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भगवान राम का अपमान, आजादी के नारे और तिरंगे से बदसलूकी: कॉकरोचों को ये तक नहीं पता कि वे क्यों आए हैं, पढ़ें- CJP के प्रदर्शन में ऑपइंडिया को क्या दिखा

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने शनिवार (6 जून 2026) को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपनी इस कथित पार्टी के सदस्यों यानी ‘कॉकरोचों’ को प्रदर्शन के लिए बुलाया था।CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने समर्थकों से बड़ी संख्या में पहुँचकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की थी, लेकिन उनका साथ देने वाले कॉकरोचों की संख्या उनकी उम्मीदों को तोड़ने वाली रही।

अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर युवाओं और छात्रों से बड़ी से बड़ी संख्या में जुटने का आह्वान किया था लेकिन आह्वान का असर केवल कुछ कॉकरोचों पर ही पड़ा। सोशल मीडिया पर करोड़ों फॉलोअर्स वाली इस CJP के प्रदर्शन में बमुश्किल कुछ सौ लोग ही पहुँचे। बात सिर्फ इतनी ही नहीं है इसमें शामिल होने वाले कॉकरोचों को देखकर भी साफ समझा जा सकता था कि इनकी मंशा केवल हिंसा फैलाना, सुर्खियाँ बटोरना, सरकार और भारतीय संस्कृति को बदनाम करना था।

यह आरोप कोई हमारा मनगढ़ंत नहीं है बल्कि ऑपइंडिया को इसके प्रमाण भी मिले हैं। पहली बात तो ये सामने आई कि प्रोटेस्ट के नाम पर शोर मचाने वाले ये कॉकरोच असल में ना तो कोई छात्र हैं और ना ही पढ़ाई या किसी तरह की परीक्षा से इनका कोई लेना-देना है और इसका प्रमाण इन्होंने खुद ही दे दिया ‘आजादी-आजादी’ के नारे लगाकर।

वायरल वीडियो अब तक आपने भी देख लिए होंगे और अगर नहीं देखें तो ऑपइंडिया के इन वीडियोज को देंखे, जिसमें ये अबर्न नक्सली डफली बजाते हुए ‘आजादी-आजादी’ चिल्ला रहे।

वीडियो में दिख रहे ये लोग चिल्ला रहे, “हम क्या चाहते आजादी, BJP से आजादी, हमारा नारा आजादी, मोदी सुनले आजादी, BJP सुनले आजादी, तुम जेल में डालो आजादी, हम लेके रहेंगे आजादी, मैं भी बोलूँ आजादी, तू भी बोले आजादी, देश बोले आजादी, मोदी तुझसे आजादी, BJP तुझसे आजादी।” अब आप सोचिए कि इसका पेपर लीक से क्या लेना देना है भला?

यह पहली बार नहीं जब ये वामपंथी गुट किसी भी अन्य मुद्दे को ढाल बनाकर सामने आया हो और बाद में असली रंग दिखाया हो। किसान आंदोलन के समय भी किसानों के साथ उनकी लड़ाई में शामिल होने को ढोंग कर के इन वामपंथियों ने एक शांत से धरने को हिंसक बना दिया था।

इसके अलावा साल 2019-20 का समय याद करें तो दिल्ली समेत जगह-जगह CAA-NRC के विरोध में सड़क पर आकर बैठे प्रदर्शनकारियों ने अपने प्रोटेस्ट का रंग बदल दिया था। उन्हीं प्रदर्शनों का नतीजा था कि दिल्ली को हिंदू विरोधी दंगे झेलने पड़े। 40-50 लोगों की निर्ममता से मौत हुई।

मकसद भी नहीं बता पा रहे अभिजीत के कॉकरोच, तिरंगे के अपमान का वीडियो आया सामने

बता दें कि CJP के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने अपने समर्थकों से अपील की थी कि वो अपने साथ तिरंगा झंडा, किताबें और फूल लेकर आएँ। उनके कॉकरोचों यानी समर्थकों ने ये बात मानी भी लेकिन शायज आशुतोष उन्हें ये बताना भूल गए कि तिरंगे को हर भारतीय, हर देशभक्त सम्मान की दृष्टि से देखता है।

ऑपइंडिया ने इसकी पुष्टि कर रही ऐसी ही एक घटना को कैप्चर भी किया है, जिसमें प्रदर्शन करने पहुँचे कॉकरोच तिरंगे का अपमान कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि कोई ऐसा व्यक्ति, जिसको अपने देश से प्रेम हो वो ऐसी घटिया हरकत कर सकता है। साफ समझ आ रहा कि ये हरकते भारत को बदनाम करने की वामपंथियों की केवल एक साजिश है।

दूसरी तरफ ऑपइंडिया के रिपोर्टर्स को ग्राउंड पर ऐसा कोई कॉकरोच नहीं मिला, जो यह बता सके कि उनका जुटान यहाँ हुआ किसलिए है। किसी के पास कोई मुद्दा नहीं जो वो बता सकें कि इसलिए वो प्रदर्शन करने आए हैं। कोई पेपर लीक पेपर लीक चिल्ला रहे तो वो उनके साथ मिल जा रहे।

कोई आजादी-आजाजी चिल्ला रहा तो उधर भी उपस्थिति दर्ज कर रहे। इस बैनर से उस बैनर, यहाँ से वहाँ, वहीं जो असल में कॉकरोच करते हैं।

हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ उगला जहर उगलने पहुँच रहे कॉकरोचों के दादा-परदादा

जंतर-मंतर पर पहुँचे एक बुजुर्ग ने ऑपइंडिया के रिपोर्टर से कहा कि ‘पांडव-वांडव’ तो कभी थे ही नहीं, ये सब बेकार बाते हैं। उन्होंने आगे कहा, “राम-वाम सब छोड़ दे, तु वहाँ मत जा, राम मोदी को नहीं मारता, सारे देश को लूट कर खा गया, वो मोदी को नहीं मारता, राम मंदिर के नाम पर कितने रुपए डकार गया, अडानी-अंबानी को नहीं मारता है।”

जब ऑपइंडिया के रिपोर्टर ने पूछा कि इसमें भगवान राम बीच में कहाँ से आ गए तो वो कहते हैं, “तेरे मेरे को डराने के लिए हैं राम तो, उसको नहीं मानते।” जिनको ना तो भारत के इतिहास, संस्कृति और धर्मग्रंथो से कोई लेना-देना नहीं, ना तो इन्हें हिंदू देवी-देवताओं का सम्मान करना आता है, ये लोग पहुँचे हैं कॉकरोचों को समर्थन करने।

कोई डायरी को बता रहा संविधान तो किसी का जवाब- अब्बा-डब्बा-जब्बा

प्रशांत राणा नाम के एक कॉकरोच से ऑपइंडिया के रिपोर्टर ने बात की तो उसने हाथ में ली हुई डायरी को भारत का संविधान बताया। जब रिपोर्टर ने दिखाने को कहा तो प्रशांत ने थोड़ा भाव खाया, लेकिन फिर डायरी खोली और कहा, ‘ये मेरे कुछ आर्टिकल्स हैं।’ जी हाँ यानी कॉकरोचों का अपना एक संविधान भी लिखा जा रहा है। उसने कहा कि ये मेरे लिए संविधान है।

रिपोर्टर ने जब उससे कहा कि भाई दिखाओ तो इस संविधान में क्या है तो कॉकरोच ने कहा- “इतनी पर्सनल चीज नहीं दिखा सकते।” इसके बाद वो लगातार अपने मन का बेतुकी बातें करता रहा जो संभवतः उसके अपने पर्सनल संविधान में लिखी होंगी।

ऑपइंडियो को प्रशांत की तरह ही एक और कॉकरोच मिला। उसने कहा कि वो सिस्टम का विरोध करने वालों का समर्थन कर रहा है। उसने कहा कि एजुकेशन सिस्टम पूरी तरह करप्ट हो चुका है। जब रिपोर्टर ने पूछा कि तो इसका हल क्या है और CJP के पास इसका क्या समाधान है तो उसने ना में सिर हिला दिया कि उसके पास इसका कोई जवाब नहीं है।

मास्क पहने एक कॉकरोच ने ऑपइंडिया को बताया कि नीट पेपर लीक हुआ है, इसलिए वो यहाँ आया है, लेकिन और कौन से पेपर कब लीक हुए हैं, इसके बारे में उसे कोई जानकारी नहीं थी। वह लगातार कहता रहा, “नीट का पेपर लीक हुआ है, होते रहते हैं, अब जैसे नीट का पेपर लीक हुआ है, नीट का पेपर लीक हुआ था, नीट का पेपर लीक हो जाएगा फिर।”

अंत में कॉकरोच ने रिपोर्टर से ही पूछ लिया कि वो बताए कौन-कौन से पेपर लीक हुए हैं। रिपोर्टर के हर सवाल में फँसते हुए कॉकरोच में अंत में चेहरा दिखाकर और बेईज्जती कराना सही नहीं समझा और चुप हो गया। जिन्हें किसी विषय की कोई जानकारी नहीं है, यहाँ तक की अपने भविष्य का भी कुछ नहीं पता ये औरों के भविष्य की क्या चिंता करेंगे।

कोई कॉकरोच यहाँ हिंदू देवी-देवता का अपमान कर रहा तो कोई अपनी पर्सनल डायरी को संविधान बता रहा। किसी को तिरंगे के सम्मान से कोई लेना-देना नहीं तो कोई डफली बजाते हुए आजादी-आजादी चिल्ला रहा और इनका कहना था कि ये छात्रों के भविष्य के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेंगे, ये कॉकरोच जिनके पास ना तो ज्ञान है और ना ही तमीज।

तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति के ‘घृणा मॉडल’ को अन्नामलाई की चुनौती, पेरियार नहीं, कलाम हैं आदर्श: समझें- ‘We The Change’ से राष्ट्रवाद का शंखनाद कितना अहम

तमिलनाडु की राजनीति में दशकों पुराने द्रविड़ आंदोलनों के ‘घृणा मॉडल’ को सीधी चुनौती देते हुए, पूर्व आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई ने एक अभूतपूर्व आंदोलन का शंखनाद किया है। पेरियार, अंबेडकर, उत्तर भारत विरोध और हिंदी विरोध जैसी विभाजनकारी विचारधाराओं पर आधारित राजनीति के विपरीत, अन्नामलाई ने भारत के मिसाइल मैन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को अपना आदर्श बनाया है। उन्होंने ‘कलाम स्कूल ऑफ आइडियोलॉजी’ के तहत ‘वी द चेंज’ (We The Change) आंदोलन की शुरुआत की है, जिसका प्राथमिक लक्ष्य तमिलनाडु में राष्ट्रवाद और सकारात्मक विकास का बीज बोना है।

दरअसल, भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और अपनी बेदाग, साहसी और तेजतर्रार छवि के लिए मशहूर पूर्व आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई ने बीजेपी से अपनी राहें आधिकारिक तौर पर अलग कर ली हैं। अन्नामलाई का यह फैसला किसी राजनीतिक द्वेष या आपसी कलह का नतीजा नहीं है, बल्कि यह तमिलनाडु की आत्मा को एक नई वैचारिक दिशा देने की एक विराट और दमदार कोशिश है। बिना अपनी पूर्व पार्टी पर कोई निशाना साधे, उन्होंने बेहद गरिमापूर्ण तरीके से इस्तीफा दिया और तुरंत बाद एक नए राजनीतिक आंदोलन की नींव रख दी।

यह आंदोलन केवल एक नए संगठन का जन्म नहीं है, बल्कि यह तमिलनाडु की उस पारंपरिक, संकीर्ण और घृणा-आधारित राजनीति के ताबूत में आखिरी कील ठोकने की शुरुआत है, जिसने दशकों से इस महान धरती को शेष भारत से अलग रखने की साजिश रची थी।

अन्नामलाई ने इस आंदोलन के जरिए तमिल गौरव और भारतीय राष्ट्रवाद के अद्भुत संगम की एक नई धारा प्रवाहित की है। इस नए सफर का आगाज होते ही तमिलनाडु की जनता ने जिस तरह इस पर अपना भरोसा जताया है, वह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि राज्य के युवा अब बदलाव के लिए पूरी तरह तड़प रहे हैं।

‘We The Change’ की अद्भुत शुरुआत, महज 10 घंटे में 10 लाख सदस्य

अन्नामलाई ने पारंपरिक राजनीति से बिल्कुल अलग हटकर देश के महानतम सपूत, मिसाइल मैन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को अपना आदर्श और वैचारिक प्रतीक बनाया है। उन्होंने कलाम साहब के सिद्धांतों पर आधारित ‘कलाम स्कूल ऑफ आइडियोलॉजी’ के तहत अपने नए आंदोलन ‘We The Change’ (वी द चेंज) की आधिकारिक घोषणा की। यह आंदोलन उनके द्वारा कोयंबटूर में स्थापित किए जाने वाले ‘एपीजे अब्दुल कलाम सेंटर फॉर एथिक्स एंड पॉलिटिक्स’ के तहत संचालित होगा।

इस घोषणा का प्रभाव इतना व्यापक और तीव्र था कि महज 10 घंटों के भीतर ही 10 लाख से अधिक लोग, विशेषकर युवा और महिलाएँ इस आंदोलन से जुड़ गए। तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास में यह अपने आप में एक अटूट रिकॉर्ड है।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

वैसे, जब दक्षिण की राजनीति में हाल ही में एक अभिनेता की पार्टी ‘टीवीके’ बनी थी, तो उन्होंने मंच से पेरियार और पारंपरिक द्रविड़ प्रतीकों का नाम लेकर वही पुरानी घिसी-पिटी राजनीति की थी। लेकिन अन्नामलाई ने उन सभी विभाजनकारी चेहरों से पूरी तरह दूरी बनाकर यह साबित कर दिया कि वे राज्य में सत्ता बदलने नहीं, बल्कि व्यवस्था और सोच को बदलने आए हैं।

द्रविड़ आंदोलनों का हिंदी, उत्तर भारत और सनातन से घृणा का इतिहास

तमिलनाडु की राजनीति आजादी के पहले से और उसके बाद भी कुछ खास नकारात्मक मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। द्रविड़ आंदोलन के नाम पर राज्य में हमेशा हिंदी विरोध, उत्तर भारत विरोध और ब्राह्मण विरोध को ही राजनीति का मूल आधार बनाया गया।

इस द्रविड़ विचारधारा की असलियत बेहद स्याह और समाज को तोड़ने वाली रही है। इसके जनक माने जाने वाले पेरियार का इतिहास देश, संस्कृति और बहुसंख्यक समाज की आस्थाओं के प्रति अत्यंत आक्रामक और घृणा से भरा रहा है। द्रविड़ आंदोलन के नाम पर तमिलनाडु में सनातन धर्म को निशाना बनाया गया, उत्तर भारतीय नागरिकों के खिलाफ नफरत फैलाई गई और भाषा के नाम पर देश को बाँटने की कोशिशें हुईं।

हद तो तब हो गई जब इस विचारधारा के तहत मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के पावन चरित्र तक पर उंगली उठाई गई और जनभावनाओं को आहत किया गया। द्रविड़ राजनीति ने हमेशा तमिल अस्मिता को भारतीयता के विरोधी के रूप में पेश किया, जिससे राज्य का युवा देश की मुख्यधारा से वैचारिक रूप से कटता चला गया। इस घृणा मॉडल के सहारे वहाँ के क्षेत्रीय दलों ने दशकों तक सत्ता सुख भोगा और भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े साम्राज्य खड़े किए।

विडंबना यह रही कि तमिलनाडु की इस जमीन पर राष्ट्रीय पार्टियाँ भी इन द्रविड़ मुद्दों का खुलकर पुरजोर विरोध नहीं कर पाती थीं, क्योंकि उन्हें राज्य में गठबंधन की बैसाखियों की जरूरत होती थी। लेकिन अन्नामलाई ने इस कायरतापूर्ण राजनीति को लात मारकर सीधे सच का रास्ता चुना है।

कलाम कार्ड क्यों है अन्नामलाई का सबसे दमदार मास्टरस्ट्रोक?

ऐसे नफरत भरे और कट्टर माहौल में अन्नामलाई द्वारा डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को अपना वैचारिक प्रतीक चुनना भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा और सकारात्मक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। डॉ. कलाम एक ऐसे अजातशत्रु नेता और वैज्ञानिक रहे हैं, जिनका सम्मान द्रविड़ समर्थक, राष्ट्रवादी, अल्पसंख्यक, अगड़े, पिछड़े और समाज के हर वर्ग के लोग समान रूप से करते हैं।

रामेश्वरम के एक साधारण तमिल परिवार में जन्मे कलाम साहब ने कभी भी खुद को किसी विक्टिम कार्ड या अल्पसंख्यक पहचान के सहारे आगे नहीं बढ़ाया। उन्होंने शिक्षा, कड़ी मेहनत, देशभक्ति और विज्ञान के बल पर देश के शीर्ष वैज्ञानिक और राष्ट्रपति बनने का गौरव प्राप्त किया।

अन्नामलाई ने कलाम साहब को आगे रखकर द्रविड़ राजनीति के उस नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है, जो कहता था कि एक सच्चा तमिल राष्ट्रवादी नहीं हो सकता। अन्नामलाई का यह कदम समाज को जोड़ने वाला है। यह आंदोलन किसी खास जाति, धर्म या संप्रदाय को बढ़ावा देने के बजाय देश और राज्य के सामूहिक और समग्र विकास पर केंद्रित है।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

अन्नामलाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तमिल संस्कृति और भाषा पर अगाध गर्व करना और भारत माता के प्रति पूरी तरह समर्पित रहना एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

संस्थान के बेस पर राजनीति का महाप्लान किया तैयार

अन्नामलाई एक बेहद पढ़े-लिखे, पूर्व नौकरशाह और दूरदर्शी राजनेता हैं, जो आक्रामक राजनीति करने के साथ-साथ गंभीर मुद्दों पर बात करने से कभी नहीं घबराते। उन्होंने अपनी इस राजनीतिक यात्रा की शुरुआत अचानक नहीं की, बल्कि इसके पीछे उनकी एक गहरी संस्थागत तैयारी है।

अन्नामलाई ने कोयंबटूर में जिस कलाम सेंटर की स्थापना की है, उसे बेस बनाकर वे पूरे तमिलनाडु में गवर्नेंस, शिक्षा, विज्ञान और तकनीक आधारित राजनीति को आगे बढ़ाएंगे। यह संस्थान राज्य के उन युवाओं को प्रशिक्षित करेगा जो राजनीति में आना चाहते हैं लेकिन जिनके पास कोई पारिवारिक गॉडफादर नहीं है।

अन्नामलाई की नजर बहुत दूरदर्शी है और उनका लक्ष्य साल 2031 का तमिलनाडु विधानसभा चुनाव है। अपने दीर्घकालिक विजन को समझाते हुए उन्होंने बेहद व्यावहारिक बात कही कि केवल एक मुख्यमंत्री, 234 विधायक या 39 सांसद मिलकर तमिलनाडु की इस सड़ चुकी मौजूदा व्यवस्था को नहीं बदल सकते। अगर हमें वाकई पूरी व्यवस्था को बदलना है, तो हमें पंचायत स्तर से लेकर पार्षद, मेयर और शीर्ष पदों तक करीब 30,000 ईमानदार, कर्मठ और राष्ट्रभक्त नए लोगों की एक पूरी फौज तैयार करनी होगी। उनका यह आंदोलन आने वाले वर्षों में धीरे-धीरे एक राजनीतिक दल का रूप लेगा और राज्य की भ्रष्ट पारिवारिक राजनीति को उखाड़ फेंकेगा।

कैप्टन विजयकांत के साथ वो अनुभव और राष्ट्रवाद का असली दर्द

अपने इस विजन के पीछे के अनुभव को साझा करते हुए अन्नामलाई ने अपने जीवन के एक बेहद महत्वपूर्ण अध्याय का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि साल 2009 में जब वे देश के प्रतिष्ठित संस्थान आईआईएम (IIM) लखनऊ से एमबीए कर रहे थे, तब उन्होंने विशेष अनुमति लेकर डीएमडीके (DMDK) के संस्थापक और दिवंगत अभिनेता-राजनेता कैप्टन विजयकांत के साथ तीन महीने की जमीनी इंटर्नशिप की थी।

लोकसभा चुनाव के दौरान ग्रामीण इलाकों में धूल फाँकते हुए और जमीनी स्तर पर काम करते हुए उन्होंने चुनावी राजनीति और सार्वजनिक सेवा की वास्तविक समझ हासिल की थी। यही जमीनी अनुभव आज उनके काम आ रहा है।

नितिन नवीन को भेजे अपने गरिमापूर्ण इस्तीफे में अन्नामलाई ने राष्ट्रीय पार्टियों के उस कड़वे सच और दर्द को भी बयाँ किया, जिससे वे लंबे समय से जूझ रहे थे। उन्होंने लिखा कि राष्ट्रीय दल कभी भी उस भाषा और भावना के साथ बात नहीं कर पाए जिसे तमिलनाडु के आम लोग अपनी आत्मा से समझ सकें।

अन्नामलाई ने भाजपा में रहते हुए इसी धारणा को बदलने की पुरजोर कोशिश की और कई अंदरूनी तथा बाहरी बाधाओं के बावजूद राज्य के कोने-कोने में राष्ट्रवाद की अलख जगाई। उन्होंने गर्व से यह साफ किया कि वे एक ऐसे पक्के राष्ट्रवादी हैं जो क्षेत्रीय आकांक्षाओं, तमिल भाषा और उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर सर्वोच्च गर्व करते हैं।

तमिलनाडु में राष्ट्रवाद के स्वर्णिम युग की शुरुआत

के. अन्नामलाई का यह कदम तमिलनाडु की राजनीति में एक नए सूर्योदय की तरह है। उन्होंने साबित कर दिया है कि सकारात्मकता, विकास और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर बिना किसी नफरत का सहारा लिए भी एक विशाल जन आंदोलन खड़ा किया जा सकता है। द्रविड़ दलों ने जहाँ हमेशा उत्तर भारत और सनातन से घृणा को अपना हथियार बनाया, वहीं अन्नामलाई ने डॉ. कलाम के ‘मनों के मिलन’ (Unity of Minds) के सिद्धांत को अपना कवच बनाया है।

‘We The Change’ आंदोलन के जरिए तमिलनाडु की धरती पर राष्ट्रवाद का जो बीज बोया गया है, वह आने वाले समय में एक विशाल वटवृक्ष बनेगा। देश की अखंडता को सर्वोपरि मानते हुए तमिल अस्मिता को नया आकाश देने का अन्नामलाई का यह प्रयास न केवल दमदार है, बल्कि भारत की एकता को मजबूत करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।

तमिलनाडु की जनता ने 10 लाख से अधिक की संख्या में जुड़कर यह दिखा दिया है कि वे अब घृणा की राजनीति से ऊब चुके हैं और अन्नामलाई के नेतृत्व में एक नए, समृद्ध और राष्ट्रवादी तमिलनाडु के निर्माण के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

‘कल आतंकियों को पद्म भूषण भी दे देंगे?’: जब अखिलेश सरकार को पड़ी थी हाई कोर्ट की फटकार, आतंक के केस वापस लेने चली थी सपा; जानिए 2013 का पूरा विवाद

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर 13 साल पुराना एक बड़ा विवाद चर्चा में आ गया है। यह वही मामला है, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार ने आतंकवाद के आरोपितों के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की थी। अब योगी सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर ने इस पुराने मुद्दे को दोबारा उठाकर समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला है।

ओमप्रकाश राजभर ने शनिवार (6 जून 2026) को सोशल मीडिया पर 6 जून 2013 की एक पुरानी खबर का स्क्रीनशॉट शेयर किया। यह खबर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच द्वारा आतंकवाद के आरोपितों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने के फैसले को लेकर अखिलेश सरकार से कड़े सवाल पूछे जाने से जुड़ी थी।

राजभर ने मामले का जिक्र करते हुए लिखा, “पढ़ लीजिएगा। कम से कम आपको अपने पाप याद आ जाएँगे। फिर जब आप 2027 में चुनाव हारेंगे तो EVM और SIR को दोष नहीं दे पाएँगे।”

क्या था पूरा मामला?

साल 2012 में समाजवादी पार्टी पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता में आई थी और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने थे। विधानसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी ने वादा किया था कि आतंकवाद के मामलों में फँसाए गए मुस्लिम युवकों के मामलों की समीक्षा कराई जाएगी। पार्टी का कहना था कि कई युवकों को गलत तरीके से फँसाया गया है और उनकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।

सरकार बनने के बाद इसी वादे को पूरा करने की दिशा में काम शुरू हुआ। वर्ष 2013 में अखिलेश सरकार ने वर्ष 2007 के लखनऊ, फैजाबाद और वाराणसी सीरियल ब्लास्ट मामलों से जुड़े आरोपितों के खिलाफ चल रहे मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की। इन धमाकों में कई लोगों की जान गई थी जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे। जैसे ही सरकार के इस फैसले की जानकारी सामने आई तो इसे लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद शुरू हो गया।

विपक्षी दलों ने सरकार पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया। वहीं इस फैसले को अदालत में भी चुनौती दी गई।

हाई कोर्ट ने क्यों उठाए सवाल?

मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच पहुँचा। 6 जून 2013 को सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने अखिलेश सरकार के फैसले पर गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत ने पूछा कि आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों में मुकदमे वापस लेने का आधार क्या है? कोर्ट ने सरकार से उन आरोपितों की सूची भी माँगी, जिनके खिलाफ मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।

इसके साथ ही हाई कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या इस तरह के मामलों में केंद्र सरकार से जरूरी अनुमति ली गई है। अदालत ने साफ कहा कि आतंकवाद से जुड़े मामलों को सामान्य आपराधिक मामलों की तरह नहीं देखा जा सकता क्योंकि इनका असर केवल किसी एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि पूरे समाज और राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है।

बाद में दिसंबर 2013 में हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और देश के खिलाफ युद्ध जैसे गंभीर मामलों में अभियोजन वापस लेने के लिए केंद्र सरकार की सहमति आवश्यक होती है। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में मुकदमे वापस लेने के लिए असाधारण और मजबूत कारण होने चाहिए।

‘कल आतंकियों को पद्म भूषण भी दे देंगे?’

इस मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट की कुछ टिप्पणियाँ काफी चर्चा में रही थीं। अदालत ने सरकार के रुख पर नाराजगी जताते हुए तीखी टिप्पणी की थी कि ‘आज आप आतंकवाद के आरोपितों के मुकदमे वापस ले रहे हैं, कल क्या इन्हें पद्म भूषण भी दे देंगे’?

कोर्ट ने कहा था कि यदि सरकार इस तरह आतंकवाद के आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने लगेगी, तो समाज में गलत संदेश जाएगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कौन दोषी है और कौन निर्दोष, इसका फैसला अदालत करेगी, सरकार नहीं।

संभल दंगों के आरोपितों का मुकदमा भी लिया गया था वापस

यह पहला मौका नहीं था जब समाजवादी पार्टी की सरकार ऐसे फैसलों को लेकर विवादों में आई हो। इससे पहले साल 1993 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की सरकार ने संभल में वर्ष 1978 में हुए दंगों से जुड़े आरोपितों के खिलाफ मुकदमे भी वापस लिए थे।

बताया जाता है कि उस दंगे में सैकड़ों लोगों की हत्या हुई थी और कई हिंदुओं के मकानों व पूजा स्थलों को आग लगा दी गई थी। उस फैसले को लेकर भी उस समय राजनीतिक बहस हुई थी।

अब फिर क्यों उठा यह मुद्दा?

दरअसल, पिछले कुछ महीनों से ओमप्रकाश राजभर लगातार समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर हमलावर नजर आ रहे हैं। खासकर सपा के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को लेकर राजभर लगातार सवाल उठा रहे हैं।

राजभर का आरोप है कि समाजवादी पार्टी केवल वोट बैंक की राजनीति करती है और गैर-यादव पिछड़ी जातियों को सिर्फ चुनावी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करती है। इसी राजनीतिक तनातनी के बीच उन्होंने 2013 के आतंकवाद मामलों का विवाद एक बार फिर सामने ला दिया है।

अपने सोशल मीडिया पोस्ट में राजभर ने कहा कि 6 जून की तारीख इसलिए याद रखनी चाहिए, क्योंकि इसी दिन हाई कोर्ट ने आतंकवाद के आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने के फैसले पर सपा सरकार को कठघरे में खड़ा किया था।

‘यह सरकार खून-खराबे के बिना सत्ता से नहीं हटेगी’: CJP के कॉकरोचों ने सोशल मीडिया पर मचाया उत्पात, कीं रक्तपात-हिंसा-अराजकता की बातें

विवादित कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने आज शनिवार (6 जून 2026) को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने समर्थकों से बड़ी संख्या में जंतर-मंतर पहुँचकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की थी। लेकिन यह प्रदर्शन फीका ही रहा, ना भीड़ जुटी और ना ही कोई सार्थक परिणाम दिखा।

जमीन पर यह प्रदर्शन भले की पुलिस की मुस्तैदी की वजह से शांतिपूर्ण रहा हो लेकिन पार्टी के तिलचट्टों ने सोशल मीडिया पर इसमें हिंसा के लिए उकसाने की पूरी कोशिश की थी। ऑपइंडिया को सोशल मीडिया पर CJP समर्थकों की कई ऐसी टिप्पणियाँ मिलीं, जिनमें प्रदर्शन के दौरान प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हिंसा की बात कही गई थी।

रक्तपात और हिंसा का आह्वान

CJP के प्रदर्शन में शामिल होने की अपील करने वाली कुछ रेडिट पोस्टों के जवाब में एक समर्थक ने खुले तौर पर हिंसा का समर्थन किया। उसने लिखा, “यह अभिशप्त सरकार खून-खराबे और हिंसा के बिना सत्ता से नहीं हटेगी।”

स्क्रीनशॉट – रेडिट

इसी रेडिट अकाउंट से की गई एक अन्य टिप्पणी में भी प्रदर्शन के दौरान हिंसा को उचित ठहराने की कोशिश की गई। टिप्पणी में लिखा गया, “सत्ता में बैठे लोग गुंडे हैं और अपने पास मौजूद हर हथकंडे का इस्तेमाल करते हैं। अगर ये गुंडे इतने ही मूर्ख हैं, तो आंदोलन का हिंसक होना तय है।”

स्क्रीनशॉट – रेडिट

भारत में भी नेपाल जैसा Gen Z विरोध प्रदर्शन चाहिए

एक अन्य CJP समर्थक ने हाल ही में नेपाल में हुए युवा-नेतृत्व वाले उग्र प्रदर्शनों का हवाला देते हुए वैसी ही स्थिति की इच्छा जताई। उसने कहा कि नेपाल में युवाओं ने पुलिस कार्रवाई और लाठीचार्ज की परवाह किए बिना आंदोलन में हिस्सा लिया और भारतीय युवाओं को भी इसी तरह एकजुट होकर आगे आना चाहिए।

अपनी टिप्पणी में उसने लिखा, “नेपाल में युवाओं ने पुलिस या लाठीचार्ज की चिंता किए बिना विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। भारतीय युवाओं को भी एकता के लिए इससे अधिक मजबूत विश्वास दिखाना चाहिए।”

स्क्रीनशॉट – रेडिट

नेपाल को मजबूत लोकतांत्रिक परंपराओं या राजनीतिक स्थिरता के लिए नहीं जाना जाता। वहाँ बहुत कम प्रधानमंत्री ऐसे रहे हैं जो अपना पूरा कार्यकाल पूरा कर पाए हों। देश के राजनीतिक इतिहास में कई बार सरकारें जनआंदोलनों और राजनीतिक उथल-पुथल के चलते सत्ता से बेदखल हुई हैं।

इसके विपरीत, भारत दुनिया के सबसे सफल और जीवंत लोकतंत्रों में से एक माना जाता है, जहाँ सत्ता परिवर्तन हमेशा संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनावों के माध्यम से होता रहा है। भारत में सरकारों को बदलने का अधिकार मतदाताओं के पास है और यह प्रक्रिया चुनावी व्यवस्था के जरिए संपन्न होती है।

प्रदर्शनों के दौरान की थी पागलपन भरी चीजें होने की उम्मीद

CJP के एक समर्थक ने प्रदर्शन के दौरान ‘कुछ बड़ा’ या ‘असामान्य’ होने की संभावना को लेकर उत्साह व्यक्त किया था। उसने लिखा, “मैं वहाँ जा रहा हूँ और इंस्टाग्राम को स्टोरीज से भर दूँगा, क्योंकि निश्चित रूप से कुछ पागलपन भरी चीजें होने वाली हैं।”

इस टिप्पणी से संकेत मिलता है कि समर्थक को प्रदर्शन के दौरान किसी अप्रत्याशित घटनाक्रम की उम्मीद थी। सोशल मीडिया पर सामने आए ऐसे संदेशों ने प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर और अधिक सवाल खड़े कर दिए हैं, खासकर तब जब पार्टी नेतृत्व लगातार आंदोलन को शांतिपूर्ण बता रहा है।

स्क्रीनशॉट – रेडिटॉ

भारतीय न्यायपालिका को उखाड़ फेंकने का आह्वान

सोशल मीडिया पर की गई एक अन्य टिप्पणी में CJP के एक समर्थक ने केवल लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार ही नहीं, बल्कि भारतीय न्यायपालिका के प्रति भी असंतोष व्यक्त किया। उसने लिखा, “हमें अपनी न्यायपालिका को भी बाहर का रास्ता दिखाना होगा, क्योंकि उसने अपनी स्वतंत्रता खो दी है।”

इस तरह की टिप्पणियाँ दर्शाती हैं कि कुछ समर्थक देश की प्रमुख लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति गहरा अविश्वास व्यक्त कर रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि ऐसे बयान संवैधानिक संस्थाओं की वैधता पर सवाल खड़े करते हैं और सार्वजनिक विमर्श को और अधिक ध्रुवीकृत बना सकते हैं।

स्क्रीनशॉट – रेडिटॉ

किसानों के विरोध-प्रदर्शन जैसी स्थिति के लिए योजना बनाना

CJP के कुछ समर्थक चाहते थे कि यह आंदोलन नवंबर 2020 में शुरू हुए किसान आंदोलन की तरह लंबा और प्रभावशाली साबित हो। सोशल मीडिया पर एक समर्थक ने दावा किया कि किसान आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और उपद्रव के लिए प्रदर्शनकारी नहीं, बल्कि केंद्र सरकार द्वारा भेजे गए तत्व जिम्मेदार थे।

उसने लिखा, “निराशावादी नहीं बनना चाहता, लेकिन अगर सैकड़ों लोग प्रदर्शन के लिए जुटते हैं तो वे भीड़ में कुछ लोगों को सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के लिए शामिल कर देंगे और फिर पूरे आंदोलनकारियों को उपद्रवी बता देंगे। किसान आंदोलन में भी ऐसा हुआ था और इस बार भी ऐसा ही होगा।”

इस टिप्पणी में समर्थक ने पहले से ही यह तर्क देने की कोशिश की कि यदि प्रदर्शन के दौरान कोई हिंसा या कानून-व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न होती है, तो उसके लिए CJP नेतृत्व और समर्थकों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।

स्क्रीनशॉट – रेडिटॉ

CJP समर्थकों की सोशल मीडिया टिप्पणियों को देखते हुए लगता है कि यह प्रदर्शन केवल सरकार के खिलाफ कथित शांतिपूर्ण विरोध तक सीमित नहीं था बल्कि इसके जरिए देश में अराजकता का माहौल पैदा करने की कोशिश की थी लेकिन सुरक्षाबलों की मुस्तैदी से यह संभव नहीं हो सका।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

मिशन समुद्र मंथन से अंडमान में मिला गैस का महाभंडार, मोदी सरकार ने पूर्वी तट पर बनाया ₹1.5 लाख करोड़ का मेगा प्लान: समझें कैसे ऊर्जा में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा भारत

वैश्विक ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा संप्रभुता को मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। केंद्र सरकार के ‘मिशन समुद्र मंथन’ (राष्ट्रीय गहरे जल अन्वेषण मिशन) के तहत ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL) ने अंडमान सागर में ‘श्री विजयपुरम-3’ खोजी कुएँ में प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार की खोज की है। यह कुआँ तट से 15 किलोमीटर दूर और 355 मीटर गहरे पानी में स्थित है, जहाँ 1,900 मीटर से अधिक की गहराई पर इओसीन फॉर्मेशन में लगातार गैस फ्लेयरिंग देखी गई है।

वैसे वर्तमान समय में पूरी दुनिया एक अभूतपूर्व ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक तनावों के दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में जारी अशांति, लाल सागर का संकट और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे संवेदनशील समुद्री व्यापारिक मार्गों पर मंडराते खतरों ने दुनिया भर के देशों को अपनी ऊर्जा सुरक्षा की समीक्षा करने पर मजबूर कर दिया है। भारत भी इस वैश्विक संकट से अछूता नहीं है, क्योंकि देश को अपनी तेल की जरूरतों का एक बहुत बड़ा यानी 85% हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ता है। हर साल अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ पेट्रोल, डीजल और एलपीजी खरीदने में खर्च हो जाता है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर अंतरराष्ट्रीय बाजार की हर छोटी-बड़ी हलचल का सीधा असर पड़ता है।

इसी वैश्विक संकट के बीच भारत के पूर्वी समुद्र तट और पश्चिमी रेगिस्तान से ऐसी सुखद और ऐतिहासिक खबरें आई हैं, जो आने वाले समय में देश की पूरी ऊर्जा कहानी को बदलकर रख देंगी। केंद्र सरकार द्वारा शुरू किए गए ‘मिशन समुद्र मंथन‘ यानी ‘राष्ट्रीय गहरे जल अन्वेषण मिशन’ के तहत भारत ने गहरे और अति-गहरे समुद्र में छिपे हाइड्रोकार्बन के विशाल भंडार को खंगालना शुरू कर दिया है।

अंडमान सागर में एक के बाद एक मिली सफलताओं और देश के पूर्वी तट पर शुरू हुए डेढ़ लाख करोड़ रुपए के मेगा प्लान ने भारत के ऊर्जा स्वतंत्रता मिशन को एक नई और अचूक दिशा दे दी है। इस महा-मिशन का उद्देश्य देश के भीतर ही इतने ऊर्जा स्रोत विकसित करना है कि भविष्य में किसी भी वैश्विक संकट का असर देश के आम नागरिकों की जेब पर न पड़े।

अंडमान सागर से आई दूसरी बड़ी खुशखबरी

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का क्षेत्र सामरिक दृष्टि से जितना महत्वपूर्ण है, भूगर्भीय रूप से यह ऊर्जा का उतना ही बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि अंडमान सागर में एक और नए स्थान पर प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार का पता चला है।

यह ऐतिहासिक खोज सरकारी तेल कंपनी ऑयल इंडिया लिमिटेड द्वारा अंडमान द्वीप समूह के पूर्वी तट से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित श्री विजयपुरम-3 नामक एक एक्सप्लोरेटरी यानी खोजी कुएँ में की गई है। यह कुआँ लगभग 355 मीटर गहरे समुद्री क्षेत्र में खोदा गया था, जो अपनी भौगोलिक बनावट के कारण बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है।

इस खोज की तकनीकी गहराइयों को समझें तो समुद्र के तल से नीचे करीब 1900 से अधिक की गहराई तक जाकर इस कुएँ की टेस्टिंग की गई है। यह खोज इओसीन फॉर्मेशन नाम की भूगर्भीय परत में हुई है, जो अपनी विशेष चट्टानी संरचना के लिए जानी जाती है।

परीक्षणों के दौरान इस कुएँ से लगातार गैस फ्लेयरिंग देखी गई, जो बेहद उच्च दबाव और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस की निरंतर उपस्थिति को प्रमाणित करती है। पेट्रोलियम मंत्री ने देश को बधाई देते हुए साफ किया कि यह भारत के समुद्री तेल और गैस अन्वेषण कार्यक्रम के लिए एक मील का पत्थर है और इससे आने वाले दिनों में देश की गैस उत्पादन क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिलेंगे।

अंडमान बेसिन की असली भूगर्भीय क्षमता से अभी दुनिया अनजान

यह खोज इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि ऑयल इंडिया लिमिटेड ने मौजूदा अन्वेषण अभियान के तहत अंडमान बेसिन में कुल तीन खोजी कुएं खोदे थे, जिनमें से दो में हाइड्रोकार्बन यानी तेल और गैस की सफल मौजूदगी दर्ज की जा चुकी है। इससे पहले, वर्ष 2025 में इसी क्षेत्र के पास श्री विजयपुरम-2 कुएँ में भी प्राकृतिक गैस मिलने की पुष्टि हुई थी।

उस समय निकाली गई गैस के नमूनों की जाँच में पाया गया था कि उसमें लगभग सतासी प्रतिशत शुद्ध मीथेन गैस मौजूद है, जो व्यावसायिक उपयोग के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। पहली सफलता के तत्काल बाद सरकार ने बिना समय गँवाए इस क्षेत्र में अन्वेषण गतिविधियों को और तेज कर दिया, जिसका परिणाम अब श्री विजयपुरम-3 के रूप में सबके सामने है।

भूवैज्ञानिकों और ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अंडमान बेसिन की अंडरवाटर संरचना म्यांमार और इंडोनेशिया के उन समुद्री क्षेत्रों से बिल्कुल मिलती-जुलती है, जहाँ पिछले कई दशकों से बड़े पैमाने पर प्राकृतिक गैस और तेल का व्यावसायिक उत्पादन किया जा रही है। अब तक तकनीक की कमी और अत्यधिक गहराई के कारण अंडमान का यह क्षेत्र पूरी तरह अनछुआ रहा था, लेकिन अब यह साबित हो चुका है कि भारत के इस समुद्री क्षेत्र के नीचे गैस का एक विशाल खजाना दबा हुआ है।

फिलहाल ऑयल इंडिया लिमिटेड इस गैस भंडार का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन कर रही है ताकि इसके नमूनों को एकत्र कर इसकी गुणवत्ता, संरचना और ऊर्जा क्षमता का सटीक परीक्षण किया जा सके। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर सब कुछ योजना के अनुसार रहा, तो साल 2030 तक इस क्षेत्र से व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया जा सकता है।

पूर्वी तट पर भारत का सबसे बड़ा ऊर्जा अभियान

अंडमान की इस बड़ी सफलता ने भारत सरकार के हौसलों को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है और यही कारण है कि देश की सबसे बड़ी तेल और गैस उत्पादक कंपनी ओएनजीसी यानी ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन ने भारतीय समुद्रों में गहरे पानी से तेल निकालने के लिए अपने इतिहास के सबसे बड़े प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी है।

ओएनजीसी ने गहरे और अति-गहरे पानी में तेल और गैस की खोज और ड्रिलिंग के लिए अठारह से बीस अरब डॉलर यानी लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपए से अधिक के भारी-भरकम निवेश की योजना तैयार की है। इसके लिए वैश्विक स्तर पर टेंडर जारी कर दिए गए हैं और मार्च के महीने में मुंबई में हुई प्री-बिड मीटिंग में दुनिया भर की एक दर्जन दिग्गज ड्रिलिंग कंपनियों ने हिस्सा लिया है।

इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत दुनिया की सबसे अत्याधुनिक ड्रिलशिप और सेमी-सबमर्सिबल रिग्स को भारतीय समुद्रों में तैनात किया जा रहा है। भारत इस महा-मिशन में किसी भी तरह की तकनीकी कसर नहीं छोड़ना चाहता, इसलिए ओएनजीसी ने गहरे समुद्र की ड्रिलिंग में महारत रखने वाली दुनिया की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों जैसे ब्राजील की पेट्रोब्रास, फ्रांस की टोटल एनर्जी और अमेरिका की एक्सोनमोबिल के साथ रणनीतिक और तकनीकी सहयोग किया है।

यह प्रोजेक्ट केवल तेल खोजने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ी आर्थिक और रणनीतिक सोच काम कर रही है, जो भारत को वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगी।

एडवांस्ड सिस्मिक इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल

इस बार भारत सरकार और उसकी तेल कंपनियाँ केवल पुराने और पारंपरिक तरीकों पर निर्भर नहीं हैं। मिशन समुद्र मंथन के तहत पूर्वी तट पर भारत का अब तक का सबसे आधुनिक और हाई-टेक सिस्मिक सर्वे शुरू किया जा रहा है, जिसके लिए वैश्विक जियोफिजिकल कंपनियों से निविदाएँ माँगी गई हैं। यह मिशन करीब छतीस महीने तक चलेगा, जिसके तहत समुद्र के नीचे की चट्टानों और उनकी जटिल संरचनाओं का एक हाई-टेक डिजिटल नक्शा तैयार किया जाएगा। इस तकनीक के माध्यम से उन क्षेत्रों की भी पहचान की जा सके की जिन्हें पहले तकनीकी सीमाओं के कारण पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया था।

इस हाई-टेक सर्वे में ब्रॉडबैंड थ्री-डी सिस्मिक इमेजिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें विशेष सर्वेक्षण जहाज समुद्र के पानी में कई किलोमीटर लंबी केबल छोड़ते हैं। ये उपकरण समुद्र के नीचे शक्तिशाली ध्वनि तरंगें भेजते हैं, जो समुद्र की तलहटी और उसके नीचे स्थित विभिन्न चट्टानों से टकराकर वापस लौटती हैं।

जहाजों पर लगे अत्यधिक संवेदनशील सेंसर इन तरंगों की गूँज को रिकॉर्ड कर लेते हैं, जिसके बाद वैज्ञानिक इस विशाल डेटा को सुपरकंप्यूटरों के जरिए प्रोसेस करके समुद्र के नीचे कई किलोमीटर गहराई तक की एक स्पष्ट त्रिविमीय तस्वीर तैयार करते हैं। इससे यह साफ पता चल जाता है कि किस जगह की चट्टानी संरचना के बीच तेल या गैस फंसी हुई है और यही तकनीक दुनिया के सबसे बड़े ऑफशोर तेल क्षेत्रों की खोज में इस्तेमाल की जाती है।

नदी बेसिनों में छिपी ऊर्जा की असीम संभावनाएँ

इस आधुनिक तकनीक के निशाने पर मुख्य रूप से देश के चार सबसे बड़े नदी बेसिन हैं, जिनमें सबसे बड़ा दाँव कृष्णा-गोदावरी यानी केजी बेसिन पर माना जा रहा है। यह क्षेत्र पहले से ही भारत का प्रमुख गैस उत्पादन केंद्र है, लेकिन सरकार का मानना है कि नई तकनीक के जरिए इस बेसिन के और अधिक गहरे हिस्सों में छिपे जटिल पेट्रोलियम सिस्टम और गैस हाइड्रेट्स का पता लगाया जा सकता है।

इसी तरह ओडिशा के तट के पास स्थित महानदी बेसिन को भारत के सबसे संभावित और समृद्ध डीप-वॉटर क्षेत्रों में से एक माना जाता है, जहाँ वैज्ञानिकों को करीब आठ किलोमीटर से अधिक की गहराई तक तेल और गैस होने के प्रबल संकेत मिले हैं।

इसके अलावा बंगाल-पुर्णिया बेसिन को भूवैज्ञानिक एक बड़ा अवसर मान रहे हैं, क्योंकि यहाँ समुद्र के नीचे लगभग दस किलोमीटर तक मोटी अवसादी परतें मौजूद हैं। शुरुआती अध्ययनों से संकेत मिले हैं कि यहाँ मियोसीन युग के प्राचीन और विशाल हाइड्रोकार्बन भंडार छिपे हो सकते हैं, जो सफल होने पर पूरे पूर्वी भारत की ऊर्जा तस्वीर को बदल देंगे।

तमिलनाडु से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैला कावेरी बेसिन भी इस योजना का एक अहम हिस्सा है, जिसके ऑफशोर कार्बोनेट सिस्टम और जुरासिक सिं-रिफ्ट प्ले की जाँच की जाएगी। यहाँ आठ किलोमीटर की गहराई में और बड़े तेल भंडारों की उम्मीद जताई जा रही है, जिसके लिए भविष्य में बड़े स्तर पर ड्रिलिंग की जाएगी।

मल्टी-क्लाइंट मॉडल से बदलेगा पूरा खेल

इस विशाल और खर्चीले मिशन को तेजी से पूरा करने और सरकारी खजाने पर आर्थिक बोझ कम करने के लिए सरकार ने एक बेहद चालाकी भरी रणनीति अपनाई है, जिसे मल्टी-क्लाइंट मॉडल कहा जाता है। पारंपरिक तरीकों में सिस्मिक डेटा जुटाने का पूरा खर्च और उसका जोखिम सरकार या सरकारी तेल कंपनियों को उठाना पड़ता था, जिससे बजट की कमी के कारण काम काफी धीमा हो जाता था। लेकिन इस नए मॉडल के तहत अंतरराष्ट्रीय जियोफिजिकल कंपनियाँ अपने खर्च और अपने जोखिम पर समुद्र के नीचे का डेटा जुटाएंगी।

इसके बाद ये कंपनियाँ इस प्रामाणिक डेटा को दुनिया भर की विभिन्न ऊर्जा और तेल उत्पादक कंपनियों को बेच सकेंगी, जिससे उनका मुनाफा भी सुरक्षित रहेगा और सरकार पर शुरुआती वित्तीय बोझ भी नहीं पड़ेगा।

इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि इसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी और निवेश रातों-रात बढ़ जाएगा, जिससे भारत के समुद्रों में तेल की खोज का काम कई गुना तेजी से आगे बढ़ सकेगा। जब दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियाँ इस डेटा को खरीदेंगी, तो वे भारत में निवेश करने के लिए खुद-ब-खुद आकर्षित होंगी, जिससे देश में विदेशी निवेश भी बढ़ेगा।

पश्चिमी सीमा पर भी मिली बड़ी कामयाबी

एक तरफ जहाँ देश के पूर्वी समुद्री हिस्से में मिशन समुद्र मंथन इतिहास रच रहा है, वहीं दूसरी तरफ देश के पश्चिमी छोर से भी भारत के लिए एक और बड़ी खुशखबरी आई है। राजस्थान के जैसलमेर बेसिन में सरकारी तेल कंपनी ऑयल इंडिया लिमिटेड को एक और बड़ी कामयाबी हाथ लगी है, जिसने मरुभूमि में ऊर्जा की एक नई किरण जगाई है।

कंपनी ने जैसलमेर के प्रसिद्ध डांडेवाला फील्ड में एक नया गैस कुआँ खोजा है, जिसकी सबसे खास बात यह है कि यहाँ पहली बार बेहद कम गहराई पर स्थित सानू फॉर्मेशन से प्राकृतिक गैस निकलनी शुरू हुई है।

यह कुआँ केवल 950 मीटर की गहराई तक ही ड्रिल किया गया था और शुरुआती परीक्षणों में ही यहाँ से लगभग 25000 स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रतिदिन गैस का प्रवाह दर्ज किया गया है। तकनीकी विश्लेषण और भूगर्भीय जाँच के आधार पर वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस विशिष्ट क्षेत्र में करीब 75 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस का कुल संसाधन मौजूद हो सकता है।

डांडेवाला फील्ड हालाँकि पहले से ही पारंपरिक गैस उत्पादन के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन सानू फॉर्मेशन में गैस का मिलना एक बड़ी रणनीतिक जीत है, जिसने इस पूरे रेगिस्तानी इलाके में भविष्य के लिए ड्रिलिंग की नई संभावनाएँ खोल दी हैं।

भारत की ऊर्जा जरूरतें और आयात का भारी बोझ

भारत की वर्तमान ऊर्जा स्थिति और उसकी जरूरतों को समझे बिना इस पूरे मिशन के महत्व को नहीं जाना जा सकता। भारत आज की तारीख में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश बन चुका है, जहां तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और शहरीकरण के कारण ईंधन की माँग आसमान छू रही है।

आँकड़ों के अनुसार, भारत में इस समय प्राकृतिक गैस की दैनिक खपत लगभग एक सौ सतासी मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रति दिन तक पहुँच चुकी है। उद्योगों के संचालन, बड़े कारखानों, सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों के लिए सीएनजी और घरों की रसोई के लिए पीएनजी की माँग हर गुजरते दिन के साथ बढ़ रही है।

इस भारी माँग को पूरा करने के लिए भारत को अपनी कुल जरूरत का लगभग 50% हिस्सा विदेशों से लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी एलएनजी के रूप में आयात करना पड़ता है। कच्चे तेल के मामले में आत्मनिर्भरता की स्थिति और भी ज्यादा चिंताजनक है, क्योंकि भारत को अपनी दैनिक जरूरतों का लगभग पचासी प्रतिशत हिस्सा विदेशों से ही खरीदना पड़ता है।

देश में कच्चे तेल का आयात बिल हर साल लाखों करोड़ रुपए तक पहुँच जाता है, जिससे देश का एक बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ ईंधन खरीदने में ही स्वाहा हो जाता है। ऐसे माहौल में देश के भीतर ही नए गैस और तेल के भंडार मिलना सरकार के लिए बहुत बड़ी राहत की खबर है, जो देश को आर्थिक रूप से और मजबूत बनाएगी।

कच्चे तेल का दैनिक गणित और भारत का उत्पादन

भारत की तेल की दैनिक खपत और उसके घरेलू उत्पादन के बीच का गणित बेहद दिलचस्प है और यह दिखाता है कि देश को आत्मनिर्भर बनने के लिए कितने बड़े स्तर पर काम करने की जरूरत है।

भारत में रोजाना लगभग 55 लाख बैरल कच्चे तेल की खपत होती है, जो देश की विशाल आबादी और उसके परिवहन तंत्र की रीढ़ है। इस 55 लाख बैरल में से भारत अपने तमाम घरेलू स्रोतों जैसे मुंबई हाई, असम के तेल क्षेत्रों और कृष्णा-गोदावरी बेसिन को मिलाकर रोजाना लगभग 9 से 10 लाख बैरल कच्चे तेल का खुद उत्पादन कर पाता है।

यह घरेलू उत्पादन देश की कुल जरूरत के मुकाबले काफी कम है, जिसके कारण भारत को रोजाना लगभग 45 लाख बैरल कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार से खरीदना पड़ता है। यही वजह है कि जब भी खाड़ी देशों में या वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक डॉलर का भी उछाल आता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर उसका अरबों रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

सरकार का पूरा ध्यान अब इसी अंतर को पाटने पर है ताकि घरेलू उत्पादन को 9 लाख बैरल से बढ़ाकर उस स्तर पर ले जाया जा सके जहाँ विदेशों पर निर्भरता न्यूनतम हो जाए।

भारत Vs पाकिस्तान: तेल और गैस उत्पादन का सच

जब भी भारत की सीमाओं के पास कोई भूगर्भीय खोज होती है, तो दोनों देशों की तुलना और उनके दावों की हकीकत जानना बेहद जरूरी हो जाता है। हाल ही में पाकिस्तान की सरकारी तेल कंपनी ओजीडीसीएल यानी ऑयल एंड गैस डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड ने भारत की सीमा से सटे अपने सिंध प्रांत के सांघड़ जिले में बॉबी डीप-1 नामक कुएँ में तेल और गैस मिलने की बड़ी घोषणा की है।

इस खबर के आते ही पाकिस्तान में जश्न का माहौल बन गया और वहाँ के लोगों को लगा कि उनकी किस्मत बदलने वाली है, लेकिन जब हम आँकड़ों की कसौटी पर दोनों देशों की तुलना करते हैं, तो पाकिस्तान की यह खोज भारत के सामने बहुत छोटी और नीचे दिखाई देती है।

भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो पाकिस्तान का सिंध प्रांत और भारत का राजस्थान राज्य आपस में जुड़े हुए हैं और दोनों तरफ थार का एक ही रेगिस्तान फैला हुआ है, जिसके कारण रेत के नीचे की चट्टानें पुरानी और तेल-गैस को जमा करने वाली हैं।

पाकिस्तान ने दावा किया है कि उसके सांघड़ जिले के इस नए कुएँ से शुरुआती टेस्टिंग के दौरान रोजाना 2000 बैरल कच्चा तेल और 11 लाख क्यूबिक फीट गैस निकल रही है। पाकिस्तान जैसी खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के लिए यह एक राहत की खबर जरूर हो सकती है, लेकिन जब हम भारत के राजस्थान में पहले से चल रहे काम को देखते हैं, तो पाकिस्तान का यह दावा पूरी तरह फीका पड़ जाता है।

थार के रेगिस्तान में भारत की बादशाहत

भारत को राजस्थान के रेगिस्तान में बहुत पहले ही तेल का विशाल भंडार मिल चुका है और हमारी कंपनियाँ पिछले कई सालों से वहाँ से सफलतापूर्वक रिकॉर्ड उत्पादन कर रही हैं। राजस्थान के बाड़मेर में स्थित प्रसिद्ध मंगला ऑयलफील्ड से भारत अकेले रोजाना लगभग 80000 बैरल कच्चे तेल का उत्पादन कर रहा है। इसके अलावा बाड़मेर और जैसलमेर के अन्य छोटे-बड़े तेल कुओं को मिला दिया जाए तो भारत केवल राजस्थान के इस अकेले इलाके से ही रोजाना करीब 2 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन सफलतापूर्वक कर रहा है।

इसका सीधा सा मतलब यह हुआ कि पाकिस्तान को अपने जिस सिंध प्रांत के सांघड़ जिले में तेल मिलने पर इतना नाज है, भारत उससे 100 गुना ज्यादा तेल राजस्थान के रेगिस्तान से पहले ही रोजाना निकाल रहा है। पाकिस्तान को सांघड़ से सिर्फ दो हजार बैरल तेल मिलने की उम्मीद है, जबकि भारत वहाँ 2 लाख बैरल रोज निकाल रहा है।

आगे चलकर पाकिस्तान वहाँ और कुएँ खोदे तो बात अलग है, लेकिन फिलहाल जो घोषणा की गई है, उसकी असलियत भारत के मुकाबले कुछ भी नहीं है। भारत की कंपनियाँ पहले से ही इस पूरे बॉर्डर इलाके में अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं और लगातार नए कुओं की ड्रिलिंग कर रही हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर दोनों देशों की क्षमता का विशाल अंतर

अगर हम राष्ट्रीय स्तर पर दोनों देशों की कुल तेल खपत और उनके घरेलू उत्पादन की तुलना करें, तो यह अंतर और भी ज्यादा हैरान करने वाला है। पाकिस्तान को अपनी पूरी राष्ट्रीय व्यवस्था चलाने और अपनी जनता की जरूरतों को पूरा करने के लिए रोजाना लगभग 5 लाख बैरल कच्चे तेल की आवश्यकता होती है। इसके मुकाबले जैसा कि हम जानते हैं, भारत अपने घरेलू कुओं से रोजाना लगभग 9 से 10 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन खुद कर लेता है।

इसका अर्थ यह हुआ कि भारत रोजाना जितना कच्चा तेल अपने देश की जमीन और समुद्र से निकालता है, वह मात्रा पाकिस्तान की कुल राष्ट्रीय जरूरत से लगभग दोगुनी है। पाकिस्तान को कुल पाँच लाख बैरल चाहिए और भारत 10 लाख बैरल रोज खुद पैदा करता है, भले ही भारत की अपनी जरूरत 55 लाख बैरल की है।

इस लिहाज से देखा जाए तो पाकिस्तान की सांघड़ की यह खोज भारत के राजस्थान और अंडमान के हाइड्रोकार्बन साम्राज्य के सामने कहीं नहीं ठहरती और बेहद नीचे नजर आती है। असली कहानी और ऊर्जा सुरक्षा की वास्तविक बाजी पूरी तरह से भारत के हाथ में है, जो समुद्र और जमीन दोनों मोर्चों पर पाकिस्तान से कई गुना आगे चल रहा है।

ऊर्जा स्वतंत्रता और आर्थिक संप्रभुता का भविष्य

मिशन समुद्र मंथन के तहत देश के भीतर मिल रहे तेल और गैस के ये नए भंडार आने वाले समय में भारत की पूरी आर्थिक और रणनीतिक स्थिति को बदलने की ताकत रखते हैं। जब देश के भीतर ही कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का उत्पादन बड़े पैमाने पर शुरू हो जाएगा, तो आयात बिल में होने वाली भारी कटौती से देश का अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा कोष सुरक्षित रहेगा।

इस बचे हुए पैसे का उपयोग देश के आंतरिक विकास, आधुनिक बुनियादी ढाँचे के निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और तकनीकी अनुसंधान पर किया जा सकेगा, जो अंततः देश के नागरिकों के जीवन स्तर को सुधारेगा।

इसके साथ ही भारत वैश्विक तेल बाजार के उतार-चढ़ाव और मिडिल ईस्ट के तनावों से भी काफी हद तक सुरक्षित हो जाएगा, जिससे देश में ईंधन की कीमतों में स्थिरता आएगी।

प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किया गया यह मिशन अब धरातल और समंदर की गहराइयों में पूरी तरह से रंग लाने लगा है, जो भारत को आने वाले दशकों के लिए न केवल आत्मनिर्भर बनाएगा बल्कि उसकी आर्थिक संप्रभुता को भी अक्षुण्ण रखेगा। वैश्विक मंच पर भारत का यह ऊर्जा सुरक्षा मॉडल और आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ते कदम आज दुनिया के तमाम विकासशील देशों के लिए एक महान प्रेरणा बन चुके हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी: ‘क्रांति’ की रील और लोकतंत्र की रियलिटी

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में तीन चूरन सबसे अधिक चटाया जाता है;

  • वामपंथ
  • समाजवाद
  • क्रांति

हम भारतीयों का सौभाग्य देखिए कि तीनों ही चूरन असफल रहे हैं। कभी भी हमारी व्यवस्था का स्थायी आधार नहीं बन पाए। इसका सबसे बड़ा कारण भारत की वह जनता है, जिसके पास मत देने का अधिकार है। बौद्धिक बहसों में इसी जनता के बुद्धि और विवेक पर ‘विद्वतजन’ संदेह करते हैं, क्योंकि वह चूरन का हैवी डोज लेती ही नहीं।

राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के उभार और बीजेपी के राजनीतिक विस्तार के बाद तो अलग-अलग मुखौटों में इस चूरन का डेली डोज बाँटा जा रहा है। नया मुखौटा है- कॉकरोच जनता पार्टी (CJP- Cockroach Janata Party)।

आंदोलनजीवी ऐसे हर चूरन के सफल होने के दो आधार अतीत से लाते हैं। पहला, जेपी की संपूर्ण क्रांति और दूसरा अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन। अव्वल तो जेपी ने जब आंदोलन किया था, तब लोकतंत्र पर ही सीधा हमला हुआ था। वोट देने वाली जनता के अधिकारों को ही कुचल दिया गया था। इसी तरह अन्ना हजारे का आंदोलन जब हुआ, तब कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में चल रही केंद्र सरकार का इकबाल वोट देने वाली जनता की नजरों में पूरी तरह समाप्त हो चुका था। यही कारण है कि इन दोनों आंदोलनों को भले तात्कालिक समर्थन मिला और सत्ता परिवर्तन भी हुआ, पर वह हमारी व्यवस्था का स्थायी आधार नहीं बन सकी।

उलटे इसके राजनीतिक परिणामों ने वोट देने वाली जनता को पहले की तुलना में अधिक सावधान बना दिया है। अब वह केवल यह सुनकर उत्साहित नहीं हो रहा है कि कोई नया समूह पुरानी राजनीति को समाप्त करने का दावा कर रहा है। वह पूछ रहा है कि सत्ता परिवर्तन के बाद क्या होगा?

यह सत्य है कि कॉकरोच जनता पार्टी ने 6 जून 2026 को जंतर-मंतर पर शिक्षा से जुड़े जिन मुद्दों को लेकर कथित प्रदर्शन किया है, उसको लेकर लोगों की नाराजगी बीजेपी की सरकार से है। कुछ स्थानीय प्रशासनिक समस्याओं और कई सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को लेकर भी असंतोष है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह स्वभाविक है। विशेषकर तब जब कोई पार्टी 12 सालों से लगातार देश की सत्ता में बनी हुई हो। जब देश के 22 राज्यों की सत्ता उस पार्टी या उसके सहयोगियों के हाथों में हो।

पर मूल प्रश्न यह नहीं है कि नाराजगी है या नहीं? प्रश्न यह है कि क्या यह नाराजगी इतनी व्यापक और संगठित है कि वह सत्ता परिवर्तन का आधार बन सके? अभी ऐसा कोई संकेत स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता। यदि 2019 के आम चुनावों में बीजेपी की ताकत घटने को इसका संकेत मान लिया जाए तो इसका दूसरा पक्ष यह है कि उसके बाद हुए राज्यों के चुनावों में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए ने चौंकाया है। जिस महाराष्ट्र और ​हरियाणा में उसकी पराजय तय बताई जा रही थी, वहाँ धमक के साथ वह सत्ता में लौटी। जिस बिहार में नीतीश कुमार की सरकार को बीमार-लाचार बताया जा रहा था, वहाँ ​राजद किसी तरह विपक्ष की हैसियत बचा पाई। जिस ममता बनर्जी के किले को अभेद्य बताया जा रहा था, उसे ताश के पत्तों की तरह बीजेपी ने ढाह दिया।

जाहिर है कि वोट देने वाली जनता में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो चाय की गुमटी से लेकर सोशल मीडिया की गलियों तक आज सरकार की आलोचना करता दिख रहा है। पर वह विकल्प को लेकर आश्वस्त नहीं है। वह सरकार की किसी नीति को लेकर मुखर असहमति दर्ज करा रहा है, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि वह पूरी व्यवस्था बदल देना चाहता है।

ध्यान रखिएगा भारतीय लोकतंत्र में कोई सरकार केवल इसलिए नहीं हारती कि लोग नाराज हैं। वे तब हारती हैं जब कोई अधिक विश्वसनीय विकल्प दिखाई देता है। विरोध पर्याप्त नहीं होता। विश्वसनीय विकल्प भी चाहिए होता है। यदि नाराजगी से ही सरकारें जाती तो बिहार में लालू यादव का जंगलराज डेढ़ दशक का नहीं होता। पश्चिम बंगाल में वामपंथी आतंक साढ़े तीन दशक और फिर टीएमसी का आतंक समाप्त होते डेढ़ दशक नहीं लगते। कॉन्ग्रेस के एकछत्र शासन को समाप्त करने के लिए कभी जेपी, कभी वीपी, कभी अटल बिहारी तो कभी नरेंद्र मोदी का चेहरा नहीं लगता।

जब केवल व्यवस्था विरोध ही आधार हो तो उस प्रयोग की एकमात्र राजनीतिक पूँजी असंतोष होता है। विश्वास नहीं। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनुभव बताता है कि बिना विश्वास के असंतोष और सत्ता परिवर्तन के बीच बहुत लंबी दूरी होती है।

हमारी राजनीतिक व्यवस्था में केवल विरोध पर कोई दल नहीं टिकता। उन्हें समाज के सामने एक व्यापक आख्यान प्रस्तुत करना पड़ता है। उसे विश्वसनीय तरीके से जमीन पर उतारना पड़ता है। कॉन्ग्रेस ने ऐसा ही आख्यान अपने प्रोपेगेंडा तंत्र के बल पर देश को आजादी दिलाने की बुनी। इसके बल पर ही लंबे समय तक राजनीति में उसका आधिपत्य रहा।

आज जो राजनीति में बीजेपी का वर्चस्व दिख रहा है, वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और विकास के विश्वसनीय आख्यान के इर्द-गिर्द खड़ी है। इसी तरह राज्यों में समाजवादियों ने जो छिटपुट सफलता हासिल की वह ‘सामाजिक न्याय’ के आख्यान में लपेटकर परोसी गई, तभी संभव हो पाया।

इन आख्यानों से किसी की सहमति या असहमति हो सकती है। लेकिन ये आख्यान केवल विरोध पर आधारित नहीं थे। इनके पास विश्वास की जमीनी पूँजी भी थी और एक बड़ा जन समूह उससे जुड़ भी रहा था।

2014 के बाद अलग-अलग मुखौटों में तात्कालिक असंतोष को भुनाने के जो भी प्रयास हुए हैं, वे जनता के सामने न तो व्यापक आख्यान प्रस्तुत कर पाएँ हैं और न ही बेहतर व्यवस्था चलाने की क्षमता का विश्वास पैदा कर पाए हैं। यहीं कारण है कि कुछ राज्यों में विपक्ष को कभी-कभार सफलता मिल जाती है, 2019 के आम चुनाव जैसे कुछ झटके बीजेपी को भी लगते हैं, पर दूर-दूर तक उसकी राजनीतिक व्यवस्था का विकल्प बन जाने की कोई गंभीर संभावना नहीं दिखाई देती है।

संगठन, विचार, नेतृत्व और विश्वसनीयता की कसौटी पर बीजेपी का मूल्य जनता की दृष्टि में आज भी उसके विरोधियों से कहीं अधिक है। लोकतंत्र में राजनीतिक विकल्प बनने के यही चार स्तम्भ हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी जैसे प्रयोग तो इस अर्थ में और भी हास्यास्पद हैं कि उसका आधार उस सोशल मीडिया पर टिका है, जो भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक जमीन है ही नहीं। सोशल मीडिया में भले ट्रेंड बने, पर व्यवस्था जमीन पर ही खड़ी होती है। सोशल मीडिया में भले रील से क्रांति की मुनादी हो, पर सफल होने के लिए उसे भी जमीन ही चाहिए।

पोस्ट-रील-फॉलोवर से सोशल मीडिया में कंटेंट की बाढ़ लाना अलग बात है। ‘सनस्क्रीन’ लगाकर दिल्ली के उस जंतर-मंतर पर कथित प्रदर्शन कर लेना भी अलग बात है, जो मीडिया और यूट्यूबर्स के कैमरों से घिरी होती है। लेकिन जमीन पर जनता के असंतोष को झेलकर उसे अपने पक्ष में वोट के लिए प्रेरित कर लेना, 45 डिग्री के तापमान में सुदूर देहातों में कैमरे और ताली बजाने वाली भीड़ के बिना घर-घर जाकर अपनी पार्टी-नेता के किसी विचार के लिए समर्थन जुटाना बिल्कुल अलग बात है।

ये जो बाद वाली अलग बात है- वही भारतीय लोकतंत्र का अंतिम तत्व है, क्योंकि सत्ता परिवर्तन सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर नहीं, मतदाता सूची में दर्ज नामों से निश्चित होता है।

आज कॉकरोच हैं, कल पेंगुइन होंगे, परसों कुछ और। भारत में क्रांति का चूरन बेचने वाले हमेशा मिलेंगे। खरीदार भी खूब दिखेंगे। पर वास्तविक धरातल पर क्रांति शायद ही कभी स्थायी तौर पर गोदाम से बाहर निकल पाए। क्योंकि व्यवस्था बदलने की शक्ति उस जनता के हाथ में है जो टीवी स्टूडियो, कंस्टीट्यूशन क्लब की कथित बौद्धिक बहसों और सोशल मीडिया स्पेस की बकलोली से बहुत दूर रहती है, लेकिन चुनाव के दिन मतदान केंद्र तक अवश्य पहुँचती है।

यह जनता असंतुष्ट होने पर भी केवल विरोध नहीं देखती, विकल्प भी देखती है। उसे केवल व्यवस्था की कमियाँ नहीं लुभाती, वह संभावित विकल्प की क्षमताओं को भी तौलती है। वह भले हैशटैग नहीं बनाती है, पर व्यवस्था वही बनाती है।

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में लगे खालिस्तानी नारे, आतंकी भिंडरावाले को सेना ने इसी दिन 42 साल पहले किया था ढेर: जानें कट्टरपंथी क्यों इसी दिन करते हैं हंगामा

पंजाब की ऐतिहासिक और धार्मिक धरती अमृतसर से एक बार फिर तनाव और संवेदनशीलता की तस्वीरें सामने आई हैं। ऑपरेशन ब्लू स्टार की 42वीं बरसी के मौके पर शुक्रवार को अमृतसर के पवित्र स्वर्ण मंदिर (हरिमंदिर साहिब) परिसर में एक बार फिर ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ के नारे गूँज उठे। श्री अकाल तख्त साहिब के नजदीक बड़ी संख्या में कट्टरपंथी और उनके समर्थक इकट्ठा हुए, जिन्होंने हाथों में प्रतिबंधित संगठन और जरनैल सिंह भिंडरावाले के पोस्टर लहराए

हर साल 6 जून की यह तारीख भारतीय राजनीति, सिख समुदाय और देश की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में बेहद संवेदनशील मानी जाती है। इसी दिन साल 1984 में भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर परिसर को भारी हथियारों से लैस आतंकियों के चंगुल से मुक्त कराया था। इस कार्रवाई के दौरान आतंकी जरनैल सिंह भिंडरावाले को सेना ने ढेर कर दिया था। यही वजह है कि हर साल इस दिन भिंडरावाले और ऑपरेशन में मारे गए लोगों की याद में विशेष अरदास की जाती है, जिसकी आड़ में कट्टरपंथी तत्व हंगामा और नारेबाजी करते हैं।

इस बेहद संवेदनशील और तनावपूर्ण मौके को देखते हुए पंजाब पुलिस, खुफिया एजेंसियाँ और अर्धसैनिक बल पूरी तरह से अलर्ट मोड पर रहे। स्वर्ण मंदिर के आसपास के पूरे इलाके की सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद की गई थी। हालाँकि परिसर के भीतर नारेबाजी और पोस्टरबाजी के कारण माहौल में भारी तनाव देखा गया, लेकिन प्रशासन और सुरक्षाबलों की मुस्तैदी के कारण स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में बनी रही।

इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस ने पंजाब में खड़ा किया था भिंडरावाले नाम का भस्मासुर

इतिहास के पन्नों को पलटें तो जरनैल सिंह भिंडरावाले एक ऐसा नाम है जिसने पूरे पंजाब को आतंकवाद की आग में झोंक दिया था। शुरुआत में भिंडरावाले को खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस सरकार ने अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने और अकाली दल के प्रभाव को कम करने के लिए बढ़ावा दिया था। लेकिन बाद में वही भिंडरावाले भस्मासुर बन गया और उसने पंजाब में सिखों के लिए एक अलग देश ‘खालिस्तान’ की हिंसक मांग शुरू कर दी।

भिंडरावाले का प्रभाव 1978 के बाद तेजी से बढ़ा और उसने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव का समर्थन करते हुए उग्रवाद का रास्ता चुन लिया। उसके इशारे पर पंजाब में हिंदुओं और निरंकारियों की सरेआम हत्याएँ होने लगीं। जब कानून का शिकंजा कसने लगा, तो भिंडरावाले ने अपने सैकड़ों हथियारबंद आतंकियों के साथ सिखों के सबसे पवित्र स्थल स्वर्ण मंदिर परिसर पर अवैध कब्जा कर लिया और उसे एक अभेद्य किले तथा आतंकी मुख्यालय में तब्दील कर दिया।

आतंकियों से सिखों के पवित्र स्थान को मुक्त कराने के लिए सेना ने चलाया था ऑपरेशन ब्लू स्टार

जब पंजाब में कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई और आतंकवाद चरम पर पहुँच गया, तब इंदिरा गाँधी सरकार के आदेश पर भारतीय सेना को ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार‘ चलाना पड़ा। 1 जून से 8 जून 1984 के बीच चले इस भीषण सैन्य अभियान का मुख्य उद्देश्य स्वर्ण मंदिर परिसर को जरनैल सिंह भिंडरावाले और उसके घातक हथियारों से लैस समर्थकों से मुक्त कराना था। भारी गोलीबारी के बीच 6 जून 1984 को सेना ने भिंडरावाले को मार गिराया।

श्री अकाल तख्त साहिब को पहुँचा था नुकसान

इस सैन्य कार्रवाई के दौरान सिखों के सर्वोच्च धार्मिक स्थल ‘श्री अकाल तख्त साहिब’ को भारी नुकसान पहुँचा था, जिसे सिख समुदाय का एक बड़ा वर्ग आज भी अपनी धार्मिक भावनाओं पर गहरी चोट और बेअदबी के रूप में देखता है। यही कारण है कि 42 साल बीत जाने के बाद भी यह मुद्दा भावनात्मक और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बना हुआ है और इसके जख्म आज भी ताज़ा हैं। इस ऑपरेशन के बाद देश का माहौल बिगड़ गया था और इसके प्रतिशोध में ही इंदिरा गाँधी की उनके सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी थी, जिसके बाद देश में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे थे।

इस बरसी के मौके पर स्वर्ण मंदिर परिसर में मौजूद प्रदर्शनकारियों ने भारतीय राज्य के खिलाफ अपनी भड़ास निकाली। एक कट्टरपंथी संगठन के नेता ने वहाँ मौजूद भीड़ के सामने बयान देते हुए कहा, “1984 की सैन्य कार्रवाई ने पूरे सिख समुदाय को एक ऐसी गहरी पीड़ा दी है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। हमारे पवित्र अकाल तख्त पर हमला करके हमारी धार्मिक पहचान को कुचलने की कोशिश की गई थी। हम अपनी स्वायत्तता और हक की लड़ाई को हमेशा जिंदा रखेंगे और शहीदों की कुर्बानी बेकार नहीं जाने देंगे।”

ऑपरेशन ब्लू स्टार की बरसी के समय हर साल हंगामा करते हैं खालिस्तानी कट्टरपंथी

दूसरी तरफ देश की सुरक्षा एजेंसियाँ और भारत सरकार इसे देश की अखंडता, एकता और संप्रभुता से जुड़ा मामला मानती हैं। उनके लिए भिंडरावाले एक खूँखार आतंकी था जिसने देश को बाँटने की साजिश रची थी, जबकि अलगाववादी और कट्टरपंथी संगठनों के लिए वह आज भी एक बड़ा प्रतीक बना हुआ है। यही विरोधाभास हर साल 6 जून को स्वर्ण मंदिर परिसर में टकराव और हंगामे की स्थिति पैदा करता है।

प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण अरदास की अनुमति है, लेकिन देश विरोधी गतिविधियों और कानून हाथ में लेने वालों पर सख्त नजर रखी जा रही है। सोशल मीडिया पर भी इस बार नारेबाजी और पोस्टरों के कई वीडियो तेजी से वायरल हुए, जिस पर साइबर सेल लगातार नजर बनाए हुए है ताकि पंजाब का भाईचारे वाला माहौल दोबारा न बिगड़ सके।

₹15 लाख करोड़ के संदिग्ध रेवेन्यू से SEBI की कार्रवाई तक: जानिए कौन हैं राजेश मेहता और क्यों घिरी उनकी कंपनी Rajesh Exports

सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने 3 जून 2026 को बेंगलुरु स्थित जेम्स एंड ज्वेलरी कंपनी राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड (REL), उसके प्रमोटर, चेयरमैन और प्रबंध निदेशक राजेश मेहता के खिलाफ एकपक्षीय अंतरिम आदेश जारी किया।

इसके तहत कंपनी और मेहता को प्रतिभूति बाजार (Securities market) तक पहुँच से प्रतिबंधित कर दिया गया। इसका सीधा मतलब है कि अगले आदेश तक राजेश मेहता REL के शेयरों की खरीद-बिक्री या किसी भी प्रकार का लेनदेन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नहीं कर सकेंगे।

राजेश एक्सपोर्ट्स की 99% आय फर्जी: राजेश मेहता की गोल्ड एक्सपोर्ट कंपनी के खिलाफ SEBI ने क्यों शुरू की कार्रवाई?

SEBI ने राजेश मेहता और राजेश एक्सपोर्ट्स पर वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच लगभग 15.15 लाख करोड़ रुपए के राजस्व को गलत तरीके से दिखाने या बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगाया है। सरल शब्दों में कहें तो कंपनी और उसकी सहयोगी इकाइयों द्वारा इस अवधि में दिखाई गई आय का लगभग 99.8 प्रतिशत हिस्सा वास्तविक नहीं था।

SEBI के 109 पन्नों के आदेश में कहा गया है कि कंपनी का समेकित वित्तीय प्रदर्शन लगभग पूरी तरह उसकी विदेशी सहायक कंपनियों, विशेष रूप से वैलकैम्बी एसए (Valcambi SA), पर निर्भर बताया गया है। इसके बावजूद कंपनी ने लगातार इन कंपनियों के वित्तीय विवरण सार्वजनिक नहीं किए।

इतना ही नहीं बार-बार समन भेजे जाने के बावजूद कंपनी ने जाँच अधिकारियों को विक्रेताओं, ग्राहकों और अन्य आवश्यक वित्तीय जानकारियों का विवरण भी उपलब्ध नहीं कराया। SEBI के अनुसार, राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड ने अपनी सहायक (Subsidiaries) और स्टेप-डाउन सहायक कंपनियों के वित्तीय विवरण जाँच एजेंसी को उपलब्ध नहीं कराए।

इनमें वित्त वर्ष 2023-24 और 2024-25 के लिए REL Singapore, वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 तक के लिए Bab Al Rayan Jewellery LLC, वर्ष 2024 के लिए GGR तथा उसके 2020 से 2024 तक के स्टैंडअलोन वित्तीय विवरण, वर्ष 2020 से 2024 तक के लिए Valcambi USA Inc और वित्त वर्ष 2022-23 से 2024-25 तक के लिए ACC Energy के स्टैंडअलोन वित्तीय विवरण शामिल हैं। SEBI का कहना है कि इन दस्तावेजों के अभाव में कंपनी के वित्तीय दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना मुश्किल हो गया।

SEBI के आदेश में कहा गया कि जाँच के दौरान राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड अपनी सहायक कंपनियों से जुड़े कई महत्वपूर्ण रिकॉर्ड उपलब्ध कराने में विफल रही। इनमें बिक्री रजिस्टर, खरीद रजिस्टर, ग्राहकों के अनुसार बकाया रकम (डेब्टर्स) का विवरण, विक्रेताओं के अनुसार देनदारियों (क्रेडिटर्स) का ब्योरा, तथा संबंधित पक्षों (Related Parties) और उनसे हुए लेनदेन की सूची शामिल थी। SEBI का कहना है कि इन दस्तावेजों के अभाव में कंपनी की सहायक कंपनियों के वित्तीय लेनदेन और दावों की जाँच करना मुश्किल हो गया।

SEBI ने कहा कि कई बार ईमेल और समन भेजने के बावजूद राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड (REL) ने माँगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई। इससे जाँच प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न हुई और SEBI के लिए कंपनी के समेकित वित्तीय विवरणों (Consolidated Financial Statements) की सत्यता की जाँच करना मुश्किल हो गया।

SEBI के अनुसार, यह SEBI अधिनियम, 1992 की धारा 11(2)(ia) और 11C(3) का उल्लंघन है। इसके अलावा कंपनी ने अपनी सहायक और स्टेप-डाउन सहायक कंपनियों के ऑडिट किए गए वित्तीय विवरण अपनी वेबसाइट पर अपलोड नहीं किए।

SEBI का कहना है कि इससे सूचीबद्ध कंपनियों से जुड़े LODR नियमों के रेगुलेशन 46(2)(s) और कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 136(1) का भी उल्लंघन हुआ।

राजेश एक्सपोर्ट्स की जाँच में SEBI को क्या निष्कर्ष मिले?

SEBI द्वारा राजेश एक्सपोर्ट्स, वैलकैम्बी और उसकी अन्य सहायक कंपनियों के वित्तीय रिकॉर्ड की जाँच में पाया गया कि कंपनी ने समेकित स्तर (Consolidated Level) पर लाखों करोड़ रुपए का राजस्व दिखाया था, लेकिन स्टैंडअलोन स्तर पर उसकी आय इसका केवल एक छोटा हिस्सा थी।

वित्त वर्ष 2020-21 में राजेश एक्सपोर्ट्स का समेकित राजस्व 2,58,306 करोड़ रुपए बताया गया था, जबकि उसका स्टैंडअलोन रेवेन्यु सिर्फ 2,060 करोड़ रुपए था। 2020-21 से 2025-26 के बीच समेकित और स्टैंडअलोन दोनों तरह की आय बढ़ी, लेकिन दोनों के बीच का बड़ा अंतर लगातार बना रहा।

वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का समेकित राजस्व 7,78,716 करोड़ रुपए तक पहुँच गया, जबकि उसका स्टैंडअलोन राजस्व केवल 9,189 करोड़ रुपए था।

राजेश एक्सपोर्ट्स (REL) का कहना था कि उसके समेकित और स्टैंडअलोन रेवेन्यु के बीच इतना बड़ा अंतर इसलिए है क्योंकि उसकी अधिकांश आय उसकी विदेशी सहायक कंपनियों से आती है। इनमें वैलकैम्बी एसए (Valcambi SA) प्रमुख है, जिसे कंपनी अपनी मुख्य परिचालन इकाई बताती है।

हालाँकि उपलब्ध आँकड़ों से पता चलता है कि GGR समेत REL से जुड़ी कई अन्य कंपनियाँ या तो केवल होल्डिंग कंपनियाँ हैं, जिनका कोई वास्तविक कारोबार नहीं है, या फिर उन्होंने अभी तक अपना संचालन शुरू ही नहीं किया है।

REL और उसकी सहायक कंपनियों के वित्तीय रिकॉर्ड की जाँच के आधार पर SEBI के प्रारंभिक निष्कर्ष बताते हैं कि कंपनी के समेकित राजस्व का लगभग 97 से 99 प्रतिशत हिस्सा विदेशी सहायक और स्टेप-डाउन सहायक कंपनियों से जुड़ा हुआ बताया गया।

हालाँकि बार-बार समन भेजे जाने के बावजूद कंपनी इन राजस्व दावों के समर्थन में सत्यापित किए जा सकने वाले दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा सकी। SEBI ने यह भी कहा कि REL Singapore और कंपनी की अन्य कई सहायक इकाइयों की वास्तविक कारोबारी गतिविधियाँ बहुत कम थीं या लगभग नहीं थीं।

SEBI के अनुसार, कंपनी की मुख्य परिचालन इकाई के रूप में पेश की गई Valcambi SA ने अपने ऑडिट किए गए वित्तीय विवरणों में केवल बहुत मामूली स्टैंडअलोन आय दिखाई थी, जो मुख्य रूप से प्रोसेसिंग शुल्क और वैल्यू एडिशन से जुड़ी थी।

नियामक ने यह भी कहा कि GGR द्वारा समेकित स्तर पर दिखाई गई भारी-भरकम लेकिन अनऑडिटेड आय का समर्थन न तो उसके ऑडिट किए गए स्टैंडअलोन वित्तीय विवरणों से होता है और न ही उपलब्ध लेनदेन रिकॉर्ड या सामान्य अकाउंटिंग सिद्धांतों से। SEBI ने जोर देकर कहा कि समस्या केवल कुछ जानकारी उपलब्ध न होने की नहीं है।

असली मुद्दा यह है कि कंपनी द्वारा समेकित स्तर पर दिखाई गई आय को लंबे समय तक बार-बार माँगे जाने और पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद सत्यापित नहीं किया जा सका। SEBI के आदेश में कहा गया है कि कंपनी ने लेनदेन से जुड़े रिकॉर्ड, ग्राहकों का विवरण, विक्रेताओं की पुष्टि, चालान, स्टॉक संबंधी रिकॉर्ड और अन्य मूल साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराए।

वहीं जिस विदेशी इकाई को मुख्य कारोबारी इकाई बताया गया, उसने भी बहुत कम स्टैंडअलोन आय दिखाई। इसके अलावा अन्य सहायक कंपनियों की ओर से भी कोई ठोस कारोबारी गतिविधि साबित नहीं की जा सकी। ऐसे में कंपनी द्वारा घोषित समेकित राजस्व के आँकड़े व्यावसायिक रूप से अविश्वसनीय प्रतीत होते हैं।

SEBI की जाँच में यह भी सामने आया कि वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच कंपनी ने अपनी सहायक कंपनियों से जुड़ी लगभग 15,15,385 करोड़ रुपए की आय को कथित तौर पर गलत तरीके से प्रस्तुत किया। यह राशि कंपनी द्वारा दिखाई गई कुल आय का करीब 99.80 प्रतिशत हिस्सा है।

SEBI का कहना है कि पहली नजर में ऐसा लगता है कि कंपनी की इन गतिविधियों ने निवेशकों और शेयर बाजार के सामने राजेश एक्सपोर्ट्स के कारोबार के आकार, उसकी वित्तीय स्थिति और आर्थिक मजबूती की एक बढ़ी-चढ़ी और भ्रामक तस्वीर पेश करने में मदद की।

राजस्व को बढ़ाकर दिखाने के आरोपों के अलावा SEBI ने कंपनी से जुड़े कुछ संदिग्ध लेनदेन की भी जाँच की। जाँच के दौरान पाया गया कि राजेश एक्सपोर्ट्स ने Affluence Shares and Stocks Pvt Ltd के साथ 11,487 करोड़ रुपए की बिक्री और 11,488 करोड़ रुपए की खरीद दिखाई थी।

हालाँकि इस कंपनी ने राजेश एक्सपोर्ट्स के साथ किसी भी प्रकार के कारोबारी संबंध होने से इनकार किया और कहा कि उसका लेनदेन सीधे कंपनी के बजाय व्यक्तिगत रूप से राजेश मेहता के साथ था। SEBI की जाँच में यह भी सामने आया कि कंपनी का पैसा पहले राजेश मेहता से जुड़ी संस्थाओं तक पहुँचाया गया और फिर वहां से उनके निजी खातों में भेजा गया।

हालाँकि इन लेनदेन को कंपनी के खातों में दर्ज किया गया था, लेकिन कुछ धनराशि का इस्तेमाल बोर्ड की मंजूरी और संबंधित पक्षों (Related Party Transactions) से जुड़े आवश्यक खुलासों के बिना व्यक्तिगत डेरिवेटिव ट्रेडिंग में किया गया। बाद में इस धन का कुछ हिस्सा वापस भी लौटा दिया गया।

SEBI के आदेश में कई अन्य संदिग्ध पहलुओं का भी उल्लेख किया गया है। इनमें अफ्रीका में सोने की खदान से जुड़े एक निवेश का मामला भी शामिल है, जिसमें लगभग 10.35 करोड़ रुपए लगाए गए थे। जाँच के दौरान इस निवेश से जुड़े पर्याप्त दस्तावेज, मूल्यांकन रिपोर्ट और ग्राहकों, विक्रेताओं तथा सहायक कंपनियों के वित्तीय रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं मिले।

गौरतलब है कि राजेश एक्सपोर्ट्स के खिलाफ जाँच मार्च 2024 में शुरू हुई थी। यह जाँच एक शेयरधारक की शिकायत के बाद शुरू की गई, जिसमें दो साल से अधिक समय से बकाया पड़े असामान्य रूप से बड़े व्यापारिक देयों (Trade Receivables) पर सवाल उठाए गए थे।

अब SEBI ने राजेश एक्सपोर्ट्स और उसके प्रबंध निदेशक राजेश मेहता को प्रतिभूति बाजार में कारोबार करने से रोक दिया है। हालाँकि राजेश एक्सपोर्ट्स ने अपने ऊपर लगाए गए सभी आरोपों को खारिज किया है, लेकिन SEBI की कार्रवाई का असर कंपनी और उसके निवेशकों पर साफ दिखाई दिया।

4 जून को कंपनी का शेयर 5 प्रतिशत के लोअर सर्किट पर पहुंच गया और करीब 104 रुपए पर कारोबार करता दिखा। पिछले तीन वर्षों में कंपनी के शेयर की कीमत 80 प्रतिशत से अधिक गिर चुकी है। इसका असर भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) पर भी पड़ा है, जिसके पास राजेश एक्सपोर्ट्स में 10.8 प्रतिशत हिस्सेदारी है।

इस हिस्सेदारी का मूल्य करीब 334 करोड़ रुपए बताया जाता है। रिपोर्टों के अनुसार, 2023 से अब तक निवेशकों को कुल मिलाकर लगभग 12,700 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है, जिससे करीब 1.94 लाख शेयरधारक प्रभावित हुए हैं।

सफलता की मिसाल से लेकर SEBI की जाँच तक: कौन हैं राजेश मेहता?

20 जून 1964 को बेंगलुरु में जन्मे राजेश जसवंत राय मेहता खुद के दम पर सफल हुए कारोबारी माने जाते हैं। उनका परिवार मूल रूप से गुजरात के मोरबी का रहने वाला जैन परिवार है। राजेश मेहता का सपना डॉक्टर बनने का था और उन्होंने नेशनल कॉलेज में पढ़ाई भी की लेकिन वे अपनी उच्च शिक्षा पूरी नहीं कर सके।

इसके बाद उन्होंने पारिवारिक कारोबार में हाथ बँटाना शुरू किया। वर्ष 1985 में उन्होंने अपने भाई प्रशांत मेहता के साथ मिलकर चाँदी के व्यापार की एक कंपनी शुरू की। इसके लिए शुरुआती पूँजी उनके दूसरे भाई बिपिन मेहता से उधार ली गई थी। मेहता बंधु चेन्नई से आभूषण खरीदते थे और उन्हें गुजरात व दक्षिण भारत के विभिन्न बाजारों में मुनाफे के साथ बेचते थे।

धीरे-धीरे राजेश मेहता ने आभूषणों का एक बड़ा थोक कारोबार खड़ा कर लिया। उन्होंने भारतीय पारंपरिक डिजाइनों को अलग-अलग बाजारों तक पहुँचाने में भी भूमिका निभाई और ‘राजेश आर्ट ज्वेलर्स’ के नाम से कारोबार संचालित किया। वर्ष 1989 में राजेश मेहता ने बेंगलुरु के एक गैरेज में केवल 10 कर्मचारियों के साथ राजेश एक्सपोर्ट्स की स्थापना की।

रिपोर्टों के अनुसार, यह भारत की शुरुआती संगठित स्वर्ण आभूषण निर्माण इकाइयों में से एक थी। कंपनी का मुख्य कारोबार संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ब्रिटेन, ओमान, कुवैत, अमेरिका और यूरोप को सोने के आभूषणों का निर्यात करना था। 1992 तक कंपनी का कारोबार लगभग 2 करोड़ रुपए तक पहुँच गया था।

इसके बाद इसमें तेजी से वृद्धि हुई और 1998 तक इसका टर्नओवर करीब 120 करोड़ रुपए हो गया। 1994 तक राजेश एक्सपोर्ट्स भारत की सबसे बड़ी स्वर्ण आभूषण निर्यातक और थोक विक्रेता कंपनियों में शामिल हो चुकी थी। वर्ष 1995 में कंपनी ने अपना IPO लाया, जिससे लगभग 10 करोड़ रुपए जुटाए गए।

इसके बाद कंपनी ने सोने के पूरे कारोबार में विस्तार किया, जिसमें रिफाइनिंग, निर्माण और खुदरा बिक्री शामिल थी। राजेश एक्सपोर्ट्स ‘शुभ ज्वेलर्स’ नाम से रिटेल ज्वेलरी चेन भी संचालित करती है। कंपनी की वेबसाइट के अनुसार, राजेश एक्सपोर्ट्स दुनिया में उत्पादित होने वाले लगभग 35 प्रतिशत सोने को प्रोसेस करने का दावा करती है।

वर्ष 2015 में राजेश एक्सपोर्ट्स ने स्विट्जरलैंड की कंपनी वैलकैम्बी एसए (Valcambi SA) का लगभग 40 करोड़ डॉलर (400 मिलियन डॉलर) के नकद सौदे में अधिग्रहण करके बाजार विशेषज्ञों को चौंका दिया था। उस समय वैलकैम्बी दुनिया की सबसे बड़ी गोल्ड रिफाइनिंग कंपनी मानी जाती थी।

हालाँकि अधिग्रहण के बाद वैलकैम्बी भी विवादों में घिर गई। कंपनी पर दुबई से आने वाले कथित ‘डर्टी गोल्ड’ (संदिग्ध स्रोतों से प्राप्त सोना) को प्रोसेस करने के आरोप लगे थे। इन विवादों के बीच ऐसी खबरें भी सामने आईं कि वैलकैम्बी ने स्विस गोल्ड एसोसिएशन की सदस्यता छोड़ दी थी।

एक समय राजेश एक्सपोर्ट्स का नाम फॉर्च्यून 500 कंपनियों की सूची में शामिल था। राजस्व के आधार पर इसे भारत की सबसे बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों में गिना जाता था। हालाँकि अब SEBI की जाँच में आरोप लगाया गया है कि हाल के वर्षों में कंपनी द्वारा दिखाए गए राजस्व का बड़ा हिस्सा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया था और वास्तविक नहीं था।

राजेश मेहता को अपने कारोबारी जीवन में कई पुरस्कार और सम्मान मिले। उन्हें ‘उद्योग श्री’, कर्नाटक सरकार का ‘ज्वेलर ऑफ द ईयर’ पुरस्कार, चीन में ‘आउटस्टैंडिंग बिजनेसमैन’ सम्मान और फोर्ब्स की 2017 की भारत के सबसे अमीर लोगों की सूची में भी जगह मिली थी। राजेश एक्सपोर्ट्स को कई सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिला।

वर्ष 2022 में कंपनी एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC) बैटरी स्टोरेज के लिए घोषित 18,100 करोड़ रुपए की PLI योजना के लाभार्थियों में शामिल थी। हालाँकि राजेश एक्सपोर्ट्स 2024 में SEBI की जाँच के दायरे में आई, लेकिन उससे पहले भी कई विश्लेषक और निवेशक कंपनी की असाधारण रूप से ऊँची आय, बड़े नकद भंडार और उसकी सहायक कंपनियों से जुड़ी सीमित पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाते रहे थे।

कुछ लोगों ने तो राजेश एक्सपोर्ट्स की स्थिति की तुलना गीतांजलि जेम्स के पतन से भी की, जिसे भारत के सबसे चर्चित ज्वेलरी निर्यात घोटालों में से एक माना जाता है।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

पंजाब के ‘शिक्षा सुधारों’ का श्रेय लेने पर कॉन्ग्रेस और AAP में जंग, पढ़े- जब दिल्ली में केजरीवाल पर शीला दीक्षित के काम को अपना बताने के लगे थे आरोप

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर पंजाब के ‘शिक्षा क्षेत्र में नंबर-1’ बनने की काफी चर्चा हो रही है। स्कूल शिक्षा में शीर्ष स्थान मिलने के बाद इस बात पर राजनीतिक बहस शुरू हो गई है कि इसका श्रेय किसे मिलना चाहिए।

आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार इसे अपनी शिक्षा सुधार नीतियों का नतीजा बता रही है। पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने कहा कि भगवंत मान सरकार के दौरान पंजाब 27वें स्थान से पहले नंबर पर पहुँचा है।

हालाँकि, कॉन्ग्रेस विधायक और पंजाब के पूर्व शिक्षा मंत्री परगट सिंह ने इस दावे पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पंजाब में शिक्षा सुधार की शुरुआत पिछली कॉन्ग्रेस सरकार के समय ही हो गई थी और 2022 में AAP के सत्ता में आने से पहले हुए बड़े शिक्षा सर्वे में इसके संकेत दिखने लगे थे।

यह विवाद दिल्ली की उस पुरानी बहस की याद दिलाता है, जब कॉन्ग्रेस नेताओं ने AAP पर आरोप लगाया था कि उसने शिक्षा क्षेत्र में उन सुधारों का श्रेय लिया, जिसकी नींव शीला दीक्षित सरकार के दौरान रखी गई थी। अब पंजाब में भी यही सवाल उठ रहा है कि शिक्षा जैसे लंबे समय के सुधार का असली श्रेय किसे मिलना चाहिए।

क्या है AAP का दावा?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब पंजाब सरकार ने हालिया रैंकिंग में अपने प्रदर्शन को लेकर हुए दावा किया कि राज्य स्कूल शिक्षा में देश में नंबर-1 बना है। अरविंद केजरीवाल, मुख्यमंत्री भगवंत मान और अन्य AAP नेताओं ने इस उपलब्धि का श्रेय 2022 में पार्टी के सत्ता में आने के बाद किए गए शिक्षा सुधारों को दिया।

सरकार का कहना है कि स्कूल्स ऑफ एमिनेंस, फिनलैंड और सिंगापुर जैसे देशों में शिक्षकों की ट्रेनिंग, शिक्षकों और स्टाफ की भर्ती, स्मार्ट क्लासरूम का विस्तार और स्कूलों के बुनियादी ढाँचे में सुधार जैसे कदमों से सरकारी स्कूलों में बड़ा बदलाव आया है।

AAP का दावा है कि इन पहलों की वजह से पंजाब की शिक्षा व्यवस्था मजबूत हुई और राज्य शिक्षा रैंकिंग में शीर्ष स्थान तक पहुँचा है। केजरीवाल ने यह भी कहा कि पहले पंजाब शिक्षा रैंकिंग में निचले पायदान पर था लेकिन अब नंबर-1 बन गया है जिसे AAP सरकार के शिक्षा मॉडल की सफलता के तौर पर पेश किया जा रहा है।

रियलिटी चेक: क्या पंजाब की शिक्षा में सुधार AAP के आने से पहले शुरू हो गया था?

AAP पंजाब के शिक्षा क्षेत्र में सुधार का श्रेय अपनी सरकार को दे रही है लेकिन घटनाक्रम की टाइमलाइन बताती है कि राज्य में सुधार की शुरुआत पार्टी के सत्ता में आने से पहले ही हो चुकी थी। AAP सरकार ने मार्च 2022 में पंजाब में सत्ता संभाली थी लेकिन जिन अहम सर्वे और रिपोर्टों का हवाला दिया जा रहा है, उनमें से कुछ का डेटा 2022 से पहले का है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस उपलब्धि का पूरा श्रेय AAP सरकार को मिलना चाहिए या फिर वह पहले से किए गए काम का फायदा उठा रही है?

उदाहरण के तौर पर, नेशनल अचीवमेंट सर्वे (NAS) 2021 जो देशभर में छात्रों की पढ़ाई और सीखने के स्तर को मापता है, AAP सरकार बनने से कई महीने पहले किया गया था। इस सर्वे में पंजाब का प्रदर्शन अच्छा रहा था और राज्य बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल था। इसी तरह कॉन्ग्रेस नेताओं ने पहले की परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स (PGI) रिपोर्टों का हवाला देते हुए दावा किया है कि पंजाब में शिक्षा क्षेत्र में सुधार के संकेत सरकार बदलने से पहले ही दिखने लगे थे।

हालाँकि इसका यह मतलब नहीं है कि मौजूदा सरकार की कोई भूमिका नहीं रही। सत्ता में आने के बाद AAP सरकार ने स्कूल्स ऑफ एमिनेंस शुरू किए, शिक्षकों के लिए ट्रेनिंग कार्यक्रम चलाए, भर्ती अभियान शुरू किए और स्कूलों के बुनियादी ढाँचे को बेहतर बनाने पर काम किया। लेकिन शिक्षा क्षेत्र में सुधार आमतौर पर लंबे समय में असर दिखाते हैं और इनके नतीजे सामने आने में कई साल लग सकते हैं। ऐसे में किसी एक सरकार को पूरे सुधार का श्रेय देना आसान नहीं होता।

इसलिए टाइमलाइन से यह संकेत जरूर मिलता है कि पंजाब की शिक्षा में सुधार की प्रक्रिया AAP के सत्ता में आने से पहले ही शुरू हो चुकी थी। हालाँकि, मौजूदा सरकार ने अपने स्तर पर कई नई पहलें जारी रखीं और सुधारों को आगे बढ़ाने की कोशिश की।

एक और महत्वपूर्ण बात जो अक्सर राजनीतिक बहस में छूट जाती है, वह यह है कि पंजाब को भारत का कुल मिलाकर शिक्षा में नंबर-1 राज्य घोषित नहीं किया गया है। AAP सरकार जिस रैंकिंग का हवाला दे रही है, वह केवल स्कूल शिक्षा के संकेतकों और छात्रों के सीखने के परिणामों (learning outcomes) से जुड़ी है। इसमें पूरे शिक्षा क्षेत्र को नहीं मापा गया है, जिसमें उच्च शिक्षा, विश्वविद्यालय, रिसर्च आउटपुट, शिक्षकों की गुणवत्ता, रोजगार क्षमता और अन्य कई मानक शामिल होते हैं। इसलिए यह कहना कि पंजाब पूरे शिक्षा क्षेत्र में भारत का नंबर-1 राज्य बन गया है, पूरी तरह गलत है। ऐसे दावों का प्रचार लोगों के बीच भ्रम फैला सकता है लेकिन सच को लंबे समय तक छिपाए नहीं रहा जा सकता है।

दिल्ली जैसा विवाद: बेहतर शिक्षा का श्रेय किसे?

पंजाब में शिक्षा को लेकर छिड़ी बहस नई नहीं है। इससे पहले दिल्ली में भी ऐसा ही विवाद हुआ था। AAP सरकार ने शिक्षा मॉडल को अपनी बड़ी उपलब्धि बताया लेकिन कॉन्ग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि पार्टी उन सुधारों का श्रेय ले रही है जिसकी नींव पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सरकार के दौरान रखी गई थी।

शीला दीक्षित के 15 साल के कार्यकाल में स्कूलों के बुनियादी ढाँचे, नई कक्षाओं, सुविधाओं और शिक्षा बजट पर काफी काम हुआ था। वहीं सत्ता में आने के बाद AAP ने शिक्षक प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम सुधार और स्कूलों के आधुनिकीकरण जैसे कई नए कदम उठाए।

कॉन्ग्रेस का कहना था कि AAP जिन सुधारों का प्रचार कर रही है, वे पहले से किए गए निवेश का नतीजा थे। हालाँकि AAP ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसने अपनी नीतियों और सुधारों से शिक्षा व्यवस्था को बदला है। इसके बाद यह बहस शुरू हो गई कि शिक्षा में सफलता का असली श्रेय उस सरकार को मिलना चाहिए जिसने सुधार शुरू किए या उस सरकार को जिसने उन्हें आगे बढ़ाया और बड़े स्तर पर लागू किया।

अब पंजाब में भी कॉन्ग्रेस इसी तरह के आरोप लगा रही है तो इससे यह बहस फिर से तेज हो गई है कि शिक्षा जैसे लंबे समय में दिखने वाले सुधारों का असली श्रेय किसे मिलना चाहिए।

निष्कर्ष

पंजाब की हालिया शिक्षा रैंकिंग ने निश्चित तौर पर AAP सरकार के इस दावे को मजबूत किया है कि उसके शिक्षा सुधारों का असर दिख रहा है। लेकिन इस उपलब्धि को लेकर पैदा हुआ राजनीतिक विवाद एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि ऐसे सुधारों का श्रेय किसे मिलना चाहिए, जिनका असर दिखने में कई साल लगते हैं?

टाइमलाइन यह संकेत देती है कि पंजाब में शिक्षा सुधार की शुरुआत 2022 में AAP सरकार आने के तुरंत बाद नहीं हुई थी। सरकार बदलने से पहले हुए सर्वे और मूल्यांकन के आँकड़े बताते हैं कि राज्य में सुधार के संकेत पहले ही दिखाई देने लगे थे। हालाँकि, मौजूदा सरकार ने भी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अपनी तरफ से कई नई पहलें शुरू की हैं।

यह विवाद दिल्ली की उस पुरानी बहस जैसा भी नजर आता है जब कॉन्ग्रेस नेताओं ने AAP पर आरोप लगाया था कि वह उन सुधारों का श्रेय ले रही है जिसकी नींव शीला दीक्षित सरकार के दौरान रखी गई थी। चाहे कोई इस तुलना से सहमत हो या नहीं लेकिन दोनों मामले यह दिखाते हैं कि शिक्षा सुधार आमतौर पर कई सरकारों के प्रयासों का नतीजा होते हैं।

यह भी समझना जरूरी है कि पंजाब का हालिया प्रदर्शन मुख्य रूप से स्कूल शिक्षा और छात्रों के सीखने के परिणामों से जुड़ा है। इसलिए यह दावा करना गलत होगा कि पंजाब पूरे शिक्षा क्षेत्र में भारत का नंबर-1 राज्य बन गया है। ऐसा दावा करने के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों, विश्वविद्यालयों, रिसर्च, रोजगार क्षमता और शिक्षा से जुड़े अन्य मानकों की भी तुलना जरूरी होती है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

‘BJP सहयोगियों को खा जाती है’: अन्नामलाई के जाने के बाद फिर उठा पुराना आरोप, लेकिन बिहार से महाराष्ट्र तक क्या कहते हैं तथ्य?

ना केवल तमिलनाडु बल्कि पूरे दक्षिण में बीजेपी के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल के. अन्नामलाई ने पार्टी छोड़ दी है। अन्नामलाई ने ‘वी द लीडर्स’ नाम से अपनी पार्टी का गठन किया है और वो अब तमिलनाडु में जन आंदोलन करेंगे और चुनाव भी लड़ेंगे। अन्नामलाई के जाने के बाद सोशल मीडिया पर यह बात तैरने लगी है कि बीजेपी बीच सफर में अपने नेताओं या अपने सहयोगियों को छोड़ देती हैं।

हालाँकि, इस बात में कितनी सच्चाई है ये हम इस लेख में जानेंगे। पहली शुरुआत BJP और अन्नामलाई से ही करते हैं। चाहते तो अन्नामलाई तमिलनाडु में बैठ इस्तीफा दे देते लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

बीजेपी ने उन्हें साथ रखने की लगातार कोशिशें कीं, पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन से लेकर गृह मंत्री अमित शाह ने उनसे बातचीत की उनकी शिकायतों को समझा और साथ देने की भी बात कही। लेकिन बात नहीं बनी और इसमें अन्नामलाई की भी अपनी वजह रही होंगी।

वो बीजेपी ही थी जिसने अन्नामलाई को तमिलनाडु में पार्टी का नेतृत्व करने का मौका दिया और पूरी ताकत उनके पीछे लगा दी। सार्वजनिक मंचों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बीजेपी के तमाम बड़े नेता जिस अपनेपन के साथ अन्नामलाई को संबोधित करते उससे साफ नजर आता था कि वो अन्नामलाई में एक भविष्य का नेता देखते हैं लेकिन ये साथ लंबा नहीं चला तो इसके लिए बीजेपी ही जिम्मेदार नहीं।

यह आरोप कि बीजेपी अपने सहयोगियों को खत्म कर देती है, उन्हें धीरे-धीरे कमजोर कर देती है और अंततः उनकी राजनीतिक जमीन अपने कब्जे में ले लेती है। यह आरोप इतना दोहराया गया है कि कई लोगों ने इसे लगभग सत्य मान लिया। लेकिन क्या वास्तव में तस्वीर इतनी सीधी है? क्या हर राज्य में BJP ने अपने सहयोगियों को किनारे लगाया या कई मामलों में उसने राजनीतिक लाभ की स्थिति में होते हुए भी सहयोगियों को नेतृत्व, सम्मान और जगह दी?

अगर भारतीय राजनीति को सिर्फ आरोपों से नहीं बल्कि उदाहरणों और घटनाओं के क्रम से समझा जाए, तो एक दूसरा पक्ष भी साफ दिखाई देता है कि BJP की गठबंधन राजनीति का एक बड़ा आधार सहयोगियों को साथ लेकर चलने की रणनीति रही है। यह रणनीति हमेशा सफल रही हो, ऐसा नहीं है। मतभेद भी हुए, रिश्ते टूटे भी लेकिन यह कहना कि BJP का स्वभाव ही सहयोगियों को खत्म करना है, तथ्यों के सामने अधूरा तर्क नजर आता है।

सबसे पहले बिहार को देखिए। नीतीश कुमार की जेडीयू और BJP के बीच लंबे समय से संबंध है। नीतीश लंबे वक्त तक बीजेपी के साथ राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं। 2020 विधानसभा चुनाव में BJP ने 74 सीटें जीतीं जबकि जेडीयू 43 सीटों पर सिमट गई। BJP स्पष्ट रूप से बड़ी पार्टी बन चुकी थी। सामान्य राजनीतिक गणित कहता कि मुख्यमंत्री BJP का होना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही बने। BJP ने अपने बड़े जनादेश के बावजूद गठबंधन धर्म को प्राथमिकता दी और सहयोगी दल के नेता को शीर्ष पद पर बनाए रखा। यह कोई छोटी राजनीतिक घटना नहीं थी। भारतीय राजनीति में सत्ता अक्सर संख्या के हिसाब से चलती है लेकिन यहाँ BJP ने संख्या से ऊपर गठबंधन को रखा।

बाद में 2022 में जेडीयू ने खुद NDA छोड़ा और महागठबंधन में चली गई यानी रिश्ता टूटने की शुरुआत BJP की ओर से नहीं हुई। अब दोनों दल साथ हैं और जेडीयू का राजनीतिक स्पेस आज भी उनता ही मजबूत है।

बिहार की बात सिर्फ जेडीयू तक सीमित नहीं है। भाजपा ने जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) को लगातार राजनीतिक स्पेस दिया। मुकेश सहनी की VIP पार्टी को भी गठबंधन में जगह दी गई, चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) लगातार NDA में है और राजनीतिक महत्व बना हुआ है।

ये वे दल थे जिनकी अपनी सीटें सीमित थीं लेकिन BJP ने उन्हें राजनीतिक प्रासंगिकता दी। अगर उद्देश्य केवल सहयोगियों को खत्म करना होता, तो छोटे दलों को सीटें देकर अपने वोट बैंक का हिस्सा साझा करने की मजबूरी BJP क्यों स्वीकार करती?

महाराष्ट्र का उदाहरण भी कम दिलचस्प नहीं है। भाजपा और शिवसेना का रिश्ता कोई 5-10 साल का नहीं था बल्कि यह लगभग तीन दशक तक चला। 1980 के दशक के अंत से दोनों दल साथ आए और महाराष्ट्र की राजनीति में एक वैचारिक साझेदारी बनी।

2019 विधानसभा चुनाव में दोनों ने साथ चुनाव लड़ा और बहुमत हासिल किया। भाजपा 105 सीटों पर और शिवसेना 56 सीटों पर जीती। लेकिन सरकार गठन के समय मुख्यमंत्री पद को लेकर विवाद हुआ और उद्धव ठाकरे ने कॉन्ग्रेस और NCP के साथ सरकार बनाने का फैसला किया। यहाँ भी यह गठबंधन तोड़ने की पहल भाजपा की तरफ से नहीं की गई थी।

हाँ, बाद के वर्षों में शिवसेना में विभाजन हुआ और एकनाथ शिंदे गुट भाजपा के साथ आया। आलोचक इसे भाजपा की रणनीति कह सकते हैं लेकिन उतना ही बड़ा तथ्य यह भी है कि भाजपा चाहती तो मुख्यमंत्री पद अपने पास रख सकती थी, फिर भी शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया गया। महाराष्ट्र में सबसे बड़ी ताकत होने के बावजूद सहयोगी चेहरे को आगे रखना भाजपा की गठबंधन शैली का हिस्सा था।

पंजाब में शिरोमणि अकाली दल भाजपा का सबसे पुराना सहयोगी था। दोनों का रिश्ता दो दशक से अधिक समय तक चला। कृषि कानूनों के मुद्दे पर मतभेद बढ़े और 2020 में अकाली दल ने एनडीए छोड़ने का फैसला किया। यह अलग बात है कि किसान आंदोलन के दबाव और पंजाब की राजनीति ने अकाली दल को यह निर्णय लेने पर मजबूर किया, लेकिन तथ्य यह है कि गठबंधन से बाहर निकलने की घोषणा अकाली दल की ओर से हुई थी। भाजपा ने अपने सबसे पुराने सहयोगी को बाहर नहीं किया बल्कि सहयोगी ने खुद रास्ता अलग चुना।

उत्तर प्रदेश में भाजपा की राजनीति को देखें तो यहाँ भी सहयोगियों को साथ रखने का एक मॉडल दिखता है। अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल हों या निषाद पार्टी के संजय निषाद दोनों दलों को भाजपा ने केवल चुनावी समय की जरूरत नहीं माना।

मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व दिया गया, सीटों में भागीदारी दी गई और सामाजिक समीकरणों में उन्हें जगह मिली। भाजपा समझती रही कि उत्तर प्रदेश जैसी विशाल राजनीति केवल अकेले नहीं लड़ी जा सकती, सामाजिक आधार का विस्तार सहयोगियों के साथ ही संभव है।

पूर्वोत्तर में भाजपा की गठबंधन नीति शायद सबसे अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। नागालैंड में भाजपा ने नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (NDPP) के साथ चुनाव लड़ा और क्षेत्रीय नेतृत्व को स्वीकार किया। असम में असम गण परिषद (AGP) को साथ रखा गया।

मेघालय और मणिपुर में भी क्षेत्रीय दलों के साथ साझा सत्ता मॉडल अपनाया गया। भाजपा चाहती तो अपनी राष्ट्रीय ताकत के आधार पर ‘बड़े भाई’ की राजनीति कर सकती थी लेकिन पूर्वोत्तर में उसने स्थानीय नेतृत्व और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के साथ समन्वय का रास्ता चुना। यही कारण है कि एनडीए का विस्तार पूर्वोत्तर में सबसे तेज हुआ।

आंध्र प्रदेश इसका नया उदाहरण है। 2024 के बाद जब चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी एनडीए के लिए अहम सहयोगी बनकर उभरी, तब भाजपा ने न केवल उन्हें महत्व दिया बल्कि गठबंधन को स्थिर बनाए रखने की कोशिश की। राष्ट्रीय स्तर पर बहुमत के समीकरण में सहयोगियों की अहमियत को भाजपा ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया। यह वही राजनीति है जिसमें ‘एकला चलो’ के बजाय ‘साथ लेकर चलो’ का संकेत दिखता है।

दिलचस्प बात यह है कि भाजपा पर सबसे ज्यादा आरोप वही लोग लगाते हैं जो कॉन्ग्रेस की गठबंधन राजनीति को भूल जाते हैं, इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण भरे पड़े हैं। हाल ही में तमिलनाडु में भी ऐसा ही दिखा। कॉन्ग्रेस वर्षों तक DMK के साथ रही लेकिन राजनीतिक समीकरण बदलते ही रिश्तों में दूर बढ़। कॉन्ग्रेस ने DMK की पीठ में छुरा घोंप दिया और विजय की TVK के साथ हाथ मिला लिया।

यह भी सच है कि गठबंधन राजनीति हमेशा बराबरी का रिश्ता नहीं होती। बड़ी पार्टी स्वाभाविक रूप से प्रभावशाली होती है। भाजपा भी अपवाद नहीं। कई सहयोगी कमजोर भी पड़े, कुछ दलों का जनाधार भाजपा के विस्तार से प्रभावित भी हुआ। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भाजपा की ‘साजिश’ थी या भारतीय राजनीति का स्वाभाविक परिणाम।

इतना जरूर दिखता है कि भाजपा ने कई बार राजनीतिक लाभ की स्थिति में होते हुए भी सहयोगियों को नेतृत्व दिया, मुख्यमंत्री पद छोड़ा, सीटें साझा कीं और छोटे दलों को राष्ट्रीय राजनीति में जगह दी। बिहार में नीतीश कुमार, महाराष्ट्र में शिंदे, उत्तर प्रदेश में अपना दल और निषाद पार्टी और भी तमाम उदाहरण केवल संयोग नहीं लगते।

इसलिए जब यह कहा जाता है कि भाजपा सहयोगियों को ‘खा जाती’ है, तब शायद यह भी पूछना चाहिए कि अगर ऐसा ही होता तो इतने क्षेत्रीय दल बार-बार उसके साथ क्यों लौटते?