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SC की शरण में भगोड़ा विजय माल्या, संपत्ति जब्त करने पर रोक की लगाई गुहार

जैसे-जैसे शिकंजा कसता जा रहा है भगोड़े कारोबारी विजय माल्या की नींद उड़ती जा रही है। बैंकों का 9 हजार करोड़ रुपया लेकर देश से भागे माल्या ने अब सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई है। उसने शीर्ष अदालत से अपनी और रिश्तेदारों की संपत्ति कुर्क करने की प्रक्रिया पर रोक लगाने की अपील की है।

अपनी याचिका में उसने कहा है कि केवल किंगफिशर कंपनी से संबंधित संपत्ति ही कुर्क की जाए और उसकी निजी और पारिवारिक संपत्ति जब्त न की जाए। याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सोमवार (जुलाई 29, 2019) को सुनवाई करेगा।

माल्या की इस अपील को बॉम्बे हाई कोर्ट ने 11 जुलाई को ख़ारिज कर दिया था।

इस समय ब्रिटेन में प्रत्यर्पण की कार्यवाही का सामना कर रहे माल्या को 5 जनवरी, 2019 को विशेष पीएमएलए अदालत ने भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किया था। इसके बाद उसकी संपत्तियों को कुर्क करने की कार्रवाई शुरू की गई थी। खुद को आर्थिक भगोड़ा अपराधी घोषित करने के फैसले को माल्या ने चुनौती दे रखी है। उसका कहना है कि जब तक हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई पूरी नहीं होती, एजेंसियाँ उसकी निजी संपत्तियों को कुर्क न करें।

63 साल के विजय माल्या ने भारतीय बैंकों से 9,000 करोड़ रुपए का लोन लिया था और उसे चुका नहीं पाने के कारण 2 मार्च, 2016 को देश छोड़ दिया था। भारत ने 2017 में प्रत्यर्पण की मांग की थी और फिलहाल वह जमानत पर बाहर है। ब्रिटेन के हाई कोर्ट में प्रत्यर्पण आदेश के खिलाफ उसकी अर्जी पर अगले साल 11 फरवरी से सुनवाई होगी।

आजम खान के बोल अभद्र और असभ्य, ऐसा सबक सिखाएँ कि याद रहे: जावेद अख्तर

लोकसभा में भाजपा सांसद रमा देवी पर की गई टिप्पणी को लेकर आजम खान चौतरफा घिरते जा रहे हैं। गीतकार और पूर्व सांसद जावेद अख्तर ने आजम खान के बयान को अभद्र और असभ्य बताया है।

जावेद अख्तर ने ट्वीट कर कहा है, “मेरा मानना है कि स्पीकर की कुर्सी पर बैठीं सांसद के लिए आजम खान के शब्द पूरी तरह से अस्वीकार्य हैं। यह अभद्र और असभ्य था। सदन के स्पीकर की जिम्मेदारी है कि वह उन्हें (आजम खान) ऐसा सबक सिखाएँ जिसे वह भूल न सकें।”

रामपुर से सपा सांसद आजम खान ने लोकसभा में तीन तलाक बिल पर चर्चा के दौरान कहा था, “आप मुझे इतनी अच्छी लगती हैं कि मेरा मन करता है कि आपकी आँखों में आँखें डाले रहूॅं।” इस टिप्पणी ने उस वक्त सदन की अध्यक्षता कर रहीं रमा देवी को असहज कर दिया था।

इस टिप्पणी को लेकर शुक्रवार (जुलाई 26, 2019) को स्पीकर ओम बिड़ला ने विपक्ष के नेताओं के साथ बैठक की थी। बैठक में तय किया गया कि अपनी टिप्पणी के लिए आजम खान सदन में माफी माँगे। यदि वे ऐसा नहीं करते तो उनके खिलाफ कार्रवाई होगी।

UAPA कानून में बदलाव: आखिर व्यक्ति विशेष को आतंकवादी क्यों घोषित करना चाहते हैं अमित शाह?

मोदी सरकार लगातार यह दोहराती रही है कि आतंकवाद को लेकर उसकी नीति जीरो टॉलरेंस की है। इसी कड़ी में सरकार गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) संशोधन विधेयक 2019 लेकर आई है। आम बोलचाल में इसे UAPA बिल भी कहते हैं।

लोकसभा से 24 जुलाई को पारित यह बिल व्यक्ति विशेष को भी आतंकवादी घोषित करने और उसकी संपत्ति जब्त करने का अधिकार देता है। सरकार का दावा है UAPA कानून में यह संशोधन सुरक्षा एजेंसियों को आतंकवादियों से चार कदम आगे रखेगा।

संशोधन की खास बातें

  • आतंकी गतिविधियों में संलिप्त होने की आशंका पर व्यक्ति विशेष को आतंकवादी घोषित किया जा सकेगा।
  • जो आतंकियों को आर्थिक और वैचारिक मदद देते हैं या आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले विचारों का प्रचार-प्रसार करते हैं, उन्हें आतंकवादी घोषित किया जा सकेगा।
  • राष्ट्रीय जॉंच एजेंसी (एनआईए) के इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी भी आतंकवाद के मामलों की जॉंच कर सकेंगे।
  • एनआईए महानिदेशक को ऐसी संपत्तियों को जब्त करने और उनकी कुर्की का अधिकार होगा जिनका आतंकी गतिविधि में इस्तेमाल हुआ हो।

बदलाव क्यों?

बिल पर चर्चा के दौरान लोकसभा में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह और गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने इस कानून में संशोधन की जरूरत को बिंदुवार स्पष्ट किया। इसके मुताबिक;

  • UAPA या किसी अन्य कानून में व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने का प्रावधान नहीं है। ऐसे में जब किसी आतंकवादी संगठन पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो उसके सदस्य नया संगठन बना लेते हैं।
  • आतंकी गतिविधियों, उसके लिए धन मुहैया कराने वालों या उसका प्रचार-प्रसार करने वाले व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करना जरूरी है।
  • आतंकवाद व्यक्ति की मंशा से जुड़ा मसला है न कि संगठन का। इसलिए ऐसी गतिविधियों में संलिप्त लोगों को आतंकवादी घोषित करने के प्रावधान की बेहद जरूरत महसूस की जा रही है।
  • मौजूदा UAPA कानून की धारा 25 के अनुसार आतंकी गतिविधियों से जुड़ी संपत्ति जब्त करने का अधिकार केवल सम्बन्धित राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को है।
  • कई बार आतंकी विभिन्न राज्यों में अपनी संपत्ति रखते हैं। ऐसे मामलों में अलग-अलग राज्यों के डीजीपी की मंजूरी लेना बहुत मुश्किल हो जाता है। देरी के कारण आतंकियों के लिए अपनी संपत्ति दूसरों के नाम ट्रांसफर करना आसान हो जाता है।
  • मौजूदा UAPA कानून की धारा 43 के सेक्शन IV और VI के अनुसार डीएसपी या समकक्ष पद से नीचे के अधिकारी जॉंच नहीं कर सकते। एनआईए में डीएसपी की कमी है, जबकि उसके इंस्पेक्टर भी इस तरह के मामलों की जॉंच में पारंगत हैं।

संशोधन से क्यों सहमा विपक्ष?

लोकसभा में बिल के विरोध में केवल 8 वोट ही पड़े। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि विपक्ष इस कानून में संशोधन के पक्ष में है। बिल पर वोटिंग के दौरान कॉन्ग्रेस सहित कई विपक्षी पार्टियों ने सदन का बहिष्कार किया था। विपक्ष इस बिल को जन विरोधी और संविधान विरोधी बता रहा है। यहां तक कि विपक्ष ने सत्ताधारी दल पर बहुमत के नाम पर विपक्ष की आवाज दबाने का आरोप भी लगाया।

विपक्ष का कहना है कि अब सिर्फ़ संदेह के आधार पर ही किसी को आतंकवादी घोषित कर ऐसे व्यक्तियों की संपत्ति जब्त की जा सकेगी। विपक्ष और आलोचकों का यह भी कहना है कि इसका इस्तेमाल विरोधियों को फँसाने के लिए किए जाने का खतरा है। विपक्ष को डर है कि इससे एनआईए की मनमानी बढ़ेगी और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा।

शंका का समाधान

विपक्ष के संदेहों को दूर करने की कोशिश करते हुए अमित शाह ने कहा कि सरकार इस विचार से कतई सहमत नहीं है कि आतंकवाद पर काबू आतंकियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की बजाए उनसे बातचीत कर पाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि संशोधनों का मकसद तेजी से जॉंच है। उनके अनुसार;

  • संशोधन में कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए बहुत सारी सावधानियॉं रखी गई हैं।
  • यह संशोधन व्यक्तियों को आतंकवादी घोषित करने की इजाजत तभी देता है जब कानूनन पर्याप्त साक्ष्य हो।
  • गिरफ्तारी या जमानत प्रावधानों में कोई बदलाव नहीं किया जा रहा है, इसलिए यह स्पष्ट है कि किसी भी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होगा।
  • विभिन्न स्तरों पर एनआईए में केस का रिव्यू होता है, इसलिए इंस्पेक्टर स्तर पर जॉंच से किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होगी।

कॉन्ग्रेस राज में बना कानून, तीन बार संशोधन भी

UAPA कोई नया कानून नहीं है। आज भले कॉन्ग्रेस इस कानून में संशोधन का विरोध कर रही हो, लेकिन 1967 में इंदिरा गाँधी की सरकार ही इस बिल को पहली बार लेकर आई थी। कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के कार्यकाल में तीन मौकों पर 2004, 2008 और 2011 में भी इस कानून में संशोधन किया गया था।

ऐसे समझे नुकसान

कानून में व्यक्ति को आतंकी घोषित करने का प्रावधान नहीं होने के कारण हो रहे नुकसान को आप इस तरह समझ सकते हैं। यासीन भटकल इंडियन मुजाहिद्दीन से जुड़ा था। इंडियन मुजाहिद्दीन आतंकवादी संगठन घोषित है। लेकिन, भटकल आतंकवादी घोषित नहीं किया जा सका। इसका फायदा उठा उसने 12 आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया।

व्यक्ति को आतंकी घोषित करने की प्रक्रिया

केन्द्रीय गृह मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार किसी व्यक्ति को आतंकवादी तभी घोषित किया जा सकेगा जब गृह मंत्रालय ऐसा करने की सहमति देगा। आतंकी घोषित व्यक्ति केन्द्रीय गृह सचिव के समक्ष अपील कर सकेगा। वे इस पर 45 दिनों के भीतर फैसला करेंगे। मौजूदा या सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति का गठन होगा। इसमें भारत सरकार के कम से कम दो सेवानिवृत्त सचिव होंगे। कोई व्यक्ति खुद को आतंकवादी घोषित करने के खिलाफ यहॉं भी सीधे अपील कर सकेगा।

हाफिज सईद, मसूद अजहर पर कसेगा शिकंजा

प्रस्तावित संशोधनों के लागू होने के बाद सबसे पहला शिकंजा हाफिज सईद और मसूद अजहर पर कसने की तैयारी है। हाफिज सईद साल 2008 के मुंबई आतंकी हमले का मास्टरमाइंड है, जबकि मसूद अजहर साल 2001 में संसद पर हमले में मोस्ट वॉन्टेड है।

मैं पंडित, सब अज्ञानी: सागरिका घोष ने सैन्य अधिकारी को कहा ‘मूर्ख’

सोशल मीडिया के कई फायदे हैं। यह सबको अपनी बात रखने का मौका देता है। इसने देश के विमर्श का मुद्दा तय करने का लुटियंस अभिजात्यों का स्वयंभू अधिकार भी छीन लिया है। इससे खार खाए बैठे कथित ‘वेटरन जर्नलिस्ट’ जो अब प्रोपगेंडा फैलाने के कारण बेनकाब हो चुके हैं, आए दिन अपने विचारों से असहमति जताने वालों को नीचा दिखाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते।

इसी कड़ी में आज वरिष्ठ पत्रकार सागरिका घोष ने पहले तो अपनी सोच थोपने की कोशिश की और जब इस पर एतराज जताया गया तो भारतीय सेना के सबसे सम्मानीय अधिकारियों में से एक मेजर नवदीप सिंह के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया।

इसकी शुरुआत वामपंथी प्रोपगेंडा वेबसाइट वायर के एक ट्वीट से हुई। वायर ने सागरिका की किताब ‘ह्वाई आइ एम लिबरल’ का एक उद्धरण ट्वीट किया था। यह किताब कितनी मूर्खतापूर्ण बातों से लबालब है, जिसका एक नमूना वायर का ट्वीट है। सागरिका ने वायर के ट्वीट को आगे बढ़ाते हुए खुद को ‘लिबरल देशभक्त’ और ‘शांति’ का पैरोकार बताया। कहा कि अपने देश को उन लोगों से ज्यादा प्यार करती हैं जो ‘गरीबों की संतानों’ को अपनी ‘रक्तरंजित आकांक्षाओं’ को पूरा करने के लिए मोर्चे पर भेजना चाहते हैं।

कई लोगों ने सागरिका की इस टिप्पणी पर कड़ा एतराज जताया। पहला तो यह कि सेना में केवल गरीब ही नहीं जाते। दूसरा, भारतीय सेना का युद्धक अभियान धनाढ्यों और कुलीनों की रक्तरंजित आकांक्षाओं का नतीजा नहीं है। तीसरा, पाकिस्तान जैसे आतंकी राष्ट्र की मुरीद उन जैसी ‘शांतिदूत’ का खुद को उन लोगों से ज्यादा देशभक्त बताना जो मुॅंहतोड़ जवाब देने की बात करते हैं।

सागरिका की टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताने वालों में वतन के लिए मर मिटने की शपथ लेने वाले मेजर नवदीप सिंह भी हैं। वे पेशे से वकील हैं।

सागरिका को जवाब देते हुए मेजर सिंह ने कहा कि वे भी लिबरल और शांति के पैरोकार हैं। लेकिन, वर्दी पहनने वाले गरीबों की संतान नहीं हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना अपने नेता की रक्तरंजित आकांक्षाओं को पूरा करने वाली ‘मिलिशिया’ (नौसिखिया, नागरिक सेना) नहीं है, बल्कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा के लिए लोकतांत्रिक संविधान के तहत काम करने वाली ईकाई है।

लेकिन सागरिका घोष जैसे लोग मानते हैं कि वे सेना के बारे में उन लोगों से ज्यादा जानती हैं, जिन्होंने वतन के लिए मर-मिटने की कसम खाई है। इसलिए, मेजर सिंह पर पलटवार करते हुए उन्होंने कहा कि वातानूकुलित कमरे में बैठे राजनेताओं के इशारे पर लड़ने वाले ज्यादातर जवान गरीबों की संतान हैं। जवाब में मेजर सिंह ने कहा कि इस तर्क से तो निचले ग्रेड के सभी सरकारी कर्मचारी और यहॉं तक कि प्राइवेट सेक्टर के लोग भी गरीब परिवारों से हैं। इसलिए, केवल सेना पर सवाल उठाने का कोई औचित्य नहीं है।

इसके बाद जब सागरिका घोष के पास तर्क खत्म हो गए तो वह बदतमीज़ी पर उतर आईं। उन्होंने मेजर सिंह से सैन्य मसलों पर बहस करते हुए उन्हें ही ‘मूर्ख’ कह डाला। इस पर अमूमन कोई भी आपा खो बैठता। लेकिन मेजर सिंह ने इसके बाद भी शालीनता बरकरार रखते हुए सागरिका की भाषा का विरोध किया।

गौर करने की बात है कि जिस व्यक्ति को सागरिका ने युद्ध के बारे में बहस करते हुए मूर्ख कहा, वे न केवल सेना के सर्वाधिक सम्मानित वालंटियर्स में से हैं, बल्कि सेना की कई प्रशस्तियाँ भी पा चुके हैं। इनमें से कई तो ऐसे सैन्य अभियानों के लिए है, जिनकी जानकारी तक सार्वजनिक नहीं की जा सकती। उनको मिली प्रशस्तियों की सूची कुछ ऐसे है:

  • जनरल अफ़सर कमांडिंग-इन-चीफ़ (GOC-in-C) की प्रशस्ति: 2004 (अज्ञात/गुप्त घटना के लिए)
  • सेना प्रमुख की प्रशस्ति: (स्वतंत्रता दिवस, 2005)
  • GOC-in-C की प्रशस्ति: (स्वतंत्रता दिवस, 2005)
  • वायु सेना द्वारा AOC-in-C (एयर अफ़सर कमांडिंग-इन-चीफ़) की प्रशस्ति: (गणतंत्र दिवस, 2006)
  • GOC-in-C की प्रशस्ति: (गणतंत्र दिवस, 2007)
  • सेना प्रमुख की प्रशस्ति: (सेना दिवस, 2008)
  • सातवीं प्रशस्ति: प्रकृति और तारीख अज्ञात
  • सेना प्रमुख की प्रशस्ति: (सेना दिवस, 2010)

अब अगर सागरिका घोष की ‘उपलब्धियों’ की बात करें तो अपने पिताजी के ओहदे पर कुलाँचे भरते कैरियर में प्रोपगंडा फ़ैलाने के अलावा कुछ और सोच पाना मुश्किल है। जंग के बिना शांति नहीं होती। सागरिका जैसे शैम्पेन लिबरल शांति के भ्रम में इसीलिए रह पाते हैं, क्योंकि हिन्दुस्तान के सैनिक पाकिस्तानी सैनिकों और जिहादियों के हाथों अपनी जानें गँवा कर उनके जैसों और जिहादियों के बीच खड़े रहते हैं। शांति को किसी ‘अधिकार’ की तरह for-granted लेने वाले सागरिका जैसे लिबरलों के लिए इसका दाम मेजर सिंह जैसे वीर ही चुकाते हैं।

आतंकियों को कुत्ते की मौत मारने के दस फायदे, छठा आपको 72 हूरों के पास भेज देगा

आज सुबह से सुरक्षाबलों की आतंकियों के साथ मुठभेड़ चल रही थी। उसके बाद खबर आई कि जीनत उल इस्लाम और मुन्ना लाहौरी कुत्ते की मौत मरे। (कृपया ‘कुत्ते की मौत’ पर आहत न हों, आपकी इच्छा हो तो लोमड़ी, गीदड़ कुछ भी लगा सकते हैं) सुरक्षाबलों ने उन्हें मार गिराया। अब, जबकि वो मार गिराए गए हैं और भारत सरकार की नई जीरो टॉलरेंस नीति के हिसाब से साल के दो सौ आतंकी निपटाए जा रहे हैं, तो इससे कई सकारात्मक बातें सामने आती हैं।

पहली तो यह है कि आतंकी मारे जा रहे हैं। ये बात सच है कि मारने में भारत सरकार की गोलियाँ खर्च हो रही हैं, लेकिन अगर उस खर्चे की आप 22-22 साल की न्यायिक प्रक्रिया के बाद फाँसी या जेल देने में हुए खर्चे से तुलना करें, जिसे बाद में इनके बापों की जनमपत्री निकालने वाले राडियाछाप पत्रकार और विश्वविद्यालयों को जेहाद और नक्सली आतंक का अड्डा बनाने वाले कामपंथी यह कह कर नकारते रहें कि ये एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग है, तो आप पाएँगे कि चंद गोलियों की कीमत और उनका इम्पैक्ट लॉन्ग रन के लिए सबसे सही है। इसलिए भारत माता के वीर सपूतों की जय बोलते रहिए जो इन आतंकियों को एक अच्छे स्ट्राइक रेट और एवरेज के साथ फ्रंट फुट पर खेलते हुए आभासी आकाशी वेश्यालय भेजते रहते हैं।

दूसरी बात इससे यह होती है कि आपको इस बात पर डिबेट नहीं करना पड़ता कि आतंक का कोई मजहब है कि नहीं। धर्म तो बिलकुल नहीं होता, आतंक का मजहब ज़रूर होता है लेकिन लोग स्वीकारना नहीं चाहते। इस कारण फर्जी के डिबेट होते हैं, डिबेट करने वाले भी जानते हैं कि बाजारों में बम बाँध कर फटने वाला किसी खास मजहब से ही ताल्लुक रखता है, फिर भी कह नहीं सकता क्योंकि ऐसा कहते ही उसके इंटेलेक्चुअल होने का तमगा छीन लिया जाएगा। बुद्धिजीवी बनने के लिए आदमी बहुत सारे शहादत देता है जिसमें कॉमन सेंस, बुद्धि-विवेक का इस्तेमाल, चीजों को संदर्भ के साथ समझने की क्षमता आदि शामिल हैं।

तीसरी बात यह है कि हमें यह सब नहीं सोचना पड़ता कि वो किसी तथाकथित अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखता है कि नहीं। क्योंकि कुछ लोगों के लिए, जो नैरेटिव पर शिकंजा कसे रहते हैं, एक खास मजहब से ताल्लुक रखने वाला आदमी समुदाय विशेष का हो जाता है। उनकी विशेषता भले ही यह हो कि वो भारत देश के विरोध में हों, बम फोड़ते हों, आतंक फैलाते हों, लेकिन वो कहलाते शांतिप्रिय ही हैं। जैसे कि किसी कर्कशा ने अपना नाम पहले से ही ‘शांति’ रख लिया हो। या, किसी कातिल ने अपना नाम दयासागर रख लिया हो।

उसके बाद, चौथी सकारात्मक बात यह होती है कि आपको कोई मीडिया वाला, या वकील, यह समझाने नहीं आएगा कि वो जब बड़ा हो रहा था तो परिस्थितियाँ बहुत विषम थीं। यह कह कर उसकी सजा कम कराने की कोशिश नहीं होगी कि उसका बेटा दसवीं में है, बीवी अकेली हो जाएगी, परिवार का अकेला कमाने वाला जेल चला जाएगा तो कैसे जीवन होगा! जी, यही दलीलें दी जाती हैं। एक खास मजहब से, जिसका मैं नाम नहीं लूँगा, निकलने वाले अपराधियों को यही सब कह कर बचाया जाता है कि अरे, उसको जेल में डाल दोगे तो उसका घर कैसे चलेगा। बाकी धर्म के अपराधियों के घर की चिंता कभी नहीं हुई क्योंकि उनका परिवार नहीं होता और पूरी दुनिया का कानून इसी आधार पर तो चलता है कि चोर चोरी नहीं करेगा तो घर कैसे चलेगा! ख़ैर, विषयांतर हो गया पर आप मेरी बात समझ गए होंगे।

पाँचवा फायदा यह है कि हमारे सुरक्षा बलों को, हमारी एजेंसियों को कई साल तक लगातार सबूत इकट्ठा नहीं पड़ेगा कि ये आदमी आतंकी है। क्योंकि, आजकल तो आतंकियों के इतने रहनुमा सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते हैं कि वो ये भी साबित करने पर आ जाएँगे कि उसके हाथ में एके47 थी तो क्या हुआ, वो जिज्ञासावश देख रहा होगा किसी से लेकर। इससे ये साबित कैसे हुआ कि वो आतंकी था। फिर नए सबूत लाने को कहे जाएँगे। और सबूत आएँगे, तो बाद में कहा जाएगा कि सुरक्षा बलों ने तो सबूत प्लांट किए थे।

छठी बात यह होगी कि आतंकी कोर्ट में यह नहीं कहेगा कि उससे दबाव में बयान दिलवाया गया है। चूँकि, वो यह बात बोल नहीं पाएगा तो मीडिया का समुदाय विशेष और माओनंदन लेनिनप्रिया वामभक्त कामपंथियों की जमात यह नैरेटिव नहीं बना पाएगी कि शांतिप्रिय समुदाय के युवाओं को भारतीय स्टेट टॉर्चर करता है और उन्हें उनके मजहब के आधार पर चिह्नित करते हुए जबरदस्ती आतंकी करार दिया जाता है।

सातवीं बात, जो उसके फाँसी पर चढ़ने के बाद अमूमन चर्चा में आती है, वो यह होगी कि चूँकि वो समुदाय विशेष का था इसीलिए फाँसी दे दी गई, अगर वो हिन्दू होता तो उसे छोड़ दिया जाता। पहली बात तो यह है कि हिन्दू इस तरह के काम में शरीक नहीं होते, इसलिए उन्हें न तो पकड़ा जाता, न ही छोड़ने की नौबत आती। ‘हिन्दू टेरर’ की थ्योरी कैसे फुस्स हुई, वो सबके सामने है। दूसरी बात, हिन्दुओं को उनके अपराधों की सजा हर दिन इसी देश का कोर्ट देता है, और उस पर कोई बवाल नहीं करता।

आठवीं अच्छी बात यह होती कि फाँसी से बचने के लिए जो ‘दया याचिका’, यानी मर्सी पटीशन, देकर जो कुछ समय तक सरकारी खर्चे पर दाल-चावल खाई जाती है, उससे बचाव हो जाता है। जो है ही नहीं, वो दाल-चावल क्या खाएगा। दया याचिका को लेकर इमोशनल दलीलें, सत्तारूढ़ पार्टियों की तुष्टीकरण का कैलकुलेशन, चोर पत्रकारों के नैरेटिव आदि को सुन कर समय बर्बाद नहीं होता।

नवीं बात, जो बहुत ही ज्यादा सकारात्मक है, वो यह है कि ह्यूमन राइट्स के नाम पर जो आतंकवादियों और नक्सली आतंकियों को इस देश के चिरकुट विचारक बचाते रहते हैं, वो सब देखने से लोग बच जाते। क्योंकि आतंकी और सुरक्षा बलों के जवानों में ह्यूमन एक ही पक्ष होता है, इसलिए राइट्स भी उन्हीं के होते हैं। उस पक्ष का नाम है सुरक्षा बल। ये लोग अपनी जान की परवाह किए बिना इन कैंसर कारक हूरप्रेमी, अतः सेक्सुअली परवर्ट और ट्विस्टेड, आतंकियों से लड़ते हैं। इसीलिए यह वाहियात तर्क सुनने से पूरा देश बच जाता कि मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, जबकि आतंकी न तो मानव हैं, न उनके अधिकार हैं। जा कर उन बापों से पूछिए जिन्हें अपने आतंकी औलादों पर गर्व है और कहते हैं कि एक और होता तो उसे भी कुत्ते की मौत मरने, सॉरी शहीद होने, भेज देते।

इसलिए, दसवीं बात यह है कि इतने स्टेज का झंझट छोड़ो, क्योंकि जिसके हाथ में हथियार है, और जो गोली चला रहा है, उसे पकड़ने के चक्कर में कोई जवान मारा जाए, इससे बेहतर है कि उसे घेरकर मार दिया जाए। हाँ, उसने आत्मसमर्पण करना चाहा हो तो उसको पकड़ा जाए। लेकिन जब सामने से गोली चले, तो गाय की भीड़ को नमस्कार करके सर झुकाना बुद्धिमानी तो बिलकुल नहीं है।

अलीगढ़ में हनुमान जी की मूर्ति तोड़ने से तनाव, बजरंग दल ने मुस्लिम युवक पर लगाया आरोप

आज, शनिवार को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में पुराने बस स्टैंड के पास गाँधी पार्क में लगी हनुमान जी की मूर्ति क्षतिग्रस्त कर दी गई। इस से आक्रोशित बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया। घटना के विरोध में तमाम हिन्दू कार्यकर्ता गाँधी पार्क पहुँचे।

उनका कहना है कि इस पार्क में हर वर्ग के लोग घूमने-फिरने आते हैं। सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं। इसके बावजूद एक विशेष समुदाय के युवक ने जान-बूझकर हनुमान जी की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया। 

बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि सीसीटीवी कैमरा लगे होने के बाद भी इस घटना पर अपराधियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गई। गौरव शर्मा (बजरंगदल, महानगर संयोजक, अलीगढ़) ने दावा किया है कि मुस्लिम समुदाय के व्यक्ति ने रात में पार्क में घुसकर मूर्ति तोड़ दी। शर्मा के अनुसार उसे चौकीदार ने पार्क में घुसते देखा था।

विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि शहर के तमाम पार्क में अवांछित तत्व घूमते हैं और बहन-बेटियों के साथ छेड़खानी करते हैं। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस-प्रशासन से इस मामले में संज्ञान लेने की भी अपील की है। उन्होंने कहा कि अगर प्रशासन ऐसा नहीं कर पाता है तो बजरंग दल खुद ऐसे तत्वों को रोकने के लिए आगे आएगा।

हाल ही में अलीगढ़ के जिलाधिकारी चंद्रभूषण सिंह ने सड़क पर हनुमान जी की आरती और नमाज को लेकर सख्त निर्देश दिए थे। शहर में शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए डीएम ने आदेश दिए थे कि सड़क पर किसी भी हाल में आरती, हनुमान चालीसा और नमाज न हो। इसको लेकर प्रशासन शुक्रवार से ही चौकन्ना है, लेकिन अलीगढ़ बस स्टैंड गांधी पार्क में हनुमान जी की मूर्ति तोड़ने की घटना ने माहौल गरमा दिया।

मूर्ति तोड़ने की जानकारी जैसे ही बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को मिली वे गाँधी पार्क पहुँच गए और हंगामा किया। थाना गाँधी पार्क पुलिस ने कार्यकर्ताओं को खूब समझाया, लेकिन वे नहीं माने और कार्रवाई की माँग को लेकर धरने पर बैठ गए।

जातिवाद और साम्प्रदायिकता ही कम्युनिस्टों का ‘बाज़ार’ है, वो इसे भला खत्म क्यों होने देंगे?

पंचतंत्र में किसी भी व्यक्ति पर आँख बंद करके भरोसा न करने की सीख राजकुमारों को देने के संदर्भ में कथावाचक पंडित विष्णु शर्मा कहते हैं कि मंत्री हमेशा चाहेगा कि राजा किसी न किसी मुसीबत में फँसा ही रहे, ताकि मंत्री की प्रासंगिकता, उसकी पूछ बनी रहे। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में इसका अर्थ है कि जिसकी कुल जमा-पूँजी दूसरे की समस्याएँ हो और उसी से उसकी रोज़ी-रोटी चलती हो तो भला वह इंसान समस्या का समाधान क्यों चाहेगा। हालाँकि यह ‘लेंस’ कोई सर्वव्यापी सत्य नहीं है, लेकिन कुछ जगहों पर यह शर्तिया लागू होता है- कम्युनिस्ट उन्हीं में से एक हैं।

“सर्वहारा के लिए” और “बुर्जुआ के खिलाफ” का इनका नारा अव्वल तो केवल आँखों में धूल झोंकने का होता है, कथनी-करनी में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है। और कभी-कभार यदा-कदा अपनी कथनी को करनी में बदलना भी पड़ता है, तो केवल बेभाव का खून बहाने के अतिरिक्त कोई भी ‘उपलब्धि’ इनके हाथ आई ही नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि यह केवल दुर्भाग्यपूर्ण संयोगों और घटनाओं की ही एक शृंखला हो, जैसा कि अक्सर ‘असली कम्युनिज़्म’ तो अभी तक किसी ने ‘ट्राई’ ही नहीं किया का बहाना मार आँखों में धूल झोंकने वाले अर्बन नक्सली दावा करते हैं। यह नाकामी, यह खून-खराबा ही दुनिया को ‘शोषक’ और ‘शोषित’ के अति-सरल (और झूठे) ध्रुवों में बाँट देने वाले मार्क्सवाद की तार्किक परिणति है। यह रक्त-पिपासा कोई ‘glitch’ नहीं, एकदम हार्डकोर ‘feature’ है।

यूरोप में आर्थिक, भारत में जातिवादी?

भारत के मार्क्सवादियों, कन्हैया कुमार जैसी उसकी उम्मीदों और स्वरा भास्कर, गुरमेहर कौर जैसे हिमायतियों को अगर सुनें तो लगेगा मार्क्सवाद जाति-व्यवस्था के बारे में है, इसका आधार सामाजिक है। मार्क्सवादी ‘यूटोपिया’ के बाद यह सबसे बड़ा झूठ है। कम्युनिज़्म असल में आर्थिक शोषक-शोषित द्विगुण (binary) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका सरलीकृत संस्करण ऐसे समझिए कि मानव इतिहास कुल मिलाकर पैसे और ताकत की लूट की कहानी है। कुछ लोग ‘दुर्घटनावश’ (न कि अपने कौशल से) अमीर हो गए, उन्होंने (केवल) पैसे के दम पर ताकत हासिल की और पूरी पश्चिमी सभ्यता, संस्कृति और इसका इतिहास पैसा और ताकत लूट कर इसके गठजोड़ से करोड़ों को सताने और मारने वाले शोषकों की बनाई हुई एक कृत्रिम ‘रचना’ भर है।

इस सोच के मीन-मेख पर तो किताबें कम पड़ जाएँ, लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि यहाँ धन-सम्पदा को ‘शोषक’ को पहचानने का आधार माना गया है। लेकिन जब भारत में इसका आयात किया गया तो एक बड़ी समस्या यह थी कि आर्थिक आधार भारत में चलना नहीं था- अंग्रेजों और उससे पहले मुगलों के भारत को लूटने के चलते लगभग पूरा भारत कंगाल था। तो नैरेटिव गढ़ने लायक, दुश्मन ‘बुर्जुआ वर्ग’ तैयार करने लायक बड़ी संख्या में अमीर तो मिले नहीं। और बिना शोषक-शोषित के वर्गभेद के ‘सामाजिक क्रांति’ किसके खिलाफ होती? अंग्रेज तो राजनीतिक शत्रु थे। उनका भारतीयों के साथ इतना सामाजिक रूप से मिलना-जुलना नहीं था। न ही इतनी संख्या में वह थे कि उन्हें सामाजिक शत्रु बनाया जा सके।

यहाँ से तैयार हुआ शोषक जाति-शोषित जाति का कथानक। हालाँकि भारत में मार्क्स के जीवन-काल (1818-1883) में ही इस जहर के बीज बोए जाने लगे थे, लेकिन इसने ज़ोर पकड़ना चालू किया लेनिन की अक्टूबर क्रांति (1917) के दौरान और उसके बाद। अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे राष्ट्रवादी आंदोलन की पीठ पर चढ़ कर आया मार्क्सवाद जल्दी ही अपने असली रंग दिखाने लगा। भारतीय कम्युनिस्टों ने मुस्लिमों के खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया, देश के पहले मजहबी उम्माह के प्रति वफ़ादारी के कायल बने और जाति-प्रथा, छुआछूत की कुप्रथाओं को ही हिन्दू धर्म की परिभाषा बता कर अंग्रेजी प्रोपेगंडा को ही आगे बढ़ाया। हरिशंकर परसाई की मशहूर कहानी की तरह वह तो केवल ‘क्रांति’ करने के लिए किसी को ‘शोषक’ बनाने की फ़िराक में थे- चाहे असलियत कुछ भी हो।

हर जगह, हर कदम पर विनाशक

मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट देश-काल-परिस्थिति कुछ भी रही हो, हर जगह असफल ही हुए हैं। लगभग हर जगह खूनी रूप से असफल। आदर्शवादी, वैचारिक सब्ज़बाग में उनकी अंधश्रद्धा इतनी ज़्यादा है कि उसको असफल होते देख कर वह मुँह फेर लेते हैं- तथ्य और सबूत से लेकर अपनी क्रांति में बहते खून तक हर चीज़ के प्रति संवेदनशून्य होकर। जिन जगहों पर आर्थिक कम्युनिज़्म चलाने की कोशिश की, वहाँ उद्योग-धंधे तबाह हो गए, लोग भूखे मर गए। जिसने भूख और भूख से उपजे गुस्से को आवाज़ दी, उसे सरकार ने ‘लोगों का दुश्मन’ (एनेमी ऑफ़ द पीपल) बता कर गोली मार दी या जिन फैक्ट्री-मालिकों को कम्युनिस्ट गाली देते थे, उनसे भी ज़्यादा अमानवीय परिस्थिति में बंधुआ मजदूरी/गुलामी करने के लिए भेज दिया। और उस पर चुत्ज़्पाह (सीनाजोरी) यह कि गरीबी हटाने का नारा देकर ही सत्ता में बने रहे। ऐसे ही 20वीं सदी में 10 से 11 करोड़ (Death by Government, 1994, R. J. Rummel; Black Book of Communism, 1999, Stéphane Courtois) लोग कम्युनिस्टों की सर्वहारा क्रांति की भेंट चढ़ गए। इस आँकड़े की भयावहता इस चीज़ से समझी जा सकती है कि हिटलर इसके दस प्रतिशत (60 लाख से 1.20 करोड़ के बीच) लोगों को मार कर दुनिया में एक गाली बन गया।

भारत में कम्युनिस्टों ने जातिवादी और आर्थिक घालमेल किया, तो उसके भी परिणाम ऐसे ही हुए। नेहरू के वैचारिक रूप से अपने पाले में होने का फायदा उठाकर उन्होंने हिंदुस्तान को लाइसेंस-कोटा-परमिट राज में जकड़वा दिया। तर्क यह दिया गया कि चूँकि अंग्रेजों के समय में ऊपर उठे गिने-चुने उद्योगपति लगभग सभी सवर्ण हैं, इसलिए मार्केट को खुला छोड़ देने पर दलित को ऊँचा उठने का मौका नहीं मिलेगा। इसमें वह पता नहीं यह पक्ष देख नहीं पाए या देख कर अनदेखा किया कि देश में निजी मुनाफ़े के लिए औद्योगीकरण जहाँ-जहाँ, जैसे-जैसे हुआ, छुआछूत धीरे-धीरे, लेकिन सतत रूप से घटता गया।

आखिर निजी फैक्ट्री मालिक, जो अधिकतम मुनाफ़े के चक्कर में होता है, वह ऐसे दलित को नौकरी क्यों न देता जो यह साबित कर देता कि वह किसी सवर्ण उम्मीदवार से अधिक मुनाफ़ा ला सकता है? अंबेडकर ने खुद गाँवों को ‘जातिवाद और अस्पृश्यता का मलकुंड’ और तीव्र औद्योगीकरण को सामाजिक सफाई बताया था। और यही हुआ भी। आर्थिक उदारीकरण के बाद से बीस साल में जातिवाद और छुआछूत में आई कमी, उसके पहले के करीब 50 सालों से कई गुना ज़्यादा है। लेकिन कम्युनिस्ट यह मान लें तो फिर राजनीति करने के लिए उनके पास क्या बचता?

सामाजिक रूप से भी उन्होंने यही किया। चूँकि वह केंद्रीय सत्ता पर कभी सीधा कब्ज़ा नहीं कर पाए (यह बात अलग है कि भारत की राजनीति की मुख्यधारा नेहरूवियन दर्शन उन्हीं की विचारधारा का ‘अहिंसक’, संशोधित रूप था), तो कभी केंद्रीय स्तर पर बोल्शेविक आर्मी जैसा संगठन नहीं बना। लेकिन जिस राज्य में भी वह सत्ता में आए, हिंसा फैली, जातिवाद बढ़ा। भारतीय कम्युनिस्ट काडर की हिंसा, जैसे बेटों की लाश से बहते खून में सना भात उसकी माँ को खिलाना, दलित शरणार्थियों को भून डालना, आदि की आधुनिक इतिहास में दूसरे कम्युनिस्टों और हिटलर के अलावा सानी मिलना मुश्किल है।

जहाँ राज करने का मौका नहीं मिला, या काडर से उतनी हिंसा नहीं बन पड़ी जितनी में ‘क्रांति’ की रक्त-पिपासा शांत हो सके, वहाँ बची-खुची कसर नक्सलियों-माओवादियों के ज़रिए पूरी हुई। चारु मजूमदार, जिसे नक्सली ‘आंदोलन’ का संस्थापक माना जाता है, मार्क्स-लेनिन-माओ की ही त्रयी की परिणति था। उसने जो जन-अदालतें लगाईं, जैसे जमींदारों ही नहीं, किसी भी सवर्ण को, जो खुल्लम-खुल्ला और सौ-प्रतिशत कम्युनिस्ट न हो, जन अदालतों के मुकदमे की नौटंकी कर के मार डालने को ‘क्रांति’ बताया, वह राई-रत्ती भी माओ और लेनिन द्वारा अपने देशों में अपनाए गए हथकंडों से अलग नहीं है। 26/11 के बाद दिए गए इंटरव्यू में भारतीय माओवादियों का पोस्टर-बॉय माने जाने वाले किशनजी ने कहा था कि जिहादी बस मुस्लिमों को न मारें तो इस्लामी दहशतगर्दी (जी हाँ, इस्लामी दहशतगर्दी) के समर्थन से उसे कोई गुरेज नहीं है

‘Culture Game’ ‘स्ट्रॉन्ग’ है

सवाल लाज़मी है कि इतने खूनी इतिहास के बाद भी आज कम्युनिस्ट होना नाज़ी होने की तरह गाली क्यों नहीं है, बल्कि ऐसे इठला कर खुद को कम्युनिस्ट बताया जाता है मानों कोई तमगा हो। ऐसा इसलिए है कि एक तो उनकी विचारधारा आदर्शवादी नैतिकता की चाशनी में डूबी है, शोषक-शोषित का फर्जी binary हर इंसान को ऐसा लगता है कि कहीं-न-कहीं ‘सही’ हो सकता है। और दूसरे, भारत में आज़ादी के बाद सारे बौद्धिक-सांस्कृतिक संस्थानों को नेहरू ने अंदरखाने राजनीतिक समर्थन के बदले कम्युनिस्टों के हवाले कर दिया था। नतीजन उनकी आवाज़ ही भारतीय समकालीन सांस्कृतिक परिदृश्य की इकलौती आवाज़ बची।

इसीलिए जातिवाद को खत्म करने वाली सबसे बड़ी आर्थिक ताकत, मुक्त बाज़ार, के भी कम्युनिस्ट दुश्मन हैं। इसीलिए कम्युनिस्ट सड़कें न बनने देने वाले, स्कूलों में बम और सरकारी दफ्तरों में आग लगा देने वाले नक्सलियों-माओवादियों के पैरोकार हैं। इसीलिए एक ओर भारतीय संस्कृति को ‘ब्राह्मणवादी, जातिवादी’ बता कर नष्ट करने पर सांस्कृतिक कम्युनिस्ट/अर्बन नक्सली आमादा हैं, वहीं दूसरी और आदिवासी इलाकों में ‘संस्कृति’ बचाए रखने के नाम पर कोई विकास कार्य भी नहीं होने देते।

‘Miss You-Kiss You’ से लेकर योग और गोमांस तक इरा त्रिवेदी के ‘कर्मों’ पर रिग्रेसिव हिन्दू नजर

गाय के माँस को झूठे आँकड़ों के आधार पर प्रोटीन का सबसे बेहतर स्रोत बताने वाली कथित योग गुरु इरा त्रिवेदी आजकल चर्चा में हैं। इरा त्रिवेदी और विवाद का सिर्फ एक दिन का रिश्ता नहीं है। बीफ (गोमांस) के प्रचार से पहले इरा त्रिवेदी सस्ती लोकप्रियता के लिए महिला उत्पीड़न जैसे संवेदनशील मुद्दे का मजाक भी बना चुकी हैं।

इरा द्वारा गोमांस के प्रचार को लेकर सामने आए विवाद के बाद उन्हें दूरदर्शन ने चौबीस घंटे घर पर योग करने की आजादी दे दी है। अब वो दूरदर्शन पर योग नहीं सिखा पाएँगी। हालाँकि, इस प्रकरण के बाद वो ट्विटर पर माफ़ी माँगती नजर आईं थी। इस पूरे विवाद के बाद आज अचानक चेतन भगत के ट्वीट ने #Metoo कैम्पेन की यादें भी ताजा कर दी है।

दरअसल, ट्विटर पर इरा त्रिवेदी को लेकर चल रहे विवाद के बाद कल ही चेतन भगत ने एक ट्वीट करते हुए लिखा- “Karma”

हालाँकि, चेतन भगत ने इस ट्वीट के बाद आगे कुछ भी नहीं लिखा है, लेकिन ट्विटर यूज़र्स इसके बाद Me Too (मीटू) अभियान के बारे में सोचने को मजबूर जरूर हो गए।

पिछले साल इस मुहिम के शुरू होने के बाद कई महिलाओं को अपने साथ घर और कार्यक्षेत्र पर हुए यौन उत्पीड़न के बारे में खुलकर कहने का हौसला मिला था। यह अभियान इतना ताकतवर था कि विदेशों में कई नामी हस्तियों को इसके बाद अपने-अपने क्षेत्रों में तगड़ा विरोध झेलना पड़ा। कई आरोपितों का उनके कार्यक्षेत्र से बहिष्कार कर दिया गया था, तो कई लोग अपने दोहरे चरित्र के कारण सबके सामने बेपर्दा हो गए। 

भारत में भी ऐसा ही कुछ देखा गया, लेकिन यहाँ पर ख़ास बात यह भी देखी गई कि इस अभियान में जिन लोगों के नाम उछले, उनके प्रति कई प्रगतिशील (जो रिग्रेसिव नहीं थे) और नारीवादियों ने एक समानांतर संवेदना दिखाई। घटिया कॉमेडी और अश्लील प्रोग्राम्स की वजह से प्रगतिशीलों की बाइबिल, AIB जैसे समूहों ने जरूर अपने कुछ लोगों को निष्कासित किया।

लेकिन, इरा त्रिवेदी जैसे कई लोगों ने इस अभियान का गलत फायदा उठाने के भी प्रयास किए। ठीक वैसे ही, जैसे अक्सर कुछ लोग अपने धर्म, जाति, मजहब और लैंगिक विषमताओं के आधार पर विक्टिम कार्ड खेलकर लोकप्रियता जुटाते हुए देखे जाते हैं।

भावनाओं में बहकर योग गुरु इरा त्रिवेदी ने चेतन भगत पर भी आरोप लगाए थे कि उन्होंने उनका उत्पीड़न करने की कोशिश की थी। उनका कहना था कि चेतन भगत ने उन्हें जबरदस्ती किस किया था।

इरा त्रिवेदी के इस आरोप की पोल खुद चेतन भगत ने ही उनके ईमेल के स्क्रीनशॉट सार्वजनिक कर के खोल दी थी और ट्वीट करते हुए लिखा था- “तो कौन किसे किस करना चाहता था।”

चेतन भगत के कल किए गए ‘कर्म’ (Karma) वाले ट्वीट का सम्बन्ध उसी घटना से जोड़कर देखा जा रहा है।

इरा त्रिवेदी के ग्रहों की दशा अवश्य ही विपरीत चल रही है। एक समय था जब उन्होंने इस्लाम के धर्म ग्रन्थ से तुलना करते हुए क़ुरान को आधुनिक और हिन्दुओं को रेग्रेसिव (यानी, जो प्रगति, तरक्की, और उन्नति के विरोधी होते हैं) बताकर खूब वाह-वाही लूटी थी। लेकिन, जैसा कि एक मशहूर गायक अल्ताफ राजा ने गाया है, “वो साल दूसरा था, ये साल दूसरा है….”

फिलहाल, दूरदर्शन ने एक नया ट्वीट शेयर किया है, लेकिन इसमें इरा त्रिवेदी गायब हैं। रोजाना स्वस्थ मन-मस्तिष्क के लिए योग जरूर करें, और ये शो देखना न भूल जाएँ।

बरेली के जिस गॉंव से भाग रहे हिन्दू, वहॉं का जाबिर मोदी को गाली देने पर गिरफ्तार

बरेली के मिलक पिछौड़ा गॉंव के एक मुस्लिम युवक को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया है। उत्तर प्रदेश का यह गॉंव पिछले कुछ दिनों से हिन्दुओं को पूजा-पाठ से रोके जाने, उन्हें धर्मांतरण और पलायन के लिए मजबूर करने की खबरों को लेकर चर्चा में बना हुआ है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक गॉंव के जाबिर नामक युवक का एक वीडियो वायरल हुआ है। इसमें वह पीएम मोदी के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल करता दिख रहा है। समुदाय विशेष के कथित आतंक से पहले से ही परेशान हिन्दू इस वीडियो को देख बिफर उठे।

कुछ मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि यह वीडियो लोकसभा चुनाव से पहले का है। लेकिन, गाँव के हालिया तनाव को देखते हुए यह वीडियो आग में घी का काम कर सकता था। इसलिए, मामला सामने आते ही नवाबगंज की पुलिस ने कय्यूम अली के बेटे जाबिर को गिरफ़्तार कर लिया। तनाव को देखते हुए पीएसी और चार थानों की फ़ोर्स के साथ नवाबगंज के सर्कल अफ़सर पीतमपाल सिंह खुद गाँव में जमे हुए हैं

27/7/19 के दैनिक जागरण (बरेली शहर संस्करण) से साभार

पूजा से रोकने को लेकर चर्चा में है गाँव

85% के करीब मुस्लिम आबादी वाला मिलक पिछौड़ा गाँव कुछ दिनों से चर्चा में है। गाँव के हिन्दुओं का कहना है कि ग्राम समाज की ज़मीन पर पिछले 70 वर्षों से एक छोटा-सा मंदिर है, जिसका निर्माण कार्य गाँव वाले मिलकर कराना चाहते हैं। लेकिन, मुस्लिम समुदाय के लोग उन्हें न तो पूजा करने देते हैं और न ही मंदिर का निर्माण करने दे रहे हैं। विरोध करने पर मुस्लिम समुदाय के लोग लाठी-डंडों और ईंट-पत्थरों से उन पर हमला कर देते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पुलिस ने ऐसी घटना से इनकार किया था। दैनिक जागरण ने हिन्दू महिलाओं के हवाले से बताया था कि मुस्लिम मंदिर में घंटा बजाने और मूर्ति पर जल चढ़ाने भी नहीं देते। यदि कोई हिन्दू इसका विरोध करता है तो मुस्लिम समुदाय के लोग उनके घर की लड़कियों को उठा लेने की धमकी देते हैं।

सरस्वती नामक महिला ने बताया था कि रोज-रोज इस तरह के धमकी भरे माहौल में रहना दूभर हो गया है। सभी अधिकारियों से मदद की गुहार भी लगाई, लेकिन उसका कोई नतीजा अब तक नहीं निकला है। उन्होंने बताया कि स्थानीय भाजपा विधायक छत्रपाल सिंह से भी कोई मदद नहीं मिली। सरस्वती ने कहा कि जहाँ पूजा-पाठ की स्वतंत्रता न हो, वहाँ से चले जाना ही बेहतर है।

मीडिया की कारस्तानी: जय श्री राम बोलने के लिए मुस्लिम MLA पर BJP मंत्री ने डाला दबाव

जय श्री राम बोलने के लिए मजहब विशेष को मजबूर करने की कई झूठी खबरें सामने आ चुकी हैं। अब इसी कड़ी में कुछ मीडिया संस्थानों ने क्रॉप्ड वीडियो के जरिए यह साबित करने की कोशिश की है कि झारखंड की भाजपा सरकार में मंत्री सीपी सिंह ने कॉन्ग्रेस विधायक इरफान अंसारी को जय श्री राम बोलने के लिए मजबूर किया। इन मीडिया संस्थानों में कथित राष्ट्रवादी न्यूज़ चैनल टाइम्स नाउ भी शामिल है।

झारखंड विधानसभा के बाहर हुई घटना का जिक्र करते हुए टाइम्स नाउ ने आरोप लगाया है कि सिंह ने अंसारी को जय श्री राम बोलने के लिए मजबूर किया। इसी तरह का दवा कुछ अन्य मीडिया हाउस ने भी किए हैं। सबने अपने दावों के समर्थन में एक जैसे वीडियो क्लिप चलाए हैं।

मीडिया संस्थानों की तरफ से प्रसारित वीडियो क्लिप को देखकर यह इनकार नहीं किया जा सकता कि सिंह ने अंसारी से जय श्री राम कहने के लिए कहा। लेकिन, यह आधा सच है। भाजपा नेता को विलेन की तरह से पेश करने के लिए मीडिया संस्थानों ने जान-बूझकर पूरे वीडियो का एक ही हिस्सा दिखाया। वीडियो के शुरुआती हिस्से को देखने से पता चलता है कि सीपी सिंह जय श्री राम पर कॉन्ग्रेस विधायक के कॉमेंट का जवाब दे रहे थे।

पूरे वीडियो को देखने से पता चलता है कि अंसारी के साथ जय श्री राम बोलने को लेकर कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की गई। उन्होंने खुद ही कहा कि राम सिर्फ भाजपा के नहीं, बल्कि सभी के हैं। इसके बाद, इंटरव्यू रिकॉर्ड करने वाले चैनल के क्रू ने बगल में इंटरव्यू दे रहे सीपी सिंह से अंसारी की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया माँगी। जवाब में सिंह ने कहा कि बेशक, इरफान भाई को जय श्री राम बोलना चाहिए, क्योंकि उनके पूर्वज भी राम ही थे, बाबर या तैमूर नहीं। वो अंसारी को याद दिलाते हैं कि उनकी पिछली पीढ़ी हिंदू थी न कि आक्रमणकारी मुगल।

इस वीडियो से यह स्पष्ट होता है कि सीपी सिंह ने अंसारी को जय श्री राम बोलने के लिए इसलिए कहा क्योंकि अंसारी दावा कर रहे थे कि राम सिर्फ भाजपा के नहीं बल्कि सभी के हैं। लेकिन, मीडिया हाउसों ने इरफान अंसारी की टिप्पणी को हटाते हुए एडिटेड वीडियो प्रसारित किया।

इस वीडियो में ध्यान देने वाली बात ये है कि इरफान अंसारी ने भी सीपी सिंह के द्वारा जय श्री राम बोलने को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई। वीडियो में वे हँसते हुए अपने हाथ में बंधा कलावा दिखाते हैं। साथ ही वे कहते हैं, राम सभी के हैं और अयोध्या में ‘राम की स्थिति’ को लेकर भाजपा नेता पर ताना भी मारते हैं।