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हिंदू बन लॉरा फ्रांसिस ने मंदिर में किया विवाह, फिर भी तमिलनाडु सरकार ने गर्भगृह में पूजा से रोका: हाई कोर्ट ने दिया अधिकार, जानिए कैसे सनातन को बताया सबसे अलग

मद्रास हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता या उसका विदेशी नाम उसकी हिंदू आस्था का निर्धारण नहीं कर सकता। मामले में टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने यह भी कहा कि हिंदू धर्म उदार है और इसे अपनाने के लिए किसी औपचारिक समारोह या धर्मांतरण प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है। जस्टिस डी भरत चक्रवर्ती ने तंजावुर के श्री अरुलमिगु अभिष्ट वरदराजपेरुमाल मंदिर से जुड़े मामले में यह व्यवस्था दी।

यह मामला एक अमेरिकी नागरिक महिला, लौरा फ्रांसिस अयंगर (Laura Frances Iyengar) से जुड़ा है, जिन्हें तमिलनाडु के तंजावुर जिले में स्थित एक ऐतिहासिक मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने से सिर्फ इसलिए रोक दिया गया था क्योंकि प्रशासन ने उनके विदेशी नाम और अमेरिकी नागरिकता के आधार पर उन्हें ईसाई मान लिया था।

कोर्ट ने अपने आदेश में न केवल महिला के अधिकारों को बहाल किया, बल्कि हिंदू धर्म की व्यापकता, उदारता और इसकी ऐतिहासिक प्रकृति पर भी गहरी टिप्पणी की। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि लौरा ने पूरी निष्ठा और आचरण के साथ हिंदू धर्म को अपनाया है और उन्हें किसी अन्य हिंदू महिला भक्त की तरह ही मंदिर में पूजा-अर्चना करने का पूरा अधिकार है।

जानिए क्या है पूरा मामला और HC ने तमिलनाडु सरकार को क्यों लगाई फटकार

यह पूरा विवाद तमिलनाडु के तंजावुर जिले में स्थित श्री अरुलमिगु अभिष्ट वरदराजपेरुमाल मंदिर से शुरू हुआ। अमेरिकी नागरिक लौरा फ्रांसिस ने हिंदू धर्म के प्रति अपनी गहरी आस्था के कारण कई वर्ष पहले ही इस धर्म को अपना लिया था। सितंबर 2023 में उन्होंने इसी मंदिर में एक हिंदू व्यक्ति, वरधा बालाजी वेंकटकृष्णन से पूरे रीति-रिवाजों के साथ विवाह किया था।

विवाह के बाद भी वह लगातार वैष्णव संप्रदाय की धार्मिक प्रथाओं का पालन कर रही थीं और एक समर्पित हिंदू की तरह जीवन जी रही थीं। विवाद तब पैदा हुआ जब वर्ष 2024 में लौरा फ्रांसिस ने एक बार फिर इस मंदिर का दौरा किया। वहाँ मौजूद कुछ स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं ने उनके विदेशी रंग-रूप और नाम को देखकर आपत्ति जताई।

उनका मानना था कि वह हिंदू नहीं हैं और एक गैर-हिंदू को मंदिर के भीतर प्रवेश नहीं मिलना चाहिए। इस विरोध के बाद लौरा के पति वरधा बालाजी ने ‘तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती’ (HR&CE) विभाग के अधिकारियों को एक पत्र लिखा।

उन्होंने विभाग से अनुरोध किया कि उनकी पत्नी को एक हिंदू भक्त के रूप में मंदिर में बिना किसी रोक-टोक और भय के स्वतंत्र रूप से पूजा करने की अनुमति दी जाए। इसके जवाब में HR&CE विभाग ने 10 अगस्त 2024 को एक आधिकारिक आदेश जारी किया। विभाग ने अपने आदेश में लौरा फ्रांसिस को एक ‘अमेरिकी ईसाई महिला’ के रूप में पेश कर दिया।

विभाग का तर्क था कि अन्य भक्तों की धार्मिक भावनाओं को ठेस न पहुँचे, इसलिए लौरा को केवल मंदिर के बाहरी परिसर तक ही जाने की अनुमति दी जा सकती है, उन्हें मुख्य गर्भगृह या आंतरिक हिस्सों में जाने की अनुमति नहीं होगी। इसके बाद लौरा ने मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ का दरवाजा खटखटाया और विभाग को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की।

विदेशी नाम होने से कोई ईसाई नहीं हो जाता: HC ने हिंदू धर्म को बताया सबसे उदार

इस मामले की सुनवाई मद्रास हाई कोर्ट के जज जस्टिस डी भरत चक्रवर्ती की पीठ ने की। कोर्ट ने HR&CE विभाग के रुख को पूरी तरह से खारिज कर दिया और प्रशासन की कार्रवाई पर नाराजगी जाहिर की। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कहा कि चूँकि याचिकाकर्ता एक अमेरिकी नागरिक थीं, इसलिए अधिकारियों ने स्वतः ही यह मान लिया कि वह ईसाई होंगी।

जज ने इस तर्क को पूरी तरह से अतार्किक और तथ्यहीन बताते हुए कहा कि अधिकारियों का यह निष्कर्ष किसी भी पुख्ता सामग्री या सबूत पर आधारित नहीं था और केवल अमेरिकी होने से कोई ईसाई नहीं हो जाता और न ही विदेशी नाम होने से किसी की हिंदू आस्था कम हो जाती है। हिंदू धर्म को रेखांकित करते हुए जस्टिस डी भरत चक्रवर्ती ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

मद्रास हाई कोर्ट के आदेश का एक हिस्सा (साभार: लॉ बीट)

उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जो ऐतिहासिक रूप से अत्यंत समावेशी और उदार रहा है। अन्य मजहब और पंथों के विपरीत, हिंदू धर्म में किसी को अपने भीतर शामिल करने के लिए किसी अनिवार्य औपचारिक धर्मांतरण समारोह या किसी आधिकारिक धर्मांतरण प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं होती है।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इसे अपनाने के लिए ऐसी कोई पूर्व-शर्त लागू नहीं होती। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ‘पेरुमल नाडार बनाम पोन्नुस्वामी’ मामले का जिक्र किया। कोर्ट ने उस मामले में स्पष्ट किया था कि कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से और पूरी तरह से हिंदू बन सकता है, बशर्ते उसके भीतर इस धर्म को अपनाने का सच्चा इरादा हो।

कोर्ट ने कहा था कि व्यक्ति का आचरण भी समाज में ऐसा होना चाहिए जो उसकी इस धार्मिक निष्ठा को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करता हो। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया था कि हिंदू धर्म में शामिल होने के लिए किसी भी प्रकार के औपचारिक शुद्धिकरण या प्रायश्चित समारोह की कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि महिला का नाम ‘लौरा फ्रांसिस’ है, उन्हें एक हिंदू के रूप में मान्यता देने से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने HR&CE विभाग के 10 अगस्त 2024 के आदेश को उस सीमा तक अवैध और असंवैधानिक घोषित कर दिया जहाँ उन्हें ‘अमेरिकी ईसाई महिला’ कहा गया था।

कोर्ट ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि उनके पति के दादा पहले उक्त मंदिर के न्यासी के रूप में कार्य कर चुके थे, जिससे हिंदू धर्म में उनका सामाजिक और धार्मिक एकीकरण सिद्ध होता है।

अंत में कोर्ट ने निर्देश दिया कि लौरा फ्रांसिस को पूरी तरह से एक हिंदू भक्त माना जाए और उन्हें वे सभी अधिकार और विशेषाधिकार प्राप्त होंगे जो किसी भी अन्य हिंदू महिला भक्त को मिलते हैं। मंदिर के रीति-रिवाजों, आगमों, परंपराओं और नियमों के दायरे में रहते हुए, उन्हें किसी भी हिस्से में जाने से नहीं रोका जा सकता।

महिला ने प्रस्तुत किए थे अपने हिंदू होने के प्रमाण

कोर्ट में मामले की पैरवी के दौरान लौरा फ्रांसिस अयंगर ने ऐसे कई ठोस सबूत पेश किए, जिससे यह साबित हुआ कि उनका हिंदू धर्म की ओर झुकाव कोई क्षणिक विचार नहीं था, बल्कि वह वर्षों से इस धर्म को जी रही थीं। लौरा ने कोर्ट को विस्तार से बताया कि उन्होंने किसी दबाव में नहीं, बल्कि स्वेच्छा से कई साल पहले हिंदू धर्म को आत्मसात किया था।

वह लंबे समय से लगातार हिंदू देवी-देवताओं की पूजा कर रही हैं और उनकी जीवनशैली सनातन धर्म के पूर्णतः अनुरूप है। सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में उन्होंने अपने सरकारी दस्तावेजों को पेश किया, जिसके तहत भारत आने के लिए दिए गए अपने वीजा आवेदनों में भी उन्होंने विवाह से पहले ही स्वयं को ‘हिंदू’ के रूप में घोषित किया था।

इसके साथ ही उन्होंने अपनी शादी से पहले और बाद में भारत के विभिन्न हिस्सों में स्थित कई प्रसिद्ध और ऐतिहासिक हिंदू मंदिरों की यात्राएँ की थीं और हिंदू रीति-रिवाजों से तीर्थयात्राएँ संपन्न की थीं। एक हिंदू व्यक्ति से शादी करने के बाद, वह लगातार वैष्णव संप्रदाय के रीति-रिवाजों, अनुष्ठानों और त्योहारों का श्रद्धापूर्वक पालन कर रही थी।

महिला का विवाह सितंबर 2023 में इसी श्री अरुलमिगु अभिष्ट वरदराजपेरुमाल मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था। इन तमाम साक्ष्यों के आधार पर ही कोर्ट ने माना कि उनका आचरण और उनकी आस्था उनके हिंदू होने का प्रमाण हैं, जिसे महज एक विदेशी पासपोर्ट या नाम के आधार पर झुठलाया नहीं जा सकता।

श्री अरुलमिगु अभिष्ट वरदराजपेरुमाल मंदिर का इतिहास

तमिलनाडु के तंजावुर जिले के पसुपति कोइल में स्थित श्री अरुलमिगु अभिष्ट वरदराजपेरुमाल मंदिर लगभग 900 वर्ष पुराना है। यह मंदिर भगवान वरदराज पेरुमाल (भगवान विष्णु) को समर्पित है। इस मंदिर का इतिहास श्री रामानुजाचार्य, उनके गुरु पेरिया नंबी और उनके एक शिष्य से जुड़ी एक प्रसिद्ध घटना से संबंधित है।

मान्यता है कि चोल राजा कुलोत्तुंग ने अपने राज्य के लोगों को यह लिखकर देने का आदेश दिया कि भगवान शिव सबसे श्रेष्ठ हैं। जब श्री रामानुजाचार्य को दरबार में बुलाया गया, तब उनके एक शिष्य अपने गुरु का वेश धारण करके स्वयं दरबार में पहुँचे। उनके साथ श्री रामानुजाचार्य के गुरु पेरिया नंबी भी थे।

राजा ने दोनों से अपने आदेश पर हस्ताक्षर करने को कहा, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया। राजा इस बात से बहुत क्रोधित हो गया और उसने उनकी आँखें निकालने का आदेश दे दिया। शिष्य ने किसी और से अपनी आँखें निकलवाने के बजाय स्वयं अपने नाखूनों से अपनी आँखें निकाल लीं।

वहीं सैनिकों ने 105 वर्षीय पेरिया नंबी की आँखें फोड़ दीं। इसके बाद पेरिया नंबी बड़ी कठिनाई से पसुपति कोइल पहुँचे। यहीं भगवान वरदराज पेरुमाल ने उन्हें दर्शन दिए और उन्हें मोक्ष प्रदान किया। मान्यता है कि इस घटना के बाद श्री रामानुजाचार्य ने इस स्थान पर भगवान वरदराज पेरुमाल के मंदिर का निर्माण कराया।

तभी से यह मंदिर भगवान के दिव्य दर्शन और पेरिया नंबी को प्राप्त मोक्ष के कारण श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

‘तमिलनाडु को अलग देश होना चाहिए’: मद्रास HC ने कहा- यह देशद्रोह नहीं, आज के दौर में ऐसा बयान देश/सरकार के खिलाफ नफरत फैलाना नहीं; जानिए क्या है मामला

मद्रास उच्च न्यायालय (मद्रास हाईकोर्ट) ने हाल ही में देशद्रोह (Sedition) के एक मामले को रद्द करते हुए बेहद महत्वपूर्ण और अनोखी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि आज के सामाजिक परिवेश में तमिलनाडु को भारत से अलग करके एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की बात कहना देशद्रोह का अपराध नहीं माना जाएगा, बल्कि ऐसा बयान देने वाले व्यक्ति को समाज में ‘मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं’ (Mental Health Issues) से पीड़ित माना जाएगा।

जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती की एकल पीठ ने ‘कीरा बनाम राज्य’ मामले की सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक आदेश पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान समय में अगर कोई ऐसी बात कहता भी है, तो उससे आम जनता के मन में सरकार के प्रति कोई नफरत या असंतोष पैदा नहीं होगा, बल्कि लोग इसे एक फिजूल की बात मानकर नजरअंदाज कर देंगे। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह पूरा मामला क्या था, अदालत ने अपने फैसले में क्या-क्या महत्वपूर्ण दलीलें दीं और इस फैसले के बाद आम जनता के मन में किस तरह के सवाल उठ रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला साल 2014 का है, जब चेन्नई के आरकेवी प्रिव्यू थिएटर में एक किताब का विमोचन किया गया था। इस किताब के लेखक और संकलक ‘इलांगोवन’ नाम के व्यक्ति थे (जिनकी मामले की पेंडेंसी के दौरान ही मौत हो चुकी है)। इस किताब को प्रकाशित करने का आरोप दो प्रकाशकों कीरा उर्फ मूर्ति और थमिल बाला पर था, जो ‘कड़गम पथिपगम’ नाम का प्रकाशन गृह चलाते हैं।

अभियोजन पक्ष (सरकारी वकील) के अनुसार, इस किताब में साल 1967 के एक घटनाक्रम का जिक्र था। किताब में लिखा गया था कि 1967 में ‘तमिलारसन’ नाम के एक व्यक्ति ने कोयंबटूर में यह घोषणा की थी कि तमिलनाडु को भारत से अलग होकर एक स्वतंत्र राष्ट्र बनना चाहिए। आरोप यह भी था कि किताब में देश से अलग होने (Secession) के लिए गुरिल्ला युद्ध (Guerrilla Warfare) जैसी हिंसक पद्धतियों को अपनाने का संदर्भ दिया गया था।

इसी को आधार बनाकर पुलिस ने प्रकाशकों के खिलाफ तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124ए (देशद्रोह) के तहत मामला दर्ज किया था, जो सैदापेट के 23वें मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट में लंबित था। दोनों प्रकाशकों ने इस मुकदमे को रद्द कराने के लिए मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

हाईकोर्ट ने फैसले में क्या-क्या कहा?

जस्टिस डी. भरत चक्रवर्ती ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद प्रकाशकों के खिलाफ चल रहे देशद्रोह के मुकदमे को पूरी तरह से खारिज (Quash) कर दिया।

जस्टिस चक्रवर्ती ने मामले की गहराई से समीक्षा करते हुए प्रकाशकों के खिलाफ चल रहे इस मुकदमे को पूरी तरह से निरस्त कर दिया। उन्होंने अपने फैसले में दलील दी कि देशद्रोह के आरोपों को हमेशा वर्तमान सामाजिक परिदृश्य की रोशनी में देखा जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि साल 1967 के दौर में जब तमिल लिबरेशन फ्रंट जैसी समूह सक्रिय थे, तब इस तरह के भाषण या प्रकाशन निश्चित रूप से भारत सरकार के खिलाफ नफरत भड़का सकते थे, लेकिन आज का भारत दिल और आत्मा से पूरी तरह एकीकृत हो चुका है।

इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस किताब में आज के समय में देश को तोड़ने का कोई नया आह्वान नहीं किया गया है, बल्कि यह सिर्फ दशकों पुरानी एक घटना का ऐतिहासिक रिकॉर्ड है और इतिहास में जो घटा उसे केवल दर्ज करना या लिखना अपराध की श्रेणी में नहीं आता।

अदालत ने अपने फैसले में कई बेहद अहम कानूनी और सामाजिक टिप्पणियाँ कीं-

समय और सामाजिक परिवेश का महत्व: अदालत ने कहा कि देशद्रोह के आरोपों की समीक्षा हमेशा वर्तमान सामाजिक ताने-बाने और माहौल को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। जस्टिस चक्रवर्ती ने कहा, “यह सच हो सकता है कि 1967 के दौर में जब तमिलारसन ने ‘तमिल लिबरेशन फ्रंट’ का गठन किया था, तब इस तरह के भाषण या प्रकाशन से भारत सरकार के खिलाफ नफरत या अवमानना भड़क सकती थी। लेकिन आज के परिदृश्य में भारत एक राष्ट्र के रूप में दिल और आत्मा से पूरी तरह एकीकृत (Unified) है।”

नफरत नहीं, सिर्फ खीझ पैदा होगी: अदालत ने कहा, “अगर आज कोई व्यक्ति तमिलनाडु को बाँटकर एक अलग देश बनाने की बात करता है, तो निश्चित रूप से उसे मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित व्यक्ति माना जाएगा। इससे आम जनता के बीच कोई नफरत पैदा नहीं होगी, बल्कि यह बात अधिक से अधिक लोगों में थोड़ी झुंझलाहट या खीझ (Annoyance) पैदा कर सकती है।”

इतिहास को दर्ज करना अपराध नहीं: हाईकोर्ट ने इस बात को भी रेखांकित किया कि विवादित किताब में आज के समय में देश को तोड़ने या अलग होने का कोई नया आह्वान नहीं किया गया है। इसमें केवल दशकों पहले (1967 में) जो कुछ घटित हुआ था, उसका एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड दर्ज किया गया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जो कुछ इतिहास में हुआ, उसे महज दर्ज करना या लिखना, नफरत भड़काने की कोशिश के दायरे में नहीं आ सकता।”

मद्रास हाई कोर्ट के फैसले का हिस्सा

आम लोगों के मन में उठ सकते हैं अहम सवाल

मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला जहाँ एक तरफ अभिव्यक्ति की आजादी और इतिहास लेखन के अधिकार को सुरक्षा देता है, वहीं दूसरी तरफ इसने आम जनता और कानूनी जानकारों के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस फैसले के बाद लोगों के मन में कई तरह के सवाल और चिंताएं कौंध रही हैं:

देशद्रोह की परिभाषा और दायरा क्या है?: आम लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि देशद्रोह या देश को तोड़ने की बात करने की सीमा रेखा कहां तय होती है? अगर देश के किसी हिस्से को अलग राष्ट्र बनाने की माँग को सिर्फ ‘मानसिक बीमारी’ कहकर छोड़ दिया जाएगा, तो संप्रभुता (Sovereignty) की रक्षा कैसे होगी? जनता के एक वर्ग का मानना है कि अलगाववाद (Separatism) से जुड़े बयानों को मानसिक स्वास्थ्य से जोड़ना कानूनी रूप से इसे बेहद हल्का बना सकता है।

क्या हिंसक संदर्भों को नजरअंदाज किया जा सकता है?: मामले में सरकार की तरफ से यह दलील दी गई थी कि किताब में अलगाव के लिए ‘गुरिल्ला युद्ध’ जैसे हिंसक रास्तों का जिक्र है। जनता के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या केवल पुराना इतिहास होने के आधार पर देश के खिलाफ हथियार उठाने वाली विचारधारा के प्रचार को सुरक्षित माना जा सकता है? लोगों की चिंता यह है कि ऐसी ऐतिहासिक घटनाओं का बार-बार महिमामंडन आज के युवाओं को गुमराह कर सकता है।

मानसिक स्वास्थ्य का कानूनी इस्तेमाल: कोर्ट द्वारा ‘मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं’ शब्द का इस्तेमाल किए जाने पर भी चर्चाएं तेज हैं। लोगों का सवाल है कि क्या भविष्य में देश विरोधी या भड़काऊ बयान देने वाले लोग इस अदालती टिप्पणी का हवाला देकर खुद को मानसिक रूप से अस्वस्थ बताकर बच निकलने का रास्ता नहीं ढूँढ लेंगे?

मद्रास उच्च न्यायालय ने इस फैसले के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की है कि आज का भारत आंतरिक रूप से बेहद मजबूत और एकजुट है, जिसे किसी छिटपुट अलगाववादी बयान से खतरा नहीं हो सकता। हालाँकि कानूनी सख्ती और वैचारिक स्वतंत्रता के बीच का यह संतुलन आने वाले समय में भी बहस का एक बड़ा केंद्र बना रहेगा।

एक सैनिक, एक लॉन्चर और दुश्मन के टैंक पर अंतिम प्रहार: DRDO की स्वदेशी MPATGM को मिली हरी झंडी, जानें- कितनी ताकतवर है यह एंटी-टैंक मिसाइल

भारत की सेना को और मजबूत और आधुनिक बनाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में 3 जुलाई 2026 को रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) की बैठक हुई। इस बैठक में करीब 52000 करोड़ रुपए के रक्षा खरीद प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। इन प्रस्तावों का मकसद भारतीय सशस्त्र बलों की ताकत बढ़ाना और रक्षा क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाना है

इनमें सबसे महत्वपूर्ण फैसला स्वदेशी मैन पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (MPATGM) की खरीद को मंजूरी देना है। इसके अलावा भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए कई आधुनिक हथियार प्रणालियों और तकनीकों को भी मंजूरी मिली है। इससे सेनाओं की युद्ध क्षमता भी मजबूत होगी और रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी गति मिलेगी।

AoN क्या है और इसका क्या महत्व है?

रक्षा खरीद प्रक्रिया में एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी (AoN) पहला औपचारिक चरण होता है। इसका मतलब यह नहीं होता कि हथियारों की खरीद पूरी हो गई है, बल्कि सरकार यह मंजूरी देती है कि संबंधित रक्षा उपकरण की आवश्यकता है। इसके बाद तकनीकी मूल्यांकन, टेंडर, मूल्य निर्धारण और अनुबंध जैसी प्रक्रियाएँ शुरू होती हैं।

3 जुलाई को 2026 DAC ने करीब 52 हजार करोड़ रुपए के जिन प्रस्तावों को AoN दिया है, वे भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं। इनमें बड़ी संख्या में स्वदेशी रक्षा प्रणालियाँ शामिल हैं, जिससे घरेलू रक्षा उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा।

MPATGM क्या है और भारतीय सेना के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है?

DAC की बैठक का सबसे अहम फैसला मैन पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (MPATGM) की खरीद को मंजूरी देना है। यह पूरी तरह स्वदेशी एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल है, जिसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने विकसित किया है।

इसका उद्देश्य पैदल सेना को आधुनिक युद्धक्षेत्र में दुश्मन के टैंकों और बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ अधिक प्रभावी बनाना है। यह तीसरी पीढ़ी की फायर एंड फॉरगेट (Fire & Forget) मिसाइल है। यानी सैनिक लक्ष्य को लॉक कर मिसाइल दागने के बाद तुरंत अपनी स्थिति बदल सकता है और मिसाइल स्वयं लक्ष्य का पीछा करते हुए उसे नष्ट कर देती है।

इसमें Imaging Infrared (IIR) Homing Seeker, ऑल-इलेक्ट्रिक कंट्रोल एक्ट्यूएशन सिस्टम, फायर कंट्रोल सिस्टम, टैंडम वारहेड, स्वदेशी प्रोपल्शन सिस्टम और हाई-परफॉर्मेंस साइटिंग सिस्टम जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है।

इसका टैंडम वारहेड आधुनिक मुख्य युद्धक टैंकों पर लगे एक्सप्लोसिव रिएक्टिव ऑर्मर (ERA) को भी भेद सकता है। मिसाइल को ट्राइपॉड या सैन्य वाहन पर लगे लॉन्चर से दागा जा सकता है। इसके विकास में DRDO की कई प्रयोगशालाओं ने योगदान दिया है।

रिसर्च सेंटर इमारत (RCI), टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (TBRL), हाई एनर्जी मैटेरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी (HEMRL), इंस्ट्रूमेंट्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (IRDE) और डिफेंस लेबोरेटरी, जोधपुर ने इसके विभिन्न घटक विकसित किए।

जोधपुर की डिफेंस लेबोरेटरी ने थर्मल टारगेट सिस्टम भी तैयार किया, जिससे परीक्षण के दौरान दुश्मन के टैंक जैसी परिस्थितियाँ बनाई गईं। मिसाइल का IIR सीकर दिन और रात दोनों समय प्रभावी ढंग से काम करने में सक्षम है। भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) इसके विकास-सह-उत्पादन भागीदार हैं।

सफल परीक्षणों के बाद सेना में शामिल होने की दिशा में बढ़ा एक और कदम

MPATGM ने पिछले कुछ वर्षों में कई सफल परीक्षण पूरे किए हैं। जुलाई 2021 में इसकी न्यूनतम और अधिकतम मारक दूरी का सफल परीक्षण हुआ था। अप्रैल 2024 में पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में इसके वारहेड फ्लाइट ट्रायल सफल रहे, जहाँ आधुनिक टैंकों को भेदने की इसकी क्षमता साबित हुई।

11 जनवरी 2026 को महाराष्ट्र के अहिल्या नगर स्थित केके रेंज में इस मिसाइल का टॉप अटैक कैपिबिलिटी के साथ चल रहे लक्ष्य पर सफल परीक्षण किया गया। इस दौरान मिसाइल ने दिन और रात दोनों समय लक्ष्य भेदन क्षमता और ड्यूल-मोड सीकर कार्यक्षमता का भी सफल प्रदर्शन किया।

सफल परीक्षण के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने DRDO, उद्योग जगत और विकास एवं उत्पादन साझेदारों को बधाई देते हुए इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। वहीं DRDO के अध्यक्ष डॉ समीर वी कामत ने कहा कि इन सफल परीक्षणों के बाद यह हथियार प्रणाली भारतीय सेना में शामिल किए जाने की दिशा में महत्वपूर्ण चरण तक पहुँच गई है। DAC से खरीद की मंजूरी मिलने के बाद अब इसके सेना में शामिल होने का रास्ता और मजबूत हो गया है।

केवल MPATGM ही नहीं, सेना को मिलेंगे कई और अत्याधुनिक हथियार

रक्षा अधिग्रहण परिषद ने केवल MPATGM ही नहीं, बल्कि भारतीय सेना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कई अन्य आधुनिक हथियार प्रणालियों की खरीद को भी मंजूरी दी है। इनमें सबसे प्रमुख आकाश तरंग इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम है, जो दुश्मन के ड्रोन और अन्य मानव रहित हवाई वाहनों (UAV) से सेना की टुकड़ियों को सुरक्षा प्रदान करेगा।

यह केवल एंटी-ड्रोन प्रणाली नहीं, बल्कि हवाई खतरों का पता लगाने, उनकी निगरानी करने और आवश्यक होने पर उन्हें इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से निष्क्रिय करने में भी सक्षम है। इसके अलावा परिषद ने मिडियम रेंज सर्फेश टू एयर मिसाइल (MRSAM) प्रणाली की खरीद को मंजूरी दी है।

यह मध्यम दूरी से आने वाले लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, ड्रोन और मिसाइल जैसे हवाई खतरों से सुरक्षा प्रदान करेगी। वहीं वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (V-SHORADS) भी सेना की कम दूरी की हवाई सुरक्षा को मजबूत करेगी। मल्टी-स्पेक्ट्रल सेंसर से लैस यह प्रणाली कम ऊँचाई पर आने वाले हवाई खतरों का तेजी से पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने में सक्षम होगी।

परिषद ने टैंकों के लिए एक्टव प्रोटेक्शन सिस्टम (APS) की खरीद को भी मंजूरी दी है। यह प्रणाली टैंकों पर आने वाली एंटी-टैंक मिसाइलों और अन्य हमलों को निष्क्रिय कर उनकी सुरक्षा बढ़ाएगी। इसके साथ ही जेट आधारित कामिकाजे ड्रोन सिस्टम की खरीद को भी हरी झंडी मिली है।

ये ड्रोन लंबे समय तक हवा में रहकर लक्ष्य की निगरानी करते हैं और जरूरत पड़ने पर स्वयं लक्ष्य से टकराकर उसे नष्ट कर देते हैं। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, ये अधिक मारक क्षमता के साथ इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता भी बढ़ाएँगे और अपेक्षाकृत कम लागत वाला प्रभावी विकल्प साबित होंगे।

नौसेना और वायुसेना को भी मिलेगी नई ताकत

DAC ने भारतीय नौसेना के लिए मल्टी इंफ्लुएंस ग्राउंड माइन (MIGM), नवल शिपबॉर्न अनमैंड एरियल सिस्टम (NSUAS) और लैंड बेस्ड टेस्टिंग फैसिलिटी (LBTF) की स्थापना को भी मंजूरी दी है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, MIGM दुश्मन की समुद्री गतिविधियों और उसकी पैंतरेबाजी को रोकने में मदद करेगी।

वहीं अत्याधुनिक सेंसरों से लैस NSUAS नौसेना की समुद्री निगरानी और स्थितिजन्य जागरूकता को मजबूत करेगी। LBTF भारतीय नौसेना के इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम और उससे जुड़े उपकरणों के परीक्षण की जरूरतों को देश में ही पूरा करने में मदद करेगी।

भारतीय वायुसेना के लिए परिषद ने फिक्स्ड विंग हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट (FW-HAPS) की खरीद को भी मंजूरी दी है। यह प्रणाली लंबे समय तक ऊँचाई पर रहकर इंटेलिजेंस, सर्विलांस, रिकॉनिसेंस (ISR), दूरसंचार और रिमोट सेंसिंग जैसे महत्वपूर्ण मिशनों में वायुसेना की क्षमता को और मजबूत करेगी।

नई सैन्य नेतृत्व टीम की पहली DAC बैठक और आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा

यह रक्षा अधिग्रहण परिषद की पहली बैठक थी जिसमें नई सैन्य नेतृत्व टीम ने हिस्सा लिया। बैठक में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एन एस राजा सुब्रमणी, नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन और हाल ही में पदभार संभालने वाले थल सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ शामिल हुए।

जनरल धीरज सेठ पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि भविष्य के युद्धों को देखते हुए भारतीय सेना का आधुनिकीकरण उनकी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा। केंद्र सरकार ने फरवरी 2026 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद रक्षा बजट में 15 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी की थी।

वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए 7.85 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, जिसमें 2.19 लाख करोड़ रुपए पूंजीगत व्यय के लिए निर्धारित किए गए हैं। इस राशि का उपयोग लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, युद्धपोत, पनडुब्बियाँ, मिसाइलें, स्मार्ट हथियार और विभिन्न मानव रहित प्रणालियों की खरीद में किया जाएगा।

DAC द्वारा MPATGM सहित विभिन्न स्वदेशी हथियार प्रणालियों को AoN दिया जाना इस बात का संकेत है कि भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

MPATGM के सेना में शामिल होने से विदेशी एंटी-टैंक मिसाइलों पर निर्भरता कम होगी, जबकि DRDO, भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL), भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और अन्य भारतीय रक्षा उद्योगों को भी बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा।

यानी DAC के इन फैसलों से भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना की मारक क्षमता, निगरानी, हवाई सुरक्षा और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है।

स्किन-केयर बिजनेस में पाकिस्तानी दे रहे इंसानी गर्भनाल से सहयोग, चीन से वियतनाम तक फैला था गिरोह: जानिए एंटी-एजिंग और कॉस्मेटिक उत्पादों में कैसे होता था इस्तेमाल

पाकिस्तान में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने न सिर्फ वहाँ की जाँच एजेंसियों को, बल्कि पूरी दुनिया के मेडिकल और कॉस्मेटिक सेक्टर को हैरान कर दिया है। पाकिस्तान की फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) ने देश की राजधानी इस्लामाबाद में एक बेहद बड़े अंतरराष्ट्रीय गिरोह का भंडाफोड़ किया है।

इस गिरोह पर आरोप है कि यह स्थानीय अस्पतालों से नवजात बच्चों की ‘प्लेसेंटा‘ यानी गर्भनाल को अवैध रूप से खरीदता था, फिर उसे गुपचुप तरीके से प्रोसेस करके महँगे एंटी-एजिंग इंजेक्शन और कॉस्मेटिक उत्पाद बनाने के लिए वियतनाम तस्करी कर रहा था।

यह कार्रवाई इसलिए भी गंभीर है क्योंकि अस्पतालों से निकलने वाले जिस जैविक हिस्से को सामान्य तौर पर कचरा मानकर नष्ट कर दिया जाता है, उसे ये लोग करोड़ों रुपए के काले कारोबार में तब्दील कर चुके थे। इस पूरे मामले ने मेडिकल वेस्ट के मैनेजमेंट और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

कैसे हुआ इस अंतरराष्ट्रीय गिरोह का पर्दाफाश?

यह पूरी कार्रवाई पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में खुफिया सूचनाओं के आधार पर की गई। FIA को खबर मिली थी कि शहर के रिहायशी इलाकों में मानव अंगों और जैविक सामग्रियों की अवैध प्रोसेसिंग की जा रही है।

इसके बाद जाँच एजेंसी ने सबसे पहले इस्लामाबाद के बेहद पॉश इलाके F-7/1 में एक घर पर निगरानी रखने के बाद छापा मारा। वहाँ अधिकारियों को कोई सामान्य घर नहीं, बल्कि एक पूरी तरह से काम कर रहा अवैध प्रोसेसिंग प्लांट मिला, जहाँ मानव प्लेसेंटा को साफ करने, सुखाने और पैक करने की पूरी व्यवस्था थी।

गिरफ्तार किए गए आरोपितों से पूछताछ के आधार पर इस्लामाबाद के ही E-11 सेक्टर में एक और घर पर छापा मारा गया, जहाँ भारी मात्रा में रेफ्रिजरेटर, प्रोसेसिंग मशीनें और कच्चा जैविक सामान बरामद हुआ।

ठीक उसी दिन इस्लामाबाद एयरपोर्ट पर वियतनाम भेजे जा रहे 100 किलोग्राम प्लेसेंटा के एक बड़े कंसाइनमेंट को भी अधिकारियों ने जब्त कर लिया। इस पूरी कार्रवाई में कुल पाँच लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें तीन चीनी नागरिक ली गेंगकई, वांग बाओ और पेंग फेई गुआ और दो पाकिस्तानी नागरिक वकास और कासिम हनीफ शामिल हैं।

शुरुआत में इन लोगों ने दावा किया था कि यह भेड़ का प्लेसेंटा है, लेकिन कड़ाई से पूछताछ करने पर उन्होंने कुबूल किया कि यह इंसानी गर्भनाल है।

आखिर प्लेसेंटा (गर्भनाल) क्या होता है?

आम बोलचाल में हम जिसे गर्भनाल या अपरा कहते हैं, वह गर्भावस्था के दौरान महिला के गर्भाशय में विकसित होने वाला एक अस्थायी अंग है। यह माँ और गर्भ में पल रहे शिशु के बीच एक जीवन रेखा की तरह काम करता है।

इसी के जरिए माँ के शरीर से बच्चे तक ऑक्सीजन, जरूरी पोषक तत्व, फैट और हार्मोन पहुँचते हैं। साथ ही यह बच्चे के खून से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने का काम भी करता है।

जब बच्चे का जन्म होता है, तो उसके तुरंत बाद प्लेसेंटा भी माँ के शरीर से बाहर आ जाता है। इसके बाद इसका काम खत्म हो जाता है। सामान्य और कानूनी तौर पर इसे ‘बायो-मेडिकल वेस्ट’ यानी जैव-चिकित्सीय कचरा माना जाता है और अस्पतालों द्वारा इसे सुरक्षित तरीके से नष्ट कर दिया जाता है।

800 रुपए की खरीद और 7 लाख का इंजेक्शन: मुनाफे का गणित

इस अवैध धंधे के पीछे की सबसे बड़ी वजह अंधाधुंध मुनाफा था। FIA और पाकिस्तान की ह्यूमन ऑर्गन ट्रांसप्लांट अथॉरिटी की जाँच में सामने आया है कि यह गिरोह इस्लामाबाद और रावलपिंडी के सरकारी के साथ ही निजी अस्पतालों के कर्मचारियों से भी साँठगाँठ करके बेहद सस्ते दामों पर इसे खरीद लेता था।

अस्पतालों से प्रति पीस प्लेसेंटा को मात्र 800 पाकिस्तानी रुपए यानि (लगभग ढाई डॉलर) की मामूली कीमत पर खरीदा जाता था। इसके बाद इन अवैध फैक्ट्रियों में इसे सुखाकर पाउडर या अर्क के रूप में तैयार किया जाता था।

जब इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार जैसे वियतनाम या चीन में एंटी-एजिंग ट्रीटमेंट के लिए भेजा जाता था, तो इससे तैयार होने वाले एक सिंगल इंजेक्शन की कीमत 7,00,000 पाकिस्तानी रुपए यानि (लगभग 2530 डॉलर) तक पहुँच जाती थी। इसी भारी मुनाफे के लालच में अस्पतालों के कचरा प्रबंधन विभाग से लेकर ऊपरी स्तर के लोग भी इस रैकेट में शामिल थे।

तस्करी का पैमाना: हर महीने 200 किलो की खपत

जाँच एजेंसियों के मुताबिक, यह कोई शुरुआती या छोटा नेटवर्क नहीं था, बल्कि यह गिरोह लंबे समय से इंडस्ट्रियल स्तर पर काम कर रहा था। यह गिरोह हर महीने इस्लामाबाद और रावलपिंडी के अलग-अलग अस्पतालों से लगभग 200 KG मानव प्लेसेंटा इकट्ठा कर रहा था।

दोनों अवैध फैक्ट्रियों से जाँच टीम ने कुल 500 KG से अधिक संदिग्ध मानव प्लेसेंटा और उससे तैयार उत्पाद बरामद किए हैं। जाँच एजेंसी द्वारा साझा की गई तस्वीरों में देखा जा सकता है कि एक आलीशान घर के कमरों को बकायदा कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट में बदल दिया गया था, जहाँ ट्रॉलियों पर बड़ी-बड़ी ट्रे में मानव प्लेसेंटा को सुखाने के लिए रखा गया था।

अब FIA को शक है कि इस गिरोह के तार सिर्फ इस्लामाबाद तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि लाहौर, पेशावर और रावलपिंडी जैसे बड़े शहरों में भी फैले हुए हैं। इस बात की भी गहन जाँच की जा रही है कि कैसे एयरपोर्ट के इमिग्रेशन और कस्टम अधिकारियों की आँखों के सामने से ‘She Placenta’ के फर्जी कमर्शियल लेबल के तहत इतने संवेदनशील जैविक कचरे को विदेश भेजा जा रहा था।

कॉस्मेटिक और वेलनेस इंडस्ट्री में इसकी माँग क्यों है?

आपके मन में यह सवाल उठ सकता है कि आखिर इस जैविक कचरे से ऐसा क्या बनता है जिसके लिए लोग लाखों रुपए देने को तैयार हैं। दरअसल प्लेसेंटा प्राकृतिक रूप से प्रोटीन, आयरन, विटामिन, स्टेम सेल्स और ग्रोथ फैक्टर्स से भरपूर होता है।

वैश्विक स्तर पर वेलनेस, कॉस्मेटिक और वैकल्पिक चिकित्सा के कुछ बाजारों में यह दावा किया जाता है कि मानव या पशु प्लेसेंटा के अर्क से बनी क्रीम, सीरम और इंजेक्शन का इस्तेमाल इंसानी त्वचा को दोबारा जवान कर सकता है। इसे झुर्रियों को मिटाने, स्किन को टाइट करने और ऊतकों के पुनर्निर्माण के लिए एक जादुई दवा की तरह प्रचारित किया जाता है।

चिकित्सा विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि कॉस्मेटिक उत्पादों या एंटी-एजिंग में मानव प्लेसेंटा के फायदों को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण बेहद सीमित और विवादास्पद हैं और कई देशों में इसके इस तरह के व्यावसायिक उपयोग पर पूरी तरह प्रतिबंध है।

हालाँकि कानूनी तौर पर दुनिया के कई देशों में प्लेसेंटा का इस्तेमाल बेहद कड़े नियमों के तहत होता है। जब कोई माँ लिखित सहमति देती है, तो उसके प्लेसेंटा का उपयोग वैज्ञानिक अनुसंधान, गंभीर रूप से जले हुए मरीजों के इलाज, घावों को भरने और आँखों की कुछ विशेष सर्जरी के लिए किया जाता है। लेकिन यह सब सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त ऑर्गन प्रोक्योरमेंट संस्थाओं के जरिए ही हो सकता है, किसी गुप्त रिहायशी विला में नहीं।

कानून और स्वास्थ्य के लिहाज से यह कितना खतरनाक है?

अब सवाल उठता है की अस्पतालों से निकलने वाले प्लेसेंटा को सख्त नियमों के तहत नष्ट करना क्यों जरूरी है, इसके पीछे दो बड़े कारण हैं जिनमें पहला कानून और दूसरा जानलेवा संक्रमण का खतरा है।

पाकिस्तानी डॉक्टर के अनुसार, बच्चे के जन्म के बाद प्लेसेंटा को सामान्य कचरा नहीं माना जा सकता क्योंकि यह सीधे इंसानी खून और शारीरिक द्रव्यों के संपर्क में रहता है।

इस वजह से इसमें हेपेटाइटिस, HIV या अन्य संक्रामक बीमारियाँ फैलाने वाले वायरस और बैक्टीरिया मौजूद हो सकते हैं। अगर इसे सही तापमान पर वैज्ञानिक तरीके से डिस्पोज न किया जाए या इसकी अवैध प्रोसेसिंग बिना सुरक्षा उपकरणों के हो, तो यह समाज में बड़ी महामारी या गंभीर स्वास्थ्य संकट को जन्म दे सकता है।

अगर कानूनी पहलू की बात करें तो पाकिस्तान में मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम, 2010 के तहत किसी भी मानव अंग या जैविक हिस्से का व्यावसायिक इस्तेमाल या उसकी खरीद-फरोख्त पूरी तरह से गैर-कानूनी है।

इस कानून के तहत दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों को 10 साल तक की जेल और 10 लाख पाकिस्तानी रुपए तक का जुर्माना हो सकता है। फिलहाल पकड़े गए पाँचों आरोपितों पर इसी कानून के तहत सख्त धाराएँ लगाई गई हैं।

पाकिस्तान में अँगों की तस्करी का पुराना इतिहास

मानव बायोलॉजिकल मटेरियल की तस्करी पाकिस्तान के लिए कोई नई बात नहीं है क्योंकि इससे पहले भी वहाँ अवैध रूप से किडनी निकालने और बेचने वाले कई बड़े गिरोहों का पर्दाफाश हो चुका है।

अक्सर गरीब मजदूरों या लाचार लोगों को पैसों का लालच देकर या उनका अपहरण करके अवैध बेसमेंट और निजी क्लीनिकों में उनकी किडनी निकाल ली जाती थी और उसे अमीर स्थानीय या विदेशी मरीजों को बेच दिया जाता था।

मानव भ्रूण (Human Embryo) की तस्करी और इसके पीछे का सच

प्लेसेंटा तस्करी के इस बड़े खुलासे के बीच चिकित्सा और सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान एक और बेहद संवेदनशील और गंभीर विषय की ओर गया है, जिसे ‘ह्यूमन एम्ब्रियो’ यानी मानव भ्रूण की तस्करी कहा जाता है।

भ्रूण दरअसल गर्भावस्था के शुरुआती चरण का वह रूप होता है जिससे आगे चलकर बच्चा विकसित होता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह की जैविक सामग्रियों की तस्करी के पीछे दो सबसे बड़ी वजहें मानी जाती हैं, जिनमें पहली IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक और दूसरी स्टेम सेल रिसर्च है।

दुनिया के कई अमीर देशों में ऐसे संपन्न जोड़े जो प्राकृतिक रूप से माता-पिता नहीं बन पाते, वे संतान सुख के लिए अवैध सरोगेसी या बिना रिकॉर्ड वाले एम्ब्रियो की भारी माँग करते हैं।

इस माँग को पूरा करने के लिए तस्कर गिरोह विकासशील या गरीब देशों की लाचार महिलाओं को पैसों का लालच देकर उनके अंडे (Eggs) हासिल करते हैं और फिर लैब में भ्रूण तैयार कर उन्हें विदेशों में ऊँचे दामों पर बेच देते हैं।

इसके अलावा वैज्ञानिक जगत में स्टेम सेल थेरेपी को लेकर हो रहे शोध भी इसकी माँग बढ़ाते हैं, क्योंकि शुरुआती भ्रूण में मौजूद स्टेम कोशिकाओं में इंसानी शरीर के किसी भी अंग को दोबारा विकसित करने की क्षमता होती है।

कॉस्मेटिक और चिकित्सा के कुछ बाजारों में मानव भ्रूण के अर्क (Embryo Extract) को लेकर भी कई तरह के भ्रामक दावे किए जाते हैं। कुछ लोग मानते हैं  कि भ्रूण के तत्वों से बने उत्पाद त्वचा को हमेशा के लिए जवान रखने, असाध्य बीमारियों को ठीक करने और बढ़ती उम्र के असर को पूरी तरह रोकने में कारगर होते हैं।

वही चीन में लोग अपनी सेक्स क्षमता को बढ़ाने के लिए ह्यूमन एम्ब्रियो को कहते है, ऐसा ही साल 2000 की एक तस्वीर में देखने को मिलता है की एक चीनी नागरिक ह्यूमन एम्ब्रियो को कहा रहा है।

हालाँकि चिकित्सा विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने इस बात को पूरी तरह खारिज किया है और स्पष्ट किया है कि कॉस्मेटिक या एंटी-एजिंग उत्पादों में मानव भ्रूण के इस्तेमाल का कोई भी पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं है।

दुनिया के अन्य देशों में भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले

मानव प्लेसेंटा की अवैध खरीद-फरोख्त और चोरी का यह संकट सिर्फ किसी एक देश तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के कई अन्य कोनों में भी ऐसे मामले सामने आ चुके हैं।

चीन में समय-समय पर ऐसे कई ब्लैक मार्केट नेटवर्क पकड़े गए हैं जो आधिकारिक स्वास्थ्य चेतावनियों के बावजूद पारंपरिक दवाओं और हेल्थ सप्लीमेंट्स के लिए अस्पतालों से अवैध रूप से प्लेसेंटा खरीदते थे।

इसके अलावा अफ्रीका में ट्रेडिशनल मेडिसिन मार्केट, केन्या में आध्यात्मिक मान्यताओं और नाइजीरिया में पारंपरिक रीति-रिवाजों या आर्थिक लाभ के चलते अस्पतालों से प्लेसेंटा चोरी होने और उनकी अवैध बिक्री के मामले दर्ज किए जा चुके हैं।

वैश्विक स्वास्थ्य अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि प्लेसेंटा का उपयोग केवल स्वीकृत चिकित्सा अनुसंधान या फार्मास्युटिकल उद्देश्यों के लिए ही कानूनी माना जाता है, जिसके लिए मरीज की लिखित सहमति, नैतिक मंजूरी और कड़े सरकारी नियमों का पालन अनिवार्य है।

इसके विपरीत, बिना अनुमति के मानव प्लेसेंटा को इकट्ठा करना, बेचना या एक जगह से दूसरी जगह ले जाना पूरी दुनिया में गैर-कानूनी है। ऐसा करने पर मानव ऊतकों की चोरी, मेडिकल वेस्ट का अवैध प्रबंधन, धोखाधड़ी, जालसाजी और मानव जैविक सामग्री की तस्करी जैसे गंभीर आपराधिक मामलों के तहत सख्त कानूनी कार्रवाई की जाती है।

शुद्ध पेट्रोल गायब, E10 का विकल्प नहीं और हर गाड़ी पर E20 का बोझ: एथेनॉल नीति अच्छी, लेकिन आम आदमी को ईंधन चुनने की आजादी क्यों नहीं?

भारत सरकार ने 1 अप्रैल 2026 से देश के हर पेट्रोल पंप के लिए केवल E20 पेट्रोल बेचना अनिवार्य कर दिया है। E20 का मतलब है ऐसा पेट्रोल, जिसमें 20 प्रतिशत एथेनॉल मिला हो और जिसकी न्यूनतम ऑक्टेन रेटिंग 95 हो। बिना एथेनॉल वाला शुद्ध पेट्रोल बाजार से लगभग गायब हो चुका है। केवल कुछ प्रीमियम ब्रांड, जैसे इंडियन ऑयल का XP100, अब भी उपलब्ध हैं। यह 100-ऑक्टेन सुपर-प्रीमियम पेट्रोल है जिसकी कीमत ₹150 प्रति लीटर से ज्यादा है।

इस अचानक और पूरी तरह किए गए बदलाव से कार और दोपहिया वाहन मालिकों में काफी नाराजगी और चिंता है। कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता घटाना और एथेनॉल उत्पादन के जरिए किसानों की मदद करना अच्छे उद्देश्य हैं। लेकिन जिस तरीके से यह नीति लागू की जा रही है यानी लोगों से विकल्प छीनकर एक ही तरह का पेट्रोल सबके लिए अनिवार्य कर दिया गया है, उससे आम नागरिकों के सामने कई समस्याएँ खड़ी हो रही हैं। खासकर उन लोगों के लिए जो हर कुछ साल में अपना वाहन बदलने की स्थिति में नहीं हैं।

पुराने वाहन ज्यादा एथेनॉल वाले पेट्रोल के लिए नहीं बने

यह याद रखना जरूरी है कि भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का विचार बिल्कुल नया नहीं है। पिछली UPA सरकार ने E10 कार्यक्रम शुरू किया था, जिसमें पेट्रोल में 10 प्रतिशत एथेनॉल मिलाया जाता था। लेकिन उस समय इसे आज की तरह अनिवार्य नहीं किया गया था। देशभर के पेट्रोल पंपों पर बिना मिलावट वाला शुद्ध पेट्रोल भी मिलता रहा। इस कारण पुराने वाहनों के मालिक 100 प्रतिशत पेट्रोल खरीद सकते थे, अगर उनका वाहन 10 प्रतिशत एथेनॉल वाले पेट्रोल पर भी ठीक से नहीं चल रहा था।

भारत में 2011 के बाद बिके अधिकतर वाहन E10 के अनुकूल हैं। इसलिए ऐसे वाहन E10 पेट्रोल पर बिना किसी बड़ी दिक्कत के चलते रहे। लेकिन अब जब E20 ही हर जगह उपलब्ध एकमात्र पेट्रोल बन गया है और शुद्ध पेट्रोल हटा दिया गया है, तो वही पुराने वाहन और यहाँ तक कि 2022 या 2023 की शुरुआत तक बने कई वाहन भी मुश्किल में आ गए हैं। इसकी वजह यह है कि E20 के अनुकूल अधिकतर वाहन अप्रैल 2023 से ही बाजार में आने शुरू हुए, जब BS6 Phase 2 उत्सर्जन नियम लागू किए गए। इसका मतलब है कि 2011 के बाद और अप्रैल 2023 से पहले बने ज्यादातर वाहन E10 के अनुकूल थे लेकिन उन्हें 20 प्रतिशत एथेनॉल मिले पेट्रोल पर चलाने के लिए नहीं बनाया गया था।

नुकसान और माइलेज को लेकर चिंता

चिंता यह है कि एथेनॉल (भले ही कम मात्रा में हो) उन वाहनों को धीरे-धीरे नुकसान पहुँचा सकता है जिन्हें इसे झेलने के हिसाब से बनाया ही नहीं गया था। एथेनॉल हवा से नमी को आसानी से सोख लेता है। यह नमी पुराने वाहनों के मेटल फ्यूल टैंक, फ्यूल लाइन, इंजेक्टर और दूसरे हिस्सों में जंग और खराबी पैदा कर सकती है। यह रबर की पाइप, प्लास्टिक पार्ट्स, सील और गैसकेट पर भी असर डालता है। जिन वाहनों में कार्बोरेटर है या पुराने फ्यूल सिस्टम हैं, जो एथेनॉल के हिसाब से कैलिब्रेट नहीं किए गए हैं, उनमें एयर-फ्यूल मिक्सचर ज्यादा लीन हो सकता है। इससे पावर कम हो सकती है, इंजन झटके दे सकता है, स्टार्ट होने में दिक्कत आ सकती है और फिल्टर चोक हो सकते हैं।

सरकार ने कुछ अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा है कि E20 पुराने वाहनों को नुकसान नहीं पहुँचाता लेकिन उसने कुछ नुकसान की बात स्वीकार भी की है।

माइलेज भी घटता है, क्योंकि एथेनॉल में शुद्ध पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा कम होती है। पुराने वाहनों में यह कमी कई बार 3 से 6 प्रतिशत या उससे भी ज्यादा हो सकती है। अप्रैल 2023 के बाद बने नए वाहन E20 के हिसाब से डिजाइन किए गए हैं लेकिन भारतीय सड़कों पर अभी भी बड़ी संख्या में पुराने कार, बाइक और थ्री-व्हीलर चल रहे हैं, जिन्हें ज्यादातर E10 या उससे कम मिश्रण तक के लिए ही प्रमाणित किया गया था। ऐसे वाहनों पर जबरन E20 थोपना गलत है और इससे कई वाहन मालिकों के लिए मरम्मत का खर्च बढ़ेगा और पार्ट्स जल्दी बदलवाने पड़ेंगे।

मिले हुए पेट्रोल पर कोई छूट नहीं

इन तकनीकी समस्याओं के बावजूद सरकार का यह फैसला भी सवाल खड़े करता है कि एथेनॉल मिले पेट्रोल पर कोई छूट या कीमत में कमी नहीं दी जा रही है। एथेनॉल भारत में ही बनता है और आयातित कच्चे तेल की तुलना में सस्ता होता है। इसलिए पेट्रोल में इसे मिलाने से तेल कंपनियों की कुल लागत कम होनी चाहिए। इसके बावजूद पेट्रोल पंप पर कीमत इस तरह कम नहीं हुई कि उपभोक्ताओं को वास्तविक राहत मिले। दूसरी तरफ माइलेज कम होने के कारण अब लोगों को वही दूरी तय करने के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है।

आम आदमी दोहरा बोझ उठा रहा है। एक तरफ उसके वाहन को नुकसान होने की आशंका है और दूसरी तरफ प्रति किलोमीटर चलने की वास्तविक लागत बढ़ रही है। इसके बदले उसे कोई मुआवजा या राहत नहीं मिल रही। ऐसा लगता है कि फायदा कहीं और जा रहा है, जबकि कीमत आम नागरिक चुका रहा है।

केंद्र सरकार ने मिश्रित पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी माफ करने का फैसला किया है लेकिन हैरानी की बात यह है कि इसमें E20 पेट्रोल शामिल नहीं है जिसे फिलहाल हर व्यक्ति खरीदने के लिए मजबूर है। यह छूट E22, E25, E27 और E30 फ्यूल ब्लेंड्स पर लागू होती है जिनमें क्रमशः 22 प्रतिशत, 25 प्रतिशत, 27 प्रतिशत और 30 प्रतिशत एथेनॉल मिला होता है। ये मिश्रण अभी बाजार में उपलब्ध नहीं हैं। ये फिलहाल पाइपलाइन में हैं और जल्द लाए जाएँगे।

उपभोक्ताओं को विकल्प मिलना चाहिए

इसका सही समाधान सरल है और कई देशों में पहले से काम कर रहा है। सरकार को बाजार में अलग-अलग एथेनॉल मिश्रण एक साथ उपलब्ध कराने चाहिए जैसे E10, E20, E30 और नए फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए इससे भी ऊँचे ग्रेड। इन्हें पेट्रोल पंपों पर अलग-अलग डिस्पेंसर या विकल्पों के रूप में बेचा जाना चाहिए और इनके दामों में भी अंतर होना चाहिए। जैसे आज लोग अपने वाहन और बजट के हिसाब से रेगुलर और प्रीमियम पेट्रोल चुनते हैं, वैसे ही वाहन मालिकों को यह आजादी होनी चाहिए कि वे अपनी कार या बाइक के लिए उपयुक्त ब्लेंड चुन सकें।

पुराने वाहनों को E10 या उस कम एथेनॉल मिश्रण पर चलते रहने की सुविधा मिलनी चाहिए, जो उनके लिए सुरक्षित हो। नए वाहन चाहें तो ज्यादा एथेनॉल वाले मिश्रण का इस्तेमाल कर सकते हैं, अगर उससे बेहतर प्रदर्शन मिलता हो या किफायती हो तो।

कई देशों में लोगों को अपने वाहन के लिए सही ईंधन चुनने की आजादी है। एक ही पेट्रोल पंप पर अलग-अलग कीमतों पर अलग-अलग मिश्रण उपलब्ध होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हमारे यहाँ आज रेगुलर पेट्रोल, प्रीमियम पेट्रोल और हाई-ऑक्टेन पेट्रोल मिलते हैं। अमेरिका में सामान्य पेट्रोल ज्यादातर E10 होता है लेकिन फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए E85 भी बड़े पैमाने पर उपलब्ध है। ब्राजील में पेट्रोल पंपों पर आमतौर पर लगभग 27 प्रतिशत एथेनॉल मिला सामान्य गैसोलीन और लगभग शुद्ध एथेनॉल यानी E100, दोनों उपलब्ध होते हैं।

सरकार ने E22, E25, E27 और E30 के मानक पहले ही अधिसूचित कर दिए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, पेट्रोल पंपों पर एक साथ पेट्रोल के कई मिश्रण उपलब्ध कराए जाएँगे और वाहन मालिक अपने वाहन के लिए सबसे बेहतर विकल्प चुन सकेंगे। लेकिन पुराने वाहनों के लिए E10 जैसे कम एथेनॉल मिश्रण का कोई प्रस्ताव नहीं है। ज्यादा एथेनॉल वाले ये मिश्रण कम एथेनॉल वाले विकल्पों के साथ विकल्प के रूप में आने चाहिए, न कि उन्हें पूरी तरह हटाकर उनकी जगह लेने चाहिए। इससे उन करोड़ों लोगों की सुरक्षा होगी जो अब भी पुराने लेकिन पूरी तरह चलने योग्य वाहन चला रहे हैं।

जब शुद्ध पेट्रोल अब लगभग नहीं मिल रहा और पुराने वाहनों के लिए कोई सुरक्षित विकल्प नहीं बचा है, ऐसे में सभी लोगों पर एक ही तरह का E20 पेट्रोल थोपना सही नहीं है। यह न तो आम लोगों के साथ न्याय है और न ही व्यावहारिक फैसला।

सरकार को चाहिए कि वह जल्द से जल्द पेट्रोल के अलग-अलग विकल्प उपलब्ध कराए। जैसे E10, E20 और दूसरे मिश्रण जिससे लोग अपने वाहन और अपनी जेब के हिसाब से सही ईंधन चुन सकें। दुनिया के कई विकसित देशों में यही व्यवस्था है। लंबे समय में भारत के वाहन मालिकों के लिए भी यही बेहतर होगा। आम आदमी को इतनी राहत और विकल्प मिलना चाहिए।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

चलाता था बच्चियों से रेप करने वाला ‘ग्रूमिंग गैंग’, सजा पूरी होने से पहले ही छोड़ा: जानिए कौन है ‘डैडी’ शब्बीर अहमद, ब्रिटेन में क्यों मचा है बवाल?

ब्रिटेन में बच्चों के यौन शोषण के सबसे चर्चित मामलों का दोषी शबीर अहमद 14 साल जेल में रहने के बाद रिहा हो गया है। उसकी रिहाई के बाद पूरे ब्रिटेन में विरोध शुरू हो गया है। लोग उसे पाकिस्तान भेजने की माँग कर रहे हैं।

लेकिन ब्रिटेन के पुराने कानून और पाकिस्तान के रुख की वजह से यह मामला उलझ गया है। इस स्थिति के चलते ब्रिटेन की सड़कों पर तनाव है और पीड़ितों में गहरा खौफ बना हुआ है। जानते हैं कि शबीर अहमद कौन है और उसकी रिहाई पर इतना विवाद क्यों हो रहा है।

कौन है रेपिस्ट शबीर अहमद और क्या थे उस पर आरोप?

शबीर अहमद मूल रूप से पाकिस्तान में जन्मा एक अपराधी है। वह कई दशक पहले ब्रिटेन आया था और वहाँ रहने लगा था। साल 2012 में ब्रिटिश अदालत ने उसे रोशडेल शहर में नाबालिग और बेसहारा लड़कियों के साथ दरिंदगी करने वाले 9 लोगों के एक गिरोह का मुख्य सरगना (रिंगलीडर) घोषित किया था।

शबीर अहमद को लड़कियों से रेप और गंभीर यौन अपराधों के 30 मामलों में दोषी पाते हुए 22 साल की जेल की सजा सुनाई गई थी। अदालत की कार्यवाही के दौरान यह सामने आया था कि शबीर अहमद और उसका गैंग बेहद शातिर था। वे मासूम लड़कियों को मुफ्त खाना, सिगरेट और शराब का लालच देकर अपने जाल में फँसाते थे।

इसके बाद उनका बार-बार शारीरिक और मानसिक शोषण किया जाता था। लड़कियाँ इस आरोपित से इस कदर डरती थीं कि उसे ‘डैडी’ कहकर बुलाने पर मजबूर थीं। इस मामले को आधुनिक ब्रिटिश इतिहास के सबसे घिनौने और काले अध्यायों में से एक माना जाता है, जिसने ब्रिटेन के पुलिस सिस्टम की कमियों को उजागर किया था।

जेल से रिहाई के बाद पीड़ितों में खौफ और सड़कों पर गुस्सा

शबीर अहमद को हाल ही में एक ‘अर्ली रिलीज स्कीम’ (जल्दी रिहाई योजना) के तहत 14 साल जेल में बिताने के बाद छोड़ दिया गया। हालाँकि, जेल से बाहर आने के बाद भी उस पर चौबीस घंटे कड़ी नजर रखी जा रही है। अधिकारियों ने उसके पैर में एक GPS इलेक्ट्रॉनिक टैग लगा दिया है, जिससे उसकी हर हरकत ट्रैक हो रही है।

शबीर अहमद को रोशडेल और ओल्डहैम जैसे इलाकों में जाने की पूरी तरह मनाही है, ताकि वह पीड़ितों के आसपास न फटक सके। इसके बावजूद, इस दरिंदे की रिहाई की खबर मिलते ही पीड़ितों के जख्म फिर हरे हो गए हैं। एक पीड़िता ने मीडिया को बताया कि वह अपने और अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर डरी हुई है।

पीड़िता ने आगे कहा कि वे लोग डर के मारे घर से बाहर नहीं कदम रख पा रहे है। वहीं दूसरी तरफ, रोशडेल के स्थानीय युवाओं और प्रदर्शनकारियों ने पीड़ितों की सुरक्षा के लिए खुद ही सड़कों पर उतरकर रात में गश्त (विजिलेंटे पेट्रोलिंग) शुरू कर दी है। जनता का मानना है कि ऐसे समाज के दुश्मन को खुले में रहने का कोई हक नहीं है।

इमिग्रेशन एक्ट 1971 का वो पेंच, जो बना अहमद का ढाल

शबीर अहमद को दोषी ठहराए जाने के बाद ब्रिटिश सरकार ने उसकी ब्रिटिश नागरिकता को रद्द कर दिया था। इस फैसले के बाद वह कानूनी रूप से सिर्फ एक पाकिस्तानी नागरिक रह गया है। इसके बावजूद, ब्रिटिश सरकार चाहकर भी उसे तत्काल प्रभाव से पाकिस्तान डिपोर्ट यानी देश से बाहर नहीं निकाल पा रही है।

इसके पीछे ब्रिटेन का 55 साल पुराना एक कानून आड़े आ रहा है, जिसने सरकार के हाथ बांध दिए हैं। दरअसल, ब्रिटिश इमिग्रेशन एक्ट 1971 के तहत कॉमनवेल्थ (राष्ट्रमंडल) देशों के उन नागरिकों को डिपोर्ट करने से सुरक्षा मिली हुई है, जो साल 1973 से पहले ब्रिटेन आए थे।

इस नियम के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति 1973 से पहले आया और कम से कम 5 साल तक वहाँ कानूनी रूप से रहा, तो उसे वापस नहीं भेजा जा सकता। चूंकि पाकिस्तान उस दौर में कॉमनवेल्थ का हिस्सा था और अहमद 1960 के दशक के आखिरी सालों में ब्रिटेन आ गया था, इसलिए वह इस कानूनी खामी का फायदा उठाकर ब्रिटेन में ही टिका हुआ है।

पाकिस्तान का अड़ंगा और ब्रिटिश सरकार की अगली रणनीति

ब्रिटिश सरकार इस समय इस मामले को लेकर चौतरफा दबाव में है। देश के बड़े राजनीतिक नेताओं का कहना है कि यह कानून गंभीर अपराधियों को बचाने के लिए नहीं बनाया गया था। प्रधानमंत्री की ओर से गृह मंत्रालय को इस मामले की समीक्षा करने के आदेश दिए गए हैं।

ब्रिटिश संसद में चल रहे नए इमिग्रेशन बिल के जरिए इस पुराने कानून को बदलने या इसमें संशोधन करने की कोशिशें तेज कर दी गई हैं ताकि कानूनी रास्ता साफ हो सके। हालाँकि, कानून बदल जाने के बाद भी सरकार के सामने एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती खड़ी है।

ब्रिटिश अधिकारियों ने इस मुद्दे पर पाकिस्तान सरकार से बातचीत शुरू की है, लेकिन पाकिस्तान अपने ऐसे अपराधियों को वापस लेने में हमेशा आनाकानी करता रहा है। इससे पहले भी रोशडेल गैंग के 2 अन्य अपराधियों की नागरिकता छीनी गई थी, लेकिन पाकिस्तान ने उन्हें अपने देश में एंट्री देने से साफ मना कर दिया था।

अब ब्रिटेन के कुछ नेताओं का कहना है कि अगर पाकिस्तान इस बार भी अहमद को स्वीकार नहीं करता है, तो ब्रिटेन को उसे दी जाने वाली विदेशी मदद में कटौती कर देनी चाहिए।

FIFA World Cup Round of 32: स्पेन, पुर्तगाल और स्विट्जरलैंड की जीत, अब आगे क्या?

पिछली रात से लगातार बारिश हो रही है। मुंबई के कई इलाकों में पानी भर गया है। इसके चलते पिछले तीन घंटों से बिजली भी नहीं है। मैंने जो मोमबत्तियाँ जलाई थीं, अब उनकी लौ मद्धम होने लगी है। टेबल पर गुज़रे दिन के टाइम्स ऑफ इंडिया का खेल-पृष्ठ फड़फड़ा रहा है, जिसमें एमबाप्पे की तारीफों के पुल बाँधे गए हैं। खिड़की के बाहर बरसात का शोर है। रह-रहकर बिजली की गड़गड़ाहट सुनाई देती है। मैं किचन में जाकर चाय बनाने लगता हूँ। अदरक की महक पूरे किचन में फैल चुकी है।

अचानक मेरा ध्यान टेबल पर पड़े अखबार की उस खबर पर जाता है, जिसमें लिखा था कि भारी बारिश के चलते नवी मुंबई में कॉलेज जाने वाली दो छात्राओं की मौत हो गई थी, क्योंकि सड़क पर भरे पानी में करंट दौड़ रहा था। किसी ने सच ही कहा है कि बारिश सबके लिए खुशियाँ लेकर नहीं आती। वह सभी के लिए एक-सी नहीं होती। और यहाँ बात सिर्फ बारिश तक ही सीमित नहीं है।

फुटबॉल विश्व कप का कारवाँ जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे वह हमें कई बेहतरीन मुकाबलों की सौगात देता जा रहा है। खूबसूरत किस्सों और कहानियों का सिलसिला लगातार जारी है। गुज़री रात हमने सेनेगल को टूर्नामेंट से बाहर होने से पहले शानदार फुटबॉल खेलते देखा।

किसे मालूम था कि मैदान के बाहर भी सेनेगल की टीम कई मुश्किलों से जूझ रही थी। कोच पापे थियाव का नया अनुबंध महीनों तक अधर में लटका रहा। खिलाड़ियों के बोनस और भुगतान को लेकर भी विवाद चलता रहा। कैंप की व्यवस्थाओं और भोजन की गुणवत्ता को लेकर भी असंतोष की खबरें सामने आती रहीं। मगर मजाल है कि मैदान पर उनके प्रदर्शन में कहीं कोई कमी दिखाई दी हो। जब भी वे मैदान पर उतरे, अपने देश के लिए अंतिम क्षण तक जान लगा दी। मैदान पर वे सचमुच शेर की तरह लड़े। वे राउंड ऑफ 16 में जगह तो नहीं बना सके, लेकिन अपने जज़्बे के लिए उन्हें दुनिया भर के खेलप्रेमियों का सम्मान और स्नेह मिला। यही कहानियाँ इस खेल को इतना खूबसूरत बना देती हैं।

बीती रात साढ़े बारह बजे लॉस एंजेलिस स्टेडियम में स्पेन को इस टूर्नामेंट के अपने पहले नॉकआउट मुकाबले में ऑस्ट्रिया से भिड़ना था। स्पेनिश कोच लुई डे ला फुएन्ते ने पिछले मैच की विजयी प्लेइंग इलेवन में सिर्फ एक बदलाव करते हुए अपनी टीम को मैदान में उतारा। पिछले मुकाबले में राइट बैक की भूमिका में मार्कोस लोरेन्ते थे, लेकिन इस बार उनकी जगह पेड्रो पोर्रो को मौका मिला। बाकी टीम पिछले मैच जैसी ही थी।

मैच के शुरुआती पलों से ही स्पेनिश टीम ग्रुप स्टेज के मुकाबले कहीं अधिक आत्मविश्वास से भरी दिखाई दी। छोटे-छोटे जादुई पासों के साथ वह लगातार विपक्षी गोलपोस्ट की ओर बढ़ती रही। दाहिने फ्लैंक पर अपने शानदार ड्रिबल्स से लामीन यमाल ऑस्ट्रियाई खिलाड़ियों की नाक में दम किए हुए थे। वहीं बाएँ छोर से एलेक्स बाएना भी लगातार गोल के अवसर तैयार कर रहे थे। नतीजा यह हुआ कि मैच के छत्तीसवें मिनट में सेंट्रल फॉरवर्ड मिकेल ओयारजाबाल ने गोल दागकर स्पेन को बढ़त दिला दी।

ऑस्ट्रिया ने बराबरी करने की पूरी कोशिश की, लेकिन स्पेन की रक्षापंक्ति में मौजूद उन्नीस वर्षीय पाऊ कुबार्सी और अनुभवी आयमेरिक लापोर्त के सामने उनकी एक न चली। सच तो यह था कि ऑस्ट्रिया इस मैच में कभी पूरी तरह संभल ही नहीं पाया। स्पेन ने लगभग पैंसठ प्रतिशत समय गेंद अपने कब्जे में रखी और विपक्षी गोलपोस्ट पर कुल बाईस शॉट लगाए। आगे चलकर पेड्रो पोर्रो और ओयारजाबाल ने एक-एक और गोल दागते हुए स्पेन को 3-0 की शानदार जीत दिला दी। पूरे मुकाबले में ऑस्ट्रिया एक भी शॉट लक्ष्य पर नहीं लगा सका, जो स्पेन के रक्षात्मक प्रदर्शन की मजबूती को दिखाता है।

इस जीत के साथ स्पेन राउंड ऑफ 16 में पहुँच गया। साथ ही, 2010 विश्व कप जीतने के बाद पहली बार स्पेन ने FIFA विश्व कप के नॉकआउट चरण का कोई मुकाबला अपने नाम किया।
अगले मैच में टोरंटो के मैदान पर पुर्तगाल का सामना क्रोएशिया से होना था। दुनिया भर से हजारों दर्शक अपने सबसे चहेते खिलाड़ी को खेलते देखने पहुँचे थे। मैच से पहले क्रिस्टियानो रोनाल्डो की बहन ने यह संकेत दिया था कि संभव है विश्व कप के बाद रोनाल्डो इस खूबसूरत खेल को हमेशा के लिए अलविदा कह दें। यह सुनते ही समर्थकों का उत्साह और भी बढ़ गया।

कोच रॉबर्टो मार्टिनेज़ अपनी टीम को 4-2-3-1 की फॉर्मेशन के साथ आक्रामक सोच लेकर मैदान में उतारते हैं। अटैकिंग लाइन में क्रिस्टियानो रोनाल्डो का साथ राफेल लिआओ और पेड्रो नेटो दे रहे थे। वहीं मिडफ़ील्ड में ब्रुनो फर्नानदेज़ के साथ विटिन्हा और होआओ नेवेश मौजूद थे।
ईवान पेरिसिच, लुका मॉद्रिच और मातेओ कोवाचिच जैसे अनुभवी खिलाड़ियों के नेतृत्व में क्रोएशिया भी इस मुकाबले को हल्के में लेने के मूड में नहीं था। रेफरी की सीटी बजते ही टोरंटो स्टेडियम में हजारों दर्शकों के शोर के बीच यह हाई-वोल्टेज मुकाबला शुरू हो गया। यह मैच शायद क्रिस्टियानो रोनाल्डो या उनके पुराने साथी लुका मॉद्रिच में से किसी एक का राष्ट्रीय जर्सी में आखिरी विश्व कप मुकाबला भी हो सकता था।

मैच के तीसरे मिनट में ही आंते बुदीमीर का नीचा शॉट गोलकीपर रोक लेते हैं। इसके जवाब में पुर्तगाल की ओर से ब्रुनो फर्नानदेज़ तुरंत जवाबी हमला करते हैं, लेकिन उनका प्रयास भी सफल नहीं हो पाता। खेल आगे बढ़ता है। राफेल लिआओ एक सटीक पास बॉक्स के भीतर ब्रुनो फर्नानदेज़ की ओर बढ़ाते हैं, मगर क्रोएशियाई रक्षापंक्ति फिर शानदार बचाव करती है। दोनों टीमें लगातार आक्रमण करती रहीं, लेकिन किसी को सफलता नहीं मिली। इसी के साथ पहले हाफ का खेल समाप्त हुआ और स्कोर 0-0 से बराबरी पर रहा।

दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। मातेओ कोवाचिच पुर्तगाल के गोलपोस्ट की दिशा में एक सटीक निशाना साधते हैं, लेकिन गोलकीपर शानदार बचाव करते हुए उसे रोक लेते हैं। मगर मैच के तिरेपनवें मिनट में ईवान पेरिसिच, जोसिप स्टानिसिक के शानदार पास को गोल में तब्दील कर देते हैं। इसके साथ ही क्रोएशिया मुकाबले में 1-0 की बढ़त हासिल कर लेता है। मैदान में मौजूद लगभग 44 हजार दर्शकों में बड़ी संख्या पुर्तगाली समर्थकों की थी। उन सभी को मानो एक बड़ा झटका लग चुका था।

इस गोल के दस मिनट के भीतर ही क्रोएशिया दो बार फिर हमला करता है, लेकिन वह अपनी बढ़त को दोगुना नहीं कर पाता। दबाव में दिख रही पुर्तगाली टीम के कोच रॉबर्टो मार्टिनेज़ तुरंत दो बदलाव करते हैं। विटिन्हा, ब्रुनो फर्नानदेज़ और पेड्रो नेटो की जगह क्रमशः बरनार्डो सिल्वा, नेल्सन सेमेडो और फ्रांसिस्को कोन्सेकाओ को मैदान में भेजा जाता है। लेकिन इन बदलावों के साथ एक और बड़ा फैसला देखने को मिलता है। डिफेंडर होआओ कैंसेलो की जगह स्ट्राइकर गोंकालो रामोस को उतारा जाता है। मकसद बिल्कुल साफ था; अब पुर्तगाल पूरी ताकत के साथ लगातार आक्रमण करने वाला था।

इन सब्स्टीट्यूशन्स के बाद पुर्तगाल नई ऊर्जा से भर उठता है। तुरंत ही वह एक गोल भी दाग देता है, लेकिन VAR उसे अमान्य कर देता है। खेल आगे बढ़ता है। पुर्तगाल को एक कॉर्नर मिलता है, जिसे लेने नूनो मेंडेस आगे आते हैं। इसी दौरान क्रोएशियाई बॉक्स में एक फाउल हो जाता है। क्रोएशिया के खिलाड़ियों के विरोध के बावजूद VAR की समीक्षा के बाद पुर्तगाल को पेनाल्टी मिल जाती है।

क्रिस्टियानो रोनाल्डो, जो अब तक FIFA विश्व कप के किसी भी नॉकआउट मुकाबले में गोल नहीं कर सके थे, गेंद के पीछे खड़े होते हैं। गोलकीपर तैयार थे। रेफरी सीटी बजाते हैं। रोनाल्डो गेंद को गोलकीपर की दाईं ओर भेजते हुए पेनाल्टी को गोल में बदल देते हैं। स्कोर 1-1 से बराबर हो जाता है। यह टूर्नामेंट में उनका तीसरा गोल था।

खेल फिर आगे बढ़ता है। मातेओ कोवाचिच एक बार फिर पुर्तगाल के गोलपोस्ट की दिशा में शानदार शॉट लगाते हैं, लेकिन गोलकीपर फिर बेहतरीन बचाव करते हैं। आज कोवाचिच शानदार लय में दिखाई दे रहे थे। कुछ ही देर बाद क्रोएशिया को कॉर्नर मिलता है। लुका मॉद्रिच गेंद के पास खड़े होते हैं। उनकी किक पर मातानोविच ऊँची छलांग लगाकर हेडर लगाते हैं, लेकिन गेंद क्रॉसबार के ऊपर से निकल जाती है। अगले ही पल मातानोविच फिर गेंद को कोवाचिच की ओर बढ़ाते हैं। वह एक और दमदार शॉट लगाते हैं, मगर पुर्तगाल का गोलकीपर फिर शानदार सेव कर लेता है।

अस्सी मिनट का खेल पूरा हो चुका था। कोच रॉबर्टो मार्टिनेज़ क्रिस्टियानो रोनाल्डो को बाहर बुलाकर उनकी जगह रुबेन नेवेश को मैदान में उतारते हैं। दोनों ही टीमें लगातार विपक्षी गोलपोस्ट पर हमले करती रहती हैं, लेकिन स्कोर अब भी 1-1 से बराबरी पर था। निर्धारित नब्बे मिनट पूरे होने के बाद रेफरी दस मिनट का स्टॉपेज टाइम देते हैं।

90+2 मिनट पर क्रोएशियाई कोच एक मिडफील्डर को बाहर बुलाकर डिफेंडर योश्को ग्वार्डियोल को मैदान में भेजते हैं। इस बदलाव का उद्देश्य साफ था—स्टॉपेज टाइम में अपनी रक्षापंक्ति को और मजबूत करना। लेकिन जैसे ही ग्वार्डियोल मैदान पर आते हैं, पुर्तगाल के स्थानापन्न खिलाड़ी गोंकालो रामोस गोल दाग देते हैं। 90+4 मिनट में राफेल लिआओ बाईं ओर से शानदार क्रॉस डालते हैं, जिसे गोंकालो रामोस बेहतरीन हेडर के साथ गोल में बदल देते हैं। टूर्नामेंट में अपने पहले गोल के साथ वह स्टॉपेज टाइम में पुर्तगाल को 2-1 की बढ़त दिला देते हैं।
क्या सेनेगल के बाद अब क्रोएशिया भी शानदार खेल दिखाने के बावजूद अंतिम क्षणों में टूर्नामेंट से बाहर होने जा रहा था?

पूरी पुर्तगाली टीम अब अपने बॉक्स के आसपास सिमटकर रक्षण करने लगती है। 90+14 मिनट में क्रोएशिया एक गोल दाग देता है। पुर्तगाली डगआउट में सन्नाटा छा जाता है। लाल जर्सी पहने उनके समर्थक भी हैरान रह जाते हैं। इस मुकाबले में हर कुछ मिनट बाद नया मोड़ आ रहा था। क्या अब मैच एक्स्ट्रा टाइम में जाएगा?

लेकिन तभी VAR हस्तक्षेप करता है और रेफरी गोल का फैसला पलट देते हैं। क्रोएशियाई खिलाड़ी इस फैसले का विरोध करते हैं, लेकिन रेफरी का निर्णय अंतिम होता है। खेल फिर शुरू होता है। 90+19 मिनट पर हर पल नया मोड़ लेता यह हाई-वोल्टेज मुकाबला आखिरकार समाप्त हो जाता है।

यह एक शानदार मैच था। विवादित फैसलों से भरे इस रोमांचक मुकाबले को किसी तरह पुर्तगाल जीतकर अगले दौर में अपनी जगह बना लेता है। अब राउंड ऑफ 16 में उसका सामना अपने चिर-प्रतिद्वंद्वी स्पेन से होगा। यह ऐसा मुकाबला होगा जिसे फुटबॉल प्रेमी शायद ही मिस करना चाहेंगे।

उधर, क्रोएशिया का सफर यहीं समाप्त हो जाता है। इस दर्दनाक हार के साथ शायद लुका मॉद्रिच और क्रोएशिया की राष्ट्रीय टीम का साथ भी हमेशा के लिए समाप्त हो गया।

फिर दिन के अगले मुकाबले की बिसात वैंकूवर में सजती है, जहाँ स्विट्जरलैंड का सामना अल्जीरिया से था। स्विट्जरलैंड के स्ट्राइकर ब्रील एम्बोलो ने मैच के दसवें मिनट में ही गोल दागकर अपनी टीम को शुरुआती बढ़त दिला दी। लगभग तीस से चालीस मीटर तक जोहान मनजाम्बी अकेले गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं। मौका मिलते ही वह गेंद गोलपोस्ट की दिशा में बढ़ाते हैं, जिसे वहाँ मौजूद एम्बोलो शानदार अंदाज़ में गोल में बदल देते हैं।

दूसरे हाफ की शुरुआत होते ही स्विस विंगर दान न्दोए दाईं ओर से शानदार किक लगाते हैं। अल्जीरिया के गोलकीपर के पास उसका कोई जवाब नहीं था। स्विट्जरलैंड दूसरे हाफ की शुरुआत में ही अपना दूसरा गोल कर चुका था। स्कोर 2-0 हो जाता है। आखिर तक यही स्कोर बना रहता है और स्विट्जरलैंड राउंड ऑफ 16 में अपनी जगह पक्की कर लेता है, जहाँ अगले सप्ताह उसका सामना कोलंबिया और घाना के बीच होने वाले मुकाबले की विजेता टीम से वैंकूवर में ही होगा।

आज खेले गए मुकाबलों में पुर्तगाल और क्रोएशिया का मैच सबसे रोमांचक रहा। कभी क्रोएशिया हावी दिखाई दिया तो कभी पुर्तगाल। यह मुकाबला आखिरी सीटी तक दर्शकों को अपनी सीटों से बाँधे रखने में सफल रहा।

अब आज रात डलास स्टेडियम में मिस्र का सामना ऑस्ट्रेलिया से होगा। दोनों ही टीमें यह मुकाबला जीतकर टूर्नामेंट में अपनी उम्मीदें ज़िंदा रखना चाहेंगी। ऑस्ट्रेलिया अपने ड्रीम रन को बरकरार रखते हुए आज एक और बड़ा शिकार करने की कोशिश करेगी।

फिर कल, भारतीय समयानुसार रात साढ़े तीन बजे, मियामी के मैदान पर 2022 विश्व विजेता अर्जेंटीना और काबो वर्दे के बीच मुकाबले का किक-ऑफ होगा। छोटे से द्वीपीय देश काबो वर्दे के खिलाड़ियों ने विराट हौसले के साथ खेलते हुए यहाँ तक का सफर तय किया है। वे एक और बड़ा उलटफेर करने के इरादे से मैदान में उतरेंगे।

हालांकि अर्जेंटीना के कोच लियोनेल स्कालोनी ने मैच से पहले साफ कहा है कि काबो वर्दे को हल्के में लेने की भूल नहीं की जा सकती। स्पेन और उरुग्वे जैसी टीमों को रोक चुकी यह टीम किसी भी बड़े देश के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है।

इस मुकाबले में लियोनेल मेस्सी के सामने होंगे वोज़िन्हा। यह सचमुच देखने लायक टक्कर होगी। एक ओर होंगे मेस्सी, जो मैदान के किसी भी कोने से गोल करने की क्षमता रखते हैं। दूसरी ओर होंगे वोज़िन्हा, जिनके सामने गोल करने में बड़ी-बड़ी टीमों के पसीने छूट चुके हैं।

मेस्सी इस समय शानदार फॉर्म में हैं। वह इस विश्व कप में छह गोल के साथ गोल्डन बूट की दौड़ में किलियन एमबाप्पे के बराबर चल रहे हैं।

इसके बाद कल सुबह सात बजे घाना का सामना कोलंबिया से होगा। अपने ग्रुप में, जिसमें पुर्तगाल भी शामिल था, शीर्ष स्थान पर रहने वाली कोलंबिया इस मुकाबले में निश्चित रूप से फेवरेट होगी। लेकिन नॉकआउट मुकाबलों में कुछ भी हो सकता है।

घाना की कोशिश होगी कि वह बेहद मजबूत रक्षापंक्ति के सहारे पूरे 120 मिनट तक ‘लॉस कैफेटेरोस’ को गोल करने से रोके रखे। अगर वह ऐसा करने में सफल रहता है, तो शानदार फॉर्म में चल रही कोलंबिया भी बड़े उलटफेर का शिकार हो सकती है। वहीं कोलंबिया को बेहद सतर्क रहना होगा और ‘ब्लैक स्टार्स’ को बिल्कुल भी कमतर आँकने की भूल नहीं करनी चाहिए।

हर विश्व कप में तरह-तरह की भविष्यवाणियाँ भी चर्चा का विषय बनती रही हैं। वर्ष 2010 के विश्व कप में ‘पॉल बाबा’ नाम के ऑक्टोपस ने दुनिया भर में सुर्खियाँ बटोरी थीं। कभी कोई तोता, तो कभी कोई सफेद बिल्ली ऐसी भविष्यवाणियों के कारण चर्चा में आ जाती है।

इस बार घाना के पारंपरिक आध्यात्मिक गुरु नाना क्वाकू बोनसाम सुर्खियों में हैं। उन्होंने दावा किया था कि उन्होंने अपनी राष्ट्रीय टीम के खिलाफ होने वाले मुकाबले से पहले इंग्लैंड के स्टार स्ट्राइकर हैरी केन पर आध्यात्मिक बंधन लगा दिया था, जिसके कारण हैरी केन उस मैच में गोल नहीं कर सके। लेकिन बंधन हटने के बाद अगले ही मुकाबले में केन ने गोल दागकर अपनी टीम को अगले दौर में पहुँचा दिया।

अब नाना क्वाकू बोनसाम ने एक और बड़ी भविष्यवाणी कर दी है। उनका दावा है कि अर्जेंटीना काबो वर्दे के खिलाफ होने वाला मुकाबला हार जाएगा। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा है कि लियोनेल मेस्सी अब इस विश्व कप में आगे कोई गोल नहीं कर पाएँगे।

इसके बाद दुनिया भर में अर्जेंटीना के समर्थकों के बीच इस भविष्यवाणी को लेकर खूब चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि, इन भविष्यवाणियों में कितना सच है और कितना अंधविश्वास, इसका फैसला तो मैदान पर होने वाला खेल ही करेगा। खैर, उस मुकाबले में क्या होगा, यह तो वक्त ही बताएगा।

आगे की खबरों के लिए हमारे साथ बने रहिए। यूँ ही हमारे चहेते खेल के बेहतरीन किस्से आपके सामने आते रहेंगे।

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में सुलझा धर्मांतरण विवाद, 26 परिवारों ने की घर वापसी: पढ़ें- साय सरकार ने मिशनरियों पर कैसे कसी नकेल, पहले कॉन्ग्रेस देती थी विवादों को हवा

छत्तीसगढ़ का बस्तर और जशपुर अंचल लंबे समय से ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण के खेल का केंद्र रहा है। भोले-भाले जनजातीय लोगों को बहला-फुसलाकर, तरह-तरह के प्रलोभन देकर या नए जमाने के डिजिटल माध्यमों से जाल में फंसाकर उनकी मूल संस्कृति से दूर करने की साजिशें यहाँ लंबे समय से आम रही हैं।

ताजा मामला छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के भरंडा और खड़का गाँवों से सामने आया, जहाँ धर्मांतरण को लेकर जनजातीय समाज और मतांतरित ईसाइयों के बीच तनाव चरम पर पहुँच गया था। स्थिति इतनी बिगड़ गई थी कि ईसाई मजहब को मानने वाले 26 परिवारों को ग्रामीणों ने सामाजिक बहिष्कार कर गाँव छोड़ने का अल्टीमेटम दे दिया था।

सालों से सुलग रही इस चिंगारी को जहाँ पिछली कॉन्ग्रेस सरकार के समय हिंसक होने के लिए खुला छोड़ दिया जाता था, वहीं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की भाजपा सरकार और प्रशासनिक मुस्तैदी ने इसका समाधान निकाला।

नारायणपुर के खड़का गाँव में दिनभर चले तनाव के बाद प्रशासनिक मध्यस्थता के बीच मतांतरित परिवारों ने ईसाई मजहब का त्याग कर अपनी मूल जनजातीय संस्कृति और दूमा हांडी को छूकर सनातनी जड़ों में घर वापसी की है।

आइए जानते हैं कि आखिर नारायणपुर में यह विवाद क्यों भड़का, ईसाई मिशनरियाँ किस तरह ग्रामीण इलाकों में जहर घोल रही हैं और कैसे भाजपा सरकार छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 के जरिए इस समस्या की जड़ पर प्रहार कर रही है।

नारायणपुर के भरंडा और खड़का गाँव का पूरा विवाद

नारायणपुर जिले के भरंडा थाना क्षेत्र के भरंडा गाँव और उससे लगे खड़का गाँव में मतांतरण को लेकर उपजा असंतोष अचानक नहीं भड़का था, बल्कि इसकी पृष्ठभूमि दिसंबर 2025 से ही तैयार हो रही थी। गाँव में बड़ी संख्या में जनजातीय समुदायों को ईसाई मिशनरियों द्वारा कनवर्ट किया जा रहा था।

इससे मूल सनातन परंपरा और पेन संस्कृति को मानने वाले ग्रामीण बेहद आक्रोशित थे। 9 जून 2026 के बाद स्थिति तब और ज्यादा बिगड़ गई जब दोनों पक्षों के बीच जमकर मारपीट हुई और इस झड़प में कई महिलाओं के घायल होने की भी सूचना मिली।

इस घटना के बाद ग्रामीणों का विरोध लगातार बढ़ता गया और गाँव के गयता तथा पटेल समेत प्रमुख लोगों ने ईसाई मजहब मानने वाले 26 परिवारों को एक-एक कर घरों से बाहर निकाल दिया। घर से निकाले जाने के बाद ये परिवार गाँव के बाहर पेड़ों की छाँव में और खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हो गए।

ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप था कि ये मतांतरित लोग गाँव की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, रीति-रिवाजों और सामुदायिक संस्थाओं का पालन नहीं कर रहे थे, जिससे पूरा सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा था।

दूमा हांडी स्पर्श और आगा देवता की पूजा से निकला शांतिपूर्ण समाधान

जहाँ कॉन्ग्रेस के शासनकाल में ऐसे मामलों में केवल लीपापोती की जाती थी और मिशनरियों को मौन संरक्षण दिया जाता था, वहीं भाजपा सरकार के प्रशासन ने मध्यस्थता का ऐसा रास्ता निकाला जो पूरी तरह जनजातीय संस्कृति की रक्षा करता है। खड़का गाँव में दिनभर चले गतिरोध और तनाव के बाद प्रशासन, पुलिस और ग्रामीणों के बीच मैराथन बैठक हुई।

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक और तहसीलदार सहित बड़ी संख्या में पुलिस बल की मौजूदगी में मतांतरित परिवारों ने स्वीकार किया कि उनसे बड़ी चूक हुई थी और वे अपनी मूल संस्कृति में लौटना चाहते हैं। इसके बाद बस्तर की अति-पारंपरिक आदिवासी रीति-नीति के अनुसार मतांतरित परिवार के सदस्यों ने पितरों की पवित्र मटकी यानी दूमा हांडी का स्पर्श किया।

इसके बाद ग्राम आगा देवता की विशेष पूजा-अर्चने में भाग लेकर सामाजिक रूप से पुनः गाँव में शामिल होने की प्रक्रिया पूरी की। इस सामाजिक शुद्धि और घर वापसी के बाद ग्रामीणों ने अपना विरोध समाप्त कर दिया।

वहीं भरंडा गाँव में भी यह लिखित समझौता हुआ कि ईसाई परिवार बस्ती के भीतर कोई भी चंगाई सभा, घर पर सामूहिक प्रार्थना या ईसाई पद्धति से अंतिम संस्कार जैसी धार्मिक गतिविधि नहीं करेंगे, साथ ही गाँव वालों ने उन्हें मूल धर्म में लौटने के लिए एक महीने का समय दिया है।

ईसाई मिशनरियों का घिनौना खेल और ग्रामीण इलाकों में गहराया तनाव

छत्तीसगढ़ के सुदूर वनांचल क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों की सक्रियता कोई मजहबी प्रचार का सामान्य मामला नहीं है, बल्कि यह देश के जनसांख्यिकीय ढाँचे को बदलने का एक सुविचारित एजेंडा है। मिशनरियाँ यहाँ के सीधे-साधे जनजातीय लोगों की गरीबी, बीमारी और कम पढ़े-लिखे होने का अनुचित फायदा उठाती हैं।

जनजातीय समाज प्रकृति पूजक और हिंदू सनातन व्यवस्था का अटूट हिस्सा रहा है, लेकिन मिशनरियाँ जब इनका धर्मांतरण कराती हैं, तो सबसे पहले वे जनजातीय लोगों को उनकी पारंपरिक पेन व्यवस्था, बुढ़ादेव की पूजा और पुरखों के रीति-रिवाजों को छोड़ने के लिए उकसाती हैं।

इससे गाँवों में सदियों पुराना आपसी भाईचारे का सामाजिक ताना-बाना बिखर जाता है। इसके अलावा जादुई इलाज और चंगाई सभाओं के नाम पर बड़ा फ्रॉड किया जाता है। कनवर्ट होने के बाद ये लोग अपने ही सगे भाइयों से नफरत करने लगते हैं, जिससे गृह-युद्ध जैसी स्थिति पैदा होती है।

जशपुर के हर्रापाठ गाँव का उदाहरण भी सामने आया था, जहाँ राष्ट्रपति की दत्तक संतान कहे जाने वाले पहाड़ी कोरबा जनजाति की 24 एकड़ से अधिक जमीन पर ईसाई बन चुके लोगों द्वारा चर्च बनाने के लिए अवैध कब्जे की कोशिश की गई थी, जिसे बाद में भारी राजनीतिक और सामाजिक दबाव के बाद मुक्त कराया जा सका।

जब मिशनरियों के इशारे पर फूटा था जनजातीय और SP का सिर

नारायणपुर में हुआ यह विवाद कोई पहली घटना नहीं है, क्योंकि छत्तीसगढ़ में ईसाई मिशनरियों के आक्रामक धर्मांतरण के खिलाफ जनजातीय समाज का आक्रोश पहले भी हिंसक रूप ले चुका है। दिसंबर 2022 और जनवरी 2023 का नारायणपुर के एड़का गाँव का दंगा इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

एड़का पंचायत के गोर्रा गाँव में नए-नए ईसाई बने मतांतरितों ने चर्च के पादरियों के नेतृत्व में जनजातीय समाज के लोगों पर लाठी, डंडों, रॉड और धारदार हथियारों से जानलेवा हमला कर दिया था। इसके विरोध में जब जनजातीय समाज ने पाँच हजार से अधिक लोगों की महा-रैली निकाली, तो चर्च के इशारे पर बाहर से बुलाए गए करीब 700 से 800 ईसाइयों की उग्र भीड़ ने भारी पत्थरबाजी की थी।

इस दौरान स्थिति को शांत कराने पहुँचे नारायणपुर के तत्कालीन SP सदानंद कुमार पर चर्च के भीतर ही हमला किया गया, जिससे उनका सिर फट गया था। इस हिंसक झड़प में थाना प्रभारी भुनेश्वर जोशी और कई अर्धसैनिक बलों के जवान भी लहूलुहान हुए थे, जिससे साफ पता चलता है कि मिशनरी किस हद तक कानून व्यवस्था को चुनौती देने की तैयारी के साथ काम करते हैं।

कॉन्ग्रेस राज में तुष्टिकरण और खुली छूट बनाम भाजपा राज में त्वरित न्याय

छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के साथ ही धर्मांतरण के खिलाफ लड़ाई का दृष्टिकोण पूरी तरह बदल गया है और दोनों सरकारों के रवैये में जमीन-आसमान का अंतर साफ देखा जा सकता है। कॉन्ग्रेस के शासनकाल में वोट बैंक की राजनीति के कारण अवैध धर्मांतरण पर आँखें मूंद ली गई थीं।

यहाँ तक कि तत्कालीन सरकार के मंत्रियों के रिश्तेदारों पर ही जनजातीय लोगों की कीमती जमीनें ठग कर अपने नाम कराने के गंभीर आरोप लगे थे। उस दौर में जब जनजातीय समाज शिकायत लेकर जाता था, तो जिला प्रशासन मूकदर्शक बना रहता था, जिसके कारण छोटे विवाद अंततः बड़े हिंसक दंगों में बदल जाते थे।

इसके विपरीत, वर्तमान विष्णु देव साय की भाजपा सरकार स्पष्ट रूप से जनजातीय संस्कृति और सनातन अस्मिता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। नारायणपुर, भरंडा और खड़का के मामलों में जैसे ही विवाद की भनक लगी, एएसपी और तहसीलदार भारी पुलिस बल के साथ खुद मौके पर पहुँचे और चौबीस घंटे के भीतर कानून का डर दिखाते हुए शांतिपूर्ण समाधान निकाला।

कड़े प्रशासनिक रुख के कारण अब मतांतरितों को भी समझ आ गया है कि सरकार पूरी तरह जनजातीय समाज के साथ खड़ी है, इसलिए वे स्वेच्छा से घर वापसी का मार्ग चुन रहे हैं।

छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 के सख्त कानूनी प्रावधान

विष्णु देव साय सरकार केवल तात्कालिक प्रशासनिक समझौतों पर भरोसा नहीं कर रही है, बल्कि वह इस सामाजिक बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 लेकर आई। यह कानून वर्ष 1968 के पुराने मध्य प्रदेश के कानून की जगह लेगा, जिसकी कमजोरियों का फायदा उठाकर मिशनरी गिरोह आसानी से बच निकलते थे।

नए कानून के तहत सामूहिक धर्मांतरण को राज्य की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना गया है, इसलिए इसके दोषियों को कम से कम दस साल से लेकर आजीवन कारावास यानी पूरी जिंदगी जेल में काटने की सजा मिलेगी और साथ ही देश में सर्वाधिक पच्चीस लाख रुपए का भारी जुर्माना भी लगाया जाएगा।

यदि कोई व्यक्ति किसी नाबालिग, महिला, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति का अवैध तरीके से धर्म बदलवाता है, तो उसे दस से बीस साल तक की जेल काटनी होगी। इसके अतिरिक्त, सोशल मीडिया या ऑनलाइन गेमिंग के जरिए किए जाने वाले डिजिटल धर्मांतरण को भी इस कानून के दायरे में लाया गया है।

इसके तहत सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होंगे, जिससे पुलिस बिना वारंट के पादरियों या दलालों को गिरफ्तार कर सकेगी और विशेष अदालतों में इसकी त्वरित सुनवाई होगी।

घर वापसी को मिला कानूनी कवच और जड़ों की ओर लौटना हुआ आसान

इस नए कानून की सबसे क्रांतिकारी और बहुप्रशंसित विशेषता यह है कि यह धर्मांतरण और अपनी जड़ों की ओर लौटने यानी घर वापसी के बीच के अंतर को पूरी तरह स्पष्ट करता है। कानून के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अपना मौजूदा बाहरी धर्म छोड़कर वापस अपने पैतृक धर्म या अपने पूर्वजों के मूल धर्म यानी सनातन अथवा जनजातीय संस्कृति में लौटता है, तो इसे कानूनी रूप से धर्मांतरण नहीं माना जाएगा।

इसका सबसे बड़ा व्यावहारिक लाभ यह है कि नारायणपुर के खड़का गाँव के जनजातीय समाज ने जो दूमा हांडी छूकर अपनी मूल परंपरा में वापसी की है, उसके लिए उन्हें किसी जिला मजिस्ट्रेट को पहले से सूचना देने या तीस दिनों तक किसी सरकारी आपत्ति का इंतजार करने की कोई आवश्यकता नहीं होगी।

सरकार ने अपनी मूल संस्कृति और धर्म में वापस आने वाले लोगों के लिए कानूनी दरवाजे पूरी तरह से अड़चन-मुक्त और खुले रखे हैं, जबकि नया धर्म अपनाने वालों के लिए कठोर स्क्रूटनी की व्यवस्था की है ताकि कोई भी लाचारी या मजबूरी का फायदा न उठा सके।

नारायणपुर का खड़का और भरंडा विवाद देश के सामने एक जीवंत उदाहरण है कि जब शासन और प्रशासन की नीयत साफ हो, तो बिना किसी खून-खराबे के सनातन संस्कृति की रक्षा की जा सकती है। ईसाई मिशनरियों ने सुदूर वनांचलों में जनजातीय समाज को बाँटने और समाज में जहर घोलने का जो धंधा चला रखा था, उस पर अब भाजपा सरकार के कड़े रुख और नए कानून ने पूरी तरह से पूर्णविराम लगा दिया है।

छत्तीसगढ़ सरकार का यह रवैया साफ संदेश देता है कि राज्य के हर नागरिक की परंपरा, संस्कृति और उसके विश्वास को सुरक्षित रखना उनकी प्राथमिकता है और अब राज्य में धोखे या प्रलोभन के जरिए धर्मांतरण का खेल खेलने वालों के लिए कोई जगह नहीं बची है।

गया में मोमोज खिलाकर नाबालिग हिंदू लड़कियों के अश्लील वीडियो बनाने वाला रेहान गिरफ्तार, दिल्ली तक पहुँची पुलिस: ग्राउंड रिपोर्ट में पढ़ें पूरी ट्रेन की तलाशी से आत्मसमर्पण तक की कहानी

बिहार के गया जिले के बांकेबाजार में नाबालिग और अन्य युवतियों के अश्लील वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल करने के सनसनीखेज मामले में मुख्य आरोपित मोहम्मद रेहान को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। आरोपित गिरफ्तारी से बचने के लिए लगातार अपनी लोकेशन बदल रहा था और पुलिस की विशेष जाँच टीम (SIT) को चकमा देकर दिल्ली से बिहार तक भागता फिर रहा था। आखिरकार पुलिस के चौतरफा बढ़ते दबाव और लगातार की जा रही छापेमारी के बाद आरोपित ने पटना के फुलवारी शरीफ थाने में आत्मसमर्पण कर दिया।

गया पुलिस की टीम उसे ट्रांजिट रिमांड पर लेकर गया आई, जहाँ उसका मेडिकल कराने और अदालत में पेश करने के बाद उसे गया मंडल कारागार (जेल) भेज दिया गया है। इस घटना के बाद स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश था, जिसे देखते हुए पुलिस अब इस मामले में त्वरित सुनवाई (स्पीडी ट्रायल) सुनिश्चित करने की तैयारी कर रही है।

मोमोज खिलाकर शोषण का क्या है पूरा मामला?

यह पूरा मामला गया जिले के बाँकेबाजार थाना क्षेत्र का है, जहाँ सोशल मीडिया पर कुछ आपत्तिजनक और अश्लील वीडियो प्रसारित होने के बाद विवाद की शुरुआत हुई। आरोपित मोहम्मद रेहान पर आरोप है कि वह इलाके की लड़कियों को रील बनाने के बहाने अपने जाल में फंसाता था, उनसे दोस्ती करता था और फिर उनके अश्लील वीडियो बना लेता था। इन वीडियो के जरिए वह लड़कियों को ब्लैकमेल करता था और उनके साथ जबरन संबंध बनाता था। बताया जा रहा है कि उसके निशाने पर लगभग 20 हिंदू लड़कियाँ थीं, जिनके वीडियो और तस्वीरें उसके पास होने की बात सामने आई है।

मामला तब उजागर हुआ जब एक पीड़ित नाबालिग लड़की के भाई को इस घिनौनी करतूत की भनक लगी। पीड़िता महादलित वर्ग से आती है। भाई ने हिम्मत दिखाते हुए बाँकेबाजार थाने में मुख्य आरोपित मोहम्मद रेहान के खिलाफ नामजद प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपित के खिलाफ पॉक्सो एक्ट (POCSO Act), आईटी एक्ट (IT Act) और अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) समेत कई अन्य गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया।

मामले की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक अन्य पीड़ित युवती, जिसका एक साल पहले विवाह हो चुका था, आरोपित रेहान ने उसके ससुराल तक इन अश्लील वीडियो को भेजकर उसका घर उजाड़ने की कोशिश की थी।

इस घटना के सामने आने के बाद पूरे बांकेबाजार इलाके में जबरदस्त तनाव और आक्रोश फैल गया। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने आरोपित की अविलंब गिरफ्तारी और सख्त से सख्त सजा की माँग को लेकर बाँकेबाजार को पूरी तरह बंद रखा। बाजार बंद के दौरान लोगों ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन भी किया, जिसके बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया और आरोपित को पकड़ने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान शुरू किया गया।

बिहार पुलिस ने SIT गठित कर की ताबड़तोड़ छापेमारी

मामले की संवेदनशीलता और जनता के भारी आक्रोश को देखते हुए गया के वरीय पुलिस अधीक्षक (SSP) सुशील कुमार ने तुरंत एक्शन लिया। उन्होंने शेरघाटी के डीएसपी संदीप कुमार के नेतृत्व में चार सदस्यीय विशेष जाँच दल (SIT) का गठन किया। एसआईटी ने तकनीकी और वैज्ञानिक अनुसंधान का सहारा लेते हुए आरोपित की तलाश शुरू की।

जाँच के शुरुआती चरण में पुलिस ने सबसे पहले नाबालिग पीड़िता का अदालत में धारा 164 के तहत बयान दर्ज कराया, ताकि कानूनी तौर पर केस मजबूत रहे। इसके साथ ही फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की टीम को कथित घटनास्थल पर भेजा गया, जहाँ से टीम ने कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्य एकत्र किए।

इंटरनेट और सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे वायरल वीडियो की डिजिटल जाँच भी शुरू की गई ताकि यह पता लगाया जा सके कि मुख्य आरोपित के अलावा इस वीडियो को आगे फैलाने में और किन-किन लोगों की भूमिका रही है। तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर पुलिस इस रैकेट से जुड़े अन्य संदिग्धों की भी सरगर्मी से तलाश कर रही है।

ऑपइंडिया से बातचीत में बाँकेबाजार पुलिस का बड़ा खुलासा

इस पूरे घटनाक्रम और आरोपित को पकड़ने के लिए किए गए ‘कैट एंड माउस चेस’ (चूहे-बिल्ली के खेल) को लेकर बाँकेबाजार थाना के पदाधिकारी पवन कुमार ने ‘ऑपइंडिया’ से एक्सक्लूसिव बातचीत में कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। उन्होंने बताया कि यह पूरा मामला 29 जून 2026 को तब प्रकाश में आया, जब पीड़ित नाबालिग के भाई ने थाने आकर पुलिस को एक पेन-ड्राइव सौंपी। इस पेन-ड्राइव में 5 से 6 बेहद आपत्तिजनक और अश्लील वीडियो मौजूद थे। वीडियो देखते ही पुलिस ने तुरंत केस दर्ज कर आरोपित रिहान की तलाश शुरू कर दी।

थाना पदाधिकारी पवन कुमार ने ऑपइंडिया को बताया कि तकनीकी निगरानी (सर्विलांस) के दौरान पुलिस को सूचना मिली कि आरोपित दिल्ली भाग गया है। बांकेबाजार थाना की एक विशेष टीम तुरंत दिल्ली के लिए रवाना हुई। इसी बीच पुलिस को खुफिया जानकारी मिली कि आरोपित दिल्ली से ‘पुरुषोत्तम एक्सप्रेस’ ट्रेन में सवार होकर वापस बिहार लौट रहा है। पुलिस टीम ने मुस्तैदी दिखाते हुए उत्तर प्रदेश के प्रयागराज रेलवे स्टेशन पर तगड़ी घेरेबंदी की। चलती ट्रेन में पूरी छानबीन की गई, बोगियों को खंगाला गया और पुरुषोत्तम एक्सप्रेस के टीटीई (TTE) की मदद लेकर पूरी रिजर्वेशन लिस्ट भी देखी गई, लेकिन रेहान वहाँ नहीं मिला।

ट्रेन में तलाशी अभियान के बाद पुलिस टीम मिर्जापुर स्टेशन पर उतरी और वापस दिल्ली के लिए रवाना हुई। दिल्ली पहुँचने पर पुलिस को पता चला कि रिहान को पुलिस की भनक लग चुकी थी और वह महज 5 घंटे पहले ही वहाँ से अपनी भाभी के साथ फरार हो गया था। थाना पदाधिकारी ने बताया कि रेहान बेहद शातिर तरीके से पुलिस से बच रहा था; वह गिरफ्तारी से बचने के लिए लगातार अपना मोबाइल बंद रखता था और पूरे दिन में सिर्फ दो-तीन घंटे में एक बार कुछ मिनटों के लिए फोन ऑन करता था। दिल्ली से भागकर वह अयोध्या के रास्ते वाराणसी पहुँचा और फिर वहाँ से बिहार में दाखिल हुआ।

पुलिस टीम ने इस दौरान तकनीकी लोकेशन के आधार पर आरोपित की भाभी से संपर्क साधा और फोन पर उसे सख्त निर्देश दिया कि वे आरोपित को तुरंत आत्मसमर्पण करने के लिए कहें, क्योंकि पुलिस ने उसे चारों तरफ से घेर लिया है और भागने का कोई रास्ता नहीं बचा है। पुलिस के इसी चौतरफा तकनीकी और सामाजिक दबाव के आगे घुटने टेकते हुए आखिरकार मोहम्मद रेहान ने पटना के फुलवारी शरीफ थाने में जाकर सरेंडर कर दिया।

थाना पदाधिकारी पवन कुमार ने आगे स्पष्ट किया कि आरोपित मोहम्मद रेहान की उम्र 18 वर्ष से अधिक है (यानी वह कानूनी रूप से बालिग है) और उस पर लगे आरोप बेहद संगीन हैं। पुलिस ने आरोपित का मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिया है, जो इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सबूत है। इस फोन को फॉरेंसिक ऑडिट के लिए भेजा जा रहा है ताकि डिलीट किए गए डेटा और अन्य वीडियो को भी रिकवर किया जा सके और यह साफ हो सके कि उसने और कितनी लड़कियों को अपनी हवस और ब्लैकमेलिंग का शिकार बनाया था।

आईजी विकास वैभव बोले- महिला अपराध पर होगी कड़ी कार्रवाई

इस संवेदनशील मामले पर मगध रेंज के महानिरीक्षक (IG) विकास वैभव ने कड़ा रुख अपनाया है। आईजी विकास वैभव ने स्पष्ट रूप से कहा कि महिलाओं की गरिमा, सम्मान और सुरक्षा को ठेस पहुँचाने वाले किसी भी अपराध को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ऐसे अपराधों में शामिल लोगों के खिलाफ पुलिस बेहद कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित कर रही है।

आईजी ने यह भी आश्वासन दिया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए गया पुलिस इस केस में त्वरित सुनवाई (स्पीडी ट्रायल) सुनिश्चित करने का पूरा प्रयास करेगी। पुलिस का लक्ष्य है कि वैज्ञानिक और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर अदालत में जल्द से जल्द चार्जशीट दाखिल की जाए, ताकि न्यायिक कार्यवाही बिना किसी देरी के पूरी हो सके और आरोपित को कानून के तहत निर्धारित अधिकतम व उचित सजा दिलाई जा सके।

बेटियों की सुरक्षा और उनके डिजिटल स्पेस को लेकर चिंता

गयाजी के बाँकेबाजार की इस घटना ने एक बार फिर सोशल मीडिया के दुरुपयोग और ग्रामीण इलाकों में पैर पसार रहे डिजिटल अपराधों की ओर ध्यान खींचा है। हालाँकि इस मामले में पुलिस की तत्परता, दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश और पटना तक की गई घेरेबंदी और तकनीकी सूझबूझ की सराहना हो रही है। मुख्य आरोपित मोहम्मद रेहान के जेल जाने के बाद स्थानीय बाजार तो खुल गए हैं और लोगों का गुस्सा कुछ शांत हुआ है, लेकिन इलाके के अभिभावकों में अब भी अपनी बेटियों की सुरक्षा और उनके डिजिटल स्पेस को लेकर चिंता बनी हुई है। अब सबकी नजरें कोर्ट के ट्रायल पर टिकी हैं, जहाँ इस बात का फैसला होगा कि पीड़ित बेटियों को कितनी जल्दी न्याय मिलता है।

‘इस अव्यवस्था के जिम्मेदार गोपाल राव हैं’: राम मंदिर चंदा चोरी केस में निर्मोही अखाड़े के निशाने पर ‘बिना पद वाले सबसे पॉवरफुल’ शख्स, जानिए- कौन हैं नागरकट्टे?

अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद हर दिन इससे जुड़े नए-नए विवाद सामने आ रहे हैं। अब निर्मोही अखाड़ा ने गोपाल राव नागरकट्टे को इस विवाद का सबसे बड़ा चेहरा बताया है। गोपाल राव नागरकट्टे ट्रस्ट में किसी आधिकारिक प्रशासनिक पद पर न होते हुए भी मंदिर प्रबंधन के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति माने जाते हैं।

चंदा चोरी विवाद गहराने के बाद अब ट्रस्ट के आजीवन सदस्य और निर्मोही अखाड़ा के प्रमुख महंत दिनेंद्र दास ने गोपाल राव पर सीधे और गंभीर आरोप लगाए हैं। वहीं दूसरी तरफ, विश्व हिंदू परिषद (VHP) के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने साफ कर दिया है कि इस मामले में किसी को बख्शा नहीं जाएगा और चाहे कोई भी हो, उसकी भूमिका की पूरी जाँच होगी।

‘गोपाल राव राजनीति कर रहे’: निर्मोही अखाड़ा का आरोप

राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य और निर्मोही अखाड़ा के प्रमुख महंत दिनेंद्र दास ने गोपाल राव को इस पूरे विवाद और अव्यवस्था के लिए जिम्मेदार ठहराया है। महंत दिनेंद्र दास ने कहा कि गोपाल राव राम मंदिर की पुरानी वैष्णव परंपराओं को ताक पर रखकर ‘राजनीति खेल रहे हैं’। वे उत्तर प्रदेश की राम परंपरा को छोड़कर जबरन दक्षिण की परंपरा थोपने का प्रयास कर रहे हैं, जिससे मंदिर में अव्यवस्था फैली है।

महंत दिनेंद्र दास ने आपत्ति जताई कि गर्भगृह में राम लला की सेवा के लिए केवल उन्हीं लोगों को जाने की अनुमति होनी चाहिए जो कंठी पहनते हैं और दीक्षित हैं, लेकिन ट्रस्ट में इन नियमों का पालन ठीक से नहीं हो रहा है। निर्मोही अखाड़ा के प्रमुख ने चंदा चोरी मामले में गिरफ्तार आरोपित टिन्नू यादव का जिक्र करते हुए कहा कि गोपाल राव ने ऐसे गलत लोगों को शह दी है।

उन्होंने आगे कहा, “हमने गोपाल राव को ट्रस्ट में लाकर गलती की। उन्हें अनिल मिश्रा ने पेश किया था और अब हम ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।” महंत दिनेंद्र दास ने माँग की है कि गोपाल राव को तुरंत उनके पद और ट्रस्ट के आंतरिक कामकाज से दूर किया जाना चाहिए। हालाँकि, उन्होंने चंपत राय का बचाव करते हुए कहा कि चंपत राय के साथ उनके अपने लोगों ने ही धोखा किया है।

‘चंपत राय का इस्तीफा हुआ, गोपाल राव की भी हो जाँच’: VHP नेता का बयान

विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ नेता और कानूनी विशेषज्ञ आलोक कुमार ने एक टीवी इंटरव्यू में इस पूरे विवाद पर अपनी बात रखी है। आलोक कुमार ने दावा किया कि उन्हें पक्का मालूम है कि चंपत राय और अनिल मिश्रा दोनों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी जी ने उनके इस्तीफे को स्वीकार किया है और आगामी ट्रस्ट की बैठक में इस पर चर्चा होगी।

इंटरव्यू में जब आलोक कुमार से पूछा गया कि चंपत राय ने 7 जून को बयान दिया था कि ‘चोरी का कोई सबूत नहीं है और ऑडिट चल रहा है’, जबकि पुलिस 4 जून को ही रिकवरी कर चुकी थी, तो आलोक कुमार ने कहा, “मैं चंपत जी के उस बयान का समर्थन नहीं कर सकता। वह बयान नहीं आना चाहिए था। सत्य के साथ कोई समझौता नहीं होना चाहिए।” हालाँकि, उन्होंने चंपत राय की तारीफ करते हुए यह भी कहा कि अयोध्या में क्या हो रहा है, यह चंपत जी से छुपा नहीं रहता था।

इसके अलावा, जब आलोक कुमार से पूछा गया कि गोपाल राव ट्रस्ट में न होते हुए भी वहाँ क्या कर रहे थे, तो उन्होंने कहा कि गोपाल राव वहाँ अन्य ट्रस्टियों की व्यवस्थाओं में सहायता कर रहे थे। उन्होंने स्पष्ट कहा, “जो भी आरोपित है, उसकी गहन जाँच होनी चाहिए। पुलिस को बिना किसी परिणाम की परवाह किए पूरी छूट के साथ जाँच करनी चाहिए, किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा।”

अयोध्या के संतों के हाथ में मंदिर सौंपने की माँग पर आलोक कुमार ने असहमति जताई। उन्होंने कहा कि संतों को भगवान की पूजा के लिए समय चाहिए। इतने बड़े संगठन और परिसर को चलाने के लिए प्रशासनिक अनुभव और प्रबंधन की विशेषज्ञता रखने वाले लोगों की भी जरूरत होती है, इसलिए उन्हें ट्रस्ट से बाहर नहीं रखा जा सकता।

कौन हैं गोपाल राव नागरकट्टे?

गोपाल राव मूल रूप से कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के निवासी हैं। वे शैक्षणिक योग्यता में भौतिकी विज्ञान (Physics) से परास्नातक (M.Sc.) हैं। गोपाल राव लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के समर्पित पदाधिकारी रहे हैं और कर्नाटक में संघ के प्रांत प्रचारक की भूमिका निभा चुके हैं। वर्तमान में वे विश्व हिंदू परिषद (VHP) के केंद्रीय सह मंत्री पद पर कार्यरत हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जब अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू हुआ, तो उन्हें पहले निर्माण प्रभारी बनाया गया और बाद में राम मंदिर का व्यवस्थापक (एडमिनिस्ट्रेटर) नियुक्त किया गया। पिछले साल उन्हें ट्रस्ट में एक विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में भी शामिल किया गया, हालाँकि इसकी कोई आधिकारिक घोषणा कभी नहीं की गई।

ट्रस्ट में बिना पद के भी अपार शक्तियाँ और ‘पावरफुल’ रसूख

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के बाद गोपाल राव को मंदिर प्रबंधन में दूसरा सबसे प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता है। ट्रस्ट में कोई बड़ा प्रशासनिक पद न होने के बावजूद मंदिर की लगभग सभी गतिविधियों में उनका सीधा हस्तक्षेप रहता है। मंदिर परिसर का कोई भी आयोजन हो, भगवान के भोग की सामग्री की खरीद हो या पुजारियों का प्रबंधन… सब कुछ इन्हीं के जिम्मे है।

इसके अलावा, दर्शन और वीवीआईपी (VVIP) आरती पास जारी करने की बेहद संवेदनशील जिम्मेदारी भी वही संभालते हैं। नियमतः यह अधिकार केवल चंपत राय, अनिल मिश्रा या जिले के वरिष्ठ अधिकारियों (DM, SSP) के पास है, लेकिन गोपाल राव भी अपने नाम से VVIP पास जारी करते रहे हैं। यही नहीं, उन्होंने अपने एक रिश्तेदार को भी मंदिर के कार्यों से जोड़ रखा था, जो कथित तौर पर गोपाल राव की ID का इस्तेमाल कर VVIP बुकिंग और मंदिर के अन्य कार्यों में हस्तक्षेप करता था। मंदिर निर्माण के वक्त पत्थरों की खरीदारी कहाँ से होनी है, इसमें भी गोपाल राव की अपरोक्ष भूमिका थी।