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‘हम पूरे उत्तर प्रदेश में धमाके करेंगे और सरकार देखती रह जाएगी’: CM योगी और 50 जगहों को उड़ाने की धमकी

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को फिर से धमकी दी गई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यूपी पुलिस की इमरजेंसी सर्विस के व्हाट्सएप नंबर पर एक धमकी भरा मैसेज भेजा गया है। इसमें मुख्यमंत्री आवास सहित राज्य के 50 अलग-अलग जगहों पर धमाके की धमकी दी गई है।

जी न्यूज ने पुलिस के हवाले से बताया है कि मैसेज में लिखा है, “हम पूरे उत्तर प्रदेश में धमाके करेंगे और सरकार देखती रह जाएगी।” धमकी भरे मैसेज के बाद मुख्यमंत्री आवास सहित पूरे राज्य में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। लखनऊ के कालिदास मार्ग पर हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है। यहीं मुख्यमंत्री का आवास है।

जानकारी के मुताबिक मैसेज के बाद सीएम आवास के आसपास के वीआईपी इलाके में भी सघन चेकिंग शुरू कर दी गई है। साथ ही बम स्क्वॉड और डॉग स्क्वॉड की मदद से बंगले की छानबीन की जा रही है। पुलिस इस बात का पता लगाने में जुटी है कि मैसेज किसने और कहाँ से भेजा है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी ने गृह विभाग के सभी सचिव और आला अधिकारी के साथ बैठक की है। मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी ने बताया कि मामले की जाँच की जा रही है।

आपको बता दें कि फिलहाल सीएम योगी को Z+ सिक्योरिटी मिली हुई है, लेकिन लगातार सीएम को मिल रही जान से मारने की धमकियों को गंभीरता से लेते हुए आईबी ने पहले भी उनकी सिक्योरिटी को लेकर अलर्ट जारी किया हुआ है।

इससे पहले भी सीएम योगी आदित्यनाथ को यूपी पुलिस की इमरजेंसी सर्विस यूपी 112 के व्हाट्सएप नंबर पर संदेश भेजकर बम से उड़ाने की धमकी दी गई थी। इसके बाद महाराष्ट्र एटीएस ने कार्रवाई करते हुए मुंबई निवासी 25 वर्षीय आरोपित कामरान को गिरफ्तार किया था, जो कि इस समय उत्तर प्रदेश पुलिस की एसटीएफ की हिरासत में है।

महाराष्ट्र एटीएस ने मुंबई के चूनाभट्टी इलाके के निवासी कामरान खान को एटीएस की कालाचौकी इकाई ने गिरफ्तार किया था। इतना ही नहीं कामरान की गिरफ्तारी के बाद भी लखनऊ पुलिस को एक धमकी भरी कॉल आई थी, जिसमें कहा गया था, “जिसे गिरफ्तार किया है, उसे छोड़ दो वरना अंजाम भुगतना पड़ेगा।”

पूछताछ में आरोपित कामरान ने बताया था कि उसे योगी आदित्यनाथ को धमकी देने के बदले एक करोड़ रुपये देने का वादा किया गया था। हालाँकि कामरान ने यह नहीं बताया था कि उसे पैसों का ऑफर किसने दिया था।

J&K प्रशासन ने सरपंच अजय पंडिता के परिवार को दी ₹20 लाख की अनुग्रह राशि, 14 जून को देशभर में प्रदर्शन की अपील

दक्षिण कश्मीर में 8 जून को आतंकवादियों के हाथों मारे गए सरपंच अजय पंडिता भारती के परिवार को जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने गुरुवार (11 जून, 2020) को 20 लाख रुपए की अनुग्रह राशि प्रदान की है।

रिपोर्ट्स के अनुसार जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल गिरीश चंद्र मुर्मू ने अजय पंडिता भारती के परिवार के सदस्यों के साथ मुलाकात की और उनके प्रति अपनी गहरी संवेदनाएँ व्यक्त की।

उपराज्यपाल ने अजय पंडिता को श्रद्धांजलि भी अर्पित किया और कहा कि उनके द्वारा दिए गए सर्वोच्च बलिदान को हमेशा याद रखा जाएगा और उम्मीद जताई कि इस तरह के नृशंस कृत्य के अपराधियों को मानवता के खिलाफ अपने अपराध का एहसास होगा।

जम्मू-कश्मीर सरकार की तरफ से पूर्ण समर्थन का आश्वासन देते हुए, उपराज्यपाल ने वीरगति को प्राप्त सरपंच के परिवार को अनुग्रह राहत राशि प्रदान की। 20 लाख के राहत राशि में 5 लाख रुपए सिक्योरिटी रिलेटेड एक्सपेंडिचर से, 1 लाख रुपए प्रदेश (जम्मू) सरकार की तरफ से, 4 लाख रुपए उपराज्यपाल के रिलीफ फंड की तरफ से और 10 लाख रुपए पंचायत वेलफेयर फंड की तरफ से शामिल है।

कश्मीरी पंडित की हत्या को लेकर प्रदर्शन

वहीं सरपंच अजय पंडिता भारती की हत्या को लेकर कपिल मिश्रा ने इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ 14 जून को देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले हिंदुओ से सोशल डिस्टेंसिग को मद्देनजर रखते हुए इतिहास के सबसे बड़े वर्ल्डवाइड प्रोटेस्ट करने का आह्वान किया है।

उन्होंने कहा सभी लोग अपनी सुविधा अनुसार इस्लामिक आतंकवाद के विरोध में फ़ोटो, वीडियो, ऑडियो या संदेश वाले प्लेकार्ड के साथ सोशल मीडिया में अपनी फ़ोटो, शहर और देश के नाम के साथ पोस्ट और शेयर करने की बात की है।

साथ ही उन्होंने इस प्रदर्शन में एकजुटता की मिशाल पेश करने के लिए #HinduUnitedAgainstTerror लिख कर सोशल मीडिया पर ट्रेंड कराने की बात भी कहीं हैं। और लोगों को ये संदेश दिया है कि अब हम चुप नहीं बैठेंगे।

आतंकवादियों द्वारा अजय पंडिता भारती की हत्या

बता दें, जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के लोकभवन लरकीपोरा में सरपंच अजय पंडिता की गोली मारकर हत्या की गई थी। पुलिस ने घटना के बारे में जानकारी देते हुए बताया था कि सोमवार (08 जून, 2020) की शाम करीब 6 बजे कुछ आतंकवादियों ने 40 वर्षीय सरपंच अजय पंडिता उर्फ भारती को गोली मार दी।

घटना को अंजाम देकर आतंकवादी मौके से फरार हो गए थे। घटना को उस समय अंजाम दिया गया था कि जब सरपंच अपने बागान में गए थे। आस-पास के लोगों ने पंडिता को नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। अजय पंडिता कॉन्ग्रेस से जुड़े हुए थे और लुकबावन इलाके के सरपंच थे।

ओडिशा: महानदी में 11 साल बाद उभरा 500 वर्ष पुराना गोपीनाथ मंदिर, देखने को जुटी भीड़

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के नयागढ़ जिले में महानदी के जल में 500 साल पुराने गोपीनाथ मंदिर के अवशेष दिखाई दिए हैं। कहा जा रहा है इससे पहले यह मंदिर 11 साल पहले नजर आया था। इसके बाद इसके अग्र भाग के दर्शन पानी का स्तर कम होने से अब फिर हुए हैं। इसे देखने के लिए पद्मवती गाँव के पास काफी संख्या में लोग पहुॅंचे।

बता दें, नयागढ़ जिल में यह खोज INTACH की महानदी वैली हेरिटेज साइट्स डॉक्यूमेंटेशन प्रोजेक्ट का हिस्सा है। प्रोजेक्ट असिस्टेंट दीपक कुमार नायक ने ऐतिहासिक धरोहरों के बारे में रूचि रखने वाले रवीन्द्र कुमार राणा की मदद से इस साइट का मुआयना किया और बताया कि गोपीनाथ मंदिर भगवान श्रीकृष्ण का ही मंदिर था।

फेसबुक पोस्ट में दीपक कुमार नायक ने इस मंदिर को प्रोजेक्ट में शामिल करने तक की पूरी कहानी साझा की है। उन्होंने बताया कि अतीत में पद्मवती गाँव सतपतना का हिस्सा था। यानी 7 गाँव का गठजोड़। 19 वीं शताब्दी में नदी के स्तर में भारी बदलाव आने के कारण यहाँ के लोग ऊँचे स्थानों पर जा बसे। इस दौरान ग्रामीणों ने न केवल खुद के स्थान को बदला, अपितु मंदिर के देवताओं को भी अपने साथ ले गए।

स्थानीय लोगों के मुताबिक, उस जगह करीब 22 मंदिर थे। जो पानी का स्तर बढ़ने के बाद नदी में विलीन हो गए। गोपीनाथ मंदिर का अग्र भाग पानी का स्तर कम होने पर इसलिए दिखाई देता है, क्योंकि यह उस समय का समय बड़ा मंदिर था। लोग बताते हैं कि इससे पूर्व भगवान गोपीनाथ मंदिर के मस्तक के दर्शन 11 वर्ष पूर्व हुए थे। पर तब यह बहुत कम समय के लिए उभरा था। लेकिन, पिछले एक साल में इसके दर्शन 4-5 बार हुए हैं।

दीपक कुमार नायक के अनुसार, तीन महीने पहले उन्हें उनके मित्र रवींद्र राणा ने कॉल करके इस बारे में बताया था। इससे पहले उन्हें संबलपुर में कुछ नदीजल में लीन हुए मंदिर के बारे में पता था लेकिन महानदी घाटी के निचले-मध्य क्षेत्र में जलमग्न मंदिर के बारे में सुनना उनके लिए एक असाधारण बात थी। बस फिर क्या? इसके बाद उन्होंने अपने प्रोजेक्ट कॉर्डिनेटर को इस संबंध में बताया और उन्होंने इसे अपने अभियान “Mahanadi Valley Heritage Sites Documentation” का हिस्सा बनाया।

दीपक के अनुसार, अनिल धीर, उनकी बातें सुनकर और स्पॉट पर जाने को तैयार हुए और उन्होंने 3 तीन दिन के अंदर जाकर इस जगह का मुआयना करने का मन बनाया। लेकिन कोविड-19 के कारण उनका प्लान चौपट हो गया। पर, जैसे ही कुछ दिन पहले लॉकडाउन खत्म हुआ, वह फौरन जगह पर गए। लेकिन करीब तीन बार उन्हें मंदिर जल के अंदर मिला।

दीपक कहते हैं कि उन्होंने हर बार कोशिशों के असफल होने पर अपनी उम्मीद छोड़ दी थी कि वह शायद इस जगह को दस्तावेजों में न शामिल कर पाएँ। लेकिन 7 जून को अचानक उनके मित्र राणा बाबू ने उन्हें बताया कि मंदिर का ऊपरी भाग अब नदी में कुछ दिनों से दिखने लगा है। यह सुनते ही दीपक ने अपने वरिष्ठ अनिल धीर को इस बारे में बताया। लेकिन दुर्भाग्यवश उस समय अनिल उनके साथ साइट पर नहीं जा पाए।

अगली सुबह 7 बजे दीपक बैदेश्वर पहुँचे। इसके बाद उन्होंने पद्मवती गाँव जाने का सफर अपने मित्र राणा के साथ नाव के जरिए तय किया। करीब 10 मिनट बाद वह मंदिर के अग्र भाग के पास थे। मंदिर का मस्तक उन्हें स्पष्ट दिख रहा था। उन्होंने इस दौरान तस्वीर खींचकर कई प्रमाण लेने का प्रयास किया। लेकिन नदी का वेग ऐसा था कि यह सब असंभव लगने लगा।

इस बीच उनके साथ नौका में आए, बालुंकेश्वर मंदिर के पुजारी ने नदी के अग्र भाग पर कूदकर नाव को स्थिर किया और वह कुछ तस्वीर खींच पाए। बता दें सोशल मीडिया पर गोपीनाथ मंदिर की यही तस्वीरें इस समय वायरल हो रही हैं।

दीपक के अनुसार, पद्मवती गाँव में वर्तमान में स्थित गोपीनाथ मंदिर में जल में विलीन मंदिर की असली मूर्ति विद्यमान है। इसके अलावा प्रोजेक्ट असिस्टेंट दीपक कहते हैं कि गोपीनाथ मंदिर को बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला पत्थर वहीं लग रहा है जिनका प्रयोग 15वी व 16वीं शताब्दी में मंदिरों को बनाने के लिए किया जाता था।

उन्होंने बताया जब यह यह क्षेत्र पानी में विलीन हुआ, उस समय वहाँ कई देवता थे जिन्हें स्थानांतरित कर दिया गया था। उनमें से गोपीनाथ, नृसिंह, रास बिहारी, कामना देवी और दधिभमण उल्लेखनीय थे। जिन्हें आज भी निकटवर्ती टिकरीपाड़ा गाँव और पद्मवती गाँव में पूजा जाता है।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक पद्मावती ग्रामवासी सनातन साहू ने कहा है कि सन् 1933 में हमारा गाँव सम्पूर्ण रूप से नदी में विलीन हो गया था। उस समय हमारी उम्र 6 साल थी। हम पाँच भाई-बहनों ने पद्मवती यूपी स्कूल में शरण ली थी। उस साल बाढ़ आने के साथ नदी गतिपथ बदलकर हम सबके लिए काल बन गई थी।

INTACH की कोशिशों पर प्रोजेक्ट सचिव अनिल धीर

इस मंदिर के संबंध में और अपने प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी देते हुए महानदी प्रोजेक्ट के प्रमुख अनिल धीर ने कहा कि इंडियन नेशनल ट्रस्ट फार आर्ट एण्ड कल्चरल हेरिटेज (इनटाक) की तरफ से डॉक्यूमेंटेशन ऑफ दि हेरिटेज आफ दि महानदी रिवर वैली प्रोजेक्ट शुरू किया गया है।

छत्तीसगढ़ से महानदी के निकलने वाले स्थान से जगतसिंहपुर जिले के पारादीप तक 1700 किमी. (दोनों तरफ) के किनारे से 5 से 7 किमी. के बीच सभी पुरानी कीर्तियों की पहचान की जाएगी। इन तमाम सामग्रियों की रिकार्डिंग की जा रही है। फरवरी महीने में इसकी सूची प्रकाशित की जाएगी।

धीर ने कहा है कि ओडिशा में ऐसे बहुत से मंदिर हैं जो पानी में डूबे हुए हैं। इसमें हीराकुद जलभंडार में 65 मंदिर शामिल हैं। नदियों में भी बहुत से मंदिर समाहित हैं, जिनका सर्वे होना चाहिए। कुछ मंदिर अभी भी खड़े हैं और कुछ ढह गए हैं। मॉडल के तौर पर गोपीनाथ मंदिर को पुन: महानदी से निकालकर जमीन में स्थापित किया जाना चाहिए। 

कोरोना युद्ध में सैनिकों को नहीं रख सकते दुखी: डॉक्टरों को सैलरी नहीं मिलने पर SC

देश में जारी कोरोना संकट के दौरान डॉक्टरों को सैलरी नहीं देने या फिर कम देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से लेते हुए सरकार को दिशा निर्देश जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि युद्ध के दौरान अपने सैनिकों को दुखी नहीं रख सकते। इतना ही नहीं उनकी समस्याओं को दूर करने के लिए उन्हें अतिरिक्त रुपए भी दिए जाने चाहिए।

शुक्रवार (12 जून, 2020) को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अशोक भूषण, एसके कौल और एमआर शाह की बेंच ने कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रहे डॉक्टरों को सैलरी न मिलने के मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर कोर्ट को शामिल नहीं होना चाहिए और सरकार को यह मुद्दा सुलझाना चाहिए।

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा युद्ध के समय आप अपने सैनिकों को नाखुश नहीं करते। कुछ इसी तरह कोरोना के खिलाफ लड़े जा रहे इस युद्ध में असंतुष्ट सैनिकों (डॉक्टरों) को परेशानी हो इसे देश बर्दाश्त नहीं कर सकता है। वहीं कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को अपनी शिकायत और सुझाव स्वास्थ्य मंत्रालय को भेजने के लिए भी कहा है।

केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अगर बेहतर सुझाव सामने आते हैं, तो उन्हें समायोजित किया जा सकता है। बेंच ने कहा कि ऐसी खबरें आ रही हैं कि कई डॉक्टरों को भुगतान नहीं किया जा रहा है।

बेंच ने कहा हमने कुछ रिपोर्ट देखी कि डॉक्टर हड़ताल पर चले गए। दिल्ली में कुछ डॉक्टरों को पिछले तीन महीनों से भुगतान नहीं किया गया है। यह चिंताजनक हैं जिनका ध्यान रखा जाना चाहिए। इसके लिए अदालत के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

कोर्ट की बेंच ने आगे कहा कि केन्द्र सरकार को इस संकट के बीच युद्ध लड़ रहे डॉक्टरों के लिए और अधिक करना चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उनकी समस्याओं का समाधान किया जाए।

दरअसल, एडवोकेट अमित साहनी ने कोविड-19 मरीजों के इलाज में लगे स्वास्थ्यकर्मियों को उचित वेतन और क्वारंटाइन की सुविधा उपलब्ध कराने का निर्देश देने की माँग की थी। साथ ही कहा था कि जो लोग इस संकट के बीच बिना थके, बिना हारे अपने परिवार व अपनी जान की परवाह किए बिना मरीजों का इलाज करने में लगे हुए हैं। ऐसे लोगों की दुर्दशा पर कोर्ट का तत्काल हस्तक्षेप आवश्यक है।

आपको बता दें कि कोरोना मरीजों के उपचार में लापरवाही और संक्रमण से मरे लोगों के शव के साथ दुर्व्यवहार पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। दिल्ली की केजरीवाल सरकार को फटकार लगाते हुए उससे जवाब भी मॉंगा है।

शीर्ष अदालत ने कहा है कि दिल्ली के अस्पतालों का बुरा हाल है। शवों के साथ अनुचित व्यवहार किया जा रहा है। कुछ शव कूड़े में मिले हैं। यह बताता है कि लोगों के साथ जानवरों से भी बदतर सलूक किया जा रहा है।

अमरोहा में दलित हत्या पर छाती पीटने वाले जौनपुर में दलितों के गाँव फूँके जाने पर चुप क्यों हैं?

मौके के हिसाब से संवेदनाओं का प्रदर्शन अब मीडिया गिरोह की पहचान बन चुका है। बीते दिनों उत्तर प्रदेश में दलितों से संबंधी दो घटनाएँ सामने आईं। एक में एक दलित युवक को गोली मारकर खत्म कर दिया गया और दूसरी घटना में दलितों के पूरे गाँव को आग के हवाले झोंक दिया गया। 

दलित युवक वाली घटना 6 जून की रात अमरोहा में घटी। घटना के प्रकाश में आते ही इसे मीडिया गिरोह ने तेजी से कवर किया। साथ ही प्रमुखता से खबरों की हेडलाइन में सवर्ण या अपर कास्ट जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया और ये बताया कि कुछ दिन पहले दलित युवक को सवर्णों ने मंदिर में जाने से भी रोका था।

हालाँकि, अमरोहा पुलिस ने पड़ताल के बाद इस एंगल को पूर्ण रूप से खारिज किया। इससे साफ हो गया कि मीडिया गिरोह ने सिर्फ़ अपना प्रोपेगेंडा चलाने के लिए झूठ फैलाया।

इसके बाद 9 जून को प्रदेश में दलितों पर हमले की एक बड़ी खबर सामने आई। जौनपुर जिले के सरायख्वाज़ा क्षेत्र के भदेठी गाँव में समुदाय विशेष के लोगों ने आम तोड़ने को लेकर शुरू विवाद पर इतना विकराल रूप धारण किया कि उन्होंने दलितों के इस गाँव में आग लगा दी और जमकर उत्पात भी मचाया। इस दौरान हवाई फायरिंग हुई। वाहनों को आग में झोंका गया। भैंस और बकरियों को राख कर दिया गया। लेकिन मीडिया गिरोह इस घटना पर चुप्पी साधे बैठा रहा।

अमरोहा मामले पर जिस सक्रियता से राणा अय्यूब जैसे कट्टरपंथी, दलित विचारक और उनके हितैषी बन बैठे थे। वह सभी इस घटना पर मौन हो गए। न किसी ने इस वाकये की निंदा की और न ही दलितों के भविष्य को लेकर अपनी चिंता जाहिर की।

कारण शायद सिर्फ़ एक ही था कि अमरोहा में आरोपित सवर्ण निकल आया था, जो इनके एजेंडे के लिए फिट था। लेकिन जौनपुर में एक तो उपद्रवी भीड़ ही समुदाय विशेष से थी और दूसरा मास्टरमाइंड जावेद सिद्दीकी पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का बेहद करीबी था। तो आखिर कैसे कोई इसपर अपनी राय रखता?

बता दें, हर मामले पर निष्पक्ष पत्रकारिता के झूठे दावे करने वाले वामपंथी मीडिया पोर्टल इस मामले में न तो अपने विचार प्रकट कर रहे है, और न ही देश में लोकतंत्र को बचाने की दुहाई देने आरफा खान्नम शेरवानी जैसी पत्रकार कुछ बोल रही हैं।

दलितों पर हुए इस बर्बरता पर प्रिंट का भी अभी तक कोई लेख सामने नहीं आया है और न ही दलितों के नाम पर अपना पूरा करियर बनाने वाले दीलीप सी मंंडल ने इस घटना का आँकलन किया है।

द वायर, जिसे पिछले दिनों कई मुद्दों पर अपनी रिपोर्टिंग के लिए लताड़ लगी, वह इस मामले को केवल आपसी विवाद का मामला बताता है।

हाँ, दिलीप सी मंडल ने हिप्पोक्रेसी की सीमा लाँघते हुए एक ट्वीट जरूर किया है। इसमें उन्होंने अपने दलित विचारक होने के साथ-साथ मुस्लिम प्रेम को बरकरार रखा है। उन्होंने अपने ट्वीट में आरोपितों के ख़िलाफ़ अपनी स्पष्ट राय रखने की जगह देश की जनसंख्या को जिम्मेदार ठहराया है और न्याय व प्रशासन पर ठीकरा फोड़ दिया है।

उन्होंने लिखा, “देश में 130 करोड़ लोग हैं। आपसी झगड़े, हिंसा, हत्याएँ तो होंगी। सवाल ये है कि ऐसी घटनाओं पर पुलिस-प्रशासन और न्यायपालिका का रुख क्या है। इसी के आधार पर तय होगा कि कोई सरकार न्यायप्रिय है या जुल्मी। इस कसौटी पर यूपी की सरकार कुछ जातियों के पक्ष में झुकी नजर आती है।”

खुद सोचिए, दिलीप सी मंडल जैसे बुद्धिजीवि आज आखिर क्यों न्याय प्रशासन की बात कर रहे हैं? क्यों यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि देश की जनसंख्या इतनी अधिक है कि अपराध और हत्याएँ तो होगीं ही? ये वही लोग हैं जो सवर्णों के आरोपित होते ही उनकी जाति को मुख्य रूप से उजागर करते हैं और ऐसी हाय-तौबा मचा देते हैं कि किसी व्यक्ति विशेष को सवर्णों से घृणा ही हो जाए या वह देश में नागरिक को मिलने वाले मौलिक अधिकारों पर ही सवाल उठा दे?

ऐसा लगता है कि दलित उत्थान गिरोह विशेष के लिए टीआरपी बटोरने का शब्द मात्र है। इसके नाम पर ​दिलीप मंडल जैसे लोग खुद को बुद्धिजीवी के रूप में स्थापित करते हैं।

जौनपुर की घटना ने दलित हितैषी कथित बुद्धिजीवियों को ही नंगा नहीं किया है। मीडिया गिरोह, वामपंथी दलित विचारकों के अलावा अखिलेश यादव, उदित राज, मायावती, चंद्रशेखर जैसे कथित दलित हितैषी नेताओं की भी पोल खोलकर कर दी है। वे भी मौन हैं क्योंकि इस मामले में आरोपित न तो सवर्ण है और न ही बीजेपी से उनका कोई कनेक्शन। जय भीम-जय मीम के नाम पर दलितों के साथ होने वाले छलावे को यह मामला बेनकाव करता है। इसलिए सबने चुप्पी साध रखी है।

दोनों घटनाओं पर इनकी प्रतिक्रियाओं का अंतर यह भी बताता है कि कैसे मौकापरस्त गिरोह हमारे सामने किसी भी मामले को अपने एजेंडे के अनुसार पेश करता है। अपने नजरिए को ही अंतिम सत्य बताकर हम पर थोपने की कोशिश करता है।

वहीं, योगी सरकार, जिसे हमेशा ब्राह्मणवाद का चेहरा बताया जाता है वह दलितों के ख़िलाफ़ हुई क्रूरता पर फौरन एक्शन में आती है और आरोपितों के ख़िलाफ़ रासुका के तहत कार्रवाई के आदेश देती है। साथ ही पीड़ितों को न्याय दिलाने की हरसंभव कोशिश करती है।

लेकिन सेकुलरिज्म को कथित खेवनहार मौन हैं। बोल भी रहे तो इस सावधानी से कि कोई दलितों पर बर्बरता के लिए समुदाय विशेष पर ऊँगली न उठा सके।

दलित लड़कियों से करते थे छेड़खानी, टोका तो मुस्लिमों ने बस्ती पर किया हमला: NSA के तहत कार्रवाई, थाना प्रभारी सस्पेंड

आजमगढ़ जिले में दलित बस्ती पर हमले के मामले को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सख्ती दिखाई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार आरोपितों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही महराजगंज के थाना प्रभारी को सस्पेंड कर दिया गया है।

घटना 10 जून की है। आजमगढ़ जिले के महाराजगंज थाना क्षेत्र के सिकंदरपुर आयमा गाँव में मुस्लिमों के एक समूह ने दलित बस्ती पर धारदार हथियारों से हमला कर दिया था। घटना में 12 से अधिक लोग घायल हो गए थे।

इस मामले में परवेज, फैजान, नूरआलम, सदरे आलम समेत 12 आरोपित गिरफ्तार किए जा चुके हैं। सीएम ने एसपी प्रो. त्रिवेणी सिंह को मामले में सख्ती से कार्यवाही नहीं करने पर फटकार लगाई है। इसके बाद एसपी ने महराजगंज थानाध्यक्ष इंस्पेक्टर अरविंद पांडेय को निलंबित कर दिया। मामले में फरार चल रहे सात आरोपितों पर 25-25 हजार रुपए का इनाम घोषित किया गया है।

लगातार हो रही इस तरह की घटना को मद्देनजर रखते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ के स्पष्ट निर्देश है कि अगर कही पर भी सांप्रदायिक या जातीय घटना हुई तो इंस्पेक्टर के साथ सीओ के खिलाफ कार्रवाई होगी और एसपी-एसएसपी के खिलाफ की भी जवाबदेही होगी। राज्य में ऐसी किसी भी घटना को लेकर सीएम ने पुलिस के आला-अधिकारियों से सख्ती से पेश आने को कहा है।

दैनिक जागरण के अनुसार आरोपित ट्यूबेल पर पानी लेने के लिए जाने वाली दलित लड़कियों से छेड़खानी करते थे। 10 जून को भी छेड़खानी की घटना हुई थी। इसी बात पर विवाद हो गया। इसके बाद समुदाय विशेष के लोगों ने दलित बस्ती पर हमला कर दिया।

इस दौरान लाठी-डंडों के साथ धारदार हथियारों से लैस आरोपितों ने घर में मौजूद महिलाओं और बच्चों के साथ भी मारपीट की और फिर वहाँ से फरार हो गए। दो समुदाय के बीच हुए विवाद की सूचना मिलते ही महाराजगंज थाना सहित कई थानों की पुलिस फोर्स मौके पर पहुँची थी। इस मामले में पीड़ित पक्ष के विनोद की तहरीर पर पुलिस ने परवेज, फैजान, नूरआलम, सदरे आलम, आरिफ, आमीर, आशीफ, अल्तमस, सुहेल के अलावा 10 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था।

इससे पहले जौनपुर जिले के सरायख्वाजा थाना क्षेत्र के गाँव भदेठी में मंगलवार (9 जून, 2020) को शहबाज नामक लड़के का दलित बस्ती के बच्चों से बकरियाँ चराने को लेकर विवाद हो गया था। इसके बाद दोनों समुदाय के लोगों में दिन में कहासुनी हो गई। देर रात में मुस्लिम पक्ष के सैकड़ों लोगों ने मिलकर लाठी-डंडों से लैस दलित बस्ती में हमला बोल दिया था और कई घरों को आग के हवाले कर दिया था। इस मामले में भी सीएम योगी ने आरोपितों के खिलाफ एनएसए के तहत कार्रवाई करने का आदेश दिए थे।

आदिवासियों को भड़काने वाले आकार पटेल का ट्विटर एकाउंट ‘सस्पेंड’, बचाव में उतरे राजदीप सरदेसाई

भारत में समुदाय विशेष, महिलाओं, और आदिवासियों को ‘दुनिया को नोटिस’ करने के लिए ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ विरोध प्रदर्शन की तरह विरोध करने का आग्रह कर उन्हें भड़काने वाले एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के पूर्व कार्यकारी निदेशक आकार पटेल का ट्विटर एकाउंट ‘इंडिया’ के लिए सस्पेंड (विदस्टैंड) कर दिया गया है।

इस पर राजदीप सरदेसाई आकार पटेल के बचाव में उतर गए हैं। राजदीप ने आकार पटेल के अकाउंट सस्पेंड होने पर ट्वीट किया है, जिसमें उन्होंने लिखा है – “

“ट्विटर एक अजीब हालात में: यह पूर्व एमनेस्टी प्रमुख और पत्रकार आकार पटेल को ब्लॉक करता है, लेकिन अपमानजनक अनाम हैंडल को सांप्रदायिक जहर उगलना जारी रखने की अनुमति देगा.. एक स्पष्ट पारदर्शी नीति की आवश्यकता है।

आकार पटेल का ट्विटर अकाउंट सस्पेंड होने के बाद –

अकाउंट ब्लॉक होने से पहले का स्क्रीनशॉट

भड़काऊ ट्वीट करने के बाद पत्रकार और एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक आकार पटेल के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी। उनके खिलाफ में बेंगलुरु के जेसी नगर पुलिस स्टेशन के पुलिस इंस्पेक्टर नागराजा डीआर द्वारा मुकदमा दर्ज कराया गया है।

इसमें पटेल पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने पूरे भारत में अमेरिका की तरह के विरोध-प्रदर्शन आयोजित करने के लिए अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को भड़काने और उकसाने की कोशिश की।

दरअसल, 31 मई को आकार पटेल ने ‘कोलोराडो टाइम्स रिकॉर्डर’ के एक ट्वीट के हवाले से एक ट्वीट किया था, जिसमें अमेरिका में विरोध-प्रदर्शन कर रहे लोगों का एक वीडियो शेयर किया गया था। इस वीडियो के साथ ट्वीट में आकार पटेल ने लिखा था कि भारत के खास समुदाय, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और गरीबों को भी इनकी तरह विरोध-प्रदर्शन करने की आवश्यकता है। इसे दुनिया देखेगी। प्रदर्शन करना भी एक कला है।

भड़काऊ ट्वीट के कारण FIR हो चुकी है दर्ज

आकार पटेल के खिलाफ आईपीसी की धारा 505 (1)(बी), धारा 153 (दंगा भड़काने के इरादे से गलत तरीके से उकसाना) और धारा 117 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

पुलिस अधिकारियों ने कहा है कि साइबर क्राइम पुलिस और राज्य के खुफिया अधिकारी अमेरिका में हिंसक विरोध प्रदर्शन में लिप्त लोगों की प्रतिक्रियाओं पर नजर रखे हुए हैं। एक अधिकारी ने कहा कि वह मामले की जाँच में जुटे हुए हैं।

आकार पटेल ने ‘कोलाराडो टाइम्स रिकॉर्डर’ का एक वीडियो क्लिप पोस्ट किया था जिसमें दिख रहा है कि हज़ारों लोग कोलाराडो के कैपिटोल बिल्डिंग के पास अश्वेत अमरीकी नागरिक जॉर्ज फ़्लॉयड की हत्या के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं।

हालाँकि, आकार पटेल द्वारा पोस्ट किए गए वीडियो में एक शांतिपूर्ण विरोध दिखाया गया था। लेकिन अमेरिका में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों में हिंसा, दंगा, आगजनी और लूटपाट जमकर हुई है। आपको बता दें कि मिनियापोलिस में एक श्वेत पुलिस अधिकारी द्वारा अफ्रीकी अमेरिकी जॉर्ज फ्लॉयड की कथित हत्या के बाद बड़े स्तर पर विरोध-प्रदर्शन हुए, लेकिन बाद में ये हिंसा और दंगों में तब्दील हो गए।

इतना ही नहीं प्रदर्शनकारियों ने पुलिस टीमों पर भी हमला किया है। ऐतिहासिक स्थानों सहित पुलिस वाहनों को निशाना बनाते हुए उग्र प्रदर्शनकारियों ने दुकानों को लूटा और कई घरों व सार्वजनिक संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया।

इसके बाद से भारत में वाम उदारवादी समुदाय से इसी तरह के हिंसक विरोध-प्रदर्शनों का आह्वान कर रहे हैं। इसे देखते हुए अमेरिका में हुई हिंसा की तर्ज पर भारत में हिंसा को उकसाने वाली पोस्टों को लेकर सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क हो गई हैं।

अपने खिलाफ दर्ज मुकदमे पर प्रतिक्रिया देते हुए आकर पटेल ने डेक्कन हेराल्ड को बताया कि मुझे नहीं लगता कि यह मामला दर्ज किया जाना चाहिए था। मुझे नहीं लगता इस केस में कुछ आगे हो सकेगा।

नेपाली सुरक्षा बलों की फायरिंग में 1 भारतीय की मौत, हिरासत में लिए गए व्यक्ति की रिहाई की कोशिशें जारी

बिहार के सीतामढ़ी जिले से सटे नेपाल सीमा पर गोलीबारी में एक की मौत हो गई और तीन अन्य जख्मी हो गए। घटना शुक्रवार (12 जून 2020) की है। नेपाली सुरक्षा बलों ने 15 राउंड फायरिंग की।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सोनबरसा थाना क्षेत्र के पिपरा परसाइन पंचायत अंतर्गत लालबदी स्थित जानकी नगर गाँव में कुछ मजदूर खेत में काम कर रहे थे कि अचानक नेपाली सुरक्षा बलों ने फायरिंग कर दी। इसमें नागेश्वर राय के 25 वर्षीय पुत्र डिकेश कुमार की मौत हो गई।

सशस्त्र सीमा बल (SSB) के डीजी कुमार राजेश चंद्रा के अनुसार सुबह 8:40 मिनट पर पर एक परिवार नेपाल जा रहा था। नेपाली सुरक्षा बलों ने उन्हें रोका और वापस जाने को कहा। इस दौरान कहासुनी हो गई। नेपाली सुरक्षा बलों ने 15 राउंड फायरिंग की जिसमें तीन लोग जख्मी हो गए।

उन्होंने बताया कि एक नागरिक को नेपाली सुरक्षा बलों ने हिरासत में भी लिया है। उसकी रिहाई के लिए बातचीत की जा रही है। सब कुछ सीमा पर नेपाल के हिस्से में हुआ।

विनोद राम के पुत्र उमेश राम के दाहिना हाथ में तो सहोरबा निवासी बिंदेश्वर ठाकुर के पुत्र उदय ठाकुर को दाएं जाँघ में गोली लगी है। घायल भारतीय नागरिकों का सीतामढ़ी के निजी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया है।

स्थानीय लोगों के अनुसार नेपाली सुरक्षा बलों ने गाँव के वशिष्ठ राय के पुत्र लगन राय को अपने कब्जे में भी ले रखा है। उसको गोली का लगी हैं या नहीं, इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है। भारत-नेपाल सीमा पर इस तरह की यह पहली घटना करार दी जा रही है।

निर्दोष भारतीय नागरिकों पर नेपाल पुलिस द्वारा गोली चलने के बाद भारत-नेपाल की बिहार से लगती सीमा पर भारतीय एसएसबी और स्थानीय पुलिस लालबंदी की तैनाती कर दी गईं हैं। मामले को लेकर जाँच के भी आदेश दे दिए गए हैं।

बता दें कि हाल ही में नेपाल ने 18 मई को नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था। इसमें कालापानी, लिपुलेख और लिमिपियाधुरा को अपने क्षेत्र के रूप में दिखाया था। नेपाल ने अपने नक़्शे में कुल 335 वर्ग किलोमीटर के इलाके को शामिल किया था। इसके बाद 22 मई को संसद में संविधान संशोधन का प्रस्ताव पेश किया था।

गौरतलब है कि नेपाल सरकार द्वारा लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को अपने नए राजनीतिक नक़्शे में दिखाने पर भारत सरकार की कड़ी प्रतिक्रिया दी थी। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा था कि देश के किसी क्षेत्र पर इस तरह के दावे को भारत द्वारा नहीं स्वीकार किया जाएगा। भारतीय विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि नेपाल सरकार ने जो आधिकारिक नक़्शा जारी किया है उसमें भारतीय क्षेत्र को नेपाल में दिखाया गया है, ये एकतरफ़ा हरकत ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं है। इसका भारत विरोध करता है।

वहीं जनता समाजवादी पार्टी की सांसद सरिता गिरि ने नेपाल सरकार द्वारा नए नक्शे को संविधान का हिस्सा बनाने के लिए लाए गए संविधान संशोधन प्रस्ताव पर अपना अलग से संशोधन प्रस्ताव लाते हुए उन्होंने इसे इस विवादित संविधान संशोधन को खारिज करने की माँग की थी। वहीं, उनकी पार्टी ने उनको तुरंत अपना यह संशोधन प्रस्ताव वापस लेने का सख्त निर्देश दिया। लेकिन, सरिता गिरी ने साफ-साफ कहा था कि चीन के इशारों पर नेपाल सरकार नक्शे में बदलाव करना चाहती है।

सरिता गिरि ने ये भी दावा किया था कि नेपाल की जनता भी नहीं चाहती है कि नक्शे को लेकर भारत के साथ कोई विवाद हो। उनकी राय थी कि नेपाल का नया नक्शा जारी करने से पहले नेपाल को भारत से बातचीत करनी चाहिए थी।

‘लोगों के साथ जानवरों से भी बदतर सलूक’: दिल्ली में कोरोना पर SC सख्त, केजरीवाल सरकार को फटकारा

कोरोना मरीजों के उपचार में लापरवाही और संक्रमण से मरे लोगों के शव के साथ दुर्व्यवहार पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। दिल्ली की केजरीवाल सरकार को फटकार लगाते हुए उससे जवाब मॉंगा है।

शीर्ष अदालत ने कहा है कि दिल्ली के अस्पतालों का बुरा हाल है। शवों के साथ अनुचित व्यवहार किया जा रहा है। कुछ शव कूड़े में मिले हैं। यह बताता है कि लोगों के साथ जानवरों से भी बदतर सलूक किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली के सरकारी अस्पताल शवों का तरीके से रखरखाव नहीं कर रहे। कोरोना संक्रमितों की मौत के बाद उनके परिजनों को सूचना नहीं दी जा रही। कुछ मामलों में परिजन अपनों के अंतिम संस्कार में शामिल तक नहीं हो पाए। दिल्ली के लोकनायक जयप्रकाश हॉस्पिटल (LNJP) की स्थिति को गंभीरता से लेते हुए अदालत ने उससे भी जवाब तलब किया है।

जस्टिस एमआर शाह ने कहा, “लाशें किस तरह से रखी जा रही हैं? ये क्या हो रहा है? अगर लाशों के साथ ऐसा सलूक हो रहा है, अगर लाशें कचरे के ढेर में मिल रही हैं तो यह इंसानों के साथ जानवरों से भी बदतर सलूक है।”

शीर्ष अदालत ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमआर शाह की पीठ को सौंपा था। शुक्रवार (12 जून, 2020) को पीठ ने शव के रखरखाव के तरीके पर दिल्ली सरकार पर सख्त टिप्पणी की। कहा कि होम मिनिस्ट्री की गाइडलाइंस का अनुपालन नहीं हो रहा है। अस्पताल डेड बॉडी का सही तरह से रखरखाव और निपटारा नहीं कर रहे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमें शवों से ज्यादा जिंदा मरीजों की चिंता है। उनकी भी काफी दुर्दशा हो रही है, उन्हें शवों के साथ रहना पड़ रहा है, यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में कोरोना टेस्ट की संख्या कम करने पर भी चिंता जताई। कहा कि सरकारी अस्पताल में बेड खाली पड़े हैं, लेकिन लोगों को मरीजों को लेकर इधर-उधर भागना पड़ रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के अलावा महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल को भी इस मामले में नोटिस जारी किया है। इन राज्यों के मुख्य सचिव से कोरोना संक्रमितों के उपचार की स्थिति को लेकर रिपोर्ट मॉंगी गई है। मामले की अगली सुनवाई बुधवार को होगी। शीर्ष अदालत ने संक्रमितों की मौत के बाद उनके शव रखरखाब को लेकर आई मीडिया रिपोर्टों के बाद इस मामले पर संज्ञान लिया था।

फैक्ट चेक: UP में 3 दलितों के साथ मारपीट, सिर मुँड़वा कर गाँव में घुमाया, क्विंट सहित मीडिया गिरोह ने फैलाया झूठ, जानिए सच

सवर्णों द्वारा अनुसूचित जाति के लोगों पर अत्याचार की झूठी और भ्रामक ख़बरें आजकल सोशल मीडिया ही नहीं बल्कि मुख्यधारा की मीडिया में भी आम होती नजर आ रही हैं। हाल ही में एक झूठी खबर में यह साबित करने का प्रयास किया गया था कि अमरोहा में एक युवक को दलित होने के कारण मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया और उसे गोली मार दी गई और अब एक नए प्रकरण में भी दलितों पर ‘ऊँची जाति’ वालों द्वारा अत्याचार का नैरेटिव बनाने के लिए झूठी खबर प्रकाशित की जा रही हैं।

कुछ ऐसी रिपोर्ट्स सामने आई हैं, जिनमें दावा किया गया कि लखनऊ के बरौली खलीलाबाद गाँव में गत 04 जून को एक ब्राह्मण व्यक्ति के घर से चोरी करते पकड़े जाने के बाद तीन दलितों को बाँधकर पीटा गया, उनके साथ बदसलूकी की गई और उनके गले में ‘जूतों की माला’ पहनाकर उनकी परेड करवाई गई।

प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘द क्विंट’ की एक रिपोर्ट को शेयर करते हुए कुछ चिरपरिचित एजेंडाबाजों ने ‘दलित लाइव्स मैटर’ (Dalit Lives Matter) हैशटैग के साथ इस झूठी खबर को शेयर करना शुरू किया। ऐसा करने वालों में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण सबसे पहले व्यक्ति थे।

एक कदम आगे जाते हुए कश्मीरी पत्रकार रकीब हमीद नाइक, जो ‘द वायर’ और ‘द कारवां’ जैसे वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट्स के लिए भी लिखते हैं, ने यह भी दावा किया कि COVID -19 के बीच जारी लॉकडाउन के दौरान दलितों के खिलाफ ऊँची-जाति की क्रूरता में अचानक उछाल आया है।

इसके बाद ‘द क्विंट’ की इस तथाकथित रिपोर्ट को कई अन्य लोगों द्वारा भी शेयर किया गया। ‘द क्विंट’ में 11 जून को प्रकाशित इस सनसनीखेज लेख का शीर्षक है – “UP में 3 दलितों के साथ मारपीट, सिर मुँड़वा कर गाँव में घुमाया।”

क्या कहती है ‘द क्विंट’ की झूठी रिपोर्ट

‘द क्विंट’ की इस रिपोर्ट में लिखा है – “उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में तीन दलित लोगों के साथ मारपीट की खबर सामने आई है। तीनों के साथ मारपीट की गई, जबरन सिर मुँड़वा दिया गया और गले में जूते टाँगगकर उन्हें घुमाया गया। ये घटना लखनऊ के बरौली खलिलाबाद गाँव में 4 जून की बताई जा रही है।”

PGI पुलिस स्टेशन इंचार्ज केके मिश्रा के हवाले से ‘द क्विंट’ ने लिखा – “तीन दलित लोगों को कथित तौर पर एक ब्राह्मण शख्स के घर से पंखा चुराते हुए देखा गया। परिवार के तीन लोगों को पकड़ने के बाद, गाँव के और लोग भी इकट्ठा हो गए और फिर भीड़ ने उन्हें पीटना शुरू कर दिया। उन्हें और अपमानित करने के लिए, उन्होंने उनका सिर मुँडवा दिया और गले में चप्पलें टाँगकर उन्हें गाँव में घुमाया।”

इस खबर को जातिवादी स्वरुप देकर अन्य समाचार स्रोतों ने भी इसे प्रकाशित किया है।

पुलिस ने स्पष्ट किया कि इस घटना में कोई जातिगत एंगल था ही नहीं

हालाँकि, अमरोहा की घटना की तरह ही ‘द क्विंट’ के ये दावे भी सच नहीं हैं। लखनऊ पुलिस ने इस पर स्पष्ट किया है कि इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का जातिगत पूर्वग्रह से कोई लेना-देना नहीं था और यह महज एक चोरी का मामला था।

लखनऊ पुलिस ने कहा कि उस दिन गाँव से दो घटनाओं की सूचना मिली थी। पहली घटना में, कुछ चोरों को ग्रामीणों ने चोरी के सामान के साथ रंगे हाथों पकड़ा था। चोर सवर्ण और अनुसूचित, दोनों ही जाति के थे और इन मीडिया पोर्टलों द्वारा किए गए दावों के विपरीत कि वे सभी दलित थे।

वास्तव में, जिन ग्रामीणों ने उन चोरों को रंगे हाथों पकड़ा था, वे गुस्से में थे, उन्हें पीटा और उनके सिर के बाल काट दिए। लखनऊ पुलिस ने पुष्टि की कि आरोपितों के साथ-साथ उन ग्रामीणों के खिलाफ भी मामले दर्ज किए गए हैं, जिन्होंने आरोपितों को पीटा और दुर्व्यवहार किया।

पुलिस ने पुष्टि की कि दो ग्रामीण, जो मुंडन और पीटने वालों में से थे, उन आरोपितों को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है। घटना में शामिल बाकी ग्रामीणों की तलाश में पुलिस लगी हुई थी। बयान में यह भी कहा गया है कि चोरों की पिटाई और परेड करने वाले लोग भी कई जातियों के थे। यानी, जैसा कि ‘द क्विंट’ और अन्य समाचार स्रोतों ने इसे सवर्ण और दलित का मुद्दा बताने का प्रयास किया है, वह बेबुनियाद और झूठा है।

अमरोहा की घटना को भी मीडिया गिरोह ने दिया था जातिवादी एंगल

उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिला स्थित हसनपुर कोतवाली क्षेत्र के गाँव डोमखेड़ा में गत 6 जून की रात 4 युवकों ने आपसी रंजिश के चलते घर में घुस कर एक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी। मीडिया के कई प्रमुख स्रोतों ने इस खबर में स्पष्ट तौर पर यह साबित करने का प्रयास किया है कि अमरोहा में एक दलित को मंदिर में जाने के कारण गोली से मार दिया गया।

जबकि वास्तविकता स्वयं अमरोहा पुलिस ने सामने रखी। इस घटना पर अमरोहा पुलिस ने खुद छानबीन के बाद एक वीडियो जारी कर स्पष्ट करते हुए कहा कि इस घटना में युवक की जाति और मंदिर में प्रवेश का कोई प्रसंग था ही नहीं। इस वीडियो में अमरोहा पुलिस, थाना हसनपुर क्षेत्रान्तर्गत ग्राम डोमखेड़ा में नाबालिग युवक की हत्या करने के सम्बन्ध में सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (SP) विपिन ताडा ने कहा –

“मामला दर्ज कर के जाँच शुरू कर दी है। दो की गिरफ्तारी भी हो गई है। इनका ये कहना है कि जो मृतक है उनके भाई के साथ में इनके आम के बगीचे के ठेकों का और मधुमक्खी पालन की साझेदारी थी, जिसमें कि इनके 5 हज़ार रुपए मृतक के भाई पर शेष थे। इसी बात के तकादे को लेकर मृतक और अभियुक्त पक्ष का झगड़ा हुआ, जिसके बाद अभियुक्त गाँव छोड़कर भाग गया। फिर बदला लेने के उद्देश्य से अचानक गाँव में आया और इस युवक को गोली मारकर फरार हो गया। 2 की गिरफ्तारी हो गई है, इनसे पूछताछ करके बाकियों की गिरफ्तारी भी होगी।”

अमरोहा की घटना को भी डाली और सवर्णों के बीच संघर्ष साबित करने वाला गिरोह भी ‘द क्विंट’ की ही तरह वामपंथी प्रोपेगेंडा का हिस्सा थे, जिसमें प्रमुख नाम, टेलीग्राफ और अपने फैक्ट चेकर होने का दावा करने वाले ऑल्टन्यूज़ के संस्थापक थे।

सोशल मीडिया पर इस घटना को दलित पर सवर्णों के अत्याचार के रूप में जमकर शेयर किया गया, जबकि वास्तविकता क्विंट, वायर, लल्लनटॉप, टेलीग्राफ, ऑल्टन्यूज़ जैसे मीडिया गिरोह की हेडलाइन से अलग यह है कि यह मामला मृतक युवक की जाति या मंदिर में पूजा को लेकर नहीं बल्कि आपस में मिलजुलकर शुरू किए गए बिजनेस को लेकर था।