उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले से गंभीर मामला सामने आया। यहाँ के अकबरपुर कोतवाली इलाके में स्थित एक प्राचीन शिव मंदिर परिसर में कचरा फेंकने और गंदगी फैलाने को लेकर भारी बवाल हो गया। इस घटना में एक मुस्लिम परिवार और उनके साथ आए दर्जनों इस्लामिक भीड़ पर शिव मंदिर परिसर को अपवित्र करने और विरोध करने पर एक हिंदू युवक पर तलवार से जानलेवा हमला करने का आरोप लगा है।
इस पूरी वारदात के कई Videos सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। घटना की जानकारी मिलते ही उत्तर प्रदेश पुलिस तुरंत एक्शन लिया और 2 आरोपितों को गिरफ्तार किया। इस पूरे मामले की FIR कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है।
संदर्भित प्रकरण में वादी की तहरीर के आधार पर सुसंगत धाराओं में अभियोग पंजीकृत कर 02 नफर अभियुक्तों को गिरफ्तार किया जा चूका है।
— AMBEDKARNAGAR POLICE (@ambedkarnagrpol) June 9, 2026
मंदिर परिसर में कचरा फेंकने से शुरू हुआ विवाद
पूरा मामला अंबेडकर नगर के अकबरपुर कोतवाली क्षेत्र का बताया जा रहा है। FIR के मुताबिक, मीरानपुर लालाघाट निवासी उमेश सोनकर शिव मंदिर में पूजा-पाठ और शिव कथा में शामिल थे। इसी दौरान मोहल्ले के कुछ इस्लामिक कट्टरपंथी वहाँ पहुँचे और मंदिर परिसर के बाहर गंदगी फैलाने लगे।
A Muslim family broke the municipal dustbin and started dumping garbage inside temple premises in Ambedkar Nagar, UP.
When a Hindu man politely asked them to stop, they came armed with a sword, attacked him and claimed "this is mosque land, not temple. pic.twitter.com/rLDf8bnSb4
— Team Hindu United (@TeamHinduUnited) June 8, 2026
आरोप है कि हाजी गयास, अरमान, अबरार, राजा और उनके साथ आए 20 से 25 अन्य इस्लामिक कट्टरपंथियों ने वहाँ कचरा फेंकना शुरू कर दिया। शिकायत में कहा गया है कि आरोपितों ने पहले नगर पालिका का डस्टबिन तोड़ा और फिर मंदिर के आसपास गंदगी फैलाने लगे।
विरोध करने पर धारदार हथियारों से बोला धावा
जब हाजी गयास, अरमान, अबरार और राजा नाम के युवक मंदिर के पास गंदगी फैलाने लगे, तो वहाँ मौजूद उमेश सोनकर और मोहल्ले के अन्य लोगों ने उन्हें ऐसा करने से मना किया। हिंदुओं ने बेहद शालीनता और शांति से उन्हें समझाया कि यह आस्था का केंद्र है और यहाँ कचरा न फेंके।
लेकिन इतना सुनते ही आरोपित पक्ष अचानक उग्र हो गया। उन्होंने तुरंत अपने अन्य साथियों को वहाँ बुला लिया। देखते ही देखते हाजी गयास, अरमान, अबरार और राजा के साथ 20 से 25 अज्ञात लोग लाठी-डंडे और धारदार तलवार लेकर मौके पर धमक पड़े। इन सभी लोगों ने एक राय होकर हिंदू श्रद्धालुओं को घेर लिया।
मस्जिद की जमीन बताकर किया जानलेवा हमला
इस्लामिक कट्टरपंथियों ने मंदिर परिसर के सामने खड़े होकर हिंदुओं को गंदी-गंदी गालियाँ देना शुरू कर दिया। उन्होंने चीखते-चिल्लाते हुए हिंदुओं को जान से मारने की धमकी दी। आरोपितों का कहना था कि यह जमीन मंदिर की संपत्ति नहीं है बल्कि यह मस्जिद की जमीन है। इसी बात को लेकर उन्होंने डस्टबिन तोड़ दिया और विवाद को आगे बढ़ाया।
इसके बाद आरोपितों ने हथियारों से लैस होकर उमेश सोनकर और अन्य लोगों पर जानलेवा हमला बोल दिया। इस अचानक हुए हमले में उमेश सोनकर को गंभीर चोटें आई हैं। हमलावरों ने मंदिर की पवित्रता को भंग करने की पूरी कोशिश की और वहाँ मौजूद श्रद्धालुओं में दहशत फैला दी।
पुलिस का त्वरित एक्शन और 2 आरोपित गिरफ्तार
इस घटना के बाद पीड़ित उमेश सोनकर ने तुरंत अकबरपुर कोतवाली में तहरीर देकर न्याय की गुहार लगाई। पुलिस ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए बिना किसी देरी के हाजी गयास, अरमान, अबरार, राजा और 20-25 अन्य अज्ञात लोगों के खिलाफ सुसंगत और गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया।
FIR कॉपी की एक प्रति
अंबेडकर नगर पुलिस ने आधिकारिक बयान जारी कर बताया है कि पीड़ित की तहरीर के आधार पर तत्काल केस दर्ज किया गया। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए इस मामले में नामजद दो आरोपितों को धर-दबोचा है। इलाके में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल तैनात किया गया है और बाकी फरार आरोपितों की तलाश में छापेमारी की जा रही है।
मद्रास हाई कोर्ट ने 5 जून को दरगाह और वक्फ बोर्ड की संपत्ति को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट का कहना है कि किसी दरगाह का किसी जगह पर होना ही इस बात का सबूत नहीं है कि जिस जमीन पर वो है, वो वक्फ की प्रॉपर्टी बन जाए। कोर्ट ने साफ किया कि वक्फ बोर्ड को जमीन पर अपना हक साबित करने के लिए डॉक्यूमेंट्स और प्रोसिजर को फॉलो करना होगा।
240 साल पुरानी दरगाह से जुड़े मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने देखा कि जमीन का ना तो वक्फ सर्वे हुआ था और न ही उसे वक्फ प्रॉपर्टी के तौर पर नोटिफाइड किया गया था। इसी आधार पर दरगाह के रजिस्ट्रेशन के आदेश को कोर्ट ने रद्द कर दिया।
तमिलनाडु वक्फ बोर्ड बनाम सैयद हबीबुल्लाह शाह कहदारी के मामले में न्यायमूर्ति के गोविंदराजन थिलाकवाड़ी ने कहा कि वक्फ बोर्ड को कानूनी रूप से भूमि पर स्वामित्व साबित करना होगा। कोर्ट ने कहा, किसी दरगाह होने मात्र से वह वक्फ बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में नहीं आ जाता, जब तक कि कानून के मुताबिक वह भूमि वक्फ की संपत्ति माना न जाए।
न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि हर कब्र या दरगाह अपने आप वक्फ की संपत्ति नहीं बन जाती। उन्होंने साफ किया कि मुस्लिम कानून के मुताबिक किसी धार्मिक उद्देश्य के लिए जब कोई मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति को पूरी तरह से दे देता है, तब वह वक्फ बोर्ड का होता है।
कोर्ट ने तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया, जिसमें ट्रिप्लिकेन में मौजूद सैय्यद हबीबुल्लाह शाह खदारी आरिफ रब्बानी हजरत दरगाह के लिए बोर्ड ने एक मुतवल्ली नियुक्त किया था। बोर्ड ने बगैर सर्वेक्षण पूरा किए वक्फ अधिनियम के तहत रजिस्ट्रेशन का भी निर्देश दिया था।
240 साल पुराने दरगाह का 40 साल से परिवार कर रहा देखरेख
ये मामला ट्रिप्लिकेन के 240 साल पुराने दरगाह से जुड़ा हुआ है।इसकी देखरेख याचिकाकर्ता का परिवार पिछले 40 साल से कर रहा है। उसने वक्फ बोर्ड के फैसले को कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि जमीन लोक निर्माण विभाग की है, न की वक्फ बोर्ड की।
याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में कहा कि वक्फ अधिनियम के तहत प्रक्रिया का पालन किए बगैर संपत्ति को वक्फ संपत्ति घोषित करने या किसी मुतवल्ली को नियुक्त करने का अधिकार वक्फ बोर्ड को नहीं है।
तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने कोर्ट में इसका विरोध करते हुए कहा कि भूमि और आसपास का क्षेत्र दरगाह का है और बाद में यह लोकनिर्माण विभाग में आ गया।
लोक निर्माण विभाग ने कोर्ट को बताया कि यह सरकारी भूमि था और इसे भारत स्काउट्स एंड गाइड्स को बिना किराए के आवंटित किया गया था। विभाग ने यह भी आरोप लगाया कि परिवार ने उसकी सहमति के बिना दरगाह की भूमि को धोखाधड़ी से पंजीकृत कराया था।
कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे साबित हो सके कि संपत्ति वक्फ बोर्ड की है। इसलिए वक्फ बोर्ड के दावे को खारिज कर दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि हर कब्र और दरगाह को खुद ब खुद वक्फ संपत्ति नहीं माना जा सकता है और कोर्ट को निजी पारिवारिक कब्र और सार्वजनिक धार्मिक उद्देश्य वाली जमीन में अंतर करना होगा।
कोर्ट ने कहा, ” यदि किसी दरगाह का कभी सर्वेक्षण नहीं किया गया है, उसे पंजीकृत नहीं किया गया है या वक्फ के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया है, तो वक्फ बोर्ड सामान्यतः केवल इसलिए स्वतः नियंत्रण ग्रहण नहीं कर सकता क्योंकि वह एक मुस्लिम धार्मिक संस्था है।”
वक्फ बोर्ड को किसी संस्था पर नियंत्रण रखने से पहले उस पर उसका अधिकार है, इससे जुड़े दस्तावेज और दूसरे सबूत देने होंगे। ऐसा कोई कानूनी दस्तावेज नहीं है, जिससे साबित हो कि संपत्ति वक्फ बोर्ड को दी गई थी या यह बोर्ड की संपत्ति थी। बिना सर्वे के दरगाह को पंजीकृत कराना गलत है
नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में जब ‘इंडी गठबंधन’ (INDIA Bloc) के नेता एक बार फिर मेज के इर्द-गिर्द इकट्ठा हुए, तो कैमरों की चमक और मुस्कुराते चेहरों के पीछे एक ऐसी राजनीतिक बेबसी और कड़वाहट साफ नजर आ रही थी जिसे छिपाना नामुमकिन था। मंच पर एकजुटता के कसीदे पढ़े जा रहे थे, लेकिन पर्दे के पीछे की हकीकत यह थी कि इस गठबंधन में शामिल हर दल अपनी ढपली पर अपना ही राग अलाप रहा था।
यह बैठक किसी दूरगामी नीति या भविष्य के सुनहरे रोडमैप के लिए नहीं, बल्कि हालिया चुनावी शिकस्तों से सहमे क्षेत्रीय क्षत्रपों की ‘अस्तित्व बचाने’ की एक सामूहिक छटपटाहट मात्र थी। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा राजनीतिक झटका तब लगा जब दिल्ली में विपक्षी एकजुटता का दिखावा चल रहा था और ठीक उसी वक्त कोलकाता से लेकर दिल्ली तक अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के पैरों के नीचे से राजनीतिक जमीन खिसक चुकी थी।
ममता बनर्जी का ‘यू-टर्न’ और एक झटके में बिखराव की कहानी
इस बैठक की सबसे दिलचस्प और विरोधाभासी तस्वीर ममता बनर्जी की मौजूदगी थी। राजनीति में अवसरवादिता और मजबूरियों का इससे बड़ा उदाहरण शायद ही कोई दूसरा हो। जब तक पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों के नतीजे नहीं आए थे, तब तक ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस इस इंडी गठबंधन को ठेंगा दिखा रही थी।
सीटों के तालमेल से लेकर साझा रैलियों तक दीदी ने कॉन्ग्रेस और अन्य सहयोगियों को भाव देना भी मुनासिब नहीं समझा था। लेकिन हाल ही में पश्चिम बंगाल में मिली करारी चुनावी हार ने उनके तेवर ढीले कर दिए। जो ममता कल तक गठबंधन से दूरी बना रही थीं, वो हार के तुरंत बाद दिल्ली की बैठक में शामिल होने दौड़ पड़ीं।
मगर नियति का खेल देखिए जिस वक्त ममता बनर्जी दिल्ली में इंडी गठबंधन की बैठक में मंच साझा कर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता साबित करने की कोशिश कर रही थीं, ठीक उसी समय उनकी अपनी पार्टी में एक ऐतिहासिक बगावत हो चुकी थी। लोकसभा में तृणमूल कॉन्ग्रेस के 20 सांसदों ने एकमत होकर पार्टी आलाकमान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और खुद को एक अलग गुट के रूप में मान्यता देने के लिए लोकसभा स्पीकर को पत्र सौंप दिया। इसके साथ ही राज्यसभा के भी एक सांसद ने सांसदी और अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
यानी एक तरफ दीदी दिल्ली में विपक्षी एकता की नई स्क्रिप्ट लिख रही थीं, तो दूसरी तरफ एक ही झटके में उनके 21 सांसद कम हो चुके थे। पार्टी का यह अंदरूनी बिखराव यह बताने के लिए काफी है कि जो दल खुद को नहीं संभाल पा रहे, वे देश को विकल्प देने का दावा कर रहे हैं।
अतीत के पन्ने, संयोजक पद का विवाद और बर्बादी की शुरुआत
इंडी गठबंधन के इस ताजा तमाशे को समझने के लिए थोड़ा फ्लैशबैक में जाना जरूरी है। इस गठबंधन की बुनियाद में ही महत्वाकांक्षाओं का जो बारूद भरा था, उसने इसकी बर्बादी की पटकथा बहुत पहले लिख दी थी। जब जनता दल यूनाइटेड (JDU) के तत्कालीन नेता नीतीश कुमार को इस गठबंधन का संयोजक बनाने की बात चल रही थी, तब तृणमूल कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी (AAP) ने मिलकर इसका तीखा विरोध किया था।
ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल की जोड़ी नहीं चाहती थी कि गठबंधन की कमान किसी ऐसे नेता के हाथ में जाए जो उनके अपने राष्ट्रीय उभार के आड़े आए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उसी अहं और आपसी खींचतान के बिंदु से इंडी गठबंधन के पतन और बर्बादी की शुरुआत हो गई थी, जो आज तक थमने का नाम नहीं ले रही है।
डीएमके और आप की बेरुखी, धोखे और मजबूरी का गणित
इस बार की बैठक में कुछ चेहरों की गैरमौजूदगी ने भी गठबंधन के खोखलेपन को पूरी तरह उजागर कर दिया। द्रमुक (DMK) और आम आदमी पार्टी (AAP) इस बैठक से पूरी तरह नदारद रहीं। तमिलनाडु में डीएमके और कॉन्ग्रेस का रिश्ता अब उस मोड़ पर पहुँच चुका है जहाँ केवल औपचारिकताएँ बची हैं। दरअसल तमिलनाडु के हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों में कॉन्ग्रेस ने जिस तरह तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) के प्रति अपनी नजदीकियाँ बढ़ाईं, उसे डीएमके ने एक बड़े धोखे के रूप में देखा।
दिलचस्प बात यह है कि कॉन्ग्रेस ने जिस टीवीके के चक्कर में अपनी पुरानी सहयोगी डीएमके को नाराज किया या धोखा दिया, उसे इस बैठक में आमंत्रित तक नहीं किया गया। जब सवाल उठा तो बेहद लचर बहाना बनाया गया कि टीवीके के पास कोई सांसद नहीं है, इसलिए उन्हें नहीं बुलाया गया।
वहीं दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी ने भी इस बैठक से दूरी बनाए रखना ही बेहतर समझा। चुनावी मैदान में एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोकने और फिर दिल्ली में आकर गले मिलने की इस नौटंकी से अब ये दल खुद भी असहज होने लगे हैं।
हेमंत सोरेन की दूरी और केरल का ‘एजेंट’ विवाद
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की रणनीति भी इस बैठक में ढुलमुल ही नजर आई। उन्होंने खुद इस बैठक में शामिल होने के बजाय अपनी जगह एक प्रतिनिधि को भेजकर केवल कोरम पूरा किया। यह साफ तौर पर दर्शाता है कि अब क्षेत्रीय दलों को भी इस बात का अहसास हो चुका है कि इंडी गठबंधन के मंच से उन्हें केवल नुकसान ही होना है।
इससे भी ज्यादा कड़वाहट वामपंथियों और कॉन्ग्रेस के बीच देखने को मिली। सीपीआई(एम) (CPI-M) ने खुलकर आरोप लगाया कि इस गठबंधन में उनके नेता और केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की घोर बेइज्जती की गई है। यह वही गठबंधन है जहाँ चुनावी रैलियों में खुद राहुल गांधी ने अपने ही सहयोगी दल के नेता को बीजेपी का ‘एजेंट’ तक करार दे दिया था।
हालाँकि केरल की राजनीतिक जमीन पर ये दोनों पार्टियाँ (कॉन्ग्रेस और वामदल) हमेशा से आमने-सामने रही हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर दोस्ती का जो ढोंग ये रचते हैं, उसकी कलई विजयन और राहुल गांधी के बयानों से बार-बार खुल जाती है। सीपीआई(एम) के नेताओं ने इस बैठक में भी कॉन्ग्रेस से इस अपमान पर स्पष्टीकरण की मांग की, जिससे बैठक का माहौल और तनावपूर्ण हो गया।
हार के मलबे पर खड़ी पार्टियों का जमावड़ा
अगर इस बैठक में शामिल हुए दलों के ट्रैक रिकॉर्ड पर नजर डालें, तो यह साफ हो जाता है कि यह कोई वैचारिक गठबंधन नहीं, बल्कि पराजित और कमजोर हो चुके दलों का एक शेल्टर होम (आश्रय स्थल) बन चुका है। शरद पवार की राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) का हश्र किसी से छिपा नहीं है, पार्टी पहले ही टूट चुकी है और लगभग बर्बाद होने की कगार पर है। बैठक में पहुँचे अन्य दल भी किसी न किसी बड़ी चुनावी शिकस्त का दंश झेलकर ही वहाँ पहुँचे थे।
चाहे महबूबा मुफ्ती की पीडीपी (PDP) हो, अरविंद केजरीवाल की आप (AAP) हो या फिर बिहार में सत्ता से बेदखल हुई आरजेडी (RJD) इन सभी पार्टियों के पास न तो आज कोई ठोस राष्ट्रीय नीति बची है और न ही कोई स्पष्ट भविष्य नजर आ रहा है।
इन क्षेत्रीय दलों की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जब ये अपने-अपने राज्यों में मजबूत होते हैं, तो कॉन्ग्रेस और इस गठबंधन को ठेंगा दिखाते हैं, और जैसे ही जनता इन्हें नकार देती है, ये अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने के लिए ‘संविधान और लोकतंत्र’ के नाम पर दिल्ली में एकजुट होने का स्वांग रचने लगते हैं।
केवल दिखावे की डोर से बंधी एकजुटता
पॉलिटिकल कमेंट्री के नजरिए से देखें तो यह बैठक विपक्षी राजनीति के उस संकट को दर्शाती है जहां नीतियां गौण हैं और सिर्फ निजी व दलीय अस्तित्व को बचाए रखने की मजबूरी सर्वोपरि है। तृणमूल कॉन्ग्रेस का 21 सांसदों के नुकसान के बावजूद इस बैठक में बैठना, वामदलों का अपमान का घूँट पीकर भी हाजिरी लगाना और प्रमुख दलों का इस बैठक से कन्नी काट जाना… यह सब इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि ‘इंडी गठबंधन’ आज अपनी ही अंतर्विरोधों की ढपली और अपने ही स्वार्थों के राग में उलझकर रह गया है।
जनता के सामने विकल्प पेश करने का दावा करने वाले इन नेताओं के पास अपनी ही पार्टियों के बिखराव को रोकने का कोई फॉर्मूला नहीं है, ऐसे में यह तथाकथित एकजुटता केवल एक राजनीतिक तमाशे से ज्यादा कुछ नहीं दिखती।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के 15 साल के शासन के दौरान कई बार हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएँ सामने आईं। चुनाव बाद हुई हिंसा, CAA विरोधी दंगे और वक्फ संशोधन विधेयक के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं को लेकर विपक्ष लगातार राज्य सरकार पर सवाल उठाता रहा।
अब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने 2019 में CAA के विरोध में हुए दंगों की जाँच कराने का फैसला किया है, जिनमें रेलवे की संपत्तियों को भारी नुकसान पहुँचा था। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने पुलिस महानिदेशक सिद्ध नाथ गुप्ता को निर्देश दिया है कि 2019 के CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान आगजनी, तोड़फोड़ और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने से जुड़े सभी मामलों की समीक्षा की जाए।
खास तौर पर रेलवे की संपत्तियों को हुए नुकसान की जाँच की जाएगी। इसके लिए एक विशेष पुलिस सेल बनाई जाएगी, जो सत्यापित मामलों की जाँच करेगी। सरकार का दावा है कि मुर्शिदाबाद, हावड़ा और अन्य इलाकों में हुए दंगों के कारण रेलवे को करीब 93 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था।
जाँच के बाद इस नुकसान की भरपाई दंगों में शामिल लोगों से कराने की भी कोशिश की जाएगी। यह फैसला केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के साथ हुई बैठक के बाद लिया गया है।
पश्चिम बंगाल में CAA-विरोधी दंगे और TMC सरकार का परोक्ष समर्थन
12 दिसंबर 2019 को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) पारित किया गया था। इस कानून का उद्देश्य पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई और पारसी समुदाय के उन लोगों को भारतीय नागरिकता देने की प्रक्रिया आसान बनाना था, जो 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आ चुके थे।
हालाँकि CAA में मुस्लिमों को शामिल नहीं किए जाने को लेकर देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। विपक्षी दलों और कई संगठनों ने आरोप लगाया कि यह कानून भेदभावपूर्ण है। यह भी दावा किया गया कि CAA को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) से जोड़कर लागू किया जाएगा और इससे भारतीय मुस्लिमों की नागरिकता खतरे में पड़ सकती है।
इन दावों के बाद देशभर में CAA विरोधी प्रदर्शन तेज हो गए। उस समय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी लगातार CAA के खिलाफ रैलियाँ और प्रदर्शन कर रही थीं। विरोध प्रदर्शनों के बीच कई राज्यों में हालात तनावपूर्ण हो गए और कुछ जगहों पर हिंसा भी हुई।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने कई सभाओं में CAA का विरोध करते हुए कहा था कि यह कानून उनकी लाश पर ही लागू हो सकेगा। 16 दिसंबर 2019 को उन्होंने एक रैली में कहा था, “अगर CAA लागू करना है तो मेरी लाश पर करना होगा।” इसी दौरान 14 दिसंबर 2019 को पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले में हिंसा भड़क उठी।
मुस्लिम भीड़ ने लालगोला और कृष्णापुर रेलवे स्टेशनों पर खड़ी पाँच खाली ट्रेनों में आग लगा दी। सूती इलाके में रेलवे ट्रैक को नुकसान पहुँचाया गया, जबकि बेलडांगा रेलवे स्टेशन को भी निशाना बनाया गया। मुर्शिदाबाद जिले में कई रेलवे स्टेशनों पर तोड़फोड़ की गई और एक टोल प्लाजा में भी आगजनी की घटना सामने आई।
2019 में CAA-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान भीड़ ने ट्रेनों, रेलवे काउंटरों, कोचों और रेलवे की बड़ी संपत्तियों को पहुँचाया था नुकसान
CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हिंसा केवल मुर्शिदाबाद तक सीमित नहीं रही, बल्कि हावड़ा जिले में भी कई जगहों पर तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएँ सामने आईं। उलूबेरिया रेलवे स्टेशन पर दंगाईयों ने रेलवे ट्रैक जाम कर दिए, जिससे ट्रेन सेवाएँ प्रभावित हुईं। इस दौरान स्टेशन परिसर और कुछ ट्रेनों में भी तोड़फोड़ की गई तथा पथराव की घटनाएँ हुईं।
अधिकारियों के अनुसार, पथराव में एक ट्रेन चालक घायल हो गया था। हिंसा का असर पूर्व रेलवे के सियालदह मंडल की रेल सेवाओं पर भी पड़ा। इसके अलावा पूर्व रेलवे के मालदा मंडल के अंतर्गत आने वाले सुजनीपाड़ा रेलवे स्टेशन पर भी हमला किया गया।
हावड़ा जिले के सांकराइल रेलवे स्टेशन के टिकट काउंटर को निशाना बनाया गया और स्टेशन परिसर में आग लगा दी गई। वहीं निमतीता रेलवे स्टेशन पर भी प्रदर्शनकारियों ने रेलवे संपत्ति को नुकसान पहुँचाया और पथराव किया। इन घटनाओं के कारण कई इलाकों में रेल सेवाएँ बाधित हुईं और रेलवे को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
Anti-CAB protesters set the ticket counter at Sankrail railway station on fire in Howrah district pic.twitter.com/5fSws6mYRz
हिंसा के दौरान रेलवे ट्रैक पर टायर जलाकर ट्रेनों का संचालन रोक दिया गया। कई जगहों पर पथराव की घटनाएँ भी हुईं। स्थिति को नियंत्रित करने पहुँची पुलिस की एक गाड़ी को भी आग के हवाले कर दिया गया। हालात बिगड़ने के बाद एहतियात के तौर पर कई ट्रेनों को रद्द करना पड़ा।
वहीं कानून-व्यवस्था बनाए रखने और अफवाहों को रोकने के लिए राज्य के छह जिलों में इंटरनेट सेवाएँ भी अस्थायी रूप से बंद कर दी गई थीं।
CAA-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान मुस्लिम भीड़ ने रेलवे की संपत्ति को पहुँचाया था निशान
12 से 16 दिसंबर 2019 के बीच पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद, बीरभूम और उत्तर 24 परगना समेत कई जिलों में CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएँ सामने आईं। दक्षिण 24 परगना जिले में नुंगी और आक्रा रेलवे स्टेशनों के बीच दंगाईयों द्वारा रेलवे ट्रैक जाम किए जाने से रेल सेवाएँ बुरी तरह प्रभावित हुईं।
आक्रा रेलवे स्टेशन में तोड़फोड़ की गई और बाद में उसमें आग लगा दी गई। इसके अलावा टिकट काउंटर में रखी नकदी भी लूट लिए जाने की खबरें सामने आईं। उस समय ऑपइंडिया ने पश्चिम बंगाल में जिहादी दंगों के दौरान एक स्थानीय बंगाली, शंखदीप शोम के भयावह अनुभव पर रिपोर्ट की थी।
एक फेसबुक पोस्ट में शोम ने बताया कि वह यूपी हावड़ा-चेन्नई सेंट्रल कोरोमंडल एक्सप्रेस में सवार थे, जो शुक्रवार को दोपहर लगभग 3:20 बजे हावड़ा-खड़गपुर खंड पर उलुबेरिया स्टेशन पर पहुँची थी।
उन्होंने बताया कि स्टेशन से सटी एक मस्जिद में जुम्मे की नमाज के बाद करीब 500-700 उपद्रवियों की एक बड़ी भीड़ निकली, जिन्होंने स्टेशन के बाहर लेवल क्रॉसिंग के पास रेलवे लाइन को जाम कर दिया, जिसके कारण ट्रेन सेवाएँ प्रभावित हुईं और यात्रियों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।
ट्रेनों में तोड़-फोड़-स्टेशनों पर आगजनी, लेकिन राजनीति करने और जिहादी हिंसा को कमतर दिखाने में व्यस्त थीं ममता सरकार
जब बंगाल जल रहा था, तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आग में घी डालने और खुद को ‘धर्मनिरपेक्षता’ का रक्षक बताने वाली अपनी छवि को चमकाने के तरीके ढूँढ रही थीं।
याद दिला दें कि पश्चिम बंगाल में विरोध-प्रदर्शनों के बीच, तत्कालीन गवर्नर जगदीप धनखड़ ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उस विज्ञापन को असंवैधानिक बताया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि NRC और नागरिकता संशोधन कानून लागू नहीं किए जाएँगे।
गवर्नर ने कहा था कि सरकार के प्रमुख के तौर पर ममता बनर्जी ऐसे विज्ञापनों के लिए सरकारी फंड का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं। इस बीच बीजेपी ने आरोप लगाया था कि सीमावर्ती जिलों में मुस्लिम भीड़ हिंदू घरों पर हमले कर रही थी।
बंगाल में बांग्लादेश से लगे सभी जिलों में घुसपैठियों द्वारा हिन्दुओं के घरों में लूटपाट और आगजनी की जा रहा है। pic.twitter.com/3lyShh8s8F
13 से 17 दिसंबर 2019 के बीच कई जगहों पर TMC कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर मुस्लिम दंगाइयों ने 19 से ज्यादा रेलवे स्टेशनों और 20 ट्रेनों में तोड़-फोड़ की या उन्हें आग के हवाले कर दिया। दंगाइयों ने गुजरती ट्रेनों पर पत्थर भी फेंके, टिकट बुकिंग काउंटरों में तोड़-फोड़ की, पैसे चुराए और रेल की पटरियों को घेर लिया।
रेलवे को हुआ भारी नुकसान, करोड़ों की संपत्ति नष्ट, सैकड़ों ट्रेनें करनी पड़ीं रद्द
परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल में रेल मंत्रालय को लगभग 655 ट्रेनें रद्द करनी पड़ीं। रेलवे परिसर में दंगे और आगजनी के कई मामलों में लगभग 17 FIR दर्ज की गईं। पूर्वी रेलवे (ER) ने कथित तौर पर 127 मेल/एक्सप्रेस ट्रेनें, 190 यात्री ट्रेनें और 290 उपनगरीय ट्रेनें रद्द कीं।
दक्षिण-पूर्वी रेलवे के खड़गपुर डिवीजन को अकेले जिहादी भीड़ की हिंसा के कारण लगभग 16 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ, क्योंकि 13 से 17 दिसंबर 2019 के बीच 48 ट्रेनें रद्द की गईं, छह स्टेशनों में तोड़फोड़ की गई, पाँच ट्रेनों में आग लगा दी गई और RPF टीमों पर दंगाइयों ने हमला किया।
हालाँकि तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जिन्होंने कई मौकों पर यह दावा किया था कि वह काफिर नहीं हैं और वह काफिरों से लड़ती हैं, ने मुस्लिम भीड़ हिंसा की घटनाओं को ‘छोटी-मोटी घटनाएँ’ कहकर खारिज कर दिया। ममता यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने खुद को पीड़ित बताते हुए भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को खलनायक के रूप में पेश किया।
उन पर पश्चिम बंगाल में जानबूझकर ट्रेनें रद्द करने का आरोप लगाया ताकि राज्य और उनकी सरकार को बदनाम किया जा सके। यह अपमानजनक और द्वेषपूर्ण बयान तब आया जब रेल मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल के दंगा प्रभावित क्षेत्रों में मौजूदा तनाव, नाकाबंदी, हमलों और TMC सरकार द्वारा दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई करने में विफलता के कारण सुरक्षा जोखिमों का हवाला देते हुए सेवाएँ निलंबित कर दीं।
इतना ही नहीं जब रेलवे अधिकारियों को मुस्लिम भीड़ से बचने के लिए भागना और छिपना पड़ा, तब ममता बनर्जी ने यह कहकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया कि रेलवे अधिकारियों और बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा राज्य सरकार का काम नहीं है।
ममता ने 17 दिसंबर 2019 को दक्षिण कोलकाता के जादवपुर में एक रैली में कहा, “कुछ जगहों पर कुछ छोटी-मोटी घटनाएँ हुईं। लेकिन उन्होंने (केंद्र सरकार ने) लगभग रेल सेवाएँ ठप कर दीं। ट्रेनों के मनमाने ढंग से रद्द होने के कारण लोगों को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। रेलवे की सुरक्षा करना हमारी जिम्मेदारी नहीं है, लेकिन हमने यथासंभव उनकी मदद करने की कोशिश की। ट्रेनों और स्टेशनों की सुरक्षा के लिए उनके पास अपनी पुलिस फोर्स, RPF है।”
TMC सुप्रीमो का यह कहना कि रेलवे की संपत्ति और अधिकारियों की सुरक्षा करना उनकी सरकार का काम नहीं था, एक तरह से यह स्वीकार करने जैसा था कि उन्होंने जिहादियों को दंगे करने और विशेष रूप से केंद्र सरकार की संपत्तियों को निशाना बनाने की अनुमति दी ताकि दबाव बनाया जा सके और यह सब एक ऐसे कानून के लिए किया गया जिसका किसी भी भारतीय नागरिक से कोई लेना-देना नहीं था।
दंगों में हुए नुकसान की कीमत उपद्रवियों से वसूलने में भी TMC ने नहीं दिया केंद्र सरकार का साथ
ममता बनर्जी की अगुवाई वाली TMC सरकार ने न सिर्फ़ दंगाईयों को परोक्ष रूप से समर्थन दिया और जवाबदेही से बचने की कोशिश की, बल्कि 2019 में CAA-विरोधी प्रदर्शनों और हिंसा के दौरान रेलवे की संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई को भी असल में रोक दिया।
CAA-विरोधी दंगों के कुछ दिनों बाद रेलवे बोर्ड के चेयरमैन वीके यादव ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि पश्चिम बंगाल में ट्रेनों, स्टेशनों, पटरियों और दूसरी संपत्तियों के नष्ट होने से भारतीय रेलवे को 80-93 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ है।
मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से घोषणा की कि वे रेलवे संपत्ति को नष्ट करने में शामिल पहचाने गए दंगाइयों से लागत वसूलने के लिए राज्य अधिकारियों के साथ समन्वय करेंगे। हालाँकि कानून और व्यवस्था राज्य का विषय है, लेकिन TMC ने दंगाइयों की पहचान और गिरफ्तारी के लिए कोई प्रयास नहीं किए और ना अपराधियों के खिलाफ मुआवजे की कार्यवाही में सहायता की।
रेल मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल लोक व्यवस्था रखरखाव (संशोधन) अधिनियम, 2017 (सामूहिक मुआवजे की अनुमति देने वाला) और सार्वजनिक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम, 1984 (अनिवार्य दंड और वसूली) का हवाला देते हुए TMC सरकार से सहयोग माँगा था। हालाँकि ममता बनर्जी के असहयोग के कारण कोई सार्थक वसूली कार्रवाई नहीं की जा सकी।
2026 में नई सरकार के लिए छह साल बाद 2019 के CAA विरोधी हिंसा की नए सिरे से, समयबद्ध जाँच का आदेश देना आवश्यक होना, ममता के नेतृत्व वाली TMC सरकार की जानबूझकर की गई निष्क्रियता, दस्तावेजी रूप से दर्ज आगजनी और हिंसा को व्यवस्थित रूप से कम आँकने और केंद्र सरकार के साथ असहयोग करने के बारे में बहुत कुछ कहता है।
मूल रुप से यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का जो दावा समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने रविवार (8 जून 2026) को किया था वो ऑपइंडिया की पड़ताल में कहीं टिक नहीं पाया। अखिलेश ने X पर लिखा चढ़ावे में करोड़ों की चोरी हुई लेकिन जब हमने सपा के पूर्व मंत्री रहे और पार्टी प्रवक्ता पवन पांडेय से बात की तो उन्होंने कह दिया कि यह बस सुनी सुनाई बात है।
इस बीच सोशल मीडिया पर यह बात आग की तरह फैल गई। लोगों ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय से जवाब देने को कहा। वो सामने आए और बताया कि ऐसी कोई बात नहीं सामने आई है। धीरे-धीरे कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में चंदा चोरी को लेकर कुछ लोगों की गिरफ्तारी की खबरें भी तैरने लगीं। हालाँकि, कुछ वक्त बाद ही पुलिस ने साफ कर दिया कि कोई गिरफ्तारी नहीं है। यानी राम मंदिर के नाम पर जो इतना वितंडा खड़ा किया गया वो केवल सनसनी फैलाने के लिए था।
राम मंदिर के नाम पर भ्रम फैलाने का लंबा इतिहास
यह पहला मौका नहीं है जब राम मंदिर के इर्द-गिर्द भ्रम फैलाने की कोशिश की गई हो। समाजवादी पार्टी ने कई बार अयोध्या में राम मंदिर के आसपास जमीन खरीद और कथित जमीन घोटाले का मुद्दा उठाया। अखिलेश यादव ने आरोप लगाए कि अयोध्या में कुछ लोगों ने जमीन खरीद-फरोख्त में फायदा उठाया और सरकार को जवाब देना चाहिए। SP नेताओं ने इसे ‘राम के नाम पर भ्रष्टाचार’ का मुद्दा बनाया। मंदिर के ट्रस्ट पर ही सवाल उठाए गए लेकिन जाँच में कभी उल्टा सपा पर ही उँगलियाँ उठीं।
सपा जमीन घोटाले की आड़ में राम मंदिर परियोजना की छवि खराब करने की कोशिशों में जुटी रही। रिपोर्ट्स में सामने आया कि जिस जमीन को लेकर ट्रस्ट पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया है, उसे 2011 में समाजवादी पार्टी के नेता सुल्तान अंसारी ने 2 करोड़ रुपए में खरीदा था।
राम मंदिर के नाम पर राजनीतिक चमकाने की कोशिश कर रहे अखिलेश यादव वहीं सज्जन हैं जो राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का न्यौता मिलने के बाद भी कार्यक्रम में शामिल होने नहीं पहुँचे थे। उन्होंने थोड़े दिनों बाद वहाँ जाने की बात कहकर बात को टाल दिया और आज तक भी वो राम मंदिर में नजर नहीं आए हैं।
अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव का राम भक्तों पर गोली चलवाने का इतिहास रहा है तो उनके चाचा राम गोपाल यादव ने भी राम मंदिर को लेकर बदजुबानी की थी। मई 2024 में रामगोपाल यादव ने राम मंदिर पर बयान देते हुए कहा है कि ‘वो मंदिर बेकार है, मंदिर ऐसे नहीं बनते। राम मंदिर का नक्शा ठीक नहीं बना है, ये वास्तु के हिसाब से ठीक नहीं बनाया गया है।’
सिर्फ मंदिर ही नहीं अयोध्या में विकास से जुड़े खर्चों को लेकर भी सपा के नेता आए दिन बीजेपी पर सवाल उठाते रहे हैं। दीपोत्सव जैसे भव्य कार्यक्रमों की आलोचना की जाती रही है। खुद अखिलेश यादव तक यह कह चुके हैं कि दीयों पर पैसे क्यों खर्च करने हैं।
मंदिर के पैसे पर सपा की नजर?
राम मंदिर को लेकर समय-समय पर पैदा किए जाने वाले भ्रम के बीच एक सवाल अक्सर सामने आता है कि क्या मंदिर प्रबंधन, चढ़ावे या ट्रस्ट को लेकर लगातार शंकाएँ खड़ी करने के पीछे कोई बड़ा राजनीतिक उद्देश्य हो सकता है? यह तर्क भी दिया जाता है कि यह भविष्य की सत्ता-राजनीति की जमीन तैयार करने की कोशिश हो रही है। जब बार-बार यह भ्रम फैलाया जाता है तो धीरे-धीरे एक ऐसा नैरेटिव बनाया जा सकता है कि राम मंदिर ट्रस्ट खुद अपने संसाधनों का प्रबंधन नहीं कर पा रहा है।
अगर कभी सपा सत्ता में लौटती है तो यही भ्रम एक संगठित नैरेटिव बनकर सरकारी हस्तक्षेप या नियंत्रण की माँग का आधार बन सकता है। यानी अगर कभी राजनीतिक समीकरण बदलें, तो राम मंदिर को भी ‘बेहतर निगरानी’ और ‘पारदर्शिता’ जैसे बहानों के नाम पर सरकारी नियंत्रण के दायरे में लाने की बहस खड़ी की जा सकती है।
फिर इस पैसे का इस्तेमाल किस तरह होगा और किस तरह पैसे की बंदरबाँट हो सकता है इसको लेकर तमाम तरह के सवाल होंगे। क्या उस पैसे को कोई और सरकार सरकारी योजनाओं के नाम पर मंदिर से डायवर्ट कर देगी या उस पैसे का इस्तेमाल राजनीतिक तुष्टिकरण के लिए किया जाएगा। मंदिर पर पैदा किए जाने वाले भ्रम के बीच यह सवाल भी लोगों को ध्यान में रखने की जरूरत है।
राम मंदिर के पास कितना पैसा है और कितना आता है दान?
राम मंदिर में चढ़ावे को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि मंदिर ट्रस्ट के पास आखिर कितना पैसा है, हर साल कितना दान आता है और उसका इस्तेमाल कैसे होता है।
13 दिसंबर 2025 को हुई श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बैठक में बताया गया था कि ट्रस्ट को अब तक कुल 4,575 करोड़ रुपए मिले हैं। यह पैसा दान, ब्याज और अन्य माध्यमों से मिला है। ट्रस्ट के मुताबिक, मंदिर निर्माण, श्रीराम जन्मभूमि परिसर के विस्तार, जमीन और भवनों की खरीद समेत कई दूसरे कामों पर करीब 2,475 करोड़ रुपए खर्च किए गए। यानी उस समय ट्रस्ट के पास लगभग 2,100 करोड़ रुपए की राशि बची हुई थी।
वहीं, राम मंदिर की वार्षिक रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2024-25 का पूरा हिसाब दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, इस एक साल में ट्रस्ट की कुल आय 327 करोड़ रुपए रही। इसमें से 153 करोड़ रुपए सीधे दान के रूप में आए जबकि 173 करोड़ रुपए बैंक में जमा रकम पर मिले ब्याज से आए। यानी मंदिर की आमदनी सिर्फ चढ़ावे से नहीं बल्कि जमा फंड पर मिलने वाले ब्याज से भी होती है।
अगर 153 करोड़ रुपए के सालाना दान को रोज के हिसाब से देखें तो औसतन करीब 42 लाख रुपए प्रतिदिन मंदिर में चढ़ावे के रूप में आए। हालाँकि त्योहारों, खास मौकों और वीकेंड पर यह राशि सामान्य दिनों से ज्यादा होती हैं। राम मंदिर में रोजाना करीब 70 हजार से 80 हजार श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं। त्योहारों और छुट्टियों के दौरान यह संख्या दो से तीन गुना तक बढ़ जाती है।
दान की व्यवस्था भी कई स्तरों पर की गई है। मंदिर के गर्भगृह के पास ‘दर्शन पथ’ में चार बड़े दान पात्र (बक्से) रखे गए हैं, जिनमें श्रद्धालु नकद चढ़ावा डालते हैं। इसके अलावा ऑनलाइन दान की सुविधा भी है और मंदिर परिसर में 10 कंप्यूटरीकृत काउंटर बनाए गए हैं, जहाँ लोग रसीद के साथ दान दे सकते हैं।
चढ़ावे की गिनती भी तय प्रक्रिया के तहत होती है। इसके लिए 14 लोगों की एक टीम बनाई गई है, जिसमें 11 बैंक कर्मचारी और ट्रस्ट के 3 सदस्य शामिल होते हैं। यही टीम दान बक्सों में जमा रकम की गिनती करती है।
आपने वीर दास की वो कविता तो सुनी होगी जहाँ वो छाती पीटकर अपने दो तरह के हिंदुस्तान से आने का विलाप सुना रहा था। लेकिन शनिवार (6 जून 2026) को ऐसी ही दो तरह की दिल्ली मैंने एक दिन में देख डाली। अब वैसे तो किसी पर शनि चढ़ जाए तो उसकी लंका लगनी तय समझी जाती है इसीलिए मुझे शनिवार को देखना था कि लंका आज किसकी लगती है, सरकार की या कोकरोचों की।
एक तरफ़ 6 जून को विपक्ष एंजेल प्रिया नाम की दूसरी आईडी से देश के पॉलिटिकल इकोसिस्टम में लॉग इन करना चाहता था और वहीं दूसरी तरफ़ सरकार थी जो ख़ुद को GENZ का बेस्ट फ्रेंड बताने के लिए मोदी सरकार मैदान में Youth For Viksit Bharat नाम के टेंट गाड़कर उतर चुकी थी।
अब आधी दुनिया तो जान ही चुकी थी कि आम आदमी पार्टी के अंडे से निकले कॉकरोच क्या कांड करने वाले थे, लेकिन सरकार ये दिखाना चाहती थी, की Gen Z के तकिए के नीचे आज भी मोदी जी की तस्वीर रहती है।
अब भाई 23-24 मिलियन पेज वाला ट्रेंड, जो किसी बुखार की तरह सोशल मीडिया पर चढ़ा हुआ था। एक ऐसा बवासीर जिस पर राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर उससे एक्स पर उसकी बकैती करने का हक भी सरकार ने निपटा डाला। सारा देश देखना चाहता था कि ट्विटर के ट्रेंड और इंस्टाग्राम के रील्स से निकलकर जब ये कॉकरोच सड़क पर उतरेंगे तो क्या हाल होगा, क्या कोई दंगा होगा, क्या नेपाल या बांग्लादेश जैसी बड़ी सी पिक्चर का कोई टीजर दिल्ली की सड़कों पर दिखेगा, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं, छी ससुर !
500 पुलिस वाले, 1000 मेला देखने के मूड से सड़क पर निकले, 400 कंटेन्ट क्रिएटर, 200 मीडिया और यूट्यूबर्स और 300 नेटफलिक्स के सतरंगी कैरेक्टर्स के अलावा यहाँ कुछ नहीं था। लेकिन वहीं दूसरी तरफ जंतर मंतर के पेड तंतर से दूर सोनिया गाँधी के शब्दों में लिखूँ तो ‘लोकतंतर’ की असली आवाज 7 हजार की भीड़ त्यागराज स्टेडियम में बैठी थी।
भाईसाहब जब मैं वहाँ पहुँची तो कदम रखने की जगह नहीं, पता चला कि वहाँ मोदी सरकार ने उन सभी युवाओं को बुलाया हुआ है, जिनकी पटरी देशभक्तों के साथ मैच खाती है। अब वहाँ मौजूद भजन गायकों की टेलर स्विफ्ट मैथिली ठाकुर के भाषण को सुनकर लग रहा था कि ऐसी ही प्रैक्टिस जारी रही तो भाजपा को अगली सुषमा या स्मृति ईरानी तो मिलना तय है।
साबरमती रिपोर्ट और ‘मोदी है तो मुमकिन है’ गाने के बाद विक्रांत मैसी जितना ज्यादा वामपंथी बिरादरी के निशाने पर आए, ऐसे में उनसे डरने की बजाए डबल अटैक मोड में अब वो पहले से ज्यादा सरकार के साथ उनके कार्यक्रम से लेकर उनकी आवाज बनकर दिखाई देते हैं। ये वाकई आज से पहले मैंने तो कभी नहीं देखा था कि मेन स्ट्रीम बॉलीवुड इस तरीके से सरकार के साथ खड़ा रहता है। 2014 से पहले Startup शब्द न सुनने वाले देश ने पिछले 12 सालों में 2 लाख से ज्यादा Startups देख डाले तो ऐसी कहानियाँ बोट म्यूजिक वाले अमन गुप्ता काहे नहीं आकर कहेंगे।
भाई, उधर जाकर लगा कि इस देश में हर मोर्चे पर वैभव सूर्यवंशी जैसा एक टैलेंट, दमदार काम कर रहा है और सरकार ना सिर्फ़ उनको पहचान दे रही है बल्कि सम्मान भी दे रही है। अब जिस देश को कारगिल युद्ध के टाइम हमारी सेना की लोकेशन बताने वाली पत्रकार बरखा दत्त को पकड़ कर पद्म श्री चिपकाया गया था, उस देश में असली काम करने वाले युवाओं का सम्मान होते देखना अभी न्यू नॉर्मल के ट्रैक पर जा रहा है।
लेकिन कमाल ये नहीं था, कमाल तो तब शुरू हुआ जब भीड़ में शामिल होकर कॉलेज के लड़के-लड़कियों के बीच मैं बैठी रही। मन टटोलने की कोशिश की तो यकीन मानिए मैं भी बाहर निकलते हुए कंविन्स हो चुकी थी कि फ़ॉरेन फंडिंग का पैसा उठाकर ये झोला छाप वामपंथी अपने लिए चरस गांजे के अलावा किसी सही जगह इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं।
बॉस, जब एक कॉलेज जाने वाली लड़की, जो 2029 में अपना पहला वोट देने वाली है और इजरायल-ईरान से लेकर रूस के तेल तक उसका ज्ञान किसी भी एवरेज JNU के बुढ़ऊ से डबल मिलेगा तो राहुल गाँधी कितनी भी यात्रा कर लें, जमीन पर नतीजे एकदम नहीं बदल सकते हैं।
अब आप ही बताओ जिस जगह की माँग शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की होनी थी, वहाँ पर उमर ख़ालिद की क़व्वाली गाने वालों की भीड़ थी। जहाँ बात स्टूडेंट्स के भविष्य की होनी थी, वहाँ भाड़े का झुंड हजारों साल पहले के मनुवाद पर विलाप कर रहा था। जहाँ पर हल्ला देश की दिक्कत को लेकर होना था, वहाँ वही पुराना आजादी वाला नारा गूँज रहा था। लेकिन वहीं त्यागराज में देश का आज बनाने वाले, देश का भविष्य सँवारने वाले युवाओं का सम्मान हो रहा था। वहाँ कोई भारत के टुकड़े-टुकड़े का नारा नहीं चल रहा था।हाँ, मैंने वहाँ ‘भारत माता की जय’ की गूँज ही सुनी थी।
मुझे भीतर गए मुश्किल से 30 मिनट ही हुए थे और मंच से एंकर आवाज लगाने लगी ‘GenZ कहाँ हैं’ और पूरा हॉल गूँज रहा था कि ‘GenZ यहाँ है।’ हाँ, हो सकता है कि ये एक साइलेंट स्टेटमेंट हो सरकार का कि अगर सामने वाला मोर्चा जंतर मंतर के जरिए सोशल मीडिया की थाली में नेगटिव का भरता, प्रोपागैंडा का पराठा और दंगों की दाल परोसने की कोशिश कर रहा था, तो हम भी दिखा देंगे कि देश की युवा शक्ति आज भी मेलोडी खिलाने वाले प्रधानमंत्री के साथ है।
आप ऐसे लीडर से नरेटिव की लड़ाई जीत ही नहीं सकते हैं जो 75 की उम्र में भी 25 के बालक की तरह सोचता हो। प्रधानमंत्री की पढ़ाई भले ही छूटे कई दशक बीत गए हों लेकिन होमवर्क करने की आदत आज भी कायम है। तभी मुझे ऐसा एक बार भी नहीं लगा कि खुद को GenZ बताने वाला एक मास समूह कभी भी उनसे कट्टी करने का मूड रखेगा।
भूतनाथ रिटर्न में एक डायलॉग आता है कि डेमोक्रेसी में कभी भी सही,गलत का चुनाव नहीं होता है, बल्कि कम गलत और ज्यादा गलत का चुनाव होता है। जाहिर सी बात है कि 140 करोड़ कि आबादी में शत प्रतिशत सहमति और संतुष्टि तो किसी सूरत में मिलने से रही। जिस देश में 98 % लाने वाले शर्मा जी के लड़के को भी ये सुनना पड़ता हो कि थोड़ी और मेहनत करते तो 99 आ सकते थे, ऐसी नस्लों के समाज में किसी न किसी चूक पर आक्रोश निकलना तो स्वाभाविक है।
पेपर लीक, सुस्त सिस्टम से युवा नाराज है लेकिन वही युवा ये भी जानता है कि इसका इलाज भी इसी सरकार में संभव है वरना सामने जो निकोबार में समंदर में गधा बनकर मछली के साथ डुबकी मार रहा था, वो हर दूसरे महीने आपको tension में छोड़कर खुद vacation में जाएगा।
तो हाँ, भाई लोग!
दिल्ली के GenZ ने तो आज बता दिया कि तराजू के एक तरफ मोदी और दूसरी तरफ कोई भी आकर बैठ जाए, वजन हमेशा मोदी जी कि साइड ही रहने वाला है। ऐसे में मेरी आज 2 तरह कि दिल्ली देखने की कहानी यही पूरी हुई।
दिल्ली पुलिस की लाठियाँ मायूस रह गईं, जवान भी हताश होकर घर चले गए। वो वापसी की राह में मन ही मन कहते होंगे कि
आज के लिए फिलहाल इतना ही आपकी तरह मैं भी मायूस हूँ लेकिन उम्मीद पर दुनिया कायम है दिल दुखा है लेकिन टूटा तो नहीं है और उम्मीद का दामन छूटा तो नहीं है
भारत में विकास और कानून की राह में अक्सर एक ही तरह का गतिरोध देखने को मिलता है। जब भी प्रशासन किसी शहर को आधुनिक बनाने, सड़कें चौड़ी करने या सार्वजनिक भूमि को अतिक्रमण मुक्त करने के लिए बुलडोजर निकालता है, तो एक विशेष समुदाय द्वारा इसे ‘मजहब पर हमला’ बताकर शोर मचाया जाने लगता है। जयपुर से लेकर दिल्ली और फरीदाबाद से लेकर वाराणसी तक की घटनाएँ गवाह हैं कि जब मंदिर, गुरुद्वारे या सरकारी भवन टूटते हैं, तो वह ‘प्रगति’ का हिस्सा मान लिए जाते हैं और लोग खुशी-खुशी बलिदान दे देते हैं।
लेकिन, जैसे ही किसी अवैध मस्जिद, मजार या मदरसे की बारी आती है, अचानक इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ जुट जाती है, सुरक्षा बलों पर पथराव होता है और ‘बेचारा’ बनकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोना रोया जाने लगता है। जबकि सबसे ज्यादा अवैध निर्माण भी उन्हीं की ओर से किए जाते हैं।
जयपुर में नूरानी मस्जिद पर प्रशासन का एक्शन
जयपुर के नंदीपुरी इलाके में सोमवार (8 जून) को जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) ने अवैध ‘नुरानी मस्जिद’ को जमींदोज किया। यह कार्रवाई जगतपुरा-मालवीय नगर रोड को 30 फीट से बढ़ाकर 80 फीट करने के लिए अनिवार्य थी। प्रशासन ने साफ किया कि इस रास्ते में केवल मस्जिद नहीं, बल्कि दो मंदिर, एक मजार और एक सत्संग भवन भी आ रहे थे। विडंबना देखिए, मंदिरों के हटने पर कोई तनाव नहीं हुआ, लेकिन मस्जिद पर कार्रवाई के लिए प्रशासन को 3000 पुलिसकर्मी तैनात करने पड़े।
शहर में हाई अलर्ट घोषित कर इंटरनेट सेवाओं को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया। यह इंटरनेट बैन इसलिए करना पड़ा क्योंकि कट्टरपंथी तत्व सोशल मीडिया का सहारा लेकर भीड़ इकट्ठा करते हैं। वे शहर की शांति भंग करने के लिए भड़काऊ पोस्ट साझा करते हैं। पुलिस ने फ्लैग मार्च किया और चप्पे-चप्पे पर जवान तैनात किए। यह डराने वाली स्थिति केवल इसलिए पैदा हुई क्योंकि एक पक्ष विकास को मजहबी रंग देने पर तुला था।
वाराणसी का मल्टी-मॉडल स्टेशन: रात के अंधेरे में एक्शन
वाराणसी में काशी रेलवे स्टेशन के विस्तार के लिए आधी रात को बुलडोजर चला। वहाँ रेलवे की जमीन पर बने एक हनुमान मंदिर और अजगैब शहीद मस्जिद को हटाया गया। प्रशासन ने भारी PAC और RPF तैनात की थी। रेलवे ने साफ किया कि स्टेशन को एयरपोर्ट की तर्ज पर विकसित किया जाना है।
करीब एक घंटे के भीतर सारे अवैध ढांचे जमींदोज कर दिए गए। यह प्रोजेक्ट 336 करोड़ रुपए का है जो लाखों यात्रियों को सुविधा देगा। यहाँ भी मंदिर पक्ष ने कोई बवाल नहीं किया। विकास की इस बड़ी तस्वीर में मजहब को बाधा नहीं बनने दिया गया, जो एक परिपक्व समाज की निशानी है।
दिल्ली का तुर्कमान गेट: अवैध ढांचे पर बवाल और पुलिस पर हमला
एक उदाहरण दिल्ली के तुर्कमान गेट का ही ले लीजिए। इस इलाके में भी जब अवैध ढांचे हटाए गए, तो कट्टरपंथियों ने पुलिस पर पथराव किया। दिल्ली हाई कोर्ट ने मस्जिद से सटे दवाघर और बारात घर को अवैध घोषित किया था। जैसे ही अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू हुई, वहां उपद्रवी जमा हो गए। उन्होंने पुलिस को अपना काम करने से रोका और हिंसक हमले किए।
उपद्रवियों ने पत्थर बरसाए जिससे चाँदनी महल थाने के SHO गंभीर रूप से घायल हुए। पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। मजे की बात यह है कि कार्रवाई से पहले लोगों को सामान हटाने का समय दिया गया था। फिर भी, अराजकता फैलाना ही एकमात्र उद्देश्य दिखाई दिया। कानून का पालन करने के बजाय, यहाँ वर्दी पर पत्थर मारना अधिक जरूरी समझा गया।
सिखों का बड़प्पन: कश्मीर में 72 साल पुराने गुरुद्वारे का बलिदान
जब बात देश की प्रगति की आती है, तो सिख समुदाय ने हमेशा एक मिसाल पेश की है। कश्मीर में श्रीनगर-बारामूला हाईवे के निर्माण के लिए 72 साल पुराने ‘दमदमा साहिब गुरुद्वारे‘ को हटाने की जरूरत थी। यह गुरुद्वारा 1947 से वहाँ मौजूद था और लंगर के माध्यम से हजारों की सेवा कर रहा था। लेकिन सिखों ने प्रशासन के साथ पूरा सहयोग किया।
सिख समुदाय ने खुद आगे बढ़कर गुरुद्वारे को तोड़ने पर सहमति दी। उन्होंने विकास को प्राथमिकता दी और राजमार्ग का रास्ता साफ किया। इसके बदले में प्रशासन ने उन्हें वैकल्पिक जमीन और सहयोग का प्रस्ताव दिया। वहाँ न तो इंटरनेट बंद हुआ और न ही कोई पथराव। यह दर्शाता है कि एक सच्चा धार्मिक व्यक्ति देश के विकास को सर्वोपरि मानता है।
झंडेवालान और वारंगल: मंदिर टूटे पर कानून नहीं टूटा
दिल्ली के झंडेवालान में 800 साल पुराने मंदिर परिसर और 100 से ज्यादा घरों को तोड़ा गया। स्थानीय लोगों में गुस्सा और दुख था, लेकिन किसी ने अराजकता नहीं फैलाई। यह परिसर RSS मुख्यालय के पास था, फिर भी लोगों ने कानून को अपने हाथ में नहीं लिया। उन्होंने शांतिपूर्वक विरोध दर्ज कराया और न्याय की गुहार लगाई।
इसी तरह तेलंगाना के वारंगल में काकतीय काल का 800 साल पुराना शिव मंदिर स्कूल बनाने के लिए गिरा दिया गया। लोग नाराज थे, लेकिन उन्होंने सड़कों पर आगजनी नहीं की। अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई और कानूनी रास्ता अपनाया गया। यह हिंदू समाज का धैर्य है कि मंदिर टूटने पर भी वे दंगों की राह नहीं चुनते।
फरीदाबाद का छावनी रूप: जब मंदिर-मस्जिद साथ गिरे
फरीदाबाद के NIT-3 इलाके में कोर्ट और NGT के आदेश पर बड़ी कार्रवाई हुई। वहाँ 2 धार्मिक स्थलों (मस्जिद और मंदिर) समेत 20 अवैध निर्माणों को ध्वस्त किया गया। इस दौरान 1000 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात रहे और मोबाइल इंटरनेट बंद किया गया। प्रशासन जानता था कि मस्जिद पर हाथ लगाते ही कुछ तत्व माहौल बिगाड़ सकते हैं।
यह कार्रवाई रेलवे कॉरिडोर और एलिवेटेड रोड के लिए जरूरी थी। मंदिर शांति से हट गया, लेकिन मस्जिद के नाम पर तनाव पैदा करने की कोशिश की गई। प्रशासन को रात 2 बजे से दोपहर 2 बजे तक ऑपरेशन चलाना पड़ा। यह भेदभाव नहीं, बल्कि कानून की एकसमान कार्रवाई थी जिसे केवल एक समुदाय ने पचाने से इनकार किया।
गुजरात मॉडल: जब मोदी सरकार ने गिराए मंदिर
जब हम धार्मिक ढांचे और विकास की बात करते हैं, तो गुजरात का उदाहरण सबसे सटीक है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब गाँधीनगर में सड़क चौड़ीकरण के लिए एक महीने में कई मंदिरों को गिराया गया था। प्रशासन ने सरकारी जमीन पर बने हर अवैध ढांचे को हटाने का संकल्प लिया था।
हैरानी की बात यह है कि दिवाली के समय हुई इस कार्रवाई में कहीं कोई हिंसा नहीं हुई। मंदिर रातों-रात हटा दिए गए और जनता ने सहयोग किया। मोदी जी ने खुद कहा था कि ‘राष्ट्र धर्म’ मजहब से बड़ा है। हिंदू संगठनों के कुछ विरोध के बावजूद, सरकार अपने फैसले पर अडिग रही और गाँधीनगर की सड़कें चौड़ी हो गईं।
प्रधानमंत्री मोदी ने साझा किया था कि अफसर अक्सर नेताओं को डराने के लिए सबसे पहले हनुमान मंदिर तोड़ते हैं। उन्हें लगता है कि इससे तूफान खड़ा होगा और कार्रवाई रुक जाएगी। लेकिन गुजरात में उन्होंने हिम्मत दिखाई। इसका परिणाम यह हुआ कि पूरा शहर खुश हो गया क्योंकि जाम की समस्या खत्म हो गई थी।
‘लैंड जिहाद’ और मीडिया का चश्मा
यह एक कड़वा सच है कि सार्वजनिक जमीनों पर सबसे ज्यादा अवैध कब्जे मजारों के रूप में होते हैं। इसे अक्सर ‘लैंड जिहाद’ का नाम दिया जाता है क्योंकि ये ढांचे रातों-रात खड़े कर दिए जाते हैं। बाद में इन्हें ‘ऐतिहासिक’ बताकर बचाने की कोशिश होती है। जयपुर की नूरानी मस्जिद को भी 45 साल पुराना बताया गया, लेकिन क्या पुराना होना अवैध कब्जे को वैध बना देता है?
मीडिया का एक धड़ा या कहें वामपंथी गैंग भी केवल मस्जिदों पर कार्रवाई को प्रमुखता से दिखाता है। अपनी खबरों की बड़ी-बड़ी हेडलाइन में अवैध मस्जिदों को ढहाने की बात छापता है।
लेकिन जब मंदिर टूटते हैं, अतिक्रमण हटाया जाता है, तो उसे कहे भी प्रमुखता से दिखाया नहीं जाता है। उसे ‘अतिक्रमण हटाओ अभियान’ कहा जाता है। मस्जिदों के टूटने पर उसे ‘मुस्लिमों पर जुल्म’ बता दिया जाता है। यह विमर्श ही कट्टरपंथियों को और अधिक उकसाने का काम करता है।
कानून की नजर में सब बराबर हों
विकास के पहिये किसी का मजहब देखकर नहीं रुकते। यदि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना है, तो हर अवैध कब्जे को हटाना होगा। एक समुदाय का यह व्यवहार कि ‘मेरा अवैध निर्माण मजहब का हिस्सा है’, देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है। सिखों और हिंदुओं से उन्हें सीखने की जरूरत है कि राष्ट्र निर्माण के लिए त्याग आवश्यक है।
प्रशासन को इंटरनेट बंद करने और हजारों जवानों को तैनात करने पर मजबूर करना यह साबित करता है कि कट्टरपंथ देश की संप्रभुता को चुनौती देता है। जब तक हर नागरिक यह नहीं समझेगा कि सार्वजनिक भूमि पर कब्जा इबादत नहीं, बल्कि अपराध है, तब तक बुलडोजर की गरज अनिवार्य रहेगी। कानून का शासन ही लोकतंत्र की असली पहचान है।
सनातन धर्म में संतों का स्थान हमेशा से राजनीति और सत्ता के गलियारों से ऊपर माना गया है। संत का धर्म होता है सत्य की रक्षा, निष्पक्षता और समाज को सही राह दिखाना। लेकिन बीते कुछ दिनों में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की राजनीतिक बयानबाजी और समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रति उनका झुकाव एक नए विवाद को जन्म दे रहा है।
राजनीतिक गलियारों और सनातन प्रेमियों के बीच आज यह बड़ा सवाल तैर रहा है कि क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सपा की सोची-समझी राजनीतिक चाल को समझ नहीं पा रहे हैं या फिर इसके पीछे कोई और कहानी है? वह रह-रहकर सपा की तारीफ करते हैं, कभी इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रति नरम रुख अपनाते हैं, तो कभी देश में जातियों की राजनीति की बात करने लगते हैं।
अभी इटावा और सैफई में यादव परिवार के साथ मंच साझा करते हुए उन्होंने जो बयान दिए, उसने करोड़ों सनातनी भक्तों को हैरान कर दिया है।
सैफई में मुलायम परिवार की तारीफों के बाँधे पुल, क्या इतिहास भूल गए?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इन दिनों ‘गौ-प्रतिष्ठा आंदोलन’ के तहत देशव्यापी यात्रा पर हैं। लेकिन इस धार्मिक यात्रा के दौरान जब वे इटावा पहुँचे, तो उनका अंदाज पूरी तरह राजनीतिक नजर आया। उन्होंने मुलायम सिंह यादव के परिवार की न सिर्फ जमकर तारीफ की, बल्कि मुलायम सिंह को ‘संतों का सम्मान करने वाला’ और ‘दशकों पुराना सच्चा हितैषी’ तक करार दे दिया।
हद तो तब हो गई जब उन्होंने अखिलेश यादव और डिंपल यादव को ‘बड़े दिल वाला’ बताते हुए मुलायम सिंह यादव द्वारा पूर्व में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की गिरफ्तारी का भी एक तरह से बचाव कर डाला।
इस बयान के बाद देश के सनातनी समाज में भारी आक्रोश और असमंजस है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या केवल राजनीतिक गठजोड़ या सपा के तुष्टिकरण के एजेंडे को हवा देने के लिए इतिहास के काले पन्नों को जानबूझकर पलटा जा रहा है? आखिर गौ-रक्षा और सनातन रक्षा की यात्रा में ‘सच्चे हितैषी’ चुनने का स्वामी जी का पैमाना क्या है?
1990 के काले दौर में सनातनियों के खून से लाल हुआ था सरयू का जल
इतिहास गवाह है कि जब 1990 में अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था, तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे। 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को अयोध्या में निहत्थे कारसेवकों पर जिस बेरहमी से पुलिस ने गोलियां चलाई थीं, उसकी गूँज आज भी हर सनातनी के दिल में दर्द पैदा करती है।
ऐतिहासिक कड़वा सच: मुलायम सरकार के आदेश पर हुई उस फायरिंग में दर्जनों रामभक्त बलिदान हुए और सरयू नदी का जल लाल हो गया था। बाद में मुलायम सरकार ने रामभक्तों पर गोलियाँ चलाने वाले पुलिसकर्मियों और अधिकारियों पर से मुकदमे भी वापस ले लिए थे। इसी घटना के बाद उन्हें एक खास समुदाय (मुस्लिमों) को खुश करने की राजनीति के कारण ‘मुल्ला मुलायम’ की उपाधि तक मिल गई थी।
आज स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद उसी दौर के मुखिया को ‘संत सेवक’ बताकर किसका हित साध रहे हैं? क्या यह उन बलिदानी कारसेवकों के बलिदान का अपमान नहीं है?
गुरु के अपमान और खुद पर हुए लाठीचार्ज को भूल गए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जिस गुरु परंपरा की दुहाई देते हैं, उसी इतिहास का एक पन्ना उनके गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से भी जुड़ा है। मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में ही स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को आजमगढ़ से गिरफ्तार किया गया था, जिसे पूरे देश ने शंकराचार्य पद और सनातन परंपरा का घोर अपमान माना था।
साल 2015 का वाराणसी कांड: अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री काल के दौरान वाराणसी के गोदौलिया क्षेत्र में गणेश विसर्जन को लेकर संतों का एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन चल रहा था। तत्कालीन सपा सरकार की पुलिस ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके छोटे-छोटे बटुकों (शिष्यों) पर बेरहमी से लाठियाँ बरसाई थीं। इस लाठीचार्ज में स्वामी जी खुद गंभीर रूप से घायल हुए थे और उन्हें जेल में डाल दिया गया था।
आज सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि जिनके शासनकाल में खुद स्वामी जी पर और उनके मासूम शिष्यों पर लाठियाँ चलीं, आज सत्ता से बाहर होते ही वही अखिलेश यादव और उनका परिवार स्वामी जी के लिए ‘बड़े दिल वाला’ कैसे हो गया? क्या सपा स्वामी जी के रसूख का इस्तेमाल अपनी मुस्लिम-यादव (MY) और जातीय राजनीति की छवि को सुधारने के लिए नहीं कर रही है?
गो-तस्करी का इतिहास Vs योगी सरकार के सख्त कदम
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इस समय गो-माता को राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाने के लिए यात्रा कर रहे हैं। लेकिन वे उत्तर प्रदेश में गोवंश के इतिहास को लेकर दोहरा रवैया अपनाते दिख रहे हैं।
सपा शासन में गो-तस्करी का ‘खेल’: मुलायम और अखिलेश यादव के शासनकाल में उत्तर प्रदेश में 1955 का गोवध निषेध अधिनियम सिर्फ कागजों तक सीमित था। चंदौली जिले का सैयदराजा थाना और नौबतपुर चेकपोस्ट पूरे देश में गो-तस्करों के सबसे बड़े गढ़ के रूप में कुख्यात थे।
हालात ये थे कि इन थानों और चेकपोस्टों पर पोस्टिंग पाने के लिए पुलिस अधिकारियों के बीच बोलियाँ लगा करती थीं। यहाँ से होने वाली अवैध गो-तस्करी का पैसा कथित तौर पर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचता था। यूपी से गोवंश को बिहार के रास्ते पश्चिम बंगाल और वहां से बांग्लादेश के कत्लखानों में कटने के लिए भेज दिया जाता था।
योगी सरकार का ‘गोरक्षा मॉडल’: सपा शासनकाल के विपरीत साल 2017 में योगी आदित्यनाथ के आते ही सूबे की तस्वीर बदल गई। योगी सरकार ने जो कदम उठाए, वे आज देश के लिए नजीर हैं:
अवैध बूचड़खाने बंद: सत्ता संभालते ही सभी अवैध कत्लखानों पर ताला लगाया गया। देश का सबसे सख्त कानून (2020): यूपी गोवध निवारण अधिनियम में संशोधन कर 3 से 10 साल की कठोर जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया। कड़ी कार्रवाई: गो-तस्करों पर एनएसए (रासुका) लगाया गया और कई बड़े तस्करों के एनकाउंटर किए गए। गो-संरक्षण केंद्र: आज उत्तर प्रदेश में 7,000 से अधिक गो-संरक्षण केंद्र चालू हैं, जिनमें 13 लाख से अधिक गोवंश का सरकारी खर्चे पर पालन-पोषण हो रहा है।
सवाल यह है कि जो सरकार गो-माता की रक्षा के लिए इतने ठोस कदम उठा रही है, स्वामी जी उसकी सराहना करने से कतराते हैं। वहीं दूसरी तरफ गो-तस्करी के मूकदर्शक रहे परिवार को वे ‘गोभक्त’ का सर्टिफिकेट बाँट रहे हैं।
लव जिहाद और धर्मांतरण पर चुप्पी का संरक्षण?
यादव परिवार के शासनकाल में उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों, अवध क्षेत्र और नेपाल से सटे सीमावर्ती इलाकों में बड़े पैमाने पर अवैध धर्मांतरण और ‘लव जिहाद’ के मामले सामने आए थे। विदेशी फंडिंग के दम पर मिशनरी और कट्टरपंथी ताकतें सक्रिय थीं, लेकिन तत्कालीन सपा सरकार ने अपने कोर वोट बैंक के खिसकने के डर से इन गतिविधियों पर हमेशा चुप्पी साधे रखी।
यही नहीं, वो गौरक्षा की आड़ में इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रोपेगेंडा को भी बढ़ाते दिख रहे हैं। साफ दिख रहा है कि वो खुद को सनातनी से ज्यादा अब सेकुलर दिखाने का प्रयास करते दिख रहे हैं।
सनातन के शीर्ष पदों पर बैठे संतों का काम इन मुद्दों पर समाज को सचेत करना होता है। लेकिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का सपा के सुर में सुर मिलाकर देश में जातियों की बात करना और इस्लामिस्टों के प्रति नरम रुख दिखाना यह दर्शाता है कि वे अनजाने में ही सही, लेकिन सपा के ‘डिवाइड एंड रूल’ (बाँटो और राज करो) के एजेंडे का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
करोड़ों सनातनियों के साथ विश्वासघात या राजनीतिक भूल?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती स्वयं को सनातन परंपरा का ध्वजवाहक बताते हैं। ऐसे में उनका यह कर्तव्य बनता है कि वे राजनीतिक स्वार्थ और एजेंडे से ऊपर उठकर केवल और केवल सनातन हितों की बात करें।
इतिहास की कड़वी सच्चाइयों से आँखें मूँदकर रामभक्तों पर गोली चलवाने वालों, संतों का दमन करने वालों और गो-तस्करी को बढ़ावा देने वाली ताकतों को ‘संत सेवक’ बताना देश के करोड़ों सनातनियों की भावनाओं पर नमक छिड़कने जैसा है।
सनातन समाज आज स्वामी जी से यह सवाल पूछ रहा है कि क्या एक संत की गरिमा किसी राजनीतिक दल की ‘कठपुतली’ या उसका ‘चुनावी ढाल’ बनने में है? स्वामी जी को जल्द ही यह समझना होगा कि राजनीतिक चश्मे से सनातन की रक्षा नहीं हो सकती और इतिहास को झुठलाने का प्रयास अंततः संत परंपरा के साथ एक बड़ा विश्वासघात ही साबित होगा।
2017 से पहले उत्तर प्रदेश में या तो सरकारी भर्तियाँ नहीं ही होती थीं और अगर होती भी तो प्रतियोगी परीक्षाएँ अक्सर नकारात्मक कारणों से सुर्खियों में रहती थीं जैसे- पेपर लीक, नकल माफिया, कोचिंग माफिया, भर्ती घोटाले और परीक्षा केंद्रों पर अव्यवस्था। 2017 के बाद आई योगी सरकार ने परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाया है, नकल माफियाओं पर कार्रवाई हुई है और सरकारी नौकरियों की संख्या भी खूब बढ़ी है।
योगी सरकार ने 2024 कांस्टेबल भर्ती परीक्षा के पेपर लीक मामले में तुरंत एक्शन लेते हुए पूरी परीक्षा रद्द कर दी। STF जाँच शुरू हुई। सरकार ने सख्ती बरतते हुए ताबड़तोड़ गिरफ्तारियाँ की। इस दौरान कई राज्यों तक फैला नेटवर्क सामने आया। इतना ही नहीं 48 लाख उम्मीदवारों को फिर से परीक्षा देने का मौका दिया ताकि किसी के साथ अन्याय न हो। दूसरे पेपर लीक के मामले में भी योगी सरकार का एक्शन सख्त रहा।
मुलायम सिंह सरकार और अखिलेश सरकार में ऐसा नहीं हुआ। दोनों ही मामलों में जब सरकार बदली तब एक्शन हुए। पुलिस भर्ती को लेकर 2007 का विवाद हो या 2017 का। दोनों में भर्ती प्रक्रिया में धाँधली के आरोप लगे। मेरिट लिस्ट में हेराफेरी से लेकर फर्जी प्रमाण पत्र रिकॉर्ड बदलने के प्रमाण मिले। यहाँ तक कि यूपी लोकसेवा आयोग पर भी गंभीर सवाल उठे। यहाँ तक कहा गया कि समाजवादी पार्टी के मुखिया का पूरा कुनबा घोटाले में शामिल है। पहले देखते हैं सपा के शासन काल में हुए कुछ पेपर लीक और प्रक्रिया में धाँधली में प्रमुख मामले कौन से रहे।
UPCPMT 2014 (Uttar Pradesh Combined Pre-Medical Test)– यह मामला काफी दिलचस्प था, क्योंकि शुरुआत में इसे ‘पेपर लीक‘ कहा गया और परीक्षा रद्द कर फिर से परीक्षा ली गई। इस दौरान केजीएमयू के एक शिक्षक समेत कई नाम सामने आए लेकिन जाँच में तस्वीर कुछ अलग निकली।
दरअसल 22 जून 2014 को परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले गाजियाबाद में दो बैंकों- SBI और इलाहाबाद बैंक के स्ट्रॉन्ग रूम में रखे प्रश्नपत्र बॉक्सों की सील टूटी हुई या छेड़छाड़ की स्थिति में मिली। इसके बाद करीब 1.1 लाख अभ्यर्थियों की परीक्षा तत्काल रद्द कर दी गई। प्रशासन को लगा कि प्रश्नपत्र बाहर निकाले गए होंगे। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उच्चस्तरीय जाँच के आदेश दिए। STF और प्रशासनिक जाँच भी शुरू हुई। दो एफआईआर दर्ज हुए।
सरकार और KGMU ने यह तर्क दिया कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा में थोड़ी भी आशंका पूरी परीक्षा की विश्वसनीयता खत्म कर सकती है। सुरक्षा प्रणाली में इतनी बड़ी सेंध लगी थी कि परीक्षा की निष्पक्षता पर भरोसा नहीं किया जा सकता था, इसलिए ‘संदेह का लाभ’ छात्रों को देने के बजाय परीक्षा रद्द कर दोबारा कराई जाए। फिर रिएग्जाम जुलाई 2014 में आयोजित हुई।
उत्तर प्रदेश ग्रामीण विकास अधिकारी (VDO) भर्ती 2013-14– यह मामला ‘कैश फॉर जॉब’ यानी नौकरी के बदले घूस विवाद के रूप में चर्चा में आया था। यह मामला लगभग 3002 ग्रामीण विकास अधिकारी पदों की भर्ती से जुड़ा था।
मार्च–मई 2014 में पोर्टल Cobrapost ने एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिए दावा किया कि भर्ती प्रक्रिया में कुछ राजनीतिक बिचौलिए, विधायक और सत्ता से जुड़े लोग शामिल हैं, जो उम्मीदवारों को नौकरी दिलाने के नाम पर पैसे माँग रहे हैं।
स्टिंग के अनुसार, उम्मीदवारों से ₹8 लाख से ₹13 लाख तक की माँग की जा रही थी। कई लोगों ने कथित तौर पर कुल रकम का आधा हिस्सा ‘टोकन मनी’ के रूप में माँगा गया। दावा किया गया कि चयनित उम्मीदवारों की सूची ‘ऊपर’ से जिलाधिकारियों को भेजी जाएगी।
Cobrapost ने अपने स्टिंग में कुछ तत्कालीन राज्य मंत्री स्तर के पदाधिकारियों, सत्तारूढ़ दल के विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों के नाम लिए थे। रिपोर्ट में दावा किया गया कि कई लोगों ने अपने राजनीतिक संपर्कों के आधार पर भर्ती कराने का भरोसा दिया।
लेकिन जाँच में यह बात कभी सामने नहीं आया और न ही कोर्ट का कोई आदेश आया। यह सिर्फ राजनीतिक विवाद बन कर रह गया। कोई यह नहीं साबित कर पाया कि 3002 VDO पदों की भर्ती रिश्वत लेकर की गई थी।
UPPCS-2015 पेपर लीक और चेयरमैन का मामला
मार्च 2015 में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) की पीसीएस प्रारंभिक परीक्षा का प्रश्नपत्र परीक्षा शुरू होने से पहले व्हाट्सएप पर वायरल हो गया था। जाँच में पाया गया कि लीक हुआ पेपर और वास्तविक प्रश्नपत्र काफी हद तक मेल खाते थे। इसके बाद परीक्षा रद्द कर दी गई और एसटीएफ जाँच शुरू की गई। कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं। इस दौरान जो भर्ती हुई उसे ‘यादव भर्ती’ भी कहा जाता है। आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे। आयोग के खिलाफ व्यापक छात्र आंदोलन हुए।
अभ्यर्थियों और कुछ याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कुछ विशेष जिलों और जातियों के उम्मीदवारों को अनुचित तरीके से लाभ पहुँचाया गया। चयन सूची में असामान्य पैटर्न होने के आरोप अदालतों तक पहुँचे।
दरअसल तत्कालीन अखिलेश सरकार ने 2013 में अनिल कुमार यादव को यूपीपीएससी का चेयरमैन बनाया था और उनके कार्यकाल में पीएससी, पीएससी जे, मेडिकल अधिकारी समेत कई एंट्रेस टेस्ट हुए, जिसमें घोटाले के आरोप लगे। उन पर यादवों को लाभ पहुँचाने के आरोप भी लगे। चयन प्रक्रिया में पैटर्न के बदलने को लेकर भी उम्मीदवारों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। UPPCS-2015 पर्चा लीक मामले में लोक सेवा आयोग को क्लीनचिट दिए जाने के अखिलेश सरकार के फैसले का जमकर विरोध हुआ था। कहा गया कि जब जाँच जारी है, तो फिर क्लीन चिट देने की इतनी जल्दबाजी क्यों है सरकार को?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2015 में हुए अनिल कुमार यादव की यूपीपीएससी अध्यक्ष पद पर नियुक्ति को ‘अवैध’ और ‘मनमानी’ करार दिया। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने उनकी नियुक्ति करते समय उनकी योग्यता, ईमानदारी और जरूरत की पर्याप्त जाँच नहीं की। इसके बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा।
यूपी जल निगम भर्ती घोटाला 2016-17– यूपी जल निगम भर्ती घोटाला मुख्य रूप से 2016-17 में हुई भर्तियों से जुड़ा था, जब राज्य में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी सरकार थी। बाद में 2017 में सरकार बदलने के बाद इसकी जाँच शुरू हुई। इस दौरान जल निगम में करीब 1300 नियुक्तियाँ की गई थीं, जिनमें 122 सहायक अभियंता, 853 जूनियर इंजीनियर और 325 क्लर्क शामिल हैं।
योगी सरकार ने जब जाँच शुरू की, तो SIT ने कई गंभीर अनियमितताओं की जानकारी दी। इसमें बताया गया कि भर्ती प्रक्रिया असामान्य तेजी से पूरी की गई। इसके विज्ञापन से लेकर नियुक्ति पत्र तक की प्रक्रिया बहुत कम समय में पूरी हुई।
सरकारी नियमों का पालन नहीं हुआ। उत्तर पुस्तिकाओं और मूल्यांकन पर सवाल उठे। कुछ चयनित अभ्यर्थियों के सही और गलत उत्तरों का पैटर्न एक जैसा पाया गया। कुछ मामलों में गलत उत्तरों पर भी अंक दिए गए थे। ऐसे विषयों में भर्ती की गई, जिनमें पद ही नहीं थे। SIT ने परीक्षा आयोजित करने वाली निजी कंपनी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए।
सरकार ने पहले 122 सहायक अभियंताओं की नियुक्तियाँ रद्द की, बाद में करीब 1300 कर्मचारियों की नियुक्तियाँ निरस्त कर दी गई। इस मामले में आजम खान का नाम भी सामने आया, जो उस वक्त शहरी विकास मंत्री थे। उन पर FIR दर्ज किए गए।
हालाँकि, समाजवादी पार्टी ने तर्क दिया कि भर्ती प्रक्रिया विभागीय स्तर पर हुई थी और राजनीतिक नेतृत्व की प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी। वहीं जांच एजेंसियों और योगी सरकार ने भर्ती नियमों के व्यापक उल्लंघन की बात कही।
यूपी जल निगम भर्ती घोटाला उन मामलों में गिना जाता है, जिनमें जाँच के बाद सिर्फ आरोप नहीं लगे, बल्कि बड़ी संख्या में नियुक्तियाँ भी रद्द की गईं। जाँच में भर्ती प्रक्रिया, मूल्यांकन प्रणाली, पदों की स्वीकृति और परीक्षा संचालन में गंभीर अनियमितताओं की बात सामने आई, जिसके बाद लगभग 1300 नियुक्तियाँ रद्द कर दी गईं और कई लोगों के खिलाफ जाँच और मुकदमे चले।
मुलायम सिंह यादव के राज में हुए घोटाले
मुलायम सिंह यादव के 2003–2007 कार्यकाल को लेकर सबसे बड़ा और सबसे अधिक चर्चित उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती घोटाला (2005–06) माना जाता है। उनके राज में ‘परिवहन भर्ती घोटाला’ भी सामने आया था। हालाँकि इसका उतना कागजात और प्रमाण नहीं मिलते जितना पुलिस भर्ती घोटाले को लेकर दिया गया।
पुलिस भर्ती घोटाला (2005–06)- 2007 में मायावती सरकार के सत्ता में आने के बाद पुलिस भर्ती की जाँच कराई गई। जाँच के बाद पाया गया कि 2004–06 के दौरान हुई भर्तियों में बड़े पैमाने पर अनियमितताएँ हुईं।
जाँच रिपोर्ट में कहा गया कि फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल किया गया। आंसर शीट में कथित तौर पर फेरबदल किया गया। चयन में बदलाव कर कुछ उम्मीदवारों को फायदा पहुँचाया गया। पुलिस वैरिफिकेशन प्रक्रिया में भी अनियमितता पाई गई। यहाँ तक कि अंकों और रिकॉर्ड में भी हेरफेर हुए।
इसको देखते हुए 2007 में मायावती सरकार ने पहले चरण में 6504 पुलिसकर्मियों की भर्ती रद्द की। 12 वरिष्ठ IPS अधिकारियों को निलंबित कर दिया। इसके अलावा जाँच के बाद हजारों भर्तियाँ भी निरस्त की गई। मायावती सरकार ने 3964 अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की नियुक्तियाँ भी रद्द कर दी। कुल मिलाकर 10000 से अधिक भर्तियाँ मायावती के नेतृत्व वाली सरकार ने निरस्त की।
सरकारी जाँच समिति ने दावा किया कि 2004–06 के बीच 20000 से अधिक पुलिस भर्ती में गंभीर अनियमितताएं थीं। कुछ जगह उत्तर पुस्तिकाएं दोबारा लिखे जाने तक के आरोप लगे। हैंडराइटिंग विशेषज्ञों की रिपोर्ट का हवाला दिया गया।
उस समय BSP सरकार ने कहा था कि यदि जाँच में राजनीतिक दबाव या नेताओं की भूमिका साबित होती है, तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई होगी। हालाँकि इसे किसी नेता के खिलाफ अनियमितता को प्रमाणित नहीं किया जा सका।
2003–2007 के दौरान कुछ भर्ती परीक्षाओं और चयन प्रक्रियाओं को लेकर प्रश्नपत्र लीक होने और धाँधली के आरोप लगते रहे, लेकिन उस दौर में पुलिस भर्ती में कथित चयन अनियमितता का विवाद सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा।
परिवहन विभाग भर्ती विवाद– UPSRTC (रोडवेज) में भी समय-समय पर भर्ती और नियुक्तियों को लेकर आरोप लगे। विशेष रूप से ड्राइवर और कंडक्टर की भर्तियों में कथित अनियमितताओं, भाई-भतीजावाद और नियमों को ताक पर रखकर की गई नियुक्तियों को लेकर काफी विवाद हुआ। लेकिन ये मामला पुलिस भर्ती घोटाले के सामने कुछ नहीं था, क्योंकि पुलिस भर्ती घोटाले में कार्रवाई भी सरकार बदलने पर की गई।
कोचिंग माफियाओं का तंत्र जिसे योगी सरकार ने ‘अभ्युदय’ से तोड़ा
समाजवादी पार्टी की सरकार में नकल और पेपर लीक कोई अलग-अलग समस्याएँ नहीं थीं बल्कि एक संगठित इकोसिस्टम था। इस इकोसिस्टम की शुरुआत स्कूलों से होती थी। बोर्ड परीक्षाओं में नकल कराई जाती थी, जिसके जरिए बड़ी संख्या में ऐसे छात्र अच्छे अंकों के साथ पास हो जाते थे और यही स्थिति विश्वविद्यालयों तक में जारी रहती।
विश्वविद्यालयों से निकलने वाले इन्हीं छात्रों को कोचिंग माफिया अपने नेटवर्क में शामिल करते थे। दूसरी तरफ भर्ती आयोगों में बैठे भ्रष्ट अधिकारी इस नेटवर्क को संरक्षण देते थे। दोनों के बीच ऐसी साँठगाँठ बन गई थी जिसमें पेपर लीक होना आम बात बन गया था। रिपोर्ट्स सामने आईं कि कुछ कोचिंग सेंटर के छात्रों को पेपर में अनुचित लाभ मिलता है। इसका सीधा फायदा पैसा वालों को मिल जाता और गरीब छात्र मुँह ताकते रह जाते।
योगी सरकार ने यह संगठित नेटवर्क तोड़ दिया। अब छात्रों को फ्री कोचिंग के लिए सरकार ने अभ्युदय जैसी स्कीम लॉन्च की है। ‘मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना’ की शुरुआत 16 फरवरी 2021 को बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेरणा से की गई थी। इसका मकसद ऐसे प्रतिभाशाली छात्रों को मुफ्त कोचिंग देना है, जो आर्थिक कमजोरी या संसाधनों की कमी के कारण निजी कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई नहीं कर पाते हैं।
मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के तहत कई बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती है। इसमें संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) की प्रारंभिक और मुख्य परीक्षाओं के साथ साक्षात्कार की तैयारी शामिल है। इसके अलावा JEE और NEET जैसी इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं के लिए भी प्रशिक्षण दिया जाता है। वहीं, NDA और CDS जैसी रक्षा सेवाओं से जुड़ी परीक्षाओं की तैयारी की सुविधा भी इस योजना में उपलब्ध है।
सरकारी नौकरी देने में मीलों आगे योगी सरकार
आज अखिलेश यादव आए दिन सरकारी नौकरी को लेकर सवाल उठाते रहते हैं लेकिन उनके कार्यकाल के दौरान सरकारी नौकरी मिलना युवाओं के लिए लगभग असंभव सा था। एक तो नौकरियाँ निकलती नहीं थी और जो निकलती भी थीं तो वे भ्रष्टाचार और माफियाओं की भेंट चढ़ जाती थीं। योगी सरकार के मंत्री अनिल राजभर ने विधानसभा में बताया था कि अखिलेश यादव के कार्यकाल के दौरान 2012 से 2017 के बीच केवल 1.38 लाख नौकरी दी गईं।
वहीं, योगी सरकार ने इस परिपाटी को बदला है और मुख्यमंत्री खुद बता चुके हैं कि उनकी सरकार आने के बाद से 9 वर्षों में 9 लाख लोगों को सरकारी नौकरियाँ दी गई हैं। यह अखिलेश के काल में दी गईं नौकरियों से 7 गुना अधिक है। योगी सरकार ने केवल प्रक्रिया नहीं बदली है बल्कि सरकारी भर्ती की इस पूरी मशीनरी को दुरुस्त किया है। इसके बाद यह मशीनरी और तेज गति से काम करने लगी है।
4 जून 2026 को लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के व्याख्यान के दौरान ‘ श्रोताओं के शर्मनाक हरकत’ की निंदा की। मुख्य न्यायाधीश को परेशान करने वाले लोगों के वीडियो सामने आने के बाद दूतावास ने ये बयान जारी किया।
आधिकारिक बयान में भारतीय उच्चायोग ने कहा, “4 जून 2026 को, भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश ने आयोजकों के निमंत्रण पर लंदन विश्वविद्यालय के बर्कबेक स्थित कॉलेज के एक कार्यक्रम में शामिल हुए। इसमें उन्हें ‘एआई और अंतर्राष्ट्रीय कानून’ पर लेक्चर देना था।”
उनके भाषण के बाद एक अच्छी चर्चा हुई। इस दौरान एक व्यक्ति ने कार्यक्रम में बाधा डालने की कोशिश की। दर्शकों का ऐसा अशोभनीय व्यवहार अस्वीकार्य है और मर्यादा के विपरीत है। मतभेद एक लोकतांत्रिक समाज का स्वाभाविक हिस्सा हैं, हालाँकि इसे सभ्य और सम्मानजनक तरीके से व्यक्त किया जाना चाहिए।
वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि एक प्रतिभागी भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति को लेकर सवाल उठाते हुए दिखाई दे रहा है। मुख्य न्यायाधीश लंदन विश्वविद्यालय के बर्कबेक कॉलेज में ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अंतर्राष्ट्रीय कानून’ पर लेक्चर देने के लिए गए थे।
In the 1st video, the lady interrupting CJI Suryakant is not a student but a Professor of Geography and anti-India activist, Kalpana Wilson. She is daughter of Amrit Wilson whose OCI was cancelled by GoI few months ago. She is ideologically aligned to India's CPI(ML). She has a… https://t.co/AeXxhRa7Ma
— Stop Hindu Hate Advocacy Network (SHHAN) (@HinduHate) June 7, 2026
वहाँ मौजूद एक महिला ने पहले मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों का जिक्र किया और फिर उनसे असहमति के बारे में पूछा। उन्होंने कहा, “ माननीय न्यायाधीश ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संदर्भ में लोकतंत्र की रक्षा के भारतीय इतिहास के बारे में कुछ बहुत महत्वपूर्ण बातें कही हैं। लेकिन, हमें देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई कानूनी विशेषज्ञों से पता चल रहा है कि भारत में ‘असहमति ‘ को लेकर काफी चिंता है। और ऐसा लगता है कि यह ‘चिंता’ कुछ हद तक माननीय न्यायाधीश के भाषण में भी झलकती है।” इससे पहले कि वह अपना प्रश्न पूरा कर पातीं, मंच पर मौजूद मॉडरेटर ने प्रश्न को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह चर्चा के विषय से संबंधित नहीं था।
बाद में महिला की पहचान अमृत विल्सन की बेटी कल्पना विल्सन के रूप में हुई। कल्पना बिरबेक विश्वविद्यालय में भूगोल की प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।
कल्पना विल्सन कौन हैं?
बिरबेक विश्वविद्यालय में कल्पना विल्सन के प्रोफाइल के अनुसार , वे सामाजिक विज्ञान विषय में सीनियर प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं और उनका कार्य अंतरराष्ट्रीय विकास और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में रिसर्च पर है। उन्होंने नस्ल/लिंग, श्रम, नव-उदारवाद और प्रजनन अधिकारों एवं न्याय से संबंधित विषयों पर शोध किया है, जिसमें विशेष रूप से दक्षिण एशिया और उसके प्रवासी समुदायों पर ध्यान दिया गया है।
कल्पना ने ससेक्स विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में बीए (ऑनर्स) और एरिया स्टडीज (दक्षिण एशिया) में एमए किया है। उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय के एसओएएस से राजनीतिक अर्थशास्त्र में पीएचडी भी की है। बिरबेक कॉलेज ज्वाइंन करने से पहले, वह लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और एसओएएस में कार्यरत थीं। हालाँकि उनकी अकादमिक उपलब्धियाँ भारत-विरोधी गतिविधियों को छिपा नहीं सकतीं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर उनके बायो से पता चलता है कि वे ‘नस्लवाद और अंतरराष्ट्रीय विकास, लिंग, नवउदारवाद, साम्राज्यवाद और हिंदुत्व फासीवाद’ के बारे में लिखती हैं और खुद को ‘मार्क्सवादी नारीवादी’ बताती हैं। कल्पना ने सीपीआई (एमएल) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य से हुई है। उनकी एक बेटी अनन्या है।
वामपंथी और भारत-विरोधी नेटवर्कों के साथ उनका जुड़ाव
कल्पना विल्सन का वामपंथी और भारत-विरोधी नेटवर्कों से जुड़ाव केवल अकादमिक लेखन तक सीमित नहीं है। वह नियमित रूप से ऐसे मंचों और अभियानों में शामिल होती रही हैं, जो भारत, भाजपा, आरएसएस और हिंदू संगठनों को फासीवादी, बहुसंख्यकवादी और दमनकारी के रूप में चित्रित करते हैं। साथ ही राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों और इससे जुड़े आरोपितों का समर्थन भी करती हैं।
लेस्टर हिंसा के लिए हिंदुओं को दोषी ठहराना
2022 में कल्पना विल्सन और उनकी मां अमृत विल्सन के साथ-साथ उनसे जुड़े ग्रुप ने ब्रिटेन के लीसेस्टर में हुई सांप्रदायिक हिंसा के लिए हिंदुओं को दोषी ठहराया। शहर में हिंदुओं के साथ हुई टारगेटेड हिंसा और धमकियों को मानने के बजाय, तनाव के लिए ‘हिंदुत्व’ को जिम्मेदार माना। उन्होंने लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग के बाहर भी प्रदर्शन किया, जिसे उन्होंने ब्रिटेन की राजनीति में हिंदुत्व के बढ़ते प्रभाव के रूप में वर्णित किया। लीसेस्टर हिंसा पर OpIndia की विस्तृत रिपोर्ट यहाँ देखी जा सकती है।
भारत से जुड़े मुद्दों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन
यही नेटवर्क भारत से जुड़े कई मुद्दों पर विरोध प्रदर्शनों में भी शामिल रहा है। उन्होंने पाकिस्तान का कर्ज माफ करने, भारत में अवैध निर्माणों पर बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ, फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, जिसे उन्होंने “त्रासदी को प्रचार में बदलना” बताया, भारत में किसानों के विरोध प्रदर्शन का समर्थन किया और 2002 के गुजरात हिंसा के विरोध में एक कैंडल मार्च निकाला, जिसे उन्होंने मोदी विरोधी नजरिए से पेश किया।
साम्यवादी राजनीति और पूँजीवाद पर हमले
कल्पना विल्सन की वैचारिक स्थिति ने भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर उनके लेखन को भी प्रभावित किया है। एक कम्युनिस्ट मार्क्सवादी के रूप में, उन्होंने भारत में पूँजीवाद का विरोध किया है और बड़े औद्योगिक घरानों पर असमानता फैलाने और हिंदुत्व के विकास में योगदान देने का आरोप लगाया है। उन्होंने आरएसएस, भाजपा और अन्य हिंदू समूहों को ‘पूँजीवादी समर्थक’ बताया है। उनके लेख कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, मार्क्सवादी लेनिनवादी मुक्ति (सीपीआई (एमएल)) की वेबसाइट पर प्रकाशित हुए हैं, जो वामपंथी राजनीतिक नेटवर्कों के साथ उनके संबंधों को और भी स्पष्ट करते हैं।
कर्नाटक में हिजाब विवाद पर क्या बोली कल्पना
कर्नाटक में हिजाब विवाद के दौरान, कल्पना विल्सन ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया कि वह मुस्लिम लड़कियों को केवल इसलिए कॉलेजों में दाखिले से वंचित कर रही है, क्योंकि वे हिजाब पहनकर अपनी आस्था व्यक्त करती हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि मुस्लिम छात्राओं को इस्लाम विरोधी गिरोह तंज कसते हैं। मुस्लिम छात्राओं को परेशान किया जा रहा था। विवाद को लेकर उन्होंने जो लिखा, उसमें एक बार फिर भारत को अल्पसंख्यकों के प्रति शत्रुतापूर्ण देश के रूप में चित्रित करने की कोशिश की गई, जबकि बहस के कानूनी पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया गया। कर्नाटक हिजाब विवाद का विस्तृत विवरण यहाँ देखा जा सकता है।
In the 1st video, the lady interrupting CJI Suryakant is not a student but a Professor of Geography and anti-India activist, Kalpana Wilson. She is daughter of Amrit Wilson whose OCI was cancelled by GoI few months ago. She is ideologically aligned to India's CPI(ML). She has a… https://t.co/AeXxhRa7Ma
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स्टेन स्वामी का समर्थन किया कल्पना ने
कल्पना विल्सन ने भी स्टैन स्वामी का समर्थन किया। स्टैन पर एनआईए ने प्रतिबंध लगा दिया था। सीपीआई (माओवादी) से जुड़ा जेसुइट पादरी है। स्वामी को एल्गर परिषद मामले में गिरफ्तार किया गया था और उन पर एक बड़े माओवादी षड्यंत्र का हिस्सा होने का आरोप लगा था। विल्सन का स्वामी को समर्थन करना उस व्यापक वामपंथी अभियान के अनुरूप था, जिसमें उन्हें मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में पेश किया गया था। इस दौरान जाँच एजेंसी ने जो पादरी स्ट्रैन पर गंभीर आरोप लगाए, उसे कम करके आंका गया।
भारत-यूरोपीय यूनियन शिखर सम्मेलन में शामिल हुई
2021 में कल्पना विल्सन AIMC और द लंदन स्टोरी फाउंडेशन द्वारा प्रायोजित भारत-ईयू शिखर सम्मेलन में वक्ताओं में से एक थीं। पैनल में आनंद ग्रोवर, क्रिस्टोफ़ जैफ़्रेलॉट, प्रद्युम्न जयराम, नोदीप कौर, रविंदर कौर, इंडियन काउंसिल ऑफ इंटरनेशनल मुस्लिम्स के उमैर खान, सीपीआई (एमएल) सदस्य कविता कृष्णन, हर्ष मंदर, निखिल मंडलपार्थ और हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स की श्राव्या ताडेपल्ली, द लंदन स्टोरी फाउंडेशन की रितुम्ब्रा मनुवी, रकीब हामिद नाइक, करुणा नंदी, आकार पटेल, पामेला फिलिपोस, एन राम, मनु सेबेस्टियन, प्रतीक सिन्हा, अशोक स्वैन, ऑड्रे ट्रुश्के और रिचर्ड विल्सन सहित कई जाने-माने भारत-विरोधी वक्ता शामिल थे।
‘भारत नरसंहार के कगार पर: नरसंहार की रोकथाम’ पर चर्चा
कल्पना “भारत नरसंहार के कगार पर: नरसंहार की रोकथाम” शीर्षक वाले कार्यक्रम में एक वक्ता भी थीं। इस कार्यक्रम में ऑस्ट्रेलियाई ग्रीन्स पार्टी के सदस्य डेविड शूब्रिज, जेनेट राइस और ली रियानन, द ह्यूमनिज्म प्रोजेक्ट के हारून कासिम, कंचा इलाइया शेफर्ड, सीपीआई (एमएल) सदस्य कविता कृष्णन, मैसी विश्वविद्यालय के मोहन दत्ता, पीटर फ्रेडरिक, आम आदमी पार्टी से जुड़े पूर्व आईपीएस अधिकारी आरबी श्रीकुमार, तीस्ता सेतलवाद, आईएएमसी के राशिद अहमद, दिल्ली दंगों की आरोपी सफूरा जरगर, द पोलिस प्रोजेक्ट की सुचित्रा विजयन, आकार पटेल, रकीब हामिद नाइक, ऋतुम्ब्रा मनुवी, हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स की सुनीता विश्वनाथ और अंगना चटर्जी शामिल थे।
‘हिंदू विरोध’ को किया खारिज
एक दूसरे कार्यक्रम में कल्पना विल्सन और केवल भारडिया ने ‘हिंदू-विरोधी मिथक का पर्दाफाश, फासीवाद-विरोधी एकजुटता का निर्माण’ वाले टॉपिक में हो रही चर्चा में भाग लिया। इस दौरान, विल्सन ने कहा कि बांग्लादेश में मंदिरों पर हुए हमलों और हत्याओं को हिंदू-विरोधी भावना कहना ‘सही नहीं’ है। उन्होंने दावा किया कि दक्षिण एशिया में औपनिवेशिक काल से ही सांप्रदायिक और धार्मिक हिंसा होती है और भारत में हिंदुत्व के उदय और अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी से हवा मिल गई है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि हिंदुओं पर हमले मुसलमानों और यहूदियों पर हमलों की तरह वैश्विक नहीं हैं।
विश्व स्तर पर हिंदुत्व के खिलाफ सम्मेलन का समर्थन किया
विल्सन ने ‘वैश्विक हिंदुत्व विघटन’ सम्मेलन का भी समर्थन किया, जो एक विवादास्पद आयोजन था और जिसने हिंदू धर्म और हिंदुत्व के बीच अंतर करने का दावा किया। इसमें कई लोगों ने हिंदुत्व का विरोध करने की आड़ में हिंदू पहचान, हिंदू संगठनों और हिंदू सभ्यतागत दावों को प्रभावी ढंग से टारगेट करने वाले तर्क दिए।
‘वैश्विक हिंदुत्व का विघटन’ एक तीन दिवसीय सम्मेलन था, जिसे 45 से अधिक विश्वविद्यालयों के 60 से अधिक विभागों द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था। इनमें से अधिकांश अमेरिका के थे। यह सम्मेलन सितंबर 2021 में आयोजित हुआ था। सम्मेलन से कई हिंदू विरोधी तत्व जुड़े हुए थे, जिनमें ऑड्रे ट्रुश्के , आनंद पटवर्धन और नंदिनी सुंदर शामिल थे।
द पोलिस प्रोजेक्ट और भारत-विरोधी कश्मीरी विचारों का संबंध
2019 में द पोलिस प्रोजेक्ट के साथ एक बातचीत में कल्पना विल्सन ने ‘हिंदू फासीवाद’ और हिंदुत्व विचारधारा के बारे में बात की। द पोलिस प्रोजेक्ट अपने भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी रुख के लिए जाना जाता है। इसकी सह-संस्थापक सुचित्रा विजयन कश्मीर पर अलगाववादी विचारों का समर्थन करती रही हैं और ऐसे मंचों पर दिखाई देती रही हैं, जहाँ पाकिस्तान समर्थित भारत-विरोधी आवाजें भी मौजूद रही हैं। इंटरव्यू में विल्सन ने अनुच्छेद 370 और 35ए को निरस्त करने का विरोध किया और दावा किया कि संवैधानिक परिवर्तनों के बाद बाहरी लोग जमीन खरीदकर कश्मीर को लूट रहे हैं।
अनुच्छेद 370, कोविड लॉकडाउन और फासीवाद के आरोप
कश्मीर पर उनके विचार अलगाववादियों और वामपंथी संगठनों की ‘आवाज’ लग रहे थे। उनके शब्दों और भाषा काफी मिलते-जुलते लग रहे थे। 2020 में भारत में कोविड लॉकडाउन के वक्त उन्होंने ‘अधिकारों का दमन, नफरत को बढ़ावा: भारत में फासीवाद और कोविड-19’ शीर्षक से एक लेख लिखा।
इसमें विल्सन ने मोदी सरकार पर महामारी का इस्तेमाल धार्मिक और जाति आधारित नफरत को भड़काने के लिए करने का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी दावा किया कि अनुच्छेद 370 को निरस्त करके, भारत इजरायली शैली के ‘बस्तीवादी उपनिवेशवाद’ के माध्यम से कश्मीर पर ‘कब्जा’ कर रहा है और आंशिक इंटरनेट बंद करके कश्मीरियों को आधारभूत जानकारियों से भी महरूम किया जा रहा है।
मोदी सरकार पर बार-बार हमले
उनके लेखन में बार-बार मोदी सरकार को फासीवादी और हिंदू वादी बताया गया। अपने लेख में उन्होंने दावा किया कि भारत में महामारी ने वामपंथियों के बीच पहले से मौजूद इस धारणा की पुष्टि कर दी है कि यह शासन फासीवाद का एक ऐसा रूप है जिसमें हिंदू वर्चस्ववाद और नवउदारवाद आपस में जुड़े हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि महामारी के दौरान मोदी सरकार का मुख्य उद्देश्य वायरस को अपने वैचारिक अभियान के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना था।
उमर खालिद के लिए समर्थन और यूएपीए को खत्म करने की माँग
कल्पना विल्सन ने 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों से जुड़े साजिश के आरोपित उमर खालिद का समर्थन किया । खालिद को अदालतों ने जमानत देने से इनकार कर दिया है, क्योंकि अदालतों ने पूर्व नियोजित साजिश और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की यात्रा के दौरान अशांति फैलाने के प्रयास का हवाला दिया है।
विल्सन ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम को निरस्त करने की मांग की है और उमर खालिद समेत तथाकथित राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांग की है। बड़े षड्यंत्र में उमर खालिद की भूमिका का विवरण यहां देखा जा सकता है और 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों का विवरण यहां देखा जा सकता है ।
स्वच्छ भारत अभियान पर हमला
भारत सरकार के कल्याणकारी और विकास योजनाओं पर भी कल्पना विल्सन ने हमला किया था। 2017 में उन्होंने लिंचिंग, विकास और स्वच्छ भारत अभियान के बीच एक अजीबोगरीब तुलना की और दावा किया कि स्वच्छ भारत मिशन गरीबों के साथ क्राइम था। यह टिप्पणी स्वच्छता और जन कल्याणकारी योजनाओं पर उनकी सोच को दर्शाता है।
एसएएसएफ पैनल और कश्मीर को ‘आजाद’ करने की पैरवी
CPI(ML) ने लंदन के SOAS में दक्षिण एशिया एकजुटता समूह (SASG) द्वारा आयोजित “फासीवाद का प्रतिरोध, एकजुटता का निर्माण, भारत-कश्मीर और उससे आगे” शीर्षक वाली एक चर्चा में हिस्सा लिया था। 2019 में आयोजित इस कार्यक्रम में कविता कृष्णन, दिब्येश आनंद, अमृत विल्सन, कल्पना विल्सन, सतपाल मुमा, सज्जाद हसन, राजरत्न अंबेडकर, निताशा कौल समेत कई लोगों ने भाग लिया। CPI(ML) के लेख में कश्मीर को ‘आजाद’ करने की वकालत की गई। विल्सन को एक बार फिर उस तंत्र में शामिल किया गया, जो नियमित रूप से भारत के आंतरिक मामलों का अंतर्राष्ट्रीयकरण करता है और अलगाववादी विचारों को बढ़ावा देता है।
चंदन गुप्ता हत्याकांड के फैसले में एनआईए की अदालत ने एसएएसजी की निंदा की। कोर्ट ने एलायंस फॉर जस्टिस एंड अकाउंटेबिलिटी (न्यूयॉर्क), सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (मुंबई), इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (वाशिंगटन डीसी), पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (नई दिल्ली), रिहाई मंच (लखनऊ), साउथ एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप (लंदन) और यूनाइटेड अगेंस्ट हेट (नई दिल्ली) सहित कुछ गैर-सरकारी संगठनों के प्रभाव पर चिंता व्यक्त की।
कोर्ट ने कहा, “सांप्रदायिक भावना वैचारिक स्तर पर सूक्ष्म रूप से घुसपैठ करती है और अक्सर ऐसे गैर-सरकारी संगठनों की रिपोर्टों और हस्तक्षेपों के माध्यम से प्रकट होती है। इस अदालत ने अक्सर देखा है कि जब राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में शामिल आरोपियों को मुकदमे के लिए लाया जाता है, तो इन गैर-सरकारी संगठनों से कथित तौर पर जुड़े कुछ वकील वकालतनामा लेकर उनका प्रतिनिधित्व करने के लिए पहले से ही मौजूद होते हैं।” अदालत ने इन गैर-सरकारी संगठनों के फंडिंग पर भी सवाल उठाए।
सीपीआई (एमएल) की प्रशंसा और एनआईए पर आरोप
2014 में द गार्जियन में छपे लेख में कल्पना विल्सन ने बिहार के एक गाँव में CPI(ML) की चुनाव में जीत की प्रशंसा की। इसका शीर्षक था ‘सिर्फ भारत के मध्यम वर्ग को ही नरेंद्र मोदी से समस्या नहीं है ‘। लेख में उन्होंने पटना विस्फोटों के बाद मोदी की रैली के दौरान हुई गिरफ्तारियों के संबंध में भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) पर गंभीर आरोप लगाए। इसमें दावा किया गया कि मुस्लिम युवकों को हिरासत में लेकर उनसे झूठे बयान निकलवाने के लिए उन्हें प्रताड़ित किया गया। ये आरोप बिना किसी विश्वसनीय सबूत के लगाए गए थे।
कम्युनिस्ट वेबसाइट के लिए लेखन
कम्युनिस्ट वेबसाइट सैल्वेज के लिए ‘हेज फंड, प्रचार और हिंदू फासीवाद’ शीर्षक से लिखे एक लेख में विल्सन ने आरएसएस, गौ संरक्षण समूहों, जाति व्यवस्था, गुजरात 2002 की घटना, गरीबी, कुपोषण, पूंजीवाद और ब्रिटिश उपनिवेशवाद को जोड़कर हिंदुत्व पर हमला किया। इसी लेख में उन्होंने हिंदुत्व को औपनिवेशिक, ब्राह्मणवादी, पितृसत्तात्मक और पुरुषवादी बताया और दावा किया कि यह हिंदू धर्म को एकरूप करने का प्रयास है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हिंदुत्व में उन हिंदू देवी-देवताओं के मंदिरों को नष्ट करना शामिल है, जिनकी उत्पत्ति स्वदेशी धर्मों या दलितों द्वारा पूजे जाने वाले धर्मों से हुई है।
भारत के खिलाफ अभियानों पर हस्ताक्षर किया था विल्सन ने
कल्पना विल्सन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों और कर्मचारियों पर कथित हमलों की निंदा करने वाले पत्रों पर हस्ताक्षर करने वालों में से एक हैं। उन्होंने रोहित वेमुला मामले का मुद्दा उठाया और महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा को लेकर केन्द्र सरकार की आलोचना की। उनकी सक्रियता, लेखन और सार्वजनिक भागीदारी भारत, मोदी सरकार, हिंदू संगठनों और हिंदुत्व के विरुद्ध है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वे वामपंथी, इस्लामी विचारधारा से जुड़े और भारत विरोधी संगठनों के साथ एकजुटता दिखाती हैं।
कल्पना विल्सन की मां का ओसीआई कार्ड रद्द, दिल्ली उच्च न्यायालय से कोई राहत नहीं
कल्पना विल्सन की मां अमृत विल्सन के भारत विरोधी रुख के कारण ओसीआई विशेषाधिकार खत्म हो गए थे। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन कोर्ट ने इस मामले में यह कहते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया कि न्यायालय देश को बदनाम करने की इजाजत नहीं दे सकता। विल्सन ने भारत सरकार की नीतियों की सार्वजनिक रूप से आलोचना की है।
उन्होंने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) का विरोध किया है। उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की कड़ी आलोचना की है। अक्सर उन्हें फासीवादी कहा है।
गौरतलब है कि एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। हालाँकि राष्ट्रीय स्तर पर एनआरसी या एनपीआर के कार्यान्वयन के लिए कोई परिचालन नियम अधिसूचित नहीं किए गए। घरेलू राजनीति की आलोचना के अलावा, विल्सन ने अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में भी भाग लिया है जहाँ भारत के विधायी उपायों को इस्लामोफोबिक और ‘जातीय सफाई’ की दिशा में उठाया गया कदम बताया गया।
उन्होंने लीसेस्टर में हुई अशांति के संबंध में भी बयान दिए। उन्होंने दावा किया कि आरएसएस समर्थकों को हिंसा भड़काने और हिंदुओं को पीड़ित के रूप में पेश करने की कहानी को मजबूत करने के लिए वहाँ भेजा गया था। इन दावों का कई संगठनों और लेखकों ने कड़ा विरोध किया। साथ ही, हिंदू घरों और मंदिरों पर इस्लामी भीड़ के हमले को सबूत के तौर पर पेश किया।
विल्सन ब्रिटेन स्थित दक्षिण एशिया एकजुटता समूह से जुड़ी रही हैं। इसने भारतीय उच्चायोग के बाहर विरोध प्रदर्शन किए और सोशल मीडिया पर भाजपा और आरएसएस की आलोचना की। इस समूह ने कश्मीर में हो रहे घटनाक्रमों को अलगाववादी विचारों से मेल खाने वाले नजरिए से पेश किया है और भारत को ‘आक्रामक देश’ के रूप में पेश करने की कोशिश की।
अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के बाद अलगाववादी अभियानों से जुड़े प्रतीकात्मक चित्रों का उपयोग करके उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी गतिविधियाँ तेज कर दी। इस तरह से देखा जाए तो माँ और बेटी दोनों का भारत विरोधी गतिविधियों का लंबा इतिहास रहा है।
मुख्य न्यायाधीश के प्रति नाराजगी को एक अलग घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। कल्पना की उपस्थिति ही उनके इतिहास और पूर्व बयानों को देखते हुए उनके इरादों को बयाँ करती हैं।
(यह मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया लेख है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)