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छत्तीसगढ़ और राजस्थान की 9-9 पार्टियों पर संकट, आयोग ने थमाया नोटिस: जानें क्या है मामला- क्यों छिन जाती है किसी राजनीतिक पार्टी की मान्यता?

पिछले छह साल यानी 2019 से चुनाव नहीं लड़ने वाले राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग ने नोटिस जारी किया है। आयोग ने ऐसे सभी पार्टियों को सूची से हटाने के संबंधित राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को निर्देश दिए हैं। फिलहाल इन पार्टियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने के लिए कहा गया है। सुनवाई की प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव आयोग अपना फैसला लेगा कि इन पार्टियों को सूची से बाहर करना है या नहीं।

छत्तीसगढ में ऐसी 9 पार्टियाँ हैं जिन्हें नोटिस थमाया गया है।

  1. छत्तीसगढ़ एकता पार्टी
  2. छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा
  3. छत्तीसगढ़ समाजवादी पार्टी
  4. छत्तीसगढ़ संयुक्त जातीय पार्टी
  5. छत्तीसगढ़ विकास पार्टी
  6. पृथक बस्तर राज्य पार्टी
  7. राष्ट्रीय आदिवासी बहुजन पार्टी
  8. राष्ट्रीय मानव एकता कांग्रेस पार्टी
  9. राष्ट्रीय समाजवादी स्वाभिमान मंच

राजस्थान की बात करें तो यहाँ भी ऐसी 9 पार्टियाँ हैं। इनमें पूर्व बीजेपी नेता और राज्यसभा सांसद घनश्याम तिवाड़ी की पार्टी का नाम भी शामिल है।

राजस्थान की 9 पार्टियाँ

  1. राजस्थान जनता पार्टी
  2. राष्ट्रीय जनसागर पार्टी
  3. खुशहाल किसान पार्टी
  4. भारत वाहिनी पार्टी
  5. भारतीय जन हितकारी पार्टी
  6. नेशनल जनसत्ता पार्टी
  7. नेशनल पीपुल्स फ्रंट
  8. स्वच्छ भारत पार्टी
  9. महाराणा क्रांति पार्टी

दरअसल ये पार्टियाँ चुनाव के समय राजनीतिक फायदे के लिए पेपर पर बनाई जाती हैं। पार्टी बनने पर सरकार से वित्तीय मदद और दूसरी सुविधाओं का लाभ उठा लिया जाता है और धरातल पर इसका वजूद नहीं होता।

भारत में रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट 1951 की धारा 29A के तहत राजनीतिक पार्टियों का रजिस्ट्रेशन चुनाव आयोग करता है। इसमें टैक्स में छूट का भी फायदा मिलता है। चुनाव चिन्ह मिलने और राजनीतिक फायदा उठाने के लिए पार्टियाँ माध्यम बन जाती हैं।

15 दिनों की मोहलत

मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इन पार्टियों को 15 दिन में आयोग के ऑफिस आकर जवाब देने के लिए कहा है। पार्टियों के अध्यक्ष, महासचिव या पार्टी प्रमुख जो भी चाहे आयोग आकर जवाब दे सकते हैं। इसमें ये बताना होगा कि 2019 के बाद 6 साल तक इनलोगों ने किसी भी चुनाव में हिस्सा क्यों नहीं लिया? और अब तक धरातल पर क्या-क्या किया है या इनकी गतिविधि चल रही है या नहीं।

नोटिस में ये भी कहा गया है कि यदि वक्त रहते इन पार्टियों के नुमाइंदे आयोग के सामने प्रस्तुत होकर जवाब नहीं दिया तो आयोग इन पार्टियों को निष्क्रिय मानते हुए पार्टियों की सूची से हटा सकता है।

क्यों छीनी जाती है पार्टियों की मान्यता ?

  1. पार्टियाँ अगर चुनाव आयोग द्वारा तय वोट प्रतिशत से कम वोट पाती हैं तो मान्यता छिन जाती है।
  2. चुनाव आयोग के नियम और संविधान का उल्लंघन करने पर पार्टियों की मान्यता जा सकती है।
  3. चुनाव आयोग समय-समय पर समीक्षा करता है कि पार्टियाँ धरातल पर एक्टिव हैं या नहीं।
  4. अगर कोई राजनीतिक दल टूट जाता है और उसका वजूद नहीं बचता तो पार्टी की मान्यता खत्म हो जाती है।
  5. अगर पार्टी का रजिस्ट्रेशन गलत तरीके से किया गया हो, तो मान्यता रद्द हो सकती है

चीन ने पाकिस्तान को लाइव लैब बनाकर की अपने हथियारों की टेस्टिंग, डिप्टी आर्मी चीफ बोले-ऑपरेशन सिंदूर में तीन दुश्मनों से एक साथ लड़ा भारत: हमें मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत

भारतीय सेना के डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर. सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर को लेकर बड़ा खुलासा किया है। दिल्ली में FICCI के ‘न्यू एज मिलिट्री टेक्नोलॉजीज’ कार्यक्रम में उन्होंने बताया कि मई 2025 में हुए इस ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान को चीन से भारतीय सेना की गतिविधियों की लाइव जानकारी मिल रही थी।

जनरल सिंह ने कहा, “भारत और पाकिस्तान के बीच DGMO स्तर की बातचीत चल रही थी, तब पाकिस्तान को चीन हमारे सैन्य ठिकानों की लाइव अपडेट्स दे रहा था। जनरल सिंह ने कहा कि भारत को एक साथ तीन दुश्मनों पाकिस्तान, चीन और तुर्की का सामना करना पड़ा।” उन्होंने कहा, “एक बात जो चीन ने शायद देखी है वो ये कि वो अपने हथियारों को अलग-अलग सिस्टम्स के खिलाफ आजमा सकता है। जैसे एक तरह की ‘लाइव लैब’ उसे मिल गई हो।”

जनरल राहुल सिंह ने बताया कि पिछले पाँच सालों में पाकिस्तान के 81% हथियार चीन से आए हैं। चीन ने पाकिस्तान को एक लाइव लैब की तरह इस्तेमाल किया, जहाँ वह अपने हथियारों को दूसरे हथियारों के खिलाफ टेस्ट कर रहा था। तुर्की ने भी पाकिस्तान को खुफिया जानकारी और राजनीतिक समर्थन देकर उसका साथ दिया। उन्होंने कहा कि जंग एक बॉर्डर पर हो रही थी लेकिन विरोधी तीन थे। वैसे, आपको बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सभी चीनी हथियार फुस्स साबित हुए।

देश को मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत

जनरल सिंह ने कहा कि हमारे कुछ स्वदेशी हथियारों ने शानदार काम किया, लेकिन कुछ ने निराश किया। उन्होंने चेतावनी दी कि भविष्य में ऐसे खतरों से निपटने के लिए मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत है।

डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर. सिंह ने कहा, “हमारे पास इजरायल जैसा आयरन डोम नहीं है। हमारा देश बहुत बड़ा है और ऐसी तकनीक में भारी खर्चा आता है।” फिर भी भारतीय सेना ने पाकिस्तान के हमलों को नाकाम कर दिया। ऑपरेशन के चार दिन बाद 10 मई को भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर हुआ। जनरल सिंह ने इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर पर भी जोर दिया और कहा कि हमें अपने सिस्टम को और मजबूत करना होगा। इस ऑपरेशन से भारत को कई सबक मिले हैं।

बता दें कि ये सब 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद शुरू हुआ, जिसमें 26 लोग मारे गए, जिनमें पर्यटक और स्थानीय लोग शामिल थे। इसके जवाब में भारत ने 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। इस ऑपरेशन में भारतीय सेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान-ऑक्यूपाइड कश्मीर (PoK) में नौ आतंकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन से सटीक हमले किए। जवाब में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर और पंजाब में ड्रोन हमले किए खासकर पुंछ और राजौरी में, जहाँ कई नागरिकों की जान गई।

त्रिनिदाद और टोबैगो को बनाने वाले कौन हैं गिरमिटिया मजदूर? पीएम मोदी ने जिनकी मेहनत को किया याद: प्रधानमंत्री कमला सुशीला प्रसाद का जानिए बिहार से कनेक्शन

भारतीयों की पहचान उनकी मेहनत, सफलता और हर मुसीबत से लड़ने की कर्मठता के लिए जानी जाती है। ये अपनी संस्कृति के साथ हर नई जगह में घुलमिल जाते हैं। यही वजह है कि भारतीय सदियों से दुनिया भर में प्रवास करते रहे हैं। भारतीयों की कार्यकुशलता, शिक्षा और उद्यमशीलता का लोहा आज दुनिया मान रही है।

एक समय ऐसा भी था जब उन्हें जबरन दूसरे देशों में मजदूरी के लिए ले जाया जाता था। धीरे-धीरे गुलाम जैसी जिंदगी से आगे बढ़े और जहाँ बसे वहाँ की पहचान बन गए। पराधीनता, दर्द और पीड़ा से मुक्त होकर अपना नाम कमाया।

पीएम मोदी ने भारतीय समुदाय की प्रशंसा की

वेनेजुएला के पास एक छोटे सा द्वीप है जिसे त्रिनिदाद और टोबैगो के नाम से जाना जाता है। इसका इतिहास भारत से जुड़ा हुआ है क्योंकि भारतीय यहाँ भी ले जाकर बसाए गए थे।

5 देशों के दौरे पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब त्रिनिदाद और टोबैगो पहुँचे तो उसका जमकर स्वागत किया गया। कोवा में नेशनल साइक्लिंग वेलोड्रोम में एक कार्यक्रम में पीएम मोदी ने कहा, “मैं जानता हूँ कि त्रिनिदाद और टोबैगो में भारतीय समुदाय की मौजूदगी उनके साहस और कार्यकुशलता के बारे में बताता है,”

फोटो साभार-Focus2Move

भगवान राम के जयकारे सुनकर पीएम मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने कहा, “मैं भी इसी तरह की भक्ति भावना के साथ कुछ लेकर आया हूँ। अयोध्या में स्थित राम मंदिर की प्रतिकृति और सरयू नदी का कुछ जल”

पीएम ने कहा, “हम अपने प्रवासी समुदाय की ताकत और समर्थन को बहुत महत्व देते हैं। दुनिया भर में फैले 35 मिलियन से अधिक लोगों के साथ, भारतीय प्रवासी हमारा गौरव हैं। जैसा कि मैंने अक्सर कहा है, आप में से प्रत्येक एक राष्ट्रदूत है, भारत के मूल्यों, संस्कृति और विरासत का एक राजदूत है।” उन्होंने वैश्विक स्तर पर भारतीय समुदाय के योगदान की चर्चा की

19वीं शताब्दी से है रिश्ता हमारा

19वीं शताब्दी में भारत के लोगों को मजदूरी करने के लिए अंग्रेजों ने अपने उपनिवेशों में भेजा। कम मजदूरी और दयनीय हालत के बावजूद भारतीय मजदूर बड़ी संख्या में अनुबंध समाप्त होने के बाद वहीं रह गए।

इसकी शुरुआत 1834 में मॉरीशस से हुई। 87 साल की औपनिवेशिक अनुबंध के तहत 1.5 मिलियन से ज्यादा भारतीय दूसरे देशों में बंधुआ मजदूरों के रूप में लाए गए। अनुबंध समाप्त होने के बाद इनमें से कई अप्रवासियों ने विदेशी धरती पर ही रहने का फैसला किया। इन लोगों ने समृद्ध बस्तियाँ बनाईं और अपनी परंपराओं को आगे बढ़ाया।

पीएम मोदी ने इसको याद करते हुए कहा, “आपके पूर्वजों ने जिन परिस्थितियों का सामना किया, वो मजबूत इरादे वाले लोगों को भी तोड़ सकती थी। लेकिन उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी और समस्याओं का डटकर सामना किया। पूर्वजों ने गंगा और यमुना को पीछे छोड़ दिया, लेकिन अपने दिलों में रामायण को बसाए रखा। उन्होंने अपनी मिट्टी छोड़ी, लेकिन अपनी आत्मा नहीं।”

प्रधानमंत्री मोदी ने प्रवासियों को “एक शाश्वत सभ्यता के संदेशवाहक” के रूप में भी याद किया। प्रवासियों के योगदान से देश को सांस्कृतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक फायदा हुआ। इस खूबसूरत देश पर आप का प्रभाव दिख रहा है।”

उल्लेखनीय है कि त्रिनिदाद और टोबैको की पहली महिला और वर्तमान प्रधानमंत्री कमला सुशीला प्रसाद-बिसेसर एक हिंदू हैं। उनकी विरासत दक्षिण भारत और उत्तर भारत दोनों से मिलती है। उनके पूर्वज भारतीय अनुबंध प्रणाली के तहत त्रिनिदाद और टोबैको आए और यहीं बस गए।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “भारत में लोग प्रधानमंत्री कमला को बिहार की बेटी मानते हैं। उनकी तरह यहाँ भी ऐसे कई लोग हैं जिनकी जड़ें बिहार में हैं। बिहार की विरासत हम सभी के लिए गर्व की बात है।” दुनिया के महान प्रवासी भारतीयों की शानदार उपलब्धियों की चर्चा करते हुए उन्होंने कई प्रतिष्ठित हस्तियों का नाम भी लिया।

पीएम ने कहा, “आप, गिरमिटिया (ब्रिटिश भारत से आए गिरमिटिया मजदूर) के बच्चे हैं लेकिन अब उन संघर्ष से आगे अपनी सफलताओं के लिए जाने जाते हैं।” कैरेबियाई राष्ट्र के क्रिकेट के प्रति दीवानगी की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, “25 साल पहले जब मैं यहाँ आया था, तो हम सभी ब्रायन लारा के कवर ड्राइव और पुल शॉट से मंत्रमुग्ध हो गए थे। फिलहाल सुनील नरेन और निकोलस पूरन हमारे युवाओं के दिलों में बसते हैं। पिछले कुछ सालों में हमारी दोस्ती और गहरी हुई है।”

दोनों देशों के बीच गहरे और ऐतिहासिक संबंधों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, “बनारस, पटना, कोलकाता, दिल्ली भारत के शहर हो सकते हैं, लेकिन वे यहाँ की सड़कों के नाम भी हैं। नवरात्रि, महाशिवरात्रि, जन्माष्टमी यहाँ दोगुने उत्साह और गर्व के साथ मनाई जाती है।”

उन्होंने भगवान राम का भी जिक्र किया और भारतीय समुदाय की भगवान राम में गहरी आस्था के बारे में बताया। उन्होंने कहा, “मुझे यकीन है कि आप सभी ने 500 साल बाद अयोध्या में राम लला की वापसी का बहुत उत्साह के साथ स्वागत किया होगा। हमें याद है कि आपने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए पवित्र जल और शिलाएं भेजी थीं।”

यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) ने 1998 में दास व्यापार और उन्मूलन को याद करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस की स्थापना की ।

कौन हैं गिरमिटिया?

1833 में ब्रिटिश साम्राज्य, 1848 में फ्रांसीसी उपनिवेशों और 1863 में डच साम्राज्य में दास प्रथा का अंत हो गया। ब्रिटेन में भारतीयों की गिरमिटिया दासता 1920 के दशक तक जारी रही। इससे इंडो-साउथ अफ़्रीकी, इंडो-कैरिबियन, इंडो-मॉरीशस और इंडो-फिजियन समुदायों का विकास हुआ।

दरअसल दास प्रथा खत्म होने के बाद काम करवाने के लिए अंग्रेजी साम्राज्य को मजदूरों की जरूरत पड़ी। तब भारत से 5 साल के अनुबंध पर इन मजदूरों को 1834 के दशक में अमेरिका, अफ्रीका और यूरोप भेजा गया। 5 साल बीत जाने के बाद आने के पैसे नहीं थे इसलिए ज्यादातर लोग यहाँ बस गए और इन्हें गिरमिटिया कहा गया।

भारत से बाहर भेजे गए मजदूरों के लिए गिरमिटिया शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले अंग्रेजों ने ही किया। जब मजदूरों को अनुबंध के तहत भेजा जाता था तो उसे गिरमिटिया कहा जाता था। गिरमिटिया की पूरी कहानी ब्रिटिश उपनिवेशवाद से जुड़ी हुई है। दरअसल ब्रिटिश साम्राज्य को स्थापित करने और उसे मजबूत बनाने के लिए सस्ते और मेहनतकश लोगों की जरूरत थी। उस वक्त ब्रिटिश शासन ने भारतीय किसानों पर भारी टैक्स लगा दिया था और कर्ज के चंगुल में किसान लगातार फँसते जा रहे थे। ऐसे में गिरमिटिया बनकर बड़ी संख्या में लोगों ने पलायन किया।

त्रिनिदाद और टोबैगो में भारतीय प्रवासियों का संक्षिप्त इतिहास

1498 में क्रिस्टोफर कोलंबस के त्रिनिदाद और टोबैगो के समुद्र तट पर कदम रखा। इससे पहले इस द्वीप को कोई नहीं जानता था। बाद में जब इस द्वीप का दुनिया से सामना हुआ तो यहाँ के लोगों को दास के रूप में काम करने के लिए मजबूर किया गया।
स्पेनिश साम्राज्य में 1796 तक त्रिनिदाद शामिल था।

1802 में इस क्षेत्र को ब्रिटिश क्राउन को सौंप दिया गया और ये द्वीप ब्रिटिश उपनिवेश का हिस्सा बन गया। अंग्रेजी निवेशक त्रिनिदाद के चीनी क्षेत्र को बढ़ावा देना चाहते थे। अंग्रेजी कंपनियों को इससे जबरदस्त फायदा हो रहा था। द्वीप के चीनी और कोको बागानों में काम करने के लिए अफ्रीकी देशों से मजदूरों को दास के रूप में लाया गया था।

1838 में ब्रिटिश संसद के दास प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया। इसका असर त्रिनिदाद पर पड़ा। यहाँ की कृषि अर्थव्यवस्था तब ढहने के कगार पर पहुँच गई थी। यहाँ अफ्रीकी लोगों ने खेतों, बागानों में काम करने से इनकार कर दिया।

चीनी और चॉकलेट उद्योगों ने खुद को पूरी तरह से ढहने से बचाने के लिए नए मजदूरों को लाना शुरू किया। इस वक्त चीनी, पुर्तगाली, अफ्रीकी-अमेरिकी और सबसे ज्यादा भारतीय मजदूरों को यहाँ लाया गया। भारतीय सबसे मेहनती और तैयार मजदूर माने जाते थे और कथित तौर पर इन्हें ‘मूल्यवान स्थिर मजदूर’ कहा जाता था।

इसलिए भारतीय मजदूरों की माँग यहाँ ज्यादा थी और किसी भी अन्य राष्ट्र से अधिक संख्या में इन्हें काम पर रखा गया था। 1891 तक इन द्वीपों में 45,800 से अधिक भारतीय रह रहे थे। 1917 में ब्रिटिश सरकार ने गिरमिटिया व्यवस्था को खत्म कर दिया।

सच में, दास व्यापार का उन्मूलन केवल एक दिखावा था, क्योंकि उपनिवेशों में गिरमिटिया व्यवस्था उससे कम अमानवीय नहीं था। भारतीयों को केवल ब्रिटिश हितों के लिए हिंद महासागर और अटलांटिक महासागर को पार करके हजारों किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए मजबूर किया गया।

भारतीय मजदूरों की जिंदगी

217 भारतीय मजदूरों को लेकर पहला जहाज 1845 में त्रिनिदाद के पोर्ट-ऑफ-स्पेन पहुँचा। त्रिनिदाद में अधिकांश भारतीय कलकत्ता (कोलकाता) और मद्रास (चेन्नई) के बंदरगाहों से आए थे। इनमें ज्यादातर बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल के लोग शामिल थे। इसके बाद 1845 और 1917 के बीच जहाजों में भरकर हजारों भारतीयों को कैरीबियाई देशों में ले जाया गया।

यात्रा के दौरान मुश्किलों के बाद जब ये लोग वहाँ पहुँचे तो परिस्थितियाँ काफी मुश्किलभरी थी। भारतीयों को दुर्व्यवहार, घटिया भोजन और मौसम की मार का सामना करना पड़ा।

प्रसिद्ध बारबेडियन उपन्यासकार जॉर्ज लैमिंग ने कहा, “त्रिनिदाद और गुयाना का ऐसा कोई इतिहास नहीं हो सकता जो भारतीय मजदूरों की मेहनत से परे हो।”

बाद में परिस्थितियाँ बदली। यहां एक कानून बनाया गया जिसके तहत मज़दूरों को जमीन दी गई। कई भारतीय मजदूरों ने इसे मान लिया और वहीं के होकर रह गए। 1960 के दशक तक बड़ी संख्या में त्रिनिदाद में बसे भारतीय ईसाई मिशनरियों के चंगुल में फँस गए और वहाँ बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ। इनमें से ज्यादातर निरक्षर और गरीब थे।

20वीं सदी की शुरुआत में भारतीय यहाँ के व्यापार और राजनीति में सक्रिय हुए। उन्होंने एकजुट होकर राजनीतिक संगठन बनाए। धीरे-धीरे यहाँ की राजनीति पर इनकी पकड़ मजबूत होती चली गई।

निष्कर्ष

30 मई को मनाया जाने वाला भारतीय प्रवासी दिवस उन पहले भारतीय गिरमिटिया मजदूरों को याद करता है, जो मई 1845 में फेटेल रजाक जहाज पर सवार होकर त्रिनिदाद पहुंचे थे,। हालाँकि वे अपनी मर्जी से नहीं गए थे, बल्कि बिना किसी विकल्प के इस यात्रा पर निकलने के लिए मजबूर थे। धीरे- धीरे इन लोगों ने विदेशी भूमि को अपने घर के रूप में अपनाया और इसे भारत के रंगों और परंपराओं से समृद्ध किया।

जैसा कि पीएम मोदी ने कहा कि गिरमिटिया के बच्चों ने वास्तव में इतिहास रच दिया है। उन्होंने दिखाया कि उनकी ताकत, मेहनत और जीवन जीने का दृढ़ संकल्प ब्रिटिश उत्पीड़न और अत्याचारों के कहीं ऊपर था। स्थिति अब बदल गई है। कई देशों की तरह त्रिनिदाद और टोबैगो में ये लोग प्रमुख पदों पर पहुँच गए हैं और देश की उपलब्धियों में अपना अहम योगदान दे रहे हैं।

PAK-चीन में 3000KM भीतर घुसकर जो मचा दे तबाही, जमीन के भीतर हो विस्फोट… ऐसा हाइपरसोनिक बंकर बस्टर बना रहा DRDO: जानें- भारत के पास ऐसा क्या, जो इजरायल के पास भी नहीं

भारत ने अपनी ताकत को और मजबूत कर लिया है! DRDO की अग्नि-5 बंकर बस्टर मिसाइल अब तैयार हो रही है, जो दुश्मन के जमीन के नीचे बने बंकरों को पल में उड़ा देगी। ये मिसाइल 7,500 किलो का भारी वारहेड ले जा सकती है और 100 मीटर गहराई तक घुसकर तबाही मचा सकती है। इसकी रेंज 3,000 किमी तक रहेगी, यानी पाकिस्तान और चीन के अहम ठिकाने इसके निशाने पर होंगे।

खास बात ये है कि ये हाइपरसोनिक है, यानी इतनी तेज कि कोई रडार इसे पकड़ नहीं सकता। अमेरिका के GBU-57 बम से भी ज्यादा ताकतवर, ये मिसाइल सस्ती और स्वदेशी है। पाकिस्तान के कहुटा और नूर खान जैसे ठिकानों को नष्ट करने में ये गेम-चेंजर होगी। DRDO की इस तकनीक ने भारत को दुनिया के टॉप डिफेंस पावर में ला खड़ा किया है।

खास बात ये है कि भारत की अग्नि-V मिसाइल ऐसी मिसाइल है, जिससे रेंज में दुनिया की कुछेक मिसाइलें भले ही आगे हों, लेकिन बंकर बस्टर के तौर पर, जैसा इसे बनाया जा रहा है, वैसी ताकत दुनिया के किसी भी देश के पास नहीं है। आइए, विस्तार से जानते हैं अग्नि-V के बारे में सबकुछ…

अग्नि-V बंकर बस्टर मिसाइल क्या है?

भारत का रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) एक ऐसी मिसाइल बना रहा है, जो दुनिया के सबसे ताकतवर गैर-परमाणु हथियारों में से एक होगी। इसका नाम है अग्नि-V बंकर बस्टर मिसाइल। ये मिसाइल जमीन के नीचे बने मजबूत बंकरों, सैन्य ठिकानों और हथियारों के गोदामों को तबाह करने के लिए बनाई जा रही है। इसे खास तौर पर पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देशों की चुनौतियों को ध्यान में रखकर डिज़ाइन किया गया है।

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अग्नि-5 (AGNI-V) पहले से ही भारत की एक शक्तिशाली मिसाइल है, जो 5,000-7,000 किलोमीटर तक मार कर सकती है और परमाणु हथियार ले जा सकती है। लेकिन अब DRDO इस मिसाइल का एक नया वर्जन बना रहा है, जो पारंपरिक हथियार (यानी गैर-परमाणु) के साथ काम करेगा। इस नए वर्जन को खास तौर पर बंकर बस्टर के लिए डिज़ाइन किया जा रहा है। बंकर बस्टर का मतलब है ऐसा हथियार जो जमीन के नीचे गहरे बने बंकरों, सुरंगों और जमीन के नीचे या ऊपर कंक्रीट की मोटी परतों से बनाई गई इमारतों को ध्वस्त कर सके।

अग्नि-V मिसाइल की खास बातें

  • वजन और ताकत: ये मिसाइल 7,500-8,000 किलोग्राम (7.5-8 टन) का भारी वारहेड ले जा सकती है। इसका मतलब है कि इसमें इतना विस्फोटक होगा कि ये बहुत बड़े और मजबूत ढाँचों को भी उड़ा देगा। इसका खुद का वजन 50 हजार किलोग्राम तक है।
  • पेनेट्रेशन: ये मिसाइल जमीन में 80-100 मीटर गहराई तक घुसकर विस्फोट कर सकती है। यानी पहाड़ों या कंक्रीट के नीचे बने बंकर भी इससे नहीं बच सकते।
  • रेंज: भारी वारहेड की वजह से इसकी रेंज 2,500-3,000 किलोमीटर तक होगी, जो पाकिस्तान और चीन के ज्यादातर हिस्सों को कवर कर सकती है।
  • गति: ये मिसाइल मैक 8 से मैक 20 (9,800-24,500 किमी/घंटा) की रफ्तार से चलती है। इतनी तेज गति की वजह से इसे रोकना लगभग नामुमकिन है।
  • दो तरह के वारहेड
  1. एयरबर्स्ट वारहेड: ये हवा में फटेगा और हवाई अड्डों, रडार स्टेशनों, या सतह पर मौजूद ठिकानों को तबाह करेगा।
  2. डीप-पेनेट्रेशन वारहेड: ये जमीन में गहराई तक जाएगा और बंकरों, मिसाइल साइलो, या कमांड सेंटर को नष्ट करेगा।
  • सटीकता शानदार: इसमें भारत का नाविक (NavIC) नेविगेशन सिस्टम, रिंग लेजर जायरोस्कोप और माइक्रो इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम है, जो इसे सटीक निशाना बनाने में मदद करते हैं।
  • ये मिसाइल कैनिस्टर-लॉन्च तकनीक का इस्तेमाल करती है, यानी इसे ट्रक या रेल से कहीं भी ले जाकर तेजी से लॉन्च किया जा सकता है। ये इसे और भी खतरनाक और लचीला बनाता है।
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अमेरिका के GBU-57 और भारत के अग्नि-V में कितना अंतर?

अमेरिका का GBU-57 मैसिव ऑर्डनेंस पेनेट्रेटर (MOP): ये दुनिया का सबसे मशहूर बंकर बस्टर बम है। इसका वजन 13,600 किलोग्राम (30,000 पाउंड) है, जिसमें 2,400-2,700 किलोग्राम विस्फोटक होता है। ये 60 मीटर गहरे कंक्रीट या 130 फीट चट्टान में घुस सकता है। लेकिन इसे इस्तेमाल करने के लिए B-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर चाहिए, जो बहुत महँगा है। अमेरिका ने 21 B-2 बनाए, लेकिन अब सिर्फ 19 सक्रिय हैं। हालाँकि अग्नि-V इन महँगे झंझटों से मुक्त है और पूरी तरह से सटीक हमले करने में सक्षम है।

आइए जानते हैं अग्नि-V और GBU-57 में अंतर

डिलीवरी का तरीका: GBU-57 को B-2 जैसे स्टील्थ बॉम्बर से गिराया जाता है, जो महंगे हैं और उनकी देखभाल में भारी खर्चा आता है। जबकि अग्नि-V एक मिसाइल है, जो कैनिस्टर से लॉन्च होती है। इसे बॉम्बर की जरूरत नहीं, जिससे ये सस्ता और तेज़ है।

पेलोड: GBU-57 का विस्फोटक 2,400-2,700 किग्रा है, जबकि अग्नि-V 7,500-8,000 किग्रा का वारहेड ले जा सकती है। यानी अग्नि-V ज्यादा तबाही मचा सकती है।

पेनेट्रेशन: GBU-57 60 मीटर तक घुस सकता है, लेकिन अग्नि-V 80-100 मीटर तक जा सकती है।

रेंज: GBU-57 की रेंज B-2 बॉम्बर पर निर्भर करती है, जो 11,000 किमी तक जा सकता है। वहीं, अग्नि-V की रेंज 2,500-3,000 किमी है, जो भारत के लिए काफी है।

गति: GBU-57 की गति मैक 1 (जब 50,000 फीट से गिराया जाता है) है। जबकि अग्नि-V मैक 8-20 की हाइपरसोनिक गति से चलती है, जिसे दुश्मन की मिसाइल डिफेंस सिस्टम रोक नहीं सकते।

मोबिलिटी : अग्नि-V को तेजी से तैनात किया जा सकता है। इसे दुनिया के सबसे बेहतरीन एयर डिफेंस सिस्टम भी ट्रैक नहीं कर सकते।

कुल मिलाकर अग्नि-V ज्यादा सस्ता, तेज़ और पाकिस्तान-चीन जैसे क्षेत्रीय खतरों के लिए बेहतर विकल्प है।

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दुनिया में किन देशों के पास ये ताकत

कई देशों ने बंकर बस्टर हथियार बनाए हैं, लेकिन उनकी ताकत अलग-अलग है-

  • अमेरिका: GBU-57 MOP (60 मीटर पेनेट्रेशन), GBU-28, और BLU-109 बम। इन्हें B-2 या B-52 बॉम्बर ले जाते हैं।
  • चीन: DF-15C बैलिस्टिक मिसाइल, जिसका पेलोड 500-750 किग्रा और पेनेट्रेशन 20-25 मीटर है। ये अग्नि-V से कम ताकतवर है।
  • रूस: KAB और BetAB बम, जो 1.5-5 मीटर तक घुस सकते हैं।
  • दक्षिण कोरिया: Hyunmoo-4 और Hyunmoo-5 मिसाइलें, 600 किमी रेंज और 24 मीटर पेनेट्रेशन।
  • भारत: अग्नि-V अपने भारी पेलोड और गहरी पेनेट्रेशन की वजह से GBU-57 के बाद दूसरा सबसे ताकतवर बंकर बस्टर हो सकता है।
फोटो साभार: AI ChatGPT

खास बात ये है कि इजरायल के पास इस रेंज की मिसाइल तो है, लेकिन उसके पास ऐसी मार करने वाली क्षमता नहीं है। इजरायल की जेरिको-3 मिसाइल की रेंज 11 हजार किमी के आसपास है, लेकिन वो सिर्फ 800-900 किलोग्राम का ही वॉरहेड ढो सकता है।

पाकिस्तान के कौन से ठिकाने भारत के निशाने पर?

पाकिस्तान ने अपनी सीमाओं पर कई मजबूत भूमिगत सैन्य ठिकाने बनाए हैं, जो भारत के लिए खतरा हैं। अग्नि-V बंकर बस्टर इन ठिकानों को नष्ट करने के लिए बनाई जा रही है। कुछ अहम ठिकानों के बारे में भी जान लीजिए।

कहुटा न्यूक्लियर फैसिलिटी

  • ये पाकिस्तान का सबसे महत्वपूर्ण परमाणु हथियार अनुसंधान और उत्पादन केंद्र है।
  • इसे पहाड़ों के नीचे बनाया गया है, ताकि हवाई हमलों से बचा जा सके।
  • क्यों निशाना बनाना जरूरी?: अगर युद्ध हुआ, तो ये सुविधा पाकिस्तान के परमाणु हमलों का आधार हो सकती है। इसे नष्ट करना भारत की रक्षा के लिए जरूरी है।

किराना हिल्स

  • ये पाकिस्तान की सीक्रेट न्यूक्लियर वेपन साइट है। यहाँ पाकिस्तान न सिर्फ न्यूक्लियर वेपन्स रखता है, बल्कि टेस्टिंग भी करता है।
  • यहाँ भूमिगत सुरंगें और बंकर हैं, जहाँ हथियार छिपाए जाते हैं।
  • इन हथियारों को नष्ट करके भारत पाकिस्तान की हमलावर क्षमता को कम कर सकता है।

नूर खान एयरबेस

  • इस एयरबेस के नीचे भूमिगत हथियार गोदाम और कमांड सेंटर हैं।
  • ये पाकिस्तान की वायुसेना का अहम ठिकाना है।
  • इसे तबाह करने से पाकिस्तान की हवाई ताकत और कमांड-कंट्रोल सिस्टम कमजोर होगा।

मसरूर एयरबेस

  • कराची के पास ये एयरबेस मिसाइल और परमाणु हथियारों का भंडारण करता है।
  • इसकी तबाही से पाकिस्तान की मिसाइल ताकत को बड़ा झटका लगेगा।
  • पाकिस्तान के पलटवार की संभावनाएँ लगभग नष्ट हो जाएँगी।

पाकिस्तान ने भारत के साथ कई युद्ध लड़े हैं और उसकी परमाणु ताकत भारत के लिए लगातार खतरा है। अगर युद्ध हुआ, तो ये ठिकाने भारत पर हमले का आधार बन सकते हैं। अग्नि-V की गहरी पेनेट्रेशन और हाइपरसोनिक गति इन ठिकानों को तेजी से और पूरी तरह नष्ट कर सकती है, जिससे भारत की सुरक्षा बढ़ेगी।

भारत को इस बंकर बस्टर की जरूरत क्यों?

  • पाकिस्तान और चीन का खतरा: दोनों देशों ने जमीन के नीचे बंकर, मिसाइल साइलो, और कमांड सेंटर बनाए हैं। ये भारत के लिए खतरा हैं। अग्नि-V इन ठिकानों को नष्ट करके भारत को रणनीतिक बढ़त देगी।
  • पहाड़ी युद्ध में फायदा: हिमालय जैसे इलाकों में दुश्मन सुरंगों और बंकरों का इस्तेमाल करता है। अग्नि-V इनका जवाब है।
  • सस्ता और तेज़ विकल्प: अमेरिका की तरह महँगे स्टील्थ बॉम्बर की जरूरत नहीं। मिसाइल सस्ती और तेजी से तैनात हो सकती है।
  • ईरान पर अमेरिकी हमले से मिली प्रेरणा: 22 जून 2025 को अमेरिका ने ईरान के फोर्डो परमाणु सुविधा पर GBU-57 का इस्तेमाल किया। इससे साबित हुआ कि बंकर बस्टर हथियार कितने जरूरी हैं।
  • आत्मनिर्भर भारत: ये मिसाइल पूरी तरह स्वदेशी है, जो भारत की रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भरता दिखाती है।

अग्नि-V बंकर बस्टर मिसाइल भारत की रक्षा में एक गेम-चेंजर है। ये अमेरिका के GBU-57 से ज्यादा ताकतवर, सस्ती और तेज़ है। इसकी हाइपरसोनिक गति और 80-100 मीटर की पेनेट्रेशन क्षमता इसे दुनिया के सबसे खतरनाक हथियारों में से एक बनाती है। खास तौर पर पाकिस्तान के कहुटा, किराना हिल्स और नूर खान जैसे ठिकानों को नष्ट करने की इसकी क्षमता भारत को रणनीतिक बढ़त देती है। साथ ही ये मिसाइल भारत की आत्मनिर्भरता और वैश्विक रक्षा ताकत का प्रतीक है।

जो एनसीआरबी 2024 की रिपोर्ट आई तक नहीं, उसका हवाला देकर मीडिया ने किया UP को बदनाम: रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश को बताया अपराध का अड्डा, फैक्ट चेक में पोल खुली

5 मई को टाइम्स नाउ ने ‘सबसे ज़्यादा अपराध दर वाले शीर्ष 10 भारतीय राज्यों का खुलासा!’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया। इसमें दावा किया गया है कि ‘2024 एनसीआरबी की विस्तृत अपराध रिपोर्ट’ में उत्तर प्रदेश में अपराध दर ‘7.4 प्रति व्यक्ति’ है (जिसका मतलब है कि प्रति 1,00,00 जनसंख्या पर 7,40,000 अपराध)। जबकि 2024 के आँकड़े अब तक एनसीआरबी ने जारी ही नहीं किए हैं। नवीनतम आँकड़ा 2022 का है।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी 6 मई को यही प्रकाशित किया। जागरण ने भी 22 मई को इसे प्रकाशित किया। इन सभी रिपोर्टों में एक जैसे दावे किए गए।

दावा क्या है?

रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में प्रति व्यक्ति क्राइम रेट 7.4 है। इसका मतलब है कि प्रति 100,000 पर 7,40,000 अपराध होता है। मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि यह आँकड़ा 2024 एनसीआरबी रिपोर्ट के हवाले से है। नौ अन्य राज्यों के लिए भी इसी तरह के हाई क्राइम रेट का दावा किया गया है। इसका मतलब है कि देश में अपराध बढ़ा है।

देश में सर्वाधिक क्राइम वाले 10 राज्य

  1. उत्तर प्रदेश – प्रति व्यक्ति 7.4 क्राइम रेट
  2. अरुणाचल प्रदेश – प्रति व्यक्ति 5.8 क्राइम रेट
  3. झारखंड – प्रति व्यक्ति 5.3 क्राइम रेट
  4. मेघालय – प्रति व्यक्ति 5.1 क्राइम रेट
  5. दिल्ली (एनसीटी) – प्रति व्यक्ति 5.0 क्राइम रेट
  6. असम – प्रति व्यक्ति 4.4 क्राइम रेट
  7. छत्तीसगढ़ – प्रति व्यक्ति 4.0 क्राइम रेट
  8. हरियाणा – प्रति व्यक्ति 3.8 क्राइम रेट
  9. ओडिशा – प्रति व्यक्ति 3.8 क्राइम रेट
  10. आंध्र प्रदेश – प्रति व्यक्ति 3.6 क्राइम रेट

रिपोर्ट का आँकलन किया जाए तो पता चलता है कि इन सभी राज्यों में जनसंख्या से ज्यादा अपराध हुए हैं, यानी करीब- करीब हर व्यक्ति क्राइम का शिकार हुआ है। क्योंकि इनमें प्रति व्यक्ति अपराध दर 1 से अधिक है। यही दावा सिविल सेवा से लेकर बैंकिंग परीक्षा की तैयारी कराने वाले PW IAS, Adda 24 7 और Study IQ जैसी संस्थानों ने अपने वेबसाइट पर किया।

रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि आखिर इन राज्यों में क्राइम रेट हाई क्यों हैं? उत्तर प्रदेश में अपराध ज्यादा होने की वजह चोरी , हिंसा, सांप्रदायिक अशांति को बताया गया। वहीं अरुणाचल प्रदेश और मेघालय जैसे राज्यों में कम क्राइम रेट की वजह पहाड़ों पर दूरदराज क्षेत्रों में स्थानीय जनजातीय समुदाय का रहना बताया गया है। इसकी वजह से पुलिस तक शिकायतें कम आती हैं।

झारखंड और छत्तीसगढ़ में, नक्सली हिंसा और अवैध खनन की वजह से क्राइम होता है। दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराध और सड़क पर होने वाली हिंसा काफी है, जिससे क्राइम रेट ज्यादा है। असम में जातीय संघर्ष और सीमा विवाद हिंसक घटनाओं के लिए जिम्मेदार है। हरियाणा और ओडिशा में महिलाओं के साथ अपराध और ग्रामीण असमानता बढ़ रही है, इसलिए सामाजिक तनाव तेजी से बढ़ रहा है। आंध्र प्रदेश में साइबर क्राइम और वित्तीय गड़बड़ियों का मामला सबसे ज्यादा है।

वास्तविकता

राज्यों को लेकर किए गए दावे पूरी तरह से निराधार हैं और NCRB की आधिकारिक रिपोर्ट इसका समर्थन नहीं करता। पहली बात की राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ‘भारत में अपराध’ रिपोर्ट वर्ष 2022 में होने वाले क्राइम को लेकर दी गई है, न कि 2024 के लिए। इसे 3 दिसंबर 2023 को जारी किया गया था। 2023 या 2024 के लिए कोई भी NCRB रिपोर्ट अभी तक NCRB वेबसाइट पर प्रकाशित नहीं हुई है। हमने NCRB के अधिकारियों से भी इसे लेकर बातचीत की है। उन्होंने साफ कहा है कि 2022 की रिपोर्ट ही वेबसाइट पर मौजूद नवीनतम रिपोर्ट है।

2022 में राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेश में क्राइम रेट के आँकड़े

एनसीआरबी 2022 की रिपोर्ट

इस रिपोर्ट में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का डेटा है। ये मीडिया रिपोर्टों को झुठलाती हैं। भारत में अपराध 2022 की तालिका 1A.3 के अनुसार, देश में क्राइम रेट प्रति 100,000 जनसंख्या पर 422.2 थी, जबकि उत्तर प्रदेश में अपराध दर प्रति 1,00,000 जनसंख्या पर 322 है। यानी मीडिया रिपोर्ट में किए गए प्रति व्यक्ति 7.4 से काफी कम।

एनसीआरबी के आँकड़ों से साफ पता चलता है कि दिल्ली में क्राइम रेट सबसे ज्यादा है। यहाँ प्रति एक लाख आबादी पर 1512.8 अपराध हुए हैं। जबकि केरल में प्रति 100,000 लोगों पर 1274.8 अपराध दर्ज किए गए। इसकी तुलना उत्तर प्रदेश से की जाए तो ये काफी कम हैं। इतना ही नहीं यूपी में अपराध केरल, हरियाणा, गुजरात, तमिलनाडु आदि कई अन्य राज्यों से कम हुए हैं।

मीडिया में ये दावा किया गया कि उत्तर प्रदेश में अपराध दर प्रति 100,000 पर 7,40,000 है, यानी 24 करोड़ की आबादी वाले राज्य में 170 करोड़ से ज्यादा क्राइम। ये अपने आप में ही गलत आँकड़ा है।

प्रमुख मीडिया वेबसाइटों ने जिस तरह से मनगढ़ंत आँकड़ों का प्रचार किया है ये काफी चिंता की बात है। इससे जनता को गलत जानकारी मिलती है, आधिकारिक आँकड़ों को कमजोर करती है साथ ही राज्य की कानून व्यवस्था की कथित नाकामी को लेकर प्रशासन पर गलत दबाव बनाया जाता है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य को लेकर गलत रिपोर्ट पेश करना ज्यादा गंभीर मामला है। साथ ही ये पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाती है। इस झूठे आँकड़े को हजार बार कहकर योगी आदित्यनाथ सरकार के अपराध को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति पर सवाल उठाए जाते हैं।

‘सर के लिए मैं सूटकेस में भी बंद हो जाऊँगी, बीफ खाऊँगी’: इंदौर के शूटिंग कोच मोहसिन खान के जाल में फँसी हिंदू लड़कियाँ करती थीं ऐसी बात, पीड़िता ने किया खुलासा

इंदौर में रेप और यौन उत्पीड़न के इल्जाम में गिरफ्तार हुए मोहसिन खान को लेकर पीड़िताओं ने नई खुलासे किए हैं। पीड़िताओं ने बताया कि कैसे मोहसिन खान मुस्लिम लड़कियों को अपनी बहनें बताता था और उसने हिंदू लड़कियों को अपने टारगेट पर लिया हुआ था।

लड़कियाँ उसके जाल में इस तरह फँसी हुई थीं कि वो आम बातचीत में ये तक कह देती थीं कि ‘सर के लिए तो मैं सूटकेस तक में बंद होने के लिए तैयार हूँ।’

ये खुलासा खुद मोहसिन खान के जाल में फँसी एक पीड़िता ऑर्गनाइजर की पत्रकार सुभी विश्वकर्मा से बातचीत में किया है। सुभी की ग्राउंड रिपोर्ट में लड़की को ये सारी बातें करते साफ सुना जा सकता है।

‘हिंदू लड़कियाँ उसका निशाना थीं’पीड़िता

ऑर्गेनाइजर की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, पीड़िता ने बताया कि मोहसिन हिंदू लड़कियों के शरीर पर भद्दी टिप्पणियाँ करता था और ‘ओमेगल ऐप’ पर लड़कियों के साथ न्यूड वीडियो कॉल भी करता था।

पीड़िता के मुताबिक, मोहसिन कहता था कि सभी मुस्लिम लड़कियाँ उसकी बहनें हैं, लेकिन हिंदू लड़कियाँ उसका निशाना हैं। वह हिंदू लड़कों से भी लड़कियों को ‘यूज एंड थ्रो’ करने के लिए कहता था।

मोहसिन हिंदू लड़कियों को कलावा पहनने या तिलक लगाने से रोकता था। मोहसिन खान उन लड़कियों को भी मांस खिलाता था, जो नहीं खाती थी। इसमें जैन और राजपूत लड़कियाँ शामिल थी।

बीफ खा सकती हूँ, सूटकेस में पैक करवा सकती हूँ’

मोहसिन लड़कियों को पॉवर के नाम और लड़कों को स्टेमिना के नाम पर खाने के लिए गोलियाँ देता था। पीड़िता ने बताया कि एक लड़की मोहसिन के प्रभाव में आकर सुबह 4 बजे नमाज़ पढ़ने लगती थी। वह लड़की ‘अस्सलाम अलैकुम’ या ‘अल्लाह हाफिज’ कहने लगी थी।

कोचिंग में पढ़ने वाली एक और लड़की ने मजाक-मजाक में ये तक कह दिया कि वह ‘मोहसिन के लिए बीफ खा सकती है या खुद को सूटकेस में पैक भी करने दे सकती है।’

झूठ बोलकर फ्लैट पर जाती थी शादीशुदा महिलाएँ

मोहसिन हिंदू लड़कियों को अपने फ्लैट पर बुलाता था। फ्लैट पर उसके दोस्त भी शादीशुदा हिंदू महिलाओं को लाते थे। कई लड़कियाँ कोचिंग या कॉलेज जाने का बहाना बनाकर उसके फ्लैट पर रुकती थीं।

मोहसिन खासतौर पर 12 से 15 साल की नाबालिगों को निशाना बनाता था। इसमें एक दलित रिसेप्शनिस्ट भी शामिल थी। पीड़िता ने बताया कि मोहसिन ने एक 12 साल की बच्ची को कहा था कि तुम्हारें ब्रेस्ट बहुत बड़े हो गए है और आवाज भारी हो गई है जो अजीब लग रही है।

पीड़िता ने आगे बताया कि मोहसिन हमारे सामने ही न्यूड वीडियो कॉल के बारे में खुलकर बात करता था। मोहसिन ने एक लड़की से टारगेट शॉट्स का हवाला देते हुए कहा, “अगर मुझे नहीं देगी तो उल्टे क्लिक करवा दूँगा।”

मोदी-योगी नेताओं की बुराई

पीड़िता ने आगे बताया, “मोहसिन लड़कियों से कहता एक बार कलमा पढ़कर देखो, यह बहुत पवित्र है।” मोहसिन मोदी जी और योगी जी जैसे बड़े नेताओं की बुराई करता था।

मोहसिन कहता था कि मोदी जी ने महंगाई बढ़ा दी है और उन्होंने अपनी पत्नी को छोड़ दिया है। मोहसिन लड़कियों को मंदिर जाने से रोकता और कहता, “आप भगवान को पानी चढ़ाते हो, इससे अच्छा है कि वह पानी गरीबों को दो।”

मोहसिन खुद को विराट कोहली जैसा बताता था। मोहसिन हिंदू धर्म की बातों का मज़ाक उड़ाता था। कुछ छात्रों ने मोहसिन को कहा था कि चादर चढ़ाने के बजाय गरीबों की मदद करनी चाहिए तो इस बात पर मोहसिन गुस्सा हो जाता था।

इजरायल का विरोधी मोहसिन खान

पीड़िता ने बताया कि मोहसिन के फ्लैट पर पानी की बोतलों में कागज़ की पर्चियाँ मिली थीं। इन पर्चियों पर कुछ लिखा भी था।

मोहसिन इजरायल का विरोध भी करता था। वह लड़कियों से कहता कि कुछ खास चिप्स या स्नैक्स मत खाओ, क्योंकि वे इजरायल से जुड़े हैं।

अब तक की कार्रवाई

एडिशनल सीपी ने बताया कि मोहसिन पर रेप, POCSO एक्ट, SC/ST एक्ट और मध्य प्रदेश के धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत आरोप हैं। पुलिस इस मामले को प्राथमिकता दे रही है और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है।

अधिकारियों का कहना है कि वे ऐसे अपराधियों को रोकने के लिए जागरूकता अभियान चला रहे हैं और ट्रेनर के बैकग्राउंड चेक पर भी ध्यान दे रहे हैं।

क्या था मामला?

इंदौर में ड्रीम ओलंपिक शूटिंग एकेडमी का कोच मोहसिन खान हिंदू लड़कियों को अपने जाल में फँसाकर उनके साथ रेप करता और ब्लैकमेल कर धर्मांतरण करवाता था। मोहसिन खान के फोन से 30 महिलाओं के आपत्तिजनक वीडियो मिले थे।

मोहसिन ने एक वीडियो में हिंदू लड़कियों को जानबूझकर निशाना बनाने की बात कबूली थी। पुलिस ने इस मामले में अब तक 8 FIR दर्ज की हैं। इनमें बलात्कार, POCSO एक्ट और धोखाधड़ी के आरोप शामिल हैं।

ट्रंप का ‘बिग ब्यूटीफुल बिल’ अमेरिकी संसद में हुआ पास, 250वें स्वतंत्रता दिवस पर होंगे हस्ताक्षर: 869 पन्नों के बिल में जानें क्या कुछ, जिसके विरोध में डेमोक्रेट नेता 8 घंटे देते रहे भाषण

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वन बिग ब्यूटीफुल बिल गुरुवार (3 जुलाई 2025) को अमेरिकी कॉन्ग्रेस में 218 मतों से पास कर दिया गया है। अमेरिकी सीनेट ने इस बिल को मंगलवार (2 जुलाई 2025) ही पास कर दिया था। अब इस बिल पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने हैं। इसके लिए ट्रंप ने अमेरिका के 250वें स्वतंत्रता दिवस यानी 4 जुलाई 2025 का दिन चुना है।

बिल के पास होने पर ट्रंप ने कहा, “यह अमेरिका के लिए एक बेहतरीन बिल होगा। ये देश को आगे बढ़ाने में तेजी लाएगा।”

ट्रंप ने कहा, – “स्वतंत्रता दिवस पर इससे बड़ा गिफ्ट कोई नहीं हो सकता।”

ट्रंप का कहना है कि मैंने अमेरिका के लोगों को डेथ टैक्स से निजात दिलाई है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट के अनुसार, शुक्रवार को शाम 5 बजे आयोजित बड़े समारोह में ट्रंप इस विधेयक पर हस्ताक्षर करेंगे।

बिग ब्यूटीफुल बिल का पास होना ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के लिए बड़ी उपलब्धि का तौर पर देखा जा रहा है। गुरुवार को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में ये बिल 218-214 के मतों के अंतर से पास हो गया है। मतदान के दौरान रिपब्लिकन पार्टी के दो सांसदों ने डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में अपना वोट डाला। रिपब्लिकन पार्टी इस बिल का लगातार विरोध कर रही है। यहाँ तक कि एलन मस्क ने भी इस बिल का विरोध किया था।

वादे किये, वादे पूरे किए

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “सभी को बधाई। कई बार तो मुझे शक हुआ कि ये बिल 4 जुलाई तक हम इस काम को पूरा कर भी पाएँगे या नहीं। पर अब हमने बड़े टैक्स में कटौती कर ली है और सीमा पर सुरक्षा के लिए भी जरूरी रिसोर्सेज जुटाए हैं।”

वेंस ने आगे लिखा, “हमने वादे किए, वादे पूरे किए।”

मंगलवार को अमेरिका के निचले सदन यानी सीनेट में ये बिल 51-50 से पारित हुआ था। 869 पन्नों के बिल में कई तरह की कटौती, सेना के लिए बजट, डिफेंस और एनर्जी उत्पादन के बढ़े हुए खर्च, स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रमों में कटौती समेत कई बातें शामिल हैं। इसके अलावा अवैध प्रवासियों के लिए डिपोर्टेशन के लिए बजट बढ़ाने मुद्दे भी रखे गए हैं।

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की बड़ी उपलब्धि

बिग ब्यूटीफुल बिल का पास होना ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के लिए बड़ी उपलब्धि का तौर पर देखा जा रहा है। गुरुवार को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में ये बिल 218-214 के मतों के अंतर से पास हो गया है। मतदान के दौरान रिपब्लिकन पार्टी के दो सांसदों ने डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में अपना वोट डाला। रिपब्लिकन पार्टी इस बिल का लगातार विरोध कर रही है। यहाँ तक कि एलन मस्क ने भी इस बिल का विरोध किया था।

डेमोक्रेट नेता हकीम जेफ्रीस ने विधेयक के विरोध में करीब आठ घंटे से ज्यादा समय तक भाषण दिया। विपक्ष का कहना है कि इस बिल के कारण आने वाले वर्षों में लाखों लोगों को स्वास्थ्य बीमा से वंचित रहना पड़ सकता है। साथ ही शिक्षा पर भी असर पड़ेगा। हालाँकि व्हाइट हाउस ने इस बात से इंकार किया है।

बिल में क्या-क्या शामिल

इस बिल में अमेरिका- मेक्सिको के बॉर्डर वॉल के लिए 46 अरब डॉलर (लगभग 3,85,730 करोड़ रुपए) का बजट रखा गया है। इसके अलावा 10,000 नए ICE अधिकारियों की भर्ती की जाएगी। 1 लाख प्रवासी डिटेंशन बेड्स के लिए 45 अरब डॉलर (3 लाख 73 हजार 777 करोड़ रुपए) का बजट रखा गया है।

इस बिल के तहत पेंटागन बजट में इजाफा किया गया है। अमेरिकी गोल्डन डोम कहे जाने वाले मिसाइल शील्ड के लिए 25 अरब डॉलर (लगभग 207,000 करोड़ रुपए) और मंगल ग्रह पर जाने वाले मिशन के लिए 10 अरब डॉलर (लगभग 83,000 करोड़ रुपये) का बजट तय किया गया है।

अमेरिकी कॉन्ग्रेस के बजट ऑफिस का अनुमान है कि इस विधेयक के कारण अगले 10 सालों में संघीय घाटे में 3.3 ट्रिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हो सकती है।

एगो अनमोल सांस्कृतिक जुड़ाव… त्रिनिदाद और टोबैगो में भोजपुरी चौताल सुन प्रधानमंत्री मोदी हुए अभिभूत, मिला देश का सर्वोच्च सम्मान: PM कमला बिसेसर को बताया- बिहार की बेटी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल ही में त्रिनिदाद और टोबैगो दौरे पर है। प्रधानमंत्री के तौर पर यह उनकी पहली यात्रा थी। वहाँ की प्रधानमंत्री कमला प्रसाद-बिसेसर ने मोदी को ‘दुनिया के सबसे सम्मानित नेताओं’ में से एक बताया।

कमला बिसेसर ने कहा कि मोदी ने भारत को ताकतवर देश बनाया है। कमला बिसेसर ने भारत के वैक्सीन अभियान की भी तारीफ की। इस दौरान मोदी को त्रिनिदाद और टोबैगो का सबसे बड़ा सम्मान, ‘द ऑर्डर ऑफ द रिपब्लिक ऑफ त्रिनिदाद और टोबैगो’ मिला।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया कि वे पोर्ट ऑफ स्पेन में भोजपुरी चौताल देखकर बहुत खुश हैं। उन्होंने कहा कि त्रिनिदाद और टोबैगो का भारत, खासकर पूर्वी यूपी और बिहार से गहरा संबंध है।

पीएम मोदी को ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ सम्मान

प्रधानमंत्री कमला प्रसाद-बिसेसर समेत 38 मंत्रियों और सांसदों ने पियार्को इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर पीएम मोदी को ‘गार्ड ऑफ ऑनर‘ दिया।

मोदी ने इस गर्मजोशी भरे स्वागत के लिए आभार जताया और भारतीय मूल की आबादी की सराहना की। यह 1999 के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी, जिसने दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को और गहरा किया है।

ओसीआई कार्ड

प्रधानमंत्री मोदी ने त्रिनिदाद और टोबैगो में भारतीय समुदाय से मुलाकात की। पीएम मोदी ने बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि भारतीय मूल की छठी पीढ़ी तक के लोग OCI कार्ड के लिए पात्र होंगे। इससे वे भारत में रह और काम कर सकेंगे। पीएम मोदी ने कहा, “भारत आपका स्वागत करता है।”

पीएम मोदी ने त्रिनिदाद और टोबैगो की प्रधानमंत्री कमला प्रसाद-बिसेसर के बिहार से पारिवारिक संबंध का भी जिक्र किया। पीएम कमला के पूर्वज बिहार के बक्सर में रहते थे। पीएम मोदी ने कहा, “भारत के लोग प्रधानमंत्री कमला प्रसाद बिसेसर को बिहार की बेटी मानते हैं।”

पीएम मोदी ने उन्हें राम मंदिर का प्रतिरूप, सरयू नदी का पवित्र जल और महाकुंभ का जल भेंट किया। कमला प्रसाद-बिसेसर ने खुशी-खुशी इसे ‘गंगा धारा’ में अर्पित किया।

खेल, संस्कृति और वैश्विक जुड़ाव

पीएम मोदी ने अपने भाषण में क्रिकेट का जिक्र किया। उन्होंने लारा, सुनील नारायण और निकोलस पूरन जैसे वेस्टइंडीज के खिलाड़ियों को याद किया। यह दिखाता है कि भारत और त्रिनिदाद और टोबैगो के बीच खेल से गहरा संबंध है।

पीएम मोदी ने ‘भारत को जानो’ क्विज के विजेताओं- शंकर रामजतन, निकोलस मराज और विंस महतो से भी मुलाकात की। उन्होंने कहा कि यह क्विज प्रवासी युवाओं को भारत से जोड़ता है।

कुल मिलाकर पीएम मोदी की यह यात्रा ‘ग्लोबल साउथ’ को एकजुट करने की भारत की कोशिश का हिस्सा है। यह यात्रा दोनों देशों के रिश्ते मजबूत कर रही है। साथ ही, यह भारतीय संस्कृति और प्रवासी भारतीयों की वैश्विक भूमिका भी दर्शाती है।

जिस इंग्लैंड का रूसी तेल से चलता है इंजन, रूबल से भरी हैं तिजोरियाँ, उसके अखबार The Telegraph ने बताया भारत को ‘दुश्मन देश’: तेल खरीदने पर रोया, झाड़ा ‘नैतिकता’ का ज्ञान

ब्रिटेन के अखबार ‘द टेलीग्राफ’ ने भारत को ‘शत्रु राष्ट्र’ कहकर सनसनी फैला दी। लेखक टॉम शार्प ने सोमवार (1 जुलाई 2025) भारत के रूस से सस्ता तेल और हथियार खरीदने पर सवाल उठाए, इसे पश्चिम के खिलाफ बताया। टॉम की मानें तो रूस से अपनी उर्जा जरूरतों और सैन्य साजोसामान खरीदने वाला भारत पश्चिमी देशों का दोस्त नहीं है, बल्कि दुश्मन है। वो ऐसा करके दूसरे पक्ष के साथ खड़ा है।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना यह कहते हुए किया कि भारत ने सस्ता रूसी तेल खरीदकर पुतिन के युद्ध को बढ़ावा दिया है। लेख में यह भी कहा गया कि रूस से भारत की रक्षा खरीद एक रणनीतिक खतरा है और भारत की तटस्थता को ‘दोहरेपन’ के रूप में दिखाया गया।

लेकिन लेखक यह भूल गए कि भारत बार-बार साफ कर चुका है कि वह अपने फैसले अपने राष्ट्रीय हित में ही लेता है न कि किसी और के दबाव में। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट कहा की, “यूरोप को यह सोचना बंद करना होगा कि उसकी समस्याएँ ही दुनिया की समस्याएँ हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएँ उसकी नहीं हैं।”

भारत तटस्थ नहीं है, वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) का उपयोग करता है, जिससे वह अपने लोगों के हित में सस्ती ऊर्जा और सुरक्षित रक्षा आपूर्ति सुनिश्चित करता है।

लेख में यह सवाल नहीं उठाया गया कि वास्तव में रूस को फंड कौन कर रहा है? और जब लंदन खुद रूसी अमीरों का पैसा साफ करने की जगह बन चुका है और भारत से वांछित आर्थिक अपराधियों को शरण देता है, तो ब्रिटेन भारत पर सवाल उठाने की नैतिक स्थिति में है भी क्या? इस पूरी बहस में असली मुद्दा भारत की आलोचना नहीं, बल्कि पश्चिम की दोहरी नीति और भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को समझने की जरूरत है।

टेलीग्राफ की आलोचना और असली सच्चाई

टेलीग्राफ की नाराजगी की एक वजह रूस के यंतर शिपयार्ड में बने स्टेल्थ युद्धपोत आईएनएस तमाल का भारत में शामिल किया जाना भी है। लेखक ने इसे भारत का रूस के साथ मिलकर काम करने पर सवाल उठाते हुए ‘विश्वासघात’ जैसा बताया, जैसे यह कोई गलत फैसला हो।

लेकिन हकीकत तो ये है कि भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग बहुत पुराना और भरोसेमंद रहा है। जब पश्चिमी देश जैसे ब्रिटेन और अमेरिका ने भारत को आधुनिक हथियार देने से मना कर दिया था, तब सोवियत संघ (रूस) ने भारत को सस्ते, भरोसेमंद और बिना शर्त हथियार दिए।

आईएनएस तमाल कोई नई या अनोखी बात नहीं है, बल्कि यह उसी लंबे रिश्ते का हिस्सा है। यह भारत की रणनीतिक जरूरत और भरोसे पर आधारित है, ना कि किसी पश्चिमी देश की नाराजगी से तय होता है।

अगर आज भारत रूस से हथियार खरीदता है तो यह उसकी अपनी सुरक्षा और हित को ध्यान में रखकर होता है। भारत अब अलग-अलग देशों से हथियार लेता है, लेकिन यह उसका स्वतंत्र फैसला होता है।

एक युद्धपोत से देश की नीयत नहीं तय होती, लेकिन ब्रिटेन की तीखी प्रतिक्रिया ये दिखाती है कि वह आज भी भारत से वही पुराने रवैये की उम्मीद करता है। पश्चिम का असहज महसूस करना भारत की सोच को नहीं बदल सकती।

भारत पर उंगली उठाने वाले ब्रिटेन को खुद के गिरेबान में झाक लेना चाहिए

भारत को रूस से सस्ता तेल खरीदने पर ‘दुश्मन’ कहने वाले टेलीग्राफ और ब्रिटेन को पहले अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए। लंदन सालों से रूस के अवैध पैसे को छिपाने की जगह बना हुआ है।

ढीले कानून, रियल एस्टेट में छूट और ‘गोल्डन वीजा’ जैसी नीतियों ने रूसी अमीरों को अरबों की संपत्ति यूके में लगाने का मौका दिया। 2020 की यूके संसद की रिपोर्ट में माना गया कि लंदन गंदे रूसी पैसे का लॉन्ड्री सेंटर बन चुका है।

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने बताया कि 1.5 अरब पाउंड (17487 करोड़ रुपए) से ज्यादा की संपत्ति भ्रष्ट या क्रेमलिन से जुड़े रूसियों से जुड़ी है और इसका बड़ा हिस्सा लंदन में है। यू.के. की राष्ट्रीय अपराध एजेंसी ने भी माना है कि रूसी फर्जी लेन-देन में आधे से ज्यादा यू.के. से जुड़े हैं।

ऐसे में, जब खुद ब्रिटेन ने सालों रूस के पैसों से अपनी अर्थव्यवस्था को फायदा पहुँचाया, तो भारत को सिर्फ सस्ता तेल खरीदने पर ‘दुश्मन’ कहना पूरी तरह से गलत और दोहरा रवैया है। भारत तो बस अपने लोगों के लिए सस्ता ईंधन चाहता है, इसमें दुश्मनी कैसी?

यूरोपीय संघ का ऊर्जा संबंधी पाखंड, वही तेल खरीदते समय भारत को उपदेश देना

भारत को रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने पर आलोचना का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन अगर सही देखा जाए तो पश्चिम खुद इसमें पीछे नहीं है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भी, यूरोप ने रूसी तेल का आयात बढ़ाया। मार्च 2022 में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने बताया था कि यूरोप ने हर महीने 15% ज्यादा तेल मँगवाया।

युद्ध के पहले 9 महीनों में यूरोपीय संघ ने भारत से 6 गुना ज्यादा रूसी ऊर्जा खरीदी। जर्मनी, इटली और नीदरलैंड इसमें सबसे आगे थे। आज भी, जबकि रूस पर प्रतिबंध लगे हैं, यूरोपीय देश तीसरे देशों के जरिए रूस का रिफाइन्ड तेल खरीद रहे हैं और इसमें भारत सबसे बड़ा सप्लायर है।

भारत सस्ता रूसी कच्चा तेल खरीदता है, उसे अपने रिफाइनरियों में साफ करता है और फिर वही तेल यूरोप को बेचता है। 2024 में भारत ने सऊदी अरब को पीछे छोड़कर यूरोप का सबसे बड़ा ईंधन सप्लायर बन गया और ये ज्यादातर ईंधन रूसी तेल से ही बना था।

यूरोपीय कानून रूस से सीधे कच्चा तेल लेने से रोकते हैं, लेकिन अगर तेल भारत जैसे देश में रिफाइन हो जाए, तो वह साफ माना जाता है। यानी तेल वही है, बस रास्ता बदल गया है। तो बात ये है कि यूरोप की कारें रूसी तेल से ही चल रही हैं, फर्क बस इतना है कि वह तेल भारत की रिफाइनरियों के जरिए आ रहा है।

जब टेलीग्राफ भारत को दोहरा कहता है, तो वह यह भूल जाता है कि भारत आज पश्चिम के लिए एक ऊर्जा केंद्र बन चुका है। यूरोप रूस पर दिखावे के प्रतिबंध लगाता है, लेकिन हकीकत में उसी तेल को भारत से खरीदकर अपनी जरूरतें पूरी करता है।

रूस से हथियार खरीदने पर भारत की आलोचना का असली सच क्या है?

हाल ही में टेलीग्राफ ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत की सैन्य ताकत को नजरअंदाज कर दिया, जहाँ ब्रह्मोस मिसाइल और S-400 सिस्टम जैसे रूसी हथियारों ने अहम भूमिका निभाई। इसके बजाय अखबार ने भारत की रूस पर रक्षा निर्भरता का मजाक उड़ाया।

लेकिन वो ये भूल गया कि भारत ने रूस से रक्षा संबंध तब शुरू किए थे, जब पश्चिमी देशों ने भारत को हथियार देने से मना कर दिया था। सोवियत संघ और बाद में रूस ने भारत को सस्ते, भरोसेमंद और बिना शर्त हथियार दिए। यही वो कारण थे जिनकी वजह से भारत ने रूस के साथ मजबूत रक्षा साझेदारी बनाई और यही साझेदारी आज भी काम आ रही है।

भारत अपने 60% हथियार भंडार को एक दिन में नहीं बदल सकता और ना ही ऐसा करना सही होगा, खासकर किसी बाहरी दबाव में। भारत अब अमेरिका, फ्रांस, इजरायल से भी हथियार ले रहा है और साथ ही तेजस फाइटर जेट, ड्रोन, मिसाइल सिस्टम और वायु रक्षा जैसी स्वदेशी तकनीकों में भी निवेश कर रहा है।

भारत के पास दो दुश्मन पड़ोसी हैं, एक तरफ पाकिस्तान दूसरी ओर चीन। ऐसे में भारत को भरोसेमंद और समय पर मिलने वाली सैन्य सप्लाई चाहिए और रूस अब भी अपने वादे निभाता है।

पश्चिमी देशों से हथियार खरीदना अक्सर राजनीतिक शर्तों जाँच और वीटो जैसे मामलों से जुड़ा होता है। भारत इन चीजों का जोखिम नहीं उठा सकता। कारगिल युद्ध के वक्त अमेरिका ने पाकिस्तान का साथ दिया था और ईरान जैसे देश को भी वही अमेरिका बाद में रोकने लगा, जिसकी उसने पहले मदद की थी।

भारत ने हमेशा शांति और बातचीत का समर्थन किया है, इसलिए रूस से सहयोग का मतलब ये नहीं कि भारत युद्ध का समर्थन करता है। रूस के साथ भारत का रिश्ता सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि सोचा समझा रणनीतिक सुरक्षा कवच है, जो भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करता है।

भारत की ऊर्जा जरूरतें नहीं हैं अनैतिक

पश्चिमी  देश अक्सर भारत की व्यावहारिक सोच को अनैतिक बता देते हैं। लेकिन विदेश मंत्री  डॉ. एस. जयशंकर ने एकदम साफ शब्दों में कहा है, “अगर यूरोप अपनी देखभाल कर सकता है, तो हम भी कर सकते हैं।”

उन्होंने याद दिलाया कि भारत की प्रति व्यक्ति आय करीब 2,000 डॉलर है, जबकि यूरोप की 60,000 डॉलर। ऐसे में अगर यूरोप अपने लिए एलएनजी जमा करता है, तो भारत से ये उम्मीद करना कि वह सस्ता रूसी तेल न खरीदे, ये न्याय नहीं  बल्कि पाखंड है।

भारत रूस से तेल इसलिए खरीदता है क्योंकि उसके 140 करोड़ लोगों को सस्ती ऊर्जा की जरूरत है, न कि युद्ध को समर्थन देने के लिए। जैसा कि डॉ. जयशंकर ने कहा, “हम भू-राजनीतिक फायदा पाने के लिए अपने लोगों को मंदी में नहीं झोंकते।”

भारत लगातार शांति और बातचीत की बात करता रहा है, जबकि पश्चिमी देश यूक्रेन को हथियार दे रहे हैं और इस युद्ध को और लंबा कर रहे हैं। अब सवाल यह है की वास्तव में तटस्थ कौन है? इसका फैसला लोगों को खुद करना चाहिए।

भगोड़ों के मामले में पाखंडी बना ब्रिटेन, लंदन बना सुरक्षित पनाहगाह

अगर ब्रिटेन वास्तव में नैतिकता की बात करना चाहता है, तो उसे पहले यह जवाब देना होगा कि वह भारत के सबसे बड़े आर्थिक अपराधियों को शरण क्यों दे रहा है। विजय माल्या जो 9,000 करोड़ रुपए की बैंक धोखाधड़ी का आरोपित है, वो  2016 से लंदन में रह रहा हैं।

भारत ने उसका प्रत्यर्पण आदेश (Extradition order) भी जीत लिया है, लेकिन वों अब भी ब्रिटेन में हैं क्योंकि वहाँ की कानूनी प्रक्रिया में बार-बार अपीलें उसको बचा रही हैं। नीरव मोदी जो 14,000 करोड़ रुपए का PNB बैंक घोटाले में आरोपित हैं, 2019 से ब्रिटेन की जेल में हैं।

भारत के पास उसके खिलाफ मजबूत सबूत हैं, फिर भी उसका प्रत्यर्पण अब तक नहीं हो पाया। इसी तरह, संजय भंडारी जैसे आरोपित भी ब्रिटेन में खुलेआम रह रहा हैं। हर बार ब्रिटेन की अदालतें ‘मानवाधिकार’ और ‘भारतीय जेलों की स्थिति’ का हवाला देकर इन अपराधियों के प्रत्यर्पण को रोक देती हैं।

लेकिन यही ब्रिटेन गरीब और मजबूर अवैध प्रवासियों को बहुत जल्दी उनके देश भेज देता है, चाहे वे रवांडा या अल्बानिया से हों। तो क्या यह संदेश दिया जा रहा है कि अगर आप अमीर और भारतीय हैं।

तो आपको ब्रिटेन में सुरक्षा मिलेगी और अगर आप गरीब हैं, तो आपको बाहर फेंक दिया जाएगा? यह दोहरा मापदंड बताता है कि ब्रिटेन आज ‘आर्थिक अपराधियों की पनाहगाह’ बनता जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है, क्या ऐसा देश दुनिया को नैतिकता और सही-गलत का पाठ पढ़ाने लायक है?

‘व्हाटअबाउटइज्म’ या जरूरी हकीकत की जाँच

जब भी भारत पश्चिम के दोहरे मापदंडों को उजागर करता है, तो उस पर अक्सर ‘व्हाटअबाउटिज़्म’ यानी ‘उलटा सवाल पूछने’ का आरोप लगाया जाता है। लेकिन यह ध्यान भटकाने की कोशिश नहीं, बल्कि न्याय और बराबरी की माँग है।

अगर पश्चिम यह कहता है कि रूस से तेल खरीदना युद्ध को बढ़ावा देना है, तो फिर रूस से गैस खरीदने पर क्या कहेंगे?  लंदन स्टॉक एक्सचेंज में रूसी कंपनियों की मौजूदगी पर क्या राय है? और यमन युद्ध के दौरान सऊदी अरब को हथियार बेचने के बारे में क्या? ये कुछ ऐसे सवाल है जिनके बारे में वों शायद भूल जाते है।

सच्चाई यह है कि 2015 से ब्रिटेन ने सऊदी अरब को 20 अरब पाउंड से ज्यादा के हथियार बेचे, जबकि सऊदी जेट ने यमन में नागरिकों के ठिकानों पर हमले किए। लेकिन क्या टेलीग्राफ ने कभी इस पर गुस्सा जताया? नहीं, क्योंकि उसका गुस्सा सिर्फ भारत को निशाना बनाने के लिए है, ना कि ब्रिटेन के अपने आकाओं के लिए।

हर देश अपने रणनीतिक हितों के लिए फैसले लेता है, पश्चिम सदियों से यही करते आ रहा है। अगर भारत ऐसा कर रहा है तो यह धोखा नहीं, समझदारी और परिपक्वता की निशानी है। भारत अपने फैसले अपने लोगों की जरूरतों को प्राथमिकता देकर लेता है, किसी और की मर्जी से नहीं।

पश्चिम को आज्ञाकारिता की अपेक्षा, स्वतंत्रता की नहीं

पश्चिम के कई टिप्पणीकारों को यह बात परेशान करती है कि भारत अब लाइन में नहीं रहता। यह संयुक्त राष्ट्र के मंचों पर सही तरीके से मतदान नहीं करता। यह तेल वहीं खरीदता है जहाँ इसे सबसे अच्छा सौदा मिलता है, प्रेस कॉन्फ्रेंस में बेबाकी से बोलता है और सभी को याद दिलाता है कि इसकी विदेश नीति यहीं रहेगी।

भारत ने पक्ष लेना बंद कर दिया है। यह भारत के साथ खेल रहा है और बदलते गठबंधनों, लेन-देन की कूटनीति और आर्थिक राष्ट्रवाद की दुनिया में  यही एकमात्र स्थिर स्थिति है जिसे भारत को बनाए रखना चाहिए।

अपने हितों को हर चीज से ऊपर रखने की भारत की इच्छा को ‘शत्रु व्यवहार’ कहना बेतुका है। यह दर्शाता है कि ब्रिटेन में अभी भी औपनिवेशिक नशा है, जहाँ भारत से एक वफादार की तरह व्यवहार करने की उम्मीद की जाती है, न कि एक भरोसेमंद बराबरी वाले देश की तरह।

यूके जैसे देशों के पास भारत को नैतिकता सिखाने का कोई हक नहीं

यूके को भारत और रूस के प्रति रुख से असहमत हो सकता है, लेकिन उसके पास भारत को नैतिकता सिखाने का कोई हक नहीं है। भारत पर सवाल उठाने से पहले यूके को यह बताना चाहिए कि उसने लंदन में रूसी अमीरों को सालों तक पैसा छिपाने की छूट क्यों दी, क्यों उसके पास आज भी रूस से जुड़ा हुआ एक सक्रिय आर्थिक तंत्र है।

क्यों वह भारत के आर्थिक भगोड़ों को वापस नहीं भेजता और क्यों आज भी भारत जैसे देशों के जरिए रूस से आने वाले रिफाइन्ड तेल का इस्तेमाल कर रहा है। ना तो भारत और ना ही यूके दोनों ही परिपूर्ण नहीं हैं, लेकिन भारत को सिर्फ इसलिए ‘दुश्मन’ कहना, क्योंकि वह अपने लोगों के लिए सस्ता तेल खरीदता है। ये गलत है।

जबकि ब्रिटेन उन्हीं भारतीय धोखेबाजों को शरण देता है, रूसी पैसे से अपने शहर को चलाता है और तेल के लिए चुपचाप नियमों की खामियों का फायदा उठाता है, ये सबसे बड़ा पाखंड है। आज दुनिया बदल रही है, अब रिश्ते दबाव या आदेश पर नहीं, बल्कि आपसी सम्मान पर टिकें है। भारत अपनी स्वतंत्रता, फैसलों और लोगों के हितों की रक्षा करता रहेगा। अब वक्त आ गया है कि ब्रिटेन ये समझे कि आजाद भारत को अब उपदेश नहीं, बराबरी चाहिए।

मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढे।

भारत ना बन पाए ‘वर्ल्ड फैक्ट्री’, इसके लिए चीन अटका रहा ‘मेक इन इंडिया’ में रोड़े: अब iPhone बनाने वाले 300 इंजीनियर-टेक्नीशियन वापस बुलाए, जानिए क्या होगा असर

तकनीक के क्षेत्र में भारत की तरक्की पड़ोसी देश चीन को पच नहीं रही है। वह आए दिन ऐसे कदम उठा रहा है जिससे भारत की आर्थिक वृद्धि रुके। अब उसके निशाने पर भारत में बनने वाले आईफोन आए हैं। उसने आईफोन निर्माता फॉक्सकॉन के भारतीय प्लांट में काम करने वाले अपने यहाँ के इंजीनियरों और कर्मचारियों को वापस बुला लिया है। वह इसके जरिए भारत में एप्पल के उत्पादों के निर्माण का बढ़ता दायरा रोकना चाहता है।

चीन ने क्या फैसला लिया?

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने अपने 300 से अधिक इंजीनियर और टेक्नीशियन को वापस बुलाया है। यह कर्मचारी भारत में फॉक्सकॉन के प्लांट में काम कर रहे थे। फॉक्सकॉन में काम करने वाले यह इंजीनियर और टेक्नीशियन चीनी नागरिक बताए गए हैं।

रिपोर्ट बताती है कि उन्हें बीते 2 माह के भीतर वापस बुलाया गया है। चीन ने यह कर्मचारी फॉक्सकॉन के कर्नाटक और तमिलनाडु में स्थित प्लांट से वापस बुलाए हैं। बताया गया है कि यह कर्मचारी कुछ तकनीकों के विशेषज्ञ के तौर पर काम करते थे।

चीन के अपने नागरिकों के भारतीय फैक्ट्रियों में काम ना करने देने की रिपोर्ट्स पहले भी आई थीं। तब बताया गया था कि वह चीन से भारत के लिए कर्मचारियों को जाने ही नहीं दे रहा है। हालाँकि, अब स्पष्ट हो गया है कि वह भारत में काम करने वाले कर्मचारी भी वापस बुला रहा है।

चीन का यह फैसला भारत में एप्पल के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है। दरअसल, भारत में कुछ ही साल पहले एप्पल ने अपने फोन बनाना चालू किया है और यहाँ इसक विशेषज्ञ टेक्नीशियन और इंजीनियर कम हैं। कुछ तकनीकों में तो यह तो ना के बराबर हैं।

ऐसे में चीन से फॉक्सकॉन इंजीनियर और टेक्नीशियन भारत लाती है। चीन में लम्बे समय से आईफोन और बाकी एप्पल उत्पादों का निर्माण हो रहा है, ऐसे में वहाँ कुशल इंजीनियर और टेक्नीशियन ज्यादा हैं। अब वह इन्हें वापस बुला कर यहाँ की फैक्ट्रियों का काम प्रभावित करना चाहता है।

चीन के इस फैसले का क्या असर?

चीन के इस फैसले का कितना असर भारत में फॉक्सकॉन की निर्माण क्षमता पर होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। हालाँकि, विशेषज्ञों के ना होने के चलते उसे कुछ फर्क जरूर पड़ेगा। कुछ रिपोर्ट्स में बताया गया है कि इन फैक्ट्रियों में अभी ताईवान के इंजीनियर और टेक्नीशियन काम कर रहे हैं।

यह भी स्मार्टफोन निर्माण विषय में ही एक्सपर्ट हैं। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, यह भी बताया गया है कि फॉक्सकॉन ने इस फैसले के विषय में भारत सरकार को सूचित कर दिया है। रिपोर्ट बताती है कि चीन के इस फैसले के चलते आईफोन 17 के भारत में निर्माण पर कुछ दिक्कतें आ सकती हैं लेकिन बाकी कोई विशेष समस्या नहीं होने वाली है।

चीन ने क्यों वापस बुलाए इंजीनियर?

भारत में स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरिंग और विशेष कर आईफोन के बढ़ते निर्माण पर चीन चिंतित है। अभी तक इस इंडस्ट्री पर चीन एकक्षत्र राज करता आया है। लेकिन मोदी सरकार के प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम लाने के बाद भारत में स्मार्टफोन निर्माण ने तूफानी तेजी पकड़ी है।

एप्पल ने भारत में 2017 में अपने फोन बनाना चालू किया था। उसके लिए फॉक्सकॉन कम्पनी यह काम करती है। लेकिन 2020 के बाद जब चीन पर निर्भर रहने के खतरे सामने आए तो इन कम्पनियों ने तेजी से भारत में अपनी क्षमताएँ बढ़ाना चालू कर दिया।

वर्तमान में एप्पल के लगभग 25% आईफोन का निर्माण भारत में होता है। भारत में एप्पल के फ़ोनों का उत्पादन भारत के लिए विदेशी मुद्रा भी ला रहा है। वर्ष 2024-25 में एप्पल ने भारत से ₹1.48 लाख करोड़ से अधिक के स्मार्टफोन निर्यात किए हैं। यह भारत के कुल स्मार्टफोन निर्यात का लगभग 75% है।

इस सबके चलते भारत में आईफोन का निर्माण चीन के लिए बड़ी समस्या के तौर पर उभरा है। इस क्षेत्र में उसे अब भारत से कांटे की टक्कर मिल रही है। इसलिए वह इंजीनियर और टेक्नीशियन वापस बुला कर इस गति को रोकना चाहता है।

चीन ने इंजीनियर और टेक्नीशियन अब वापस बुलाए है लेकिन वह इससे पहले भी इस यात्रा में ब्रेक लगाने का प्रयास कर चुका है। कुछ रिपोर्ट्स में यह सामने आया कि चीन स्मार्टफोन बनाने के लिए आवश्यक कई पार्ट्स की सप्लाई भी रोक रहा है। यह पार्ट इन आईफोन के निर्माण के लिए आवश्यक थे।

सिर्फ फॉक्सकॉन तक सीमित नहीं है कहानी

चीन के भारत की तरक्की में अड़ंगा लगाने की यह कहानी नई नहीं है और ना ही स्मार्टफोन के निर्माण तक सीमित है। कुछ ही दिनों पहले उसने बिना कोई आधिकारिक प्रतिबन्ध लगाए ही विशेष काम में उपयोग होने वाले उर्वरकों की आपूर्ति रोक दी थी। चीन भारत छोड़ कर बाकी देशों को ख़ुशी-ख़ुशी यह उर्वरक भेज रहा है। 

इसके अलावा उसने अहमदाबाद-मुम्बई बुलेट रेल प्रोजेक्ट में उपयोग होने वाली 3 टनल बोरिंग मशीन (TBM) का भारत को आयात रोक दिया है। टनल बोरिंग मशीन, जमीन के नीचे सुरंग बनाने के लिए काम में लाई जाती हैं।

 चीन ने वर्तमान में भारत को आने वाली 3 ऐसी TBM रोक रखी हैं। यह तीनों मशीनें जर्मनी की एक कम्पनी ने बनाई हैं। यह कम्पनी इन्हें चीन के गुआंगझाऊ में बनाती है। इनकी आवश्यकता मुंबई के बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स बनाने में है।

 TBM का मुद्दा कोई नया नहीं है। इसको लेकर केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल जर्मनी के मंत्री को सावर्जनिक तौर पर लताड़ चुके हैं। इसमें उन्होंने जर्मन कम्पनी की बनाई TBM के चीन के पोर्ट पर रोके जाने की बात दोहराई थी। इसका वीडियो भी वायरल हुआ था। 

चीन के पास पृथ्वी के दुर्लभ चुंबकीय तत्वों (रेयर अर्थ मैग्नेट्स) का भंडार है। अमेरिका के साथ टैरिफ वार के बाद चीन ने इन दुर्लभ तत्वों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। भारत में स्थापित ऑटोमोबाइल, सेमीकंडक्टर और अन्य उपकरण निर्माण से जुड़े उद्योगों को इस प्रतिबंध के चलते आपूर्ति बाधित हो गई थी।