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‘सेकुलर’ प्रोपेगेंडा को ‘राष्ट्रवादी’ कार्टूनों से ध्वस्त करता नवयुवक; हिन्दुओं के नरसंहार ने बनाया आर्टिस्ट

वैसे तो सोशल मीडिया पर पसरी वामपंथी विचारधारा से लड़ पाना वाकई एक बेहद कठिन काम है। लेकिन, फिर भी पिछले दिनों सोशल मीडिया पर कई ऐसे लोग उभर कर सामने आए हैं, जिन्होंने इस बने-बनाए इकोसिस्टम को ध्वस्त करने के लिए अपनी रचनात्मकता का प्रयोग किया और वामपंथियों-लिबरलों के हर प्रोपगेंडे की बखिया उधेड़ते रहे। 

इंस्टाग्राम पर official_artkraftervishy के नाम से एक्टिव एक कार्टूनिस्ट हमारी इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण हैं। ये कार्टूनिस्ट लगातार ऐसे मुद्दों व शख्सियतों के लिए अपने हुनर का प्रदर्शन कर रहे हैं, जिनपर वर्तमान में अधिकांश लोगों का ध्यान नहीं गया है। बात चाहे वीर सावरकर की हो, छत्रपति शिवाजी की हो, आदिगुरु शंकराचार्य की हो या फिर संसद का कॉन्सेप्ट देने वाले कायाकवे कैलासा की। 

इस अकॉउंट पर आपको उस हर शख्स की झलक देखने को मिलेगी, जिन्होंने सनातन के पताका को कभी झुकने नहीं दिया। इन सबके अलावा इस अकॉउंट पर आपको कुछ ऐसे मुद्दों पर बने कार्टून भी मिलेंगे जो लिबरलों की विचारधारा के उलट आपको सच्चाई से रूबरू करवाएँगे। साथ ही ये भी बताएँगे कि आखिर किस तरीके से आम आदमी को वामपंथ का इंजेक्शन प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से दिया जाता है, ताकि उसका ध्यान पूरे मुद्दे से भटक जाए और वह असल समस्या पर बात करना ही छोड़ दे।

official_artkraftervishy की ऑपइंडिया से बात

आज जब हमारी नजर इस अकॉउंट पर पड़ी, तो हमने इस कार्टूनिस्ट से संपर्क किया। हालाँकि, बातचीत के दौरान सुरक्षा के लिहाज से उन्होंने अपना असली नाम हमसे साझा नहीं किया। उन्होंने बताया कि वह एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं और अपनी नौकरी के काम से समय निकाल कर लोगों को जागरूक करने के लिए ये कार्टून या डिजिटल आर्ट बनाते हैं। ऐसे में असली नाम बताना उनके लिए खतरनाक हो सकता है। इसलिए उन्होंने अपने असली नाम की जगह हमें अपनी पहचान ‘विशाल’ के तौर पर करने को कही।

सरलता व सहजता से अपने काम की जानकारी देने वाले विशाल ने ऑपइंडिया से बातचीत में बताया कि स्कूल और कॉलेज तक उन्हें ड्राइंग केवल एक हॉबी के रूप में पसंद थी। मगर, जैसे-जैसे समय बीता। उन्होंने सोशल मीडिया पर वामपंथियों की पकड़ को महसूस किया और उन्हें ये बात कचोटने लगी कि आखिर कोई भी हिंदुओं के लिए या हिंदू धर्म पर बोलने के लिए क्यों तैयार नहीं है?

इसके बाद उन्होंने खुद को इस काम के लिए तैयार किया। उन्होंने बताया कि वैसे तो कार्टून्स पर काम करना पिछले साल अक्टूबर में ही शुरू कर दिया था। मगर, उनके इरादे इस दिशा में तब और मजबूत हुए, जब 19 जनवरी को उन्होंने कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अत्याचार पर 30 साल बीत जाने पर भी लोगों को चुप देखा। 

उसी क्षण, उन्होंने निश्चय किया कि अब वह अपनी कला के जरिए लोगों को इन सभी मुद्दों पर जागरूक करेंगे। उन्होंने सोशल मीडिया पर अकॉउंट बनाए, ईएमआई पर एक आईपैड खरीदा और आगे अपनी प्रैक्टिस शुरू की।

इस पूरे अंतराल में उनके मन को सिर्फ़ एक बात परेशान करती रही कि राष्ट्र के नाम पर आखिर क्यों सही दिशा में कोई आवाज नहीं उठाता?

धीरे-धीरे विशाल ने अपने आपको तैयार किया और ऐसे कार्टून बनाए जो देखने में कार्टून कम और इलस्ट्रेशन ज्यादा थे। उन्होंने ऐसे मुद्दों को उठाया। जो सनातन धर्म से संबंधी थे और हमारे भारत के इतिहास को दर्शाते थे।

उन्होंने बताया कि इस मुहिम को चलाते हुए उन्हें कई लोगों ने धमकियाँ दीं। उन्हें कई बार ऐसे मैसेज आए, जिसमें उनसे सवाल किया गया कि आखिर वो नफरत क्यों फैलाते हैं? जिसपर वह उन्हें बस यही जवाब देते रहे कि वो नफरत नहीं फैलाते, बस लोगों को सच्चाई से रूबरू करवाते हैं।

वे कहते हैं, “पिछली सरकारों ने देश में इस तरह का माहौल तैयार किया कि हम वास्तविकता से बहुत दूर हो गए। आज अगर कोई सच बोलता है या उसके लिए आवाज उठाता है, तो हेट-स्पीच का नाम दे दिया जाता है और ऐसे मुद्दों पर टिप्पणी करने वाले को इतना परेशान किया जाता है कि वह खुद ही कुछ समय में चुप हो जाता है।”

अपने साथ हुए हालिया वाकए की चर्चा करते हुए विशाल बताते हैं, “कुछ समय पहले हावड़ा में जब प्रदर्शनकारियों ने RPF का कॉलर पकड़ लिया था, तो मैंने गृहयुद्ध जैसी उस स्थिति दर्शाने के लिए एक कार्टून बनाया। मगर, मुंबई के एक वकील को वो पसंद नहीं आया और उन्होंने मेरे अकाउंट की शिकायत पुलिस आयुक्त से कर दी।”

विशाल के अनुसार इस घटना के बाद और पहले भी उनके कार्टूनों पर ऐसी अनेकों शिकायतों का सिलसिला चलता रहा। लेकिन फिर भी वो अपने उद्देश्य से भटके नहीं है। वे कहते हैं, “कई शिकायतों के बावजूद मैं अपना काम कर रहा हूँ और हमेशा करता रहूँगा।” 

बता दें, इन कार्टूनों के कारण कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर उनके ख़िलाफ़ मास रिपोर्टिंग भी हुई थी, जिसके कारण उनका ट्विटर अकाउंट भी सस्पेंड कर दिया गया। अभी फिलहाल वह फेसबुक और इंस्टा पर एक्टिव हैं।

विशाल मानते हैं कि जब भी कोई दक्षिणपंथी विचारधारा का व्यक्ति अपनी आवाज उठाता है तो उसे इस तरह की परेशानियों का सामना करना ही पड़ता है।

विशाल के कुछ कार्टून और उनकी राय

1.केरल में हथिनी की मौत- 

हाल में केरल में गर्भवती हथिनी के साथ हुई अमानवीयता के मद्देनजर कई लोगों ने अपनी सहानुभूति प्रकट की। लेकिन ये ध्यान रखने की आवश्यकता है कि केरल वही जगह है, जहाँ कम्यूनिस्टों का बोल बाला है और लोग खुले आम बीफ पार्टी करने से नहीं चूकते।

ऐसे में इस हुनरमंद कार्टूनिस्ट ने अपनी कला के जरिए केरल में पसरी वामपंथी मानसिकता और उनके दोहरेपन पर गहरी चोट की। उन्होंने, हर कार्टूनिस्ट से हटकर, इस मुद्दे पर एक घड़ियाल को फ्रेम में दिखाया। जिसके सामने बीफ रखा है और दीवार पर गाय का सिर टंगा है।

मगर, वो सोशल मीडिया पर एक हथिनी की मौत से आहत होकर पूछता है कि आखिर एक मनुष्य, जानवरों के साथ ऐसी बर्बरता कैसे कर सकता है।

2. एकतरफा सेकुलरिज्म

हमारे समाज में सेकुरलिज्म के नाम पर वामपंथियों द्वारा सनातन धर्म की उपेक्षा कई बार देखने को मिलती है। ऐसे में हिंदुओं से ये उम्मीद की जाती है कि वह समुदाय विशेष के हर रिवाज को शांति से मानते जाएँ और उनकी आर्थिक मदद करते जाएँ। लेकिन जब इसी प्रकार की अपेक्षा समुदाय विशेष से की जाती है तो उनका कट्टरपंथ उनपर हावी हो जाता है।

इसी बात को अपने कार्टून के जरिए दिखाते हुए विशाल उस खबर का जिक्र करते हैं जब वैष्णो देवी श्राइन ने मुस्लिमों के लिए 500 लोगों की इफ्तारी का इंतजाम किया। लेकिन 2014 में इसी वैष्णो देवी की तस्वीर दस के सिक्के पर दिखने से कट्टरपंथियों ने बवाल खड़ा कर दिया था।

इसके अलावा कार्टूनिस्ट ने इस बात को भी दिखाया कि भले ही मंदिरों से इफ्तारी की खबरें आ जाएँ लेकिन मस्जिदों से कभी लंगर या दान की खबर नहीं आएगी।

3.पालघर साधुओं की लिंचिंग, तबरेज की मौत और जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या

बीते दिनों लिंचिंग एक ऐसा बड़ा मुद्दा उभरकर समाज की सुर्ख़ियाँ बना। जिसका पर्याय वामपंथियों ने हिंदू आतंक से जोड़कर प्रदर्शित किया। मसलन तबरेज की मौत पर जिस प्रकार जय श्रीराम के नारे को आधार बनाकर हिंदुत्व पर प्रहार हुआ, वैसे पालघर मामले में हिंदू संतों के लिए किसी ने इंसाफ नहीं माँगा।

लेकिन, विशाल ने बड़ी सजगता से इस मामले पर कार्टून बनाकर लिबरल इकोसिस्टम द्वारा गढ़े नैरेटिव का भंडाफोड़ किया। उन्होंने एक कार्टून में जॉर्ज फ्लॉयड, तबरेज और जूना अखाड़े के साधू की तस्वीर बनाई, साथ ही ये बताया कि इन तीनों हत्या के मामले में कैसे सबकी प्रतिक्रिया अलग-अलग रही।

जॉर्ज के मामले में लोगों ने बड़े-बड़े लेख और ट्वीट लिखे, तबरेज के मामले को तूल देकर दंगे करने की कोशिश की गई। मगर पालघर मामले पर पर केवल अनुरोध किया गया कि साम्प्रदायिकता न फैलाएँ और बस चुप रहें।

4.बुद्धिजीवियों का आतंक

वामपंथी विचारधारा के बारे में जब भी हम बात करते हैं, तो ये ध्यान में रखना आवश्यक है कि बिना मीडिया में पकड़ के इस आइडियोलॉजी का कोई औचित्य नहीं है। आज जितना भी पाठकों या दर्शकों को इस विचारधारा के प्रति प्रेरित किया जाता है, वो सब मीडिया के जरिए है। 

हमें मीडिया में एक पक्ष की पत्रकारिता दिखाई जाती है और बड़ी चालाकी से आम जनता को बरगला दिया जाता है। इसी मुद्दे को अपने कार्टून के जरिए विशाल ने बखूबी दिखाया है। उन्होंने इस तरह की पत्रकारिता से आम जनता को भटकाने वालों की विचारधारा को ‘Intellectual terrorism’ का नाम दिया है।

5. विक्टिम कार्ड

पिछले कुछ समय में हमने ये ट्रेंड देखा है कि इस्लामोफोबिया के नाम पर देश में हमेशा समुदाय विशेष एक प्रकार से विक्टिम कार्ड खेलता रहा और वामपंथी खुलेआम उनके इस झूठ के सबसे बड़े वाहक बने हुए हैं। मगर, जब भी समुदाय विशेष द्वारा किए अपराधों का पर्दाफाश हुआ, तो इसपर सफाई देने की जगह, उसे उन्होंने अपने अस्तित्व पर ही खतरा बता दिया।

इसी संबंध में विशाल ने एक कार्टून बनाया। इस कार्टून के जरिए उन्होंने संदेश दिया कि लोग कट्टरपंथ के बारे में नहीं बोलते। तबलीगियों को समर्थन देने पर नहीं बोले। समुदाय विशेष के बहुत सारे अपराधों पर नहीं बोलते। मगर, जैसे ही उँगली उठनी शुरू होती है, वह अपने अल्पसंख्यक होने का विक्टिम कार्ड खेल जाते हैं

6. हिंदूफोबिक कॉमेडी

हास्य, व्यंग्य के नाम पर पिछले दिनोँ खुलेआम हिंदू घृणा फैलाई गई। कई जगह ऐसे कॉमेडियन सामने आए जिन्होंने अपनी क्रिएटिव सोच के नाम पर केवल हिंदू देवी-देवताओं और उनकी खिल्ली उड़ाई।

इस मुद्दे पर कार्टून बनाकर विशाल ने यह संदेश देना चाहा कि हम हिंदू इतने बिखरे हुए हैं कि कोई भी टुटपुँजिया वामपंथी कॉमेडी के नाम पर हमारे इतिहास, हमारी परंपरा, हमारी मान्यताओं के साथ खिलवाड़ करता जाता है और हम उसे केवल अभिव्यक्ति की आजादी समझकर बख्शते जाते हैं।

7. रमजान स्पेशल कवरेज

इस कार्टून में विशाल ने एक गंभीर मुद्दा उठाया। उन्होंने अपने कार्टून के जरिए जानवरों पर होते अत्याचार को प्रकाशित तो किया। साथ ही उन्होंने इस कार्टून में उन्होंने बताया कि एक त्यौहार के नाम पर लाखों जानवरों को हलाल कर दिया जाता है। लेकिन न पेटा वाले कुछ बोलते हैं और न ही कोई सामाजिक कार्यकर्ता इसपर अपनी जुबान खोलता है। मगर, जैसे ही कोई हिंदू त्यौहार आता है तो लोगों की अचानक संवेदनाएँ जाग जाती हैं और वो ज्ञान देना शुरू कर देते हैं।

8. ऑल लाइव्स मैटर

पिछले दिनो अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद सोशल मीडिया पर ब्लैक लाइव मैटर का ट्रेंड बहुत चर्चा में रहा। बड़े-बड़े चेहरे भी इसपर अपनी प्रतिक्रिया देने से नहीं चूँके। ऐसे में विशाल ने एक कार्टून बनाया। जिसमें उन्होंने इस व्यक्ति की व्यथा को दर्शाया, जो सोशल मीडिया पर हिंदू घृणा से सने ट्वीट देखकर तंग आ चुका है और वह अब न ऐसी बातें सुनना चाहता है और न ही देखना।

9. सेव योर टेंपल

हिंदुओं में हिंदू धर्म के लिए घृणा और सरकारों का हस्तक्षेप देखते हुए इस कार्टून को विशाल ने बनाया। उन्होंने कार्टून के बारे में बताया कि अंग्रेजों के समय से एक नियम बना है कि राज्यों का दखल हमेशा मंदिरों में रहता है। 

ऐसे में मंदिर के पास जितना पैसा आता नहीं है, उससे ज्यादा पैसा निकाल लिया जाता है और बाद में सब्सिडी के नाम पर बाँट दिया जाता है। लेकिन गैर हिंदू धार्मिक संस्थानों से सवाल तक नहीं होता कि उनका फंड कहाँ से आ रहा है? बाद में वे लोग यही पैसा धर्मांतरण के लिए प्रयोग करते हैं, जिहाद में इस्तेमाल करते हैं। कुल मिलाकर हमारा पैसे लेकर हमारे खिलाफ ही इस्तेमाल किया जाता है।

इसलिए लोगों को सजग होने की जरूरत हैं कि जब हम मंदिर में जाते हैं तो दान आदि ज्यादा न करें, बल्कि उस पैसे से किसी गरीब हिंदू का पेट भर दिया जाए। या फिर उस पैसे को पंडितों को दिया जाए। या फिर उस पैसे को हिंदू धर्म के विस्तार के लिए प्रयोग में लाया जाए।

वे कहते हैं कि सेव योर टेंपल पर उनके कार्टून का उद्देश्य सिर्फ़ यही था कि लोग जागरूक हों और मंदिरों से राज्य के अनावश्यक हस्तक्षेप को हटाने की माँग करें।  

10. रियाज नाइकू- गणित का टीचर

आतंकवादी रियाज नाइकू के एनकाउंटर के बाद जिस तरह से मीडिया में ट्रेंड चला कि हेडलाइन में उसके अपराधों की जगह उसके प्रोफेशन का जिक्र होने लगा, उससे आहत होकर विशाल ने यह कार्टून बनाया।

इसमें उन्होंने बताया कि अगर रियाज मैथ का टीचर था भी तो उसने शायद अपने छात्रों को यही पढ़ाएगा कि जिस दिन हिंदुस्तान से काफिरों का सफाया होगा उस दिन हिंदुस्तान में गजवा ए हिंद आएगा।

इस कार्टून पर हमसे बात करते हुए विशाल बताते हैं कि हमाारे मीडिया में आतंकियों को एक ‘स्ट्रगलर’ के तौर पर दिखाया जाता है। जबकि सच्चाई ये नहीं है। विशाल रियाज नाइकू और बुरहान वानी से जैसे आतंकियों के बारे में कहते हैं कि इन सबका एक ही मिशन है।

ऐसे में अगर न्यूज के जरिए ब्रेनवॉश किया जाएगा, इनके लिए सहानुभूति इकट्ठा की जाएगी। लेकिन अगर, वहीं कोई हिंदू लड़का ऐसा कुछ करता है, तो वो उसकी मंशा को जानने की कोशिश नहीं करते बल्कि सिर्फ उसके हिंदू होने के कारण उसे हिंदू आतंकी का चेहरा बता दिया जाता है।

विशाल का युवाओं को संदेश

ऑपइंडिया से बात करते हुए अंत में विशाल सिर्फ़ हमारे युवाओं से यही अपील करते हैं कि वह किसी भी मुद्दे पर एक राय निर्मित करने से पहले हर पहलू पर गौर करें। जब भी कोई मीडिया संस्थान कोई खबर चलाए तो उसे अपने स्तर पर समझने की कोशिश करें कि आखिर कोई मीडिया चैनल ऐसी बात क्यों कर रहा है?

वे कहते हैं कि हमें इस समय इस बने-बनाए नैरेटिव को तोड़ना बहुत जरूरी हो गया है। वरना ये लोग देश में धर्म का नाश कर देंगे।

वे कहते हैं कि उनके कार्टून बनाने के पीछे का उद्देश्य था कि आज जो लोग लंबे-लंबे आर्टिकल पढ़ने में कतराते हैं। वह इस बात को समझ जाएँ कि आखिर खबरों का वास्तविक मतलब क्या है? और क्यों वामपंथी संस्थान इस तरह की रिपोर्टिंग कर रहे हैं, उसका लिंक क्या है, उनकी मंशा क्या है?

विशाल हिंदुत्व का पताका लहराने के लिए और अपने इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए युवाओं के लिए फ्री वॉलपेपर भी तैयार करते हैं। ताकि हमारे नायकों की छवि, उनकी महानता की गाथा, हमेशा युवाओं को प्रेरित करे और उन्हें मालूम रहे- हमारा अपना वास्तविक इतिहास और हमारी पहचान क्या है।

तुम्हारी मॉं हिंदू थी, हम तुम पर कैसे यकीन कर लें: नवाजुद्दीन सिद्दीकी की भतीजी ने किए चौंकाने वाले खुलासे

एक्टर नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी के के छोटे भाई मीनाज के खिलाफ हाल ही में यौन उत्पीड़न और शारीरिक हिंसा का मामला दर्ज किया गया है। मामला नवाज़ुद्दीन की भतीजी साशा सिद्दीकी ने दर्ज करवाया है। पिंकविला को दिए एक इंटरव्यू में साशा ने अपने आरोपों को लेकर विस्तार से बात की है।

इससे नवाजुद्दीन के परिवार के लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। बकौल साशा जब उसने नवाजुद्दीन और उनके परिवार को इस बारे में बताया तो उसे दुत्कार दिया गया। उससे कहा गया कि तुम्हारी मॉं हिंदू थी, तो तुम्हारी बातों पर कैसे यकीन कर लें।

साशा ने बताया अपने साथ हुए दुष्कर्म के बारे में जब उसने नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी और उनके परिवार वालों को बताया तब उन लोगों ने उससे कहा कि वह एक हिंदू माँ की संतान हैं और इसलिए वह झूठी है। उसने आगे बताया कि उसकी माँ ने अपने माँ-बाप के खिलाफ जा कर प्रेम विवाह किया था। लेकिन लगातार उत्पीड़न और शारीरिक हिंसा के कारण उसकी माँ ने सिद्दीकी परिवार को छोड़ तलाक ले लिया था।

इंटरव्यू में सिद्दीकी की भतीजी शाशा सिद्दीकी ने कहा है कि उसके साथ यौन उत्पीड़न तब शुरू हुआ जब वह केवल नौ साल की थी। उस समय, उसे समझ नहीं आया कि उसके साथ क्या हो रहा है, मगर समय के साथ उसने गुड टच और बैड टच के बीच अंतर के बारे में पता चला। उसने अपने परिवार को इस हरकत के बारे में बताने की कोशिश की, लेकिन कोई भी उसके बचाव में नहीं आया। कथित तौर पर जब वह 8 वीं क्लास में थी, उसके पिता ने उसकी पढ़ाई जारी रखने से इनकार कर दिया, क्योंकि उनका मानना ​​था कि लड़कियों को शिक्षा नहीं देना चाहिए।

साशा ने बताया एक रात जब वह दिल्ली में थी, चाचा मिनाज़ उसके कमरे में आए और उसे यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करने की कोशिश की। जब मैंने इसका विरोध किया, तब उन्होंने अपनी बेल्ट निकाली और मुझे पीटना शुरू कर दिया। साशा ने कहा कि उसके पास सबूत के तौर पर शारीरिक हमले (चोट के जख्म और निशान) की तस्वीरें भी है, जो उसने उस वक्त अपने बॉयफ्रेंड को भेजा था, जिसके साथ अब उसकी शादी हो चुकी है।

साशा ने यह भी कहा है कि जब उसने शादी करने का फैसला किया, तो उसके पिता के परिवार ने उसके पति और ससुराल वालों के खिलाफ कई झूठे आरोप लगाए। इसमें उसकी कम उम्र को लेकर झूठे डॉक्यूमेंट दिखाए गए, जो बाद में अदालत में गलत साबित हुए।

उसने आगे बताया कि नवाजुद्दीन का परिवार, जिसमें उनके खुद के पिता भी शामिल हैं, वर्षों से उसके पति के परिवार को लगातार धमकियों और अदालती मामलों को लेकर परेशान कर रहे हैं।

उसने आरोप लगाया कि सिद्दीकी परिवार में शारीरिक हमला, हिंसा, धमकी और घरेलू शोषण एक आम बात है जिसका कई महिलाओं ने सामना किया है। उसने आरोप लगाया कि नवाजुद्दीन की पत्नी (जिसने तलाक के लिए अर्जी दाखिल की है), उसकी अपनी माँ और उसकी चाची ने भी शारीरिक शोषण और हिंसा का सामना किया है। उसने बताया कि नवाजुद्दीन के भाई स्वभाव से गुस्सैल और अपमानजनक हैं। इस परिवार का माहौल आमतौर पर हिंसक रहता है।

इंटरव्यू में नवाजुद्दीन की भतीजी ने यह भी कहा कि जब नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी को उसके द्वारा दर्ज की गई एफआईआर के बारे में पता चला, तो उसने उसे इस बारे में बात करने के लिए बुलाया था। उसे शिकायत वापस लेने के लिए कहा गया। लेकिन उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया।

उसने कहा कि पहले नवाज़ुद्दीन ने उसकी बात गलत कहते हुए इग्नोर कर दिया था। उस वक़्त नवाज़ुद्दीन ने यह कह कर बात टाल दी थी कि मिनाज़ सिद्दीकी उसके चाचा हैं और वह ऐसा कभी नहीं कर सकते।

दरभंगा: नजीर के घर बड़ा धमाका, 1 किमी तक गूॅंजी आवाज; लोगों ने पूछा- बम बना रहा था या पटाखा?

बिहार का दरभंगा शुक्रवार (5 जून 2020) की दोपहर एक जोरदार धमाके से दहल गया। धमाका विश्वविद्यालय थाना क्षेत्र के आजमनगर दुर्गा मंदिर इलाके में हुई।

धमाका इतना भीषण था कि मोहम्मद नजीर के घर की दीवार और छत ध्वस्त हो गई। लोगों का कहना है कि धमाके की आवाज तकरीबन एक किलोमीटर के इलाके तक सुनाई दी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, मोहम्मद नजीर के परिवार के 5 लोगों की स्थिति नाजुक है। नजीर की उम्र पचास साल के आसपास बताई जा रही है। घायलों में तीन बच्चे हैं। डीएमसीएच में इनका इलाज चल रहा है।

धमाके की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँच गई। धमाका कैसे हुआ यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। प्रशासन ने कहा है कि प्रथम दृष्टया यह पटाखे के कारण हुआ विस्फोट लग रहा है। लेकिन स्थानीय लोगों का दावा है कि धमाका बम बनाते वक्त हुआ। ऑपइंडिया इन दावों की पुष्टि नहीं करता।

सूत्रों का कहना है कि पुलिस ने नजीर को गिरफ्तार कर लिया है। स्थानीय लोगों का दावा है कि दीवारों की हालत और विस्फोट की तीव्रता देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि यह पटाखों से हुआ होगा।

धमाके से क्षतिग्रस्त बिल्डिंग
धमाके से जख्मी बच्चे

वहीं धमाके से गिरी दीवार के नीचे दबे खून से लथपथ लोगों को मोहल्ले के लोगों ने निकालने की कोशिश की और अभी भी राहत और बचाव कार्य जारी है। स्थानीय विधायक संजय सरागवी ने भी घटनास्थल का दौरा किया है।

स्थानीय जनप्रतिनिधि प्रभावित क्षेत्र का जायजा लेने पहुँच चुके हैं

शरजील इमाम और हर्ष मंदर ने प्रदर्शनकारियों को बरगलाया: चार्जशीट में दंगे भड़काने में इनकी अहम भूमिका का उल्लेख

दिल्ली पुलिस ने बुधवार (3 मई, 2020) को फरवरी में हुए दिल्ली दंगों के दौरान आईबी ऑफिसर अंकित शर्मा हत्याकांड में चार्जशीट दायर की है। जिसमें उन्होंने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंदू-विरोधी दंगों को बढ़ावा देने वाले घटनाओं की पहचान की है।

चार्जशीट के शुरुआत में पिछले साल 13 दिसंबर को जामिया मिलिया इस्लामिया के पास हुई हिंसा के बारे में बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, जामिया मिलिया इस्लामिया मेट्रो स्टेशन पर लगभग 2000 लोग बिना किसी परमिशन के इकठ्ठा हुए और संसद भवन की तरफ मार्च करने लगें।

जब पुलिसकर्मियों ने उन्हें मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 1 पर रोका तो इस पर प्रदर्शनकारी हिंसक हो उठे और उन्होंने पुलिस पर पत्थरबाजी की। घटना के दौरान पंद्रह पुलिस कर्मी घायल हो गए थे।

चार्जशीट में फिर 15 दिसंबर 2019 को न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी के आसपास हुई हिंसा की घटनाओं के बारे में बताया गया है। जिसके अनुसार जामिया के कुछ पूर्व और अभी के छात्रों ने कुछ राजनीतिक दलों के सदस्यों के साथ मिलकर नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के विरोध में प्रदर्शन शुरू कर दिया।

संसद और राष्ट्रपति भवन तक मार्च करते समय भीड़ सड़कों को भी जाम करने लगी। जिस पर पुलिस ने उन्हें रोका तो उन्होंने पुलिस पर पथराव करना शुरू कर दिया।

जामिया कैंपस हिंसा

16 दिसंबर, 2019 को प्रदर्शनकारी जामिया कैंपस के अंदर जमा हो गए और वहीं से पुलिस पर पत्थरबाजी करने लगे। वे जानबूझ कर दंगे को नियंत्रित करने वाले पुलिसकर्मियों को निशाना बना रहे थे।

चार्जशीट के मुताबिक, स्थिति को काबू करने के लिए दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 के तहत 52 लोगों को गिरफ्तार किया। वहीं इस घटना के दौरान 35 पुलिस अधिकारी और घटनास्थल पर मौजूद 97 लोग घायल हो गए। इसके अलावा तीन पुलिस बूथ क्षतिग्रस्त हो गए थे।

हिन्दू विरोधी दंगों में शरजील और हर्ष मंदर की भूमिका

चार्जशीट में जेएनयू छात्र शारजील इमाम और हर्ष मंदर की दिल्ली हिंसा में भूमिका बताई गई है। पुलिस ने चार्जशीट में कहा कि समिति ने जेएनयू छात्र शरजील इमाम को विरोध के लिए बुलाया था। जहाँ शरजील ने 14 दिसंबर को भड़काऊ भाषण दिया। जहाँ उसने उत्तर भारत के सभी शहरों को तब तक के लिए बंद करने का आह्वान किया जब तक सरकार सीएए / एनआरसी को वापस नहीं ले लेती।

जिसके बाद नागरिकता कानून के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन के दौरान न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में जमकर हिंसा हुई थी। शरजील इमाम के खिलाफ पहले ही अप्रैल में चार्जशीट दायर की जा चुकी थी।

बाद में 16 दिसंबर 2019 को हर्ष मंदर विरोध स्थल पहुँचे और प्रदर्शनकारियों से कहा कि वे भारत के सर्वोच्च न्यायालय में विश्वास न करें। यहाँ पर न्याय पाने का एकमात्र तरीका सड़कों पर लड़ाई लड़ना है।

बता दें हर्ष मंदर को भारत विरोधी गतिविधियों के लिए जाना जाता है। साथ ही जॉर्ज सोरोस और कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी के साथ उनका लगाव जगजाहिर है।

चार्जशीट में भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद का भी नाम शामिल हैं। जिन्होंने 22 दिसंबर 2019 को प्रदर्शन स्थल पहुँच कर प्रदर्शनकारियों को सड़कों पर बने रहने के लिए उकसाया जब तक कि सरकार सीएए / एनआरसी / एनपीआर वापस नहीं ले लेती।

शाहीन बाग का खेल

चार्जशीट में फिर शाहीन बाग विरोध के बारे मे बताते हुए पुलिस ने कहा कि प्रदर्शनकारी 15 दिसंबर 2019 से ही इस क्षेत्र को पूरी तरह ब्लॉक कर रखा था। प्रदर्शनकारियों ने किसी भी वाहन को उस सड़क का उपयोग नहीं करने दिया। जिसकी वजह से रोजाना इस मार्ग पर जाने वाले एक लाख से अधिक यात्रियों को असुविधा का सामना करना पड़ता था। शाहीन बाग विरोध प्रदर्शन की ‘सफलता’ को देखकर, लोगों ने दिल्ली के अन्य हिस्सों में इसी प्रकार सड़कों को ब्लॉक करने की कोशिश की थी।

17 दिसंबर 2019 को जाफराबाद में भीड़ ने पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया। सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाया और कई पुलिस अधिकारियों को घायल कर दिया।

प्रदर्शनकारियों ने 15 दिसंबर 2019 से शुरू हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान उत्तर-पूर्व जिले में सात स्थानों पर अवैध रूप से हिंसक प्रदर्शन किया था। जिसके चलते इलाके में स्थिति तनावपूर्ण बनी रही। विरोध करने के लिए बड़ी संख्या भीड़ इकट्ठा होती थी।

दिल्ली पुलिस ने दंगों के सिलसिले में 783 मामले दर्ज किए हैं। हिंदू विरोधी दंगों में कुल 52 लोगों ने अपनी जान गँवाई थी। वहीं 434 लोग घायल हुए और घायल हुए लोगों में लगभग 100 लोगों को बंदूक की गोली लगी थी।

दिसंबर 2019 से 2020 के दिल्ली दंगों तक: पहचान छिपाने के लिए इस्लामी भीड़ ने CCTV कैमरों से कैसे की छेड़छाड़

इस साल फरवरी में इस्लामिक भीड़ द्वारा सीएए विरोध के नाम पर अंजाम दिए गए हिंदू विरोधी दंगों के दौरान दिल्ली संपत्ति के नुकसान, दंगे, आगजनी और खून-खराबे की गवाह बनी। तब से लेकर अब तक दिल्ली पुलिस ने अपराधियों को गिरफ्तार करने के लिए अथक प्रयास किया है। इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई, जबकि 250 से अधिक लोग घायल हुए थे।

इस मामले में दिल्ली पुलिस ने कई गिरफ्तारियाँ की। दंगों से संबंधित कई आरोप पत्र भी दायर किए हैं। जाँच के दौरान खुलासा हुआ कि इस्लामिक दंगाइयों ने पकड़ में आने से बचने के लिए सीसीटीवी कैमरों को नष्ट कर दिया था।

4 जून (गुरुवार) को दिल्ली पुलिस ने फरवरी 2020 में हुए दिल्ली दंगों को लेकर एक नई चार्जशीट दायर की है। दिल्ली पुलिस ने 20 वर्षीय दिलबर सिंह नेगी की हत्या के मामले में 12 लोगों को गिरफ्तार किया है, जिसे कथित तौर पर इस्लामवादी दंगाइयों ने जिंदा जला दिया था।

दिल्ली पुलिस ने कहा कि मुस्लिम भीड़ द्वारा जलाई गई संपत्तियों में से एक अनिल स्वीट्स की भी दुकान थी, जहाँ से पुलिस ने 26 फरवरी को नेगी का शव बरामद किया था। दरअसल भोजन और आराम करने के लिए दिलबर सिंह नेगी दुकान से गोदाम में गया था।

दिल्ली पुलिस ने चार्जशीट में पुष्टि की है कि कट्टरपंथी मुस्लिम दंगाइयों ने अपने इलाके में लगे सभी सीसीटीवी कैमरों को तोड़ दिया था। इस इलाके से ही पुलिस ने नेगी के शव को बरामद किया था। पुलिस ने कहा कि उन्होंने ये गिरफ्तारियाँ चश्मदीद गवाहों के बयान और तकनीकी सबूतों के आधार पर की हैं। हालाँकि पुलिस कुछ ही सीसीटीवी फुटेजों को बरामद कर सकी है, क्योंकि अधिकांश कैमरों को दंगाइयों ने तोड़ दिया था।

ताहिर हुसैन के घर में लगे सीसीटीवी कैमरे को कर दिया था बंद

इसी तरह दिल्ली पुलिस ने 2 जून (मंगलवार) को कड़कड़डूमा कोर्ट में एक चार्जशीट दायर की, जो कि दिल्ली दंगों में AAP के निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन के संलिप्तता से जुड़ी थी। चार्जशीट में पुलिस ने कहा है कि निलंबित AAP पार्षद ताहिर हुसैन के आवास के पास लगे कैमरों से कोई सीसीटीवी फुटेज बरामद नहीं हुई है। चार्जशीट में कहा गया है कि कथित तौर पर हिंसा से पहले और हिंसा के दौरान किए गए कारनामों को छिपाने के लिए सीसीटीवी कैमरों से छेड़छाड़ की गई थी।

1030 पेज की चार्जशीट के मुताबिक ताहिर हुसैन के घर और ऑफिस के आसपास कई सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे। उसके घर से कैमरों की चार डीवीआर भी बरामद की गई है। इन सभी को फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) में जमा किया गया था, लेकिन उसमें कहा गया है कि 23 फरवरी से लेकर 28 फरवरी तक कोई भी रिकॉर्डिंग नहीं मिली है।

इसे देखते हुए ऐसा माना जा रहा है कि या तो सीसीटीवी कैमरे बंद थे या वे उस समय काम नहीं कर रहे थे। चार्जशीट में कहा गया है कि दंगों के दौरान ताहिर हुसैन के घर या कार्यालय में किसी भी व्यक्ति की रिकार्डिंग नहीं है। इससे ऐसा लगता है कि वह वहाँ के क्रियाकलापों को रिकॉर्ड नहीं करना चाहते थे।

मार्च 2020 में कुछ वीडियो सामने आए थे, जिनमें उत्तर-पूर्वी दिल्ली के चाँद बाग और जाफराबाद इलाकों में इस्लामवादी दंगाइयों द्वारा इलाके के सभी सीसीटीवी कैमरे को तोड़ते हुए देखा गया, क्योंकि ये लोग अपनी पहचान छिपाना चाहते थे। दंगाइयों ने कथित तौर पर दिल्ली पुलिस पर हमला करने से कुछ मिनट पहले ही इन कैमरों को तोड़ा था।

इस घटना में दंगाइयों द्वारा डीसीपी अमित शर्मा बुरी तरह से घायल कर दिए थे और आईपीएस शर्मा को बचाने की कोशिश करने वाले कांस्टेबल रतन लाल को दंगाइयों ने मौत के घाट उतार दिया था।

दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के दौरान राजधानी में सीएए विरोध के नाम पर हिंदू विरोधी दंगों को अंजाम दिया गया था। इसमें एक पुलिस कॉन्स्टेबल ने अपनी जान गवाँ दी थी। इसी बीच दिल्ली के गोकुलपुरी में भड़की हिंसा के दौरान एक और डीसीपी घायल हो गए थे।

इतना ही नहीं सीएए विरोध के नाम पर हुए दंगों ने दिल्ली में सांप्रदायिक रूप ले लिया था, जिसके कारण दिल्ली के कई इलाकों में हिंसा फैल गई थी। दिल्ली की सड़कों पर हुए हिंदू-विरोधी दंगों में करीब 53 लोगों की मौत हो गई थी। दंगाइयों ने आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की बेरहमी से हत्या कर उनका शव भी नाले में फेंक दिया था।

एक पैटर्न

इससे पहले भी पिछले वर्ष दिसंबर में सीएए विरोध के नाम पर देश में लोग सड़कों पर उतर आए थे। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने सरकारी संपत्तियों को आग के हवाले किया था। सीएए विरोध के नाम पर भड़की हिंसा के कई वीडियो सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों के सामने आए थे। वीडियो में इस्लामिक दंगाई सीसीटीवी कैमरे तोड़ते नजर आए थे।

इस बीच मंगलुरु से कुछ सीसीटीवी फुटेज के वीडियो सामने आए थे। इसमें दंगाई 19 दिसंबर 2019 को सीसीटीवी कैमरों को अपने मुताबिक मोड़ते नजर आए थे। हालाँकि दंगाई क्षेत्र में लगे एक सीसीटीवी कैमरे को एडजस्ट करने से चूक गए, जिससे उनकी हरकतें कैद हो गई थी।

आकार पटेल पर FIR: भारत में अमेरिका जैसे दंगों के लिए समुदाय विशेष और दलितों को उकसाया था

पत्रकार और एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक आकार पटेल के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। उन पर ट्वीट के जरिए दलितों और समुदाय विशेष को अमेरिका जैसे दंगे भारत में करने के लिए उकसाने का आरोप है।

पटेल ने ट्वीट कर कहा था कि देश का समुदाय विशेष और दलित उसी तरह का विरोध प्रदर्शन करें जैसा अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद से चल रहा है।

डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के अनुसार आकार पटेल के खिलाफ में बेंगलुरु के जेसी नगर पुलिस स्टेशन के पुलिस इंस्पेक्टर नागराजा डीआर द्वारा मुकदमा दर्ज कराया गया है। इसमें पटेल पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने पूरे भारत में अमेरिका की तरह के विरोध-प्रदर्शन आयोजित करने के लिए अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को भड़काने और उकसाने की कोशिश की।

दरअसल 31 मई को आकार पटेल ने कोलोराडो टाइम्स रिकॉर्डर के एक ट्वीट के हवाले से एक ट्वीट किया था, जिसमें अमेरिका में विरोध-प्रदर्शन कर रहे लोगों का एक वीडियो शेयर किया गया था। इस वीडियो के साथ ट्वीट में आकार पटेल ने लिखा था कि भारत के समुदाय विशेष, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और गरीबों को भी इनकी तरह विरोध-प्रदर्शन करने की आवश्यकता है। इसे दुनिया देखेगी। प्रदर्शन करना भी एक कला है।

साभार-ट्विटर

वीडियो में आप देख सकते हैं कि हजारों की संख्या अमेरिका के नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के विरोध में जमीन पर लेटे हुए हैं और ये प्रदर्शनकारी अपने हाथों को पीछे लगाकर “मैं साँस नहीं ले सकता” की आवाज लगाते हुए सुनाई दे रहे हैं।

नागराजा द्वारा पुलिस में की गई शिकायत में कहा गया है कि पटेल ने अल्पसंख्यकों, पिछड़ों, गरीबों और महिलाओं से आह्वान किया कि वे वीडियो में देखे गए लोगों की तरह विरोध-प्रदर्शन करें। उन्होंने कहा कि कई लोगों ने पटेल के ट्वीट पर आपत्ति भी जताई थी।

अब आकार पटेल के खिलाफ आईपीसी की धारा 505 (1)(बी), धारा 153 (दंगा भड़काने के इरादे से गलत तरीके से उकसाना) और धारा 117 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

पुलिस अधिकारियों ने कहा है कि साइबर क्राइम पुलिस और राज्य के खुफिया अधिकारी अमेरिका में हिंसक विरोध प्रदर्शन में लिप्त लोगों की प्रतिक्रियाओं पर नजर रखे हुए हैं। एक अधिकारी ने कहा कि वह मामले की जाँच में जुटे हुए हैं।

हालाँकि आकार पटेल द्वारा पोस्ट किए गए वीडियो में एक शांतिपूर्ण विरोध दिखाया गया था। लेकिन अमेरिका में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों में हिंसा, दंगा, आगजनी और लूटपाट जमकर हुई है। आपको बता दें कि मिनियापोलिस में एक श्वेत पुलिस अधिकारी द्वारा अफ्रीकी अमेरिकी जॉर्ज फ्लॉयड की की कथित हत्या के बाद बड़े स्तर पर विरोध-प्रदर्शन हुए, लेकिन बाद में ये हिंसा और दंगों में तब्दील हो गए।

इतना ही नहीं प्रदर्शनकारियों ने पुलिस टीमों पर भी हमला किया है। ऐतिहासिक स्थानों सहित पुलिस वाहनों को निशाना बनाते हुए उग्र प्रदर्शनकारियों ने दुकानों को लूटा और कई घरों व सार्वजनिक संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया।

इसके बाद से भारत में वाम उदारवादी समुदाय विशेष से इसी तरह के हिंसक विरोध-प्रदर्शनों का आह्वान कर रहे हैं। इसे देखते हुए अमेरिका में हुई हिंसा की तर्ज पर भारत में हिंसा को उकसाने वाली पोस्टों को लेकर सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क हो गई हैं।

अपने खिलाफ दर्ज मुकदमे पर प्रतिक्रिया देते हुए आकर पटेल ने डेक्कन हेराल्ड को बताया कि मुझे नहीं लगता कि यह मामला दर्ज किया जाना चाहिए था। मुझे नहीं लगता इस केस में कुछ आगे हो सकेगा।

केरल: गर्भवती हथिनी की हत्या मामले में एक गिरफ्तार, अनानास में पटाखे रखकर खिला दिया था

केरल में एक गर्भवती हथिनी को पटाखों से भरा अनानास खिलाने के मामले में एक आरोपी को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। उससे पूछताछ की जा रही है। उसके नाम का खुलासा फिलहाल नहीं किया गया है।

गर्भवती हथिनी की हत्या को लेकर वेबसाइट चेंज डॉट ओआरजी पर 24 घंटे में 927 लोगों ने पिटीशन डाली है। यहाँ 13 लाख से ज्यादा लोगों ने दोषियों को कड़ी सजा दिलाने की माँग के साथ पिटीशन को समर्थन दिया है।

पूरे देश में लोगों ने इंसान की इस हैवानियत पर नाराजगी जताई है। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने घटना में दोषी पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का भरोसा दिलाया है। सोशल मीडिया पर लोग दोषियों को सख्त सजा देने की माँग कर रहे हैं। बढ़ते आक्रोश को देखते हुए केरल सरकार ने वन विभाग की विशेष जाँच टीम गठित की है।

वन विभाग की टीम ने भी लोगों के गुस्से को शांत करने के लिए ट्वीट कर कहा कि “हथिनी की मौत के मामले में वन्यजीव संरक्षण कानून की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। कई संदिग्धों से पूछताछ की जा रही है। विशेष जाँच दल का गठन किया गया है। दोषियों को सजा दिलाने में वन विभाग कोई कसर नहीं छोड़ेगा।”

वहीं केंद्र ने भी इस घटना पर संज्ञान लेते हुए केरल सरकार से पूरी रिपोर्ट माँगते हुए दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया था। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने अपनी नाराजगी जताते हुए माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर लिखा, “केंद्र सरकार ने मल्लापुरम, केरल में एक हथिनी की हत्या के मामले पर बहुत गंभीरता से ध्यान दिया है। हम सही तरीके से जाँच करने और अपराधी को पकड़ने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। पटाखे खिलाना और मारना भारतीय संस्कृति नहीं है।”

दरअसल, 27 मई को मल्लपुरम से एक दिल दहलाने वाली घटना सामने आई। एक 15 वर्षीय गर्भवती हथिनी एक अमानवीय कृत्य का शिकार हो गई। उसे किसी उपद्रवी शख्स ने एक पटाखों से भरा अनानास खिलाया, जिससे हथिनी के मुँह में विस्फोट हो गया और वह बुरी तरह जख्मी हो गई। हथिनी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि वह गर्भवती थी। उसका जबड़ा टूट गया था और मुँह में विस्फोट के कारण वह अनानास चबाने के बाद कुछ खा नहीं पा रही थी। इस विस्फोट से उसकी जीभ और मुँह पर गंभीर चोटें आईं। इसके बाद वह एक नदी में चली गई और तीन दिनों के बाद आखिर में उसने प्राण त्याग दिए।

इस घटना को नीलांबुर के सेक्शन फारेस्ट ऑफिसर मोहन कृष्णन ने जनता के साथ साझा किया। हाथी को बचाने के लिए जो रैपिड एक्शन टीम गई थी, उसका नेतृत्व वही कर रहे थे। उन्होंने भावुक होकर मलयाली में फेसबुक पर लिखा:

“वो 20 महीने बाद अपने बच्चे को जन्म देने वाली थी। उसे भूख लगी थी, उसे क्या पता था कि क्रूर इंसानों के जिस भोजन को वो उनका प्यार समझ कर ग्रहण करेगी, वो सिर्फ़ एक छलावा है, जो दोहरी जिंदगियों का भक्षक बन जाएगा। मेरे सामने अब भी उसका चेहरा घूम रहा है। उसने पानी में ही कब्र बना ली। अब हम उसे लेकर जा रहे हैं, दफनाने के लिए। वो उसी ज़मीन के नीच हमेशा के लिए सोएगी, जहाँ उसने बचपन से हँसा-खेला था। मैं और क्या कर सकता हूँ? स्वार्थी मानव जाति की तरफ से उसे कहता हूँ- बहन, क्षमा करो।”

सुनियोजित साजिश थी जामिया हिंसा, हर दंगाई के पास पहले से थे पत्थर, पेट्रोल बम: दिल्ली पुलिस का खुलासा

जामिया हिंसा मामले में दिल्ली पुलिस ने गुरुवार (जून 4, 2020) को दिल्ली हाई कोर्ट में हलफनामा दायर किया। दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट को बताया कि पिछले साल दिसंबर माह में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के ख़िलाफ हुई हिंसा कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। यह ये एक सुनियोजित घटना थी। हर दंगाई के पास पहले से पत्थर, लाठी और पेट्रोल बम थे।

जामिया मिलिया इस्लामिया के कैंपस में बीते साल 13 और 15 दिसंबर को हिंसा हुई थी। दिल्ली पुलिस के वकील अमित महाजन और रजत नैयर ने जामिया हिंसा मामले में इस दौरान 6 याचिकाओं पर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि उस समय भीड़ का इरादा केवल कानून और व्यवस्था को बाधित करना था।

दिल्ली पुलिस की ओर से कोर्ट में कुछ वीडियोज और तस्वीरें भी सबूत के तौर पर पेश की गई। इनके जरिए बताया गया कि छात्रों के आंदोलन की आड़ में वास्विकता में कुछ लोगों ने स्थानीय लोगों की मदद से दंगा भड़काने की कोशिश की।

क्राइम ब्रांच ने कहा, “जामिया हिंसा कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। बल्कि सुनियोजित घटना थी, जहाँ दंगाइयों के पास पत्थर, लाठियाँ , पेट्रोल बम, ट्यूबलाइट आदि पहले से थीं। इससे साफ होता है कि भीड़ का इरादा केवल कानून-व्यवस्था को बाधित करना था।”

जामिया हिंसा के आरोपित छात्र नहीं, बाहरी हैं

जामिया हिंसा पर दायर 3 एफआईआर के मद्देनजर दिल्ली पुलिस ने कहा कि 20 लोगों के ख़िलाफ़ चार्जशीट साकेत कोर्ट में दाखिल हुई है। इनमें से कोई भी यूनिवर्सिटी का छात्र नहीं है।

जाँच में ये भी खुलासा हुआ कि स्थानीय नेताओं और राजनेताओं ने भड़काऊ नारे लगाकर प्रदर्शनकारियों को भड़काने का काम किया।

पुलिस ने बताया, “जामिया हिंसा में दंगाइयों ने गाड़ी के टायर जलाए और पुलिस की ओर फेंके। एक एंबुलेंस, जिससे एक मरीज को यूनिवर्सिटी के रास्ते ले जाया जा रहा था, उसे भी क्षतिग्रस्त किया गया। कानून को तोड़ते हुए इस भीड़ के कई समूहों ने कैंपस में एंटर किया और फोर्स के ऊपर पत्थरबाजी की।”

अलग से जानकारी की कोई आवश्यकता नहीं

दिल्ली पुलिस ने गुरुवार को कोर्ट से ये भी अपील की कि जामिया हिंसा मामले में अलग से जाँच करने की कोई जरूरत नहीं है। वह पहले से ही इस संबंध में व्यापक जाँच कर रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हलफनामे में पुलिस ने उन याचिकाओं को खारिज करने की भी माँग की, जिसमें छात्रों की गिरफ्तारी और चिकित्सा सहायता न दिए जाने का हवाला देकर फैक्ट-फाइंडिंग कमिटी के गठन की माँग हुई थी।

पुलिस ने दिल्ली हाइकोर्ट में इन याचिकाओं को खारिज करने की माँग करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क है कि जामिया में हुआ प्रदर्शन सिर्फ़ एक छात्र विरोध था और शांतिपूर्ण प्रदर्शन था, जो कि पूर्ण रूप से झूठ है, इसलिए इन दलीलों को अस्वीकार किया जाए।

बता दें, दंगाइयों के ख़िलाफ़ पुलिस की कार्रवाई के संबंध में कुछ याचिका नबीला हसन, स्नेहन मुखर्जी और सिद्धार्थ द्वारा दाखिल की गई थी। इसके अलावा कुछ याचिकाएँ हिंसा के आरोपितों के ख़िलाफ़ दर्ज एफआईआर को निरस्त करने के लिए विभिन्न वकीलों, जामिया छात्रों, ओखला निवासियों और यहाँ तक की जामा मस्जिद के इमामों द्वारा दायर की गई थी।

दिल्ली पुलिस ने उच्च न्यायालय में यह भी कहा कि असहमति के अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन किसी को भी अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में कानून हाथ में लेने, हिंसा भड़काने, आगजनी करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

कोरोना के इलाज में प्रयुक्त हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा के शोध में बड़ा फर्जीवाड़ा, लैंसेट पत्रिका ने हटाया विवादास्पद शोधपत्र

कोरोना वायरस के इलाज को लेकर एक बड़ा शोध घोटाला उजागर हुआ है। चिकित्‍सा क्षेत्र की दुनिया की सबसे प्रभावशाली पत्रिकाओं में से एक द लैंसेट ने मलेरिया ड्रग्स क्लोरोक्विन और हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के सम्बन्ध में किए गए चार लेखकों के फर्जी शोध पत्र को वापस ले लिया है।

गौरतलब है कि इन लेखकों का दावा था कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा कोरोना महामारी की लड़ाई में गेमचेंजर्स के रूप में इस्तेमाल किए जाने से रोगियों में मृत्यु दर बढ़ जाती है। इसके पूर्व ऐसा ही एक शोध न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन द्वारा प्रकाशित किए गए थे।

दुनिया की प्रमुख चिकित्सा पत्रिकाओं में से एक लैंसेट द्वारा गुरुवार को जो विवादास्पद शोध पत्र को वापस ले लिया गया। उसमें लेखकों द्वारा दावा किया गया था कि कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने के लिए जिस दवा ‘हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन’ को संजीवनी माना जा रहा था, वह दवा कारगर नहीं रही। संक्रमितों में यह दवा लेने वालों का मृत्युदर और अधिक बढ़ जाता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार इस शोधपत्र जो चार लोग शामिल थे। इनमें प्रमुख रूप से डॉ मंदीप आर मेहरा, डॉ अमित एन पटेल, डॉ सपन देसाई और डॉ फ्रैंक रुशिट्जका जैसे लेखकों का शोधपत्र फर्जी पाए जाने पर, पत्रिका ने फर्जी शोध पत्र को हटा दिया है।

बता दें कि इस स्टडी की सत्यता को जानने के लिए WHO और दूसरी संस्थाओं से दुनियाभर के 100 से ज्यादा रिसर्चर ने जाँच करवाने की डिमांड की थी। जिसके बाद लैंसेट ने कहा, “नए डेवलपमेंट के बाद हम प्राइमरी डेटा सोर्स की गारंटी नहीं ले सकते, इसलिए स्टडी वापस ले रहे हैं।”

Lancet’s statement about the retraction of their article, via Twitter

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन से मृत्यदर बढ़ने की आशंका पर की गई इस स्टडी के चलते इस बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक टेड्रोस एडहैनम घेब्रेयसस ने कहा कि विशेषज्ञों ने इस दवा के सुरक्षा संबंधी डाटा के अध्ययन के बाद फिर से परीक्षण की सिफारिश कर दी है।

WHO को संचालित करने वाले कार्यकारी समूह ने परीक्षण में शामिल सभी दवाओं के समूहों को फिलहाल जारी रखने की स्वीकृति दे दी है। इसके साथ ही कोरोना की दवाओं के परीक्षण में शामिल मरीजों को जल्द ही फिर से हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा पहले की तरह देने की अनुमति दे दी है। उन्होंने इस बाबत कहा कि इस सिफारिश का मतलब यह है कि जिन मरीजों ने खुद पर कोरोना दवाओं के परीक्षण की सहमति दे रखी है उन्हें डॉक्टर यह दवा देने लगेंगे। इस आदेश से पूर्व WHO के महानिदेशक ने यह भी बताया कि डब्ल्यूएचओ की सुरक्षा निगरानी कमेटी ने हाइड्रॉक्सिक्लोरोक्वीन के वैश्विक डाटा का परीक्षण कर लिया है। 

गौरतलब है कि इस दवा को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा कोरोना महामारी की लड़ाई में गेमचेंजर्स के रूप में विशेष तौर पर जोर दिया गया था। लेकिन अब इस शोध के फर्जी पाए जाने के बाद, हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा को लेकर किए गए इस फर्जी शोध के कारण अमेरिका की सियासत फिर से गरम हो सकती है।

क्या है हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन?

इस दवा का मुख्य तौर पर इस्तेमाल मलेरिया के उपचार के लिए किया जाता है। इसके अलावा आर्थराइटिस के उपचार के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा उत्पादन करने वाले देशों में से एक है। यह एंटी मलेरिया दवा है जो कई तरह के मलेरिया से लड़ने में सक्षम है। हालाँकि, यह दवा कोरोनावायरस से किस तरह लड़ती है इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।

गुजरात कॉन्ग्रेस: बगिया लुट गई, माली बेखबर, राज्यसभा चुनाव के साथ ही टलने वाला नहीं है यह संकट

यदि न्यूज चैनल्स की भाषा में कहूँ तो गुजरात में आजकल राजनीति ‘गरमाई’ हुई है। इसका कारण है राज्यसभा चुनाव। शुक्रवार को मोरबी से कॉन्ग्रेस विधायक बृजेश मेरजा ने इस्तीफा दे दिया। सात विधायक पहले ही पार्टी छोड़ चुके हैं।

करीब 36 साल से मैं गुजरात में हूॅं और लगातार राजनीतिक गतिविधि पर नजर बनाए रखता हूॅं। 2017 के राज्यसभा चुनाव को छोड़ दूॅं तो राज्य में संसद के उच्च सदन के सदस्य के चुनाव कभी इतने रोचक नहीं रहे।

क्यों गुजरात में पिछले तीन साल से राज्यसभा चुनाव इतने रोचक होते चले जा रहे हैं? इस सवाल का एक ही कारण है कि भाजपा राज्यसभा में अपना संख्या बल मजबूत करना चाह रही है। इसे ध्यान में रख अपने गढ़ में वह हर चुनाव में एक अतिरिक्त उम्मीदवार मैदान में उतार रही है।

गुजरात में राज्यसभा चुनाव तब पहली बार तब रसप्रद हुए जब भाजपा ने 2017 में अमित शाह और स्मृति ईरानी के अलावा कॉन्ग्रेस से ही पाला बदल कर आए बलवंत सिंह राजपूत को अपना तीसरा उम्मीदवार बनाया था।योजना थी सोनिया गाँधी के करीबी अहमद पटेल, जो उस समय लगातार छठे टर्म के लिए मैदान थे, उन्हें रोकना।

उस वक्त गुजरात कॉन्ग्रेस के विधायकों को बंगलुरु के एक रिसॉर्ट में कई दिन ठहराए जाने के बाद चुनाव हुआ था। चुनाव तो हो गया पर जब मतगणना हुई तो कॉन्ग्रेस के आधिकारिक पोलिंग एजेंट और गुजरात के वरिष्ठ नेताओं में से एक शक्ति सिंह गोहिल ने कुछ ऐसे तकनीकी मुद्दे उठाए कि मतगणना कई बार टालनी पड़ी और आखिरकार मध्यरात्रि के बाद अहमद पटेल को विजयी घोषित किया गया। ये मामला अभी भी गुजरात हाई कोर्ट में निलंबित है।

बस कुछ उसी तरह का चित्र गुजरात में इस बार के राज्यसभा चुनाव में भी उभर कर आया है। इस बार गुजरात से राज्यसभा के 4 सांसद जुने चाने हैं। गुजरात विधानसभा की संख्या के आधार पर भाजपा और कॉन्ग्रेस दोनों के दो-दो उम्मीदवारों का राज्यसभा जाना तय था। लेकिन, भाजपा ने अभय भारद्वाज और रमीला बेन बारा के अलावा पूर्व मंत्री नरहरी अमीन को तीसरा उम्मीदवार बनाया। कॉन्ग्रेस ने अपने दो दिग्गज नेता शक्ति सिंह गोहिल और भरत सिंह सोलंकी को मैदान में उतार रखा है।

यूँ तो यह चुनाव अप्रैल में हो जाने थे। लेकिन कोरोना के कारण उपजे हालात की वहज से चुनाव टालने पड़े। अब इस महीने की 19 तारीख को चुनाव होने हैं। वैसे अप्रैल में चुनाव टाले जाने से पहले ही गुजरात कॉन्ग्रेस के पॉंच विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था।

ये पॉंच विधायक थे, प्रवीणभाई मारू (गढडा), जेवी काकड़िया (धारी), सोमाभाई गांडाभाई पटेल (लिंबडी), प्रद्युम्नसिंह जाडेजा (अबडासा) और मंगलभाई गावीत (डांग)। उस समय भी यह कहा जा रहा था कि राज्यसभा के चुनाव आते-आते और भी कॉन्ग्रेसी विधायक अपने इस्तीफे विधानसभा अध्यक्ष को सौंप देंगे। जैसे ही चुनाव की नई तारीखों का ऐलान हुआ, कॉन्ग्रेस विधायक अक्षय पटेल व जीतू चौधरी ने इस्तीफा सौंप गुजरात की राजनीति को गरम कर दिया है।

राजनीति में आरोप प्रत्यारोप चलते रहते हैं। लेकिन यहॉं सवाल यह है कि गुजरात कॉन्ग्रेस को अभी और कितना अपमानित होना है और वह भी अपने ही विधायकों के द्वारा? गुजराती की एक कहावत का भावानुवाद है कि “सेना कहाँ लड़ रही है वो सेनापति को ही पता नहीं है”। गुजरात कॉन्ग्रेस की स्थिति भी कुछ ऐसी है। जब सारे गुजराती न्यूज चैनल्स अक्षय पटेल के इस्तीफे की खबर ब्रेकिंग न्यूज के रूप में चमका रहे थे तभी गुजरात कॉन्ग्रेस के प्रमुख अमित चावड़ा अचानक से प्रगट हुए। उन्होंने अक्षय पटेल के इस्तीफे की बात को अफ़वाह करार दिया। लेकिन, चावड़ा के प्रगट होने के ठीक एक घंटे बाद गुजरात विधानसभा अध्यक्ष ने न केवल अक्षय पटेल, बल्कि उनके साथ जीतू चौधरी के इस्तीफे की भी पुष्टि कर दी। जाहिर है कि गुजरात कॉन्ग्रेस के सेनापति अमित चावड़ा को पता भी नहीं था की उनकी सेना कहाँ लड़ रही है।

य​दि हम एक बार गुजरात कॉन्ग्रेस के इस आरोप को मान भी लें कि भाजपा खरीद-फरोख्त कर रही है तो भी सवाल उस पर ही उठते है। यदि माल खुद बिकने को तैयार हो तो उसे कोई क्यूँ नहीं खरीदेगा? गौर करने वाली बात यह भी है कि कॉन्ग्रेस से बीजेपी में विधायकों के जाने का यह सिलसिला 2017 से शुरू हुआ है। पार्टी छोड़ने वाले हर विधायक ने यह बात कही है कि उनकी कॉन्ग्रेस में नहीं सुनी जाती। यह बात कुंवरजी बावलिया और जवाहर चावड़ा जैसों ने भी कही जो पीढ़ियों से कॉन्ग्रेसी थे।

कॉन्ग्रेस छोड़ते वक्त यही बात ठाकोर नेता अल्पेश ठाकोर ने भी कही थी। हालॉंकि कॉन्ग्रेस और उनका साथ एक-डेढ़ साल से ज़्यादा नहीं रहा, फिर भी इससे यह तो पता चलता ही है कि गुजरात कॉन्ग्रेस में कुछ भी ठीक नहीं है। गुजरात कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष का तो जनता से जुड़ाव उस कदर भी नहीं है जितना शायद शक्ति सिंह गोहिल, भरत सिंह सोलंकी या फिर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष परेश धाणानी का है। शायद यही कारण है कि पार्टी विधायकों के इस्तीफे की भनक तक प्रदेश अध्यक्ष को नहीं थी।

अक्षय पटेल और जीतू चौधरी के इस्तीफे के बाद अल्पेश ठाकोर ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि गुजरात कॉन्ग्रेस का और भी बुरा हाल होने वाला है। उन्होंने गुजरात कॉन्ग्रेस की गुटबाजी का हवाला देते हुए यह बात कही। यदि ऐसा है तो राज्यसभा चुनाव के बाद भी कॉन्ग्रेस का यह संकट खत्म होने वाला नहीं दिखता।

जब मार्च में राज्यसभा चुनाव की घोषणा हुई थी और कॉन्ग्रेस के पॉंच विधायकों ने इस्तीफा दिया था तभी से यह माना जा रहा था कि कॉन्ग्रेस को एक ही सीट से संतोष करना पड़ेगा। उस समय शक्ति सिंह गोहिल और भरत सिंह सोलंकी में से किसी एक के मैदान छोड़ देने के विकल्प पर चर्चा भी हुई थी। परंतु दोनों पक्ष अपने आप को एक दूसरे से बेहतर लड़ाकू बताने पर तुला रहा और कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं था। वो तो भला हो कोरोना का कि गुजरात कॉन्ग्रेस की जो अंदरूनी लड़ाई अप्रैल में बेनकाब हो जानी थी वह जून तक टल गया।

पर अब जून भी आ गया है। 19 जून भी आने को है। फिलहाल परिस्थिति ऐसी है कि एक उम्मीदवार को जीत के लिए 35 वोट चाहिए। आठ विधायकों के इस्तीफे के बाद कॉन्ग्रेस के 65 विधायक रह गए हैं। अगर निर्दलीय जिग्नेश मेवानी के वोट भी उनके साथ गिन ले तो आँकड़ा 66 तक पहुॅंचता है। ट्राइबल पार्टी BTP के दो विधायक जोड़ने पर 68 और NCP के एकमात्र विधायक के साथ आने पर भी यह 69 ही होता है। यानी तब भी कॉन्ग्रेस के केवल एक ही उम्मीदवार की जीत पक्की है। वैसे कहा जा रहा है कि शरद पवार का चाहे जो निर्देश हो NCP विधायक कांधल जाडेजा भाजपा के उम्मीदवारों को ही अपना वोट देंगे। चुनाव तक BTP विधायकों के भी जाडेजा की ही राह पकड़ने की अटकलें हैं।

ऐसे में कॉन्ग्रेस के पास एक ही रास्ता है कि वह भाजपा विधायकों से इस्तीफ़ा दिलवाना शुरू करे और गेंद धीरे धीरे अपने पाले में लाने की कोशिश करे। लेकिन जिस कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को अपने विधायकों के पार्टी छोड़ने की खबर न हो, वो भला भाजपा के विधायकों को कैसे पाला बदलने के लिए राजी कर सकते हैं और वह भी एक-दो नहीं, बल्कि तीन से चार विधायकों को। वैसे भी जो पार्टी तीन दशक से गुजरात की सत्ता में लगातार बनी हुई हो उसको छोड़कर कोई भी विधायक ऐसी पार्टी में क्यों जाना चाहेगा जिसका सेनापति दिशाहीन हो?

मोटी बात यह है कि गुजरात में भी कॉन्ग्रेस की स्थिति देश के अन्य हिस्सों से अलग नहीं है, बल्कि ज्यादा ही खराब दिखती है। जब हालात यह बन गए हैं कि शक्ति सिह गोहिल या भरत सिंह सोलंकी में से एक ही राज्यसभा में जा सकेंगे तो यह संकट और बढ़ेगा। जो उच्च सदन नहीं पहुॅंचेगा वह या तो अपनी गतिविधियों, अपनी ताकत को सीमित कर लेगा या फिर उसे पार्टी की अंदरुनी लड़ाई को तेज करने में लगाएगा।

गुजरात में इस साल के अंत तक 7 म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के चुनाव होने हैं। 2022 में विधानसभा चुनाव है। क्या गुजरात कॉन्ग्रेस में तब तक इतनी ताकत बचेगी कि वह इन चुनावों में टक्कर दे पाए? या फिर उस के पास पाटीदार आंदोलन की तरह एक और वर्ग विग्रह का कटु शस्त्र ही बच जाएगा ताकि भाजपा को हराना सुनिश्चित न हो सके तो पिछली बार की तरह ही उसे प्रचंड बहुमत पाने से रोकने में सफलता मिल सके।

फिलहाल तो गुजरात कॉन्ग्रेस की हालत ‘खाया पिया कुछ नहीं पर गिलास तोड़ा बारह आना’ जैस’ है। न वह तीन दशक से सत्ता में आ सकी है और न अब अपने विधायकों को एकजुट रख पा रही है।