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निचले तबके के लिए अभिजात्यों की घृणा बनाती है नरेंद्र मोदी को महामानव

"तुमने जिस ख़ून को मक़्तल में दबाना चाहा
आज वह कूचा-ओ-बाज़ार में आ निकला है
कहीं शोला, कहीं नारा, कहीं पत्थर बनकर
ख़ून चलता है तो रूकता नहीं संगीनों से
सर उठाता है तो दबता नहीं आईनों से"

शायर साहिर लुधियानवी ने ये पंक्तियाँ 23 मई 2019 की सुबह को ध्यान में रखकर नहीं लिखी थीं। ये पंक्तियाँ लिखी जा चुकी हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह नरेंद्र मोदी को एक बार फिर देश ने सर आँखों पर बिठा लिया है। एक बार फिर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले हैं, बावजूद इसके कि इस नरेंद्र मोदी को कुछ सत्तापरस्त राजपरिवारों और उनके सिपहसालारों ने विषैले, बेबुनियाद और झूठे आरोप लगाकर खून के दलाल से लेकर नीच और न जाने क्या क्या बोलकर दमन करने का पूरी शिद्दत से प्रयास किया।

जब पाँच साल तक देश में लोकतंत्र की हत्या हुई तो फिर लोकतंत्र ने इस हत्या को एक बार फिर और कहीं अधिक जोरदार तरीके से क्यों चुना? मोदी सरकार की प्रचंड विजय क्या एक बार फिर जनता की भूल और EVM में गड़बड़ी का नतीजा है? ऐसे समय में तमाम राजनैतिक विरोधाभासों के बीच अकेले अपने दम पर लोकसभा चुनाव में 300 की संख्या पार कर लेना किसी चमत्कार से कम नहीं माना जा सकता है।

गत पाँच वर्षों में हम सबने देखा कि विपक्ष के मुद्दे और विरोध के तरीके इतने स्तरहीन थे कि जनता स्वयं अपना फैसला करती गई। कॉन्ग्रेस ने विपक्ष की भूमिका में रहते हुए एक झाँसेबाज की भूमिका निभाई। कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी दल मात्र इसी उठापटक में व्यस्त रहे कि वो आखिर जनता की आँखों में किस तरह से नरेंद्र मोदी की छवि ख़राब कर सके। और अंततः राहुल गाँधी ने अपनी मेधा पर अंकुश लगाए बिना यह स्वीकार भी कर लिया कि उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य अब नरेंद्र मोदी की छवि की धज्जियाँ उड़ाना है।

1992, नरेंद्र मोदी लाल चौक, श्रीनगर में तिरंगा फहराते हुए

राहुल गाँधी को लुटियंस मीडिया से लेकर तमाम ‘लिबरल विचारकों’ ने गोद में बिठाकर खूब स्तनपान करवाया, लेकिन मानसिक दैन्यता की भरपाई कोई विटामिन नहीं कर पाया। नतीजा ये हुआ कि जिस आदमी को पैदा होते ही देश का प्रधानमंत्री बना देने का फैसला कर लिया गया था, उसे उसके गढ़ से लात मार कर खदेड़ दिया गया। अब सवाल ये है कि अभिजात्यता पर ये लात किसने मारी है?

क्या राहुल गाँधी और उनके तमाम सलाहकार अभी भी मन से ये स्वीकार कर पा रहे हैं कि EVM ने नहीं, बल्कि जनता ने उनकी अभिजात्यता को उखाड़ फेंका है? जवाब बेहद आसान है। नतीजे आने के बाद राहुल गाँधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में चाहे दुखी मन से कह दिया हो कि वो ये हार स्वीकार करते हैं लेकिन उन्होंने अभी तक जनता से अपने झूठे आरोपों और उनके गिरोहों द्वारा किए गए जनादेश के अपमान के लिए माफ़ी नहीं माँगी है।

क्या एक महामानव का सामना अभिजात्यता से सम्भव था?

नरेंद्र दामोदरदास मोदी यानी जनता का नेता। RSS कार्यालय में चाय बनाने वाला यह व्यक्ति आज के समय में जनता का नेता बनकर दोबारा सामने खड़ा है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि नरेंद्र मोदी आज राजनीति के महामानव बन चुके हैं। यह छवि इतनी विशाल आखिर किसने बनाई? चुनाव तो बहुत बाद में हुए लेकिन नरेंद्र मोदी बनने में क्या महज एक दिन पड़ने वाले वोट का ही योगदान है? क्या कॉन्ग्रेस इस आत्मचिंतन को कर पाने में सक्षम है कि जिस नरेन्द्र मोदी से वो नफरत करते आए हैं, वो एक दिन में तैयार नहीं हुआ है। इस नरेंद्र मोदी ने जमीन से शुरुआत की और आज भारतीय राजनीति के इतिहास के किसी भी प्रधानमंत्री से बड़ा कद ले चुका है।

नरेंद्र मोदी ने अपने व्यक्तित्व का यह विस्तार तब किया जब आप और हम नेहरू और इंदिरा की आत्ममुग्धता में व्यस्त थे। हम यह देख पाने में असमर्थ थे कि समय बदल चुका है। आप मात्र इतिहासकारों को गोद में बिठाकर, उनकी कलम में अपनी मानसिकता की स्याही भरकर अब मनचाहा इतिहास नहीं लिखवा सकते हैं। कॉन्ग्रेस ने आजादी के बाद एक बड़ा समय इस देश की अशिक्षा और सूचना के साधनों पर सम्पूर्ण अधिकारों के साथ निरंकुश तरीके से इस्तेमाल कर के बिताया। इसी इतिहास की बदौलत हम सब आज गाँधी परिवार से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।

1980, नरेंद्र मोदी भाषण देते हुए  

इसी इतिहास की बदौलत कॉन्ग्रेस स्वयं कभी स्वीकार नहीं कर पाई कि उनके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को गर्भ से निकलने के बाद जमीन पर चलना होगा, उसे लोगों के बीच नजर आना होगा, लोगों के दुखों को समझना होगा। यही कारण रहा कि आज जो राहुल गाँधी किसी पंचायत चुनाव में प्रधान और वार्ड मेंबर का पद जीतने लायक योग्यता नहीं रखता है, वो इस बुजुर्ग पार्टी का सबसे पहला व्यक्ति बनकर प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखता जा रहा है। कॉन्ग्रेस ने उसे कभी तैयार होने और पकने का मौका ही नहीं दिया।

दूसरी ओर नरेंद्र मोदी को लें, तो हम देखते हैं कि उन्होंने गौतम बुद्ध की ही तरह लोगों के बीच रहकर ही लोगों के दर्द को समझा। उन्होंने जनता का नेता बनने के लिए जनता के बीच रहकर ही संघर्ष किए और पार्टी में एक छोटे से पद से उठकर आज एक बार फिर खुद को भाजपा का चेहरा बना चुके हैं। कॉन्ग्रेस का दुर्भाग्य देखिए कि जिस जनता के जरिए वो अपने राजकुमार को सत्ता पर बिठाना चाहती है, वो उसी जनता का मानमर्दन और अपमान अपने घटिया चुटकुलेकारों और ‘शिक्षित’ विदूषकों द्वारा करवाती रही।

कॉन्ग्रेस लगातार जनता के निर्णय को छल और प्रपंच साबित करती रही। वो कहती रही कि वोट देने वाले लोग मूर्ख और अशिक्षित हैं, इसलिए मोदी जीत रहा है। इन विषैले लोगों ने कहा कि मोदी अनपढ़ है इसलिए उसे सत्ता नहीं सौंपी जानी चाहिए, मोदी पिछड़े वर्ग का है, इसलिए उसे प्रधानमंत्री बनते नहीं देखा जा सकता है। लेकिन इन सबके बीच वो कभी भी ये स्वीकार नहीं कर पाए कि उनकी वंशवाद में लिप्त सत्तापरस्ती को लोग नकार चुके हैं।

जनता ने जो निर्णय दिया है, वो किसी पार्टी या विचारधारा के खिलाफ नहीं है, बल्कि उनका सन्देश है उन लोगों के लिए, जो समाज के सबसे कमजोर वर्ग को घृणा और उपेक्षा की दृष्टि से देखता हैं। कॉन्ग्रेस के लिए स्वीकार कर पाना मुश्किल है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर हाल में जनता का वो स्वप्न हैं, जिन्हें आम जनता जीना चाहती है। जब घटिया चुटकुले बनाकर मोदी की छवि ख़राब करने का प्रयास करने वाली लुटियंस मीडिया ‘देश का मतलब मोदी नहीं’ कहती रही, तब देश की जनता उन्हें एकबार फिर देश का चेहरा बनाने के लिए तैयारी कर रही थी।

कॉन्ग्रेस की गोद में बैठी मीडिया की छटपटाहट देखते ही बन रही है। उदाहरण के लिए चाहे टेलीग्राफ जैसे समाचार पत्र का उदाहरण लें या फिर रोजाना TV पर आकर लोगों को TV ना देखने की सलाह देने वाले स्वघोषित निष्पक्ष पत्रकार का उदाहरण ले लीजिए; सबने सिर्फ इस वजह से मोदी विरोधी डर जनता के बीच स्थापित करने के भगीरथ प्रयास किए, ताकि उन्हें किसी निचले तबके के व्यक्ति को देश का चेहरा बनते ना देखना पड़े।

अभिजात्यता के गुलाम ये सभी पत्रकार और मीडिया के समूह पिछले 5 सालों से व्यक्तिगत नफरत को ‘जनता की राय’ बताकर ज़हर उगल रहे रहे। उन्होंने ‘डर का माहौल है‘ जैसे मुहावरे गढ़ने के तमाम प्रयास किए। इन जहरीले पत्रकारों ने कहा कि मोदी आएगा तो लोग तलवारें लेकर दौड़ेंगे, दलितों का शोषण होगा, संस्थान बिक जाएँगे। अब नतीजे जब हमारे सामने हैं तो क्या वो जनता की राय को स्वीकार कर पाएँगे? या अपने अहंकार और व्यक्तिगत लड़ाई को ही सर्वोपरि रखकर दोबारा यही साबित करने की कोशिश में जुट जाएँगे कि उनकी वास्तविक दुश्मनी मोदी से ही है।

अपने विषैले विचारों को लोकतंत्र की परिभाषा साबित करने वाले लोग क्या लोकतंत्र की आवाज़ के बीच जनादेश का शोर सुन पा रहे हैं? या फिर अपने कानों में उँगलियाँ डालकर बस यही सुनना चाह रहे हैं कि नहीं, यह लोकतंत्र नहीं कोई चमत्कार ही है। अभिजात्यों की जुबान कुछ भी कहे, लेकिन उनके कान ये नहीं सुनना चाह रहे हैं कि कोई नेहरू और इंदिरा से भी बड़ा व्यक्तित्व देश की जनता ने चुन लिया है। निचले तबके से उठे लोगों को जनता द्वारा सत्ता सौंपा जाना देखकर ये पत्रकार सन्नाटे में हैं। ये अब निर्वात में जीना चाह रहे हैं, जिसमें न लोकतंत्र हो, ना ही जनादेश जैसी कोई बात हो। यह भी सत्य है कि कल चुनाव के नतीजे देखने के बाद क्रांति के उपासक लोकतंत्र के ये प्रहरी ये भी चाह रहे हैं कि काश जनता से जनता का नेता चुनने का अधिकार ही छीन लिया जाए।

चुनाव प्रचार के आखिरी ओवर्स में तो ऐसी भी आवाजें सुनने को मिलीं कि हम सत्ता के खिलाफ ही बोलते हैं। यहीं से क्रांति और लाल सलाम की बू आती है। कुछ इसी तरह के लोगों को यही सन्देश देते सुना जाने लगा। सत्ता के खिलाफ बोलूंगा ही बोलूंगा का मतलब है कि सरकार अगर सदियों से घर और छत के लिए तरसते लोगों को बिजली-पानी और छत दिलाने का प्रयास करे, तब भी आप सरकार के खिलाफ लोगों को भड़काएँगे, सिर्फ इसलिए क्योंकि आपको ऐसा करना अच्छा लगता है? आप खुद बताइए कि सरकार की कौन सी ऐसी नीति थी, जिसको आपने अपने स्तर पर जनता तक पहुँचाने का प्रयास किया? निष्पक्षता के नाम पर आप सिर्फ एक विषैले दुश्मन की तरह पेश आते रहे, जिसे जब जहाँ से मौका मिला उसने वहाँ अपनी नफरत का बीज बोने का अवसर तलाशा।

जो भी है, आप चाहे कितने ही अच्छे नैरेटिव बिल्डर क्यों न हों, आपकी कलम से आपके जैसे ही गोदी में बैठे कितने ही अभिजात्यों को सुकून और इनपुट मिलता हो, आप आज सूती कपड़े पहनकर जीवनयापन करने के लिए स्वतंत्र हैं हो सके तो केदारनाथ की उस गुफा चले जाइए, जहाँ 5 साल बाद विषाक्त लोगों से घिरे होने के कारण स्वयं को डिटॉक्स करने के लिए ध्यान लगाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना ‘पीस ऑफ़ माइंड’ बैलेंस करते हैं। क्योंकि आप जिनकी गोदी में बैठे हुए हैं, वो लोग जनता का मिजाज समझने के बजाए इस बात को लेकर सर धुन रहे हैं कि जनता द्वारा खदेड़कर भगाए गए डिम्पलधारी राजकुमार को फिर से उत्तर की ओर आखिर कैसे लाया जाए?

मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने 57% से अधिक सीटें ग्रामीण इलाकों में जीती हैं

लोकसभा के चुनाव परिणाम आ चुके हैं और भाजपा ने एक बार फिर से अपने नाम ऐतिहासिक जीत दर्ज कराई है। भाजपा को 201 शहरी और अर्द्ध शहरी सीटों में से 105 सीटों पर जीत मिली है और 57 फीसद से अधिक सीटें पार्टी ने गाँवों में जीती हैं।

हालाँकि पहले ऐसा माना था कि कॉन्ग्रेस की जड़े ग्रामीण इलाकों में भाजपा से ज्यादा मजबूत हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में पुरानी भ्रांतियों को तोड़ने के लिए भाजपा नेताओं ने गाँव-गाँव जाकर अपनी जमीन को बहुत मजबूत किया है जिसके नतीजे अब सबके सामने हैं।

बीते पाँच सालों में भाजपा द्वारा ग्रामीण लोगों के लिए लागू की गई योजनाओं ने उन्हें ग्रामीणों के बीच लोकप्रिय बनाया। भाजपा को ग्रामीण इलाकों में उज्‍ज्‍वला योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना का भी बहुत फायदा मिला।

मोदी की भाजपा ने इस बार ग्रामीण भारत की कुल 342 सीटों में से 197 सीट जीती हैं। इसमें से सिर्फ 30 सीटें कॉन्ग्रेस के खाते में गई हैं। भाजपा सरकार के कार्यकाल में खास बात ये दिखी कि ग्रामीण क्षेत्रों में इतना कार्य करने के बावजूद भी पार्टी ने शहरी मतदाताओं को नाराज़ नहीं होने दिया।

टैक्स में छूट से लेकर आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण जैसे मुद्दों ने मध्यम वर्ग को भाजपा के साथ बाँधे रखा। इसका परिणाम भी हम नतीजों में देख सकते हैं कि 50 लाख से अधिक आबादी के 8 शहरों की 32 सीटों में से 16 भाजपा ने अपने नाम की जबकि छोटे शहर की कुल 57 सीटों में से भाजपा को 35 सीटें मिलीं। बता दें कि शहरों की 144 सीटों में से भाजपा को 70 सीटें मिली हैं। क्षेत्रीय दलों ने 55 सीटों पर जीत हासिल की है।

पिता की बात मान लेते अखिलेश तो 5 सीटों पर नहीं सिमटना पड़ता

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 62 सीटों पर भारी मतों से अपनी जीत दर्ज कराई है। हालाँकि माना जा रहा था कि प्रदेश में सपा-बसपा-रालोद के महागठबंधन से भाजपा को काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। मोदी लहर में गठबंधन तिनके की तरह उड़ गया। जीत को लेकर आश्वस्त बसपा-सपा को सिर्फ़ 10 और 5 सीटें लेकर संतोष करना पड़ा।

याद दिला दें कि बसपा से गठबंधन होने के बाद सपा के पूर्व अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने अपनी नाराज़गी जाहिर की थी। उनका कहना था कि उनके बेटे अखिलेश ने उनसे बिना पूछे ये कदम उठाया। इसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ेगा। मुलायम सिंह यादव ने गठबंधन पर अपनी राय रखते हुए कहा था, “अखिलेश मायावती के साथ आधी सीटों पर गठबंधन किया है। आधी सीटें देने का आधार क्या है? अब हमारे पास केवल आधी सीटें रह गई हैं। हमारी पार्टी कहीं अधिक दमदार है।”

दरअसल, उस समय मुलायम सिंह को डर था कि जिन सीटों पर उनके जीतने की उम्मीद थी वो यदि बसपा को दे दी जाएँगी तो उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाएगी। और अब चुनाव का परिणाम देखने के बाद ऐसा लग रहा है जैसे मुलायम सिंह सही कह रहे थे। भाजपा द्वारा प्रदेश में भारी मतों से विजयी होने के बाद मुलायम द्वारा कही ये बात हर किसी को याद आ रही होगी क्योंकि उस समय किसी को नहीं मालूम था कि एक अनुभवी राजनेता के बोल अपनी पार्टी के लिए इतने सही और सटीक साबित होंगे।

पिछले चुनावों और इन चुनावों पर यदि गौर करें तो मालूम होगा कि 2014 में सपा को सिर्फ़ 5 सीटें मिली थीं और बसपा को शून्य लेकिन 2019 में सपा में कोई बढ़त होती नहीं दिखी जबकि बसपा को 10 सीटें मिलीं। स्पष्ट है कि गठबंधन का असली फायदा सिर्फ़ मायावती को हुआ है। इन चुनावों में सपा पार्टी से जहाँ मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव ने जीत दर्ज कराई वहीं डिंपल यादव को कन्नौज में हार का मुँह देखना पड़ा।

ममता के प्रिय पुलिस अधिकारी पर लटकी गिरफ्तारी की तलवार, SC ने कहा HC जाओ

शारदा चिट फंड घोटाले में शुक्रवार (मई 23, 2019) को सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता के पूर्व पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार की गिरफ्तारी पर अब तक लगी रोक की अवधि को आगे बढ़ाने की माँग पर सुनवाई करने से मना कर दिया। कोर्ट ने राजीव कुमार से कहा कि वो कोलकाता हाईकोर्ट जा सकते हैं, वहाँ छुट्टियाँ नहीं चल रही हैं इसलिए उनकी समस्या का समाधान वहीं हो सकता है।

गौरतलब है इससे पहले शारदा चिट फंड घोटाले मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता के पूर्व पुलिस कमिश्नर और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के क़रीबी राजीव कुमार को तगड़ा झटका दिया था। कोर्ट ने राजीव कुमार को गिरफ़्तार करने और हिरासत में लेकर पूछताछ करने पर रोक संबंधी प्रोटेक्शन को वापस ले लिया था। शीर्ष अदालत ने उन्हें अग्रिम ज़मानत के लिए कोलकाता हाईकोर्ट का रुख़ करने के लिए 7 दिन का समय दिया था। अगर वे इन सात दिनों में हाईकोर्ट का रुख़ नहीं करते और उन्हें वहाँ से अग्रिम ज़मानत नहीं मिलती है तो सीबीआई सात दिन बाद उन्हें गिरफ़्तार कर सकती है। राजीव कुमार की गिरफ्तारी में छूट की अवधि 24 मई को खत्म हो रही है।

ख़बर के अनुसार, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 30 अप्रैल को सीबीआई को कोलकाता के पूर्व पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार को हिरासत में लेकर पूछताछ पर पहले दी गई छूट को हटाने के लिए संतोषजनक सबूत पेश करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि सीबीआई को अदालत में वे सभी सबूत पेश करने होंगे जिससे इस घोटाले में राजीव कुमार की भूमिका साबित हो सके। साथ ही कोर्ट ने सीबीआई को राजीव कुमार की संलिप्तता ख़ासकर लैपटॉप के डेटा, मोबाइल फोन या डायरियों से जुड़े सबूत पेश के निर्देश भी दिए थे, जिसमें कथित रूप से सबूतों को नष्ट करने के लिए प्रभावशाली लोगों के भुगतान की जानकारी शामिल थी। 

ED ने रॉबर्ट वाड्रा की जमानत रद करने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट का किया रुख

कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा के पति और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा की मुश्किलें खत्म होतीं नजर नहीं आ रही हैं। लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद गाँधी परिवार को एक और झटका लग सकता है, क्योंकि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने रॉबर्ट वाड्रा पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। खबर के मुताबिक, ED ने मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में रॉबर्ट वाड्रा की जमानत रद्द करने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। गौरतलब है कि इस मामले में एक ट्रायल कोर्ट ने 1 अप्रैल को अग्रिम जमानत दी थी।

मनी लॉन्ड्रिंग मामले के आरोपी रॉबर्ट वाड्रा ने हाल ही में विदेश जाने की अनुमति लेने के लिए दिल्ली की एक अदालत में अग्रिम जमानत के लिए याचिका डाली थी। अदालत में वाड्रा के वकील ने अनुरोध किया था कि उनकी सुरक्षा के चलते यात्रा कार्यक्रम किसी से साझा न किया जाए।

कोर्ट ने वाड्रा को 1 अप्रैल 2019 को कई शर्तें लगाते हुए उन्हें अग्रिम जमानत दी थी और अदालत की पूर्व अनुमति के बिना देश छोड़कर नहीं जाने की बात कही थी। रॉबर्ट वाड्रा लंदन के 12 ब्रायंस्टन स्क्वायर में 19 लाख पाउंड कीमत की संपत्ति की खरीद को लेकर मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों का सामना कर रहे हैं।

जनता का भरोसा EVM पर से उठ चुका है: महागठबंधन की हार पर मायावती

बसपा सुप्रीमो मायावती ने लोकसभा चुनाव में महागठबंधन की करारी हार का ठीकरा ईवीएम के सिर फोड़ा है। उन्होंने कहा कि सत्ताधारी दल भाजपा ने चुनाव को ईवीएम के जरिए हाईजैक कर लिया है और ये चुनाव परिणाम जनता के गले नहीं उतर रहा। मायावती के अनुसार जनता ने भाजपा और प्रधानमंत्री की गलत नीतियों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ाई लड़ी थी, लेकिन जो परिणाम आया, वह जनभावना व जन अपेक्षाओं के बिल्कुल विपरीत है।

बसपा प्रमुख का कहना है कि ईवीएम से चुनाव कराने की इस व्यवस्था में कई कमियों के बारे में उनको जानकारी मिली है और शायद यही वजह है कि देश भर में ईवीएम का विरोध हो रहा है। मायावती ने गुरुवार (मई 23, 2019) को देर शाम मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद जनता का ईवीएम पर से विश्वास ही खत्म हो जाएगा।

इसके साथ ही उन्होंने सवाल किया कि जब अधिकतर राजनीतिक पार्टियाँ बैलट पेपर से चुनाव कराने की माँग कर रही हैं, तो इसमें चुनाव आयोग और भारतीय जनता पार्टी को आपत्ति क्यों हो रही है? सुप्रीम कोर्ट को भी इस ओर गंभीरतापूर्वक सोच-विचार करना चाहिए। वहीं, उन्होंने यूपी में कुछ सीटों पर गठबंधन को मिली जीत को भाजपा की सोची समझी साजिश बताया। उन्होंने कहा कि भाजपा ने ऐसा इसलिए किया है, ताकि चुनाव पूरी तरह से प्रभावित नजर न आए और कोई सवाल न उठा सके।

मायावती ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव व रालोद मुखिया चौधरी अजित सिंह का आभार प्रकट करते हुए कहा कि उन्होंने गठबंधन के सभी प्रत्याशियों को जिताने की कोशिश की, लेकिन पार्टी की मेहनत के अनुरुप परिणाम न आने की तकलीफ है। इसके साथ ही उन्होंने गठबंधन के तीनों दलों के कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों, नेताओं, सांसदों व विधायकों का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि बसपा, सपा और रालोद के साथ अन्य पीड़ित पार्टियाँ मिलकर आगे की रणनीति तय करेंगी और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर से प्रेरणा लेकर संघर्ष जारी रखेंगी।

उम्मीद है कि वाड्रा मैडम जान गई होंगी कि ‘Who is Smriti Irani’

साल 2014 में जब यह बात सामने आई थी कि अमेठी सीट से राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ स्मृति ईरानी चुनावी मैदान में उतरेंगी तो एक सवाल के जवाब में प्रियंका गाँधी ने पूछा था, “स्मृति ईरानी…कौन हैं?” यह वाकया एक रोड शो के दौरान हुआ था जब वो अपने भाई राहुल गाँधी के लिए चुनाव प्रचार कर रही थीं।

आज लोकसभा निर्वाचन में स्मृति ईरानी की प्रचंड जीत के बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो ट्रेंड कर रहा है। राहुल गाँधी के अमेठी में चुनाव के कड़े मुक़ाबले में हारने के बाद प्रियंका गाँधी की “स्मृति ईरानी…कौन हैं?” वाली टिप्पणी कॉन्ग्रेस पर काफ़ी भारी पड़ रही है। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रियंका के मसखरे अंदाज़ का जवाब ईरानी ने अपनी जीत सुनिश्चित करके दिया है। मतलब साफ़ है कि ईरानी ने कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष राहुल गाँधी को हराकर यह दिखा दिया कि देश में लोकतंत्र की व्यवस्था है न कि राजवंश की।

लोग स्मृति ईरानी की जीत की सराहना कर रहे हैं और साथ ही कॉन्ग्रेस पार्टी पर कटाक्ष भी कर रहे हैं। प्रियंका गाँधी अक्सर ईरानी पर यह आरोप लगाती थी कि वो एक बाहरी व्यक्ति हैं और उन्हें अमेठी के मतदाताओं की कोई परवाह नहीं है। उनके इन बेबुनियादी आरोपों का जवाब, राहुल को न चुनकर अमेठी की जनता ने ख़ुद ही दे दिया।

कॉन्ग्रेस ने अपने गढ़ अमेठी की सीट पर इतिहास भी रचे हैं। सोनिया गाँधी ने जब 1999 में इस सीट का प्रतिनिधित्व किया था तब उन्होंने भाजपा के संजय सिंह को 48.07% के स्पष्ट अंतर से हराया था। 2014 के लोकसभा चुनाव में, राहुल गाँधी ने स्मृति ईरानी को 1.07 लाख वोटों के अंतर से हराया था, लेकिन मार्जिन का प्रतिशत पहले से बेहद कम होकर 12.33% रह गया था। 2009 में राहुल गाँधी ने भाजपा के प्रदीप कुमार सिंह को 3.70 लाख से अधिक मतों के अंतर से हराकर अमेठी में जीत हासिल की थी।

भारतीय राजनीति में इसे ऐतिहासिक घटना के रूप में दर्ज किया जाएगा, जब गाँधी परिवार को उसके गढ़ में शिकस्त का सामना करना पड़ा। इससे पहले सोशलिस्ट पार्टी के नेता राजनारायण ने स्वर्गीय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को 1977 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली से हराया था।

राहुल गाँधी तो अमेठी से हार गए, क्या सिद्धू लेंगे राजनीति से सन्यास?

पिछले महीने उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा छोड़कर कॉन्ग्रेस में आए नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने घोषणा की थी कि अगर लोकसभा 2019 में अमेठी से राहुल गाँधी हार जाएँगे तो सिद्धू राजनीति से सन्यास ले लेंगे। अब चूँकि तस्वीर पूरी तरह साफ़ हो चुकी है और स्मृति ईरानी को हर जगह से जीत की बधाइयाँ मिल रही हैं, और राहुल गाँधी खुद अपनी हार स्वीकार चुके हैं तो सोशल मीडिया यूजर्स सिद्धू से उनसे इस्तीफे की माँग कर रहे हैं।

सिद्धू के एक महीने पुराने बयान को प्रासंगिक बनाया जा रहा है। ट्विटर पर लोग इंतजार कर रहे हैं कि सिद्धू अपने बयान पर कायम रह पाएँगे या नहीं। कुछ का कहना है कि अब सिद्धू राजनीति छोड़कर क्रिकेट कमेंंट्री में वापस चले जाएँगे। तो, कुछ के मुताबिक अब कैप्टन अमरिंदर सिंह को नवजोत सिंह सिद्धू से राहत मिलने वाली है। ट्विटर पर यूजर्स का कहना है कि सिद्धू को केवल कॉमेडी शो को जज करना चाहिए, राजनीति उनके बस की बात नहीं हैं।

गौरतलब है 23 मई को चुनाव परिणाम साफ़ होने के बाद स्मृति ईरानी को हर ओर से बधाइयाँ मिल रही है। राहुल गाँधी ने खुद स्मृति ईरानी को संदेश देते हुए कहा कि अमेठी से स्मृति ईरानी ने जीत हासिल की है। वो चाहते हैं कि स्मृति ईरानी प्यार से अमेठी की जनता का ख्याल रखेंं। बता दें राहुल गाँधी लगातार तीन बार से अमेठी में जीत रहे थे लेकिन इन लोकसभा चुनाव में स्मृति ने उन्हें बड़ी टक्कर दी और वहाँ से जीत दर्ज कराई।

गठबंधन की ‘लालटेन’ बुझ गई बिहार में, कॉन्ग्रेस सहित सभी अँधेरे में

चुनाव परिणाम आने के बाद लगभग सभी राजनैतिक दलों की स्थितियाँ साफ़ हो चुकी हैं। एक ओर जहाँ लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा ने प्रचंड बहुमत के साथ जीत दर्ज की है वहीं कुछ राजनैतिक पार्टियाँ ऐसी भी हैं जो खाता तक नहीं खोल पाईं। बिहार में तेजस्वी यादव की नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनता दल का कुछ यही हाल हुआ है। 17वें लोकसभा चुनाव में आरजेडी के हिस्से में एक भी सीट नहीं आई।

बिहार में आरजेडी कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन करके मैदान में उतरी थी। पार्टी ने 20 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन एक भी सीट पर जीत नहीं दर्ज कर पाई जबकि कॉन्ग्रेस 9 सीटों पर मैदान में उतरी थी और पार्टी को बिहार में 1 सीट मिली।

आरजेडी का गठन 1997 में हुआ था। पार्टी ने पहला चुनाव 1998 में लड़ा था तब बिहार में उन्हें 17 सीट मिली थी। इसके बाद 2014 में पार्टी को बिहार में 27 सीटें मिलीं लेकिन 2019 में आरजेडी शून्य पर ही सिमटी रह गई। कॉन्ग्रेस और आरेजेडी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने वाली राष्ट्रीय लोक समता दल और हिंदू आवाम मोर्चा भी अपना खाता नहीं खोल पाई।

वहीं दूसरी ओर भाजपा-जेडीयू-एलजीपी के गठबंधन ने बिहार में ऐतिहासिक जीत हासिल की। भाजपा को बिहार में 17 सीटें मिलीं, जेडीयू को 16 सीटें और राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति दल को 6 सीटें मिली हैं। इस गठबंधन ने बिहार में 37 सीटें जीती हैं।

हार का ठीकरा किसके सर फूटेगा यह पार्टी और मेरे बीच की बात है: राहुल गाँधी

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे सामने आने शुरू हुए तो कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की पुश्तैनी सीट अमेठी भी हाथ से निकल गई, जो हमेशा से कॉन्ग्रेस का गढ़ रही है। भाजपा की फायरब्रांड नेता और स्टार प्रचारक स्मृति ईरानी ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को यहाँ से हरा दिया। राहुल गाँधी की इस अप्रत्याशित हार से कॉन्ग्रेस का विश्वास डगमगा गया है। खबर के अनुसार, हार के बाद राहुल गाँधी ने पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने का भी प्रस्ताव रखा। हालाँकि पार्टी प्रवक्ता सुरजेवाला ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के इस्तीफे की बात को गलत बताया। वहीं जब राहुल गाँधी से हार की जिम्मेदारी को लेकर पूछा गया तो उन्होंने कहा ये उनके और कॉन्ग्रेस वर्किंग कमिटी के बीच की बात है।

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, राजधानी दिल्ली में शनिवार (मई 25, 2019) को कॉन्ग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक होगी। जिसमें पार्टी की हार की वजहों पर चर्चा करने करने के साथ ही कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर किसी बड़े फैसले की भी उम्मीद की जा रही है।

हालाँकि मतगणना अभी जारी है, लेकिन अभी तक की गिनती के अनुसार एनडीए को 303 सीटें मिलती दिख रही हैं। भाजपा ने 298 सीटों पर जीत हासिल कर ली है। फिलहाल भाजपा 4 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। वहीं कॉन्ग्रेस 52 सीटों पर ही सिमट गई है। पार्टी की हार स्वीकार करते हुए राहुल गाँधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके पीएम मोदी को बधाई दी। इसके साथ ही उन्होंने अमेठी से स्मृति ईरानी की जीत पर भी बधाई देते हुए अमेठी की जनता का भरोसा कायम रखने की बात कही।