Home Blog Page 5835

दब्बू होते हैं उत्तर भारत के वोटर, दक्षिण भारतीयों की तरह शिक्षित भी नहीं: कॉन्ग्रेसी शमा मोहम्मद ने उड़ाया मजाक

कॉन्ग्रेस की नेशनल मीडिया पैनलिस्ट शमा मोहम्मद ने दक्षिण भारतीय मतदाताओं को शिक्षित और उत्तर भारतीय मतदाताओं को अशिक्षित बताया है। हार्वेस्ट टीवी न्यूज़ चैनल पर कॉन्ग्रेस पार्टी की तरफ़ से एक बहस में हिस्सा लेते हुए शमा ने ये बातें कहीं। एग्जिट पोल्स के नतीजों से बौखलाई शमा ने कहा कि उत्तर भारत के मतदाता दक्षिण भारतीय मतदाताओं की तरह शिक्षित नहीं होते और वे मीडिया पर विश्वास जताते हैं। शमा ने कहा कि उत्तर भारतीय मतदाताओं को काफ़ी आसानी से और जल्दी प्रभावित किया जा सकता है। कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल समर्थित हार्वेस्ट टीवी पर बोलते हुए शमा ने ऐसा कहा।

डिबेट की एंकरिंग कर रहीं वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त ने जब शमा मोहम्मद से पूछा कि अगर एग्जिट पोल्स सही साबित हो जाते हैं, तब वह क्या कहेंगी? इस पर शमा ने कहा कि उत्तर भारत के वोटर्स व्हाट्सप्प पर आई चीजों पर आसानी से विश्वास करते हैं और जल्दी प्रभावित किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि उत्तर भारतीयों के पास अक्सर व्हाट्सप्प सन्देश आते रहते हैं। भारतीय वायुसेना द्वारा की गई बालाकोट एयर स्ट्राइक पर नाराज़गी जताते हुए शमा मोहम्मद ने कहा कि इसके ऊपर मीडिया द्वारा सवाल नहीं पूछे गए।

शमा मोहम्मद ने आरोप लगाया कि मीडिया के लोग भाजपा प्रवक्ताओं से सवाल नहीं पूछते। उन्होंने दावा किया कि यूपीए के समय में हुए सर्जिकल स्ट्राइक्स को लेकर भी मीडिया ने भाजपा नेताओं से सवाल नहीं पूछे। बहस के दौरान स्वराज इंडिया के संस्थापक योगेंद्र यादव ने कॉन्ग्रेस पर मुद्दों को ठीक से न उठाने का आरोप लगाया। योगेंद्र यादव ने कहा कि मुख्य विपक्षी पार्टी होने के बावजूद कॉन्ग्रेस ने कई मुद्दों को ठीक से जनता के सामने नहीं रखा। बरखा दत्त के शो में शमा ने इजराइल और ऑस्ट्रेलिया के एग्जिट पोल्स का उदाहरण देते हुए सारे एग्जिट ग़लत होने की संभावना जताई।

योगेंद्र यादव के आरोपों का जवाब देते हुए शमा मोहम्मद ने कहा कि राहुल गाँधी ने अपनी हर एक जनसभा में बेरोज़गारी से लेकर किसानों तक के मुद्दे उठाए, कॉन्ग्रेस ने हर मुद्दे को जनता के बीच ले जाने की हरसंभव कोशिश की। शमा ने योगेंद्र यादव को भी खरी-खरी सुनाई। उन्होंने कहा कि यादव ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाने की बजाए ख़ुद के प्रत्याशी क्यों नहीं खड़े किए? शमा मोहम्मद ने पूर्व आप नेता से पूछा कि उन्होंने नोटा का समर्थन क्यों किया? उन्होंने योगेंद्र यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि लोकतंत्र में सभी को वोट करने की अनुमति होनी चाहिए।

12:45 के बाद सुनें शमा मोहम्मद का विवादस्पद बयान (साभार: हार्वेस्ट टीवी न्यूज़)

सोमवार (मई 20, 2019) को एक अन्य कॉन्ग्रेस नेता उदित राज ने भी अपने एक विवादस्पद ट्वीट में लिखा था कि केरल के लोग शिक्षित होते हैं, इसीलिए वो भाजपा को वोट नहीं करते। इस पर हमने आँकड़े गिनाए थे कि कैसे भारत से आतंकी संगठन आईएसआईएस ज्वाइन करने वाले सबसे ज्यादा केरल के ही लोग हैं। उदित राज ने इस दौरान साक्षरता और शिक्षा के बीच का अंतर भूलकर अपनी नासमझी का परिचय दिया। एग्जिट पोल्स के सामने आने के बाद कॉन्ग्रेस नेताओं ने अब भाजपा की बजाए जनता को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया है, ऐसा प्रतीत होता है।

LS चुनाव में ‘हमारे पक्ष में’ परिणाम और मस्जिदों की सुरक्षा के लिए पढ़े जाएँ विशेष नमाज़: देवबंद

अजीबोगरीब फतवों के लिए मशहूर इस्लामिक यूनिवर्सिटी दारुल उलूम देवबंद ने भी लोकसभा चुनाव 2019 के परिणामों में रूचि दिखानी शुरू कर दी है। इस्लामिक संस्था ने मतगणना के ‘ख़ास परिणामों’ के लिए नमाज़ का आयोजन किया। रविवार (मई 19, 2019) को एग्जिट पोल्स के माध्यम से विभिन्न न्यूज़ एजेंसियों ने चुनाव परिणाम का अनुमान लगाया। अधिकांश एग्जिट पोल्स में भाजपा के नेतृत्व वाले राजग को पूर्ण बहुमत मिलता दिख रहा है। ऐसे में दारुल उलूम देवबंद एग्जिट पोल्स के नतीजों से ख़ुश नहीं है। नाराज़ मुफ़्ती महमूद हसन बुलंशहरी ने कहा, “अभी जैसी परिस्थितियाँ बन रही हैं, ऐसे समय में ज़रूरी है कि देश की शांति व समृद्धि के लिए नमाज़ पढ़ी जाए। मस्जिदों और इस्लामिक शिक्षकों की सुरक्षा के लिए भी यह महत्वपूर्ण है।

मुफ़्ती ने आगे कहा कि आपको इस बात का थोड़ा भी अंदाज़ा नहीं होता कि किसकी प्रार्थना सुनी जा रही है और देश बेहतरी की ओर बढ़ने लगे। उन्होंने सभी संस्थाओं से चुनाव परिणाम ज़ारी होने तक नियमित नमाज़ के बाद ‘ख़ास परिणाम’ के लिए अलग से प्रार्थनाएँ आयोजित करने की अपील की। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रार्थनाएँ 3 दिन पहले ही शुरू हो जानी चाहिए। मुफ़्ती ने संस्था के अनुयायियों से अपने पापों के लिए प्रायश्चित करने को कहा और बताया कि आजकल समाज में लालच की भावना बढ़ रही है।

देवबंद के मौलवियों ने मुफ़्ती के सुझाव को गंभीरता से लेते हुए इसका स्वागत किया है और ‘अपने पक्ष में’ चुनाव परिणाम हासिल करने के लिए प्रार्थनाओं का सिलसिला शुरू कर दिया है। मौलाना इशाक़ गोरा ने मुफ़्ती के सुझाव की प्रशंसा करते हुए कहा कि सभी मुस्लिमों को मज़हबी रूप से उनके सुझाव पर अमल करना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे लोकसभा चुनाव के परिणामों को लेकर आशंकित हैं। उन्होंने आगे कहा:

हमारे देश को एक ऐसी सरकार की ज़रूरत है जो सबको साथ लेकर चले और भाईचारा, शांति और समरसता को बढ़ावा दे। दुर्भाग्यपूर्ण रूप से, कुछ राजनीतिक पार्टियाँ ऐसी हैं जो धर्म के आधार पर राजनीति करती हैं। ये सही नहीं है और ऐसी पार्टियों को जाना पड़ेगा। इसीलिए मुफ्ती ने जो प्रार्थनाओं की बात कही है, उसे गंभीरता से लेना चाहिए।

हाल ही में विवादित इस्लामिक संस्था देवबंद ने एक फतवे में औरतों के रमजान माह की विशेष नमाज तरावीह की जमात करने और मस्जिद में तरावीह की नमाज़ पढ़ने को ग़लत करार दिया था। देवबंद का तर्क था कि जब नमाज़ पढ़ने के लिए महिलाएँ मस्जिद नहीं जा सकतीं तो तरावीह के लिए उन्हें इजाज़त कैसे दे दी जाए। मुफ़्तियों ने कहा कि महिलाओं को तरावीह की नमाज़ घर के भीतर एकांत में अदा करनी चाहिए। इसके अलावा हाल में एक अन्य अजीब फतवा भी जारी किया गया।

हाल ही में दारुल उलूम देवबंद ने फतवा जारी करते हुए पवित्र रमजान महीने में तरावीह की नमाज़ के दौरान लाइट बंद कर अंधेरा करने को ग़लत करार दिया। मस्जिदों में बिजली गुल कर अंधेरे या मध्यम रोशनी में नमाज़ अदा करने को मुफ्ती-ए-कराम ने रस्मन और ग़लत करार दिया। मुफ़्तियों ने मजहब के लोगों से इस्लाम में ईजाद की जा रही ‘नई-नई रस्मों एवं रिवाजों’ से बचने की सलाह दी।

राजीव गाँधी: PM जो मर कर वापस हुआ ‘ज़िंदा’, जिसे कॉन्ग्रेस ही नहीं दिला सकी ‘न्याय’

इन चुनावों में राजीव गाँधी यकायक मुद्दा बन गए- चुनावी भी, चर्चा का भी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें भ्रष्टाचारी कहा, शेखर गुप्ता ने ‘डैशिंग, बाल-बच्चों वाला, युवा प्रधानमंत्री’, और सैम पित्रोदा के अनुसार उनकी जिंदगी में अर्थ ही राजीव गाँधी के भारत में इंटरनेट लाने से आया।

कभी 19 साल तक शेखर गुप्ता इंडियन एक्सप्रेस के सम्पादक रहे थे, उसी इंडियन एक्सप्रेस के, जिसने राजीव गाँधी की आईएनएस विराट पर छुट्टियों का खुलासा किया, और बदले में उसके ऑफिस पर इनकम टैक्स के नाम पर सैन्य छापेमारी जैसी रेड पड़ी। उन पर इंडियन एक्सप्रेस के इसी ‘दुस्साहस’ के बदले कर्मचारियों को यूनियनबाजी के लिए उकसा कर अख़बार ठप करवाने की कोशिश का भी संदेह किया जाता है। सिख दंगों के भी दाग उन पर हैं।

राफ़ेल पर जब भी कॉन्ग्रेस आक्रामक हुई, उसके सामने पलट कर राजीव के समय का बोफोर्स घोटाला मुँह बाए खड़ा रहा। अगस्ता वेस्टलैंड भी कई लोगों को बोफोर्स 2.0 लगा, और जब क्रिश्चियन मिशेल को भारत लाया गया तो लगा कि काश इसी तरह मरहूम क्वात्रोची को भी पकड़ कर राज़ उगलवाए जा सकते!

और चुनाव खत्म हुए ठीक से दिन भर भी नहीं बीत पाया कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने ऐलान कर दिया कि बस राज्यपाल साइन भर कर दें, उनकी सरकार राजीव गाँधी के कातिलों को रिहा करने के लिए तैयार बैठी है। ऐलान भी उनकी हत्या की तिथि 21 मई की पूर्व-संध्या को। मात्र दुर्योग, या राजनीतिक इशारा?

कातिलों की कानून के साथ कबड्डी

अगर राजीव गाँधी की हत्या के मुकदमे का इतिहास पढ़ा जाए तो यह न्याय कम, न्याय का मखौल ज्यादा लगेगा। पहले तो सुप्रीम कोर्ट में मृत्युदंड पाए 4 मुख्य अभियुक्तों में से नलिनी श्रीहरन के मृत्युदंड को उम्रकैद में केवल इसलिए बदल दिया गया कि वह महिला है, और उसने एक बच्ची को जन्म दिया था। उसकी पैरवी भी किसी और ने नहीं, राजीव की पत्नी श्रीमती सोनिया गाँधी ने की। तीन अन्य आरोपियों के मृत्युदंड को सुप्रीम कोर्ट ने खुद उम्रकैद में बदल दिया था

उसके बाद लगभग 20 साल तक कानून से लुका-छिपी खेलने के बाद बाकी तीन अभियुक्तों मुरुगन, संतन, पेरारीवालन ने अपने मृत्युदंड में देरी के लिए कानून और सरकार को दोषी ठहराते हुए अपना मृत्युदंड भी माफ़ किए जाने की माँग की। तर्क यह दिया कि हम बीस साल कैद पहले ही काट चुके हैं, यह तो एक उम्रकैद के बराबर हो ही गया है। ऊपर से बीस साल से पता नहीं, जिंदगी मिलेगी या मौत इस डर ने जिंदगी और मानसिक संतुलन को तबाह कर दिया है- ऐसे में हमें मृत्यदंड दिया जाना अन्याय होगा। 2014 में उनकी बात मानते हुए अदालत ने उन्हें भी उम्रकैद में डाल दिया

उसके बाद शुरू हुई असली कबड्डी। जिस नलिनी को अगर रहम न मिलता महिला होने के नाते, जिन तीन कातिलों को अगर समय पर मृत्यदंड दे दिया गया होता तो आज होते ही न ज़िंदा, वह अब यह माँग कर रहे हैं कि उन्होंने एक उम्रकैद भर का समय काट लिया है तो उन्हें आज़ाद कर दिया जाए। और उनकी यह माँग पूरी करने के लिए तमिलनाडु की सरकार आतुर दिख रही है। आड़ ले रही है जनभावनाओं की।

सवाल  

पहला सवाल यह कि क्या एक उम्रकैद पूरी कर छूट जाने की सुविधा उन कैदियों को भी मिलनी चाहिए जिन्हें पहले मृत्युदंड मिला था और बाद में फाँसी में देर होने के चलते रहम खा कर उम्रकैद में डाल दिया गया। इस तरह तो उनके लिए दो बार रहम की गुंजाईश हो गई (जबकि आम, सीधे उम्रकैद पाए अपराधी को एक ही बार रहम मिलता है, बीस साल पूरे होने पर), जबकि उन्हें मृत्युदंड दिया ही इसलिए गया क्योंकि उनका अपराध किसी रहम के लायक नहीं समझा गया। यानि कम क्रूर तरीके से हत्या (जिसपर सीधे केवल उम्रकैद होगी) पर केवल एक बार सजा में कमी का मौका, और ज्यादा क्रूर तरीके से हत्या (जिसपर मृत्युदंड होगा) में दो बार सजा में कमी का मौका? क्या यही संदेश देना चाहती है समाज में तमिलनाडु सरकार?

दूसरा सवाल यह कि यह ‘जनभावना’ के आधार पर कातिलों, आतंकियों की रिहाई का क्या मतलब है? यह ऐसी खतरनाक नज़ीर है जिसे कश्मीर जैसे संवेदनशील इलाके वाले, जेएनयू जैसे अर्बन नक्सलियों के गढ़ वाले देश में कैसे दुरुपयोग में लाया जाएगा, यह बताने की जरूरत नहीं है।

और तीसरा सवाल यह कि जरा पलानिस्वामी खुद को राजीव गाँधी, या उस हमले में मारे गए 13 अन्य बेगुनाहों की जगह रख कर देखें? अगर उनके साथ ऐसा कुछ हो जाए, तो क्या वह अपने कातिलों का ऐसे बच निकलना पसंद करेंगे? राजीव गाँधी भ्रष्ट थे, इस ओर इशारा करने वाले पर्याप्त सबूत हैं। उनपर सिख दंगों समेत बहुत सारे ऐसे आरोप हैं जिनके लिए शायद वह जेल में होते अगर जिन्दा होते। लेकिन इस मामले में वह एक न्याय माँगते पीड़ित हैं, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री हैं। इतिहास अगर उन्हें उनके गुनाहों के लिए नहीं माफ़ करेगा तो हमें भी उनके कातिलों को ऐसे बच जाने देने के लिए जवाबदेह ठहराएगा।

नोट: मैं व्यक्तिगत तौर पर मृत्युदंड का विरोधी हूँ। पर यहाँ सवाल मृत्युदंड बनाम उम्रकैद का नहीं है। यहाँ सवाल है कम गंभीर अपराध और ज्यादा गंभीर अपराध के न्याय में विसंगति का।

2019 नहीं, अब 2024 में ‘पकेंगे’ राहुल गाँधी: BBC ने अपने ‘लाडले’ की प्रोफाइल में किया बदलाव

बीबीसी को राहुल गाँधी से काफ़ी उम्मीदें थी। अभी भी मीडिया संस्थान को राहुल गाँधी से काफ़ी उम्मीदें हैं। अंतर इतना है कि पहले बीबीसी वालों को उनसे 2019 लोकसभा चुनाव में उम्मीदें थी, अब 2024 लोकसभा चुनाव में उम्मीदें हैं। तभी तो बीबीसी ने चुपके से अपनी वेबसाइट पर राहुल गाँधी की प्रोफाइल में उनकी वापसी की तारीख़ बदल दी।

पहले उन्हें 2019 लक्ष्य था, अब 2024 लोकसभा चुनाव को उनके लिए वास्तविक लक्ष्य रखा गया है। एग्जिट पोल्स आने के बाद बीबीसी को भी पता चल गया है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाला राजग पूरी ताक़त के साथ केंद्र में वापसी कर रहा है। अतः, उसने अपनी उम्मीदों की नई समयसीमा तय कर दी। इतना ही नहीं, इस प्रोफाइल में राहुल गाँधी के बारे में और भी कई अन्य रोचक चीजें हैं, जिन्हें जानकार आप थोड़ा-सा मनोरंजनात्मक लुत्फ़ उठा सकते हैं।

राहुल गाँधी को बीबीसी ‘डार्क हॉर्स’ बताता है। उन्हें उम्मीद भी है कि कभी न कभी तो ये घोड़ा दौड़ेगा ज़रूर। लेकिन, यहाँ कुछ ऐसे विशेषज्ञ भी हैं, जिन्होंने बीबीसी को राहुल गाँधी के बारे में कुछ ऐसा बताया है, जो हमें या आपको नहीं पता। बीबीसी के अनुसार, राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा है कि राहुल गाँधी के पास व्यापक राजनीतिक समझ है। जिन्होंने राहुल को बोलते देखा है, उनके भाषण और इंटरव्यू वगैरह से जो एक बार भी गुजरा है, उसे पता है कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के पास कितनी विस्तृत और व्यापक राजनीतिक समझ है। विशेषज्ञों ने उन्हें बैकरूम से ऑपरेट करने वाला नेता बताया। अनाम विशेषज्ञों के हवाले से और भी बहुत कुछ लिखा जा सकता था लेकिन गनीमत यह कि बीबीसी इतने पर ही रुक गया।

कॉन्ग्रेस में अहमद पटेल बैकरूम से ऑपरेट करते रहे हैं। भाजपा में ये भूमिका अरुण जेटली निभाते आ रहे हैं। लेकिन, राहुल गाँधी के बारे में बैकरूम ऑपरेटर होने की नई बात शायद ही किसी को पता हो। ये भी अच्छा है। कुछ ऐसी तारीफ़ करने की रणनीति में भी दम है क्योंकि इसे कोई देखने नहीं जा सकता। अगर वे लिखते कि ‘राहुल अच्छे वक्ता हैं’ या ‘अच्छा भाषण देते हैं’, तब सबकुछ लोगों के सामने आ जाता। लेकिन, उन्हें ‘Practiced Backroom Operator’ बताकर बीबीसी ने एक ऐसी दक्षता की बात की, जिसका सबूत देने की ज़रूरत ही नहीं है।

इसके अलावा प्रोफाइल में राहुल गाँधी को राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सफलता का क्रेडिट भी दिया गया है। हाँ, उनकी अध्यक्षता में किन राज्यों में कॉन्ग्रेस को हार मिली है, इसकी चर्चा करनी ज़रूरी नहीं समझी गई है। बस एक लाइन में लिखा गया है कि कॉन्ग्रेस की स्थिति तो पहले से ही डाँवाडोल थी, कुछ राज्यों में हार मिली। मंद अर्थव्यवस्था, नोटबंदी, राफेल, असहिष्णुता और रोज़गार पर राहुल द्वारा सोशल मीडिया पर लगातार पूछे गए सवालों को उनके स्मार्ट चुनाव प्रचार अभियान के रूप में देखा गया है। शायद बीबीसी ही इसका जवाब दे पाए कि जिन मुद्दों पर राहुल ट्विटर पर सर्वज्ञानी बन जाते हैं, उन्हीं मुद्दों पर इंटरव्यू और भाषणों में उनके पास जवाब क्यों नहीं होते।

जैसे, राफेल पर उन्होंने ट्विटर पर कई सवाल पूछे, वहाँ उन्हें राफेल की सर्विस और उपकरणों सहित सभी चीजों के मूल्य पता होते हैं, उन्हें अदालत द्वारा सुनाए गए निर्णयों के छोटे से छोटे विवरणों की भी जानकारी होती है, लेकिन इंटरव्यू के दौरान वह वायुसेना से पूछने की बात करते हैं और कहते हैं कि उनके पास details नहीं है। सोशल मीडिया पर सर्वज्ञानी और कैमरे के सामने डिटेल्स पता नहीं होना- ये दोनों ही बातें विरोधाभाषी हैं और बीबीसी को इन्हीं में स्मार्टनेस की गूँज सुनाई दे जाती है।

इससे भी ज्यादा बीबीसी ने प्रियंका की तारीफ़ों के पुल बाँधे हैं। प्रियंका ने आज तक अपनी लोकप्रियता साबित नहीं की है, एक भी चुनाव नहीं जीता है, अपनी देखरेख में पार्टी को भी एक भी चुनाव नहीं जितवाया है, फिर भी बीबीसी उन्हें चमत्कारिक और लोकप्रिय बताता है। प्रियंका ने कौन सा चमत्कार किया है और उनकी लोकप्रियता का पैमाना क्या है, ये तो शायद बीबीसी उनके लिए 2029 का लक्ष्य तय कर के ही बता सकता है। प्रियंका ‘Popular & Charismatic’ हैं- किनके बीच हैं, किस क्षेत्र में हैं, इस बारे में कोई ख़ास जानकारी नहीं दी गई है। बस विशेषण ठूँस दिए गए हैं।

बीबीसी ने ठीक लिखा है कि चुनाव प्रचार अभियान के मामले में राहुल गाँधी ने इस बार ख़ासी मेहनत की है। जहाँ पीएम मोदी ने इस लोकसभा चुनाव के चुनाव प्रचार अभियान के दौरान 144 रैलियाँ की, राहुल 125 रैलियों के साथ ज्यादा पीछे नहीं रहे। अगर इतने के बाद भी कॉन्ग्रेस की बुरी हार हो रही है (एग्जिट पोल्स के अनुसार), तो ज़िम्मेदारी किसकी बनती है? क्या इसके बाद बीबीसी एक लेख लिखेगा, जिसमें कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को कॉन्ग्रेस की विफलता के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा? वो भी उस दौर में, जब एक पंचायत चुनाव हारने को सीधा पीएम की लोकप्रियता कम होने से जोड़ दिया जाता है।

बीबीसी की हमेशा से आदत रही है कि उसने राहुल गाँधी के मामले में ‘Nepotism’ या वंशवाद को ‘Royalty’ या राहुल को ‘Royal Scion’ कहा है। ऐसे शब्द इसीलिए चुने जाते हैं, ताकि राहुल को और ‘Glorify’ किया जा सके। चूँकि बीबीसी ऐसे फैंसी अंग्रेजी शब्द चुनता है, इसीलिए हमनें यहाँ अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग किया। मोदी के ख़िलाफ़ बीबीसी द्वारा चलाया जा रहा दुष्प्रचार अभियान किसी से छिपा नहीं है। हाल ही में गिरोह विशेष के अन्य मीडिया संस्थानों का अनुसरण करते हुए बीबीसी ने भी एक लम्बी-चौड़ी रिपोर्ट के माध्यम से समझाया कि कैसे ‘मोदी के भारत’ में मुस्लिमों को डर लग रहा है और उनके पूरे मज़हब पर ही आक्रमण किया जा रहा है। इस रिपोर्ट में विश्लेषकों के नाम पर अरुंधति रॉय जैसे प्रोपेगंडाबाज़ों की राय ली गई थी।

अगर मोदी के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार करना है तो उनके विरोधी, जैसे कि राहुल गाँधी का महिमामंडन तो करना ही पड़ेगा, भले ही उनकी सफलता का वास्तविक लक्ष्य 2029 से होकर 2034 ही क्यों न पहुँच जाए। कभी बीबीसी की रिपोर्ट में प्रियंका को कॉन्ग्रेस का ‘Mythical Weapon‘ बताया जाता है तो कभी मीडिया द्वारा राहुल को नकारात्मक अटेंशन देने को लेकर नाराज़गी जताई जाती है। इससे पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी अपने ‘क्रन्तिकारी’ दौर में मीडिया के लाडले रह चुके हैं लेकिन राहुल पर लम्बे समय तक दाँव खेलना ज्यादा सुरक्षित है क्योंकि वो एक स्थापित पार्टी के नेता हैं। उसी पार्टी के, जिसमें वंशवाद मीडिया के लिए रॉयल्टी हो जाता है।

एग्जिट पोल और पुरषार्थ: फर्जी लिबरल गैंग वो शब्द इस्तेमाल कर रही है, जिसका अर्थ भी उसे नहीं पता

स्वघोषित लिबरलों और पत्रकारिता के समुदाय विशेष को कितना जोर का सदमा धीरे से लगा है एग्जिट पोल से, यह परत-दर-परत निकल रहा है। पहले तो एग्जिट पोल के आने से पहले ही उन्हें नकारने की कसरत शुरू हो गई, फिर ABP-Nielsen के इकलौते सर्वे जिसमें एनडीए का बहुमत कम होता दिखा, उसे ही सबसे ‘क्रांतीकारी’ प्रचारित कर डूबती नब्ज़ संभालने का प्रयास किया गया। और अब लिबरल महिला रेवती लौल एग्जिट पोल करने की बात को ही ‘मर्दों का नंबरों से खेल अपने पुरुष-अहं को तुष्ट करना’ करार दे रहीं हैं।

एनडीटीवी के शो पर की यह अजीब बात

एनडीटीवी पर रवीश कुमार के एग्जिट पोल के बाद वाले शो पर चर्चा समाप्त करते हुए रेवती ने कहा, “… मैं इस बात के साथ एन्ड करना चाहती हूँ कि जब 23 तारीख को हमें पता चलना ही है और एग्जिट पोल, एग्जिट पोल है ही नहीं तो हम कर क्या रहे हैं? (हम) इस अंजुमन में आते हैं क्यों बार-बार? वो इसलिए क्योंकि ये पुरुषार्थ है…” यहाँ तक तो तब भी ठीक था। आगे उन्होंने ‘पुरुषार्थ’ की बड़ी ही अजीब परिभाषा भी बताई। “और हम, हमें नंबरों… पुरुष, सिर्फ पुरुष नंबरों के साथ खेलें कि मैं बड़ा हूँ या मैं बड़ा हूँ, मैं बड़ा हूँ या मैं बड़ा हूँ… क्यों कर रहे हैं हम ये? एक बुनियादी सवाल इससे ये है कि हम…  जो लोग, जिनमें बहुत ज्यादा डर है, उसके बावजूद कुछ लोग कह रहे हैं कि हमें ये सरकार पसंद नहीं है उसका मतलब है वो…  यही बड़ी बात है। यही आँकड़ा मेरे लिए मायने रखती है। एग्जिट पोल जाए भाड़ में!”

जब अपनी सुविधा हो तो लिबरल गैंग न केवल पुरुषों को ‘नंबर-नंबर रटने वाले’ के रूप में स्टीरियोटाइप कर सकता है, बल्कि साथ में उसे उनकी ‘मेल ईगो’ से भी जोड़ सकता है। और यही बात अगर किसी दक्षिणपंथी (खासकर कि पुरुष दक्षिणपंथी) ने कह दी होती तो वह लाख अपनी बात के पक्ष में तर्क पेश कर-कर के मर जाता लेकिन उसकी ऑनलाइन मॉब-लिंचिंग हो गई होती और महिला आयोग तक उसे घसीट लिया जाता।

और तो और, कहाँ से, किस आधार पर यह नैरेटिव चल रहा है कि ‘लोगों में डर है’? चेहरा बचाने के लिए और नैतिक जीत का दावा करने के लिए लिबरल गैंग को नए बहाने तलाशने शुरू कर देने चाहिए।

सिद्धू पीठ में खंजर घोंपने का काम कर रहे हैं, आलाकमान कार्रवाई करे: कॉन्ग्रेसी मंत्री

एग्जिट पोल्स के सामने आने के साथ ही पंजाब में कॉन्ग्रेस की अंदरूनी कलह भी खुल कर सतह पर आने लगी है। मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह द्वारा नवजोत सिंह सिद्धू को महत्वकांक्षी बताए जाने के बाद अब उनकी कैबिनेट के एक अन्य मंत्री ने भी सिद्धू पर निशाना साधा है।

पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री ब्रह्मा मोहिंद्रा ने राज्य के पर्यटन मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू पर निशाना साधते हुए पार्टी हाईकमान से उन पर कार्रवाई करने की माँग की है। मोहिंद्रा ने कहा कि पार्टी आलाकमान इस पर गंभीरता से निर्णय ले। बता दें कि सिद्धू दम्पति मुख्यमंत्री पर हमलावर है और नवजोत कौर ने कहा था कि मुख्यमंत्री के कारण ही उन्हें टिकट नहीं मिला।

अभी हाल ही में नवजोत सिंह की पत्नी नवजोत कौर ने कहा था कि नवजोत सिंह सिद्धू से पंजाब में इसलिए प्रचार नहीं कराया जा रहा है क्योंकि कैप्टन अमरिंदर सिंह ऐसा नहीं चाहते हैं। बता दें कि मीडिया में ख़बर यह आई थी कि सिद्धू के गले में समस्या है, जिसका इलाज चल रहा है, इसलिए वह प्रचार से दूर हैं। ख़बरों पर गौर करें तो पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के बीच कई मसलों पर मतभेद बना रहता है। इसके बाद नवजोत कौर ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी को सिद्धू की जरूरत ही नहीं है, इसीलिए उनसे पंजाब में प्रचार नहीं कराया जा रहा है।

मंत्री मोहिंद्रा ने सिद्धू पर पीठ में छुरा घोपने का आरोप लगाते हुए कहा कि वह बेवक़्त बयान देते जा रहे हैं। उन्होंने सिद्धू के बारे में कहा कि वो सिर्फ़ 2 सालों से ही कॉन्ग्रेस में हैं और अपना नियम झाड़ते हुए अपना अजेंडा लागू करना चाह रहे हैं। उन्होंने कहा कि सिद्धू भूल गए हैं कि वह भाजपा में नहीं बल्कि अब कॉन्ग्रेस में हैं, जहाँ कई मंचों पर अपनी बात रखी जा सकती है। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि वह कैबिनेट के अन्य साथियों को सिद्धू के ख़िलाफ़ पत्र लिखेंगे।

सिद्धू की पत्नी ने मुख्यमंत्री अमरिंदर पर उनका टिकट काटने के आरोप भी लगाए थे। कैप्टेन ने इन आरोपों को बकवास बताया था। नवजोत सिंह सिद्धू पर हमला बोलते हुए मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने कहा था, “सिद्धू मेरी जगह सीएम बनना चाहते हैं। सिद्धू कॉन्ग्रेस की छवि बिगाड़ रहे हैं, पार्टी को उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी चाहिए। अगर वह असली कॉन्ग्रेसी होते तो वह अपनी शिकायतों के लिए पंजाब चुनाव का वक्त नहीं चुनते।

कैप्टेन ने साथ ही कॉन्ग्रेस आलाकमान कर अनुशासनहीनता बर्दाश्त न करने की सलाह दी थी। उन्होंने कहा था कि यह पार्टी हाईकमान तय करेगा कि क्या कार्रवाई करनी है? सिद्धू को बचपन से जानने की बात करते हुए कैप्टेन ने कहा था कि उन्हें सिद्धू से कोई निजी दुश्मनी नहीं है। कैप्टेन ने कहा था कि सिद्धू संभवतः महत्वकांक्षी हैं और वो मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं।

पंजाब कॉन्ग्रेस की कलह और भी खुल कर सामने आ सकती है क्योंकि कहा जा रहा है कि नेता चुनाव परिणाम के इन्तजार में बैठे हैं। चुनाव परिणाम आते ही कई अन्य ऐसे मंत्री हैं, जो सिद्धू के ख़िलाफ़ मुखर होकर अपनी बात रख सकते हैं। नवजोत सिंह सिद्धू ने कॉन्ग्रेस के लिए राज्य में ताबड़तोड़ सभाएँ की है।

मायावती से मिलने के लिए लगी UP के ‘बाबुओं’ की लाइन, ‘BSP की वापसी की ‘उम्मीद’

एग्जिट पोल्स में उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-रालोद महागठबंधन और भाजपा के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिल रही है। अगर यूपी की बात करें तो जहाँ एबीपी न्यूज़ की एग्जिट पोल में भाजपा को मात्र 22 सीटें मिलती दिख रही है, इंडिया टुडे-एक्सिस के एग्जिट पोल में पार्टी को 62-68 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है।

सपा-बसपा-रालोद महागठबंधन की तरफ एबीपी ने 56 सीटें जाती हुई दिखाई है वहीँ इंडिया टुडे के अनुसार, महागठबंधन सिर्फ़ 10-16 सीटों पर सिमट जाएगा। उत्तर प्रदेश में एग्जिटपोल्स को लेकर एजेंसियों के अलग-अलग अनुमान होने की स्थिति में दोनों ही पक्षों को उम्मीद है कि उन्हें अधिक सीटें मिलेंगी। कहते हैं, दिल्ली का रास्ता लखनऊ होकर जाता है और पिछली बार राज्य में भाजपा के एकतरफा परफॉरमेंस को देखें तो बात सच भी साबित होती है।

इस बीच एक ऐसी ख़बर आई है, जो चौंकाने वाली है। मायावती के घर के बाहर नेताओं की नहीं बल्कि सरकारी बाबुओं की लाइन लगी हुई है। ये नौकरशाह ‘बहन जी’ से मिलने के लिए उनके पास पहुँच रहे हैं। इनमें कई मौजूदा अधिकारी हैं तो कई वर्तमान में कार्यरत हैं। ‘बेस्ट विशेज’ से लेकर मायावती की ‘उज्जवल भविष्य की कामना’ वाली संदेश लिखी हुई पर्चियों के साथ ‘बहन जी’ को गुलदस्ते भेंट किए जा रहे हैं। अचानक से मायावती के घर के बाहर बाबुओं की लगी लाइन से पत्रकारों सहित कई लोगों की नज़रें उधर गई हैं और लोग अंदेशा लगा तरहे हैं कि इसका कारण क्या होगा?

कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि इन नौकरशाहों को मायावती की पार्टी बसपा के अधिक सीटें जीतने का अंदेशा है। उन्हें लगता है कि मायवती राज्य में फिर से प्रासंगिक हो जाएँगी और उनका प्रभाव बढ़ जाएगा। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़, मायावती के घर पर कार्यरत एक कर्मचारी ने बताया, “ये अधिकारीगण मायावती से शिष्टाचार मुलाक़ात के लिए पहुँच रहे हैं। इनमें से अधिकतर ऐसे हैं, जिन्होंने उनके मुख्यमंत्रित्व काल में काम किया था। इनमें से कुछ का सम्बन्ध बहुजन समाज से है। ये अधिकारी बहन जी को मौजूदा स्थितियों से अवगत भी करा रहे हैं।

चुनाव परिणाम आने से पहले हुई ऐसी मुलाक़ातों को स्थानीय भाषा में ‘भूल न जाना’ कह कर पुकारा जाता है। 2007 में मुख्यमंत्री सचिवालय में कार्यरत एक अधिकारी ने मायावती से मलकट की ख़बर को स्वीकारते हुए कहा, “मैं उन्हें चुनावों के लिए शुभकामनाएँ देने गया था। बसपा वापसी कर रही है और शुभकामनाएँ देने में कोई बुराई नहीं है। जब नेताओं की स्थिति बुरी हो, तब आप उन्हें विश करने नहीं जाते।” कुछ अधिकारियों ने चुनाव परिणाम आने के बाद मायावती से मिलने की बजाए उन्हें सिर्फ़ गुलदस्ता भेजने का निर्णय लिया है। एक अधिकारी ने कहा कि बसपा एग्जिट पोल में सिखाए गए आँकड़ों से बेहतर प्रदर्शन करेगी।

एक अन्य अधिकारी ने कहा कि वो मायावती से इसीलिए मिल रहे हैं क्योंकि एग्जिट पोल्स के अनुसार, वो कमबैक कर रही हैं। बता दें कि मायावती के कार्यकाल के दौरान कई ऐसे अधिकारी थे, जिनकी तूती बोलती थी। मायावती के सचिव रहे एक अधिकारी भ्रष्टाचार के मामले में सरकारी एजेंसियों की राडार पर हैं और उनके यहाँ छापा भी पड़ा है।

ओडिशा में NDA के साथ गठबंधन में आ सकती है BJD, पार्टी ने दिया संकेत

लोकसभा चुनाव के संपन्न होने के बाद अब चर्चा एग्जिट पोल के निष्कर्षों पर हो रही है। एग्जिट पोल आने के बाद ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के नेतृत्व वाले बीजू जनता दल (बीजेडी) ने भाजपा के साथ गठबंधन के संकेत दिए हैं। बीजेडी के प्रवक्ता अमर पटनायक ने इसे लेकर बयान दिया है। उन्होंने कहा, “अगर चुनावी एग्जिट पोल्स के हिसाब से देखें, तब केंद्र में एनडीए की सरकार बन सकती है और तब हम सरकार का हिस्सा हो सकते हैं।”

अमर पटनायक ने कहा कि उनकी पार्टी उस दल या गठबंधन को समर्थन दे सकती है, जो केंद्र में सरकार बनाएगी और उनके राज्य की भलाई के लिए काम करेगी। उन्होंने कहा कि वो उस पार्टी के साथ गठबंधन करेंगे, जो राज्य की पुरानी माँगों और विवादित मुद्दों को निपटाएगी। इससे पहले, बीजेडी के उपाध्यक्ष और मंत्री एन एन पात्रो ने भी इस बात की और इशारा किया था कि बीजेडी उसी को समर्थन देगी, जो कि ओडिशा की मदद करेगा।

रविवार (मई 19, 2019) को टीवी पर प्रसारित किए गए एग्जिट पोल के अनुसार, एनडीए एक बार फिर से सरकार बनाने में सफल रहेगी। इस एग्जिट पोल में भाजपा को ओडिशा में भी फायदा होता दिख रहा है। 2014 में भाजपा सिर्फ एक सीट जीत सकी थी, जबकि बीजेडी को 20 सीटों पर जीत मिली थी।

हालाँकि, दोनों पार्टियों में गठबंधन के संकेत पहले से ही मिल रहे थे। कुछ दिनों पहले, लोकसभा चुनाव के दौरान ही जब ओडिशा में फोनी तूफान आया था, केंद्र की तरफ से राज्य को ₹1341 करोड़ की सहायता प्रदान की गई थी और प्रधानमंत्री मोदी खुद तूफान से होने वाले नुकासान का जायजा लेने के लिए पहुँचे थे। इस दौरान उन्होंने सीएम नवीन पटनायक की जमकर तारीफ की थी।

चुनाव के दौरान दूसरे दल के मुख्यमंत्री की तारीफ करने के साथ ही इसके राजनीतिक मायने निकालने शुरू हो गए थे। खैर, ये तो चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद ही पता चल पाएगा कि किसकी सरकार बन रही है और कौन सी पार्टी किस पार्टी को समर्थन दे रही है।

25 फोटो से सब क्लियर: BJP को कहाँ कितना फायदा, कहाँ हो रहा नुकसान

लोकसभा चुनाव 2019 के सातवें और अंतिम चरण सम्पन्न होने के साथ ही विभिन्न न्यूज़ चैनल्स और सर्वे एजेंसियों द्वारा संयुक्त रूप से एग्जिट पोल के आँकड़ों का दौर शुरू हो गया। इस लेख में हम आपको राज्य-वार सीटों के आँकड़ें (एक्सिस एग्जिट पोल के अनुसार) बताएँगे कि किस राज्य में बीजेपी के खाते में कितनी सीटें आने की उम्मीद हैं।

दिल्ली

दिल्ली की कुल 7 सीटों में से 6 सीट बीजेपी को मिलने की संभावना है और 1 सीट पर बीजेपी-कॉन्ग्रेस के बीच टक्कर हो सकती है।

आंध्र प्रदेश

आंध्र प्रदेश में कुल 25 सीटों में से एक भी सीट बीजेपी को नहीं मिलती दिख रही है।

असम

असम की कुल 14 सीटों में से 10 सीटें बीजेपी को मिलने की संभावना है।

बिहार

बिहार की 40 सीटों में से 16 सीटें बीजेपी को मिलती नज़र आ रही हैं और एक सीट पर यह संशय है कि वो या तो बीजेपी के खाते में जा सकती है या आरजेडी के खाते में।

छत्तीसगढ़

यहाँ कुल 11 सीटों में से 7 सीट बीजेपी को मिल सकती है और 1 सीट पर कॉन्ग्रेस और बीजेपी के बीच टक्कर है।

गुजरात

गुजरात की 26 सीटों में से केवल 2 सीटों पर बीजेपी-कॉन्ग्रेस के बीच कड़ी टक्कर है और बाक़ी सभी सीटें बीजेपी के खाते में जाती दिख रही है।

गोवा

गोवा की 1 सीट बीजेपी को मिलने की संभावना है और 1 सीट पर बीजेपी-कॉन्ग्रेस के बीच कुछ कहा नहीं जा सकता कि किसके खाते में जाए।

हरियाणा

हरियाणा की 10 सीटों में से 9 सीटें बीजेपी को मिलती दिख रही हैं और 1 सीट पर संशय बना हुआ है।

जम्मू-कश्मीर

यहाँ की 6 सीटों में से 3 सीटें बीजेपी को मिलने की संभावना है और 1 सीट को लेकर बीजेपी, जेकेएनसी और कॉन्ग्रेस के बीच कड़ा मुक़ाबला है।

झारखंड

झारखंड में कॉन्ग्रेस का सूपड़ा साफ़ होता दिख रहा है और बीजेपी को 14 में से 12 सीटें मिलती दिख रही हैं। केवल 2 सीट को लेकर संशय है।

हिमाचल प्रदेश

हिमाचल की चारों सीटें बीजेपी को मिल सकती है।

कर्नाटक

कर्नाटक की 28 सीटों में से 21 सीटें बीजेपी को मिल सकती हैं और 1 सीट जेडीएस, 1 सीट कॉन्ग्रेस और 1 सीट आईएनडी के पास जा सकती है। बाक़ी 4 सीटों पर कुछ कहा नहीं जा सकता।

केरल

केरल राज्य में बीजेपी को 1 भी सीट नहीं मिलने का संकेत दिया गया है।

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र की 48 सीटों में से 19 सीटें बीजेपी को मिलने की संभावना है और तीन अन्य सीटों को लेकर संशय बरक़रार है।

मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश में भी कॉन्ग्रेस का सूपड़ा साफ़ होता दिख रहा है और 26 सीटें बीजेपी को मिलने की संभावना है। केवल 2 सीटों पर बीजेपी और कॉन्ग्रेस के बीच कुछ भी हो सकता है।

ओडिशा

ओडिशा की कुल 21 लोकसभा सीट में से 15 बीजेपी को मिलने की उम्मीद है। बाक़ी 6 सीटों पर बीजेपी, कॉन्ग्रेस और बीजेडी की टक्कर है।

राजस्थान

25 सीटों वाले राजस्थान में 21 सीटें बीजेपी को मिलने की संभावना है, और बाक़ी 4 सीटों पर बीजेपी और कॉन्ग्रेस के बीच फैसला होना है, और 1 सीट RLD के खाते में जाती दिख रही है।

पंजाब

पंजाब की 13 सीटों में से बीजेपी को 1 ही सीट मिलने की उम्मीद बताई गई है।

तमिलनाडु

तमिलनाडु की 39 सीट में से केवल 1 ही सीट मिलने की उम्मीद की गई है, लेकिन उस पर भी पर बीजेपी और कॉन्ग्रेस के बीच टक्कर है।

उत्तर प्रदेश

जनसंख्या के आधार पर सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की कुल 80 सीटों में से 55 सीटें बीजेपी को मिलने की उम्मीद है, बाक़ी पर तस्वीर साफ़ नहीं हो सकी।

तेलंगाना

तेलंगाना की 17 सीटों में से केवल 1 सीट बीजेपी को मिलने की संभावना है और इसके अलावा 2 अन्य सीटों पर कॉन्ग्रेस और टीएरएस के साथ कांटे की टक्कर है।

उत्तराखंड

उत्तराखंड की पाँचों सीटें बीजेपी को मिलने की उम्मीद है।

अंडमान निकोबार, चंडीगढ, दादरा और नागर हवेली, दमन और दीव और पुडुचेरी

यहाँ की कुल 6 सीटों में से 4 सीटें बीजेपी को मिलने की संभावना जताई गई है।

अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा

सेवन सिस्टर (सात बहनें) नाम से विख्यात इन राज्यों की कुल 14 लोकसभा सीटों में से 6 सीटें बीजेपी को मिल सकती हैं।

पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल में कुल लोकसभा सीटें 42 हैं। इनमें से 16 सीटें बीजेपी को मिलने की उम्मीद है और 8 सीटों पर TMC के साथ कड़ी टक्कर है। वहीं 1 सीट को लेकर बीजेपी और कॉन्ग्रेस बीच टक्कर है।

विभिन्न एजेंसियों के एग्जिट पोल द्वारा जुटाए गए इन सभी आँकड़ों को देखकर लगता है कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार का गठन होगा। फ़िलहाल तो इस बात पर केवल कयास ही लगाया जा सकता है, क्योंकि असली तस्वीर तो 23 मई को ही सबके सामने आएगी।

PS: इस लेख में केवल BJP के सीटों के आँकड़े दिए गए हैं। सहयोगी पार्टियों के आँकड़ों को इसमें सम्मिलित नहीं किया गया है।

मोदी जीत गए तो क्या हुआ, उसके पंख कतर दिए जाएँगे: कॉन्ग्रेस ने स्वीकारी ‘Moral Victory’

कॉन्ग्रेस ने शायद अब सार्वजनिक रूप से अपनी हार स्वीकार कर ली है। पार्टी के मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ के एक लेख का विश्लेषण करें तो यही पता चलता है। हेराल्ड ने एक लेख लिखा है, जिसका शीर्षक ही यह बताने के लिए काफ़ी है कि कॉन्ग्रेस और उसके लोग लोकसभा चुनाव 2019 के विभिन्न एग्जिट पोल्स के जारी होने के बाद कितने सदमे में हैं। इस लेख का शीर्षक कहता है कि क्या हो जाएगा अगर मोदी जीत भी जाए, उसके पंख को कतर दिए जाएँगे। शीर्षक कहता है कि यह बात मोदी को भी पता है। कुल मिलाकर देखें तो कॉन्ग्रेस अब इसी बात से ख़ुश है कि मोदी-भाजपा की सीटें पिछली बार से कम होंगी (एग्जिट पोल्स के अनुसार)। लेख की शुरुआत ही होती है एग्जिट पोल्स जारी करने वाली एजेंसियों को गाली देने के साथ।

इस लेख में विभिन्न एजेंसियों द्वारा जारी किए गए एग्जिट पोल्स का विश्लेषण करते हुए उनकी सफलता प्रतिशत का जिक्र किया गया है। कहा गया है कि 2014 में बड़े राज्यों के चुनावों में ये अधिकतर बुरी तरह ग़लत साबित हुए थे। वैसे, ये कोई नई बात नहीं है क्योंकि एग्जिट पोल कोई फाइनल नतीजे नहीं होते और इसे मतदाताओं के सैम्पल के आधार पर जारी किया जाता है। अपने दावों की पुष्टि के लिए कॉन्ग्रेस के मुखपत्र ने पार्टी के ‘डाटा एनालिटिक्स विंग’ के प्रमुख का ट्वीट लगाया है। इसके बाद लेख में एग्जिट पोल पर बहस करने वाले एंकरों की तुलना कार्टून से की गई है।

इस लेख को आगे पढ़ते-पढ़ते पता चल जाता है कि लेखक रात भर सोया नहीं है। एजेंसियों को गाली देने से लेकर एंकरों का मज़ाक उड़ाने तक, सब कुछ एक ख़ास अवसाद से ग्रसित होकर लिखा गया लगता है। भाजपा के बड़े नेताओं के बॉडी लैंग्वेज की पड़ताल करने का दावा करते हुए हेराल्ड ने कहा है कि इससे साफ़-साफ़ दिख रहा है कि सब कुछ ठीक नहीं है। उदाहरण के लिए उसने प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष द्वारा की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस को लिया है। इसमें कहा गया है कि मोदी ने सारा लाइमलाइट भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को दे दिया। अव्वल तो यह कि अगर मोदी ख़ुद ही बोलते रहते और अमित शाह को बोलने का मौक़ा नहीं मिलता तो कॉन्ग्रेस के सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मुखपत्र भाजपा में लोकतंत्र न होने का रोना रो रहे होते।

मोदी ने अमित शाह को क्यों बोलने दिया, उन्हें क्यों लाइमलाइट दिया, इस पर भी हेराल्ड को आपत्ति है। इसका कारण भी हेराल्ड ने काफ़ी अजीब सा गिनाया है। हेराल्ड के अनुसार, मोदी को कुछ ऐसा पता है जो मेन स्ट्रीम मीडिया को नहीं पता। लेख के अनुसार, मोदी को पता है कि उनकी छवि अब ख़राब होती जा रही है, इसीलिए उन्होंने अमित शाह को बोलने दिया। इससे आगे का कारण हँसी पैदा करने वाला है। लेख में कहा गया है कि मोदी को यह भी पता है कि राहुल गाँधी की छवि काफ़ी अच्छी होती जा रही है, उनका क़द बढ़ता जा रहा है, इसीलिए मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुप रहे। इस कारण में लॉजिक ढूँढने का ज़िम्मा पाठकों पर छोड़ते हुए आगे बढ़ते हैं।

आगे हेराल्ड इस बात पर ताली पीटता है कि उन्हें शिवसेना और जदयू जैसे अस्त-व्यस्त गठबंधन दलों के साथ सरकार चलाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। हेराल्ड ने लिखा है कि जिन एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियों को सबसे ज्यादा पैसे दिए गए, उन्होंने भी भाजपा को उम्मीद से कम सीटें दी हैं। हेराल्ड का सीधा मानना है कि जिस भी न्यूज़ चैनल या एजेंसी ने भाजपा को एग्जिट पोल में ज्यादा सीटें दी, उन्हें पैसे दिए गए थे। हेराल्ड इस बात पर ताली पीटने में ही व्यस्त है कि मोदी गठबंधन साथियों के साथ उतनी स्वतंत्रता से सरकार नहीं चला पाएँगे, जैसा उन्होंने पिछले पाँच वर्षों में किया था।

कॉन्ग्रेस यहाँ अपनी हार मानती नज़र आ रही है और इसी बात से ख़ुश है कि राजग को बहुमत मिला तो क्या हो गया, सरकार ठीक से थोड़ी न चल पाएगी, हेराल्ड को उम्मीद है कि गठबंधन साथी तो ज़रूर परेशान करेंगे। अर्थात, अब कॉन्ग्रेस अपनी हार से दुःखी नहीं है लेकिन मोदी को थोड़ी परेशानी तो होगी, इस उम्मीद में ख़ुश है। लेकिन, हेराल्ड ने ख़ुद का सबसे ज्यादा मज़ाक तो बंगाल चुनाव का विश्लेषण करते हुए उड़वाया है। लेख का दावा है कि सारे संसाधन और सारी मेहनत झोंकने के बावजूद भाजपा यहाँ तृणमूल से पीछे नज़र आ रही है। असल में जिन्हें भी राजनीति की जरा भी समझ है, उन्हें पता है कि बंगाल में अगर भाजपा को 10 सीटों के क़रीब भी मिलती है तो यह बड़ी सफलता है, एग्जिट पोल्स में तो 23 तक दिए गए हैं।

बंगाल में कभी बराबर की लड़ाई तो थी ही नहीं। यह वहाँ सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी, उनकी पूरी सरकारी मशीनरी और गुंडागिरी में दक्ष पार्टी कार्यकर्ताओं से एक ऐसी पार्टी की लड़ाई थी, जिसका राज्य में अब से पहले कोई कैडर ही नहीं था। बावजूद इसके भाजपा के अच्छे प्रदर्शन को Downplay कर के दिखाने के चक्कर में नेशनल हेराल्ड अपनी राजनीतिक नासमझी का परिचय दे रहा है। कॉन्ग्रेस के मुखपत्र का यह भी दावा है कि दमदम, जौनपुर और आजमगढ़ की रैलियों में पीएम मोदी को जनता से ठंडी प्रतिक्रिया मिली। अगर दमदम में मोदी की रैली फ्लॉप रही तो तृणमूल के गुंडों ने रैली के तुरंत बाद वहाँ से भाजपा प्रत्याशी मुकुल रॉय पर हमला क्यों किया?

आजमगढ़ और जौनपुर के सपा और बसपा का गढ़ होने के बावजूद मोदी की रैली में यहाँ अच्छी-ख़ासी भीड़ जुटी और नेशनल हेराल्ड के दावे यहाँ भी झूठे साबित होते हैं। मोदी ने जनता के रुख को देखते हुए सातवें चरण के मतदान के दौरान केदारनाथ का दौरा किया, ऐसा नेशनल हेराल्ड का दावा है। इसके बाद इसने भी लिबरलों के उसी मुद्दे को उठाया, पीएम मोदी जब मंदिर में गए तो रेड कार्पेट क्यों बिछाया गया, कैमरे उनके साथ क्यों थे, वगैरह-वगैरह। इस बारे में हमने भी एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें इस बात पर चिंतन किया गया था किचश्मा पहन कर ध्यान लगाने को लेकर गिरोह विशेष के निशाने पर आए मोदी को अपनी आध्यात्मिक साधना कैसे करनी चाहिए और क्या-क्या पहनना चाहिए, वे वामपंथी भी अब इस पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्हें सनातन हिन्दू परंपरा पर कोई विश्वास ही नहीं।

नेशनल हेराल्ड लेख का अंत होते-होते कॉन्ग्रेस की ‘मोरल जीत’ स्वीकार कर लेता है और भाजपा सरकार ठीक से तो चला नहीं पाएगी, इस उम्मीद में ख़ुश होने की झूठी कोशिश करता है। इसके बाद चुनाव आयोग की आलोचना का भी सिलसिला शुरू हो जाता है, जिसमें पूछा जाता है कि मोदी को केदारनाथ दौरे की अनुमति क्यों दी गई? नेशनल हेराल्ड की चले तो किसी व्यक्ति को अपनी व्यक्तिगत धार्मिक आस्था के लिए मंदिरों के दर्शन के भी लाले पड़ जाएँ। इस लेख का विश्लेषण इसीलिए ज़रूरी था, क्योंकि कॉन्ग्रेस ने अपनी नैतिक जीत स्वीकार करते हुए भाजपा के गठबंधनों से यह उम्मीद रखी है कि वो मोदी को सरकार चलाने के दौरान परेशान करें।

नेशनल हेराल्ड ने मोदी की जीत को ‘Pyrrhic Victory’ कहा है। इसका अर्थ हुआ कि ऐसी जीत, जो हार के बराबर हो (सम्राट अशोक के कलिंग विजय की तुलना इससे कर सकते हैं, इसका अर्थ हुआ कि ऐसी जीत जिसमें विजेता को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा हो)। नेशनल हेराल्ड को उम्मीद है कि मोदी जीत कर भी हार सकते हैं। ऐसे शब्दों के चयन के साथ ही नेशनल हेराल्ड ने जता दिया है कि आएगा तो मोदी ही।