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BJP घृणा में ‘न्यूज 24’ इतना अंधा कि बार बार अपना ही थूका चाट रहा: GDP गिरने से लेकर मुस्लिम आरक्षण तक पर किया गुमराह, हेराफेरी पकड़ी गई तो ट्वीट किया डिलीट

फेक न्यूज फैलाकर लोगों को गुमराह करने के आरोपों को लगातार झेलने वाले न्यूज 24 चैनल आदतों से बाज नहीं आ रहा है। पिछले कुछ समय में न्यूज 24 के कई बड़े झूठ पकड़े जा चुके हैं। शुक्रवार (29 नवंबर 2024) को न्यूज 24 ने एक बार फिर से झूठ बेचने की कोशिश की और अपने ऑफिसियल एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल पर पोस्ट शेयर किया कि भारत की जीडीपी में गिरावट आई है।

इससे पहले, वो अप्रैल 2024 में बीजेपी नेता और हैदराबाद से पार्टी की प्रत्याशी रहीं डॉ माधवी लता के बारे में फेक न्यूज फैला चुका है, जिसमें उसे माफी भी माँगनी पड़ी थी। दोंनों ही मामलों में चैनल ने ट्वीट डिलीट कर भले ही माफी माँग ली हो, लेकिन इससे उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं।

GDP पर देश को गुमराह करने वाला ट्वीट

News24 ने शुक्रवार (29 नवंबर 2024) को एक ट्वीट किया जिसमें दावा किया गया कि वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में भारत की जीडीपी 5.4% गिर गई। ट्वीट में लिखा गया, “दूसरी तिमाही में देश की GDP में गिरावट, 5.4% कम हुई।”

न्यूज24 का भ्रामक ट्वीट, जिसके बाद में डिलीट कर दिया गया।

हकीकत में यह दावा पूरी तरह गलत था। भारत की जीडीपी में गिरावट नहीं हुई, बल्कि जीडीपी वृद्धि दर 5.4% थी। यह पिछले 7 तिमाहियों में सबसे धीमी वृद्धि दर जरूर है, लेकिन कुल जीडीपी घटने का कोई सवाल नहीं था।

भारत वर्तमान में दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और $5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। इसके बावजूद, News24 ने गलत जानकारी फैलाते हुए दर्शकों को गुमराह किया। जब सोशल मीडिया पर इसकी आलोचना हुई, तो चैनल ने यह ट्वीट डिलीट कर दिया।

एक यूजर लाला ने X (ट्विटर) पर लिखा, “News24 फिर से फेक न्यूज फैक्ट्री बनता जा रहा है।”

मुस्लिम आरक्षण पर भी फैलाया था फेक न्यूज

बता दें कि News24 ने 21 अप्रैल 2024 को भाजपा नेता माधवी लता के नाम से एक पोस्ट किया था, जिसमें दावा किया गया कि उन्होंने सभी मुसलमानों के लिए आरक्षण की माँग की है। पोस्ट में लिखा था, “अरब, सैयद और शिया मुसलमानों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। हम सभी मुसलमानों के लिए आरक्षण की माँग कर रहे हैं।”

इस ट्वीट के लिए न्यूज24 ने माँगी थी माफी

इस दावे को माधवी लता ने तुरंत खारिज किया और इसे झूठा बताया। उन्होंने कहा, “मैंने कभी ऐसा कोई बयान नहीं दिया। यह निराशाजनक है कि एक राष्ट्रीय मीडिया चैनल मेरे नाम पर झूठ फैलाए।”

भाजपा नेता की नाराजगी के बाद News24 ने अपना ट्वीट डिलीट कर इसे ‘मानवीय भूल’ बताया। चैनल ने माफी माँगते हुए कहा, “यह ट्वीट मानवीय भूल का परिणाम था और इसे हटा दिया गया है। इसके लिए हम क्षमा चाहते हैं।”

सोशल मीडिया पर न्यूज 24 के खिलाफ गुस्सा

इन दोनों घटनाओं के बाद News24 की जमकर आलोचना हुई। कई सोशल मीडिया यूजर्स ने चैनल पर झूठी खबरें फैलाने का आरोप लगाया।

एक यूजर ने लिखा, “हर दिन News24 फेक न्यूज फैलाओ, फिर डिलीट करो और माफी माँग लो। यह इनका रोज का काम हो गया है।”

दूसरे ने लिखा, “एक न्यूज चैनल होने के नाते क्या आप इस तरह की गलती कर सकते हैं? क्या आप बिना जाँचे-परखे खबरें पोस्ट करते हैं?”

विश्वसनीयता पर उठते सवाल

इन दोनों मामलों ने News24 की साख पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। यह स्पष्ट है कि चैनल की ओर से बार-बार ‘मानवीय भूल’ का बहाना बनाकर गलत जानकारी फैलाने की कोशिश की जा रही है। मीडिया का काम जनता को सही और सटीक जानकारी देना है। लेकिन बार-बार ऐसी गलतियाँ दिखाती हैं कि News24 जैसी संस्थाओं को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार की जरूरत है। वरना, दर्शकों का विश्वास खोने का खतरा हमेशा बना रहेगा।

‘अल्लाहु अकबर’ के नारे लगाते हुए संभल में पुलिस पर टूटी इस्लामी भीड़, हिंसा में 14 साल के लड़के से लेकर 72 साल का मोहम्मद तक शामिल: FIR से खुलासा, खून-खराबे की मंशा से जुटे थे उपद्रवी

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में रविवार (24 नवंबर 2024) को मुस्लिम भीड़ ने पुलिस पर हमला कर दिया था। यह हमला उस समय किया गया था जब कोर्ट के आदेश पर एक टीम जामा मस्जिद का सर्वे करने गई थी। हमले में 2 दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए थे और भीड़ में शामिल 5 लोगों की संदिग्ध हालातों में मौत भी हुई थी।

पुलिस घटना के बाद से आरोपितों का पता लगाने में जुटी थी। अब इसी जाँच के क्रम में सामने आया है कि घटना वाले दिन हिंसक भीड़ अल्लाहु अकबर का नारा लगाते हुए आगे बढ़ी थी और आरोपितों के पास तमंचे और कारतूस भी थे। पुलिस ने आरोपितों की गिरफ्तारी के साथ इन हथियारों को बरामद कर लिया है। आरोपितों की उम्र 14 से 72 वर्ष के बीच है।

इस हिंसा की विस्तृत FIR SHO संभल कोतवाली इंस्पेक्टर अनुज कुमार तोमर ने दर्ज करवाई है। रविवार को दी गई अपनी तहरीर में SHO ने बताया कि 24 नवंबर को वो अपने हमराह पुलिसकर्मियों के साथ संभल की जामा मस्जिद पर ड्यूटी दे रहे थे। सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर एहतियातन पुलिसकर्मी कारतूस, टीयर गैस सेल और अन्य दंगा निरोधक उपकरणों से लैस थे। तभी अचानक ही मस्जिद की तरफ 800 से 900 लोगों की भीड़ तेजी से बढ़ने लगी।

अल्लाहु अकबर चिल्ला रही थी भीड़

इंस्पेक्टर संभल कोतवाली का दावा है कि भीड़ ‘अल्लाहु अकबर’ का नारा लगा रही थी। इस भीड़ को आगे बढ़ कर कुछ पुलिसकर्मियों ने रोकना चाहा। इन्हें समझाने की बहुत कोशिश की गई। पुलिस ने बताया कि मस्जिद को किसी भी तरह का नुकसान नहीं किया जा रहा। हालाँकि भीड़ में से कोई बी यह दलील सुनने को तैयार नहीं था। सुबह 8:45 पर भीड़ ने पुलिस पर पत्थरबाजी शुरू कर दी और मस्जिद से महज 100 मीटर की दूरी तक पहुँच गई।

भीड़ ने सुरक्षा पंक्ति बनाकर खड़े पुलिसकर्मियों को पीटना शुरू कर दिया। उनमें से कई के हथियारों को लूट लिया गया। हमले में कई पुलिसकर्मियों को गंभीर चोटें आईं। हालात गंभीर होता देखकर अतिरिक्त फ़ोर्स की माँग की गई। कुछ पुलिस वालों को अपने घायल सिपाहियों के इलाज की जिम्मेदारी पर लगा दिया गया। खुद SHO ने भीड़ से लूटे गए हथियारों को वापस करने की अपील की। हालाँकि बदले में उन पर भी पत्थरबाजी शुरू कर दी गई।

सिपाही से ले कर SDM तक, किसी को नहीं छोड़ा

पत्थरबाजी में कोतवाली संभल के साथ कैलादेवी, रजपुरा और कुढ़फतेहगढ़ के भी SHO घायल हो गए। भीड़ द्वारा हिंसा जारी रही और इसकी चपेट में SDM रमेश बाबू भी आ गए। कुछ ही देर में हिंसक भीड़ ने DSP अनुज चौधरी और SP संभल के PRO (जनसम्पर्क अधिकारी) को भी मार कर घायल कर दिया। सर्वे टीम तक पहुँचने पर आमादा हिंसक भीड़ को रोकने में रैपिड एक्शन फ़ोर्स (RAF) के कांस्टेबल सोनू सहित उत्तर प्रदेश पुलिस के कई अन्य जवानों को भी चोटें आईं।

तहरीर में आगे बताया गया है कि चोटिल होने के बावजूद भीड़ को निषेधाज्ञा लागू होने का हवाला दिया गया। साथ ही उन्हें न मानने पर बल प्रयोग की चेतावनी भी मिली। इस बात पर भीड़ ने अपनी हिंसा तेज कर दी। पुलिस पर पत्थरों के साथ गोलियों की भी बौछार कर दी गई। सार्वजनिक सम्पत्तियों में भी तोड़फोड़ शुरू हो गई। इसी दौरान एक संरक्षित दीवार को भी तोड़ दिया गया और टायरों को जला कर आगजनी शुरू कर दी गई।

पुलिस का मानना है कि भीड़ की इन करतूतों से शांति व्यवस्था भंग हो गई थी और आम लोगों के मन में आतंक का माहौल बन गया था। तमाम दुकानदारों ने अपने शटर गिरा दिए और लोगों ने अपने घरों की खिड़कियाँ बंद कर दीं। बल प्रयोग के तौर पर पुलिस ने भीड़ पर वाटर कैनन से पानी की बौछार की लेकिन उपद्रवी टस से मस नहीं हुए और पथराव जारी रहा। तभी जिले के DM ने हल्का बल प्रयोग करने का आदेश दिया।

दंगाइयों में 14 वर्षीय नाबालिग से 72 साल का का बुजुर्ग तक

पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए रबर बुलेट और आँसू गैस के गोले छोड़े। बदले में हमलावरों ने पत्थरबाजी के साथ गोलियाँ बरसानी जारी रखीं। इसी दौरान पुलिस ने हमला कर रहे 21 उपद्रवियों को गिरफ्तार भी किया। इन पकड़े गए लोगों में 19 साल के मोहम्मद शादाब और इतनी ही उम्र के मोहम्मद रिहान शामिल हैं। ये दोनों आरोपित संभल की जामा मस्जिद के आसपास मौजूद बाजारों के निवासी हैं। पकड़े गए तीसरे आरोपित का नाम गुलफाम है।

पुलिस की कार्रवाई में पकड़ा गया चौथा आरोपित अमान है। पाँचवे आरोपित का नाम मोहम्मद सलीम है। 30 वर्षीय मोहम्मद सलीम की तलाशी में 5 प्लास्टिक पैलेट बरामद हुई। माना जा रहा है कि इसे पुलिस से लूटा गया था। 19 साल के छठवें आरोपित का नाम मोहम्मद समीर है। पकड़ा गया सातवाँ आरोपित 37 साल का याकूब है जिसके पास से 12 बोर का एक तमंचा और उसकी नली में फँसा एक कारतूस बरामद हुआ है।

दबोचा गया 8वाँ आरोपित 19 वर्षीय सलमान है। 9वें आरोपित 30 साल के रिहान अली के पास से पुलिस से लूटी गई 2 रबर बुलेट मिली है। 10वाँ आरोपित 72 साल का बुजुर्ग मोहम्मद बाबू है। 22 साल का 11वाँ आरोपित मोहम्मद हैदर है जिसकी तलाशी के दौरान उसके पास पुलिस से लूटा गया 3 ब्लैंक कारतूस बरामद हुआ है। 12वाँ आरोपित 22 वर्षीय यामीन है। यामीन के पास से पुलिस को 12 बोर के 2 कारतूस मिले हैं। 13वाँ आरोपित 30 साल का सलीम है।

पुलिस द्वारा दबोचे गए 14वें आरोपित 32 वर्षीय आफ़ताब के पास से एक तमंचा व 2 कारतूस मिले हैं। इसमें से एक कारतूस आफताब ने तमंचे में लोड कर रखा था। 15वें आरोपित की पहचान 58 वर्षीय बुजुर्ग मोहम्मद नदीम के तौर पर हुई है। 16वें और 17वें आरोपितों की पहचान क्रमशः 22 वर्षीय फ़िरोज़ और इसी उम्र के फरदीन के तौर पर हुई है। गिरफ्तार हुआ 18वाँ आरोपित 25 वर्षीय मोहम्मद तहजीब है जिसके पास से .315 बोर का एक तमंचा और 2 कारतूस बरामद हुए हैं। इसमें से एक कारतूस तमंचे में लोड था।

बताते चलें कि संभल हिंसा में मारे गए अधिकतर लोगों के पोस्टमार्टम रिपोर्ट में .315 बोर की ही गोली लगना पाया गया है। गिरफ्तार हुआ 19वाँ आरोपित 46 साल का नईम है। इन सभी के अलावा पकड़े गए दंगा आरोपितों में 2 नाबालिग भी शामिल हैं। इनमें से एक की उम्र 16 वर्ष जबकि दूसरे की महज 14 साल है।

पुलिसकर्मी ही नहीं उनके वाहन भी टारगेट पर

गौरतलब है कि हिंसा के दौरान उपद्रवियों ने पुलिस वालों की 3 प्राइवेट कारों को भी जलाकर निशाना बनाया। इसके साथ सुरक्षा बलों की 4 निजी बाईकों को भी आग के हवाले कर दिया गया। ये सभी पुलिसकर्मी अलग-अलग थानाक्षेत्रों से इमरजेंसी ड्यूटी पर जामा मस्जिद क्षेत्र में भेजे गए थे। सरकारी गाड़ियों में भी आगजनी का प्रयास किया गया। पत्थरबाजी करके DSP की गाड़ी का शीशा तोड़ डाला गया। उपद्रवियों का इतना खौफ था कि उनके खिलाफ डर से कोई स्थानीय व्यक्ति गवाही देने के लिए तैयार नहीं हुआ।

पुलिस ने 24 नवंबर को ही इन सभी 21 आरोपितों को शाम 5:10 पर आधिकारिक तौर पर गिरफ्तार कर लिया। इनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 191 (2), 191 (3), 190, 109 (1), 125 (a), 125 (b), 221, 132, 121 (1), 121 (2), 324 (4), 223 (b), 326 (f) और 317 (3) के साथ आपराधिक कानून संसोधन 1932 की धारा 7 व सार्वजानिक सम्पत्ति नुकसान निवारण अधिनियम 1984 के सेक्शन 3/4 के तहत कार्रवाई की गई है। इन सभी पर आर्म्स एक्ट की धारा 7/3/4 भी लगाई गई है।

ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। पुलिस मामले की जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई में जुटी हुई है। CCTV फुटेज व अन्य माध्यमों से अन्य हमलावरों की तलाश की जा रही है। भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच बीते शुक्रवार (29 नवंबर) की जुमे की नमाज़ अदा की गई है। घायल पुलिसकर्मियों का इलाज चल रहा है।

जिसे मुस्लिम कहते हैं संभल की जामा मस्जिद, उस हरि मंदिर में सपा सरकार ने बंद करवाई थी पूजा: बीजेपी MLA ने दिखाए मैप-फोटो, ASI ने भी माना इमारत में बार-बार हुए बदलाव

उत्तर प्रदेश स्थित संभल के जामा मस्जिद-हरिहर मंदिर विवाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के मेरठ सर्किल में पुरातत्वविद अधीक्षक विनोद सिंह रावत ने एक हलफनामे दायर किया है। इस हलफनामे में कहा गया है कि ASI अधिकारियों को निरीक्षण के लिए मस्जिद में जाने की अनुमति नहीं दी गई। इसके साथ ही जामा मस्जिद प्रबंधन समिति ने मस्जिद के अंदर कई हस्तक्षेप एवं बदलाव किए हैं।

हलफनामे में कहा गया है कि ASI की एक टीम ने विवादित मस्जिद का साल 1998 में और फिर जून 2024 में निरीक्षण किया था। पत्रकार राहुल शिवशंकर द्वारा सोशल मीडिया साइट X पर शेयर किए गए हलफनामे की कॉपी में कहा गया है, “एएसआई के लिए भी स्थिति बहुत कठिन है। ASI के अधिकारियों को भी निरीक्षण के लिए स्मारक में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी।”

हलफनामे में आगे कहा गया है, “हालाँकि, जिला प्रशासन के सहयोग से ASI ने समय-समय पर स्मारक (जामा मस्जिद) का निरीक्षण किया। ASI की एक टीम ने साल 1998 में स्मारक का निरीक्षण किया था। एएसआई टीम द्वारा स्मारक का सबसे हालिया निरीक्षण 25 जून, 2024 को किया गया था। निरीक्षण नोट की एक प्रति भी अनुलग्नक-I के रूप में संलग्न है।”

विनोद सिंह रावत ने आगे कहा है कि संभल के जामा मस्जिद प्रबंधन समिति ने विवादित मस्जिद में कई तरह के हस्तक्षेप और बदलाव किए हैं। मस्जिद प्रबंधन समिति ने ASI टीम को निरीक्षण करने से रोक दिया है। इस तरह ASI को मस्जिद की वर्तमान स्थिति के बारे में पता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि ASI के पास इस बारे में भी कोई जानकारी नहीं है कि मस्जिद में कोई अतिरिक्त निर्माण किया गया था या नहीं।

हलफनामे में आगे लिखा है, “अनुच्छेद 32 और 33 के जवाब में यह प्रस्तुत किया गया है कि स्मारक से जुड़ी मस्जिद प्रबंधन समिति ने स्मारक में विभिन्न हस्तक्षेप, परिवर्धन, संशोधन आदि किए हैं। जून 2024 के महीने में ASI के अधिकारियों द्वारा किए गए निरीक्षण में स्मारक में किए गए कुछ हस्तक्षेपों को दर्ज किया गया है। उक्त निरीक्षण नोट की एक प्रति कृपया अनुलग्नक-I में देखी जा सकती है।”

इसमें आगे कहा गया है कि ASI टीम को इसके नियमित निरीक्षण से रोक दिया गया है। विनोद सिंह रावत ने अपने हलफनामे में यह भी बताया है कि इस मस्जिद में जब भी किसी आधुनिक हस्तक्षेप या बदलाव की गतिविधि देखी गई तो स्थानीय पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई और इसके जिम्मेदार लोगों एवं संस्थाओं को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए।

इस तरह जामा मस्जिद की वर्तमान स्थिति और उसमें किए गए बदलाव के बारे में ASI को जानकारी नहीं है। इस मामले में यह हलफनामा बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि 22 दिसंबर 1920 को अधिनियम की धारा 3(3) के तहत संयुक्त प्रांत सरकार ने अधिसूचना जारी करके विवादित स्थल को संरक्षित स्मारक घोषित किया था।

सपा सरकार से पहले हरिहर मंदिर में होती थी पूजा-अर्चना

वहीं, देवरिया से भाजपा विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने अपने सोशल मीडिया साइट X पर जामा मस्जिद का पुराना नक्शा और कुछ तस्वीरें शेयर की हैं। इनमें कुछ महिलाओं को पूजा करते हुए देखा जा सकता है। त्रिपाठी का कहना है कि साल 2012 की सपा सरकार से पहले जामा मस्जिद में पूजा और शादी-विवाह होते थे।

उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा, “इसकी (पूजा-अर्चना और शादी-विवाह की) पुरानी तस्वीरें भी हैं। सपा सरकार में MP शफीकुर्रहमान बर्क़ के दबाव में पूजा-अर्चना रूकवा दी गई। हरि मंदिर को पूरी तौर पर जामा मस्जिद में तब्दील कर दिया गया। सरकारी गजट से लेकर तमाम लेखों में यहाँ हिंदू मंदिर का ज़िक्र है। यही वजह है कि आज कुछ लोगों को सर्वे से डर लगता है!”

मंदिर-घर-संपत्ति सबको इस्लामी कट्टरपंथी बना रहे निशाना, पर मुस्लिमों से ही पूछकर वॉयस ऑफ अमेरिका ने हिंदुओं को बताया सुरक्षित: अब इसी सर्वे को दिखा प्रोपेगेंडा कर रही बांग्लादेशी मीडिया

बांग्लादेश में एक तरफ हिंदुओं के खिलाफ हिंसा खत्म होने का नाम नहीं ले रही, चुन-चुनकर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है, हिंदू नेताओं पर ईशनिंदा के केस लगाए जा रहे हैं और दूसरी तरफ बांग्लादेश का मीडिया दुनिया के सामने अलग माहौल बनाने में लगा है जहाँ ये बताया जा रहा है कि मुहम्मद युनूस की अंतरिम सरकार में बांग्लादेशी अल्पसंख्यक अधिक सुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

नीचे कुछ बांग्लादेशी मीडिया आउटलेट की हेडलाइन देख सकते हैं। इनमें वॉयस ऑफ अमेरिका के सर्वे का हवाला देते हुए कहा गया है कि सर्वे बता रहा है कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में अल्पसंख्यक सुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

हेडलाइन से बिलकुल ऐसा लग रहा है मानो इस सर्वे में अल्पसंख्यकों से ही पूछा गया होगा कि उन्हें बांग्लादेश में सुरक्षित लगता है या नहीं। लेकिन खबर के अंदर देखने पर पता चलेगा कि ये सर्वे का निष्कर्ष भी बांग्लादेश की बहुसंख्यक आबादी यानी मुस्लिमों से पूछकर दिया गया है।

ढाका ट्रिब्यून हो या डेली स्टार, सबने अपनी रपोर्ट में वॉयस ऑफ अमेरिका (VOA) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए बताया कि, बांग्लादेश में अधिकांश लोग मानते हैं कि अंतरिम सरकार धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों को पिछले अवामी लीग सरकार की तुलना में अधिक सुरक्षा प्रदान कर रही है।

दिलचस्प बात ये है कि अक्टूबर के अंत में किए गए इस सर्वे में 1,000 लोगों ने भाग लिया था, जिनमें से 92.7% मुस्लिम ही थे। सोचिए, अल्पसंख्यकों की स्थिति के बारे में मुस्लिमों से पूछा गया कि अल्पसंख्यक उनके देश में कैसा महसूस करते हैं।

नतीजे आए कि 64.1% का मानना है कि वर्तमान अंतरिम सरकार अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को बढ़ा रही है। इसके विपरीत, केवल 15.3% उत्तरदाताओं ने कहा कि स्थिति पहले से खराब हुई है, जबकि 17.9% ने महसूस किया कि स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। सर्वेक्षण में शामिल मुसलमानों का केवल 13.9% हिस्सा मानता है कि यूनुस सरकार के तहत अल्पसंख्यकों की सुरक्षा स्थिति खराब हुई है। इसके विपरीत, गैर-मुसलमानों में से 33.9% ने कहा कि स्थिति पहले से खराब हो गई है।

उल्लेखनीय है कि बांग्लादेश में एक तरफ मीडिया ‘वॉयस ऑफ अमेरिका’ जैसे सर्वेक्षणों के नतीजों के जरिए प्रोपगेंडा रच रहा है और दूसरी तरफ हिंदू अपने हालातों पर रोते-बिलखते दिख रहे हैं। उनकी आवाज उठाने को कोई नहीं है। ये जिस युनूस सरकार के राज में अल्पसंख्यकों के साथ इंसाफ की बातें मुस्लिम कर रहे हैं उसी सरकार के आने के बाद हिंदुओं के साथ बांग्लादेश में तमाम घटनाएँ हुईं।

इस्लामी कट्टरपंथियों ने न केवल उनके घरों को जलाया, उनके सामानों को लूटा बल्कि उनकी महिलाओं से बदसलूकी की, उनके देवी-देवताओं का अपमान किया और कई जगह हत्या जैसी घटनाओं को भी अंजाम दिया गया। इतने से जब मन नहीं भरा तो हिंदुओं को रैली करता देख भी कट्टरपंथी भड़क गए। उन्होंने कुछ दिन पहले ही बांग्लादेशी झंडे के अपमान का आरोप लगाकर हिंदू नेता कृष्ण दास को गिरफ्तार करवा दिया। फिर उनपर ईशनिंदा का आरोप लगाया और उन्हें देशद्रोह के इल्जाम में जेल में डाल दिया।

बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति इतनी बदतर है कि सोशल मीडिया पर हिंदुओं की तमाम वीडियो है जिसमें वो रो रोकर मदद माँगने को मजबूर हैं। युनूस सरकार के आने के बाद भी कई हिंदू महिलाओं की रोती-बिलखती वीडियोज सामने आईं थी। बड़े-बड़े कलाकार इसलिए निशाना बनाए गए क्योंकि वो हिंदू थे। उनके घरों को तबाह कर दिया गया, उन्हें घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया। और, जब बात उन्हें इंसाफ देने की आई तो युनूस सरकार ने ये कहकर पल्ला झाड़ लिया कि वो छात्र आंदोलन में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करेंगे। इतने पर भी मीडिया ये फैला रहा है कि युनूस सरकार अल्पसंख्यकों को सुरक्षित माहौल दे रही है।

जुमे की नमाज के बाद चटगाँव में 3 मंदिरों पर हमला, मूर्तियों को तोड़ा: हिंदुओं की दुकानों को भी फूँका, पीड़ितों को बचाने नहीं आई बांग्लादेश की पुलिस-फौज

प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्ता पलट के बाद बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं का नरसंहार जारी है। हत्या और बलात्कार की घटनाएँ बढ़ गई हैं। मंदिरों का विध्वंस किया जा रहा है। जिहादी एवं चरमपंथियों द्वारा दिए जा रहे इस कृत्य को मोहम्मद यूनुस की सरकार और सेना का समर्थन प्राप्त है। जुमे की नमाज के बाद हिंसक इस्लामी फिर ने हिंदुओं और मंदिरों को निशाना है।

हिंसक इस्लामी भीड़ ने जुमे की नमाज के बाद शुक्रवार (29 नवंबर 2024) को बांग्लादेश के चटगाँव स्थित तीन हिंदू मंदिरों पर हमला कर दिया और उसमें तोड़फोड़ की। इस्लामी चरमपंथियों ने हिंदू देवी-देवताओं की प्रतिमा को भी नहीं छोड़ा। उन्होंने प्रतिमा को खंडित करके टुकड़ों को इधर-उधर फेंक दिया। वहीं, हिंदुओं पर हमले किए गए। इसके कारण लोगों को अपनी जान बचाने के लिए भागना पड़ा।

शुक्रवार को चटगाँव के कोतवाली पुलिस स्टेशन इलाके में स्थित हिंदुओं के दुकानों को आग लगा दी गई। कुछ लोगों के मकानों में भी आग लगाने की बात सामने आ रही है। शांतानेश्वरी मातृ मंदिर, शनि मंदिर और शांतनेश्वरी कालीबाड़ी मंदिर को निशाना बनाया गया। हमले के दौरान हिंदुओं ने सेना और पुलिस से मदद माँगी, लेकिन उनकी कोई मदद नहीं की गई।

शांतिनेश्वरी मंदिर प्रबंधन समिति के स्थायी सदस्य तपन दास ने स्थानीय बीडीन्यूज24 को बताया, “जुमा (शुक्रवार) की नमाज के बाद सैकड़ों लोगों का एक जुलूस आया। उन्होंने हिंदू विरोधी और इस्कॉन विरोधी नारे लगाने शुरू कर दिए। हमलावरों ने मंदिर पर हमला कर कर दिया और ईंट-पत्थर फेंके। उन्होंने शनि मंदिर और काली मंदिर में तोड़फोड़ की और दुकानों को निशाना बनाया।”

जिन इलाकों में हमला किया गया है, वे हिंदू बहुल हैं। यहाँ की 90 प्रतिशत आबादी हिंदू है। सत्ता पलटने के बाद अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही हिंसा से डरकर समुदाय के कई लोग इलाका छोड़कर चले गए हैं। शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार के तख्ता पलट के बाद बांग्लादेश में अब तक 200 से अधिक हिंदू मंदिरों निशाना बनाते हुए देवी-देवताओं को अपवित्र किया गया है।

यही वो चटगाँव है, जहाँ ISCKON के संत चिन्मय कृष्णदास और उनके दो सहयोगियों को गिरफ्तार किया गया है। उनकी गिरफ्तारी के बाद अल्पसंख्यक समुदाय ने यहाँ विरोध प्रदर्शन किए थे। दरअसल, यूनुस सरकार को समर्थन दे रहीं बांग्लादेश की इस्लामी पार्टियों ने ISKCON को बैन करवाने के लिए जोर लगा दिया है। वे ISKCON को ‘कट्टरपंथी संगठन’ बता रही हैं।

बांग्लादेश की कट्टरपंथी सरकार ने चिन्मय कृृष्णदास की जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। इतना ही नहीं, बांग्लादेश सरकार ने चिन्मय कृष्णदास सहित उनकी धार्मिक संस्था से जुड़े 17 लोगों के बैंक खातों को फ्रीज कर दिया है। इन खातों से लेन-देन पर 30 दिन के लिए रोक लगाने का आदेश दिया गया है। इस्लामी मुल्क में हिंदू संत पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया है। 

MCD अस्पतालों में 31% पद खाली, केवल 36% स्वास्थ्य बजट का इस्तेमाल: AAP के ‘दिल्ली मॉडल’ से मरीजों की हालत बदतर, नहीं मिल पा रहा इलाज

आम आदमी पार्टी (AAP) के नेतृत्व वाली दिल्ली नगर निगम (MCD) की स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। ‘दिल्ली में स्वास्थ्य मुद्दों की स्थिति 2024’ नामक इस रिपोर्ट को 28 नवंबर को प्रजा फाउंडेशन द्वारा जारी किया गया। इसमें बताया गया है कि 2023-24 में MCD के अस्पतालों और डिस्पेंसरी में स्वीकृत पदों में से 31% पद खाली रहे, जबकि 2022-23 के स्वास्थ्य बजट का केवल 36% उपयोग किया गया।

दिल्ली सरकार के साल 2022-23 के बाद 2023-24 में स्वास्थ्य बजट में 16% की बढ़ोतरी हुई और 2024-25 में यह 12% और बढ़ाया गया। लेकिन बजट का उपयोग प्रभावी नहीं हो पाया। 2023-24 के बजट के उपयोग का डेटा भी उपलब्ध नहीं है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे रिसर्च के दौरान MCD और राज्य सरकार के कई अस्पतालों ने महीनों का डेटा पूरा नहीं दिया। प्रजा फाउंडेशन के शोध प्रबंधक श्रेयस चोरगी ने बताया कि दिल्ली में स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी के लिए डेटा संग्रह प्रणाली कमजोर है। उन्होंने कहा, “दिल्ली में स्वास्थ्य सेवाओं का प्रबंधन केंद्र, राज्य और MCD में विभाजित है, जिससे डेटा संग्रह और विश्लेषण में बाधाएं आती हैं। एक केंद्रीकृत स्वास्थ्य सूचना प्रणाली आवश्यक है।” प्रजा फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार, MCD और राज्य सरकार द्वारा संचालित कई अस्पतालों और डिस्पेंसरी ने रिसर्च के दौरान कई महीनों का डेटा ही जमा नहीं किया।

रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली में स्वास्थ्य सेवा का प्रबंधन केंद्रीय, राज्य और नगर निगम प्रशासन के बीच बंटा हुआ है, जिससे डेटा संग्रह और विश्लेषण कठिन हो जाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि स्वास्थ्य जानकारी को एक केंद्रीकृत प्लेटफॉर्म पर एकत्र करना जरूरी है।

रिपोर्ट में 2014 से 2023 तक के स्वास्थ्य डेटा का विश्लेषण किया गया। इसमें संचारी रोगों के चलते 1,59,129 मौतें हुई हैं, तो सांस की बीमारियों के चलते 88,159 मौतें हुई हैं। वहीं, हाइपरटेंशन से 43,487 मौतें तो टीबी से 35,800 लोगों की जान गई है। इस बीच, डेंगू से मौत के मामले में 627% की बढ़ोतरी हुई है, जो 2014 में 74 थी और 2023 में बढ़कर 538 हो गई। हाइपरटेंशन से मौत के मामलों में 109% की बढ़ोतरी हुई है, जो 2014 में 1,962 थी और 2023 में 4,102 तक पहुँच गई। वहीं, हृदय रोग से मौत के मामले 66% बढ़े।

AAP के ‘दिल्ली मॉडल’ के दावों पर सवाल खड़े हो रहे हैं। मरीजों की तकलीफें और बढ़ती बीमारियाँ दिखाती हैं कि बजट और संसाधन पर्याप्त होने के बावजूद स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर नहीं हो पा रही हैं। खाली पदों और बजट का उपयोग न हो पाना दिल्ली के निवासियों के लिए चिंता का विषय है।

खाने को सूअर का मांस, पीने को टॉयलेट का पानी… भारतीयों को बंधक बना रहा ‘थाइलैंड ड्रीम्स’, मगरमच्छ के सामने भी देते हैं डाल: जानिए म्यांमार-लाओस से कैसे चल रहा साइबर स्कैम

थाईलैंड में नौकरी, लाखों में सैलरी और आईटी से जुड़ा हल्का-फुल्का काम। यही वो सपना है, जिसके नाम पर फँस कर हजारों भारतीय म्यांमार, लाओस समेत कई दक्षिण एशियाई देशों में चलने वाले स्कैम कॉल सेंटर तक पहुँच रहे हैं। संसद में दिए गए एक उत्तर में विदेश मंत्रालय ने बताया है कि वह अब तक 2000 से अधिक भारतीयों को इन स्कैम कॉल सेंटर से बचा कर वापस ला चुका है। यह स्कैम सेंटर कैसे काम करते हैं, किसको फँसाते हैं, किस तरह की प्रताड़ना देते हैं और इनसे क्या करवाते हैं, यह जानने से पहले इन स्कैम कॉल सेंटर से जो बच कर लौटे, उनकी कहानी जान सुन लीजिए, जिससे आपको अंदाजा हो कि यह समस्या कितनी बड़ी है।

24 दिन रखा, लगातार करवाया घोटाला: शिवेंद्र

म्यांमार के इन स्कैम कॉल सेंटर के चंगुल में फँसने और बचने का सबसे ताजा मामला कानपुर के शिवेंद्र सिंह का है। शिवेंद्र 19 नवम्बर, 2024 को ही म्यांमार से थाईलैंड के रास्ते भारत लौटे हैं। उन्होंने दैनिक भास्कर से अपनी कहानी बयाँ की है। शिवेंद्र ने बताया कि उसके साथ ही कानपुर के दफ्तर में काम करने वाले एक संदीप नाम के व्यक्ति ने ऑफर दिया कि थाईलैंड के कॉल सेंटर में ₹1 लाख/ महीने की नौकरी है। उसने इसके बाद उनसे ₹2 लाख लिए। उनका वर्क वीजा की जगह टूरिस्ट वीजा बनवाया गया।

कानपुर के शिवेंद्र (फोटो साभार:दैनिक भास्कर)

शिवेंद्र को 31 अक्टूबर, 2024 को दिल्ली बुलाया गया। उन्हें समझाया गया कि थाईलैंड में एक स्टॉक एक्सचेंज कम्पनी के कॉल सेंटर में काम करना होगा। इसके बाद 3 नवम्बर, 2024 को उन्हें एक फ्लाइट में बिठा कर थाईलैंड भेज दिया गया। इसके बाद उन्हें दो चीनी लोग अपने साथ लेकर म्यांमार चले गए। शिवेंद्र ने बताया कि उन्हें म्यांमार में एक ऐसे ही कॉल सेंटर में ले जाया गया। यहाँ 8 घंटे लोगों को ठगने का साइबर क्राइम करवाया जाता। आधे घंटे कुछ खाने को दिए जाते। रात में रिपोर्ट ली जाती कि किसने कितनी ठगी की है।

शिवेंद्र ने वापस जाने की बात कही तो उनसे ₹10 लाख की माँग की गई। शिवेंद्र ने बताया कि जो भी लोग यहाँ ठगों का विरोध करते, उनके हाथ-पैर तोड़ कर जेल में डाल देते। कुछ लोगों को मगरमच्छ के सामने भी डाला जाता। शिवेंद्र ने किसी तरह अपने घर कानपुर में यह जानकारी पहुँचाई। सांसद देवेन्द्र सिंह भोले और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने जल्द कार्रवाई को कहा। इसके बाद विदेश मंत्रालय के दखल से शिवेंद्र 25 नवम्बर को छोड़ा गया। शिवेंद्र ने बताया कि हर वक़्त, हर बात की जाँच यह चीनी ठग करते थे। उनका कहना है कि यह 24 दिन उन्हें 24 साल लगे।

सुअर का मांस खिलाते थे, उल्टा लटकाते थे: सौरभ

लखनऊ के रहने वाले सौरभ सिंह की भी कहानी कुछ ऐसी ही है। अप्रैल, 2024 में वापस आए सागर ने जागरण को बताया है कि उन्हें भी नौकरी के बहाने थाईलैंड बुलाया गया और फिर म्यांमार ले जाया गया। सागर ने बताया कि कैद के दौरान उनसे 22 घंटे तक चीन और बाकी देशों में ठगी करवाई जाती थी। जो भी सोने की कोशिश करता था, उसे बिजली के झटके दिए जाते थे। यहाँ तक कि नहाने भी नहीं जाने देते थे। खाने में उन्हें मात्र चावल और सुअर का मांस दिया जाता था।

म्यांमार नौकरी स्कैम
सौरभ (फोटो साभार: Jagran)

सागर ने बताया कि जो भी ठगी करने से मना करता था, उसे उलटा लटका कर मारते थे, खाने को नहीं देते थे। यातनाएँ दी जाती थीं। इन चीनी ठगों ने सागर के परिवार से ₹8.14 लाख की वसूली करके उन्हें छोड़ा। उनके परिवार ने किसी तरह इस पैसे का इंतजाम किया। पूरा पैसा मिलने के बाद उन्हें थाईलैंड के रास्ते छोड़ा गया। सौरभ किसी तरह वापस भारत पहुँचे। सागर के लौटने के समय उनके दोस्त अजय और राहुल वहीं फंसे हुए थे। राहुल नवम्बर, 2024 में ही लौटे हैं। आगे राहुल की कहानी पढ़िए।

अजय को टॉर्चर करते हैं, झटके देते हैं: राहुल

भारत लौटे राहुल ने बताया कि उनका दोस्त अजय अब भी म्यांमार में फंसा है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि अजय को मलेशिया में एक नौकरी के लिए ऑफर दिया गया था लेकिन असल में म्यांमार ले जाया गया। अजय को म्यांमार की थाईलैंड सीमा के नजदीक एक जगह पर रखा गया।

म्यांमार नौकरी
अजय की हालत (फोटो साभार: TNIE)

अजय को एक जगह अँधेरे कमरे में बंद करके रखा गया है। उसको घंटों तक डंडों और पाइपों से पीटा जाता है। उसके शरीर पर चोट के अनगिनत निशान हैं। अजय को खाना भी नहीं दिया जाता। अजय का परिवार गरीब है, जो फिरौती के पैसे नहीं दे पा रहा। ऐसे में वह फंसे हैं।

12 दिन भूखा रखा, टॉयलेट का पानी पिलाया: विधान

देहरादून के विधान भी इसी से गुजरे हैं। विधान अगस्त, 2024 में वापस भारत लौट पाए हैं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए गए एक इंटरव्यू में विधान ने बताया कि वह मई, 2024 में थाईलैंड गए थे। यहाँ उन्हें देश के आईटी सेक्टर में एक अच्छी नौकरी का झांसा दिया गया था। हालाँकि, थाईलैंड से उन्हें म्यांमार के म्यावदी ले जाया गया और ठगी के काम में झोंक दिया गया। उन्होंने जब यह करने से मना किया तो उनको 12 दिनों तक भूखा रखा गया। बिजली के झटके दिए गए। उनको टॉयलेट से पानी पिलाया गया। कई-कई घंटों तक लाठियों से उन्हें मारा।

म्यांमार नौकरी स्कैम
विधान (फोटो साभार: TOI)

उनके परिवार को वीडियो कॉल करके दिखाया जाता कि किस तरह उन्हें यातनाएँ दी जा रही हैं। इसके बाद उनके परिवार से 2000 डॉलर माँगे गए। जब यह पैसे मिल गए तो उन्हें खाना दिया गया। एक दिन म्यांमार की सेना के लोगों ने आकर उन्हें छोड़ने को कहा। इसका कारण भारतीय विदेश मंत्रालय का दबाव बताया गया। विधान, अजय, राहुल, सौरभ और शिवेंद्र के अलावा अभी भी संभवतः हजारों भारतीय म्यांमार में इसी तरह फंसे हैं। सिर्फ भारतीय ही नहीं, म्यांमार के इन कैम्प में पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और यहाँ तक कि लन्दन से भी लोग आकर फंस गए हैं।

अब जानिए कौन लोग भारतीय युवाओं को इस नरक में धकेल रहे हैं, कैसे लोग इस झाँसे में फंसते हैं, इनसे काम क्या करवाया जाता है, म्यांमार ही क्यों ले जाया जाता है और बाकी जरूरी बातें।

कैसे और क्यों लोग फंसते हैं?

जो भी युवा इस दलदल से वापस लौटे हैं, उनकी लगभग एक ही कहानी है, थाईलैंड-मलेशिया-फिलिपीन्स में नौकरी। भारत में बेरोजगारी से परेशान युवा ज्यादा पैसे के लालच में आते हैं। उनको बताया जाता है कि काफी कम पैसे में वह भी विदेश जाकर पैसा कमा सकते हैं। कम पढ़े-लिखे युवा झाँसे में आ जाएँ, इसके लिए कॉल सेंटर की नौकरी बताई जाती है। जो युवा तकनीकी बैकग्राउंड से हैं, उन्हें आईटी में नौकरी का सपना दिखाया जाता है। उन्हें ₹1 लाख से अधिक की सैलरी बताई जाती है। कई बार यह झांसा देने वाले उनके करीबी भी होते हैं।

उन्हें नौकरी का ऑफर देते समय थाईलैंड, मलेशिया या फिलिपीन्स का नाम लिया जाता है, ताकि उन्हें शक ना हो। वीजा के नाम पर भी उनसे ठगी की जाती है। वर्क वीजा की जगह पर उन्हें टूरिस्ट वीजा थमाया जाता है। इसके बाद जब वह चंगुल में आ जाते हैं तो उन्हें भारत से बैंकॉक ले जाया जाता है। एजेंसियाँ भी भारत से बैंकॉक जाने वालों पर शक नहीं करतीं। क्योंकि भारत से हर साल लाखों टूरिस्ट थाईलैंड जाते हैं। ऐसे में यह पता करना कि कौन सा आदमी किस उद्देश्य से जा रहा है, संभव नहीं हो पाता।

म्यांमार कैसे ले जाते हैं?

थाईलैंड में पहुँचने के बाद इन भारतीयों को एयरपोर्ट पर ही रिसीव कर लिया जाता है। इसके बाद इन्हें चीनी गैंगस्टर अपने साथ गाड़ी में बिठा कर कंपनी दिखाने के वादे के साथ ले जाते हैं। एक बार इनके कब्जे में आने के बाद यहाँ आए लोग असहाय हो जाते हैं। थाईलैंड में इन्हें अलग-अलग गाड़ियों से म्यांमार की सीमा तक पहुँचाया जाता है। अगर कोई विरोध करता है या फिर जाने से मना करता है, तो उसको बन्दूक के बल पर डराया जाता है। ज्यादातर लोग यहीं सरेंडर कर देते हैं।

म्यांमार-थाईलैंड के बीच 2400 किलोमीटर से अधिक लम्बी सीमा है। इसमें नदी-नाले, पहाड़ और खेत समेत आबादी वाले इलाके हैं। यह सीमा कई जगहों पर खुली हुई है। यानि एक-दूसरे देश से लोग आवाजाही कर सकते हैं। कई जगह दोनों देशों को नदियाँ बाँटती हैं। इन्हीं नदियों में नाव के जरिए ही थाईलैंड से लाए जाने के बाद भारतीय और बाकी लोगों को म्यांमार में दाखिल करवाया जाता है। यहाँ तक आते-आते लोग समझ जाते हैं कि उनके साथ अब क्या होने वाला है। इसके बाद उन्हें इस स्कैम में झोंक दिया जाता है।

म्यांमार ही क्यों ले जाते हैं?

इसके पीछे भी एक कारण है। म्यांमार 2021 से ही गृह युद्ध में फंसा हुआ है। म्यांमार, ब्रिटेन से आजादी पाने के बाद अधिकांश समय तक सैन्य शासन में रहा है। इसे ‘Junta’ या ‘हुन्ता’ कहते हैं। 2021 में सेना ने आंग सान सू की सरकार को सत्ता से फेंक कर फिर से कब्जा कर लिया था। इसके बाद देश में गृह युद्ध छिड़ गया।

विद्रोही समूहों ने बड़े गठबंधन बना लिए। उन्होंने म्यांमार के दूरदराज इलाकों में हमले करने चालू के दिए। वर्तमान में शान-चिन जैसे देश राज्य तक इन विद्रोहियों के कब्जे में हैं। पूरे देश में अराजकता का माहौल है। इसीलिए यह स्कैम चलाने के लिए सबसे मुफीद जगह म्यांमार ही है।

म्यांमार में थाईलैंड या चीन से सीमा वाले इलाकों में यह स्कैम चलाए जाते हैं। कई जगह इसके लिए पूरे शहर बसाए गए हैं। इनको रोकने वाला कोई नहीं है। यदि सेना या फिर विद्रोही गुट इन पर कार्रवाई करना चाहते हैं तो वह इनको खिला देते हैं। विद्रोही समूहों को भी हथियार के लिए पैसे जरूरत है, इसलिए वह भी इस पर आँख मूँद लेते हैं।

कई मामलों में सेना भी कुछ नहीं बोलती। स्थानीय लोग भी इन सबमें जुड़े हुए हैं। इन इस घोटाले का सबसे बड़ा केंद्र म्यावादी शहर है। यह थाईलैंड सीमा पर स्थित है। इस शहर पर कब्जे के लिए सेना और विद्रोहियों में भारी लड़ाई हो चुकी है। अभी भी कई जगहों पर सेना का नियंत्रण नहीं है। ऐसे में आसानी से यहाँ घोटाला चलाया जा सकता है।

यह शहर थाईलैंड की सीमा पर है, ऐसे में यहाँ लोगों को फंसा कर लाना और बाकी सुविधाएँ प्राप्त करना भी आसान है। जब म्यावदी में कार्रवाई होती भी है, तो यह दूसरी जगह चले जाते हैं। इनके पास इतना पैसा है कि यह स्थानीय लोगों को पैसा देकर सारी सुविधाएँ हासिल कर लेते हैं।

कौन हैं यह स्कैम सेंटर चलाने वाले?

इस काम में ठगी का काम भारतीय, पाकिस्तानियों, अफ्रीकी और बाकी जगहों से तस्करी करके लाए लोगों को दिया जाता है। यह काम उनसे करवाने वाले चीनी हैं। यह चीन के आपराधिक गैंग हैं। कोविड से पहले यह गैंग मकाऊ में जुए का काम करते थे। इसमें भी यह अरबों कमाते थे। कोविड के बाद अब उन्होंने यह धंधा अपना लिया है। चीन से आकर यह म्यांमार में अपना पूरा गैंग बनाते हैं। एयरपोर्ट से लेकर इन शहरों में अपने लोग बिठाते हैं। इसके बाद तस्करी और ठगी का धंधा चालू कर देते हैं। चीन की सरकार भी इनके इतने बड़े ऑपरेशन के आगे फेल है।

कैसा होता है यह स्कैम सेंटर?

एक स्कैम सेंटर में जानवरों की तरह लोग रखे जाते हैं। एक-एक कमरे में 10-12 लोग रखे जाते हैं। उनके खाने-पीने या नहाने-धोने का भी सही इंतजाम नहीं होता। इन्हीं स्कैम सेंटर में हजारों कम्प्यूटर या फोन होते हैं, जिनके जरिए ठगी की जाती है। इसी सेंटर के भीतर ही जेल और टॉर्चर सेंटर बनाए जाते हैं। इनकी सुरक्षा के लिए हथियारबंद गार्ड लगाए जाते हैं। चारों तरफ कंटीली तार भी लगाई होती है ताकि कोई भाग ना सके। इसके अलावा, ठग यहाँ बाकी इंतजाम भी रखते हैं।

म्यांमार स्कैम
केके पार्क, म्यांमार का सबसे बड़ा स्कैम सेंटर (फोटो साभार: DW)

क्या स्कैम करवाते हैं?

इन जगहों पर अभी साइबर स्कैम ही सबसे अधिक चल रहे हैं। यह लोग जो ठगी या स्कैम सबसे अधिक करवाते हैं, उसका नाम ‘पिग बुचरिंग’ है। इसका अर्थ है किसी सुअर को काटना। यानी यह किसी को निशाने पर लेते हैं और उसे आर्थिक तौर पर मारते हैं। इन सेंटर में काम करने वाले लोगों ने बताया है कि उन्हें सुंदर लड़कियों के तौर पर आईडी बनानी होती है।

इसके बाद उन्हें अमेरिका-चीन और यूरोप समेत बाकी विकसित देशों के पुरुषों को निशाना बनाना होता है। ठगी करने वालों को सबसे पहले इन देशों के अकेलापन महसूस करने वाले या सेक्स की तलाश में इन्टरनेट पर मौजूद पुरुषों को खोजना होता है। इसके बाद उन्हें ठगी करने वाले फर्जी प्रोफाइल के आधार पर कोई सुंदर लड़की बना कर सम्पर्क करते हैं।

जब कई दिन तक बात करने के बाद सामने वाले पुरुष को विश्वास हो जाता है कि वह असल में किसी लड़की से बात कर रहा है तो उसे एक निवेश का झाँसा दिया जाता है। उसे ठग अपने विश्वास में लेकर किसी फर्जी एप में एक निवेश करने को कहते है, इसमें उन्हें बड़े फायदे का सपना दिखाया जाता है।

यदि कोई पैसा निवेश करता है, तो उसे इसी फर्जी एप में 100% तक का फायदा भी दिखाया जाता है। इसके बाद उसे कभी-कभार निवेश की आधी रकम भी वापस भेज दी जाती है और बताया जाता है कि यह उसका मुनाफ़ा है। इसके बाद झाँसे में आए लोग पक्के तौर पर मान लेते हैं कि वह सही जगह बात कर रहे हैं।

इसके बाद जितना सम्भव हो, उतना पैसा ठग कर उसे छोड़ दिया जाता है। इसके अलावा और भी कई तरीके हैं, जिनसे ठगी की जाती है। इनमें अचानक फोन करके किसी की अश्लील वीडियो बनाकर धमकाना, पार्ट टाइम नौकरी देकर ठगना और बाकी तरीके भी शामिल हैं।

कितना लूट चुके?

इसका कोई ठीक-ठीक अनुमान नहीं लेकिन एक स्टडी बताती है कि इस ‘पिग बुचरिंग’ जरिए ही 75 बिलियन डॉलर (लगभग ₹6.5 लाख करोड़) की वसूली यह गैंग कर चुके हैं। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से यह ठगी चलती रहती है। एक और रिपोर्ट बताती है कि 2023 में ही ठगी का यह आँकड़ा 64 बिलियन डॉलर (लगभग ₹5 लाख करोड़) पार कर चुका था।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट कहती है कि म्यांमार, लाओस और कम्बोडिया में चलने वाले इन स्कैम सेंटर में 1 लाख से अधिक लोग फंसे हैं जो यही काम कर रहे हैं। इसी से यह अंदाजा लग सकता है कि यह घोटाला कितना बड़ा है और इसमें कितना पैसा यह घोटालेबाज कमाते हैं।

जो बात नहीं मानते, उनका क्या?

इन स्कैम सेंटर में धोखे से पहुँचने वालों में से कई ठगी करने से इनकार भी करते हैं। उनके साथ यहाँ जानवरों से भी बदतर सलूक होता है। किसी को बिजली के झटके दिए जाते हैं तो किसी को बाँध कर घंटों तक मारा जाता है। विरोध करने वालों ने बताया कि यहाँ खाना-पीना नहीं दिया जाता और कई दिनों तक भूखा रखा जाता है। साथ ही हाथ-पैर तक तोड़ दिए जाते हैं। मगरमच्छों के सामने तक फेंकने की बात सामने आई है। कितने लोगों को यहाँ मार दिया गया, इसकी जानकारी नहीं है।

छोड़ने का क्या माँगते हैं?

यहाँ तस्करी कर लाए गए लोगों को छोड़ने की एवज में फिरौती माँगी जाती है। उन्हें बताया जाता है कि वह बेचे गए हैं, ऐसे में उन्हें यह कीमत चुकानी होगी। कई बार यह धनराशि ₹1 लाख से लेकर ₹10 लाख तक होती है। जो पैसा नहीं चुकाते, उनसे काम करवाया जाता है। छोड़ने की एवज में लोगों से और लोगों को तस्करी कर बुलाने और फिर इसी काम में झोंकने की बात भी कही जाती है। डरे-सहमे होने के कारण परिवार भी फिरौती का पैसा इकट्ठा करके दे देते हैं।

भारत सरकार क्या कर रही?

भारत में बीते लगभग 2 वर्षों में यह समस्या तेजी से उभरी है। जल्दी अमीर बनने और विदेश में अच्छी नौकरी के नाम पर युवा झाँसे में आते हैं। इसी के चलते वह घोटाले में फंसते हैं। जिनके परिवार के युवा इन कैम्प में फंसे हैं, वह स्थानीय सांसद-विधायक से मदद माँगते हैं। कई बार वह विदेश मंत्रालय तक पहुँचते हैं। विदेश मंत्रालय अपने स्तर से इन पर काम कर रहा है। विदेश मंत्रालय ने 28 अगस्त, 2024 को राज्यसभा में इस विषय में जानकारी भी दी है।

विदेश मंत्रालय ने बताया कि उसने कम्बोडिया से 1091, लाओस से 770 और म्यांमार से 497 लोगों को वापस लाने में सफलता पाई है। हालाँकि, इन देशों में चलने वाले इन स्कैम कॉल सेंटर में कितने भारतीय अभी फंसे हैं। इस विषय में कोई जानकारी नहीं है। विदेश मंत्रालय ने लोगों को सचेत भी किया है कि विदेश में नौकरी के नाम पर झाँसे में ना पड़ें।

शरजील इमाम की ‘बहन’ बिहार में बनी जज, इस्लामी कट्टरपंथी बोले- अब होगा न्याय: भाई ने चिकेन नेक काटने की दी थी धमकी, शाहीनबाग का रहा है मास्टरमाइंड

सीएए-एनआरसी विरोध प्रदर्शनों के बीच असम को भारत से अलग करने की बात कहने वाले शरजील इमाम से जुड़ी एक खबर आ रही है। सोशल मीडिया पर सामने आया है कि शरजील जहाँ पिछले 4 साल से जेल में है वहीं उसकी बहन फरहा निशात ने न्यायिक सेवा को पास कर लिया है।

ये जानकारी सोशल मीडिया पर शरजील इमाम के भाई मुजम्मिल इमाम ने साझा की है। मुजम्मिल ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा,

“जिंदगी का यही फलसफा है: एक तरफ भाई ज़ुल्म के ख़िलाफ़ इंसाफ की लड़ाई लड़ने के खातिर जेल में तो दूसरी तरफ बहन ज़ुल्म के ख़िलाफ़ इंसाफ देने खातिर अब जज की कुर्सी पर बैठेंगी। छोटी बहन फरहा निशात 32वीं बिहार न्यायिक सेवा परीक्षा में उत्तीर्ण हो कर आज भाई को फ़क्र करने का मौक़ा दिया है। और मुझे उम्मीद है कि अपने कार्यकाल में तुम अपने फैसलों से किसी बेगुनाह के साथ ज़ुल्म नहीं होने दोगी। अल्लाह तुम्हें हिम्मत और ताक़त दें।”

इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर शरजील इमाम के समर्थक इस जानकारी को शेयर कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि शरजील की बहन जज बन गई और अब जुल्म के खिलाफ न्याय करेंगे।

पोस्ट के मुताबिक हमने जब बीपीएससी की वेबसाइट पर इस परीक्षा के नतीजे चेक किए तो लिस्ट में पिछड़े वर्ग की श्रेणी में 124570 रोल नंबर पर फरहा निशात का नाम मिला। यह लड़की शरजील इमाम की ही बहन है इसकी हम आधिकारिक पुष्टि नहीं कर पाए हैं। लेकिन सोशल मीडिया पर और मीडिया रिपोर्ट में यही दावा है कि यही फरहा निशात शरजील की बहन हैं।

गौरतलब है कि साल 2019-20 में सीएए-एनआरसी विरोधी प्रदर्शन के दौरान शरजील इमाम पर मुस्लिमों को उकसाने, दंगा भड़काने, और देशद्रोह जैसे गंभीर आरोपों में केस दर्ज हुआ था। बाद में 28 जनवरी 2020 को उसे गिरफ्तार किया गया था और उस पर केस चला था। कुछ समय पहले उसे जामिया हिंसा मामले में बरी किया गया लेकिन बाकी आरोपों में वह अब भी जेल में है।

मस्जिद पर निचली अदालतें चुप रहे, कुरान पर हाई कोर्ट… वरना दंगे होंगे, गिरेंगी लाशें: ‘कलकत्ता कुरान’ मामले में एक CM ने हजारों की मुस्लिम भीड़ से कहा था – जज पर लो एक्शन

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने गुरुवार (28 नवंबर) को सुप्रीम कोर्ट को एक पत्र भेजा। इसमें मुस्लिम बोर्ड ने सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया है कि देश की निचली अदालतों को मस्जिदों से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई नहीं करने का निर्देश दे। पत्र ऐसे समय लिखा गया है, जब ट्रायल कोर्ट के आदेश पर संभल के जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान इस्लामी भीड़ द्वारा हिंसा की गई।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपने पत्र में साल 1991 के उपासना स्थल अधिनियम (प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991) का हवाला दिया है। इसमें वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा का शाही ईदगाह, धार के भोजशाला मस्जिद, लखनऊ की टीले वाली मस्जिद, संभल की शाही जामा मस्जिद और अजमेर के मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह जैसी याचिकाओं पर विचार नहीं करने का अनुरोध किया गया है।

इस इस्लामी संस्था ने अपने पत्र में आगे लिखा है, “डॉक्टर SQR इलियास (AIMPLB के राष्ट्रीय प्रवक्ता) ने भारत के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में तत्काल स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई करने और निचली अदालतों को किसी भी अन्य विवाद के लिए दरवाजे खोलने से परहेज करने का निर्देश देने की अपील की है।”

पत्र में चेतावनी देते हुए कहा गया है, “संसद द्वारा पारित इस कानून (उपासना स्थल या धार्मिक स्थल अधिनियम 1991) को सख्ती से लागू करना केंद्र और राज्य सरकारों, दोनों की जिम्मेदारी है। ऐसा न करने पर पूरे देश में विस्फोटक स्थिति पैदा हो सकती है, जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार जिम्मेदार होंगे।”

एक तरह से ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि अगर निचली अदालतों द्वारा मस्जिदों के सर्वे को मंजूरी दी जाती है तो संभल में हुई हिंसा की तरह दूसरी जगह भी हिंसा भड़क सकती है। हालाँकि, मुस्लिम भीड़ ने तब भी दंगे किए हैं, जब हाई कोर्ट ने इस्लामी मजहबी किताबों से संबंधित याचिकाओं पर विचार किया। साल 1985 का कलकत्ता कुरान याचिका इसका ज्वलंत उदाहरण है।

साल 1985 की कलकत्ता कुरान याचिका

अधिवक्ता चांदमल चोपड़ा और सीतल सिंह ने 29 मार्च 1985 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक आवेदन दायर किया था। इसमें कलकत्ता हाई कोर्ट से सरकार को इस्लाम की मजहबी किताब ‘कुरान’ की हर प्रति को ‘जब्त’ करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। उन्होंने कहा कि कुरान की आयतों में काफिर (गैर-मुस्लिमों) के खिलाफ हिंसा का आह्वान किया गया है।

याचिका में तर्क दिया गया था कि कुरान की प्रत्येक प्रति दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 95 (कुछ प्रकाशनों को जब्त घोषित करने की शक्ति) और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A (धार्मिक आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) और 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के इरादे से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्य) के तहत ‘जब्त करने योग्य’ है।

याचिका में तर्क दिया गया कि मुस्लिम अब तक कानून का दुरुपयोग करके इस्लाम की आलोचना करने वाली किताबों पर प्रतिबंध लगाते रहे हैं। बता दें कि यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष सैयद वसीम रिजवी ने भी कुरान की 26 आयतों को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए रिजवी पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगा दिया था।

खैर, चाँदमल चोपड़ा और सीतल सिंह द्वारा दायर याचिका सुनवाई के लिए शुरू में कलकत्ता हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति खस्तगीर जे के समक्ष आया था। हालाँकि, आज की तरह उम्मीद से उलट उस विद्वान न्यायाधीश ने आवेदन को खारिज करने के बजाय उस पर विचार किया। उन्होंने प्रतिवादी पक्षों को नोटिस भी जारी किया। इसके बाद जो हुआ, वह बेहद भयानक है।

इस याचिका के विरोध में पश्चिम बंगाल की तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), जमात-ए-इस्लामी और कलकत्ता के केरल मुस्लिम एसोसिएशन ने हथियार उठा लिए। आंदोलन को मजबूत करने के लिए एक ‘कुरान रक्षा समिति’ की स्थापना की गई। CPIM के नेतृत्व वाली बंगाल सरकार ने दावा किया कि यह याचिका दुर्भावनापूर्ण इरादे से दायर की गई है।

कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने भी वामपंथियों का साथ दिया और याचिका का विरोध किया। बढ़ते राजनीतिक दबाव के चलते जस्टिस खस्तगीर ने इसे अपनी सूची से हटाकर जस्टिस सतीश चंद्रा की अदालत में भेज दिया। राज्य के महाधिवक्ता एसके आचार्य की सलाह पर मामला जस्टिस बिमल चंद्र बसाक की पीठ को सौंप दिया गया और उन्होंने 17 मई 1985 को इसे याचिका खारिज कर दी।

कलकत्ता (अब कोलकाता) में कुरान याचिका को लेकर दंगे

इतिहासकार सीताराम गोयल ने अपनी किताब ‘द कलकत्ता कुरान पिटीशन‘ की पृष्ठ संख्या 26 और 27 में लिखा है कि याचिका के बारे में जानने के बाद देश के विभिन्न हिस्सों से लेकर बांग्लादेश तक के मुस्लिमों दंगे किए। बांग्लादेश में दंगों में कई लोग कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी से जुड़े थे। इन चरमपंथियों ने सरकारी संपत्ति को आग लगा दी और मिसाइलें भी फेंकी।

चेपल नवाबगंज शहर में झड़प के दौरान पुलिस को आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी। इस गोली-बारी में 12 लोगों की मौत हो गई और 100 से अधिक लोग घायल हो गए। इसके एक दिन बाद जमात-ए-इस्लामी की 20,000 की भीड़ ने राजधानी ढाका में हिंसक विरोध प्रदर्शन किया। यहाँ तक ​​कि भारतीय उच्चायोग के कार्यालय पर घात लगाकर हमला करने की भी कोशिश की गई।

The Calcutta Quran Petition
कोर्ट केस हुआ कोलकाता में, मुस्लिमों ने दंगा-फसाद किया बांग्लादेश से लेकर राँची-श्रीनगर में (साभार: सीता राम गोयल की किताब, The Calcutta Quran Petition, page 26-27)

भारत के राज्य झारखंड की राजधानी राँची (उस समय बिहार का एक बड़ा शहर था) में मुस्लिमों ने काले झंडे और बैनर लेकर ‘विरोध मार्च’ निकाला। इस दौरान दंगाई भीड़ ने सरकार विरोधी नारे लगाए और दुकानों पर पत्थर फेंके और छोटे व्यापारियों के कारोबार को जबरन बंद करवाया। डरे हुए कारोबारियों ने विरोध प्रदर्शन के अगले दिन भी अपना कारोबार बंद रखा।

जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में भी मुस्लिमों की भीड़ ने CPI मुख्यालय में तोड़फोड़ की। एक पुल को आग लगाने का प्रयास किया गया। स्कूल-कॉलेजों, सिनेमाघरों और दुकानों को जबरन बंद करवा दिया गया। आखिरकार, पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी और इसमें एक शख्स की मौत हो गई थी। जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री जीएम शाह ने तो याचिका पर सुनवाई करने वाले जज के खिलाफ ऐक्शन लेने की माँग कर डाली थी।

The Calcutta Quran Petition
कुरान पर कोर्ट में केस कैसे? जम्मू-कश्मीर के CM जज पर ही एक्शन लेने की माँग कर बैठे (साभार: सीता राम गोयल की किताब, The Calcutta Quran Petition, page 29)

सीताराम गोयल ने अपनी किताब में लिखा है, “इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI), जो इस्लामी मुद्दों की हिमायती रही है, को मुस्लिम भीड़ ने ‘हिंदू सांप्रदायिकों’ के साथ जोड़ दिया है। भीड़ तो भीड़ ही होती है और जो कुछ भी वह करती है, उसकी जिम्मेदारी उन लोगों पर होती है जो उन्हें अक्सर संगठित करते हैं।”

अब, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) भी अपनी चिट्ठी में इसी तरह का संकेत देने की कोशिश की है कि यदि अदालतें हिंदू मंदिरों के ऊपर बनी मस्जिदों के वास्तविक चरित्र के बारे में सर्वे से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई जारी रखती हैं तो मुस्लिम भीड़ फिर से दंगे कर सकती है। संभल में इसकी बानगी पूरा देश ही नहीं, दुनिया भी देख चुकी है।

जिस दिल्ली में दम घोंट रही हवा, वहाँ एक घर ऐसा भी जिसका AQI रहता है 10-15: जानिए पीटर सिंह और नीनो कौर ने कैसे बसाया यह ‘स्वर्ग’

दिल्ली में जहाँ प्रदूषण का ये हाल है कि वायु गुणवत्ता सूचकांक कभी-कभी 300-400 तक पार कर जाता है वहीं इसी दिल्ली में एक घर ऐसा भी है जहाँ का वातावरण अत्यंत शुद्ध है और घर का AQI 10-15 तक रहता है। ये घर है सैनिक फार्म्स में पीटर सिंह और नीनो कौर का।

पीटर और नीनो कौर ने अपने इस घर को स्व-संवर्धन तकनीकों से निर्मित किया है। इसमें सीमेंट के बजाय चूने के मोर्टार का उपयोग किया गया है। इस घर में पेंट्स की जगह भी चूना का प्रयोग हुआ है। वहीं छत पर कंक्रीट स्लैब की जगह पत्थर की टाइलें हैं, जो गर्मियों में तापमान को नियंत्रित करने में मदद करती हैं।

इसके अलावा इस घर की खास बात हैं कि यहाँ 15,000 से अधिक पौधे हैं, जो हवा को शुद्ध करने में मदद करते हैं। ये पौधे न केवल बाहरी वायु गुणवत्ता को बेहतर बनाते हैं बल्कि अंदर की हवा को भी साफ रखते हैं। इस प्रकार, घर का AQI हमेशा 15 से नीचे रहता है।

वहीं यदि बिजली आदि की बात करें तो घर पूरी तरह से सौर ऊर्जा पर निर्भर करता है और ऑफ-ग्रिड चलता है। इस घर में पानी की बर्बादी न हो इसका भी पूरा ध्यान दिया जाता है। यहाँ वर्षा के पानी को एक 15,000-लीटर टैंक में इकट्ठा किया जाता है, जिसका उपयोग बाद में पौधों की सिंचाई के लिए किया जाता है। पानी का पुनर्चक्रण सुनिश्चित करता है कि कोई भी बूंद बर्बाद न हो।

पीटर और नीनो के इस घर में वो दोनों खुद जैविक खाद्य पदार्थ उगाते हैं। वे फसल अवशेष का उपयोग करके खाद बनाते हैं, जिससे वे मशरूम उगती है। इस तरह उनके घर में ही सारी सब्जियाँ उग जाती हैं और उन्हें बाहर की सब्जियाँ नहीं खरीदनी पड़ती।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पीटर और नीनो ने ऐसे घर का निर्माण तब किया जब पता चला कि नीनो ब्लड कैंसर से पीड़ित हैं और उनके फेफड़े दिल्ली की जहरीले हवा झेलने लायक नहीं हैं। डॉक्टरों ने उन लोगों को दिल्ली भी छोड़ने को कहा, लेकिन ये जोड़ा दिल्ली में रहा और अपनी एक ऐसी दुनिया बनाई जो आज दिल्ली में रहने वालों के लिए एक मिसाल है।