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PM मोदी के पहुँचते ही अर्जेंटीना में गूँजा ‘जय श्रीराम’: जानें व्यापारिक साझेदारी के लिहाज से क्यों है प्रधानमंत्री का ये दौरा खास, ऊर्जा क्षेत्र को पहुँचाएगा लाभ

पाँच देशों की यात्रा पर निकले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने तीसरे चरण में शुक्रवार (4 जुलाई 2025) की शाम में अर्जेंटीना पहुँचे। इससे पहले उन्होंने त्रिनिडाड और टोबैगो का दौरा किया, जहाँ दोनों देशों के बीच छह समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए।

यहाँ पीएम मोदी को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘द ऑर्डर ऑफ द रिपब्लिक ऑफ त्रिनिडाड एंड टोबैगो’ से सम्मानित किया गया। पीएम मोदी यह सम्मान पाने वाले पहले विदेशी नेता बने। उनकी इस यात्रा की शुरुआत घाना से शुरु हुई थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स पहुँचे, जहाँ ईजाइजा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उन्हें औपचारिक स्वागत मिला। यह उनकी दूसरी अर्जेंटीना यात्रा है। पहली बार वह 2018 में G20 शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए गए थे। पिछले 57 वर्षों में यह पहली द्विपक्षीय यात्रा है जिसमें कोई भारतीय प्रधानमंत्री अर्जेंटीना पहुँचा है। पीएम मोदी के होटल पहुँचने पर भारतीय समुदाय के लोगों ने ‘जय श्री राम’ के नारे से उनका भव्य स्वागत किया।

विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी अर्जेंटीना यात्रा के दौरान राष्ट्रपति जेवियर मिलेई से मुलाकात करेंगे। इस दौरान दोनों नेता रक्षा, कृषि, खनन, तेल और गैस, नवीकरणीय ऊर्जा, व्यापार और निवेश जैसे कई अहम मुद्दों पर बातचीत करेंगे, जिससे दोनों देशों के बीच साझेदारी को और मजबूत किया जा सके।

अर्जेंटीना के समृद्ध खनिज भंडार

अर्जेंटीना में लिथियम, कॉपर और शेल गैस जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के बड़े भंडार मौजूद हैं, जो उसे भारत के लिए एक संभावित ऊर्जा भागीदार बनाते हैं। यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शेल गैस और चौथा सबसे बड़ा शेल ऑयल भंडार वाला देश है।

साथ ही पारंपरिक तेल और गैस के भी अच्छे भंडार यहाँ मौजूद हैं। अर्जेंटीना, बोलिविया और चिली के साथ ‘लिथियम ट्रायएंगल’ का हिस्सा है, जो एंडीज पर्वत क्षेत्र में स्थित है और लिथियम के समृद्ध भंडार के लिए जाना जाता है।

लिथियम का इस्तेमाल मोबाइल, लैपटॉप, इलेक्ट्रिक गाड़ियों और ऊर्जा भंडारण के लिए बनने वाली बैटरियों में होता है, इसलिए यह भारत के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों के लिए बहुत जरूरी माना जा रहा है।

भारत की सरकारी कंपनी खानिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL) ने अर्जेंटीना के कातामार्का प्रांत में लिथियम खोज के अधिकार पहले से ही हासिल कर लिए हैं। इसके अलावा, अर्जेंटीना ‘वाका मुएर्ता’ क्षेत्र में बड़े पैमाने पर एलएनजी (LNG) परियोजना पर काम कर रहा है।

जिसका लक्ष्य 2030 तक सालाना 30 मिलियन टन (3 करोड़ टन) एलएनजी निर्यात करना है। अर्जेंटीना इस परियोजना में विदेशी निवेश चाहता है, जिसके कारण भारत को भी इसमें भागीदारी का मौका मिलने की उम्मीद है।

भारत और अर्जेंटीना के बीच द्विपक्षीय व्यापार

पिछले एक साल में भारत और अर्जेंटीना के बीच द्विपक्षीय व्यापार 5.2 अरब डॉलर (4.31 लाख करोड़ रुपए) से ऊपर पहुँच गया है। भारत अब अर्जेंटीना के छह बड़े व्यापारिक साझेदारों में शामिल है।

पहले दोनों देशों के बीच व्यापार मुख्य रूप से खाद्य तेलों तक सीमित था, लेकिन अब रक्षा, ऊर्जा, खनन और निवेश जैसे क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ाने की कोशिश हो रही है। अर्जेंटीना भारत से दवाइयाँ, चिकित्सा उपकरण और आईटी सेवाएँ आयात करने में रुचि दिखा रहा है, जबकि भारत अर्जेंटीना के कृषि बाजार तक पहुँच बनाना चाहता है।

अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर मिलेई, जो दिसंबर 2023 में सत्ता में आए, वो पश्चिमी देशों के बाहर भी आर्थिक साझेदारी बढ़ाने के पक्ष में हैं। वहीं भारत दक्षिण अमेरिकी व्यापार समूह मर्कोसुर के साथ अपने व्यापारिक संबंध फिर से मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है, जिसके संस्थापक सदस्य अर्जेंटीना ने भी इस संगठन में सुधार की इच्छा जताई है।

भारत-अर्जेंटीना रक्षा सहयोग

भारत और अर्जेंटीना के बीच रक्षा सहयोग, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और टेलीमेडिसिन पर भी बातचीत होने की उम्मीद है। अर्जेंटीना ने भारत के तेजस लड़ाकू विमान में रुचि दिखाई है।

वह भारत के बड़े स्तर पर चलने वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म और सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं से भी प्रभावित है। दोनों देशों की अंतरिक्ष एजेंसियाँ पहले भी साथ काम कर चुकी हैं और अब सस्ते सैटेलाइट लॉन्च के लिए भविष्य में नई साझेदारी की भी उम्मीद है।

आतंकवाद के मुद्दे पर भी दोनों देशों की सोच एक जैसी है। 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले की अर्जेंटीना ने सबसे पहले निंदा की थी। 1992 और 1994 में खुद आतंकवादी हमले झेल चुके अर्जेंटीना को इस खतरे की गंभीरता का भी अच्छा-खासा अनुभव है।

प्रधानमंत्री मोदी की अर्जेंटीना यात्रा का महत्व

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव को देखते हुए भारत अब अपनी ऊर्जा आपूर्ति को वहाँ से कम करने और नए विकल्प तलाशने की दिशा में काम कर रहा है। अर्जेंटीना समेत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पाँच देशों की मौजूदा यात्रा भी इसी रणनीति का हिस्सा है।

पिछले कुछ वर्षों में रूस-यूक्रेन युद्ध और हाल ही में इजराइल-ईरान संघर्ष जैसे बड़े घटनाक्रमों से भारत ने यह सीखा है कि ऊर्जा आपूर्ति के लिए कई विकल्प होना जरूरी है। रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने का भारत का फैसला भी इसी नीति के तहत लिया गया था, जिससे देश की आर्थिक स्थिरता बनी रहे।

सरकार अब उन देशों के साथ व्यापार संबंध मजबूत करने पर काम कर रही है जो भारत के संभावित ऊर्जा साझेदार बन सकते हैं। अर्जेंटीना दौरे के बाद प्रधानमंत्री मोदी ब्राजील जाएँगे, जहाँ वह 17वें ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेंगे और उसके बाद राजकीय यात्रा करेंगे। इस यात्रा के अंतिम चरण में वह नामीबिया जाएँगे। इससे पहले वह घाना, त्रिनिडाड और टोबैगो का दौरा कर चुके हैं।

OpIndia Exclusive- बुर्काधारी औरतों ने नोचे महिला पत्रकार के बाल, मुस्लिम भीड़ ने पत्थर-बेल्ट से मारा: दिल्ली के सीमापुरी में मीडियाकर्मियों पर हमला, जान बचाने जिस DTC में चढ़े उसमें भी तोड़फोड़

दिल्ली के सीमापुरी इलाके की बंगाली बस्ती में शुक्रवार (4 जुलाई 2025) की शाम एक ऐसी घटना घटी, जिसने पत्रकारिता की स्वतंत्रता, सामाजिक सौहार्द और कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। ऑल इंडिया न्यूज़ की पत्रकार सुप्रिया पाठक और उनके कैमरामैन श्याम पर इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने जानलेवा हमला किया। यह हमला सरकारी जमीन पर अवैध अतिक्रमण और झुग्गी-झोपड़ी के मुद्दे पर रिपोर्टिंग के दौरान हुआ, जब दोनों पत्रकार बंगाली मार्केट के पास एक मस्जिद के सामने कैमरा लेकर खड़े थे।

पीड़ितों के मुताबिक, बुर्कानशीं महिलाओं और नाबालिग किशोरों की भीड़ने न केवल पत्रकारों को बेरहमी से पीटा, बल्कि उनके उपकरण, नकदी और निजी सामान भी लूट लिए। इस घटना ने दिल्ली पुलिस की निष्क्रियता और प्रशासनिक लापरवाही को उजागर किया है, क्योंकि अभी तक न तो कोई गिरफ्तारी हुई है और न ही पीड़ितों को एफआईआर की कॉपी उपलब्ध कराई गई है।

दिल्ली की सड़क पर दिखा इस्लामी हिंसा का भयावह मंजर

जानकारी के मुताबिक, शुक्रवार (4 जुलाई 2025) की शाम करीब 6 बजे सुप्रिया पाठक और श्याम सीमापुरी के बंगाली बस्ती क्षेत्र में 200 फुटा रोड के पास पहुँचे। उनका मकसद सरकारी जमीन पर हो रहे अवैध अतिक्रमण की सच्चाई को उजागर करना था, जो स्थानीय निवासियों और प्रशासन के बीच लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। इस इलाके में अवैध झुग्गियाँ, निर्माण कार्य और कथित तौर पर बांग्लादेशी और रोहिंग्या प्रवासियों की मौजूदगी ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।

सुप्रिया और श्याम ने जैसे ही मस्जिद के सामने अपनी रिपोर्टिंग शुरू करने के लिए कैमरा सेट किया, कुछ स्थानीय लोगों ने आपत्ति जताई। शुरुआत में यह आपत्ति मौखिक थी, लेकिन जल्द ही यह हिंसक रूप ले लिया। भीड़ में शामिल बुर्का पहनी मुस्लिम महिलाओं और नाबालिग किशोरों ने पत्रकारों को घेर लिया। शुरुआत में 20-30 लोगों की भीड़ कुछ ही मिनटों में 200 से अधिक लोगों की उग्र भीड़ में बदल गई।

भीड़ ने सुप्रिया और श्याम पर लाठियों, मुक्कों और लातों से हमला शुरू कर दिया। सुप्रिया को सड़क पर घसीटकर पीटा गया, जिससे उनके पैर में गंभीर चोट आई और हड्डी टूट गई। उनके शरीर पर कई जगह घाव और चोट के निशान हैं। श्याम के चेहरे और शरीर पर भी गहरे घाव आए और उनके सिर पर मुक्कों की बौछार की गई। हमलावरों ने सुप्रिया का मोबाइल, कैमरा, माइक, बैटरी और जेब में मौजूद नकदी लूट ली, जबकि श्याम की घड़ी और पर्स भी छीन लिया गया।

पत्रकारों ने बचने की कोशिश में एक डीटीसी बस में शरण ली, लेकिन भीड़ ने बस को चारों ओर से घेर लिया। हमलावरों ने बस के शीशे तोड़ दिए और दोनों को जबरन बाहर खींच लिया। इस दौरान बस चालक ने कोई मदद नहीं की और उल्टा उन्हें बस से उतार दिया। भीड़ ने बस को भी नुकसान पहुँचाया, जिससे सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुँची। इस घटनाक्रम का वीडियो भी सामने आया है।

पीड़ित ने ऑपइंडिया से साझा की आपबीती

पीड़ित के मुताबिक, उन्हें अलग भीड़ ने मारा और उनकी साथी पत्रकार सुप्रिया को अलग से पीटा गया। बाद में कुछ बाइक वाले आए, उन्होंने मदद करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें भी बाइक समेत गिरा दिया गया। फिर पुलिसकर्मी आए और उन्होंने बाइक पर उन्हें आगे छोड़ने का प्रयास किया। हालाँकि इस दौरान भी भीड़ बाइक के पीछे रही, किसी ने पत्थर फेंके तो किसी ने बेल्ट मारी।

बचाव की नाकाम कोशिशें और प्रशासन की निष्क्रियता

घटना के दौरान सड़क पर जाम होने के बावजूद कोई भी स्थानीय व्यक्ति पत्रकारों की मदद के लिए आगे नहीं आया। कुछ राहगीरों ने कोशिश की, लेकिन भीड़ के आक्रामक रवैये और कथित कट्टरपंथी नारों के सामने उन्हें पीछे हटना पड़ा। एक राहगीर ने सुप्रिया को अपनी बाइक पर बिठाकर सुरक्षित स्थान तक ले जाने की कोशिश की, लेकिन भीड़ ने उसे भी खींचकर मारपीट की। आखिरकार एक पुलिसकर्मी ने हस्तक्षेप किया और दोनों को मौके से कुछ दूरी पर सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया।

पत्रकारों को इसके बाद सीमापुरी थाने ले जाया गया, जहाँ से उन्हें मेडिकल जाँच के लिए जीटीबी अस्पताल भेजा गया। रात 9 बजे अस्पताल पहुँचने के बावजूद, इलाज और मेडिकल प्रक्रिया में इतनी देरी हुई कि सुबह 4 बजे तक उन्हें वहाँ से निकलने का मौका मिला। सुप्रिया के पैर में प्लास्टर चढ़ा है और वह चलने में असमर्थ हैं, जबकि श्याम को भी गंभीर चोटें आई हैं।

कट्टरपंथी इरादों के साथ किया गया हमला

वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने X लिखा कि यह हमला योजनाबद्ध था, क्योंकि पत्रकारों की रिपोर्टिंग से कई अवैध गतिविधियों का भेद खुलने का खतरा था।

इस घटना में मुस्लिम महिलाओं और नाबालिग किशोरों की सक्रिय भागीदारी विशेष रूप से चिंताजनक है। बुर्का पहनी महिलाओं ने न केवल पत्रकारों पर शारीरिक हमला किया, बल्कि उन्हें अपशब्द कहे और धार्मिक आधार पर टिप्पणियाँ कीं। नाबालिग किशोरों ने भी हिंसा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया जो यह दर्शाता है कि कट्टरपंथी विचारधारा युवा पीढ़ी में भी गहरे तक पैठ बना चुकी है।

लोगों का दावा है कि हमलावरों ने पत्रकारों को इसलिए निशाना बनाया क्योंकि वे हिंदू थे और हमलावरों को इस बात का भरोसा था कि उनकी मजहबी पहचान के चलते पुलिस कोई सख्त कार्रवाई नहीं करेगी। यह भी आरोप लगाया गया कि ऐसे मामलों में मुस्लिम समुदाय की भीड़ थाने को घेर लेती है, जिससे प्रशासन दबाव में आ जाता है और कार्रवाई करने में असमर्थ रहता है। इस तरह की धारणा हमलावरों को और अधिक बेखौफ बनाती है, जिससे वे कानून को अपने हाथ में लेने से नहीं हिचकते।

लोगों का कहना है कि दिल्ली में अवैध कब्जाधारियों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, जिसके चलते प्रशासन उनके खिलाफ कार्रवाई करने से हिचकता है। यह भी दावा किया गया कि कुछ राजनीतिक दलों ने वोट बैंक की खातिर अवैध प्रवासियों को बसने की अनुमति दी, जिससे इस तरह की हिंसक घटनाएँ बढ़ रही हैं।

हालाँकि इस मामले में हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर हमले के बावजूद दिल्ली पुलिस ने अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है। पीड़ितों को न तो एफआईआर की कॉपी दी गई है और न ही किसी हमलावर की गिरफ्तारी हुई है। लोगों का दावा है कि पुलिस पीड़ित पत्रकारों को ही परेशान कर रही है, जबकि हमलावर खुले में घूम रहे हैं।

हिंदी से दिक्कत, लेकिन ‘नॉर्थ इंडियन’ उर्दू से मोहब्बत: वोटबैंक की लालच में हकीकत कब तक नजरअंदाज करेंगे कॉन्ग्रेस से जुड़े द्रविड़-कन्नड़-मराठा नेता, कब तक चलेगी ये राजनीति?

भाषाई कट्टरता और हिंसक प्रवृत्ति एक बार फिर भारतीय सामाजिक और राजनीतिक दृश्य को तब कलंकित करती दिखी जब 29 जून 2025 को महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के कार्यकर्ताओं ने मुंबई के मीरा रोड उपनगर में एक मिठाई की दुकान के 48 वर्षीय मालिक बाबूलाल खिमजी चौधरी पर केवल इसलिए हमला कर दिया कि उन्होंने मराठी में बातचीत करने से इनकार कर दिया था।

बाबूलाल खिमजी चौधरी की ‘जोधपुर स्वीट्स और नमकीन’ नाम की दुकान है। उन पर तब हमला हुआ जब मनसे के कार्यकर्ता करण कंडांगीरे (मनसे उप शहर प्रमुख), पामोद नीलेकट (वाहतुक सेना जिला आयोजक), अक्षय दलवी, सचिन सालुंखे और अमोल पाटिल समेत 7 लोग दुकान में आकर मराठी में लेनदेन की माँग करने लगे।

बातचीत जल्द ही बहस में तब्दील हो गई। ये टकराव तब और उग्र हो गया जब पीड़ित ने उनके उस झूठे दावे पर आपत्ति जताई कि महाराष्ट्र विधानसभा ने व्यवसायों में मराठी भाषा के प्रयोग और मराठी भाषी कर्मचारियों की नियुक्ति को अनिवार्य कर दिया है।

यह घटना न केवल भाषा के नाम पर की जा रही गुंडागर्दी को दिखाता है, बल्कि उन क्षेत्रीय दलों की रणनीति पर भी सवाल उठाता है, जो राजनीतिक गलियारों में चर्चा में बने रहने के लिए इस तरह से गुंडागर्दी का सहारा ले रहे हैं। इस तरह की घटनाएँ न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों को चोट पहुँचाती हैं, साथ ही यह पूरे राज्य में गुस्सा और समाज में आपसी झगड़े को भी बढ़ावा देती हैं।

भाषा की लड़ाई से राजनीति हुई फिर जिंदा

महाराष्ट्र में हाल ही में भाषा के नाम पर गैर-मराठी बोलने वालों को परेशान किया गया। एमएनएस के कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेकर जल्दी ही जमानत पर छोड़ दिया गया।

एमएनएस और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) जैसे दल लंबे समय से मराठी अस्मिता की बात करते आ रहे हैं, लेकिन यह ज्यादातर दूसरों को डराने और परेशान करने तक ही सीमित रहा है।

कुछ ही दिनों पहले, जब राज्य सरकार ने स्कूलों में हिंदी शुरू करने का फैसला वापस लिया, तो उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने ‘मराठी मानुष’ की एकता की बात की। इसके विरोध में उद्धव ठाकरे और संजय राउत ने सरकारी आदेश की प्रतियाँ जला दीं थी।

महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है जहाँ कई भाषाएँ बोलने वाले लोग रहते हैं। यहाँ बॉलीवुड जैसी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री भी है। आम मराठी लोग गैर-मराठी बोलने वालों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन MNS जैसी कुछ क्षेत्रीय पार्टियाँ भाषा के नाम पर झगड़े और डर का माहौल बना रही हैं।

राज्य की बीजेपी सरकार ने इसे लेकर साफ और सख्त रुख अपनाया है। शुक्रवार (4 जुलाई 2025) को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि मराठी भाषा पर गर्व करना गलत नहीं है, लेकिन भाषा के नाम पर गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जो लोग भाषा के आधार पर मारपीट करेंगे, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। उन्होंने यह भी कहा कि हमें सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करना चाहिए।

हिंदी को लेकर विवाद करना और अंग्रेजी को अपनाना समझ से बाहर है। कानून हाथ में लेने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। एक अहम बात यह भी है कि जहाँ हिंदी, गुजराती और दूसरी भाषाएँ बोलने वालों को निशाना बनाया जाता है, वहीं उर्दू भाषा को इस गुस्से से अछूता रखा गया है।

हिंदी और मराठी एक जैसी लिपि और जड़ों से जुड़ी हैं, फिर भी हिंदी को ‘उत्तर भारतीय’ कह कर नफरत का प्रतीक बनाया जाता है, जबकि उर्दू पर कोई सवाल नहीं उठता।

देश के कई राज्यों में भाषा को लेकर भेदभाव और राजनीतिक विवाद बढ़ती जा रही है। तमिलनाडु में DMK सरकार ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) का यह कहकर विरोध किया कि यह तमिल भाषियों पर हिंदी थोपने का प्रयास है।

हालाँकि नीति में हिंदी अनिवार्य नहीं थी और छात्र इसके विकल्प के तौर पर अपनी पसंद की कोई भी भाषा चुन सकते थे। मार्च 2024 में महाराष्ट्र के पुणे के भूषण मंडलिक को तमिलनाडु में सिर्फ इसलिए पीटा गया क्योंकि वह तमिल नहीं बोल पाते थे।

इसी तरह कर्नाटक में एक ओड़िया रेस्टोरेंट को स्थानीय भाषा कन्नड़ के नाम पर अपनी ओड़िया नेमप्लेट हटाने के लिए मजबूर किया गया, जबकि पहले से कन्नड़ में नाम का बोर्ड लगा हुआ था।

झारखंड में 2022 में JMM सरकार ने भोजपुरी और मगही को क्षेत्रीय भाषाओं की सूची से बाहर कर दिया, जबकि उर्दू को बनाए रखा और हिंदी को किसी भी जिले में क्षेत्रीय भाषा का दर्जा नहीं दिया गया, जिससे भारी विरोध हुआ।

शिवसेना (UBT) ने भी मुस्लिम बहुल इलाकों में उर्दू में पोस्टर लगाकर उद्धव ठाकरे को ‘अली जनाब’ बताया, लेकिन हिंदी को अक्सर विरोध का सामना करना पड़ता है। पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में भी उर्दू को बढ़ावा दिया जा रहा है जबकि हिंदी का विरोध किया जाता है।

यूपी में उर्दू अनुवाद की माँग पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि इसका मकसद बच्चों को मौलवी बनाना है, वैज्ञानिक नहीं। इन सभी घटनाओं से साफ है कि कुछ राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीति के लिए भाषा को हथियार बना रहे हैं, जहाँ खासकर हिंदी को निशाना बनाया जा रहा है और उर्दू को विशेष छूट दी जा रही है।

हिंदी से नफरत लेकिन वोट के लिए उर्दू और अंग्रेजी भाषा स्वीकार्य

देश में भाषाओं को लेकर विवाद लगातार बढ़ रहा है, लेकिन यह विवाद भाषा की असली चिंता से ज्यादा राजनीति से जुड़ा है। कुछ क्षेत्रीय और मुस्लिम-तुष्टिकरण करने वाली पार्टियाँ हिंदी का विरोध हमेशा से करती रही हैं और इसे थोपने का आरोप भी लगाती हैं।

जबकि उर्दू को बढ़ावा देने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती तो सवाल ये है कि भाषा के साथ इस तरह का राजनीतिक और सामाजिक भेदभाव आखिर क्यों हो रहा है। उत्तर प्रदेश में 1989 में कॉन्ग्रेस सरकार ने सिर्फ मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा बना दिया था।

यही हाल पश्चिम बंगाल, दिल्ली, बिहार और तेलंगाना जैसे राज्यों में भी देखा गया, जहाँ उर्दू को विशेष दर्जा मिला। लेकिन हिंदी, जो संस्कृत से निकली है और देश की जमीन से जुड़ी है, उसे ‘उत्तर भारतीय’ कहकर बदनाम किया जाता है। उर्दू की उत्पत्ति इस्लामी आक्रमणों के समय हुई थी, जब विदेशी शासकों को स्थानीय जनता से संवाद के लिए एक मिली-जुली भाषा की जरूरत थी।

वहीं, बॉलीवुड में भी उर्दू को खास बढ़ावा मिलता रहा है। गीतकारों और लेखकों ने उर्दू के शब्दों और इस्लामिक शब्दावली (जैसे जन्नत, खुदा, काफिर आदि) को फिल्मों में खूब इस्तेमाल किया, जिससे हिंदी को कमतर और उर्दू को ज्यादा शिष्ट भाषा की तरह पेश किया गया।

इसने उर्दू की एक खास छवि बना दी और आम हिंदी को हाशिए पर डाल दिया। इसका नतीजा ये रहा कि आज भी कुछ राजनीतिक दल उर्दू को विशेष दर्जा देते हैं, उसके लिए फंड जारी करते हैं जबकि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को नजरअंदाज किया जाता है।

महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में हिंदी बोलने वाले आम लोगों को निशाना बनाया जाता है, जबकि उर्दू बोलने वाले मुसलमानों पर कोई सवाल नहीं उठाता। मुसलमानों से कोई यह नहीं पूछता कि वे मराठी या कन्नड़ में बात क्यों नहीं करते।

हाल ही में महाराष्ट्र में एमएनएस का एक कार्यकर्ता मुस्लिम इलाके में मराठी थोपने गया तो उसे माफी तक माँगनी पड़ी और वो भी हिंदी में। इसके बावजूद हिन्दी को सम्मान नहीं मिल पा रहा है, लोग उसी का विरोध कर रहे है।

अगर इसे ठीक तरह से समझने की कोशिश की जाए, तो ये भाषा की लड़ाई नहीं बल्कि एकतरफा राजनीति है जिसमें मुस्लिम समुदाय और उर्दू को छूने से सभी पार्टियाँ डरती हैं क्योंकि विरोध का डर होता है, जबकि हिंदुओं और हिंदी के खिलाफ बोलना ‘सुरक्षित’ माना जाता है। यही कारण है कि उर्दू, जो थोपी गई भाषा थी, आज विशेष दर्जा पाती है और हिंदी को बदनाम किया जाता है।

वैसे, उर्दू कभी आम जन की भाषा थी भी नहीं। उत्तर भारत में पढ़े-लिखे तबके ने इसे इसलिए अपनाया, क्योंकि ये राजकीय यानी कामकाज की भाषा थी। ये अलग बात है कि इसका व्याकरण हिंदी वाला रहा, तो आम लोग लिखने की लिपि अपनी सुविधानुसार सीखते रहे, लेकिन बोलने-समझने के लिए जरूरी व्याकरण वो हिंदी से ही लेते रहे। वाक्य विन्यास से लेकर सबकुछ। ऐसे में उर्दू का न सिर्फ जन्म उत्तर भारत में हुआ, बल्कि इसका व्याकरण भी हिंदी वाला है।

हालाँकि इसके पीछे की वजहें यानी जड़ें विदेशी हैं। इसके बावजूद उर्दू न सिर्फ प्योर ‘नॉर्थ इंडियन’ है, बल्कि पूरी तरह से भारत में ही जन्मी है। ये बात समझने वाले लोग कभी हिंदी का विरोध करेंगे ही नहीं, लेकिन उन्हें यही समझने नहीं दिया जा रहा है। जबकि इन लोगों को यही समझना जरूरी है।

अपनी क्षेत्रीय भाषा पर गर्व करना गलत नहीं, लेकिन दूसरी भाषाओं के अस्तित्व को नकारना या उसे अपमानित करना नैतिकता के लिहाज से कैसे सही हो सकता है? महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु या अन्य किसी भी जगह जितनी लोग हिंदी बोलते हैं, उतने उर्दू भी बोलते होंगे।

आम बोलचाल की भाषा हो या फिर साहित्य की। हिंदी की तरह उर्दू का भी प्रयोग है। लेकिन कुछ नेता केवल अपनी राजनीति साधने के लिए हिंदी भाषा सत्ता का प्रतीक मानकर इसके विरोध में जुटे हुए हैं। वहीं एक समुदाय के वोट की लालच में उर्दू को सामाजिक सौहार्द वाली भाषा करके पेश किया जाता है।

जबकि हकीकत ये है कि उर्दू पर मुस्लिम समुदाय का एकाधिकार नहीं है। ये भाषा भी उत्तरी भारत की भाषा है जैसे हिंदी। अगर इन नेताओं के लिए उर्दू बाहरी भाषा नहीं है तो फिर पूछा जाना चाहिए कि हिंदी पर इतना बवाल क्यों? क्या सिर्फ इसलिए कि सत्ताधारी पार्टी अन्य भाषाओं की तरह इस भाषा को भी सम्मान देती है और ये बात राजनीति करने वालों को नहीं पसंद आती।

(नोट: मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक करके विस्तार से पढ़ें।)

पटना में बीजेपी नेता गोपाल खेमका को गोलियों से भून उतारा मौत के घाट, 2018 में बेटे की भी हुई थी हत्या: CM नीतीश बोले – अपराधी बख्शे नहीं जाएँगे

भारतीय जनता पार्टी के नेता और व्यवसाई गोपाल खेमका की शुक्रवार (4 जुलाई 2025) की देर रात गोली मारकर हत्या कर दी गई। हमलावरों ने बिहार के पटना में स्थित उनके घर के बाहर उन्हें गोली मारी। साल 2018 में उनके बेटे गुंजन खेमका की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, गोपाल खेमका की हत्या की घटना पटना के गाँधी मैदान थाना क्षेत्र के रामगुलाम चौक के पास हुई। उस समय खेमका बांकीपुर क्लब से आ रहे थे, जहाँ घर के बाहर ही उन पर गोलियाँ चला दी गई। तुरंत उन्हें मेडिवर्सल अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

खेमका के परिवारवालों का आरोप है कि घटनास्थल से पुलिस थाना केवल 300 मीटर की दूरी पर है, इसके बावजूद पुलिस ने वहाँ पहुँचने में देरी की। खेमका के छोटे भाई शंकर खेमका ने पुलिस पर लापरवाही और धीमी प्रतिक्रिया का आरोप लगाया।

सेंट्रल सिटी एसपी दीक्षा ने जानकारी देते हुए बताया, “देर रात जब वह एग्जीबिशन रोड स्थित अपने अपार्टमेंट में पहुँचने वाले थे, तभी एक हथियारबंद अपराधी ने उन्हें नजदीक से गोली मार दी। पुलिस ने घटनास्थल से एक गोली और एक खोखा बरामद किया है। बिहार पुलिस ने मामले की जाँच के लिए SIT भी गठन किया है। घटना की सूचना मिलने के बाद पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने खेमका के आवास पर पहुँच कर शोक संतप्त परिवार को सांत्वना दी।

वही हमलावर का पता लगाने के लिए सीसीटीवी फुटेज भी निकाल लिया गया है, जिसमें नीली शर्ट और काला हेलमेट पहने एक व्यक्ति खेमका के घर के बाहर खड़ा दिखाई दे रहा है। वीडियो में दिख रहा है कि कुछ देर बाद दो गाड़ियाँ आती हैं और गार्ड के गेट खोलने का इंतजार करती है। इसमें पहली कार खेमका खुद चला रहे थे, जबकि पीछे आ रही दूसरी कार कोई दूसरा व्यक्ति चला रहा था। 

इसी दौरान हमलावर उनकी तरफ दौड़ा और कार में ही उन्हें गोली मार दी। इसके बाद अपना स्कूटर लेकर भाग गया। इसके बाद बाहर आए गार्ड ने गेट खोला। सीसीटीवी फुटेज में खेमका को अपनी कार की स्टीयरिंग व्हील पर आगे की ओर पड़ा हुआ देखा जा सकता है। जबकि दूसरी कार में बैठा व्यक्ति भागकर कार से बाहर आता दिख रहा है।

इससे पहले गोपाल खेमका के बेटे गुंजन खेमका की भी 2018 में हथियारबंद अपराधियों ने वैशाली जिले के हाजीपुर औद्योगिक क्षेत्र में इसी तरह गोली मारकर हत्या कर दी थी।

नीतीश कुमार बोले- अपराधी बख्शे नहीं जाएँगे

इस बीच, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य में कानून व्यवस्था को लेकर पुलिस पुलिस अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की है। इस बैठक के बाद नीतीश कुमार ने एक्स पर पोस्ट किया, “विधि व्यवस्था सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। अपराध करने वाले कोई भी हों, उन्हें किसी कीमत पर बख़्शा नहीं जाए। घटित आपराधिक घटनाओं के अनुसंधान कार्यों में तेजी लाने और दोषियों पर त्वरित कार्रवाई करने का निर्देश दिया।”

उन्होंने लिखा कि कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुलिस और प्रशासन को पूरी मुस्तैदी और कड़ाई से काम करने का निर्देश दिया गया है।

कमरा तैयार रखना, बिस्तर पर बिछाना साफ चादर… कोलकाता गैंगरेप से पहले मनोजीत ने सिक्योरिटी गार्ड को दिए थे निर्देश, सवाल पूछने पर धमकाया: गिरफ्तारी के बाद खुलासा, क्राइम सीन भी पूरा री-किएट

कोलकाता गैंगरेप केस में छानबीन के दौरान गिरफ्तार सुरक्षा गार्ड ने घटना वाले दिन को लेकर बड़ा खुलासा किया है। उसने बताया है कि रेप से पहले मुख्य आरोपित मनोजीत ने उसे कमरे में पर्याप्त मात्रा में पानी और साफ चादर रखने को कहा था। सुरक्षा गार्ड पिनाकी बनर्जी कहना है कि गार्ड रुम में अक्सर शराब पार्टियाँ होती थी, इसलिए उसे इस बात का शक नहीं हुआ कि मनोजीत इतनी बड़ी घटना को अंजाम देने की सोच रहा है।

पिनाकी बनर्जी ने दावा किया है कि आरोपित जैब अहमद और प्रमित मुखर्जी ने उससे कहा था कि वह मेन गेट को बंद कर दे और गार्ड रुम की चाबियाँ उन लोगों को देकर कहीं और जा कर ड्यूटी करे। बनर्जी ने कहा कि उसने मनोजीत को यह भी बताया कि कॉलेज आज खत्म हो रहा है, तो उसने उसे धमकी दी और हद में रहने को कहा।

उसने कहा, “तुम्हें क्या लगता है कि तुम मेरे बिना यहाँ जिंदा रह सकते हो?” उसने पुलिस को बताया कि उसने आरोपित जैब को एक इनहेलर लाते हुए भी देखा था। उसने उससे इस बारे में पूछा तो जैब ने कथित तौर पर कहा कि किसी को इसकी जरूरत थी।

इससे पहले पीड़िता ने अपनी शिकायत में कहा था कि घबराहट के कारण उसे साँस लेने में दिक्कत हो रही थी, इसलिए आरोपितों ने उसे इन्हेलर दिया था और फिर उसके साथ बलात्कार किया गया। सुरक्षागार्ड पिनाकी बनर्जी को शुक्रवार (4 जुलाई 2025) को अलीपुर अदालत में पेश करने के बाद 8 जुलाई तक के लिए पुलिस हिरासत में भेज दिया गया है।

गैंगरेप के सात दिन बाद पुलिस ने शुक्रवार (4 जुलाई) को लॉ कॉलेज में चारों आरोपितों और पीड़िता की मौजूदगी में क्राइम सीन को री-क्रिएट किया। इस दौरान पूरे प्रक्रिया की वीडियोग्राफी और घटनास्थल की 3डी मैपिंग की गई। इससे पहले सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कॉलेज के आस-पास बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था।

पुलिस का कहना है कि जाँच में सामने आए निष्कर्षों और पीड़िता द्वारा की गई शिकायतों को मिलाकर आगे की जाँच की जाएगी। साथ ही अन्य सबूतों से भी मामले की पुष्टि की जाएगी। वहीं गिरफ्तार सुरक्षा गार्ड पिनाकी बनर्जी को भी पुलिस ने गवाह बना लिया है।

रईस के ठेले से टकराई कार तो मुस्लिम भीड़ ने सीताराम को उतारा मौत के घाट: भीलवाड़ा में मॉब लिंचिंग के बाद सड़कों पर उतरे हिंदू, शाहरुख गिरफ्तार, वसीम-सद्दाम समेत कई हिरासत में

राजस्थान में भीलवाड़ा के जहाजपुर में एक हिंदू युवक की कार मस्जिद के पास खड़े सब्जी के ठेले से टकरा गई। माफी माँगने के लिए वह गाड़ी से उतरा तो पास खड़ी मुस्लिम भीड़ ने उसके साथ मॉब लिंचिंग कर मौत के घाट उतार दिया। मामले पर पुलिस को शिकायत दी गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, टोंक जिले से सिकंदर, सीताराम, दिलकुश और दीपक जहाजपुर आए थे। यहाँ से गुजरते समय शुक्रवार (4 जुलाई 2025) की शाम को टकिया मस्जिद के पास उनकी कार एक आलू-प्याज के ठेले से टकरा गई। ये ठेला रईस फकीर नाम के आदमी का है।

कार के टकराने से आलू और प्याज जमीन में फैल गए। पूरे मामले पर लोगों से माफी माँगने और सब्जियाँ उठाने के लिए सीताराम कार से बाहर उतरा। उसने लोगों से हाथ जोड़कर माफी माँगी और नुकसान की भरपाई करने की भी बात कही।

हालाँकि सीताराम की बात सुनने के बजाय वहाँ का माहौल हिंसा में बदल गया। पास ही खड़े मुस्लिम युवकों की भीड़ में से बाबू खान, वसीम, शाहरुख, सद्दाम, हसनैन, मोहसिन, साहिल, इस्लाम, तनवीर, शारिफ, हनीफ, आबिद, इदरीस, गुलजार और मुर्तजा ने सीताराम को पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया।

यहाँ तक कि उसके दोस्तों ने भी उसे बचाने की कोशिश की। इसमें उन्हें भी चोटें आईं। लेकिन सीताराम के साथ इस कदर मॉब लिंचिंग की गई कि घटना स्थल पर ही उसकी मौत हो गई।

मुस्लिम भीड़ यहीं पर नहीं रुकी। चारों हिंदू लड़के कहीं जा न पाएँ इसके लिए पहले उन्होंने कार की वायरिंग निकाल दी। सीताराम को तीनों दोस्तों ने किसी तरह मोटरसाइकिल पर अस्पताल तक पहुँचाया। हालांकि डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

सीताराम की मौत की खबर फैलते ही स्थानीय लोगों की गुस्साई भीड़ ने जहाजपुर के अस्पताल में जुटकर विरोध प्रदर्शन किया और दोषियों पर कार्रवाई की माँग की। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने भी घटना पर रोष व्यक्त किया है। BJP विधायक गोपीचंद मीणा भी वहाँ पहुँचे और घटना पर आक्रोश व्यक्त किया है। साथ ही उन्होंने आरोपितों के खिलाफ कड़ी सजा की माँग की है।

इस मामले की जानकारी मिलने पर भीलवाड़ा में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। बाजार को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। पुलिस ने एक आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है और शक के दायरे में आए अन्य लोगों को भी हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।

सीताराम की निर्मम हत्या के बाद समुदाय में तनाव का माहौल है। स्थानीय लोगों ने हिंदू समुदाय के खिलाफ की जा रही बर्बरतापूर्ण हिंसा और हत्या के लिए समुचित जाँच की माँग की है।

लोकतंत्र जीवन जीने का है तरीका- रेड हाउस में बोले पीएम मोदी: त्रिनिदाद और टोबैगो में सोहारी पत्ते पर किया भोजन, पोर्ट ऑफ स्पेन में प्रधानमंत्री ने कहा- भारतीय विरासत पर गर्व

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 देशों की आधिकारिक यात्रा के तहत शुक्रवार (4 जुलाई 2025) को पोर्ट ऑफ स्पेन पहुँचे। यहाँ पीएम ने त्रिनिदाद और टोबैगो की संसद को भी संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल एक राजनीतिक मॉडल नहीं बल्कि जीवन जीने का तरीका है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समय 5 देशों की आधिकारिक यात्रा पर हैं। शुक्रवार (4 जुलाई) को जब वह त्रिनिदाद और टोबैगो की यात्रा पर पोर्ट ऑफ स्‍पेन पहुँचे तो उनका स्वागत पारंपरिक तरीके से स्वागत हुआ। इसके साथ ही प्रधानमंत्री को त्रिनिदाद और टोबैगो के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘द ऑर्डर ऑफ द रिपब्लिक ऑफ त्रिनिदाद एंड टोबैगो’ से सम्मानित किया गया।

त्रिनिदाद और टोबैगो की संसद में संयुक्त बैठक को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा कि मैं इस प्रतिष्ठित रेड हाउस में बोलने वाला भारत का पहला प्रधानमंत्री बनकर गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ।

उन्होंने कहा कि हम भारतीयों के लिए लोकतंत्र सिर्फ एक राजनीतिक मॉडल नहीं बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है। हमारे पास हजारों सालों की समृद्ध विरासत है। यहाँ के कई सांसदों के पूर्वज उस बिहार से हैं, जो महाजनपदों और प्राचीन गणराज्यों का घर था।

पीएम ने कहा “इस महान राष्ट्र के लोगों ने दो उल्लेखनीय महिला नेताओं को चुना है राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री। वे गर्व से खुद को प्रवासी भारतीयों की बेटियाँ कहती हैं। उन्हें अपनी भारतीय विरासत पर गर्व है। हमारे दोनों राष्ट्र औपनिवेशिक शासन की छाया से ऊपर उठे और साहस को अपनी स्याही और लोकतंत्र को अपनी कलम बनाकर अपनी कहानियाँ लिखीं”।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा “मैं इस सदन में इतनी सारी महिला सदस्यों को देखकर प्रसन्न हूँ। महिलाओं के प्रति सम्मान भारतीय संस्कृति में गहराई से निहित है। हमारे महत्वपूर्ण पवित्र ग्रंथों में से एक स्कंद पुराण में कहा गया है कि एक बेटी दस बेटों के बराबर खुशी लाती है।”

त्रिनिदाद और टोबैगो की संसद की संयुक्त सभा को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारतीय क्रिकेट प्रेमी वेस्टइंडीज क्रिकेट टीम के सबसे उत्साही प्रशंसकों में से हैं। हम दिल से उनका उत्साहवर्धन करते हैं, सिवाय उस समय के जब वे भारत के खिलाफ खेल रहे हों।

अपनी यात्रा के दौरान पीएम मोदी ने त्रिनिदाद की प्रधानममंत्री कमला बिसेसर को भी अपने ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान में शामिल किया। दोनों ने एक पेड़ लगा कर पृथ्वी को हरबार और आने वाली पीढ़ी के लिए बेहतर कल की कामना की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की त्रिनिदाद और टोबैगो की यात्रा के अवसर पर पीएम मोदी को सोहारी पत्ते पर खाना परोसा गया। इस मौके की तस्वीरें एक्स पर शेयर करते हुए प्रधानमंत्री ने लिखा “प्रधानमंत्री कमला प्रसाद बिसेसर द्वारा आयोजित रात्रिभोज में सोहारी पत्ते पर भोजन परोसा गया। इसका त्रिनिदाद और टोबैगो के लोगों, खासकर भारतीय मूल के लोगों के लिए सांस्कृतिक महत्व है। यहाँ, त्योहारों और अन्य विशेष कार्यक्रमों के दौरान अक्सर इस पत्ते पर भोजन परोसा जाता है”।

इसके बाद से SohariLeaf जैसे हैशटैग सोशल मीडिया पर खूब ट्रेंड कर रहे हैं। भारत के लोग यह देखकर गौरवान्वित महसूस कर रहें हैं कि अन्य देशों में भी भारतीय संस्कृति को इतना ही सम्मान दिया जाता है, जितना कि भारत में। भारतीयों का कहना है कि भारत सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि एक ऐसी संस्कृति है जो सम्पूर्ण विश्व में बसती है।

‘बिग ब्यूटीफुल बिल’ पर ट्रंप ने किया हस्ताक्षर, स्वतंत्रता दिवस पर व्हाइट हाउस में हुई पिकनिक: विधेयक में ऐसा क्या है कि अमेरिका में हो गए दो फाड़?

अमेरिका के 249वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर शुक्रवार (4 जुलाई 2025) को व्हाइट हाउस में पिकनिक मनाया गया। इसी दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टैक्स और सरकारी खर्च संबंधी अपने पसंदीदा विधेयक ‘बिग ब्यूटीफुल बिल’ पर हस्ताक्षर भी किए।

इस बिल को एक दिन पहले अमेरिकी संसद हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने 218-214 वोटों से पारित किया था।

अमेरिका के 249वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर व्हाइट हाउस में पिकनिक मनाया गया। इस दौरान बिल पर साइन करते हुए ट्रंप ने कहा कि ये बिल अमेरिका के लोगों, परिवार और व्यापार के लिए नई शुरुआत है। हम गैर जरूरी खर्चों को कम कर टैक्स घटा रहे हैं ताकि हमारी अर्थव्यवस्था अधिक मजबूत हो सके।

ट्रंप ने इस अवसर पर कहा कि मैंने अमेरिका के लोगों को इतना खुश पहले कभी नहीं देखा। इस बिल के कारण अलग अलग वर्गों के लोग भी सुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

इस बिल का पास होना ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। हालाँकि इसे लेकर अमेरिका में दो अलग अलग मतों पर बहस छिड़ी हुई है। बिल के अमेरिकी संसद में पारित होने से पहले विपक्ष की डेमोक्रैट पार्टी ने बिल के विरोध में लगभग 8 घंटे तक लंबा भाषण दिया था। विपक्ष का कहना है कि ये बिल आने वाले वर्षों में लोगों को स्वास्थ्य बीमा और शिक्षा की सुविधा से वंचित कर सकता है।

 869 पन्नों के बिल में कई तरह की कटौती, सेना के लिए बजट, डिफेंस और एनर्जी उत्पादन के बढ़े हुए खर्च, स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रमों में कटौती समेत कई बातें शामिल हैं। इसके अलावा अवैध प्रवासियों के लिए डिपोर्टेशन के लिए बजट बढ़ाने मुद्दे भी रखे गए हैं।

कुछ विश्लेषकों का ये भी मानना है कि इस बिल के कारण देश के 36.2 ट्रिलियन डॉलर (2715 लाख करोड़ रुपए) के कर्ज में 3 ट्रिलियन डॉलर (2 खरब 50 लाख करोड़ रुपए) का अधिक इजाफा कर सकता है। यहाँ तक कि डोनाल्ड ट्रंप के चहेते रहे एलन मस्क ने भी इस बिल का विरोध किया था। टेस्ला के CEO मस्क का कहना है कि इस बिल से सस्ते और स्वच्छ ऊर्जा के उद्योग में अमेरिका को नुकसान हो सकता है।

अक्षय ऊर्जा की माँग लगातार बढ़ रही है। इस बिल के कारण अमेरिका में अगले 10 वर्षों में ऊर्जा की कीमतें 50% तक बढ़ जाएँगी। ऐसे में इस उद्योग से जुड़ी नौकरियों के अमेरिका में खत्म होने की आशंका जता ई जा रही है।

बिल में क्या-क्या शामिल

इस बिल में अमेरिका- मेक्सिको के बॉर्डर वॉल के लिए 46 अरब डॉलर (लगभग 3,85,730 करोड़ रुपए) का बजट रखा गया है। इसके अलावा 10,000 नए ICE अधिकारियों की भर्ती की जाएगी। 1 लाख प्रवासी डिटेंशन बेड्स के लिए 45 अरब डॉलर (3 लाख 73 हजार 777 करोड़ रुपए) का बजट रखा गया है।

इस बिल के तहत पेंटागन बजट में इजाफा किया गया है। अमेरिकी गोल्डन डोम कहे जाने वाले मिसाइल शील्ड के लिए 25 अरब डॉलर (लगभग 207,000 करोड़ रुपए) और मंगल ग्रह पर जाने वाले मिशन के लिए 10 अरब डॉलर (लगभग 83,000 करोड़ रुपये) का बजट तय किया गया है।

मुहर्रम और काँवड़ यात्रा के आते ही शुरू हुआ ‘शांति समितियों’ के साथ बैठकों का दौर, हिंसा के बाद पीड़ित ‘बहुसंख्यक’ ही ठहराए जाएँगे दोषी: क्या हिंदुओं को तुष्टिकरण का आसान शिकार बनाने के लिए होती हैं बैठकें?

हर साल की तरह इस बार भी मुहर्रम और काँवड़ यात्रा का समय एक साथ आ रहा है। हिंदू भगवान शिव को जल चढ़ाने के लिए काँवड़ यात्रा निकालते हैं, तो मुस्लिम समुदाय मुहर्रम में इमाम हुसैन की शहादत को याद करता है। ये दोनों धार्मिक-मजहबी आयोजन अपने आप में बहुत खास हैं, लेकिन जब ये एक साथ होते हैं, तो कई बार तनाव और हिंसा की खबरें सामने आती हैं।

इसे रोकने के लिए पुलिस और प्रशासन पहले से ही शांति समितियों (पीस कमेटी) की बैठकें आयोजित कर रहा है, खासकर उन इलाकों में जहाँ हिंदू और मुस्लिम आबादी मिली-जुली है। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल बार-बार उठता है – हिंसा हो या न हो, दोष ज्यादातर हिंदुओं पर ही क्यों डाला जाता है? आखिर यह खेल क्या है?

शांति समितियों की कहाँ-कहाँ हो रही हैं बैठकें?

इसका जवाब है – देश के कई हिस्सों में… जहाँ हिंदू और मुस्लिम आबादी साथ-साथ रहती है, शांति समितियाँ बनाई गई हैं। इनका मकसद है कि मुहर्रम और काँवड़ यात्रा के दौरान शांति बनी रहे। कुछ जगहों पर ये बैठकें हो चुकी हैं-

  • दिल्ली: सीलमपुर, जहाँगीरपुरी और मंडावली जैसे इलाकों में पुलिस ने शांति समितियों के साथ बैठकें कीं। इनमें काँवड़ यात्रा के रास्तों, लाउडस्पीकर की आवाज और सुरक्षा पर बात हुई।
  • उत्तर प्रदेश: गाजियाबाद, मुजफ्फरनगर, मेरठ, मुरादाबाद, सीतापुर और रायबरेली में जिला प्रशासन ने दोनों समुदायों के धार्मिक नेताओं को बुलाकर बैठकें कीं।
  • पश्चिम बंगाल: मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में भी शांति समितियाँ सक्रिय हैं, खासकर हाल की वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 के विरोध के बाद।
  • बिहार और झारखंड: कुछ संवेदनशील इलाकों में भी ऐसी बैठकें हुईं, जहाँ दोनों समुदायों के लोग शामिल हुए।

इन बैठकों में पुलिस, प्रशासन और दोनों समुदायों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। मकसद होता है कि रास्तों का बँटवारा हो, समय का ध्यान रखा जाए और कोई विवाद न हो। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये समितियाँ वाकई निष्पक्ष हैं या इनका इस्तेमाल सिर्फ हिंदुओं को कटघरे में खड़ा करने के लिए होता है?

हिंदुओं को दोषी ठहराने की आदत

बीते सालों में कई ऐसी घटनाएँ हुईं, जहाँ हिंसा के बाद हिंदुओं को ही दोषी ठहराया गया, भले ही शुरुआत दूसरी ओर से हुई हो। कुछ उदाहरण देखिए—

  • जहाँगीरपुरी-2022 (दिल्ली): हनुमान जयंती की शोभा यात्रा पर पथराव हुआ। कई लोग घायल हुए, जिनमें पुलिसकर्मी भी शामिल थे। जाँच में पता चला कि पथराव मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने किया। लेकिन शांति समिति की बैठकों और कुछ मीडिया में यह नैरेटिव बनाया गया कि हिंदुओं ने ‘उकसावे’ वाली हरकत की।
  • खरगोन-2022 (मध्य प्रदेश): रामनवमी के जुलूस पर पथराव हुआ। दुकानें और घर जले। जाँच में मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों को दोषी पाया गया। लेकिन प्रशासन और कुछ मीडिया ने हिंदुओं पर इल्जाम लगाया कि उन्होंने भड़काऊ नारे लगाए।
  • मुजफ्फरनगर-2016 (उत्तर प्रदेश): काँवड़ यात्रा के दौरान एक छोटा-सा विवाद हिंसा में बदल गया। बाद में पुलिस और स्थानीय नेताओं ने काँवड़ियों पर ही इल्जाम लगाया कि उन्होंने हंगामा किया।

इन घटनाओं में एक पैटर्न दिखता है – हिंसा की शुरुआत चाहे कोई भी करे, दोष ज्यादातर हिंदुओं पर ही डाला जाता है। शांति समितियों की बैठकों में भी हिंदुओं को ही सलाह दी जाती है कि वे ‘सावधानी’ बरतें, लाउडस्पीकर न बजाएँ या जुलूस में भीड़ न करें, ताकि मुस्लिम समुदाय ‘उत्तेजित’ न हो। लेकिन क्या मुस्लिम समुदाय को ऐसी सलाह दी जाती है? यह सवाल हर बार उठता है।

शांति समितियों की जरूरत क्यों?

पुलिस का कहना है कि शांति समितियाँ बनाना जरूरी है, क्योंकि अतीत में मुहर्रम और काँवड़ यात्रा के दौरान हिंसा की कई घटनाएँ हुई हैं।

कुछ बड़े उदाहरण इस तरह से हैं-

  • अहमदाबाद दंगा-1969: मुहर्रम और अन्य आयोजनों के समय हुए दंगों में करीब 1000 लोग मारे गए।
  • मुरादाबाद दंगा-1980: ईद और अन्य आयोजनों के दौरान हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए।
  • मुजफ्फरनगर दंगा-2013: एक छोटी-सी घटना ने सांप्रदायिक हिंसा का रूप ले लिया, जिसमें कई लोग मारे गए और हजारों बेघर हुए।

पुलिस का मानना है कि शांति समितियाँ दोनों समुदायों के बीच संवाद का रास्ता खोलती हैं। इन बैठकों में रास्तों, समय और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बात होती है। लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि ये समितियाँ सिर्फ औपचारिकता हैं और इनका असल मकसद हिंदुओं को ‘नियंत्रण’ में रखना है।

कॉन्ग्रेस और शांति समितियों का इतिहास

शांति समितियों की शुरुआत का इतिहास कॉन्ग्रेस सरकारों से जुड़ा है। 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद देश में सांप्रदायिक हिंसा की कई घटनाएं हुईं। नोआखली (बंगाल) और बिहार के दंगों में हजारों लोग मारे गए। उस समय कॉन्ग्रेस ने शांति समितियों (या अमन कमेटियों) का गठन शुरू किया। इनका मकसद था –

  • हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच विश्वास बहाल करना।
  • धार्मिक आयोजनों के दौरान तनाव रोकना।
  • हिंसा की आशंका को कम करना।

लेकिन लोगों का कहना है कि कॉन्ग्रेस ने इन समितियों का इस्तेमाल अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए किया। खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में, इन समितियों के जरिए कॉन्ग्रेस ने मुस्लिम समुदाय को यह दिखाने की कोशिश की कि वह उनकी सुरक्षा की गारंटी है। इस प्रक्रिया में हिंदुओं को बार-बार “संयम” बरतने का संदेश दिया गया।

सिर्फ मुस्लिम बहुल इलाकों में क्यों?

शांति समितियाँ ज्यादातर उन इलाकों में बनाई जाती हैं जहाँ मुस्लिम आबादी ज्यादा है। जैसे दिल्ली का सीलमपुर, जहाँगीरपुरी या पश्चिम बंगाल का मुर्शिदाबाद। इसका कारण यह बताया जाता है कि इन इलाकों में सांप्रदायिक तनाव की आशंका ज्यादा रहती है। लेकिन यह बात कई सवाल उठाती है-

  • एकतरफा नीति: हिंदू बहुल इलाकों में ऐसी समितियाँ क्यों नहीं बनतीं? या उनकी जरूरत ही क्यों नहीं पड़ती?
  • हिंदुओं पर दबाव: काँवड़ यात्रा जैसे हिंदू आयोजनों में हिंदुओं को सलाह दी जाती है कि वे लाउडस्पीकर न बजाएँ, जुलूस छोटा रखें, ताकि मुस्लिम समुदाय ‘नाराज’ न हो। लेकिन मुहर्रम के जुलूसों में ऐसी सख्ती क्यों नहीं दिखती?
  • दोष का खेल: हिंसा होने पर हिंदुओं को ही दोषी ठहराया जाता है, यह कहकर कि उन्होंने ‘उकसाया’। और मामलों की जाँच में ये बात हमेशा सामने आती है कि शुरुआत मुस्लिम समुदाय ही करता है।

यह नीति न सिर्फ एकतरफा लगती है, बल्कि यह भी सवाल उठाती है कि क्या प्रशासन मुस्लिम समुदाय को ‘तुष्टिकरण’ करने की कोशिश कर रहा है?

हिंदुओं को क्यों बार-बार सलाह?

हिंदू त्योहारों जैसे काँवड़ यात्रा, रामनवमी या हनुमान जयंती के दौरान हिंदुओं को ही सलाह दी जाती है कि वो…

  • ‘लाउडस्पीकर धीमा रखें।’
  • ‘जुलूस में ज्यादा भीड़ न करें।’
  • ‘मुस्लिम बहुल इलाकों से बचें।’

ऐसा इसलिए, ताकि मुस्लिम समुदाय ‘उत्तेजित’ न हो। लेकिन मुहर्रम जैसे मुस्लिम आयोजनों में ऐसी सख्ती कम दिखती है। और जब दोनों त्योहार एक साथ होते हैं, तो दोनों से शांति की अपील की जाती है, लेकिन हिंसा होने पर दोष फिर भी हिंदुओं पर ही डाला जाता है। यह स्थिति एक खतरनाक नैरेटिव को जन्म देती है – कि मुस्लिम समुदाय की हिंसा को ‘जायज’ माना जाए और हिंदुओं को हर बार ‘संयम’ बरतना चाहिए।

इस साल भी वही कहानी

इस साल भी मुहर्रम और काँवड़ यात्रा के लिए शांति समितियों की बैठकें हो रही हैं। दिल्ली, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में पुलिस और प्रशासन सक्रिय है। लेकिन हर बार की तरह, हिंदुओं को ही ज्यादा सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है। अगर इस बार हिंसा होती है, तो क्या फिर से हिंदुओं को ही दोषी ठहराया जाएगा?

यह ‘नाटक’ क्यों? ऐसे में लोग शांति समितियों को एक ‘नाटक’ ही मानते हैं। क्योंकि…

  • हिंदुओं को कटघरे में खड़ा करना: हिंसा की शुरुआत चाहे कोई भी करे, दोष हिंदुओं पर ही डाला जाता है।
  • राजनीतिक फायदा: कुछ राजनीतिक दल इन समितियों का इस्तेमाल अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए करते हैं।
  • एकतरफा अपील: हिंदुओं को बार-बार संयम बरतने की सलाह दी जाती है, लेकिन मुस्लिम समुदाय को ऐसी सख्ती कम दिखाई देती है।

यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाता है, जहाँ हिंदू अपने ही देश में अपने त्योहार मनाने से डरने लगते हैं।

शांति समितियाँ बनाना गलत नहीं है। अगर ये वाकई शांति ला सकती हैं, तो यह अच्छा कदम है। लेकिन इनकी कार्यप्रणाली और नीयत पर सवाल उठते हैं। बार-बार हिंदुओं को दोषी ठहराने की आदत न सिर्फ एकतरफा है, बल्कि यह सांप्रदायिक तनाव को और बढ़ाती है।

अगर शांति समितियाँ निष्पक्ष हों, तो दोनों समुदायों की जिम्मेदारी बराबर होनी चाहिए। हिंसा को किसी भी रूप में सही नहीं ठहराया जा सकता। हालाँकि अब इस बार मुहर्रम और काँवड़ यात्रा के दौरान शांति बनी रहे, ऐसा हर कोई चाहता है, लेकिन इसके लिए प्रशासन और शांति समितियों को निष्पक्ष रहना होगा।

भारत सरकार ने वक्फ कानून से जुड़े दिशानिर्देश किए जारी, अब खास पोर्टल और डाटाबेस में दर्ज होंगी सभी प्रॉपर्टीज: जानें- इसके मायने क्या और ये कैसे करेगा काम

केंद्र सरकार ने गुरुवार (3 जुलाई 2025) को वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के तहत नए वक्फ नियम 2025 लागू किए। इसे एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तिकरण, दक्षता और विकास नियम – 2025 (Unified Waqf Management, Empowerment, Efficiency and Development Rules, 2025) कहा जा रहा है। ये नियम हाल ही में लागू वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के तहत बनाए गए हैं, जो 8 अप्रैल 2025 से लागू हुआ था।

इस कदम का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को पारदर्शी, उत्तरदायी और आधुनिक तकनीक से युक्त बनाना है। यह पहली बार है जब देशभर की वक्फ संपत्तियों को एक केंद्रीकृत डिजिटल पोर्टल पर लाने का प्रयास किया जा रहा है।

इस नए नियम के अंतर्गत एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म केंद्रीय वक्फ प्रबंधन प्रणाली (Central Waqf Management System – CWMS)  बनाया गया है। इसमें वक्फ संपत्तियों और उनके अतिक्रमण, विकास योजनाओं और वित्तीय जानकारी को डिजिटल रूप से दर्ज किया जाएगा। यह पोर्टल अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय में वक्फ विभाग के संयुक्त सचिव के अधीन कार्य करेगा।

हर वक्फ संपत्ति को एक विशेष पहचान संख्या (ID) दी जाएगी जिससे उनकी निगरानी और भविष्य में निर्देश लेना आसान होगा। अब राज्य वक्फ बोर्डों की फाइलों में सीमित जानकारी की जगह सारी जानकारी सार्वजनिक पोर्टल पर मौजूद रहेगी।

नियमों के अनुसार, हर राज्य सरकार को एक नोडल अधिकारी नियुक्त करना होगा जिसकी रैंक कम से कम संयुक्त सचिव के बराबर हो। साथ ही, एक केंद्रीय सहायता इकाई बनाई जाएगी जो वक्फ की जानकारी, पंजीकरण, अकाउंट मैन्ट्नन्स, ऑडिट और अन्य कार्यों को सुचारू रूप से कराने में मदद करेगी।

सभी मुतवल्लियों (वक्फ संपत्तियों के प्रबंधकों) को पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा। उन्हें मोबाइल और ईमेल के जरिए ओटीपी द्वारा प्रमाणित किया जाएगा। इसके बाद वों सभी अपनी वक्फ संपत्तियों की जानकारी पोर्टल पर दर्ज करा सकेंगे और नियमित वित्तीय व प्रशासनिक रिपोर्ट वक्फ बोर्ड को देनी होगी।

नए नियमों में वक्फ संपत्तियों का समय पर पंजीकरण, जियो टैगिंग और डिजिटल मैपिंग को अनिवार्य कर दिया गया है। इससे अपंजीकृत और सीमा-विवादित संपत्तियों की पहचान की जा सकेगी। हर वक्फ बोर्ड को समय-समय पर ऑडिट रिपोर्ट जमा करना होगा और देरी की स्थिति में कार्रवाई की जा सकती है।

एक तय किए गए प्रारूप में अकाउंट मैन्ट्नन्स की व्यवस्था की गई है जिससे पारदर्शिता और एकरूपता सुनिश्चित हो सके। अतिक्रमित वक्फ संपत्तियों की सूची अब सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जाएगी जिसमें उनकी कानूनी स्थिति और पुनः प्राप्ति की जानकारी भी होगी।

इससे वक्फ बोर्डों पर दबाव रहेगा कि वे समय पर कार्रवाई करें और अतिक्रमण पर सख्ती दिखाएँ। यह व्यवस्था आम जनता को सूचनाएँ उपलब्ध कराने का काम भी करेगी। इसके अलावा, विधवाओं, तलाकशुदा महिलाओं और अनाथों को वक्फ से सहायता प्राप्त करने की प्रक्रिया को स्पष्ट किया गया है। अकाउंटिंग, ऑडिट, रजिस्टर संधारण आदि के तरीके भी नियमों में शामिल किए गए हैं।

सरकार का कहना है कि यह पहल वक्फ संपत्तियों की गड़बड़ियों, अतिक्रमण और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए जरूरी थी, जिसे कई बार संसद और ऑडिट रिपोर्टों में उजागर किया गया था।

हालाँकि वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 को लेकर कई याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं, जिनमें वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेताओं समेत कई याचिकाकर्ताओं ने इसकी वैधता पर सवाल उठाए हैं। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रखा है।

यह विषय आगामी मानसून सत्र में संसद में भी चर्चा का केंद्र रह सकता है। सरकार का कहना है कि ये नियम मजहबी और सामाजिक संपत्तियों को समाज के ज़रूरतमंद तबकों के हित में उपयोग में लाने की दिशा में एक अहम और निर्णायक पहल हैं।