सोशल मीडिया पर ऋचा भारती द्वारा की गई ‘आपत्तिजनक टिप्पणी’ को लेकर राँची की अदालत ने उन्हें अजीबोगरीब शर्त लगा कर जमानत दी। अदालत ने जमानत देते हुए कहा कि ऋचा को 15 दिनों के भीतर कुरानशरीफ की पाँच प्रतियाँ बाँटनी होंगी। ऋचा ने इस शर्त को मानने से इनकार कर दिया और कहा कि आज अदालत उन्हें कुरान बाँटने को कह रही है, कल को इस्लाम मज़हब अपनाने को भी कहा जा सकता है। ऋचा ने पूछा कि क्या कभी किसी अदालत ने किसी आरोपित को रामायण या भगवद्गीता बाँटने को कहा है?
अब झारखण्ड के एडवोकेट जनरल ने राँची अदालत के जज मनीष कुमार सिंह द्वारा सुनाए गए निर्णय का स्वागत किया है। एडवोकेट जनरल अजित कुमार ने कहा कि अदालत ने जो निर्णय दिया है और जो भी लोग इसका विरोध कर रहे हैं, उन्हें इस आदेश के पीछे का औचित्य समझने की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक समरसता को बनाए रखना लोगों की जिम्मेदारी है, इसीलिए कोर्ट का कुरान बाँटने वाला आदेश बिलकुल सही है। एडवोकेट जनरल अजीत कुमार ने कहा कि अदालत के इस आदेश के बाद ऋचा को इस्लाम के बारे में बहुत कुछ समझने को मिलेगा।
अजीत कुमार ने कहा कि इससे ऋचा को अच्छा सबक सीखने को मिलेगा और वह भविष्य में कभी आपत्तिजनक टिप्पणी नहीं करेंगी। उधर ऋचा हाईकोर्ट जाने की तैयारी में हैं और हिन्दू संगठनों के नेता लगातार उनके घर पहुँच रहे हैं। ऋचा का कहना है कि उन्होंने तो कोई टिप्पणी भी नहीं की थी बल्कि किसी और का पोस्ट शेयर किया था। ऋचा की दलील है कि वह पोस्ट रोहिंग्या को लेकर था ण कि भारत में रह रहे समुदाय विशेष को लेकर।
Total bluff. I have checked with senior SC lawyers. Bail conditions are restricted to means (like reporting to court or police) to ensure a person does not jump bail. Distributing Quran as bail condition is totally illegal. A citizen has been stripped of her rights in #Jharkhandhttps://t.co/hgkKpRgYGt
टाइम्स नाउ से बात करते हुए एडवोकेट जनरल ने कहा कि अदालत का निर्णय भारतीय क़ानून के मुताबिक है। उधर राँची के कई वकील ने भी जस्टिस मनीष कुमार सिंह के इस निर्णय के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है। राँची विमंस कॉलेज में तृतीय वर्ष की छात्रा ऋचा को पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रह्मण्यम स्वामी का भी साथ मिला है।
नौकरी के लिए उत्तराखंड से गुरुग्राम आए 3 लड़कों के साथ गंभीर मारपीट की घटना सामने आई है। इस कथित जानलेवा हमले में 2 युवकों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि अन्य एक युवक गंभीर रूप से घायल बताया जा रहा है।
उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले से तीन लड़के दिल्ली में रोजगार के उद्देश्य से आए थे। वो एक होटल में काम भी कर रहे थे। रिपोर्ट्स के अनुसार, 14 जुलाई की रात उन पर जानलेवा हमला हुआ है। इस हमले में 2 युवकों की मौत हो गई और एक युवक गंभीर रूप से घायल है।
इस प्रकरण पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से बातचीत करते हुए मामले की जाँच करने और आवश्यक कार्रवाई करने की अपील की है।
गुड़गाँव में उत्तराखंड के तीन युवकों के साथ हुई घटना पर आज हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री @mlkhattar जी से बातचीत की ।हरियाणा सरकार इस मामले में सभी आवश्यक कार्यवाही कर रही है। इस घटना से प्रभावित सभी परिवारों के प्रति मेरी संवेदनाएं हैं। घायल युवक के स्वस्थ होने की कामना करता हूँ।
सोशल मीडिया पर ये खबर तेजी से फैल रही है और बताया जा रहा है कि घटना के बाद से गुरुग्राम के उद्योग विहार फेज-1, डुंडाहेड़ा थाने में उत्तराखंड के कई लोग मौजूद हैं। हँगामा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। लोगों का आरोप है कि तीनों लड़कों पर जानलेवा हमला किया गया है और पुलिस इस मामले को एक्सीडेंट का केस बताकर टालने का प्रयास कर रही है।
कथित हमले को लेकर मृतक युवकों के गाँव में शोक व्याप्त है। गुरुग्राम पुलिस के मुताबिक, पौड़ी गढ़वाल के कुठ गाँव निवासी रमेश सिंह (23 वर्ष), कठूड़ गाँव निवासी वीर सिंह (22 वर्ष) और सलोन गाँव निवासी नरेंद्र सिंह गुरुग्राम में एमजीएफ मॉल स्थित एंपायर क्लब में बतौर कुक की नौकरी करते थे। सोमवार सुबह तीनों युवक सरहौल बॉर्डर के पास से गुजर रहे थे, तभी किसी तेज रफ्तार वाहन ने उन्हें टक्कर मार दी। दुर्घटना में रमेश सिंह और वीर सिंह की मौके पर ही मौत हो गई जबकि नरेंद्र सिंह गंभीर रूप से घायल हो गया। हालाँकि, मृतकों के परिजनों का कहना है कि पुलिस इसे सड़क हादसे का नाम देकर टालने का प्रयास कर रही है।
वहीं, उत्तराखंड के समाजसेवी रोशन रतूड़ी का कहना है, “होटल में काम करने वाले तीनों लड़के 14 जुलाई रात को काम ख़त्म करने के बाद अपने कमरे पर जा रहे थे। तभी उन पर अचानक हमला किया गया, जिसमें से दो उतराखंडी भाईयों की दर्दनाक मौत हो गई है, और एक भाई अभी भी जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा है। तीनों लड़के पौड़ी गढ़वाल के रहने वाले हैं।”
पाकिस्तान ने 26/11 हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को गिरफ्तार करने का दावा किया है। 26/11 मामले के पब्लिक प्रोसिक्यूटर उज्जवल निकम ने इसे पाकिस्तान की नौटंकी करार देते हुए कहा है कि हाफिज की गिरफ्तारी पर वह दुनिया को मूर्ख बना रहा है।
लश्कर-ए-तय्यबा का संस्थापक हाफिज जमात-उद-दावा का भी सरगना है। वह फलाह-ए-इंसानियत नाम से भी एक संगठन चलाता है। मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकी हमलों में 166 लोगों की मौत हो गई थी।
निकम का कहना है, “अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण पाकिस्तान दुनिया को धोखा दे रहा है। देखना होगा पाकिस्तान हाफिज के खिलाफ कोर्ट में कितना सबूत करता है और उसे कितनी सजा होगी। नहीं तो मैं इसे एक ड्रामा ही कहूंगा।”
Ujjwal Nikam, special public prosecutor in the 26/11 Mumbai terror attack case on arrest of Hafiz Saeed: Pakistan is fooling the world that they have arrested him, we have to see how they produce evidence in courts and how efforts are made to convict him, otherwise it is a drama. pic.twitter.com/tvRToS0j6q
पीटीआई ने पाकिस्तानी अधिकारियों के हवाले से बताया है कि हाफिज को बुधवार को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के आतंकरोधी विभाग ने गिरफ्तार किया। एक आतंकरोधी कोर्ट के सामने पेश होने के लिए लाहौर से गुजरांवाला जाते वक्त उसकी गिरफ्तारी हुई। न्यायिक हिरासत में उसे कड़ी सुरक्षा वाले कोट लखपत जेल में रखा गया है।
हाफिज और उसके 12 साथियों पर इसी महीने आतंकी गतिविधियों के लिए फंड जुटाने को लेकर मामला दर्ज किया गया था। उसके खिलाफ पाकिस्तान में आतंकवाद से जुड़े करीब 23 मामले दर्ज हैं। हालॉंकि पाकिस्तान के अतीत को देखते हुए उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान ने पहले भी हाफिज को गिरफ्तार किया है। लेकिन, कभी अदालत में उसके खिलाफ ठोस साक्ष्य पेश नहीं किए। नतीजतन, उसे हर बार जमानत मिल जाती है।
Jamatud Dawa’s Hafiz Saeed arrested and sent to judicial custody: Pakistan media (file pic) pic.twitter.com/1Txu9BlvoK
अमेरिका के वैश्विक आतंकी सूची में शामिल हाफिज पर एक करोड़ डॉलर का इनाम है। अमेरिका ने उसे 2012 में इस सूची में शामिल किया था। माना जा रहा है कि उसके खिलाफ ताजा कार्रवाई पाकिस्तान ने अपनी दयनीय आर्थिक स्थिति को देखते हुए की है। पाकिस्तान पर फाइनेंसियल एक्शन टास्क फोर्स से ब्लैक लिस्ट होने का खतरा मंडरा रहा है।
सोशल मीडिया पर एक पोस्ट को लेकर चल रहे विवाद ने अब नया मोड़ ले लिया है। मंगलवार (जुलाई 17, 2019) को राँची की एक अदालत द्वारा ग्रैजुएशन की छात्रा ऋचा भारती को कुरान बाँटने की शर्त पर जमानत देने का मामला सामने आया था। लेकिन अदालत के इस फैसले के खिलाफ अब राँची जिला बार एसोसिएशन ने सर्वसम्मति से जज मनीष कुमार सिंह की कोर्ट का बहिष्कार करने का फैसला लिया है।
राँची जिला बार एसोसिएशन यह फैसला सुनाने वाले जज मनीष सिंह के कुरान बाँटने के निर्णय से नाराज है। बार एसोसिएशन ने कहा है कि वो किसी भी तरह की न्यायिक प्रक्रिया का तब तक बहिष्कार करेंगे जब तक मनीष कुमार का तबादला नहीं हो जाता है।
अदालत के निर्णय से नाराज बार एसोसिएशन के अधिवक्ताओं से ज्यूडिशियल कमिश्नर ने 48 घंटे का समय माँगा है। इसमें यह भी माँग की गई है कि यदि 48 घंटे बाद भी यह शर्त थोपने वाले जज मनीष सिंह का तबादला नहीं होता है तो वो अनिश्चितकालीन बहिष्कार करेंगे।
बहिष्कार कर रहे कुंदन प्रकाशन (महासचिव जिला बार एसोसिएशन) का कहना है कि अदालत की ऐसी बेतुकी शर्त से सामाजिक समरसता भंग हो रही है। यदि ऐसे आदमी को नेतागिरी करनी है तो उन्हें त्यागपत्र देकर राजनीति में जाना चाहिए। साथ ही बहिष्कार कर रहे वकीलों का कहना है कि उन्होंने अदालत द्वारा इस प्रकार का निर्णय कभी नहीं सुना है और यह निंदनीय है।
नाराज अधिवक्ताओं का कहना है कि कुरान बाँटने की शर्त लगाने वाले मनीष कुमार सिंह की अदालत से हम अधिवक्ताओं के साथ शुरू से ही इस प्रकार का दुर्व्यवहार किया गया है, जिसके बारे में हम पहले भी शिकायत कर चुके हैं। लेकिन शिकायतकर्ता अधिवक्ता से बदला लेने के लिए मनीष कुमार सिंह ने अपने कोर्ट का इस्तेमाल किया। महासचिव ने यह भी कहा कि जो निर्णय आज उन्होंने दिया है वह मौलिक अधिकारों के हनन का मामला है। कोई भी किसी भी धर्म को मानने और उसके प्रचार-प्रसार के लिए बाध्य नहीं कर सकता है।
बहिष्कार कर रहे वकीलों ने कहा –
“एक बच्ची ने फॉरवर्ड किए गए सन्देश में सिर्फ यह कहा है कि हम पर भी कई इल्जाम लगते हैं लेकिन हम आतंकवादी नहीं बनते हैं। यह तो संज्ञान लेने लायक बात भी नहीं थी। हमें बच्ची को अरेस्ट करने वाले लोगों पर आश्चर्य हो रहा है। अंजुमन इस्लामिया के लोगों को एक बच्ची पर, जिसे धर्म की ठीक से समझ तक नहीं है, इस प्रकार का आरोप लगाने से पहले सोचना चाहिए था। आपने नोटिस देने तक का काम नहीं किया है। हमें कल्पना करनी चाहिए कि उस बच्ची के दिमाग में इस समय क्या चल रहा होगा? अदालत के निर्णय को समाज किस तरह से देख रहा है हमें देखना चाहिए। एक अधिवक्ता काला कोट पहनने के बाद हिन्दू और मुस्लिम नहीं होता है। इस फैसले को लेकर हिन्दू ही नहीं बल्कि कई मुस्लिम अधिवक्ताओं तक ने कुरान बाँटने के इस फैसले पर आश्चर्य व्यक्त किया है और कहा कि इस प्रकार की शर्त कोई न्यायालय कैसे रख सकता है?
दरअसल, न्यायधीश मनीष सिंह की अदालत ने ऋचा भारती को कुरान बाँटने की शर्त पर जमानत दी है। ऋचा पर आरोप है कि उन्होंने फेसबुक पर सांप्रदायिक (लेकिन आपत्तिजनक) पोस्ट किया था। इस संबंध में अंजुमन कमिटी ने पोस्ट को आपत्तिजनक और धार्मिक भावना को आहत करने वाला बताते हुए उनके खिलाफ FIR दर्ज कराया था।
इसके बाद सशर्त जमानत देते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि ऋचा को विभिन्न संस्थाओं को कुरान की 5 प्रतियाँ बाँटनी होंगी। न्यायिक मैजिस्ट्रेट मनीष सिंह ने ऋचा को निर्देश दिया कि वह कुरान की एक कॉपी अंजुमन कमिटी और 4 अन्य कापियाँ विभिन्न स्कूलों और कॉलेजों को बाँटेंगी। साथ ही उसकी रशीद लेनी होगी। कोर्ट ने इसके लिए ऋचा को 15 दिनों का समय दिया है।
कर्नाटक की 14 महीने पुरानी कॉन्ग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार का गिरना करीब-करीब तय हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मुंबई में डटे बागी विधायकों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे गुरुवार को विधानसभा सत्र में हिस्सा नहीं लेंगे। कल एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली सरकार के विश्वास मत पर मतदान होना है। मुख्यमंत्री ने पूरे घटनाक्रम पर चुप्पी साध ली है, जबकि कॉन्ग्रेस नेता और राज्य सरकार में मंत्री डीके शिवकुमार ने कहा है कि पार्टी ह्विप जारी करेगी और दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई करेगी।
Hearing on Karnataka rebel MLAs case in SC: Supreme Court in its order says, “the Karnataka Speaker cannot be forced to take a decision within a time frame.” pic.twitter.com/9cOT8eTL6f
इससे पहले 15 बागी विधायकों की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन विधायकों को सदन की कार्रवाई में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। साथ ही इन पर पार्टी का ह्विप भी लागू नहीं होगा। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष नियमों के मुताबिक अपना फैसला देने को स्वतंत्र हैं। पीठ ने यह भी कहा कि विधानसभा अध्यक्ष को तय समय सीमा के भीतर फैसला लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार ने कहा है कि वे शीर्ष अदालत के फैसले का सम्मान करते हैं और संवैधानिक अधिकारों के दायरे में फैसला करेंगे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए भाजपा नेता जगदीश शेट्टार ने कहा है कि कुमारस्वामी के कारण राज्य में अराजकता की स्थिति पैदा हो गई और उन्हें समय गॅंवाए बिना इस्तीफा दे देना चाहिए। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने इस फैसले को बागी विधायकों की नैतिक जीत बताते हुए कहा है कि सरकार बहुमत खो चुकी है और कुमारस्वामी को इस्तीफा दे देना चाहिए।
BS Yeddyurappa, BJP: Karnataka CM has lost his mandate, when there is no majority he must resign tomorrow. I welcome SC’s decision, it’s the victory of constitution&democracy, a moral victory for rebel MLAs. It’s only an interim order, SC will decide powers of Speaker in future. pic.twitter.com/LAPOFsHDK8
बागी विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष पर जान-बूझकर उनके इस्तीफे पर फैसला नहीं करने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
Rebel #Karnataka MLAs in #Mumbai: We honour Supreme Court’s verdict. We all are together. We stand by our decision. There is no question of going to the Assembly. pic.twitter.com/56z1XdPnMj
225 सदस्यीय विधानसभा में कॉन्ग्रेस के 79, जदएस के 37, बीजेपी के 105, दो निर्दलीय, एक बीएसपी का विधायक है। इनमें से कॉन्ग्रेस के 13 और जदएस के तीन विधायक इस्तीफा दे चुके हैं। यदि बागी विधायकों को अयोग्य ठहरा दिया जाता है या उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया जाता है या फिर वे विश्वासमत में भाग नहीं लेते हैं तो बहुमत के लिए 105 सदस्यों के समर्थन की जरूरत होगी। इस सूरत में सरकार के पास विधानसभा अध्यक्ष और बसपा विधायक समेत 101 सदस्यों का ही समर्थन होगा। एकमात्र मनोनीत सदस्य मतदान नहीं कर सकते और निर्दलीय विधायक पहले ही भाजपा को समर्थन देने की बात कह चुके हैं। ऐसे में सरकार बचाने के लिए कॉन्ग्रेस-जदएस को या तो बागी विधायकों में से कम से कम छह को विश्वासमत के दौरान पक्ष में मतदान करने के लिए मनाना होगा या फिर बीजेपी के खेमे में सेंधमारी करनी होगी।
शिवसेना सांसद संजय राउत ने अंडा और चिकेन को शाकाहारी घोषित किए जाने की माँग की है। ये बात उन्होंने राज्यसभा में आयुर्वेद पर हो रही बहस के दौरान कही। राज्यसभा में बैठे अन्य सांसदों ने भी आयुष मंत्रालय को इस बात पर विचार करने की सलाह दी कि चिकेन शाकाहारी है या नहीं? वहीं, अमर सिंह ने राउत की दलीलों को कुतर्क करार दिया। शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे के क़रीबी राउत ने कहा:
“मैं एक बार नंदुरबार क्षेत्र के एक छोटे से कस्बे में गया। वहाँ आदिवासी लोग हमारे लिए भोजन लेकर आए। जब मैंने पूछा कि खाने में क्या है तो उन्होंने बताया कि यह ‘आयुर्वेदिक चिकेन’ है। आदिवासियों ने बताया कि इसे इस तरह से पकाया गया है कि इसे खाने से बीमारियाँ भी दूर हो जाती हैं।”
शिवसेना नेता संजय राउत ने मांग की है कि अंडा और चिकन वेज घोषित किए जाएं। मैं भी मांग करता हूँ कि- विस्की और बीयर को पानी घोषित किया जाए। बस और ट्रक, साईकल घोषित किए जाएं। जींस और ट्राउज़र, अंडरवेयर घोषित किए जाएं।#MatlabKuchBhi
राउत ने दावा किया कि चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ लोग आयुर्वेदिक अंडे पर रिसर्च कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा उन्हें ख़ुद शोध कर रहे लोगों ने ही बताया है। शिवसेना मुखपत्र दैनिक सामना के एग्जीक्यूटिव एडिटर संजय राउत ने रिसर्चर्स के हवाले से कहा कि सिर्फ वही मुर्गियाँ आयुर्वेदिक अंडे देती हैं, जिन्हें केवल आयुर्वेदिक खाद्य पदार्थ खाने को दिए जाएँ। उन्होंने कहा कि लोग अपने शरीर में प्रोटीन की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उन आयुर्वेदिक अण्डों को खा सकते हैं।
संजय राउत ने कहा कि अमेरिका में दूध और हल्दी से बने पेय काफ़ी लोकप्रिय हो रहे हैं, लेकिन भारत में इसे नज़रअंदाज किया जाता है। हालाँकि, कई अन्य सांसदों ने चर्चा के दौरान गंभीर मुद्दों पर भी बात की। सांसदों ने आयुष मंत्रालय के लिए बजट बढ़ाने की माँग की ताकि हज़ारों वर्ष पुरानी आयुर्वेद परंपरा को विकसित कर लाखों-करोड़ों लोगों को लाभ पहुँचाया जा सके। संजय राउत ने आयुष मंत्रालय के लिए 10,000 करोड़ रुपए के वार्षिक बजट की माँग की।
देश जब कारगिल युद्ध की 20वीं वर्षगाँठ मना रहा है, मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने पाठ्यक्रम से इस युद्ध से जुड़े चैप्टर को निकल बाहर किया है। राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार ने कारगिल युद्ध में भारतीय जवानों की शौर्य गाथा पर आधारित चैप्टर को सिलेबस से न सिर्फ़ हटाया है, बल्कि इस क़दम को जायज ठहराने के लिए अजीबोगरीब तर्क भी दिए जा रहे हैं।
एमवीएम साइंस कॉलेज भोपाल के सबसे पुराने और बड़े कॉलेजों में से एक है। राज्य सरकार बदलते ही इस कॉलेज के सिलेबस से कारगिल शौर्यगाथा वाला हिस्सा हटा दिया गया है। वर्ष 2018-19 के सिलेबस में कारगिल युद्ध से जुड़ा चैप्टर था, जो 2019 -20 के सिलेबस से गायब है। पाठ्यक्रम की समीक्षा के लिए कॉलेज ने क़रीब 20 लोगों की एक टीम बनाई थी। फैसले के बचाव में कहा जा रहा है कि कारगिल युद्ध से जुड़ी किताबें नहीं मिल रही थीं, इसीलिए यह निर्णय लिया गया।
कॉलेज का कहना है कि कारगिल युद्ध पर आधारित अच्छे लेखकों की पुस्तकें नहीं हैं, जिस कारण इससे जुड़े चैप्टर को हटाना पड़ा। भाजपा ने इसका कड़ा विरोध किया है। भाजपा का कहना है कि इस युद्ध के वक़्त अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे, इसलिए कॉन्ग्रेस इस युद्ध के बारे में छात्रों को शिक्षा नहीं देना चाहती है।
26 जुलाई 1999 को भारत ने कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान पर विजय पाई थी। इस दिन को प्रत्येक वर्ष ‘विजय दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इस युद्ध में भारतीय सेना के सैकड़ों जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। इस युद्ध पर कई फ़िल्में भी बन चुकी हैं।
क्या विडंबना है! जिस दिन राँची की एक अदालत हिंदू लड़की ऋचा भारती को ज़मानत के लिए क़ुरान की 5 प्रतियाँ वितरित करने का आदेश देती है, ठीक उसी दिन लगभग 2000 किलोमीटर दूर भारत के ही एक राज्य कर्नाटक में इस्लामी धर्मांतरण का प्रयास किया जा रहा होता है। वो भी कहाँ, किसी मुहल्ले, बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन पर नहीं… कोर्ट में, सरकारी संस्थानों में!
कर्नाटक में सलाम सेंटर नामक एक इस्लामिक संगठन है। यह ‘दवाह (Dawah)’ के लिए मशहूर है। दवाह मतलब वो इस्लामी प्रथा जिसमें गैर-मुस्लिमों को इस्लाम अपनाने के लिए प्रेरित किया जाता है। सलाम सेंटर की वेबसाइट के अनुसार, “वह कुरान गैर-मुस्लिम भाइयों और बहनों के बीच बाँटने का काम करता है। इसने हजारों लोगों के बीच इस्लाम, कुरान और पैगंबर मुहम्मद (PBUH) का प्रचार-प्रसार किया है।”
वेबसाइट में यह भी कहा गया है, “डॉक्टर्स, पुलिस अधिकारियों, शिक्षकों, अधिवक्ताओं, न्यायाधीशों, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों, आईटी प्रोफेशनल्स जैसों के बीच ‘कुरान सबके लिए’ का संदेश देने में उनका अभियान बेहद सफल रहा है।”
सलाम सेंटर के संस्थापक और चेयरमैन सैयद हामिद मोहसिन ने कर्नाटक हाई कोर्ट में भी ‘दवाह (Dawah)’ किया और अदालत के भीतर वकीलों के साथ-साथ न्यायाधीशों को भी कुरान की प्रतियाँ बाँटीं। वह अपनी वेबसाइट पर कहते हैं, “कर्नाटक उच्च न्यायालय के कॉन्फ्रेंस हॉल में कुरान वितरण के सफल कार्यक्रम के बाद मैंने यह सोचा कि क्यों न कुरान को व्यक्तिगत रूप से न्यायाधीशों और वकीलों को उनके कार्यालयों में जाकर पेश किया जाए। इस संबंध में जब मैंने कुछ मुस्लिम वकीलों के साथ चर्चा की, तो उन्होंने भी इस आइडिया पर सहमति जताई। हालाँकि कुरान की प्रतियों को न्यायाधीशों के कार्यलय में जाकर बाँटना कोई आसान काम नहीं है लेकिन मैंने चुनौती स्वीकारते हुए कहा, “कोशिश करनी चाहिए। यह अल्लाह का काम है, और अल्लाह निश्चित रूप से इस काम में हमारी मदद करेगा।”
बेंगलुरु के सिटी सिविल कोर्ट में वकीलों के बीच कुरान वितरण
मोहसिन ने हाई कोर्ट के जजों के साथ मीटिंग की पूरी कहानी वेबसाइट पर लिख रखी है। मोहसिन के अनुसार, जजों के साथ उनकी मीटिंग 12 दिनों तक चली। वह लिखते हैं, “माननीय न्यायाधीशों ने जब हमारे हाथों में कुरान देखा तो वे सम्मानपूर्वक उठ खड़े हुए, गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया। हमने उन्हें कुरान, पैगंबर मुहम्मद के जीवन पर एक किताब, मूल इस्लामी साहित्य और कुरान की डीवीडी दी। उन्होंने आदरपूर्वक हमें अपने बगल में बैठने की पेशकश की। उन्होंने बड़े ही सम्मान के साथ हमारे दिए उपहार को खोला और तुरंत कुरान पढ़ना शुरू कर दिया। फिर वे कुरान, पैगंबर मुहम्मद, इस्लाम पर बातचीत करने लगे।”
कोर्ट के पुस्तकालय में भी कुरान दिया गया। मोहसिन के अनुसार कुरान अब तक कोर्ट पुस्तकालय में नहीं थी। कई वकीलों और कोर्ट में कार्यरत कई अन्य अधिकारियों को भी कुरान वितरित की गई।
एक वकील ने मोहसिन को कुरान के बारे में कुछ बताया, उसे भी वेबसाइट पर मजेदार ढंग से डाला गया है। वकील ने कहा, “मैंने पाँच दिन पहले आपसे कुरान प्राप्त किया था और इसे पढ़ गया। मुझे इसमें हिंदुओं के खिलाफ कुछ भी नहीं मिला। जबकि हमें बताया गया था कि कुरान में केवल हिंदुओं के खिलाफ जहर है। हमें यह भी बताया गया था कि कुरान हिंदुओं के खिलाफ जिहाद के लिए कहता है। लेकिन कुरान में इस तरह का कुछ भी नहीं है। इसे पढ़ने के बाद मेरी गलतफहमी दूर हो गई है। अब मैं कुरान का गंभीरता से अध्ययन करूँगा और दूसरों की गलतफहमी को दूर करने की कोशिश करूँगा।”
मोहसिन ने अपनी वेबसाइट पर कुरान को लेकर कर्नाटक हाई कोर्ट के गैर-मुस्लिम जजों द्वारा कही गई बातों को भी बड़े अनोखे अंदाज में लिख रखा है। इनमें से एक जज ने मोहसिन को बताया, “हाँ, मैं कुरान पढ़ना चाहता हूँ ताकि जान सकूँ कि अल्लाह ने पूरी मानवता को क्या संदेश दिया है। अगर कुरान में सभी मानवों के लिए संदेश है तो आपने इसे अब तक मानवता से दूर क्यों रखा?”
एक अन्य जज ने मोहसिन से कहा, “मैं पिछले 10 वर्षों से देख रहा हूँ कि इस्लाम और मुस्लिमों पर अत्याचार का स्तर बढ़ा है। अब इन अत्याचारों के निवारण के लिए आपको अगले 10 वर्षों तक कुरान को लोकप्रिय बनाना होगा। यह लगातार बड़े पैमाने पर किया जाना चाहिए। अन्यथा मुस्लिमों के लिए हालात बदतर हो सकते हैं।”
यह बहुत आश्चर्यजनक है कि इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए कर्नाटक हाई कोर्ट ने इजाजत दे दी और वो भी अपने ही यहाँ, जजों-वकीलों के बीच! वो भी तब जब भारतीय न्यायपालिका हमारे संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप की दुहाई बार-बार देती है।
सलाम सेंटर के चेयरमैन सैयद हामिद मोहसिन पैगंबर मुहम्मद पर कन्नड़ भाषा में लिखी पुस्तक कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को देते हुए (फोटो साभार: salaamcentre.in)
मोहसिन ने तो अपनी वेबसाइट पर यह भी दावा किया है कि वह कर्नाटक विधान परिषद में भी ‘दवाह (Dawah)’ कर चुका है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को कुरान देते हुए अपनी फोटो उसने वेबसाइट पर भी डाली है।
सलाम सेंटर ने तो यहाँ तक कहा है कि उसने पुलिस विभागों में भी ‘दवाह (Dawah)’ करवाया है। एक जगह वेबसाइट पर लिखा गया, “सलाम सेंटर ने कर्नाटक राज्य पुलिस कर्मियों को पवित्र कुरान का संदेश देकर एक और उपलब्धि हासिल कर ली है। बहुत सकारात्मक परिणाम होने की संभावना है। इंशा अल्लाह!” और हाँ, केवल पुलिस विभाग ही नहीं, सलाम सेंटर कर्नाटक राज्य आंतरिक सुरक्षा खुफिया विभाग के मुख्यालय में भी कुरान वितरित कर चुकी है।
पुलिस कमिश्नर को कुरान देते हुए
मौजूदा क़ानूनों को देखें तो मोहसिन की कार्रवाई अवैध नहीं है। लेकिन यह वास्तव में चिंता का विषय जरूर है कि कथित रूप से धर्मनिरपेक्ष संस्थानों को धर्म परिवर्तन (या कम से कम प्रचार-प्रसार) के लिए लक्षित किया जा रहा है। इसके अलावा, यह अस्थिर जनसांख्यिकी अराजकता को जन्म देती है। ऐसी परिस्थितियों में, न केवल ईसाइयों बल्कि समुदाय विशेष द्वारा भी धर्मांतरण के लिए हिंदुओं को निशाना बनाया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में आज कुलभूषण जाधव मामले पर फैसला आना है। 2016 में ईरान से अगवा कर पाकिस्तान ने उन्हें भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) के लिए जासूसी के आरोप में मौत की सज़ा सुनाई थी, जिसे रोकने के लिए भारत सरकार ने हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में अपील की थी। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने पाकिस्तान को निर्देश दिया था कि उसके अंतिम निर्णय पर पहुँचने तक कुलभूषण जाधव की सज़ा पर अमल न किया जाए।
गिरफ़्तारी की जगह पर ही प्रश्नचिह्न
पाकिस्तान का दावा है कि उसने पूर्व नेवी अफ़सर जाधव को बलूचिस्तान में पकड़ा। भारत लगातार इसका खंडन करता रहा है। भारत का कहना है कि जाधव को पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI ने ईरान से अगवा किया था। पाकिस्तान में उन पर सैन्य अदालत में मुकदमा चलाकर 2017 के अप्रैल में जासूसी और आतंकवाद के जुर्म में मौत की सज़ा सुनाई थी।
कब क्या हुआ
25 मार्च, 2016: पाकिस्तानी अधिकारी भारत को जाधव की गिरफ़्तारी की सूचना एक प्रेस रिलीज़ के ज़रिए देते हैं। भारत ने उसी दिन जाधव तक भारतीय दूतावास का कॉन्सुलर एक्सेस (दूतवासीय पहुँच, जोकि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का नियम और शिष्टाचार दोनों है) देने की माँग पाकिस्तान के सामने रखी।
30 मार्च, 2016: भारत ने पाकिस्तान को अपनी कॉन्सुलर एक्सेस माँग की याद दिलाई। एक बार नहीं, 14 बार।
7 दिसंबर, 2016: पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री सरताज अज़ीज़ ने भी माना कि कुलभूषण जाधव के खिलाफ पाकिस्तानी अदालत में पेश सबूत पक्के नहीं हैं। लेकिन उसी दिन पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर यह दावा भी कर दिया कि सरताज अज़ीज़ द्वारा ऐसा बयान दिए जाने की बात ही गलत है।
6 जनवरी, 2017: पाकिस्तान ने नए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटरस को डोज़ियर सौंपने का दावा किया, जो अपने देश को “अस्थिर” करने के लिए भारतीय हस्तक्षेप पर था।
10 जनवरी, 2017: पाकिस्तानी सेना की इंटर-सर्विसेज़ पब्लिक रिलेशन्स (ISPR) ने प्रेस रिलीज़ जारी कर जाधव को मृत्युदण्ड सुनाए जाने की सूचना दी।
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में पहुँचा भारत
मई, 2017: भारत ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में जाधव तक कॉन्सुलर एक्सेस न देने को लेकर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ याचिका दायर की और सैन्य अदालत के फैसले को चुनौती दी। 15 मई, 2017 को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने भारत और पाकिस्तान की दलीलें सुनने के बाद मामला सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया। पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने भारत का पक्ष रखा। 18 मई को अदालत ने अपने अंतिम फैसले तक के लिए कुलभूषण को सुनाई गई सज़ा को स्थगित कर दिया। भारत ने विएना कन्वेशन के नियमों के गंभीर उल्लंघन का आरोप पाकिस्तान पर लगाया। भारत के अनुसार विएना कन्वेंशन के अनुच्छेद 36 के दिशा-निर्देश के मुताबिक़ कॉन्सुलर एक्सेस हर मामले में आवश्यक है, चाहे जासूसी के आरोप ही क्यों ना हों।
17 अप्रैल, 2018: भारत ने अपने पक्ष में दूसरे दौर की दलीलें रखीं।
7 जुलाई, 2018: पाकिस्तान ने भारत के आरोपों पर अपना प्रत्युत्तर अदालत में जमा किया।
20 नवम्बर, 2018: तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कुलभूषण तक राजनयिक पहुँच (डिप्लोमेटिक एक्सेस) की माँग की।
19 फरवरी, 2019: अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कुलभूषण मामले की खुली अदालत में सुनवाई शुरू की। भारत की माँग मृत्यु दण्ड को ख़ारिज करने और जाधव की तत्काल रिहाई की थी। भारत के अनुसार पाकिस्तान ने ठोस सबूत पेश करना तो दूर, सामान्य न्यायिक प्रक्रिया का भी पालन इस मामले में नहीं किया। अपना पक्ष रखते हुए भारत ने दावा किया कि एक तथाकथित कबूलनामे के अलावा पाकिस्तान के पास जाधव के ख़िलाफ़ कोई भी सबूत नहीं है। जाधव की पहचान और राष्ट्रीयता के सवाल पर भारत ने कहा कि उसका पूर्व नेवी अफसर होने की पहचान ही राष्ट्रीयता का सबूत है। कसाब समेत पाकिस्तान द्वारा अपने आतंकियों की लाशों को स्वीकार करने से इंकार पर तंज कसते हुए साल्वे ने यह भी कहा कि भारत के नागरिक ऐसे नहीं होते की सरकार को उनकी नागरिकता नकारने की ज़रूरत पड़े, और न ही भारत विदेशी ज़मीन पर फँसे अपने नागरिकों को नकारता है।
आजकल कोर्ट ऐसे-ऐसे विचित्र फ़ैसले दे रही है कि या तो आपकी भाषा पर से नियंत्रण हट जाएगा या आपको उनकी समझदारी पर शक होने लगेगा। संविधान में अभिव्यक्ति की आज़ादी है। लेकिन ये किस समय, किसके पक्ष में इस्तेमाल होगा, ये कोई नहीं जानता। आम आदमी फेसबुक पर बहुत सारी बातें लिखता है और वो बातें बहुत अच्छी से लेकर बहुत खराब के रेंज में हो सकती हैं। लिखने वाले अलग-अलग परिस्थितियों में, अलग तरीक़ों से व्यवहार करते हैं। अभिव्यक्ति भी बदल जाती है, शब्द बदल जाते हैं।
हाल ही में ऋचा भारती को कोर्ट ने विचित्र सजा सुनाई। ऋचा ने फेसबुक पर रोहिंग्या आदि के ख़िलाफ़ कुछ ‘आपत्तिजनक’ पोस्ट शेयर किए थे। किसी की भावनाएँ आहत हुईं और केस कर दिया। आरोपित की गिरफ़्तारी हुई तो आरोपित ने बेल का आवेदन दिया। कोर्ट ने ऋचा को बेल तो दिया लेकिन एक शर्त पर कि वो शिकायतकर्ता, यानी अंजुमन कमिटी, समेत चार पुस्तकालयों में क़ुरान की प्रतियाँ बाँटे। ऋचा ने बाद में इस शर्त पर आपत्ति जताई कि ये आदेश अटपटा है और उसके मौलिक अधिकारों का हनन है। साथ ही, ऋचा ने यह भी कहा कि जिन लोगों ने पोस्ट लिखा वो बाहर हैं और एक नागरिक के तौर पर रोहिंग्याओं के भारत में घुसने पर उसे अपनी बात रखने का हक है।
आगे क्या होगा, ये तो कोर्ट का मसला है लेकिन ऐसे मौक़ों पर फ़्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन पर चर्चा ज़रूरी है। कोर्ट चाहे तो आदर्शवादी बन कर यह नकार दे कि आम लोग आम जीवन में गाली देते हैं, लिखते हैं, और बातचीत का हिस्सा बनाते हैं। हर दी हुई गाली से किसी न किसी की भावनाएँ आहत होंगी ही। गाली देना गलत बात है, लेकिन यह बात भी तय है कि पुलिस और प्रशासन चाह कर भी ऐसा करने वाले सारे लोगों को जेल में नहीं डाल सकती। अब तर्क यह आएगा कि जो बात कोर्ट के सामने आएगी वो उसी पर फ़ैसला देगी। सही बात है, लेकिन एक केस के सारे बिंदुओं पर तो न्यायिक दंडाधिकारी अपनी बात रखेंगे न?
उसी पोस्ट पर जो ऋचा के साथ हुआ वो न तो अंजुमन कमिटी को दिखा न कोर्ट को। अंजुमन इस्लामिया अगर स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण का ध्यान रखती है तो उसे ऋचा के साथ-साथ उन लोगों पर भी केस करना चाहिए था जो समुदाय विशेष वाले नाम हैं और उस लड़की को ‘रंडी साली ऋचा’ कह रहे हैं और उसको बहन के रेप की धमकी दे रहे हैं। हो सकता है अंजुमन इस्लामिया वालों को ‘फक योर सिस्टर’ का या ‘तेरी माँ मेरी रखैल’ आदि का मतलब मालूम न हो, लेकिन कोर्ट के जजों को तो ज़रूर पता होगा कि इन शब्दों से एक लड़की की ‘मोडेस्टी आउटरेज’ होती है। और यह क़ानूनन जुर्म है। लेकिन कोर्ट भी लैंडमार्क जजमेंट देने के चक्कर में कमेंट पढ़ना भूल गई होगी क्योंकि मर्डर, रेप, डकैती, किडनैपिंग से लेकर लाखों केस अदालतों में लंबित हैं तो रह गया होगा। बस अब जज साहब यह न कह दें कि ‘हुआ सो हुआ’।
ऐसे मुद्दों पर कोर्ट की अवमानना से लेकर कई ऐसी बातें होती हैं कि आप बहुत कुछ चाह कर भी नहीं लिख सकते। क़ानूनी दायरे में तो ऐसी सजा या शर्तों का प्रावधान है लेकिन क़ानूनी दायरे में किसी विदेशी शरणार्थी (जो कि कई बार ग़ैरक़ानूनी कार्यों में लिप्त पाए जाते रहे हैं) के ख़िलाफ़ टिप्पणी करने से पहले शायद इस बात पर ध्यान जाना चाहिए कि इसी देश का नागरिक, इसी देश की एक लड़की को ‘रंडी साली’ कहता है और उसकी बहन के बलात्कार की धमकी देता है। रोहिंग्याओं और बढ़ती जनसंख्या एक समस्या है, और हर आदमी, अपने शब्दों में उस पर चर्चा करने को स्वतंत्र है। इन समस्याओं पर समग्र चर्चा की आवश्यकता है और सोशल मीडिया जैसे अनौपचारिक माध्यमों पर भी अगर व्यक्ति खुद को अभिव्यक्त न कर पाएगा तो जाएगा कहाँ?
ऐसे में तो फिर सरकारों द्वारा की गई हर गिरफ़्तारी जायज हो जाएगी! या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी फर्जी सेकुलरों वाला रोग लग गया है कि अगर पत्रकारिता के गिरोह विशेष के सदस्य की गिरफ़्तारी होगी तो आसमान सर पर उठा लिया जाएगा लेकिन उसके बाहर के लोग पकड़े जाएँगे तो कहा जाएगा कि ‘इस तरह के जहर फैलाने वाले व्यक्ति की गिरफ़्तारी बिलकुल सही है’। ये तो दोगलापन है, भले ही बुद्धिजीवियों में यह आज कल ज्यादा प्रचलन में है। आज अभिव्यक्ति पर हमला मानने वाले अचानक से चुप क्यों हैं? क्या कमेंट में ‘रंडी साली ऋचा’ लिखने वाले मजहबी नाम वाले व्यक्ति को वही कोर्ट रामायण पढ़ने और बाँटने की सलाह दे तो भी क्या यही प्रतिक्रिया रहेगी? क्या उस मामले में कोर्ट संघी नहीं हो जाएगा? क्या तब यह नहीं कहा जाएगा कि सरकार कोर्ट पर दबाव डाल रही है?
यही दुर्भाग्य है कि कोर्ट की हिम्मत नहीं होती समुदाय विशेष के मामले में यही विवेकशील निर्णय देने की। इस देश की संस्थाओं ने बार-बार यह साबित किया है कि समुदाय विशेष के मामले उनके निजी और मज़हबी मसले हो जाते हैं जबकि हिन्दुओं के मंदिरों की संपत्ति से लेकर उनके विवाह में कितने लोग पहुँचें, दीवाली पर कितने पटाखे फोड़े जाएँ, होली में कितना पानी बहाया जाए, दही हांडी की ऊँचाई कितनी हो – यह सब कोर्ट और सरकार तय करती है।