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न कोई बड़ा नाम, न कोई पहचान … फिर भी लोकसभा की 5वीं सबसे बड़ी पार्टी बन गई NCPI, उस दल के बारे में जानिए सब कुछ जिसमें मिले हैं TMC के 20 सांसद

बंगाल की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। यहाँ तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी के लगभग 20 सांसदों के एक बागी गुट ने नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय की घोषणा कर दी है। यह संख्या लोकसभा में टीएमसी के कुल सांसदों के दो-तिहाई से अधिक बताई जा रही है, जिसके कारण यह गुट दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता से बचने की कानूनी सुरक्षा प्राप्त कर सकता है।

बागी नेताओं में सुदीप बंद्योपाध्याय, काकोली घोष दस्तिदार, सताब्दी रॉय, सायोनी घोष और अरूप चक्रवर्ती जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र सौंपकर स्वयं को एनसीपीआई का सदस्य मान्यता देने और संसद में अलग बैठने की व्यवस्था की माँग की है। साथ ही, इस गुट ने NDA का समर्थन करने का भी ऐलान किया है।

अचानक कैसे अस्तित्व में आई NCPI?

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जिस NCPI में विलय किया गया है, वह देश की एक बेहद छोटी और लगभग अज्ञात राजनीतिक पार्टी है। नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है, जिसे चुनाव आयोग ने 2022-23 में पंजीकृत किया था। 14 जून से पहले इस पार्टी की सार्वजनिक या मीडिया उपस्थिति लगभग न के बराबर थी। न इसकी कोई पहचान थी और न ही चुनाव चिह्न का किसी को पता था। फेसबुक पर भी इस पार्टी का आखिरी पोस्ट 2023 में ही हुआ था।

कई रिपोर्टों में इसे त्रिपुरा आधारित पार्टी बताया जा रहा है। हालाँकि निर्वाचन आयोग के दस्तावेजों के अनुसार, इसका मुख्यालय जागो बिस्वा, होल्डिंग नंबर 4719, ग्राम हाटगाछा, डाकघर बनिपुर, थाना सांकरैल, जिला हावड़ा, पश्चिम बंगाल – 711304 में स्थित है। इसलिए, कई रिपोर्टों में किए जा रहे दावों के विपरीत, यह पार्टी वास्तव में पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में आधारित है।

लोकसभा में भी बनी बड़ी पार्टी

इस पार्टी की राजनीतिक मौजूदगी अब तक बहुत छोटी रही है। 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इसके सिर्फ दो उम्मीदवार मैदान में उतरे थे। दोनों को बहुत कम वोट मिले। पूरी पार्टी को कुल मिलाकर सिर्फ 822 वोट मिले थे। यही वजह है कि इस पार्टी का नाम कभी राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा में नहीं आया। लेकिन अब लोकसभा में 19-20 सांसदों के साथ एनसीपीआई अचानक पाँचवीं सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। इससे वह एनडीए के भीतर भी एक महत्वपूर्ण सहयोगी बनकर उभरी है और सांसदों की संख्या के आधार पर तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) से आगे निकल गई है।

ये भी माना जा रहा है कि टीएमसी के बागी सांसदों ने सोच-समझकर यह रास्ता चुना है। भारत के दल-बदल कानून के अनुसार यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई या उससे अधिक सांसद या विधायक किसी दूसरी पार्टी में एक साथ विलय करते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए इन नेताओं ने नई पार्टी बनाने या अलग-अलग किसी दूसरी पार्टी में जाने के बजाय एक मौजूदा पार्टी में सामूहिक रूप से शामिल होने का फैसला किया।

इसके अलावा एनसीपीआई को चुनने का एक और कारण यह माना जा रहा है कि यह पार्टी बहुत छोटी और लगभग निष्क्रिय थी। ऐसे में टीएमसी से आए नेता इस पार्टी पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित कर सकते हैं और इसे अपनी राजनीतिक जरूरतों के अनुसार आगे बढ़ा सकते हैं। अगर वे सीधे भाजपा या किसी बड़े एनडीए दल में शामिल होते, तो उन्हें वहाँ के पुराने नेताओं और संगठन के अधीन काम करना पड़ता। इस विलय के बाद लोकसभा में एनसीपीआई की ताकत अचानक बढ़ गई है। करीब 20 सांसदों के साथ यह लोकसभा की पाँचवीं सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। साथ ही एनडीए के भीतर भी इसका महत्व काफी बढ़ गया है।

TMC नेताओं में अब भी असंतोष

गौरतलब है टीएमसी नेताओं में असंतोष की खबरें केवल संसद तक सीमित नहीं हैं। बताया जा रहा है कि 60 से अधिक विधायक पार्टी नेतृत्व के कुछ फैसलों से नाराज हैं। अगर भविष्य में इनमें से बड़ी संख्या में विधायक भी एनसीपीआई में शामिल हो जाते हैं, तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव आ सकता है। इससे टीएमसी की ताकत काफी घट सकती है, जबकि एनडीए को एक नया और मजबूत सहयोगी मिल सकता है।

नोट: यह रिपोर्ट अंग्रेजी में राजू दास द्वारा लिखे गए लेख पर आधारित है। आप मूल रिपोर्ट को इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं

स्टैंडअप शो में बढ़ती अभद्र भाषा पर बहस तेज, प्रणित मोरे और मधुर विर्ली के वीडियो वायरल: क्या खुद दर्शक ही दे रहे ऐसे कंटेंट को बढ़ावा?

हम एक अजीब समय में जी रहे हैं जहाँ कॉमेडी और विवाद का रिश्ता हिंसक हो गया है। इन दिनों स्टैंड-अप कॉमेडी सर्किट में ऐसी घटनाएँ आम हो गई हैं जहाँ ‘मजाक’ के नाम पर सीमाएँ तोड़ी जाती हैं, अपमान किया जाता है और फिर हल्के-फुल्के अंदाज में माफी माँग ली जाती है।

प्रणित मोरे का 370 रुपए की बिरयानी वाला विवाद इसी का ताजा उदाहरण है। प्रणीत मोरे के शो में गुरुग्राम के युवक हिमांशु जांगरा ने महिलाओं पर अश्लील टिप्पणी की थी। जब इस पर आलोचना हुई, तो मोरे ने माफी माँगी और कहा कि इंस्टाग्राम सस्पेंड होने से वह बात नहीं कर सके।

पूरी घटना ये थी कि प्रणीत मोरे के शो में गुरुग्राम के युवक हिमांशु जांगरा ने महिलाओं पर अश्लील टिप्पणी की थी। शो में सामने आई क्लिप में हिमांशु जांगरा ने अपनी से बड़ी महिला के साथ डेटिंग का एक किस्सा सुनाया।

हिमांशु ने कहा कि वह उसे डेट पर ले गया और ₹370 की बिरयानी खिलाई और जब वह लड़की जाने लगी तो हिमांशु ने सोचा कि बिरयानी के ₹370 तो वसूले ही नहीं। वसूलने से हिमांशु का मतलब यहाँ लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाना था।

इसके बाद प्रणीत मोरे के शो से जुड़ा एक और विवाद सामने आया। शो में एक सेजल पवार नाम की डॉक्टर को मृत पुरुषों के गुप्तांग का मजाक बना रही थी। शो में सेजल पवार कहती है कि वह मुंबई के KEM अस्पताल में काम करती है, यहाँ अस्पताल में वे और उनकी साथी मृत पुरुषों के शवों का गुप्तांग का साइज की तुलना कर मजाक उड़ाती हैं।

ऐसे ही मधुर विरली के एक पुराने स्टैंड-अप क्लिप में रेप और मर्डर को लेकर जोक दिखा, जहाँ वह बताते हैं कि कैसे एक आदमी रेप के बाद किसी को चाकू मार देता है क्योंकि महिला क्डल (Cuddle) करना चाहती है। इसके बाद सोशल मीडिया पर सेलिब्रिटीज ने इस जोक को अपमानजनक बताया और विरली ने अपना इंस्टाग्राम अकाउंट डिएक्टिवेट कर दिया।

अगर आप को याद हो तो इस से भी बड़ा और गंभीर विवाद रहा रणवीर अल्लाहबादिया का समय रैना के शो ‘इंडिया गॉट लेटेंट’ पर की गई अपमानजनक टिप्पणी। महिला कंटेस्टेंट से उन्होंने एक ऐसा सवाल किया जो अभद्र, अपमानजनक और संवेदनशील था। इसके बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में हस्तक्षेप किया, कई FIR दर्ज हुईं और सेलिब्रिटीज ने उनका साथ छोड़ दिया।

वह चक्र जो दोहराया जा रहा है

यह दिलचस्प है कि हर बार एक ही पैटर्न दिखता है, विवादास्पद कंटेंट, वायरल क्लिप, सोशल मीडिया आउटरेज, आधिकारिक माफी और फिर क्या होता है? टिकट की कीमत बढ़ जाती है। शो की डिमांड बढ़ जाती है। कॉमेडियन फेमस हो जाता है।

समाज को यह भुलाने में कितना समय लगता है? कुछ महीने। और फिर क्या होता है? इन्हीं विवादों को लेकर अलग-अलग डेडिकेटेड शो बना दिए जाते हैं। यूट्यूब पर क्लिप दिखाई जाते हैं, विचार-विमर्श वाले शो बनते हैं। विचार आता है – यह कितना गलत था, देखो, क्या बोल गया। और इसी बहाने से दर्शक फिर से लौट आता है।

समाज का सहयोग: हम ही विलेन

यहीं आता है सबसे महत्वपूर्ण सवाल – क्या हम इन कॉमेडियन्स को इसी तरह फेमस बनाने के लिए जिम्मेदार नहीं हैं? जब हम इनके शो में जाते हैं, टिकट खरीदते हैं, उनके यूट्यूब वीडियो देखते हैं, सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं, तो क्या हम उन्हें वैलिडेशन नहीं दे रहे हैं? एक विवाद होता है, कुछ दिनों के लिए भीड़ भड़क जाती है, आलोचना होती है। लेकिन क्या उस चर्चा में कॉमेडियन के शो की और भी ज्यादा चर्चा नहीं हो जाती?

यह ‘सच्चाई’ और ‘सोशल कमेंट्री’ के नाम पर किया जाता है। लेकिन अगर सोशल कमेंट्री है, तो क्या महिलाओं का अपमान करना या बलात्कार जैसे गंभीर विषय पर जोक बनाना उपयुक्त है?

दिलचस्प बात यह है कि यह समस्या केवल पुरुष कॉमेडियन्स तक सीमित नहीं है। महिला स्टैंड-अप कॉमेडियन्स भी बॉडी शेमिंग, सेक्सुअल कंटेंट और आक्रामक जोक्स के लिए जानी जाती हैं। कुछ इंफ्लूएंसर्स और एक्ट्रेसेस भी इसी ट्रेंड में शामिल हैं। यह साबित करता है कि समस्या ‘कॉमेडी’ की सीमा निर्धारण की है, चाहे वह किसी भी लिंग का व्यक्ति कर रहा हो।

असली सवाल

क्या यह सब केवल विचारों को चुनौती देने वाली कॉमेडी है? या फिर यह सिर्फ व्यूज पाने का खेल है जहाँ ‘कंट्रोवर्सी ही प्रमोशन’ है? अगर यही कॉमेडी है, तो क्या महिलाओं को हीन साबित करने वाले जोक्स या ट्रॉमा को हल्के में लेने वाली बातें ‘बोल्ड’ कहलाती हैं?

यह समझ में नहीं आता कि क्यों किसी के दर्द को मजाक बनाना ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ माना जाता है। और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब कोई इसका विरोध करता है, तो उसे ‘सेंसर शिप’, ‘प्रतिबंध’ आदि कहा जाता है।

अगर एक आम इंसान की नजर से देखें, तो आज हम ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ विवाद भी कमाई और लोकप्रियता का जरिया बन गया है। कई बार लोगों को पता होता है कि उनकी बातों पर विवाद होगा, आलोचना होगी, फिर भी वही किया जाता है क्योंकि उससे चर्चा मिलती है।

जब कोई कॉमेडियन बार-बार सीमाएँ पार करता है, लोगों की भावनाएँ आहत करता है, फिर माफी माँगकर वापस आ जाता है, तो अक्सर लोग उसे समर्थन देते हैं। क्योंकि हमें वह ‘बहादुरी’ या ‘सच बोलना’ लगने लगता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सच बोलने का मतलब हमेशा किसी दूसरे को नीचा दिखाना, चोट पहुँचाना या उसके दर्द को मजाक बनाना होना चाहिए? क्या हँसी सिर्फ तब ही पैदा हो सकती है जब किसी के सम्मान, अधिकार या उसके व्यक्तिगत अनुभवों को दाँव पर लगाया जाए?

‘कॉन्ग्रेस ने भगवा आतंकवाद बोलने को कहा’: UPA सरकार में मंत्री रहे सुशील शिंदे ने खोल दी पार्टी की असलियत, पुराना वीडियो Viral होते ही भड़के आम लोग

केंद्र में कॉन्ग्रेस की सरकार में 2012 से 2014 तक गृह मंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे का एक वीडियो वायरल हो रहा है। वीडियो में शिंदे ‘भगवा आतंकवाद’ को लेकर बड़ा बयान दे रहे हैं। उन्होंने माना कि यह शब्द इस्तेमाल नहीं होना चाहिए था और इसके पीछे पार्टी का हाथ बताया। अब सच्चाई सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग कॉन्ग्रेस को खूब लताड़ लगा रहे हैं।

वीडियो में सुशील कुमार शिंदे से जब पूछा गया कि ‘भगवा आतंकवाद‘ टर्म सही था या नहीं तब वह कहते हैं, “पार्टी (कॉन्ग्रेस) ने बताया था कि भगवा आतंकवाद बोलना है, मैंने वही किया। गलत तो था। मैं यह शब्द इस्तेमाल नहीं करना चाहता था। ऐसा नहीं होना चाहिए था। ये उस पार्टी की विचारधारा होती है। ये चाहे भगवा हो या रेड हो या सफेद हो। ऐसा कोई आतंकवाद नहीं होता है।”

हालाँकि, सुशील शिंदे का यह बयान डेढ़ साल पुराना है। जब यूट्यूबर और पत्रकार शुभांकर मिश्रा ने सुशील कुमार शिंदे के साथ पॉडकास्ट किया था। तब भी ऑपइंडिया ने उस समय भी इस मामले को उठाया था। अब इस वीडियो के एक अंश वायरल हो रहा है, जिसमें शिंदे ‘भगवा आतंकवाद’ जैसे भद्दे प्रोपेगेंडा को गलत बताकर अपना कबूलनामा सौंप रहे हैं।

सोशल मीडिया पर लोगों ने कॉन्ग्रेस पर साधा निशाना

अब डेढ़ साल बाद सोशल मीडिया पर शिंदे के इस बयान का वीडियो वायरल होने के बाद बवाल मच गया है। लोग इसे कॉन्ग्रेस की ‘झूठों’ से पर्दा उठाने और कॉन्ग्रेस की हिंदू-घृणा जैसी बातें कह रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इसे पूर्व गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे का कबूलनामा बताया है। बीजेपी ने सवाल उठाया कि क्या यह सनातन संस्कृति को बदनाम करने की कांग्रेस की एक सोची-समझी साजिश थी?

बीजेपी नेता डॉ. निखिल आनंद कहते हैं कि सुशील कुमार शिंदे का बयान कॉन्ग्रेस की वैचारिक सोच को उजागर करता है। उनके मुताबिक कॉन्ग्रेस और उससे जुड़ी विचारधारा ने हमेशा भारतीय संस्कृति, परंपराओं और सनातन आस्था को निशाना बनाया है तथा राजनीतिक हितों के लिए कट्टरपंथी ताकतों के साथ समझौता किया है। उन्होंने लोगों से ऐसे तत्वों के प्रति सतर्क रहने और लोकतांत्रिक तरीके से उनका जवाब देने की बात कही।

कपिल बिश्नोई कहते हैं, “कॉन्ग्रेस पार्टी की हिंदुओं और भगवा रंग से नफरत किसी से ढकी छिपी नहीं है। रह रह कर ये नफरत किसी न किसी रूप में बाहर आ ही जाती है।”

एक्स हैंडल ‘जनार्दन मिश्रा’ ने कॉन्ग्रेस को घेरते हुए कहा, “अब तो पूर्व कॉन्ग्रेसी भी सच बोलने लगे लेकिन चमचे फिर भी नहीं मानेगे…!!”

‘भगवा आतंकवाद’ पर शिंदे ने क्या कहा था?

बता दें कि भारत के गृहमंत्री रहते हुए सुशील कुमार शिंदे ने साल जनवरी 2013 में कहा था कि भाजपा और आरएसएस के कैंपों में ‘हिंदू आंतकवादियों’ को प्रशिक्षण दिया जाता है। इस बयान को लेकर उनकी खूब आलोचना हुई थी। हालाँकि, इन आलोचनाओं के बाद भी वे अपने बयान पर कायम थे।

तब गृहमंत्री शिंदे ने कहा था, “ये सब इतनी बार अख़बार में आ गया है। ये कोई नई चीज़ नहीं है जो मैंने आज कही है। ये भगवा आतंकवाद की ही बात मैंने की है, कोई दूसरी बात नहीं कही है।” दरअसल, 20 जनवरी 2013 को जयपुर में आयोजित कॉन्ग्रेस के चिंतन शिविर के दौरान शिंदे ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर आरोप लगाया था।

अपने बयान के पीछे शिंदे ने एक कथित रिपोर्ट का हवाला दिया था। उन्होंने कहा था, “हमारे पास रिपोर्ट आ गई है। जाँच में भाजपा हो या आरएसएस के ट्रेनिंग कैंप, हिंदू आतंकवाद बढ़ाने का काम देख रहे हैं।समझौता एक्सप्रेस रेलगाड़ी का धमाका हो, मक्का मस्जिद ब्लास्ट हो या फिर मालेगाँव, हिंदू चरमपंथियों ने वहाँ जाकर बम धमाके करवाए और फिर कह दिया कि ये धमाके अल्पसंख्यकों ने करवाए।”

सुशील कुमार शिंदे ने कहा था कि ऐसी कोशिशों से देश को सतर्क रहना चाहिए। शिंदे के इस बयान पर कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने उन्हें मुबारकवाद दी थी। इससे पहले गृहमंत्री रहते हुए कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने साल 2010 में सबसे पहले भगवा आतंकवाद शब्द का प्रयोग किया था।

भगवा आतंकवाद पर केंद्रीय गृहमंत्री के रूप में 25 अगस्त 2010 को डीजीपी और आईजी के वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए चिदंबरम ने कहा था, “मैं आपको सावधान करना चाहता हूँ कि भारत में युवा पुरुषों एवं महिलाओं को कट्टरपंथी बनाने के प्रयासों में कोई कमी नहीं आयी है। इसके अलावा हाल में ‘भगवा आतंकवाद’ सामने आया है, जो अतीत में कई बम विस्फोटों में पाया गया है..।”

कष्टभंजनदेव हनुमानजी के स्वरूप, ‘किंग ऑफ सालंगपुर’ और कॉपीराइट विवाद: जानें क्या है पूरा मामला, क्यों हो रहा है विरोध?

गुजरात के बोटाद जिले में स्थित प्रसिद्ध सालंगपुर धाम एक बार फिर धार्मिक और सामाजिक चर्चाओं का केंद्र बन गया है। कष्टभंजनदेव हनुमानजी महाराज मंदिर से जुड़े एक फैसले ने न केवल स्थानीय क्षेत्र बल्कि गुजरात के कई संतों, धार्मिक संगठनों और भक्तों के बीच भी बहस छेड़ दी है।

विवाद की शुरुआत तब हुई जब यह जानकारी सामने आई कि ‘किंग ऑफ सालंगपुर’ के नाम से प्रसिद्ध विशाल हनुमान प्रतिमा, कष्टभंजनदेव हनुमानजी के अलग-अलग दिव्य स्वरूपों, विशेष वाघा-श्रृंगार और अन्य रचनात्मक प्रस्तुतियों के लिए कॉपीराइट और ट्रेडमार्क सुरक्षा ली गई है।

मंदिर ट्रस्ट का कहना है कि यह कदम आध्यात्मिक विरासत को सुरक्षित रखने और डिजिटल दौर में बढ़ती धोखाधड़ी तथा गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए उठाया गया है। वहीं दूसरी ओर कई संत, ब्राह्मण, महामंडलेश्वर और हिंदू संगठन इसे भगवान के स्वरूपों से जुड़ी आस्था और परंपरा का विषय बता रहे हैं और इसका विरोध कर रहे हैं।

इसी कारण पिछले कुछ दिनों से सालंगपुर धाम कॉपीराइट, ट्रेडमार्क और धार्मिक अधिकारों को लेकर चर्चा में बना हुआ है। आखिर सालंगपुर धाम ने ऐसा क्या किया जिससे यह विवाद शुरू हुआ? मंदिर ट्रस्ट का पक्ष क्या है? विरोध करने वाले संतों और संगठनों की आपत्तियां क्या हैं? और इस पूरे मामले की सच्चाई क्या है? — पढ़िए पूरी रिपोर्ट।

सालंगपुर धाम ने कौन सी ऐसी घोषणा की जिससे खड़ा हुआ विवाद?

विवाद की शुरुआत 12 जून 2026 को हुई। इस दिन सालंगपुर धाम की ओर से घोषणा की गई कि श्री कष्टभंजनदेव हनुमानजी महाराज के विभिन्न दिव्य स्वरूपों, ‘किंग ऑफ सालंगपुर’ के नाम से प्रसिद्ध विशाल प्रतिमा, विशेष वाघा-श्रृंगार और कुछ अन्य रचनात्मक प्रस्तुतियों के लिए कॉपीराइट और ट्रेडमार्क से जुड़े प्रमाणपत्र प्राप्त किए गए हैं।

इसके बाद इन प्रमाणपत्रों को हनुमानजी महाराज के पवित्र चरणों में समर्पित किया गया। मंदिर के कोठारी विवेकसागर स्वामी ने कहा कि भारत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को आधुनिक बौद्धिक संपदा कानूनों के माध्यम से सुरक्षित रखना समय की आवश्यकता बन गया है।

मंदिर प्रशासन के अनुसार, यह केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि भविष्य में मंदिर की अलग पहचान और उससे जुड़ी आध्यात्मिक संपत्ति के संरक्षण की दिशा में उठाया गया कदम है। घोषणा सामने आते ही सोशल मीडिया पर इस विषय को लेकर अलग-अलग तरह की चर्चाएँ शुरू हो गईं।

कई लोगों ने इसे मंदिर की विशेष पहचान को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी फैसला बताया, जबकि दूसरी ओर कुछ लोगों के बीच यह सवाल उठने लगा कि क्या अब भगवान के स्वरूपों पर भी कॉपीराइट या ट्रेडमार्क लिया जा सकता है? इसी सवाल ने पूरे विवाद को जन्म दिया।

मंदिर ट्रस्ट को यह कदम उठाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?

सालंगपुर धाम के प्रशासन का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में मंदिर के नाम पर बड़ी संख्या में ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामले सामने आए थे। ट्रस्ट के अनुसार, कई फर्जी वेबसाइट, सोशल मीडिया पेज और अन्य डिजिटल माध्यमों के जरिए सालंगपुर के नाम पर नकली रूम बुकिंग, ऑनलाइन प्रसाद, दान और विभिन्न सेवाओं के नाम पर श्रद्धालुओं के साथ ठगी की जा रही थी।

मंदिर का कहना है कि ऐसे मामलों में केवल सामान्य शिकायतें काफी साबित नहीं हो रही थीं। कई बार धोखाधड़ी करने वाले लोग मंदिर की तस्वीरों, प्रतिमाओं, श्रृंगार और पहचान का इस्तेमाल करके श्रद्धालुओं को गुमराह कर रहे थे। ऐसी स्थिति में कानूनी कार्रवाई को अधिक प्रभावी बनाने और साइबर अपराधियों के खिलाफ तेजी से कदम उठाने के लिए कॉपीराइट और बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपी राइट्स) का कानूनी संरक्षण लेना जरूरी हो गया था।

मंदिर ट्रस्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि फिलहाल सालंगपुर धाम की ओर से कोई ऑनलाइन रूम बुकिंग सेवा या घर बैठे प्रसाद भेजने की व्यवस्था नहीं चलाई जा रही है। श्रद्धालुओं को केवल आधिकारिक माध्यमों पर ही भरोसा करना चाहिए और किसी भी संदिग्ध व्यक्ति या वेबसाइट को पैसे देने से पहले पूरी सावधानी बरतनी चाहिए।

विरोध प्रदर्शन की शुरुआत कहाँ से हुई?

घोषणा के बाद सबसे पहले विरोध की आवाज अलग-अलग संतों और सनातन संगठनों की ओर से उठी। सनातन संत समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्योतिर्नाथ महाराज ने इस मुद्दे पर आपत्ति जताते हुए सवाल उठाया कि अगर आज हनुमानजी के स्वरूपों से कॉपीराइट और ट्रेडमार्क जोड़ा जा सकता है, तो कल किसी अन्य देवी-देवता को लेकर भी इसी तरह के दावे किए जा सकते हैं।

उनके अनुसार, सनातन परंपरा में भगवान को इस तरह कानूनी स्वामित्व से जोड़ना उचित नहीं माना जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि सनातन धर्म की परंपरा में भगवान सभी के हैं और उन्हें किसी कानूनी सीमा या अधिकार में बांधने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। ज्योतिर्नाथ महाराज ने इस मामले में जरूरत पड़ने पर कानूनी लड़ाई लड़ने की भी बात कही।

विरोध करने वालों में एक और प्रमुख नाम मेंदरडा के खाखीमढ़ी रामजी मंदिर के गादीपति सुखरामदास बापु का रहा। उन्होंने कहा कि भगवान कभी किसी के कॉपीराइट नहीं हो सकते। उनके अनुसार, भगवान पूरे समाज के हैं और उन्हें किसी एक संस्था या ट्रस्ट से विशेष रूप से जोड़ने की कोशिश दुखद है।

ब्राह्मण संगठन भी संघर्ष में हुए शामिल

विवाद केवल संतों तक सीमित नहीं रहा। वर्ल्ड ब्राह्मण ऑर्गेनाइजेशन और समस्त गुजरात ब्रह्म समाज सहित कई संगठनों ने भी इस मुद्दे पर विरोध दर्ज कराया। वर्ल्ड ब्राह्मण ऑर्गेनाइजेशन के चेयरमैन, जो कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता भी हैं, हेमांग रावल ने कहा कि भगवान पर हर भक्त का अधिकार है, किसी एक ट्रस्ट का नहीं।

उनके अनुसार, हनुमानजी, भगवान राम और गणपति जैसे देवी-देवता किसी एक संप्रदाय की कॉर्पोरेट संपत्ति नहीं बन सकते और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 और 25 नागरिकों को अपने धर्म और आस्था का पालन करने का अधिकार देते हैं। ऐसे में भगवान के नाम या स्वरूपों को कॉपीराइट और ट्रेडमार्क जैसी व्यवस्थाओं से जोड़ना कई सवाल खड़े करता है।

उन्होंने कहा कि इस मामले को लेकर चैरिटी कमिश्नर के सामने प्रस्तुति देने के साथ जरूरत पड़ने पर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक भी जाया जा सकता है। ब्रह्म समाज के नेताओं अश्विन त्रिवेदी और हेमांग रावल ने यह भी तर्क दिया कि ‘सालंगपुर’ एक गाँव का नाम है और ‘कष्टभंजनदेव’ हनुमानजी के पारंपरिक नामों में से एक है। ऐसे में इन शब्दों और प्रतीकों के साथ ट्रेडमार्क जोड़ने का मुद्दा भी चर्चा का विषय बना हुआ है।

महामंडलेश्वर और अन्य संतों ने क्या कहा?

विवाद बढ़ने के साथ अन्य संत और महामंडलेश्वर भी इस मामले में शामिल हो गए। महामंडलेश्वर अखिलेश्वरदासजी महाराज ने कहा कि भगवान किसी एक संप्रदाय, ट्रस्ट या संस्था के नहीं होते, बल्कि पूरे समाज के होते हैं। कई अन्य धार्मिक नेताओं ने भी इसी तरह की भावना व्यक्त की।

उन्होंने भी कहा कि सनातन परंपरा में भगवान को सभी का माना जाता है और आस्था के केंद्रों पर किसी प्रकार का एकाधिकार नहीं होना चाहिए। हलाँकि सभी संतों, धार्मिक नेताओं और विरोध करने वालों के शब्द अलग-अलग थे, लेकिन उनका मुख्य तर्क एक ही था कि भगवान पर किसी का विशेष अधिकार नहीं हो सकता।

ट्रस्ट ने क्या स्पष्टीकरण दिया?

विवाद बढ़ने के बाद सालंगपुर धाम के प्रशासन ने इस मामले पर विस्तार से अपनी सफाई भी दी। ट्रस्ट ने कहा कि पूरे विवाद में सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि लोग इसे ऐसे देख रहे हैं जैसे मंदिर भगवान पर मालिकाना हक का दावा कर रहा हो। ट्रस्ट के अनुसार, उनका ऐसा कोई उद्देश्य नहीं है और हनुमानजी महाराज पूरी सृष्टि के हैं और हमेशा सभी के रहेंगे।

ट्रस्ट का कहना है कि कॉपीराइट और ट्रेडमार्क का संबंध भगवान से नहीं, बल्कि मंदिर की अलग पहचान, विशेष प्रतिमाओं, रचनात्मक प्रस्तुतियों, वाघा-श्रृंगार और उनसे जुड़ी दृश्य अभिव्यक्तियों से है। इन कदमों का मुख्य उद्देश्य श्रद्धालुओं को धोखाधड़ी से बचाना और मंदिर की पहचान के गलत इस्तेमाल को रोकना है।

क्या है विवाद का केंद्र?

अगर इस पूरे विवाद को ध्यान से देखा जाए तो साफ समझ आता है कि यहाँ दो अलग-अलग दृष्टिकोण आमने-सामने हैं। एक तरफ मंदिर ट्रस्ट का मानना है कि आज के समय में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए कानूनी उपायों का इस्तेमाल जरूरी हो गया है।

वहीं दूसरी तरफ विरोध करने वालों का कहना है कि भगवान के स्वरूपों और धार्मिक प्रतीकों को कॉपीराइट और ट्रेडमार्क जैसी व्यवस्थाओं से जोड़ने पर आस्था और परंपरा से जुड़े सवाल खड़े होते हैं। फिलहाल इस विवाद का मुख्य मुद्दा यह नहीं है कि मंदिर ट्रस्ट भगवान पर मालिकाना हक का दावा कर रहा है या नहीं।

असली सवाल यह है कि कॉपीराइट और ट्रेडमार्क के दायरे में आने वाली बातों को लोग किस तरह समझते हैं और इसका उनकी धार्मिक भावनाओं पर क्या असर पड़ता है।

क्या है वर्तमान स्थिति?

फिलहाल इस विवाद को लेकर दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ अलग-अलग संत और संगठन विरोध दर्ज करा रहे हैं और कुछ मामलों में कानूनी लड़ाई तक जाने की चेतावनी भी दी जा रही है। वहीं दूसरी ओर सालंगपुर धाम का प्रशासन लगातार यह कह रहा है कि उनका उद्देश्य भगवान पर मालिकाना हक स्थापित करना नहीं है, बल्कि मंदिर की अलग पहचान और श्रद्धालुओं की सुरक्षा को बनाए रखना है।

आने वाले दिनों में यह बहस केवल धार्मिक मंचों तक सीमित रहती है या फिर कानूनी स्तर तक पहुँचती है, इस पर सभी की नजर रहेगी। लेकिन एक बात तय है कि सालंगपुर धाम के इस फैसले ने कॉपीराइट, ट्रेडमार्क, आस्था और धार्मिक विरासत के संरक्षण को लेकर एक बड़ी चर्चा शुरू कर दी है, जिसके आगे और बढ़ने की संभावना बनी हुई है।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


कहीं च्यूइंगम पर रोक तो कहीं बच्चों के नामों पर बंदिशें, कई शहरों में तो मरना भी गैरकानूनी: जानिए कुछ ऐसे देशों के बारे में जिनके अजब गजब हैं कानून

दुनिया भर में कानून उस समाज की जरूरतों के हिसाब से बनाए जाते हैं जहाँ वे लागू होते हैं। जहाँ कुछ कानून, जैसे चोरी या हत्या जैसे अपराधों से जुड़े कानून, आम तौर पर हर जगह एक जैसे होते हैं, वहीं कुछ कानून या स्थानीय नियम किसी खास समस्या से निपटने के लिए भी हो सकते हैं। ऐसे नियम या कानून स्थानीय लोगों को तो बिल्कुल सही लग सकते हैं, लेकिन बाहरी लोग, जिन्हें इन कानूनों के पीछे के सामाजिक, ऐतिहासिक या सांस्कृतिक संदर्भ की जानकारी नहीं होती, उन्हें ये अजीब लग सकते हैं।

दुनिया भर के सात ऐसे नियम- कानून काफी अजीबोगरीब माने जाते हैं और ये समझ से परे हैं। ये अलग अलग देशों में लागू हैं।

सिंगापुर में च्यूइंगम पर प्रतिबंध

च्यूइंग गम एक समय सिंगापुर में बड़ी समस्या बन गई थी। इस चिपचिपी चीज को शरारती तत्वों ने सबवे दरवाजों के सेंसर, लॉक सिलेंडर के अंदर, मेलबॉक्स, चाबी के छेदों, लिफ्ट के बटन और एलिवेटर के बटन जैसी जगहों पर चिपकाना शुरू कर दिया था। इससे रखरखाव और सफाई का खर्चा बढ़ गया। सिंगापुर में 1987 में मास रैपिड ट्रांजिट (MRT) लोकल रेलवे सिस्टम शुरू हुआ। ये उस वक्त का सबसे बड़ा सार्वजनिक प्रोजेक्ट था, लेकिन च्यूइंगम की समस्या MRT तक भी पहुँच गई। शरारती तत्वों ने MRT ट्रेनों के दरवाजों के सेंसर पर च्यूइंगम चिपकाना शुरू कर दिया, जिससे दरवाजे ठीक से काम नहीं कर पाते थे और ट्रेन सेवाओं में रुकावट आती थी।

उस समय सिंगापुर सरकार सिंगापुर को एक ग्लोबल ट्रेडिंग हब बनाने के लिए प्रतिबद्ध थी। सफाई और सार्वजनिक स्वच्छता पर खास ध्यान दे रही थी। सरकार ने 1992 में च्यूइंग गम के आयात, बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून पास किया। कानून के अनुसार, देश में च्यूइंग गम रखना गैर-कानूनी नहीं है, लेकिन च्यूइंगम बेचना, आयात करना या वितरित करना गैर-कानूनी है।

इसलिए, सिंगापुर जाने वाला कोई व्यक्ति अपने निजी इस्तेमाल के लिए थोड़ी मात्रा में च्यूइंगम देश में ला सकता है, लेकिन गलत जगह पर गम थूकना गैर-कानूनी है। सिंगापुर सरकार ने 2004 में कुछ खास वजहों जैसे दांतों की देखभाल और निकोटीन वाली च्यूइंगम के लिए कानून में छूट दी। इन्हें डॉक्टर या रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट से खरीदा जा सकता है।

दुनिया के कुछ देशों में मरना गैर-कानूनी है, मौत को रोकने के लिए नियम तक बना दिेए गए हैं

सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन दुनिया में ऐसी जगहें हैं, जहाँ मरना मना है। मौत आम तौर पर हर जगह एक डरावनी और अनचाही घटना मानी जाती है, लेकिन कुछ इलाकों में तो मौत को रोकने के लिए नियम तक बना दिए गए हैं। ऐसे दुनिया के छह देश हैं, जहाँ कुछ खास शहरों में मरने के खिलाफ नियम हैं।

नॉर्वे का लॉन्गईयरब्येन शहर: स्वालबार्ड द्वीप समूह में बहुत सर्द और पर्माफ्रॉस्ट (हमेशा जमी रहने वाली जमीन) वाली जगह लॉन्गईयरब्येन है। ठंड की वजह से यहाँ लाशें सड़ती नहीं हैं। बीमारियों या संक्रमण के फैलने के खतरे को रोकने के लिए, स्वालबार्ड के गवर्नर ने अजीब नियम बना दिए हैं। नियम के अनुसार, जो लोग मर चुके हैं या लाइलाज बीमारी से जूझ रहे हैं, उन्हें दफनाने या इलाज के लिए नॉर्वे के दूसरे शहरों में जाना पड़ेगा। हालाँकि, अगर किसी की मौत शहर में हो जाती है, तो उसका अंतिम संस्कार वहीं किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए लाइसेंस और बहुत सारे कागजी काम की जरूरत होती है जिसमें महीनों लग सकते हैं।

1998 में यह साबित हो गया कि लाशों से संक्रमण फैल सकता है। दरअसल वैज्ञानिकों ने 80 साल पहले बर्फ में दफनाए गए सात लोगों के शव निकाले। ये सातों लोग 1918 की बड़ी महामारी के दौरान स्पेनिश फ्लू से मरे थे। हैरानी की बात यह है कि वैज्ञानिक सातों शवों से वायरस के जीवित नमूने निकालने में कामयाब रहे। इससे यह पुष्टि हुई कि जानलेवा बीमारियाँ पर्माफ्रॉस्ट में दफनाई गई लाशों में जीवित रह सकती हैं।

स्पेन का लानजारोन शहर लानजारोन के मेयर जोस रुबियो ने 1999 में शहर में मरने पर रोक लगा दी थी। इस रोक की वजह यह थी कि स्थानीय कब्रिस्तान अपनी क्षमता की सीमा तक भर चुका था।

फ्रांस के तीन शहरों में रोक दक्षिणी फ्रांस के तीन शहरों – ले लावांडू, सारपुरेंक्स और कुग्नॉक्स, में भी ऐसी ही रोक लगाई गई थी। 2000 में ले लावांडू के मेयर ने स्थानीय कब्रिस्तान में दफनाने के लिए जगह की कमी के कारण मरने पर रोक लगा दी। सारपुरेंक्स और कुग्नॉक्स शहरों ने भी 2007 और 2008 में ऐसे ही वजहों को देखते हुए मौत पर रोक लगा दी।

इटली का सेलिया शहर इटली के मध्ययुगीन गाँव सेलिया के मेयर ने 2015 में एक आदेश पारित किया, जिसके तहत गाँव में बीमार पड़ना या मरना आधिकारिक तौर पर गैर-कानूनी हो गया। यह कदम गाँव की बूढ़ी होती आबादी को बचाने के लिए उठाया गया था। मेयर डेविड जिकिनेला ने एक आदेश पर हस्ताक्षर किए, जिसमें कहा गया था कि निवासियों को बीमार पड़ने की मनाही है, और उन्हें अपनी सेहत को प्राथमिकता देनी चाहिए। यह सख्त कदम तब उठाया गया जब गाँव की आबादी 1960 में 1300 से घटकर 2015 में 537 रह गई थी। इसके अलावा बची हुई आबादी में से 60% लोग 65 साल से ज्यादा उम्र के थे।

ब्राजील का बिरिटिबा मिरिम: ब्राजील के बिरिटिबा मिरिम शहर के मेयर ने 2005 में एक सार्वजनिक बिल पेश किया, जिसमें निवासियों के लिए शहर में मरना गैर-कानूनी बना दिया गया, क्योंकि स्थानीय कब्रिस्तान भर चुका था। बिल में किसी सजा का प्रावधान नहीं था, लेकिन मेयर का मकसद मरने वाले लोगों के रिश्तेदारों पर जुर्माना लगाना और जरूरत पड़ने पर जेल भेजना था, ताकि कब्र के पत्थरों के लिए और जगह मिल सके।

जापान का इट्सुकुशिमा शहर: जापान का इट्सुकुशिमा शहर को मियाजिमा के नाम से भी जाना जाता है। शहर को काफी पवित्र माना जाता है, क्योंकि यहाँ कई धार्मिक स्थल और मंदिर हैं। इस जगह की पवित्रता बनाए रखने के लिए 19वीं सदी के आखिर में यहाँ बच्चे के जन्म और मृत्यु पर रोक लगा दी गई थी। इस द्वीप पर कोई कब्रिस्तान या अस्पताल नहीं है।

ऑस्ट्रेलिया में वोट न देना अपराध है

लोकतांत्रिक देशों में वोट देना नागरिकों का अधिकार माना जाता है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने एक कदम आगे बढ़कर वोट न देने को दंडनीय अपराध बना दिया। दूसरे शब्दों में, ऑस्ट्रेलिया में वोट देना सिर्फ़ एक अधिकार नहीं बल्कि एक कानूनी जिम्मेदारी है, जिसका उल्लंघन करने पर A$20 ($13, £10) तक का जुर्माना लग सकता है और कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है। यह 1924 में कानून में संशोधन के जरिए किया गया था।

इस कानून के पास होने के बाद ऑस्ट्रेलिया सबसे ज्यादा वोटिंग प्रतिशत वाले देशों में से एक बन गया। भले ही यह सजा जैसा लगे, लेकिन इस कानून को लोगों का समर्थन मिला हुआ है। लोगों को वोट देने में आसानी हो, इसके लिए अधिकारियों ने कई उपाय अपनाए हैं। जैसे- देश में चुनाव शनिवार को होते हैं। इस दिन ज्यादातर लोगों की छुट्टियाँ होती है। इसके अलावा कंपनियों के लिए यह जरूरी है कि वे चुनाव के दिन कर्मचारियों को सवेतन छुट्टी दें ताकि लोगों के पास वोट देने के लिए पर्याप्त समय हो।

बच्चों के नामों को मंजूरी देती है सरकार

दुनिया भर के कई देशों में बच्चों के नाम रखने से जुड़े कुछ नियम और कानून हैं। जहाँ कुछ देशों में बच्चों के नामों के लिए सरकारी मंजूरी जरूरी माना जाता है, वहीं कुछ देश ऐसे हैं जहाँ सरकार चाहे तो बच्चों के नाम को अस्वीकार कर दे। कुछ देशों में खास नामों पर रोक है।

आइसलैंड: इस यूरोपीय देश में ‘नेशनल नेम एक्ट’ (1971, 2019 में संशोधित) के तहत लोगों का एक नेशनल रजिस्टर बना हुआ है। कानून के मुताबिक, बच्चों के नाम आइसलैंड की व्याकरण संबंधी परंपराओं के अनुसार होने चाहिए।

न्यूजीलैंड: इस देश में, ‘बर्थ्स, डेथ्स, मैरिजेज़ एंड रिलेशनशिप्स रजिस्ट्रेशन एक्ट 1995’ के तहत कुछ ऐसे नामों पर साफ तौर पर रोक है, जो अपमानजनक, शर्मनाक या बेवजह लंबे हों।

डेनमार्क: डेनमार्क में ‘पर्सनल नेम्स एक्ट’ (नेवनेलोवेन, 2003) के तहत नाम चुनने पर पाबंदियाँ लगी हुई हैं और करीब 7000 नामों को मंजूरी दी गई है, जिसमें से ही नाम रखा जा सकता है।

जर्मनी: जर्मनी का ‘सिविल स्टेटस एक्ट’ (पर्सनेंस्टैंड्सगेसेट्ज़) और ‘स्टैंडेसाम्ट’ (रजिस्ट्रार ऑफिस) के तहत नाम मंजूर करने के नियम कानूनी रूप से ज रूरी हैं। जर्मनी में बच्चों के नाम उस इलाके के ‘वाइटल स्टैटिस्टिक्स’ ऑफिस (स्टैंडेसाम्ट) से मंज़ूर होने चाहिए जहाँ बच्चे का जन्म हुआ हो। नाम से बच्चे के लिंग का पता चलना चाहिए, और नाम ऐसा नहीं होना चाहिए जो पारंपरिक रूप से सरनेम (उपनाम) के तौर पर इस्तेमाल होता हो।

फिनलैंड: ‘नेम्स एक्ट 1985’ के मुताबिक, फिनलैंड के सभी नागरिकों के फर्स्ट नाम ज्यादा से ज्यादा चार अक्षर वाले होने चाहिए। जिन लोगों का कोई ‘फर्स्ट नेम’ नहीं है, उन्हें फिनलैंड के नेशनल पॉपुलेशन डेटाबेस में नाम दर्ज कराते समय एक नाम रखना जरूरी है। इसके अलावा कानून के तहत नवजात बच्चों के माता-पिता के लिए जरूरी है कि वे अपने बच्चों का नाम रखें और जन्म के दो महीने के भीतर पॉपुलेशन रजिस्ट्री को इसकी जानकारी दें।

इस मामले में भारत माता-पिता को अपने बच्चों का नाम अपनी पसंद के अनुसार रखने की पूरी आजादी देता है। बच्चों के नाम पर पाबंदी लगाने वाला कानून भारतीयों के लिए तो कल्पना से परे है।

कबूतरों को दाना खिलाने पर रोक

किसी भी इलाके में कबूतरों की बढ़ती आबादी एक बड़ी समस्या हो सकती है, और वेनिस ने इसका समाधान ढूंढ लिया है। इटली के इस तैरते हुए शहर की सिटी काउंसिल ने कबूतरों की आबादी को तेजी से बढ़ने से रोकने के लिए उन्हें दाना खिलाने पर रोक लगाने वाला एक म्युनिसिपल नियम पास किया। शुरू में यह रोक ऐतिहासिक स्मारकों वाले इलाकों में लागू थी, लेकिन 2008 में इसे पूरे शहर में लागू कर दिया गया।

इस रोक से पहले सेंट मार्क्स स्क्वायर पर कबूतरों को दाना खिलाना पर्यटकों की एक आम गतिविधि हुआ करती थी। इस प्रतिबंध के पीछे कारण यह था कि कबूतरों की बीट से स्मारकों के संगमरमर को नुकसान पहुँचता था और इससे सफाई व सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ पैदा होती थीं। स्थानीय प्रशासन इस नियम को लागू करता है और इसका उल्लंघन करने पर भारी जुर्माना लगाया जाता है।

महाराष्ट्र के मुंबई में भी हाई कोर्ट के आदेश के बाद बीएमसी ने ऐसा ही प्रतिबंध लगाया था। इस फैसले के कारण दादर कबूतरखाना बंद हो गया। यह करीब 100 साल पुराना था और मुंबई में कबूतरों को दाना खिलाने की एक प्रमुख जगह माना जाता था। बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने आदेश में सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता के लिए गंभीर खतरा बताया था।

ग्रीस में हाई हील्स नहीं

जो यात्री आकर्षक स्मारकों या प्राचीन पुरातात्विक स्थलों के सामने हाई हील्स पहनकर पोज देना पसंद करते हैं, उनके लिए अपनी शानदार वास्तुकला के बावजूद ग्रीस सही जगह नहीं है। दरअसल यहाँ एक नियम है, जो ऐतिहासिक स्थलों पर हाई हील्स पहनने पर प्रतिबंध लगाता है।

2009 में ग्रीक सरकार ने एक सार्वजनिक निर्देश जारी किया, जिसमें पर्यटकों को ऐसे जूते पहनकर ऐतिहासिक स्थलों पर जाने से रोका गया, जिनसे प्राचीन संगमरमर को नुकसान पहुँच सकता है। यह प्रतिबंध तब लगाया गया जब विशेषज्ञों ने कहा कि नुकीली और पतली हील्स वाले जूते ऐतिहासिक स्थलों के फर्श को नुकसान पहुँचा सकते हैं। इन्हें आसानी से ठीक नहीं किया जा सकता। नियम तोड़ने वाले पर्यटकों के लिए €900 तक के भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया था।

कई देशों में खास कपड़े पहनने पर प्रतिबंध

हालाँकि दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में कैमोफ्लाज प्रिंट यानी सेना की तरह के कपड़े पहनना बिल्कुल सामान्य बात है, लेकिन कैरिबियन क्षेत्र यानी अफ्रीका, एशिया और मध्य पूर्व के कुछ देशों में आम नागरिकों के लिए कैमोफ्लाज प्रिंट वाले कपड़े पहनने पर प्रतिबंध है। दुनिया भर में दो दर्जन से ज्यादा ऐसे देश हैं, जहाँ इस तरह के प्रतिबंध लगे हुए हैं। एंटीगुआ और बारबुडा, बारबाडोस, बहामास, डोमिनिका, ग्रेनाडा, सऊदी अरब, घाना, नाइजीरिया और फिलीपींस में इससे जुड़ा कानून हैं, जो आम नागरिकों के लिए कैमोफ्लाज कपड़ों पर प्रतिबंध लगाते हैं।

इन कानूनों का उल्लंघन करने पर सामान जब्त किया जा सकता है, भारी जुर्माना लगाया जा सकता है या गिरफ्तारी भी हो सकती है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

FIFA विश्व कप की पहली महान रात्रि: ऑरान्जे बनाम उगते सूरज के योद्धा

विश्व कप के इस नवप्रभात ने अपने साथ कई रोचक कथाएँ लेकर आगाज़ किया है। भारतीय समयानुसार रविवार की सुबह तक कुल चार मुकाबले खेले जा चुके हैं और उनमें से एक ने इतिहास के पन्नों पर अपना नाम अंकित करा लिया।

चार वर्ष पहले अपने ही घर में आयोजित विश्व कप में बिना एक भी अंक अर्जित किए विदा हो जाने वाला कतर इस बार एक बदले हुए आत्मविश्वास के साथ मैदान पर उतरा। ग्रुप बी के अपने प्रथम मुकाबले में उसका सामना यूरोप की सुदृढ़ और अनुशासित टीम स्विट्जरलैंड से था। अधिकांश विशेषज्ञों की दृष्टि में स्विस टीम इस मुकाबले की प्रबल दावेदार थी, किंतु फुटबॉल बार-बार यह स्मरण कराता है कि भविष्यवाणियाँ घास के मैदान पर नहीं, खिलाड़ियों के पैरों से लिखी जाती हैं।

नब्बे मिनट तक चले इस संघर्ष में स्विट्जरलैंड अधिकांश समय बढ़त बनाए रखने में सफल रहा। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कतर के हिस्से एक और निराशाजनक हार लिखी जा चुकी हो। किंतु अंतिम क्षणों में आया वह गोल केवल स्कोरबोर्ड पर अंकित एक संख्या नहीं था; वह कतर के फुटबॉल इतिहास में अंकित होने वाला एक मील का पत्थर था।

स्कोर 1-1 हुआ और उसी के साथ कतर ने फीफा विश्व कप के इतिहास में पहली बार एक अंक अर्जित कर लिया। ह्यूस्टन में उपस्थित दर्शकों की गर्जना ने उस क्षण को और भी स्मरणीय बना दिया।

वैसे भी कतर के मुख्य प्रशिक्षक जुलेन लोपेतेगुई ने मुकाबले से पूर्व स्पष्ट शब्दों में कहा था, “हम यहाँ केवल उपस्थिति दर्ज कराने नहीं आए हैं।”

ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी टीम ने अपने प्रदर्शन से उस कथन को सार्थक सिद्ध करने की दिशा में पहला कदम बढ़ा दिया है।

वहीं बोस्टन स्टेडियम में खेले गए ग्रुप सी के मुकाबले में स्कॉटलैंड ने मेक्गीन के गोल के साथ हैती को 1-0 से मात देकर अपने ग्रुप में जरूरी तीन अंक लिए।

वैंकूवर में ग्रुप डी के मुकाबले में वैश्विक रैंकिंग में तीसवें स्थान पर स्थित ऑस्ट्रेलिया ने तेईसवीं रैंक की तुर्की को 2-0 धो डाला। अरदा गुलेर, काल्हानोग्लू, डेमीराल, यिल्दीज़ व यिल्माज़ जैसे सितारा खिलाड़ियों से सजी तुर्की की टीम को ऑस्ट्रेलिया ने सधे हुए खेल से मैच में पाँव जमाने ही नहीं दिए।

वहीं ग्रुप स्टेज के जिस मैच का सभी को इंतजार था वह रविवार सुबह साढ़े पांच बजे न्यूयॉर्क के न्यू जर्सी स्टेडियम में खेला गया। ब्राजील का मुकाबला मोरक्को से था। ब्राजील ने मैच की शुरुआत मिडफील्ड में कासेमीरो व गुईमराएज़ को रख 4-2-3-1 की फॉर्मेशन के साथ की। मोरक्को ने हालाँकि मैच के इक्कीसवें मिनट में इस्माइल साईबारी के गोल के साथ ब्राजील समेत संपूर्ण स्टेडियम को झकझोर दिया था। साईबारी के गोल ने मोरक्को के दर्शकों में खुशी की लहर पैदा कर दी थी।

लेकिन मोरक्को की यह खुशी ज्यादा देर बनी न रह सकी। ठीक ग्यारह मिनट पश्चात ही मैच के बत्तीसवें मिनट में ब्राजील के स्टार लेफ्ट विंगर विनीसियस जूनियर लगभग हाफ-लाइन से गेंद को अकेले ही लेकर मोरक्को के गोल पोस्ट की ओर बढ़े। मोरक्को के तीन डिफेंडरों को छका कर उन्होंने गोलपोस्ट की दिशा में एक राइट फुटर किक लिया जिसका गोलकीपर बोनू के पास कोई जवाब नहीं था। स्कोर हो गया था 1-1, जो फाइनल व्हिस्ल बजने तक यही रहा।

विश्व कप का हर संस्करण खेलप्रेमियों को कई खूबसूरत कहानियाँ व कुछ बेहतरीन खिलाड़ी देता है, जो अपने खेल से सभी का दिल जीत लेते हैं। ऐसे ही इस विश्व कप में वो एक खिलाड़ी होंगे मोरक्को के अठारह वर्षीय मिडफील्डर अयूब बोउदादी। सुबह खेले गए इस मुकाबले में अयूब बोउदादी ने सितारों से सजी ब्राजीली मिडफील्ड को चोक कर के रख दिया। उन्होंने विपक्षी टीम के हर हमलों को अपने गोलपोस्ट तक पहुँचने ही न दिया।

कासेमीरो व गुईमराएज़ जैसे अनुभवी मिडफील्डरों की अयूब बोउदादी ने एक न चलने दी। अगर आपने यह मैच नहीं भी देखा तो इस मैच की हाईलाइट जरूर देखिएगा; ब्राजील के खिलाफ अठारह वर्षीय अयूब बोउदादी की मास्टरक्लास के लिए।

अब आगे ग्रुप ई के मुकाबले में ह्यूस्टन स्टेडियम में एक ओर होंगे फुटबॉल जगत के सूरमा जर्मन खिलाड़ी तो वहीं दूसरी ओर होंगे फुटबॉल विश्व कप के इतिहास में जनसंख्या के आधार पर विश्व कप के लिए क्वालीफाई करने वाले सबसे छोटे देश कुराकाओ के कैरेबियन लड़ाके। जर्मन टीम अपने पिछले पाँचों मैच जीत कर बेहतरीन फॉर्म के साथ टूर्नामेंट में अपने अभियान की शुरुआत करेगी।

वहीं कुराकाओ पिछले पाँच मैचों में तीन हार, एक ड्रॉ व एक जीत के साथ कुछ खास फॉर्म में नहीं है परन्तु विश्व कप में अपने पर्दापण को वो कैरेबियन अंदाज में एक जश्न की भांति ले रहे हैं और हर एक पल का आनंद ले रहे हैं। विश्व कप के इस संस्करण के सबसे युवा कोच जूलियन नागेल्समान की अटैकिंग फिलॉस्फी के साथ खेलते हुए निश्चित तौर पर जर्मन टीम विश्व कप के पिछले दो संस्करणों में अपने बेहद निराशाजनक प्रदर्शन को भुला कर अपने समर्थकों का दिल जीतना चाहेंगे। इस मैच में आपको अटैकिंग फुटबॉल देखने को मिलेगी। इस मैच को आप रविवार रात भारतीय समयानुसार रात साढ़े दस बजे देख सकेंगे।

और अब दृष्टि टिकती है उस मुकाबले पर जिसकी प्रतीक्षा केवल डच और जापानी समर्थक ही नहीं, बल्कि विश्व फुटबॉल का प्रत्येक रसिक कर रहा है। भारतीय समयानुसार रात ठीक डेढ़ बजे डल्लास के मैदान पर दो ऐसी परंपराएँ आमने-सामने होंगी, जिन्होंने पिछले एक दशक में अपने खेल से दुनिया को बार-बार चकित किया है।

एक ओर होंगे नीदरलैंड्स के ‘ऑरान्जे’, विश्व फुटबॉल का वह महान अपूर्ण अध्याय, जिसने प्रतिभा, सौंदर्य और सामूहिकता से खेल के इतिहास को समृद्ध तो किया, परंतु विश्व कप की स्वर्णिम ट्रॉफी आज तक उसके हाथों की पहुँच से कुछ इंच दूर ही रही। सन् 1994 के बाद से विश्व कप के ग्रुप चरण में पराजय का स्वाद न चखने वाली यह टीम एक ऐसी विरासत की वाहक है, जिसने टोटल फुटबॉल जैसी क्रांतिकारी अवधारणा को जन्म दिया और पीढ़ियों तक खेल की दिशा बदल दी। किंतु इतिहास का एक निर्मम व्यंग्य भी उनके साथ जुड़ा है, विश्व कप फाइनल तक पहुँचने के बाद सर्वाधिक बार उपविजेता रहने का।

दूसरी ओर होंगे जापान के ‘समुराई ब्लूज़’; एशियाई फुटबॉल के उस अनुशासित और अथक योद्धा दल की संज्ञा, जिसने पिछले कुछ वर्षों में स्वयं को केवल एक प्रतिभागी नहीं, बल्कि एक वास्तविक दावेदार के रूप में स्थापित किया है। विश्व कप क्वालीफाइंग अभियान में चौवन गोल दागना और मात्र तीन गोल स्वीकार करना किसी संयोग का परिणाम नहीं होता। यह उस संरचना, अनुशासन और दीर्घकालिक योजना का प्रतिफल है, जिसे जापान ने वर्षों की साधना से निर्मित किया है।

और यदि किसी को अब भी जापान की क्षमता पर संदेह हो, तो उसे पिछले विश्व कप की स्मृतियों में लौट जाना चाहिए, जहाँ इसी टीम ने समूह चरण में जर्मनी और स्पेन जैसी यूरोपीय महाशक्तियों को पराजित कर पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया था। इसीलिए जापान के विरुद्ध मैदान पर उतरने वाली कोई भी टीम यदि उन्हें हल्के में लेने की भूल करती है, तो उसका मूल्य अक्सर स्कोरबोर्ड पर चुकाना पड़ता है।

हाँ, दोनों दल इस महायुद्ध में अपनी पूर्ण शक्ति के साथ नहीं उतर रहे। अंतिम समय में लगी चोटों ने दोनों शिविरों से कुछ महत्वपूर्ण नाम छीन लिए हैं। आधुनिक फुटबॉल के निरंतर व्यस्त कैलेंडर का दुष्परिणाम इस विश्व कप में भी दिखाई दे रहा है, जहाँ कई टीमें अपने कुछ सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के बिना अभियान प्रारंभ करने को विवश हैं।

किन्तु विश्व कप का आकर्षण ही यही है। यहाँ केवल ग्यारह खिलाड़ियों की नहीं, विचारधाराओं की टक्कर होती है। एक ओर डच सौंदर्य और रचनात्मकता होगी, तो दूसरी ओर जापानी अनुशासन और अथक परिश्रम। और जब ऐसी दो धाराएँ एक ही मैदान पर मिलती हैं, तब परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है स्वयं वह दृश्य, जिसका साक्षी बनने का अवसर फुटबॉल प्रेमियों को प्राप्त होता है।

आगे सोमवार के दिन आइवरी कोस्ट का मुकाबला इक्वाडोर से, स्वीडन का मुकाबला ट्यूनीशिया से व कलात्मक खेल के लिए जाने जानी वाली स्पेन की टीम काबो वर्दे के खिलाफ अपने अभियान का आगाज़ करेंगे।

आगे भी ऐसी ही कहानियाँ जन्म लेंगी। कहीं कोई दिग्गज अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए संघर्ष करेगा, तो कहीं कोई अनजान चेहरा विश्व फुटबॉल के आकाश में नए नक्षत्र की भाँति उदित होगा। यही तो विश्व कप का आकर्षण है; नब्बे मिनटों में इतिहास बदल जाने का आकर्षण।

फिलहाल निगाहें टिकी हैं रविवार रात होने वाले मुकाबलों पर, जहाँ ‘ऑरान्जे’ का सामना ‘समुराई ब्लूज़’ से होगा और जर्मनी अपने अभियान का शुभारंभ करेगा। तब तक के लिए; फुटबॉल की बातों का यह सिलसिला यहीं विराम लेता है।

वीवा ला फुटबॉल।

साइबर ठगी के शिकार या बैंक खाते के पैसे हो गए फ्रीज? आपकी मदद करेगा मोदी सरकार का MRM पोर्टल: जानिए घर बैठे कैसे वापस पा सकेंगे अपनी रकम

अक्सर हम ऐसा सुनते हैं कि लोगों के मोबाइल पर एक कॉल आता है, जिसमें सामने वाला खुद को बैंक अधिकारी बताता है और KYC अपडेट करने के नाम पर आपसे कुछ जानकारी ले लेता है। कुछ ही मिनटों में आपके खाते से हजारों रुपए निकल जाते हैं।

घबराकर आप 1930 हेल्पलाइन पर शिकायत करते हैं और पुलिस की मदद से ठग के खाते में पहुँची रकम फ्रीज भी हो जाती है। लेकिन इसके बाद शुरू होती है लंबी प्रक्रिया। बैंक, पुलिस और कई बार अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। कई लोगों को महीनों तक अपने पैसे का इंतजार करना पड़ता है।

ऐसे ही लाखों साइबर ठगी पीड़ितों की परेशानी को कम करने के लिए गृह मंत्रालय के अधीन इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) ने मनी रेस्टोरेशन मॉड्यूल (MRM) शुरू किया है।

यह राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) का नया डिजिटल मॉड्यूल है, जिसके जरिए साइबर फ्रॉड के पीड़ित घर बैठे अपनी फ्रीज हुई रकम वापस पाने के लिए आवेदन कर सकेंगे।

आखिर MRM पोर्टल की जरूरत क्यों पड़ी?

भारत में डिजिटल भुगतान तेजी से बढ़ा है। UPI, नेट बैंकिंग और ऑनलाइन ट्रांजैक्शन ने लोगों की जिंदगी आसान तो बनाई है, लेकिन इसके साथ साइबर अपराधों जैसी समस्या में भी जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है।

सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 2022 में साइबर सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं की संख्या करीब 10.29 लाख थी, जो 2024 में बढ़कर 22.68 लाख तक पहुँच गई। आज साइबर ठग केवल OTP फ्रॉड तक सीमित नहीं हैं।

बल्कि डिजिटल अरेस्ट, फर्जी निवेश योजनाएँ, पार्ट-टाइम जॉब स्कैम, KYC अपडेट और फेक कस्टमर केयर जैसे कई नए तरीकों से लोगों को निशाना बना रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि यदि किसी पीड़ित की रकम समय रहते फ्रीज भी हो जाए तो उसे वापस पाने की प्रक्रिया बेहद जटिल रहती थी। MRM इसी परेशानी को दूर करने के लिए लाया गया है।

क्या है मनी रेस्टोरेशन मॉड्यूल (MRM)?

मनी रेस्टोरेशन मॉड्यूल एक ऑनलाइन रिफंड सिस्टम है जिसे I4C ने विकसित किया है। इसका उद्देश्य साइबर ठगी के पीड़ितों को एक ऐसा प्लेटफॉर्म देना है जहाँ वे अपनी फ्रीज हुई रकम वापस पाने के लिए डिजिटल तरीके से आवेदन कर सकें।

पहले लोगों को बैंक शाखाओं, पुलिस कार्यालयों और अन्य विभागों के चक्कर लगाने पड़ते थे। कई मामलों में अदालत से आदेश लेने की जरूरत भी पड़ती थी। अब इस प्रक्रिया का बड़ा हिस्सा ऑनलाइन कर दिया गया है ताकि पीड़ितों को कम परेशानी हो और रिफंड की प्रक्रिया तेज हो सके।

MRM पोर्टल का लाभ हर साइबर ठगी पीड़ित को नहीं मिलेगा। इसके लिए दो महत्वपूर्ण शर्तें पूरी होना जरूरी हैं। पहली यह कि पीड़ित ने ठगी का पता चलते ही 1930 हेल्पलाइन या NCRP पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई हो।

दूसरी यह कि ठगी की रकम अपराधी के बैंक खाते में ट्रेस होकर फ्रीज कर दी गई हो। यदि पैसा किसी दूसरे खाते में ट्रांसफर हो चुका है या निकाल लिया गया है, तो इस मॉड्यूल के जरिए रिफंड संभव नहीं होगा। इसलिए साइबर विशेषज्ञ हमेशा सलाह देते हैं कि फ्रॉड का पता चलते ही तुरंत शिकायत दर्ज करानी चाहिए।

MRM पोर्टल पर रिफंड के लिए आवेदन कैसे करें?

रिफंड पाने के लिए सबसे पहले पीड़ित को MRM पोर्टल पर जाना होगा और सिटीजन लॉगिन विकल्प पर क्लिक करना होगा। इसके बाद उसी मोबाइल नंबर से लॉगिन करना होगा जो NCRP शिकायत में दर्ज है।

OTP सत्यापन पूरा होने के बाद रिफंड का अनुरोध करें वाले सेक्शन में जाकर 14 अंकों वाली शिकायत ID दर्ज करनी होगी। इसके बाद पैन कार्ड की कॉपी, बैंक खाता संख्या और IFSC कोड जैसी जरूरी जानकारी भरनी होगी।

जिन मामलों में FIR और कोर्ट ऑर्डर की आवश्यकता है, वहाँ उनकी कॉपी भी अपलोड करनी होगी। आवेदन सबमिट करने के बाद पोर्टल एक यूनिक रिक्वेस्ट ID जारी करेगा, जिसकी शुरुआत ‘MR2026’ से होगी। इसी ID की मदद से आवेदक अपने रिफंड की स्थिति ऑनलाइन ट्रैक कर सकेगा।

संचार साथी ऐप भी कर रहा है बड़ी मदद

जहाँ MRM का उद्देश्य साइबर ठगी के बाद फंसी रकम वापस दिलाना है, वहीं सरकार का ‘संचार साथी’ प्लेटफॉर्म साइबर अपराध को रोकने और डिजिटल पहचान की सुरक्षा में मदद कर रहा है।

दूरसंचार विभाग द्वारा शुरू किए गए इस प्लेटफॉर्म के जरिए नागरिक अपना खोया या चोरी हुआ मोबाइल ब्लॉक कर सकते हैं, IMEI नंबर ट्रैक कर सकते हैं, संदिग्ध कॉल और मैसेज की शिकायत कर सकते हैं और मोबाइल की वैधता की जाँच कर सकते हैं।

सरकार के अनुसार इस पहल की मदद से लाखों संदिग्ध सिम कार्ड और IMEI नंबर ब्लॉक किए जा चुके हैं, जबकि लाखों मोबाइल फोन भी बरामद किए गए हैं।

साइबर ठगी का शिकार होने पर क्या करें?

अगर आपके साथ साइबर ठगी होती है तो घबराने की बजाय तुरंत कार्रवाई करना सबसे जरूरी है। सबसे पहले 1930 हेल्पलाइन पर कॉल करें या NCRP पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएँ।

अपने बैंक को तुरंत जानकारी दें ताकि ट्रांजैक्शन को ट्रैक किया जा सके। किसी अनजान व्यक्ति या एजेंट को रिफंड दिलाने के नाम पर पैसे न दें और केवल सरकारी पोर्टल का ही इस्तेमाल करें। जितनी जल्दी शिकायत दर्ज होगी, रकम फ्रीज होने और वापस मिलने की संभावना उतनी ही अधिक होगी।

‘इनोवेट इन इंडिया’ का ग्लोबल विस्तार: जानिए फ्रांस में ‘Bharat Innovates 2026’ के आयोजन के पीछे क्या है मोदी सरकार का प्लान

साल 2047 तक ‘विकसित भारत’ के संकल्प को पूरा करने के लिए मोदी सरकार नवाचार पर लगातार जोर दे रही है। 2 लाख से अधिक स्टार्टअप्स, 21 लाख नौकरियाँ, एआई, डीपटेक, रिसर्च और Bharat Innovates 2026 जैसी पहल इस दिशा में मजबूत कदम है। इसी कड़ी में फ्रांस के नीस शहर में 14 से 16 जून तक ‘भारत इनोवेट्स 2026’ का आयोजन किया जा रहा है।

यह आयोजन इसलिए खास है क्योंकि यह भारत की डीप-टेक क्षमता को वैश्विक निवेशकों, उद्योगपतियों और राष्ट्रों के सामने प्रस्तुत करने वाला अब तक का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय मंच है, जो सॉफ्टवेयर आउटसोर्सिंग से आगे बढ़कर भारत की नई तकनीकी पहचान बना रहा है। मोदी सरकार भी इनोवेशन के दम विकास पर खासा जोर दे रही है। ऐसे में भारत इनोवेट्स 2026 केवल सिर्फ स्टार्टअप सम्मेलन नहीं, बल्कि भारत की डीप-टेक (Deep Tech) क्षमता को दुनिया के सामने लाने का मंच भी है।

क्या है भारत इनोवेट्स 2026

भारत इनोवेट्स 2026 भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की पहल है, जिसका उद्देश्य भारत के सर्वश्रेष्ठ डीप-टेक स्टार्टअप्स, शोध संस्थानों और इनोवेशन को वैश्विक स्तर पर प्रदर्शित करना है।

‘भारत इनोवेट्स’ का ध्यान 13 अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों पर केंद्रित है। इनमें एडवांस्ड कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर्स, अगली पीढ़ी के संचार माध्यम, एडवांस्ड मटीरियल्स और रेयर मिनरल्स, बायोटेक्नोलॉजी, अंतरिक्ष और रक्षा, मैन्युफैक्चरिंग और उद्योग 4.0 शामिल हैं। इसका लक्ष्य भारतीय युवाओं, निवेशकों और उद्योगों के बीच एक मजबूत सेतु का निर्माण करना तथा स्टार्टअप्स को कमर्शियलाइजेशन के अवसर देना है।

फ्रांस के कार्यक्रम में कौन-कौन पहुँचे

फ्रांस के दो दिवसीय सम्मेलन में 120 भारतीय डीप-टेक स्टार्टअप, 15 से अधिक IIT, IISc जैसे हाई एजुकेशन संस्थान, 500 से अधिक वैश्विक निवेशक, अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के CEO, वेंचर कैपिटल फर्म और रिसर्च इंस्टीट्यूट शामिल हो रहे हैं।

इस सम्मेलन के माध्यम से भारत की तकनीकी ताकत का वैश्विक प्रदर्शन होगा। अब तक भारत की पहचान IT सेवाओं और सॉफ्टवेयर आउटसोर्सिंग से जुड़ी रही है। भारत इनोवेटिव्स का लक्ष्य यह दिखाना है कि भारत अब सेमीकंडक्टर, स्पेस टेक, एआई, बायोटेक, एडवांस्ड कंप्यूटिंग, हेल्थ टेक, क्लीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में भी दुनिया को नई दिशा दिखाने का माद्दा रखता है।

आज भारत की कई कंपनियाँ ऐसी तकनीकों पर काम कर रही हैं जो वैश्विक स्तर पर प्रभाव डालने वाली हैं। भारतीय स्टार्टअप्स क्वांटम साइबरसिक्योरिटी प्लेटफॉर्मस (Quantum Cybersecurity Platforms) विकसित कर रहे हैं। एआई की मदद से औद्योगिक सुरक्षा सिस्टम विकसित कर रहे हैं।

एडवांस रोबॉटिक्स, बहुभाषावाली एआई मॉडल्स, क्लाइमेट तकनीक और अगली पीढ़ी के हेल्थकेयर सोल्यूशन पर काम कर रही हैं। ऐसी कई कंपनियाँ भारत की यूनिवर्सिटी और रिसर्च इंस्टीट्यूट्स से निकली हैं। इससे पता चलता है कि भारत में उच्च शिक्षा और इनोवेशन में संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं।

IIT Madras और IIT Bombay आज देश के प्रमुख DeepTech Incubation Hubs बन चुके हैं। इन दोनों संस्थानों से जुड़े 1000 से अधिक स्टार्टअप्स की संयुक्त वैल्यूएशन 9 अरब डॉलर से अधिक बताई जा रही है। इन कंपनियों ने हजारों रोजगार भी पैदा किए हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में अकेले IIT Madras ने 100 से अधिक डीपटेक स्टार्टअप्स को इनक्यूबेट किया।

विदेशी निवेश आकर्षित करने का मंच

भारत के कई स्टार्टअप्स के पास तकनीक है, लेकिन पूँजी और वैश्विक बाजार तक पहुँच काफी कम है। फ्रांस में हो रहा ‘भारत इनोवेस्ट 2026’ भारतीय कंपनियों को सीधे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और उद्योगों से जोड़ने के दिशा में भी अहम कदम है। भारत लगातार ‘मेक इन इंडिया’ पर जोर देता रहा है। अब इसका अगला कदम ‘इनोवेट इन इंडिया’ है।

मोदी सरकार लंबे समय से भारत को केवल मैन्युफैक्चरिंग हब नहीं, बल्कि नवाचार और अनुसंधान का वैश्विक केंद्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। सरकार की नीतियाँ देश में अनुकूल माहौल बना रही है। विश्वविद्यालय और शोध संस्थान प्रतिभा, प्रयोग और खोज को आगे ले जा रहे हैं। सब मिल कर काम करेंगे तभी ‘इनोवेशन क्रांति’ देश में संभव है। भारत इनोवेस्ट इसी रणनीति का हिस्सा है।

यह आयोजन ‘India-France Year of Innovation 2026’ के तहत हो रहा है। इसका मकसद दोनों देशों के बीच तकनीक, अनुसंधान, रक्षा और उद्योग क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना है।

भारत इनोवेट्स 2026 के माध्यम से भारत का लक्ष्य

  • भारतीय डीप-टेक स्टार्टअप्स को वैश्विक बाजार से जोड़ना।
  • विदेशी निवेश और तकनीकी साझेदारी आकर्षित करना।
  • भारतीय विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को वैश्विक नेटवर्क से जोड़ना।
  • तकनीकी हस्तांतरण को बढ़ावा देना, ताकि इनोवेशन को नई धार मिले।
  • भारतीय इनोवेशन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना और कॉमर्शियलाइजेशन करना है।

भारत इनोवेट्स 2026 को सफल बनाने के लिए सरकार ने क्या-क्या किया

राष्ट्रीय स्तर पर चयन प्रक्रिया- देशभर से हजारों आवेदनों के बीच चयन कर सर्वश्रेष्ठ डीप-टेक स्टार्टअप्स को चुना गया। इसके लिए वैज्ञानिकों और उद्योग विशेषज्ञों की तकनीकी निगरानी समिति बनाई गई थी, जिसकी अगुवाई भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार अजय कुमार सूद ने किया। IIT नेटवर्क को जोड़ा गया। IIT गाँधीनगर में राष्ट्रीय बेसकैम्प लगाया गया। IIT बॉम्बे में डीप-टेक प्री-समिट आयोजित किया गया।

इसके अलावा दूसरे देश के प्रमुख तकनीकी संस्थानों की भागीदारी सुनिश्चित की गई। स्टार्टअप्स की मॉनेटरिंग की गई और वैश्विक प्रस्तुति के लिए तैयार किया गया।

सरकार ने वैश्विक VC फंड्स, कॉर्पोरेट्स, विश्वविद्यालयों और रिसर्च संस्थानों को इस कार्यक्रम में आमंत्रित किया ताकि भारतीय स्टार्टअप्स को फंडिंग, पायलट प्रोजेक्ट्स और व्यावसायिक अवसर मिल सकें।

फ्रांस के नीस शहर को इसलिए चुना गया क्योंकि यह यूरोपीय इनोवेशन, अनुसंधान और निवेश नेटवर्क से जुड़ा प्रमुख केंद्र माना जाता है। इससे भारतीय कंपनियों को यूरोपीय बाजार तक पहुँच बनाने में मदद मिल सकती है।

यदि G20 भारत की कूटनीतिक शक्ति का प्रदर्शन था, तो भारत इनोवेस्ट 2026 को मोदी सरकार की ‘तकनीकी डिप्लोमैसी’ का प्रदर्शन माना जा सकता है। इसका संदेश साफ है कि भारत अब केवल दुनिया का बाजार नहीं, बल्कि भविष्य की तकनीकों का निर्माता और निर्यातक देश भी बनना चाहता है।

एक तरह से देखा जाए तो भारत इनोवेस्ट 2026, स्टार्टअप इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, राष्ट्रीय शिक्षा नीति और भारत की डीप-टेक रणनीति को एक वैश्विक मंच पर एक साथ प्रदर्शित करने वाला पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय आयोजन है।

‘गले लगाएँगे, ₹50 लाख देंगे… बस पुजारी को जेल भिजवाओ’: कर्नाटक में धर्मस्थल को बदनाम करने के पीछे था वामपंथी प्रकाश राज का भी हाथ? जानिए शिकायतकर्ता ने अब तक क्या बताया

कर्नाटक के धर्मस्थल को बदनाम करने के मामले में साजिशकर्ता के तौर पर अब अभिनेता प्रकाश राज का नाम सामने के बाद विवाद फिर गहरा गया है। कर्नाटक हाई कोर्ट में दाखिल याचिका में मुख्य शिकायतकर्ता और पूर्व सफाईकर्मी CN चिन्नैया ने दावा किया है कि एक्टिविस्ट गिरीश मट्टन्नावर ने उसकी अभिनेता प्रकाश राज से फोन पर बात कराई थी और फोन पर ही प्रकाश राज ने उसे निर्देश दिए थे।

चिन्नैया के अनुसार, प्रकाश राज ने उससे अधिकारियों के सामने वही बातें कहने को कहा था, जो उसे पहले से समझाई गई थीं। यह दावा ऐसे समय सामने आया है, जब इसी मामले में SIT अपनी जाँच के बाद पहले ही कई शिकायतकर्ताओं और गवाहों पर झूठी जानकारी देकर जाँच को गुमराह करने का दावा कर चुकी है।

चिन्नैया ने अपनी याचिका में यह भी आरोप लगाया है कि धर्मस्थल और धर्माधिकारी (पुजारी) वीरेंद्र हेगड़े को निशाना बनाने के लिए एक बड़ी साजिश रची गई थी, जिसकी जाँच अभी जारी है।

प्रकाश राज का नाम कैसे आया?

हाई कोर्ट में दाखिल याचिका में चिन्नैया ने दावा किया कि एक्टिविस्ट गिरीश मट्टन्नावर ने उसे अभिनेता प्रकाश राज से फोन पर बात कराई थी। उसके अनुसार, प्रकाश राज ने तमिल भाषा में उससे कहा था कि वह अधिकारियों और जाँच एजेंसियों के सामने वही बयान दे, जो मट्टन्नावर ने उसे समझाया है।

चिन्नैया ने यह भी आरोप लगाया कि धर्मस्थल के खिलाफ अभियान चलाने वाले कुछ लोग लगातार उसके संपर्क में थे और उसे विशेष तरीके से बयान देने के लिए तैयार किया जा रहा था।

200 करोड़ की साजिश, 50 लाख का लालच और दबाव के आरोप

चिन्नैया ने याचिका में दावा किया कि एक्टिविस्ट महेश शेट्टी तिमरोडी ने उसे बताया था कि पूरी योजना का बजट लगभग 200 करोड़ रुपए है। उसने आरोप लगाया कि धर्मस्थल धर्माधिकारी वीरेंद्र हेगड़े को जेल भेजने में सहयोग करने पर उसे 50 लाख रुपए देने का वादा किया गया था।

याचिका में यह भी कहा गया है कि कुछ लोगों को बाहरी स्रोतों से आर्थिक मदद मिल रही थी और धर्मस्थल की छवि खराब करने के लिए सुनियोजित अभियान चलाया जा रहा था।

चिन्नैया ने आरोप लगाया कि उससे यूट्यूब चैनलों पर बयान दिलवाए गए, कोर्ट में क्या कहना है इसकी ट्रेनिंग दी गई और कई बार मानसिक तथा शारीरिक प्रताड़ना भी झेलनी पड़ी। उसने यह भी दावा किया कि जब उसने कथित झूठे आरोपों के साथ आगे बढ़ने में हिचक दिखाई तो उसे धमकियां दी गईं।

प्रकाश राज की सफाई

बता दें कि शिकायतकर्ता के इस दावे के बाद अभिनेता प्रकाश राज ने भी धर्मस्थल मामले से जुड़े अपने नाम को लेकर चल रही खबरों पर प्रतिक्रिया दी। सोशल मीडिया पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए, उन्होंने अफवाहों को निराधार बताया और कहा कि वे जल्द ही मीडिया से व्यक्तिगत रूप से बात करके सभी शंकाओं को दूर करेंगें।

कैसे शुरू हुआ धर्मस्थल मामला और जाँच में कैसे बदली पूरी कहानी?

पूरा मामला जून 2025 में सामने आया था, जब धर्मस्थल मंदिर के पूर्व सफाईकर्मी सीएन चिन्नैया ने दावा किया था कि उसे 1995 से 2014 के बीच महिलाओं, बच्चियों और अन्य लोगों के शव दफनाने के लिए मजबूर किया गया था।

उसने आरोप लगाया था कि धर्मस्थल के आसपास कई स्थानों पर सामूहिक कब्रें मौजूद हैं। आरोपों की गंभीरता को देखते हुए कर्नाटक सरकार ने जुलाई 2025 में SIT का गठन किया।

जाँच के दौरान चिन्नैया ने कई स्थानों की पहचान की, जहाँ खुदाई की गई। हालाँकि अधिकांश जगहों से उसके दावों की पुष्टि करने वाले सबूत नहीं मिले। जिस खोपड़ी और हड्डियों को उसने सबूत बताया था, उनकी जाँच में भी उसके आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी।

बाद में चिन्नैया ने अपने कई दावों से पीछे हटते हुए कहा कि वह कुछ लोगों के प्रभाव में था और उससे झूठे बयान दिलवाए गए थे। इसके बाद SIT ने करीब 3900 पन्नों की चार्जशीट दाखिल कर मुख्य शिकायतकर्ता समेत कई लोगों पर झूठी जानकारी देने, सबूत छिपाने और जाँच को गुमराह करने के आरोप लगाए।

SIT का दावा है कि धर्मस्थल में सामूहिक दफन की कहानी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया या गलत तथ्यों के आधार पर प्रचारित किया गया। दिलचस्प बात यह रही कि जिन लोगों ने शुरुआत में FIR और जाँच की माँग की थी, बाद में उन्हीं में से कुछ लोग अदालत पहुँचकर FIR रद्द कराने की माँग करने लगे।

सिर्फ टेस्टिंग नहीं, डिजाइन से लेकर स्पेस हार्डवेयर निर्माण तक: अहमदाबाद में बनेगा स्पेस मैन्युफैक्चरिंग पार्क, जानें कैसे मिलेगी भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र को रफ्तार

गुजरात सरकार ने अहमदाबाद के पास खोराज GIDC में विकसित किए जा रहे स्पेस मैन्युफैक्चरिंग पार्क के लिए कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज (CTF) स्थापित करने की घोषणा की है। इन सुविधाओं के विकास के लिए IN-SPACe की ओर से उपकरणों पर 100 करोड़ रुपए तक का योगदान दिया जाएगा।

वहीं निर्माण और संचालन का अतिरिक्त खर्च राज्य सरकार उठाएगी। यह घोषणा 10वें IN-SPACe इंडस्ट्री कनेक्ट कार्यक्रम के दौरान की गई।

प्रस्तावित कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज में क्लास 100,000 क्लीनरूम, थर्मो-वैक्यूम चैंबर, 12 टन तक पेलोड क्षमता वाली वाइब्रेशन टेस्टिंग सिस्टम, EMI/EMC टेस्टिंग सुविधाएँ, क्लाइमेट टेस्ट चैंबर, मास प्रॉपर्टीज मापन प्रणाली, मैग्नेटिक फील्ड टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्थ ऑब्जर्वेशन ऑप्टिक्स के कैलिब्रेशन की सुविधाएँ शामिल होंगी।

राज्य सरकार ने खोराज में 50 एकड़ जमीन आवंटित की है, जिसे भविष्य में 100 एकड़ तक बढ़ाने की व्यवस्था भी रखी गई है। पहली नजर में यह खबर किसी नए औद्योगिक पार्क या सरकारी परियोजना की घोषणा जैसी लग सकती है।

लेकिन अगर इसके पीछे के व्यापक संदर्भ को समझने की कोशिश की जाए तो साफ होता है कि यह केवल एक नई सुविधा का निर्माण नहीं है, बल्कि भारत के तेजी से बढ़ते निजी स्पेस सेक्टर के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का प्रयास है।

वास्तव में इस परियोजना को समझने के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि अंतरिक्ष में भेजी जाने वाली किसी भी चीज को धरती पर किस तरह तैयार किया जाता है।

यह कोई साधारण औद्योगिक पार्क नहीं, जानिए क्यों है खास

जब आम लोग सैटेलाइट के बारे में सोचते हैं तो उनके मन में अक्सर सिर्फ लॉन्चिंग का दृश्य आता है। रॉकेट तेज आवाज के साथ आसमान में उड़ता है और सैटेलाइट अंतरिक्ष में पहुँच जाता है। लेकिन हकीकत में लॉन्चिंग से पहले कई सालों तक तैयारी और परीक्षण की लंबी प्रक्रिया चलती है। अंतरिक्ष पृथ्वी जैसा वातावरण नहीं होता।

वहाँ हवा नहीं होती, दबाव नहीं होता, तापमान में बहुत ज्यादा बदलाव होता है और लॉन्चिंग के दौरान भारी कंपन का सामना करना पड़ता है। इसलिए किसी भी सैटेलाइट या दूसरे स्पेस हार्डवेयर को अंतरिक्ष में भेजने से पहले उसकी कई तरह की जाँच और टेस्ट किए जाते हैं। क्लीनरूम इसका सबसे आसान उदाहरण है।

सैटेलाइट में लगाए जाने वाले कैमरे, सेंसर और दूसरे बेहद संवेदनशील उपकरणों पर धूल का एक छोटा सा कण भी असर डाल सकता है। इसलिए ऐसे उपकरणों को सामान्य माहौल में नहीं बल्कि बेहद नियंत्रित और साफ वातावरण वाले क्लीनरूम में तैयार और असेंबल किया जाता है। थर्मो-वैक्यूम चैंबर का काम अंतरिक्ष जैसी परिस्थितियाँ बनाना होता है।

इसमें हवा निकालकर वैक्यूम तैयार किया जाता है और बहुत ज्यादा गर्म और बहुत ज्यादा ठंडी स्थितियाँ बनाकर यह जाँचा जाता है कि सैटेलाइट अंतरिक्ष में सही तरीके से काम कर पाएगा या नहीं। इसी तरह वाइब्रेशन टेस्टिंग भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। जब रॉकेट लॉन्च होता है तो उससे भारी कंपन और यांत्रिक दबाव पैदा होता है।

अगर सैटेलाइट या उसके अंदर लगे उपकरण इस कंपन को सहन नहीं कर पाए तो पूरा मिशन असफल हो सकता है। इसलिए पृथ्वी पर ही कृत्रिम रूप से ऐसी स्थिति बनाकर उसकी जाँच की जाती है। EMI/EMC टेस्टिंग के जरिए यह सुनिश्चित किया जाता है कि अलग-अलग इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम एक-दूसरे को प्रभावित किए बिना सही तरीके से काम कर सकें।

सरल शब्दों में कहें तो खोराज में बनने वाली ये सुविधाएँ ऐसी जगह होंगी जहाँ पृथ्वी पर ही अंतरिक्ष जैसी परिस्थितियां तैयार करके सैटेलाइट और दूसरी स्पेस सिस्टम्स की जांच और परीक्षण किए जाएँगे।

स्टार्टअप्स के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?

पिछले कुछ वर्षों में भारत में स्पेस स्टार्टअप्स की संख्या तेजी से बढ़ी है। रॉकेट तकनीक से लेकर सैटेलाइट मैन्युफैक्चरिंग, अर्थ ऑब्जर्वेशन, कम्युनिकेशन और डेटा एनालिटिक्स जैसे क्षेत्रों में कई नई कंपनियाँ सामने आई हैं। लेकिन ज्यादातर स्टार्टअप्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती इंफ्रास्ट्रक्चर की होती है।

किसी स्टार्टअप के लिए अपनी थर्मो-वैक्यूम चैंबर, क्लीनरूम या वाइब्रेशन टेस्टिंग सिस्टम तैयार करना बहुत महंगा काम होता है। कई मामलों में इसका खर्च करोड़ों रुपए तक पहुँच जाता है। इसी वजह से कंपनियों को ऐसी सुविधाओं के लिए दूसरी संस्थाओं पर निर्भर रहना पड़ता है। अब तक कई निजी कंपनियाँ ISRO की उपलब्ध सुविधाओं का इस्तेमाल करती रही हैं।

2020 के बाद सरकार ने निजी क्षेत्र के लिए स्पेस सेक्टर खोला, जिसके बाद IN-SPACe के जरिए इस तरह की सुविधाओं तक पहुँच को ज्यादा व्यवस्थित तरीके से उपलब्ध कराया गया। लेकिन ISRO की सुविधाएँ मूल रूप से उसके अपने मिशनों के लिए बनाई गई हैं। भारत में निजी स्पेस कंपनियों की संख्या बढ़ने के साथ इन सुविधाओं की माँग भी लगातार बढ़ रही है।

ऐसी स्थिति में खोराज में विकसित की जा रही कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज का उद्देश्य यह है कि कई कंपनियाँ एक ही प्लेटफॉर्म पर आधुनिक टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल कर सकें। इससे सिर्फ लागत कम नहीं होगी, बल्कि नई कंपनियों के लिए स्पेस सेक्टर में आने की मुश्किलें भी कम होंगी।

हालाँकि सबसे ज्यादा चर्चा कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज की हो रही है, लेकिन खोराज परियोजना को केवल एक टेस्टिंग सेंटर के रूप में देखना सही नहीं होगा। राज्य सरकार और IN-SPACe की योजना एक ऐसा स्पेस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार करने की है, जहाँ कंपनियाँ सिर्फ अपने उत्पादों की जाँच ही नहीं करेंगी, बल्कि सैटेलाइट, पेलोड सिस्टम और दूसरे स्पेस हार्डवेयर की डिजाइन, विकास, असेंबली और मैन्युफैक्चरिंग भी कर सकेंगी।

यानि CTF पूरे प्रोजेक्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इस परियोजना का उद्देश्य केवल टेस्टिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे कहीं बड़ा है।

2020 के बाद भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में क्या बदलाव आए?

इस पूरे प्रोजेक्ट को समझने के लिए 2020 के स्पेस रिफॉर्म्स को समझना जरूरी है। लंबे समय तक भारत का स्पेस सेक्टर लगभग पूरी तरह ISRO पर केंद्रित रहा। देश की अंतरिक्ष क्षमताओं का विकास हुआ और मंगलयान व चंद्रयान जैसे ऐतिहासिक मिशन सफल रहे, लेकिन निजी क्षेत्र की भागीदारी बहुत सीमित थी।

2020 में केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए स्पेस सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया। इसके साथ ही IN-SPACe का गठन किया गया। IN-SPACe का काम निजी कंपनियों को अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रवेश के लिए जरूरी मंजूरी, मार्गदर्शन और समन्वय देना है।

इसके बाद आज कई भारतीय स्टार्टअप्स रॉकेट, सैटेलाइट और अन्य स्पेस टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं। निजी क्षेत्र को स्पेस सेक्टर में शामिल करने का मतलब सिर्फ नई कंपनियों को मौका देना नहीं था, बल्कि इसका यह भी मतलब था कि देश को नए तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत पड़ेगी।

खोराज में विकसित की जा रही कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज को इसी बड़े बदलाव का एक हिस्सा माना जा सकता है।

गुजरात निभा रहा महत्वपूर्ण भूमिका

खोराज में विकसित किया जा रहा स्पेस पार्क सिर्फ टेस्टिंग की जगह नहीं होगा, बल्कि इसे एक पूरा औद्योगिक क्लस्टर के रूप में तैयार करने की योजना है। यहाँ भविष्य में ऐसी कंपनियाँ आ सकती हैं जो सैटेलाइट के अलग-अलग हिस्से बनाएँगी, पेलोड सिस्टम विकसित करेंगी, स्पेस आधारित एप्लीकेशन पर काम करेंगी और उसी इकोसिस्टम में अपने उत्पादों का परीक्षण भी कर सकेंगी।

यानी डिजाइन से लेकर फ्लाइट के लिए तैयार सिस्टम बनने तक की पूरी प्रक्रिया के लिए जरूरी ढाँचा एक ही क्लस्टर में विकसित करने की कोशिश की जा रही है। खोराज प्रोजेक्ट का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि यह गुजरात में बन रहा है। इसके पीछे कई रणनीतिक कारण भी हैं। IN-SPACe का मुख्यालय अहमदाबाद में स्थित है।

साथ ही गुजरात का ISRO से भी लंबे समय से जुड़ा हुआ संबंध रहा है। अहमदाबाद में स्थित स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम में अहम भूमिका निभाता आया है। पिछले कुछ वर्षों में गुजरात सरकार ने डिफेंस, एयरोस्पेस और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया है। राज्य में सेमीकंडक्टर क्षेत्र में बड़े निवेश भी हो रहे हैं।

स्पेस टेक्नोलॉजी और सेमीकंडक्टर उद्योग आपस में जुड़े हुए हैं, क्योंकि सैटेलाइट और अन्य अंतरिक्ष प्रणालियों के लिए उन्नत इलेक्ट्रॉनिक घटकों की जरूरत होती है। इस दृष्टि से देखा जाए तो खोराज में विकसित किया जा रहा स्पेस मैन्युफैक्चरिंग पार्क कोई अलग-थलग प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि गुजरात में विकसित हो रहे बड़े हाई-टेक इकोसिस्टम का एक हिस्सा है।

क्या हो सकते हैं इसके दीर्घकालिक प्रभाव?

खोराज प्रोजेक्ट का वास्तविक असर आने वाले वर्षों में दिखाई देगा। अगर यहाँ प्रस्तावित इंफ्रास्ट्रक्चर सफलतापूर्वक विकसित हो जाता है और उद्योग इसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करता है, तो यह भारत के स्पेस स्टार्टअप्स के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन बन सकता है।

इससे स्थानीय स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ेगी, सप्लाई चेन और मजबूत होगी और आयात पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिलेगी। इस प्रोजेक्ट का एक और महत्वपूर्ण पहलू ISRO से जुड़ा हुआ है। जब निजी क्षेत्र के लिए अलग और समर्पित टेस्टिंग इकोसिस्टम तैयार होगा, तो ISRO की सुविधाओं पर दबाव धीरे-धीरे कम हो सकता है।

इससे ISRO अपने वैज्ञानिक शोध, अगली पीढ़ी की तकनीक, मानव अंतरिक्ष मिशन और अन्य उन्नत अभियानों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर सकेगा। यानी यह पहल सिर्फ निजी क्षेत्र की मदद नहीं करेगी, बल्कि पूरे भारतीय स्पेस इकोसिस्टम को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकती है। खोराज में बनने वाली कॉमन टेक्निकल फैसिलिटीज को सिर्फ एक नई लैब या सरकारी प्रोजेक्ट के रूप में देखना सही नहीं होगा।

यह भारत के स्पेस सेक्टर में हो रहे बड़े बदलाव का हिस्सा है, जिसमें सरकार, उद्योग, स्टार्टअप्स और वैज्ञानिक संस्थान मिलकर एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो आने वाले दशकों में भारत को वैश्विक स्पेस अर्थव्यवस्था में मजबूत स्थिति दिला सके। इसी वजह से खोराज का यह प्रोजेक्ट सिर्फ गुजरात ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय स्पेस सेक्टर के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

नोट: यह रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित लेख पर आधारित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।