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कर्नाटक के जिस लक्कुंडी में मिले थे वीरभद्रेश्वर मंदिर के निशान, वहाँ 20 साल बाद ASI ने फिर शुरू की खुदाई: होयसल राजवंश का खुलेगा इतिहास

कर्नाटक के लक्कुंडी में दूसरी बार खुदाई शुरू हुई है। 20 साल पहले यहाँ एक बार खुदाई की गई थी। इस बार कोटे वीरभद्रेश्वर मंदिर की वस्तुएँ, सिक्के और शिलालेख को जमा करने के लिए पर्याप्त जगह बनाई गई है। सेवानिवृत वैज्ञानिक केशव और एएसआई की टीम साथ में काम कर रही है।

इतिहासकार खुदाई में निकलनेवाली कलाकृतियों को लेकर काफी उत्साहित है। इससे पहले लक्कुंडी में खुदाई के काम के लिए 10 टीमें लगाई गई थी। इनलोगों ने 5 कुएँ, 6 शिलालेख और 600 नक्काशी की गई ऐतिहासिक पत्थर को निकाला था।

इस बार एएसआई अधिकारियों ने एक खुला संग्रहालय बनाया है जहाँ खुदाई में मिलनेवाली वस्तुओं को एकत्रित किया जाएगा। लक्कुंडी हेरिटेज डेवलपमेंट अथॉरिटी के मुताबिक राष्ट्रकूट, कल्याणी, चालुक्य और होयसल काल के सिक्के, कुछ और कुएँ, मंदिर और दूसरी वस्तुएँ खुदाई में यहाँ मिलने की उम्मीद हैं।

दक्षिण के साम्राज्य की समृद्ध कला

राष्ट्रकूट राजवंश और होयसल राजवंश के साक्ष्य उनकी कला, वास्तुकला, अभिलेख और साहित्यिक स्रोतों से मिलते हैं।

राष्ट्रकूट सामाज्य ने 8वीं से 10 वीं शताब्दी तक दक्कन के क्षेत्र में फैला सबसे अहम साम्राज्यों में एक था। दन्तिदुर्ग ने इस साम्राज्य की स्थापना की थी। इस साम्राज्य में करीब साढ़े सात लाख गाँव शामिल था। राष्ट्रकूटों ने दक्कन की स्थापत्य कला में जबरदस्त योगदान दिया।

एलोरा की गुफाएँ राष्ट्रकूट राजाओं ने बनवाई

राष्ट्रकूट साम्राज्य की वास्तुकला में एलोरा की गुफाएँ, खासकर कैलाशनाथ मंदिर महत्वपूर्ण हैं, ये मंदिर चट्टान को काटकर बनाए गए हैं। मंदिरों की दीवारों पर शिव-पार्वती और दूसरे देवी-देवताओं की कथाओं की शानदार मूर्तियाँ बनाई गई है। इनलोगों ने हाथी के शानदार रॉक कट गुफा का निर्माण करवाया।

वहीं होयसल ने हलेबिड का होयसलेश्वर मंदिर और बेलूर का चेन्नाकेशव मंदिर समेत कई मंदिरों का निर्माण कराया। इनकी नक्काशी और मूर्तियाँ समृद्ध कला को दर्शाती हैं। मंदिरों के शिलालेख होयसल शासकों के बारे में जानकारी देती हैं। UNESCO ने बेलूर, हेलबिदु और सोमनाथपुरा के मंदिर को विश्व धरोहर माना है।

होयसल साम्राज्य के अवशेष खास कर मंदिर और शिलालेख उनके शासनकाल में कला और संस्कृति की संपन्नता को दर्शाता है।

10वीं से 14वीं शताब्दी तक दक्कन क्षेत्र में होयसल राजवंश का शासन था। इनलोगों ने 317 वर्ष तक शासन किया। मूल रूप से कर्नाटक और कावेरी नदी के उपजाऊ क्षेत्र वाले तमिलनाडू में इसका शासन था। नृप काम द्वितीय 1026 ई. में होयसल राज की नींव रखी। विंष्णुवर्धन जैसे कई प्रभावशाली राजा हुए जिनके कार्यकाल में वैष्णव संप्रदाय यहाँ फला-फूला।

पहले सोशल मीडिया पर बने ‘वोक-लिबरल’, किया फिलिस्तीन का समर्थन: अब अमेरिकी वीजा लेने को पोस्ट डिलीट कर रहे भारतीय छात्र, ट्रंप ने किया है स्टैंड में बदलाव

अमेरिका में पढ़ाई करने का सपना देख रहे भारतीय छात्रों के लिए अब उनका सोशल मीडिया अकाउंट एक बड़ी रुकावट बन रहा है। दरअसल, अमेरिकी वीज़ा अप्लाई करने के लिए भारतीय छात्र अपने सोशल मीडिया से ऐसे पोस्ट हटा रहे हैं, जिनसे उन्हें लगता है कि उनके वीज़ा पर कोई आँच आ सकती है।

ट्रंप सरकार का सख्त रुख

ट्रंप ने सभी अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए सोशल मीडिया की कड़ी जाँच को अनिवार्य करने पर विचार किया है। इसका सीधा और साफ मतलब है कि आपके सोशल मीडिया पर कोई भी राजनीतिक पोस्ट, कोई मज़ाक या एक्टिविज़्म से जुड़ी सामग्री अमेरिकी वीज़ा अधिकारियों द्वारा गलत समझी जा सकती है और आपका वीज़ा रद्द हो सकता है।

यह नई सख्ती 2024 में अमेरिकी कॉलेज परिसरों में हुए फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनों और यहूदी विरोधी घटनाओं के बाद ट्रंप सरकार की अंतरराष्ट्रीय छात्रों पर कड़ी निगरानी रखने की कोशिश का हिस्सा है।

कौन-कौन डिलीट कर रहा है पोस्ट?

  • मान्या (बदला हुआ नाम): एक छात्रा ने अपने वीज़ा काउंसलर की सलाह पर अपने इंस्टाग्राम और लिंक्डइन प्रोफाइल ही हटा दिए।
  • दिलजीत (बदला हुआ नाम): इन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स को प्राइवेट कर दिया है।
  • सूरज (बदला हुआ नाम): एक आइवी लीग यूनिवर्सिटी में मास्टर्स के लिए चुने गए सूरज ने अपना लिंक्डइन अकाउंट हटा दिया है और अब वो किसी भी विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं होते।
  • JNU के एक पीएचडी स्कॉलर: इन्होंने भी अपने सोशल मीडिया से फिलिस्तीन समर्थक सामग्री हटाई है। इसके अलावा फेसबुक और इंस्टाग्राम से भी डिलीट करने की संभावना जताई जा रही है।

पोस्ट डिलीट करने की वजह

छात्र मुख्य रूप से वीज़ा रिजेक्ट होने के डर से ऐसा कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि ज़रा सा भी राजनीतिक या हिंसक एक्टिविज़्म उनके अमेरिकी वीज़ा के लिए खतरा बन सकता है। अमेरिकी प्रशासन फेसबुक, एक्स, लिंक्डइन और टिकटॉक जैसे सभी प्लेटफॉर्म की जाँच करने की योजना बना रहा है, और उन्हें पिछले पाँच सालों के सोशल मीडिया हैंडल की जानकारी भी देनी होती है।

एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि सिर्फ पोस्ट करना ही नहीं, बल्कि अमेरिकी कानून के तहत अवैध मानी जाने वाली गतिविधियों से संबंधित पोस्ट को लाइक करना, कमेंट करना या शेयर करना भी वीज़ा रद्द होने का कारण बन सकता है। ‘आपत्तिजनक’ सामग्री क्या मानी जाएगी, यह अभी पूरी तरह से साफ नहीं है, लेकिन फिलिस्तीन समर्थक विचार या अमेरिकी विरोधी भावनाएँ खास तौर पर कड़ी जाँच के दायरे में आ सकती हैं।

छात्र क्या करें?

वीज़ा काउंसलर यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि अचानक से ढेर सारे पोस्ट डिलीट करना भी अधिकारियों के लिए ‘रेड फ्लैग‘ बन सकता है। इससे उन्हें शक हो सकता है कि छात्र कुछ छिपा रहा है। अमेरिकी सरकार पहले से ही AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का इस्तेमाल करके उन विदेशी छात्रों के वीज़ा रद्द कर रही है जो कुछ समूहों का समर्थन करते हुए दिखाई देते हैं।

शिक्षा सलाहकार छात्रों को सलाह दे रहे हैं कि वे अपने डिजिटल फुटप्रिंट पर नज़र रखें और सोच-समझकर पोस्ट करें। उन्हें ऐसे पोस्ट करने चाहिए जिससे उनके पढ़ाई के लक्ष्य और दुनिया को समझने का नज़रिया दिखाई दे। अपनी प्राइवेसी सेटिंग्स को मजबूत करें, लेकिन इतना भी नहीं कि आप कुछ छिपाते हुए दिखें।

पुलिस ने किया मना, फिर भी कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार नहीं मानी… RCB के जश्न समारोह में हुई 11 मौतों का कौन जिम्मेदार: CM बोले- कुंभ में भी तो हुआ था, डिप्टी CM बोले- कार्यक्रम 10 मिनट में निपटा

IPL में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु की जीत के बाद चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर मची भगदड़ में 11 जानें चली गईं, मगर कॉन्ग्रेस अब भी इस पर सफाई देने से नहीं थक रही हैं। अभी तक इस मामले में एक तरफा होकर बेंगलुरु पुलिस को जिम्मेदार ठहराया जा रहा था, लेकिन हाल में जब ये बात सामने आई कि इस परेड को निकालने के लिए पुलिस ने मना किया था, तो सवाल उठने लगा कि अगर पुलिस की मनाही के बावजूद सम्मान समारोह आयोजित हुआ तो इसमें कर्नाटक के कॉन्ग्रेस प्रशासन की गलती नहीं तो किसकी गलती है।

देख सकते हैं कि भगदड़ के बाद मौके पर पहुँचे क्रिकेट पत्रकार विक्रांत गुप्ता ने वीडियो में इस बात की जानकारी दी कि उन्हें पता चला है कि बेंगलुरु पुलिस ने सुरक्षा कारणों से परेड को निकालने से मना किया था। उनके अलावा मीडिया में भी अगर देखें तो यही खबरें आ रही थी कि पुलिस ने परेड निकालने से सख्त मना कर दिया। पुलिस ने कहा था- कोई विजय परेड नहीं होगी। पार्किंग की जगह सीमित है, इसलिए लोगों को मेट्रो या बाकी पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है।

दुखद बात ये है कि पुलिस प्रशासन द्वारा ये मना करने के बावजूद कॉन्ग्रेस ने अपनी वाह-वाही के लिए इस कार्यक्रम को आयोजित करवाया। जब हादसा हो गया तब एक तरफ मुख्यमंत्री इस मामले पर कहते दिखे कि उन्हें इस मामले पर कोई राजनीति नहीं करनी। दूसरी तरफ उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार स्वीकारते मिले कि ये सम्मान समारोह उन्हीं की सरकार की देखरेख में हुआ, लेकिन चूँकि भीड़ ज्यादा थी इसलिए इसे 10 मिनट में ही निपटवा दिया गया था।

फोटो साभार: बेंगलुरु पुलिस

अब इसी रवैये को देखते हुए भाजपा ने उन्हें घेरना शुरू किया है। उनका कहना है कि ये बात अच्छे से जानते हुए कि क्रिकेट प्रेमी अपनी पसंदीदा टीम के जीतने पर कैसे उत्साह दिखाते हैं, कैसे सड़कों पर जश्न मनाते हैं, सरकार ने लोगों की सुरक्षा की अनदेखा की और केवल राजनीति साधी। कई नेता इस घटना पर मुख्यमंत्री का इस्तीफा माँग रहे हैं। मगर, सीएम अपना बचाव इस घटना की तुलना दूसरी घटना से करके कर रहे हैं।

भाजपा नेता के बयानों पर अपना पक्ष रखते हुए उन्होंने इस घटना को कमतर दिखाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा, “मैं उनकी तुलना करके और यह कहकर इसका बचाव नहीं करने जा रहा हूँ कि यह यहाँ हुआ और वह वहाँ हुआ। कुंभ मेले में 50-60 लोग मारे गए थे। मैंने आलोचना नहीं की। अगर कॉन्ग्रेस आलोचना करती है, तो यह अलग बात है। क्या मैंने या कर्नाटक सरकार ने आलोचना की?”

उनके इस बयान के बाद केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी का बयान आया। उन्होंने सलाह दी- “मै उन्हें सलाह देता हूँ कि वे महाकुंभ कि तुलना इस घटना से न करें। यह सरकार की विफलता है। जब वे विधान सौधा और चिन्नास्वामी स्टेडियन के सामने सम्मान समारोह आयोजित करना चाहते थे तो पुलिस अधिकारियों ने पहले ही सलाह दी थी कि दोनों जगह पर एक साथ सुरक्षा देना असंभव है, लेकिन उन्होंने इस सलाह को नजरअंदाज किया।”

बता दें कि ये पहली बार नहीं है कि क्रिकेट में जीत के बाद टीम भारी-भरकम भीड़ के बीच परेड निकाले। पिछले साल ऐसी परेड मुंबई में आयोजित हुई थी जब भारत ने टी20 वर्ल्ड कप जीता था। ओपन रूफ वाली बस में भारतीय क्रिकेट ने मरीन ड्राइव तक परेड निकाली थी। इस दौरान सैंकड़ों लोग वहाँ जमा हुए थे और पुलिस व्यवस्था से सब अच्छे से हुआ था। अगर वहाँ पर परेड कार्यक्रम थोड़ी सूझ-बूझ के कारण अच्छे से निपट सकता था, तो बेंगलुरु में भी। मगर, अपनी वाह-वाही के कारण कॉन्ग्रेस ने पुलिस की सुनी और न लोगों की सुरक्षा की सोची।

140 नए OBC समूह, 97 मुस्लिम समुदाय और 17% आरक्षण: 2024 में हाई कोर्ट ने लगा दी थी रोक, मानसून सत्र में फिर सर्वे पेश करेंगी ‘ममता दीदी’

पश्चिम बंगाल में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) आरक्षण का मुद्दा इन दिनों गरमाया हुआ है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार ने हाल ही में एक नया ओबीसी सर्वे पूरा किया है, जिसमें 140 नए उप-समूहों को ओबीसी कैटेगरी में शामिल करने की बात कही जा रही है। सरकार इस रिपोर्ट को 9 जून 2025 से शुरू होने वाले विधानसभा के मानसून सत्र में पेश करने जा रही है और संकेत दिए हैं कि 17% ओबीसी आरक्षण नीति को बरकरार रखा जाएगा।

मुस्लिमों को आरक्षण क्यों मिल रहा है?

  • बंगाल में ओबीसी आरक्षण दो श्रेणियों में बंटा हुआ है। पहला ‘ओबीसी ए’- इसमें 10% आरक्षण है और कुल 81 समुदाय शामिल हैं, जिनमें से चौंकाने वाले 56 मुस्लिम समुदाय से हैं।
  • ओबीसी बी- इसमें 7% आरक्षण है और कुल 99 समुदाय शामिल हैं, जिनमें से 41 मुस्लिम समुदाय से हैं।

इसका मतलब यह है कि बंगाल के कुल ओबीसी आरक्षण का एक बड़ा हिस्सा मुस्लिम समुदायों को दिया गया है। बंगाल सरकार का तर्क है कि ये मुस्लिम समुदाय सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं और इसलिए उन्हें आरक्षण की आवश्यकता है। सरकार का दावा है कि ये फैसले दो सर्वे और पिछड़ा वर्ग आयोग की सुनवाई जैसी ‘तीन-स्तरीय प्रक्रिया’ के बाद लिए गए हैं।

कोर्ट क्यों लगा रही है रोक?

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब मई 2024 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने बंगाल सरकार द्वारा जारी किए गए करीब 12 लाख ओबीसी प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया। हाई कोर्ट ने अपने कड़े फैसले में साफ तौर पर कहा था कि ‘धर्म ही इन समुदायों को ओबीसी घोषित करने का एकमात्र मानदंड प्रतीत होता है।’

भारतीय संविधान के तहत आरक्षण केवल सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया जा सकता है, धर्म के आधार पर नहीं। हाई कोर्ट ने पाया कि बंगाल सरकार ने कई मुस्लिम समुदायों को केवल उनके धर्म के आधार पर ओबीसी सूची में डाल दिया, जो असंवैधानिक है।

कोर्ट का मानना है कि इससे आरक्षण के मूल सिद्धांत का उल्लंघन होता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी बंगाल सरकार को इन उप-समूहों के सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को स्पष्ट करने के लिए कहा था, न कि केवल धार्मिक पहचान के आधार पर उन्हें शामिल करने के लिए।

बीजेपी यह मुद्दा उठा रही है कि अगर धर्म के आधार पर आरक्षण दिया जाता है, तो हिंदू और अन्य समुदाय के जो सच्चे हकदार ओबीसी हैं, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित किया जाएगा। यह एक ऐसा मुद्दा है जो हिंदू मतदाताओं के बीच अपील कर सकता है।

ममता बनर्जी सरकार इस मामले में कई मोर्चों पर सवालों के घेरे में-

हाई कोर्ट का फैसला सीधे तौर पर बंगाल सरकार पर ‘धर्म आधारित’ आरक्षण देने का आरोप लगाता है, जो एक गंभीर संवैधानिक उल्लंघन है। यह आरोप ममता सरकार की धर्मनिरपेक्षता की छवि को धूमिल करता है और उस पर मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने की राजनीति का आरोप लगता है।

बंगाल सरकार को बार-बार अदालतों से फटकार मिल रही है, जो उसकी नीतियों की वैधता पर सवाल उठाती है। 12 लाख ओबीसी प्रमाणपत्रों का रद्द होना सरकार के लिए एक बड़ा झटका है और उसकी प्रशासनिक क्षमता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।

बंगाल सरकार ने दावा किया है कि उसने ‘तीन-स्तरीय प्रक्रिया’ का पालन किया है, लेकिन हाई कोर्ट के फैसले से पता चलता है कि यह प्रक्रिया शायद उतनी पारदर्शी और संवैधानिक नहीं थी जितनी होनी चाहिए थी। तेजी से नए सर्वे को पूरा करना भी संदेह पैदा करता है कि क्या यह पूरी तरह से वैज्ञानिक और निष्पक्ष तरीके से किया गया है। सुप्रीम कोर्ट की समय-सीमा और लाखों नौकरी आवेदकों के प्रभावित होने का दबाव सरकार को तेजी से फैसले लेने पर मजबूर कर रहा है, जिससे गलतियों की संभावना बढ़ जाती है।

आगे क्या?

बंगाल सरकार अब नए सर्वे को विधानसभा में पेश करेगी और हो सकता है कि यह मामला एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक रूप से गरमा भी सकता है। यह देखना बाकी है कि सुप्रीम कोर्ट इस नए सर्वे और उसमें शामिल 140 उप-समूहों पर क्या रुख अपनाता है, और क्या बंगाल में ओबीसी आरक्षण का मुद्दा एक नई राजनीतिक लड़ाई का कारण हो सकता है।

11 मौतों के बाद कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने दिए न्यायिक जाँच के आदेश, स्टेडियम के बाहर मची थी भगदड़.. भीतर चल रहा था ‘सरकारी जश्न’: PM मोदी ने जताया दुख

बेंगलुरु में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (RCB) की ऐतिहासिक IPL 2025 जीत का जश्न उस वक्त मातम में बदल गया, जब चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर भगदड़ में 11 लोगों की जान चली गई। RCB ने पंजाब किंग्स को 6 रन से हराकर 18 साल बाद पहली बार IPL खिताब जीता। बुधवार (4 जून 2025) को जब टीम बेंगलुरु पहुँची, तो एयरपोर्ट पर हजारों फैंस ने गर्मजोशी से स्वागत किया। टीम जब मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से मिलने विधान सौध पहुँची, तो सड़कों पर फैंस तालियाँ और नारे लगाते दिखे।

लेकिन चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर जश्न बेकाबू हो गया। स्टेडियम की क्षमता 35 हजार की थी, मगर 3 लाख से ज्यादा फैंस जमा हो गए। शाम 4:40 बजे भीड़ में खींचतान और नारेबाजी के बीच भगदड़ मच गई। इस दौरान पुलिस ने लाठियाँ भी भाँजी।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, फैंस खिलाड़ियों की एक झलक पाने को बेताब थे और कुछ लोग स्टेडियम में कूदने की कोशिश कर रहे थे। पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग किया, जिससे स्थिति और बिगड़ गई।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने 11 मौतों की पुष्टि की है और 33 लोगों के घायल होने की भी जानकारी उन्होंने दी है।

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने दुख जताते हुए मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये की सहायता राशि देने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि घायलों का मुफ्त इलाज कराया जा रहा है और सभी अब खतरे से बाहर हैं। उन्होंने ज्यूडिशियल इन्क्वॉयरी के भी आदेश दे दिए हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शोक व्यक्त करते हुए घायलों के जल्द स्वस्थ होने की कामना की।

कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने कहा कि पुलिस ने क्राउड मैनेजमेंट के लिए कार्यक्रम को छोटा किया और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त फोर्स तैनात की।

BCCI सचिव देवजीत सैकिया ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए भविष्य में ऐसे आयोजनों के लिए नए नियम बनाने की बात कही। स्टेडियम के अंदर जश्न जारी रहा, क्योंकि पुलिस ने अंदर के फैंस को भगदड़ की जानकारी नहीं दी, ताकि और हंगामा न हो। इस दुखद घटना ने RCB की जीत की खुशी को फीका कर दिया।

इधर सेना के अपमान पर राहुल गाँधी को हाई कोर्ट ने लगाई फटकार, उधर कॉन्ग्रेस के ‘युवराज’ के बयान को हथियार बना भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा पाकिस्तान

पाकिस्तान राहुल गाँधी के बयानों को हथियार बनाकर भारत के खिलाफ प्रचार कर रहा है, तो दूसरी ओर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उनके बयानों पर कड़ी फटकार लगाई है। राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी के बयानों ने पाकिस्तानी मीडिया को मौका दिया है कि वे भारत को नीचा दिखाने की कोशिश करें, खासकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ट्रम्प की मध्यस्थता के दावों को लेकर। राहुल के बयानों को पाकिस्तानी मीडिया ने इसे भारत की हार के रूप में पेश किया।

उधर, हाई कोर्ट ने साफ कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब सेना के खिलाफ अपमानजनक बातें कहना नहीं है। राहुल के बयानों को लेकर उनके खिलाफ मानहानि का केस चल रहा है, जिसे बंद करने की याचिका दाखिल की गई थी, लेकिन उसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।

गाँधी परिवार और उनकी पार्टी ने एक बार फिर अपने बयानों के जरिए पाकिस्तान को भारत के खिलाफ हथियार दे दिया, ताकि वे कुछ राजनीतिक फायदा उठा सकें। राहुल गाँधी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के उस दावे का समर्थन किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि वे भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता कर रहे हैं।

रायबरेली के सांसद ने तंज कसते हुए कहा, “नरेंद्रजी ने ट्रम्प का हुक्म माना, जिन्होंने कहा ‘नरेंद्र, आत्मसमर्पण करो’ और उन्होंने जवाब दिया ‘हाँ, सर’।” उन्होंने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का हवाला देते हुए कहा, “भारत ने अमेरिका की धमकी के बावजूद 1971 में पाकिस्तान को तोड़ा था। कॉन्ग्रेस के शेर और शेरनियाँ महाशक्तियों से लड़ते हैं और कभी नहीं झुकते।”

इस बीच, कॉन्ग्रेस ने भी एक शर्मनाक मीम के जरिए इसकी हिमायत की, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ट्रम्प से निर्देश लेते हुए दिखाया गया, जैसे कि उन्होंने युद्धविराम की घोषणा कर दी, जिसे ‘आत्मसमर्पण’ के तौर पर पेश किया गया।

पाकिस्तानी मीडिया ने भारत की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी द्वारा दिए गए इस मौके को फौरन लपक लिया और इसे अपनी गलत मंशा वाली कहानी को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया। Geo.tv के एक पत्रकार ने कहा, “कॉन्ग्रेस पहले से ही पीएम मोदी की ट्रम्प के मध्यस्थता के दावे पर चुप्पी की आलोचना कर रही थी। अब उन्होंने उनका मजाक उड़ाना भी शुरू कर दिया है।”

इसके बाद उन्होंने कॉन्ग्रेस के आधिकारिक हैंडल से पोस्ट किए गए अपमानजनक मीम का जिक्र किया और वह वीडियो भी दिखाया, जिसमें राहुल गाँधी ने पीएम मोदी का मजाक उड़ाया था।

पत्रकार ने आगे कहा, “भारत का विपक्ष यह सवाल उठा रहा है कि क्या युद्धविराम पाकिस्तान के कहने पर शुरू हुआ था या ट्रम्प के प्रस्ताव की वजह से। अगर ऐसा है, तो सरकार ने इसे क्यों मान लिया, खासकर जब हम युद्ध जीत रहे थे? अगर यह सच नहीं है, तो केंद्र सरकार के दावे गलत और भ्रामक हैं।” उन्होंने इस गंभीर समय में भी विपक्षी नेताओं की छोटी-मोटी राजनीति पर रोशनी डाली।

बता दें कि OpIndia ने पहले ही बताया था कि राहुल गाँधी के खतरनाक बयान इस्लामिक गणराज्य को प्रचार के लिए और सामग्री देंगे। उनके विदेश मंत्री एस जयशंकर पर लगाए गए झूठे आरोप और ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ के नतीजे पर सवाल उठाने वाले बयानों को भी पाकिस्तान ने रिपोर्ट किया था।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लगाई राहुल गाँधी को फटकार

इस बीच, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राहुल गाँधी को फटकार लगाई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार भारतीय सेना के खिलाफ अपमानजनक बातें कहने तक नहीं जाता। हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की, जब उसने विपक्ष के नेता राहुल गाँधी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने 2022 की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भारतीय सेना के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक टिप्पणियों के लिए लखनऊ की एक अदालत द्वारा जारी समन आदेश को चुनौती दी थी।

सिंगल जज जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने कहा, “इसमें कोई शक नहीं कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति और बोलने की आजादी की गारंटी देता है, लेकिन यह आजादी उचित प्रतिबंधों के अधीन है और इसमें किसी व्यक्ति या भारतीय सेना के खिलाफ अपमानजनक बयान देने की आजादी शामिल नहीं है।” लखनऊ की अदालत के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट आलोक वर्मा ने राहुल गाँधी को मानहानि के मामले में 24 मार्च को सुनवाई के लिए पेश होने का निर्देश दिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए राहुल ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।

शिकायत वकील विवेक तिवारी ने उदय शंकर श्रीवास्तव की ओर से दायर की थी, जो बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन के पूर्व निदेशक थे और सेना में कर्नल के बराबर रैंक रखते थे। तिवारी ने आरोप लगाया कि राहुल गाँधी ने 16 दिसंबर 2022 को भारत और चीन की सेनाओं के बीच 9 दिसंबर 2022 को हुए टकराव के बारे में जो टिप्पणी की, वह भारतीय सेना के लिए अपमानजनक और मानहानिकारक थी।

राहुल ने कहा था कि “अरुणाचल प्रदेश में चीनी सैनिक भारतीय सेना के जवानों को पीट रहे हैं” – यह बयान सरकार की वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन की हरकतों की आलोचना के लिए था। राहुल की मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ याचिका खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 199(1) के तहत, कोई व्यक्ति जो अपराध का सीधा शिकार नहीं है, उसे भी ‘पीड़ित व्यक्ति’ माना जा सकता है, अगर उस अपराध से उसे नुकसान हुआ हो या उसका बुरा असर पड़ा हो।

गौरतलब है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद अभी भी कॉन्ग्रेस पार्टी और राहुल गाँधी लगातार भारतीय सेना, उसके शौर्य और पहलगाम हमले पर सवाल उठा रहे हैं।

IRCTC ने बंद किए 2.5 करोड़ फर्जी यूजर ID, 20 लाख यूजर ID की फिर से होगी जाँच: यूँ ही नहीं बुकिंग खुलते ही खत्म हो जाते हैं ट्रेनों के टिकट, चल रहा बड़ा फर्जीवाड़ा

भारतीय रेलवे के आईआरसीटीसी पोर्टल से तत्काल टिकट बुक करना लगभग असंभव काम जैसा है। सुबह 10 बजे पोर्टल खुलते ही पेज फ्रीज होना, पेमेंट गेटवे क्रैश होना और कुछ देर बाद ही उपलब्ध सीटें खत्म होना आम बात है। इसके पीछे की गुत्थी अब रेलवे ने सुलझा ली है। आईआरसीटीसी ने खुलासा किया है कि इसके पीछे कौन है?

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक भारतीय रेलवे को पिछले 5 महीनों में 2.9 लाख संदिग्ध पीएनआर का पता चला है। ये वो सामान्य और तत्काल टिकट हैं, जिसे बुकिंग शुरू होने के 5 मिनट के अंदर खरीदे गए थे।

रेलवे अधिकारियों के मुताबिक, ” जनवरी से मई 2025 में 2.5 करोड़ फर्जी यूजर आईडी बंद कर दी गई है। इनमें से कई खाते एजेंटों या सॉफ्टवेयर से जुड़े थे, जो सिस्टम में खामियों का फायदा उठा रहे थे। इसके अलावा 20 लाख यूजर आईडी को दोबारा जाँच के लिए रखा गया है। जानकारी के मुताबिक इस दौरान राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर 134 शिकायतें दर्ज की गईं, 6800 से ज्यादा डिस्पोजेबल ईमेल डोमेन को ब्लॉक किया गया।”

डिस्पोजेबल ईमेल का इस्तेमाल यात्रियों से ज्यादा पैसे वसूलने के लिए किया जाता है। धोखाधड़ी करने वाले एजेंट हर संपर्क या काम के लिए एक अलग आईडी का इस्तेमाल करता है जिसे डिस्पोजेबल ईमेल कहा जाता है।

सभी टिकटों के जल्दी बुक हो जाने की समस्या कुछ खास ट्रेनों और रूटों पर ज्यादा है। इसलिए ऐसे यूजर्स को ब्लॉक करना थोड़ा आसान रहा।

अधिकारियों का कहना है कि आईआरसीटीसी ने सिस्टम में सुधार के लिए कई कदम उठाए हैं। संदिग्ध डोमेन और आईडी को ब्लॉक करने के अलावा एंटी-बॉट सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया है। पोर्टल पर ट्रैफिक बढ़ने पर बेहतर तरीके से निपटने के लिए एक प्रमुख कंटेंट डिलीवरी नेटवर्क के साथ साझेदारी की गई है। इसमें आम लोगों के इस्तेमाल करने और स्वचालित मशीन के इस्तेमाल के बीच का अंतर समझा जा सकेगा। माना जाता है कि ‘सुपर तत्काल’ और ‘नेक्सस’ जैसे अवैध सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल टिकट बुकिंग के लिए किया जाता है जो इंसान की तुलना में लॉन इन करने, फॉर्म भरने और भुगतान करने में तेज हैं।

आईआरसीटीसी का दावा है कि 22 मई 2025 की सुबह 10 बजे 31814 टिकट प्रति मिनट बुक की गई। उन्होंने ये भी बताया है कि अक्टूबर 2024 और मई 2025 के बीच बुकिंग के प्रयास की सफलता का अनुपात 43.1% से बढ़ कर 62.2% हो गया।

थायरोकेयर के संस्थापक ए वेलुमनी ने सोशल मीडिया पर बुकिंग सिस्टम में बदलाव के सुझाव दिए हैं। उनके मुताबिक “यात्रियों को एक साथ बुकिंग करने के बजाय निर्धारित स्लॉट में बुकिंग क्यों नहीं करने दी जाती?”

वेलुमणि की पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए संदीप सभरवाल ने कहा है कि तत्काल में टिकट बुकिंग करने की कोशिश में वे 90 फीसदी बार असफल रहे।

ऐसे कितने ही रेलवे यात्री टिकट बुकिंग से परेशान होकर एजेंटों के पास पहुँचते हैं और तय कीमत से दोगुनी या तिगुनी कीमत पर टिकट कटवाते हैं।

मैंने चाय-बिस्कुट लेकर आने को कहा, आप केवल चाय लेकर आए… बिस्कुट-दालमोट परोसने में ‘घोर त्रुटि’ से उखड़े जज साहब, स्टाफ से माँग लिया स्पष्टीकरण: जाने क्या है मामला

उत्तर प्रदेश के गोंडा में एक जज ने अपने अर्दली को बिस्किट और चाय और परोसने में ही गड़बड़ी पर कड़ी फटकार लगाई है। उसे आधिकारिक तौर पर नोटिस भी जारी किया गया है। इस अर्दली से इस ‘घोर त्रुटि’ के लिए जवाब भी माँगा गया है। इस नोटिस का फोटो सोशल मीडिया में वायरल है।

सोशल मीडिया पर यह नोटिस गोंडा के अपर जनपद एवं सत्र न्यायाधीश के नाम से वायरल है। यह पत्र राकेश कुमार नाम के एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को जारी किया गया है जो जज का अर्दली (एक तरह का चपरासी) है। वायरल नोटिस में 30 मई, 2025 की तारीख लिखी हुई है।

इस वायरल नोटिस में जज इस बात के लिए अर्दली से जवाब माँग रहे है कि वह जज के कहने के बावजूद चाय के साथ बिस्किट क्यों नहीं लाया। इसके अलावा इस बात पर भी सफाई पेश करने की बात कही गई है कि जज के सामने गन्दी और खराब दालमोठ क्यों पेश की गई।

इस वायरल नोटिस में लिखा है, “यह कि आज दिनांक 30/05/2025 को लन्च समय में मेरे विश्राम कक्ष में सिविल जज / FTC नवीन गोण्डा सुश्री शर्मिष्ठा साहू मिलने आयी थी जिस पर मेरे द्वारा आपको चाय/बिस्कुट लाने हेतु कहा गया, जबकि आपके द्वारा केवल दो चाय लायी गयी।”

आगे इस नोटिस में लिखा है, “मेरे द्वारा पुनः बिस्कुट लाने के लिए कहा गया, किन्तु आपके द्वारा बिस्कुट न लाकर पुरानी खराब स्थिति में जिसमें से गन्दी गंध आ रही थी, दालमोठ रखी गई, जबकि आलमारी में दो डिब्बे में अच्छी स्थिति में बिस्कुट रखे हुए थे, बावजूद आपके द्वारा जानबूझकर खराब पुरानी दालमोट रखी गयी, जो कि फेंकने की स्थिति में थी।”

इस नोटिस में राकेश कुमार से स्पष्टीकरण 31 मई, 2025 तक माँगा गया था। इस पूरी घटना को नोटिस में ‘जानबूझकर’ की गई ‘घोर त्रुटि’ बताया गया था। इस नोटिस के बाद कर्मचारी पर क्या एक्शन हुआ, यह स्पष्ट नहीं है। हालाँकि, इस नोटिस के सामने आने के बाद लोग सरकारी तौर तरीके की आलोचना कर रहे हैं।

यह ऐसा कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले 2023 में इलाहाबाद हाई कोर्ट से भी एक ऐसा ही मामला मामला आ चुका है। एक ट्रेन के लेट होने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जज ने नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण माँग लिया था। उन्हें यह समस्या थी कि पैंट्री और पुलिस वाले ने उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं दिया था।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस गौतम चौधरी को ट्रेन यात्रा के दौरान असुविधा हुई थी। यह यात्रा 8 जुलाई 2023 (शनिवार) को नई दिल्ली से प्रयागराज के बीच पुरुषोत्तम एक्सप्रेस में की गई थी। हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार के लिखे लेटर के अनुसार इस दिन ट्रेन 3 घंटे लेट थी।

लेटर में बताया गया कि न्यायाधीश द्वारा बार-बार बुलाए जाने के बावजूद TTE सहित किसी भी रेलकर्मी द्वारा कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया था। इस नोटिस में GRP स्टाफ और पैंट्री कार मैनेजर से स्पष्टीकरण माँगा गया था। बाद के इस घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने भी नाराजगी जाहिर की थी।

खदीजा शेख को जमानत क्योंकि जेल में रहती तो ‘जिंदगी हो जाती बर्बाद’, शर्मिष्ठा पर कहा- आसमान नहीं टूट जाएगा: क्या अभिव्यक्ति की आजादी के मायनों को संकुचित कर रही हैं अदालतें?

भारत देश की नींव संविधान पर टिकी है, जिसके तहत हर नागरिक को समान अधिकार और सम्मान की बात कही गई है। लेकिन आज देश की दो हाई कोर्ट्स के दो अलग-अलग फैसलों ने इस सपने पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ बॉम्बे हाई कोर्ट ने खदीजा शेख को जमानत दे दी, जिसने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ जैसे नारे लगाए। दूसरी तरफ कोलकाता हाई कोर्ट ने शर्मिष्ठा पनोली को जमानत देने से इनकार कर दिया, जिसने ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ कहा।

इन दोनों मामलों में आरोपित छात्राएँ हैं। दोनों ने ही अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त की.. लेकिन एक को बेल मिल गई, तो दूसरी को जेल में ठूँट दिया गया। इन दोनों मामलों में न्याय का तराजू एक तरफ झुका हुआ क्यों दिखता है? आखिर क्या वजह है कि एक को उसकी जिंदगी और करियर की चिंता में राहत मिलती है, जबकि दूसरी को जेल की सलाखों के पीछे धमकियाँ और परेशानी झेलनी पड़ रही है? ये सवाल हर भारतीय के मन में उठ रहे हैं।

दो छात्राएँ, दो हाई कोर्ट, दो फैसले, दो कहानियाँ

खदीजा शेख को रिहाई: पुणे की इंजीनियरिंग छात्रा खदीजा ने सोशल मीडिया पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ लिखा। उसने भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की आलोचना की, जिसमें भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को नष्ट किया था। खदीजा ने इसे ‘फासीवादी’ करार दिया और जम्मू-कश्मीर को ‘अधिकृत’ बताया। उसकी पोस्ट में भारत की संप्रभुता को चुनौती थी, फिर भी बॉम्बे हाई कोर्ट ने उसे जमानत दे दी

कोर्ट ने कहा कि खदीजा ने माफी माँग ली है, वह एक छात्रा है और उसकी जिंदगी बर्बाद नहीं करनी चाहिए। कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाई कि एक छात्रा को उसकी राय के लिए इस तरह सजा देना गलत है। कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया कि खदीजा बिना किसी डर के अपनी परीक्षाएँ दे सके।

शर्मिष्ठा पनोली को कैद: 22 साल की लॉ स्टूडेंट शर्मिष्ठा ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो डाला, जिसमें उसने ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ कहा। उसका गुस्सा जायज था – पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 24 हिंदुओं की हत्या के बाद, जिसमें आतंकियों ने धर्म पूछकर गोली मारी थी। शर्मिष्ठा ने पाकिस्तान के खिलाफ बोलते हुए कुछ शब्दों का इस्तेमाल किया, जिससे भारत के कुछ इस्लामी कट्टरपंथी नाराज हो गए। यहाँ तक कि हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करने वाले वजाहत खान ने एफआईआर करा दी।

नतीजा? बंगाल पुलिस ने उसे 1500 किमी दूर आकर हरियाणा के गुरुग्राम से गिरफ्तार कर लिया। उसके खिलाफ IPC की धारा 295A (धार्मिक भावनाएँ आहत करना), 505(2) (सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाना) और 504 (जानबूझकर अपमान) के तहत केस दर्ज हुआ। कोलकाता हाई कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी, यह कहते हुए कि ‘दो दिन जेल में रहने से आसमान नहीं टूट पड़ेगा‘ और उसके वीडियो ने ‘लोगों की भावनाएँ आहत’ की हैं।

खदीजा को बेल, शर्मिष्ठा को जेल क्यों?

दोनों मामले देखने के बाद सवाल उठता है – अगर खदीजा को छात्र होने के नाते, माफी माँगने के बाद और उसकी शिक्षा व करियर की चिंता करते हुए जमानत मिल सकती है, तो शर्मिष्ठा को क्यों नहीं? अगर खदीजा की अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान किया जा सकता है, तो शर्मिष्ठा की क्यों नहीं? अगर खदीजा की पोस्ट – जिसमें उसने भारत की संप्रभुता को चुनौती दी, ‘भावनात्मक’ मानी जा सकती है, तो शर्मिष्ठा का भारत के दुश्मन देश और आतंकवाद के संरक्षक पाकिस्तान के खिलाफ बोलना अपराध कैसे हो गया? वो भी तब, जब भारत और पाकिस्तान ने हाल ही में एक लड़ाई लड़ी हो और पूरा मामला उसी के इर्द-गिर्द घूम रहा हो।

शर्मिष्ठा ने अपनी याचिका में बताया कि उसे जेल में धमकियाँ मिल रही हैं। उसे साफ पानी तक नहीं मिल रहा और जेल की हालत ऐसी है कि उसकी सेहत को खतरा है। फिर भी कोलकाता हाई कोर्ट ने उसकी जमानत खारिज कर दी। दूसरी तरफ बॉम्बे हाई कोर्ट ने खदीजा के लिए कहा कि उसे बिना डर के पढ़ाई का मौका मिलना चाहिए। क्या शर्मिष्ठा का करियर, उसकी सुरक्षा, उसकी अभिव्यक्ति का अधिकार मायने नहीं रखता?

क्या धर्म के आधार पर हो रहा है भेदभाव?

सबसे बड़ा सवाल जो हर भारतीय के मन में उठ रहा है – क्या भारत की न्यायपालिका धर्म के आधार पर फैसले दे रही है? क्या खदीजा को इसलिए जमानत मिली क्योंकि वह मुस्लिम है, और शर्मिष्ठा को इसलिए जमानत नहीं मिली क्योंकि वह हिंदू है? यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि शर्मिष्ठा का मामला नुपुर शर्मा के मामले से मिलता-जुलता है। 2022 में नुपुर शर्मा को भी इस्लामी कट्टरपंथियों के गुस्से का शिकार होना पड़ा था।

उनकी टिप्पणी को गलत तरीके से पेश किया गया और उनके खिलाफ देशभर में हिंसा भड़की। नुपुर ने माफी माँगी, लेकिन उनकी माफी को स्वीकार नहीं किया गया। उल्टा सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें ही ‘लूज टंग’ कहकर दोषी ठहराया। इस हिंसा में दो हिंदुओं – कन्हैया लाल और उमेश कोल्हे की बेरहमी से हत्या कर दी गई, सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने नुपुर का समर्थन किया था।

शर्मिष्ठा के मामले में भी यही पैटर्न दिखता है। उसने माफी माँगी, वीडियो हटा लिया, लेकिन फिर भी उसे जेल में डाल दिया गया। दूसरी तरफ खदीजा की पोस्ट, जिसमें उसने भारत के खिलाफ और पाकिस्तान के पक्ष में बात की, उसे ‘भावनात्मक’ मानकर माफ कर दिया गया। क्या यह दोहरा मापदंड नहीं है?

अभिव्यक्ति की आजादी सिर्फ एक समुदाय को?

भारत में संविधान के तहत अभिव्यक्ति की आजादी हर नागरिक का अधिकार है। लेकिन क्या यह आजादी सिर्फ एक समुदाय के लिए है? अगर कोई हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करता है, तो उसे अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला दिया जाता है। लेकिन अगर कोई इस्लाम या इस्लामी कट्टरपंथ के खिलाफ बोलता है, तो उसे ‘धार्मिक भावनाएँ आहत’ करने का दोषी ठहराया जाता है। शर्मिष्ठा ने पाकिस्तान के खिलाफ बोला, जो भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देता रहा है। फिर भी, उसे अपराधी की तरह जेल में डाल दिया गया। दूसरी तरफ, खदीजा ने भारत की संप्रभुता को चुनौती दी, लेकिन उसे ‘छात्रा’ और ‘भावनात्मक’ कहकर छोड़ दिया गया।

यह पैटर्न सिर्फ शर्मिष्ठा या नुपुर शर्मा तक सीमित नहीं है। 2019 में कमलेश तिवारी और 2022 में किशन भरवाड़ की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथियों ने उनकी टिप्पणियों को ‘ब्लासफेमी’ यानी ईशनिंद माना। क्या भारत में अब राष्ट्रवाद अपराध बन गया है? क्या ‘भारत माता की जय’ कहने वालों को जेल मिलेगी और ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ कहने वालों को बेल?

कलकत्ता हाई कोर्ट की कड़ाई और ममता सरकार की वोटबैंक पॉलिटिक्स

कोलकाता हाई कोर्ट का यह कहना कि “दो दिन जेल में रहने से आसमान नहीं टूट पड़ेगा” शर्मिष्ठा के लिए बेहद कठोर है। क्या कोर्ट को यह नहीं सोचना चाहिए कि एक युवा छात्रा, जो अपनी पढ़ाई और करियर के लिए मेहनत कर रही है, उसकी जिंदगी और सुरक्षा का क्या होगा? दूसरी तरफ बॉम्बे हाई कोर्ट ने खदीजा के करियर और शिक्षा की चिंता की, लेकिन शर्मिष्ठा के लिए ऐसी कोई चिंता क्यों नहीं दिखाई गई?

पश्चिम बंगाल की टीएमसी सरकार ने भी इस मामले में शर्मिष्ठा को राहत देने का विरोध किया। क्या यह सिर्फ वोटबैंक की राजनीति है? क्या बंगाल में राष्ट्रवाद को अपराध मान लिया गया है? शर्मिष्ठा ने अपनी याचिका में बताया कि उसे जेल में जान से मारने की धमकियाँ मिल रही हैं, साफ पानी तक नहीं मिल रहा और उसकी सेहत खराब हो रही है। फिर भी न तो कोर्ट और न ही सरकार ने उसकी सुरक्षा की चिंता की।

जनता का भरोसा डगमगा रहा है मीलॉर्ड

भारत की न्यायपालिका और संविधान पर हर भारतीय को गर्व है। लेकिन जब ऐसे फैसले सामने आते हैं, जो धर्म के आधार पर भेदभाव की बू देते हैं, तो लोगों का भरोसा डगमगाने लगता है। अगर खदीजा को माफी और जमानत मिल सकती है, तो शर्मिष्ठा को क्यों नहीं? अगर खदीजा की अभिव्यक्ति की आजादी और करियर की चिंता हो सकती है, तो शर्मिष्ठा की क्यों नहीं? क्या हिंदू छात्रा का भविष्य मुस्लिम छात्रा जितना महत्वपूर्ण नहीं है?

जब कोर्ट इस्लामी कट्टरपंथियों की ‘आहत भावनाओं’ को इतना गंभीरता से लेते हैं, लेकिन हिंदुओं की भावनाओं को नजरअंदाज करते हैं, तो यह सवाल उठता है कि क्या न्यायपालिका का तराजू संतुलित है? जब इस्लामी कट्टरपंथी ‘सर तन से जुदा’ की धमकियाँ देते हैं, और कोर्ट उन पर कार्रवाई करने के बजाय पीड़ित को ही दोषी ठहराते हैं, तो यह कट्टरपंथ को बढ़ावा देने जैसा नहीं है?

बाबा साहेब आंबेडकर ने एक ऐसे भारत की कल्पना की थी, जहाँ धर्म, जाति या लिंग के आधार पर कोई भेदभाव न हो। लेकिन आज जब शर्मिष्ठा जैसी हिंदू छात्रा को सिर्फ इसलिए जेल में डाल दिया जाता है क्योंकि उसने आतंकवाद के खिलाफ बोला और खदीजा जैसी छात्रा को भारत के खिलाफ बोलने के बावजूद राहत मिलती है, तो क्या यह बाबा साहेब के सपने का अपमान नहीं है?

“क्या अब देश से प्यार करना अपराध है?” यह सवाल आज हर उस भारतीय का है, जो इस दोहरे मापदंड को देखकर आहत है। क्या हमारी न्यायपालिका और सरकार इस भेदभाव को खत्म करने के लिए कुछ करेगी? क्या शर्मिष्ठा जैसे राष्ट्रवादियों की आवाज को सुना जाएगा, या उन्हें जेल में धमकियाँ झेलने के लिए छोड़ दिया जाएगा?

यह समय है कि हम भारत के नागरिक इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएँ। हमें अपने संविधान, अपनी न्यायपालिका और अपने देश पर भरोसा है। लेकिन जब ऐसे फैसले सामने आते हैं, जो हिंदू-मुस्लिम के आधार पर भेदभाव का शक पैदा करते हैं, तो हमें सवाल पूछने का हक है। आखिर क्या यही है वह भारत, जिसका सपना बाबा साहेब ने देखा था? क्या यही है वह न्याय, जिसके लिए हमारा संविधान बना था?

नाम: जुनयोंग लियू और यून्किंग जियान, काम: रिसर्च, संबंध- बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड, मिशन: अमेरिका को जैविक हथियारों से तबाह करना: जानिए क्या है FHB तस्करी का मामला

अमेरिका में दो चीनी नागरिकों यून्किंग जियान (33) और जुनयोंग लियू (34) को एक खतरनाक बायोलॉजिकल पैथोजन ‘फ्यूजेरियम ग्रैमिनीरम’ की तस्करी करने के आरोप में गिरफ्तार किया है, जो अनाज की फसलों को बर्बाद कर सकता है।

काश पटेल ने X पर दी जानकारी

काश पटेल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पहले ट्वीटर) पर बताया कि FBI ने अमेरिका में चीनी नागरिक को गिरफ्तार किया है, जिस पर खतरनाक बायोलॉजिकल पैथोजन की तस्करी का आरोप है।

गिरफ्तार किए गए व्यक्ति की पहचान युनकिंग जियान के रूप में हुई है, जिस पर फ्यूसैरियम ग्रैमिनेरम नामक फंगस की तस्करी का आरोप है। पटेल ने इसे ‘एग्रोटेररिज्म एजेंट’ बताया, जिसका मतलब है कि इसका इस्तेमाल फसलों को नुकसान पहुँचाकर कृषि-आतंकवाद फैलाने के लिए किया जा सकता है।

कैसे पकड़े गए दोनों चीनी नागरिक?

27 जुलाई 2024 को लियू ने अमेरिका में प्रवेश करते समय अधिकारियों को बताया कि वह अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने आया है और जल्द ही लौट जाएगा। उसने दावा किया कि उसके पास कोई ‘काम की चीज’ नहीं है। हालाँकि, उसके सामान की दूसरी बार जाँच करने पर अधिकारियों को चीनी भाषा में एक नोट, फिल्टर पेपर का एक टुकड़ा और चार प्लास्टिक की थैलियाँ मिलीं, जिनमें लाल रंग की पौधों की सामग्री के छोटे-छोटे गुच्छे थे।

शुरुआत में लियू ने कहा कि उसे नहीं पता कि ये चीजें उसके बैग में कैसे आईं। लेकिन कड़ी पूछताछ के बाद उसने सच कबूल कर लिया। उसने बताया कि उसने जानबूझकर नमूनों को टिशू के एक बंडल में छिपाया था क्योंकि उसे पता था कि इनके आयात पर प्रतिबंध है। उसका मकसद अमेरिका में अपना रिसर्च जारी रखना था।

क्या है पूरा मामला?

अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट के बयान के अनुसार, जियान और लियू पर साजिश रचने, तस्करी करने, झूठे बयान देने और वीजा धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। ये दोनों कथित तौर पर अपनी रिसर्च के लिए चीनी सरकार से फंडिंग ले रहे थे। लियू, जो चीन की एक यूनिवर्सिटी में इस रोगाणु पर रिसर्च कर रहा था, डेट्रॉयट मेट्रोपॉलिटन एयरपोर्ट के रास्ते इसे अमेरिका लाने की कोशिश कर रहा था।

उसका मकसद मिशिगन यूनिवर्सिटी की लैब में इस पर रिसर्च करना था, जहाँ उसकी गर्लफ्रेंड जियान काम करती है। अधिकारियों का मानना है कि ये दोनों चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हो सकते हैं।

इतिहास में भी इस तरह के हमले हो चुके हैं, जिसमें जर्मनी, जापान और भारत शामिल है। इस तरह के मामले ने अमेरिका समेत दुनिया को फिर से चेताया है कि जैविक आतंकवाद केवल थ्योरी नहीं, बल्कि एक हकीकत बनता जा रहा है, जिससे वैश्विक खाद्य सुरक्षा को बड़ा खतरा है।