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गुजरात के जावेद की टेढ़ी हड्डियाँ, ₹4 करोड़ का सालाना खर्च और PAK के ‘रैट चिल्ड्रन’: करीबी रिश्तों में निकाह से पैदा होता स्वास्थ्य संकट, जानें- क्या है जेनेटिक बीमारी MPS

मुस्लिम समाज में आपसी रिश्तदारों में निकाह आम है। ऐसे दंपति के बच्चों में आनुवांशिक बीमारियाँ ज्यादा होती हैं, क्योंकि दोषपूर्ण जीन होने की संभावना बढ़ जाती है। गुजरात का जावेद भी ऐसे ही आनुवांशिक बीमारी से जुझ रहा है। उसके अब्बू मोहम्मद आजी ने अपनी खाला की बेटी से निकाह किया था। नतीजतन जावेद को MPS IV नाम की आनुवांशिक बीमारी हो गई। 18 साल से वह हर दिन मौत की दुआ माँगते हुए जीता है। उसकी बहन भी ऐसी ही बीमारी से ग्रसित है। लेकिन वह चल फिर पाती है।

पाकिस्तान में माना जाता है कि करीब 80 फीसदी निकाह फर्स्ट कजिन और सेकेंड कजिन में होता है। इसलिए यहाँ आनुवांशिक बीमारियों के मरीज भी ज्यादा हैं। हालात तो ये है कि माइक्रोसेलफी से पीड़ित बच्चों को ‘रैट चिल्ड्रन’ कह कर उनका शोषण भी किया जाता है।

दुर्लभ बीमारी से ग्रस्त है जावेद

गुजरात के अहमदाबाद में रहने वाले 26 साल के जावेद को म्यूकोपोलीसेकेरिडोसिस टाइप IV बीमारी है। जन्मजात होने वाली इस बीमारी का पता बच्चे में तुरंत नहीं चलता। कई बार 2-4 साल में उसके लक्षण दिखते हैं। लेकिन कई बार 7-8 साल तक इसका पता चलता है। 8 साल की उम्र में जावेद को इसका पता तब चला जब वह क्रिकेट खेलते-खेलते गिर गया और दर्द से कराहने लगा। जब उठाने की कोशिश की गई लेकिन उसे उठाया नहीं जा पा रहा था।

टीचर को उसने रोते हुए कहा कि उसके घुटने और पैरों में काफी दर्द है। टीचर ने उसके अम्मी अब्बू को फोन किया। उनके पहुँचने पर जावेद को अस्पताल ले जाया गया। उसे दवा देकर भेज दिया गया। डॉक्टरों को लगा कि गिरने से उसकी मासपेशियाँ खिंच गई होंगी। लेकिन घर पहुँचने पर उसकी स्थिति ठीक होने के बजाय बिगड़ गई। जब वह उठ नहीं पाया तो मौलवी के पास भी उसके अब्बू दौड़े और उसे 10 हजार रुपए का तेल दिया लेकिन वह भी बेकार गया। 18 साल से इसी तरह वह बेड़ पर पड़ा है।

दरअसल उसे काफी रेयर बीमारी म्यूकोपॉलीसेकेराइडोसिस टाइप 4 (Mucopolysaccharidosis Type 4 या MPS IV) हो गई है। यह जेनेटिक बीमारी होती है और करीबी रिश्ते में जब शादियाँ होती हैं, तो उनके बच्चों में ये बीमारी होने की आशंका होती है। यही वजह है कि जावेद की बहन भी इसी बीमारी की शिकार है। उसके ज्वाइंट पर दर्द रहते हैं, घुटने-केहुनियाँ में सूजन आती है। उसकी हालत जावेद से बेहतर है, लेकिन उसका निकाह नहीं हो पा रहा है।

राँची की डॉक्टर श्वेता शेखर के मुताबिक, MPS कई तरह की होती है। कई MPS के मरीजों को हड्डियों के टेढ़े-मेड़े होने, सिर बढ़ा होने, पैर में कमजोरी, कम उम्र में बूढ़ा होना, आँखों, ह्रदय, साँस लेने में तकलीफ, गर्दन छोटी होना, पसलियों का टेढ़ा होना, दाँतों में खराबी समेत दूसरी दिक्कतों के साथ-साथ मानसिक बीमारी भी हो जाती है। लेकिन MPS 4 में सारी दिक्कत शारीरिक होती है। ऐसे मरीज की उम्र भी ज्यादा नहीं होती।

क्या होता है मॉर्कियो सिंड्रोम

म्यूकोपॉलीसेकेराइडोसिस टाइप 4 या मॉर्कियो सिंड्रोम (Morquio syndrome) एक दुर्लभ आनुवंशिक और जन्मजात बीमारी है। यह किसी संक्रमण या खान-पान से नहीं होती, बल्कि माता-पिता के दोषपूर्ण जीन के कारण होती है। आपसी रिश्तों, जैसे चचेरे-ममेरे-फुफेरे भाई-बहनों में जब शादियाँ होती हैं, तो इसकी संभावना काफी बढ़ जाती है। यही वजह है कि मुस्लिम देशों में ऐसे बीमारियों के मरीज ज्यादा मिलते हैं।
दरअसल यह एक ऑटोसोमल रिसेसिव (Autosomal Recessive) बीमारी है यानी माता-पिता जब आपसी रिश्तेवाले होते हैं तो दोनों में ऐसे जीन कैरी करने की संभावना होती है। ऐसे में उनके होने वाले बच्चों को ये बीमारी ज्यादा होती है।

लाइलाज है बीमारी

इस बीमारी को एंजाइम थेरेपी से थोड़ा ठीक किया जा सकता है लेकिन इसका खर्च काफी है। करीब 4 करोड़ रुपए सालाना खर्च आता है। इसलिए जावेद का इलाज नहीं हो पा रहा। इस बीमारी में शरीर में कुछ विशेष एंजाइम नहीं बनते। इसके कारण ग्लाइकोसामिनोग्लाइकैन (GAGs) नामक पदार्थ शरीर में जमा होने लगता है। धीरे-धीरे यह हड्डियों, जोड़ों, हृदय, आँखों और दूसरे अँगों को नुकसान पहुँचाता है, इसलिए जावेद 26 साल में 90 साल का हो गया है यानी उसकी हड्डियाँ उतनी कमजोर है कि तेजी से उठने बैठने पर भी टूट जाती है।

वह दर्द से तड़पता है। टेडी मेड़ी हड्डियाँ शरीर के ऊपर से दिखती हैं। बिस्तर से उठना मुश्किल होता है। उठते ही लुढ़क जाता है। जन्मजात बीमारी है। दो महीने का होने पर शरीर सूखने लगा था। शरीर बदन के मुकाबले काफी बड़ा दिखता है। चलते फिरते गिर जाता है। पैर काफी कमजोर। स्कूल छुड़ाना पड़ा क्योंकि दूर भेजना मुश्किल था। एक दिन ट्यूशन गया तो रास्ते में गिर गया। केहूनी घुटने में चोट लगी। इसके बाद वह भी छूट गया। 26 साल की हालत में हड्डियों की हालत 90 साल वाली हो गई है।

डॉक्टर श्वेता शेखर के मुताबिक, ये बीमारी लाइलाज है यानी इसे पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन मरीज को तड़पने से बचाने के लिए एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी कराई जा सकती है। इसके अलावा ऑर्थोपेडिक सर्जरी, फिजियोथेरेपी, हार्ट और दूसरे अँगों का समय समय पर चेकअप कराना, सांस लेने में अगर दिक्कत आए तो उसे डॉक्टर को दिखाना जरूरी है। यहाँ तक कि कई बार स्पाइनल सर्जरी की भी जरूरत महसूस की जा सकती है।

कई बीमारियों को न्योता देता है करीबी रिश्तों में होने वाली शादियाँ

करीबी रिश्तेदारों में विवाह से किसी एक बीमारी का नहीं, बल्कि कई ऑटोसोमल रिसेसिव रोगों का जोखिम बढ़ जाता है। यही वजह है कि दुनियाभर में मुस्लिम समुदाय दूसरी जैनेटिक बीमारियों से भी परेशान हैं। इनमें MPS के अलग-अलग प्रकारों मसलन MPS 1, MPS IV, MPS IVA, MPS IVB के अलावा बेटा थैलिसीमिया, सिकल सेल डिजीज यानी एससीडी, सिस्टिक फाइब्रोसिस, स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी, फेनिलकेटोनुरिया, टे-सैक्स रोग समेत कई दुर्लभ मेटाबॉलिक बीमारियाँ शामिल हैं।

पाकिस्तान का बुरा हाल

पाकिस्तान की करीब 80 फीसदी जनसंख्या मुस्लिम है। यहाँ चचेरे-ममेरे-फुफेरे भाई-बहनों (फर्स्ट कजन) के बीच निकाह आम है। माना जाता है कि करीब 60% से 65% निकाह आपसी रिश्तों में होते हैं। कहा जाता है कि इससे ‘बेटियाँ घरों में रह जाएँगी’। रिश्तेदारों में निकाह का खामियाजा अगली पीढ़ी भुगतती है, जब बच्चा जेनेटिक बीमार से ग्रस्त पैदा होता है।

पाकिस्तान में ऐसे मरीजों का कोई राष्ट्रीय डेटा मौजूद नहीं है लेकिन कराची के आगा खान यूनिवर्सिटी अस्पताल, लाहौर के चिल्ड्रन अस्पताल , इस्लामाबाद के जिला केन्द्र पर ऐसे मरीज ज्यादा आते हैं। दरअसल जागरूकता और इलाज छोटे-छोटे शहरों में मौजूद ही नहीं है। ऐसे में बड़े शहरों के कुछ केन्द्रों पर ही मरीज के लिए आना मजबूरी है।

कराची के एक अध्ययन के मुताबिक, सिंध प्रांत में आनुवांशिक बीमारियों में MPS से पीड़ित 90 रोगियों में मोरक्वियो सिंड्रोम MPS IV के मरीज थे। इसके अलावा पंजाब, बलूचिस्तान जैसे प्रांत में एमपीएस के अलावा दूसरे मरीजों की संख्या ज्यादा थी।

पाकिस्तान के डॉक्टर आपसी रिश्तों में होने वाले निकाह के खिलाफ हैं। इनका मानना है कि पाकिस्तान ऐसा देश है, जहाँ फर्स्ट कजिन और सेकेंड कजिन में निकाह सबसे ज्यादा होता है। ऐसे में आनुवांशिक बीमारियों के होने का खतरा भी यहाँ ज्यादा है। इसको लेकर देश में जागरूकता बढ़ाने की बात भी डॉक्टर कहते हैं।

पाकिस्तान के ‘रैट चिल्ड्रन’ शोषण के शिकार

पाकिस्तान सिर्फ आनुवांशिक बच्चों को पैदा ही नहीं करता बल्कि उनका शोषण करने में भी अव्वल है। यहाँ आनुवांशिक बीमारी माइक्रोसेलफी से पीड़ित बच्चों को रैट चिल्ड्रन के नाम से शोषण होता है। ऐसे बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास रुक जाता है। ऐसे बच्चों को ‘शाह डोला के चूहे’ माना जाता है। इनको दरगाह से जुड़े लोग और आसपास के गैंग भिखारी बनाते हैं और देश भर में भीख मँगवाते हैं।

इतना ही नहीं, ठीक बच्चों को रैट चिल्ड्रन बनाकर देश भर में भीख मँगवाया जाता है। दरअसल अंधविश्वास और रूढिवादिता से ग्रसित निसंतान दंपति शाह दौला की दरगाह पर मन्नत माँगने आते हैं। उनके लिए बच्चा पैदा होने पर पहले बच्चे को दरगाह को सौंपना अनिवार्य होता है। बताया जाता है कि अगर ऐसा नहीं किया तो आने वाले बच्चे विकृति वाले होंगे। इसके बाद जब दंपति अपने बच्चों को दरगाह को सौंप देते हैं तो उन्हें फिर जिंदगी में मिलना का मौका नहीं दिया जाता। बच्चा मिलने के बाद उन्हें ‘कृत्रिम माइक्रोसेफली’ का शिकार बनाया जाता है, जिसमें खोपड़ी के सामान्य विकास को रोकने के लिए उनके सिर पर लोहे की पट्टी बाँध दी जाती है।

इन अभागे बच्चों को हरे रंग के वस्त्र पहना कर दरगाह के आसपास भीख माँगने के लिए मजबूर किया जाता है। तीर्थयात्री यह सोचकर चिंतित रहते हैं कि अगर उनकी उपेक्षा की जाए तो उनका बुरा हाल हो सकता है, इसलिए वे बच्चों के भीख के कटोरे में नकद और सिक्के भर देते हैं। माता-पिता के संरक्षण से वंचित ये अशिक्षित बच्चे दरगाह प्रशासन की दया पर निर्भर रहते हैं। बच्चों को ‘नकली चूहे’ बना कर भीख मँगवाया जाता है।

‘सतलुज’ ने उतार दिया मुखौटा: दिलजीत दोसांझ की ‘ग्लोबल सुपरस्टार’ वाली छवि के पीछे छिपी राजनीति बेनकाब, ऑपइंडिया ने पहले ही दी थी चेतावनी

वर्षों से दिलजीत दोसांझ को एक सीधे-सादे, ग्लोबल पंजाबी स्टार के रूप में पेश किया जाता रहा है। एक गायक, एक अभिनेता और एक सॉफ्ट स्पोकन हस्ती जिन्हें लाखों लोग प्यार करते हैं।

एक ऐसा व्यक्ति जो पंजाब के बारे में गाता है और प्यार, किसानों तथा पहचान की बात करता है। लेकिन हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘सतलुज’ ने उस सच को सामने ला दिया है जिसे सालों के इमेज मैनेजमेंट ने पर्दे के पीछे छिपा रखा था।

‘सतलुज’: एक प्रोपेगैंडा फिल्म

‘सतलुज’ सिर्फ पंजाब के उग्रवाद के दौर की बात करने वाली फिल्म नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य बहुत गहरा है। यह फिल्म सालों तक अटकी रही क्योंकि इसमें छिपी राजनीतिक को लेकर तरह-तरह के सवाल थे।

शुरुआत में इस फिल्म का नाम ‘घल्लूघारा’ (नरसंहार) रखा गया था। यह नाम और इसके कुछ दृश्य केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) को रास नहीं आए। इसके बाद नाम बदलकर ‘पंजाब 95’ किया गया और आखिरकार बनने के तीन साल बाद यह रिलीज हो सकी।

इस फिल्म को 3 जुलाई को Zee5 OTT प्लेटफॉर्म पर बिना किसी शोर-शराबे के ‘सतलुज’ नाम से रिलीज किया गया। लेकिन 6 जुलाई को बिना किसी सटीक कारण बताए इसे प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया।

ध्यान देने वाली बात यह है कि यह फिल्म केवल भारतीय दर्शकों के लिए गायब हुई है, अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए नहीं, Zee5 का अंतरराष्ट्रीय पोर्टल इसे अब भी दिखा रहा है। अब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इस मामले की जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है।

समस्या यह नहीं है कि फिल्म पंजाब में पुलिस की ज्यादतियों की बात करती है, किसी भी ईमानदार समाज में ऐसे मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए। समस्या ‘सतलुज’ में पंजाब के उग्रवाद के दौर को पेश करने के तरीके से है।

फिल्म में खालिस्तानी आतंकवादियों और सिख चरमपंथियों के प्रति नरम रुख अपनाया गया है जबकि भारतीय राज्य (सरकार/प्रशासन) को इकलौते विलेन के रूप में दिखाया गया है।

जब फिल्म में तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या को दिखाया गया, तो उसे ‘बदले’ के रूप में दिखाया किया गया। जो लोग पंजाब उग्रवाद के इतिहास को नहीं समझते, वे इसका पूरा संदर्भ गलत समझ लेंगे। इस संदर्भ को अगर फिल्म की नजर से देखे तो उसको ऐसे दिखने की कोशिश की गई है कि वो कार ब्लास्ट सही था और वो बदला भी।

इसके अलावा जसवंत सिंह खालरा द्वारा इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाने के फैसले ने उस समय के भारतीय अधिकारियों को बेहद खराब रोशनी में दिखाया। KPS गिल, जिन्होंने पंजाब में उग्रवाद को सचमुच खत्म कर दिया, उन्हें ‘IPS बिट्टा’ नामक एक बुरे पुलिस वाले के रूप में दिखाया गया।

फिल्म में हिंदुओं की हत्याओं को कोई जगह नहीं मिली, यहाँ तक कि एक साधारण संदर्भ भी नहीं दिया गया। सख्त पुलिस कार्रवाई के पीछे की वजह कभी नहीं समझाई गई और न ही यह संकेत दिया गया कि कैसे खालिस्तानी आतंकवादी हिंदुओं, उग्रवाद का विरोध करने वाले सिखों, पुलिसकर्मियों और अधिकारियों की बेरहमी से हत्या कर रहे थे।

ऑपइंडिया ने वर्षों पहले इस पैटर्न को किया था चिन्हित

इस मोड़ पर दिलजीत की राजनीतिक विचारधारा प्रासंगिक हो जाती है। ऑपइंडिया वर्षों से कह रहा है कि उनकी सार्वजनिक छवि और उनका राजनीतिक संदेश आपस में मेल नहीं खाते।

2020 में किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान यह साफ था कि आंदोलन को खालिस्तानी तत्वों ने हाईजैक कर लिया था। दिलजीत उनके पक्ष में सबसे मुखर सेलिब्रिटी आवाजों में से एक बनकर उभरे।

उन्होंने विरोध प्रोटेस्ट इकोसिस्टम पर सवाल उठाने वालों पर खुलकर हमला किया। इस अभिनेता-गायक को हमेशा की तरह लेफ्ट-लिबरल भीड़ द्वारा एक बहादुर पंजाबी ‘आइकन’ के रूप में सराहा गया।

जून 2020 में कॉन्ग्रेस के तत्कालीन लुधियाना सांसद रवनीत सिंह बिट्टू (जो बेअंत सिंह के पोते भी हैं) ने खालिस्तानी आतंकवादी संगठन सिख फॉर जस्टिस (SFJ) के गुरपतवंत सिंह पन्नू का समर्थन करने के लिए दिलजीत दोसांझ और अन्य के खिलाफ FIR दर्ज करने की माँग की थी।

बिट्टू ने भारत-चीन आमने-सामने के दौरान SFJ के भारत-विरोधी रुख और सिख सैनिकों को लुभाने के उसके प्रयास की ओर इशारा किया था। ऑपइंडिया ने रिपोर्ट की थी कि कैसे दिलजीत प्रतिबंधित खालिस्तान समर्थक अलगाववादी संगठन के समर्थन को लेकर निशाने पर आए थे।

ऑपरेशन ब्लूस्टार से लेकर जगतार सिंह जोहल तक

दिलजीत का विवादों से पुराना नाता रहा है। फिल्म ‘पंजाब 1984’ के लिए उनके द्वारा गाए गए गाने ‘रंगरुत’ के बोलों के बाद भी उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ा था, जिसमें खुलकर बंदूकें उठाने और (1984 का) बदला लेने की बात कही गई थी।

गाने के बोल हैं ‘सोधा जालमा नु लाउना एके-47इया ने’ जिसका अनुवाद है ‘AK-47 अत्याचारियों से हिसाब चुकता करेगी’। कॉन्ग्रेस सांसद रवनीत बिट्टू ने तब उन पर ऑपरेशन ब्लूस्टार के 36 साल बाद शांति भंग करने का आरोप लगाया था।

इसके बाद खालिस्तानी आतंकवादी जगतार सिंह जोहल के लिए उनका समर्थन आया, जिसका नाम हिंदू और RSS नेताओं की हत्या के मामलों में NIA की चार्जशीट में है। जोहल को ब्रिगेडियर जगदीश कुमार गगनेजा, रविंदर गोसाईं, अमित शर्मा और अन्य की हत्या के मामले में आरोपित बनाया गया है।

दिलजीत ने जोहल के लिए प्रताड़ना के दावों और निष्पक्ष सुनवाई की बात की थी। हालाँकि निष्पक्ष सुनवाई हर किसी का कानूनी अधिकार है, लेकिन दिलजीत के समर्थन में यह चुनिंदा जल्दबाजी साफ दिखाई दे रही थी। जब पंजाब में हिंदू नेताओं की हत्या की जा रही थी, तब इस सेलिब्रिटी की अंतरात्मा कहाँ थी?

खालिस्तान की स्पष्ट निंदा करने से इनकार

अभिनेत्री से सांसद बनीं कंगना रनौत के साथ ऑनलाइन बहस के दौरान यह पैटर्न और साफ हो गया। किसान आंदोलन के दौरान कंगना ने उनसे बार-बार सिर्फ यह कहने को कहा कि वे खालिस्तान का समर्थन नहीं करते और खालिस्तानी तत्वों की निंदा करते हैं।

दिलजीत इस माँग से बचते रहे और ट्रोल सेनाओं ने सोशल मीडिया पर कंगना पर हमला कर दिया। दिलजीत ने कभी भी साफ तौर पर खालिस्तानियों की निंदा नहीं की।

पुराने विवाद अब एक पैटर्न की तरह दिखते हैं

ये उदाहरण बताते हैं कि वास्तव में एक पैटर्न है। विरोध पारिस्थितिकी तंत्र का समर्थन करना जब खालिस्तानी तत्व दिखाई दे रहे थे, सीधे पूछे जाने पर खालिस्तान की स्पष्ट निंदा करने से इनकार करना, हिंदू नेताओं की लक्षित हत्याओं के आरोपितों के प्रति सहानुभूति रखना और अब ‘सतलुज’।

‘सतलुज’ पर आई प्रतिक्रिया ने इस पूरे इकोसिस्टम को और अधिक बेनकाब कर दिया है। Zee5 से फिल्म हटाए जाने के बाद, जेल में बंद खालिस्तान समर्थक सांसद अमृतपाल सिंह की पार्टी अकाली दल (वारिस पंजाब दे) ने पूरे पंजाब में इसकी सार्वजनिक स्क्रीनिंग आयोजित करना शुरू कर दिया।

गाँवों में प्रोजेक्टर और बड़ी स्क्रीन के जरिए डाउनलोड की गई कॉपियाँ दिखाई गईं। पार्टी नेता रशपाल सिंह सोसन ने इन स्क्रीनिंग को बढ़ावा दिया और अमृतपाल सिंह का एक पुराना वीडियो भी साझा किया जिसमें वह जसवंत सिंह खालरा की तारीफ कर रहा था।

यह कोई छोटी बात नहीं है। अगर जेल में बंद खालिस्तान समर्थक सांसद अमृतपाल सिंह की पार्टी द्वारा किसी फिल्म को अपनाया और प्रसारित किया जा रहा है, तो इससे पता चलता है कि फिल्म की राजनीतिक उपयोगिता है।

उनकी पार्टी ‘सतलुज’ को सिनेमा के रूप में नहीं दिखा रही है, वो इसका इस्तेमाल राजनीतिक सामग्री के रूप में कर रही है। पंजाब पीड़ित भावना और अलगाववादी भावना के इर्द-गिर्द एक नैरेटिव को पुनर्जीवित करने के लिए दिलजीत के चेहरे और खालरा की कहानी का इस्तेमाल कर रही है।

इस तरह आतंक को ‘प्रतिरोध’ के रूप में रीपैकेज किया जाता है

‘सतलुज’ महज एक फिल्म नहीं है। यह खालिस्तानी उग्रवाद को नैतिक प्रतिरोध के रूप में रीपैकेज करने के लंबे समय से चल रहे प्रयास का नया अध्याय है। यह एक पुराना हथकंडा है जो सबसे पहले आतंकवाद के पीड़ितों को गायब करता है, फिर चरमपंथी का मानवीकरण करता है, फिर अकेले राज्य को खलनायक बनाता है और आखिर में दुष्प्रचार पर सवाल उठाने वाले किसी भी व्यक्ति को सिख-विरोधी कह देता है।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि खालिस्तानी दुष्प्रचार पर सवाल उठाना सिख-विरोधी नहीं बल्कि भारत-समर्थक है। यह पंजाब-समर्थक भी है। इस राज्य ने खालिस्तानी आतंकवाद के कारण बहुत कुछ झेला है।

हिंदू उग्रवाद का विरोध करने वाले सिख और पुलिसकर्मी मारे गए। परिवार तबाह हो गए। सरकार से गलतियाँ हुईं और ज्यादतियाँ भी हुईं, लेकिन वह अलगाववादियों और आतंकवादियों का महिमामंडन करने का बहाना नहीं बन सकती।

सुपरस्टार की छवि बरकरार, लेकिन राजनीति बेनकाब

दिलजीत दोसांझ के पास स्थिति साफ करने के लिए सालों का समय था। उनके पास बिना किसी चालाकी भरे शब्दों के यह कहने के लिए सालों थे कि खालिस्तान अस्वीकार्य है और पंजाब में आतंकवाद का महिमामंडन नहीं किया जा सकता। इसके बजाय हर नए विवाद ने सुई को उसी दिशा में धकेला है।

‘सतलुज’ के साथ मुखौटा उतर गया है। सुपरस्टार की छवि बनी हुई है। वैश्विक संगीत कार्यक्रम बने हुए हैं। पॉलिश की हुई PR टीम बनी हुई है। लेकिन इसके पीछे वही राजनीति और विचारधारा खड़ी है जिसके बारे में ऑपइंडिया ने सालों पहले चेतावनी दी थी।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

रामायण को ‘कार्टून’ कहा, ‘गोमूत्र’ का तंज कसा और आलोचकों को FIR से डराया: पढ़ें- कौन हैं TMC नेता नीलांजन दास, जिन्हें ममता बनर्जी के गढ़ में भीड़ ने पीटा

पश्चिम बंगाल में बीजेपी द्वारा तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के 15 साल के ‘दमनकारी शासन’ को खत्म किए हुए दो महीने हो चुके हैं लेकिन TMC नेताओं के खिलाफ जनता का गुस्सा शांत नहीं हुआ है। अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी के बाद अब TMC नेता नीलांजन दास को भी बंगाल के लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 8 जुलाई को कोलकाता के भवानीपुर इलाके में TMC आईटी सेल के प्रमुख और प्रवक्ता नीलांजन दास के साथ स्थानीय लोगों ने मारपीट की।

इस घटना के कई वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए हैं। इन वीडियो में नीलांजन को लोगों के एक समूह से घिरा हुआ देखा जा सकता है। वीडियो में कुछ लोग उन्हें पीटते और घसीटते हुए भी नजर आ रहे हैं। इस दौरान नीलांजन रोते और कई बार लोगों से गुहार लगाते दिखाई देते हैं। वीडियो में नाराज स्थानीय लोगों को नीलांजन दास के लिए ‘चोर-चोर’ कहते हुए सुना जा सकता है।

कोलकाता के भवानीपुर में नीलांजन दास के साथ हुई बदसलूकी राजनीतिक रूप से इसलिए भी अहम है क्योंकि यह इलाका TMC प्रमुख ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता है। जब दास एक पत्रकार से बात कर रहे थे, तो गुस्साई भीड़ ने उन्हें घसीटा। हालाँकि, एक पुलिस अधिकारी TMC नेता को वहाँ से सुरक्षित निकाल ले गए।

आलोचकों के खिलाफ FIR की धमकी देने से लेकर जनता के गुस्से का सामना करने तक: कौन हैं नीलांजन दास?

नीलांजन दास TMC के प्रमुख नेताओं में से एक हैं। वे पार्टी के प्रवक्ता हैं और टीवी न्यूज डिबेट में नियमित रूप से दिखाई देते हैं। नीलांजन TMC के स्टेट जनरल सेक्रेटरी हैं और पार्टी के आईटी एवं सोशल मीडिया विंग के प्रमुख भी हैं।

टीएमसी नेता नीलांजन दास का रिकॉर्ड रहा है कि वे अपनी पार्टी या ममता बनर्जी की आलोचना करने वालों के खिलाफ FIR दर्ज कराने की धमकी देते रहे हैं। नीलांजन दास को TMC की सांसद महुआ मोइत्रा का भी करीबी माना जाता है।

दिसंबर 2025 में नीलांजन दास ने लोकप्रिय X हैंडल ‘Befitting Facts’ चलाने वाले शशांक सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। शशांक सिंह ने कोलकाता में ग्लोबल फुटबॉल स्टार लियोनेल मेसी के दौरे के दौरान कथित बदइंतजामी को लेकर TMC सरकार की आलोचना करते हुए पोस्ट किए थे। इसी X यूजर ने महुआ मोइत्रा के खिलाफ भी आलोचना करते हुए पोस्ट किए थे।

नीलांजन दास द्वारा 11 दिसंबर को साइबर शिकायत दर्ज कराने के बाद शशांक सिंह को गिरफ्तार किया गया था। शिकायत में ‘Befitting Facts’ और एक अन्य X यूजर शुभम पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने TMC सांसद महुआ मोइत्रा पर संसद के अंदर ई-सिगरेट पीने का आरोप लगाते हुए ‘फर्जी, मनगढ़ंत और मानहानिकारक पोस्ट’ शेयर किए थे।

नीलांजन दास ने अपनी शिकायत को X हैंडल पर शेयर करते हुए लिखा था, “बीजेपी आईटी सेल के मूर्खों @subhsays और @BefittingFacts के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है क्योंकि उन्होंने सांसद @MahuaMoitra के खिलाफ बेबुनियाद और मानहानिकारक ट्वीट किए।”

उस समय नीलांजन दास का X हैंडल भी सस्पेंड कर दिया गया था। इस साल अप्रैल में नीलांजन ने X यूजर के खिलाफ ममता बनर्जी का कार्टून पोस्ट करने को लेकर FIR दर्ज कराई थी।

जब एक X यूजर ने दास की इस उत्पीड़न करने वाली रणनीति की आलोचना करते हुए कहा कि ‘भारत एक लोकतंत्र है और TMC नेता को शर्म आनी चाहिए’ तो उन्होंने उस यूजर को ही धमकी दे डाली। इसके जवाब में नीलांजन दास ने लिखा, “4 मई के बाद आपको लोकतंत्र का असली रूप देखने को मिलेगा।”

दास जाहिर तौर पर BJP और उसके समर्थकों के खिलाफ TMC की चुनाव के बाद की हिंसक राजनीतिक बदले की कार्रवाई के बारे में बात कर रहे थे। हालाँकि, बंगाल के लोगों ने बीजेपी को शानदार जीत दिलाई और TMC को अपमानजनक हार दी।

पिछले कुछ वर्षों में नीलांजन दास ने ऑनलाइन धमकियों और FIR के जरिए TMC सरकार के कई आलोचकों को निशाना बनाया है। जून 2024 में कोलकाता की एक हाउसिंग सोसाइटी के लोगों को बीजेपी के पक्ष में वोट देने के लिए TMC सरकार द्वारा निशाना बनाया जा रहा था।

सेंट्रल कोलकाता के बेलेघाटा इलाके में स्थित ‘सनराइज हाइट्स’ के बाहर कचरा फेंका जा रहा था क्योंकि उस हाउसिंग कॉम्प्लेक्स के 543 निवासियों ने TMC के खिलाफ वोट दिया था।

बेहद बेशर्मी दिखाते हुए नीलांजन दास ने हाउसिंग सोसाइटी के बाहर कचरा फेंकने की कार्रवाई को ‘बदला लेने का अहिंसक तरीका’ बताया था।

TMC में सायोनी घोष से लेकर ममता बनर्जी तक कई हिंदू-विरोधी नेता हैं। ममता बनर्जी खुद हिंदू काफिरों से लड़ने की बात कहती रही हैं। नीलांजन दास भी TMC के टॉप हिंदू-विरोधी नेताओं में शामिल हैं।

2020 में जब देश कोविड महामारी के कारण लॉकडाउन का पालन कर रहा था, तब नीलांजन दास ने X पर एक पोस्ट किया था जिसमें उन्होंने हिंदू महाकाव्य रामायण को तंज कसते हुए कार्टून बताया था। उन्होंने ‘गोमूत्र’ वाला तंज भी कसा था।

2007 में दास ने एक X पोस्ट में वही बात दोहराई जो बात कॉन्ग्रेस कहती आई है। उन्होंने भगवान राम को भगवान ना मानते हुए एक कहा, “कौन से भगवान? रामायण महाकाव्य का एक पौराणिक पात्र।”

ऑनलाइन हिंदू-विरोध के अलावा, आलोचना करने वाली आवाजों के खिलाफ FIR की धमकियाँ देने और वैचारिक विरोधियों का अपमान करने का भी नीलांजन दास का रिकॉर्ड रहा है।

जुलाई 2025 में जब लोकप्रिय अभिनेत्री और BJP नेता रूपाली गांगुली ने तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के शासन की आलोचना की तो नीलांजन दास ममता बनर्जी के बचाव में उतर आए। हालाँकि, दास ने गांगुली की टिप्पणियों का जवाब नहीं दिया बल्कि उन्हें ‘फ्लॉप सोप अभिनेत्री’ कहकर खारिज कर दिया।

दास ने 19 जुलाई 2025 को लिखा, “भारत की सबसे वरिष्ठ महिला राजनेता को एक फ्लॉप सोप अभिनेत्री से लेक्चर लेने की जरूरत नहीं है। FO!”

अपने गुंडों जैसे व्यवहार को दिखाते हुए दास ने बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा पर एक लाइव टीवी डिबेट के दौरान वरिष्ठ सरकारी सलाहकार कंचन गुप्ता को ‘बूढ़ी चुड़ैल’ कहा था।

पश्चिम बंगाल में 4 मई के चुनाव नतीजों के बाद रिपोर्ट्स सामने आईं कि नीलांजन दास के खिलाफ कम से कम दो FIR दर्ज की गईं। एक FIR बंगाल के श्रीरामपुर में और दूसरी असम में दर्ज हुई थी। उस समय दास ने अपना X अकाउंट कुछ समय के लिए डीएक्टिवेट कर दिया था।

हैरानी की बात नहीं है कि सोशल मीडिया पर कई लोग कोलकाता में नीलांजन दास पर हुए हमले को ‘कर्मा’ बता रहे हैं क्योंकि आखिरकार वे अब उन्हीं धमकियों और डराने-धमकाने का सामना कर रहे हैं, जिनका इस्तेमाल वे वर्षों से अपनी पार्टी के आलोचकों के खिलाफ करते रहे थे।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)

‘तुम्हें जहाँ से निकाला गया है, उन्हें भी वहाँ से निकालो’: पढ़ें- कैसे अयोध्या में विशाल मस्जिद ना बनने के पीछे चंदे का अकाल नहीं, जिहादी मानसिकता है असल वजह

यह खबर देश के हर नागरिक के लिए बेहद विचारणीय है। अयोध्या के धन्नीपुर में बनने वाली प्रस्तावित भव्य मस्जिद के लिए मुस्लिम समुदाय से उतने पैसे भी नहीं मिले, जितने की उम्मीद की जा रही थी। सुनने में शायद यह बात अजीब लगे लेकिन हकीकत में यह हँसने की नहीं बल्कि गहराई से सोचने की बात है। यह इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि एक खास समुदाय की सोच में कितना कट्टरपंथ और जिद्द बसी है।

ये मुस्लिम समुदाय सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मिली दूसरी जगह पर एक भव्य मस्जिद, अस्पताल या लाइब्रेरी बनाने के लिए अपनी जेब से पैसा देने को तैयार नहीं हैं। वे आज भी इसी बात पर अड़े हैं कि राम जन्मभूमि की वही जमीन उनकी थी और वे उसी जमीन के मोह में फँसे हैं। यह मानसिकता केवल अयोध्या तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में वक्फ की हर संपत्ति और विवादित ढांचे पर उनकी इसी सोच को बयाँ करती है।

चंदे का महासंकट: क्यों औंधे मुँह गिरी भव्य मस्जिद की योजना?

साल 2019 में जब सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया, तो उसके बाद सरकार ने अयोध्या के धन्नीपुर गाँव में मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन दी थी। इस जमीन पर मुस्लिम ट्रस्ट ने बहुत बड़ा प्लान बनाया था। उन्होंने सोचा था कि यहाँ एक शानदार और भव्य मस्जिद बनेगी। साथ ही, लोगों की भलाई के लिए 300 बेड का एक बड़ा अस्पताल, एक बढ़िया लाइब्रेरी और एक बड़ा लंगर (कम्युनिटी किचन) भी तैयार किया जाएगा। पूरा नक्शा और तैयारी एकदम पक्की थी।

लेकिन असलियत में हुआ इसके ठीक उलटा। खुद मुस्लिम समाज के लोगों ने ही इस पूरे प्रोजेक्ट में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और इससे अपना मुँह मोड़ लिया। अपनों के इस तरह साथ छोड़ने की वजह से यह बड़ा और खूबसूरत प्लान पूरी तरह ठप हो गया। अब संस्था के बड़े अधिकारियों का कहना है कि वे यहाँ कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि सिर्फ एक बहुत छोटी सी मस्जिद बनाएँगे। इस छोटी मस्जिद को खड़ा करने के लिए भी कम से कम 3 से 5 करोड़ रुपए चाहिए, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी समाज से सिर्फ डेढ़ करोड़ रुपए का ही चंदा मिल पाया है।

मजहबी किताबों की उल्टी व्याख्या और जमीन का मोह

देखिए, मस्जिद के लिए चंदा न मिलने की असली वजह यह बिल्कुल नहीं है कि लोगों के पास पैसे खत्म हो गए हैं। इसके पीछे असल में एक गहरी मजहबी और राजनीतिक सोच काम कर रही है। इस पुरानी और कट्टरपंथी सोच में जीत और हार का पैमाना हमारे आज के रक्षा विज्ञान से बिल्कुल अलग है। इस मानसिकता में लोग तब तक खुद को हारा हुआ मानते ही नहीं, जब तक कि उनके कब्जे से जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा भी हमेशा के लिए न चला जाए। सीधा सा नियम समझ लीजिए… इनके लिए किसी भी तरह जमीन पर अपना कब्जा बनाए रखना ही सबसे बड़ी जीत है।

इस अजीब जिद के पीछे कुछ कट्टरपंथी विचारकों की अपनी तरह से की गई व्याख्या है। जैसे, कुरान के सूरा अल-बकरा की आयत 191 में एक जिक्र आता है कि ‘तुम्हें जहाँ से निकाला गया है, उन्हें भी वहाँ से निकालो।’ शुरुआत में यह बात सिर्फ मक्का की जमीन को वापस पाने के लिए कही गई थी, लेकिन समय के साथ कट्टरपंथी सोच के लोगों ने इसे पूरी दुनिया की जमीनों से जोड़ दिया। उनकी सोच यह बन गई कि जो जमीन एक बार ‘दार-अल-इस्लाम’ यानी इस्लामिक शासन के नीचे आ गई, वह हमेशा के लिए उन्हीं की हो गई। उसे किसी भी गैर-मुस्लिम के हाथ में जाने देना ये अपनी सबसे बड़ी मजहबी हार मानते हैं। यही वजह है कि इतिहास में सदियों पहले स्पेन (अंडालूसिया) में हुई अपनी हार का रोना ये लोग आज भी रोते हैं।

वक्फ संपत्तियों पर अवैध दावा और जमीन हड़पने की वही पुरानी नीति

यही रवैया हमें वक्फ बोर्ड और बाकी जमीनी विवादों में भी साफ देखने को मिलता है। इनकी सोच बहुत सीधी है, जिस भी सरकारी या प्राइवेट जमीन पर एक बार हक जता दिया या जिसे अपना मान लिया, उसे फिर किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं है। उसे छोड़ना ये अपनी नाक कटने जैसा या अपनी हार मानते हैं।

यही वजह है कि जब भी सरकार या अदालतें वक्फ की जमीनों की जाँच करने या उनके नियमों को सुधारने की कोशिश करती हैं, तो ये लोग तुरंत विरोध में खड़े हो जाते हैं और हंगामा शुरू कर देते हैं। इनके लिए जमीन हाथ से जाने का सीधा मतलब है अपनी ताकत का कम होना। पुरानी सोच के मुताबिक, जो जमीन एक बार इनके कब्जे में आ गई, उसे किसी और को देना ये अपनी सबसे बड़ी हार समझते हैं। इसी चक्कर में ये अदालती फैसलों को भी मन से स्वीकार नहीं कर पाते और हर जगह कोई न कोई नया विवाद खड़ा रखते हैं।

प्रशासनिक पेंच और अब सरकारी सहायता पर टिकी निगाहें

अयोध्या के धन्नीपुर में इस काम के समय पर शुरू न होने की वजह सिर्फ पैसों की कमी ही नहीं थी, बल्कि इस मस्जिद को बनाने वाले ट्रस्ट की अपनी कमियाँ भी थीं। सरकारी दफ्तर से नक्शा पास कराने और उसकी फीस जमा करने जैसे कागजी कामों में ही इस ट्रस्ट ने बहुत लंबा समय खराब कर दिया। छोटे-छोटे तकनीकी कामों को भी ये लोग समय पर नहीं संभाल पाए।

अब जब मुस्लिम समाज के लोगों ने इस बड़े प्रोजेक्ट को पूरी तरह नकार दिया है और चंदा देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, तो ये लोग अंदर ही अंदर एक नया रास्ता ढूँढ रहे हैं। ट्रस्ट के लोगों की बातों से अब ऐसा लग रहा है कि जब अपनों से कोई मदद नहीं मिली, तो इनकी नजरें सरकार की तरफ टिक गई हैं। अब ये जुगाड़ लगाने में जुटे हैं कि कैसे भी करके सरकारी मदद या विकास का पैसा मिल जाए, ताकि किसी तरह इनकी इज्जत बच सके।

एक तरफ भव्य राम मंदिर, दूसरी तरफ खोखली जिद

अगर आप इस पूरे मामले को ध्यान से देखें, तो यह एक तरफ भारत के गौरव और हमारे भव्य राम मंदिर के शानदार निर्माण को दिखाता है। वहीं दूसरी तरफ, यह कुछ लोगों की पुरानी और जिद से भरी सोच की पोल भी खोलता है। एक तरफ जहाँ देश-विदेश से करोड़ों हिंदुओं ने अपनी मर्जी से दिल खोलकर चंदा दिया और राम मंदिर का सपना पूरा कर दिखाया, वहीं दूसरी तरफ सिर्फ जिद और कट्टरपंथ के चक्कर में मुस्लिम समाज अपनी ही इस नई मस्जिद के लिए थोड़ी सी रकम भी जमा नहीं कर पाया।

चाहे वाराणसी का ज्ञानवापी मामला हो, धार की भोजशाला का विवाद हो या फिर वक्फ कानून में सुधार की बात… हर जगह सिर्फ जमीन पर अपना कब्जा जमाए रखने की यह मानसिक लड़ाई साफ दिखती है। अयोध्या के धन्नीपुर की मस्जिद का इतना बड़ा प्लान अचानक बहुत छोटा हो जाना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है। जब तक लोग सच को स्वीकार नहीं करेंगे और अपनी सोच नहीं बदलेंगे, तब तक सिर्फ विरोध और जिद के दम पर कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता।

मुंबई की बारिश, रंग-बिरंगी जर्सियाँ और FIFA विश्व कप का नशा… जारी हैं फुटबॉल के खूबसूरत किस्से

मुंबई में बीते दो हफ्तों में जोरदार बारिश हुई है। सड़कें नदियाँ बन गई हैं। कुछ इलाकों में तो पिछले तीन दिनों से बिजली-पानी व राशन आदि की आपूर्ति नहीं हो सकी है।

तमाम बड़े शहर ठप्प पड़ गए हैं। मगर कल से बारिश थोड़ा कम हुई है। हालाँकि स्कूलों की छुट्टी कर दी गई है; सो, बच्चे वापस मैदानों की ओर लौटने लगे हैं। मैं कुछ पल ठहरकर आजाद मैदान में बच्चों को खेलते हुए देख रहा हूँ। इन कुछ पलों में जिंदगी बिल्कुल ठहर सी गई है।

मैदानों में जलभराव है, मगर इसकी चिंता किए बगैर विभिन्न राष्ट्रीय टीमों की रंग-बिरंगी जर्सियां पहने नन्हें बच्चे खुशी-खुशी फुटबॉल खेल रहे हैं। जिधर भी गेंद जा रही है पच्चीस-तीस बच्चे उधर ही छप्प-छप्प करते हुए दौड़ रहे हैं। जो थोड़े बड़े बच्चे हैं, वह बेहतरीन तरीके से खेलते नजर आ रहे हैं। पास में ही फैशन स्ट्रीट की कई दुकानों में फुटबॉल की जर्सियाँ लटकी हुई हैं। अमूमन जिन राष्ट्रों का हमने नाम भी नहीं सुना, उनकी टीमों की जर्सियाँ भी धड़ल्ले से बिक रही हैं। कोलाबा का कॉस्वे मार्केट भी रंग-बिरंगी जर्सियों से सजा हुआ है। जो लड़के-लड़कियाँ फुटबॉल के दीवाने हैं, वह जानते होंगे कि किसी रोज बड़ा होकर पैसे जोड़ कर नाईकी, एडिडास या पूमा की ओरिजनल जर्सी ले पाना उन सभी का एक ख्वाब रहता है। तब तक, बाजारों में बिक रही ऐसी ही जर्सियाँ उनके दिलों को सुकून देती हैं।

कॉर्पॉरेट दफ्तरों में भी बड़े मैचों के दिन ‘जर्सी-डे’ घोषित कर दिया जा रहा है। लोग अपनी पसंदीदा टीम की जर्सी पहने दफ्तर पहुँच रहे हैं। फुटबॉल को पागलपन की हद तक चाहने वाले केरल से तो चंद रोज पहले अर्जेंटीना-ब्राजील आदि की जर्सी पहने नन्हें बच्चों का स्कूल बसों से उतरकर कतार बनाकर विद्यालय में घुसने का विडियो भी वायरल हुआ था। कुछ दिनों के लिए फुटबॉल ने सभी को अपने आगोश में ले लिया है।

क्या आपने इस विश्व कप में हुआ इंग्लैंड बनाम मेक्सिको का मुकाबला देखा था? क्या आपने सेनेगल बनाम बेल्जियम का मुकाबला देखा था? क्या आपने पेराग्वे को जर्मनी की टीम को हराते हुए देखा था? क्या आपने अर्लिंग हालांड को ब्राजील के खिलाफ दो गोल दागते हुए देखा था? क्या आपने काबो वर्दे को पहले स्पेन, उरुग्वे और फिर अर्जेंटीना के खिलाफ शानदार तरीके से अंतिम क्षणों तक बिना हार माने वीरता से लड़ते देखा था? क्या आपने गत विजेता अर्जेंटीना को मिस्र के खिलाफ मैच की अंतिम घड़ी तक संघर्ष करते हुए देखा था?

अगर आपने इस विश्व कप में खेले जा रहे एक से बढ़कर एक मुकाबले नहीं देखे तो आप मैदान पर काफी कुछ बेहतरीन घटित होता हुआ देखने से वंचित रह गए हैं।

फुटबॉल शायद मानवों द्वारा रचित सबसे रोचक बॉल-गेम है। जीवन की ही भाँति यहाँ अंत तक कुछ भी हो सकता है, बशर्ते हम हार न मानें। फुटबॉल 90 मिनट में इतना कुछ दे जाता है कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते। शायद इस खेल जैसा एड्रिनलिन रश किसी दूसरे खेल में नहीं।

अब, जबकि राउंड ऑफ 16 के सभी मुकाबले खेले जा चुके हैं, आज देर रात से क्वार्टर फाइनल दौर के मुकाबले खेले जाने लगेंगे। अभी तक यह टूर्नामेंट बेहद रोचक रहा है। मेजबान राष्ट्रों द्वारा संपूर्ण विश्व से मेक्सिको, अमेरिका व कनाडा पहुंचे खेलप्रेमियों का गर्मजोशी से स्वागत, एक से एक शानदार मैच। काबो वर्दे, कुराकाओ, इक्वाडोर, पेराग्वे जैसे राष्ट्रों की हार न मानने की जिद, अफ्रीकी राष्ट्रों का वैश्विक मंच पर शानदार प्रदर्शन, युवा पीढ़ी के नवीन सितारों का उदय; क्या कुछ देखने को नहीं मिला भला अबतक हमें। इस विश्व कप को शायद इतने सारे कमबैक्स, सेटबैक्स व अंतिम मिनटों में दागे इक्वलाइज़र्स के लिए याद रखा जाएगा।

खैर, कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। अभी तो मात्र इंटरवल भर हुआ है। टूर्नामेंट आज से और भी भयंकर होने जा रहा है। अब, आज रात, पहला क्वार्टर फाइनल मुकाबला खेला जाना है। विश्व कप की चमचमाती स्वर्णिम ट्रॉफी अब विजेता से मात्र तीन जीत दूर है।

पहले क्वार्टर फाइनल में आज देर रात भारतीय समयानुसार डेढ़ बजे, बेहतरीन फॉर्म में चल रही मोरक्को की टीम पिछले संस्करण की उपविजेता फ्रांस से भिड़ने जा रही है।

मोरक्को के पास अंत तक हार न मानने का जज्बा है। फ्रांस के पास एक बवंडर की भाँति अटैक करने वाली टीम। यह निश्चित रूप से एक ब्लॉकबस्टर मैच होगा। दो बार की विजेता फ्रांस, इस विश्व कप में, अबतक सबसे संतुलित टीम नजर आई है। वह जितना बेहतरीन अटैक करती है उतना ही शानदार उनका डिफेंस भी है। रक्षापंक्ति में विलियम सालीबा के नेतृत्व में जूल्स कूंदे, उपामेकानो, कोनाटे, हर्नान्देज़ बंधु व लूका डीने जैसे खिलाड़ियों की फौज मौजूद है।

इनके पास बेंच पर चेर्की, माटेटा, थुर्रम, देसिरे दोऊ जैसे अटैकर्स हैं जो बेंच से आकर भी कुछ पलों में मैच का रुख बदलने का माद्दा रखते हैं। यह उन्हें बेहद घातक बना देता है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह टीम विश्व कप का खिताब जीतने के मकसद से ही इस टूर्नामेंट में आई है और इनके विजय-रथ को रोकने का दुस्साहस शायद ही कोई टीम कर सकेगी। अभी तक के इनके तमाम मैच तो यही दर्शाते हैं।

वहीं, मोरक्को के पास इस्माइल साइबारी व ब्राहीम डियाज के रूप में दो भाले हैं। मोरक्को ने नीदरलैंड्स को सिर्फ हराया भर नहीं था बल्कि चारों खाने चित्त कर दिया था। उन्होंने रोनाल्ड कोमान की नीदरलैंड्स पर मैच के अंत तक ऐसा शिकंजा कसा कि नीदरलैंड्स अपना नैसर्गिक खेल खेल ही नहीं सकी।

मोरक्को को अब मात्र एक और अफ्रीकी टीम भर मानना बड़ी ग़लती होगी। वह पिछले संस्करण में सेमीफाइनल खेल चुके हैं और इस दफा भी अपने सभी मैचों में बेहतरीन अंदाज में खेलते हुए दिखे हैं।

गौरतलब है कि यह दोनों ही टीमें कतर विश्व कप के सेमीफाइनल में आमने-सामने थीं। जहां फ्रांस ने 2-0 से जीत जरूर हासिल कर ली थी परन्तु मोरक्को ने उनको उस रोज़ अल-बाएत स्टेडियम के मैदान में नब्बे मिनट चले मुकाबले में नरक के दर्शन करा दिए थे। मोरक्को पिछली बार का बदला भी लेना चाहेगा।

मोरक्को एक ऐसी टीम है जिसे आप कमतर कर के नहीं आंक सकते। वो सदैव मैदान में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। अचरफ हाकीमी के नेतृत्व में बोनू, बाऊदादी, अज़्ज़ेदीन ऊनाही, अमराबात व माज़ारूई जैसे खिलाड़ियों से लैस मोरक्को जरूर आज रात बड़ा शिकार करने के लिए आतुर होगी। यह मैच वाकई काफी रोचक होने जा रहा है।

एटलस लायंस क्या लेस ब्ल्यूज़ का रथ रोक सकेंगे यह पता चलेगा आज देर रात बोस्टन में होने जा रहे इस मुकाबले के बाद।

फीफा विश्व कप का महासंग्राम जारी है।
फुटबॉल के खूबसूरत किस्से भी जारी रहेंगे।
बने रहिए साथ।
वीवा ला फुटबॉल।

ऑस्ट्रेलिया के लोगों को अपना बुढ़ापा सँवारने के लिए भारत से आस, इन्वेस्ट किए ₹2800 करोड़: जानिए कौन सी स्कीम में मुनाफा पाकर AustralianSuper हुई गदगद

ऑस्ट्रेलिया की एक बहुत बड़ी कंपनी है। इसका नाम ‘ऑस्ट्रेलियनसुपर’ है। यह कंपनी वहाँ के लोगों के बुढ़ापे का पैसा यानी पेंशन संभालती है। यह ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा पेंशन फंड है। इस कंपनी ने भारत को लेकर एक बहुत बड़ा फैसला किया है। वह भारत सरकार के कामकाज और नीतियों से बहुत खुश है। इसी वजह से कंपनी ने भारत में और ज्यादा पैसा लगाने का एलान किया है।

यह कंपनी भारत की एक खास सरकारी स्कीम में पैसा लगा रही है। इस स्कीम का नाम ‘नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड’ (NIIF) है। इस बार कंपनी भारत में ₹2,800 करोड़ का नया निवेश करने जा रही है। भारत के लिए यह बहुत बड़ी बात है। इस नए निवेश को मिलाकर कंपनी अब तक भारत में बहुत सारा पैसा लगा चुकी है। अब भारत के अलग-अलग बाजारों में इस कंपनी का कुल निवेश ₹18,600 करोड़ से भी ज्यादा हो गया है। इससे साफ पता चलता है कि दुनिया का भारत पर भरोसा लगातार बढ़ रहा है।

भारत की स्कीम से मिला रिकॉर्ड तोड़ मुनाफा

यह पूरी कहानी भारत की तरक्की को दिखाती है। इस ऑस्ट्रेलियाई कंपनी ने भारत में पहली बार निवेश नहीं किया है। इससे पहले साल 2019 में भी कंपनी ने भारत की इसी एनआईआईएफ (NIIF) स्कीम पर भरोसा जताया था। तब कंपनी ने भारत में ₹1,350 करोड़ का निवेश किया था। कंपनी के मुख्य निवेश अधिकारी शॉन मैनुएल हैं। उन्होंने खुद इस निवेश को लेकर एक बड़ी बात बताई है।

शॉन मैनुएल ने कहा कि साल 2019 में किया गया वह निवेश उनके लिए वरदान साबित हुआ। वह निवेश उनकी कंपनी के इतिहास में सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाले प्रोजेक्ट्स में से एक रहा। इस भारतीय स्कीम से कंपनी को उम्मीद से कहीं ज्यादा फायदा मिला। उन्हें यहाँ बहुत तगड़ा रिटर्न मिला। इसी शानदार मुनाफे और अच्छे अनुभव को देखकर कंपनी के लोग गदगद हो गए। यही वजह है कि वे भारत में दोबारा पैसा लगाने के लिए खुद आगे आए हैं।

ऑस्ट्रेलिया के बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाएगा भारत

भारत और ऑस्ट्रेलिया में पेंशन का सिस्टम बिल्कुल अलग है। हमारे भारत में नौकरी करने वालों के लिए एक सरकारी व्यवस्था है। इसे हम ईपीएफओ (EPFO) कहते हैं। यहाँ हर महीने सैलरी से कटने वाला PF का पैसा एक ही सरकारी जगह जमा होता है। लेकिन ऑस्ट्रेलिया में ऐसा कोई एक बड़ा सरकारी सिस्टम नहीं है। वहाँ का नियम अलग है।

ऑस्ट्रेलिया में ऑस्ट्रेलियनसुपर जैसी बड़ी प्राइवेट कंपनियाँ यह काम करती हैं। ये कंपनियाँ लोगों की नौकरी के दौरान उनका पैसा जमा करती हैं। फिर बुढ़ापे में उन्हें पेंशन देती हैं। इसे वहाँ रिटायरमेंट फंड भी कहते हैं। अब ऑस्ट्रेलिया के आम लोग भारत पर बहुत बड़ा भरोसा कर रहे हैं। वे अपने बुढ़ापे की गाढ़ी कमाई को सुरक्षित रखना चाहते हैं।

साथ ही वे उस पैसे पर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा भी कमाना चाहते हैं। इसके लिए उन्हें भारत सबसे सुरक्षित और अच्छा देश लग रहा है। ऑस्ट्रेलियनसुपर कोई छोटी-मोटी कंपनी नहीं है। इस अकेली कंपनी के पास ऑस्ट्रेलिया के 36 लाख से ज्यादा लोगों का पैसा जमा है। अगर इस पूरे पैसे को भारतीय रुपए में देखें, तो यह करीब ₹23,12,000 करोड़ से भी ज्यादा बनता है। यह बहुत बड़ी रकम होती है।

अब इस विशाल फंड का एक बड़ा हिस्सा भारत में आने जा रहा है। कंपनी इस पैसे को भारत के विकास से जुड़े कामों में लगाएगी। इस निवेश से दोनों देशों को बहुत बड़ा फायदा होगा। पहला फायदा ऑस्ट्रेलिया के बुजुर्गों को मिलेगा।

जब भारत की सरकारी स्कीम से कंपनी को बढ़िया मुनाफा होगा, तो वहाँ के बुजुर्गों की पेंशन की रकम बढ़ जाएगी। दूसरा बड़ा फायदा हमारे अपने देश भारत को होगा। इस विदेशी पैसे से भारत में बड़े-बड़े हाईवे, पुल, बिजली और पानी जैसे जरूरी प्रोजेक्ट्स तैयार होंगे। इससे हमारे देश का इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत मजबूत हो जाएगा।

भारत की तारीफ में पढ़े कसीदे

ऑस्ट्रेलिया की इस बड़ी कंपनी के बड़े अधिकारियों ने भारत सरकार की खुलकर तारीफ की है। उन्होंने भारत के काम करने के तरीके को बहुत सराहा है। अधिकारियों ने बताया कि वे भारत में पैसा क्यों लगा रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह भारत में हो रही तेज तरक्की है। भारत की अर्थव्यवस्था बहुत मजबूती से आगे बढ़ रही है। यहाँ का मध्यम वर्ग यानि मिडिल क्लास भी बहुत तेजी से बड़ा हो रहा है।

इसके पास सामान खरीदने और खर्च करने के लिए अच्छा पैसा है। बाजार में इस रौनक को देखकर विदेशी कंपनियाँ भारत की तरफ आकर्षित हो रही हैं। इसके अलावा एक और सबसे बड़ी बात है। वह बात है भारत सरकार के नियम और कानून। अधिकारियों ने कहा कि भारत सरकार की नीतियाँ हमेशा एक जैसी रहती हैं। यहाँ बार-बार नियम बदलते नहीं हैं। इससे विदेशी कंपनियों का काम करना आसान हो जाता है। वे सरकार पर पूरा भरोसा कर पाती हैं।

भारत सरकार ने बाहर के देशों से आने वाले पैसे के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं। अब विदेशियों के लिए भारत में पैसा लगाना और बिजनेस शुरू करना बहुत आसान हो चुका है। कागजी काम भी अब ज्यादा पेचीदा नहीं रहा। भारत सरकार की इसी ईमानदारी और अच्छे माहौल को देखकर कंपनी का भरोसा मजबूत हुआ है। इसी पक्के भरोसे के कारण ऑस्ट्रेलियनसुपर ने भारत में अपना निवेश इतना ज्यादा बढ़ाने का बड़ा फैसला लिया है।

क्या है यह एनआईआईएफ (NIIF) स्कीम?

एनआईआईएफ (NIIF) स्कीम का पूरा नाम ‘नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड’ है। भारत सरकार ने इस स्कीम को साल 2015 में शुरू किया था। इसे आप सरकार का एक बहुत बड़ा गुल्लक कह सकते हैं। सरकार ने यह गुल्लक क्यों बनाया? इसका एक बहुत बड़ा कारण था। सरकार चाहती थी कि दुनिया भर के अमीर और बड़े निवेशक भारत में अपना पैसा लगाएँ। वे भारत के विकास में भागीदार बनें। इसी सोच के साथ इस खास फंड की शुरुआत की गई थी।

अब समझते हैं कि इस स्कीम में काम कैसे होता है। जब विदेशी कंपनियाँ या बड़े बैंक इस फंड में अपना पैसा डालते हैं, तो भारत सरकार उस पैसे को देश के विकास में लगाती है। इस पैसे से हमारे देश में बड़े-बड़े काम होते हैं। जैसे आलीशान और चौड़े हाईवे बनाए जाते हैं। नदियों पर मजबूत पुल तैयार होते हैं। बड़े-बड़े समुद्री बंदरगाह और नए एयरपोर्ट बनाए जाते हैं। इसके अलावा बिजली, पानी और अन्य जरूरी सुविधाएँ भी इसी पैसे से सुधारी जाती हैं। यानी विदेशियों के पैसे से हमारे देश का ढांचा मजबूत होता है।

इस स्कीम की सबसे अच्छी बात इसका सुरक्षित होना है। जब विदेशी कंपनियाँ इस सरकारी स्कीम में पैसा लगाती हैं, तो उन्हें डूबने का कोई डर नहीं रहता। मोदी सरकार उन्हें पूरी सुरक्षा देती है। साथ ही उन्हें इस पैसे पर बहुत अच्छा और तय मुनाफा भी मिलता है। दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले भारत में निवेश करना बहुत फायदेमंद साबित हो रहा है। जब विदेशी कंपनियों को दिखता है कि उनका पैसा यहाँ पूरी तरह सुरक्षित है और कमाई भी तगड़ी हो रही है, तो वे खुद-ब-खुद भारत की तरफ खींची चली आती हैं। यही वजह है कि आज दुनिया भर के बड़े निवेशक भारत पर आँख मूंदकर भरोसा कर रहे हैं।

मेलबर्न में जुटे दोनों देशों के प्रधानमंत्री और बड़े-बड़े बिजनेसमैन

इस बहुत बड़े और ऐतिहासिक निवेश का एलान मेलबर्न शहर में किया गया। वहाँ ‘ऑस्ट्रेलिया-इंडिया सीईओ फोरम‘ नाम की एक बहुत बड़ी बैठक चल रही थी। इसी बैठक के दौरान इस निवेश की घोषणा हुई। यह मौका दोनों देशों के लिए बेहद खास था। इस बड़े कार्यक्रम में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद मौजूद थे। उनके साथ ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज भी वहाँ बैठे थे। दोनों देशों के राष्ट्रध्यक्षों का एक साथ आना इस बात का सबूत है कि यह डील कितनी बड़ी है।

इस बैठक में सिर्फ दोनों देशों के प्रधानमंत्री ही नहीं थे। उनके अलावा वहाँ दुनिया भर के दिग्गज लोग जुटे थे। बैठक में दोनों देशों के 200 से भी ज्यादा बड़े-बड़े बिजनेस लीडर्स और बिजनेसमैन शामिल हुए थे। इसके साथ ही दोनों देशों की बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी के चांसलर और वाइस-चांसलर भी वहाँ आए हुए थे।

इस महा-सम्मेलन में ऑस्ट्रेलियनसुपर कंपनी के सबसे बड़े अधिकारी पॉल श्रोडर ने भी हिस्सा लिया था। उन्होंने भारत के साथ काम करने और इस नई साझेदारी को लेकर अपनी खुशी जाहिर की। उन्होंने माना कि भारत के साथ मिलकर काम करना उनके लिए फायदे का सौदा है।

मोदी के भारत में हर तरफ हैं निवेश के बड़े मौके

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बड़ी बैठक में विदेशी निवेशकों का बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने दुनिया के सामने नए भारत की असली ताकत और खूबियों को रखा। आज का भारत बहुत तेजी से बदल रहा है। यहाँ डिजिटल क्रांति आ चुकी है और हर काम मोबाइल-इंटरनेट से चुटकियों में हो जाता है। सरकार लगातार नए और अच्छे आर्थिक सुधार कर रही है, जिससे भारत में व्यापार करना बहुत आसान और तेज हो गया है।

PM मोदी ने ऑस्ट्रेलिया की कंपनियों को भारत आने का खुला न्योता दिया। उन्होंने कंपनियों से यहाँ अपनी फैक्ट्रियाँ लगाने, प्रदूषण मुक्त बिजली बनाने और मोबाइल-कंप्यूटर की चिप (सेमीकंडक्टर) तैयार करने को कहा। आजकल भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ (EV), ऑनलाइन बिजनेस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं, जहाँ विदेशी कंपनियों के लिए कमाई के बहुत बड़े मौके हैं।

इस महा-बैठक में दोनों देशों के बीच रक्षा यानी देश की सुरक्षा को लेकर भी कई ऐतिहासिक फैसले हुए हैं। भारत और ऑस्ट्रेलिया मिलकर सेना से जुड़े आधुनिक सामान बनाने के लिए एक ‘डिफेंस इनोवेशन कॉरिडोर’ तैयार करेंगे। दोनों देशों ने मिलकर आतंकवाद को जड़ से खत्म करने पर बहुत जोर दिया है। एक संयुक्त रक्षा घोषणा के जरिए दोनों देशों की सेनाओं के बीच आपसी तालमेल को और मजबूत किया जाएगा, जिससे वे एक-दूसरे से नई तकनीक और हुनर सीखेंगी। इसके साथ ही समुद्री सीमाओं की सुरक्षा और निगरानी को बेहतर बनाने के लिए ‘मैरीटाइम सिक्योरिटी रोडमैप’ पर काम तेज होगा। इस दोस्ती और भरोसे को और बढ़ाने के लिए भारतीय सेना के एक अधिकारी को ऑस्ट्रेलिया के डिफेंस कॉलेज में तैनात भी किया जाएगा।

बिजली और ऊर्जा के मामले में भी दोनों देशों ने एक नया इतिहास रच दिया है। भारत में बिजली की जरूरतों को पूरा करने और इसकी कमी को दूर करने के लिए दोनों देशों के बीच यूरेनियम को लेकर एक बहुत बड़ा समझौता हुआ है। इसके तहत ऑस्ट्रेलिया अब भारत को यूरेनियम की सुरक्षित सप्लाई करेगा, जो भारत के परमाणु बिजली घरों के काम आएगा। इससे हमारे देश में बिना किसी प्रदूषण के भारी मात्रा में बिजली बनाई जा सकेगी। इतना ही नहीं, भारत ने अपनी रणनीति बदलते हुए ऑस्ट्रेलिया से एलएनजी (LNG) गैस, कोयला और डीजल जैसी चीजें भी ज्यादा मात्रा में मँगाने का फैसला किया है। इससे भारत के उद्योगों और गाड़ियों के लिए भविष्य में कभी भी ईंधन की कमी नहीं होगी।

आने वाले समय की आधुनिक तकनीक को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों ने एक और बड़ा कदम उठाया है। दोनों देश मिलकर ‘क्रिटिकल मिनरल कॉरिडोर’ यानी जरूरी खनिजों के लिए एक खास रास्ता बनाएँगे। मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक गाड़ियों की बैटरी और कंप्यूटर चिप्स बनाने के लिए कुछ खास खनिजों की जरूरत होती है, जो इस समझौते के बाद भारत को बहुत आसानी से मिल सकेंगे। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच इंटरनेट पर होने वाले फ्रॉड और हैकिंग को रोकने के लिए एक खास ‘PACTS’ साइबर सुरक्षा समझौता हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा कि भारत का बड़ा बाजार और ऑस्ट्रेलिया की बेहतरीन तकनीक मिलकर दोनों देशों के लिए बहुत फायदे का सौदा है। यह पूरा समझौता दिखाता है कि भारत अब वैश्विक मंच पर एक बहुत बड़ी महाशक्ति बनकर उभर रहा है।

US में साइक्लोस्पोरियासिस का प्रकोप, तेजी से फैल रहा आँखों से न दिखने वाला यह खतरनाक पैरासाइट: जानिए, कैसे ये भारत में भी फैल सकता है, बचाव के लिए करें कौन से उपाय

अमेरिका के कई राज्यों में इन दिनों एक छोटा पैरासाइट यानी पैरासाइट के कारण फैली बीमारी ने स्वास्थ्य अधिकारियों और आम जनता की चिंता को काफी बढ़ा दिया है। इस बीमारी का नाम साइक्लोस्पोरियासिस है, जो मुख्य रूप से हमारे पाचन तंत्र पर हमला करती है।

हाल के हफ्तों में इस संक्रमण के मामलों में अप्रत्याशित और बहुत तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है, जिसके कारण अस्पतालों और जाँच प्रयोगशालाओं पर भारी दबाव बन गया है।

इस बीमारी की चपेट में आने वाले मरीजों को बेहद गंभीर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें हफ्तों तक चलने वाले अनियंत्रित और बहुत तेज दस्त यानी डायरिया की शिकायत सबसे ज्यादा है।

मिशिगन जैसे राज्य में तो स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि वहाँ कुछ ही दिनों के भीतर सैकड़ों मामले दर्ज किए गए हैं, जो आम दिनों के मुकाबले कई गुना ज्यादा हैं। हालाँकि स्वास्थ्य विभाग और संघीय एजेंसियाँ लगातार इस बात की जाँच कर रही हैं कि आखिर इस संक्रमण की मुख्य वजह क्या है, लेकिन अभी तक किसी भी एक विशेष खाद्य पदार्थ, ब्रांड या सप्लायर की पहचान नहीं हो सकी है।

शुरुआती जाँच में दूषित ताजे फल और सब्जियों को इसका मुख्य कारण माना जा रहा है, क्योंकि यह पैरासाइट अक्सर खेतों और फसलों के जरिए ही इंसानी आबादी तक पहुँचता है। चूँकि भोजन की आपूर्ति श्रृंखला कई राज्यों से होकर गुजरती है, इसलिए इस संक्रमण के सटीक स्रोत का पता लगाना जाँच कर्ताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

क्या है साइक्लोस्पोरियासिस और कैसे होता है इसका हमला

साइक्लोस्पोरियासिस असल में भोजन या पानी के जरिए फैलने वाली एक गंभीर बीमारी है, जो एक बेहद छोटे और छोटा  पैरासाइट  साइक्लोस्पोरा कायटैनेन्सिस के कारण होती है।

सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन यानी CDC के मुताबिक, यह पैरासाइट इंसानी आँखों से दिखाई नहीं देता और जब कोई व्यक्ति इससे दूषित खाना या पानी लेता है, तो यह उसके शरीर के भीतर प्रवेश कर जाता है।

शरीर में पहुँचने के बाद यह पैरासाइट मुख्य रूप से छोटी आंत को अपना निशाना बनाता है और वहाँ जाकर अपनी संख्या बढ़ाने लगता है, जिससे आँतों का सामान्य कामकाज पूरी तरह प्रभावित हो जाता है।

यह संक्रमण आम तौर पर गर्मी के महीनों में यानी मई की शुरुआत से लेकर अगस्त के अंत तक बहुत ज्यादा सक्रिय रहता है क्योंकि इस मौसम में इस पैरासाइट के पनपने की अनुकूल परिस्थितियाँ होती हैं।

हालाँकि यह बीमारी आमतौर पर जानलेवा नहीं मानी जाती है, लेकिन अगर इसका सही समय पर इलाज न किया जाए तो यह हफ्तों तक शरीर को निचोड़ सकती है। सबसे खास बात यह है कि इसके लक्षण एक बार ठीक होने के बाद दोबारा वापस आ सकते हैं, जिससे मरीज लंबे समय तक कमजोरी और थकावट महसूस करता रहता है।

शरीर पर दिखने वाले लक्षण और डायरिया का खतरनाक रूप

जब कोई व्यक्ति इस खतरनाक पैरासाइट के संपर्क में आता है, तो उसके शरीर में तुरंत लक्षण दिखाई नहीं देते बल्कि इसे उभरने में दो दिन से लेकर चौदह दिन तक का समय लग सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इस संक्रमण का सबसे प्रमुख और डरावना लक्षण पानी जैसा तेज दस्त होना है, जिसे कई बार विस्फोटक मलत्याग भी कहा जाता है। इसके अलावा मरीजों को पेट में बहुत तेज और असहनीय मरोड़ या ऐंठन महसूस होती है, जो उन्हें पूरी तरह से बेहाल कर देती है।

संक्रमण के अन्य लक्षणों में लगातार जी मिचलाना, उल्टी होना, शरीर में भारी थकान, भूख में भारी कमी आना और बहुत तेजी से वजन का घटना शामिल है। इसके अतिरिक्त मरीजों को पेट में बहुत ज्यादा गैस बनने, शरीर में तेज दर्द होने और हल्का बुखार रहने की शिकायत भी होती है।

नोरोवायरस जैसे आम पेट के इन्फेक्शन के विपरीत, जो कुछ ही दिनों में खुद-ब-खुद ठीक हो जाता है, साइक्लोस्पोरियासिस का असर बहुत लंबा चलता है। इसके गंभीर दौर में मरीजों के शरीर से पानी इतनी तेजी से निकलता है कि उन्हें डिहाइड्रेशन यानी पानी की गंभीर कमी के कारण अस्पताल में भर्ती तक कराना पड़ जाता है।

अमेरिका में अचानक बढ़े मामले और जाँच की जमीनी हकीकत

इस समय अमेरिका के कई राज्यों जैसे मिशिगन, ओहियो, इलिनोइस, न्यूयॉर्क, टेक्सास, नॉर्थ कैरोलिना और इंडियाना में इस संक्रमण के मामलों में भारी उछाल आया है।

मिशिगन के स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, वहाँ पिछले कुछ ही हफ्तों में मामलों की संख्या तेजी से बढ़कर सात सौ से ऊपर पहुँच गई है, जबकि आम तौर पर इस पूरे राज्य में सालभर में सिर्फ चालीस से पचास मामले ही सामने आते थे।

मिशिगन के दक्षिण-पूर्वी हिस्से के कई काउंटियों जैसे मोनरो, वाश्टेनॉ, लेनावी, शियावासी, वेन, जैक्सन, ओकलैंड और लिविंगस्टन में इसका सबसे घातक असर देखा जा रहा है।

मामलों की संख्या इतनी ज्यादा है कि मरीजों का परीक्षण करने वाली प्रयोगशालाएँ पूरी तरह से थक चुकी हैं और जहाँ पहले टेस्ट की रिपोर्ट चौबीस घंटे में आ जाती थी, वहीं अब इसमें दो से तीन दिन का समय लग रहा है।

इस भारी दबाव के कारण डॉक्टरों को यह भी सोचना पड़ रहा है कि अगर जाँच में देरी जारी रही, तो वे केवल लक्षणों के आधार पर ही इलाज शुरू कर देंगे। मिशिगन की मुख्य चिकित्सा कार्यकारी डॉ नताशा बगदासारियन ने बताया कि इतने बड़े पैमाने पर मरीजों का इंटरव्यू लेना और उनके खान-पान का पता लगाना मुस्किल काम हो गया है।

स्वास्थ्य कर्मी दिन-रात काम करके मरीजों की ग्रोसरी लिस्ट खंगाल रहे हैं और यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने पिछले दिनों में किस रेस्टोरेंट में क्या खाया था।

कैसे फैलता है यह पैरासाइट और क्यों है इसे ढूँढना मुश्किल

साइक्लोस्पोरा पैरासाइट के फैलने का मुख्य जरिया इंसानी मल यानी व्हीकल-ओरल रूट होता है, जब किसी संक्रमित व्यक्ति के मल से दूषित हुआ पानी या मिट्टी फसलों के संपर्क में आती है।

हालाँकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने यह साफ किया है कि यह बीमारी सीधे तौर पर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में तुरंत नहीं फैलती है, क्योंकि शरीर से बाहर निकलने के बाद इस पैरासाइट के अंडों को पर्यावरण में संक्रामक यानी एक्टिव होने के लिए कम से कम एक से दो सप्ताह का समय चाहिए होता है।

इसका सीधा मतलब यह है कि यह संक्रमण घर में खाना पकाने के दौरान नहीं, बल्कि सीधे खेतों के स्तर पर असुरक्षित सिंचाई जल या खराब स्वच्छता के कारण फैलता है। चूँकि बहुत से फल और सब्जियाँ कच्चे ही खाए जाते हैं, इसलिए वे इस संक्रमण को फैलाने के सबसे बड़े वाहक बन जाते हैं।

इस जाँच को सबसे ज्यादा जटिल अमेरिका की विशाल फूड सप्लाई चेन बनाती है, जहाँ एक राज्य में उगाई गई फसल को दूसरे राज्य में पैक और प्रोसेस किया जाता है और फिर उसे देश के दर्जनों अलग-अलग राज्यों में बिक्री के लिए भेज दिया जाता है।

पूर्व में हुए इसके आउटब्रेक बताते हैं कि पैक्ड सलाद, धनिया, तुलसी, रास्पबेरी, स्नो पीज और हरी प्याज जैसी चीजें इसके फैलने का मुख्य कारण रही हैं और इस बार भी FDA and CDC प्याज, खीरा और धनिए जैसी चीजों पर अपनी जाँच केंद्रित कर रहे हैं।

संक्रमण से बचाव के उपाय और फल-सब्जियों को साफ करने के तरीके

इस पैरासाइट से सुरक्षित रहने के लिए स्वास्थ्य अधिकारियों और न्यूयॉर्क राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने बहुत ही कड़े दिशा-निर्देश और व्यावहारिक सुझाव जारी किए हैं। चूँकि यह पैरासाइट फल और सब्जियों की सतह से बहुत मजबूती से चिपक जाता है, इसलिए केवल साधारण पानी से इसे ऊपर-ऊपर से धो देना काफी नहीं होता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि रास्पबेरी जैसी बेरीज को साफ करना और भी मुश्किल होता है क्योंकि उनके ऊपर छोटे-छोटे बाल होते हैं जिनमें यह पैरासाइट आसानी से छिपा रहता है। इससे बचने के लिए सबसे पहले ताजी सब्जियाँ या फल छूने से पहले और बाद में अपने हाथों को साबुन और पानी से बहुत अच्छे से धोना चाहिए।

सभी कटी हुई या पकी हुई सब्जियों को तैयार करने के दो घंटे के भीतर तुरंत रेफ्रिजरेटर में रख देना चाहिए। इसके अलावा सलाद के पत्तों को इस्तेमाल करने से पहले उनके बाहरी पत्तों को पूरी तरह से हटाकर फेंक देना चाहिए और खीरे या तरबूज जैसी सख्त चीजों को साफ ब्रश से अच्छी तरह रगड़कर धोना चाहिए।

किसी भी फल या सब्जी के खराब हिस्से को खाने से पहले काटकर अलग कर देना चाहिए। हालाँकि इसे जमाने यानी फ्रीज करने से इस पैरासाइट के मरने की कोई गारंटी नहीं होती है, लेकिन भोजन को कम से कम 158 डिग्री फारेनहाइट यानी 70 डिग्री सेल्सियस तक अच्छी तरह पकाना इसे खत्म करने का एकमात्र सबसे सुरक्षित और निश्चित तरीका है।

चिकित्सा परामर्श की आवश्यकता और इलाज के उपलब्ध विकल्प

यदि किसी व्यक्ति को लगातार कई दिनों तक पानी जैसे दस्त हो रहे हों, पेट में तेज मरोड़ उठ रही हो या शरीर में पानी की कमी के लक्षण जैसे चक्कर आना, अत्यधिक प्यास लगना, पेशाब कम होना और बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस हो रही हो, तो उसे बिना किसी देरी के तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज्ड यानी कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों के लिए यह संक्रमण और भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है क्योंकि उनके शरीर में यह बीमारी लंबे समय तक टिकी रह सकती है और उन्हें ठीक होने में बहुत ज्यादा समय लगता है।

हालाँकि अभी तक इस संक्रमण से किसी के भी मौत की खबर नहीं आई है, लेकिन स्थिति बिगड़ने से रोकने के लिए समय पर इलाज बहुत जरूरी है।

‘मेरी हिंदू बेटी अब मुझे और मेरे बेटे को जान से मारना चाहती है’: पिता ने ऑपइंडिया से बयाँ किया दर्द, कहा- वसीम, इकरा और नेहा खान ने किया बेटी का ब्रेनवॉश; नमाज भी सिखाया

कल्पना कीजिए कि एक आदमी, जिसकी पत्नी नहीं है और वो माँ-बाप दोनों का फर्ज निभाते हुए अपनी 19 साल की बेटी और 17 साल के बेटे को संभाल रहा है, उसकी बेटी एक दिन ऐसे जिहादियों के संपर्क में आ जाती है, कि वो उसी पिता को जान से मारने के लिए आतुर हो जाती है। उस लड़की का ऐसा ब्रेनवॉश किया जाता है कि वो लोगों से कहती है कि उसके पिता और भाई को जहर दे दिया जाए ताकि वो धर्मांतरण कर ले। वो लड़की जो कभी मन से व्रत रखती थी, भगवान की पूजा करती थी, अब नमाज और हिजाब पहनना सीख रही है।

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के मधुबन बापूधाम थाना क्षेत्र के मैनापुर गाँव से ऐसा ही हैरान और परेशान करने वाला मामला सामने आया है। यहाँ एक ब्राह्मण हिंदू परिवार की 19 वर्षीय बेटी को बहला-फुसलाकर उसका धर्म परिवर्तन कराने और उसके जरिए पूरे परिवार को खत्म करने की एक गंभीर साजिश का खुलासा हुआ है।

यहाँ वसीम नाम के युवक, उसका परिवार, लड़की को दो सहेलियाँ इकरा खान और नेहा खान ने मिलकर युवती का इस कदर ब्रेनवॉश कर दिया है कि वह अपने ही पिता और भाई की जान लेने पर आमादा हो गई है। जब ऑपइंडिया की पत्रकार सौम्या सिंह ने पीड़ित पिता से बात की, तो उन्होंने अपनी बेटी के बदले व्यवहार, घर में मिले नमाज और हिजाब के सबूतों और परिवार को मिल रही धमकियों को लेकर अपनी गहरी चिंता जताई। उनकी आवाज से साफ समझा जा सकता था कि वे आज कितना बेबस महसूस कर रहे।

मासूमियत का शिकार और षड्यंत्र का जाल: कैसे शुरू हुआ हिंदू युवती का ब्रेनवॉश?

गाजियाबाद के मैनापुर निवासी युवती का परिवार एक सम्मानित हिंदू परिवार है, लेकिन उसके घर में बर्बादी की नींव आज से चार साल पहले पड़ी। पीड़ित पिता ने अत्यंत भावुक होकर बताया कि जब उनकी बेटी केवल 15 वर्ष की थी, तब वसीम उनके घर टाईल्स लगाने आया और लड़की को बरगलाकर इंस्टाग्राम पर बातचीत करनी शुरू कर दी।

खतौली निवासी इस दिहाड़ी मजदूर वसीम ने लड़की को अपनी बातों और झूठे जाल में फँसाना शुरू कर दिया। एक 15 साल की बच्ची, जो मजहबी साजिशों के इस खौफनाक खेल से पूरी तरह अनजान थी, उसे वसीम ने लगातार बरगलाना शुरू किया। इस पूरे घृणित खेल में वसीम अकेला नहीं था।

आरोपित वसीम

उसी गाँव मैनापुर में रहने वाली नेहा खान और उसकी सहेली इकरा के द्वारा लगातार इस प्रेम प्रसंग को बढ़ावा दिया गया। इन दोनों लड़कियों ने हिंदू युवती की अच्छी सहेली बनकर नजदीकी बढ़ाई और लगातार वसीम और युवती के इस तथाकथित प्रेम प्रसंग को हवा दी।

नेहा खान और इकरा ने युवती का ब्रेनवॉश इस स्तर पर किया कि उन्होंने धीरे-धीरे उसके मन से सनातन धर्म के प्रति श्रद्धा को खत्म करना शुरू कर दिया। इन दोनों कट्टरपंथी लड़कियों ने उसे गुपचुप तरीके से नमाज पढ़नी सिखानी शुरू कर दी और उसे धर्मांतरण के लिए बरगलाने लगे।

धीरे-धीरे लड़की को अपने ही धर्म के खिलाफ खड़ा कर दिया गया और उसके धर्मांतरण कराने की साजिश रची जाने लगी।

घर में जहर देने की साजिश और हत्या का खौफ: पीड़ित हिंदू पिता की आपबीती

यह मामला एक लड़की के झूठे प्रेम जाल में फंसने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक पूरे हिंदू परिवार को सामूहिक रूप से समाप्त करने की एक बेहद गंभीर और डरावनी आपराधिक साजिश है। पिता ने पुलिस कमिश्नर कार्यालय, गाजियाबाद को सौंपे गए अपने लिखित शिकायत पत्र में स्पष्ट रूप से अपनी और अपने बेटे की हत्या की गहरी आशंका जताई है।

पीड़ित पिता का कहना है कि यह जिहादी अब उनकी बेटी को बरगलाकर उनकी और उनके बेटे की हत्या कराने की साजिश में है। पिछले महज 15 दिनों के भीतर युवती दो बार घर छोड़कर भाग चुकी है। पिता उसे बार-बार घर लाते हैं, लेकिन घर आने के बाद भी उसकी मानसिक स्थिति और व्यवहार पूरी तरह बदल चुका था।

पिछली बार जब वह घर छोड़कर गई तब से वह अपने ही परिवार में निचली मंजिल पर किराएदारों के साथ रह रही थी। जहाँ इसने उन किराएदारों से अपने पिता एवं अपने भाई को जहर देकर मारने की बात कही। उसने सीधे तौर पर अपने सगे पिता और भाई की हत्या की साजिश की बात स्वीकार की। जब यह बात पिता को पता चली, तो उनके होश उड़ गए।

पिछले 15 दिनों से जब भी उसे समझाने या घर पर रखने का प्रयास किया जाता है, वह लगातार आत्महत्या करने की धमकी दे रही है। वह पूरी तरह से इन दोनों लड़कियों नेहा खान और इकरा के माध्यम से उस जिहादी मजदूर वसीम के संपर्क में बनी हुई है।

पिता का आरोप है कि उनकी बेटी को शायद ड्रग्स दिया जा रहा है, क्योंकि पिछले 9 महीनों से उसका स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा है और उसकी मानसिक स्थिति भी ठीक नहीं है।

हिजाब, नमाज की डायरी और उर्दू लिखे पन्ने: धर्मांतरण का पुख्ता सबूत

हिंदू युवती का ब्रेनवॉश और धर्मांतरण कोई हवा-हवाई बात नहीं है, बल्कि इसके पुख्ता और रोंगटे खड़े कर देने वाले लिखित और विजुअल सबूत पीड़ित पिता ने ऑपइंडिया को सौंपे हैं। पीड़िता पिता ने ऑपइंडिया की पत्रकार सौम्या सिंह को अपनी बेटी की वो तस्वीरें भेजीं, जिसमें उनकी बेटी ने हिजाब पहना हुआ है।

पिता ने बताया कि इकरा और नेहा खान ने उनकी बेटी को हिजाब पहनाया था, वे उसे हिजाब बाँधना और बुर्का पहनना भी सिखाती थीं। उसने घर में हिंदू देवी-देवताओं की पूजा-पाठ करना और व्रत रखना पूरी तरह से बंद कर दिया है, जबकि वह पहले व्रत भी रखती थी, मन से पूजा भी करती थी।

उसकी माँ नहीं है इसलिए वह पिता और छोटे भाई का ध्यान रखते हुए घर के काम भी करती थी। लेकिन अब उसका व्यवहार पूरी तरह बदल गया है। वह सिर्फ वसीम के साथ रहना चाहती है, धर्मांतरण कर इस्लाम अपनाना चाहती है।

पीड़ित पिता द्वारा सौंपा गया युवती की कॉपी का पेज

इसके साथ ही पिता ने बेटी को नोटबुक की तस्वीरें भी भेजीं, जिसमें वसीम, इकरा और नेहा ने नमाज, वुज़ू और इस्लाम के रिवाजों का पालन करने का तरीका लिखा हुआ है। इस डायरी में कुछ चीजें तो हिंदी में लिखी हुई हैं, लेकिन कुछ चीजें उर्दू में भी हैं, जो समझ नहीं आ रहा है।

कट्टरपंथियों ने लिख कर दिए थे वुज़ू करने के तरीके

पीड़िता पिता ने बताया कि यह साजिश कितनी पुरानी और गहरी है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस मामले में उन्होंने एक परिचित मुस्लिम डॉक्टर को कॉपी दिखाई और उसका मतलब पूछा तो उन्होंने कहा कि ये सब किसी को बीमार करवाने की चीजें हैं।

कट्टरपंथियों ने याद करने के लिए लिखा था कब-कब करनी है नमाज

ये बात 2025 की है। उनका कहना है कि इसी दौरान उनका बेटा लंबे समय के लिए बीमार भी पड़ा था, जिसे लेकर वो अस्पताल में थे। उस दौरान भी बेटी भाई को देखने के बहाने घर से निकलती थी लेकिन वो वसीम से मिलने चली जाती थी।

उर्दू में लिखे गए शब्द

लाचार पिता ने बेटी को पुलिस के हवाले छोड़ा

इस खौफनाक और जानलेवा साजिश का खुलासा होने के बाद पीड़ित पिता ने न्याय के लिए हर दरवाजा खटखटाया। पहले एक स्थानीय बीजेपी नेता देहात मंडल अध्यक्ष सचिन ने सहायता की और उन्होंने ही हिंदू संगठनों तक ये बात पहुँचाई। इसके बाद महाकाली वाहिनी ने मदद की और उनके साथ पिता मधुबन बापूधाम थाने गए और SHO से मिले।

लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। उनका कहना है कि इससे अपराधियों के हौसले और बुलंद हो गए और पिछले दो दिन से कुछ मुस्लिम लड़के उनके घर के चक्कर काट रहे हैं। बार-बार बेटी के भाग जाने से परेशान होकर पिता ने फिलहाल बेटी को थाने में छोड़ दिया है, ताकि वो कम से कम जिहादियों से सुरक्षित रहे और पुलिस कार्रवाई करे।

पिता का कहना है कि उन्होंने लिख कर दे दिया है कि वह इस हालत में बेटी को घर लेकर नहीं जाएँगे। वसीम का पूरा परिवार लड़की के ब्रेनवॉश की कोशिश में लगा हुआ है। दूसरी तरफ पिता जब लड़की को समझाने की कोशिश करते हैं तो वह धर्मांतरण करने वसीम के साथ जाने की बातें करती है।

पिता का कहना है कि वसीम, इकरा, नेहा तीनों आपस में मिले हुए हैं और लड़की को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी बेटी की वजह से ही तीनों की आपस में जान-पहचान हुई और बाद में तीनों ने मिलकर ये सब शुरू कर दिया। थाने के SHO ने फोन कर पिता से कहा कि वे आएँ लड़की को वे समझा रहे और वे लेकर जाएँ लेकिन पिता राजी नहीं हैं।

हिंदू संगठनों ने बढ़ाया मदद का हाथ, लगातार संपर्क में है महाकाली वाहिनी

इस पूरे मामले को लेकर महाकाली वाहिनी ने एडिशनल कमिश्नर केशव चौधरी से मिल कर यह मामला उठाया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स डॉ उदिता त्यागी ने एक वीडियो बाइट जारी करके पुलिस से तत्काल हस्तक्षेप करके परिवार और बेटी को बचाने की माँग की।

उन्होंने कहा कि इस्लाम के जिहादी अब समाज की हिंदू बेटियों को अपने ही परिवार को जहर देने के लिए तैयार कर रहे हैं ताकि वो परिवार की सारी धन संपत्ति पर कब्जा कर सकें। जिहादी अब मासूम बच्चियों को शिकार बनाकर उनके परिवार के पुरुषों की हत्या की साजिश कर रहे हैं।

उनका कहना है कि यह मामला हर हिंदू परिवार के लिए एक गंभीर चेतावनी है और अब समय आ गया है कि पुलिस प्रशासन बिना किसी देरी के जिहादी वसीम, नेहा खान और इकरा को तुरंत गिरफ्तार करे, ताकि एक बेबस पिता के आँसुओं को न्याय मिल सके और सनातन की एक और बेटी को इस खौफनाक मजहबी दलदल से बाहर निकाला जा सके।

इस संबंध में ऑपइंडिया ने मधुबन बापूधाम थाने के आधिकारिक नंबर पर बात कर मामले से जुड़ी जानकारी ली। पुलिस अधिकारी ने बताया कि पिता ने कोई लिखित शिकायत अब तक दर्ज नहीं कराई है और उनकी बेटी भी अब घर वापस जाने को तैयार है। हालाँकि जैसा कि हमने इस रिपोर्ट में बताया है कि पीड़ित पिता कार्रवाई हुए बिना बेटी को घर ले जाने के लिए तैयार नहीं है।

पर्यावरण और विकास में संतुलन से समृद्धि की ओर बढ़ रहा उत्तर प्रदेश, ‘1 पेड़ माँ के नाम’ अभियान बना रहा विश्व रिकॉर्ड: पढ़ें 9 साल में योगी सरकार ने कैसे की ‘हरित क्रांति’

हरित विकास, समृद्ध उत्तर प्रदेश! ये नारा है यूपी की बीजेपी सरकार का। इसके तहत पिछले 9 वर्षों से सरकार पौधरोपण से लेकर कार्बन उत्सर्जन को कम करने पर काम कर रही है। यूपी देश का सबसे पहला ईवी इस्तेमाल करने वाला राज्य बन गया है। एक्सप्रेस वे पर ईवी चार्जिंग स्टेशन बन गए हैं। इन सबके बीच सरकार का पौधरोपण अभियान भविष्य में उत्तर प्रदेश को पर्यावरण संतुलन और विकास के बीच आदर्श राज्य के रूप में प्रस्तुत करने वाला है।

‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के तहत 35 करोड़+ पौधरोपण

सीएम योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए महाअभियान चलाया जा रहा है। ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान भी इसका हिस्सा है, जिसकी शुरुआत 5 जून को हुई थी। उत्तर प्रदेश में ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के तहत 12 जुलाई को राज्य में एक दिन का बृहत वृक्षारोपण कार्यक्रम किया जाएगा, जिसमें एक ही दिन में 35 करोड़ पौधे लगाने का नया रिकॉर्ड बनाया जाएगा।

प्रधानमंत्री मोदी की प्रेरणा से शुरू किया गया यह एक राष्ट्र व्यापी महाअभियान है, जिसके तहत हर नागरिक से अपनी माँ के नाम पर कम से कम एक पेड़ लगाने का आह्वान किया गया है। इसमें नागरिकों को संकल्प दिलाया जा रहा है कि वे न केवल पेड़ लगाएँ, बल्कि शरारती तत्वों और जानवरों से उसकी सुरक्षा भी करें और जल संरक्षण को जीवन का हिस्सा बनाएँ।

5 जून 2026 को ‘उत्तर प्रदेश स्वच्छ वायु प्रबंध परियोजना’ के शुभारंभ अवसर पर ‘एक पेड़ माँ के नाम’ वृक्षारोपण महाअभियान-2026 के आधिकारिक ‘लोगो’ का अनावरण किया गया था।

‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत साल 2025-26 में 37 करोड़ पौधरोपण का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन राज्य में अक्टूबर 2025 तक 37.21 करोड़ पौधों का रोपण कर विश्व रिकॉर्ड बनाया।

इससे पहले भी सरकार ने कई योजनाओं के माध्यम से राज्य में हरित क्षेत्र का विकास किया है। व्यापक तौर पर पौधरोपण कार्यक्रम चलाया जा रहा है। पौधरोपण में तकनीक का इस्तेमाल और वृक्षों के संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है। भविष्य में के प्रयासों से प्रदेश में निरंतर बढ़ रहा हरित आवरण आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की मजबूत नींव रख रहा है।

9 वर्षों में 247 करोड़ से अधिक पौधरोपण

पिछले 9 साल में योगी सरकार ने व्यापक अभियान चलाकर 247+ करोड़ पौधे लगाने में सफलता पाई। इसे एक ‘जन आंदोलन’ का रूप देकर संभव बनाया गया, जिसमें समाज ने नेतृत्व किया और सरकार ने सहयोगी की भूमिका निभाई। साल 2017 में सरकार के पास वृक्षारोपण के लिए मात्र 5.5 करोड़ पौधे थे, लेकिन 2026 में सरकारी और निजी नर्सरियों की क्षमता बढ़ाने से पौधों का स्टॉक 57 करोड़ हो चुके हैं।

इनमें सांस्कृतिक और औषधीय महत्व वाले पौधों की संख्या काफी है। इससे न केवल संख्या बढ़ेगी, बल्कि पौधों की प्रजातियों में भी गुणात्मक बदलाव आया है। राज्य में 948 ‘विशाल हेरिटेज वृक्षों’ को पहचान कर उन्हें संरक्षित किया गया है।

साल 2017 में प्रदेश में मात्र 9.18 फीसदी क्षेत्र हराभरा था। लेकिन वर्तमान में 9.96 फीसदी हिस्सा पेड़-पौधों से ढ़का हुआ है। सरकार पिछले 9 वर्षों में इंफ्रास्ट्रक्चर में अभूतपूर्व तरक्की की है। एक्सप्रेस वे, सड़क निर्माण, मेट्रो और दूसरी सुविधाओं को बढ़ावा देने के बावजूद वन क्षेत्रों को बढ़ाने में सफल रही है। यह सरकार की अहम उपलब्धि है।

2047 तक 20 फीसदी हिस्से होंगे वनक्षेत्र

2030 तक राज्य में वनक्षेत्र को बढ़ा कर 15 फीसदी करने का लक्ष्य रखा गया है। आजादी के सौ साल पूरे होने पर अर्थात 2047 तक राज्य का 20 फीसदी हिस्से में हरित विकास किया जाएगा।

वनावरण वृद्धि का राष्ट्रीय औसत 3.41फीसदी है जबकि उत्तर प्रदेश में 3.72 फीसदी की दर से हरित क्षेत्र का विकास हो रहा है यानी राष्ट्रीय औसत से 0.31 फीसदी ज्यादा। देश में वनावरण की दृष्टि से यूपी अभी दूसरे नंबर पर है। आर्थिक समीक्षा 2025-26 के मुताबिक, पौधरोपण का असर ये है कि राज्य में साल 2020-21 से 2024-25 के बीच वृक्षारोपण से 84.5 मिलियन टन कार्बन का अवशोषण हुआ है।

‘इंडिया स्टेट ऑफ फ़ॉरेस्ट रिपोर्ट (ISFR) 2023 के अनुसार, उत्तर प्रदेश में ग्रीन कवर एरिया में भारत की दूसरी सबसे बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

यह उपलब्धि राज्य द्वारा वृक्षारोपण, वृक्ष संरक्षण और पर्यावरणीय स्थिरता की दिशा में की जा रही लगातार कोशिशों को रेखांकित करती है और एक हरित उत्तर प्रदेश के निर्माण में एक और महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगी।

नदियों के किनारे औषधीय और छायादार फलदार युक्त पौधों के रोपण को बढ़ावा देने के लिए ‘गंगा बायोडायवर्सिटी पार्क’ की स्थापना की जा रही है। प्रत्येक जनपद में ‘अमृत वन’ स्थापित किए गए है।

सरकार की अमृत सरोवर योजना

राज्य में भूजल स्तर के गिरने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अप्रैल 2022 में मिशन अमृत सरोवर की शुरुआत हुई। इसके तहत अब तक 19111 से अधिक अमृत सरोवरों का निर्माण कार्य पूरा किया जा चुका है, जबकि 25000 से अधिक अमृत सरोवरों का निर्माण किया जा रहा है। ऐसा करने वाला यूपी देश के अग्रणी राज्यों में से एक है।

अमृत सरोवरों का निर्माण ग्रामीण विकास विभाग करवा रहा है, जिसके लिए कम से कम एक एकड़ जमीन की जरूरत है और उसकी गहराई इतनी हो कि इसमें लगभग 10000 क्यूबिक मीटर पानी आ सके।

इतना ही नहीं पुराने तालाबों और दूसरे प्राकृतिक जल स्रोतों का भी वैज्ञानिक तरीके से पुनरुद्धार किया जा रहा है। अगर गहराई कम हो गई है तो उसे ठीक किया जा रहा है। किनारों की ढलान ठीक की जा रही है, ताकि वर्षा का पानी उसमें जा सके । इससे भूजल स्तर में और सुधार आएगा।

तालाबों, पोखरों के चारों ओर नीम, पीपल, बरगद, अर्जुन जैसे विशाल छायादार और औषधि वाले पेड़ लगाए जा रहे हैं और एक हरित पट्टी का निर्माण किया जा रहा है। इसका मकसद मिट्टी के कटाव को रोकना, भूजल स्तर बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन को मजबूत करना है।

नदियों का पुनरुद्धार और पौधरोपण कार्यक्रम

योगी सरकार पौधारोपण महायज्ञ-2026 के तहत राज्य से होकर बहने वाली गंगा- यमुना समेत 13 प्रमुख नदियों के किनारे पेड़-पौधे लगाकर उसे हरा-भरा बनाएगी। अविरल धारा पौधरोपण कार्यक्रम में नदियों के किनारे 5 किलोमीटर की परिधि में 2673 स्थलों पर 22240.11 हेक्टेयर क्षेत्र में 3.83 करोड़ से अधिक पौधे लगाए जाएँगे।

कार्यक्रम का मकसद नदियों की अविरल धारा के साथ-साथ आसपास के क्षेत्र को हराभरा बनाना है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ साथ जल को प्रदूषित होने से बचाना और उसका संरक्षण करना है।

राज्य से बड़े बड़े शहरों से होकर जाने वाली गंगा की धारा स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त बने, इसके लिए 603 स्थलों पर 4,495.72 हेक्टेयर में 79.86 लाख पौधे रोपे जाएँगे। जिन जगहों पर वृक्षारोपण में ज्यादा जोर होगा उनमें प्रयागराज, प्रतापगढ़, कौशांबी, फतेहपुर, वाराणसी, गाजीपुर, मीरजापुर, भदोही, काशी वन्यजीव शामिल हैं।

अभियान के तहत यमुना के किनारे वाले 647 स्थलों पर 6531.77 हेक्टेयर क्षेत्र में 1.08 करोड़ से अधिक पौधे रोपे जाएँगे।
इसके अलावा गोमती के किनारे 297 स्थलों पर 31.37 लाख पौधे लगाए जाएँगे, बेतवा नदी के तट पर 52.35 लाख पौधे, सरयू और घाघरा के किनारे 254 स्थलों पर 27.75 लाख पौधे लगाए जाएँगे।

सई नदी के किनारे 23.29 लाख पौधरोपण का लक्ष्य रखा गया है। राप्ती, छोटी गंडक, सोन, रामगंगा, केन, हिंडन और चंबल जैसी नदियों के तट को भी हराभरा बनाया जाएगा ताकि पर्यावरण संरक्षण कर भविष्य के लिए जल- जीवन- जमीन को संरक्षित किया जा सके। गोरखपुर में 1400 एकड़ के रामगढ़ ताल और 400-500 एकड़ में फैले चिलवा ताल का सफल संरक्षण भी किया गया है।

राज्य सरकार ने अब तक 3363 किलोमीटर लंबाई वाली 50 नदियों का पुनरुद्धार किया है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में 3388 तालाबों का निर्माण किया गया। इससे भूजल स्तर और जल संचयन के क्षेत्र में वृद्धि हुई है। किसानों को खेती और पशुपालन में इससे सहयोग मिल रहा है।

नमामि गंगे प्रोजेक्ट के साथ साथ मनरेगा ने भी इस अभियान में अहम भूमिका निभाई है। 2014-15 में शुरू हुई नमामि गंगे प्रोजेक्ट का लक्ष्य गंगा और उसकी सहायक नदियों के प्रदूषण उन्मूलन और पुनर्जीवन पर केन्द्रित है। निर्मल गंगा, अविरल गंगा, जन गंगा और ज्ञान गंगा के माध्यम से सीवेज प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, सामूहिक भागीदारी और अनुसंधान पर जोर दिया गया।

विश्व बैंक के सहयोग से 2741 करोड़ रुपए की लागत से देश का पहला एयर शेड आधारित परियोजना यूपी कैप स्कीम शुरू की गई।

वन और पारिस्थितकी तंत्र का सफल जुड़ाव

वनक्षेत्र में वृद्धि का सीधा और सकारात्मक असर राज्य के वन्यजीव और पारिस्थितकी तंत्र पर पड़ा है। बाघों के संरक्षण के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनी हैं जिससे बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 2006 में इनकी संख्या 109 थी, जो 2022 में बढ़कर 205 हो गई है।

यह राष्ट्रीय बाघ आबादी का 5.6% है पीलीभीत टाइगर रिजर्व को बाघों की संख्या दोगुनी होने पर प्रतिष्ठित ‘TX2 अवार्ड’ दिया गया है और चित्रकूट के 53,000 हेक्टेयर क्षेत्र को चौथे ‘रानीपुर टाइगर रिजव’ के रूप में पहचाना गया है।

गंगा डॉल्फिन एवं सारस: देश की कुल 6,327 गंगा डॉल्फिन में से सबसे अधिक 2,397 डॉल्फिन (37.8%) उत्तर प्रदेश में पाई गई हैं। 2023 में इसे ‘राज्य जलीय जीव’ घोषित किया गया है। राज्य पक्षी सारस की संख्या साल 2021 के 17329 थी, जो 2025 में 20281 हो गई है।

गिद्ध संरक्षण: पारिस्थितकी तंत्र के लिए अहम माने जाने वाले रेड-हेडेड गिद्धों के संरक्षण के लिए देश का पहला ‘गिद्ध प्रजनन केन्द्र’ गोरखपुर में स्थापित किया गया है।

मानव-वन्यजीव संघर्ष को आपदा घोषित करने वाला यह देश का प्रथम राज्य है, जिसके तहत 2024 में 10 बाघ और 55 तेंदुए, 2025 में 19 बाघ, 54 तेंदुए और 02 भेड़ियों का सुरक्षित रेस्क्यू किया गया।

श्रावस्ती में ‘केन नाला’ को बायोडायवर्सिटी हेरिटेज साइट के रूप में विकसित किया गया है। 100 साल से अधिक पुराने पेड़ों को ‘विरासत वृक्ष’ घोषित कर संरक्षित किया जा रहा है। उदाहरण के लिए संरक्षित वृक्षों में बाराबंकी में 5000 साल पुराना पारिजात वृक्ष अहम है।

कार्बन क्रेडिट योजना से पर्यावरण का बचाव

किसानों के लिए देश की पहली कृषि-वानिकी के तहत ‘कार्बन क्रेडिट फाइनेंस योजना’ उत्तर प्रदेश में लागू की गई है। इससे किसानों को पयावरण अनुकूल खेती और वृक्षारोपण के बदले काबन डाइऑक्साइड अवशोषण की एवज में अतिरिक्त रकम मिल रही है। योजना के तहत किसानों को हर 5 साल में 06 डॉलर प्रति कार्बन क्रेडिट की दर से भुगतान किया जा रहा है।

पहले चरण में 6 मंडलों के 25140 किसानों को पंजीकृत किया गया है। राज्य में अब तक किसानों को आंशिक भुगतान के रूप में 49.05 लाख रुपए वितरित किए जा चुके हैं और 25 लाख दुधवा टाइगर नेशनल पार्क फाउंडेशन को दिए गए हैं।

प्रदूषण मुक्त ईवी योजना

राज्य सरकार ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए इलेक्ट्रिकल वाहनों को सपोर्ट कर रही है। इसके बुनियादी ढाँचे को बढ़ावा देने के लिए एक विस्तृत नीति लागू की गई है। योजना के तहत चार्जिंग स्टेशन लगाने वालों को प्रति यूनिट (उपकरण व बुनियादी ढाँचे की लागत का) ₹10 लाख तक की भारी सब्सिडी और रियायती बिजली दरें दी जा रही हैं। चार्ज पॉइंट ऑपरेटरों को चार्जर, अपस्ट्रीम इन्फ्रास्ट्रक्चर और बैटरी उपकरणों की लागत का 20% (प्रति यूनिट ₹10 लाख तक) सब्सिडी के रूप में मिलता है।

उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशनों के लिए बिजली की दरें सामान्य औसत लागत से भी कम तय की हैं। राज्य में ‘पीएम ई-ड्राइव’ और राज्य की योजना के तहत हजारों नए चार्जिंग स्टेशन लगाए जा रहे हैं। लखनऊ, कानपुर, मेरठ, अयोध्या, प्रयागराज जैसे शहरों में पीपीपी मॉडल पर 714 नए ईवी स्टेशन स्थापित किए जा रहे हैं।

इतना ही नहीं राज्य में इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने वालों को उत्तर प्रदेश इलेक्ट्रिक वाहन विनिर्माण एवं गतिशीलता नीति, 2022 के अंतर्गत सब्सिडी भी दी जा रही है। राज्य में पंजीकृत और निर्मित वाहनों के रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन फीस पर 100 फीसदी की छूट दी है, जो 13 अक्टूबर 2027 तक लागू है। इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर पर ₹5,000, फोर-व्हीलर पर ₹1 लाख तक और ई-बसों पर ₹20 लाख तक की सब्सिडी दी जा रही है।

इसका असर ये हुआ है कि देश में सबसे ज्यादा इलेक्ट्रिक वाहन उत्तर प्रदेश में हैं। राज्य में रजिस्टर कराए गए इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या 4.14 करोड़ से ज्यादा हैं। दिल्ली दूसरे और महाराष्ट्र तीसरे नंबर पर है। यूपी में ईवी वाहनों में बड़ी संख्या ई-रिक्शा की है, जो करीब 85 फीसदी हैं।

सबसे ज्यादा ईवी रनिंग हाईवे वाला राज्य बना उत्तर प्रदेश

देश में सबसे ज्यादा 22 एक्सप्रेस वे उत्तर प्रदेश में हैं, जिनमें से यमुना एक्सप्रेस-वे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे, पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे और गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस-वे को ईवी रनिंग हाईवे बनाया जा चुका है साथ ही कई एक्सप्रेस वे पर काम जारी है। दिल्ली-आगरा यमुना एक्सप्रेस वे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे पर फास्ट चार्जिंग स्टेशन स्थापित किए गए हैं। अब इन एक्सप्रेस वे पर ईवी वाहन सरपट दौड़ रही हैं।

सौर ऊर्जा के इस्तेमाल के लिए चलाए जा रहे पीएम सूर्य घर योजना का लाभ भी राज्य को काफी मिला है। अयोध्या के 18 नगर निगमों को सोलर सिटी के रूप में विकसित किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश सौर ऊर्जा नीति 2022 के तहत अगले 5 वर्षों में 22000 मेगावॉट वाले सौर ऊर्जा परियोजना शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। 2017 में 288 मेगावॉट वाले सौर ऊर्जा परियोजना थे, जो अब 2815 मेगावाट बिजली पैदा करने वाले सौर ऊर्जा परियोजनाएँ राज्य में चल रही हैं।

राज्य में अवैध कब्जे के खिलाफ जोरदार अभियान चलाया जा रहा है और इसका भी फायदा पर्यावरण को मिल रहा है। कुकरेल में अवैध कब्जों को हटा कर वहाँ शानदार ‘सौमित्र वन’ स्थापित किया गया है। राज्य में अटल वन,एकलव्य वन, ऑक्सी वन और सिटी वन बनाए गए हैं। राज्य में भूमि संरक्षण पर भी काफी काम हुआ है।

रामसर साइट्स के तौर पर 10 आद्रभूमि का संरक्षण किया गया है। इनमें गंगा रिवर, बखीरा,सरसई नावर झील, असन,सूर सरोवर, हैदरपुर वेटलैंड, पार्वती अगरा,सांडी,समसपुर अहम हैं। इन्हें अंतरराष्ट्रीय मान्यता भी मिल चुकी है। गंगा नदी के किनारे वाले 275 आर्द्रभूमि को चिन्हित कर उनमें से 231 के लिए इंटीग्रेटेड वेटलैंड मैनेजमेंट प्लान का निर्माण किया गया है। ऐसा करने वाला उत्तर प्रदेश देश का दूसरा राज्य है।

शहरों को हरा भरा रखने के लिए भी कई योजनाएँ चल रही हैं। उत्तर प्रदेश शहरी हरित नीति इसके लिए योगी सरकार ने लागू किया है। इसके तहत मियावाकी वन वर्टिकल गार्डन और ग्रीन रूफ का विकास किया जा रहा है। सबसे अच्छे शहर को अल्टीमेट ग्रीन सिटी का खिताब दिया जाएगा। जीवाश्म इंधन पर निर्भरता कम करने के लिए ग्रीन हाइड्रोजन नीति 2024 लागू की गई है।

FIFA World Cup: मेस्सी के चमत्कार से अर्जेंटीना ने मिस्र को हराकर क्वार्टर फाइनल में की एंट्री, स्विट्जरलैंड भी बढ़ा आगे; महसूस करें बीती रात का रोमांच

एक मशहूर जापानी कहावत है – 七転び八起き, (Nana korobi ya oki). जिसका अंग्रेजी अनुवाद है – fall down seven times, stand up eight. यह कहावत हमें सिखाती है कि अक्सर सफलता असफलता को टालते रहने से नहीं अपितु हार ना मानने से मिलती है।

मंगलवार (7 जुलाई 2026) की रात हम सभी ने अर्जेंटीना की लातिन अमेरिकी टीम को मिस्र की जुझारू अफ्रीकी टीम के खिलाफ इस कहावत को सच करते देखा। कल जैसा खेल खेला गया, ऐसे मैच सालों में कभी-कभार देखने को मिलते हैं।

इस विश्व कप में पेराग्वे ने जर्मनी को मात दी थी। मोरक्को ने नीदरलैंड्स को परास्त किया था। हाल ही में नॉर्वे ने पाँच बार की विजेता ब्राजील का किला ढहा दिया था। यह कई यादगार मुकाबले रहे जहाँ गजब के उलटफेर देखने को मिले। फिर बेल्जियम ने 2-0 से पिछड़ने के बावजूद अंतिम क्षणों में सेनेगल को मात दे दी थी। ऐसे ही इस विश्व कप में कुल ग्यारह कमबैक अबतक देखने को मिले। हर दिन यहाँ कुछ नया और कुछ बीते दिन से ज्यादा रोचक होता जा रहा है। कल की रात भी अनूठी रही।

बीती रात फीफा विश्व कप के गत विजेता अपने खिताब की रक्षा करने अटलांटा स्टेडियम में अपने राउंड ऑफ 16 मुकाबले में मिस्र के फाराओज़ का सामना करने उतरे।

अल्बीसेलेस्त के कोच लियोनेल स्कालोनी ने 4-1-3-2 की फॉर्मेशन में अपनी टीम को मैदान में उतारा था। फॉरवर्ड लाइन में इस जंग में लियोनेल मेस्सी का साथ देने के लिए हूलियन अल्वारेज़ खड़े थे। उनके पीछे रॉड्रिगो दी पॉल, एंजो फर्नाडेज़ व एलेक्सिस मैकऐलिस्टर की तिकड़ी थी। रक्षापंक्ति में मोलीना, रोमेरो, लीसान्द्रो मार्टीनेज़ व ताग्लियाफीको थे और गोलपोस्ट की रक्षा करने एमिलियानो मार्टिनेज खड़े थे। गत विजेता अपने पिछले ही मुकाबले में काबो वर्दे के खिलाफ संघर्ष करते नजर आए थे। इस बार निश्चित ही उनपर जरूरत से ज्यादा दबाव था, यह साबित करने का कि आखिर क्यों वो पिछले संस्करण के विजेता हैं।

अर्जेंटीनी प्लेइंग इलेवन को मद्देनजर रखते हुए मिस्र के कोच होसाम हसन ने 4-2-3-1 की फॉर्मेशन में अपनी टीम को मैदान में उतारा था। उन्होंने मैच पूर्व यह जताया था कि उनका प्रयास होगा शुरुआती बढ़त लेकर अर्जेंटीना पर दबाव बनाने की। ऐसा नहीं है कि मिस्र कमजोर टीम है। उनके पास अर्जेंटीना को टक्कर देने हेतु अच्छे खिलाड़ियों का एक दल था जो मैच के अंतिम सेकेंड तक हार नहीं मानने वाला था। जो लोग सिर्फ विश्व कप के दौरान फुटबॉल देख रहे हैं वह मिस्र की टीम की मजबूती का अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि इतने बड़े मैच में भी कोच होसाम हसन ओमार मारमूश जैसे खतरनाक स्ट्राइकर को बेंच पर रखने का साहस कर रहे थे।

रेफरी फ्रैंक्वा लेतेक्ज़िर की व्हिस्ल के साथ 67500+ दर्शकों से खचाखच भरे अटलांटा स्टेडियम में इस बहुप्रतीक्षित मुकाबले की शुरुआत हो जाती है।

मिस्र के खिलाड़ियों के पास खोने के लिए कुछ भी न था। सुन त्ज़ू ने ‘द आर्ट ऑफ वार’ में लिखा है ना कि अटैक इज़ द बेस्ट वे टू डिफेंड; कुछ ऐसा ही करते हुए कोच होसाम हसन के निर्देशानुसार उनकी टीम मैच के पहले मिनट से ही अटैकिंग फुटबॉल खेलते हुए दिखती है।

प्रयास था कि मैच के शुरुआती पलों में ही एक सरप्राइज एलिमेंट क्रिएट करते हुए गोल दाग कर अर्जेंटीनी टीम को बैकफुट पर ले आया जाए। और, उनको इस में जल्द ही सफलता भी मिल जाती है।

मैच के चौदहवें मिनट में मिस्र को एक कॉर्नर किक मिलती है। वह शॉर्ट कॉर्नर लेते हुए एक अटैकिंग मूव बनाने का प्रयास करते हैं। छोटे पासों से गेंद मैदान के दाईं छोर पर खड़े खिलाड़ी मारावां अत्तिया की ओर खिसका दी जाती है जो तुरंत अर्जेंटीनी बॉक्स में एक बेहद नपा तुला क्रॉस डालते हैं। वहाँ मिस्र के पाँच खिलाड़ी मौजूद थे। गेंद यासेर इब्राहिम की ओर जाती है, जो एक जोरदार हेडर से गेंद को गोलपोस्ट के भीतर भेज देते हैं। अर्जेंटीनी टीम को काटो तो खून नहीं।

लेकिन इस थ्रिलर में अभी और भी ट्विस्ट आने बाकी थे। एक अर्जेंटीनी खिलाड़ी को अटैकिंग पोजीशन में मिस्र के बॉक्स में फाउल कर दिया गया। नतीजतन मिस्र के गोल के सात-आठ मिनट के अंदर ही अर्जेंटीना को एक पेनाल्टी मिल जाती है। उनके पास इस नॉकआउट मैच में वापसी का सुनहरा मौका आ गया था। कप्तान लियोनेल मेस्सी आगे बढ़कर गेंद को हाथों में लेते हैं। अर्जेंटीनी समर्थक गोल की आस लिए उनकी ओर नजरें गड़ाए बैठे थे। स्टेडियम एक पल के लिए खामोश था।

रेफरी का इशारा मिलते ही मेस्सी गेंद की ओर दौड़ते हैं। वह गोलकीपर की बांई ओर एक किक लगाते हैं। मगर यह क्या हो गया था। उनकी पेनाल्टी मिस्र के बड़े फुटबॉल क्लब अल अहली के लिए खेलने वाले गोलकीपर मोस्तफा शोबिर द्वारा रोक ली गई थी। एक पल के लिए तो सारे स्टेडियम में सन्नाटा पसरा हुआ था।

मिस्र के कोच आगे बढ़कर दर्शकों की ओर बढ़ कर हाथ हवा में लहराते हैं। अपने गोलकीपर द्वारा किए इस बचाव का मोल वो जानते थे। ऐसे बड़े अहम समय में किया गया यह पेनाल्टी सेव किसी गोल से कम नहीं था। मिस्र लगातार हमले करने लगती है। अर्जेंटीना भी तुरंत कुछ जवाबी हमले करती है। मेस्सी विपक्षी गोलपोस्ट पर निशाना साधते हैं मगर गोलकीपर द्वारा बचाव कर लिया जाता है। हूलियन अल्वारेज़ भी एक शानदार शॉट लगाते हैं मगर वह भी गेंद को गोलपोस्ट के भीतर नहीं भेज पाते। हाफ टाइम की समाप्ति पर स्कोर 1-0 रहता है। सारी दुनिया को चौंकाते हुए मिस्र ने गत विजेता पर बढ़त बनाई हुई थी।

अगले हाफ का खेल शुरू होता है। लिएंद्रो पारेदेस गोलकीपर मोस्तफा शोबिर के पोस्ट पर हमला करते हैं, जिसे गोलकीपर द्वारा बचा लिया जाता है। मैच के साठवें मिनट में मिस्र फिर एक गोल जड़ देती है। मगर VAR द्वारा गोल रद्द कर दिया जाता है। मैच के छियासठवें मिनट में अर्जेंटीनी कोच लियोनेल स्कालोनी एक मिडफील्डर को बाहर कर स्ट्राइकर लाऊतारो मार्टीनेज़ को और एक डिफेंडर को बाहर कर एक मिडफील्डर को मैदान में उतारते हैं। मकसद साफ था – कैसे भी एक गोल दागा जाए और मैच में वापसी संभव करी जाए।

लेकिन कोच लियोनेल स्कालोनी को तब झटका लगता है जब इन सब्स्टीट्यूशन्स के दो मिनट बाद ही मिस्र की टीम बिजली की गति से काउंटर अटैक करती है और हासेम हसन से मिले बेहद शानदार पास को गोल में तब्दील करने में मोस्तफा ज़िको कोई ग़लती नहीं करते। संपूर्ण विश्व में फुटबॉल को चाहने वाले इसपर यकीन ही नहीं कर पा रहे थे। मिस्र की टीम ने गत चैंपियन के खिलाफ 2-0 से बढ़त बना ली थी। स्टेडियम में लाल रंग की जर्सी में बैठे मिस्र की टीम के तमाम चाहने वाले झूमने लगे थे। उनका बस एक मैच देखने अपने घरों से हजारों किलोमीटर दूर आना सार्थक हो गया था। वो खुशी से झूम रहे थे।

अर्जेंटीनी मैनेजमेंट कुछ समझ ही नहीं पाया था। मैदान के भीतर उनके तमाम खिलाड़ियों के माथे पर अब चिंता की लकीरें साफ साफ दिखने लगी थीं। सिवाय मेस्सी के, वह लगातार किसी उधेड़बुन में थे। जैसे जैसे खेल आगे बढ़ रहा था, सारी दुनिया में खेल समर्थकों को लगने लगा था कि शायद आज, नेमार की भांति, लियोनेल मेस्सी को भी वो एक अंतिम बार खेलते देख रहे हैं।

लिसांद्रो मार्टिनेज़ गोलपोस्ट पर एक जोरदार किक लगाते हैं। मगर स्कोर अब भी 2-0 ही था। खेल के दूसरे हाफ का हाइड्रेशन ब्रेक भी समाप्त हो जाता है। खेल जैसे आगे बढ़ता जा रहा था, अर्जेंटीनी डगआउट में सभी लोग उम्मीद खोते जा रहे थे। ऐसा लगने लगा था कि शायद आज एक और बड़ा उलटफेर होने जा रहा था।

ऐसा लग रहा था मैदान पर मौजूद कोई भी खिलाड़ी आज थक ही नहीं रहा था। वह पूरा ग्राउंड कवर कर रहे थे और अर्जेंटीना के खिलाड़ियों पर लगाम लगाए हुए थे। मगर मेस्सी किसी वन में मंडराते हिरन की भांति मिस्र की डिफेंसिव लाइन में बारम्बार सेंध लगाए जा रहे थे।

मैच का उन्यासीवाँ मिनट। अर्जेंटीनी टीम छोटे पासों के साथ हाफ लाइन से गेंद को आगे लेकर बढ़ती है। गेंद हूलियन अल्वारेज़ के पास आती है जिसे वो दाईं फ्लैंक पर खड़े मेस्सी की ओर बढ़ाते हैं। मेस्सी मिस्र के बॉक्स का मुआयना करते हैं और तुरंत एक बेहतरीन क्रॉस अंदर डालते हैं। अंदर कूटी रोमेरो अकेले खड़े थे। वह एक जोरदार हेडर लगाते हैं और गेंद जाल से लिपट जाती है। स्कोर 2-1 हो गया था।

चार मिनट बाद एक दफा फिर मैदान के दाईं छोर से ही लियोनेल मेस्सी गेंद को गोलपोस्ट की दिशा में भेजते हैं। अंदर चार अर्जेंटीनी खिलाड़ी मौके की तलाश में खड़े थे। गेंद छिटक कर गोंजालो मोंटील की ओर जाती है जो गेंद को लियोनेल मेस्सी की ओर सरका देते हैं। मेस्सी मौका मिलते ही एक जोरदार लेफ्ट फुटर लगाकर गेंद को गोलकीपर मोस्तफा शोबिर के गोलपोस्ट के भीतर पहुँचा देते हैं। चार मिनट में दो गोल दाग कर अर्जेंटीना ने इस मैच में वापसी कर ली थी।

यह इक चमत्कार सरीखा था। किसी ने भी सोचा नहीं था कि ऐसी स्थिति से भी अर्जेंटीना मैच में वापसी कर सकती थी। मगर नब्बे मिनट पूर्ण हो चले थे और स्कोर 2-2 हो गया था। सारा स्टेडियम एक बार फिर अर्जेंटीनी समर्थकों के शोर से गुंजायमान हो उठा था।

खेल आगे बढ़ता है। ऐसा प्रतीत होता दिख रहा था कि मैच अब एक्स्ट्रा-टाइम में जाएगा और अपने पिछले मैच के बाद एक बार दुबारा अर्जेंटीना को 120 मिनट की थका देने वाली फुटबॉल खेलनी होगी।

लेकिन आज इस मैच में हर पल एक नया मोड़ आते जा रहा था। खेल अभी समाप्त नहीं हुआ था। 90+2। अर्जेंटीना एक बार फिर काउंटर अटैक करने के इरादे से आगे बढ़ती है। नौ नंबर की जर्सी पहने हूलियन अल्वारेज़ गेंद को मैदान की दाईं दिशा में लंबा पास डालकर लाउतारो मार्टिनेज की ओर बढ़ाते हैं। लाउतारो एक सटीक क्रॉस गोलपोस्ट की ओर डालते हैं। वहाँ एंजो फर्नानदेज़ मौजूद थे, जो एक जबरदस्त हेडर लगा कर गेंद को तीसरी दफा मिस्र के गोलपोस्ट के भीतर भेज चुके थे। अर्जेंटीना ने अंतिम क्षणों में एक गोल दाग दिया था। अर्जेंटीना एक बेहद शानदार कमबैक को अंजाम दे चुका था।

दुनिया भर के तमाम फुटबॉल को चाहने वालों को यकीन ही नहीं हो रहा था कि आखिर उन्होंने यह क्या देख लिया था। यह रोमांच का चरमोत्कर्ष था। इस मैच में क्रिस्टोफर नोलान के सिनेमाई संसार से ज्यादा रौंगटे खड़े कर देने वाले लम्हें थे। अगर अर्जेंटीना यह मैच हार जाती, तो पेनाल्टी छोड़ने के चलते मेस्सी आज एक विलेन बना दिए जाते। दुनिया भर में हजारों रोनाल्डो समर्थक अपने अपने कीबोर्ड के समीप तैयार बैठे थे – उन्हें सूली पर चढ़ाने के लिए।

मगर मैच खत्म होने तक एक असिस्ट और एक शानदार गोल के साथ उन्होंने हमें एक ऐसे रोमांचक मैच का साक्षी बना दिया था जिसे वर्षों तक याद किया जाएगा। जब जब समाज में आतंक बढ़ता है, ऊपर बैठे भगवान को धरा पर उतरना पड़ता है। आज दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों ने भगवान के साक्षात दर्शन कर लिए थे। इससे बढ़ कर अब और क्या ही लिखा जा सकता है।

मेस्सी विश्व कप के विभिन्न संस्करणों में अब कुल इक्कीस गोल कर चुके हैं। यह किसी भी खिलाड़ी द्वारा विश्व कप में लगाए गोलों में सर्वाधिक संख्या है। मेस्सी इस विश्व कप में आठ गोल दाग चुके हैं। यह किसी भी खिलाड़ी द्वारा इस विश्व कप में लगाए गोलों में सर्वाधिक संख्या है। वह विश्व कप के इतिहास में दस दफा मैं ऑफ द मैच के पुरुस्कार से नवाजे जा चुके हैं। वह विश्व कप के नॉकआउट चरण में लगातार छह मैचों में गोल लगाने वाले इकलौते खिलाड़ी भी बन गए हैं।

गौरतलब है कि सदैव इनकी तुलना में खुद को श्रेष्ठ बतलाने वाले क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने 2006 विश्व कप से इस प्रतियोगिता का हिस्सा होते हुए भी विश्व कप के नॉकआउट चरण में मात्र एक गोल स्कोर किया है।

खैर गुजरी रात का अगला मैच वैंकूवर में खेला गया था। यहाँ स्विट्जरलैंड का सामना था इस टूर्नामेंट में कमाल का फुटबॉल खेल रही कोलंबिया की टीम से। एक ओर ग्रानित झाका, ब्रीद एम्बोलो व मेनुअल अकांजी की स्विस टीम थी, जो अब तक उम्मीदों से बढ़ कर प्रदर्शन कर रही थी। वहीं कोलंबिया ने भी अबतक अपने दो नायकों जेम्स रॉड्रिगुएज़ व लुइस डियाज़ के नेतृत्व में हर मुश्किल का डट कर सामना किया था। यह दो राष्ट्रों की जिद की टक्कर होने जा रही थी।

देखना यह था कि क्या जेम्स रॉड्रिगुएज़ व लुइस डियाज़ कोलंबिया के लिए गोल दाग उन्हें क्वार्टर फाइनल का टिकट दिल पाएँगे? या अल्जीरिया को हराकर यहाँ तक पहुँची स्विट्जरलैंड एक बार फिर एक कमाल कर दिखाएगी। दोनों ही टीमें अपने इस हसीन ख्वाब को टूटते हुए नहीं देखना चाहती थीं।

इस मैच में हालाँकि नब्बे मिनट का खेल खेले जाने तक दोनों ही टीमें गोल स्कोर करने में नाकाम रहती हैं। खेल एक्स्ट्रा-टाइम में जाता है। फिर भी 0-0 के स्कोर के साथ दोनों ही टीमें बराबरी पर रहती हैं। अब मैच का परिणाम पेनाल्टी शूटआउट से होना था। पेनाल्टी शूटआउट एक काफी क्रूर विधा है, जहां किसी भी दिन कुछ भी हो सकता है। आप नब्बे मिनट तक अच्छा खेल कर भी हारी हुई टीम कहला सकते हैं। खैर, रेफरी के इशारे पर पेनाल्टी शूटआउट की शुरुआत होती है। दोनों टीमों के खिलाड़ी हाफ-लाइन पर इकट्ठा हो जाते हैं व गोलकीपर गोलपोस्ट की ओर बढ़ते हैं। स्टेडियम में दोनों ही टीमों के समर्थकों में खलबली मची हुई थी। सब बेकरार थे यह जानने के लिए की कौन सी टीम अगले दौर में जगह बनाएगी।

स्विट्जरलैंड के लिए अनुभवी खिलाड़ी मैनुएल अकांजी अपनी पेनाल्टी को गोल में नहीं बदल पाते। वहीं, कोलंबिया के लिए दाविन्सन सान्चेज़ व कूचो हर्नान्देज़ अपनी अपनी पेनाल्टी को गोल में तब्दील करने से चूक जाते हैं। नतीजतन पेनाल्टी शूटआउट में स्विट्जरलैंड कोलंबिया को 4-3 से हरा देती है। हताश दाविन्सन सान्चेज़ की नजरें आसमान पर गढ़ गई थीं। उदासी की गहराइयों में उतर चुके कूचो हर्नान्देज़ को उनके साथी खिलाड़ी ढाँढस बंधा रहे थे।

स्टेडियम में मौजूद स्विस दर्शकों का जुनून देखते ही बनता था। कोलंबिया इस विश्व कप में अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद टूर्नामेंट से बाहर हो गई थी। वह वापस अपने वतन लौटेंगे और स्विट्जरलैंड क्वार्टर फाइनल में गत विजेता से भिड़ती नज़र आएगी। यह उनके संपूर्ण राष्ट्र को कितनी खुशी देगा इसका अंदाजा भी लगाना शायद हमारे लिए मुमकिन नहीं।

यही फुटबॉल का जादू है। अपने दिन में मिस्र या काबो वर्दे भी अर्जेंटीना को जीत दर्ज करने के लिए तरसा देती है। आप होंगे विश्व विजेता, मगर यहाँ हर किसी को हर दिन अपनी काबिलियत साबित करनी होती है। यह दुनिया शूरवीरों को सलाम करती है – उनकी वीरता के लिए। और, अगर आप कसौटी पर खरा उतरते हैं, तो आपकी जय-जयकार होनी निश्चित ही है।

अब आगे शुक्रवार से क्वार्टर फाइनल मुकाबले खेले जाएंगे। पहले ही क्वार्टर फाइनल में कल रात भारतीय समयानुसार डेढ़ बजे, बेहतरीन फॉर्म में चल रही मोरक्को की टीम पिछले संस्करण की उपविजेता फ्रांस से भिड़ेगी। मोरक्को के पास अंत तक हार न मानने का जज़्बा है। फ्रांस के पास एक बवंडर की भांति अटैक करने वाली टीम। यह निश्चित रूप से एक यादगार समर होगा। एटलस लायंस क्या लेस ब्ल्यूज़ का रथ रोक सकेंगे यह पता चलेगा कल बोस्टन में होने जा रहे इस मुकाबले के बाद।

बने रहिए साथ। वीवा ला फुटबॉल।