दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने शुक्रवार (मई 17, 2019) को दिल्ली में 12 मई को हुए मतदान को लेकर एक बड़ा बयान दिया था कि चुनाव से 48 घंटे पहले तक उन्हें ऐसा लग रहा था कि सातों सीटें आम आदमी पार्टी को जाएँगी, मगर आखिरी वक्त पर पूरे मुस्लिम वोट कॉन्ग्रेस को शिफ्ट हो गए। केजरीवाल के इस बयान पर सियासी बवाल मच गया। कॉन्ग्रेस ने केजरीवाल के बयान को आड़े हाथों लिया।
कॉन्ग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष और मुस्लिम नेता हारुन यूसुफ ने इस बारे में कहा कि कॉन्ग्रेस को मुस्लिम वोट शिफ्ट हुआ, ये कहकर केजरीवाल अपना खौफ छुपाने की कोशिश कर रहे हैं। हालाँकि उनकी ये बात सही है कि मुस्लिम वोटर्स ने भारी तादाद में कॉन्ग्रेस को वोट किया, क्योंकि केजरीवाल ने सिवाय झूठ बोलने के और कोई काम ही नहीं किया। लोगों ने अपने अंदर का आक्रोश और गुस्सा वोटिंग के जरिए निकाला है, क्योंकि उनका काम सिर्फ सरकारी होर्डिंग्स पर ही हुआ है। केजरीवाल ने अपनी असफलताओं का सारा ठीकरा केंद्र पर फोड़ दिया। वहीं, कॉन्ग्रेस के दूसरे नंबर के कार्यकारी अध्यक्ष और दिल्ली के एक मात्र सुरक्षित सीट से नॉर्थ-वेस्ट दिल्ली से प्रत्याशी राजेश लिलोठिया ने कहा कि केजरीवाल से सिर्फ मुस्लिम ही नहीं, बल्कि दलित भी नाराज हैं।
Sheila Dikshit on Delhi CM’s reported remark ‘Muslim votes shifted to Congress in Delhi at last moment’: Don’t know what is he trying to say. Everyone has a right to vote whichever party he/she wants to vote. People of Delhi did not understand nor liked his governance model pic.twitter.com/SNDuOpr2s0
वहीं, केजरीवाल के बयान से भड़की शीला दीक्षित ने कहा है कि दिल्ली की जनता न तो इस सरकार के कामकाज को समझ पा रही है न ही केजवाल की बातों को। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता शीला दीक्षित ने नाराजगी जताते हुए कहा कि समझ में नहीं आता कि केजरीवाल ऐसा बोलकर कहना क्या चाह रहे हैं? उन्होंने कहा कि यह जनता का अधिकार है कि वह किस पार्टी या व्यक्ति को वोट देना चाहती है। आज तक दिल्ली के लोग न तो केजरीवाल को समझ सकी है नही इनके कामकाज को पसंद करती है।
इस मामले पर बात करते हुए ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशवरात के अध्यक्ष नवेद हामिद ने कहा कि यह कहना गलत है कि पूरा मुस्लिम वोट एकतरफा कॉन्ग्रेस को पड़ा है। इतना जरूर कहा जा सकता है कि कॉन्ग्रेस और आप को तकरीबन 70:30 के अनुपात में वोट गया है। इसके पीछे की वजह बताते हुए वो कहते हैं कि यह चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़ा गया था और मुस्लिम वोटर को कॉन्ग्रेस में ज्यादा मजबूती नज़र आई।
इसके साथ ही उन्होंने केजरीवाल की पार्टी में अल्पसंख्यकों को सही रिप्रेजेंटेशन न देने की बात की और साथ ही सवाल भी किया कि उनकी पार्टी की तरफ से किसी अल्पसंख्यक को दिल्ली की किसी सीट से टिकट क्यों नहीं दिया गया? नवेद हामिद ने कहा कि अल्पसंख्यकों ने किसी के कहने से वोट नहीं दिया, बल्कि उसे यह दिखा कि यह लड़ाई नैशनल लेवल पर कॉन्ग्रेस और भाजपा के बीच है, इसलिए सोच समझकर वोट दिया।
लोकसभा चुनाव के बीच मध्य प्रदेश के भोपाल सीट से भाजपा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर द्वारा नाथूराम गोडसे को लेकर दिए गए विवादित बयान पर राजनीतिक और मीडिया में चर्चा का बाजार गर्म है। हालाँकि, साध्वी प्रज्ञा ने माफी माँग ली है, लेकिन टीवी चैनल्स में चर्चा और बहस लगातार जारी है।
पत्रकार से आम आदमी पार्टी नेता और फिर वापस पत्रकार बने आशुतोष का सामना इस बार इतिहासकार से हुआ तो उन्होंने आशुतोष को याद दिला दिया कि उनकी वास्तविक मुद्दों पर पकड़ गूगल की सहायता के बिना शून्य है। साथ ही, यह सलाह भी दी कि उन्हें गूगल से नहीं बल्कि इतिहास पढ़कर ज्ञान बढ़ाना चाहिए।
TV 9 चैनल पर डिबेट के दौरान इतिहासकार प्रो. कपिल कुमार ने वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष को सबक सिखाया और उनकी बोलती बंद कर दी। अक्सर नाराज नजर आने वाले पत्रकार आशुतोष को नसीहत देते हुए उन्होंने कहा कि पहले इतिहास पढ़कर आया कीजिए और तभी बहस किया करें।
टीवी पर बहस के दौरान एंकर ने कहा, “क्या देश निर्माण में गोडसे ने इतना बड़ा योगदान दिया? हिंदू राष्ट्र अखबार निकालना या गाँधी अनशन पर थे, पाकिस्तान को ₹55 करोड़ दिया जाना था, उससे नाराजगी, और उसके बाद इस हद तक की गाँधी को मारे बिना कुछ नहीं हो सकता, किताबों में इतिहास में दर्ज है।”
इस पर पत्रकार आशुतोष ने कहा, “क्या अमेरिका के अंदर कैनेडी के हत्यारे की चर्चा होती है? ये जो गोडसे के बारे में बार-बार महिमामंडन करने की कोशिश की जाती है और गाँधी जी की हत्या को जायज ठहराने की कोशिश की जाती है, इसको ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में देखना पड़ेगा। क्या ये तथ्य नहीं है कि जब 11 सितंबर 1948 को जब सरदार पटेल ने गोलवलकर को चिट्ठी लिख कहा था ‘जिस तरीके से आप जहर भरे भाषण देते हैं और उससे जो माहौल बनता है, उस माहौल ने गाँधी जी की हत्या की।’ क्या उन्होंने चिट्ठी में ये नहीं लिखा था कि आरएसएस के लोगों ने मिठाईयाँ बाँटी थी और खुशियाँ मनाई थी?”
आशुतोष ने अपने परिचित नकलची अंदाज में आगे कहा, “क्या ये सच्चाई नहीं है कि गाँधी जी की हत्या के समय सरदार पटेल देश के उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री थे, और उनके रहते गुरु गोलवलकर को गिरफ्तार किया गया था। गोलवलकर 6 महीने जेल में थे और उसके बाद फिर से वे जेल के अंदर जाते हैं। क्या ये सच्चाई नहीं है कि सावरकर टेक्निकल ग्राउंड पर छूटे थे? जीवन लाल कमेटी ने यह माना था कि आरएसएस का इस हत्या में कोई हाथ नहीं है। हालाँकि, उन्होंने ये कहा था कि इस हत्या में सावरकर का हाथ था। इस समय तक सावरकर की मौत हो चुकी थी।”
आशुतोष को जज्बातों में बहता देखरक एंकर ने कहा, “मैं उस सोच की बात कर रहा, जो कत्ल करती है। चाहे वह सोच राजस्थान के शंभू रैगर की हो या दिल्ली में सिखों की हत्या की हो।” इस पर आशुतोष ने कहा, “जिनकी वो सोच है, वो श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1942 में चिट्ठी लिखते हैं, भारत छोड़ो आंदोलन को कुचल दिया जाए।”
हमें गूगल का इतिहास न पढ़ाएँ
इस पर इतिहासकार कपिल कुमार ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा, “इनको (आशुतोष) ये बता दीजिए कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी नहीं होते तो आज का बंगाल नहीं होता। जिन्ना ने जब कलकत्ता माँगा तो कॉन्ग्रेसियों ने क्या किया? पूरा इतिहास पढ़ कर आया कीजिए और तब डिबेट कीजिए। आप हमें गूगल का इतिहास न पढ़ाएँ।”
नेटफ्लिक्स, एक अमेरिकन ऑनलाइन मीडिया स्ट्रीमिंग कंपनी, ने एक शो का ट्रेलर रिलीज़ किया है। शो ‘लैला’ 14 जून से आने वाला है। इस शो में एक ऐसे काल्पनिक फ्यूचर की कल्पना की गई है जहाँ ‘हिन्दू राष्ट्रवादियों’ का राज्य की मशीनरी पर कब्ज़ा हो जाता है।
जो ट्रेलर अभी रिलीज़ किया गया है, उसमे एक हिन्दू महिला मुस्लिम पुरुष से शादी करती है, उससे पैदा हुई लड़की का नाम ‘लैला’ है। बेटी, हिन्दू राष्ट्रवादियों द्वारा उससे दूर कर दी जाती है क्योंकि मुस्लिम पिता होने के कारण वह ‘शुद्ध’ नहीं है। तब मुख्य किरदार का आगमन होता है जो उसे राज्य द्वारा संचालित एक शिक्षा केंद्र में भेज देता है जहाँ लोगों का ब्रेन वाश किया जा रहा है।
पूरे ट्रेलर में हिन्दू प्रतीकों का नकारात्मक तरीके से खूब इस्तेमाल हुआ है। ‘जय आर्यावर्त’ उस काल्पनिक अराजक राज्य का नारा है। जहाँ पर लोगों के साथ धर्म के नाम भेदभाव हो रहा है। जिसे राज्य का संरक्षण प्राप्त है। यहाँ तक इस कहानी का खलनायक भी हिन्दू प्रतीकों से लदा है।
ट्रेलर देखकर ये साफ पता चल रहा है कि पूरे शो में एंटी हिन्दू प्रोपेगेंडा की भरमार है। सब कुछ बड़ी चालाकी से वर्तमान सरकार को ध्यान में रखकर, लोगों को एक काल्पनिक माहौल से डराने के लिए इस तरह के शो बनाए जा रहे हैं। वैसे भी तथाकथित ‘लिबरल्स’ बहुत पहले से ही ‘मोदी फोबिया’ से ग्रसित हैं। और हर तरह से देश में एक नकारात्मक माहौल बनाने और दहशत फ़ैलाने में लगे हैं।
सोशल मीडिया पर नेटफ्लिक्स के इस प्रोग्राम के प्रति लोगों ने अपनी नाराजगी ज़ाहिर करनी शुरू कर दी है।
Yet another propaganda to portray “Hindu men as bad”, “Hindu men as evil”, “Hindutva as Terrorism”. I hope majority realize this self hate campaign Left is seeding in them. https://t.co/Ly7LY3Sus0
This is a deliberate attempt by @NetflixIndia to brainwash the young Hindus against Hindu revivalism. People who would lose their lives just for painting ‘their’ prophet are insulting Hinduism everyday. Stop Hinduphobia!#BoycottNetflixhttps://t.co/5yC9HFArdt
It hurts to see so many “educated” people enjoying the release of yet another hinduphobic show while it’s these “secularists” who will protest of the story of those Pakistani hindu girls is made into a movie. https://t.co/Z3pBy3tSn1
हालाँकि, यह पहली बार नहीं है, जब नेटफ्लिक्स ने हिन्दू भावनाओं से खिलवाड़ किया है। उनकी छवि को नकारात्मक तरीके से पेश किया गया हो। नेटफिक्स की लगातार प्रवित्ति रही है, एंटी हिन्दू नैरेटिव को स्थापित करने की। ‘Ghoul’ और ‘Sacred Games’ के बाद ‘लैला’ के रूप में यह तीसरा प्रयास है। इसका निर्देशन दीपा मेहता, शंकर रमन और पवन कुमार ने किया है। शो प्रयाग अकबर के नॉवेल पर आधारित है। स्क्रीनप्ले लिखा है उर्मि जुवेकर ने और मुख्य किरदारों के रूप में हैं हुमा कुरैशी, सिद्धार्थ, राहुल खन्ना, संजय सूरी और आरिफ ज़कारिया।
राजस्थान का अलवर इन दिनों आपराधिक घटनाओं के चलते सुर्खियों में है। अभी कुछ दिन पहले दलित महिला से गैंगरेप का विवाद थमा नहीं था कि फिर से एक नया मामला सामने आया है। इस बार गैंगरेप के आरोपित की पीट-पीटकर हत्या करने की बात सामने आई है। बताया जा रहा है कि अलवर में एक युवक की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई क्योंकि उसने अपने 2 दोस्तों के साथ मिलकर शादी से लौट रही एक बच्ची का रेप किया था। हत्या का आरोप पीड़िता के परिजन पर लगा है। फिलहाल पुलिस मामले की जाँच कर रही है।
बुधवार (मई 15, 2019) को पुलिस ने हरसौरा के जंगलों से एक लाश बरामद की। लाश बुरी तरह से क्षतिग्रस्त थी। युवक की पहचान होना मुश्किल हो पा रहा था। पुलिस ने एक स्थानीय अस्पताल में युवक की लाश रखवा दी। कुछ समय बाद जब एक परिवार अपने गुमशुदा बेटे की तलाश में अस्पताल पहुँचा तो उन्होंने शव की पहचान बेटे राहुल गुज्जर के रूप में की।
Alwar: A youth was beaten to death by relatives of a minor who alleged that the boy along with two of his friends had raped the girl on May 14. Police have detained 2 people. Further probe on. #Rajasthanpic.twitter.com/Mk0JAeM0Qb
हरसौरा पुलिस थाने में उसी दिन दो एफआईआर दर्ज हुईं। एक एफआईआर राहुल की हत्या की थी, जबकि दूसरी एफआईआर नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप की दर्ज हुई। इधर गैंगरेप की जाँच कर रही पुलिस ने दो आरोपित लड़कों को उठाया। युवकों से गैंगरेप मामले में पूछताछ की गई। पूछताछ में पता चला कि वे राहुल के दोस्त थे।
दोनों युवकों ने पूछताछ में गैंगरेप किए जाने की बात कुबूली है। बताया जा रहा है कि आरोपित युवक भी नाबालिग हैं, इसलिए उन्हें मेडिकल के लिए भेजा गया है। वहीं पीड़ित नाबालिग छात्रा के बयान दर्ज कर उसे भी मेडिकल जाँच के लिए भेजा गया है।
शादी से लौट रही थी नाबालिग बच्ची
पुलिस के अनुसार, बच्ची के परिजनों का आरोप है कि मंगलवार की रात को उनकी बेटी एक शादी समारोह से लौट रही थी। राहुल और उसके दोस्त भी उसी शादी में मेहमान बनकर आए थे। शादी में डिनर के बाद दोनों ने बच्ची का पीछा किया और मैरिज हॉल के पीछे सुनसान इलाके में उसे दबोच लिया।
इसके बाद तीनों आरोपितों ने बच्ची के साथ रेप किया। घर पहुँचने के बाद बच्ची ने परिजनों को घटना की जानकारी दी। परिजन तत्काल मौके पर पहुँचे और वहाँ बच्ची ने राहुल गुज्जर को पहचान लिया। परिजनों ने राहुल को पकड़कर पीटना शुरू कर दिया। वहीं, राहुल के दोस्त भागने में कामयाब रहे। पुलिस ने बताया कि बच्ची के परिजनों ने राहुल को तब तक पीटा जब तक उसकी मौत नहीं हो गई। राहुल के मरने के बाद गुस्साए लोगों ने उसका शव जंगल में ले जाकर फेंक दिया।
इसकी अगली सुबह युवक का शव बृहस्पतिवार को भूपखेड़ा के पास सड़क किनारे पड़ा मिला। लोगों की सूचना पर पुलिस ने मौके पर पहुँचकर शव को अपने कब्जे में लिया और बानसूर मोर्चरी में रखवाया। जहाँ आज उसका पोस्टमार्टम हुआ। फिलहाल, इस मामले में हत्या व रेप का मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने जाँच शुरू कर दी है। पुलिस ने फरार दोनों युवकों की पहचान कर ली है।
दक्षिण कश्मीर के पुलवामा में सेना ने शहीद राइफलमैन औरंगज़ेब की हत्या के जिम्मेदार शौकत अहमद डार समेत तीन हिज़्बुल दहशतगर्दों को मार गिराया है। डार और उसके साथियों ने पिछले साल कश्मीर में ही राइफलमैन औरंगज़ेब को अगवा कर उनकी नृशंसतापूर्वक हत्या कर दी थी। पिछले वर्ष हुई इस हत्या के अलावा भी डार कई और दहशतगर्दी के कारनामों की तैयारी और उन्हें अंजाम देने में शामिल रहा है। कश्मीर की पुलिस के मुताबिक उसके खिलाफ आतंकरोधी धाराओं के अंतर्गत कई केस दर्ज थे।
रात भर चली मुठभेड़, बारामूला में भी एक दहशतगर्द ढेर
सेना के द्वारा जारी बयान के मुताबिक पुलवामा के पंजगाम सेक्टर में रातभर चली मुठभेड़ के बाद तीनों आतंकियों को सेना ने शनिवार को मार गिराया। मारे गए दहशतगर्दों में से दो की शिनाख्त सोपोर, बारामूला में रहने वाले मुज़फ़्फ़र अहमद और इरफ़ान अहमद के रूप में हुई है। तीसरा शख्स वही शौकत अहमद डार निकला जिसने पिछले साल राइफलमैन औरंगज़ेब की हत्या कर दी थी। उस समय औरंगज़ेब ईद मनाने अपने परिवार के पास छुट्टी लेकर आ रहे थे।
44 राष्ट्रीय राइफल के जवान औरंगज़ेब को पिछले साल 14 जून को पुलवामा के ही कलमपोरा अगवा कर लिया गया था। बाद में उनकी गोलियों से छलनी लाश उसी जिले के गुलसू गाँव में मिली थी। औरंगज़ेब की हत्या इसलिए की गई थी क्योंकि उन्होंने पिछले साल 30 अप्रैल को हिज़्बुल कमांडर समीर टाइगर को मार गिराने वाले ऑपरेशन में हिस्सा लिया था। वह (टाइगर) बुरहान वानी के मारे जाने के बाद हिज़्बुल का अगला प्रपोगंडा का चेहरा था। इसके अलावा उसे एक बार पत्थरबाजी में भी गिरफ्तार किया गया था, लेकिन पाँच दिन में ही रिहा कर दिया गया।
इसके अलावा बारामूला के हथलंगू में भी सेना की सर्च पार्टी पर फायरिंग होने के बाद शुरू हुई मुठभेड़ में एक दहशतगर्द को मार गिराया गया। उसकी पहचान होनी अभी शेष है।
टेक्नोलॉजी के साथ सामाजिक ट्रेंड्स और व्यवस्थाएँ तेजी से बदल रही हैं और इसी का नतीजा है कि आए दिन हमें इसके नए-नए प्रभाव और स्वरूप हमें देखने को मिल रहे हैं। गुजरात के अहमदाबाद से ऑनलाइन गेम PUBG को लेकर एक हैरान कर देने वाली खबर सामने आई है। इस घटना में एक बच्चे की 19 वर्षीय माँ ने PUBG गेमिंग पार्टनर के लिए पति से तलाक लेने का निर्णय ले लिया है।
इस महिला ने तलाक के लिए वुमन हेल्पलाइन Abhayam-181 (अभयम-181) की सहायता माँगी है। बताया जा रहा कि भारत में PUBG गेम कई लोगों की मौत का कारण बन चुका है, लेकिन अब यह लोगों के घर तोड़ने का कारण भी बनता हुआ नजर आ रहा है।
PUBG के चक्कर में अपने मोबाइल से ही चिपकी रहती थी शिकायतकर्ता महिला
गुजरात में वुमन हेल्पलाइन अभयम-181 की एक अधिकारी ने बताया कि उनके पास मदद के लिए एक महिला की कॉल आई थी। कॉल (याचिका) के जवाब में ‘अभयम’ के एक परामर्श दल ने महिला के घर का दौरा किया और इस मुद्दे के बारे में परिवार से बात की। बात करने के बाद टीम को पता चला कि महिला PUBG खेलते हुए अपने मोबाइल फोन पर ज्यादा समय बिता रही थी, जिससे उसके और परिवार के बीच मतभेद पैदा हो गए। चौंकाने वाली बात यह है कि 19 वर्षीय महिला का तलाक की अर्जी देने के पीछे घरेलू विवाद नहीं है, बल्कि PUBG से उपजा विवाद है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अभयम-181 हेल्पलाइन के प्रोजेक्ट हेड नरेंद्र सिंह गोहिल ने बताया कि औसतन हेल्पलाइन को एक दिन में लगभग 550 कॉल आते हैं। उन्होंने कहा कि इस तरीके का यह पहला मामला था। गोहिल ने कहा कि आमतौर पर माताएँ PUBG के आदी बच्चों की शिकायत करने के लिए फोन करती हैं।
शिकायतकर्ता महिला से मुलाकात करने वाली ‘अभयम’ की काउंसलर सोनल सागरथिया ने उसे अपने फैसले पर फिर से विचार करने की सलाह दी है। इसके अलावा उसे अहमदाबाद में एक पुनर्वास केंद्र में रहने की बात भी कही गई थी। हालाँकि, उसने इसके लिए मना कर दिया, क्योंकि वहाँ उसे मोबाइल फोन के इस्तेमाल की इजाजत नहीं दी थी।
बता दें कि PUBG यानी ‘Player Unknows Bettlegrounds, दक्षिण कोरियाई मूल का एक ऑनलाइन गेम है। भारत में PUBG बैन करने से जुड़ी माँग पर कई शहरों में कानूनी कदम उठाए गए हैं। इस गेम को बैन करने के लिए सरकार कार्रवाई भी कर रही हैं।
भाजपा ने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर के खिलाफ पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है। भाजपा नेता अनूप सिंह चंदन ने ये शिकायत भाजपा नेताओं और कार्यकर्ता के खिलाफ अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करने के लिए हसरतगंज कोतवाली पुलिस स्टेशन में दर्ज करवाई है। ओमप्रकाश राजभर ने कल (मई 17, 2019) प्रचार के दौरान गाजीपुर में मंच से भाजपा के नेताओं को गाली देने के साथ ही उनको दस-दस जूता मारने को कहा। राजभर का ये वीडियो वायरल हो रहा है। ओमप्रकाश राजभर का आरोप है कि बीजेपी नेता यह कहकर प्रचार कर रहे हैं कि एसबीएसपी और बीजेपी का गठबंधन है और राजभर की पार्टी का प्रत्याशी चुनाव नहीं लड़ रहा है।
BJP worker Anoop Singh Chandan has registered a complaint with the police against Suheldev Bhartiya Samaj Party Chief OP Rajbhar (in file pic) for allegedly abusing BJP workers at a public meeting yesterday, in Ghazipur. pic.twitter.com/xsA7YhIr7Z
गौरतलब है कि, हाल ही में राजभर ने उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसे अभी तक स्वीकार नहीं किया गया है। उनकी पार्टी ने भी प्रदेश में भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ लिया है। ओमप्रकाश राजभर का कहना है कि भाजपा अपने वायदे पर खरी नहीं उतर सकी। उन्होंने कहा कि भाजपा ने हमें अलग से चुनाव लड़ने के लिए मजबूर किया। सत्ता में रहकर उन्होंने गरीबों के लिए जमकर लड़ाई लड़ी, उपेक्षित जातियों के लिए आरक्षण की माँग की, लेकिन कोई हल नहीं निकला।
फेसबुक पर लोगों ने शेयर किया वीडियो जिसमें वो गाली दे रहे हैं
इसके साथ ही राजभर ने लोकसभा चुनाव में सीट बँटवारे की बात करते हुए कहा कि भाजपा ने अपने चुनाव चिह्न पर एक सीट से चुनाव लड़ने की पेशकश की, लेकिन उन्होंने सुभासपा के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ने की शर्त रखी। जिसके लिए सीएम योगी तैयार नहीं हुए। जिसके बाद ओमप्रकाश ने भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ने का फैसला किया।
कमल हासन ने अपने हालिया बयान में कहा है कि हिन्दू शब्द मुगलों की देन है, और यह ‘बेवकूफ़ी’ होगी कि विदेशियों की दी हुई इस पहचान से हम ‘चिपके’ रहें। उन्होंने अलवर और नयनर परम्परा के संतों को क्रमशः (केवल) वैष्णव और शैव बताते हुए दावा किया कि इन संतों ने हिन्दू शब्द का प्रयोग अपनी पहचान में नहीं किया (अतः ‘हिन्दू’ पहचान अवैध है)।
“जब हमारी अलग-अलग पहचानें हैं तो यह विदेशियों द्वारा दी गई मज़हबी पहचान ओढ़े रहना बेवकूफ़ी होगी।” ऊपरी तौर पर राष्ट्रवादी या सांस्कृतिक रूप से स्वदेशीवादी लगने वाला यह बयान असल में हिन्दुओं में आई हालिया राजनीतिक एकता को तोड़ कर दोबारा अलग-अलग जातियों, सम्प्रदायों, क्षेत्रवाद आदि में बाँट देने का कुत्सित प्रयास भर है।
मुगलों से सैकड़ों साल पुराना है ‘हिन्दू’ शब्द का उद्गम
सबसे पहले तो पहचान, धर्म, संस्कृति आदि को भूल कर केवल शब्द की उत्पत्ति की बात करते हैं। हिन्दू शब्द ‘सिंधु’ के फ़ारसी अपभ्रंश से बना है। इसका सबसे पहले इस्तेमाल मुगलों ही नहीं, इस्लाम से भी एक सहस्राब्दी (1000 वर्ष) से भी पहले का है। फारसी साम्राज्य के राजा डैरियस-प्रथम के अभिलेखों में हिन्दू शब्द का ज़िक्र ईसा से 6 शताब्दी पूर्व का है, जबकि इस्लाम ईसा से 600 साल बाद का। और मुगलों का हिंदुस्तान में आगमन तो 16वीं शताब्दी, यानि इस्लाम के अविष्कार के भी 1000 साल बाद हुआ। यानि विशुद्ध तकनीकी रूप से भी कमल हासन 22 शताब्दियों की ‘मामूली’ सी चूक कर गए हैं।
अलवर और नयनर हिन्दू ही थे, विष्णु और शिव हिन्दुओं के ही देवता हैं
यह सच है कि हमारे प्राचीनतम धार्मिक शास्त्रों में हिन्दू शब्द नहीं है, और अलवर-नयनर संत खुद को वैष्णव-शैव ही कहते थे। पर इससे किसी भी तरह से हिन्दू शब्द या पहचान की वैधता कम नहीं हो जाती, जो कि कमल हासन जताना चाहते हैं। यह उसी सनातन धर्म के विभिन्न पंथ हैं जिसे आज हिंदुत्व (या अंग्रेजों का दिया, राजनीतिक प्रत्यय वाला, ‘हिन्दूइज़्म’) कहा जाता है। इसके किसी भी पंथ के अनुयायी को उस पंथ को मानने वाला हिन्दू (जैसे शैव हिन्दू, शाक्त हिन्दू, और यहाँ तक कि नास्तिक/अनीश्वरवादी हिन्दू) ही कहा जाएगा।
अलवर-नयनर संतों ने हिन्दू शब्द का इस्तेमाल इसलिए नहीं किया क्योंकि उनके समय में (अलवर 500 से 1000 ईस्वी के थे, नयनर 6ठी से 8वीं शताब्दी ईस्वी के) इस्लामी आक्रांता हिन्दुओं के लिए गंभीर खतरा नहीं बने थे, उनसे उस समय हमारे धर्म-संस्कृति को इतना बड़ा खतरा महसूस नहीं हुआ था, अतः उनकी आस्था और अपनी आस्था में अंतरों को स्पष्टतः रेखांकित करने के लिए एक अलग छत्र-शब्द (umbrella-term) की आवश्यकता महसूस नहीं हुई थी, जो इस देश में पैदा हुई उपासना पद्धतियों को एकत्रित करते हुए बाहर से आ रही और हमसे बेमेल मूल्यों पर आधारित आस्थाओं के अंतर को एक शब्द-भर में रेखांकित कर सके।
कमल हासन का यह कथन हिंदुत्व को अब्राहमी (इस्लामी-ईसाई) लेंस से देखने, उनके मापदण्डों पर मापने का परिणाम है। इस्लाम और ईसाईयत की आपसी और बाकी सबसे लड़ाई ही इस बात की है कि ‘मेरा ईश्वर को लेकर विचार, मेरी पवित्र किताब ही सही हैं, मेरा पैगंबर ही अंतिम और अकाट्य है, बाकी सब गलत ही नहीं, बुरा भी है’। ज़ाहिर बात है कि इस चश्मे से देखने पर पर अलवर-नयनर क्या, हर गाँव अपना अलग ग्राम देवता, ग्राम देवी होने के नाते एक अलग पंथ, एक अलग मज़हब दिखेगा। और अंदर देखें तो पितृ-पक्ष में अलग-अलग पूर्वजों के हेतु खाना खिलाने से हर घर एक अलग अल्पसंख्यक पंथ लगेगा।
इसी अब्राहमी चश्मे से देखने पर आस्था-आधारित पहचान संकुचन लगती है कमल हासन को जब वह कहते हैं, “वाणिज्यिक राजनीति और आध्यात्म ने हमारी महान संस्कृति को महज़ एक मज़हब तकसंकुचित कर दिया है।” यह फिर से इस्लाम और ईसाईयत की चारित्रिक विशेषताएँ हिन्दू आस्था पर थोपने का प्रयास है। संकुचित विश्वदृष्टि ईसाई और इस्लामी पंथ की है (जो ‘मेरा पैगंबर/ईसा सही, बाकी गलत’ पर आधारित और संचालित हैं), हिन्दुओं की नहीं। हिन्दू दर्शन सबको अपने हिसाब से चलने की पूर्ण स्वतंत्रता देता है, और यह स्वतंत्रता हमारी आस्था से ही आती है।
पहचान की राजनीति है यह वक्तव्य
यह वक्तव्य, जैसा कि मैंने ऊपर भी लिखा है, राष्ट्रवादी/स्वदेशीवादी लगता हुआ विभाजनकारी बयान है। यह बिना कुछ बोले उत्तर-बनाम-दक्षिण, पेरियारवादी और फर्जी आर्य बनाम द्रविड़, हिंदी बनाम अहिंदी विभाजन को बढ़ावा देने के लिए है। यह केवल इस नीयत से दिया गया बयान है कि हिन्दू जब खुद को एक हिन्दू समुदाय का न मानकर इष्ट देवता, क्षेत्र, भाषा आदि के आधार पर अलग-अलग मानेंगे तो उनके वोटों की फ़सल काटना आसान होगा। न केवल वोटों की राजनीति बल्कि चर्चों का आस्था-परिवर्तन का धंधा भी इसी कथानक (narrative) पर चलता है।
ईसाई और पेरियारवादी है कमल हासन की पृष्ठभूमि
कमल हासन की पृष्ठभूमि को देखें तो यह और भी साफ़ हो जाता है कि उनकी इस बयान के पीछे नीयत क्या है। करण थापर को दिए एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने साफ़-साफ़ बोलै है कि बचपन में वह क्रिश्चियन आर्ट्स एन्ड कम्यूनिकेशन सेंटर में काम करते थे (देखें 9:22 से 9:30 तक)।
देखें 9:22 से 9:30 तक
उनकी राजनीति को देखते हुए यह साफ हो जाता है कि उन्होंने वहाँ महज पैसों के लिए नौकरी नहीं की थी, शायद वहीं से उनकी हिन्दुओं की आस्था के लिए घृणा नींव भी रखी गई थी। इसके अलावा वह घोषित तौर पर पेरियार के प्रशंसक खुद को बता चुके हैं। उन्होंने पिछले ही साल घोषित किया था कि उनकी अपनी पहचान (भारतीय की नहीं) द्रविड़ की है।
अतः ऐतिहासिक से लेकर संदर्भित रूप से, किसी भी दृष्टि से ढूँढ़कर कमल हासन के इस वाहियात बयान में कुछ भी सकारात्मक नहीं निकाला जा सकता।
आज बुद्ध पूर्णिमा है, आज ही के दिन गौतम को बोधि वृक्ष के नीचे ‘ज्ञान’ अर्थात ‘परम बोध’ की प्राप्ति हुई थी। गौतम बुद्ध के जन्म, परम बोध और निर्वाण की तिथि एक ही थी, ऐसी मान्यता है। देखा जाए तो यह एक दुर्लभ संयोग भी है, पर जिसके साथ घटित हुआ वह कहाँ साधारण था। वह इंसान जो अध्यात्म के मार्ग पर है उसके लिए बुद्ध पूर्णिमा एक बड़ा अवसर है। सूर्य का चक्कर लगाती पृथ्वी जब सूर्य के उत्तरी भाग में चली जाती है तो उसके बाद की यह तीसरी पूर्णिमा होती है। चूँकि, आज ही के दिन उनके साथ दिव्यता घटित हुई थी, इसलिए ऐसे महान व्यक्तित्व गौतम बुद्ध की याद में इस तिथि का नाम उनके नाम पर ‘बुद्ध पूर्णिमा’ रखा गया है।
गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई. पूर्व में शाक्य गणराज्य की तत्कालीन राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी, नेपाल में हुआ था। लगभग आज से ढाई हजार साल से भी पहले की बात है, आधी रात में गौतम ने घर छोड़ दिया। राजमहल के राग-रंग, आमोद-प्रमोद, मनोरंजन से वे ऊब गए, रूपवती पत्नी का प्रेम और नवजात शिशु का मोह भी उन्हें महल और भोग-विलास की सीमाओं में नहीं बाँध पाया। कहते हैं, पहले एक रोगी को देखा, जिससे उन्हें पीड़ा का अनुभव हुआ, उसके बाद एक वृद्ध को, जिससे सुन्दर शरीर के जीर्ण हो जाने का एहसास हुआ, पहली बार जरा का अनुभव हुआ और फिर एक मृत शरीर को, देखते ही जीवन की नश्वरता ने उन्हें विचलित कर दिया। मन में प्रश्नों का सैलाब उमड़ पड़ा।
कहते हैं, जैसे-जैसे ये प्रश्न गहराते गए, उनके अंतर की पीड़ा बढ़ती गई। मौजूदा भोग-विलास वाली परिस्थिति में बने रहना अब उनके लिए असंभव हो गया। एक तरफ, उन्हें जीवन बेहद मोहक, खूबसूरत और भव्य दिख रहा था, तो दूसरी तरफ सब कुछ कितना क्षणिक है, यह बोध उन्हें बेचैन कर रही थी। उनके मानस में यह कौंधा, अभी इस क्षण में जो भरापूरा है, श्रेष्ठ है, जीवंत लग रहा है, अगले ही क्षण में वह जर्जर, निर्बल और मृत हो सकता है। जीवन में जिसे हम सुख समझ कर जी रहे थे, कहीं कोई ठहराव नहीं, न ही इसका कोई ठौर-ठिकाना। गौतम का अब ऐसे जीवन में बने रहना अति दुष्कर हो गया। कहा तो यह भी जाता है कि जीवन के तीक्ष्ण सवालों से बेचैन, गौतम ने घर छोड़ा नहीं, बल्कि उनसे घर छूट गया।
घर छूटते ही गौतम की सघन खोज शुरू हो गई, उन्हें अपने मन को विचलित कर देने वाले सवालों के जवाब चाहिए थे। कहाँ जाना है, क्या करना है? कुछ भी नहीं पता था। महल छूट चुका था। अज्ञान की पीड़ा इतनी गहन थी कि वह हर ज्ञात-अज्ञात विधि और साधना पद्धति अपनाने को तैयार थे। कहा जाता है, करीब आठ साल की घनघोर साधना के बाद सिद्धार्थ गौतम बेहद कमजोर हो चुके थे।
इन आठ सालों में चार साल तक वह समाना (श्रमण) की स्थिति में रहें। समाना के लिए मुख्य साधना बस घूमना और उपवास रखना था, इसमें वे कभी भोजन की तलाश नहीं करते थे। इससे गौतम का शरीर इतना कमजोर हो गया कि वह मृत्यु के काफी करीब पहुँच गए। बाकी समय तक वह तमाम ज्ञात-अज्ञात साधना पद्धतियों से गुजरे अंततः जब वह निरंजना नदी के पास पहुँचे, जो प्राचीन भारत की कई अन्य नदियों की तरह सूख चुकी है और अब लगभग विलुप्त हो चुकी है। कहते हैं, उस वक्त यह नदी एक बड़ी जलधारा थी, जिसमें घुटनों तक पानी तेज गति से बह रहा था। सिद्धार्थ ने नदी पार करने की कोशिश की, लेकिन आधे रास्ते में ही उन्हें इतनी कमजोरी महसूस हुई कि उन्हें लगा कि अब एक कदम भी आगे बढ़ा पाना संभव नहीं है। लेकिन उन्होंने हार नहीं माना। उन्होंने वहाँ पड़ी पेड़ की एक शाखा को पकड़ लिया और बस ऐसे ही खड़े रहे।
कहा जाता है, इसी अवस्था में वो घंटों खड़े रहे, कब तक खड़े रहे इस पर मतभेद है। हो सकता है कि कुछ पल ही हों, कमजोरी की हालत में एक पल भी बहुत भारी होता है। अचानक से उन पलों में ही उन्हें एहसास हुआ कि जिस बोध की उन्हें तलाश है, वह तो उनके भीतर ही है। फिर इतना संघर्ष क्यों? ऐसी जागृति के लिए जो आवश्यक है वह है अपने भीतर पूर्ण रूप से राजी हो जाना, हर तरह के विरोध का मिट जाना, और ऐसा तो अभी और यहीं हो सकता है, फिर ये भटकाव क्यों, मैं बाहर क्या खोजता फिर रहा हूँ।
जब उन्हें इस बात का एहसास हुआ तो उन्हें थोड़ा सम्बल मिला, थोड़ी ताकत मिली और उन्होंने कदम-कदम बढ़ाते हुए नदी पार कर ली। इसके बाद वह पास के ही एक वृक्ष के नीचे बैठ गए जो अब बोधि वृक्ष के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि वहाँ वह इस चेतना के साथ बैठे कि जब तक मैं उस परम ज्ञान को, उस परम बोध को प्राप्त नहीं कर लूँगा, यहाँ से उठूँगा नहीं। या तो अब मैं यहाँ से एक प्रबुद्ध बन कर उठूँगा या फिर इस जर्जर शरीर को इसी अवस्था में त्याग दूँगा। उनका यह संकल्प इतना सघन था कि अगले ही पल उन्हें परम ज्ञान की प्राप्ति हो गई। शायद इसके लिए उस अवस्था में उन्हें इसी चीज की ज़रूरत थी।
तो वह दिव्य घटना बस एक पल में घटित हुई, जीवन की हर बड़ी घटना किसी न किसी क्षण में ही घटित होती है। जिस वक्त पूर्ण चन्द्रमा का उदय हो रहा था। उसी वक्त गौतम को परम ज्ञान की प्राप्ति हुई। कहा जाता है वह उसी स्थान पर आनंद मुद्रा में कुछ घंटों के लिए बैठे रहें फिर उठें और इस बोध से उपजे ज्ञान का प्रथम सन्देश देने के लिए अपने उन्ही साथियों की तलाश में निकल पड़े जो समाना (श्रमण) के रूप में उनकी साधना पद्धति से प्रभावित होकर उनके साथ थे। यह भी कहा जाता है, परम बोध घटित होने के बाद जो बात सबसे पहले उन्होंने कही वह थी ‘चलो भोजन करें’ यह सुनकर वह उनके पाँचों साथी जो कालांतर में उनके प्रथम पाँच शिष्य हुए, निराश हो गए, उन्हें लगा गौतम का पतन हो चुका है। इस पर बुद्ध ने कहा, “आप गलत समझ रहे हैं, उपवास रखना महत्वपूर्ण नहीं है, जीवन में महत्वपूर्ण है जानना और आत्मसाक्षात्कार, मेरे भीतर पूर्ण चन्द्रमा उदित है, मुझे देखो, मेरे अंदर आए रूपांतरण को देखो, बस यहीं रहो।” लेकिन वे रुके नहीं उन्हें भ्रष्ट मान चले गए, कालांतर में बुद्ध ने कई सालों बाद उन्हें एक-एक करके ढूँढ निकाला और वाराणसी के सारनाथ में उन्हें ज्ञान प्राप्ति का मार्ग बताया। यही उनके पहले शिष्य हुए जिनकी प्रतीक प्रतिमा आज भी सारनाथ में मौजूद है।
इस प्रकार गौतम परम बोध के घटित होते ही बन गए बुद्ध और जिस दिन यह घटना घटी वह कहलाया ‘बुद्ध पूर्णिमा’। यहाँ एक महत्वपूर्ण सन्देश छिपा है। जो भी चीज जीवन में आप चाहते हैं, वह आपकी पूरी सघनता के साथ प्राथमिकता बन जानी चाहिए। फिर उसे मूर्त रूप लेने से कोई भी नहीं रोक सकता। प्राचीन काल से लेकर आज तक आध्यात्मिक दुनियाँ में पूरी की पूरी साधना पद्धति बस इसी बोध तक पहुँचने की तैयारी होती है। चूँकि, लोग अपने ही बनाए जंजालों में इतने उलझे हैं कि खुद को समेट कर उस एकाग्रचित बिंदु तक पहुँचने में ही उन्हें काल-कालांतर का समय लग जाता है। इस बिखराव की सबसे बड़ी वजह है हमारा हर छोटी-बड़ी चीज से खुद को जोड़ लेना। इस लिए ऐसे अवसर हैं इस जागरण को जीवन का हिस्सा बना लेने की खुद के अनावश्यक बिखराव को रोकना है। हर जगह इन्वॉल्व होने से बचना है। खुद को समेट कर परम बोध की तरफ मोड़ देना है। तभी ऐसी परम सम्भावना घटित हो सकती है।
प्राचीन काल से ही तमाम महापुरुषों ने जिन्होंने सत्य का साक्षात्कार किया उनके लिए बुद्ध सदैव मार्गदर्शक रहे। एक प्रश्न के जबाब में सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने भी कहा, “गौतम मात्र खोज रहे थे, यह जाने बगैर कि क्या खोज रहे हैं, लेकिन खोज रहे थे। अपना राज्य, अपनी पत्नी और एक नवजात शिशु को छोडक़र एक चोर की भाँति रात में महल से भाग गए। शायद उनके परिवार ने उन्हें सबसे निष्ठुर आदमी के रूप में देखा होगा, लेकिन हम कितने खुश हैं कि अगर उन्होंने एक ऐसा कदम नहीं उठाया होता, तो यह संसार और भी गरीब होता और वे लोग जो उनके साथ रहते थे, कुछ ज्यादा बेहतर नहीं हो जाते। यह भी हो सकता था कि कुछ समय के बाद उन लोगों को कोई और दुख मिल जाता। कई भीषण परिस्थितियों से गुजरती और भयानक मोड़ लेती उनकी यह खोज एक दिन समाधान की दहलीज पर पहुँच गई।”
वैशाख पूर्णिमा की मध्य रात्रि में सिद्धार्थ गौतम, बुद्ध में रूपांतरित हो गए। वह अपनी परम चेतना में खिल उठे। अपने परम स्रोत से जुडक़र निहाल हो उठे। उनको एक ठौर मिला और वे अपने अंदर ठहर गए। उनके जीवन के सभी प्रश्न विलीन हो गए, समाधान दिन के सूरज की तरह दिखने लगा। कहते हैं, एक इंसान का अपनी परम चेतना में खिलना, उस इंसान के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण जगत के लिए बेहद मूल्यवान है। आज से ढाई हजार साल पहले जो रोशनी बुद्ध के अंदर फूटी, वो आज भी इस संसार को सही राह दिखाने के लिए पर्याप्त है।
यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते शायद आपको भी लग सकता है कि आपके ज़ेहन में भी अक्सर जीवन से जुड़े ऐसे ही सवाल आते हैं, हम भी तो जिंदगी, सुख-दुख के साथ जी रहे हैं और रोज ऐसे और इससे भी कहीं ज़्यादा भयानक दृश्यों को देखते हैं, फिर हमारे साथ ऐसा कुछ क्यों नहीं घटता। यहाँ एक चीज तो हमें माननी ही होगी कि सिद्धार्थ कोई साधारण इंसान नहीं रहे होंगे। वे चेतना, जागरूकता, बोध और बुद्धि के एक खास स्तर तक विकसित हो चुके होंगे। एक ऐसा इंसान जीवन के हर पहलू को बहुत गहराई से परखता है, उसका निरीक्षण करता है, उस पर चिंतन-मनन करता है; परिणामस्वरूप कई गहन और गंभीर सवाल खड़े हो जाते हैं, लेकिन वह सवालों पर ही नहीं रुक जाता। फिर उसके लिए समाधान की खोज पूरी निष्ठा और लगन के साथ करना स्वाभाविक हो उठता है।
गौतम बुद्ध के साथ जो घटित हुआ, वो इस संसार के हर इंसान के साथ घट सकता है। बस इसके लिए हमें अपने जीवन में गहराई लानी होगी। आज बुद्ध पूर्णिमा पर बुद्ध के मानवता को दिए गए महत्वपूर्ण योगदान के न सिर्फ स्मरण बल्कि उसे आत्मसात कर खुद भी उसी जागरण की दिशा में अग्रसर करने की चेतना जागृत करने का दिन है। बुद्ध ने मानवीय चेष्टा और खुद के खोज को एक नई दिशा जरूर दी। अगर जीवन में सच्ची चेष्टा और खोज हो तो हम सब अपनी साधारण जिंदगी को भव्य और विराट बना सकते हैं, यह है उनका बेबाक संदेश।
भारत की इसी पावन धरा से बुद्ध का शांति और उन्नति का सन्देश उनके अनुयायियों द्वारा पूरी दुनिया में प्रसारित किया गया। बुद्ध को एशिया का प्रकाश पुंज भी कहा जाता है। ज्ञान का यह प्रकाश भारत ही नहीं बल्कि चीन, जापान, कोरिया, थाईलैंड, कंबोडिया, श्रीलंका, नेपाल और भूटान जैसे कई देशों में फैला। जो चिर काल तक मानवता को आलोकित करता रहेगा।
बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के आवास की सुरक्षा में तैनात केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के एक जवान (कॉन्स्टेबल) ने शुक्रवार (मई 17, 2019) को खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। यह जवान कर्नाटक का रहने वाला था और कुछ ही दिनों पहले वो घर से छुट्टियाँ बिताकर लौटा था।
जानकारी के अनुसार, सीआरपीएफ के 224 बटालियन में तैनात गिरियप्पा किरासुर पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के पटना के सर्कुलर रोड स्थित सरकारी आवास की सुरक्षा में तैनात था। रात में उसने अपनी सरकारी राइफल से खुद को गोली मार ली, जिससे घटनास्थल पर ही उसकी मौत हो गई। हालाँकि, आत्महत्या का कारण अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है, लेकिन शुरुआती जाँच में पुलिस का मानना है कि, पारिवारिक विवाद की वजह से जवान ने आत्महत्या की है। सचिवालय के डीएसपी ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है।
खबर के मुताबिक, सीआरपीएफ जवान गिरियप्पा का पत्नी के साथ फोन पर विवाद हुआ था। जिसके बाद जवान ने ये कदम उठाया। फिलहाल, पुलिस की जाँच जारी है। जल्द की आत्महत्या की वजह सामने आने की उम्मीद है। गौरतलब है कि, लोकसभा चुनाव को लेकर राबड़ी देवी लगातार पूरे प्रदेश में चुनाव प्रचार कर रही है। बिहार में इस बार आरजेडी, कॉन्ग्रेस और आरएलएसपी समेत कई छोटे दल मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं।