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कानपुर में ITBP जवानों के कमिश्नरेट घेराव की खबर फर्जी: माँ का हाथ काटने के मामले में पुलिस-CMO करेंगे दोबारा जाँच, जानें पूरा मामला

उत्तर प्रदेश के कानपुर की एक घटना शनिवार (23 मई 2026) को सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने लगी। जिसमें दावा किया गया कि भारत-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (ITBP) के जवानों ने पुलिस कमिश्नरेट कार्यालय का घेराव कर दिया और परिसर में तनावपूर्ण स्थिति बन गई।

हालाँकि बाद में पुलिस और ITBP अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि घेराव जैसी कोई स्थिति नहीं थी। अधिकारियों के मुताबिक जवान अपने साथी को न्याय दिलाने और जाँच रिपोर्ट पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कमिश्नर कार्यालय पहुँचे थे।

पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल और ITBP कमांडेंट गौरव प्रसाद दोनों ने साफ कहा कि जवान अपॉइंटमेंट लेकर आए थे और पुलिस प्रशासन की ओर से पूरा सहयोग दिया गया। ऐसे में सोशल मीडिया पर फैलाया गया कमिश्नरेट घेराव का दावा भ्रामक और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया मामला है।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल पूरा मामला ITBP के जवान विकास सिंह की माँ निर्मला देवी के इलाज और उनका हाथ काटे जाने से जुड़ा है। विकास सिंह इस समय महाराजपुर स्थित ITBP की 32वीं बटालियन में तैनात हैं और मूल रूप से फतेहपुर जिले के हथगाम क्षेत्र के रहने वाले हैं।

विकास के अनुसार उनकी 56 साल की माँ को सांस लेने में दिक्कत, कमजोरी और कब्ज की शिकायत थी। पहले उनका इलाज ITBP अस्पताल में हुआ, लेकिन 13 मई को अचानक हालत बिगड़ने पर उन्हें हायर सेंटर रेफर किया गया।

विकास अपनी माँ को एंबुलेंस से लेकर निकला, लेकिन रास्ते में भीषण जाम लग गया। माँ की हालत गंभीर होने पर वे उन्हें टाटमिल चौराहे स्थित कृष्णा सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल ले गए। आरोप है कि अस्पताल में इलाज के दौरान उनके हाथ में कैनुला लगाया गया और गलत इंजेक्शन दे दिया गया, जिसके बाद हाथ में सूजन और संक्रमण बढ़ने लगा।

बाद में हालत बिगड़ने पर उन्हें बिठूर रोड स्थित पारस हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहाँ डॉक्टरों के काफी प्रयास के बाद भी संक्रमण को नहीं रोका जा सका और अंततः 17 मई को उनका हाथ काटना पड़ा।

घटना के बाद पुलिस से माँगी मदद

इस घटना के बाद विकास सिंह 19 मई को अपनी माँ का कटा हुआ हाथ लेकर पुलिस कमिश्नर कार्यालय पहुँचे। उन्होंने कृष्णा हॉस्पिटल पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की माँग की थी। विकास ने कहा था कि “मेरी माँ ने इन्हीं हाथों से मुझे बचपन से पाला-पोसा और आज मेरे सामने उनका हाथ काटना पड़ा। मैं सेना में होने के बाद भी अपनी माँ को इंसाफ नहीं दिला पा रहा हूँ।”

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने जाँच CMO कार्यालय को सौंप दी थी। CMO डॉ हरिदत्त नेमी की ओर से गठित जाँच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंपी, लेकिन उस रिपोर्ट पर ही सवाल उठ गए। ITBP अधिकारियों का आरोप था कि रिपोर्ट साफ है और उसमें यह साफ नहीं किया गया कि आखिर लापरवाही किस स्तर पर हुई।

ITBP के जवान पहुँचे कार्यालय  

इसी को लेकर शनिवार को ITBP के अधिकारी और कुछ जवान पुलिस कमिश्नर के कार्यालय पहुँचे थे। कई जवान परिसर में मौजूद जरूर थे, क्योंकि वे अपने अधिकारी के साथ आए थे, लेकिन पुलिस और ITBP दोनों ने घेराव या किसी टकराव से इनकार किया।

पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने कहा कि “कार्यालय में किसी तरह का कोई घेराव नहीं हुआ। सेना के अधिकारियों को एस्कॉर्ट मिलता है और वही जवान उनके साथ थे। विवाद जैसी कोई स्थिति नहीं थी।”

ITBP कमांडेंट गौरव प्रसाद ने भी कहा कि जवान केवल अपने साथी के समर्थन में आए थे। उन्होंने कहा कि पुलिस प्रशासन की तरफ से पूरा सहयोग मिल रहा है और दोबारा जाँच कराने पर सहमति बनी है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मामले को गलत तरीके से दिखाया गया है।

बैठक के बाद लिया निर्णय

बैठक के दौरान पुलिस अधिकारियों, CMO और ITBP अधिकारियों के बीच करीब तीन घंटे तक चर्चा हुई। इसके बाद निर्णय लिया गया कि मामले की दोबारा जाँच होगी और इस बार जाँच में ITBP के अधिकारी भी शामिल रहेंगे।

CMO डॉ हरिदत्त नेमी ने कहा कि पहले की रिपोर्ट तथ्यों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर तैयार की गई थी, लेकिन अब ITBP और पुलिस अधिकारियों के सवालों को ध्यान में रखते हुए दोबारा जाँच की जाएगी।

जाँच कमेटी के अध्यक्ष ACMO डॉ रमित रस्तोगी ने कहा कि दोनों अस्पतालों से वेरिफाइड दस्तावेज लिए गए थे और उन्हीं के आधार पर रिपोर्ट तैयार की गई। उन्होंने बताया कि महिला हृदय रोगी थीं और उनके हाथ की नसों में ब्लॉकेज पाया गया था।

उन्होंने कहा कि ब्लॉकेज के पीछे दो संभावनाएँ हो सकती हैं। पहली थ्रोम्बोसिस जिसमें खून के थक्के नसों में फंस जाते हैं और दूसरी कंपार्टमेंट सिंड्रोम, जिसमें दर्द और सूजन को समय पर गंभीरता से नहीं लिया जाता। उन्होंने कहा कि कटे हुए हाथ की हिस्टोपैथोलॉजी जाँच से स्थिति पूरी तरह साफ हो सकती है।

वहीं पुलिस कमिश्नर ने CMO को फटकार लगाते हुए कहा कि जाँच रिपोर्ट स्पष्ट होनी चाहिए और अगर किसी अस्पताल या डॉक्टर की लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि रिपोर्ट संतोषजनक नहीं हुई तो राज्य स्तरीय समिति से जाँच कराई जाएगी।

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस ने कृष्णा हॉस्पिटल और पारस हॉस्पिटल के CCTV फुटेज भी सुरक्षित करा लिए हैं। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि आखिर 12 घंटे के भीतर ऐसा क्या हुआ जिससे मरीज के हाथ में संक्रमण तेजी से फैल गया। यह भी जाँच की जा रही है कि कौन सा इंजेक्शन लगाया गया और किस डॉक्टर या स्टाफ ने उपचार किया।

इस पूरे मामले में अपर पुलिस आयुक्त कानून व्यवस्था डॉ विपिन ताडा और कल्याणपुर थाना प्रभारी डॉ सुमेध जाधव को भी जिम्मेदारी दी गई है। दोनों अधिकारियों के पास मेडिकल की पढ़ाई का अनुभव होने के कारण वे मेडिकल जाँच और रिपोर्ट की बारीकियों को समझ रहे हैं। शनिवार को दोनों अधिकारियों ने ITBP के प्रतिनिधियों के साथ लंबी बैठक भी की।

पाकिस्तान में पेट्रोल कुछ सस्ता क्या हुआ, भारत को फेल बताने लगे सोशल मीडिया के वीर: आधा सच बेचने वालों का पूरा खेल यहाँ समझिए

पाकिस्तान में पेट्रोल-डीजल के दाम घटाए जाने पर सोशल मीडिया पर इन दिनों एक ‘ज्ञान’ बड़ी तेजी से बाँटा जा रहा है कि ‘पाकिस्तान में पेट्रोल सस्ता हो गया, भारत में महँगा है’। एक गुट के लोग मोदी सरकार का मजाक उड़ा रहे हैं और इसे ऐसे पेश कर रहे हैं मानो पाकिस्तान कोई आर्थिक महाशक्ति बन गया हो और भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह फेल हो चुकी हो। लेकिन सवाल यह है कि क्या सच में तस्वीर इतनी ही सीधी है? या फिर सोशल मीडिया पर आधा सच दिखाकर पूरा नैरेटिव बेचा जा रहा है?

पहली बात, तथ्य क्या कहते हैं? पाकिस्तान ने हाल में पेट्रोल की कीमतों में कटौती जरूर की है। पाकिस्तान में 23 मई 2026 से पेट्रोल लगभग 403.78 पाकिस्तानी रुपए प्रति लीटर पर आ गया जो पहले 409.78 पाकिस्तानी रुपए था। यानी वहाँ कीमत घटी है, इसमें कोई विवाद नहीं। लेकिन अब आते हैं उस हिस्से पर, जिसे सोशल मीडिया के बहादुर बड़े आराम से छिपा ले जा रहे हैं। कीमत कम हुई, लेकिन क्या भारत से सस्ती हो गई? इसका सीधा सा जवाब है- नहीं।

पाकिस्तान समेत दुनियाभर में बढ़ती कीमतें

मिडिल ईस्ट में ईरान VS अमेरिका-इजरायल संघर्ष शुरू होने के करीब 75 दिनों तक भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर थे जबकि दुनिया में हाल ऐसा नहीं था। जब दुनिया के कई देशों में तेल महँगा होने लगा, तब वहाँ की सरकारों ने इसका बोझ सीधे जनता पर डाल दिया। यानी पेट्रोल-डीजल के दाम तेजी से बढ़ा दिए गए। लेकिन भारत ने ऐसा तुरंत नहीं किया। इतने लंबे समय तक कीमतें स्थिर रखने वाला भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अकेला देश रहा।

भारत में पहली बार 15 मई को पेट्रोल-डीजल महँगा किया गया। इसके बाद 19 मई और 23 मई को कीमतें बढ़ाई गईं। तीन बार की बढ़ोतरी मिलाकर पेट्रोल-डीजल की कीमत करीब ₹5 प्रति लीटर बढ़ी है। दिल्ली में पेट्रोल ₹99.51 प्रति लीटर पहुँच गया है। अगर दूसरे देशों को देखें तो इस दौरान अमेरिका में पेट्रोल 44.5% महँगा हुआ, पाकिस्तान में करीब 55%, यूएई में 52.4%, ब्रिटेन में 19.2%, बांग्लादेश में 16.7% और जापान में 9.7% महँगा हुआ। यानी कई देशों में लोगों को पेट्रोल के लिए पहले से काफी ज्यादा पैसे देने पड़े, जबकि भारत में बढ़ोतरी कम रखी गई।

मिडिल ईस्ट संकट से पहले और अब पाकिस्तान में तेल की कीमतें

पाकिस्तान स्टेट ऑयल कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक, मिडिल ईस्ट का मौजूदा संकट शुरू होने से पहले 16 फरवरी 2026 को पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमत 258.17 पाकिस्तानी रुपए थे। फरवरी के आखिरी में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हुई और 1 मार्च 2026 को पाकिस्तान में कीमतें बढ़कर 266.17 पाकिस्तानी रुपए पहुँच गईं। पाकिस्तान में 3 अप्रैल 2026 को कीमतों में बेहताशा बढ़ोतरी की गई है और ये बढ़कर 458.41 पाकिस्तानी रुपए पर पहुँच गईं।

पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमतें (फोटो :- PetrolPriceinpakistan.com)

हालाँकि, कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असल सवाल है- क्या पेट्रोल के दाम कुछ रुपये घट जाना किसी देश की आर्थिक ताकत का प्रमाण है? अगर जवाब ‘हाँ’ है, तो फिर पाकिस्तान दुनिया की टॉप अर्थव्यवस्था घोषित कर दो भाई।

वही, पाकिस्तान जो साल-द-साल IMF के सामने बार-बार मदद की भीख माँगने के लिए खड़ा रहता है। वही, पाकिस्तान जहाँ डॉलर की कमी, विदेशी मुद्रा संकट, बिजली कटौती, रिकॉर्ड महँगाई और सरकारी वित्तीय बदहाली लगातार खबरों में रही। पेट्रोल पर थोड़ी राहत देना वहाँ सरकार की मजबूरी भी होती है क्योंकि जनता पहले से आर्थिक दबाव में पिस रही होती है।

यानी सोशल मीडिया पर जो लोग पाकिस्तान के पेट्रोल को लेकर भारत पर तंज कस रहे हैं, वे बड़ी सुविधा से पूरी तस्वीर गायब कर देते हैं। वे यह नहीं बताएँगे कि पाकिस्तान में बीते वर्षों में पेट्रोल 400 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर के पार पहुँच चुका था। वे यह नहीं बताएँगे कि वहाँ ईंधन नीति कई बार विदेशी कर्जदाताओं, खासकर IMF के दबाव में बदलती रही है। वे यह भी नहीं बताएँगे कि पाकिस्तान की मुद्रा में आई गिरावट ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है।

भारत की स्थिति को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में विदेशों से खरीदता है। यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महँगा होगा, मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ेगा या सप्लाई प्रभावित होगी, तो उसका असर भारत पर भी पड़ेगा।

इसके बावजूद भारत ने लंबे समय तक कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश की और बढ़ोतरी भी सीमित रखी। यह बहस अलग हो सकती है कि टैक्स कम होना चाहिए या नहीं, लेकिन यह कहना कि ‘पाकिस्तान आगे निकल गया, भारत पिछड़ गया’ एक राजनीतिक मूर्खता ज्यादा लगती है, आर्थिक विश्लेषण कम।

बिहार में जहाँ खुद भगवान राम ने की महादेव की पूजा, वहाँ अब सम्राट सरकार बनाएगी श्रीराम की भव्य मूर्ति: जानें- त्रेता युग से जुड़े इस जगह का महात्म्य

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी शनिवार (23 मई 2026) को अपने पहले बक्सर दौरे पर पहुँचे, जहाँ उन्होंने जिले की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को लेकर बड़ी घोषणाएँ कीं।

उन्होंने सबसे पहले बक्सर केंद्रीय कारा परिसर स्थित प्राचीन श्री वामनेश्वर नाथ मंदिर में पूजा की और उसके बाद रामरेखा घाट पहुँचकर ऐतिहासिक श्रीरामेश्वरनाथ मंदिर में माथा टेका। इस दौरान उन्होंने मंदिर और रामरेखा घाट के भव्य विकास का भरोसा दिलाया।

मुख्यमंत्री ने यहाँ भगवान श्रीराम की विशाल प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा भी की। बक्सर का रामरेखा घाट और श्रीरामेश्वरनाथ मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और पौराणिक परंपराओं का केंद्र है। मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने स्वयं यहाँ शिवलिंग की स्थापना की थी।

यही कारण है कि यह मंदिर देश की प्राचीन आध्यात्मिक धरोहरों में गिना जाता है। अब मुख्यमंत्री की घोषणाओं के बाद इस ऐतिहासिक स्थल को नए स्वरूप में विकसित करने की तैयारी तेज हो गई है।

लाइट एंड साउंड कॉम्प्लेक्स और महर्षि विश्वामित्र मंडपम का उद्घाटन

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का दौरा धार्मिक कार्यक्रमों और विकास योजनाओं दोनों पर केंद्रित रहा। उन्होंने सबसे पहले श्री वामनेश्वर नाथ मंदिर में पूजा-अर्चना कर राज्य की सुख-समृद्धि की कामना की। मंदिर परिसर के ले-आउट प्लान का निरीक्षण करते हुए अधिकारियों को आवश्यक निर्देश भी दिए।

इसके बाद मुख्यमंत्री रामरेखा घाट स्थित श्रीरामेश्वरनाथ मंदिर पहुँचे, जहाँ मंदिर के पुजारियों ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच उनका स्वागत किया। मुख्यमंत्री ने मंदिर परिसर में पुजारियों और स्थानीय श्रद्धालुओं से बातचीत की। इस दौरान पुजारियों ने रामरेखा घाट और मंदिर को अयोध्या की तर्ज पर विकसित करने की माँग रखी।

मुख्यमंत्री ने सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार इस धार्मिक धरोहर के समग्र विकास के लिए गंभीरता से काम करेगी। दौरे के दौरान उन्होंने करीब छह करोड़ रुपये की लागत से बने लाइट एंड साउंड कॉम्प्लेक्स और महर्षि विश्वामित्र मंडपम का उद्घाटन भी किया।

इसके अलावा उन्होंने रिमोट के जरिए महाराजा कमल बहादुर सिंह की प्रतिमा का अनावरण किया और पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया।

श्रीरामेश्वरनाथ मंदिर और रामरेखा घाट का इतिहास, भगवान राम ने स्थापित की है शिवलिंग

नारद पुराण में बक्सर के पुराने नाम ‘सिद्धाश्रम’ का उल्लेख मिलता है, जिसे भगवान शंकर की तपोभूमि कहा गया है। मान्यता है कि यहाँ महर्षि विश्वामित्र सहित 88 हजार ऋषि-मुनियों ने तपस्या की थी। गंगा के उत्तरायणी प्रवाह के कारण यह क्षेत्र ‘मिनी काशी’ के रूप में भी प्रसिद्ध है।

रामरेखा घाट स्थित श्रीरामेश्वरनाथ मंदिर का इतिहास त्रेतायुग से जुड़ा माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब महर्षि विश्वामित्र का यज्ञ राक्षसों द्वारा बार-बार बाधित किया जा रहा था, तब वे अयोध्या पहुँचे और राजा दशरथ से भगवान राम और लक्ष्मण को अपने साथ ले आए।

इसके बाद भगवान राम ने ताड़का और सुबाहु जैसे राक्षसों का वध कर ऋषियों के यज्ञ की रक्षा की और यज्ञ को सफल बनाया। यज्ञ संपन्न होने के बाद भगवान राम, लक्ष्मण और महर्षि विश्वामित्र गंगा तट पर पहुँचे। मान्यता है कि यहीं भगवान राम ने गंगा स्नान किया और गंगा की मिट्टी से शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की पूजा-अर्चना की।

यही शिवलिंग आगे चलकर श्रीरामेश्वरनाथ मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हुआ। कहा जाता है कि जनकपुर में सीता स्वयंवर में भाग लेने और शिव धनुष भंग करने से पहले भगवान राम ने यहीं अपने इष्टदेव भगवान शिव की आराधना की थी।

स्थानीय कथाओं के अनुसार, भगवान राम ने इस स्थान पर एक विशेष रेखा भी खींची थी, ताकि चारों दिशाओं सहित आकाश और पाताल मार्ग से भी कोई राक्षस इस क्षेत्र में प्रवेश न कर सके। इसी रेखा के कारण इस स्थान का नाम ‘रामरेखा घाट’ पड़ा। धार्मिक ग्रंथों और स्थानीय परंपराओं में इस स्थल को अत्यंत पवित्र माना गया है।

सावन और महाशिवरात्रि में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

रामेश्वरनाथ मंदिर में सालभर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन सावन और महाशिवरात्रि के दौरान यहाँ विशेष भीड़ देखने को मिलती है। बिहार ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों से भक्त यहाँ जलाभिषेक और पूजा-अर्चना के लिए पहुँचते हैं। सावन के दौरान मंदिर परिसर और आसपास का इलाका मेले जैसा दिखाई देता है।

बाबा ब्रह्मेश्वर धाम और गुप्ताधाम जाने वाले श्रद्धालु भी यहाँ गंगा जल लेकर पूजा करने के बाद आगे की यात्रा करते हैं। मंदिर के पुजारियों का कहना है कि यहाँ आने वाला भक्त कभी खाली हाथ नहीं लौटता। शिवलिंग के सामने सच्चे मन से की गई प्रार्थना जरूर पूरी होती है। यही वजह है कि यह मंदिर लोगों की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है।

रामरेखा घाट को कैसे विकसित करेगी सरकार?

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपने दौरे के दौरान स्पष्ट किया कि रामरेखा घाट को धार्मिक पर्यटन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। योजना के तहत यहाँ कंट्रोल रूम, शुद्ध पेयजल, चेंजिंग रूम, आधुनिक पाथ-वे और गंगा आरती की विशेष व्यवस्था की जाएगी।

इसके अलावा पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए अत्याधुनिक 5D थिएटर, रेस्टोरेंट, ड्राई डेक फाउंटेन और अन्य सुविधाओं को भी विकसित किया गया है। सरकार का उद्देश्य बक्सर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करना है। इसी कड़ी में भगवान श्रीराम की विशाल प्रतिमा स्थापित करने की योजना को भी महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

बक्सर की पहचान को मिलेगा नया विस्तार

स्थानीय लोगों और धार्मिक न्यास परिषद से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि सरकार की योजनाएँ सही तरीके से लागू हुईं, तो बक्सर आने वाले समय में देश के प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थलों में शामिल हो सकता है। इससे न केवल धार्मिक पहचान मजबूत होगी, बल्कि स्थानीय व्यापार, रोजगार और पर्यटन को भी बड़ा लाभ मिलेगा।

हर साल लाखों श्रद्धालु यहाँ गंगा स्नान और दर्शन के लिए पहुँचते हैं, लेकिन अब तक सुविधाओं की कमी महसूस की जाती रही है। मुख्यमंत्री के दौरे और घोषणाओं के बाद लोगों को उम्मीद है कि वर्षों से उपेक्षित यह ऐतिहासिक धरोहर अब नए और भव्य स्वरूप में दुनिया के सामने आएगी।

जहाँ से जरूरी होगा, वहीं से लेंगे ईंधन: अमेरिकी विदेश मंत्री के सामने जयशंकर की दो टूक, कहा- जैसे इनके लिए ‘अमेरिका फर्स्ट’ है वैसे हमारे लिए ‘इंडिया फर्स्ट’

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और यूएस सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्क रुबियो ने दिल्ली में अहम बैठक की। दिल्ली के हैदराबाद हाउस में बैठक के बाद साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोनों नेताओं ने बयान दिया।

इस दौरान रूसी तेल खरीदने को लेकर विदेश मंत्री ने बड़ा बयान दिया। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के सामने एस. जयशंकर ने कहा कि इस मुद्दे पर चर्चा हुई है, लेकिन ऊर्जा बाजार को बाजार की ताकतों पर ही छोड़ देना चाहिए।

US सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट मार्को रुबियो के साथ साझा बयान में जयशंकर ने कहा कि ट्रंप प्रशासन ने अपनी विदेश नीति में अमेरिका फर्स्ट को सबसे आगे रखा है। उसी तरह हमारा नजरिया भी इंडिया फर्स्ट है। तो जाहिर तौर पर हम दोनों अपने-अपने राष्ट्रहित को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। “

उन्होंने यह भी कहा, “जहाँ तक ​​एनर्जी के मामलों की बात है, हमारी एनर्जी सिक्योरिटी के लिए, यह जरूरी है कि हमारे पास कई सोर्स हों, बड़े सोर्स, भरोसेमंद सोर्स, सस्ते सोर्स। यूनाइटेड स्टेट्स कई मामलों में सही बैठता है। कुछ दूसरे देश भी सही बैठते हैं। इसलिए, हम सबसे सही कीमत पर सप्लाई के कई सोर्स को अलग-अलग तरह से इस्तेमाल करते रहेंगे और बनाए रखेंगे क्योंकि आखिर में, अपने लोगों को सस्ती और आसानी से मिलने वाली दरों पर एनर्जी देना हमारी जिम्मेदारी है।”

उन्होंने रूस का बगैर नाम लिए संकेत दे दिए कि भारत अपनी ऊर्जा और आर्थिक हितों को प्राथमिकता देता रहेगा। रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी दबाव के बीच जयशंकर का यह बयान सामने आया है। इससे भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की स्पष्ट झलक मिलती है।

अमेरिका के साथ रिश्तों को लेकर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा, “भारत और यूनाइटेड स्टेट्स दोनों ही समुद्री व्यापार को सुरक्षित रखने और बिना रुकावट के व्यापार करने में गहरी दिलचस्पी रखते हैं। दोनों ही देश चाहते हैं कि दुनिया भर में एनर्जी की कीमतें कम रहें और एनर्जी सोर्स का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल हों।

भारत के साथ व्यापार को लेकर मार्को रुबियो ने कहा, ” हमें उम्मीद है कि हमारे व्यापारिक प्रतिनिधि बहुत जल्द यहाँ आ सकते हैं। इससे पहले पिछले हफ्ते या उससे पहले, यूनाइटेड स्टेट्स में भारत का ट्रेड डेलीगेशन गया हुआ था। हम बहुत आगे बढ़ गए हैं और जल्द ही यूनाइटेड स्टेट्स और इंडिया के बीच एक ट्रेड एग्रीमेंट होने जा रहा है, जो लंबे समय तक चलने वाला होगा और दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद होगा और हमारे राष्ट्रीय हित को पूरा करेगा। इसके अलावा, हम कई फील्ड्स में सहयोग करना जारी रखेंगे।”

अपने पहले भारत की यात्रा पर आए मार्को रुबियो और जयशंकर ने दोनों देशों के मजबूत रिश्तों की रूपरेखा शेयर की। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते रक्षा सुरक्षा ऊर्जा और आर्थिक सहयोग की समीक्षा कर रिश्तों को और मजबूत करना उनका मकसद है। इस दौरान क्षेत्रीय और विश्वस्तर पर दोनों देशों ने अपने विचार शेयर किए।

अमेरिका में भारतीय अमेरिकियों के खिलाफ नस्लभेदी टिप्पणियों के बारे में पूछे जाने पर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा, “मैं इन टिप्पणियों को बहुत गंभीरता से लूँगा। मुझे यकीन है कि ऐसे लोग हैं जिन्होंने ऑनलाइन और दूसरी जगहों पर कमेंट्स किए हैं, क्योंकि दुनिया के हर देश में बेवकूफ लोग होते हैं। मुझे यकीन है कि यहाँ भी बेवकूफ लोग हैं, यूनाइटेड स्टेट्स में भी बेवकूफ लोग हैं जो हर समय बेवकूफी भरे कमेंट्स करते हैं। यूनाइटेड स्टेट्स एक बहुत ही स्वागत करने वाला देश है। हमारे देश को दुनिया भर से आने वाले लोगों से फायदा हुआ है।”

ट्रंप प्रशासन और क्वाड को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि क्वाड असल में, मौजूदा रूप में, प्रेसिडेंट ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान आया था और आगे बढ़ा। विदेश मंत्री के मुताबिक, “रुबियो के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के तौर पर जब वे पहली बार मिले थे तो वह बैठक क्वाड मीटिंग के लिए था। इंडो-पैसिफिक रिश्तों को देखते हुए आने वाले समय में क्वाड का महत्व और बढ़ेगा। इसलिए क्वाड पर काम जारी है, और मुझे लगता है कि अब से दो दिन बाद आप हमें पोडियम पर क्वाड के बारे में बात करते हुए देखेंगे। “

नेताओं-जजों-अफसरों का वो ‘पावर सेंटर’, जहाँ रसूखदारों को भी 30 साल तक नहीं मिलती सदस्यता: जानें- दिल्ली के जिमखाना क्लब का इतिहास, जिस पर सरकार करेगी कब्जा

देश के सबसे प्रतिष्ठित और रसूखदार क्लबों में एक दिल्ली के जिमखाना क्लब को सरकार ने खाली करने का आदेश दिया है। क्लब की लीज डीड तत्काल प्रभाव से खत्म कर दी गई है और पूरे परिसर को 5 जून तक खाली करने को कहा गया है। ये प्रधानमंत्री आवास के ठीक सामने मौजूद 27.3 एकड़ जमीन में फैला हुआ है। सरकार देश की सुरक्षा और रक्षा ढाँचे को मजबूत करने जैसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए इसका इस्तेमाल करना चाहती है।

22 मई 2026 को केन्द्र सरकार के लैंड एंड डेवलपमेंट विभाग ने क्लब सेक्रेटरी को खत भेजकर जगह 5 जून तक खाली करने का आदेश दिया है। आदेश के मुताबिक, राष्ट्रपति मुर्मू ने जमीन लीज खत्म करने पर हस्तक्षर कर दिए हैं। 5 जून को होने वाली इस ‘री-एंट्री’ प्रक्रिया के तहत जमीन के साथ-साथ वहाँ निर्मित सभी ऐतिहासिक इमारतें, खेल परिसर और दूसरे ढाँचे भारत के राष्ट्रपति के अधीन हो जाएँगे।

सरकार ने क्लब को शांतिपूर्ण तरीके से कब्जा देने के लिए कहा है, ऐसा नहीं होने पर कानूनी तरीके से बल प्रयोग किया जा सकता है। हालाँकि क्लब के सदस्य सिद्धार्थ ने कहा है कि सरकार के आदेश को कोर्ट में चुनौती दी जाएगी। ये ऐतिहासिक भवन है। इसको बनाने की शुरुआत 1913 में हुई थी। मौजूदा भवन 1930 के दशक में बनी।

क्यों अहम है दिल्ली जिमखाना क्लब

यह ऐतिहासिक इमारत प्रधानमंत्री आवास से सटा हुआ है। लुटियंस दिल्ली में प्राइम लोकेशन और रसूखदारों के जमावड़े के कारण यह बेहद अहम है। राजनीतिक नेताओं, न्यायधीशों, नौकरशाहों और उद्योगपतियों का एक तरह से मिलन स्थल है। यहाँ बड़ी बड़ी बैठकें होती हैं और अनौपचारिक तौर पर कहा जा सकता है कि सत्ता का यह केन्द्र भी है।

इसकी सदस्यता पाना बेहद मुश्किल काम है। एक समय यहाँ की सदस्यता पाने के लिए 30-37 साल तक लोगों को इंतजार करना पड़ता था। एक तरह से औपनिवेशक धरोहर रहे इस इमारत को सत्ता की धूरी भी कहा जा सकता है।

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने 80 के दशक में सुरक्षा कारणों और वीवीआईपी कल्चर का हवाला देते हुए इसे बंद करने या इसका स्वरूप बदलने की कोशिश की थी, लेकिन सफल नहीं हुए। दरअसल क्लब के सदस्यों के भारी विरोध और उनके रसूख के सामने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की नहीं चल पाई।

दिल्ली जिमखाना क्लब का इतिहास

जुलाई 1913 में इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब के नाम से इसका निर्माण कार्य शुरू किया गया। 1928 में करीब 15 साल बाद यह पूरी तरह बन कर तैयार हुआ। अंग्रेजों के जमाने में सिर्फ अंग्रेजी अधिकारी और कुछ भारतीय रियासतों के महाराजाओं को इस क्लब की सदस्यता दी गई थी। शुरुआत से ही यह क्लब रसूखदारों का अड्डा माना जाता है। इसका सदस्य बनना शान की बात थी। इसके पहले अध्यक्ष अंग्रेजी अधिकारी हारकोर्ट बटलर थे।

इसके वास्तुकार रॉबर्ट टोर रसेल थे, जिन्होंने कनॉट प्लेस और तीन मूर्ति भवन डिजाइन किया था। यही वजह है कि इसकी बड़ी-बड़ी बालकनी, ऊँची छतें और हर तरफ से दिखता हरा-भरा लॉन तीन मूर्ति भवन और कनॉट प्लेस की तरह है। इसका भव्य डिजाइन ब्रिटिश स्थापत्य कला का सुंदर उदाहरण है।

1930 में तत्काली वायसराय विलिंगडन की पत्नी लेडी विलिंगडन जब इस क्लब में आईं, तो उन्हें स्वीमिंग पूल की कमी नजर आई। उन्होंने 1936 में स्वीमिंग पूल बनाने के लिए 21000 रुपए दान किए। इसके बाद यहाँ स्वीमिंग पूल के साथ साथ स्क्वैश कोर्ट बनी। इसके बाद यहाँ कई खेल की सुविधाएँ बढाई गई। अभी यहाँ कई खेलों की उच्चस्तरीय सुविधाएँ हैं।

वर्तमान में भारत में सबसे ज्यादा 26 घास वाले टेनिस कोर्ट यहाँ हैं। इसके अलावा 7 क्ले कोर्ट और सिंथेटिक टेनिस कोर्ट, स्क्वैश कोर्ट, बैडमिंटन कोर्ट, बिलियर्ड्स रूम, कवर स्विमिंग पूल के अलावा 3 बार और 43 ट्रांजिट कॉर्टेज हैं।

यहाँ हुआ था महात्मा गाँधी-इरविन समझौता

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1931 में महात्मा गाँधी और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच यहाँ समझौता हुआ था। इससे पहले यहाँ दोनों के बीच कई बैठकें भी हुई। इस नजरिए से देखा जाए तो यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम का साक्षी भी रहा है।

1947 में जब देश का विभाजन हुआ और पाकिस्तान बना, तो पाकिस्तान जाने का फैसला ले चुके अपने साथियों के सम्मान में जनरल के.एम.करिअप्पा ने विदाई भोज का आयोजन किया था।

भारत की आजादी के बाद 1947 में ही इस क्लब के नाम से ‘इंपीरियल’ शब्द हटा दिया गया। इसके बाद आज तक इसे दिल्ली जिमखाना क्लब के नाम से जाना जाता है। आजादी के बाद देशी रिसासतों को मिलाने का सरदार पटेल का संकल्प भी इस इमारत से जुड़ा हुआ है। दरअसल इस क्लब में सरदार पटेल ने अपने सहयोगी वीपी मेनन के साथ कई गुप्त बैठकें की। इसके बाद करीब 500 देशी रियासतों के विलय को अमली जामा पहनाया गया। वीपी मेनन ने महाराजाओं को समझाने और मनाने के लिए इस क्लब में उनके साथ गुप्त बैठकें की और देशी रिसासतों का विलय कराया गया।

यहाँ की सदस्यता लेना उसी तरह मुश्किल रहा, जैसा अंग्रेजों के वक्त हुआ करता था। अब बस अंतर यह है कि बड़े बड़े राजनेताओं, उद्योगपतियों, न्यायधीशों और नौकरशाहों को यहाँ की सदस्यता मिलती थी। एक तरह से यह सत्ता का अनौपचारिक केन्द्र भी है।

इतना ही नहीं, दिल्ली जिमखाना क्लब में स्कवैश, बैडमिंटन, क्रिकेट के ग्राउंड के अलावा 26 घास के टेनिस कोर्ट हैं। स्क्वैश चैंपियन भुवनेश्वरी कुमारी ने यहाँ जमकर प्रैक्टिस की थी। माउंट एवरेस्ट पर फतह हासिल करने वाले कप्तान एमएस कोहली ने यहाँ जमकर पसीना बहाया। एक तरह से देखा जाए तो यह खेलों का भी अहम केन्द्र है।

इस क्लब की खासियत यहाँ का विशाल लाइब्रेरी भी है। इनमें कई ऐतिहासिक अखबार, पत्रिका भी शामिल हैं। 1843 की मशहूर व्यंग्य पत्रिका ‘पंच’ के अंक यहाँ मिलते हैं। लाइब्रेरी में 36000 से ज्यादा किताबें हैं। एक तरह से खेल, राजनीति के साथ-साथ यह ज्ञान का केन्द्र भी रहा है। यहाँ पहले कई तरह की साहित्यिक चर्चाएँ होती थी।

दिल्ली के अहम ऐतिहासिक इमारत, जिस पर सरकार ने कब्जा किया

शेख अली की गुमटी- दिल्ली के डिफेंस कॉलोनी इलाके में मौजूद शेख अली की गुमटी लोधी काल की करीब 600 साल पुरानी इमारत है। यहाँ स्थानीय RWA ने दशकों तक अपना कार्यालय बना रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में आदेश दिया कि इमारत खाली कर सरकार को सौंपी जाए और RWA पर 40 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया।

नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक- सरकार अब ‘राष्ट्रीय संग्रहालय’ की तरह इस्तेमाल करने का फैसला किया है। पहले मंत्रालयों द्वारा इसका इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन अब सरकार इनके उपयोग और नियंत्रण का स्वरूप बदल रही है।

उदयपुर हाउस- सिविल लाइंस स्थित यह ऐतिहासिक भवन लंबे कानूनी विवाद के बाद राजस्थान सरकार के कब्जे में वापस आया। इसकी कीमत लगभग 1500 करोड़ रुपये बताई गई थी।

महल ऑफ पठान- इसको लेकर विवाद उस समय सामने आया जब दिल्ली जल बोर्ड के पूर्व अधिकारी ने इसके कुछ हिस्से पर कब्जा कर लिया। बाद में पुरातत्व विभाग ने संरक्षण और खाली कराने की कार्रवाई शुरू की।

भारत आते ही जिस ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ में गए US के विदेश मंत्री मार्को रूबियो, वो लगातार विवादों में रहा: जानिए ‘मदर टेरेसा’ की संस्था से जुड़े विवाद

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (United States Secretary of State – Marco Rubio) की 4 दिवसीय भारत यात्रा ने देश के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में एक नया भूचाल ला दिया है। पिछले 14 वर्षों में यह पहला मौका है जब अमेरिका के किसी विदेश मंत्री ने दिल्ली से इतर सीधे कोलकाता की धरती पर लैंड किया है। इससे पहले साल 2012 में हिलेरी क्लिंटन सीधे कोलकाता पहुँची थीं। लेकिन रुबियो की इस यात्रा में सबसे ज्यादा ध्यान उनके एक बेहद विवादित और सोचे-समझे कदम ने खींचा है।

कोलकाता पहुँचते ही वे किसी आधिकारिक या रणनीतिक कार्यक्रम के बजाय सीधे मदर टेरेसा द्वारा स्थापित ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के मुख्यालय (मदर हाउस) पहुँच गए।

यह वही संस्था है जो पिछले कुछ वर्षों से भारत सरकार की सख्त निगरानी, विदेशी फंडिंग पर रोक और गंभीर कानूनी आरोपों के केंद्र में रही है। मार्को रुबियो का भारत आते ही सबसे पहले यहाँ जाना और संस्था के पदाधिकारियों के साथ बंद कमरे में मुलाकात करना महज एक कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं है। कूटनीतिक गलियारों में इसे भारत की संप्रभुता को चुनौती देने और इन विवादित ईसाई मिशनरियों को वैश्विक स्तर पर मजबूती देने के एक ठोस और रणनीतिक अमेरिकी प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के उन काले अध्यायों और विवादों का गहरा विश्लेषण जरूरी है जो इंटरनेट से लेकर अदालतों तक में गूँज रहे हैं।

फंडिंग पर सरकारी चाबुक यानी एफसीआरए से जुड़ा विवाद

मिशनरीज ऑफ चैरिटी और भारत सरकार के बीच सबसे बड़ा प्रशासनिक और वित्तीय टकराव दिसंबर 2021 में सामने आया था। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेग्युलेशन एक्ट (FCRA) के तहत संस्था के विदेशी फंडिंग लाइसेंस के नवीनीकरण को पूरी तरह रोक दिया था। गृह मंत्रालय के पास इस बात के पुख्ता इनपुट्स थे कि चंदे के नाम पर विदेशों से आने वाले अकूत धन का इस्तेमाल उन गतिविधियों में हो रहा था जो राष्ट्रहित के खिलाफ थीं।

इसके साथ ही संस्था ने ऑडिट के लिए जरूरी वित्तीय दस्तावेज और खातों का ब्योरा समय पर मुहैया नहीं कराया था, जिससे उनकी वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए थे।

इस प्रशासनिक कार्रवाई के सामने आते ही देश के भीतर एक बड़ा राजनीतिक बवंडर खड़ा हो गया था। पश्चिम बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कॉन्ग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने का बेबुनियाद आरोप लगाया था।

सरकार ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया था कि उसने कोई खाता फ्रीज नहीं किया है, बल्कि भारतीय स्टेट बैंक को खुद संस्था ने ही अपने खातों पर रोक लगाने का अनुरोध भेजा था। बाद में जनवरी 2022 में जब संस्था ने चौतरफा घिरने के बाद आवश्यक दस्तावेज और स्पष्टीकरण सरकार के सामने जमा किए, तब जाकर उनका पंजीकरण बहाल किया गया था।

सेवा की आड़ में जबरन धर्मांतरण और हिंदू भावनाओं पर आघात

इस संस्था पर लंबे समय से ‘सेवा’ और ‘मदद’ के मुखौटे के पीछे बेहद शातिराना तरीके से गरीब हिंदुओं का धर्मांतरण कराने के आरोप लगते रहे हैं। गुजरात के वडोदरा स्थित संस्था के एक बाल गृह (शेल्टर होम) का मामला इसका सबसे जीवंत और डरावना उदाहरण बनकर सामने आया था।

दिसंबर 2021 में जिला सामाजिक सुरक्षा अधिकारी मयंक त्रिवेदी और बाल कल्याण समिति ने मकरपुरा क्षेत्र में स्थित लड़कियों के बाल गृह का औचक निरीक्षण किया था। इस जाँच में जो तथ्य सामने आए, उसने प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ पूरे हिंदू समाज को झकझोर कर रख दिया था।

जाँच दल ने पाया कि बाल गृह में रहने वाली बेसहारा हिंदू लड़कियों को जबरन ईसाई मजहब की पुस्तकें (बाइबल) पढ़ने के लिए विवश किया जा रहा था। इन मासूम बच्चियों को ईसाई प्रार्थनाओं में भाग लेने और उनके गले में जबरन क्रॉस बाँधने के लिए मजबूर किया जाता था। इस मामले में गुजरात धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2003 के तहत हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने और प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराने के आरोप में मकरपुरा थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। सेवा के नाम पर चल रहे इस घिनौने खेल का पर्दाफाश तब हुआ जब अधिकारियों को पता चला कि संस्था इन बच्चियों के मूल धर्म को मिटाने पर तुली थी।

जाँच समिति की रिपोर्ट में यह भी चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि एक हिंदू लड़की की शादी उसकी मर्जी के खिलाफ जबरन एक ईसाई परिवार में कराने का तगड़ा दबाव बनाया गया था। इसके अलावा हिंदू लड़कियों की धार्मिक आस्था को भ्रष्ट करने के उद्देश्य से उन्हें भोजन में जबरन मांसाहारी (मांस) परोसा जाता था।

हालाँकि मिशनरीज ऑफ चैरिटी के प्रवक्ताओं ने इन सभी आरोपों को हमेशा की तरह बेबुनियाद और झूठा बताते हुए खारिज कर दिया। लेकिन पुलिस और जिला कलेक्टर द्वारा गठित कई विभागों की संयुक्त जाँच टीम ने इन आरोपों को सही पाया था, जिसके बाद ही कानूनी शिकंजा कसा गया था।

नवजात बच्चों की खरीद-फरोख्त से जुड़ा ह्यूमन ट्रैफिकिंग का घिनौना चेहरा

मिशनरीज ऑफ चैरिटी पर केवल जबरन धर्मांतरण कराने के ही नहीं, बल्कि नवजात बच्चों को पैसों के लिए बेचने जैसे जघन्य और अमानवीय अपराध के आरोप भी लग चुके हैं। यह काला सच साल 2018 में झारखंड के रांची स्थित संस्था के एक शेल्टर होम से सामने आया था।

वहाँ पुलिस ने मिशनरीज ऑफ चैरिटी की दो सिस्टर्स (नन) को नवजात बच्चों की अवैध खरीद-फरोख्त के आरोप में रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। इस घटना ने मदर टेरेसा द्वारा स्थापित इस संस्था के तथाकथित ‘पवित्र’ और ‘दयालु’ चेहरे के पीछे छिपे भयानक कुरुप सच को दुनिया के सामने ला दिया था।

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। आयोग ने देश की सर्वोच्च अदालत से गुहार लगाई थी कि इन ईसाई मिशनरी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे शेल्टर होम्स से बच्चों के रहस्यमयी तरीके से लापता होने और उन्हें बेचे जाने की जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक विशेष जाँच दल (SIT) का गठन किया जाए।

आयोग का आरोप था कि झारखंड के तत्कालीन सरकारी अधिकारियों ने इस संवेदनशील मामले में बेहद ढुलमुल रवैया अपनाया और इस बड़े रैकेट की जाँच को दबाने के लगातार प्रयास किए गए थे।

आयोग की गहन जाँच के दौरान जो आँकड़े सामने आए, वे बेहद डराने वाले और चौंकाने वाले थे। साल 2015 से 2018 के बीच रांची के इस शेल्टर होम में लगभग 450 असहाय और गरीब गर्भवती महिलाएँ भर्ती हुई थीं। लेकिन जब रिकॉर्ड खंगाला गया, तो वहाँ केवल 170 बच्चों का ही कानूनी ब्योरा दर्ज मिला।

बाकी बचे 280 नवजात शिशुओं के बारे में संस्था के पास कोई जानकारी नहीं थी कि वे कहाँ गए और उनका क्या हुआ। इसी तस्दीक के बाद सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम और बिहार सहित देश के 9 राज्यों की सरकारों को नोटिस जारी कर इस मानव तस्करी के तारों की जाँच करने का आदेश दिया था।

मदर टेरेसा का काला सच- छलावा, पाखंड और ‘कलकत्ता की पिशाच’

भारत का संविधान देश के प्रत्येक नागरिक में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किकता की भावना विकसित करने की बात करता है। लेकिन मदर टेरेसा को वेटिकन द्वारा ‘संत’ की उपाधि दिए जाने की पूरी प्रक्रिया घोर अंधविश्वास, पाखंड और चिकित्सा विज्ञान के सीधे अपमान पर टिकी थी।

टेरेसा को संत बनाने के लिए उनके नाम पर वेटिकन ने यह हास्यास्पद दावा किया कि उनके चित्र को छूने मात्र से लोगों के असाध्य कैंसर और ट्यूमर रातों-रात ठीक हो गए। भारत के डॉक्टरों और बुद्धिजीवियों ने इसे जनता को गुमराह करने वाला सरासर जादू-टोना और अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला कृत्य बताया था।

मशहूर ब्रिटिश लेखक क्रिस्टोफर हित्चेंस ने अपनी चर्चित किताब ‘द मिशनरी पोजीशन’ में मदर टेरेसा की इस पाखंडी छवि की धज्जियाँ उड़ाई थीं। उन्होंने अपनी किताब में टेरेसा को सीधे ‘घोउल ऑफ कोलकाता’ यानी ‘कलकत्ता की पिशाच‘ के नाम से संबोधित किया था। हित्चेंस का अकाट्य तर्क था कि टेरेसा का संस्थान पीड़ितों का आधुनिक इलाज करने के लिए नहीं था, बल्कि वह बीमार और मरते हुए लोगों को आधुनिक दवाओं से महरूम रखकर तड़पने के लिए छोड़ देता था। बीमारों से कहा जाता था कि यह दर्द उनके पापों के लिए ईश्वरीय दंड है, जिसे उन्हें बिना किसी शिकायत के चुपचाप झेलना चाहिए।

इस संस्था के घिनौने सच को उजागर करने में अनिवासी भारतीय डॉक्टर अरूप चटर्जी का शोध सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने लगभग 25 वर्षों तक इस संस्था के कामकाज पर जमीनी शोध किया और अपनी प्रामाणिक किताब ‘Mother Teresa: The Untold Story’ में इसके सारे काले कारनामे उजागर किए।

उन्होंने प्रामाणिक रूप से बताया कि दुनिया भर से इस संस्था को चंदे के रूप में करोड़ों-अरबों रुपए मिलते थे, लेकिन कोलकाता के उनके केंद्रों में मरीजों को बुनियादी चिकित्सा सुविधाएँ, साफ-सुथरी सुइयाँ और दर्द निवारक दवाएँ तक नसीब नहीं होती थीं। चंदे का यह भारी-भरकम पैसा आखिर कहाँ गायब हो जाता था, इसका कोई हिसाब भारत सरकार को नहीं दिया जाता था।

वैश्विक ताकतों का समर्थन और विवादास्पद राजनीतिक सांठगांठ

मदर टेरेसा की पूरी जिंदगी विवादों, कट्टरपंथी बयानों और दुनिया के बड़े-बड़े अपराधियों व भ्रष्टाचारियों से चंदा लेने की कहानियों से भरी पड़ी है। साल 1979 में जब उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था, तब उन्होंने अपने भाषण में दुनिया को चौंकाते हुए कहा था कि वैश्विक शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा परमाणु हथियार या युद्ध नहीं, बल्कि ‘गर्भपात’ है। उनके इस घोर रूढ़िवादी और महिला विरोधी बयान की आधुनिक समाज और दुनिया भर के महिला अधिकार संगठनों ने तीखी भर्चना की थी, जिससे उनका संकीर्ण धार्मिक एजेंडा साफ दिखाई देता था।

साल 1984 में जब भारत के भोपाल में भीषण गैस त्रासदी हुई और हजारों बेगुनाह लोग मारे गए, तब मदर टेरेसा वहाँ सांत्वना देने पहुँची थीं। लेकिन वहाँ पहुँचकर उन्होंने पीड़ितों को न्याय की लड़ाई लड़ने के बजाय कॉरपोरेट अपराधी कंपनी ‘यूनियन कार्बाइड’ को चुपचाप माफ कर देने की आत्मघाती सलाह दी थी।

आलोचकों का साफ मानना है कि वे हमेशा पश्चिमी देशों की कॉरपोरेट ताकतों और रोनाल्ड रीगन व मार्गरेट थेचर जैसी सरकारों की एजेंट के रूप में काम कर रही थीं। इसके अलावा उन्होंने अमेरिका के कुख्यात वित्तीय घोटालेबाज चार्ल्स कीटिंग से 1.25 मिलियन डॉलर का चंदा लिया और बाद में अदालत में उस अपराधी को बचाने के लिए पैरवी तक की थी।

ईसाई मिशनरियों को ऑक्सीजन देने का अमेरिकी प्रयास

इन तमाम घिनौने विवादों, मुकदमों और मानव तस्करी जैसे गंभीर आरोपों के बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का भारत आते ही सबसे पहले मिशनरीज ऑफ चैरिटी जाना एक सोची-समझी राजनीतिक पटकथा का हिस्सा है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि अमेरिका हमेशा से ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ और ‘मानवाधिकार’ के झूठे मुखौटे का इस्तेमाल करके विकासशील देशों पर अपना रणनीतिक दबाव बनाने की कुटिल नीति अपनाता रहा है।

रुबियो की यह यात्रा असल में भारत सरकार के कड़े रुख के कारण वित्तीय और सामाजिक रूप से कमजोर पड़ चुकी इन मिशनरियों को वैश्विक स्तर पर नैतिक और राजनीतिक ऑक्सीजन देने का एक खुला प्रयास है।

जिस संस्था पर भारत की अदालतों में जबरन धर्मांतरण, बच्चों की खरीद-फरोख्त और वित्तीय हेराफेरी के संगीन कानूनी मुकदमे चल रहे हों, वहाँ अमेरिकी विदेश मंत्री का खुद चलकर जाना भारत की न्याय प्रणाली और आंतरिक सुरक्षा को ठेंगा दिखाने जैसा है। वाशिंगटन इस यात्रा के जरिए यह संदेश देना चाहता है कि वह भारत में काम कर रहे इन ईसाई नेटवर्क की ढाल बनकर खड़ा है।

कांसमंडी किले को लेकर पासी समाज और मुस्लिम आमने-सामने: जानें इस्लामी आक्रांता सालार मसूद गाजी से कनेक्शन, जिसे महाराजा सुहैल देव ने गाजर-मूली की तरह काटा

विश्वप्रसिद्ध और रसीले दशहरी आमों के लिए खास पहचान रखने वाला लखनऊ का मलिहाबाद क्षेत्र आज एक अत्यंत संवेदनशील ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक विवाद का मुख्य केंद्र बन चुका है। अयोध्या, काशी, मथुरा, संभल और धार की भोजशाला के बाद अब लखनऊ का ‘कांसमंडी’ इलाका देश और प्रदेश की सांस्कृतिक व राजनीतिक बहसों के केंद्र में आ गया है। इस पूरे विवाद के केंद्र में एक ऐसा ऐतिहासिक नाम है, जिसे लेकर एक बार फिर इतिहास के पन्नों को पलटा जा रहा है और वह नाम है सैय्यद सालार मसूद गाजी का।

कांसमंडी में स्थित एक विशाल, प्राचीन और ऊँचे टीलेनुमा परिसर को लेकर पासी समाज और मुस्लिम समुदाय आमने-सामने हैं। लाखन आर्मी, पासी समाज और विभिन्न हिंदू संगठनों का दृढ़ दावा है कि वर्तमान समय में जिस परिसर को मुस्लिम पक्ष द्वारा मस्जिद, मजार या पारंपरिक कब्रिस्तान बताया जा रहा है, वह वास्तव में 11वीं शताब्दी के महान चक्रवर्ती राजपासी शासक राजा कंस का ऐतिहासिक अजेय किला है।

पासी समाज का आरोप है कि इस किले के भीतर स्थित प्राचीन महादेव (शिव) मंदिर को दबाकर इसका इस्लामीकरण किया गया है। वहीं मुस्लिम पक्ष इसे वक्फ रिकॉर्ड में दर्ज सदियों पुरानी मस्जिद और मकबरा घोषित कर रहा है। लेकिन इस पूरे विवाद की सुलगती आग के पीछे सालार मसूद गाजी का वह क्रूर इतिहास है, जिसने 11वीं शताब्दी में भारत की धरती को लहूलुहान किया था।

कौन था सालार मसूद गाजी? जानें उसकी क्रूरता का इतिहास

सैय्यद सालार मसूद गाजी को स्थानीय लोककथाओं और कुछ धार्मिक परंपराओं में ‘गाजी मियाँ’ के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन इतिहास की किताबों और ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उसका परिचय एक अत्यंत क्रूर और बर्बर विदेशी आक्रांता के रूप में होता है। वह भारत के प्रसिद्ध मंदिरों को तोड़ने और अपार धन-दौलत लूटने वाले अफगान हमलावर महमूद गजनवी का सगा भाँजा था। सालार मसूद के पिता सालार साहू, महमूद गजनवी की सेना के प्रमुख सेनापति थे। मसूद बचपन से ही अपने मामा गजनवी की छत्रछाया में पला-बढ़ा था, इसलिए उसके भीतर भी भारत की धन-संपदा को लूटने और तलवार के बल पर इस्लाम का प्रचार करने का वही क्रूर जनून सवार था जो गजनवी में था।

17वीं शताब्दी में जहाँगीर के शासनकाल के दौरान अब्दुर रहमान चिश्ती द्वारा फारसी भाषा में लिखी गई किताब ‘मिरात-ए-मसूदी’ में सालार मसूद के जीवन और उसके सैन्य अभियानों का विस्तार से उल्लेख मिलता है। इस किताब के तथ्य बताते हैं कि सालार मसूद ने भारत में कई बड़े सैन्य अभियान चलाए। उसका एकमात्र उद्देश्य भारत के समृद्ध हिंदू राज्यों को नष्ट करना, उनके पवित्र मंदिरों को लूटना और यहाँ की आबादी का जबरन धर्म परिवर्तन कराना था।

अपने इस एजेंडे को पूरा करने के लिए उसने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। उसने दिल्ली, मेरठ और कन्नौज जैसे बड़े क्षेत्रों को लूटा और वहाँ के हिंदुओं का बड़े पैमाने पर कत्लेआम किया। कन्नौज को तबाह करने के बाद उसने अवध (वर्तमान लखनऊ और आसपास के क्षेत्र) की तरफ अपने कदम बढ़ाए, जहाँ उसका सामना इस मिट्टी के वीर योद्धाओं से हुआ।

सोमनाथ मंदिर की लूट से मसूद का संबंध

सालार मसूद गाजी का नाम भारत के सबसे पवित्र और समृद्ध मंदिरों में से एक गुजरात के सोमनाथ मंदिर की लूट से भी गहराता से जुड़ा हुआ है। हालाँकि इस बात को लेकर इतिहासकारों में कुछ मतभेद जरूर हैं कि क्या वह सीधे तौर पर उस मुख्य सेना का हिस्सा था, लेकिन कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य और दस्तावेज यह प्रमाणित करते हैं कि उसने अपने मामा महमूद गजनवी के साथ भारत के मंदिरों पर हुए भीषण हमलों में सक्रिय रूप से भाग लिया था।

गजनवी की सेना जब सोमनाथ के शिवलिंग को खंडित कर रही थी और मंदिर के सोने-चाँदी को लूट रही थी, तब सालार मसूद उस जेहादी सेना को वैचारिक और सैन्य नेतृत्व दे रहा था। भारत के सांस्कृतिक प्रतीकों को नष्ट करना और हिंदुओं की आस्था पर चोट करना सालार मसूद की युद्ध नीति का एक मुख्य हिस्सा था। यही कारण है कि भारतीय जनमानस और हिंदू संगठनों में सालार मसूद गाजी की छवि एक धर्मरक्षक की नहीं, बल्कि एक क्रूर मंदिर लुटेरे और हत्यारे की रही है।

11वीं शताब्दी के अवध में महाराजा कंस पासी की हुंकार

जब सालार मसूद गाजी अपनी विशाल और उन्मादी सेना लेकर दिल्ली और कन्नौज को मटियामेट करता हुआ अवध के क्षेत्र में दाखिल हुआ, तो उसे लगा था कि आगे का रास्ता भी उतना ही आसान होगा। लेकिन उसे यह अंदाजा नहीं था कि अवध की पावन धरती पर उसका सामना राजपासी समाज के उन वीर योद्धाओं से होने वाला है जो अपनी मातृभूमि और धर्म की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने से कभी पीछे नहीं हटते थे।

लखनऊ गजेटियर के आधिकारिक और ऐतिहासिक रिकॉर्ड में यह स्पष्ट रूप से दर्ज है कि 11वीं शताब्दी के अंतिम दौर में काकोरी, मलिहाबाद और उसके आसपास का पूरा क्षेत्र राजा कंस पासी के मजबूत राजनीतिक, सामाजिक और सैन्य प्रभाव में था। महाराजा कंस पासी एक बेहद स्वाभिमानी और रणनीतिक रूप से कुशल शासक थे। जब सालार मसूद की सेना मलिहाबाद और काकोरी की सीमाओं पर पहुँचकर गांवों को जलाने और मंदिरों को तोड़ने लगी, तब राजा कंस ने विदेशी दासता स्वीकार करने या आत्मसमर्पण करने के बजाय युद्ध का बिगुल फूँक दिया। उन्होंने अपने सभी सामंतों और सैनिकों को इकट्ठा किया और इस विदेशी आक्रांता को अपनी धरती से खदेड़ने की प्रतिज्ञा ली।

कांसमंडी के रक्तरंजित युद्ध में सालार के सेनापतियों का वध

अंग्रेजी हुकूमत के दौरान तैयार किए गए लखनऊ गजेटियर के अनुसार, कांसमंडी और काकोरी का यह संपूर्ण क्षेत्र सालार मसूद गाजी की विदेशी आक्रमणकारी सेना और स्थानीय हिंदू पासी राजाओं के बीच हुए अत्यंत भीषण और रक्तरंजित संघर्ष का मुख्य रणक्षेत्र बन गया। सालार मसूद के पास घुड़सवारों और आधुनिक हथियारों से लैस एक बड़ी सेना थी, लेकिन राजा कंस पासी ने अपनी भौगोलिक स्थिति और छापामार युद्ध नीति (गोरिल्ला वॉरफेयर) का शानदार उपयोग किया। उन्होंने कांसमंडी के अपने ऊँचे और अजेय किले को अपनी रक्षा और हमले का मुख्य केंद्र बनाया।

इस युद्ध के दौरान एक ऐसी ऐतिहासिक घटना घटी जिसने सालार मसूद की सेना की रीढ़ तोड़ दी। गजेटियर में इस बात का विशेष रूप से उल्लेख है कि युद्ध के मैदान में राजपासी राजा कंस और उनके वीर सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए सालार मसूद गाजी के दो सबसे प्रमुख, भरोसेमंद और खूंखार सेनापतियों सैय्यद हातिम और सैय्यद खातिम को इसी कांसमंडी के मैदान में मार गिराया था।

इन दोनों सेनापतियों की मृत्यु कोई साधारण घटना नहीं थी; वे मसूद के अभियान के दो मुख्य स्तंभ थे। उनकी मौत से विदेशी सेना में हड़कंप मच गया और मसूद का जो अभियान अब तक अजेय लग रहा था, वह अवध की इस धरती पर आकर बेहद कमजोर और पस्त पड़ गया। राजा कंस पासी की इस बहादुरी ने सालार मसूद के विजयी रथ को ऐसा झटका दिया कि वह मलिहाबाद और लखनऊ के क्षेत्र में पूरी तरह पैर नहीं जमा सका।

बहराइच की ऐतिहासिक लड़ाई में सालार मसूद का अंत

मलिहाबाद और कांसमंडी में राजा कंस पासी से लोहा लेने के बाद सालार मसूद गाजी की सेना काफी कमजोर हो चुकी थी और उसके आधे से ज्यादा सैनिक मारे जा चुके थे। लेकिन अपने बचे-खुचे सैनिकों के साथ वह आगे बढ़ता रहा। इस कहानी का सबसे निर्णायक और अंतिम अध्याय बहराइच की ऐतिहासिक लड़ाई से जुड़ा है। साल 1034 ईस्वी में जब मसूद बहराइच के क्षेत्र में पहुँचा, तो वहाँ के महान शासक महाराजा सुहेलदेव के नेतृत्व में स्थानीय हिंदू राजाओं ने एक बड़ा गठबंधन तैयार कर लिया था।

महाराजा सुहेलदेव और राजा कंस पासी एक ही कालखंड के समकालीन योद्धा थे। बहराइच की प्रसिद्ध चित्तौरा झील के आसपास दोनों सेनाओं के बीच वह अंतिम और ऐतिहासिक महायुद्ध लड़ा गया। महाराजा सुहेलदेव की सेना ने सालार मसूद की फौज को चारों तरफ से घेर लिया। पासी समाज और स्थानीय राजाओं के संयुक्त पराक्रम के सामने विदेशी सेना टिक नहीं सकी।

महाराजा सुहेलदेव ने युद्ध के मैदान में सालार मसूद गाजी को गाजर-मूली की तरह काट डाला और उसे मिट्टी में मिला दिया। मसूद की पूरी सेना का समूल नाश कर दिया गया। मौत के बाद सालार मसूद को उसी बहराइच की धरती पर दफनाया गया, जहाँ बाद में फिरोज शाह तुगलक के शासनकाल के दौरान उसकी मजार को एक बड़ी दरगाह का रूप दे दिया गया, जिसे आज गाजी मियाँ की दरगाह कहा जाता है।

वर्तमान विवाद की जमीनी हकीकत, किला बनाम मस्जिद

अब सवाल यह उठता है कि सदियों पुराने इस इतिहास की गूँज आज मलिहाबाद के कांसमंडी में दोबारा क्यों सुनाई दे रही है? दरअसल, विवाद की जड़ें उसी प्राचीन ऊँचे टीलेनुमा परिसर से जुड़ी हैं। पासी समाज का यह दृढ़ तर्क है कि जिस स्थान पर आज मुस्लिम पक्ष दावा कर रहा है, वह असल में महाराजा कंस पासी का मूल किला है। पासी समाज का आरोप है कि इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन विदेशी आक्रांताओं और उनके सेनापतियों (हातिम और खातिम) को राजा कंस ने इसी मैदान में मारकर अपनी धरती को गौरवान्वित किया था, आज उन्हीं की कथित मजारों और कब्रों के नाम पर राजा कंस के अपने ही किले पर अवैध कब्जा कर लिया गया है।

स्थानीय हिंदू संगठनों और पासी समाज के नेताओं का कहना है कि इस किले के मूल ऐतिहासिक स्वरूप को ‘जमीन जिहाद’ के माध्यम से धीरे-धीरे नष्ट किया गया है। उनके अनुसार, परिसर के भीतर एक अत्यंत प्राचीन महादेव (शिव) मंदिर स्थापित था, जिसे दबा दिया गया और अब वहाँ नमाज पढ़ी जा रही है।

इसके साथ ही परिसर के भीतर जानबूझकर नई कब्रें और उर्दू के शिलापट लगाकर इस पूरी सनातनी विरासत का इस्लामीकरण करने का प्रयास किया जा रहा है। पासी समाज इस बात से बेहद आक्रोशित है कि उनके गौरवशाली पूर्वजों के इतिहास को मिटाकर वहाँ एक आक्रांता के सहयोगियों का महिमामंडन किया जा रहा है।

पासी समाज के प्रमुख नेता सूरज पासी ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “हम किसी भी समुदाय की वैध या कानूनी धार्मिक संपत्ति के खिलाफ बिल्कुल नहीं हैं, लेकिन हमारे पूर्वज महाराजा कंस पासी की महान विरासत को मिटाने की किसी भी साजिश को हम कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। लखनऊ गजेटियर इस बात का चश्मदीद गवाह है कि यह स्थान राजा कंस का किला था और यहीं उन्होंने विदेशी आक्रांताओं के सेनापतियों को धूल चटाई थी। हमारे आराध्य भगवान शिव के प्राचीन मंदिर को इस कब्जे से मुक्त कराना हमारी आस्था, हमारी संस्कृति और हमारे आत्मसम्मान का विषय है और हम इसके लिए कानूनी और सामाजिक रूप से अंतिम सांस तक लड़ेंगे।”

पासी समाज का यह भी कहना है कि राजपासी राजा कंस के बाद इस क्षेत्र में महाराजा बिजली पासी जैसे महान शासक रहे, जिनके नियंत्रण में उस समय 12 विशाल किले थे। इस समाज का भारत के रक्षा इतिहास में एक गौरवशाली स्थान रहा है, जिसे जानबूझकर इतिहास की मुख्यधारा की किताबों से गायब कर दिया गया।

मलिहाबाद के कांसमंडी में उपजा यह विवाद केवल एक जमीन के टुकड़े की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह इतिहास के उन दबे हुए, धूल धूसरित पन्नों को दोबारा पलटने जैसा है, जहाँ 11वीं शताब्दी के स्थानीय राजाओं का शौर्य, विदेशी आक्रांताओं का क्रूर और रक्तरंजित इतिहास और आज के दौर की धार्मिक-सांस्कृतिक अस्मिता आपस में सीधे टकरा रही हैं।

बंगाल में जिसे ‘चोर बाजारी’ बता रहे थे राहुल गाँधी, वही केरल में कर रही उनकी कॉन्ग्रेस सरकार: VD सतीशन ने केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को बनाया अपना सचिव

राजनीति में दूसरों पर कीचड़ उछालना बहुत आसान काम है। लेकिन जब वही कीचड़ खुद के दामन पर गिरता है, तो चेहरे का रंग उड़ जाता है। कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी के साथ भी ठीक ऐसा ही हुआ है। 10 दिन पहले राहुल गाँधी ने पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारी की नियुक्ति पर बड़ा हंगामा खड़ा किया था। उन्होंने देश की सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग और बीजेपी पर बेहद गंभीर आरोप लगाए थे।

लेकिन अब केरल से एक ऐसी खबर आई है जिसने राहुल गाँधी के दावों की धज्जियाँ उड़ा दी हैं। केरल में कॉन्ग्रेस की सरकार है। वहाँ के कॉन्ग्रेस मुख्यमंत्री ने ठीक वही काम किया है, जिसे राहुल गाँधी 10 दिन पहले ‘चोरी’ और ‘इनाम’ बता रहे थे। अब जब उनकी खुद की पार्टी ने वही कदम उठाया है, तो राहुल गाँधी और उनकी पूरी टीम ने चुप्पी साध ली है।

राहुल गाँधी का वह पोस्ट: ‘जितनी बड़ी चोरी, उतना बड़ा इनाम’

सबसे पहले बात करते हैं कि 10 दिन पहले ऐसा क्या हुआ था जिस पर राहुल गाँधी ने आसमान सिर पर उठा लिया था। दरअसल, पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्य चुनाव अधिकारी मनोज अग्रवाल को वहाँ का मुख्य सचिव बनाया गया था। इसके साथ ही एक और चुनाव अधिकारी सुब्रत गुप्ता भी शुभेंदु अधिकारी की टीम का हिस्सा बने थे।

इस खबर के सामने आते ही राहुल गाँधी ने बिना सोचे-समझे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक पोस्ट कर लिखा, “BJP-EC के ‘चोर बाजार’ में – जितनी बड़ी चोरी, उतना बड़ा इनाम।” राहुल गाँधी का सीधा आरोप था कि इन चुनाव अधिकारियों ने चुनाव के दौरान BJP की मदद की यानी ‘वोटों की चोरी’ की। इसलिए BJP सरकार ने उन्हें मुख्य सचिव जैसा बड़ा पद देकर इसका ‘इनाम’ दिया है। राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग जैसी निष्पक्ष संस्था को भी ‘चोर बाजार’ कह दिया था।

अब केरल में कॉन्ग्रेस सरकार ने क्या खेल किया?

अब कहानी में एक बड़ा ट्विस्ट आता है। राहुल गाँधी के इस बयान को अभी 10 दिन भी नहीं बीते थे कि केरल से एक बड़ी सरकारी नियुक्ति की खबर सामने आई। केरल में इस समय कॉन्ग्रेस के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन की सरकार है। केरल सरकार ने एक आदेश जारी किया। इस आदेश के मुताबिक, डॉ रतन यू केलकर को मुख्यमंत्री का सचिव नियुक्त कर दिया गया है।

अब चौंकने वाली बात यह है कि डॉ रतन यू केलकर कोई साधारण अधिकारी नहीं हैं। वे केरल के ‘मुख्य चुनाव अधिकारी’ के पद पर तैनात थे। यानी जिस समय केरल में चुनाव हो रहे थे, उस समय पूरी चुनावी व्यवस्था की कमान इन्हीं के हाथों में थी। अब कॉन्ग्रेस के मुख्यमंत्री ने चुनाव खत्म होते ही उन्हें अपना सबसे खास और करीबी सचिव बना लिया है।

खुद की बारी में ‘मजबूरी’ और दूसरों की बारी में ‘चोरी’?

अब यहाँ सबसे बड़ा सवाल राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी के इस दोगले रवैये पर खड़ा होता है। लोग यह पूछ रहे है कि अगर BJP या कोई गैर-कॉन्ग्रेसी सरकार किसी पूर्व चुनाव अधिकारी को उसकी योग्यता के आधार पर कोई पद दे, तो वह ‘चोर बाजार’ और ‘वोट चोरी का इनाम’ कैसे हो जाता है?

जब केरल में कॉन्ग्रेस की अपनी सरकार ठीक वही काम करती है, एक सिटिंग चुनाव अधिकारी को सीधे मुख्यमंत्री का सचिव बना देती है, तो वह ‘ईमानदार नियुक्ति’ कैसे बन जाती है? क्या राहुल गाँधी अब केरल के मुख्यमंत्री को भी पत्र लिखेंगे?

क्या वे अपनी ही सरकार के इस फैसले को ‘चोर बाजार’ का हिस्सा मानेंगे? जाहिर है कि वे ऐसा कभी नहीं करेंगे। यही राजनीति का वह दोहरा चेहरा है जिसे देश की जनता अब अच्छे से समझने लगी है।

बिना सबूत के रोना: विपक्ष और कॉन्ग्रेस का पुराना पैंतरा

इस पूरे विवाद के पीछे एक और बहुत बड़ी सच्चाई छिपी है, जिसे समझना बेहद जरूरी है। कॉन्ग्रेस पार्टी और पूरा विपक्ष पिछले कई सालों से लगातार एक ही राग अलाप रहा है। जब भी वे कोई चुनाव हारते हैं, तो अपनी कमियों को सुधारने के बजाय सीधे चुनाव आयोग पर ठीकरा फोड़ देते हैं। वे हर बार चिल्लाते हैं कि चुनाव में धांधली हुई है, वोट चोरी हुए हैं, ईवीएम (EVM) में गड़बड़ी की गई है और चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है।

लेकिन देश गवाह है कि आज तक कॉन्ग्रेस या किसी भी विपक्षी दल ने अदालत या जनता के सामने अपनी इन बातों का एक भी पुख्ता सबूत पेश नहीं किया है। सुप्रीम कोर्ट तक ने कई बार इनके दावों को खारिज किया है और फटकार लगाई है। सच्चाई यह है कि जब ये चुनाव जीत जाते हैं (जैसे केरल या अन्य राज्यों में), तब चुनाव आयोग बिल्कुल सही काम कर रहा होता है। लेकिन जब ये हार जाते हैं, तो उसी चुनाव आयोग को बदनाम करने की साजिश शुरू कर देते हैं।

सबसे ऊँची चोटी पर वर्ल्ड रिकॉर्ड तो बना, लेकिन माउंट एवरेस्ट का ‘जाम’ कितना खतरनाक?: 2 भारतीयों की मौत से उठते सवाल

दुनिया की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट पर इस साल इतिहास का सबसे बड़ा ‘ट्रैफिक जाम’ लगा है। नेपाल के रास्ते एक ही दिन में रिकॉर्ड 274 पर्वतारोहियों ने एवरेस्ट पर चढ़कर नया विश्व रिकॉर्ड बनाया है। लेकिन इस भारी भीड़ और जाम के बीच एक बहुत ही दुखद खबर आई है।

एवरेस्ट की चोटी से नीचे उतरते समय दो भारतीय पर्वतारोहियों की तबियत अचानक बिगड़ गई। इस वजह से उन दोनों की मौत हो गई है। मरने वाले भारतीयों के नाम अरुण कुमार तिवारी और संदीप आरे हैं। चोटी के पास पर्वतारोहियों की बहुत लंबी कतार लगी थी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस जाम में फँसने के कारण ऑक्सीजन की कमी हो गई। साथ ही वहाँ अत्यधिक ठंड थी, जिसे इस बड़े हादसे की मुख्य वजह माना जा रहा है।

दो भारतीय पर्वतारोहियों ने गँवाई अपनी जान

नेपाल के इस पर्वतारोहण सीजन में भारी भीड़ लगी है। इस भीड़ के बीच 2 भारतीय पर्वतारोहियों की मौत हो गई है। इस दुखद खबर ने सबको झकझोर दिया है। एवरेस्ट पर यात्रा कराने वाली एजेंसी ‘द पायनियर एडवेंचर्स’ ने इस बात की पुष्टि की है।

पहले भारतीय पर्वतारोही का नाम अरुण कुमार तिवारी था। उनकी मौत चोटी के ठीक नीचे मशहूर ‘हिलारी स्टेप’ के पास हुई। वे चोटी से नीचे उतर रहे थे। तभी वे अचानक बहुत बीमार पड़ गए। चार शेरपा गाइडों ने उन्हें बचाने की बहुत कोशिश की। लेकिन उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। डॉक्टर्स को शक है कि ज्यादा ऊँचाई की वजह से उनके फेफड़ों में पानी भर गया था।

दूसरी मौत 46 साल के संदीप आरे की हुई। संदीप ने 20 मई को एवरेस्ट की चोटी पर कामयाबी से तिरंगा फहराया था। लेकिन नीचे उतरते समय वे बर्फीले अंधेपन का शिकार हो गए। उन्हें अचानक कुछ भी दिखना बंद हो गया था। इसके बाद पाँच शेरपा गाइडों ने मिलकर उन्हें साउथ समिट से बचाया। उन्हें किसी तरह कैंप-2 तक लाया गया। लेकिन वहाँ पहुँचते ही उन्होंने दम तोड़ दिया।

एवरेस्ट की चोटी पर 5 किलोमीटर लंबा जाम

इस साल एवरेस्ट पर चढ़ने वालों की बहुत भारी भीड़ है। भीड़ के मामले में इस बार सारे पुराने रिकॉर्ड टूट गए हैं। चोटी के रास्ते पर पर्वतारोहियों की करीब 5 किलोमीटर लंबी लाइन देखी गई है। सोशल मीडिया पर इस भीड़ की तस्वीरें खूब वायरल हो रही हैं। इस साल चीन ने तिब्बत की तरफ से चढ़ाई करने की इजाजत नहीं दी थी।

इस वजह से दुनिया भर के सभी लोग नेपाल के रास्ते ही एवरेस्ट चढ़ने पहुँच गए। पहाड़ पर चढ़ने के लिए अच्छा मौसम सिर्फ कुछ दिनों के लिए ही रहता है। इसलिए सैकड़ों लोग एक साथ चोटी की तरफ निकल पड़े। इसी वजह से रास्ते में यह भयानक जाम लग गया है।

एक ही दिन में 274 लोगों का नया रिकॉर्ड

नेपाल के पर्यटन विभाग ने एक बड़ी जानकारी दी है। बुधवार को सुबह तड़के 3 बजे से ही पहाड़ पर चढ़ाई शुरू हो गई थी। यह चढ़ाई लगातार 11 घंटे तक चलती रही। इस दौरान कुल 274 पर्वतारोहियों ने एवरेस्ट की चोटी पर अपने कदम रखे। नेपाल के रास्ते एक ही दिन में चढ़ने वालों की यह अब तक की सबसे बड़ी संख्या है।

इससे पहले 22 मई 2019 को एक दिन में 223 लोग चोटी पर पहुँचे थे। वैसे दुनिया भर में एक दिन में सबसे ज्यादा 354 लोगों के चढ़ने का रिकॉर्ड है। यह रिकॉर्ड 23 मई 2019 को नेपाल और तिब्बत दोनों तरफ के रास्तों को मिलाकर बना था। इस बार तिब्बत का रास्ता बंद था। इसके बावजूद सिर्फ नेपाल के रास्ते से ही एक नया रिकॉर्ड बन गया है।

एवरेस्ट की दौड़ में भारत तीसरे नंबर पर

इस साल एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए भारत से बहुत सारे लोग पहुँचे हैं। नेपाल सरकार ने इस सीजन में कुल 494 विदेशी पर्वतारोहियों को पहाड़ पर चढ़ने की इजाजत (परमिट) दी थी। इसमें सबसे ज्यादा 109 परमिट चीन के लोगों को मिले।

दूसरे नंबर पर अमेरिका रहा, जिसके 77 नागरिकों को यह इजाजत मिली। भारत इस सूची में तीसरे स्थान पर है। भारत के 61 पर्वतारोहियों को इस बार परमिट मिला था। इसके अलावा ब्रिटेन के 32 और रूस के 18 लोगों ने भी इस बार एवरेस्ट पर चढ़ाई की है।

जाम से क्यों आ जाती है मौत की नौबत?

एवरेस्ट की चोटी के पास का हिस्सा ‘डेथ जोन’ कहलाता है। यह इलाका समुद्र तल से 8,000 मीटर से भी ज्यादा ऊँचा है। इतनी ऊँचाई पर हवा में ऑक्सीजन बहुत कम होती है। इसलिए, इंसान का शरीर यहाँ ज्यादा देर तक जिंदा नहीं रह सकता है। जब रास्ते में भीड़ होती है, तो पर्वतारोहियों को लाइन में खड़ा होना पड़ता है।

ज्यादा देर इंतजार करने से उनका ऑक्सीजन सिलेंडर खत्म होने लगता है। कड़ कड़ाती ठंड में खड़े रहने से उनका शरीर ठंडा पड़ जाता है। हाथ-पैर जमने लगते हैं। ऑक्सीजन की कमी और ठंड के कारण लोग अचानक बीमार हो जाते हैं। थकावट की वजह से कई बार नीचे उतरते समय उनका ध्यान भटक जाता है और वे हादसे का शिकार हो जाते हैं।

ऑक्सीजन की चोरी ने बढ़ाई मुश्किलें

एवरेस्ट पर भीड़ बढ़ने से एक और बड़ी परेशानी शुरू हो गई है। यहाँ ऊँचाई पर पर्वतारोहियों की मदद के लिए पहले से ऑक्सीजन सिलेंडर रखे जाते हैं। अब इन सिलेंडरों की चोरी होने लगी है। कई पर्वतारोहियों ने बताया कि उनके हिस्से के सिलेंडर गायब मिलते हैं।

इतनी ऊँचाई पर किसी की ऑक्सीजन चुराना उसकी जान लेने जैसा है। इसके अलावा, कई ऐसे लोग भी एवरेस्ट चढ़ने आ रहे हैं जो शारीरिक रूप से फिट नहीं हैं। वे रास्ते में बहुत धीरे-धीरे चलते हैं। इस वजह से उनके पीछे चल रहे बाकी लोगों के लिए भी खतरा बढ़ जाता है।

नेपाल सरकार की बंपर कमाई

इस साल नेपाल सरकार ने एवरेस्ट चढ़ने की फीस बढ़ा दी थी। इसे 11,000 डॉलर से बढ़ाकर 15,000 डॉलर (करीब 12 लाख रुपए) कर दिया गया। फीस बढ़ने के बाद भी एवरेस्ट पर आने वाले लोग कम नहीं हुए।

इस सीजन में नेपाल ने 30 अलग-अलग चोटियों के लिए 1,181 पर्वतारोहियों को परमिट दिए। इससे नेपाल सरकार को 1.25 अरब रुपए से ज्यादा की कमाई हुई। इसमें से अकेले माउंट एवरेस्ट से ही सरकार को 1.07 अरब रुपए से अधिक मिले हैं।

कुछ आयोजकों का दावा: भीड़ को संभाला जा सकता है

एक तरफ विशेषज्ञ इस भीड़ को गलत बता रहे हैं। दूसरी तरफ, कुछ ट्रिप प्लानर्स का मानना है कि इस भीड़ को संभाला जा सकता है। ऑस्ट्रिया की एक मशहूर कंपनी का कहना है कि अगर टीमों के पास पूरी ऑक्सीजन हो और सही प्लानिंग हो, तो खतरा कम किया जा सकता है।

उनका कहना है कि यूरोप के आल्प्स पहाड़ों पर एक दिन में 4,000 लोग चढ़ते हैं। एवरेस्ट तो उससे 10 गुना बड़ा है, इसलिए यहाँ 274 लोगों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है। लेकिन, वे एक बड़ी बात भूल जाते हैं। आल्प्स और एवरेस्ट के ‘डेथ जोन’ के मौसम में जमीन-आसमान का अंतर होता है। एवरेस्ट का मौसम बहुत ज्यादा खतरनाक होता है।

रिकॉर्ड्स का भी बना नया इतिहास

इस मुश्किल समय में जहाँ कुछ दुखद मौतें हुईं, वहीं कुछ ऐतिहासिक रिकॉर्ड भी बने। नेपाल के मशहूर गाइड कामी रीता शेरपा ने 32वीं बार एवरेस्ट पर चढ़कर अपना ही पुराना वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ दिया। वहीं, 52 साल की ल्हाकपा शेरपा ने 11वीं बार चोटी पर कदम रखा। वे दुनिया में सबसे ज्यादा बार एवरेस्ट चढ़ने वाली महिला बन गई हैं।

इसके अलावा, रूस के 34 साल के रुस्तम नबीव ने सबको हैरान कर दिया। उनके दोनों पैर नहीं हैं। उन्होंने बिना नकली पैरों के, सिर्फ अपने हाथों के दम पर एवरेस्ट फतह किया। लेकिन इन बड़ी सफलताओं के बाद भी सुरक्षा के इंतजामों पर सवाल उठ रहे हैं।

डार्क वेब से शुरू हुआ ऑपरेशन, मोहसिन मुलानी से जुबैर पोपटिया तक पहुँचा: पढ़ें- गुजरात पुलिस ने कैसे पकड़ा हमास कनेक्शन वाला ₹226 करोड़ का क्रिप्टो-टेरर नेटवर्क?

गुजरात पुलिस के साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CCOE) और CID क्राइम की टीमों ने मिलकर 226 करोड़ रुपए के एक बड़े अंतरराष्ट्रीय क्रिप्टोकरेंसी और आतंकी फंडिंग रैकेट का खुलासा किया है।

जाँच में सामने आया कि यह गिरोह सिर्फ वित्तीय अपराध ही नहीं बल्कि ड्रग्स सप्लाई, मानव तस्करी, सोने की तस्करी और दुनिया भर के आतंकी संगठनों तक पैसा पहुँचाने का काम भी कर रहा था।

इस बड़े काले कारोबार का खुलासा डार्क वेब की निगरानी के दौरान हुआ। साइबर सेंटर की तकनीकी टीम लगातार डार्क वेब पर नजर रख रही थी। ब्लॉकचेन जाँच के दौरान एक भारतीय IP एड्रेस सामने आया, जो artemislabs.cc नाम की वेबसाइट से सीधे डिजिटल पैसे ले रहा था। यह वेबसाइट डार्क वेब की बड़ी अवैध ड्रग्स मार्केट मानी जाती है।

डिजिटल ट्रांजैक्शन और खातों की जाँच करते हुए पुलिस अहमदाबाद के दानिलिम्दा इलाके तक पहुँची। जाँच में पता चला कि यह संदिग्ध क्रिप्टो वॉलेट अहमदाबाद निवासी मोहसिन सादिक मुलानी का था। उसके डिजिटल रिकॉर्ड और लेनदेन की गहराई से जाँच की गई तो देश के अलग-अलग हिस्सों से जुड़े 9 और संदिग्ध वॉलेट सामने आए।

DGP डॉ के लक्ष्मी नारायण राव और DIG बिपिन अहीर के मार्गदर्शन में यह बड़ा ऑपरेशन चलाया गया। इसके बाद साइबर सेंटर के SP डॉ राजदीपसिंह झाला, संजय केशवाला और विवेक भेड़ा की अगुवाई में 10 फील्ड टीमें और 3 तकनीकी खुफिया यूनिट्स बनाई गईं। करीब साढ़े चार महीने तक चले अभियान के बाद पुलिस ने पूरे गिरोह को पकड़ लिया।

जाँच से हमास से संबंध का खुलासा हुआ

इस मामले में सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ जब जब्त किए गए क्रिप्टो अकाउंट्स का संबंध गाजा के आतंकी संगठन हमास के अल-काहिरा नेटवर्क से जुड़ा मिला। साल 2025 में इजरायल सरकार ने अदालत के आदेश पर उन क्रिप्टो खातों को ब्लैकलिस्ट किया था, जिनसे तुर्की के रास्ते हमास को पैसा भेजा जा रहा था।

जाँच में पता चला कि वही प्रतिबंधित खाते इस मामले के मुख्य आरोपित मोहम्मद जुबैर पोपटिया तक पैसा पहुँचा रहे थे। जाँच आगे बढ़ने पर जुबैर पोपटिया के वॉलेट से अमेरिकी न्याय विभाग और OFAC द्वारा प्रतिबंधित आतंकी नेटवर्कों के साथ सीधे लेनदेन मिलने लगे।

इस नेटवर्क का संबंध यमन के हाउथी आतंकियों, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC-QF) और रूस के प्रतिबंधित क्रिप्टो एक्सचेंज गारेंटेक्स से भी मिला। जुबैर इन आतंकी फंड्स को भारतीय वॉलेट्स में ट्रांसफर करता था, फिर कई हिस्सों में बाँटकर हवाला नेटवर्क के जरिए नकदी में बदल देता था।

जाँच एजेंसियों से बचने के लिए गिरोह ने सामान्य क्रिप्टोकरेंसी की जगह मोनरो जैसी बेहद गुप्त डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल किया। मोनरो में भेजने वाले, पैसा लेने वाले और रकम की जानकारी छिपी रहती है। पुलिस ने ऐसे दो खास मोनरो वॉलेट जब्त किए हैं, जिनमें 193 करोड़ रुपए से ज्यादा के संदिग्ध लेनदेन मिले हैं।

कुल रकम का 40 प्रतिशत हिस्सा अवैध क्रिप्टो से आया

वरिष्ठ साइबर अधिकारियों के मुताबिक 226 करोड़ रुपए के इस पूरे नेटवर्क में करीब 30 से 40 प्रतिशत पैसा ड्रग्स, तस्करी और आतंकी गतिविधियों से आया था। बाकी रकम पीयर-टू-पीयर ट्रेडिंग, फ्यूचर्स ट्रेडिंग और हवाला नेटवर्क के जरिए सिस्टम में घुमाई गई थी।

यह गिरोह ऑनलाइन और डिजिटल फ्रॉड के जरिए आम लोगों से भी पैसे ठगता था। जिन बैंक खातों का इस्तेमाल क्रिप्टो को नकदी में बदलने के लिए किया गया, वे राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCCRP) में दर्ज 935 साइबर फ्रॉड FIR से जुड़े मिले। यानी भारतीयों से ठगा गया पैसा भी इस नेटवर्क के जरिए ड्रग्स और आतंकवाद तक पहुँचाया गया।

यह पूरा नेटवर्क कब शुरू हुआ?

इस आपराधिक नेटवर्क की शुरुआत कोविड-19 के बाद हुई थी। भारत में साथ रहने के दौरान मोहम्मद जुबैर पोपटिया, सलमान अंसारी और मोहसिन मुलानी ने मिलकर ब्रिटेन के ड्रग मार्केट में क्रिप्टोकरेंसी और USDT स्टेबलकॉइन के जरिए बड़ा अवैध कारोबार शुरू करने की योजना बनाई।

धीरे-धीरे इस गिरोह ने अहमदाबाद, मुंबई, दुबई और लंदन तक अपना नेटवर्क फैला लिया। गिरोह का काम करने का तरीका बेहद प्रोफेशनल था। अहमदाबाद में बैठा मोहसिन मुलानी एन्क्रिप्टेड टेलीग्राम चैनलों और डार्क वेब फोरम के जरिए ब्रिटिश ग्राहकों से ड्रग्स के ऑर्डर लेता था।

इसके बाद जानकारी दुबई में बैठे सरगना जुबैर पोपटिया और ब्रिटेन में लॉजिस्टिक्स संभाल रहे सलमान अंसारी को भेजी जाती थी। फिर ड्रग्स को ब्रिटेन के कूरियर नेटवर्क और रॉयल पार्सल सर्विसेज के जरिए ग्राहकों तक पहुँचाया जाता था और भुगतान क्रिप्टो वॉलेट में लिया जाता था।

सलमान अंसारी को ब्रिटिश अदालत ने सजा सुनाई थी

जाँच में यह भी सामने आया कि अक्टूबर 2024 में ब्रिटेन की अदालत ने सलमान अंसारी को ड्रग्स तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में 6 साल की सजा सुनाई थी। लेकिन खुफिया रिपोर्ट और डिजिटल सबूत बताते हैं कि सलमान मार्च 2026 तक ब्रिटेन की हाई सिक्योरिटी जेल के अंदर से ही टेलीग्राम और दूसरे डिजिटल माध्यमों से पूरे नेटवर्क को चला रहा था।

ब्रिटेन के ड्रग कारोबार से कमाया गया पैसा अंतरराष्ट्रीय हवाला और गुजरात के अंगड़िया नेटवर्क के जरिए अहमदाबाद भेजा जाता था। मोहसिन मुलानी यह रकम लेकर सलमान के जेल में बंद पिता गुलाम सादिक अंसारी तक पहुँचाता था। गुलाम सादिक इस सिंडिकेट का कैश एंकर था और वह इस पैसे को प्रॉपर्टी और दूसरे वैध कारोबारों में लगाता था।

साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की जाँच में यह भी पता चला कि डिजिटल युग और क्रिप्टोकरेंसी आने से पहले यानी 2016 से 2021 के बीच आरोपित वेस्टर्न यूनियन जैसी मनी ट्रांसफर सर्विस (MTSS) के जरिए विदेशों से पैसा मँगाते थे। इस दौरान करीब 9 देशों से 80 लाख रुपए से ज्यादा के लेनदेन की जाँच भी पुलिस कर रही है।

अब तक कुल 9 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया

गुजरात पुलिस ने इस ऑपरेशन में अब तक 9 मुख्य आरोपितों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार लोगों में अहमदाबाद के मोहम्मद सादिक मुलानी, ऐजाज असलम खान पठान, मोहम्मद जैद सिद्दीकी, नावेद अयूब खान पठान, फैज अहमद चिश्ती, सलमान हबीब खान पठान और गुलाम सादिक अंसारी शामिल हैं।

इसके अलावा मुंबई के जीशान सिराज मोतीवाला और हरियाणा के करनाल निवासी लवप्रीत सिंह को भी पकड़ा गया है। सभी आरोपितों पर IPC की धारा 111, 153 और 61 के साथ IT Act 2008 की गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया गया है।

इन पर देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरे में डालने और आतंकी साजिश में शामिल होने के आरोप लगाए गए हैं। मामले का मुख्य आरोपित मोहम्मद जुबैर पोपटिया फिलहाल दुबई में बताया जा रहा है और उसे भारत लाने के लिए प्रत्यर्पण प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

पुलिस और केंद्रीय एजेंसियाँ इस नेटवर्क से जुड़ी करोड़ों रुपए की बेनामी संपत्तियों और बैंक खातों को जब्त करने की कार्रवाई कर रही हैं। आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियाँ होने की संभावना है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)