिनियम की भावना के विपरीत थी।

खुदरा विक्रेताओं और निर्माताओं ने शिकायत क्यों की?

रिपोर्ट में नए मॉडल से उत्पन्न होने वाले कई परिचालन और वित्तीय गड़बड़ियों के बारे में बताया गया है।

एक अहम शिकायत ऋण सुविधाओं के अभाव से संबंधित थी। पूर्व की निजी थोक प्रणाली के तहत खुदरा विक्रेताओं को अक्सर उधार पर उत्पाद प्राप्त होते थे। इससे उन्हें बड़ी अग्रिम राशि का भुगतान किए बिना स्टॉक बनाए रखने की सुविधा मिलती थी।

डब्ल्यूबीएसबीसीएल के अधिग्रहण के बाद खुदरा विक्रेताओं को कथित तौर पर खरीद की पूरी लागत अग्रिम रूप से चुकानी पड़ी। चूँकि शराब के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) का लगभग 70-80% हिस्सा करों और शुल्कों का होता है, इसलिए इससे खुदरा विक्रेताओं पर वित्तीय बोझ काफी बढ़ गया।

रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि इस बदलाव के कारण सप्लाई चेन में पूँजी की कमी हुई। छोटे खुदरा विक्रेता विशेष रूप से प्रभावित हुए, क्योंकि उन्हें अब लोन से मदद नहीं मिल रही थी, बल्कि ज्यादा निवेश करना पड़ रहा था। इसकी वजह से बाजार में कथित तौर पर गिरावट आई और राजस्व प्रभावित हुआ।

भंडारण से जुड़ी समस्या

रिपोर्ट में निगम के भंडारण और लॉजिस्टिक्स बुनियादी ढाँचे को लेकर सवाल किए गए। रिपोर्ट के अनुसार, WBSBCL राज्य भर में दर्जनों डिपो संचालित करता था, जिनमें देसी शराब, विदेशी शराब और बीयर के डिपो शामिल थे। हालाँकि इनमें से कई डिपो अस्थायी थे और उनमें अग्नि सुरक्षा सहित दूसरी सुविधाएँ नहीं थी।

माल लादने और उतारने का काम अक्सर स्थानीय मजदूर करते थे, जिससे लागत में अंतर और परिचालन में दिक्कत होती थीं। रिपोर्ट में आगे यह भी कहा गया है कि स्थानीय गिरोह इन गतिविधियों पर ‘नजर’ रखते थे।

इन्वेंट्री प्रबंधन भी एक प्रमुख मुद्दा बन गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि निगम अक्सर ‘फर्स्ट इन, फर्स्ट आउट’ (एफआईएफओ) सिद्धांत का पालन करने में विफल रहा, जिसके परिणामस्वरूप स्टॉक पुराना हो गया और भंडारण संबंधी जटिलताएँ पैदा हुईं।

गोदामों में जगह की कमी के कारण आपूर्ति की मंजूरी पर प्रतिबंध लग गए, खासकर त्योहारों और ऐसे वक्त पर जब शराब की खपत आमतौर पर बढ़ जाती है।

रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि प्रतिस्पर्धी निजी वितरण नेटवर्क के दौरान ऐसी दिक्कत पैदा नहीं होती थी। डब्ल्यूबीएसबीसीएल ने एक साथ वितरक और थोक विक्रेता दोनों के रूप में कार्य करने का प्रयास किया। रिपोर्ट के अंत में कहा गया है कि सरकारी निगम की संरचना व्यावसायिक नहीं थी।

जाँच के निष्कर्ष में ये बताया गया है कि डब्ल्यूबीएसबीसीएल ने वितरक और थोक विक्रेता दोनों के रूप में एक साथ काम करने का प्रयास किया, जबकि उसने इन दोनों भूमिकाओं से जुड़े व्यावसायिक जोखिमों को नहीं उठाया।

रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि चूँकि निगम निजी वितरक की तरह शराब को बढ़ावा नहीं दे सकता था, इसलिए निर्माताओं को अलग-अलग प्रचार एजेंटों को नियुक्त करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इसी प्रकार, उन्हें माल के लिए स्वतंत्र ट्रांसपोर्ट एजेंटों पर निर्भर रहना पड़ता था। इससे ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई, जिसमें निर्माता कई ऐसी संस्थाओं पर निर्भर थे, जो न तो वितरण चैनल से जुड़ी हुई थी और न ही पारंपरिक शराब व्यापार ढाँचे के तहत सीधे तौर पर जवाबदेह थीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि सप्लाई चेन को आसान बनाने के बजाय इस सिस्टम ने और इसे जटिल बना दिया।

मोनोपॉली की शुरुआत

रिपोर्ट के अनुसार, डब्ल्यूबीएसबीसीएल के आने से हालात बदल गए। नई नीति के माध्यम से टीएमसी सरकार ने शराब निर्माताओं और बॉटलर्स को बाध्य किया कि वे केवल WBSBCL के नियुक्त वितरकों के माध्यम से ही व्यापार करें। व्होलसेलर्स की जगह आए नए वितरकों पर आरोप लगे कि वे बॉटलर्स से अनुचित दरें वसूलते थे। प्रत्येक क्रेट पर गोडाउन रेंटल (₹4) और ट्रांसपोर्ट कॉस्ट (₹3) के नाम पर भारी रकम वसूली गई।

रिपोर्ट्स के अनुसार, वितरकों को मिलने वाले मुनाफे का एक हिस्सा राज्य के राजस्व खाते में जाने के बजाय कथित तौर पर टीएमसी नेताओं को जाता था। रिपोर्ट के हवाले से आरोप लगाए गए कि यह पूरी अवैध वसूली सिंडिकेट के जरिए सीधे तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी के करीबी परिसरों, जैसे- 9, कैमक स्ट्रीट, कोलकाता तक पहुँचाई जाती थी।

रिपोर्ट के अनुसार, “विकेंद्रीकृत व्यवसाय, निष्पक्ष व्यापार प्रथाओं, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और बहु-आपूर्ति बिंदुओं की अवधारणा ने एकाधिकारवादी व्यवसाय मॉडल को जन्म दिया।”

बोतल बनाने वाली कंपनियों पर सिस्टम में शामिल होने का दबाव

रिपोर्ट और संबंधित विवरणों में यह भी दावा किया गया है कि नई व्यवस्था का विरोध करने वाले बोतल निर्माताओं को काफी दबाव का सामना करना पड़ा। इसका उदाहरण अक्सर आईएफबी एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड के रूप में दिया जाता है। कंपनी ने उत्पाद शुल्क विभाग के अधिकारियों को कई पत्र लिखकर गैरकानूनी हस्तक्षेप और दबाव को लेकर चिंता व्यक्त की।

एक पत्र में, कंपनी ने कहा कि उसने ‘कुछ उत्पाद शुल्क अधिकारियों द्वारा अवैध हस्तक्षेप’ के संबंध में बार-बार चिंता व्यक्त की थी, जो उनसे गैरकानूनी माँग पूरा नहीं करने पर परेशान कर रहे थे।

कंपनी ने आगे अनुरोध किया कि इस तरह की गतिविधियों में शामिल अधिकारियों के खिलाफ जाँच की जाए और कार्रवाई की जाए।

कंपनी ने लिखा, हमें पूरा विश्वास है कि आपने उठाए गए मुद्दों पर आवश्यक जाँच की होगी। हम आपसे अनुरोध करते हैं कि कृपया जाँच में मिले तथ्यों और इस तरह की गतिविधियों में शामिल अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई को हमारे साथ साझा करें।

पत्र में लिखा था, “इसके अतिरिक्त, हम आपके ध्यान में लाना चाहेंगे कि हमारे पूर्व पत्रों में उठाए गए मुद्दों और जैसा कि पहले ही सूचित किया जा चुका है, यह व्यवस्था पूरी तरह से आपके निर्देशों के आधार पर की गई है, और जिसके तहत हमें इस संबंध में आपके द्वारा की गई गतिविधियों के बारे में नई सरकार को सूचित करने के लिए कदम उठाने पड़े हैं,”

रिपोर्ट में उन 5 अधिकारियों के नाम बताए गए हैं जो डब्ल्यूबीएसबीसीएल के गठन की दिशा में नीतिगत ढाँचे को तैयार करने में शामिल थे। इनमें पूर्व विशेष आयुक्त (राजस्व) और महाप्रबंधक (संचालन) गौतम घोष, वरिष्ठ संयुक्त आयुक्त शांतनु आचार्य, उपायुक्त संचयन गांगुली, अतिरिक्त आयुक्त राजर्षि चक्रवर्ती और विशेष आयुक्त कुनास बिस्वास शामिल थे।

इन अधिकारियों ने नई नीति संरचना को तैयार करने और उसे मंजूरी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रिपोर्ट में सबसे गंभीर आलोचना दो स्तरीय उत्पाद शुल्क संग्रह प्रणाली की शुरुआत से जुड़ा है।

पहले, शुल्क का संग्रह मुख्य रूप से विनिर्माण चरण में होता था, जिसे आम तौर पर राजस्व संग्रह का सबसे सुरक्षित और सबसे कुशल तरीका माना जाता है। नए मॉडल में शुल्क संग्रह को विनिर्माण चरण और वितरक चरण के बीच विभाजित किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, इसके परिणामस्वरूप राजस्व प्राप्ति में देरी हुई और वितरण नेटवर्क में व्यवधान उत्पन्न हुआ, क्योंकि वितरक अक्सर अतिरिक्त शुल्क वक्त पर जमा करने में विफल रहते थे। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि इससे न केवल प्रणाली जटिल हो गई बल्कि राजस्व दक्षता भी कमजोर हो गई।

दरअसल आबकारी विभाग की गोपनीय रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल में शराब वितरण नेटवर्क के विकास का विस्तृत और विवादास्पद विवरण प्रस्तुत किया गया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे 2017 के बाद पूर्व टीएमसी सरकार के शासनकाल में प्रतिस्पर्धी थोक मॉडल से यह एक कड़े नियंत्रण वाली प्रणाली में परिवर्तित हो गया।

रिपोर्ट के निष्कर्षों के केंद्र में एकाधिकार, अत्यधिक नियंत्रण, परिचालन संबंधी अक्षमता और निर्माताओं और बोतलबंद विक्रेताओं से जबरन वसूली करने वाली वसूली शामिल है। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि डब्ल्यूबीएसबीसीएल के गठन ने पारंपरिक वितरण चेन को बदल दिया गया, जिससे विकेंद्रीकृत प्रतिस्पर्धा की जगह एक ऐसी संरचना बन गई, जिसने शक्ति को कुछ बिचौलियों के हाथों में केंद्रित कर दिया।

इसमें आगे कहा गया है कि इस मॉडल ने न केवल व्यवसायों और खुदरा विक्रेताओं के लिए लागत बढ़ाई, बल्कि शराब व्यापार पर राजनीतिक और नौकरशाही हस्तक्षेप के अवसर भी पैदा किए।

(यह मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

चाँदनी कुरैशी के ‘जिम जिहाद’ का शिकार बना करोड़पति हिंदू कारोबारी का बेटा: रहमान बना किया निकाह, पीड़ित पिता बोले- पूरे परिवार को मुस्लिम नहीं बनने पर हत्या की दे रहे धमकी

उत्तर प्रदेश के शामली जिले से धर्म परिवर्तन और ‘जिम जिहाद’ का मामला सामने आया है। यहाँ जिम ट्रेनर चाँदनी कुरैशी ने करोड़पति दवा कारोबारी के 27 साल के बेटे को ब्रेनवॉश कर धर्म परिवर्तन करवा दिया। जाट परिवार से ताल्लुक रखने वाले युवक आयुष मलिक को मुस्लिम बना दिया गया। उसका नाम बदलकर रहमान रख दिया और हुलिया भी मुस्लिम जैसा करवा दिया गया। अब आयुष की दाढ़ी बढ़ी हुई है, वह सफेद टोपी पहनने लगा है। आसपास के लोगों का कहना है कि अब वह नमाज अदा भी करता है।

इस मामले में आयुष के पिता दवा कारोबारी देवराज मलिक ने पुलिस से शिकायत की है। शिकायत में बताया कि पिछले 5 साल से लगातार आयुष से चाँदनी और उसका परिवार भी आयुष से मोटी रकम हड़प चुका है, इसी पैसों से वो अपना घर भी बनवा चुके हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, साजिश के तहत कारोबारी के बेटे आयुष को फँसाया गया है, इसके पीछे पाकिस्तानी कनेक्शन भी सामने आया है। मामले का खुलासा बघरा स्थित योग साधना यशवीर आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी यशवीर महाराज के वीडियो के बाद हुआ है।

स्वामी यशवीर महाराज की वीडियो के बाद हिंदू संगठन ने विरोध शुरू किया। हिंदू संगठन ने दवा कारोबारी देवराज मलिक के घर जाकर मामले का संज्ञान लिया। इस पर देवराज मलिक ने बताया कि उनका परिवार सनातनी है और हिंदू रीति-रिवाज ही मानता है। उन्होंने बताया कि लेकिन उनके बेटे को जिम ट्रेनर चाँदनी ने फँसाकर मुस्लिम बना दिया है। फिर हिंदू संगठन की सहायता से उन्होंने शनिवार (06 जून 2026) को पुलिस थाने में 3 मौलवियों समेत 10 लोगों पर FIR दर्ज करवाई। ऑपइंडिया के पास FIR की कॉपी मौजूद है।

जिम में कारोबारी के बेटे को साजिश के तहत प्रेमजाल में फँसाया

यह मामला शामली के सदर कोतवाली क्षेत्र का है। यहाँ दयानंद नगर में रहने वाले दवा कारोबारी और जिला केमिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष देवराज मलिक अपने परिवार के साथ रहते हैं। परिवार में एक बेटी की शादी नोएडा में हुई है। वहीं 27 साल के इकलौते बेटे आयुष मलिक ने ‘बी-फार्मा’ की पढ़ाई कर अपना मेडिकल स्टोर चलाता है।

पाँच साल पहले आयुष ने ‘कुरैशी प्लस’ जिम जाना शुरू किया। इसी जिम में कुरैशी बस्ती की रहने वाली 25 साल की चाँदनी कुरैशी ट्रेनर है। आयुष के पिता देवराज ने FIR में बताया कि चाँदनी ने साजिश के तहत उनके बेटे को प्रेमजाल में फँसाया और फिर धर्म परिवर्तन के लिए ब्रेनवॉश किया। पिता ने कहा कि बेटे को मुस्लिम बनने के लिए मजबूर किया गया।

फर्जी निकाहनामा दिखाकर कारोबारी के बेटे से मोटी रकम हड़पी

आयुष के पिता का आरोप है कि करीब 4 साल पहले चाँदनी और उसके परिवार ने चोरी-छिपे आयुष से निकाहनामा पढ़वा लिया था। इसके बाद आयुष का नाम बदलकर ‘रहमान’ रख दिया गया। पिता देवराज ने इस निकाहनामे को फर्जी बताया है और कहा कि इसे दिखाकर आरोपितों ने उनके बेटे से मोटी रकम हड़पी है और ब्लैकमेल कर अपनी बातें मनवाई हैं।

(फोटो: FIR की कॉपी)

पिता ने आरोप लगाया कि चाँदनी और उसका परिवार पिछले 5 सालों से उनके बेटे की कमाई ऐंठ रहे हैं और उस पैसे से अपना घर भी बना चुके हैं। पिता का कहना है कि बेटे के पैसों से चाँदनी और उसका परिवार ऐशो-आराम की जिंदगी जी रहे हैं।

दाढ़ी बढ़वाई और सफेद टोपी पहनी, आयुष ने रखा रहमान वाला हुलिया

पिछले 6 महीनों से आयुष का रहन-सहन ‘रहमान’ जैसा हो गया है। वह मुस्लिम तौर-तरीकों को मानने लगा है। यहाँ तक कि वह अपना हुलिया भी मुस्लिम की तरह बना चुका है। आयुष ने दाढ़ी बढ़वा ली है। उसको सफेद टोपी और कुर्ता-पायजमा पहनकर देखा गया है। इसी हुलिये में वह मेडिकल स्टोर पर बैठता है।

आयुष की एक तस्वीर भी सामने आई है। इसमें वह मस्जिद में नमाज पढ़ते नजर आ रहा है। मेडिकल स्टोर की भी एक तस्वीर देखी गई है, जिसमें वह सफेद टोपी और कुर्ता-पायजामा पहने हुए हैं। आयुष के बदलते व्यवहार से परिजन परेशान हैं। आयुष के पिता ने कहा है कि बेटे को मानसिक रूप से प्रभावित किया गया है।

धर्म परिवर्तन के मामले में ‘पाकिस्तानी कनेक्शन’

पुलिस की जाँच में पूरे मामले का पाकिस्तानी कनेक्शन भी सामने आया है। पुलिस के मुताबिक, आयुष का ब्रेनवॉश करने के लिए उसे इस्लामी कट्टरपंथ से जोड़ा गया था। उसके मोबाइल पर कट्टरपंथी वक्ता डॉ. इसरार अहमद के यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब कराया गया था। आयुष को लगातार डॉ. इसरार अहमद का कट्टरपंथी जहर सुनाया जाता था, जिससे उसकी सोच इस्लाम के प्रति प्रभावित होने लगी।

आयुष के कारोबारी पिता ने बाहरी सहायता के लगाए आरोप, संपत्ति हड़पने की जताई चिंता

कारोबारी पिता ने यह भी कहा कि आरोपितों ने आयुष के साथ-साथ उनके परिवार के अन्य सदस्यों का भी धर्म परिवर्तन करने का दबाव बनाया। पुलिस से शिकायत में पिता ने चिंता जताई है कि भविष्य में आरोपितों द्वारा उनकी संपत्तियों पर कब्जा किया जा सकता है। इतना ही पिता ने आरोप लगाया कि उन्हें इन इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा जान से मारने की धमकियाँ दी गईं इसीलिए उन्हें और उनके परिवार को जान का भी खतरा बना हुआ है।

(फोटो: FIR की कॉपी)

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चाँदनी और उसका परिवार अकेला नहीं है। इस हरकत में पूरा नेटवर्क जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि उन्हें बाहरी लोगों से सहायता मिल रही है। हालाँकि, कारोबारी पिता ने किसी भी अन्य संगठन का नाम नहीं लिया है। पुलिस से शिकायत करते हुए पिता ने आरोपितों से सुरक्षा और सख्त कानूनी कार्रवाई की माँग की है।

3 मौलवियों समेत 10 लोगों के खिलाफ FIR

आपबीती सुनाते हुए कारोबारी देवराज मलिक ने मुस्लिम बन चुके बेटे आयुष के लिए न्याय की माँग की है। इसी के साथ उन्होंने काजीवाड़ा मोहल्ले की रहने वाली जिम ट्रेनर चाँदनी कुरैशी, उसकी बहन राहिल कुरैशी, सुमाईला कुरैशी, राबिया कुरैशी, भाई आस मोहम्मद, हुमा कुरैशी, उसके अब्बा इस्लाम कुरैशी, मौलवी सलीम, मुनव्वर और एक अज्ञात के खिलाफ FIR दर्ज करवाई है।

(फोटो: FIR की कॉपी)

पिता ने कहा कि वह सनातनी हैं और उनका पूरा परिवार हिंदू धर्म ही मानता है। उनका कहना है कि वे रोजाना हनुमान मंदिर में पूजा करने भी जाते हैं। लेकिन इन लोगों ने उनके बेटे आयुष को बहला-फुसलाकर मुस्लिम बना दिया और अब इन लोगों के खिलाफ पुलिस से कार्रवाई की माँग की है।

पुलिस ने नामजद लोगों के खिलाफ धर्मांतरण, धोखाधड़ी, जालसाजी, जबरन वसूली, संगठित अपराध, आपराधिक धमकी के आरोपों में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 318(4), 336(3), 338, 61(2), 351(3), 308(5),3, 5(1) के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है।

पुलिस ने चाँदनी और उसके अब्बा इस्लाम कुरैशी को भेजा जेल

पूरे मामले में शामली के पुलिस अधीक्षक (SP) एनपी सिंह ने बताया कि पीड़ित परिवार की शिकायत के आधार पर धर्मांतरण, अवैध वसूली और धमकी देने सहित विभिन्न धाराओं में कुल 10 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। उन्होंने बताया कि पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपित चाँदनी और उसके पिता इस्लाम कुरैशी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।

पुलिस ने बताया कि इस साजिश में आजाद चौक स्थित कादियां मस्जिद के पास के मौलवी मुनव्वर और अज्ञात की भूमिका की भी जाँच की जा रही है। फिलहाल चाँदनी का भाई और बहन फरार चल रहे हैं, जिनकी गिरफ्तारी के लिए टीमें लगातार दबिश दे रही हैं। पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश करने के लिए एसपी ने SIT का गठन किया है।

स्वामी महाराज ने उठाया था पूरा विवाद

यह पूरा मामला बघरा स्थित योग साधना यशवीर आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी यशवीर महाराज के वीडियो के बाद सामने आया है। कुछ दिनों पहले स्वामी यशवीर महाराज ने वीडियो जारी कर चिंता जताई थी कि मेडिकल स्टोर संचालक आयुष मलिक को मुस्लिम युवती चाँदनी कुरैशी ने फँसा लिया है, और उनकी मुस्लिम पहचान बना दी है।

तब स्वामी महाराज ने आरोप लगाया कि युवक का धर्मांतरण दबाव में कराया गया और इस पूरे प्रकरण में शामिल लोगों की भूमिका की जाँच होनी चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि युवक के माता-पिता के धर्मांतरण की सूचनाएँ भी उन्हें मिली हैं। हालाँकि, FIR में आयुष के पिता ने साफ कर दिया कि उनका पूरा परिवार सनातनी है।

स्वामी यशवीर महाराज ने उत्तर प्रदेश सरकार और शामली पुलिस प्रशासन से मामले की जाँच कर संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की थी। उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो इस मुद्दे को लेकर आंदोलन और धरना-प्रदर्शन किया जाएगा। इसके बाद हिंदू संगठन ने इसका विरोध किया और फिर आयुष के पिता ने पुलिस थाने में जाकर FIR दर्ज करवाई।

‘राम मंदिर का चढ़ावा हुआ चोरी’: अखिलेश यादव ने किया दावा, सपा प्रवक्ता ऑपइंडिया से बोले- कोई सबूत नहीं, सूत्रों के आधार पर टहल रही है यह बात

सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने रविवार (7 जून 2026) को X पर एक सनसनीखेज दावा किया। अखिलेश यादव ने राम मंदिर में चढ़ावा चोरी होने की बात कहते हुए लिखा, “समस्त विश्व में भगवान राम के उपासकों के लिए ये एक बेहद संवेदनशील समाचार है कि ‘राम मंदिर’ के चढ़ावे की करोड़ों की रकम गायब पायी गई है।”

उन्होंने आगे लिखा, “ये मंदिर ट्रस्ट के लिए अत्यंत शर्मनाक स्थिति है। कोई भी सफाई देने के लिए सामने नहीं आना चाहता है। न्यायालय से स्वतः संज्ञान लेने की माँग है क्योंकि इसका सीधा संबंध वैश्विक स्तर पर समस्त सनातनी समाज की प्रभु राम में गहरी आस्था से जुड़ा है। सरकार की चुप्पी संदिग्ध है।”

अखिलेश यादव का ट्वीट

सपा सरकार में मंत्री रहे और पार्टी के प्रवक्ता पवन पांडेय ने भी X पर अखिलेश के इस पोस्ट पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा, “हे राम मंदिर मे भी डकैती।” पवन पांडेय 2012-2017 के बीच अयोध्या से विधायक रहे हैं।

पवन पांडेय का ट्वीट

चोरी का कोई सबूत नहीं: ऑपइंडिया से बोले सपा प्रवक्ता पवन पांडेय

इस मामले को लेकर जब ऑपइंडिया ने सपा के प्रवक्ता पवन पांडेय से बात की तो उन्होंने चढ़ावे की चोरी का सबूत ना होने की बात कही। हमने पूछा कि क्या उन्हें इस संबंध में कोई शिकायत मिली है या उनके पास कोई प्रमाण है तो उनका कहना था, “यह बात पूरे फैजाबाद शहर में सूत्रों के आधार पर टहल रही है, चार दिनों से। इसका कोई ठोस सबूत नहीं है, लिखा-पढ़ी वाला सबूत नहीं है।” जब हमने उसने पूछा कि क्या ऐसी चर्चा सुनकर उन्हें दावा किया है तो उनका जवाब था, “हाँ, यही समझ लीजिए।”

इसके बाद वे हमसे कहने लगे, “आप चंपत राय से पूछिए कि वे इसका जवाब दें।” उल्लेखनीय है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव हैं। हमने इस मामले को लेकर चंपत राय से भी बात करने का प्रयास किया लेकिन बात नहीं हो पाई। उनसे बात होने के बाद हम इस खबर को अपडेट करेंगे।

बातचीत के दौरान हमने उनसे कहा कि ‘ट्रस्ट के लोगों से हमने बात की है तो उन्होंने इस चोरी के सबूत माँगे हैं’ तो इस पर सपा प्रवक्ता पवन पांडेय ने कहा, “इस मामले पर चंपत राय 4 दिन से क्यों नहीं बोल रहे हैं। हम बता रहे हैं कि चोरी हुई है। हम लोगों थोड़े ही जाएँगे ये हमारा काम नहीं है।” हालाँकि, वह बार-बार सबूत ना होने की बात कहते रहे। उन्होंने कहा कि विवाद हुआ होगा तभी यह बात बाहर आई है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, पवन पांडेय ने उनसे बातचीत में राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी 5 से 7.50 करोड़ रुपए तक की चोरी होने की बात कही है। साथ ही, उन्होंने कहा है कि अगर चोरी नहीं हुई है तो चंपत राय प्रभु श्रीराम की कसम खाकर कहें कि सबकुछ झूठ है।

कैसे होती है चढ़ावे की गिनती?

राम मंदिर में आने वाले चढ़ावे की गिनती एक तय और पारदर्शी व्यवस्था के तहत की जाती है। दान राशि की गणना बैंक कर्मचारियों द्वारा ट्रस्ट प्रतिनिधियों की मौजूदगी में की जाती है और पूरी प्रक्रिया सीसीटीवी निगरानी के दायरे में रहती है।

गिनती के बाद दान में प्राप्त रकम का विवरण रजिस्टर में दर्ज किया जाता है। इसके बाद राशि को मंदिर परिसर में बने सुरक्षित लॉकर में रखा जाता है, जिसे अगले दिन बैंक में जमा कर दिया जाता है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का मुख्य बैंक खाता अयोध्या धाम स्थित भारतीय स्टेट बैंक में संचालित होता है।

चढ़ावे की राशि के ऑडिट और वित्तीय निगरानी का कार्य TCS (टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज) की देखरेख में किया जाता है। मंदिर में प्राप्त कुल चढ़ावे की जानकारी ट्रस्ट की बैठकों में साझा की जाती है।

दिल्ली दंगों में इस्लामी कट्टरपंथियों को दी क्लीन चिट, कुंभ और राम मंदिर को लेकर हिंदुओं को घेरा: जानें- कौन हैं CJP प्रदर्शन में दिखीं Guardian की पत्रकार हन्ना एलिस

सोशल मीडिया से उपजी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने शनिवार (6 जून 2026) को दिल्ली के जंतर-मंतर पर कुछ तिलचट्टों के साथ प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन का नेतृत्व करने के लिए CJP के संस्थापक और पूर्व AAP कार्यकर्ता अभिजीत दिपके अमेरिका से भारत पहुँचे थे।

सरकार से CBSE और NEET विवाद को लेकर जवाब माँगने के नाम पर आयोजित इस प्रदर्शन में कई ऐसे लोग भी शामिल हुए, जो खुद को निष्पक्ष बताने का ढोंग करते हैं लेकिन उनके राजनीतिक मकसद साफ नजर आ रहे थे। इसी दौरान प्रदर्शन स्थल पर मौजूद एक विदेशी महिला ने कई लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा।

अधिकांश प्रदर्शनकारियों के बीच सुनहरे बालों वाली इस महिला को देखकर सोशल मीडिया पर भी सवाल उठने लगे। एक सोशल मीडिया यूजर ने पूछा कि आखिर यह विदेशी महिला प्रदर्शन में क्या कर रही है, क्योंकि टूरिस्ट वीजा पर इस तरह की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने की अनुमति नहीं होती।

उसने दिल्ली पुलिस से कार्रवाई करने और उसका वीजा रद्द कर उसे देश से बाहर भेजने की माँग भी की। कुछ ही समय बाद उस महिला की पहचान सामने आ गई। वह महिला ब्रिटिश अखबार The Guardian की दक्षिण एशिया संवाददाता हन्ना एलिस-पीटरसन (Hannah Ellis-Petersen) थीं, जो इस प्रदर्शन को कवर करने के लिए वहाँ मौजूद थीं।

कौन हैं हन्ना एलिस-पीटरसन? जानिए उनके बारे में सबकुछ

हन्ना एलिस-पीटर्सन का लव जिहाद के मामलों को कमतर करके दिखाने और कथित ‘ऑनर किलिंग’ के मामलों को इससे गलत तरीके से जोड़ने का इतिहास रहा है। जनवरी 2020 में जब देशभर में CAA विरोधी प्रदर्शन चल रहे थे, तब वह द गार्जियन के पाठकों के सामने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर भ्रम फैलाने में जुटी थीं।

अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होकर भारत में अवैध रूप से रह रहे अल्पसंख्यकों को तेजी से नागरिकता देने के कानून के उद्देश्य को बताने के बजाय, उन्होंने दावा किया कि इस मानवीय कानून के खिलाफ महिलाओं के प्रदर्शन, मोदी की हिंदुत्व राजनीति की कथित ‘टॉक्सिक मैस्कुलिनिटी’ के खिलाफ एक जवाबी कहानी है।

हन्ना एलिस-पीटरसन के ट्वीट्स का स्क्रिनशॉट्स

उन्होंने फरवरी 2020 में दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के दौरान हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार इस्लामी कट्टरपंथियों को भी क्लीन चिट देने की कोशिश की और हिंदू विरोधी हिंसा को केवल ‘हिंदुओं और मुसलमानों के बीच झड़प’ बताकर पेश किया।

हन्ना एलिस-पीटर्सन ने यह अफसोस भी जताया था कि इन दंगों का भारत-अमेरिका संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ा और इसके बजाय अमेरिका के राष्ट्रपति ने भारत में धार्मिक स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए मोदी सरकार की प्रशंसा की।

इस ‘पत्रकार’ ने कर्नाटक के स्कूलों में बुर्का पहनने पर लगी पाबंदियों को दक्षिण भारत में ‘हिजाब बैन’ के रूप में पेश किया। उन्होंने यह भी दावा किया कि हिंदू मंदिरों के ऊपर बने विवादित ढाँचों को वापस हासिल करने की प्रक्रिया, ‘हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा भारत का इतिहास दोबारा लिखने’ की कोशिश है।

हन्ना एलिस-पीटरसन के ट्वीट्स का स्क्रिनशॉट्स

हन्ना एलिस-पीटर्सन ने द गार्जियन के लिए कई ऐसे लेख भी लिखे, जिनमें उन्होंने राम जन्मभूमि फैसले और राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर हिंदुओं को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। उन्होंने भव्य हिंदू मंदिर के स्थान पर पहले मौजूद विवादित ढाँचे का बार-बार उल्लेख कर इन घटनाओं के महत्व को कम करके दिखाने का भी प्रयास किया।

इसके अलावा इस प्रोपेगेंडा पत्रकार ने 2022 में इंग्लैंड के लीसेस्टर शहर में हुई हिंसा को ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ से जोड़ दिया, जबकि इसके समर्थन में कोई सबूत मौजूद नहीं था।

वास्तव में सेंटर फॉर डेमोक्रेसी, प्लूरलिज्म एंड ह्यूमन राइट्स (CDPHR) ने अपनी फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट में बताया था कि लीसेस्टर में इस्लामी कट्टरपंथियों ने गलत सूचनाओं को हथियार बनाया, हिंदुओं के मानवाधिकारों का उल्लंघन किया और जातीय सफाए की कोशिश की, जिसके चलते कई हिंदू परिवारों को अस्थायी रूप से अपना घर छोड़ना पड़ा।

रिपोर्ट में कहा गया था, “लीसेस्टर हिंसा को लेकर BBC और द गार्जियन की रिपोर्टिंग का जब सत्यापित पुलिस रिपोर्टों, प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और विभिन्न थिंक टैंकों की पुष्ट रिपोर्टों से तुलना की गई, तो संस्थागत हिंदूफोबिया और पक्षपात स्पष्ट रूप से सामने आया।”

हन्ना एलिस-पीटर्सन का प्रोपेगेंडा केवल हिंदुओं को बदनाम करने या इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं पर किए गए अत्याचारों को कम करके दिखाने तक सीमित नहीं रहा है। उन्होंने ऐसे लेख भी लिखे, जिनमें कुंभ मेले में भाग लेने वाले हिंदुओं को ‘कोविड सुपरस्प्रेडर’ बताया गया, जबकि उनके इस दावे के समर्थन में कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं था।

इस ‘पत्रकार’ ने कोविड-19 के वास्तविक सुपरस्प्रेडर माने जाने वाले तबलीगी जमात के सदस्यों को भी क्लीन चिट देने की कोशिश की थी। जबकि एक समय ऐसा था जब देश में सामने आए कुल कोरोना मामलों में लगभग 30 प्रतिशत मामले तबलीगी जमात से जुड़े पाए गए थे।

इसके बावजूद 2021 में भारत की कोविड-19 स्थिति को लेकर उनकी निराशाजनक रिपोर्टिंग और डर का माहौल बनाने वाली प्रस्तुतियों की प्रशंसा ‘पत्रकार’ से ‘दस्तावेज काट-छाँट करने वाले’ बने एन राम ने की थी, जो राफेल सौदे को लेकर भ्रामक जानकारी फैलाने के आरोपों के कारण चर्चित रहे हैं।

मार्च 2024 में ऑपइंडिया ने हिंदू कार्यकर्ता काजल हिंदुस्तानी के खिलाफ हन्ना एलिस-पीटरसन की कथित हिट-जॉब की कोशिश को विफल कर दिया था। इसके एक महीने बाद उन्होंने एक विवादित लेख का सह-लेखन किया, जिसका शीर्षक था- ‘भारतीय सरकार ने पाकिस्तान में हत्याओं का आदेश दिया, खुफिया अधिकारियों का दावा।’

लेख की शुरुआत में ही पाकिस्तान के आतंकवादियों को केवल ‘व्यक्तियों’ के रूप में बताया गया, जिनकी कथित तौर पर भारतीय सरकार द्वारा हत्या करवाई गई थी।

इस रिपोर्ट में मुख्य रूप से गुमनाम स्रोतों, खासकर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों से जुड़े सूत्रों के दावों का सहारा लिया गया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘सीमा पार हत्याओं’ को बढ़ावा देने वाले नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की गई। हालाँकि द गार्जियन ने अनजाने में उन्हें बाहरी खतरों से भारत की सुरक्षा करने वाले नेता के रूप में भी स्वीकार कर लिया।

द गार्जियन के आर्टिकल का स्क्रिनशॉट

दिलचस्प बात यह है कि हन्ना एलिस-पीटरसन ने ऑपइंडिया की एडिटर-इन-चीफ नूपुर जे शर्मा द्वारा दिए गए लाइवस्ट्रीम बहस के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। हालाँकि वह एक ऐसी डॉक्यूमेंट्री का हिस्सा जरूर बनीं, जिस पर हिंदुओं और भारत के बारे में भ्रामक जानकारी फैलाने का आरोप लगाया गया था।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है, मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

चीन-जापान की राह पर भारत, रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जन्म दर: पढ़ें- क्या होता है TFR, क्यों घट रही है जन्म दर और आने वाले दशकों में कितना बड़ा होगा संकट

लंबे समय तक दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती आबादी वाले देशों में गिना जाता रहा भारत अब एक बड़े जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic Shift) के दौर में जा रहा है। दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश होने के बावजूद भारत में अब जन्म दर उस स्तर से नीचे चली गई है जिसे किसी भी देश की जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक माना जाता है।

ताजा सरकारी आँकड़ों के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate-TFR) घटकर 1.9 पर पहुँच गई है। यह पहली बार है जब यह आँकड़ा ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ यानी 2.1 से नीचे गया है। इस मुद्दे ने केवल भारत में ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी आबाद से जुड़ी चर्चाओं को जन्म दिया है।

अमेरिकी अरबपति उद्योगपति और टेस्ला तथा स्पेसएक्स के प्रमुख एलन मस्क ने भी भारत की घटती जन्म दर को लेकर चिंता जताई है। भारत की आबादी को लेकर अब तक होने वाली बहस अब तक आमतौर पर जनसंख्या विस्फोट को लेकर होती रही हैं लेकिन नए आँकड़े संकेत दे रहे हैं कि आने वाले दशकों में भारत के सामने चुनौती उल्टी भी हो सकती है यानी कम होती जन्म दर, वृद्ध होती आबादी और घटता कार्यबल।

मस्क ने क्या कहा?

एलन मस्क लंबे समय से दुनिया के कई देशों में गिरती जन्म दर को लेकर चिंता जताते रहे हैं। वे कई बार सार्वजनिक मंचों पर कह चुके हैं कि घटती जनसंख्या मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती है। अब भारत को लेकर भी उन्होंने इसी चिंता को दोहराया।

AF Post द्वारा भारत की घटती प्रजनन दर से जुड़े आँकड़े साझा किए जाने के बाद मस्क ने X पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “भारत की जन्म दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे गिर चुकी है। सबसे अधिक शिक्षित वर्गों के बीच यह गिरावट कई वर्ष पहले ही शुरू हो गई थी।”

मस्क का तर्क है कि जब किसी देश में लंबे समय तक जन्म दर कम रहती है, तो धीरे-धीरे वहाँ युवाओं की संख्या कम होने लगती है। इसका असर उद्योगों, अर्थव्यवस्था, श्रम शक्ति और पेंशन व्यवस्था पर पड़ता है। जापान, दक्षिण कोरिया और कई यूरोपीय देशों को वे इसी संकट का उदाहरण बताते रहे हैं।

भारत के नए आँकड़े क्या बता रहे हैं?

भारत सरकार की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) 2024 रिपोर्ट के अनुसार देश की कुल प्रजनन दर यानी TFR अब 2.1 से घटकर 1.9 बच्चों प्रति महिला रह गई है। सरल भाषा में समझें तो इसका मतलब है कि औसतन भारत में एक महिला अपने जीवनकाल में अब दो से भी कम बच्चों को जन्म दे रही है।

यह गिरावट अचानक नहीं हुई है बल्कि पिछले कई वर्षों से लगातार जारी है। लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया था कि भारत में वर्ष 1950 में कुल प्रजनन दर 6.18 थी। लेकिन भारत ने आजादी के बाद से ही जनसंख्या को नियंत्रित करने के उपाय शुरू कर दिए गए थे।

भारत 1950 के दशक में राज्य द्वारा प्रायोजित परिवार नियोजन कार्यक्रम अपनाने वाले पहले विकासशील देशों में से एक बन गया था। 1952 में जनसंख्या नीति समिति और 1956 में केंद्रीय परिवार नियोजन बोर्ड की स्थापना की गई थी। 1976 में भारत ने पहली राष्ट्रीय जनसंख्या नीति की घोषणा की थी। इसका असर भी दिखा और 1980 में जन्म दर 4.60 पहुँच गई।

जनसंख्या नियंत्रण के लिए किए गय उपायों से भारत की TFR में लगातार कमी होती रही। नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) 2015-16 के मुताबिक, भारत में TFR 2.2 हो गया था। अगले कुछ वर्षों में इसमें और भी कमी हुई और NFHS, 2019-21 के आँकड़ों के मुताबिक, भारत में TFR 2.0 पर पहुँच गया जो प्रतिस्थापन स्तर से भी कम था। अब यह पहली बार उस स्तर से नीचे पहुँच गई है जिसे किसी देश की आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए जरूरी माना जाता है।

अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक भारत की TFR 1.29 तक पहुँच जाएगा और 2100 तक इसके 1.04 तक पहुँचने का अनुमान है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव भारत में शिक्षा, शहरीकरण, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और परिवार नियोजन के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।

2021 और 2100 में भारत की TFR का तुलनात्मक अध्ययन (फोटो साभार:लैंसेट)

क्या होता है ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

‘रिप्लेसमेंट लेवल’ या Replacement Fertility Rate का अर्थ समझना इस पूरी बहस को समझने के लिए बेहद जरूरी है। यह वह औसत संख्या होती है जितने बच्चे एक महिला को जन्म देने चाहिए ताकि एक पीढ़ी की जनसंख्या अगली पीढ़ी में बराबर बनी रहे।

आमतौर पर यह संख्या 2.1 मानी जाती है। यानी औसतन हर महिला को दो बच्चे पैदा करने होंगे ताकि माता-पिता की जगह अगली पीढ़ी ले सके। इसमें अतिरिक्त 0.1 इसलिए जोड़ा जाता है क्योंकि कुछ लोग बीमारी, दुर्घटना या अन्य कारणों से प्रजनन आयु तक नहीं पहुँच पाते।

यदि किसी देश की जन्म दर लंबे समय तक 2.1 से नीचे बनी रहती है तो धीरे-धीरे वहाँ जनसंख्या बढ़ने की रफ्तार धीमी पड़ जाती है। कुछ दशकों बाद कुल आबादी स्थिर होने लगती है और फिर घट भी सकती है। यही वजह है कि जनसंख्या विशेषज्ञ भारत के इस बदलाव को एक बड़े संकेत के रूप में देख रहे हैं।

दिल्ली की TFR फिनलैंड से भी कम लेकिन किन राज्यों में अब भी बच्चे पैदा हो रहे ज्यादा?

भारत का TFR (राष्ट्रीय औसत) अब 1.9 तक पहुँच गया है लेकिन पूरे देश की तस्वीर एक जैसी नहीं है। कुछ राज्यों में अब भी जन्म दर राष्ट्रीय औसत से अधिक बनी हुई है।

रिपोर्ट के अनुसार, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड ऐसे राज्य हैं जहाँ प्रजनन दर अभी भी रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से ऊपर है। इन राज्यों में अपेक्षाकृत अधिक जन्म दर के कारण देश का औसत कुछ हद तक संतुलित बना हुआ है।

इन राज्यों में ग्रामीण आबादी अधिक है, कम उम्र में विवाह अपेक्षाकृत ज्यादा होते हैं और कई सामाजिक-आर्थिक कारणों से परिवारों में बच्चों की संख्या अधिक बनी रहती है। दूसरी ओर दक्षिण भारत, पश्चिम भारत और बड़े महानगरों वाले राज्यों में जन्म दर तेजी से घटी है। इन इलाकों में छोटे परिवार अब सामान्य बात बन चुके हैं।

रिपोर्ट के सबसे चौंकाने वाले आँकड़ों में दिल्ली का नाम सामने आया है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में प्रजनन दर सिर्फ 1.2 दर्ज की गई है, जो देश में सबसे कम है। दिलचस्प बात यह है कि दिल्ली की यह दर यूरोपीय देशों के बराबर या कई मामलों में उनसे भी कम है। दिल्ली की जन्म दर फिनलैंड से भी नीचे पहुँच गई है।

विशेषज्ञ इसके पीछे कई कारण गिनाते हैं। बड़े शहरों में जीवनयापन की बढ़ती लागत, छोटे घर, करियर का दबाव, देर से शादी, महिलाओं का नौकरियों में बढ़ता योगदान और बच्चों की परवरिश का महँगा होना प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।

आज के शहरी परिवार पहले की तरह तीन या चार बच्चों की जगह एक या दो बच्चों को प्राथमिकता दे रहे हैं। कई दंपति तो केवल एक बच्चा रखने या बिल्कुल बच्चा न पैदा करने का निर्णय भी ले रहे हैं।

आखिर भारत में जन्म दर इतनी तेजी से क्यों घट रही है?

भारत में जन्म दर कम होने के पीछे केवल एक कारण जिम्मेदार नहीं है बल्कि कई सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलाव एक साथ काम कर रहे हैं।

सबसे बड़ा कारण शिक्षा को माना जा रहा है। खासकर महिलाओं की शिक्षा बढ़ने के बाद शादी और माँ बनने की औसत उम्र बढ़ी है। पहले जहाँ कम उम्र में शादी होना आम बात थीं, वहीं अब महिलाएँ उच्च शिक्षा और नौकरी को प्राथमिकता देने लगी हैं।

इसके अलावा शहरीकरण ने भी परिवारों की सोच बदल दी है। शहरों में महँगी शिक्षा, स्वास्थ्य खर्च और सीमित संसाधनों के कारण परिवार छोटे रखने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

महिलाओं की नौकरी और आर्थिक स्वतंत्रता भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आज बड़ी संख्या में महिलाएँ करियर और पेशेवर जीवन पर ध्यान दे रही हैं जिससे परिवार नियोजन के फैसले वो ले रही हैं। स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुँच और गर्भनिरोधक साधनों की उपलब्धता ने भी जन्म दर को नियंत्रित करने में मदद की है।

संयुक्त राष्ट्र ने भारत को लेकर क्या कहा है?

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) ने भी अपनी हालिया रिपोर्ट में माना है कि भारत की प्रजनन दर अब रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे पहुँच चुकी है। UNFPA की 2025 की रिपोर्ट में भारत का TFR 1.9 माना गया। हालाँकि एजेंसी ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि भारत की आबादी तुरंत कम होने लगेगी।

UNFPA के अनुमान के अनुसार, अगर मौजूदा रुझान जारी रहे तो साल 2100 तक भारत की कुल प्रजनन दर घटकर लगभग 1.78 तक पहुँच सकती है। साथ ही देश की औसत जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) करीब 79 वर्ष होने का अनुमान जताया गया है। यह तस्वीर भारत के सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय भविष्य को लेकर कई बड़े सवाल खड़े करती है।

कम जन्म दर के कारण युवा आबादी का हिस्सा सिकुड़ता दिखाई देता है जबकि बुजुर्ग आबादी का अनुपात बढ़ने की संभावना है। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत धीरे-धीरे ‘युवा देश’ से ‘एजिंग सोसाइटी’ की तरफ बढ़ सकता है।

2100 को लेकर UNFPA का अनुमान

हालाँकि, भारत की कुल आबादी अभी भी 140 करोड़ से अधिक है और बड़ी संख्या में लोग युवा आयु वर्ग में हैं। इसका मतलब यह है कि आने वाले कुछ दशकों तक जनसंख्या बढ़ सकती है लेकिन उसकी रफ्तार पहले जैसी नहीं रहेगी।

UNFPA का कहना है कि भारत में जनसंख्या का पैटर्न एक जैसा नहीं है। अलग-अलग राज्यों में सामाजिक परिस्थितियां, स्वास्थ्य सुविधाएं, महिलाओं की स्थिति और विवाह की औसत उम्र अलग-अलग होने के कारण जन्म दर में भी बड़ा अंतर दिखाई देता है।

दुनिया भर में आने वाला है कम होती आबादी का संकट

आबादी का कम होने का संकट सिर्फ भारत के लिए ही चुनौती नहीं बनने वाला है बल्कि दुनिया के बहुत बड़े हिस्से के लिए यह संकट जल्द ही दिखना शुरू हो जाएगा। ‘द लैंसेट’ ने 204 देशों का अध्ययन किया और बताया कि 204 देशों और क्षेत्रों में से 103 देश (50.5%) ऐसे थे जहाँ 2018 तक TFR पहले ही ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ से नीचे पहुँच चुकी थी। यह अध्ययन 2024 में प्रकाशित हुआ था।

शोध के अनुसार, 2050 तक लगभग 100 देश (49%) ऐसे हो जाएँगे जहाँ प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि नकारात्मक हो जाएगी। इसका मतलब यह है कि उन देशों में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या, मरने वाले लोगों की संख्या से कम हो जाएगी। शोध में यह भी अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक 155 देश और क्षेत्र (76%) रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे की प्रजनन दर पर पहुँच जाएँगे। वहीं, 2100 तक यह संख्या बढ़कर 198 देश (97.1%) हो सकती है। इनमें से 178 देश (87.3%) ऐसे होंगे जहाँ प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि नकारात्मक होगी।

विभिन्न देशों में 2100 तक TFR का आँकड़ा (फोटो साभार:लैंसेट)

क्या भारत भी जापान और चीन जैसी स्थिति में पहुँच सकता है?

यह सवाल अब तेजी से पूछा जाने लगा है कि क्या भारत भी भविष्य में जापान, दक्षिण कोरिया या चीन जैसी स्थिति का सामना करेगा? जापान और दक्षिण कोरिया में जन्म दर कई वर्षों से बेहद कम बनी हुई है। वहाँ बड़ी समस्या यह हो गई कि काम करने वाली युवा आबादी घटती चली गई जबकि बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ी। इससे पेंशन व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया।

चीन को भी इसी समस्या के कारण अपनी ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ तक खत्म करनी पड़ी और अब वहाँ सरकार ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए लोगों को प्रोत्साहन दे रही है। दुनिया के कई देशों में जनसंख्या को बढ़ाने के लिए अलग-अलग उपाय किए जा रहे हैं।

भारत फिलहाल उस स्थिति से दूर है क्योंकि यहाँ अभी भी युवा आबादी बड़ी संख्या में मौजूद है। ‘पॉपुलेशन मोमेंटम’ (Population Momentum) के चलते अभी भारत को कोई दिक्कत नहीं होगी। पॉपुलेशन मोमेंटम का मतलब यह है कि किसी देश की जन्म दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जाने के बाद भी उसकी आबादी कुछ समय तक बढ़ती रह सकती है।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अगर किसी देश में युवा आबादी (खासतौर पर 15 साल से कम उम्र के लोग) बड़ी संख्या में मौजूद है, तो वे आगे चलकर प्रजनन आयु में पहुँचते हैं और बच्चे पैदा करते हैं। इसलिए जन्म दर कम होने के बावजूद जनसंख्या तुरंत घटनी शुरू नहीं होती।

अध्ययन बताते हैं कि जब किसी देश की TFR (कुल प्रजनन दर) 2.1 से नीचे जाती है, तब भी आबादी की प्राकृतिक वृद्धि दर के नकारात्मक होने में लगभग 30 साल का अंतर आ सकता है। यानी जन्म दर कम होने के बावजूद जनसंख्या कुछ दशकों तक बढ़ सकती है।

हालाँकि, अगर अगले कई दशकों तक जन्म दर लगातार कम बनी रही, तो भारत को भी भविष्य में श्रमिकों की कमी, वृद्ध आबादी और आर्थिक दबाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। और विभिन्न रिपोर्ट्स में यह अनुमान साफ-साफ नजर आ रहा है।

अब भारत के लिए चिंता ‘जनसंख्या विस्फोट’ नहीं बल्कि ‘घटती जनसंख्या’ होगी

एक समय भारत में सबसे बड़ी चिंता तेजी से बढ़ती आबादी को लेकर थी। सरकारें परिवार नियोजन अभियान चलाती थीं और जनसंख्या नियंत्रण को बड़ा मुद्दा माना जाता था। लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत होगी। बहुत ज्यादा आबादी भी चुनौती है और बहुत कम जन्म दर भी भविष्य में गंभीर समस्या बन सकती है।

भारत फिलहाल उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ जनसंख्या वृद्धि धीमी हो रही है लेकिन युवा आबादी अभी भी बड़ी ताकत बनी हुई है। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि भारत अपनी जनसांख्यिकीय ताकत को आर्थिक अवसर में बदल पाता है या नहीं।

स्पष्ट है कि भारत में जन्म दर का रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जाना केवल एक आँकड़ा नहीं बल्कि देश के सामाजिक और आर्थिक भविष्य से जुड़ा बड़ा बदलाव है, जिसके असर आने वाले दशकों में साफ दिखाई दे सकते हैं।

जंतर-मंतर पर CJP के प्रदर्शन में पत्रकारों से बदसलूकी और धक्का-मुक्की, रिपोर्टरों को घेरकर लगाए ‘गोदी मीडिया’ के नारे: महिला पत्रकारों पर की अभद्र टिप्पणियाँ, पढ़ें 7 मामले

नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर शनिवार (6 जून 2026) को कॉकक्रोच जनता पार्टी (CJP) का बहुप्रचारित प्रदर्शन आयोजित किया गया। सोशल मीडिया पर इस प्रदर्शन को लेकर काफी चर्चा और प्रचार हुआ था।

ऐसे में उम्मीद की जा रही थी कि CJP के लाखों ऑनलाइन समर्थकों में से कम से कम हजारों लोग प्रदर्शन में शामिल होंगे। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही निकली।

प्रदर्शन में लोगों की संख्या काफी कम रही और यह आयोजन लगभग फ्लॉप साबित हुआ। हालात ऐसे थे कि प्रदर्शनकारियों से ज्यादा संख्या में मीडिया कर्मी और पुलिसकर्मी मौके पर मौजूद नजर आए।

दिलचस्प बात यह रही कि प्रदर्शन में शामिल कई समर्थकों को खुद यह स्पष्ट नहीं था कि प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य और एजेंडा क्या है। CJP की ओर से कहा गया था कि यह प्रदर्शन हाल के NEET और CBSE परीक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार, खासकर शिक्षा मंत्री के खिलाफ आयोजित किया जा रहा है। लेकिन प्रदर्शन के दौरान ‘आजादी-आजादी’ जैसे नारे भी लगाए गए।

जब कुछ पत्रकारों ने प्रदर्शनकारियों से उनकी माँगों और एजेंडे के बारे में बात करने की कोशिश की और इन नारों को लेकर सवाल पूछे, तो उन्हें विरोध और बदसलूकी का सामना करना पड़ा। कई प्रदर्शनकारियों ने पत्रकारों को घेर लिया, धक्का-मुक्की की और उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश की, जबकि वे केवल अपनी पेशेवर जिम्मेदारी निभा रहे थे।

ओपइंडिया के पत्रकार अनुराग मिश्रा के साथ भी ऐसा ही हुआ। जब उन्होंने प्रदर्शन में मौजूद CJP समर्थकों से उनकी माँगों के बारे में बात करने की कोशिश की, तो कई समर्थकों ने उन्हें घेर लिया और ‘गोदी मीडिया’ के नारे लगाने शुरू कर दिए।

अनुराग मिश्रा ने केवल इतना सवाल पूछा था कि सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स होने के बावजूद प्रदर्शन स्थल पर लोगों की संख्या इतनी कम क्यों है। लेकिन यह सवाल सुनते ही कई समर्थक नाराज हो गए और उन्होंने पत्रकार को घेरकर शोर-शराबा करना शुरू कर दिया तथा उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश की।

हालाँकि अनुराग मिश्रा अकेले पत्रकार नहीं थे जिन्हें प्रदर्शन स्थल पर CJP समर्थकों के आक्रामक व्यवहार का सामना करना पड़ा। जी न्यूज के एक पत्रकार के साथ भी ऐसी ही घटना हुई।

ज़ी न्यूज के पत्रकार प्रदर्शन की कवरेज कर रहे थे, तभी कई CJP समर्थक उनकी ओर बढ़े और ‘गोदी मीडिया’ के नारे लगाने लगे। देखते ही देखते माहौल तनावपूर्ण हो गया। स्थिति बिगड़ती देख मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने हस्तक्षेप किया और पत्रकार को वहां से सुरक्षित बाहर निकाला।

प्रदर्शन की कवरेज कर रहीं कुछ महिला पत्रकारों को भी CJP समर्थकों के उत्पीड़न और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में देखा जा सकता है कि कुछ CJP समर्थकों ने एक महिला पत्रकार को चारों तरफ से घेर लिया। इस दौरान वे जोर-जोर से नारेबाजी कर रहे थे और पत्रकार गंदे-गंदे इशारे भी कर रहे थे।

वीडियो सामने आने के बाद पत्रकारों की सुरक्षा और प्रदर्शन के दौरान उनके साथ हुए व्यवहार को लेकर सवाल उठने लगे हैं। आलोचकों का कहना है कि अपनी बात रखने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की माँग करने वाले लोगों को पत्रकारों के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं करना चाहिए।

एक अन्य महिला पत्रकार को भी प्रदर्शन के दौरान CJP समर्थकों के निशाने पर आना पड़ा। जब वह मौके से रिपोर्टिंग करने की कोशिश कर रही थीं, तब कुछ प्रदर्शनकारियों ने उन्हें घेरकर हूटिंग शुरू कर दी और उन पर सरकार का एजेंट होने का आरोप लगाने लगे।

इस दौरान एक प्रदर्शनकारी ने तंज कसते हुए कहा, “मोदी ने इसे 500 रुपए का नोट पकड़ा दिया होगा।” वहीं आसपास मौजूद अन्य समर्थक लगातार नारेबाजी करते रहे। महिला पत्रकार के सवाल पूछने और कवरेज करने के दौरान माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया और उन्हें भी विरोध तथा अभद्र टिप्पणियों का सामना करना पड़ा।

इसी तरह न्यूज24 के एक पत्रकार को भी प्रदर्शन के दौरान CJP समर्थकों के विरोध और धक्का-मुक्की का सामना करना पड़ा। पत्रकार प्रदर्शनकारियों से उनकी माँगों और प्रदर्शन के उद्देश्य को लेकर सवाल पूछने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन कुछ समर्थकों ने उन्हें घेर लिया और लगातार नारेबाजी शुरू कर दी।

पत्रकार ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत कर स्थिति समझाने और सवालों के जवाब लेने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारी उनकी बात सुनने के बजाय शेम-शेम और गोदी मीडिया वापस जाओ जैसे नारे लगाते रहे। इस दौरान पत्रकार को लगातार घेरकर परेशान किया गया, जिससे मौके पर तनावपूर्ण माहौल बन गया।

एक अन्य घटना में ABP न्यूज के एक पत्रकार को भी CJP समर्थकों के आक्रामक व्यवहार का सामना करना पड़ा। जब पत्रकार प्रदर्शनकारियों से बात करने और उनकी माँगों को समझने की कोशिश कर रहे थे, तब कुछ समर्थकों ने उनके साथ धक्का-मुक्की की और उन्हें घेरकर परेशान करना शुरू कर दिया।

हालांकि इस दौरान पत्रकार ने काफी संयम बनाए रखा। प्रदर्शनकारी लगातार आक्रामक अंदाज में नारेबाजी कर रहे थे और माहौल को उग्र बनाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन पत्रकार ने शांत रहते हुए अपनी रिपोर्टिंग जारी रखने का प्रयास किया। इसके बावजूद उन्हें धक्का देने और रास्ता रोकने जैसी हरकतों का सामना करना पड़ा।

प्रदर्शन की कवरेज करने पहुंचे पत्रकारों के साथ हुई इन घटनाओं ने CJP नेताओं के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। CJP की ओर से इस पूरे अभियान और प्रदर्शन को अपनी आवाज उठाने तथा सरकार तक अपनी बात पहुँचाने की कोशिश बताया गया था। लेकिन प्रदर्शन स्थल पर पत्रकारों के साथ हुए व्यवहार को लेकर आलोचक इसे विरोधाभास बता रहे हैं।

एक तरफ CJP और उसके नेता सरकार से सवाल पूछने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उदार मूल्यों की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रदर्शन के दौरान कई पत्रकारों को सवाल पूछने पर विरोध, बदसलूकी, डराने-धमकाने और नारेबाजी का सामना करना पड़ा।

आलोचकों का कहना है कि यदि कोई आंदोलन संवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है, तो उसे अपने बारे में पूछे जाने वाले सवालों का भी लोकतांत्रिक तरीके से जवाब देना चाहिए।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

कोई साड़ियों में छिपा, किसी के घर में मिला तिरपाल का ढेर: बंगाल में TMC के काली करतूतों पर भड़की जनता बना रही नेताओं को निशाना, सड़क से लेकर कोर्ट तक कर रही पिटाई; पढ़ें 6 मामले

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनने के बाद से तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी (TMC) का ‘जंगलराज’ सामने आ रहा है। TMC के काले कारनामे सामने आने के बाद जनता का गुस्सा भी फूट रहा है। ऐसा गुस्सा कि कहीं TMC नेता पर अंडे फेंके जा रहे हैं, तो कहीं जनता के गुस्से से बचने के लिए नेता साड़ियों के ढेर में छिपे हुए हैं।

एक मामले में उत्तर 24 परगना जिले के कमरहाटी में TMC विधायक मदन मित्रा की कार को घेरकर लोगों ने अंडे और ईंटे फेंकी गई। ऐसे ही कोलकाता नगर निगम में पार्षद बप्पादित्य दासगुप्ता पर कोर्ट में पेशी के दौरान अंडे फेंके गए। दासगुप्ता को जबरन वसूली के आरोप में शनिवार (06 जून 2026) को गिरफ्तार किया गया था।

एक अन्य मामले में हावड़ा जिले के TMC नेता ब्रह्मानंद चक्रवर्ती का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वह साड़ियों के ढेर के भीतर छिपे हुए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, चक्रवर्ती पर सरकारी योजना के नाम पर लोगों से कटमनी लेने के आरोप हैं। पुलिस के डर से वह साड़ियों के ढेर में छिप गए। हालाँकि, इसके बावजूद पुलिस चक्रवर्ती को ढूँढकर अपने साथ गिरफ्तार करके ले गई।

उधर, TMC नेता के बंद घर का ताला तोड़कर स्थानीय लोगों ने जमा करके रखे गए लगभग 50 हजार तिरपाल बरामद किए। यह सरकारी राहत सामग्री जनता को पहुँचानी थी, लेकिन TMC नेताओं ने अपनी संपत्ति समझकर रखी हुई थी। इसका वीडियो भी सामने आया है, जिसमें एक घर में फर्श से छत तक केवल तिरपाल के ढेर नजर आ रहे हैं। बताया गया कि यह बंद घर TMC नेता राजू बाग और उनके भाई बीजू बाग का है। बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद से ही दोनों भाई फरार चल रहे हैं।

यह कोई गिनी-चुनी घटनाएँ नहीं हैं। इससे पहले भी कई मामले सामने आए हैं। जहाँ कटमनी का पैसा खाकर बैठे TMC नेता कहीं बिस्तर के नीचे छिपे पाए गए, तो कहीं लोगों ने गुस्से में आकर TMC नेता के करीबी को ही कूट दिया। इसके अलावा TMC नेता पर रिश्वत और जमाखोरी के मामलों में भी लगातार शिकंजा कसा जा रहा है।

K9 Vajra, जोरावर टैंक और न्यूक्लियर जेनरेटर… PM मोदी ने किया हजीरा के डिफेंस प्लांट का दौरा: जानें ये जगह भारत के लिए क्यों है महत्वपूर्ण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (5 जून 2026) को गुजरात के हजीरा स्थित लार्सन एंड टुब्रो (L&T) के  मैन्युफैक्चरिंग प्लांट का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने देश की रक्षा और रणनीतिक विनिर्माण क्षमता को मजबूत करने में भारतीय उद्योगों की बढ़ती भूमिका के बारे में बताया। यह दौरा उनके गुजरात दौरे का हिस्सा था और लगभग सात साल बाद उनका इस प्लांट का पहला दौरा था।

दौरे के दौरान प्रधानमंत्री ने हजीरा परिसर में विकसित की जा रही कई स्वदेशी तकनीकों और रक्षा प्लेटफॉर्मों का निरीक्षण किया। यह प्लांट आज भारत के सबसे महत्वपूर्ण भारी इंजीनियरिंग, रक्षा उत्पादन और रणनीतिक औद्योगिक निर्माण केंद्रों में शामिल हो चुका है।

प्रधानमंत्री ने कई घंटे प्लांट में बिताए और अधिकारियों से बातचीत करते हुए वहाँ तैयार हो रहे अत्याधुनिक उपकरणों और प्रणालियों को करीब से देखा।

PM मोदी ने शेयर की तस्वीरें

दौरे के कुछ ही समय बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर तस्वीरें और जानकारी साझा की। उन्होंने भारत को आत्मनिर्भर बनाने में L&T की भूमिका की सराहना की।

प्रधानमंत्री ने लिखा, “आज दोपहर मैं हजीरा स्थित L&T परिसर गया। वहाँ विभिन्न क्षेत्रों में विकसित की जा रही कई नई और महत्वपूर्ण तकनीकों को देखा। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाने में L&T की भूमिका सराहनीय है।”

प्रधानमंत्री द्वारा साझा की गई तस्वीरों में एक तस्वीर ने सोशल मीडिया पर खास ध्यान खींचा। इस तस्वीर में वह हजीरा प्लांट में बने एक विशाल न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर के पास खड़े दिखाई दे रहे थे।

यह तस्वीर इसलिए चर्चा में आई क्योंकि ऐसे स्टीम जनरेटर भारतीय उद्योग द्वारा बनाए जाने वाले सबसे जटिल और उन्नत उपकरणों में गिने जाते हैं और देश के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

क्या होता है 700 मेगावाट का न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर?

प्रधानमंत्री द्वारा साझा की गई तस्वीर में दिखा स्टीम जनरेटर भारत की परमाणु विनिर्माण यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है। L&T ने वर्ष 2022 में हजीरा प्लांट में पहला स्वदेशी 700 मेगावाट न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर तैयार किया था।

न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर एक विशाल हीट एक्सचेंजर होता है, जिसका इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा प्लांट्स में किया जाता है। इसका मुख्य काम परमाणु रिएक्टर में पैदा होने वाली गर्मी को भाप में बदलना होता है, जिससे बिजली बनाई जाती है।

रिएक्टर के कोर में अत्यधिक गर्मी पैदा होती है। इस गर्मी को कूलेंट सिस्टम के जरिए स्टीम जनरेटर तक पहुँचाया जाता है। यहाँ यह गर्मी दूसरे सर्किट के पानी को दी जाती है, जिससे वह उच्च दबाव वाली भाप में बदल जाता है।

यही भाप बड़े टरबाइनों को चलाती है और टरबाइन जनरेटर के माध्यम से बिजली पैदा करती है। यदि स्टीम जनरेटर न हो तो परमाणु रिएक्टर में उत्पन्न गर्मी को प्रभावी तरीके से बिजली में नहीं बदला जा सकता।

हजीरा में तैयार किए जा रहे ये स्टीम जनरेटर भारत के स्वदेशी 700 मेगावाट प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR) के लिए बनाए गए हैं। भविष्य में भारत के परमाणु ऊर्जा विस्तार की योजनाओं में इन रिएक्टरों की अहम भूमिका होगी।

भारत के लिए यह निर्माण क्षमता क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत में ही इतने बड़े और मुश्किल परमाणु उपकरण बनाने की क्षमता कई कारणों से रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

पहला, इससे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में सरकार की पहल को मजबूती मिलती है और महत्वपूर्ण परमाणु उपकरणों के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम होती है।

दूसरा, इससे भारत नए परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का निर्माण तेजी से कर सकता है और आयात या वैश्विक सप्लाई चेन में आने वाली बाधाओं से बच सकता है।

तीसरा, ऐसे उपकरणों का देश में निर्माण होने से उन्नत इंजीनियरिंग विशेषज्ञता विकसित होती है और हजारों कुशल रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।

भारत ने आने वाले दशकों में अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। बढ़ती बिजली माँग को पूरा करने और कार्बन उत्सर्जन कम करने की रणनीति में परमाणु ऊर्जा को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

फिलहाल न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) देश के कई हिस्सों में स्वदेशी डिजाइन वाले 700 मेगावाट रिएक्टरों का निर्माण कर रहा है। इन परियोजनाओं के लिए L&T और BHEL जैसी कंपनियों द्वारा बनाए जा रहे स्टीम जनरेटर बेहद महत्वपूर्ण हैं।

L&T की हेवी इंजीनियरिंग इकाई पहले ही NPCIL की कई परियोजनाओं के लिए निर्धारित समय से पहले कई 700 मेगावाट स्टीम जनरेटर भेज चुकी है। कंपनी इनका निर्माण हजीरा और वडोदरा स्थित अपने आधुनिक संयंत्रों में करती है।

भारत के परमाणु विस्तार को मिल रहा समर्थन

प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के दौरान चर्चा में आया यह स्टीम जनरेटर भारत की दीर्घकालिक परमाणु ऊर्जा योजनाओं का हिस्सा है। NPCIL के अनुसार, इन उपकरणों का सफल निर्माण और समय पर आपूर्ति भारत को वर्ष 2047 तक परमाणु ऊर्जा उत्पादन में बड़ा विस्तार करने के लक्ष्य को हासिल करने में मदद करेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे अत्याधुनिक परमाणु उपकरणों का स्वदेशी निर्माण भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा करता है जिनके पास उन्नत परमाणु विनिर्माण क्षमता मौजूद है।

दौरे में रक्षा उपकरणों ने भी खींचा ध्यान

हालाँकि न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर सबसे ज्यादा चर्चा में रहा लेकिन प्रधानमंत्री ने इसके अलावा भी कई महत्वपूर्ण रक्षा प्रणालियों का निरीक्षण किया। हजीरा प्लांट  भारत में निजी क्षेत्र द्वारा चलाया जा रहा ट्रैक्ड आर्मर्ड वाहनों का सबसे बड़ा निर्माण केंद्र माना जाता है।

भारतीय सेना के लिए K-9 वज्र स्वचालित तोप प्रणाली के निर्माण में इसकी बड़ी भूमिका रही है। L&T अब तक भारतीय सेना को 100 K-9 वज्र तोपें सौंप चुकी है। इनमें से कई तोपें पूर्वी लद्दाख में लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) के पास तैनात हैं। सरकार ने 100 अतिरिक्त K-9 वज्र तोपों की खरीद को भी मंजूरी दे दी है।

हजीरा प्लांट तब भी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था जब यहाँ स्वदेशी जोरावर लाइट टैंक को पहली बार पेश किया गया था। केवल 19 महीनों में विकसित इस टैंक को विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में ऊँचाई वाले इलाकों में युद्ध के लिए डिजाइन किया गया है और वर्तमान में इसका परीक्षण चल रहा है।

इसके अलावा, भारतीय सेना की फ्यूचरिस्टिक इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल (FICV) परियोजना में भी L&T की महत्वपूर्ण भागीदारी है। इस परियोजना का उद्देश्य सेना के पुराने BMP-2 वाहनों की जगह नए आधुनिक वाहन लाना है।

प्रधानमंत्री मोदी का हजीरा दौरा इस बात का संकेत है कि भारत का औद्योगिक ढाँचा अब देश की रक्षा जरूरतों और महत्वपूर्ण ऊर्जा अवसंरचना को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभा रहा है।

उन्नत तोप प्रणालियों, स्वदेशी टैंकों और अत्याधुनिक न्यूक्लियर स्टीम जनरेटर जैसे उपकरणों का निर्माण करने वाला हजीरा प्लांट उन क्षेत्रों में भारत की आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुका है, जहाँ कभी देश को बड़े पैमाने पर विदेशी तकनीक और आयात पर निर्भर रहना पड़ता था।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

2 दिन मॉर्चरी में रहा मुस्लिम से निकाह करने वाली पारसी महिला का शव: मुस्लिम-पारसी दोनों ने जमीन देने से किया मना, हिंदुओं ने दी विदाई; जानें- बेदखली के नियम

मुस्लिम से निकाह करने वाली गुजरात की एक पारसी महिला का शव इसलिए दो दिनों तक अंतिम संस्कार की बाट जोहता रहा, क्योंकि उसे सुपुर्द ए खाक किए जाने की अनुमति नहीं मिली। शौहर ने कुछ मौलवियों से संपर्क किया। निकाह के बावजूद इस्लामिक रीति से उसे सुपुर्दे खाक करने की इजाजत नहीं दी गई। शौहर के जिंदा रहते भी नहीं। दूसरी तरफ पारसी समुदाय अडा रहा। समाज के मुताबिक अंतिम संस्कार करने की इजाजत नहीं दी गई। आखिर में सनातन रीति रिवाज से महिला का अंतिम संस्कार किया गया।

हिन्दू धर्म अपनी सहनशीलता और दूसरों को अपने में समाहित करने की प्रवृति के लिए जाना जाता है। सनातनियों की इसी खासियत ने सैकड़ों सालों तक आक्रांताओं की कोशिशों के बावजूद इसे जिंदा रखा है। यही सद्भावना और विशालतापूर्व सनातन धर्म ने महिला को गौरवपूर्ण अंतिम विदाई दी।

क्या है पूरा मामला

मुस्लिम से निकाह करने वाली पारसी समुदाय की एक 55 साल की महिला की मौत के बाद अंतिम संस्कार के लिए दो दिन तक उसके शव मॉर्चरी में ही रखा रहा। उसे न तो इस्लामिक तरीके से सुपुर्द ए खाक किया जा रहा था और न ही पारसी समुदाय अपने तरीके से अंतिम संस्कार कर रहा था। ये घटना गुजरात के नवसारी की है, जहाँ शुक्रवार (5 जून 2026) को पारसी महिला के शव को नवसारी के वेरावल इलाके में स्थित श्मशान घाट ले जाया गया। पारसी महिला के कुछ करीबी सदस्यों और उनके शौहर के कई करीबी रिश्तेदारों ने अंतिम संस्कार में भाग लिया।

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, पैंतीस साल पहले नवसारी की पारसी छात्रा ने प्रोफेसर निसार अहमद से निकाह किया था। प्रोफेसर निसार अहमद की मुलाकात छात्रा से तब हुई जब वह गुजराती भाषा में बैचलर कर रही थी। प्रोफेसर वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय से संबद्ध एक स्थानीय कॉलेज में पढ़ाते थे।

दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं। छात्रा ने अपने परिवार से कहा कि वह उस आदमी से शादी करना चाहती है जो उससे 15 साल बड़ा था। महिला के पिता एक निजी फर्म में काम करते थे, जबकि उसकी माँ नवसारी में एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थीं। परिवार की नाराजगी के बीच पारसी छात्रा ने प्रोफेसर अहमद से निकाह कर लिया।

पारसी समाज ने उस छात्रा को अपने समुदाय से बाहर कर दिया और परिवार ने भी उससे रिश्ता तोड़ लिया। महिला को पारसी समुदाय के किसी भी सामाजिक समारोह में भाग लेने की अनुमति नहीं थी। माता-पिता ने लगभग 10 वर्षों तक उससे दूरी बनाए रखी, लेकिन बाद में मान गए।

लेकिन परिवार के करीबी सदस्य के मुताबिक, कुछ साल पहले उन्हें अपने बड़े भाई और छोटी बहन की शादियों में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई थी।

कहा जाता है कि उसने इस्लाम नहीं कबूला था और जोरोस्ट्रियन धर्म को मानती थी। दंपति के कोई बच्चे नहीं हैं। हाल ही में वह बीमार पड़ गई और पारसी लोगों के हॉस्पिटल में कई दिनों तक इलाज के बाद 4 जून को उसकी मौत हो गई।

शौहर ने पारसी समुदाय से संपर्क किया, लेकिन अंतिम संस्कार की इजाजत नहीं मिला। उसने मौलवियों से पूछा, लेकिन मौलवी अड़ गए। इस्लाम जो धर्मांतरण के लिए बदनाम है। छल प्रपंच कर महिलाओं को प्रेम जाल में फँसाने और उसपर धर्मांतरण कर निकाह करने का दबाव डालने से जुड़ी खबरें रोज अखबारों की सुर्खियाँ बनती हैं, उससे जुड़े मौलवियों ने महिला की मौत का ‘सम्मान’ नहीं किया।

महिला की रिश्तेदार के मुताबिक, प्रोफेसर ने एक मुस्लिम कब्रिस्तान के रखवालों से संपर्क किया, जिन्होंने उन्हें इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार शव को दफनाने की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया। परिवारवाले काफी परेशान थे, क्योंकि शव दो दिनों तक अस्पताल के मुर्दाघर में पड़ा रहा। महिला के माता-पिता इस दुनिया में नहीं रहे। उसके भाई और छोटी बहन को उसकी मृत्यु की सूचना दी गई, तो वे भी आ गए।

मृतक महिला की बहन ने कहा, “कोई रास्ता न देखकर नवसारी के समाजसेवी और विश्व हिन्दू परिषद के नेता साजन भरवाड से मदद माँगी। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि यदि हम सभी सहमत हों, तो वे शव का अंतिम संस्कार कर देंगे… जिस पर हम सभी सहमत हो गए।”

दरअसल पारसी यानी जोरोएस्ट्रियन समुदाय भारत के सबसे छोटे और सबसे पुराने धार्मिक समुदायों में से एक है। उनके कई सामाजिकऔर धार्मिक नियम सदियों पुराने हैं, जिनका उद्देश्य अपनी अलग धार्मिक पहचान और परंपराओं को सुरक्षित रखना है। समय के साथ इसमें कोई बदलाव नहीं आया है।

आज भी महिला के बिरादरी से अलग शादी करते ही सारे अथिकार खत्म कर दिए जाते हैं। न तो वह अग्निमंदिर जैसे पूजा स्थल जा सकती है और न ही सामाजिक कार्यक्रम में हिस्सा ले सकती है।

भारत में कैसे आए पारसी

लोकप्रिय पारसी परंपरा के अनुसार, फारस यानी ईरान में इस्लामी विजय के बाद धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए पारसी शरणार्थी के रूप में 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच भारत के पश्चिमी तट खासकर गुजरात में आए थे। ‘किस्सा-ए-संजान’ नामक पारसी परंपरा के मुताबिक, स्थानीय राजा जादी राणा ने उन्हें बसने की अनुमति दी थी।

कथा के अनुसार, पारसियों ने वचन दिया था कि वे स्थानीय समाज में शांतिपूर्वक रहेंगे, स्थानीय भाषा अपनाएँगे और अपनी पहचान बनाए रखते हुए समाज में घुल-मिल जाएँगे। यह ऐतिहासिक परंपरा पारसी समुदाय की सामूहिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

क्यों कम होते जा रहे हैं पारसी

पारसियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि 1941 में देश में एक लाख 14 हजार से अधिक पारसी थे, जो 2011 की जनगणना में घटकर 57 हजार रह गए। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 के तहत अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी में गिरावट को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने कई पहल की है। उन्होंने कहा कि जियो पारसी योजना शुरू की गई है, जिसका उद्देश्य पारसी समुदाय में विवाह, परिवार और बच्चों के जन्म को प्रोत्साहित देना है।

पारसी समुदाय की प्रजनन दर भारत के लगभग सभी बड़े समुदायों से काफी कम है। बड़ी संख्या में युवा पारसी विवाह नहीं करते या काफी देर से करते हैं। बूढों की आबादी ज्यादा हो गई है। मृत्यु दर जन्म दर से ज्यादा है। दूसरे धर्म में विवाह को लेकर नियम काफी सख्त हैं। अगर कोई महिला दूसरे धर्म में विवाह करती है तो उसकी धार्मिक पहचान खत्म कर दी जाती है। यहाँ तक कि बच्चों के धार्मिक पहचान पर भी विवाद रहता है। भारत से बड़ी संख्या में पारसी विदेशों में जाकर बस गए हैं। ये भी उनकी संख्या कम होने की बड़ी वजह है।

मोदी सरकार के बड़े फैसलों से भारत में आएगी ₹6 लाख करोड़ की FDI, ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड इंडेक्स में एंट्री की तैयारी: समझें किन कदमों से बदले हालात

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में शनिवार (6 जून 2026) को आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की बैठक हुई। बैठक में चर्चा हुई कि केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा 5 जून को उठाए गए कदमों से भारत में करीब 70 अरब डॉलर (लगभग 6 लाख करोड़ रुपए) का विदेशी निवेश आ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन फैसलों से विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा और भारत में पूँजी प्रवाह तेज होगा। इससे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, सरकार की उधारी लागत कम हो सकती है और वैश्विक वित्तीय बाजारों में भारत की स्थिति और बेहतर होगी।

बैठक में वैश्विक अस्थिरता के दौर में भारत की आर्थिक वृद्धि को गति देने, दीर्घकालिक विकास प्राथमिकताओं और सुधारों को आगे बढ़ाने पर विचार-विमर्श किया गया। बैठक में प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव पीके मिश्रा, प्रधान सचिव और पूर्व RBI गवर्नर शक्तिकांत दास, परिषद के अध्यक्ष एस महेंद्र देव सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।

बैठक के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि भारत के आर्थिक परिवर्तन, दीर्घकालिक विकास और सुधारों की गति को बढ़ाने पर व्यापक चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि ‘Ease of Living’ और ‘Ease of Doing Business’ को और मजबूत बनाने के उपायों पर भी विचार साझा किए गए।

सरकार और RBI ने क्या कदम उठाए?

विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए वित्त मंत्रालय ने बड़ा कर सुधार किया है। सरकार ने विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के सरकारी बॉन्ड में निवेश पर लगने वाले शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन टैक्स को समाप्त कर दिया है। इसके अलावा सरकारी बॉन्ड से मिलने वाली ब्याज आय पर लगने वाला विदहोल्डिंग टैक्स भी हटा दिया गया है।

वहीं RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक में गवर्नर संजय मल्होत्रा ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखने का फैसला किया। केंद्रीय बैंक ने भू-राजनीतिक तनाव, महंगाई और सप्लाई चेन संबंधी चिंताओं के बीच न्यूट्रल रुख बनाए रखा। इसके साथ ही RBI ने विदेशी पूँजी आकर्षित करने के लिए कई अतिरिक्त कदमों की घोषणा की।

इनमें सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के लिए एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग (ECB) जुटाने हेतु रियायती फॉरेक्स स्वैप सुविधा और FCNR(B) डिपॉजिट योजना को फिर से शुरू करना शामिल है। इस योजना के तहत विदेशी मुद्रा जमा पर हेजिंग लागत RBI वहन करेगा। वर्ष 2013 में इसी योजना के जरिए भारत ने लगभग 26 अरब डॉलर जुटाए थे।

क्यों है 70 अरब डॉलर निवेश की उम्मीद?

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि वित्त मंत्रालय और RBI द्वारा उठाए गए कदम विदेशी निवेशकों के लिए भारत को अधिक आकर्षक बनाएँगे। करों में राहत मिलने से विदेशी निवेशकों की लागत कम होगी, जबकि RBI की नई सुविधाएँ बाहरी वित्तपोषण को आसान बनाएँगी।

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी कहा है कि केंद्रीय बैंक किसी निश्चित निवेश लक्ष्य को लेकर काम नहीं कर रहा है, लेकिन उसे बाहरी उधारी, विदेशी जमा और इक्विटी निवेश के माध्यम से मजबूत पूँजी प्रवाह की उम्मीद है। इन कदमों से भारत के भुगतान संतुलन (Balance of Payments) को भी मजबूती मिल सकती है।

ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड इंडेक्स क्यों है महत्वपूर्ण?

भारत में संभावित विदेशी निवेश का बड़ा हिस्सा भारतीय सरकारी बॉन्ड्स के ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड इंडेक्स में शामिल होने पर निर्भर माना जा रहा है। दुनिया के कई बड़े निवेश फंड इन वैश्विक बॉन्ड इंडेक्स को ट्रैक करते हैं और उसी के आधार पर निवेश करते हैं।

यदि भारतीय सरकारी बॉन्ड इस प्रमुख इंडेक्स में शामिल होते हैं, तो बड़ी मात्रा में निष्क्रिय (Passive) निवेश अपने आप भारत की ओर आएगा। विशेषज्ञों के अनुसार, केवल इस इंडेक्स में शामिल होने से अगले 10 महीनों में 20 से 25 अरब डॉलर तक का निवेश आ सकता है।

भारत पहले ही कई प्रमुख वैश्विक बॉन्ड सूचकांकों में जगह बना चुका है। जून 2024 में JPMorgan ने भारतीय बॉन्ड को अपने उभरते बाजार सूचकांक में शामिल किया था। इसके बाद जनवरी 2025 में ब्लूमबर्ग इमर्जिंग मार्केट लोकल करेंसी इंडेक्स और सितंबर 2025 में FTSE Russell के संबंधित सूचकांक में भी भारतीय सरकारी बॉन्ड शामिल किए गए।

हालाँकि जनवरी 2026 में Bloomberg Index Services Ltd (BISL) ने भारतीय सरकारी बॉन्ड को अपने प्रमुख ग्लोबल इंडेक्स में शामिल करने का फैसला टाल दिया था। कंपनी ने कहा था कि बाजार ढाँचे और परिचालन संबंधी कुछ मुद्दों पर और मूल्यांकन की जरूरत है। BISL ने संकेत दिया था कि इस विषय पर अगला अपडेट 2026 के मध्य तक दिया जाएगा।

भारत के लिए कितना बड़ा अवसर?

सरकार की कर राहत, RBI की नई निवेश प्रोत्साहन योजनाएँ, मजबूत GDP वृद्धि और ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड इंडेक्स में संभावित शामिल होने की संभावना मिलकर भारत के लिए बड़ा अवसर पैदा कर रही हैं। यदि ये सभी परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं, तो आने वाले महीनों में भारत में करीब 70 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आ सकता है।

इससे न केवल विदेशी मुद्रा भंडार और निवेश बढ़ेगा, बल्कि सरकार की उधारी लागत कम होगी, वित्तीय बाजारों को मजबूती मिलेगी और वैश्विक निवेशकों के बीच भारत की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी। ऐसे समय में जब दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ अनिश्चितता का सामना कर रही हैं, भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण आर्थिक अवसर माना जा रहा है।