ऋचा भारती को आप ने कहा क़ुरान बाँटो, उसे ‘रंडी साली’, ‘फक योर सिस्टर’ कहने वाले क्या बाँटें मी लॉर्ड?

कमेंट में ‘रंडी साली ऋचा’ लिखने वाले मुसलमान नाम वाले व्यक्ति को वही कोर्ट रामायण पढ़ने और बाँटने की सलाह दे तो भी क्या यही प्रतिक्रिया रहेगी? क्या उस मामले में कोर्ट संघी नहीं हो जाएगा? क्या तब यह नहीं कहा जाएगा कि सरकार कोर्ट पर दबाव डाल रही है?

आजकल कोर्ट ऐसे-ऐसे विचित्र फ़ैसले दे रही है कि या तो आपकी भाषा पर से नियंत्रण हट जाएगा या आपको उनकी समझदारी पर शक होने लगेगा। संविधान में अभिव्यक्ति की आज़ादी है। लेकिन ये किस समय, किसके पक्ष में इस्तेमाल होगा, ये कोई नहीं जानता। आम आदमी फेसबुक पर बहुत सारी बातें लिखता है और वो बातें बहुत अच्छी से लेकर बहुत खराब के रेंज में हो सकती हैं। लिखने वाले अलग-अलग परिस्थितियों में, अलग तरीक़ों से व्यवहार करते हैं। अभिव्यक्ति भी बदल जाती है, शब्द बदल जाते हैं।

हाल ही में ऋचा भारती को कोर्ट ने विचित्र सजा सुनाई। ऋचा ने फेसबुक पर रोहिंग्या आदि के ख़िलाफ़ कुछ ‘आपत्तिजनक’ पोस्ट शेयर किए थे। किसी की भावनाएँ आहत हुईं और केस कर दिया। आरोपित की गिरफ़्तारी हुई तो आरोपित ने बेल का आवेदन दिया। कोर्ट ने ऋचा को बेल तो दिया लेकिन एक शर्त पर कि वो शिकायतकर्ता, यानी अंजुमन कमिटी, समेत चार पुस्तकालयों में क़ुरान की प्रतियाँ बाँटे। ऋचा ने बाद में इस शर्त पर आपत्ति जताई कि ये आदेश अटपटा है और उसके मौलिक अधिकारों का हनन है। साथ ही, ऋचा ने यह भी कहा कि जिन लोगों ने पोस्ट लिखा वो बाहर हैं और एक नागरिक के तौर पर रोहिंग्या मुसलमानों के भारत में घुसने पर उसे अपनी बात रखने का हक है।

आगे क्या होगा, ये तो कोर्ट का मसला है लेकिन ऐसे मौक़ों पर फ़्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन पर चर्चा ज़रूरी है। कोर्ट चाहे तो आदर्शवादी बन कर यह नकार दे कि आम लोग आम जीवन में गाली देते हैं, लिखते हैं, और बातचीत का हिस्सा बनाते हैं। हर दी हुई गाली से किसी न किसी की भावनाएँ आहत होंगी ही। गाली देना गलत बात है, लेकिन यह बात भी तय है कि पुलिस और प्रशासन चाह कर भी ऐसा करने वाले सारे लोगों को जेल में नहीं डाल सकती। अब तर्क यह आएगा कि जो बात कोर्ट के सामने आएगी वो उसी पर फ़ैसला देगी। सही बात है, लेकिन एक केस के सारे बिंदुओं पर तो न्यायिक दंडाधिकारी अपनी बात रखेंगे न?

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उसी पोस्ट पर जो ऋचा के साथ हुआ वो न तो अंजुमन कमिटी को दिखा न कोर्ट को। अंजुमन इस्लामिया अगर स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण का ध्यान रखती है तो उसे ऋचा के साथ-साथ उन लोगों पर भी केस करना चाहिए था जो मुसलमान नाम वाले हैं और उस लड़की को ‘रंडी साली ऋचा’ कह रहे हैं और उसको बहन के रेप की धमकी दे रहे हैं। हो सकता है अंजुमन इस्लामिया वालों को ‘फक योर सिस्टर’ का या ‘तेरी माँ मेरी रखैल’ आदि का मतलब मालूम न हो, लेकिन कोर्ट के जजों को तो ज़रूर पता होगा कि इन शब्दों से एक लड़की की ‘मोडेस्टी आउटरेज’ होती है। और यह क़ानूनन जुर्म है। लेकिन कोर्ट भी लैंडमार्क जजमेंट देने के चक्कर में कमेंट पढ़ना भूल गई होगी क्योंकि मर्डर, रेप, डकैती, किडनैपिंग से लेकर लाखों केस अदालतों में लंबित हैं तो रह गया होगा। बस अब जज साहब यह न कह दें कि ‘हुआ सो हुआ’।

ऐसे मुद्दों पर कोर्ट की अवमानना से लेकर कई ऐसी बातें होती हैं कि आप बहुत कुछ चाह कर भी नहीं लिख सकते। क़ानूनी दायरे में तो ऐसी सजा या शर्तों का प्रावधान है लेकिन क़ानूनी दायरे में किसी विदेशी शरणार्थी (जो कि कई बार ग़ैरक़ानूनी कार्यों में लिप्त पाए जाते रहे हैं) के ख़िलाफ़ टिप्पणी करने से पहले शायद इस बात पर ध्यान जाना चाहिए कि इसी देश का नागरिक, इसी देश की एक लड़की को ‘रंडी साली’ कहता है और उसकी बहन के बलात्कार की धमकी देता है। रोहिंग्या मुसलमान और बढ़ती जनसंख्या एक समस्या है, और हर आदमी, अपने शब्दों में उस पर चर्चा करने को स्वतंत्र है। इन समस्याओं पर समग्र चर्चा की आवश्यकता है और सोशल मीडिया जैसे अनौपचारिक माध्यमों पर भी अगर व्यक्ति खुद को अभिव्यक्त न कर पाएगा तो जाएगा कहाँ?

ऐसे में तो फिर सरकारों द्वारा की गई हर गिरफ़्तारी जायज हो जाएगी! या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी फर्जी सेकुलरों वाला रोग लग गया है कि अगर पत्रकारिता के गिरोह विशेष के सदस्य की गिरफ़्तारी होगी तो आसमान सर पर उठा लिया जाएगा लेकिन उसके बाहर के लोग पकड़े जाएँगे तो कहा जाएगा कि ‘इस तरह के जहर फैलाने वाले व्यक्ति की गिरफ़्तारी बिलकुल सही है’। ये तो दोगलापन है, भले ही बुद्धिजीवियों में यह आज कल ज्यादा प्रचलन में है। आज अभिव्यक्ति पर हमला मानने वाले अचानक से चुप क्यों हैं? क्या कमेंट में ‘रंडी साली ऋचा’ लिखने वाले मुसलमान नाम वाले व्यक्ति को वही कोर्ट रामायण पढ़ने और बाँटने की सलाह दे तो भी क्या यही प्रतिक्रिया रहेगी? क्या उस मामले में कोर्ट संघी नहीं हो जाएगा? क्या तब यह नहीं कहा जाएगा कि सरकार कोर्ट पर दबाव डाल रही है?

यही दुर्भाग्य है कि कोर्ट की हिम्मत नहीं होती मुसलमानों के मामले में यही विवेकशील निर्णय देने की। इस देश की संस्थाओं ने बार-बार यह साबित किया है कि मुसलमानों के मामले उनके निजी और मज़हबी मसले हो जाते हैं जबकि हिन्दुओं के मंदिरों की संपत्ति से लेकर उनके विवाह में कितने लोग पहुँचें, दीवाली पर कितने पटाखे फोड़े जाएँ, होली में कितना पानी बहाया जाए, दही हांडी की ऊँचाई कितनी हो – यह सब कोर्ट और सरकार तय करती है।

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