Home Blog Page 29

अभिषेक बनर्जी पर अंडा फेंकने की घटना को ममता बनर्जी ने बताया जानलेवा, कहा- हेलमेट न होता तो जाती जान: यही TMC सुप्रीमो चुनावी हिंसाओं को बताती थी छोटी-मोटी घटना

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के सोनारपुर में शनिवार (30 मई 2026) को तृणमूल कॉन्ग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी पर नाराज स्थानीय लोगों ने अंडे फेंके और उनका विरोध किया। ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी, जिन्होंने चुनाव परिणाम आने से पहले BJP कार्यकर्ताओं को चुनाव बाद हिंसा की धमकी दी थी, लोगों द्वारा फेंके जा रहे अंडों से बचने के लिए हेलमेट पहने हुए दिखाई दिए।

सड़क पर नाटकीय विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक ड्रामे के जरिए अपना राजनीतिक करियर बनाने वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ने कोलकाता के बेल व्यू अस्पताल में हंगामा खड़ा कर दिया, जब अस्पताल ने अभिषेक बनर्जी को भर्ती करने से इनकार कर दिया।

दरअसल डॉक्टरों ने साफ कर दिया था कि उन्हें किसी तरह की गंभीर शारीरिक चोट नहीं लगी है। डॉक्टरों ने बताया कि TMC नेता पूरी तरह होश में थे, उनकी स्थिति सामान्य थी और उनकी छाती पर केवल मामूली चोट के निशान थे।

ममता बनर्जी और TMC ने इस घटना को भुनाने की कोशिश करते हुए पहले नाराज स्थानीय लोगों को ‘भाजपा समर्थित उपद्रवी’ बताया और दावा किया कि शासक ही हत्यारे बन गए हैं।

इसके बाद TMC सुप्रीमो ने यह विवादित दावा किया कि अगर अभिषेक बनर्जी ने हेलमेट नहीं पहना होता तो अंडे लगने से उनकी मौत भी हो सकती थी। उन्होंने कहा, “एक स्थानीय व्यक्ति ने उन्हें हेलमेट दिया था, नहीं तो वह मौके पर ही मर जाते।”

उन्होंने आरोप लगाया कि बंगाल में भाजपा सरकार ने एक निजी अस्पताल को उनके भतीजे को भर्ती करने की अनुमति नहीं दी, जबकि उन्हें कोई गंभीर चोट नहीं लगी थी।

जानिए 2021 के चुनाव के बाद हिंसा पर ममता बनर्जी ने क्या दिया था बयान

जहाँ ममता बनर्जी अपने भ्रष्ट भतीजे के खिलाफ जनता के गुस्से के इस मामले को एक ‘बड़ी घटना’ के रूप में पेश करने में व्यस्त हैं, वहीं TMC सुप्रीमो ने 2021 में बंगाल में हुई चुनाव बाद हिंसा को ‘छोटो छोटो घटना’ यानी छोटी-मोटी घटनाएँ बताकर खारिज कर दिया था।

जो लोग इस मामले से परिचित नहीं हैं, उन्हें बता दें कि 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद एक दर्जन से अधिक भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई थी, महिलाओं के साथ दुष्कर्म की घटनाएँ हुई थीं और हजारों लोगों को TMC के गुंडों के डर से पलायन करना पड़ा था, लेकिन प्रतिद्वंद्वी दल के कार्यकर्ताओं के खिलाफ हुई ये हिंसा और अत्याचार ममता बनर्जी को मामूली लगे थे।

उन्होंने सुझाव दिया था कि ये केवल छोटी-मोटी घटनाएँ थीं, जो चुनाव के बाद हर जगह होती रहती हैं। अप्रैल 2023 में उन्होंने कहा था, “कोयेकटा छोटो छोटो घटना घोटे छिलो इलेक्शनर पर, सामान्यो घोटे थाके सोब जाइगाइ (चुनाव के बाद कुछ छोटी-मोटी घटनाएँ हुई थीं। ऐसी घटनाएँ हर जगह होती रहती हैं)।”

उन्होंने यह भी दुख जताया था कि केंद्र सरकार ने राज्य में कई तथ्य-जाँच समितियाँ भेजीं, जिसके कारण कथित तौर पर TMC के कई कार्यकर्ताओं को झूठे मामलों में गिरफ्तार किया गया। ममता बनर्जी ने जवाबदेही स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा था, “अगर बंगाल में कुछ होता है तो इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार जिम्मेदार है।”

उन्होंने आगे कहा था, “चुनाव के बाद कुछ छोटी-छोटी घटनाएँ हुई थीं, लेकिन केंद्र ने दिल्ली से सारी टीमें भेज दीं। उन्होंने CBI, ED और आयोगों जैसी एजेंसियों के जरिए हमारे लड़के-लड़कियों को गिरफ्तार कर लिया।”

2021 में ममता बनर्जी ने चुनाव बाद TMC समर्थकों द्वारा की गई हिंसा को भाजपा और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) द्वारा कथित अत्याचार का बदला बताते हुए उसका बचाव करने की कोशिश की थी।

उन्होंने कहा था, “बंगाल एक शांतिप्रिय जगह है। चुनाव के दौरान थोड़ी गर्मी, धूल और तनाव रहा। भाजपा ने बहुत अत्याचार किया, CAPF ने भी।” यह बयान उन्होंने राज्य में शांति बनाए रखने की औपचारिक अपील करते हुए दिया था।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

बुंदेलखंड का सूर्य मंदिर बनेगा UP का नया पर्यटन केंद्र, चंदेल राजाओं ने कोणार्क से भी पहले कराया था निर्माण: अब UNESCO विश्व धरोहर में शामिल करा रही योगी सरकार

उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड इलाका हमेशा से अपने शौर्य, जल प्रबंधन, किलों और मंदिरों के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन अब इसी क्षेत्र की एक ऐतिहासिक धरोहर फिर से चर्चा में है। महोबा का प्राचीन सूर्य मंदिर जिसे राहिलिया सूर्य मंदिर भी कहा जाता है, एक बार फिर सुर्खियों में है।

इसकी वजह सिर्फ इसका इतिहास नहीं, बल्कि वह नई पहल भी है जिसके जरिए उत्तर प्रदेश सरकार इस मंदिर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने की तैयारी कर रही है। करीब 1100 साल पुराने इस मंदिर को लेकर दावा किया जाता है कि यह ओडिशा के विश्व प्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर से भी कई शताब्दियों पुराना है।

यही कारण है कि इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और स्थानीय सामाजिक संगठनों की नजरें अब इस धरोहर पर टिकी हुई हैं। सरकार भी इसे पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रही है।

पर्यटन के नए नक्शे पर उभर रहा है महोबा का सूर्य मंदिर

पिछले कुछ वर्षों में प्रशासन और पर्यटन विभाग ने इस ऐतिहासिक मंदिर को नई पहचान देने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। मंदिर परिसर में आकर्षक लाइटिंग की व्यवस्था की गई है। यहां आने वाले पर्यटकों के लिए बेहतर सड़क संपर्क विकसित किया गया है।

रात के समय मंदिर की भव्यता को दिखाने के लिए लाइट एंड साउंड शो की तैयारी की गई है, जबकि आधुनिक सुविधाओं के तहत स्मार्ट सोलर बेंच जैसी व्यवस्थाएँ भी विकसित की जा रही हैं। राहिल सागर के घाटों की सफाई, मंदिर परिसर के चारों ओर बाउंड्री वॉल का निर्माण और पर्यटकों के लिए सुविधाओं का विस्तार भी इसी योजना का हिस्सा है।

प्रशासन का मानना है कि यदि इस ऐतिहासिक धरोहर का व्यवस्थित संरक्षण और प्रचार-प्रसार किया जाए तो यह बुंदेलखंड के पर्यटन उद्योग को नई दिशा दे सकता है।

स्थानीय संगठनों और बुंदेली समाज की ओर से लगातार यह माँग भी उठ रही है कि मंदिर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए प्रस्ताव भेजा जाए। यदि ऐसा होता है तो महोबा न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से बल्कि आर्थिक और पर्यटन के लिहाज से भी नई पहचान हासिल कर सकता है।

आखिर क्यों कहा जाता है कि यह कोणार्क से भी पुराना है?

जब भी भारत में सूर्य मंदिरों की चर्चा होती है तो सबसे पहले ओडिशा के कोणार्क सूर्य मंदिर का नाम सामने आता है। लेकिन महोबा का सूर्य मंदिर इतिहास की दृष्टि से उससे कहीं अधिक पुराना माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, महोबा का यह मंदिर चंदेल शासक राहिल देव वर्मन ने नौवीं से दसवीं शताब्दी के बीच बनवाया था।

कई ऐतिहासिक अभिलेख इसके निर्माण काल को लगभग 890 से 910 ईस्वी के बीच बताते हैं। दूसरी ओर कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंह देव प्रथम ने 13वीं शताब्दी में करवाया था, जिसे लगभग 1250 ईस्वी का माना जाता है। इसका अर्थ है कि महोबा का सूर्य मंदिर कोणार्क से लगभग 300 से 350 वर्ष पहले अस्तित्व में आ चुका था।

हालाँकि दोनों मंदिरों की वास्तुकला और संरचना अलग-अलग है, लेकिन सूर्य उपासना की परंपरा के संदर्भ में महोबा का मंदिर भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

चंदेल राजाओं की विरासत और सूर्य उपासना का केंद्र

महोबा कभी चंदेल राजाओं की राजधानी हुआ करता था। यही वह राजवंश था जिसने खजुराहो जैसे विश्वविख्यात मंदिर समूहों का निर्माण कराया। चंदेल शासकों की पहचान केवल युद्ध कौशल से नहीं बल्कि स्थापत्य कला, जल संरक्षण और धार्मिक संरचनाओं के निर्माण से भी जुड़ी रही है।

महोबा सूर्य मंदिर (फोटो साभार: टाइम्स ऑफ इंडिया)

राहिल देव वर्मन को चंदेल वंश के प्रमुख शासकों में गिना जाता है। माना जाता है कि उन्होंने सूर्य देव को शक्ति, ऊर्जा और समृद्धि का प्रतीक मानते हुए इस मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर का निर्माण राहिल सागर के किनारे कराया गया, जिससे यह धार्मिक स्थल होने के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य का भी केंद्र बन गया।

उस दौर में सूर्य पूजा का विशेष महत्व था। कृषि आधारित समाज में सूर्य को जीवनदाता माना जाता था और यही कारण था कि सूर्य देव को समर्पित भव्य मंदिरों का निर्माण कराया जाता था। महोबा का सूर्य मंदिर उसी परंपरा का जीवंत उदाहरण माना जाता है।

बिना सीमेंट के बना स्थापत्य का अद्भुत नमूना

मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी निर्माण शैली है। यह विशाल संरचना ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित है और माना जाता है कि इसके निर्माण में सीमेंट या गारे का उपयोग नहीं किया गया। बड़े-बड़े पत्थरों को इस तरह जोड़ा गया कि एक हजार वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी मंदिर की मूल संरचना आज खड़ी दिखाई देती है।

यह मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली की वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। ऊँचे शिखर, अलंकृत आधार, पत्थरों पर उकेरी गई सुंदर आकृतियाँ और दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी उस समय के शिल्प कौशल को दर्शाती हैं। मंदिर की एक और विशेषता इसकी दिशा और संरचना को लेकर कही जाती है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, सूर्योदय की पहली किरण सीधे गर्भगृह तक पहुँचती थी और सूर्य देव की प्रतिमा को प्रकाशित करती थी। यद्यपि इस दावे पर विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है, लेकिन यह तथ्य मंदिर की लोकप्रियता और रहस्य को और बढ़ा देता है।

आक्रमणों की मार झेलकर भी बची रही पहचान

इतिहास के लंबे सफर में इस मंदिर ने कई उतार-चढ़ाव देखे। माना जाता है कि 1203 ईस्वी के आसपास कुतुबुद्दीन ऐबक की फौज ने धन और बहुमूल्य मूर्तियों की लालसा में इस मंदिर पर हमला किया। मंदिर को क्षति पहुँचाई गई और इसके कई हिस्सों को तोड़ने का प्रयास किया गया।

इसके बावजूद यह संरचना पूरी तरह नष्ट नहीं हो सकी। आज भी मंदिर परिसर और राहिल सागर के आसपास बिखरे हुए पत्थर तथा अवशेष उस दौर की कहानी सुनाते हैं। कई शिलाखंडों पर की गई नक्काशी अब भी स्पष्ट दिखाई देती है और यह बताती है कि अपने मूल स्वरूप में यह मंदिर कितना भव्य रहा होगा।

ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित है मंदिर की विशाल संरचना (फोटो साभार: टाइम्स ऑफ इंडिया)

समय के साथ उपेक्षा और प्राकृतिक क्षरण ने भी मंदिर को नुकसान पहुँचाया, लेकिन इसकी मूल पहचान आज भी बरकरार है। यही वजह है कि पुरातत्वविद इसे बुंदेलखंड की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल करते हैं।

सूर्य कुंड, रहस्य और धार्मिक आस्था

सूर्य मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित सूर्य कुंड भी लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। लगभग तीस फीट गहरे इस कुंड के बारे में स्थानीय लोगों का कहना है कि इसका पानी कभी पूरी तरह नहीं सूखता। श्रद्धालु यहाँ स्नान कर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं।

सूर्य मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित सूर्य कुंड (फोटो साभार: टाइम्स ऑफ इंडिया)

कुंड तक पहुँचने के लिए नीचे उतरती सीढ़ियाँ बनाई गई हैं, जो प्राचीन जल प्रबंधन प्रणाली की झलक भी दिखाती हैं। मंदिर परिसर में काली माता का एक प्राचीन मंदिर भी स्थित है, जिससे यह क्षेत्र केवल सूर्य उपासना तक सीमित नहीं रह जाता बल्कि एक विस्तृत धार्मिक परिसर का रूप ले लेता है।

बुंदेलखंड क्षेत्र में जल संरक्षण की जो परंपरा चंदेल राजाओं ने विकसित की थी, सूर्य कुंड और राहिल सागर उसके महत्वपूर्ण उदाहरण माने जाते हैं।

विश्व धरोहर बनने का सपना और भविष्य की संभावनाएँ

आज महोबा का सूर्य मंदिर एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसका गौरवशाली अतीत और संभावनाओं से भरा भविष्य एक-दूसरे से मिलते दिखाई देते हैं। स्थानीय समाज, इतिहास प्रेमी और प्रशासन सभी चाहते हैं कि इस धरोहर को वह पहचान मिले जिसकी यह हकदार है।

यदि यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में इसे स्थान मिलता है तो यह न केवल महोबा बल्कि पूरे बुंदेलखंड के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि होगी। इससे पर्यटन बढ़ेगा, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे और दुनिया को भारतीय स्थापत्य कला के एक ऐसे अध्याय से परिचित होने का अवसर मिलेगा जो अब तक अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहा है।

कोणार्क सूर्य मंदिर विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है, लेकिन महोबा का सूर्य मंदिर यह याद दिलाता है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत केवल प्रसिद्ध स्मारकों तक सीमित नहीं है। बुंदेलखंड की धरती पर खड़ा यह 1100 साल पुराना सूर्य मंदिर आज भी इतिहास, आस्था और अद्भुत वास्तुकला का जीवंत प्रतीक बनकर समय की गवाही दे रहा है।

संदर्भ के तौर पर कोणार्क सूर्य मंदिर के निर्माण काल (13वीं शताब्दी) और महोबा सूर्य मंदिर के 9वीं-10वीं शताब्दी के होने संबंधी ऐतिहासिक जानकारी विभिन्न स्रोतों में दर्ज है।

‘बेटा बीमार है तो मर जाए, पहले ₹500 दे’: अलीगढ़ में अकबर और उसके बेटों ने दलित परिवार पर बोला हमला, फाड़े महिला के कपड़े; पढ़ें- ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में क्या बोला पीड़ित परिवार

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में खड़ंजा बनाने के लिए ₹500 न देने को लेकर दलित युवक को पड़ोस में रहने वाले मुस्लिम परिवार ने बेरहमी से पीटा। दलित युवक ने बताया कि उनकी पत्नी को घर में घुसकर लाठी-डंडों और लात-घूँसों से मारा गया, जिसमें उनके कपड़े तक फट गए। बचाव में उतरे युवक ने को भी आरोपितों ने बेरहमी से पीटा।

पूरा विवाद हरदुआगंज थाना क्षेत्र के जदौला गाँव का है। पीड़ित दलित युवक आपबीती लेकर थाने पहुँचा। लेकिन पुलिस ने FIR दर्ज करने में देरी की, जिसके बाद विश्व हिंदू परिषद (VHP) के हस्तक्षेप के बाद SC/ST एक्ट, दंगा, महिला से छेड़छाड़ समेत विभिन्न धाराओं में FIR दर्ज कराई गई। FIR में अकबर खान के 4 बेटे मोहम्मद कासिम, नासिर, सलमान, आस मोहम्मद और उसकी बीवी परवीन के अलावा कुल 10 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया।

पूरा विवाद हरदुआगंज थाना क्षेत्र के जदौला गाँव का है। पीड़ित दलित युवक आपबीती लेकर थाने पहुँचा। लेकिन पुलिस ने FIR दर्ज करने में देरी की, जिसके बाद विश्व हिंदू परिषद (VHP) के हस्तक्षेप के बाद SC/ST एक्ट, दंगा, महिला से छेड़छाड़ समेत विभिन्न धाराओं में FIR दर्ज कराई गई। FIR में अकबर खान के 4 बेटे मोहम्मद कासिम, नासिर, सलमान, आस मोहम्मद और उसकी बीवी परवीन के अलावा कुल 10 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया।

इसके तुरंत बाद दूसरे पक्ष ने भी दलित युवक लवकुश, उनकी पत्नी प्रभा, उनके भाई दीपक समेत 11 नामजद और 15-20 अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराई। FIR में उन्होंने मारपीट और धमकी समेत तमाम आरोप लगाए।

ऑपइंडिया के पास दोनों पक्ष की FIR की कॉपी मौजूद हैं। इसके अलावा ऑपइंडिया ने पीड़ित दलित युवक लवकुश से बात भी की।

दलित युवक लवकुश ने क्या कहा?

जदौली गाँव में रहने वाले लवकुश मजदूरी कर अपना घर चलाते हैं। वे दिन का ₹700 कमाते हैं। उनके दो बेटे हैं। इनमें एक 4 साल का है और दूसरा अभी सिर्फ 5-6 महीने का ही है। उनकी पत्नी प्रभा घर पर रहकर अपने बच्चों की देखभाल करती हैं। लवकुश ने बताया कि उनके 4 साल के बेटे को पिछले दिनों टाइफाइड (Typhoid) हो गया था, जिसके चलते वह पिछले 10 दिन से काम पर नहीं गए थे। उनके काम पर न जाने के चलते घर की आर्थिक स्थिति भी खराब चल रही है।

गाँव में खरन्जे को उखाड़ डाला, फिर बनाने को माँगे पैसे

लवकुश ने बताया कि गाँव के प्रधान ने सड़क बनवाई थी। इसके चलते खड़ंजा नीचे चला गया है। यहाँ नाले का पानी भर जाता है, जिसके चलते समस्या होती है। इसके बाद पड़ोस के मुस्लिम परिवार ने पूरे खरन्जे को उखाड़ दिया, जिससे समस्या बढ़ गई।

अब आसपास के लोगों ने पैसा इकट्ठा कर खड़ंजा बनवाने का प्लानिंग की। सबके हिस्से में ₹500-₹500 आए। लवकुश से भी ₹500 माँगे गए। लेकिन उनके बेटे को टाइफाइड होने के चलते उन्होंने कहा कि वह ये पैसे कुछ दिन बाद में दे देंगे। इससे पड़ोस में रहने वाले अकबर की बीवी परवीन और लवकुश की पत्नी प्रभा में कहासुनी हो गई।

₹500 न देने पर लवकुश की पत्नी को घर में घुसकर पीटा

लवकुश ने बताया कि 27 मई 2026 की सुबह 8 बजे परवीन उनके घर में घुस गई और पैसे माँगने लगी। लवकुश की पत्नी प्रभा ने घर की आर्थिक स्थिति और बेटे की बीमारी के बारे में बताया तो परवीन ने कहा- मरा तो नहीं है न तेरा बेटा, मर क्यों नहीं जाता? बेटे के बारे में ऐसा सुन प्रभा को भी गुस्सा आ गया और दोनों की बहस शुरू हो गई। इस बीच परवीन ने अपने बेटों को बुला लिया।

परवीन के बेटों और उनकी बहुओं ने मिलकर प्रभा की बेरहमी से पिटाई की। प्रभा को लाठी-डंडों से पीटा गया, लात-घूँसों से पीटकर जमीन पर पटका गया। प्रभा के कपड़े तक फाड़े गए। बचाव में उतरे लवकुश पर भी डंडों से हमला किया गया। चीख-पुकार सुन आसपास के लोगों ने आकर उन्हें बचाया। इसके बाद आरोपित पक्ष ने धमकी देते हुए कहा- साले चम्हारों आज तो बच गए, दोबारा पकड़ में आए तो जाने से मार देंगे या गाँव से भगा देंगे।

मुस्लिम पक्ष ने छत से ईंट-पत्थर फेंके

इसके बाद भी मुस्लिम पक्ष ने दलित युवक पर प्रताड़ना जारी रखी। 30 मई 2026 को अपनी छत से ईंट-पत्थर फेंके गए। परवीन, उसके बेटे औऱ बहुओं ने मिलकर लवकुश के घर की ओर ईंट-पत्थर से हमला किया। इस घटना का वीडियो भी ऑपइंडिया के पास है, जिसमें दिख रहा है कि छत पर महिलाएँ ईंट इकट्ठा कर रही हैं और पत्थर बरसा रही हैं।

वहीं लवकुश और उसके भाई दीपक को इस हमले में चोटें आई हैं। उनके हाथ-सिर छिल गए हैं। वीडियो में दिख रहा है कि लवकुश बुरी हालत में खुद को बचाने का प्रयास कर रहा है। वहीं मुस्लिम पक्ष के लोगों ने अपने घर को भीतर से बंद कर लिया है। दूसरे ओर आसपास के खड़े गाँववाले तमाशा देख रहे हैं। सूचना पर मौके पर पुलिस भी पहुँची लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई।

लवकुश ने मुस्लिम पक्ष के 10 लोगों के खिलाफ कराई FIR

इसके बाद लवकुश ने खुद हरदुआगंज थाने जाकर पुलिस से शिकायत की, लेकिन पुलिस FIR दर्ज करने को तैयार नहीं हुई। लवकुश ने हिंदू संगठन VHP से संपर्क साधा, जिन्होंने पुलिस थाने में उसकी मदद की और FIR दर्ज करवाई। VHP ने बताया कि पीड़ित लवकुश जाटव समाज का है, जिस पर मुस्लिमों ने हमला किया है।

(फोटो साभार: FIR कॉपी)

पुलिस ने लवकुश की शिकायत के अनुसार संबंधित धाराओं में FIR दर्ज की है। FIR में अकबर खान के 4 बेटे मोहम्मद कासिम, नासिर, सलमान, आस मोहम्मद, परवीन, अकबर की बीवी परवीन, अकबर का साला अनीस, आस मोहम्मद की बीवी गुलफसा, असलम पुत्र इकबाल, शेरू पुत्र बादशाह, यामीन पुत्र लालखान के नाम शामिल हैं।

(फोटो साभार: FIR कॉपी)

इन पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम (SC/ST एक्ट) की धारा 3(2)(va), भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 191(2), धारा 333, 76, 351(3), 115(2) के तहत जाति के कारण अपराध, घर में घुसकर मारपीट, महिला के कपड़े उतारने की नीयत से हमला, आपराधिक धमकी, जानबूझकर चोट पहुँचाना जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

मुस्लिम पक्ष ने भी तुरंत कराई FIR

लवकुश के FIR करवाते ही तुरंत मुस्लिम पक्ष ने भी हरदुआगंज थाने पहुँचकर अपनी शिकायत दर्ज करवा दी। पुलिस ने भी मामले में तुरंत FIR दर्ज कर ली। मुस्लिम पक्ष ने शिकायत में बताया कि पड़ोस में रहने वाले लवकुश और उसके भाई दीपक ने लाठी-डंडों से मारपीट की है और घर पर ईंट-पत्थर भी फेंके हैं।

शिकायत के आधार पर पुलिस ने लवकुश, उसके भाई दीपक, लवकुश की पत्नी प्रभा, दीपक की पत्नी क्रांति, शेरपाल, गुड्डू, सोनू, पिर्मुखी, देवेन्द्र, राजकुमार समेत 15-20 अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की। इनके खिलाफ BNS की धारा 115(2), 125, 190, 191(2), 191(3), 324(4), 333, 351(2) के तहत जानबूझकर चोट पहुँचाना, दंगा, संपत्ति को नुकसान पहुँचा, घर में घुसकर मारपीट के आरोप लगाए हैं।

भारत-बांग्लादेश सीमा पर 600KM का इलाका सिक्योरिटी के लिहाज से डार्क जोन, अब मोदी सरकार बना रही फुल-प्रूफ व्यवस्था: जानें पश्चिम बंगाल सरकार दे रही कैसा सहयोग

भारत-बांग्लादेश सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में पश्चिम बंगाल सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार ने सीमा पर कंटीली तार की बाड़ लगाने और BSF के बुनियादी ढाँचे के विस्तार के लिए जमीन सौंपने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

राज्य सचिवालय नबान्न में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने BSF अधिकारियों की मौजूदगी में इसकी औपचारिक शुरुआत की। फिलहाल 27 किलोमीटर क्षेत्र के लिए जमीन ट्रांसफर की गई है, जिसमें 18 किलोमीटर हिस्से में बाड़ लगाई जाएगी और 9 किलोमीटर क्षेत्र में BSF चौकियाँ तथा अन्य जरूरी ढाँचे विकसित किए जाएँगे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत-बांग्लादेश सीमा की सुरक्षा केवल पश्चिम बंगाल ही नहीं बल्कि पूरे देश की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने दावा किया कि लंबे समय से लंबित सीमा सुरक्षा परियोजनाओं को अब तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा।

यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारत-बांग्लादेश सीमा का करीब 600 किलोमीटर हिस्सा अब भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जाता और सुरक्षा एजेंसियाँ इसे ‘डार्क जोन’ के रूप में देखती हैं।

1947 की रेडक्लिफ लाइन से शुरू हुई आज की चुनौती

भारत और बांग्लादेश के बीच मौजूद 4096 किलोमीटर लंबी सीमा का इतिहास 1947 के विभाजन से जुड़ा हुआ है। अंग्रेज न्यायविद सर सिरिल रेडक्लिफ ने महज कुछ हफ्तों में भारत और तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के बीच सीमा तय की थी।

17 अगस्त 1947 को घोषित की गई रेडक्लिफ लाइन ने बंगाल को दो हिस्सों में बाँट दिया। उस समय सीमांकन के लिए पुराने नक्शों और 1931 की जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया, जबकि जमीन पर हालात काफी बदल चुके थे।

इस जल्दबाजी में खींची गई सीमा ने गाँवों, खेतों, बाजारों और यहाँ तक कि परिवारों को भी दो देशों में बाँट दिया। नदियों, दलदली क्षेत्रों और बदलती जियोग्राफिकल परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

यही वजह है कि आज भी कई इलाकों में सीमा का प्रबंधन बेहद मुश्किल बना हुआ है। वर्तमान डार्क जोन और सीमा संबंधी कई विवादों की ऐतिहासिक जड़ें इसी रेडक्लिफ लाइन में मौजूद हैं।

क्या है 600 किलोमीटर का डार्क जोन?

भारत और बांग्लादेश के बीच कुल 4096 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो दुनिया की सबसे जटिल अंतरराष्ट्रीय सीमाओं में से एक मानी जाती है। यह सीमा पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, मेघालय, असम और मिजोरम से होकर गुजरती है। इनमें सबसे लंबी सीमा पश्चिम बंगाल में है, जिसकी लंबाई करीब 2217 किलोमीटर है।

पश्चिम बंगाल में लगभग 1600 किलोमीटर हिस्से में किसी न किसी रूप में बाड़बंदी हो चुकी है, लेकिन करीब 550 से 600 किलोमीटर क्षेत्र ऐसा है जहाँ अब भी पूरी तरह बाड़ नहीं लग पाई है। यही हिस्सा सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चिंता बना हुआ है। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, कूचबिहार और जलपाईगुड़ी जैसे सीमावर्ती जिले इस संवेदनशील क्षेत्र का हिस्सा हैं।

आखिर इसे डार्क जोन क्यों कहा जाता है?

डार्क जोन का मतलब सिर्फ अंधेरा इलाका नहीं बल्कि ऐसे क्षेत्रों को कहा जाता है जहाँ निगरानी करना बेहद कठिन है। कई हिस्सों में नदियाँ, दलदली जमीन, घने जंगल और दूर-दराज के गाँव मौजूद हैं। कुछ स्थानों पर मोबाइल नेटवर्क बहुत कमजोर है, जबकि कई जगह फ्लडलाइट्स और स्थायी सुरक्षा ढाँचे बनाना तकनीकी रूप से संभव नहीं हो पाया है।

मुर्शिदाबाद और मालदा में गंगा और पद्मा जैसी नदियाँ लगातार अपना रास्ता बदलती रहती हैं। ऐसे में स्थायी बाड़ लगाना मुश्किल हो जाता है। वहीं सुंदरबन के दलदली और मैंग्रोव क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। मानसून के दौरान स्थिति और भी जटिल हो जाती है क्योंकि तेज बहाव कई बार पहले से बने ढांचों को नुकसान पहुँचा देता है।

घुसपैठ और तस्करी के लिए क्यों संवेदनशील है यह इलाका?

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, सीमा का यह खुला हिस्सा लंबे समय से घुसपैठ और तस्करी की गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होता रहा है। रात के अंधेरे, कमजोर निगरानी और मुश्किल जियोग्राफिकल परिस्थितियों का फायदा उठाकर अवैध तरीके से सीमा पार करने की कोशिशें होती रही हैं।

इन इलाकों से मवेशी तस्करी, नकली भारतीय मुद्रा, नशीले पदार्थों, सोने और अन्य प्रतिबंधित सामानों की तस्करी के मामले सामने आते रहे हैं। नदी वाले क्षेत्रों में नावों के जरिए होने वाली तस्करी को रोकना सुरक्षा बलों के लिए विशेष चुनौती माना जाता है।

इसके अलावा मानव तस्करी भी एक गंभीर समस्या है। कई मामलों में महिलाओं और बच्चों को झाँसा देकर या अवैध नेटवर्क के जरिए सीमा पार ले जाने की कोशिश की जाती है। सुरक्षा एजेंसियाँ यह भी मानती हैं कि ऐसे खुले इलाकों का इस्तेमाल अपराधी और अन्य संदिग्ध तत्व भी कर सकते हैं।

BSF कैसे कर रही है निगरानी?

सीमा सुरक्षा बल ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए पारंपरिक सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया है। जहाँ कंटीली तार की बाड़ लगाना संभव नहीं है, वहाँ स्मार्ट फेंसिंग और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी पर जोर दिया जा रहा है।

सीमा के कई संवेदनशील हिस्सों में थर्मल कैमरे, इंफ्रारेड कैमरे, लेजर तकनीक और अत्याधुनिक सेंसर लगाए गए हैं। ये उपकरण रात के अंधेरे, घने कोहरे और खराब मौसम में भी संदिग्ध गतिविधियों का पता लगाने में मदद करते हैं।

इसके अलावा ड्रोन के जरिए निगरानी बढ़ाई गई है। सीमा पार से आने वाले संदिग्ध ड्रोनों पर नजर रखने के लिए एंटी-ड्रोन सिस्टम भी तैनात किए जा रहे हैं। नदी वाले क्षेत्रों में BSF की विशेष वाटर विंग स्पीड बोट और फ्लोटिंग बॉर्डर आउटपोस्ट्स के जरिए गश्त करती है।

भारत की ओर से BSF और बांग्लादेश की ओर से बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) सीमा सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालते हैं। दोनों देशों के बीच समन्वित सीमा प्रबंधन योजना के तहत नियमित फ्लैग मीटिंग, संयुक्त गश्त और सूचनाओं का आदान-प्रदान भी किया जाता है।

दशकों बाद भी क्यों नहीं सुलझी समस्या?

आजादी के लगभग आठ दशक बाद भी सीमा का यह हिस्सा पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सका है। इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण भूमि अधिग्रहण की जटिल प्रक्रिया है। घनी आबादी वाले क्षेत्रों में बाड़ लगाने के लिए किसानों और स्थानीय लोगों की जमीन की जरूरत पड़ती है, जिससे कई बार विवाद पैदा होते हैं।

दूसरी बड़ी चुनौती जियोग्राफिकल परिस्थितियाँ हैं। सुंदरबन के जंगल, दलदली इलाके और लगातार बदलने वाली नदी धाराएँ स्थायी बाड़बंदी को मुश्किल बना देती हैं। कई बार करोड़ों रुपए खर्च कर बनाई गई संरचनाएँ बाढ़ और कटाव की वजह से क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।

इसके अलावा सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले कुछ लोगों की आजीविका अनौपचारिक सीमा पार व्यापार पर भी निर्भर रही है। ऐसे में कई बार स्थानीय स्तर पर भी बाड़बंदी को लेकर विरोध देखने को मिलता है।

सीमा सुरक्षा को नई मजबूती

जानकारों की मानें तो कंटीली तार की बाड़ इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकती। जिन इलाकों में बाड़ लगाना संभव नहीं है, वहाँ डिजिटल फेंसिंग को मजबूत करना होगा। AI आधारित कैमरे, ग्राउंड सेंसर, सैटेलाइट निगरानी और स्मार्ट सर्विलांस सिस्टम भविष्य में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

इसके साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय, तेजी से भूमि हस्तांतरण और सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास भी जरूरी माना जा रहा है। स्थानीय लोगों को रोजगार और विकास के अवसर उपलब्ध कराकर उन्हें तस्करी और अवैध गतिविधियों से दूर रखना भी सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा हो सकता है।

भारत-बांग्लादेश सीमा का यह 600 किलोमीटर लंबा डार्क जोन लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा की कमजोर कड़ी माना जाता रहा है। अब पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा BSF को जमीन सौंपने की शुरुआत को इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

आने वाले समय में यदि बाड़बंदी, आधुनिक तकनीक और प्रशासनिक सहयोग साथ-साथ आगे बढ़ते हैं तो इस संवेदनशील क्षेत्र की सुरक्षा को काफी हद तक मजबूत किया जा सकता है।

‘द वायर’ के समर्थन में आई PM मोदी से बदसलूकी करने वाली नार्वे की प्रोपेगेंडाबाज हेले लिंग: जानें- कैसे विदेशी ‘एक्टिविस्ट’ और वामपंथी मीडिया मिलकर दे रहे भारत विरोधी नैरेटिव को हवा

PM मोदी के नॉर्वे दौरे के दौरान एक पब्लिसिटी स्टंट करके सुर्खियाँ बटोरने वाली नॉर्वे की तथाकथित ‘पत्रकार’ हेले लिंग ने वामपंथी प्रोपेगैंडा आउटलेट ‘द वायर’ का समर्थन किया है। उन्होंने भारत से जुड़ी जानकारी के लिए एक भरोसेमंद स्रोत के तौर ‘द वायर’ को माना है। इस समर्थन से ये साफ हो गया है कि पीएम मोदी के दौरे के दौरान नॉर्वे में जो हेले लिंग ने प्रधानमंत्री मोदी से बदसलूकी थी, उसकी पटकथा पहले ही राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने के लिए वामपंथी प्रोपेगेंडाबाजों ने लिख रखी थी

हेले लिंग के ‘द वायर’ को दिए गए समर्थन ने एक बार फिर इस बात की चर्चा छेड़ दी है कि भारत का वाम-उदारवादी मीडिया तंत्र विदेशी टिप्पणीकारों और प्रकाशनों का उपयोग करके भारत के लोकतांत्रिक संस्थानों और नेतृत्व को निशाना बनाने वाले दुष्प्रचार को बढ़ावा देता है।

ताजा विवाद तब शुरू हुआ जब द वायर ने शुक्रवार, 29 मई को X पर अपनी स्थापना के 11 साल पूरे होने का जश्न मनाते हुए एक पोस्ट किया, जबकि टेक फॉग और मेटा जैसे विवादों में भी यह पत्रिका फर्जी खबरों और गलत सूचनाओं से घिरी रही है। इस पोस्ट को साझा करते हुए नॉर्वेजियन पत्रकार हेले लिंग ने लिखा, “मैं द वायर की जितनी भी तारीफ करूँ कम है। भारत के बारे में पढ़ने के लिए मैं आगे भी इस पर ही भरोसा करूँगी।”

इस पोस्ट ने तुरंत लोगों का ध्यान आकर्षित किया, क्योंकि लिंग खुद इस महीने की शुरुआत में भारत को बदनाम करने की कोशिश कर चुकी हैं। उन्होंने जबरदस्ती प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए पीएम मोदी को परेशान करने की कोशिश की।

हेले लिंग कौन हैं, और वह अचानक इतनी प्रसिद्ध क्यों हो गईं?

नॉर्वेजियन प्रकाशन डैग्सविसन के साथ काम करने वाली हेले लिंग 18 मई तक सोशल मीडिया पर कोई नहीं जानता था। काफी कम उनके फॉलोवर्स थे। उन्होंने भारत-नॉर्वे के संयुक्त बयान कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी से बदसलूकी की।

उस समय, X पर लिंग के मुश्किल से 800 फॉलोअर्स थे, और उनका अकाउंट महीनों से निष्क्रिय था। हालांकि, भारत में कथित ‘मानवाधिकार उल्लंघन’ के संबंध में प्रधानमंत्री मोदी से सवाल पूछने को लेकर वामपंथी मीडिया काफी उत्साहित दिखा। घटना के वीडियो भारतीय विपक्षी हलकों और वाम-उदारवादी सोशल मीडिया नेटवर्क पर तेजी से वायरल किया गया।

संयुक्त बयान के बाद जब प्रधानमंत्री मोदी बिना कोई जवाब दिए चले गए, तो लिंग ने चिल्लाकर कहा, “प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवाल का जवाब क्यों नहीं देते?” बाद में उन्होंने गर्व से ऑनलाइन पोस्ट किया कि उन्हें उनसे जवाब की उम्मीद भी नहीं थी।

इसके तुरंत बाद वह मोदी विरोधी टिप्पणीकारों और मीडिया में छा गई। कई विपक्षी नेताओं ने भी उनके वीडियो को खूब प्रचारित किया। कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने क्लिप साझा करते हुए लिखा, “जब छिपाने के लिए कुछ नहीं होता, तो डरने के लिए भी कुछ नहीं होता।”

(साभार-एक्स)

टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा और प्रचारक राणा अय्यूब ने भी लिंग की सराहना की। राणा अय्यूब ने पोस्ट किया, “प्रधानमंत्री मोदी की नॉर्वे यात्रा के दौरान भारतीय लोकतंत्र का प्रदर्शन देखने को मिला।”

नॉर्वे स्थित भारतीय दूतावास ने बाद में स्पष्ट किया कि यह भारत और नॉर्वे के प्रधानमंत्रियों का संयुक्त बयान था। पत्रकारों के सवाल जवाब और मीडिया ब्रीफिंग शाम में विदेश मंत्रालय को करना पहले से तय था।

लिंग की अचानक भारत में बढ़ी दिलचस्पी

खास बात यह है कि लिंग ने पहले भारत को गहराई से अध्ययन भी नहीं किया था। भारत पर उसकी अधिकांश कवरेज टैरिफ, व्यापार या भूकंप जैसी सामान्य वैश्विक घटनाओं से जुड़ी थी। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान वह अचानक भारत के लोकतंत्र और राजनीतिक व्यवस्था पर सवाल उठाने लगी। खबरों को आक्रामक रूप से प्रकाशित करना शुरू कर दिया।

आलोचकों ने लिंग की सोशल मीडिया गतिविधियों की भी जानकारी दी। मई 2026 में उसने विवाद पर सोशल मीडिया में बहस से ठीक पहले, एक्स प्रीमियम वेरिफिकेशन खरीदा था। इससे साबित होता है कि उनके इर्द-गिर्द फैला वायरल अभियान स्वाभाविक नहीं था और इसे राजनीतिक संदेश के लिए सुनियोजित तरीके से बढ़ाया गया था। भारत की राजनीति और लोकतंत्र में अचानक गहरी दिलचस्पी दिखाने से पहले उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर भारत के बारे में शायद ही कोई पोस्ट किया था, जिससे इस बात को लेकर अटकलें तेज हो गईं कि भारतीय मामलों पर उनकी इस नई सक्रियता के पीछे कौन या क्या हो सकता है।

(साभार-एक्स)

विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने लिंग को करारा जवाब दिया

नॉर्वे स्थित भारतीय दूतावास ने बाद में लिंग को विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित आधिकारिक मीडिया ब्रीफिंग में आमंत्रित किया । इस बातचीत के दौरान, लिंग ने एक बार फिर लोकतंत्र और मानवाधिकारों से संबंधित जटिल प्रश्न पूछकर भारतीय अधिकारियों को घेरने का प्रयास किया।

हालाँकि, विदेश मंत्रालय के सचिव सिबी जॉर्ज ने दृढ़ता से जवाब दिया और उन्हें बार-बार याद दिलाया कि जब वह जवाब दे रहे हों तो उन्हें बीच में दखल नहीं देना चाहिए।

जॉर्ज ने कहा, “आपने मुझसे सवाल पूछा है, मुझे इसका जवाब देने दीजिए,”

जब लिंग ने बार-बार टोकना जारी रखा, तो उन्होंने कहा, “कृपया मुझे बीच में न टोकें। यह मेरी प्रेस कॉन्फ्रेंस है।”

जॉर्ज ने भारत के संवैधानिक ढाँचे, व्यापक मतदाता भागीदारी और कोविड महामारी और जी20 की अध्यक्षता के दौरान देश के वैश्विक योगदान का हवाला देते हुए भारत की लोकतांत्रिक साख का बचाव किया।

उन्होंने कहा, “हमें इस बात पर गर्व है कि हम 5000 साल पुरानी सभ्यता वाला देश हैं।”

उन्होंने चुनिंदा रिपोर्टिंग को लेकर भी कहा, “लोग कुछ अज्ञानी और नासमझ गैर-सरकारी संगठनों द्वारा प्रकाशित एक-दो समाचार रिपोर्ट पढ़ते हैं और फिर आकर सवाल पूछते हैं। चिंता मत कीजिए। हमें लोकतंत्र होने पर गर्व है।”

जब तक जॉर्ज ने अपना विस्तृत जवाब पूरा किया, तब तक खबरों के अनुसार लिंग कमरे से बाहर जा चुकी थी।

फर्जी खबरें फैलाने और मनगढ़ंत कहानियां गढ़ने में उस्ताद है ‘द वायर’

हेले लिंग ने द वायर का समर्थन किया है। उसके ताजा बयान से ‘द वायर’ की पत्रकारिता से जुड़े रिकॉर्ड की आलोचना फिर से तेज हो गई है। पिछले कई वर्षों से, द वायर पर भ्रामक रिपोर्टें, अधूरी पुष्टि वाली खबरें और भारतीय सरकार तथा हिंदू संगठनों को निशाना बनाने वाली राजनीतिक रूप से प्रेरित कहानियाँ प्रकाशित करने के आरोप लगते रहे हैं।

यह प्लेटफॉर्म अक्सर तथ्यात्मक रिपोर्टिंग के बजाय कथा-निर्माण को प्राथमिकता देता है, खासकर संवेदनशील सांप्रदायिक या राजनीतिक मुद्दों में। इस प्रकाशन को पहले भी कई विवादास्पद रिपोर्टों के लिए कानूनी नोटिस, मानहानि के मुकदमे और सार्वजनिक खंडन का सामना करना पड़ा है।

इसके सबसे चर्चित विवादों में से एक गृह मंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह को निशाना बनाने वाली एक रिपोर्ट से जुड़ा था। इस रिपोर्ट के कारण द वायर के खिलाफ 100 करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा दायर किया गया।

एक और बड़ा विवाद तब हुआ, जब इस प्लेटफॉर्म ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल पर पीरामल समूह में निवेश को लेकर वित्तीय गड़बड़ी का आरोप लगाया गया। इसमें दावा किया गया था कि उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय को पूरी तरह से अंधेरे में रखा।

पीरामल समूह ने तुरंत एक आधिकारिक बयान जारी कर रिपोर्ट को ‘पूरी तरह से निराधार’ और ‘सिद्धांतहीन’ बताया। स्वतंत्र मीडिया निगरानी संस्थाओं ने बाद में रिपोर्ट में वित्तीय गडबड़ी की बात को हटा कर संरचनात्मक अनियमितता की बात की। पोर्टल ने शिरडी इंडस्ट्रीज नामक एक डिफॉल्टिंग कंपनी के बारे में रोहिणी सिंह द्वारा लिखे गए एक लेख में गोयल पर फिर से निशाना साधा, लेकिन बुनियादी तथ्य-जाँच से पता चला कि संबंधित कॉर्पोरेट ऋण गोयल के सार्वजनिक पद संभालने से वर्षों पहले लिए गए थे।

केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) ने भी अतीत में अडानी समूह के बारे में ‘तथ्यात्मक और कानूनी रूप से गलत’ रिपोर्टिंग के लिए द वायर की सार्वजनिक रूप से आलोचना की थी।

इस प्लेटफॉर्म को इससे जुड़े कुछ पत्रकारों और टिप्पणीकारों के आचरण और रिपोर्टिंग शैली के लिए भी बार-बार आलोचना का सामना करना पड़ा।

यह प्रकाशन वस्तुनिष्ठ रिपोर्टिंग की बजाय कथा गढ़ने को प्राथमिकता देने की अपनी आदत के लिए जाना जाता है, खासकर जब बात मुस्लिम समुदाय के सदस्यों द्वारा किए गए जघन्य अपराधों की हो। वर्षों से यह संगठन लगातार ऐसी घटनाओं को छिपाने का प्रयास करता रहा है अक्सर अपराधियों को पीड़ित और वास्तविक पीड़ितों को हमलावर के रूप में पेश करता है।

यह पैटर्न नया नहीं है। 2002 के गोधरा नरसंहार और 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों से लेकर उदयपुर में कन्हैयालाल की क्रूर हत्या तक, ‘द वायर’ का इतिहास रहा है कि वह प्रतिक्रियावादी हिंदू आक्रोश को उन इस्लामी हमलों से कहीं बड़ा खतरा बताता है, जिन्होंने असल में आक्रोश को जन्म दिया था।

समन्वय और वैश्विक कथा-निर्माण से संबंधित प्रश्न

हेले लिंग ने जिस तरह से द वायर पर अपना विश्वास जताया है। इससे ये सवाल उठ रहा है कि कैसे कुछ अंतरराष्ट्रीय प्रचारक, तथाकथित पत्रकार और द वायर और न्यूजलॉन्ड्री जैसे वामपंथी भारतीय मीडिया के कुछ वर्ग मिलकर अक्सर भारत विरोधी आख्यानों को बढ़ावा देते हैं।

नॉर्वे यात्रा के दौरान कुछ भारतीय पत्रकारों और लिंग के बीच आपसी साँठगाँठ पर भी सवाल उठाए गए। लिंग ने हिंदू पत्रकार सुहासिनी हैदर से जुड़े वीडियो साझा किए, वहीं हैदर ने भी लिंग के वीडियो को ऑनलाइन प्रसारित किया।

इस तरह की घटनाएँ दर्शाती हैं कि कैसे भारत-विरोधी प्रोपेगेंडा प्रचारित करने वाले वैश्विक संस्थाएँ और लोग चुनिंदा भारतीय मीडिया प्लेटफार्मों पर तेजी से निर्भर होते जा रहे हैं।

द वायर और इसी तरह के कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म अक्सर उन विदेशी टिप्पणीकारों के लिए संदर्भ बिंदु बन जाते हैं जो वैश्विक मंच पर भारत को निशाना बनाना चाहते हैं।

इसलिए लिंग के समर्थन को लेकर खड़ा विवाद महज एक सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं रह गया है। यह एक व्यापक तंत्र को दर्शाता है जहाँ विदेशी टिप्पणीकार, विपक्षी राजनेता, सक्रिय पत्रकार और वैचारिक मीडिया मंच मिलकर भारत की छवि और संस्थानों के खिलाफ वैश्विक स्तर पर बयानबाजी करते हैं।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी, केजरीवाल-मान-सिसोदिया के साथ तस्वीरें: कौन है AAP नेता अशोक ओझा, जो अपनी ही पार्टी के नेताओं को IB के नाम पर धमकाने के आरोप में हुआ गिरफ्तार

गुजरात में आईबी (इंटेलिजेंस ब्यूरो) के नाम पर आम आदमी पार्टी (AAP) के नेताओं और कार्यकर्ताओं को धमकियाँ दिए जाने का मुद्दा उठाकर अरविंद केजरीवाल, गोपाल इटालिया और दुर्गेश पाठक ने भारी हंगामा खड़ा किया था। सोशल मीडिया पर पोस्ट की गईं, सवाल उठाए गए और पूरी घटना को राजनीतिक रंग दिया गया। लेकिन जाँच आगे बढ़ते ही पूरा खेल पलट गया। जिस ‘आईबी कॉल’ को लेकर परोक्ष रूप से सरकार और प्रशासन पर निशाना साधा जा रहा था, उसमें अब आप (AAP) का वडोदरा शहर अध्यक्ष अशोक ओझा ही आरोपित के रूप में सामने आया है।

खास बात यह है कि अशोक ओझा कोई ऐसा चेहरा नहीं है जिसे पार्टी में कोई न जानता हो। गुजरात में आप का संगठन खड़ा करने की प्रक्रिया के दौरान अशोक ओझा लगातार पार्टी के शीर्ष नेताओं के आसपास देखा जाता रहा है। वह लंबे समय से गुजरात आप में सक्रिय है और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक उसकी सीधी पहुँच है।

अरविंद केजरीवालके साथ अशोक ओझा

अरविंद केजरीवाल से लेकर इसुदान गढ़वी, गोपाल इटालिया और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान तथा मनीष सिसोदिया तक, अशोक ओझा कई मौकों पर पार्टी के बड़े चेहरों के साथ नजर आया है। गुजरात में पार्टी संगठन के विस्तार के काम के दौरान भी वह सक्रिय रहा और कई बार दिल्ली जाकर भी पार्टी का काम संभाला।

गोपाल राय और भगवंत मान के साथ अशोक ओझा

गुजरात आप के संगठन से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में उसकी उपस्थिति देखी गई है। पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं के साथ उसके संपर्कों और नजदीकी के प्रमाण के रूप में कई तस्वीरें और कार्यक्रमों के रिकॉर्ड मौजूद हैं। गुजरात में आप के प्रभारी के रूप में काम कर चुके गोपाल राय के साथ भी वह कई बार देखा गया था। संक्षेप में कहें तो अशोक ओझा केवल शहर स्तर का पदाधिकारी नहीं था, बल्कि पार्टी के बड़े नेताओं के साथ सीधा संपर्क रखने वाला और संगठन में पहचान रखने वाला चेहरा था।

मनीष सिसोदिया और मनोज सोरठिया के साथ अशोक ओझा

इसके अलावा गुजरात के आम आदमी पार्टी के कई नेताओं के साथ भी उसके अच्छे संबंध हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष इसुदान गढ़वी के साथ भी उसके संबंध करीबी हैं। इसके अलावा गोपाल इटालिया और मनोज सोरठिया के साथ भी वह कई बार दिखाई देता है। इन सभी नेताओं के साथ उसकी तस्वीरें भी इस समय उपलब्ध हैं।

क्या है पूरा मामला, जिसपर राजनीतिक रोटियाँ सेंक रही थी केजरीवाल एंड कंपनी

इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं ने दावा करना शुरू किया कि गुजरात में उनके कार्यकर्ताओं और नेताओं को इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के नाम पर फोन करके धमकाया जा रहा है। मामला तब और ज्यादा चर्चा में आया जब दिल्ली के पूर्व विधायक और आप नेता दुर्गेश पाठक ने सोशल मीडिया पर सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि गुजरात में काम कर रहे आप कार्यकर्ताओं को एक विशेष नंबर से फोन आ रहे हैं और फोन करने वाला खुद को आईबी का अधिकारी बता रहा है।

कुछ ही समय में आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी इस मुद्दे को हाथ में ले लिया। केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके दावा किया था कि उनके एक कार्यकर्ता को इस प्रकार का फोन आया था। उन्होंने आगे यह भी दावा किया था कि उन्होंने खुद उस नंबर पर फोन करके पूछा था कि क्या वे आईबी से बोल रहे हैं? और सामने से सकारात्मक जवाब मिलने के बाद जैसे ही उन्होंने बताया कि वे अरविंद केजरीवाल बोल रहे हैं, तो फोन काट दिया गया। इसके बाद केजरीवाल ने सार्वजनिक रूप से सवाल किया था कि एक राज्य से दूसरे राज्य में राजनीतिक काम करने जाने वाले नागरिकों का आईबी द्वारा वेरिफिकेशन किस कानून के तहत किया जाता है।

आप के अन्य नेताओं ने भी इस मुद्दे को आगे बढ़ाया। सोशल मीडिया पर पोस्ट की गईं, बयान दिए गए और पूरे मामले को ऐसा रंग दिया गया जैसे कोई सरकारी एजेंसी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को निशाना बना रही हो। परिणामस्वरूप यह मुद्दा राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया।

हालाँकि इस बीच आणंद के आप कार्यकर्ता केशव चौहान को भी इसी तरह का फोन आने की बात कहे जाने पर मामला पुलिस तक पहुँच गया। केशव चौहान ने आणंद साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर साइबर क्राइम पुलिस ने मोबाइल नंबर, कॉल डिटेल्स और तकनीकी डेटा की जाँच शुरू की।

जांच के दौरान सबसे पहला चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब जिस नंबर को लेकर हंगामा मचाया जा रहा था, वह नंबर आणंद के नितिन डोबरिया के नाम पर होने की बात सामने आई। पुलिस ने जब नितिन डोबरिया से पूछताछ शुरू की तो पूरी कहानी ने एक अलग ही मोड़ ले लिया। पूछताछ के दौरान नितिन डोबरिया ने बताया कि उसने वडोदरा शहर आप अध्यक्ष अशोक ओझा के कहने पर फोन किए थे और कुछ मामलों में खुद को आईबी अधिकारी के रूप में पेश किया था।

इस खुलासे के बाद पुलिस ने अशोक ओझा से भी पूछताछ शुरू की। जिसके बाद जाँच में सामने आया कि यह पूरा मामला किसी बाहरी एजेंसी या राजनीतिक विरोधियों से जुड़ा नहीं था, बल्कि आप की आंतरिक गुटबाजी और संगठन के भीतर की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से जुड़ा हुआ था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली के नेता दुर्गेश पाठक को वडोदरा और गुजरात में अधिक सक्रिय भूमिका दिए जाने के बाद स्थानीय स्तर पर असंतोष पैदा हुआ था। जाँच में यह दावा किया गया कि अशोक ओझा को डर था कि केंद्रीय नेतृत्व के बढ़ते हस्तक्षेप से स्थानीय संगठन में उसका वर्चस्व कम हो सकता है। इसी वजह से फर्जी आईबी अधिकारी का खेल रचा गया था, ताकि कुछ नेताओं पर दबाव बनाया जा सके।

अंततः जिस मुद्दे पर आप के शीर्ष नेताओं ने सार्वजनिक रूप से हंगामा मचाया था, जिस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर सरकार और प्रशासन के खिलाफ सवाल उठाए गए थे, उसी मामले में अब आप के अपने ही एक शहर अध्यक्ष और उसके साथी की गिरफ्तारी होने की बात सामने आई है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट ऑपइंडिया गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

जनगणना में मातृभाषा का एक जवाब तय करता है देश का बजट, शिक्षा नीति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व: जानिए उर्दू-अरबी से लेकर 19000 भाषाई पहचान के पीछे की पूरी कहानी

कल्पना कीजिए कि जनगणना अधिकारी आपके घर आता है और आपसे एक साधारण-सा सवाल पूछता है ‘आपकी मातृभाषा क्या है?’ आप बिना ज्यादा सोचे जवाब दे देते हैं। शायद हिंदी, उर्दू, भोजपुरी, मैथिली, तमिल या कोई दूसरी भाषा।

आपको लगता है कि यह सिर्फ एक औपचारिक जानकारी है, लेकिन हकीकत में आपके द्वारा बोला गया यह एक शब्द आने वाले वर्षों में सरकारी नीतियों, स्कूलों, शिक्षकों की भर्ती, भाषा अकादमियों के बजट और यहाँ तक कि राजनीति तक को प्रभावित कर सकता है।

भारत जैसे विशाल देश में जनगणना सिर्फ लोगों की गिनती नहीं है। यह सरकार के लिए एक ऐसा दस्तावेज है जो बताता है कि देश किस दिशा में बदल रहा है। कितने लोग कौन-सी भाषा बोलते हैं, किस राज्य में किस भाषा का प्रभाव बढ़ रहा है, किन भाषाओं को संरक्षण की जरूरत है और किन भाषाओं के आधार पर नई योजनाएँ बनाई जा सकती हैं, इन सभी सवालों के जवाब जनगणना से ही निकलते हैं।

यही वजह है कि हर जनगणना के बाद भाषा से जुड़े आँकड़े राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाते हैं। कोई भाषा समूह अपनी संख्या बढ़ने को अपनी ताकत बताता है, तो कोई यह सवाल उठाता है कि आखिर इन आँकड़ों का इस्तेमाल बाद में कहाँ और कैसे होता है। उर्दू और अरबी को लेकर होने वाली बहस भी इसी बड़े सवाल का हिस्सा है।

19 हजार से ज्यादा मातृभाषाएँ, लेकिन आखिर सरकार गिनती कैसे करती है?

अधिकांश लोगों को लगता है कि भारत में कुछ दर्जन भाषाएँ ही होंगी, लेकिन 2011 की जनगणना में लोगों ने अपनी मातृभाषा के रूप में 19,569 अलग-अलग नाम बताए थे। इनमें भाषाएँ भी थीं, बोलियाँ भी थीं और कई स्थानीय नाम भी शामिल थे।

यहीं से जनगणना का सबसे दिलचस्प और महत्वपूर्ण हिस्सा शुरू होता है। सरकार इन सभी जवाबों को ज्यों का त्यों नहीं मान लेती। भाषाविद, विशेषज्ञ और जनगणना अधिकारी इन नामों की जाँच करते हैं, उन्हें वर्गीकृत करते हैं और देखते हैं कि कौन-सी बोली किस बड़ी भाषा से जुड़ी हुई है।

इस पूरी प्रक्रिया के बाद 19,569 नामों को व्यवस्थित कर 1369 मानकीकृत मातृभाषाओं में बदला गया। इनमें से केवल वे भाषाएँ अलग श्रेणी में रखी गईं जिन्हें कम से कम 10,000 लोग बोलते थे। इस तरह देश में 121 भाषाएँ ऐसी पाई गईं जिन्हें 10,000 से ज्यादा लोग बोलते हैं।

यही वह डेटा है जो बाद में सरकारी मंत्रालयों, शिक्षा विभागों, भाषा आयोगों और नीति निर्माताओं तक पहुँचता है। दूसरे शब्दों में कहें तो किसी भाषा की पहचान और उसकी सरकारी हैसियत काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि जनगणना में उसकी उपस्थिति कितनी मजबूत दिखाई देती है।

भाषा की गिनती आखिर इतनी महत्वपूर्ण क्यों है? सरकार इन आँकड़ों का क्या करती है?

बहुत से लोगों के मन में सवाल आता है कि आखिर सरकार को यह जानने की जरूरत ही क्यों पड़ती है कि कौन-सी भाषा कितने लोग बोलते हैं। इसका जवाब सीधा है नीतियाँ बनाने के लिए।

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 121 भाषाएँ दर्ज की गई थीं। इनमें 22 अनुसूचित भाषाएँ और 99 गैर-अनुसूचित भाषाएँ थीं। सरकार इन आंकड़ों का इस्तेमाल यह समझने के लिए करती है कि किन क्षेत्रों में किस भाषा में शिक्षा की जरूरत है, किस भाषा में सरकारी सेवाएँ उपलब्ध करानी चाहिए और किन भाषाओं के संरक्षण पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

उदाहरण के लिए अगर किसी जिले में बड़ी संख्या में लोग उर्दू बोलते हैं तो वहाँ उर्दू माध्यम की कक्षाओं, उर्दू शिक्षकों और उर्दू में शैक्षणिक सामग्री की माँग बढ़ सकती है। इसी तरह अगर किसी राज्य में किसी क्षेत्रीय भाषा के बोलने वालों की संख्या तेजी से बढ़ती है तो उस भाषा में सरकारी वेबसाइट, सूचना सामग्री और सार्वजनिक सेवाएँ उपलब्ध कराने की जरूरत महसूस होती है।

आज डिजिटल युग में इन आँकड़ों का महत्व और बढ़ गया है। सरकारी ऐप, ऑनलाइन पोर्टल, डिजिटल भुगतान सेवाएँ और AI आधारित प्लेटफॉर्म भी भाषाई डेटा के आधार पर विकसित किए जा रहे हैं। यानी जनगणना का डेटा सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधे सरकारी फैसलों और बजट आवंटन को प्रभावित करता है।

अनुसूचित भाषाएँ क्या होती हैं और उर्दू को विशेष महत्व क्यों मिलता है?

भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को शामिल किया गया है। इनमें हिंदी, बांग्ला, तमिल, तेलुगु, मराठी, गुजराती, पंजाबी, कन्नड़, मलयालम, उर्दू और अन्य भाषाएँ शामिल हैं।

इन भाषाओं को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है। इसका मतलब यह नहीं कि बाकी भाषाएँ महत्वहीन हैं, लेकिन अनुसूचित भाषाओं को सरकारी स्तर पर कुछ अतिरिक्त अवसर और संरक्षण मिल सकता है।

उदाहरण के लिए संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और कई अन्य परीक्षाओं में इन भाषाओं का उपयोग किया जा सकता है। साहित्य, अनुवाद, शिक्षा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी इन्हें विशेष महत्व मिलता है।

उर्दू इसी सूची में शामिल है। यही कारण है कि उर्दू को लेकर अक्सर राजनीतिक और सामाजिक बहस देखने को मिलती है। कुछ राज्यों में उर्दू शिक्षकों की भर्ती होती है, उर्दू संस्थान चलाया जाता हैं और उर्दू साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए बजट आवंटित किया जाता है।

समर्थकों का कहना है कि यह संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त भाषा है, इसलिए उसका संरक्षण सरकार की जिम्मेदारी है। दूसरी ओर आलोचक पूछते हैं कि क्या इन योजनाओं का लाभ वास्तव में भाषा को मिल रहा है या फिर इन्हें राजनीतिक संदेश देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यही वह जगह है जहाँ भाषा, पहचान और राजनीति एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।

अरबी, उर्दू और दूसरी भाषाओं का सवाल

जब भी भाषा की राजनीति और सरकारी मान्यता की चर्चा होती है, तब एक सवाल बार-बार उठता है कि अगर उर्दू को संवैधानिक मान्यता मिल सकती है तो भोजपुरी, राजस्थानी, गढ़वाली या दूसरी भाषाओं को क्यों नहीं। इसका जवाब काफी हद तक जनगणना के आंकड़ों और भाषाई आबादी से जुड़ा होता है।

किसी भाषा को बोलने वालों की संख्या जितनी अधिक होती है, उसकी मान्यता, प्रतिनिधित्व और सरकारी सुविधाओं की माँग उतनी ही मजबूत मानी जाती है। यही वजह है कि जनगणना के दौरान भाषाई आंकड़ों को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है और कई भाषाई संगठन लोगों से अपनी मातृभाषा सही नाम से दर्ज कराने की अपील करते हैं।

इसी संदर्भ में उर्दू और अरबी का उदाहरण अक्सर चर्चा में आता है। दो भाषाएँ पूरी तरह अलग हैं। उर्दू भारत की आठवीं अनुसूची में शामिल एक मान्यता प्राप्त भाषा है, जबकि अरबी को यह दर्जा प्राप्त नहीं है।

2011 की भाषाई जनगणना के अनुसार अरबी बोलने वालों की संख्या लगभग 55 हजार दर्ज की गई थी, जबकि उर्दू बोलने वालों की संख्या करोड़ों में है। यही बड़ा कारण है कि दोनों भाषाओं की सरकारी और संवैधानिक स्थिति अलग-अलग है।

अरबी का उपयोग मुख्य रूप से इस्लामी ग्रंथ, इस्लामी साहित्य और कुछ विशेष शैक्षणिक संस्थानों तक सीमित है। इसके विपरीत उर्दू भारत के कई राज्यों में बोली, पढ़ी और लिखी जाती है तथा उसका अपना साहित्य, पत्रकारिता, कविता और सांस्कृतिक इतिहास मौजूद है। इसी आधार पर उर्दू से जुड़ी विभिन्न सरकारी योजनाएँ और संस्थागत व्यवस्थाएँ चलाई जाति हैं।

भाषाई पहचान और जनसंख्या के महत्व को समझने के लिए मैथिली, बोडो, डोगरी और संथाली का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। लंबे आंदोलनों और पर्याप्त भाषाई आधार के बाद इन चार भाषाओं को 2004 में आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था। इससे साफ होता है कि भाषा केवल सांस्कृतिक पहचान का विषय नहीं रहती, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सरकारी संसाधनों, शिक्षा और प्रशासनिक मान्यता से भी जुड़ जाती है।

यही कारण है कि उर्दू और अरबी को अक्सर एक साथ जोड़कर देखे जाने के बावजूद उनकी संवैधानिक स्थिति, उपयोग और भाषाई जनसंख्या में बड़ा अंतर है। किसी भी भाषाई बहस को समझने के लिए इन तथ्यों और जनगणना के आंकड़ों को अलग-अलग नज़रिए से देखना जरूरी है।

भाषा संबंधी जनगणना का डेटा कहाँ-कहाँ इस्तेमाल होता है?

अक्सर लोग सोचते हैं कि भाषा संबंधी आँकड़े सरकारी फाइलों में बंद हो जाते होंगे। लेकिन सच इससे  बिल्कुल अलग है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के बाद मातृभाषा आधारित शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया है। इसका मतलब है कि सरकार को यह जानना जरूरी है कि किस क्षेत्र में कौन-सी भाषा बोली जाती है।

इसी डेटा के आधार पर पाठ्य पुस्तकें तैयार होती हैं, शिक्षकों की भर्ती होती है और कई जगह स्थानीय भाषाओं में पढ़ाई शुरू की जाती है। लेकिन अब मामला सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं है।

AI और डिजिटल तकनीक के दौर में भाषाई डेटा की अहमियत और बढ़ गई है। 2024-25 में आदिवासी भाषाओं के लिए AI आधारित अनुवाद तकनीक विकसित करने के लिए 3.12 करोड़ रुपए की परियोजना को मंजूरी दी गई। इसका उद्देश्य अंग्रेजी और हिंदी से जनजातीय भाषाओं तथा जनजातीय भाषाओं से हिंदी-अंग्रेजी में अनुवाद को आसान बनाना है।

सरकारी ऐप, वेबसाइट, डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन सेवाएँ भी अब भाषाई डेटा के आधार पर विकसित की जा रही हैं। यानी जनगणना में दर्ज एक भाषा आने वाले वर्षों में तकनीकी विकास का हिस्सा भी बन सकती है।

क्या जनगणना के आँकड़े राजनीति को प्रभावित करते हैं?

लोकतंत्र में संख्या की अपनी ताकत होती है। जिस समूह की संख्या अधिक होती है, उसकी माँगों को राजनीतिक दल अधिक गंभीरता से लेते हैं। यही कारण है कि भाषा के आँकड़े भी राजनीतिक महत्व रखते हैं।

मान लीजिए कि किसी भाषा को बोलने वालों की संख्या एक राज्य में तेजी से बढ़ती दिखाई देती है। ऐसे में उस भाषा को लेकर नई माँगें उठ सकती हैं, जैसे स्कूलों में पढ़ाई, सरकारी नौकरियों में अवसर, सांस्कृतिक संस्थान या सरकारी सहायता।

यही वजह है कि कई भाषाई संगठन लोगों से अपील करते हैं कि वे जनगणना में अपनी भाषा सही तरीके से दर्ज कराएँ। उन्हें पता होता है कि आने वाले वर्षों में यही आँकड़े उनके पक्ष में तर्क बन सकते हैं।

लेकिन यह भी सच है कि केवल संख्या के आधार पर कोई नीति नहीं बनती। सरकारें प्रशासनिक जरूरत, संवैधानिक प्रावधान, शिक्षा व्यवस्था और उपलब्ध संसाधनों को भी ध्यान में रखती हैं। फिर भी जनगणना के आँकड़े किसी भी बहस की शुरुआती नींव जरूर बन जाते हैं।

आखिर आम आदमी को इससे क्या फर्क पड़ता है?

कई लोगों को लगता है कि भाषा की गिनती केवल सरकारी फाइलों का विषय है, लेकिन इसका असर सीधे आम नागरिकों तक पहुँचता है। आपके बच्चे को किस भाषा में किताब मिलेगी, किसी क्षेत्र में किस भाषा के शिक्षक नियुक्त होंगे, सरकारी वेबसाइट किस भाषा में उपलब्ध होगी, प्रतियोगी परीक्षाओं में कौन-कौन से भाषा विकल्प होंगे और किन भाषाओं के संरक्षण के लिए बजट दिया जाएगा।

इन सभी सवालों का संबंध कहीं न कहीं भाषाई आंकड़ों से जुड़ा होता है। यही कारण है कि जनगणना में दिया गया एक छोटा-सा जवाब आगे चलकर बड़े फैसलों का आधार बन सकता है। भाषा की गिनती केवल सांख्यिकी नहीं, बल्कि शिक्षा, संस्कृति, प्रशासन और राजनीति के भविष्य का संकेत भी होती है।

भारत जैसे बहुभाषी देश में जनगणना हमें यह समझने का मौका देती है कि हमारी भाषाएँ कहाँ खड़ी हैं, कौन-सी भाषाएँ आगे बढ़ रही हैं और किन्हें संरक्षण की जरूरत है। इसलिए भाषा की गिनती को केवल आंकड़ा समझना भूल होगी।

यह लोकतंत्र की उस प्रक्रिया का हिस्सा है जो तय करती है कि आने वाले वर्षों में सरकारी संसाधन किस दिशा में जाएँगे और किसे कितना प्रतिनिधित्व मिलेगा।

भारत-Pak सीमा पर मौजूद ‘हरामी नाला’ बेहद अहम, यहाँ का दलदल ही नहीं पानी भी खतरनाक: समझें- क्यों ये घुसपैठ के लिहाज से है बेहद संवेदनशील

भारत-पाकिस्तान सीमा की सुरक्षा की बात होती है तो ज्यादातर लोगों के मन में राजस्थान का रेगिस्तान या जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियाँ आती हैं, लेकिन गुजरात के कच्छ में स्थित ‘हरामी नाला’ ऐसा इलाका है, जहाँ सीमा की निगरानी करना सबसे मुश्किल कामों में से एक माना जाता है।

दलदल समुद्री पानी, बदलते ज्वार-भाटा और लगातार बदलती भौगोलिक स्थिति के कारण यह क्षेत्र सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बना रहता है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस संवेदनशील इलाके का दौरा कर यहाँ सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की और कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं का उद्घाटन व शिलान्यास किया।

क्या है हरामी नाला और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

हरामी नाला गुजरात के कच्छ क्षेत्र में स्थित करीब 22 किलोमीटर लंबा समुद्री चैनल है, जो भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा का हिस्सा बनता है। इसका बड़ा हिस्सा अरब सागर के खारे पानी से घिरा रहता है, जबकि लगभग आठ किलोमीटर का क्षेत्र दलदली जमीन से भरा हुआ है।

इस इलाके की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ ज्वार-भाटा आने के साथ पानी की गहराई, दिशा और दलदल की स्थिति लगातार बदलती रहती है। इसी वजह से यहाँ स्थायी निशान या सीमा चिन्ह स्थापित करना बेहद मुश्किल होता है। समुद्री धारा और रास्ते बार-बार बदलने के कारण इस क्षेत्र को नेविगेट करना भी काफी कठिन माना जाता है।

कैसे पड़ा हरामी नाला नाम?

हरामी नाला नाम सुनने में भले अजीब लगे, लेकिन इसके पीछे स्थानीय लोगों का अनुभव जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि इस क्षेत्र की स्थिति ऐसी है की आप इसका अनुमान नहीं लगा सकते। यहाँ आने वाला व्यक्ति कभी भी सही अंदाजा नहीं लगा सकता कि आगे क्या स्थिति मिलेगी।

समुद्री रास्ते, दलदल और पानी की गहराई लगातार बदलते रहते हैं। इसी कारण स्थानीय बोलचाल में इसे ‘हरामी नाला‘ कहा जाने लगा। समय के साथ यही नाम प्रचलित हो गया और आज यह पूरे देश में इसी नाम से जाना जाता है।

घुसपैठ और तस्करी के लिए इस्तेमाल होता रहा है यह रास्ता

हरामी नाला लंबे समय तक पाकिस्तान से होने वाली घुसपैठ के लिए आसान रास्ता माना जाता रहा है। इस इलाके की स्थिति का फायदा उठाकर आतंकवादी, तस्कर और घुसपैठिएँ भारतीय सीमा में घुसने की कोशिश करते रहे हैं।

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, कई बार पाकिस्तानी मछुआरे भी अनजाने में या जानबूझकर भारतीय सीमा में प्रवेश करते हुए पकड़े गए हैं। इस क्षेत्र में संदिग्ध नावों की गतिविधियाँ भी समय-समय पर सामने आती रही हैं।

पाकिस्तानी मछुआरे (फोटो साभार – NBT)

सबसे बड़ा उदाहरण साल 2008 के मुंबई आतंकी हमले का है। जाँच एजेंसियों के अनुसार 26/11 हमले में शामिल आतंकियों का समूह समुद्री रास्ते से भारत में दाखिल हुआ था। इसके बाद इस पूरे क्षेत्र की सुरक्षा को और मजबूत किया गया। तब से BSF लगातार यहाँ निगरानी बढ़ा रही है।

BSF के सामने हर दिन खड़ी रहती हैं कई चुनौतियाँ

हरामी नाला में सीमा की निगरानी करना बेहद कठिन काम है। यहाँ दलदल इतना गहरा होता है कि कई बार BSF की गश्ती नावें भी फंस जाती हैं। ज्वार उतरने के बाद पानी कम हो जाने पर नावों का संचालन मुश्किल हो जाता है।

दलदली जमीन पर जवानों को विशेष गमबूट पहनकर चलना पड़ता है। जमीन में मौजूद छोटे-छोटे शंख और समुद्री जीव पैरों को नुकसान पहुँचा सकते हैं। इसके अलावा केकड़े, उड़ने वाले कीट, तेज हवाएँ और खारा पानी जवानों की मुश्किलें बढ़ा देते हैं।

यहाँ दूर-दूर तक कोई आबादी नहीं है। गर्मी के मौसम में तापमान काफी अधिक हो जाता है, जबकि समुद्री हवाएँ और बदलता मौसम लगातार चुनौती पैदा करते हैं। इसके बावजूद BSF के जवान चौबीसों घंटे सीमा की निगरानी करते हैं।

तैरती चौकियाँ और आधुनिक तकनीक से हो रही निगरानी

हरामी नाला में स्थायी चौकियाँ बनाना आसान नहीं है क्योंकि दलदली जमीन निर्माण कार्य के लिए उपयुक्त नहीं है। इसी कारण BSF यहाँ तैरती हुई पोस्ट और अस्थायी निगरानी केंद्रों का इस्तेमाल करती है।

दलदली क्षेत्र में जवान हर कुछ दूरी पर अस्थायी स्टैंड बनाकर निगरानी करते हैं। हाई टाइड आने पर वे ऊँचे प्लेटफॉर्म पर चढ़कर चौकसी जारी रखते हैं ताकि किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखी जा सके।

इसके अलावा BSF के विशेष ‘क्रोकोडाइल कमांडो’ भी इस क्षेत्र में तैनात रहते हैं। आधुनिक कैमरों, नौकाओं और तकनीकी उपकरणों की मदद से पूरे इलाके की निगरानी की जाती है।

अमित शाह के दौरे से क्यों बढ़ी चर्चा?

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में हरामी नाला क्षेत्र का दौरा कर यहाँ सुरक्षा व्यवस्थाओं का जायजा लिया। उन्होंने भारत-पाक सीमा पर स्थित बॉर्डर आउटपोस्ट G-7 का उद्घाटन किया और सीमा सुरक्षा बल के जवानों से मुलाकात की।

दौरे के दौरान उन्होंने हरामी नाला क्षेत्र में बनाए गए आधुनिक ऑब्जर्वेशन पोस्ट टावर का भी उद्घाटन किया। करीब 9.5 मीटर ऊँचे इस टावर में अत्याधुनिक सर्विलांस कैमरे लगाए गए हैं, जिनकी मदद से सीमा पर दूर तक निगरानी रखी जा सकेगी।

इसके अलावा चिड़ियामोड़-बियारबेट लिंक रोड और BSF के लिए नई आधारभूत सुविधाओं की शुरुआत भी की गई। सरकार का मानना है कि इन परियोजनाओं से सुरक्षा बलों की आवाजाही आसान होगी और सीमा पर निगरानी क्षमता में बड़ा सुधार आएगा।

गृह मंत्री ने यह भी कहा कि तकनीकी और भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद इस पूरे क्षेत्र में मजबूत सुरक्षा तंत्र विकसित किया गया है और भविष्य में भी सीमा सुरक्षा को और मजबूत किया जाएगा।

सीमा सुरक्षा की दृष्टि से बेहद अहम है हरामी नाला

हरामी नाला केवल एक समुद्री चैनल नहीं बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। पाकिस्तान सीमा के निकट स्थित होने, दलदली भूभाग और समुद्री पहुँच के कारण यह सुरक्षा एजेंसियों के लिए हमेशा विशेष महत्व रखता है।

BSF के जवान कठिन परिस्थितियों में यहां दिन-रात निगरानी कर रहे हैं। आधुनिक तकनीक और नए बुनियादी ढाँचे के जुड़ने से अब इस क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत होने की उम्मीद है। यही कारण है कि हरामी नाला को भारत-पाक सीमा के सबसे चुनौतीपूर्ण और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाकों में गिना जाता है।

दिल्ली जिमखाना क्लब और CIA के जासूस: राष्ट्रीय सुरक्षा में सेंध की इनसाइड स्टोरी

अगर किसी परमाणु संपन्न राष्ट्र या दुनिया की उभरती हुई महाशक्ति की राष्ट्रीय सुरक्षा में सेंध लगानी हो, तो उसके सैन्य ठिकानों पर बम गिराने की आवश्यकता नहीं होती। इसके लिए बस उस देश के सबसे रसूखदार, औपनिवेशिक काल के एलीट क्लब की सदस्यता लेना ही काफी है, जहाँ शाम ढलते ही देश के नीति-निर्माता अपनी सुरक्षा और गरिमा को स्कॉच के पेग में घोल देते हैं।

यह सब कुछ वास्तविक घटनाओं पर आधारित कहानियाँ हैं, जो यह दर्शाती हैं कि कैसे देश की राजधानी दिल्ली के केंद्र में स्थित एक एलीट क्लब दशकों तक विदेशी जासूसों का खेल का मैदान बना रहा। इस पूरी गाथा के केंद्र में ‘दिल्ली जिमखाना क्लब’ (DGC) है, जिसे बचाने के लिए इसके रसूखदार सदस्यों ने अपनी पूरी ताकत लगा रखी है।

अध्याय 1: लुटियंस दिल्ली की ‘मधुशाला’ और राष्ट्रीय सुरक्षा का अलार्म

साल 2026 की शुरुआत दिल्ली जिमखाना क्लब के लिए एक बड़े झटके के साथ हुई। भारत सरकार के भूमि और विकास कार्यालय (L&DO) ने इस 113 साल पुराने क्लब को खाली करने का सख्त आदेश जारी कर दिया। इस कड़े कदम के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और जनहित जैसे गंभीर कारण रहे हैं।

यह क्लब प्रधानमंत्री आवास (7 लोक कल्याण मार्ग) से महज़ कुछ ही मीटर की दूरी पर, 27.3 एकड़ के बेहद संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र में फैला हुआ है। आम जनता के लिए यह केवल रईसों के मनोरंजन का अड्डा हो सकता है, लेकिन भारत सरकार के लिए यह हमेशा से एक बड़ा राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम रहा है।

साल 2020 में कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने अदालत में इस क्लब की कार्यप्रणाली पर एक बेहद तीखा बयान देते हुए कहा था, “यह क्लब व्यायामशाला से मधुशाला बन चुका है।” यह एक ऐसी ‘रियासत’ बनकर रह गया था, जहाँ देश की संभ्रांत नौकरशाही और विदेशी राजनयिकों का ऐसा घालमेल था, जो सुरक्षा तंत्र की आँखों में धूल झोंकने के लिए पर्याप्त था।

शीत युद्ध (Cold War) के दौरान, दिल्ली जिमखाना क्लब एक ऐसा संपर्क क्षेत्र (कॉन्टैक्ट ज़ोन) था, जहाँ राजनयिकों के भेष में घूम रहे विदेशी जासूस बिना किसी सरकारी पाबंदी या इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) जैसी खुफिया संस्थाओं की नजरों में आए, भारतीय जनरलों और नौकरशाहों से आसानी से मिल सकते थे।

अध्याय 2: टी-72 टैंक और टेनिस कोर्ट का जादुई ‘ड्रॉप’

यह घटना साल 1978 की है। भारतीय सेना ने सोवियत संघ से पहली बार उस दौर के सबसे आधुनिक और खतरनाक टी-72 टैंक (T-72/T-72M) मँगाए थे। करीब 41 टन वजनी यह फौलादी टैंक उस समय अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) और सीआईए (CIA) के लिए एक बड़ा रहस्य बना हुआ था। आखिर इस टैंक में ऐसा क्या था जिसने अमेरिका की नींद उड़ा रखी थी? इसके मुख्य तीन कारण थे-

मजबूत फ्रंट आर्मर (Glacis Armour): यह सिर्फ स्टील की चादर नहीं थी, बल्कि हाई-कार्बन स्टील और पॉलीयुरेथेन की कई परतों से बनी एक ऐसी सुरक्षा ढाल थी, जिसे भेदना बेहद मुश्किल माना जाता था।
लेजर रेंजफाइंडर और ऑटो-लोडर सिस्टम: इसमें लक्ष्य की दूरी नापने और गोला लोड करने का काम मशीन खुद करती थी, जिससे टैंक दुश्मन पर बहुत तेजी से प्रहार कर सकता था।
125mm स्मूथबोर गन: उस दौर में यह दुनिया की सबसे घातक टैंक गनों में शुमार थी, जो कुछ ही सेकंड में दुश्मन के टैंक को मलबे में बदल सकती थी।

सीआईए इस टैंक का पूरा ब्योरा (जिसे खुफिया भाषा में ‘SOVMAT’ कहा जाता था) हर हाल में हासिल करना चाहती थी। उन्होंने एक भारतीय सैन्य अधिकारी को रिश्वत देकर टैंक को सीमा पार पाकिस्तान भगाने की भी योजना बनाई थी, जो विफल रही।

तभी मैदान में सीआईए का एक शातिर फील्ड एजेंट रॉबर्ट बेयर उतरा, जो नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास में तैनात था। बेयर ने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा ‘सी नो इविल’ (See No Evil) में इस खतरनाक घटनाक्रम का जिक्र किया है।

बेयर के एक भारतीय एजेंट ने सेना के लॉकर से टी-72 के बेहद गोपनीय मैनुअल्स चुरा तो लिए थे, लेकिन एक बड़ी शर्त थी। उन मैनुअल्स को सिर्फ दो घंटे के भीतर वापस सैन्य तिजोरी में रखना था, इससे पहले कि सार्जेंट की ड्यूटी बदले और राज़ खुले। बेयर मैनुअल लेकर भागा, लेकिन भारत की खुफिया एजेंसी ‘इंटेलिजेंस ब्यूरो’ (IB) की पाँच गाड़ियाँ उसका पीछा कर रही थीं।

समय तेज़ी से खत्म हो रहा था और केवल 17 मिनट बचे थे। बेयर ने तत्परता दिखाते हुए अपनी गाड़ी सीधे दिल्ली जिमखाना क्लब के गेट के भीतर घुसा दी। पीछे-पीछे आईबी की गाड़ियाँ भी आ गईं। बेयर ने बिना गाड़ी रोके उसे सीधे टेनिस कोर्ट के बीच के पतले बजरी वाले पैदल रास्ते पर दौड़ा दिया, जहाँ आईबी की गाड़ियाँ पीछे आने में असमर्थ थीं।

बेयर ने उन मैनुअल्स को एक टेनिस बैग में डाला और इमली के पेड़ों के बीच से होते हुए गेस्ट हाउस नंबर तीन के पास झाड़ियों के पीछे छिपे अपने एजेंट की तरफ फेंक दिया। इसके बाद पीछा कर रहे आईबी के जासूसों को भ्रमित करने के लिए बेयर सीधे जिमखाना क्लब के बार में चला गया। वहाँ वह थ्री-पीस सूट पहने अकेले बैठे एक बेहद प्रतिष्ठित और निर्दोष भारतीय सज्जन के बगल में बैठ गया और वेटर को आवाज़ देकर दो डबल स्कॉच का ऑर्डर दे दिया।

जब आईबी के जासूस हाँफते हुए बार में घुसे, तो उन्होंने बेयर को उस भारतीय संभ्रांत व्यक्ति के साथ गंभीर चर्चा करते देखा। आईबी का पूरा ध्यान उस बेकसूर भारतीय पर टिक गया कि आखिर बेयर इतनी हड़बड़ी में उससे क्या बात करने आया था। इस ड्रामे ने सीआईए के एजेंट को इतना समय दे दिया कि वह मैनुअल लेकर सुरक्षित वापस जा सका और उन्हें सेना के लॉकर में रख दिया।

इस चोरी का परिणाम यह हुआ कि 1982 में सीआईए ने इस मैनुअल के जरिए निष्कर्ष निकाला कि शुरुआती टी-72 वर्जन की रात में लड़ने की क्षमता पश्चिमी समकक्ष टैंकों की तुलना में सीमित थी। यह रणनीतिक कमजोरी सीआईए ने तुरंत अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्री और अपने फ्रंटलाइन पार्टनर पाकिस्तान की सेना के साथ साझा कर दी।

अध्याय 3: पंजाब का जंगल, ‘चोर दरवाज़ा’ और मोर का अवैध शिकार

सैन्य अधिकारियों के लिए नियम बेहद कड़े थे। वे किसी विदेशी नागरिक से सीधे नहीं मिल सकते थे और मिलने पर उन्हें तुरंत सरकार को इसकी रिपोर्ट करनी होती थी। ऐसे में सीआईए के लिए सीधे सैन्य अधिकारियों को अपने जाल में फँसाना लगभग असंभव था।

रॉबर्ट बेयर ने अपनी किताब के पृष्ठ संख्या 75 पर लिखा है कि उन्होंने इस कड़े सिस्टम में एक ‘चोर दरवाज़ा’ खोज निकाला। बेयर को पता चला कि भारतीय सैन्य अधिकारियों को शिकार करने का अत्यधिक शौक है।

इसके बाद बेयर ने अपनी एक शिकारी वाली पहचान बनाई, सिविलियन नंबर प्लेट वाली एक मिलिट्री जीप खरीदी और पंजाब के जंगलों में डेरा डाल दिया। वहाँ उसकी मुलाकात ‘सिंह’ नाम के एक रसूखदार भारतीय सैन्य अधिकारी से हुई, जो भारत-सोवियत दोस्ती के सख्त खिलाफ था। दोनों के बीच दोस्ती गहरी हो गई। वे सप्ताहांत (वीकेंड) पर पंजाब के जंगलों और यहाँ तक कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निजी एस्टेट में अवैध रूप से भारत के राष्ट्रीय पक्षी ‘मोर’ का शिकार करने लगे।

बेयर ने सिंह को एक बेहद कीमती इतालवी बन्दूक (Browning Double-barrel) उपहार में दी। बाद में, नई दिल्ली के सीआईए स्टेशन प्रमुख ‘वाइल्ड बिल’ को भी इस शिकार यात्रा में शामिल किया गया और ‘सिंह’ को पूरी तरह से अपने साथ मिला लिया गया। इसके बाद सिंह ने अनजाने में भारत के सोवियत सैन्य उपकरणों और रक्षा व रणनीतिक कमियों की सभी संवेदनशील जानकारियां सीआईए को सौंप दीं।

अध्याय 4: हनीट्रैप और मद्रास कैफ़े की कड़वी हकीकत

सीआईए का यह एलीट नेटवर्क सिर्फ दिल्ली या पंजाब तक ही सीमित नहीं था। 1980 के दशक के मध्य में, जब श्रीलंका का गृहयुद्ध अपने चरम पर था, तब भारत की बाह्य खुफिया एजेंसी रॉ (R&AW) के मद्रास स्टेशन प्रमुख के.वी. उन्नीकृष्णन थे।

उन्नीकृष्णन को श्रीलंका (कोलंबो) में उनकी तैनाती के दौरान सीआईए ने एक एयर होस्टेस के ज़रिए बेहद शातिर तरीके से हनीट्रैप में फँसा लिया था। उनकी कुछ आपत्तिजनक तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड कर लिए गए थे, जिसके बाद ब्लैकमेलिंग का वह खेल शुरू हुआ जिसने भारत के राष्ट्रीय हितों को गहरे जख्म दिए।

उन्नीकृष्णन ने लगभग दो साल तक सीआईए के लिए काम किया। उन्होंने भारत की सबसे गुप्त नीतियों जैसे तमिल उग्रवादियों (LTTE) को भारत द्वारा दी जा रही हथियारों की ट्रेनिंग और श्रीलंका शांति समझौते को लेकर भारत सरकार की रणनीति की पूरी फाइलें सीआईए को सौंप दीं।

सीआईए ने यह संवेदनशील जानकारी श्रीलंकाई सरकार तक पहुँचाई, जिसके कारण बाद में भारतीय शांति सेना (IPKF) को वहाँ भारी सैन्य और मानवीय नुकसान झेलना पड़ा। जब तक आईबी की काउंटर-इंटेलिजेंस विंग ने उन्हें मुंबई से गिरफ्तार किया, तब तक देश का बहुत बड़ा नुकसान हो चुका था। इस घटना के बाद उन्हें सेवा से बर्खास्त कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया था।

अध्याय 5: जासूसों के अन्य पसंदीदा ‘अड्डे’ और कराची कनेक्शन

राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर केवल दिल्ली जिमखाना क्लब ही नहीं, बल्कि एलीट कल्चर के ऐसे कई अन्य ठिकाने भी रहे हैं:

दिल्ली गोल्फ क्लब: लुटियंस दिल्ली के केंद्र में 170 एकड़ में फैला यह गोल्फ क्लब देश के सेवानिवृत्त जनरलों, खुफिया प्रमुखों और नौकरशाहों का अनौपचारिक अड्डा रहा है। यहाँ ‘सॉफ्ट कल्टीवेशन’ के ज़रिए विदेशी राजनयिक खेल-खेल में देश की नीतियां उगलवा लेते थे।

जयपुर पोलो ग्राउंड (दिल्ली): प्रधानमंत्री आवास के ठीक सामने स्थित यह मैदान खेल और सत्ता के मेलजोल का बड़ा केंद्र हुआ करता था, जिस पर कुछ समय पहले ही मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से कड़ा एक्शन लिया है।

कराची जिमखाना क्लब (पाकिस्तान): दिल्ली जिमखाना की ही तरह औपनिवेशिक काल का यह क्लब पाकिस्तान के कराची शहर के केंद्र में स्थित है। यहाँ भी अमेरिकी और पश्चिमी राजनयिक वहाँ के स्थानीय अधिकारियों और सैन्य कर्मियों को प्रभावित करने तथा खुफिया नेटवर्क तैयार करने के लिए सोशल नेटवर्किंग का सहारा लेते थे।

इसके अलावा लुटियंस दिल्ली के संभ्रांत इलाकों जैसे ‘गोल्फ लिंक्स’ के बंगले हमेशा से खुफिया निगरानी के मुख्य केंद्र रहे हैं। पूर्व रॉ अधिकारी मलय कृष्ण धर ने अपनी पुस्तक ‘ओपन सीक्रेट्स‘ में खुलासा किया है कि कैसे राजीव गाँधी सरकार के दौरान राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और गृह मंत्री के बीच की तनातनी को रिकॉर्ड करने के लिए राष्ट्रपति भवन तक को टैप किया गया था। हालाँकि ऐसा नहीं है कि भारत ने कभी ऐसी रणनीतियाँ नहीं अपनाईं। मलय कृष्ण लिखते हैं कि कई बार मणिपुर के उग्रवादियों और एक पुलिस कांस्टेबल से जानकारी निकलवाने के लिए शराब को भी एक टूल की तरह इस्तेमाल किया जाता था।

परंतु खुफिया एजेंसियों के इस जिमखाना जैसे ढीले एलीट सुरक्षा सिस्टम का फायदा उठाकर साल 2004 में रॉ (R&AW) के संयुक्त सचिव रबिंदर सिंह, सीआईए के एजेंट डेविड वकाला की मदद से जाली पासपोर्ट पर काठमांडू के रास्ते अमेरिका भागने में सफल रहे। इस घटना को रॉ के पूर्व विशेष सचिव अमर भूषण ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘एस्केप टू नोव्हेयर’ (Escape to Nowhere) में विस्तार से बताया है।

ये एलीट क्लब सुरक्षा के लिए क्यों हैं संवेदनशील?

विदेशी ताकतों के लिए ये जिमखाना जैसे संभ्रांत क्लब राष्ट्रीय सुरक्षा के सबसे बड़े ‘सॉफ्ट टारगेट’ क्यों रहे हैं? इसके तीन मुख्य रणनीतिक कारण हैं-

  1. प्रोटोकॉल का भय न होना: एक सरकारी दफ्तर में विदेशी राजनयिकों से मिलने के लिए कड़े नियम होते हैं, लेकिन जिमखाना या गोल्फ क्लब की हरी घास पर स्कॉच का ग्लास हाथ में लिए राजनयिक और रक्षा अधिकारी बिना किसी लिखित अनुमति के आपस में सुरक्षा नीतियां साझा कर लेते हैं।
  2. सॉफ्ट कल्टीवेशन: टेनिस, पोलो या गोल्फ जैसे खेलों और शिकार जैसे निजी शौकों को जरिया बनाकर विदेशी एजेंसियाँ धीरे-धीरे अधिकारियों को अपना कर्जदार बना लेती हैं। इसकी शुरुआत गोल्फ स्टिक्स उधार लेने या बन्दूक उपहार में देने से होती है और अंत देशद्रोह पर जाकर होता है।
  3. रणनीतिक निकटता: ये सभी एलीट क्लब राजधानी दिल्ली के केंद्र यानी प्रधानमंत्री आवास और संवेदनशील रक्षा मुख्यालयों के ठीक बगल में स्थित हैं। ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा ऑडिट के बिना विदेशी नागरिकों की बेरोकटोक आवाजाही किसी भी देश के लिए आत्मघाती कदम है।

यही कारण है कि साल 2026 में भारत सरकार ने इस औपनिवेशिक दौर से मिले विशेषाधिकार वाले सुरक्षित ठिकाने का पट्टा खत्म करने और उसे खाली कराने का यह बड़ा फैसला लिया है। आखिर किसी भी संप्रभु देश के लिए कुछ चुनिंदा रईसों के मनोरंजन और शराब की महफिलों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) होती है। देश की सुरक्षा से बढ़कर कोई विशेषाधिकार नहीं हो सकता।

फर्जी पुलिस कॉल, ‘डिजिटल अरेस्ट’ और UPI से ठगी पर RBI की सर्जिकल स्ट्राइक: आ रहा ‘Kill Switch’, समझें- AI कैसे करेगा ट्रांजैक्शन की निगरानी

भारत में पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल पेमेंट ने जिंदगी को बेहद आसान बना दिया है। अब पैसे भेजने के लिए बैंक की लाइन में लगने की जरूरत नहीं पड़ती बस मोबाइल उठाइए और कुछ सेकेंड में UPI, इंटरनेट बैंकिंग या IMPS के जरिए पैसा एक खाते से दूसरे खाते में भेज दीजिए।

हालाँकि, जितनी तेजी से डिजिटल पेमेंट बढ़ा है, उतनी ही तेजी से डिजिटल फ्रॉड के मामले भी सामने आए हैं। अब धोखेबाज मोबाइल या सिस्टम को हैक नहीं करते बल्कि डर, लालच और दबाव बनाकर खुद उनसे पैसे ट्रांसफर करवा लेते हैं।

इसी बढ़ते खतरे को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अब एक बड़े सुरक्षा तंत्र पर काम कर रहा है। RBI ने मई 2026 में जारी वार्षिक रिपोर्ट में बताया है कि वह एक ‘किल स्विच’ (Kill Switch) सुविधा और सभी डिजिटल पेमेंट मोड के लिए ‘स्विच ऑन-स्विच ऑफ’ सिस्टम लाने की संभावना तलाश रहा है।

इसके अलावा, पहली बार बड़े मूल्य के कुछ डिजिटल ट्रांजैक्शन में थोड़ी देरी यानी ‘कूलिंग पीरियड’ देने पर भी विचार हो रहा है ताकि ठगी होने से पहले लोगों को सोचने और पहचानने का समय मिल सके।

क्या है ‘किल स्विच’ और यह कैसे करेगा काम?

कल्पना कीजिए कि किसी दिन अचानक आपको पुलिस अधिकारी, CBI, ED या किसी सरकारी एजेंसी के नाम पर वीडियो कॉल आती है। सामने वाला कहता है कि आपके खिलाफ गंभीर मामला दर्ज है और गिरफ्तारी से बचना है तो तुरंत पैसा किसी खाते में भेजिए। डर और घबराहट में बहुत से लोग बिना सोचे पैसे ट्रांसफर कर देते हैं। RBI का मानना है कि ऐसे मामलों में अगर ग्राहक को तुरंत बैंकिंग लेन-देन रोकने का विकल्प मिल जाए, तो बड़ी ठगी टाली जा सकती है।

यहीं पर ‘किल स्विच’ काम आएगा। आसान भाषा में समझें तो यह एक तरह का ‘इमरजेंसी बटन’ होगा। अगर किसी व्यक्ति को लगे कि उसके साथ डिजिटल फ्रॉड हो सकता है तो वह अपने बैंक ऐप, इंटरनेट बैंकिंग या दूसरे माध्यम से इस सुविधा को सक्रिय कर सकेगा। इसके बाद खाते से होने वाले सभी डेबिट ट्रांजैक्शन यानी पैसे निकलने की प्रक्रिया तुरंत बंद हो सकती है।

इसका मतलब यह होगा कि UPI पेमेंट, बैंक ट्रांसफर, कार्ड पेमेंट, इंटरनेट बैंकिंग या दूसरे डिजिटल माध्यमों से पैसा भेजना अस्थायी रूप से रुक जाएगा। यानी अगर कोई ठग आपको दबाव में पैसा ट्रांसफर कराने की कोशिश कर रहा है तो आप एक क्लिक में पूरा खाता ‘फ्रीज’ जैसे मोड में डाल सकते हैं और बाद में स्थिति सामान्य होने पर सेवाओं को फिर चालू कर सकते हैं।

यह प्रस्ताव नया जरूर है लेकिन इसकी सोच पूरी तरह नई नहीं है। गृह मंत्रालय (MHA) की एक उच्च स्तरीय समिति पहले भी ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे मामलों को रोकने के लिए ऐसे सिस्टम पर विचार कर चुकी है।

‘स्विच ऑन-स्विच ऑफ’ सिस्टम क्या होगा, आप खुद तय करेंगे कौन सी सेवा चलेगी?

अभी कार्ड पेमेंट में ग्राहकों को कुछ नियंत्रण पहले से मिलता है। जैसे कोई ग्राहक घरेलू कार्ड ट्रांजैक्शन, अंतरराष्ट्रीय पेमेंट या ‘टैप एंड पे’ जैसी सुविधा को बैंक ऐप से बंद या चालू कर सकता है। जरूरत पड़ने पर कार्ड लिमिट भी बदल सकता है।

अब RBI इसी मॉडल को पूरे डिजिटल पेमेंट सिस्टम तक बढ़ाने पर विचार कर रहा है। इसका मतलब है कि भविष्य में ग्राहक खुद तय कर सकते हैं कि उनके खाते से कौन-कौन सी सेवाएँ सक्रिय रहें और कौन सी बंद।

उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति रोज UPI इस्तेमाल नहीं करता तो वह इसे बंद रख सकता है और जरूरत पड़ने पर कुछ मिनट के लिए चालू कर सकता है। कोई व्यक्ति अंतरराष्ट्रीय कार्ड इस्तेमाल नहीं करता तो वह उस सुविधा को स्थायी रूप से बंद रख सकता है। ATM से निकासी, इंटरनेट बैंकिंग, UPI, कार्ड उपयोग और दूसरे भुगतान चैनलों पर भी ऐसा नियंत्रण मिल सकता है।

इसका फायदा यह होगा कि अगर किसी ठग के पास आपकी बैंक डिटेल या फोन तक पहुँच भी बन जाए तब भी वह हर सेवा का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। यानी सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत जुड़ जाएगी। RBI का मानना है कि इससे उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ेगा और डिजिटल ठगी के मामलों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।

आखिर ट्रांजैक्शन में RBI क्यों चाहता है ‘एक घंटे का इंतजार’?

RBI के एक पेपर में यह भी सुझाव दिया गया है कि कुछ बड़े डिजिटल ट्रांजैक्शन को तुरंत पूरा करने के बजाय थोड़ी देर से प्रोसेस किया जाए। प्रस्ताव के मुताबिक, ₹10,000 से अधिक के कुछ व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) भुगतान, खासकर जब पहली बार किसी व्यक्ति, एकल स्वामित्व (Sole Proprietorship) या साझेदारी फर्म (Partnership Firm) को पैसा भेजा जा रहा हो तो उस ट्रांजैक्शन में करीब एक घंटे का समय लग सकता है।

सुनने में यह लोगों को असुविधा जैसा लग सकता है लेकिन RBI इसके पीछे एक आसान तर्क दे रहा है। आज फ्रॉड इतनी तेजी से होते हैं कि लोगों को सोचने का मौका ही नहीं मिलता। फोन पर धमकी, डर और जल्दी का माहौल बनाकर पैसे तुरंत ट्रांसफर करा लिए जाते हैं। लेकिन अगर ट्रांजैक्शन पूरा होने से पहले थोड़ा समय मिले तो ग्राहक सोच सकता है कि कहीं सामने वाला ठग तो नहीं, परिवार से बात कर सकता है या ट्रांजैक्शन कैंसल भी कर सकता है।

AI करेगा निगरानी, हर ट्रांजैक्शन को मिलेगा रिस्क स्कोर

RBI केवल ‘किल स्विच’ या देरी पर ही काम नहीं कर रहा है। इस साल एक और बड़ी पहल शुरू होने की उम्मीद है, जिसका नाम है Digital Payments Intelligence Platform (DPIP)। यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म होगा जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI की मदद से हर डिजिटल ट्रांजैक्शन को रीयल टाइम में खतरे के आधार पर स्कोर देगा।

सीधे शब्दों में कहें तो अगर किसी ट्रांजैक्शन में धोखाधड़ी की आशंका होगी, तो सिस्टम उसे ज्यादा जोखिम वाला मान सकता है। इससे बैंकों और भुगतान प्रणाली को समय रहते चेतावनी मिलने में मदद हो सकती है।

RBI के सर्वे के अनुसार, भारत में 52% लोगों ने डिजिटल पेमेंट को अपनाया है और इसका सबसे बड़ा कारण इसकी गति और सुविधा है। वहीं, 67% व्यापारियों ने कहा कि डिजिटल पेमेंट ने उनके कारोबार पर सकारात्मक असर डाला है। इसी तेजी के साथ सुरक्षा की जरूरत भी बढ़ी है।

यही कारण है कि RBI अब ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रहा है, जिसमें डिजिटल भुगतान की सुविधा बनी रहे लेकिन ठगी करने वालों के लिए रास्ता कठिन हो जाए। आने वाले समय में संभव है कि पैसे भेजने की रफ्तार थोड़ी धीमी हो लेकिन इसके बदले लोगों के खातों की सुरक्षा पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो जाए।