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जातिवाद और साम्प्रदायिकता ही कम्युनिस्टों का ‘बाज़ार’ है, वो इसे भला खत्म क्यों होने देंगे?

पंचतंत्र में किसी भी व्यक्ति पर आँख बंद करके भरोसा न करने की सीख राजकुमारों को देने के संदर्भ में कथावाचक पंडित विष्णु शर्मा कहते हैं कि मंत्री हमेशा चाहेगा कि राजा किसी न किसी मुसीबत में फँसा ही रहे, ताकि मंत्री की प्रासंगिकता, उसकी पूछ बनी रहे। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में इसका अर्थ है कि जिसकी कुल जमा-पूँजी दूसरे की समस्याएँ हो और उसी से उसकी रोज़ी-रोटी चलती हो तो भला वह इंसान समस्या का समाधान क्यों चाहेगा। हालाँकि यह ‘लेंस’ कोई सर्वव्यापी सत्य नहीं है, लेकिन कुछ जगहों पर यह शर्तिया लागू होता है- कम्युनिस्ट उन्हीं में से एक हैं।

“सर्वहारा के लिए” और “बुर्जुआ के खिलाफ” का इनका नारा अव्वल तो केवल आँखों में धूल झोंकने का होता है, कथनी-करनी में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है। और कभी-कभार यदा-कदा अपनी कथनी को करनी में बदलना भी पड़ता है, तो केवल बेभाव का खून बहाने के अतिरिक्त कोई भी ‘उपलब्धि’ इनके हाथ आई ही नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि यह केवल दुर्भाग्यपूर्ण संयोगों और घटनाओं की ही एक शृंखला हो, जैसा कि अक्सर ‘असली कम्युनिज़्म’ तो अभी तक किसी ने ‘ट्राई’ ही नहीं किया का बहाना मार आँखों में धूल झोंकने वाले अर्बन नक्सली दावा करते हैं। यह नाकामी, यह खून-खराबा ही दुनिया को ‘शोषक’ और ‘शोषित’ के अति-सरल (और झूठे) ध्रुवों में बाँट देने वाले मार्क्सवाद की तार्किक परिणति है। यह रक्त-पिपासा कोई ‘glitch’ नहीं, एकदम हार्डकोर ‘feature’ है।

यूरोप में आर्थिक, भारत में जातिवादी?

भारत के मार्क्सवादियों, कन्हैया कुमार जैसी उसकी उम्मीदों और स्वरा भास्कर, गुरमेहर कौर जैसे हिमायतियों को अगर सुनें तो लगेगा मार्क्सवाद जाति-व्यवस्था के बारे में है, इसका आधार सामाजिक है। मार्क्सवादी ‘यूटोपिया’ के बाद यह सबसे बड़ा झूठ है। कम्युनिज़्म असल में आर्थिक शोषक-शोषित द्विगुण (binary) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका सरलीकृत संस्करण ऐसे समझिए कि मानव इतिहास कुल मिलाकर पैसे और ताकत की लूट की कहानी है। कुछ लोग ‘दुर्घटनावश’ (न कि अपने कौशल से) अमीर हो गए, उन्होंने (केवल) पैसे के दम पर ताकत हासिल की और पूरी पश्चिमी सभ्यता, संस्कृति और इसका इतिहास पैसा और ताकत लूट कर इसके गठजोड़ से करोड़ों को सताने और मारने वाले शोषकों की बनाई हुई एक कृत्रिम ‘रचना’ भर है।

इस सोच के मीन-मेख पर तो किताबें कम पड़ जाएँ, लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि यहाँ धन-सम्पदा को ‘शोषक’ को पहचानने का आधार माना गया है। लेकिन जब भारत में इसका आयात किया गया तो एक बड़ी समस्या यह थी कि आर्थिक आधार भारत में चलना नहीं था- अंग्रेजों और उससे पहले मुगलों के भारत को लूटने के चलते लगभग पूरा भारत कंगाल था। तो नैरेटिव गढ़ने लायक, दुश्मन ‘बुर्जुआ वर्ग’ तैयार करने लायक बड़ी संख्या में अमीर तो मिले नहीं। और बिना शोषक-शोषित के वर्गभेद के ‘सामाजिक क्रांति’ किसके खिलाफ होती? अंग्रेज तो राजनीतिक शत्रु थे। उनका भारतीयों के साथ इतना सामाजिक रूप से मिलना-जुलना नहीं था। न ही इतनी संख्या में वह थे कि उन्हें सामाजिक शत्रु बनाया जा सके।

यहाँ से तैयार हुआ शोषक जाति-शोषित जाति का कथानक। हालाँकि भारत में मार्क्स के जीवन-काल (1818-1883) में ही इस जहर के बीज बोए जाने लगे थे, लेकिन इसने ज़ोर पकड़ना चालू किया लेनिन की अक्टूबर क्रांति (1917) के दौरान और उसके बाद। अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे राष्ट्रवादी आंदोलन की पीठ पर चढ़ कर आया मार्क्सवाद जल्दी ही अपने असली रंग दिखाने लगा। भारतीय कम्युनिस्टों ने मुस्लिमों के खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया, देश के पहले मजहबी उम्माह के प्रति वफ़ादारी के कायल बने और जाति-प्रथा, छुआछूत की कुप्रथाओं को ही हिन्दू धर्म की परिभाषा बता कर अंग्रेजी प्रोपेगंडा को ही आगे बढ़ाया। हरिशंकर परसाई की मशहूर कहानी की तरह वह तो केवल ‘क्रांति’ करने के लिए किसी को ‘शोषक’ बनाने की फ़िराक में थे- चाहे असलियत कुछ भी हो।

हर जगह, हर कदम पर विनाशक

मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट देश-काल-परिस्थिति कुछ भी रही हो, हर जगह असफल ही हुए हैं। लगभग हर जगह खूनी रूप से असफल। आदर्शवादी, वैचारिक सब्ज़बाग में उनकी अंधश्रद्धा इतनी ज़्यादा है कि उसको असफल होते देख कर वह मुँह फेर लेते हैं- तथ्य और सबूत से लेकर अपनी क्रांति में बहते खून तक हर चीज़ के प्रति संवेदनशून्य होकर। जिन जगहों पर आर्थिक कम्युनिज़्म चलाने की कोशिश की, वहाँ उद्योग-धंधे तबाह हो गए, लोग भूखे मर गए। जिसने भूख और भूख से उपजे गुस्से को आवाज़ दी, उसे सरकार ने ‘लोगों का दुश्मन’ (एनेमी ऑफ़ द पीपल) बता कर गोली मार दी या जिन फैक्ट्री-मालिकों को कम्युनिस्ट गाली देते थे, उनसे भी ज़्यादा अमानवीय परिस्थिति में बंधुआ मजदूरी/गुलामी करने के लिए भेज दिया। और उस पर चुत्ज़्पाह (सीनाजोरी) यह कि गरीबी हटाने का नारा देकर ही सत्ता में बने रहे। ऐसे ही 20वीं सदी में 10 से 11 करोड़ (Death by Government, 1994, R. J. Rummel; Black Book of Communism, 1999, Stéphane Courtois) लोग कम्युनिस्टों की सर्वहारा क्रांति की भेंट चढ़ गए। इस आँकड़े की भयावहता इस चीज़ से समझी जा सकती है कि हिटलर इसके दस प्रतिशत (60 लाख से 1.20 करोड़ के बीच) लोगों को मार कर दुनिया में एक गाली बन गया।

भारत में कम्युनिस्टों ने जातिवादी और आर्थिक घालमेल किया, तो उसके भी परिणाम ऐसे ही हुए। नेहरू के वैचारिक रूप से अपने पाले में होने का फायदा उठाकर उन्होंने हिंदुस्तान को लाइसेंस-कोटा-परमिट राज में जकड़वा दिया। तर्क यह दिया गया कि चूँकि अंग्रेजों के समय में ऊपर उठे गिने-चुने उद्योगपति लगभग सभी सवर्ण हैं, इसलिए मार्केट को खुला छोड़ देने पर दलित को ऊँचा उठने का मौका नहीं मिलेगा। इसमें वह पता नहीं यह पक्ष देख नहीं पाए या देख कर अनदेखा किया कि देश में निजी मुनाफ़े के लिए औद्योगीकरण जहाँ-जहाँ, जैसे-जैसे हुआ, छुआछूत धीरे-धीरे, लेकिन सतत रूप से घटता गया।

आखिर निजी फैक्ट्री मालिक, जो अधिकतम मुनाफ़े के चक्कर में होता है, वह ऐसे दलित को नौकरी क्यों न देता जो यह साबित कर देता कि वह किसी सवर्ण उम्मीदवार से अधिक मुनाफ़ा ला सकता है? अंबेडकर ने खुद गाँवों को ‘जातिवाद और अस्पृश्यता का मलकुंड’ और तीव्र औद्योगीकरण को सामाजिक सफाई बताया था। और यही हुआ भी। आर्थिक उदारीकरण के बाद से बीस साल में जातिवाद और छुआछूत में आई कमी, उसके पहले के करीब 50 सालों से कई गुना ज़्यादा है। लेकिन कम्युनिस्ट यह मान लें तो फिर राजनीति करने के लिए उनके पास क्या बचता?

सामाजिक रूप से भी उन्होंने यही किया। चूँकि वह केंद्रीय सत्ता पर कभी सीधा कब्ज़ा नहीं कर पाए (यह बात अलग है कि भारत की राजनीति की मुख्यधारा नेहरूवियन दर्शन उन्हीं की विचारधारा का ‘अहिंसक’, संशोधित रूप था), तो कभी केंद्रीय स्तर पर बोल्शेविक आर्मी जैसा संगठन नहीं बना। लेकिन जिस राज्य में भी वह सत्ता में आए, हिंसा फैली, जातिवाद बढ़ा। भारतीय कम्युनिस्ट काडर की हिंसा, जैसे बेटों की लाश से बहते खून में सना भात उसकी माँ को खिलाना, दलित शरणार्थियों को भून डालना, आदि की आधुनिक इतिहास में दूसरे कम्युनिस्टों और हिटलर के अलावा सानी मिलना मुश्किल है।

जहाँ राज करने का मौका नहीं मिला, या काडर से उतनी हिंसा नहीं बन पड़ी जितनी में ‘क्रांति’ की रक्त-पिपासा शांत हो सके, वहाँ बची-खुची कसर नक्सलियों-माओवादियों के ज़रिए पूरी हुई। चारु मजूमदार, जिसे नक्सली ‘आंदोलन’ का संस्थापक माना जाता है, मार्क्स-लेनिन-माओ की ही त्रयी की परिणति था। उसने जो जन-अदालतें लगाईं, जैसे जमींदारों ही नहीं, किसी भी सवर्ण को, जो खुल्लम-खुल्ला और सौ-प्रतिशत कम्युनिस्ट न हो, जन अदालतों के मुकदमे की नौटंकी कर के मार डालने को ‘क्रांति’ बताया, वह राई-रत्ती भी माओ और लेनिन द्वारा अपने देशों में अपनाए गए हथकंडों से अलग नहीं है। 26/11 के बाद दिए गए इंटरव्यू में भारतीय माओवादियों का पोस्टर-बॉय माने जाने वाले किशनजी ने कहा था कि जिहादी बस मुस्लिमों को न मारें तो इस्लामी दहशतगर्दी (जी हाँ, इस्लामी दहशतगर्दी) के समर्थन से उसे कोई गुरेज नहीं है।

‘Culture Game’ ‘स्ट्रॉन्ग’ है

सवाल लाज़मी है कि इतने खूनी इतिहास के बाद भी आज कम्युनिस्ट होना नाज़ी होने की तरह गाली क्यों नहीं है, बल्कि ऐसे इठला कर खुद को कम्युनिस्ट बताया जाता है मानों कोई तमगा हो। ऐसा इसलिए है कि एक तो उनकी विचारधारा आदर्शवादी नैतिकता की चाशनी में डूबी है, शोषक-शोषित का फर्जी binary हर इंसान को ऐसा लगता है कि कहीं-न-कहीं ‘सही’ हो सकता है। और दूसरे, भारत में आज़ादी के बाद सारे बौद्धिक-सांस्कृतिक संस्थानों को नेहरू ने अंदरखाने राजनीतिक समर्थन के बदले कम्युनिस्टों के हवाले कर दिया था। नतीजन उनकी आवाज़ ही भारतीय समकालीन सांस्कृतिक परिदृश्य की इकलौती आवाज़ बची।

इसीलिए जातिवाद को खत्म करने वाली सबसे बड़ी आर्थिक ताकत, मुक्त बाज़ार, के भी कम्युनिस्ट दुश्मन हैं। इसीलिए कम्युनिस्ट सड़कें न बनने देने वाले, स्कूलों में बम और सरकारी दफ्तरों में आग लगा देने वाले नक्सलियों-माओवादियों के पैरोकार हैं। इसीलिए एक ओर भारतीय संस्कृति को ‘ब्राह्मणवादी, जातिवादी’ बता कर नष्ट करने पर सांस्कृतिक कम्युनिस्ट/अर्बन नक्सली आमादा हैं, वहीं दूसरी और आदिवासी इलाकों में ‘संस्कृति’ बचाए रखने के नाम पर कोई विकास कार्य भी नहीं होने देते।

‘Miss You-Kiss You’ से लेकर योग और गोमांस तक इरा त्रिवेदी के ‘कर्मों’ पर रिग्रेसिव हिन्दू नजर

गाय के माँस को झूठे आँकड़ों के आधार पर प्रोटीन का सबसे बेहतर स्रोत बताने वाली कथित योग गुरु इरा त्रिवेदी आजकल चर्चा में हैं। इरा त्रिवेदी और विवाद का सिर्फ एक दिन का रिश्ता नहीं है। बीफ (गोमांस) के प्रचार से पहले इरा त्रिवेदी सस्ती लोकप्रियता के लिए महिला उत्पीड़न जैसे संवेदनशील मुद्दे का मजाक भी बना चुकी हैं।

इरा द्वारा गोमांस के प्रचार को लेकर सामने आए विवाद के बाद उन्हें दूरदर्शन ने चौबीस घंटे घर पर योग करने की आजादी दे दी है। अब वो दूरदर्शन पर योग नहीं सिखा पाएँगी। हालाँकि, इस प्रकरण के बाद वो ट्विटर पर माफ़ी माँगती नजर आईं थी। इस पूरे विवाद के बाद आज अचानक चेतन भगत के ट्वीट ने #Metoo कैम्पेन की यादें भी ताजा कर दी है।

दरअसल, ट्विटर पर इरा त्रिवेदी को लेकर चल रहे विवाद के बाद कल ही चेतन भगत ने एक ट्वीट करते हुए लिखा- “Karma”

हालाँकि, चेतन भगत ने इस ट्वीट के बाद आगे कुछ भी नहीं लिखा है, लेकिन ट्विटर यूज़र्स इसके बाद Me Too (मीटू) अभियान के बारे में सोचने को मजबूर जरूर हो गए।

पिछले साल इस मुहिम के शुरू होने के बाद कई महिलाओं को अपने साथ घर और कार्यक्षेत्र पर हुए यौन उत्पीड़न के बारे में खुलकर कहने का हौसला मिला था। यह अभियान इतना ताकतवर था कि विदेशों में कई नामी हस्तियों को इसके बाद अपने-अपने क्षेत्रों में तगड़ा विरोध झेलना पड़ा। कई आरोपितों का उनके कार्यक्षेत्र से बहिष्कार कर दिया गया था, तो कई लोग अपने दोहरे चरित्र के कारण सबके सामने बेपर्दा हो गए। 

भारत में भी ऐसा ही कुछ देखा गया, लेकिन यहाँ पर ख़ास बात यह भी देखी गई कि इस अभियान में जिन लोगों के नाम उछले, उनके प्रति कई प्रगतिशील (जो रिग्रेसिव नहीं थे) और नारीवादियों ने एक समानांतर संवेदना दिखाई। घटिया कॉमेडी और अश्लील प्रोग्राम्स की वजह से प्रगतिशीलों की बाइबिल, AIB जैसे समूहों ने जरूर अपने कुछ लोगों को निष्कासित किया।

लेकिन, इरा त्रिवेदी जैसे कई लोगों ने इस अभियान का गलत फायदा उठाने के भी प्रयास किए। ठीक वैसे ही, जैसे अक्सर कुछ लोग अपने धर्म, जाति, मजहब और लैंगिक विषमताओं के आधार पर विक्टिम कार्ड खेलकर लोकप्रियता जुटाते हुए देखे जाते हैं।

भावनाओं में बहकर योग गुरु इरा त्रिवेदी ने चेतन भगत पर भी आरोप लगाए थे कि उन्होंने उनका उत्पीड़न करने की कोशिश की थी। उनका कहना था कि चेतन भगत ने उन्हें जबरदस्ती किस किया था।

इरा त्रिवेदी के इस आरोप की पोल खुद चेतन भगत ने ही उनके ईमेल के स्क्रीनशॉट सार्वजनिक कर के खोल दी थी और ट्वीट करते हुए लिखा था- “तो कौन किसे किस करना चाहता था।”

चेतन भगत के कल किए गए ‘कर्म’ (Karma) वाले ट्वीट का सम्बन्ध उसी घटना से जोड़कर देखा जा रहा है।

इरा त्रिवेदी के ग्रहों की दशा अवश्य ही विपरीत चल रही है। एक समय था जब उन्होंने इस्लाम के धर्म ग्रन्थ से तुलना करते हुए क़ुरान को आधुनिक और हिन्दुओं को रेग्रेसिव (यानी, जो प्रगति, तरक्की, और उन्नति के विरोधी होते हैं) बताकर खूब वाह-वाही लूटी थी। लेकिन, जैसा कि एक मशहूर गायक अल्ताफ राजा ने गाया है, “वो साल दूसरा था, ये साल दूसरा है….”

फिलहाल, दूरदर्शन ने एक नया ट्वीट शेयर किया है, लेकिन इसमें इरा त्रिवेदी गायब हैं। रोजाना स्वस्थ मन-मस्तिष्क के लिए योग जरूर करें, और ये शो देखना न भूल जाएँ।

बरेली के जिस गॉंव से भाग रहे हिन्दू, वहॉं का जाबिर मोदी को गाली देने पर गिरफ्तार

बरेली के मिलक पिछौड़ा गॉंव के एक मुस्लिम युवक को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया है। उत्तर प्रदेश का यह गॉंव पिछले कुछ दिनों से हिन्दुओं को पूजा-पाठ से रोके जाने, उन्हें धर्मांतरण और पलायन के लिए मजबूर करने की खबरों को लेकर चर्चा में बना हुआ है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक गॉंव के जाबिर नामक युवक का एक वीडियो वायरल हुआ है। इसमें वह पीएम मोदी के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल करता दिख रहा है। समुदाय विशेष के कथित आतंक से पहले से ही परेशान हिन्दू इस वीडियो को देख बिफर उठे।

कुछ मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि यह वीडियो लोकसभा चुनाव से पहले का है। लेकिन, गाँव के हालिया तनाव को देखते हुए यह वीडियो आग में घी का काम कर सकता था। इसलिए, मामला सामने आते ही नवाबगंज की पुलिस ने कय्यूम अली के बेटे जाबिर को गिरफ़्तार कर लिया। तनाव को देखते हुए पीएसी और चार थानों की फ़ोर्स के साथ नवाबगंज के सर्कल अफ़सर पीतमपाल सिंह खुद गाँव में जमे हुए हैं।

27/7/19 के दैनिक जागरण (बरेली शहर संस्करण) से साभार

पूजा से रोकने को लेकर चर्चा में है गाँव

85% के करीब मुस्लिम आबादी वाला मिलक पिछौड़ा गाँव कुछ दिनों से चर्चा में है। गाँव के हिन्दुओं का कहना है कि ग्राम समाज की ज़मीन पर पिछले 70 वर्षों से एक छोटा-सा मंदिर है, जिसका निर्माण कार्य गाँव वाले मिलकर कराना चाहते हैं। लेकिन, मुस्लिम समुदाय के लोग उन्हें न तो पूजा करने देते हैं और न ही मंदिर का निर्माण करने दे रहे हैं। विरोध करने पर मुस्लिम समुदाय के लोग लाठी-डंडों और ईंट-पत्थरों से उन पर हमला कर देते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पुलिस ने ऐसी घटना से इनकार किया था। दैनिक जागरण ने हिन्दू महिलाओं के हवाले से बताया था कि मुस्लिम मंदिर में घंटा बजाने और मूर्ति पर जल चढ़ाने भी नहीं देते। यदि कोई हिन्दू इसका विरोध करता है तो मुस्लिम समुदाय के लोग उनके घर की लड़कियों को उठा लेने की धमकी देते हैं।

सरस्वती नामक महिला ने बताया था कि रोज-रोज इस तरह के धमकी भरे माहौल में रहना दूभर हो गया है। सभी अधिकारियों से मदद की गुहार भी लगाई, लेकिन उसका कोई नतीजा अब तक नहीं निकला है। उन्होंने बताया कि स्थानीय भाजपा विधायक छत्रपाल सिंह से भी कोई मदद नहीं मिली। सरस्वती ने कहा कि जहाँ पूजा-पाठ की स्वतंत्रता न हो, वहाँ से चले जाना ही बेहतर है।

मीडिया की कारस्तानी: जय श्री राम बोलने के लिए मुस्लिम MLA पर BJP मंत्री ने डाला दबाव

जय श्री राम बोलने के लिए मजहब विशेष को मजबूर करने की कई झूठी खबरें सामने आ चुकी हैं। अब इसी कड़ी में कुछ मीडिया संस्थानों ने क्रॉप्ड वीडियो के जरिए यह साबित करने की कोशिश की है कि झारखंड की भाजपा सरकार में मंत्री सीपी सिंह ने कॉन्ग्रेस विधायक इरफान अंसारी को जय श्री राम बोलने के लिए मजबूर किया। इन मीडिया संस्थानों में कथित राष्ट्रवादी न्यूज़ चैनल टाइम्स नाउ भी शामिल है।

झारखंड विधानसभा के बाहर हुई घटना का जिक्र करते हुए टाइम्स नाउ ने आरोप लगाया है कि सिंह ने अंसारी को जय श्री राम बोलने के लिए मजबूर किया। इसी तरह का दवा कुछ अन्य मीडिया हाउस ने भी किए हैं। सबने अपने दावों के समर्थन में एक जैसे वीडियो क्लिप चलाए हैं।

मीडिया संस्थानों की तरफ से प्रसारित वीडियो क्लिप को देखकर यह इनकार नहीं किया जा सकता कि सिंह ने अंसारी से जय श्री राम कहने के लिए कहा। लेकिन, यह आधा सच है। भाजपा नेता को विलेन की तरह से पेश करने के लिए मीडिया संस्थानों ने जान-बूझकर पूरे वीडियो का एक ही हिस्सा दिखाया। वीडियो के शुरुआती हिस्से को देखने से पता चलता है कि सीपी सिंह जय श्री राम पर कॉन्ग्रेस विधायक के कॉमेंट का जवाब दे रहे थे।

पूरे वीडियो को देखने से पता चलता है कि अंसारी के साथ जय श्री राम बोलने को लेकर कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की गई। उन्होंने खुद ही कहा कि राम सिर्फ भाजपा के नहीं, बल्कि सभी के हैं। इसके बाद, इंटरव्यू रिकॉर्ड करने वाले चैनल के क्रू ने बगल में इंटरव्यू दे रहे सीपी सिंह से अंसारी की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया माँगी। जवाब में सिंह ने कहा कि बेशक, इरफान भाई को जय श्री राम बोलना चाहिए, क्योंकि उनके पूर्वज भी राम ही थे, बाबर या तैमूर नहीं। वो अंसारी को याद दिलाते हैं कि उनकी पिछली पीढ़ी हिंदू थी न कि आक्रमणकारी मुगल।

इस वीडियो से यह स्पष्ट होता है कि सीपी सिंह ने अंसारी को जय श्री राम बोलने के लिए इसलिए कहा क्योंकि अंसारी दावा कर रहे थे कि राम सिर्फ भाजपा के नहीं बल्कि सभी के हैं। लेकिन, मीडिया हाउसों ने इरफान अंसारी की टिप्पणी को हटाते हुए एडिटेड वीडियो प्रसारित किया।

इस वीडियो में ध्यान देने वाली बात ये है कि इरफान अंसारी ने भी सीपी सिंह के द्वारा जय श्री राम बोलने को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई। वीडियो में वे हँसते हुए अपने हाथ में बंधा कलावा दिखाते हैं। साथ ही वे कहते हैं, राम सभी के हैं और अयोध्या में ‘राम की स्थिति’ को लेकर भाजपा नेता पर ताना भी मारते हैं।

12 घंटे बाढ़ में घिरी रही महालक्ष्मी, 8 घंटे चला रेक्स्यू ऑपरेशन, सभी 1050 यात्री बचे

महाराष्ट्र में जारी भारी बारिश के बीच करीब 1,050 लोगों से भरी एक ट्रेन चारों तरफ से पानी से घिर गई थी, जिसमें 9 गर्भवती महिलाएँ भी मौजूद थी। बाढ़ का पानी ट्रेन के फ्लोर तक करीब 6 फीट ऊँचाई तक जा पहुँचा था। इस ट्रेन में फँसे हुए यात्रियों को निकालने के लिए भारतीय सेना, वायु सेना, नौसेना और एनडीआरएफ लगातार रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटे रहे। NDRF ने इनमे से 550 लोगों को बचाया।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फणनवीस ने भी सभी लोगों को सुरक्षित बचाए जाने पर बधाई दी है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, करीब 8 घंटे तक चले इस ऑपरेशन के बाद सभी यात्रियों को सफलतापूर्वक बचा लिया गया है। इसकी जानकारी केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने दी, साथ ही उन्होंने सफलतापूर्वक रेस्क्यू ऑपरेशन चलाने के लिए बचाव दलों को बधाई भी दी।

दरअसल, मुंबई-कोल्हापुर रूट पर चलने वाली महालक्ष्मी एक्सप्रेस नाम की यह ट्रेन मुंबई के पास बदलापुर और वांगनी स्टेशन के बीच फँसी रही। पानी का स्तर धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था, ऐसे में ट्रेन के लिए आगे बढ़ पाना मुश्किल हो गई थी। इस रेस्क्यू ऑपरेशन को एनडीआरएफ, आरपीएफ और नौसेना ने मिलकर अंजाम दिया। इस दौरान एयरफोर्स के दो हेलिकॉप्टरों ने हवाई सर्वेक्षण भी किया था।

फँसे हुए यात्रियों को चॉपर के मदद से एयरलिफ्ट कर के निकाला गया। एक यात्री द्वारा मिली जानकारी के अनुसार, ट्रेन मुंबई से 100 किलोमीटर दूर करीब 3 बजे से रुकी हुई थी। ट्रेन में फँसे हुए यात्रियों को बिस्कुट और पानी भी बाँटा गया। साथ ही, यात्रियों ट्रेन से नीचे न उतरने की भी अपील की।

वहीं, मुंबई शहर की लाइफ लाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेन भी लेट चल रही है। अंबरनाथ स्टेशन पानी में डूब गया है। इसके अलावा, देश की आर्थिक राजधानी कही जाने वाली मुंबई की कई इमारतों और दुकानों में पानी भर गया है। सड़क पर लंबे जाम से भी लोग परेशान हैं, तेज बारिश के कारण 24 फ्लाइट्स कैंसल कर दी गई हैं, जबकि 9 को डायवर्ट किया गया है।

मौसम विभाग का कहना है कि फिलहाल बारिश से राहत मिलने के आसार नहीं हैं। अगले 48 घंटों में शहर में तेज बारिश का पूर्वानुमान है। वहीं आज सुबह से ही मुंबई के अंधेरी, सायन और कुर्ला जैसे इलाकों में भारी बारिश हो रही है। मौसम विभाग ने लोगों को समुद्र तट पर न जाने की सलाह दी है।

कुख्यात साजिद को 20 साल की कैद, 15 साल की बच्ची को अगवा कर किया था दुष्कर्म

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में विशेष न्यायाधीश अनिल कुमार सिंह की अदालत ने नाबालिग को अगवा कर उसके साथ दुष्कर्म के मामले में साजिद को 20 साल की सजा सुनाई है। साथ ही 42 हजार रुपए का जुर्माना लगाया है। साजिद उर्फ़ संटू हरियाणा के मेवात जिले का कुख्यात अपराधी है।

अमर उजाला में प्रकाशित खबर के मुताबिक 5 फरवरी 2015 को अलीगढ़ के टप्पल क्षेत्र में 15 वर्षीय बच्ची को उसकी पड़ोस की एक महिला शौच के बहाने अपने साथ लेकर गई। रास्ते से उसे अगवा कर लिया गया।

बच्ची की खोजबीन करने पर उसके पिता को पता चला कि पड़ोस में रहने वाली महिला समीना, नजराना, मूसा, इकबाल, शमी और साबिर की मदद से साजिद उर्फ़ संटू ने उसे अगवा कर लिया है।

इसके बाद लड़की के परिजन पंचायत के पास गए। लेकिन उन्हें मदद नहीं मिली। बाद में मामला थाने पहुँचा। एसएसपी के निर्देश पर 30 मई को मुकदमा दर्ज हुआ। 28 अगस्त 2016 को बच्ची को बरामद कर साजिद को गिरफ्तार किया गया। किशोरी ने उस पर दुष्कर्म के आरोप लगाए थे जो जाँच में सही पाए गए।

जेल से छूटे एजाज खान का बदला सुर, जमकर की मोदी-शाह की प्रशंसा

मॉब लिंचिंग का शिकार हुए तबरेज अंसारी को लेकर टिक-टॉक पर विवादित वीडियो अपलोड करने को लेकर मुंबई पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद जमानत पर चल रहे सीरियल एब्यूजर और अभिनेता एजाज खान ने फेसबुक पर एक वीडियो अपलोड किया है। इस वीडियो में एजाज भारतीय जनता पार्टी के तारीफों के पुल बाँधते नज़र आ रहे हैं। बता दें कि एजाज खान को भड़काऊ वीडियो अपलोड करके साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ावा देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

एजाज खान, जो कि हमेशा ये कहते नज़र आते थे कि भाजपा सरकार के शासनकाल में उनके मजहब के लोगों के ऊपर लगातार हमले हो रहे हैं, इस वीडियो में एकदम से पलटते हुए दिखाई दे रहे हैं और अपने सम्प्रदाय के ऊपर हुए अन्याय के लिए कॉन्ग्रेस को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। इस वीडियो में उन्होंने न केवल भाजपा, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की भी प्रशंसा की है। इस वीडियो को देखकर ऐसा लगता है कि 4 दिन तक मुंबई पुलिस की हिरासत में रहने के बाद उनका हृदय-परिवर्तन हो गया है।

इस वीडियो में एजाज ने सालों से जेल में बंद निर्दोष समुदाय विशेष के लोगों को रिहा करने के लिए भाजपा सरकार की सराहना की है। उन्होंने कहा कि पिछली कॉन्ग्रेस सरकारों के शासनकाल में बिना किसी सबूत के समुदाय विशेष को 17-18 साल तक के लिए जेल में डाल दिया गया था, जो कि भाजपा के शासनकाल में छूट कर आ रहे हैं। इस दौरान एजाज ने जयपुर, कश्मीर, अहमदाबाद और राजस्थान जेल से छूटने वाले लोगों के बारे में बात करते हुए कहा कि इनका न्याय कॉन्ग्रेस से माँगना चाहिए, न कि भाजपा की सरकार से। उन्होंने कहा कि जो चीज सही और सच है, उसे मानना चाहिए और उसका समर्थन करना चाहिए।

बीजेपी की सरकार से इसका न्याय माँगना दोगलापन होगा। इन्होंने इन्हें छोड़ा है, अगर ये चाहते तो इन्हें और दिन तक अंदर रख सकते थे, मगर पीएम मोदी ने और अमित शाह ने इन्हें छोड़ा है। जिन्होंने इन्हें अंदर किया था, उनसे न्याय माँगनी चाहिए। दरअसल, राजस्थान हाईकोर्ट ने 1996 के समलेटी बमकांड मामले में आरोपित लतीफ अहमद बाजा, अली भट्ट, मिर्जा निसार, अब्दुल गोनी और रईस बेग को बेगुनाह मानते हुए 23 जुलाई को बरी कर दिया। ये लोग 23 साल जेल में गुजारने के बाद बेगुनाह साबित हुए हैं।

इनके रिहा होने के बाद से ही लगातार पीएम मोदी और अमित शाह को निशाने पर लिया जा रहा है, कि इनके शासनकाल में बिना कोई गुनाह, बिना कोई सबूत के इन्हें जेल में रखा गया था। एजाज खान इसी बात को लेकर वायरल बातों पर ध्यान न देकर खुद का दिमाग लगाने के लिए कहते हैं। वो कहते हैं कि आज से 20 साल पहले कॉन्ग्रेस की सरकार थी, न कि भाजपा की। इसलिए न्याय भी कॉन्ग्रेस से ही माँगना चाहिए। उन्होंने कहा कि हालाँकि, वो भाजपा के जय श्री राम के नारे और ट्रिपल तलाक के खिलाफ हैं, मगर इन निर्दोष लोगों की रिहाई का श्रेय भाजपा को दिया जाना चाहिए।

इस वीडियो के अलावा, एजाज ने एक और वीडियो जारी किया, जिसमें उन्होंने मुस्लिम राजनेताओं के साथ असंतोष व्यक्त किया था जो उनकी गिरफ्तारी के समय उनके बचाव में नहीं आए थे। एजाज ने कहा कि उन्होंने अपने दम पर अपनी लड़ाई लड़ी और सभी बाधाओं को पार किया। खान ने कहा, “मेरा संदेश असदुद्दीन ओवैसी, आजम खान, वारिस पठान, हाशमी जी और ऐसे सभी राजनेताओं के लिए है। मुझे 3 झूठे मामलों में फँसाया जा रहा था, लेकिन आपने मेरे बचाव में अपनी आवाज नहीं उठाई। आपने (असदुद्दीन ओवैसी) संसद में कन्हैया कुमार का बचाव किया, आपने संसद में कई लोगों के लिए अपनी आवाज़ उठाई लेकिन आपने कभी भी एजाज खान के लिए आवाज़ नहीं उठाई।”

ओवैसी और पठान जैसे मुस्लिम राजनीतिज्ञों द्वारा उनका साथ नहीं दिए जाने पर विलाप करते हुए एजाज ने कहा, “मुझे नहीं पता कि मेरी छवि किस तरह से आपको बताई जा रही है। मैं आपकी (ओवैसी) ताकत बन सकता था। आप मेरी मदद कर सकते थे। लेकिन आपने नहीं किया। हालाँकि, अल्लाह मेरे साथ था, लोग मेरे साथ थे, जिन्होंने देखा कि मेरे साथ अन्याय हो रहा है। मैं अपने मुस्लिम भाइयों को बताना चाहूँगा कि अगर संसद में हमारा प्रतिनिधित्व करने वाले ये लोग मेरे बचाव में नहीं आए, तो क्या वे कल आपके बचाव में आएँगे?”

एजाज ने आगे कहा कि उन्होंने वही किया जो ये नेता संसद में नियमित रूप से किया करते हैं। खान का कहना है कि उन्होंने उन मुद्दों के बारे में बात की, जो असदुद्दीन ओवैसी, अकबरुद्दीन ओवैसी, हाशमी और अन्य मुस्लिम नेताओं ने उठाए, फिर भी उन्हें (एजाज खान को) पुलिस द्वारा परेशान किया गया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें जमानत के लिए 1 लाख रुपए जमा करना था। इसके अलावा, हर दिन उन्हें पुलिस स्टेशन जाकर रिपोर्ट करनी होगी।

गौरतलब है कि, सांप्रदायिक और विवादस्पद वीडियो बनाने के मामले में मुंबई पुलिस ने कार्रवाई करते हुए अभिनेता एजाज खान को गिरफ्तार किया था। अभिनेता एजाज ख़ान ने टिक-टॉक ऐप पर भड़काऊ वीडियो बना कर पोस्ट किया था। इसमें हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा की बात की गई थी और एक वीडियो में पुलिस का मज़ाक उड़ाया था। पुलिस ने एजाज को 14 दिन की न्यायिक रिमांड में भेजा था। हालाँकि, 1 लाख रुपए के मुचलके पर उनको 22 जुलाई को जमानत दे दिया गया।

कश्मीर में केन्द्र ने भेजे 10 हजार और जवान, 35A खत्म करने की अटकलें

केन्द्र सरकार ने घाटी में अर्ध सैनिक बलों की 100 और कंपनियॉं यानी 10,000 अतिरिक्त जवानों की तैनाती का फैसला किया है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल के जम्मू-कश्मीर दौरे के बाद यह फैसला किया गया है। जवानों की अतिरिक्त तैनाती के साथ अनुच्छेद 35ए को खत्म किए जाने की अटकलों ने भी जोर पकड़ लिया है।

केन्द्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि अतिरिक्त जवानों की तैनाती राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति और सुदृढ़ करने के लिए की गई है। सीआरपीएफ़ की 50, सीमा सुरक्षा बल की 30 और बीएसएफ तथा आईटीबीपी की 10-10 कंपनियॉं तैनात होंगी। यह फैसला आतंकवाद के खिलाफ सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है।

जम्मू-कश्मीर में अभी राज्यपाल शासन है। इससे पहले देशभर से केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की 100 कंपनियों को 24 फरवरी को कश्मीर भेजा गया था। उस समय लोकसभा चुनाव के दौरान सुरक्षा-व्यवस्था का हवाला देते हुए तैनाती की गई थी। अमरनाथ यात्रा के लिए भी राज्य में करीब 40 हजार अतिरिक्त जवान तैनात किए गए हैं। 

कश्मीरी नेता बेचैन

अतिरिक्त जवानों की तैनाती के केन्द्र सरकार के फैसले ने कश्मीरी नेताओं को बेचैन कर दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इसका विरोध करते हुए ट्वीट किया है कि केन्द्र घाटी में डर का माहौल पैदा कर रहा है।

उन्होंने कहा है, “घाटी में अतिरिक्त 10 हजार जवान तैनात करने का केन्द्र का फैसला लोगों के मन में भय पैदा कर रहा है। कश्मीर में सुरक्षा बलों की कोई कमी नहीं है। जम्मू-कश्मीर की समस्या राजनीतिक है जिसे सैन्य संसाधनों से नहीं सुलझाया जा सकता है। भारत सरकार को दोबारा सोचने और अपनी नीति बदलने की जरूरत है।”

आईएएस से नेता बने शाह फ़ैसल ने कहा है कि अर्धसैनिक बलों की 100 अतिरिक्त कंपनियों की तैनाती से घाटी में बेचैनी बढ़ गई है। कोई नहीं जानता कि ऐसा क्यों किया गया है। कुछ बड़ा होने की अफवाहों को इस फैसले से हवा मिली है।

नेशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी ‘डर का माहौल’ बनाने का आरोप लगाया है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के महासचिव अली मोहम्मद असगर ने कहा है कि एक तरफ़ केंद्र और राज्यपाल कश्मीर के हालात सुधरने की बात कर रहे हैं और दूसरी ओर अतिरिक्त सैनिक घाटी में भेजे जा रहे हैं।

चर्च का फसाद: 80 साल की चिन्नमा को दफनाने के लिए ऑर्थोडॉक्स समूह ने उसकी बेटी को किया ब्लैकमेल

केरल में 80 साल की चिन्नमा को दफनाने के लिए उसकी बेटी को ऑर्थोडॉक्स समूह की तरफ से भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल किए जाने का मामला सामने आया है। चिन्नमा जैकबाइट समूह से जुड़ी हुईं थी। उनकी इच्छा थी कि मृत्यु के बाद उन्हें उसी कब्रिस्तान में दफनाया जाए जहॉं उनके पति दफन हैं।

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक यह कब्रिस्तान सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से ऑर्थोडॉक्स समूह के नियंत्रण में है। चर्चों के प्रशासन और संचालन को लेकर दो गुटों में विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में फैसला सुनाते हुए कहा था कि 1934 के मलांकारा गिरजाघर के दिशा-निर्देशों के अनुसार 1,100 पेरिश और उनके गिरजाघरों को ऑर्थोडॉक्स गुट द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए। पेरिश एक छोटा प्रशासनिक जिला होता है जिसका अपना चर्च और पादरी होता है। फैसले पर पूरी तरह अमल नहीं होने को लेकर इसी साल जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार पर नाराजगी भी जताई थी।

मीडिया रिपोर्टों में चिन्नमा की बेटी मिनी के हवाले से बताया गया है कि मॉं की मौत के बाद ऑर्थोडॉक्स समूह में शामिल होने के लिए उस पर दबाव डाला गया। ऐसा करने पर ही सेंट थॉमस ऑर्थोडॉक्स चर्च ने जैकबाइट समूह से जुड़ी उसकी मॉं को पारिवारिक क्रिप्ट में दफनाने की अनुमति देने की बात कही।

मिनी के अनुसार, “मेरी माँ ने मुझसे कहा था कि उन्हें किसी और कब्रिस्तान में नहीं दफ़नाया जाना चाहिए। वह फैमिली क्रिप्ट में दफ़न होना चाहती थीं, लेकिन अब इस पर यह ऑर्थोडॉक्स गुट का नियंत्रण है। जब मैंने उनसे संपर्क किया, तो उन्होंने कहा कि यदि मैं उनके समूह में शामिल हो जाऊँ तो वे मेरी माँ को दफ़न करने के लिए तैयार हैं।”

हालाँकि सेंट थॉमस चर्च के विक्टर फादर जोसेफ मलयिल ने इससे इनकार करते हुए कहा है कि अंतिम संस्कार मानवता की बात है। लेकिन, जेकोबाइट पक्ष के एक सूत्र ने दावा किया है कि ऐसे कई उदाहरण हैं, जब ऑर्थोडॉक्स समूह ने दूसरे गट के ईसाइयों को दफ़न करने से मना कर दिया।

ईसाई समुदाय के भीतर गुटबाजी बहुत अधिक है। दावों के उलट भारत में चर्चों को जाति के आधार पर भेदभाव के लिए जाना जाता है।

जाते-जाते दोबारा उपयोग में लाई जाने मिसाइलों पर काम करने का मंत्र दे गए थे कलाम

भारतीय मिसाइल प्रोग्राम के जनक कहे जाने वाले एपीजे अब्दुल कलाम की आज पुण्यतिथि है। अपनी मौत से एक महीने पहले उन्होंने रक्षा अनुसंधान एवं संगठन (DRDO) के मौजूदा प्रमुख सतीश रेड्डी को दोबारा उपयोग में लाई जाने वाली मिसाइल प्रणाली पर काम करने की सलाह दी थी। उस समय रेड्डी रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार थे।

रेड्डी ने बताया कि कलाम के निधन से महीने भर पहले उन्होंने उनसे उनके आवास पर मुलाकात की थी। इस दौरान कलाम ने उन्हें दोबारा उपयोग में लाई जाने वाली मिसाइलों पर काम का सुझाव दिया था। एक ऐसी मिसाइल जो पेलोड ले जा सके, फिर वापस आ जाए और दूसरा पेलोड ले जाए। उन्होने रेड्डी से कहा कि इस तरह की प्रणाली पर काम करिए।  

DRDO प्रमुख ने बताया कि पहली बार एक युवा वैज्ञानिक के तौर पर वे 1986 में कलाम से मिले थे। 2012 में डीआरडीओ के तत्कालीन प्रमुख वीके सारस्वत ने दूरदर्शन को दिए साक्षात्कार में कहा था कि भारत दोबारा उपयोग में लाई जा सकने वाली मिसाइल प्रणाली विकसित करने की योजना बना रहा है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने ‘फिर से उपयोग में लाए जा सकने वाले प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी प्रदर्शक’ (आरएलवी-टीडी) का सफल परीक्षण कर चुका है।

‘अग्नि’ मिसाइल देने वाले पूर्व राष्ट्रपति कलाम का IIM शिलॉन्ग में लेक्चर देते वक़्त दिल का दौरा पड़ने से 27 जुलाई 2015 को 83 वर्ष की उम्र में निधन हो गया था। 1981 में उन्हें पद्म भूषण, 1990 में पद्म विभूषण और 1997 में देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।