देश में लोकसभा चुनाव 2019 का अंतिम चरण अभी बाकी है और EVM में गड़बड़ी को लेकर सवाल अभी से खड़े हो गए हैं। आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा और संजय सिंह EVM से छेड़छाड़ की शिकायत लेकर चुनाव आयोग की चौखट तक जा पहुँचे। उन्होंने मीडिया से मुख़ातिब होते हुए बताया कि उन्हें EVM से छेड़छाड़ किए जाने के अलावा चुनाव से संबंधित दस्तावेज़ों से भी छेड़छाड़ किए जाने का डर है।
दरअसल, आप नेताओं की यह चिंता चुनाव अधिकारी की एक डायरी को लेकर है जिसमें उन्होंने 12 मई को EVM का नंबर और वोट की संख्या दर्ज की थी। ख़बर के अनुसार, 4 दिन बाद ही कुछ अफ़सरों को दोबारा डायरी बनाने के लिए कहा गया। यही वो वजह है जिसकी शिकायत करने राघव चड्ढा और संजय सिंह चुनाव आयोग के दफ़्तर पहुँच गए। इतना ही नहीं राघव चड्ढा ने EVM से छेड़छाड़ के अलावा उस जगह की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई जहाँ यह EVM और पोस्टल बैलेट रखे जाते हैं।
राघव के अनुसार, EVM का फॉर्म भरने के बाद कोई बदलाव नहीं होता, लेकिन 3 विधानसभाओं में EVM के फॉर्म फिर से भरवाए गए। इसके पीछे की मंशा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि स्ट्रॉन्ग रूम में EVM बंद होने के बाद अगर किसी तरह की कोई कार्यवाही की जाती है तो उसकी सूचना सबसे पहले प्रत्याशियों को दी जाती है। एक के बाद एक कई सवाल करते हुए राघव चड्ढा ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े कर दिए।
इस पर यदि उनसे पूछे जाए कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर उन्होंने तब सवाल क्यों नहीं खड़े किए थे, जब दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने सर्वाधिक सीटें जीत कर दिल्ली में सरकार बनाई थी? अगर तब EVM में कोई गड़बड़ी नहीं थी और न ही उसकी सुरक्षा को लेकर मन में कोई सवाल था, तो अब क्यों?
राघव चड्ढा ने पूछा कि दक्षिणी दिल्ली लोकसभा की रिटर्निंग ऑफिसर और अन्य अधिकारी उस कमरे को क्यों खोलते हैं जहाँ पोस्टल बैलेट रखा रहता है? 13 तारीख़ को स्टॉन्ग रूम सुबह 11 बजे बंद किया गया, आख़िर 6-7 घंटे EVM कहाँ रही। वहीं, आप नेता संजय सिंह ने भी चुनाव आयोग पर आरोप लगाया और पूछा कि EVM के साथ जो हो रहा है इस पर आयोग क्या कर रहा है? उन्होंने भी राघव चड्ढा की बातों का समर्थन करते हुए चुनाव आयोग को ही कटघरे में रखा।
इससे पहले केजरीवाल का बयान आया था कि चुनाव के 48 घंटे पहले तक उन्हें ऐसा लग रहा था कि सातों सीटें आम आदमी पार्टी को जाएँगी, मगर आखिरी वक्त पर पूरे मजहबी वोट कॉन्ग्रेस की तरफ शिफ्ट हो गए।
आत्ममुग्ध बौने के नाम से विख्यात दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण से ठीक एक दिन पहले बेहद भावुक होकर दावा किया है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की तरह ही एक दिन उनकी भी हत्या करवा दी जाएगी। अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि भारतीय जनता पार्टी उनकी जान के पीछे पड़ी है और उनका मर्डर किया जा सकता है।
दिल्ली के बाद अब अरविन्द केजरीवाल की पैनी निगाहें पंजाब में लोकसभा चुनाव पर हैं और वहाँ के लिए प्रचार कर रहे है। इसी दौरान अरविंद केजरीवाल ने एक मीडिया संस्थान से बात करते हुए बेहद मार्मिक बातें सामने रखी हैं। आम आदमी पार्टी ने अरविन्द केजरीवाल की इस पूरी भावुक बातचीत का पूरा वीडियो अपने ट्विटर एकाउंट पर जारी किया है।
अरविंद केजरीवाल ने कहा कि बतौर मुख्यमंत्री, उनके ऊपर 5 बार हमले हो चुके हैं और ऐसा 70 साल में नहीं हुआ है कि किसी राज्य के मुख्यमंत्री पर 5-5 बार हमले हुए हों।
‘मेरा कसूर क्या है’
अरविंद केजरीवाल ने सवाल उठाया कि आखिर ये हमले क्यों हो रहे हैं? इस सवाल का जवाब भी उन्होंने खुद दिया, “ये हमले क्यों हो रहे हैं, मेरा कसूर क्या है…मैंने क्या गलत कर दिया है, मेरे को कोई क्यों मारेगा?”
अरविन्द केजरीवाल ने बीजेपी का नाम लेते हुए कहा कि राजनीतिक दल उन पर हमला करवा रहे हैं। उन्होंने बेहद मार्मिक तरीके से कहा, “मैं तो लोगों के बच्चे को पढ़ा रहा हूँ, स्कूल भेज रहा हूँ, इलाज करवा रहा हूँ, मैं धर्म और पुण्य के काम कर रहा हूँ, निश्चित रूप से ये पार्टियाँ हमले करवा रही हैं। पहले तो उन्होंने पैटर्न बनवा दिया है, एक के बाद एक छोटे-छोटे हमले करवा रहे हैं, मुझे पूरा यकीन है ये बीजेपी वाले एक दिन खत्म करवा देंगे… मेरा मर्डर करवा देंगे।”
बता दें कि हाल ही में दिल्ली में चुनाव प्रचार के दौरान केजरीवाल को एक शख्स ने थप्पड़ रसीद कर दिया था। सीएम ने कहा कि ऐसा करके बीजेपी वाले कहेंगे कि आम आदमी पार्टी का ही कार्यकर्ता था और केजरीवाल से नाराज था। अरविन्द केजरीवाल ने कुछ सवाल उठाये और पूछा कि क्या इस तर्क के आधार पर AAP का कोई कार्यकर्ता केजरीवाल से नाराज है, तो उसे मार सकता है? कॉन्ग्रेस का कोई कार्यकर्ता कैप्टन साहब से नाराज है तो मार सकता है? बीजेपी का कोई कार्यकर्ता मोदी जी से नाराज है तो मार सकता है?
‘ये जितने आगे पीछे घूम रहे हैं, सारे बीजेपी की सरकारों को रिपोर्ट करते हैं’
इसके आगे केजरीवाल ने आगे कहा, “एक दिन मर्डर कर देंगे, कहेंगे केजरीवाल का कोई कार्यकर्ता था, नाराज था मर्डर कर दिया। आज अकेला मुख्यमंत्री हूँ, मेरी सिक्युरिटी मेरे कब्जे में नहीं है। ये जितने आगे पीछे घूम रहे हैं, सारे बीजेपी की सरकारों को रिपोर्ट करते हैं। मेरा पीएसओ भाजपा को रिपोर्ट करता है। कहीं इंदिरा गाँधी की तरह भाजपा वाले मेरे पीएसओ से खत्म करवा देंगे मेरे को…मेरी लाइफ दो मिनट के अंदर खत्म हो सकती है।”
केजरीवाल लोगों को गुमराह करते हैं- कॉन्ग्रेस
केजरीवाल के इस बयान पर कॉन्ग्रेस ने प्रतिक्रिया दी है। दिल्ली कॉन्ग्रेस के नेता जितेंद्र कोचर ने कहा कि केजरीवाल को पता है कि दिल्ली में उनका धरातल खत्म हो गया है, जमीन खिसक गई है और पंजाब में वोट बैंक की सहानुभूति पाने के लिए वह ऐसी बयानबाजी कर रहे हैं। साथ ही, उन्होंने कहा कि दिल्ली और पंजाब के लोग केजरीवाल की बातों में आने वाले नहीं हैं, केजरीवाल लोगों की भावनाओं से खेलते हैं, उन्हें गुमराह करते हैं, उनकी पार्टी खत्म होने की कगार पर है और वेंटिलेटर पर चली गई है।
अमेरिका से छपने वाली टाइम मैगजीन की कवर स्टोरी में आतिश तासीर द्वारा पीएम मोदी को ‘डिवाइडर इन चीफ’ लिखे जाने पर पीएम मोदी ने खुद शुक्रवार (मई 17, 2019) को इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “टाइम मैगजीन विदेशी है, लेखक खुद कह चुका है कि वह पाकिस्तान के एक राजनीतिक परिवार से आता है। यह उसकी विश्वसनीयता बताने के लिए काफी है।”
PM Modi Responds To TIME Magazine Cover Calling Him “Divider-In-Chief” https://t.co/4Qilbwb0s9
गौरतलब है कि, टाइम मैगजीन के 20 मई के संस्करण में कवर स्टोरी छपी थी जो आतिश तासीर ने लिखी थी। पीएम मोदी की तस्वीर पर डिवाइडर इन चीफ के शीर्षक के साथ ही एक विवादास्पद सवाल करते हुए लिखा था- क्या विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र फिर से मोदी को 5 साल का मौका देने को तैयार है? आतिश तासीर द्वारा लिखे गए इस लेख पर काफी विवाद हुआ और विपक्ष को तो पीएम मोदी पर हमला बोलने का मौका मिल गया था।
इस लेख में कहा गया था कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र पहले से काफी बँट गया है। इसमें आतिश ने मॉब लिंचिंग, योगी आदित्यनाथ को यूपी का सीएम बनाना और मालेगाँव ब्लास्ट केस में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की भूमिका का जिक्र किया था। इसके साथ ही नरेंद्र मोदी पर वादे पूरे न करने का आरोप लगाया और अविश्वास जताते हुए लिखा कि अब ये विश्वास करना मुश्किल लगता है कि वह उम्मीदों का चुनाव था। आतिश ने पीएम मोदी पर धार्मिक राष्ट्रवाद का जहर भरने जैसे तमाम आरोप लगाए थे।
भाजपा ने इस कवर स्टोरी को पीएम मोदी की छवि खराब करने की कोशिश बताया और इसके लिए आतिश तासीर पर पाकिस्तानी एजेंडा बढ़ाने का आरोप लगाया। वहीं, भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि लेखक पाकिस्तानी हैं, और पाकिस्तान से कुछ भी बेहतर की अपेक्षा नहीं की जा सकती है।
पिछले कुछ दिनों से गुजरात के कुछ गाँवों में दलित जातियों के द्वारा घोड़े पर बारात निकालने पर उच्च जातियों द्वारा विरोध करने और मारपीट की खबरें आ रही थी। इसी बीच, 15 मई को भावनगर जिले के गारियाधार तहसील के वेलावदर गाँव के राजपूतों ने अनूठा उदाहरण पेश किया। यहाँ के राजपूतों ने अपनी दरियादिली दिखाते हुए न सिर्फ दलित युवक के लिए घोड़ी दी, बल्कि सुरक्षा भी मुहैया कराई और साथ ही उसकी बारात में ठुमके लगाते हुए शादी के मंडप तक पहुँचे।
भावनगर के वेलावदर में 150 घर राजपूतो के ,200 घर पटेल के,10 घर दलित के ,इसके बावजूद #दलित_दूल्हा को अपनी घोड़ी उपलब्ध करवा, बारात डीजे के साथ निकलवा कर राजपूत समाज ने मिशाल पेश की pic.twitter.com/P3Ws3Vc0nh
— BHANWER SINGH RETA (@bhanwarsareta) May 17, 2019
जानकारी के मुताबिक, वेलावदार गाँव में राजपूतों के 150, पटेलों के 200 तो वहीं दलित के सिर्फ 10 घर हैं। इसके बावजूद यहाँ कभी किसी जाति के लिए घोड़े देने से इंकार नहीं किया गया है। हाल ही में गारियाधार से जिग्नेश वणझरा नामक दलित दूल्हे की बारात वेलावदार गाँव आई थी और दूल्हे ने घोड़ी चढ़ने की इच्छा जताई जिसकी जानकारी दूल्हे के पिता ने दिगराज सिंह गोहिल को दी। गाँव में ये बात पता चलने के बाद राजपूत फौरन इसके लिए तैयार हो गए और खुद आगे बढ़कर दूल्हे को घोड़ी उपलब्ध करवाई। साथ ही वो उसके विवाह कार्यक्रम में भी शरीक हुए। इससे दूल्हे के परिजन काफी खुश हो गए।
वहीं, दिगराज सिंह ने फेसबुक पर अपने पोस्ट के जरिए लोगों से अपील करते हुए कहा कि किसी की बारात रोक कर उनको परेशान ना किया जाए। उन्होंने कहा, “एक ब्राह्मण होने के नाते मैं समाज के सभी वर्गो से कहना चाहता हूँ कि हम सब हिंदू हैं और जितना हक हमें घोड़ी पर चढ़ने का है, उतना ही हक हमारे दलित समाज के लोगों का भी है तो कृपया उनके साथ ऐसा ना करें। अगर कोई ऐसा करे तो उसे रोके। दलित समाज के साथ हम सब कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं।”
छत्तीसगढ़ के बस्तर ज़िले में दो किसानों तुलाराम मौर्य और सुखदास को कर्ज न चुकाने के आरोप में जेल भेजे जाने पर सियासत गरमा गई है। दरअसल छत्तीसगढ़ में नई बनी कॉन्ग्रेस सरकार ने किसानों का कर्ज माफ़ करने की घोषणा की थी जिसके बाद किसानों ने कर्ज नहीं चुकाया था जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था।
इस प्रकरण की जाँच के लिए भाजपा किसान मोर्चा ने शनिवार (18 मई) को एक जाँच समिति बस्तर के लिए रवाना कर दी है। ख़बर के अनुसार, भाजपा किसान मोर्चा के अध्यक्ष पूनम चंद्राकर ने कर्ज़ माफ़ी की सच्चाई जानने के लिए समिति का गठन किया है। इस जाँच समिति में मोर्चा के प्रदेश महामंत्री भारत सिंह सिसोदिया, चंदन साहू, गौरीशंकर श्रीवास और दिलीप पाणिग्रही शामिल हैं।
जाँच दल की टीम पाँच अलग-अलग जगहों पर जाकर वहाँ के किसानों से बात करने के बाद प्रदेश अध्यक्ष को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। जाँच समिति के सदस्य बस्तर में गिरफ़्तार किए गए दोनों किसानों से बातचीत करेगी और पूरे मामले की जानकारी जुटाएगी। बस्तर जाने वाली टीम का कहना है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों की कर्ज़ माफ़ी के नाम पर लोगों को ठगने का काम किया है। कहने को तो कॉन्ग्रेस ने किसानों के कर्ज़ को माफ़ करने की घोषणा और दावे दोनों किए, लेकिन इसकी हक़ीक़त कुछ और ही है।
जिन किसानों द्वारा कर्ज़ का भुगतान नहीं किया गया उन्हें जेल भेजा जा रहा है। ताज़ा मामला बस्तर के दो किसानों का है। इस मामले को गंभीरता से लेते हुए बीजेपी ने जाँच समिति का गठन किया। दरअसल, बस्तर ज़िले के कई किसानों ने केसीसी के तहत बैंक से लोन लिया था। इन्हीं किसानों में तुलाराम और सुखदास का भी नाम शामिल है जिन्होंने बैंक से क्रमश: 10 लाख रुपए और 4 लाख रुपए का लोन लिया था, जिसके वापस न किए जाने पर उन्हें जेल में डाल दिया गया।
गौरक्षक और गौहत्या जैसे शब्दों को लेकर देशभर में किस प्रकार से मेनस्ट्रीम मीडिया ने माहौल बनाने का प्रयास किया है इसका ताजा उदाहरण जम्मू कश्मीर में देखने को मिला है। जम्मू कश्मीर में मीडिया, मुस्लिम संगठनों और नेताओं ने एक बार फिर अफवाह के आधार पर सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने की पुरज़ोर कोशिश की है। लेकिन जम्मू कश्मीर पुलिस ने उनके इस प्रयास पर पानी फेर दिया है।
दरअसल, बृहस्पतिवार (मई 16, 2019) को भदरवाह में एक शख्स नईम अहमद शाह की उस वक्त गोली मारकर हत्या कर दी गई, जब वो अपने 2 साथियों के साथ जानवरों को लेकर अपने गाँव जा रहा था। पुलिस ने संदेह के आधार पर कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लिया था। मीडिया गिरोहों ने इसे ‘फ़ौरन गौ तस्करी की अफवाह के बाद दो समूहों में विवाद हुआ शांति बनाए रखने के लिए क्षेत्र में कर्फ्यू लगा दिया गया’ जैसी हैडलाइन के साथ कवर किया।
जानने लायक बात यह है कि जिस क्षेत्र में यह घटना हुई, वह मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र है और वहाँ केवल 7-8 ही घर हिंदू समाज के अनुसूचित वर्ग के हैं।
इस बीच गत बृहस्पतिवार दोपहर तक ये अफवाह फैलाई गई कि नईम की हत्या गौरक्षा के नाम पर की गई है। हालाँकि, पुलिस ने हत्या के कारण की कोई पुष्टि नहीं की थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, घटना के बाद सुबह भदरवाह में स्थानीय मस्जिद में सैंकड़ों लोग इकठ्ठा हुए, जिसके बाद सेरी बाजार, ताकिया चौक और पारसी बस स्टैंड में खड़े वाहनों को जलाया गया, पुलिस पर पथराव किया गया, पुलिस को भी भागकर लक्ष्मी नारायण मंदिर में शरण लेनी पड़ी।
मीडिया गिरोह इस हत्याकांड में गौरक्षकों का हाथ साबित करने पर तुले हैं
इस खबर को ‘गौहत्या’ का रूप देकर दोपहर बाद इस अफवाह को खबर बनाकर तमाम मीडिया संस्थानों द्वारा जमकर चलाया गया और नैरेटिव बनाते हुए बताया जाने लगा कि भदरवाह में एक मुस्लिम शख्स की हत्या गौरक्षकों द्वारा की गई। आजतक, एनडीटीवी, ग्रेटर कश्मीर, कश्मीर रीडर समेत कश्मीर और देश के कई निष्पक्ष मीडिया संस्थानों ने बिना पुलिस की पुष्टि के ही इस खबर को एजेंडे के तहत प्रसारित करना जारी रखा।
जम्मू कश्मीर पुलिस ने किया गौहत्या वाली खबर का खंडन
इसके बाद पूरे जम्मू कश्मीर में माहौल तनावपूर्ण हो गया। कई जगहों पर हिंदू परिवारों को निशाना बनाने की कोशिश की गयी। लेकिन, पुलिस ने बड़ी मुस्तैदी से मामले को संभाल लिया। जम्मू कश्मीर पुलिस ने एक बयान जारी कर मुस्लिम संगठनों और मीडिया के प्रौपगैंडा का पर्दाफाश किया है। पुलिस ने साफ कहा कि मीडिया गैर-जिम्मेदार रिपोर्टिंग कर रही है, अभी तक जांच में हत्या के कारण का पता नहीं चल पाया है।
‘निष्पक्ष’ समाचार चैनल्स द्वारा साम्प्रदायिक तनाव भड़काकर ‘गौरक्षकों द्वारा गौहत्या’ जैसे मुहावरे स्थापित करने का यह प्रयास जम्मू कश्मीर पुलिस द्वारा विफल कर दिया गया। जम्मू कश्मीर पुलिस ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से स्पष्ट करते हुए बताया कि जैसा कि कुछ मीडिया चैनल्स द्वारा दुष्प्रचार किया जा रहा है, अभी तक की छानबीन में यह पता चला है कि यह हत्या गौरक्षकों से जुड़ा मामला नहीं है। पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया कि अभी तक इस हत्या के कारण से सम्बंधित कोई भी तथ्य मालूम नहीं है और समाचार चैनल्स इसे पहले ही गौरक्षकों द्वारा की गई हत्या साबित कर रहे हैं, जो कि मात्र एक अफवाह है।
Some media channels r wrongly reporting murder of a person in Bhaderwah as incident of alleged killing by Cow Vigilantes.Such irresponsible reporting is strongly rebutted as no such info has been confirmed during investigation so far.@ZPHQJammu@ndtv@radionews_jammu
मीडिया गिरोहों के साथ उमर अब्दुल्ला ने भी फैलाई गौहत्या की अफवाह
This on a day alleged cow vigilantes have killed a man in Badarwah area of Jammu – India’s Muslims fear for their future under Narendra Modi https://t.co/OWSqxehubP
उमर अब्दुल्ला के साथ ही CNN news 18 के पत्रकार भी इसे गौरक्षकों द्वारा हत्या साबित करने पर तुले हुए हैं।
No end to Kashmir killings. In two unconnected encounters, 5 militants, 2 civilians, 2 soldiers killed in South Kashmir. Man is shot by suspected cow vigilantes in Baderwah, a civilian shot at by SF and a PDP activist by militants succumb to their wounds.12 killed in last 48 hrs.
पुलवामा आतंकवादी घटना के बाद इसी तरह का नजरिया JNU की फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद से लेकर मीडिया गिरोहों द्वारा फैलाया गया। देहरादून पुलिस लगातार स्पष्टीकरण देती रही कि वहाँ के विद्यार्थियों के साथ कोई हिंसा नहीं हुई है, इसके बावजूद भी ये सभी क्रांतिकारी अपनी बात पर अड़े रहे और जमकर खुद को पीड़ित बताते देखे गए। इन सभी घटनाओं की कड़ी को जोड़कर देखा जाना चाहिए कि देशभर में किस प्रकार से मीडिया गिरोहों द्वारा एक विशेष नैरेटिव तैयार करने के प्रयास किए जाते रहे हैं। जाहिर सी बात है, बिना पुलिस की पुष्टि के कश्मीर में नेता, मीडिया और मुस्लिम संगठन घाटी में सांप्रदायिक तनाव बढ़ा रहे हैं जिसपर कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
ऑल्टरनेट जर्नलिज़्म के नाम पर पत्रकारिता के जो खोखे कुछ लोगों ने खोल रखे हैं, वहाँ टाटा 407 से लेकर महिन्द्रा कमांडर और ऑटोरिक्शा में बजने वाले ढिच्चिक-ढाँय वाले गानों की रिकॉर्डिंग के अलावा और कुछ काम का हो नहीं रहा। आप अगर बिहार, यूपी से लेकर दिल्ली तक की सवारी गाड़ियों में बैठेंगे तो पाएँगे कि ये लोग एक ही तरह के गाने बजाते हैं, एकदम से दिलजले टाइप के। इनके भाव से लेकर गानों का चुनाव तक बिलकुल एक ही होता है।
आज कल चुनाव चल रहे हैं, और चुनाव के दौर में नेता भी चल रहे हैं। नेता चल रहे हैं, तो पत्रकार भी चलायमान हैं। नरेन्द्र मोदी ने पिछले पाँच सालों में जितने इंटरव्यू नहीं दिए, उतने पिछले पाँच सप्ताह में दे दिए हैं। फिर राहुल गाँधी की भी लोगों को याद आई कि देश का असली भविष्य तो वही हैं, तो उनको कैसे टच अप-वच अप दे कर आइकॉनिफाय किया जाए।
इसी संदर्भ में उनके मूर्खतापूर्ण बयानों को ऐसे दिखाया गया जैसे राहुल गाँधी दार्शनिक हो गए हैं, और बुद्धों में गौतम के बाद अब राहुल ही आए हैं। ‘मैं उनके दिल से नफ़रत निकालना चाहता हूँ, प्यार बाँटना चाहता हूँ’, इस वाक्य में मूर्खता इतनी भरी हुई है कि आप सोचने लगेंगे कि आखिर कहा क्या जा रहा है। ‘चाहे जो भी हो जाए, मैं उनके माता पिता पर कोई कमेंट नहीं करूँगा’, इस बात को मीडिया ने ऐसे दिखाया जैसे कितनी मैच्योरिटी आ गई है इस व्यक्ति में जबकि यही आदमी ‘चौकीदार चोर है’ का नारा लगाता फिरता है, वो भी बिना किसी सबूत के।
पत्रकारिता के समुदाय विशेष में क्विंट की भी अपनी एक जगह है। इसके सरगना राघव बहल हैं। राघव बहल ने हाल ही में राहुल गाँधी से बातचीत की। बातचीत में क्या हुआ यह जानने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि गिरोह किस तरीके से काम करता है, वो आप सबको मालूम है। राघव बहल ने इंटरव्यू लेने के बाद जो ट्वीट किया है, वो ज़्यादा चिंता का विषय है।
यूँ तो क्विंट जैसे संस्थान पान की दुकान पर फटे पन्ने पर रिकॉर्डिंग की रिक्वेस्ट लेने वाला कार्य ही करते हैं, लेकिन ट्विटर पर मॉरल हाय ग्राउंड लेने में एक पैसा नहीं हिचकिचाते। इनके सारे सवाल वही होते हैं, जो तीन दिन पहले किसी और ने किए होते हैं। इनकी पूरी पत्रकारिता यही कहने में निकल जाती है कि मोदी से ‘कड़े सवाल’ नहीं पूछे जा रहे, लेकिन राहुल गाँधी के क्यूट डिम्पल देखते ही इनका वैचारिक स्खलन हो जाता है।
बहरहाल, राहुल गाँधी की मानसिक स्थिति का अंदाज़ा तो जनता को है ही, लेकिन राघव बहल ने जो ट्वीट किया है, वो पढ़ कर आपको लग जाएगा कि ये लोग पत्रकार किस हिसाब से कहते हैं खुद को। इन्होंने लिखा कि ‘हमने राहुल गाँधी से लगातार पूछा कि वो गठबंधन बनाने के लिए कितना समझौता करने को तैयार हैं, और उनका यह कहते रहना कि जनता जो कहेगी हम वही करेंगे, बताता है कि वो एक पूर्ण राजनेता बन गए हैं।’
राघव बहल जी, अगर इस स्टेटमेंट से राहुल गाँधी आपको पूर्ण राजनेता लगने लगे हैं तो बेलचा उठाइए और कहीं ट्रकों से गिट्टी-बालू उतारने का काम शुरु कर लीजिए। दो ऐसे वाक्य जिनका एक-दूसरे से कोई लेना-देना नहीं है, कोई संबंध नहीं, लेकिन राहुल गाँधी को कॉन्ज़ूमेट पॉलिटिशियन कहना था तो एक बेकार से बयान पर उन्हें यह कह दिया गया।
क्या राघव बहल का चुनावी विश्लेषण यह कहता है कि राहुल गाँधी किसी भी दृष्टिकोण से ‘कॉलिंग द शॉट्स’ की स्थिति में हैं? क्या उन्हें यह लगता है कि कॉन्ग्रेस आज के दौर में राष्ट्रीय स्तर की पार्टी है? क्या राघव बहल को देश के कई राज्यों में कॉन्ग्रेस द्वारा छोटी पार्टियों के साथ किसी भी तरह, बिना शर्त के सरकार में होने या गठबंधन के लिए लालायित होने में कॉन्ग्रेस की स्थिति ऐसी लगती है कि उन्हें समझौता नहीं करना पड़ेगा?
एक जानकार पत्रकार यह सवाल करेगा ही नहीं। लेकिन वैसा पत्रकार यह सवाल भी करेगा, बार-बार करेगा, और फिर उसके लिए जो जवाब आएगा उसे ऐसे बता देगा जैसे मूसा टेन कमांडमेंट्स लेकर आ गया हो। राहुल गाँधी से हर पत्रकार यही सवाल करता है कि ‘क्या वो खुद को प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं’, और राहुल का यही जवाब आता है कि वो तो जनता तय करेगी।
इन लगातार, रिपीट मोड पर चल रहे राहुली बयानों से क्या पत्रकारों को यह पता नहीं चल रहा कि कॉन्ग्रेस कुछ भी कर ले, वो इस स्थिति में तो बिलकुल नहीं होगी कि महागठबंधन के नेता बन कर राहुल को प्रधानमंत्री के तौर पर आगे करे। हाल ही में मायावती से लेकर केसीआर तक ने अपने आप को प्रधानमंत्री के रूप में आगे किया है, और कॉन्ग्रेस के नेताओं ने यह बयान दिया है कि वो प्रधानमंत्री पद पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार हैं।
सवाल जो पूछे नहीं गए, सवाल जो पूछे नहीं जाते
क्विंट सरगना बहल साहब ने दूसरे ट्वीट में यह ज्ञान दिया कि ‘राहुल गाँधी ने उनसे सवालों की लिस्ट नहीं माँगी, और जब उन्होंने कहा कि वो यह कार्यक्रम लाइव करेंगे तो राहुल सहजता से तैयार थे। यह आज के समय में काफी अलग है जबकि बाक़ियों के इंटरव्यू कोरियोग्राफ्ड प्रोपेगेंडा होते हैं।’
यहाँ पर राघव बहल दो तरीके से गलत हैं, पहला तो यह कि जिनके पत्रकार टिकटॉक के विडियो का विश्लेषण कर के ‘डेन्जरस हिन्दुत्व प्रोपेगेंडा‘ की बात निकाल लाते हैं, उन्हें दूसरों की पत्रकारिता पर ज्ञान बाँचने की आवश्यकता है नहीं। दूसरी यह कि इंटरव्यू के लिए सवालों की लिस्ट माँगना पत्रकारिता में सामान्य शिष्टाचार और सहज भाव से बेहतर इंटरव्यू संचालन के लिए होता है।
आप यह सोचिए कि आपने किसी नेता से पूछ दिया कि उनके क्षेत्र में कितने मकान बने हैं, सड़कों की लंबाई कितनी है, पोखरों की खुदाई में कितने पैसे ख़र्च हुए, कितने बच्चों की टीकाकरण हुआ। और वो हर बार, अपने सचिव से पूछता है, फिर आपको कहता है कि उनके पास उत्तर है, अब रिकॉर्ड कर सकते हैं। इसमें समय की बर्बादी होती है। आप यह सोच कर नहीं चल सकते कि हर व्यक्ति को, हर बार, सारे आँकड़े याद रहते हैं। यही कारण है कि सवालों की लिस्ट पहले मँगा ली जाती है, ताकि दोनों पक्ष का समय बचे।
आपसे सवालों की लिस्ट नहीं माँगी गई, या आप बस राहुल गाँधी के लिए माहौल बनाने के लिए ऐसा कह रहे हैं, ये आप जानिए। लेकिन जो माँगते हैं, या जो देते हैं, वो किसी भी तरह से गलत नहीं होते। उसे कोरियोग्राफ्ड प्रोपेगेंडा नहीं कहते। कोरियोग्राफ्ड प्रोपेगेंडा क्या है, इसका उदाहरण राघव बहल ने इन्हीं दो ट्वीटों में दे दिया है, और इंटरव्यू देख कर आपको पता चल जाएगा कि कई बार, बहुत सारी बातें नहीं पूछना भी, प्रोपेगेंडा का ही हिस्सा होता है।
प्रोपेगेंडा यह है कि एक अक्षम, मानसिक रूप से ढीला और आम तौर पर राजनैतिक परिदृश्य से गायब रहने वाले व्यक्ति में आपको एक परिपूर्ण पॉलिटिशियन दिखता है। प्रोपेगेंडा यह है कि आप चालाकी से सिर्फ फर्जी बातों में पूरा इंटरव्यू निकाल ले जाते हैं, जबकि दूसरे चैनलों के लिए आप प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल बस इसलिए करते हैं क्योंकि आपको वो इंटरव्यू नहीं मिला। प्रोपेगेंडा यह है कि जिस व्यक्ति के पास न तो कोई विजन है, न रोडमैप है, न ब्लूप्रिंट है, न समझाने के लिए शब्द हैं, उनमें आपको कॉन्ज़ूमेट पॉलिटिशियन दिखता है।
आपको पता है कि आप ये बात लिख देंगे, और जनता के विचार उस तरफ हो जाएँगे। इसलिए आपने उस व्यक्ति को दृश्य से गायब कर दिया और लेबल चिपकाने का काम शुरु कर दिया है। जो जनता कभी शोकेस में सजाए डब्बों को खोलती भी नहीं, उसे आपने गधे के खिलौने के डिब्बे पर घोड़े का चित्र चिपका कर ठग लिया है। ये जनता कभी भी पैसा देते वक्त तक उस डब्बे को खोलेगी भी नहीं, और जब खोलेगी तो उसे पता चलेगा कि राघव बहल ने उसे घोड़ा कह कर गधा थमा दिया। मुझे गधों से कोई समस्या नहीं, बहुत मेहनती होते हैं, जो कि राहुल गाँधी बिलकुल ही नहीं हैं, बस उदाहरण के लिए जो दिखाया जा रहा है और जो है, उसमें अंतर है, इस कारण से मैंने ये उपमा दी है।
कोरियोग्राफ्ड प्रोपेगेंडा के नाम पर जो दो-चार पत्रकार तीतर बन रहे हैं, वो जानबूझकर, आम जनता की अनभिज्ञता का फायदा उठा रहे हैं। राहुल गाँधी से इस तीतर ने यह क्यों नहीं पूछा कि उसने राफेल को लेकर हाल ही में जो बोला कि ‘मुझे इस पर जानकारी नहीं, मैं IAF से पूछूँगा’, कि जब उसे पता ही नहीं है, और एयरफ़ोर्स ने अपना पक्ष इस पर स्पष्ट कर दिया है, फिर भी आप राफेल पर क्यों नाच रहे हैं?
राहुल गाँधी से यह क्यों नहीं पूछा गया कि अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले पर उनकी क्या सफ़ाई है? भले ही राहुल गाँधी यह जवाब देते कि मामला कोर्ट में है, और वो न्यायालय का सम्मान करते हैं, लेकिन सवाल क्यों नहीं पूछा गया। उनसे नेशनल हेरल्ड केस पर क्यों सवाल नहीं पूछा गया? उनसे यह क्यों नहीं पूछा गया कि उनकी पार्टी के नेता जब प्रज्ञा ठाकुर पर सवाल उठाते हैं, तो वो स्वयं और उनकी माताजी सोनिया गाँधी भी तो ज़मानत पर घूम रहे हैं, वो क्यों चुनाव लड़ रहे हैं? दोनों में से तो कोई एक स्टैंड क्यों नहीं लेती इनकी पार्टी?
राहुल गाँधी से यह क्यों नहीं पूछा गया कि 1984 के दंगों पर जब वो इतने मुखर हैं तो फिर कमलनाथ मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री कैसे बन जाता है? आपकी और आपके माताजी की पूरी राजनीति पिछले दस सालों में 2002 पर ही अटकी रही है, जो कि अब एक साल से राफेल पर पहुँची है, फिर कमलनाथ जैसे दंगाई को आपने मुख्यमंत्री बना कर क्या यह साबित नहीं किया कि आपके पिता के सहयोग हेतु सिखों की हत्या में हाथ बँटाने वाले को कॉन्ग्रेस पार्टी अवार्ड दे रही है?
राहुल गाँधी से क्विंट ने यह सवाल क्यों नहीं पूछा कि उनके दिमाग में जो डकवर्थ-लुई से भी कॉम्प्लेक्स गणित चलता रहता है उसका आधार क्या है? जिस 30,000 करोड़ और अम्बानी की वो बात करते हैं वो संख्या कहाँ से आई है? राहुल गाँधी ने जो रैलियों में बार-बार 15 उद्योगपतियों के कभी 3.5 तो कभी 5.5 लाख करोड़ रुपए की माफ़ी की बात मोदी के सर पर रखी है, वो आँकड़ा कहाँ से आया? ये 15 उद्योगपति कौन हैं, इनके नाम राहुल गाँधी क्यों नहीं बताते? शायद इस सवाल के लिए राघव बहल को राहुल को लिस्ट दे ही देनी चाहिए थी, ताकि वो नाम लिख लेते क्योंकि इस व्यक्ति को अपना ही नाम याद हो, देश को इस पर संदेह है।
प्रोपेगेंडा न करने की बात करने वाले क्विंट ने राहुल गाँधी से यह क्यों नहीं पूछा कि मोदी द्वारा बनाया गया कानून कि आदिवासियों को कहीं भी गोली मारी जा सकती है, किस पीनल कोड में आया है? आखिर राहुल गाँधी आदिवासियों के बीच जा कर ये बातें कैसे कह देते हैं? राघव बहल को ये सवाल तो पूछना चाहिए था ताकि पता तो चलता कि मोदी ने कोई सीक्रेट मोदी पीनल कोल्ड और मोदी क्रिमिनल प्रोसीजर नामक दो कानूनी किताबें भी लिख रखी हैं जिनका पीडीएफ़ भाजपा शासित राज्यों की पुलिस के पास है। यूपीएससी की तैयारी करने वाले लोगों को इससे कितनी मदद मिल जाती!
राहुल गाँधी से क्विंटाचारी बहल ने ये क्यों नहीं पूछा कि तुमने जो दस दिन में किसानों की लोन माफ़ी और बेरोज़गारी भत्ते देने की बात की थी, और उँगलियाँ छूते हुए पूरे देश को एक दिन बताया था कि तुम्हें दस तक की गिनती आती है, वो इसी ग्रह के दस दिन थे, या फिर कहीं और के, क्योंकि दस दिन तो कब के बीत गए और भत्ता तो किसी को नहीं मिला। लोन किस तरह से, और कितने किसानों के माफ हुए हैं, उस पर भी क्विंट के क्यूट राघव बहल जी एक सवाल पूछ लेते।
ये सारी बातें राफेल की तरह नहीं हैं जो फर्जी हैं, या जिसे सुप्रीम कोर्ट तक ने नकार दिया है। ये सारी बातें राहुल गाँधी की रैलियों की पब्लिक स्पीच से हैं। इसे पूछने की हिम्मत तो क्विंट को हुई नहीं और ये प्रोपेगेंडा पर लेक्चर दे रहे हैं। राघव बहल, इसी को प्रोपेगेंडा कहते हैं। ये जो इमेज बिल्डिंग का ठेका लिया है न आपने और आपके गिरोह ने, इससे बेहतर था कि दीवारों पर ईंट जोड़ते, कम से कम वास्तव में किसी के घर की दीवार तो खड़ी हो जाती, यहाँ आप एक ग़ुब्बारे में हवा भर रहे हैं, जिसे कोई आम आदमी एक पिन मारेगा और वो फुस्स हो जाएगा।
विपक्ष में एक नेता की कमी जो कॉन्ग्रेस ही पूरा कर सकती है
राघव बहल जैसे धूर्त पत्रकारों का गिरोह यह जानता है कि उनके तारणहार कॉन्ग्रेस के युवराज ही हैं। भले ही उनकी मानसिक क्षमता कुछ भी हो लेकिन उनके कैबिनेट में अनुभवी लुटेरे हैं जो तंत्र को वापस अपने हिसाब से चला देंगे ताकि फोन पर से कैबिनेट चर्चा की जानकारी मिल जाया करे, विदेशों से बिना किसी हिसाब-किताब के चंदा मिलता रहे, राज्यसभा की सदस्यता से लेकर पद्म पुरस्कारों में इनके नाम आएँ।
सबको पता है कि महागठबंधन छुटभैये नेताओं की महात्वाकांक्षा की बलि चढ़ता आया है, चढ़ता रहेगा। आखिर ममता को यह कैसे गँवारा होगा कि वो प्रधानमंत्री न बने और मायावती बन जाए? आखिर केसीआर क्यों अपने आप को दूसरे देवगौड़ा की तरह नहीं देखेगा? आखिर स्टैलिन खुद को किंगमेकर की तरह क्यों नहीं देख सकता?
ऐसे में ज़रूरत है एक संयोजक की। लेकिन समय अब वैसा नहीं है जब कॉन्ग्रेस सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी हुआ करती थी, और उनकी बात छोटे दल सहज रूप से सुनते थे। समय ऐसा बदला है कि कॉन्ग्रेस अपना मुँह छुपाती फिरती है, और छोटे दलों से कह रही है कि ‘हमसे गठबंधन कर लो’ और वो दल कहते हैं कि करेंगे लेकिन अपनी शर्तों पर।
यही कारण है कि दूसरे संस्थानों पर ‘कठिन सवाल नहीं पूछते’ और ‘स्क्रिप्टेड इंटरव्यू’ का लेबल लगाने वाले, राहुल गाँधी को ही पूर्ण राजनेता, परिपक्व लीडर, समझदार व्यक्ति और तमाम विशेषणों से नवाज़ते हुए लेख और हेडलाइन रच रहे हैं। ये बातें जितनी हास्यास्पद हैं, अब उतनी लगती नहीं क्योंकि इस गिरोह ने राहुल गाँधी के बेकार और मतलबहीन ट्वीट में कालिदास के मुक्के को पंच तत्व के आपसी सहयोग से मानव शरीर की रचना जैसे ज्ञान की बात खोज निकाली है।
राहुल गाँधी का दुर्भाग्य यह है कि वो भरी बारिश में काली माता के मंदिर में दिया जलाने जाते नहीं, और वो सिर्फ चुनावों के समय ही जनऊ पहनते हैं, चुनावों के समय ही राम भक्त और शिव भक्त बनते हैं। साथ ही, उनको एक्सिडेंटली भी, सर पर चोट लगने से ही सही, ज्ञान मिलने की संभावना दिखती नहीं क्योंकि उसके लिए भी पूर्व में अर्जित ज्ञान के लोप होने की बात ज़रूरी है। जिस व्यक्ति की आस्था का काँटा, उसके परिवार द्वारा कुछ शहरों में तीन घंटे के लिए पहुँचाई बिजली का घर के स्टेबलाइजर के वोल्टमीटर के काँटे की तरह 60 से 200 तक बढ़ता-घटता हो, उसे कोई राम, शिव या काली आशीर्वाद देंगी, यह मानना तर्कसंगत नहीं लगता।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनसे पूछे जाने वाले सवाल आए दिन चर्चा का विषय बने रहते हैं। इसमें विपक्ष समेत कई बड़े मीडिया हाउस यह बताने का भरसक प्रयास करते हैं कि पीएम मोदी सवालों के जवाब नहीं देते या उनसे जो सवाल पूछे जाते हैं उनमें किसानों की समस्या और रोज़गार जैसे विषयों से संबंधित कठिन सवाल शामिल नहीं होते। दावा तो यहाँ तक किया जाता है कि पीएम मोदी के साक्षात्कार में केवल हँसी-ठिठोली, मनोरंजन और उनकी पसंद के व्यंजनों से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं।
विपक्ष की यह पुरज़ोर कोशिश रहती है कि पीएम मोदी द्वारा दिए गए साक्षात्कार में उन्हें किस तरह बेवजह के मुद्दों पर घेरा जा सके। इनमें कुछ मीडिया संस्थान और मीडियाकर्मी भी शामिल हैं जिन्हें दुष्प्रचार करने में महारत प्राप्त है। ऐसा ही एक नाम क्विंट के संस्थापक राघव बहल का भी है जिन्होंने हाल ही में राहुल गाँधी का साक्षात्कार लिया।
Although we persisted in asking @RahulGandhi how flexible he would be in forming an alliance, the fact that he deftly pointed towards the voters shows he is becoming a consummate politician!#Elections2019
यूँ तो राघव ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी से कई मुद्दों पर पर बातचीत की, इनमें कई मुद्दे शामिल थे। राहुल गाँधी के इस साक्षात्कार का वीडियो जब सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर आया तो कुछ लोगों ने इस पर आपत्ति दर्ज की। इस साक्षात्कार में पत्रकार राघव बहल ने अपनी चतुराई का खुला प्रदर्शन करते हुए राहुल गाँधी से वो सवाल नहीं पूछे जिनके जवाब देश की जनता जानना चाहती है। वो कुछ सवाल इस प्रकार हैं, जो अब पत्रकार राघव से पूछे जा रहे हैं।
क्या आपने 30 हज़ार करोड़ रुपए के आंकड़े के बारे में सवाल पूछा?
क्या आपने मोदी के उस “नए कानून” के बारे में पूछा जिसके तहत आदिवासियों को सीधे गोली मारी जा सकती है?
क्या आपने उनसे NYAY योजना के बारे में पूछा?
क्या आपने उनसे अलवर गैंग रेप को रोकने के लिए कहा?
क्या आपने उनसे अमेठी में हुए काम के बारे में पूछा?
क्या आपने नेशनल हेराल्ड और अगस्ता वेस्टलैंड के बारे में पूछा?
क्या राहुल गाँधी से यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि सिख दंगों के आरोपी कमलनाथ को मुख्यमंत्री क्यों बना दिया गया?
• Did u ask him abt 30k crores imaginary figure • Did u ask him abt the ” new law ” which Modi introduced for the tribals , sidhe goli maar di jayegi • Did u ask him about NYAY plannings • Did u ask him abt Alwar Gang rape • Did u ask him abt his Amethi’s work
— Abhishek Sinha अभिषेक ?? (@abhisinha948) May 18, 2019
ऐसे में यह कहने और स्वीकारने में गुरेज नहीं होनी चाहिए कि मीडिया गिरोह के निशाने पर केवल पीएम मोदी रहते हैं, जिनकी केवल आलोचना करना ही मीडिया गिरोह का एकमात्र ध्येय रहता है। जहाँ एक तरफ साक्षात्कार के नाम पर राहुल गाँधी से ‘समोसे के स्वाद’ और ‘गुड़ से बनी जलेबियों’ के बारे में सवाल पूछे जाते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ वो इस बात से भी खासे दु:खी हैं कि पीएम मोदी से कोई कठिन सवाल क्यों नहीं पूछता।
यहाँ जानकारी के लिए यह बताना ज़रूरी है कि प्रधानमंत्री मोदी से राजनीतिक और गै़र-राजनीतिक दोनों तरह के साक्षात्कार लिए गए। हाल में तो लगभग हर बड़े मीडिया संस्थान ने उनका साक्षात्कार लिया। लेकिन अगर हम कठिन सवालों भरे साक्षात्कार का रुख़ करें तो न्यूज़ एजेंसी ANI की पत्रकार स्मिता प्रकाश ने पीएम मोदी से एक घंटे से भी अधिक समय तक एनडीए सरकार की आर्थिक नीतियों, विमुद्रीकरण, जीएसटी और अन्य सभी चुनौतियों से जुड़े सवाल पूछे थे, जिन्हें सरल तो नहीं कहा जा सकता था। वहीं राहुल गाँधी ने इस साक्षात्कार को “व्यवहारिकता वाली पत्रकारिता” का नाम दिया था।
लोकसभा चुनाव सम्पन्न होने के पहले ही सरकार बनाने को लेकर विपक्ष के नेताओं में काफ़ी हलचल का माहौल बन गया है। महागठबंधन के नाम पर विपक्ष की एकजुटता ख़ासतौर पर पीएम मोदी के लेकर है। तेलुगू देशम पार्टी (TDP) अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू भी विपक्ष के नेताओं को एकजुट करने की कोशिश में जुट गए हैं। उन्होंने शुक्रवार (17 मई) को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मुलाक़ात की। इस दौरान उनके बीच चुनाव के परिणाम के बाद की रणनीति को लेकर लंबी बातचीत हुई। इस मौक़े पर मनीष सिसोदिया और पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह भी मौजूद थे।
नतीजों से पहले ही ‘बाबू’ ने जोड़-तोड़ शुरू कर दी है. आज दिल्ली में राहुल गांधी से मिले हैं. गठबंधन मैनेजमेंट के पुराने खिलाड़ी हैं…वाजपेयी जी की सरकार में भी NDA के संयोजक थे. पर ख़ुद कितनी सीट लाएँगे #ChandrababuNaidu ?
उधर, कॉन्ग्रेस भी तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने के लिए विपक्ष की पार्टियों को एकजुट करने में जुट गई है। इसके लिए कॉन्ग्रेस ने नेताओं से मिलने की क़वायद भी शुरू कर दी है। शुक्रवार (17 मई) को कॉन्ग्रेस ने कहा था कि वो एक प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष सरकार के गठन के लिए प्रतिबद्ध है। इससे पहले कॉन्ग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद ने कहा था कि अगर कॉन्ग्रेस को पूर्ण बहुमत मिल जाएगा तो भी वो राज्य स्तरीय नेता का समर्थन लेने में गुरेज नहीं करेगी। ख़बर के अनुसार, सोनिया गाँधी ने विपक्षी दलों को साथ लाने के लिए अपने विश्वासपात्र नेताओं से कहा है कि वो 23 मई को चुनाव परिणाम की घोषणा के साथ ही एक बैठक बुलाएँ।
इसके अलावा यह भी पता चला है कि मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी से भी मिलना चाहते थे पर किन्हीं कारणों की वजह से उनसे बातचीत संभव नहीं हो सकी। जानकारी के अनुसार, चंद्रबाबू नायडू आज राहुल गाँधी से मुलाक़ात करेंगे। इस मुलाक़ात में दोनों नेताओं के बीच चुनावी नतीजों के बाद की रणनीति पर गहन चर्चा होने की संभावना है। राहुल गाँधी से उनकी मुलाक़ात इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि राहुल ने सरकार बनाने के लिए गठबंधन को हरी झंडी दिखाई थी। इस संकेत से राहुल गाँधी ने अपने लक्ष्य को साफ़ कर दिया था कि वो बीजेपी को सत्ता में वापसी नहीं करने देना चाहते और इसके लिए वो विपक्ष की हर शर्त मानने को तैयार हैं। ऐसी संभावना है कि चंद्रबाबू नायडू राहुल गाँधी से मुलाक़ात करने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा अध्यक्ष अखिलेश सिंह यादव से भी मुलाक़ात के लिए लखनऊ रवाना हो जाएँगे।
बीजू जनता दल के उपाध्यक्ष व ओडिशा सरकार में मंत्री सूर्य नारायण पात्रो ने शुक्रवार (मई 17, 2019) को ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का नाम प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में सामने रखा है। मीडिया खबरों के मुताबिक उनका कहना है कि भारत और ओडिशा राज्य के लोग चाहते हैं कि नवीन पटनायक देश के प्रधानमंत्री बनें। सूर्य नारायण का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है, जब चुनावी नतीजे आने में ज्यादा समय नहीं बचा है। ऐसे में अटकलें लगाई जा रही हैं कि यदि किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलता है, और क्षेत्रीय पार्टियों के समर्थन से सरकार चुनी जाती है, तो स्पष्ट है कि बीजद इसमें अपने नेता को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहेगी इसकी संभावनाएँ प्रबल हो गई हैं।
हालाँकि बीजद उपाध्यक्ष ने यह भी कहा है कि नवीन पटनायक को प्रधानमंत्री बनने के लिए कॉन्ग्रेस का समर्थन नहीं लेना चाहिए, क्योंकि कॉन्ग्रेस का इतिहास रहा है, वह पहले तो किसी नेता को प्रधानमंत्री बनने के लिए समर्थन देती है, लेकिन कुछ ही महीनों बाद पीछे हट जाती है। वैसे, इस बयान को लेकर यह बात स्पष्ट नहीं हो पाई है कि सूर्य नारायण पात्रो के इस बयान में नवीन पटनायक की सहमति है या नहीं।
बहुत जल्द चुनाव का परिणाम आने वाला है और ज्यों-ज्यों ये तारीख करीब आ रही है, वैसे-वैसे पीएम पद के लिए दावेदारी भी बढ़ती जा रही है। गठबंधन के तमाम नेता पीएम बनने का ख्वाब संजोए बैठे हैं। परिणाम आने से पहले ही गठबंधन के कई नेताओं ने पीएम बनने की इच्छा जाहिर की है, तो कुछ ने डिप्टी सीएम बनने की शर्त रख दी है। गौरतलब है कि, नवीन पटनायक के पीएम पद के दावेदारी से पहले मायावती ने अपने आपको पीएम पद के लिए प्रबल दावेदार बताया था और साथ ही वर्तमान पीएम नरेंद्र मोदी को अनफिट करार दिया।
वहीं, पिछले दिनों तेलंगाना के मुख्यमंत्री और तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) अध्यक्ष केसीआर राव ने विपक्ष के सामने खुद को डिप्टी सीएम बनाने की शर्त रखी थी। उन्होंने कहा था कि अगर लोकसभा चुनाव में किसी एक दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, तो वो ग़ैर-बीजेपी गठबंधन की सरकार को अपना समर्थन देने के लिए तैयार हैं, मगर वो सभी उनका समर्थन करेंगे, जब उन्हें सरकार में उप-प्रधानमंत्री का पद दिया जाएगा और इसी भरोसे पर वो 21 मई को होने वाले विपक्ष की मीटिंग में शामिल होंगे।
विपक्ष के नेता जिस तरह से एक के बाद पीएम पद के लिए दावेदारी पेश कर रहे हैं, उससे समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर गठबंधन, पीएम बनाना किसको चाहता है। क्योंकि जिस तरह से नेताओं के बयान आ रहे हैं, उससे तो यही लग रहा है कि सभी लोग पीएम बनने के लिए लालायित हैं।
ऐसे में जब ये लोग खुद पीएम पद के लिए किसी एक नाम पर सहमत नहीं हैं, तो फिर ये लोग सत्ता में आने पर एक साथ मिलकर देश को कैसे चलाएँगे? क्योंकि बिना सत्ता के ही इनकी अंदरुनी खटपट सामने आ रही है, तो सत्ता में आने पर ये देश को किस दिशा में ले जाएँगे, इसके तो बस कयास ही लगाए जा सकते हैं।