Friday, June 5, 2020
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जातिवाद और साम्प्रदायिकता ही कम्युनिस्टों का ‘बाज़ार’ है, वो इसे भला खत्म क्यों होने देंगे?

मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट देश-काल-परिस्थिति कुछ भी रही हो, हर जगह असफल ही हुए हैं। आदर्शवादी, वैचारिक सब्ज़बाग में उनकी अंधश्रद्धा इतनी ज़्यादा है कि उसको असफल होते देख कर वह मुँह फेर लेते हैं।

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पंचतंत्र में किसी भी व्यक्ति पर आँख बंद करके भरोसा न करने की सीख राजकुमारों को देने के संदर्भ में कथावाचक पंडित विष्णु शर्मा कहते हैं कि मंत्री हमेशा चाहेगा कि राजा किसी न किसी मुसीबत में फँसा ही रहे, ताकि मंत्री की प्रासंगिकता, उसकी पूछ बनी रहे। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में इसका अर्थ है कि जिसकी कुल जमा-पूँजी दूसरे की समस्याएँ हो और उसी से उसकी रोज़ी-रोटी चलती हो तो भला वह इंसान समस्या का समाधान क्यों चाहेगा। हालाँकि यह ‘लेंस’ कोई सर्वव्यापी सत्य नहीं है, लेकिन कुछ जगहों पर यह शर्तिया लागू होता है- कम्युनिस्ट उन्हीं में से एक हैं।

“सर्वहारा के लिए” और “बुर्जुआ के खिलाफ” का इनका नारा अव्वल तो केवल आँखों में धूल झोंकने का होता है, कथनी-करनी में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है। और कभी-कभार यदा-कदा अपनी कथनी को करनी में बदलना भी पड़ता है, तो केवल बेभाव का खून बहाने के अतिरिक्त कोई भी ‘उपलब्धि’ इनके हाथ आई ही नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि यह केवल दुर्भाग्यपूर्ण संयोगों और घटनाओं की ही एक शृंखला हो, जैसा कि अक्सर ‘असली कम्युनिज़्म’ तो अभी तक किसी ने ‘ट्राई’ ही नहीं किया का बहाना मार आँखों में धूल झोंकने वाले अर्बन नक्सली दावा करते हैं। यह नाकामी, यह खून-खराबा ही दुनिया को ‘शोषक’ और ‘शोषित’ के अति-सरल (और झूठे) ध्रुवों में बाँट देने वाले मार्क्सवाद की तार्किक परिणति है। यह रक्त-पिपासा कोई ‘glitch’ नहीं, एकदम हार्डकोर ‘feature’ है।

यूरोप में आर्थिक, भारत में जातिवादी?

भारत के मार्क्सवादियों, कन्हैया कुमार जैसी उसकी उम्मीदों और स्वरा भास्कर, गुरमेहर कौर जैसे हिमायतियों को अगर सुनें तो लगेगा मार्क्सवाद जाति-व्यवस्था के बारे में है, इसका आधार सामाजिक है। मार्क्सवादी ‘यूटोपिया’ के बाद यह सबसे बड़ा झूठ है। कम्युनिज़्म असल में आर्थिक शोषक-शोषित द्विगुण (binary) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका सरलीकृत संस्करण ऐसे समझिए कि मानव इतिहास कुल मिलाकर पैसे और ताकत की लूट की कहानी है। कुछ लोग ‘दुर्घटनावश’ (न कि अपने कौशल से) अमीर हो गए, उन्होंने (केवल) पैसे के दम पर ताकत हासिल की और पूरी पश्चिमी सभ्यता, संस्कृति और इसका इतिहास पैसा और ताकत लूट कर इसके गठजोड़ से करोड़ों को सताने और मारने वाले शोषकों की बनाई हुई एक कृत्रिम ‘रचना’ भर है।

इस सोच के मीन-मेख पर तो किताबें कम पड़ जाएँ, लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि यहाँ धन-सम्पदा को ‘शोषक’ को पहचानने का आधार माना गया है। लेकिन जब भारत में इसका आयात किया गया तो एक बड़ी समस्या यह थी कि आर्थिक आधार भारत में चलना नहीं था- अंग्रेजों और उससे पहले मुगलों के भारत को लूटने के चलते लगभग पूरा भारत कंगाल था। तो नैरेटिव गढ़ने लायक, दुश्मन ‘बुर्जुआ वर्ग’ तैयार करने लायक बड़ी संख्या में अमीर तो मिले नहीं। और बिना शोषक-शोषित के वर्गभेद के ‘सामाजिक क्रांति’ किसके खिलाफ होती? अंग्रेज तो राजनीतिक शत्रु थे। उनका भारतीयों के साथ इतना सामाजिक रूप से मिलना-जुलना नहीं था। न ही इतनी संख्या में वह थे कि उन्हें सामाजिक शत्रु बनाया जा सके।

यहाँ से तैयार हुआ शोषक जाति-शोषित जाति का कथानक। हालाँकि भारत में मार्क्स के जीवन-काल (1818-1883) में ही इस जहर के बीज बोए जाने लगे थे, लेकिन इसने ज़ोर पकड़ना चालू किया लेनिन की अक्टूबर क्रांति (1917) के दौरान और उसके बाद। अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे राष्ट्रवादी आंदोलन की पीठ पर चढ़ कर आया मार्क्सवाद जल्दी ही अपने असली रंग दिखाने लगा। भारतीय कम्युनिस्टों ने मुसलमानों के खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया, देश के पहले मजहबी उम्माह के प्रति वफ़ादारी के कायल बने और जाति-प्रथा, छुआछूत की कुप्रथाओं को ही हिन्दू धर्म की परिभाषा बता कर अंग्रेजी प्रोपेगंडा को ही आगे बढ़ाया। हरिशंकर परसाई की मशहूर कहानी की तरह वह तो केवल ‘क्रांति’ करने के लिए किसी को ‘शोषक’ बनाने की फ़िराक में थे- चाहे असलियत कुछ भी हो।

हर जगह, हर कदम पर विनाशक

मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट देश-काल-परिस्थिति कुछ भी रही हो, हर जगह असफल ही हुए हैं। लगभग हर जगह खूनी रूप से असफल। आदर्शवादी, वैचारिक सब्ज़बाग में उनकी अंधश्रद्धा इतनी ज़्यादा है कि उसको असफल होते देख कर वह मुँह फेर लेते हैं- तथ्य और सबूत से लेकर अपनी क्रांति में बहते खून तक हर चीज़ के प्रति संवेदनशून्य होकर। जिन जगहों पर आर्थिक कम्युनिज़्म चलाने की कोशिश की, वहाँ उद्योग-धंधे तबाह हो गए, लोग भूखे मर गए। जिसने भूख और भूख से उपजे गुस्से को आवाज़ दी, उसे सरकार ने ‘लोगों का दुश्मन’ (एनेमी ऑफ़ द पीपल) बता कर गोली मार दी या जिन फैक्ट्री-मालिकों को कम्युनिस्ट गाली देते थे, उनसे भी ज़्यादा अमानवीय परिस्थिति में बंधुआ मजदूरी/गुलामी करने के लिए भेज दिया। और उस पर चुत्ज़्पाह (सीनाजोरी) यह कि गरीबी हटाने का नारा देकर ही सत्ता में बने रहे। ऐसे ही 20वीं सदी में 10 से 11 करोड़ (Death by Government, 1994, R. J. Rummel; Black Book of Communism, 1999, Stéphane Courtois) लोग कम्युनिस्टों की सर्वहारा क्रांति की भेंट चढ़ गए। इस आँकड़े की भयावहता इस चीज़ से समझी जा सकती है कि हिटलर इसके दस प्रतिशत (60 लाख से 1.20 करोड़ के बीच) लोगों को मार कर दुनिया में एक गाली बन गया।

भारत में कम्युनिस्टों ने जातिवादी और आर्थिक घालमेल किया, तो उसके भी परिणाम ऐसे ही हुए। नेहरू के वैचारिक रूप से अपने पाले में होने का फायदा उठाकर उन्होंने हिंदुस्तान को लाइसेंस-कोटा-परमिट राज में जकड़वा दिया। तर्क यह दिया गया कि चूँकि अंग्रेजों के समय में ऊपर उठे गिने-चुने उद्योगपति लगभग सभी सवर्ण हैं, इसलिए मार्केट को खुला छोड़ देने पर दलित को ऊँचा उठने का मौका नहीं मिलेगा। इसमें वह पता नहीं यह पक्ष देख नहीं पाए या देख कर अनदेखा किया कि देश में निजी मुनाफ़े के लिए औद्योगीकरण जहाँ-जहाँ, जैसे-जैसे हुआ, छुआछूत धीरे-धीरे, लेकिन सतत रूप से घटता गया।

आखिर निजी फैक्ट्री मालिक, जो अधिकतम मुनाफ़े के चक्कर में होता है, वह ऐसे दलित को नौकरी क्यों न देता जो यह साबित कर देता कि वह किसी सवर्ण उम्मीदवार से अधिक मुनाफ़ा ला सकता है? अंबेडकर ने खुद गाँवों को ‘जातिवाद और अस्पृश्यता का मलकुंड’ और तीव्र औद्योगीकरण को सामाजिक सफाई बताया था। और यही हुआ भी। आर्थिक उदारीकरण के बाद से बीस साल में जातिवाद और छुआछूत में आई कमी, उसके पहले के करीब 50 सालों से कई गुना ज़्यादा है। लेकिन कम्युनिस्ट यह मान लें तो फिर राजनीति करने के लिए उनके पास क्या बचता?

सामाजिक रूप से भी उन्होंने यही किया। चूँकि वह केंद्रीय सत्ता पर कभी सीधा कब्ज़ा नहीं कर पाए (यह बात अलग है कि भारत की राजनीति की मुख्यधारा नेहरूवियन दर्शन उन्हीं की विचारधारा का ‘अहिंसक’, संशोधित रूप था), तो कभी केंद्रीय स्तर पर बोल्शेविक आर्मी जैसा संगठन नहीं बना। लेकिन जिस राज्य में भी वह सत्ता में आए, हिंसा फैली, जातिवाद बढ़ा। भारतीय कम्युनिस्ट काडर की हिंसा, जैसे बेटों की लाश से बहते खून में सना भात उसकी माँ को खिलाना, दलित शरणार्थियों को भून डालना, आदि की आधुनिक इतिहास में दूसरे कम्युनिस्टों और हिटलर के अलावा सानी मिलना मुश्किल है।

जहाँ राज करने का मौका नहीं मिला, या काडर से उतनी हिंसा नहीं बन पड़ी जितनी में ‘क्रांति’ की रक्त-पिपासा शांत हो सके, वहाँ बची-खुची कसर नक्सलियों-माओवादियों के ज़रिए पूरी हुई। चारु मजूमदार, जिसे नक्सली ‘आंदोलन’ का संस्थापक माना जाता है, मार्क्स-लेनिन-माओ की ही त्रयी की परिणति था। उसने जो जन-अदालतें लगाईं, जैसे जमींदारों ही नहीं, किसी भी सवर्ण को, जो खुल्लम-खुल्ला और सौ-प्रतिशत कम्युनिस्ट न हो, जन अदालतों के मुकदमे की नौटंकी कर के मार डालने को ‘क्रांति’ बताया, वह राई-रत्ती भी माओ और लेनिन द्वारा अपने देशों में अपनाए गए हथकंडों से अलग नहीं है। 26/11 के बाद दिए गए इंटरव्यू में भारतीय माओवादियों का पोस्टर-बॉय माने जाने वाले किशनजी ने कहा था कि जिहादी बस मुसलमानों को न मारें तो इस्लामी दहशतगर्दी (जी हाँ, इस्लामी दहशतगर्दी) के समर्थन से उसे कोई गुरेज नहीं है

‘Culture Game’ ‘स्ट्रॉन्ग’ है

सवाल लाज़मी है कि इतने खूनी इतिहास के बाद भी आज कम्युनिस्ट होना नाज़ी होने की तरह गाली क्यों नहीं है, बल्कि ऐसे इठला कर खुद को कम्युनिस्ट बताया जाता है मानों कोई तमगा हो। ऐसा इसलिए है कि एक तो उनकी विचारधारा आदर्शवादी नैतिकता की चाशनी में डूबी है, शोषक-शोषित का फर्जी binary हर इंसान को ऐसा लगता है कि कहीं-न-कहीं ‘सही’ हो सकता है। और दूसरे, भारत में आज़ादी के बाद सारे बौद्धिक-सांस्कृतिक संस्थानों को नेहरू ने अंदरखाने राजनीतिक समर्थन के बदले कम्युनिस्टों के हवाले कर दिया था। नतीजन उनकी आवाज़ ही भारतीय समकालीन सांस्कृतिक परिदृश्य की इकलौती आवाज़ बची।

इसीलिए जातिवाद को खत्म करने वाली सबसे बड़ी आर्थिक ताकत, मुक्त बाज़ार, के भी कम्युनिस्ट दुश्मन हैं। इसीलिए कम्युनिस्ट सड़कें न बनने देने वाले, स्कूलों में बम और सरकारी दफ्तरों में आग लगा देने वाले नक्सलियों-माओवादियों के पैरोकार हैं। इसीलिए एक ओर भारतीय संस्कृति को ‘ब्राह्मणवादी, जातिवादी’ बता कर नष्ट करने पर सांस्कृतिक कम्युनिस्ट/अर्बन नक्सली आमादा हैं, वहीं दूसरी और आदिवासी इलाकों में ‘संस्कृति’ बचाए रखने के नाम पर कोई विकास कार्य भी नहीं होने देते।

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