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स्पेन-मोरक्को सीमा पर प्रवासियों की भारी घुसपैठ, भू-राजनीतिक दबाव में घिरे स्पेन के PM पेड्रो सांचेज: US के सामने न झुकने की चुका रहे कीमत? समझिए पूरा मामला

स्पेन के स्वायत्त एनक्लेव ‘सेउटा’ में मोरक्को की ओर से हजारों अवैध प्रवासियों (घुसपैठियों) की अचानक घुसपैठ ने एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय और मानवीय संकट खड़ा कर दिया है। महज 80,000 की आबादी वाले सेउटा में कुछ ही दिनों में 60,000 से अधिक घुसपैठिए सीमा पार कर दाखिल हो गए। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए स्पेनिश सेना तैनात की गई है और अधिकतर घुसपैठियों को वापस मोरक्को भेज दिया गया है।

दरअसल, मोरक्को की ओर से स्पेनिश एनक्लेव सेउटा और मेलिला में हजारों प्रवासियों के जबरन घुसने की कोशिशों ने न केवल यूरोपीय संघ की सुरक्षा दीवारों को चुनौती दी है, बल्कि मैड्रिड और रबात के बीच के कूटनीतिक संबंधों में मौजूद दरारों को भी उजागर कर दिया है।

सेउटा पर संकट का दायरा कितना बड़ा है?

सेउटा की कुल आबादी महज 80,000 के आसपास है। ऐसे में दो-तीन दिनों के भीतर ही 60,000 प्रवासियों का आ जाना इस क्षेत्र के ढांचे और संसाधनों के लिए एक गंभीर चुनौती बन गया है। घुसपैठ की चरम सीमा के दौरान हर मिनट करीब 200 घुसपैठिए समुद्र के रास्ते तैरकर या ब्रेकवाटर (समुद्री बाँध) पार करके सेउटा की सीमा में दाखिल हो रहे थे।

स्पेन के गृह मंत्रालय के अनुसार, स्थिति पर काबू पाने के प्रयासों के तहत लगभग 25,000 प्रवासियों को वापस मोरक्को भेज दिया गया है। इससे पहले मई 2021 में भी ऐसा संकट आया था, लेकिन तब प्रवासियों की संख्या 12,000 थी, जबकि इस बार का संकट उससे कई गुना बड़ा है।

इस अचानक बढ़ी घुसपैठ को लेकर मोरक्को के सुरक्षा बलों की भूमिका संदेह के घेरे में है। प्रवासन मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि मोरक्को की पुलिस और सहायक बल सीमाओं पर केवल मूकदर्शक बने रहे। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि इस घुसपैठियों को बाकायदा सेउटा की सीमा तक मोरक्को प्रशासन छोड़ रही है, जिसमें कुछ लोग जेलों से छोड़े गए कैदी भी हो सकते हैं।

बहरहाल, एएफपी न्यूज एजेंसी की मानें तो स्पेन के सेउटा में 60,000 से अधिक मोरक्कन लोगों ने घुसपैठ की थी, जिनमें से शनिवार रात तक अधिकतर लोगों को वापस मोरक्को भेज दिया गया है।

यह घटना केवल एक सामान्य प्रवासन समस्या नहीं है, बल्कि इसे स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज की सरकार पर राजनीतिक और कूटनीतिक दबाव बनाने के एक बड़े रणनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या मोरक्को अपनी सीमाओं की ढीली निगरानी को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है और क्या सांचेज प्रशासन अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की कीमत चुका रहा है।

सेउटा और मेलिला की स्थिति जानना जरूरी, कैसे मोरक्कन कर रहे हैं घुसपैठ

दरअसल, सीमा सुरक्षा में इस अचानक आई विफलता को समझने के लिए सेउटा और मेलिला की स्थिति को जानना आवश्यक है। ये दोनों शहर उत्तरी अफ्रीका के तट पर स्थित स्पेन के स्वायत्त क्षेत्र हैं, जो सीधे तौर पर मोरक्को से जमीनी सीमा साझा करते हैं। यूरोपीय संघ की मुख्यभूमि पर पहुँचने का यह सबसे सुगम रास्ता होने के कारण, हजारों अफ्रीकी प्रवासी यहाँ शरण लेने की कोशिश करते हैं।

मई 2021 में भी हुआ था ऐसा: आपको ये जानना भी जरूरी है कि मई 2021 में भी कुछ ऐसा ही हुआ था, जब कुछ ही दिनों के भीतर 12000 लोग सिउटा में घुस आए थे। इस बारे में सिउटा और मेलिला के अधिकारियों की रिपोर्ट के बाद हड़कंप मच गया था, जिसके बाद स्पेन सरकार ने कड़ा रुख अपनाया था। तब भी दोनों देशों में काफी तनातनी हुई थी, यानी स्पेन और मोरक्को के बीच।

मोरक्को की भूमिका पर खड़े हो रहे सवाल

इस अचानक बढ़ी घुसपैठ को लेकर मोरक्को के सुरक्षा बलों की भूमिका संदेह के घेरे में है। प्रवासन मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि मोरक्को की पुलिस और सहायक बल सीमाओं पर केवल मूकदर्शक बने रहे। मोरक्को की तरफ से तटीय क्षेत्रों में पुलिस का कड़ा पहरा होने के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में लोगों को स्पेनिश सीमा की ओर जाने दिया गया। बिना मोरक्को प्रशासन की ढील के इतनी भारी तादाद में लोगों का सीमा पार करना व्यावहारिक रूप से असंभव है।

अचानक क्यों बढ़ गई घुसपैठ?

विशेषज्ञों के अनुसार इस अभूतपूर्व संकट के कानूनी और राजनीतिक कारण भी हैं। जिसमें स्पेनिश सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला अहम साबित हो रहा है।

स्पेनिश सुप्रीम कोर्ट का फैसला: 8 जुलाई को स्पेन के उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, जिसके तहत समुद्र के रास्ते आने वाले किसी भी प्रवासी को बिना प्रशासनिक निष्कासन प्रक्रिया (Administrative Expulsion Procedure) शुरू किए तुरंत वापस नहीं भेजा जा सकता। इस फैसले ने प्रवासियों को कानूनी राहत मिलने की उम्मीद जगाई।

स्पेन सरकार द्वारा अवैध रूप से रह रहे लोगों को नियमित (रेगुलराइज) करने के कदमों और भविष्य में अप्रवासन नीति पर और सख्त सरकार आने की आशंकाओं ने भी प्रवासियों को जल्द से जल्द सीमा पार करने के लिए उकसाया।

सांचेत पर सत्ता छोड़ने का दबाव? आखिर कौन सा खेल खेल रहा है मोरक्को?

ऐतिहासिक रूप से मोरक्को अपनी सीमा पुलिस के जरिए इस भीड़ को नियंत्रित रखता है, लेकिन समय-समय पर मोरक्को की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा अचानक ढील दे दी जाती है। विश्लेषकों का मानना है कि मोरक्को जब भी स्पेन से किसी नीतिगत मुद्दे पर सहमत नहीं होता, तो वह सीमा नियंत्रण को ढीला कर प्रवासियों की भीड़ को स्पेनिश क्षेत्र में जाने देता है, कई सुरक्षा विशेषज्ञ इसे ‘हाइब्रिड वारफेयर’ या ‘Migration Weaponization’ की रणनीति के रूप में देखते हैं।

कई कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट का सबसे बड़ा कारण मोरक्को की राजनीतिक मंशा है। साल 1956 में आजादी मिलने के बाद से ही मोरक्को स्पेनिश एन्क्लेव सेउटा और मेलिला (Melilla) पर अपना संप्रभुता का दावा ठोकता रहा है, जिसे स्पेन सिरे से खारिज करता आया है। विश्लेषकों का आरोप है कि मोरक्को प्रवासन का इस्तेमाल स्पेन पर दबाव बनाने और इन शहरों के भविष्य पर बातचीत करने के लिए एक ‘कूटनीतिक हथियार’ के रूप में कर रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज हैं। सांचेज पर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोहरा दबाव है। विपक्षी दल पीपी (पीपुल्स पार्टी) और वॉक्स उन पर सीमा सुरक्षा में विफलता और कमजोर विदेश नीति का आरोप लगा रहे हैं। विपक्ष का दावा है कि मोरक्को के सामने सांचेज सरकार का नरम रुख ही इस तरह के संकटों को न्योता देता है।

दूसरी ओर सांचेज प्रशासन ने इस संकट को राष्ट्रीय संप्रभुता पर हमला करार दिया है। स्पेनिश सरकार ने सीमा पर सेना की तैनाती बढ़ा दी है और प्रवासियों को वापस भेजने की प्रक्रिया तेज कर दी है। इसके बावजूद मैड्रिड के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि यह संकट अनायास नहीं आया है, बल्कि इसे सांचेज को एक निश्चित कूटनीतिक रास्ते पर लाने के लिए रचा गया है।

क्या अमेरिका को ‘न’ कहना बना मुसीबत?

अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सांचेज अमेरिका की विदेश नीति से अलग राह चुनने की सजा भुगत रहे हैं। पश्चिमी सहारा के मुद्दे पर वाशिंगटन और रबात के बीच बनी सहमति के विपरीत सांचेज सरकार ने कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका से जुड़े मामलों में एक स्वतंत्र रुख अपनाया है। जब अमेरिका और उसके सहयोगियों ने इस क्षेत्र में अपने रणनीतिक हितों को साधने के लिए दबाव बनाया, तब सांचेज ने बहुपक्षवाद और अंतरराष्ट्रीय कानूनों की वकालत की।

इसके अलावा बीते सालों में स्पेन द्वारा अमेरिका की कुछ रणनीतिक नीतियों से असहमति जताने के बाद यह कूटनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि मोरक्को को वाशिंगटन का मौन समर्थन प्राप्त हो सकता है, जिससे वह स्पेन पर दबाव बनाने का दुस्साहस कर रहा है। वो कौन सी वजहे हैं जिन्हें इनसे जुड़ा माना जा सकता है?

हमास के खिलाफ इजरायल का विरोध: स्पेन ने अपने बंदरगाहों के इस्तेमाल से इजरायल को रोक दिया है। स्पेन का कहना है कि वो किसी भी लड़ाई में इजरायल का साथ नहीं देगा। यही नहीं, स्पेन ने फिलिस्तीन देश को भी मान्यता दे दी है। ऐसे में इजरायल का विरोध एक अहम पहलू है, जिसकी वजह से अमेरिका भी उसके खिलाफ खड़ा हो गया है।

अमेरिकी फाइटर जेट्स को कहा न: इजरायल को मना करने के साथ ही स्पेन ने ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका को भी झटका दिया है। नेटो का सदस्य होने के बावजूद स्पेन ने अमेरिकी फाइटर जेट्स को अपने बेस का इस्तेमाल करने से मना कर दिया है। स्पेन का कहना है कि हॉर्मुज की जंग उसकी खुद की नहीं है, इसलिए वो इस युद्ध में अमेरिका की मदद नहीं करेगा, क्योंकि अमेरिका ने ईरान पर हमले से पहले उसके साथ कोई सलाह मशविरा नहीं किया था।

हालाँकि अमेरिका ने यूरोप के साथ एकजुटता प्रदर्शित की है, लेकिन स्पेन सरकार पर सवाल भी उठाए हैं कि ये उसकी विफलता की वजह से हुआ है।

ऐतिहासिक रूप से भी आमने-सामने रहे हैं स्पेन-मोरक्को

पश्चिमी सहारा विवाद (मोरक्को से अलग हुआ हिस्सा) इस पूरे कूटनीतिक संघर्ष की सबसे अहम कड़ी है। मोरक्को इस क्षेत्र पर अपने पूर्ण अधिकार का दावा करता है, जबकि स्पेन ऐतिहासिक रूप से वहाँ के निवासियों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करता रहा है। अमेरिका द्वारा पश्चिमी सहारा पर मोरक्को के दावे को मान्यता दिए जाने के बाद मोरक्को चाहता था कि स्पेन और पूरा यूरोपीय संघ भी उसी नक्शेकदम पर चले। जब स्पेन ने तुरंत इस माँग के आगे घुटने नहीं टेके, तो सीमा पर प्रवासियों का संकट गहराने लगा।

सांचेज सरकार को यह भली-भांति एहसास है कि प्रवासियों का यह मुद्दा यूरोपीय संघ के भीतर भी स्पेन की स्थिति को असहज करता है, क्योंकि प्रवासन यूरोपीय राजनीति का सबसे संवेदनशील और विभाजनकारी विषय बन चुका है।

स्पेनिश गृह मंत्रालय और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के अनुसार, मोरक्को सीमा पर अचानक हजारों युवाओं और नाबालिगों का जमा होना बिना मोरक्को के सुरक्षा बलों की मौन सहमति या ढील के संभव नहीं है। प्रवासियों की इस भीड़ का इस्तेमाल स्पेन की अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सेवा और आंतरिक सुरक्षा पर तात्कालिक बोझ डालने के लिए किया गया है।

स्पेन ने यूरोपीय संघ से अपील की है कि वह इसे केवल स्पेन का संकट न मानकर पूरे यूरोप की बाहरी सीमा पर हुआ अतिक्रमण माने। ब्रसेल्स (यूरोपीय संघ का मुख्यालय) ने स्पेन को अपनी सीमा सुरक्षा के लिए पूर्ण सहयोग और अतिरिक्त बजटीय सहायता देने का वादा किया है, लेकिन जमीनी हकीकत बदलने में समय लग रहा है।

इस गंभीर स्थिति पर स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कहा, “स्पेन अपनी सीमाओं की अखंडता और अपने नागरिकों की सुरक्षा के साथ किसी भी सूरत में समझौता नहीं करेगा। सेउटा और मेलिला केवल स्पेन का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे यूरोप की बाहरी सीमाएँ हैं। हम इस मानवीय स्थिति का राजनीतिक इस्तेमाल करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं करेंगे और अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएँगे।”

इसके साथ ही सांचेत ने उन आलोचकों को भी जवाब दिया, जिसमें स्पेन की तरफ से घुसपैठियों को छूट मिलने की बात कही जाती रही है। सांचेत ने अपने ट्वीट में आँकड़े देते हुए बताया कि 2021 से 2026 के बीच यूरोप में इटली के रास्ते 4,78,600 घुसपैठियों ने घुसपैठ की। बाल्कान इलाकों से 3,40,600 घुसपैठ हुई। ग्रीस से 2,59,800 घुसपैठ तो स्पेन से 2,34,760 लोगों ने घुसपैठ क। वहीं पूरी सीमाओं से 48,000 लोग यूरोप में आए। उन्होंने यूरोप से अपील की कि ये समय बँटने का नहीं है, बल्कि एकजुट होकर मुकाबला करने का है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच ईयू कमीशन की प्रेसिडेंट उर्जुला वो डेर लेयेन ने भी कई बड़े कदम उठाने की घोषणा की। उन्होंने 2 कमीशन बनाते हुए इस स्थिति से निपटने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने सिउटा के हालात को अनएक्सेप्टेबल करार दिया।

यूरोपीय संघ के कूटनीतिक मामलों के प्रतिनिधियों ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। यूरोपीय आयोग के वरिष्ठ अधिकारी ने बयान जारी करते हुए कहा, “यूरोपीय संघ स्पेन के साथ पूरी एकजुटता से खड़ा है। स्पेन की सीमाएँ यूरोप की सीमाएँ हैं और हम प्रवासन के मुद्दे को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की किसी भी कोशिश की निंदा करते हैं। मोरक्को को एक जिम्मेदार पड़ोसी की तरह अपनी सीमाओं का प्रबंधन करना होगा और यूरोपीय संघ के साथ हुए सुरक्षा समझौतों का सम्मान करना होगा।”

फिलहाल सेउटा की स्थिति गंभीर बनी हुई है। स्पेनिश विशेषज्ञों का कहना है कि मोरक्को के इस क्षेत्रीय दावे और सीमा पर ढिलाई के रवैये का मुकाबला करने के लिए स्पेन को इसे केवल अपना नहीं, बल्कि पूरे यूरोपीय संघ का मुद्दा बनाना होगा। यूरोपीय संघ के स्तर पर कड़े जवाबी कदम उठाकर ही मोरक्को पर दबाव बनाया जा सकता है और सीमा पर जारी इस मानवीय और सुरक्षा संकट को रोका जा सकता है। अगर सांचेज इस संकट को कूटनीतिक बुद्धिमत्ता से हल नहीं कर पाते हैं, तो इसका असर न केवल स्पेन की आंतरिक राजनीति और उनकी सरकार के भविष्य पर पड़ेगा, बल्कि यह यूरोपीय संघ के उत्तरी अफ्रीका के साथ संबंधों की भावी दिशा भी तय करेगा।

सूखे चावल-रोटी खाकर पेपर लीक के खिलाफ लड़ रहे झारखंड के छात्र, परीक्षा गड़बड़ियों को लेकर हजारों का प्रदर्शन: इन युवाओं से CJP ने क्यों मोड़ा मुँह?

झारखंड में छात्रों का बड़ा आंदोलन देखने को मिल रहा है। राज्य में बार-बार पेपर लीक होने, जिम्मेदारी तय नहीं किए जाने और परीक्षाओं में हो रही देरी के खिलाफ हजारों छात्र सड़कों पर उतर आए हैं। राज्य में बार-बार हो रही अनियमितताओं, खासकर झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की परीक्षाओं को लेकर छात्रों में लंबे समय से नाराजगी बढ़ रही है।

मौजूदा विरोध प्रदर्शन की शुरुआत इस साल की शुरुआत में हुए JPSC पेपर लीक के बाद हुई। JPSC परीक्षा पेपर लीक मामले में कुल 11 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इस मामले के बाद JPSC के चेयरमैन लालबियाक्तलुआंगा (एल.) खियांग्ते ने इस्तीफा दे दिया था। CID उनसे JPSC परीक्षा में हुई अनियमितताओं को लेकर पूछताछ कर रही है।

मौजूदा विरोध प्रदर्शन 25 जुलाई को राजधानी राँची से शुरू हुआ और जल्द ही राज्य के करीब 24 जिलों तक फैल गया। प्रदर्शन कर रहे छात्रों की माँग है कि जिम्मेदारी तय की जाए, भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी हो और शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधार किए जाएँ। राँची का जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम इस प्रदर्शन का मुख्य केंद्र बना हुआ है।

29 जुलाई को आंदोलन के आयोजकों ने ‘महाआंदोलन’ का ऐलान किया और छात्रों से अपील की कि वे राज्य के हर जिले से राजधानी तक संविधान मार्च निकालें। इस अपील के बाद करीब 5,000 छात्र राँची में सड़कों पर उतरे। छात्रों ने हाथों में भारतीय संविधान की प्रतियाँ और तिरंगा लेकर शांतिपूर्वक मार्च किया। प्रदर्शनकारियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए प्रशासन ने पूरे शहर में सुरक्षा बढ़ा दी है। प्रदर्शन स्थल के आसपास कई जगहों पर बैरिकेड्स भी लगाए गए हैं।

परीक्षाओं में बार-बार हो रही गड़बड़ियों से छात्रों में नाराजगी

झारखंड के छात्र लंबे समय से राज्य में होने वाली कई भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं का सामना कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर छात्र मध्यम वर्ग और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों से आते हैं। इन परिवारों के लिए सरकारी नौकरी सिर्फ कमाई का जरिया नहीं बल्कि खुद और अपने परिवार की स्थिति बेहतर करने की उम्मीद भी होती है।

हाल के समय में राज्य में JSSC CGL, JPSC संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा, एक्साइज कॉन्स्टेबल भर्ती परीक्षा, JAC कक्षा 10वीं बोर्ड परीक्षा और NEET UG समेत कई परीक्षाओं में अनियमितता, पेपर लीक, सुरक्षा से जुड़ी चिंताएँ और धोखाधड़ी के आरोप सामने आए हैं।

2023 में JSSC CGL परीक्षा को लेकर बड़ा विवाद हुआ था। पेपर लीक होने के बाद इस परीक्षा को रद्द करना पड़ा था। मामला हाई कोर्ट तक पहुँचा, जिसके बाद दोबारा परीक्षा कराई गई। इस मामले में CID जाँच भी शुरू की गई थी।

इसी तरह JAC की कक्षा 10वीं की बोर्ड परीक्षा भी विवादों में आई थी। हिंदी और विज्ञान के पेपर सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद दोनों परीक्षाओं को रद्द कर दोबारा आयोजित किया गया। बाद में NEET UG पेपर लीक मामले की भी जाँच शुरू की गई।

ये उन कई परीक्षाओं में से कुछ उदाहरण हैं जिनमें किसी न किसी तरह की अनियमितता सामने आई। इन परीक्षाओं में शामिल होने वाले छात्रों का अब धैर्य जवाब दे चुका है और वे जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ शिक्षा और भर्ती व्यवस्था में सुधार की माँग कर रहे हैं।

छात्रों के समर्थन में उतरी BJP

झारखंड में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के समर्थन में BJP भी सामने आई है। शुक्रवार (31 जुलाई 2026) को पेपर लीक के मुद्दे पर बोलते हुए BJP के प्रदेश अध्यक्ष आदित्य प्रसाद साहू ने राज्य में छात्रों के आंदोलन को लेकर कॉन्ग्रेस पर दोहरे रवैये का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी केंद्र सरकार के खिलाफ छात्रों के प्रदर्शन का खुलकर समर्थन करती है लेकिन झारखंड में इसी तरह के प्रदर्शन को लेकर चुप्पी साधे हुए है।

साहू ने कहा, “जब से कॉन्ग्रेस के समर्थन से झारखंड में सरकार चल रही है, तब से JPSC और JSSC-CGL समेत कई परीक्षाओं से पहले बड़े स्तर पर प्रश्नपत्र लीक हुए हैं। इस बार भी JPSC और JSSC-CGL परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक हुए लेकिन वहाँ की सरकार गहरी नींद में सोई हुई है।”

BJP प्रदेश अध्यक्ष ने कॉन्ग्रेस के समर्थन वाली झारखंड सरकार पर परीक्षा से जुड़े घोटालों में मिलीभगत का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस के समर्थन वाली सरकार ऐसे घोटालों में सीधे तौर पर शामिल है और वह युवाओं से रोजगार के अवसर छीन रही है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि कॉन्ग्रेस पार्टी दिल्ली में प्रदर्शन कर रही है लेकिन झारखंड में कॉन्ग्रेस के नेता चुप्पी साधे हुए हैं।”

BJP ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के इस्तीफे की माँग की है। पार्टी का कहना है कि परीक्षाओं में बार-बार हो रही अनियमितताओं पर कार्रवाई करने में हेमंत सोरेन सरकार की विफलता के कारण जनता का उन पर भरोसा कम हुआ है।

CJP और विपक्ष दोनों आंदोलन से गायब

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक को लेकर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया था। इस पेपर लीक के बाद धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। लेकिन झारखंड में छात्रों के चल रहे आंदोलन से CJP गायब है। झारखंड में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP), ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) और आदिवासी छात्र संघ (ACS) समेत अलग-अलग छात्र संगठनों के सदस्य प्रदर्शन में शामिल हुए हैं लेकिन CJP ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है।

झारखंड में हो रहे प्रदर्शन का एक वीडियो CJP के जंतर-मंतर प्रदर्शन से बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाता है। इस वीडियो में प्रदर्शनकारी सिर्फ सादा चावल और रोटी खाते हुए दिखाई दे रहे हैं। प्रदर्शन में शामिल रहते हुए वे पिछले 3 दिनों से यही साधारण खाना खा रहे हैं। इसके उलट, जंतर-मंतर पर हुआ CJP का प्रदर्शन एक तरह से फूड फेस्ट बन गया था। वहाँ अलग-अलग संगठनों और समूहों की ओर से लगातार नाश्ता और खाना परोसा जा रहा था। कुछ लोग तो प्रदर्शन स्थल पर सिर्फ मुफ्त में बाँटी जा रही बिरयानी, पिज्जा और इस तरह के दूसरे खाने को खाने के लिए भी पहुँचे थे।

जंतर-मंतर पर कुछ समूहों ने सामुदायिक रसोई और लंगर लगाए थे जबकि कुछ दूसरे लोग अपने घर का बना हुआ खाना लेकर आए थे। इतना ही नहीं, दिल्ली से बाहर और यहाँ तक कि भारत से बाहर रहने वाले लोगों ने भी फूड डिलीवरी सेवाओं के जरिए प्रदर्शन स्थल पर खाना भिजवाया था। यानी CJP के प्रदर्शन के दौरान खाना भरपूर मात्रा में उपलब्ध था जबकि झारखंड में प्रदर्शन कर रहे छात्र खाने के लिए परेशान हैं और उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं है।

NEET पेपर लीक मामले में केंद्र के खिलाफ प्रदर्शन करने के मामले में CJP का रवैया साफ तौर पर पक्षपाती रहा है, उन्होंने झारखंड के उन छात्रों का समर्थन नहीं किया है जो इसी तरह के मुद्दे पर विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। परीक्षाओं में अनियमितता का मुद्दा पूरे देश में रहा है लेकिन NEET पेपर लीक को लेकर छात्रों के गुस्से के सहारे खुद को छात्रों की पार्टी के तौर पर पेश करने वाली CJP ने झारखंड के छात्रों की परेशानी से पूरी तरह आँखें मूंद ली हैं। वहीं, जिन विपक्षी दलों ने जंतर-मंतर पर CJP के प्रदर्शन का खुलकर समर्थन किया था, वे भी झारखंड की स्थिति पर सुविधाजनक तरीके से चुप्पी साधे हुए हैं।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

CWG 2026 की मेडल टैली में क्यों पिछड़ा भारत, शूटिंग-रेसलिंग जैसे खेलों के हटने से कितने बदले समीकरण: जानिए कैसे बॉक्सर देश को दिला सकते हैं टॉप 5 में जगह

ग्लासगो में आयोजित हो रहे राष्ट्रमंडल खेल 2026 (Commonwealth Games 2026) के इस संस्करण में भारतीय खेल प्रेमियों के लिए शुरुआती चरण थोड़ा चिंताजनक नजर आ रहा है। मेडल टैली में भारत की वर्तमान स्थिति को लेकर खेल गलियारों में गंभीर चर्चा शुरू हो गई है। पारंपरिक रूप से भारत जिन स्पर्धाओं में सबसे अधिक पदक बटोरता रहा है, इस बार उन खेलों की अनुपस्थिति या भारी कटौती ने सीधे तौर पर देश की पदक तालिका को प्रभावित किया है। हालाँकि इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारतीय दल के पास अब भी टॉप 5 में अपनी जगह पक्की करने का एक बेहद सुनहरा मौका बना हुआ है।

भारत के पसंदीदा खेलों के बाहर से पड़ा मुख्य अंतर

दरअसल, इस बार मेडल टैली में भारत के नीचे खिसकने का सबसे बड़ा और प्रमुख कारण कुछ विशेष खेलों का इस आयोजन से बाहर होना है। पिछले कई संस्करणों में भारत की झोली में सबसे अधिक पदक शूटिंग (निशानेबाजी) और कुश्ती जैसे खेलों से आते रहे हैं। लेकिन 2026 के इस संस्करण के संशोधित कार्यक्रम से इन दोनों ही प्रमुख स्पर्धाओं को पूरी तरह हटा दिया गया है।

आँकड़े गवाही देते हैं कि पिछले राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने अकेले शूटिंग और कुश्ती से रिकॉर्ड तोड़ पदक जीते थे। इन खेलों के हटने से भारत के लगभग 25 से 30 पदकों का सीधा नुकसान हुआ है, जिसने पूरी तालिका के गणित को पूरी तरह से बिगाड़ कर रख दिया है।

इस बार क्यों हुआ कम खेलों का आयोजन?

इसकी सबसे बड़ी वजह है ग्लास्गो का राष्ट्रमंडल खेल 2026 (CWG 2026) के लिए मेजबान शहर का चयन एक बहुत बड़े संकट और आखिरी समय के अप्रत्याशित घटनाक्रम का नतीजा। दरअसल, मूल रूप से राष्ट्रमंडल खेल 2026 की मेजबानी ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया (Victoria) राज्य को दी गई थी। लेकिन जुलाई 2023 में विक्टोरिया के तत्कालीन प्रीमियर ने यह कहते हुए अचानक मेजबानी से अपने हाथ खींच लिए कि खेलों के आयोजन का अनुमानित खर्च बेहद ज्यादा बढ़ गया है।

शुरुआत में इसका बजट लगभग $2.6 बिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तय किया गया था, जो बढ़कर $6 से $7 बिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक पहुँच गया था। इतने बड़े आर्थिक बोझ को उठाने से विक्टोरिया के मना करने के बाद राष्ट्रमंडल खेलों के अस्तित्व पर ही संकट के बादल मंडराने लगे और कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन (CGF) को आपातकालीन स्थिति में नया मेजबान तलाशना पड़ा।

ग्लाग्सो ने बचाया इस बार का राष्ट्रमंडल खेल

खेलों को रद्द होने से बचाने के लिए स्कॉटलैंड के ग्लास्गो (Glasgow) शहर ने बेहद कम समय में एक अनोखा और किफायती प्रस्ताव सामने रखा। जिसमें ग्लास्गो (जिसने 2014 में भी CWG की सफल मेजबानी की थी) ने स्पष्ट किया कि वह खेलों को रद्द होने से बचाने के लिए एक ‘डाउनसाइज्ड’ (किफायती) मॉडल पर काम करेगा। इसके लिए खेलों को केवल लगभग 114 मिलियन पाउंड के सीमित बजट में पूरा करने का खाका तैयार किया गया। इसमें ऑस्ट्रेलिया द्वारा विक्टोरिया अनुबंध तोड़ने के एवज में दिए गए मुआवजे के 100 मिलियन पाउंड शामिल थे, जिससे स्थानीय करदाताओं पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ा।

ग्लास्गो ने खेलों का दायरा घटाकर केवल 10 मुख्य स्पर्धाओं तक सीमित कर दिया और नए स्टेडियम बनाने के बजाय अपने मौजूदा खेल परिसरों का इस्तेमाल करने का फैसला लिया। इसके बाद सितंबर 2024 में स्कॉटिश सरकार की मंजूरी मिलने के बाद CGF ने आधिकारिक तौर पर ग्लास्गो को CWG 2026 का नया मेजबान घोषित कर दिया।

भारत ने 2010 के आयोजन के लिए खर्च की थी भारी रकम

भारत की मेजबानी में दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों (CWG 2010) में 21 खेलों की 272 प्रतिस्पर्धाएँ थी। इसमें 4352 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था। इन खेलों के आयोजन में भारत सरकार ने जमकर पैसे खर्च किए थे और एक तरह से दिल्ली को नए सिरे से संवारा गया था। खेल आयोजन के लिए निर्माण के साथ ही रोड-फ्लाईओवर, खेल गाँव तक के निर्माण पर जमकर पैसे खर्च किए गए थे।

भारत ने इन मुकाबलों में 38 स्वर्ण समेत 101 मेडल जीते थे और ऑस्ट्रेलिया के बाद दूसरे नंबर पर रहा था। जो अब तक का भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा है। अभी पिछले राष्ट्रमंडल खेलों (बर्मिंघम) में भारत 22 स्वर्ण समेत कुल 61 पदकों के साथ चौथे नंबर पर रहा था।

इसके मुकाबले ग्लास्गो में सिर्फ 10 खेलों में 215 प्रतिस्पर्धाएँ ही हैं। खिलाड़ियों की संख्या भी महज 2729 तक ही सीमित है। ग्लास्गो ने इन गेम्स के लिए कोई अलग तैयारी नहीं की है और न ही किसी तरह का खेल गाँव बनाया है। यूनिवर्सिटी के हॉस्टल्स और होटल्स को अस्थाई तौर पर एथलीटों के लिए उपलब्ध कराया गया है। यही नहीं, भारत के लिए सबसे ज्यादा पदक देने वाले कुश्ती और निशानेबाजी जैसी प्रतिस्पर्धा पूरी तरह से इस बार के CWG से बाहर हैं।

भारतीय दल के वर्तमान हालात और आगामी संभावनाओं पर बात करते हुए भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपने बयान में कहा, “हम अच्छी तरह जानते हैं कि शूटिंग और कुश्ती के न होने से हमारे पदकों की संख्या पर असर पड़ा है, लेकिन हमारे खिलाड़ियों का हौसला जरा भी कम नहीं हुआ है। ग्लास्गो का मॉडल अलग है, पर हमारे मुक्केबाज और भारोत्तोलक जिस तरह का प्रदर्शन कर रहे हैं, हमें पूरा यकीन है कि हम अंतिम दिनों में पदक तालिका में एक बड़ी छलांग लगाएँगे और शीर्ष 5 में अपनी जगह पक्की करेंगे।”

CWG 2026 में कैसी है पदक तालिका?

पदक तालिका की मौजूदा स्थिति की बात करें तो ऑस्ट्रेलिया 55 स्वर्ण पदकों के साथ सबसे आगे शीर्ष पर बना हुआ है। 18 स्वर्ण पदकों के साथ ब्रिटेन दूसरे, 17 स्वर्ण के साथ कनाडा तीसरे, मेजबान स्कॉटलैंड 10 स्वर्ण पदकों के साथ चौथे और नाइजीरिया 9 स्वर्ण पदकों के साथ पाँचवें नंबर पर है।

भारत इस समय 5 स्वर्ण, 12 रजत और 6 कांस्य समेत कुल 23 पदकों के साथ 10वें नंबर पर बना हुआ है। भारत से आगे 9वें नंबर पर वेल्स (6 स्वर्ण), 8वें पर मलेशिया (7 स्वर्ण), 7वें पर दक्षिण अफ्रीका (7 स्वर्ण) और 6ठे नंबर पर 7 ही स्वर्ण पदकों के साथ न्यूजीलैंड मौजूद है।

हालाँकि 1 अगस्त का दिन इन राष्ट्रमंडल खेलों में पदक के लिहाज से भारत के लिए सबसे अहम दिन साबित होने जा रहा है। भारत के 10 मुक्केबाज कम से कम रजत पदक पक्का कर चुके हैं और रिंग में उतरेंगे। अब देखना यह होगा कि इन 10 में से कितने खिलाड़ी गोल्ड मेडल में इसे बदलते हैं, जिसकी संभावनाएँ सर्वाधिक नजर आ रही हैं।

क्योंकि ये 10 पदक बॉक्सिंग में हैं और इंडियन बॉक्सर इस समय अपने सर्वश्रेष्ठ फॉर्म में भी हैं और बिना किसी खास चुनौती के फाइनल तक पहुँचने में सफल रहे हैं। यदि इन 10 फाइनल मुकाबलों में से भारत 5 स्वर्ण पदक भी जीतने में कामयाब रहता है, तो CWG 2026 में भारत के स्वर्ण पदकों की संख्या 10 हो जाएगी, जो उसे सीधे तौर पर मेडल टैली में टॉप 4 या टॉप 5 की रेस में ला खड़ा करेगी। मौजूदा समय में भारत ने 5 स्वर्ण, 12 रजत और 6 कांस्य समेत 23 पदक जीते हैं।

भारतीय मुक्केबाजी टीम के मुख्य कोच ने मुक्केबाजों की तैयारी पर अपना पूरा भरोसा जताते हुए अपने बयान में कहा, “हमारे सभी 10 रिंग योद्धा पूरी तरह से शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार हैं। उन्होंने फाइनल तक के सफर में जिस तरह का दबदबा दिखाया है, उससे देश को कई स्वर्ण पदक मिलने तय हैं। यह शनिवार भारतीय खेलों के लिए एक ऐतिहासिक दिन साबित होगा और हम पदक तालिका का पूरा गणित बदल कर रख देंगे।”

टॉप 5 में जगह बनाना लक्ष्य, भविष्य के लिए मिले काफी सबक

बहरहाल, देखा जाए तो राष्ट्रमंडल खेल 2026 का यह डाउनसाइज्ड संस्करण भारतीय खेल प्रशासन के लिए एक बड़ा सबक होने के साथ-साथ हमारी नई खेल प्रतिभाओं को परखने की एक बेहतरीन कसौटी भी साबित हो रहा है। निशानेबाजी और कुश्ती जैसी पारंपरिक स्पर्धाओं की अनुपस्थिति में भी भारतीय एथलीटों ने जिस निडरता और प्रतिबद्धता का परिचय दिया है, वह यह साफ दर्शाता है कि भारतीय खेलों का भविष्य सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। प्रतिकूल परिस्थितियों और अंतिम समय में बदले गए नियमों के बावजूद खिलाड़ियों का यह जज्बा साबित करता है कि भारतीय दल केवल परिस्थितियों के भरोसे रहने के बजाय हर चुनौती को अवसर में बदलने का हुनर रखता है।

आने वाले अंतिम मुकाबले और मुक्केबाजी के फाइनल दौर भारतीय प्रशंसकों के उत्साह को चरम पर पहुँचाने वाले हैं। रिंग में हमारे एथलीटों का आक्रामक फॉर्म, युवा खिलाड़ियों की बेफिक्र सोच और जुझारूपन इस बात की गवाही दे रहा है कि भारत इस प्रतियोगिता का समापन शानदार तरीके से करेगा। पूरी उम्मीद है कि भारतीय दल इन बाधाओं को पछाड़ते हुए अंतिम दिनों में पदकों की झड़ी लगाएगा, न केवल मेडल टैली के टॉप 5 में अपनी जगह पक्की करेगा, बल्कि वैश्विक मंच पर तिरंगे का परचम लहराकर देश को एक बार फिर से गौरवान्वित होने का ऐतिहासिक अवसर देगा।

कौन हैं अल्लूरी सीताराम राजू, जिनके नाम पर आंध्र में PM मोदी ने किया एयरपोर्ट का उद्घाटन: अंग्रेजों को हमले की तारीख पहले बताते थे, फिर भी नहीं रोक पाती थी ब्रिटिश फौज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (1 अगस्त 2026) को आंध्र प्रदेश के विजयनगरम जिले के भोगपुरम में अनेक महत्वाकांक्षी परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया। इस अवसर पर पीएम मोदी ने भोगपुरम में निर्मित अत्याधुनिक अल्लूरी सीताराम राजू अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के विशाल और आधुनिक पैसेंजर टर्मिनल भवन का औपचारिक उद्घाटन किया।

इसके साथ ही उन्होंने 17,900 करोड़ रुपए से अधिक की विभिन्न विकास परियोजनाओं को राष्ट्र को समर्पित किया। प्रधानमंत्री का यह दौरा केवल एक हवाई अड्डे के उद्घाटन तक सीमित नहीं था, बल्कि यह राज्य में आधुनिक बुनियादी ढाँचे का विस्तार करने की दिशा में उठाया गया दूरगामी कदम है।

इस पूरे आयोजन ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान और अमर जनजातीय नायक अल्लूरी सीताराम राजू के बलिदान को एक राष्ट्रीय स्तर का सम्मान भी प्रदान किया है, जिनके नाम पर इस आधुनिक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नामकरण किया गया है।

जनसभा को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “हमने अयोध्या में एयरपोर्ट का नाम वाल्मीकि के नाम से जोड़ा। हमने पंजाब में संत रविदास जी के नाम से एयरपोर्ट का नाम जोड़ा और केंद्र की NDA सरकार ने ये निर्णय किया है कि इस नए एयरपोर्ट का नाम श्री अल्लूरी सीताराम राजू के नाम पर होगा।”

आंध्र प्रदेश को मिली विकास परियोजनाओं की ऐतिहासिक सौगात

प्रधानमंत्री के इस ऐतिहासिक दौरे से आंध्र प्रदेश के इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक परिदृश्य को भी मजबूती मिली है। भोगपुरम में ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे का उद्घाटन करने के साथ-साथ पीएम ने राज्य में प्रौद्योगिकी और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी कई बड़ी परियोजनाओं की आधारशिला रखी और कई पूर्ण हो चुकी परियोजनाओं का लोकार्पण किया।

इनमें सबसे प्रमुख परियोजनाओं में से एक विशाखापत्तनम में 460 करोड़ रुपए से अधिक के भारी निवेश से स्थापित की जा रही राज्य की पहली सेमीकंडक्टर विनिर्माण सुविधा (ASIP Semiconductor Project) की आधारशिला रखना है।

इस अत्याधुनिक संयंत्र का विकास ASIP टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दक्षिण कोरिया की प्रतिष्ठित कंपनी APACT के साथ साझेदारी में किया जा रहा है। भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत स्वीकृत यह संयंत्र प्रतिवर्ष लगभग 96 मिलियन सेमीकंडक्टर चिप्स का उत्पादन करेगा, जो भारत की इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण आत्मनिर्भरता को बल देगा।

इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री ने कुरनूल-IV नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र के एकीकरण के लिए 4.5 गीगावाट की क्षमता वाली ट्रांसमिशन प्रणाली की आधारशिला रखी, जिसका कार्यान्वयन पावरग्रिड द्वारा लगभग 5,550 करोड़ रुपए के निवेश से किया जा रहा है।

इसके साथ ही लगभग 3,550 करोड़ रुपए की लागत से विकसित कुरनूल पवन व सौर ऊर्जा क्षेत्र तथा 820 करोड़ रुपए से अधिक की लागत से निर्मित अनंतपुरम और कुरनूल सौर ऊर्जा क्षेत्रों के लिए ट्रांसमिशन योजनाओं का भी उद्घाटन किया गया।

ये विशाल ट्रांसमिशन लाइनें आंध्र प्रदेश के दूरदराज क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाली विशाल हरित और स्वच्छ बिजली को सीधे राष्ट्रीय ग्रिड से जोड़ेंगी, जिससे देश भर के माँग केंद्रों तक स्वच्छ ऊर्जा पहुँचेगी और भारत के कार्बन उत्सर्जन कम करने के वैश्विक संकल्प को एक नई दिशा और गति मिलेगी।

भोगपुरम हवाई अड्डे की अत्याधुनिक तकनीक और सुविधाएँ

सार्वजनिक-निजी भागीदारी यानी PPP मॉडल के तहत 5,640 करोड़ रुपए से भी अधिक की लागत से बना भोगपुरम का यह नया ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा आधुनिक तकनीक का एक बेहतरीन नमूना है। शुरुआत में इस हवाई अड्डे को हर साल 60 लाख यात्रियों की आवाजाही को आसानी से संभालने के हिसाब से तैयार किया गया है।

भविष्य में जैसे-जैसे यात्रियों की संख्या बढ़ेगी, इसे और बड़ा किया जा सकेगा। इस हवाई अड्डे के पैसेंजर टर्मिनल भवन को इस तरह से बनाया गया है कि यहाँ आने वाले हर यात्री को एक बेहद आसान, तेज और आरामदायक यात्रा का अनुभव मिले।

हवाई अड्डे के काम-काज को बेहतर और तेज बनाने के लिए यहाँ कई आधुनिक डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। इनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बिल्डिंग इंफॉर्मेशन मॉडलिंग, एयरसाइड 4.0 तकनीक और एयरपोर्ट प्रेडिक्टिव ऑपरेशंस सेंटर जैसी प्रणालियाँ शामिल हैं।

यात्रियों को लंबी लाइनों से बचाने और उनकी सुरक्षा के लिए चेहरे की पहचान वाली बायोमेट्रिक एंट्री यानी डिजियात्रा सिस्टम, अपने आप बैग संभालने वाला ऑटोमेटेड बैगेज सिस्टम और स्मार्ट मॉनिटरिंग सिस्टम लगाए गए हैं। तकनीक के साथ-साथ यह हवाई अड्डा पर्यावरण का ध्यान रखने में भी बहुत आगे है।

इसे हरित भवन यानी ग्रीन बिल्डिंग के मानकों के अनुसार डिजाइन किया गया है और यह यूएस ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल में रजिस्टर्ड है। हवाई अड्डा परिसर की बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए यहाँ 5 मेगावाट का एक बड़ा सौर ऊर्जा प्लांट लगाया गया है।

इसके अलावा कम बिजली खर्च करने वाले कूलिंग सिस्टम, स्मार्ट लाइटिंग, बारिश के पानी को बचाने का सिस्टम, गंदे पानी को साफ करके दोबारा इस्तेमाल करने की सुविधा और इलेक्ट्रिक गाड़ियों के लिए चार्जिंग स्टेशन बनाए गए हैं, जो इसे देश के सबसे पर्यावरण-अनुकूल हवाई अड्डों में से एक बनाते हैं।

स्थानीय संस्कृति, प्रकृति और वास्तुकला का अनूठा संगम

भोगपुरम में बने अल्लूरी सीताराम राजू अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का डिजाइन सिर्फ काँच और कंक्रीट से बनी कोई साधारण इमारत नहीं है बल्कि इसमें आंध्र प्रदेश की पुरानी संस्कृति, लोक कला और प्रकृति की सुंदर झलक देखने को मिलती है।

इस हवाई अड्डे के पैसेंजर टर्मिनल भवन को इस तरह से बनाया गया है कि यहाँ आते ही लोगों को आंध्र प्रदेश की पहचान और खूबसूरती का अहसास हो जाए। इस इमारत की छत की बनावट आंध्र प्रदेश के तटीय गाँवों में पाई जाने वाली पुरानी गोल झोपड़ियों यानी ‘चुट्टिलू’ की शैली से ली गई है, जो हमारी लोक कला को एक बड़े मंच पर दिखाती है।

इसके अलावा छत का घूमता हुआ और लहरदार डिजाइन पास में मौजूद खूबसूरत अरकु घाटी की पहाड़ियों और हरे-भरे नजारों की याद दिलाता है। इस पूरी इमारत का आकार पानी के ऊपर हवा में छलांग लगाती हुई ‘उड़ती हुई मछली’ यानी फ्लाइंग फिश की सुंदर चाल से प्रेरित है।

आधुनिक तकनीक और अपनी पुरानी संस्कृति के इस अनोखे तालमेल ने भोगपुरम हवाई अड्डे को सिर्फ एक एयरपोर्ट नहीं, बल्कि पूरे आंध्र प्रदेश की कला और पहचान का एक बड़ा और सुंदर प्रतीक बना दिया है, जो यहाँ आने वाले हर यात्री का मन मोह लेता है।

स्वतंत्रता संग्राम के अमर नायक अल्लूरी सीताराम राजू का ऐतिहासिक योगदान

इस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नामकरण जिस महान विभूति के नाम पर किया गया है, वे भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अमर नायक अल्लूरी सीताराम राजू हैं। 4 जुलाई 1897 को जन्मे अल्लूरी सीताराम राजू ने अंग्रेजी हुकूमत के जुल्मों के खिलाफ आंध्र प्रदेश के जंगलों और पहाड़ियों में क्रांति का अलख जगाया था।

जब ब्रिटिश सरकार ने 1882 में ‘मद्रास फॉरेस्ट एक्ट’ लागू करके जनजातीयों के जंगलों में रहने, खेती करने और लघु वन उपज इकट्ठा करने के सदियों पुराने पारंपरिक अधिकारों को छीन लिया, तब अल्लूरी सीताराम राजू जनजातीयों के मसीहा बनकर उभरे।

उन्होंने स्थानीय जनजातियों को संगठित किया और उनके हक की लड़ाई लड़ी। रंपा और मान्यम क्षेत्र के जनजातीय उनसे इतना प्रेम और सम्मान करते थे कि वे उन्हें श्रद्धापूर्वक ‘मान्यम वीरुडु’ यानी ‘जंगलों का नायक’ कहकर पुकारते थे।

रंपा विद्रोह और अंग्रेजों के खिलाफ अनोखा गोरिल्ला युद्ध

वर्ष 1922 से 1924 के बीच लड़ा गया ऐतिहासिक रंपा विद्रोह अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ सशस्त्र क्रांति का एक स्वर्ण अध्याय है। विशाल ब्रिटिश सेना और उनके आधुनिक हथियारों का मुकाबला करने के लिए राजू और उनके जनजातीय साथियों ने आंध्र के घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों का सहारा लेते हुए गोरिल्ला युद्ध नीति अपनाई।

उन्होंने पारंपरिक धनुष-बाण, भालों और सीमित संसाधनों के बल पर अंग्रेजी सेना के पसीने छुड़ा दिए। अल्लूरी सीताराम राजू की एक बेहद अनोखी और साहसी कार्यशैली यह थी कि वे जिस किसी ब्रिटिश पुलिस स्टेशन पर हमला कर हथियार जब्त करने वाले होते थे, वहाँ पहले से एक लिखित पत्र भेजकर हमले की तारीख और समय की अग्रिम चेतावनी देते थे।

इसके बावजूद अंग्रेज अफसर उन्हें रोक पाने में नाकाम रहते थे। लगभग दो वर्षों तक अल्लूरी सीताराम राजू ने मुट्ठी भर जनजातीय वीरों के साथ मिलकर शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य की पुलिस और असम राइफल्स जैसी प्रशिक्षित सैन्य टुकड़ियों को नाकों चने चबवा दिए।

अंततः मई 1924 में एक विश्वासघात के परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया और 7 मई 1924 को कोय्यूरू के जंगलों में एक पेड़ से बाँधकर बिना किसी मुकदमे के गोली मार दी। मात्र 27 वर्ष की अल्पायु में अल्लूरी सीताराम राजू ने भारत माता की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

भारतीय सिनेमा और ‘RRR’ के माध्यम से अल्लूरी सीताराम राजू को मिली वैश्विक पहचान

भारत के जाने-माने फिल्म निर्देशक एस एस राजामौली द्वारा निर्देशित बहुचर्चित, विश्वविख्यात और ऑस्कर पुरस्कार विजेता फिल्म ‘RRR’ (2022) मुख्य रूप से दो महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों- अल्लूरी सीताराम राजू और कोमाराम भीम के जीवन, उनके महान चरित्रों और उनके एक काल्पनिक ऐतिहासिक मिलन की पृष्ठभूमि पर ही रची गई है।

इस भव्य और महाकाव्यीय फिल्म में दक्षिण भारतीय सिनेमा के शीर्ष अभिनेता राम चरण ने अल्लूरी सीताराम राजू की ओजस्वी भूमिका को पर्दे पर जीवंत किया, जबकि अभिनेता जूनियर एनटीआर ने कोमाराम भीम के जुझारू और निष्छल चरित्र को बेहद सशक्त रूप से चित्रित किया।

इस फिल्म ने अल्लूरी सीताराम राजू के असीम त्याग, उनकी बेजोड़ तीरंदाजी व युद्ध कला, उनके महान चरित्र और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ उनके प्रचंड विद्रोह की भावना को बेहद भव्य और भावनात्मक रूप से पर्दे पर उकेरा।

इस फिल्म के विश्वव्यापी प्रदर्शन और ऐतिहासिक सफलता ने केवल भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका, जापान, यूरोप और दुनिया के कोने-कोने में रहने वाले करोड़ों लोगों को अल्लूरी सीताराम राजू और भारत के जनजातीय स्वाधीनता संग्राम के इस महान इतिहास से परिचित कराया है।

नेपाल में इस्लामी कट्टरपंथियों ने काँवड़ियों पर किया हमला, पुलिस फायरिंग में गई 3 की जान: वामी मीडिया ने ‘झड़प’ बता हिंसा पर किया ‘वाइटवॉश’, जानिए कैसे झुकी बालेन सरकार Exclusive

​नेपाल, जिसे कभी दुनिया के शांत और सहिष्णु हिंदू राष्ट्र के रूप में जाना जाता था, आज इस्लामी कट्टरपंथ और जनसांख्यिकीय असंतुलन (डेमोग्राफी चेंज) के भयंकर संकट से जूझ रहा है। इस वर्ष नेपाल में पवित्र सावन मास का शुभारंभ 17 जुलाई 2026 से हुआ। सावन चढ़ते ही नेपाल की तराई से लेकर पहाड़ियों तक ‘बम-बम भोले’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष गूँजने लगे। लाखों सनातनी श्रद्धालु शिवभक्ति के उल्लास में काँवड़ लेकर बाबा भोलेनाथ के जलाभिषेक के लिए निकलने लगे।

लेकिन नेपाल के सुनसरी जिले के कप्तानगंज में काँवड़ियों पर हमले की जो रिपोर्ट्स सामने आई, उसने यह साफ कर दिया कि भारत की तरह नेपाल में भी सनातनी त्योहार और धार्मिक यात्राएँ इस्लामी कट्टरपंथियों की आँखों में खटकने लगी हैं। 26 जुलाई 2026 की रात काँवड़ियों पर हुआ जानलेवा हमला कोई अचानक हुआ हादसा या दो गुटों की मामूली कहासुनी नहीं था, बल्कि यह नेपाल की बदली डेमोग्राफी का नतीजा है।

स्थानीय पत्रकारों के मुताबिक, हिंदुओं की जान जाने के बाद नेपाल के सनातनी समाज ने अपनी चुप्पी तोड़ी। जनकपुर, विराटनगर से लेकर चितवन तक जिस तरह से हिंदू सड़कों पर उतरे और विरोध का परचम लहराया, उससे बालेन सरकार की चूलें हिल गईं। सरकार को न सिर्फ बैकफुट पर आना पड़ा, बल्कि पूरे इलाके में कर्फ्यू लगाना पड़ा।

हालाँकि बताया ये भी जा रहा है कि बाद की हिंसा में भी कम से कम 2 अन्य यानी 4 लोगों की मौत हुई है, लेकिन सरकार की तरफ से 2 ही मौतों की पुष्टि हुई है, क्योंकि समझौते भी 2 ही मृतकों के परिजनों के साथ हुए हैं। इस दौरान 15 साल के गणेश यादव की भी मौत की जानकारी मीडिया में सामने आई है। मीडिया रिपोर्ट्स में ये दावा किया जा रहा है कि ये जानें पुलिस की गोलियों से गई हैं और नेपाल सरकार भी इसी तरह के दावे कर रही है।

इस खास रिपोर्ट में हम बता रहे हैं कि कैसे नेपाल की बदलती डेमोग्राफी, वामपंथी मीडिया और इसके पीछे सक्रिय अंतरराष्ट्रीय साजिशों ने कभी हिंदू राष्ट्र रहे नेपाल में अब हिंदुओं को ही असुरक्षित बना दिया है। इस खास रिपोर्ट के लिए ऑपइंडिया के पत्रकार श्रवण शुक्ल ने नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार आचार्य डिल्ली से भी बातचीत की है।

​जानिए 26 जुलाई की हिंसा की पूरी क्रोनोलॉजी

​नेपाल के सुनसरी जिले में 26 जुलाई की रात जो घिनौना और खूनी खेल खेला गया, उसकी तैयारी कट्टरपंथियों द्वारा पहले ही कर ली गई थी। सोमवार की सुबह सनातनी काँवड़ियों को भगवान शिव का जलाभिषेक करना था।

इसके लिए श्रद्धालु पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ रात करीब 12 बजे ही अपने-अपने घरों से निकलने लगे थे। हाथों में जल, काँवड़, ढोल-डीजे और मुख में भगवान शिव का नाम पूरा माहौल भक्तिमय था।

काँवड़िये अपनी धुन में ‘बम-बम भोले’ की हुंकार भरते हुए शांतिपूर्वक अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे। तभी मुस्लिम बाहुल्य इलाके के पास घात लगाकर बैठे इस्लामी कट्टरपंथियों की उग्र भीड़ ने काँवड़ियों के जत्थे को घेर लिया।

कट्टरपंथियों ने यह कुतर्क देते हुए विवाद शुरू किया ‘तुम लोग हमारी तरफ से क्यों गुजर रहे हो? यहाँ DJ और जयकारे क्यों लगा रहे हो?’ इससे पहले कि निर्दोष और निहत्थे काँवड़िये कुछ समझ पाते, उपद्रवियों ने लाठी-डंडों, धारदार हथियारों और पत्थरों से हमला बोल दिया।

इस सुनियोजित हमले का सबसे खतरनाक और रणनीतिक पहलू यह था कि हिंसा शुरू होते ही पूरे इलाके की बिजली काट दी गई। गहरे अंधेरे का फायदा उठाकर इस्लामी भीड़ ने काँवड़ियों को बर्बरता से पीटना और काटना शुरू कर दिया।

हमले के काफी देर बाद पुलिस मौके पर पहुँची, लेकिन तब तक हमलावर अंधेरे में फरार हो चुके थे। नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार आचार्य डिल्ली का स्पष्ट दावा है कि इस खूनी हिंसा में मुस्लिम पक्ष के किसी भी व्यक्ति को खरोंच तक नहीं आई।

हिंसा का शिकार पूरी तरह से सनातनी हिंदू हुए। इस हमले में पटेल और मेहता समुदाय के लोगों को निशाना बनाया गया। इस हमले में दर्जनों काँवड़िये गंभीर रूप से घायल हो गए। यह सीधी और एकतरफा हिंसा थी। इस हमले के बाद पुलिस को मोर्चा संभालना पड़ा, जिसमें पुलिस की गोलीबारी में 2 हिंदुओं की मौत हो गई।

​सनातनी प्रतिरोध से थर्राया नेपाल: सड़कों पर उतरा हिंदू समाज, बैकफुट पर बालेन सरकार

​सुनसरी में सनातनी आस्था पर हुए इस बर्बर हमले के बाद पूरे नेपाल का वातावरण गरमा गया। दशकों से सहने और चुप रहने की नीति पर चल रहे नेपाल के हिंदू समाज का सब्र का बाँध इस बार टूट गया। हिंसा की खबर फैलते ही जनकपुर में हजारों की संख्या में हिंदू सड़कों पर उतर आए।

माता सीता की इस पावन भूमि पर सनातनियों ने अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए विरोध जताया। विराटनगर में हिंदुओं ने विशाल रैलियाँ निकालीं और हत्यारों की तत्काल गिरफ्तारी की माँग की।

चितवन जिले में स्थानीय हिंदू संगठनों और आम जनता ने ऐतिहासिक बंद का आह्वान किया, जिसके चलते पूरा इलाका ठप्प हो गया। व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रहे, सड़कों पर चक्का जाम हो गया और हर तरफ सिर्फ एक ही माँग गूँज रही थी, सनातनियों के कातिलों को फाँसी दो और कट्टरपंथ को संरक्षण देना बंद करो।

नेपाल के इतिहास में यह पहला मौका था जब हिंदुओं ने इस स्तर पर संगठित होकर अपना प्रतिरोध दर्ज कराया। इस अभूतपूर्व जनाक्रोश और सनातनी एकजुटता को देखकर काठमांडू में बैठी बालेन सरकार और प्रशासन का पसीना छूट गया।

बालेन शाह की सरकार जो अब तक इस तरह के मामलों में ढुलमुल रवैया अपनाती रही थी, उसे तुरंत बैकफुट पर आना पड़ा। स्थिति को हाथ से निकलता देख सुनसरी और आसपास के कई संवेदनशील इलाकों में आनन-फानन में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लागू करना पड़ा।

भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती की गई। सनातनियों के इस प्रचंड आक्रोश ने बालेन सरकार को यह सख्त संदेश दे दिया कि अब नेपाल का हिंदू अपने खून का हिसाब माँगेगा और चुपचाप जुल्म नहीं सहेगा।

बालेन शाह सरकार ने 7 सूत्रीय समझौते के तहत हिंसा में मारे गए 2 हिंदुओं को शहीद यानी बलिदानी घोषित किया। उनके परिजनों को सरकारी नौकरी के साथ 10-10 लाख नेपाली रुपए का मुआजवा घोषित किया। इसके अलावा साथ ही हिंसा में घायल हुए हिंदुओं को 2-2 लाख रुपए की भी आर्थिक मदद की घोषणा की।

इस मामले में बालेन शाह सरकार की गृह मंत्रालय को सीधा हस्तक्षेप करना पड़ा। गुरुवार (30 जुलाई 2026) की देर रात गृह मंत्री सुदन गुरुङ की मौजूदगी में ओमप्रकाश मेहता और जयप्रकाश मेहता के परिजनों के साथ यह समझौता हुआ।

नेपाल सरकार और मृतकों के परिजनों के बीच लिखित समझौते की कॉपी (फोटो साभार: AAJ TAK)

समझौते का एक अहम बिंदु देवानगंज स्थित मदरसे की जाँच भी है। सरकार ने मदरसे की कानूनी स्थिति की तत्काल जाँच शुरू करने और वहाँ मौजूद किसी भी दोषी व्यक्ति को कानून के दायरे में लाने की प्रतिबद्धता जताई है। इसके साथ ही यह भी तय हुआ कि स्थानीय सरकार के सहयोग से घटना स्थल के आसपास मृतकों की स्मृति में एक स्मारक पार्क बनाया जाएगा।

इस समझौते के बाद शुक्रवार को मारे गए दोनों हिंदुओं के शव परिजनों को सौंपे गए और उनका अंतिम संस्कार हो सका। पर इन मीडिया रिपोर्ट्स में कहीं नहीं बताया गया कि ये हिंसा सांप्रदायिक थी और इस्लामी कट्टरपंथियों के हमलों में हिंदुओं की जान गई, बल्कि कहा गया कि ये हत्याएँ पुलिस ने की।

नेपाली मीडिया का घिनौना चेहरा आया सामने

​नेपाल में जब भी कोई इस्लामी हिंसा होती है, तो उसके पीछे सिर्फ कट्टरपंथियों की ताकत नहीं होती, बल्कि वहाँ के बिके हुए और हिंदू विरोधी मीडिया का एक बहुत बड़ा सुरक्षा कवच होता है।

ऑपइंडिया से बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार आचार्य डिल्ली ने नेपाल के मुख्यधारा के मीडिया का ऐसा सच उजागर किया है, जो रोंगटे खड़े कर देने वाला है। आचार्य डिल्ली ने बताया कि नेपाल के लगभग 80 प्रतिशत पत्रकार, संपादक और साहित्यकार वैचारिक रूप से घोर वामपंथी और हिंदू विरोधी हैं।

यह वामपंथी इकोसिस्टम पूरी तरह से इस्लामी कट्टरपंथियों के बचाव में खड़ा रहता है। भारत के लिबरल और वामपंथी मीडिया की तर्ज पर नेपाल का मीडिया भी सनातन धर्म को बदनाम करने के लिए हिंदू आतंकवाद और उग्रवादी हिंदू जैसे मनगढ़ंत और घिनौने शब्दों का इस्तेमाल खुलेआम करता है।

जब सुनसरी में काँवड़ियों पर एकतरफा हमला हुआ, 3 हिंदू मारे गए और बिजली काटकर कत्लेआम किया गया, तब भी नेपाल के इस वामपंथी मीडिया ने हमलावरों का नाम तक छापने से परहेज किया।

स्थानीय मीडिया ने अपनी रिपोर्टिंग में इस जघन्य हत्याकांड को दो समुदायों के बीच मामूली झड़प बताकर पेश किया। यह वामपंथी मीडिया का वह पुराना पैंतरा है, जिसके जरिए इस्लामी हिंसा पर वाइटवॉश पोती जाती है। नेपाल के नेता भी ऐसे ही करते आ रहे हैं।

अपराधियों और जिहादियों के मुस्लिम नामों को छिपा दिया जाता है और पूरी कहानी को ऐसा बना दिया जाता है जैसे गलती हिंदुओं की ही थी जो वे वहाँ से गुजर रहे थे। नेपाल का यह वामपंथी गैंग पत्रकारिता के नाम पर इस्लामी कट्टरपंथ के एजेंडे को खाद-पानी देने का काम कर रहा है।

​नेपाल में मुसलमानों का इतिहास: 1825 से 2017 तक, कैसे चार चरणों में बदली आबादी

​नेपाल में अचानक इस्लामी कट्टरपंथ का यह तूफान कहाँ से आया, इसे समझने के लिए नेपाल में मुस्लिम आबादी के आगमन और उनकी जनसांख्यिकी के इतिहास को समझना बेहद जरूरी है। आचार्य डिल्ली ने ऑपइंडिया के श्रवण शुक्ला को नेपाल में मुसलमानों के बसने की पूरी क्रोनोलॉजी चरणबद्ध तरीके से समझाई।

नेपाल में मुसलमानों का आगमन मुख्यतः चार ऐतिहासिक चरणों में हुआ। पहला चरण 1825 के आसपास का था जब नेपाल का एकीकरण हुआ और उस दौरान वाराणसी से कुछ मुस्लिम कारीगरों व व्यवसायियों को नेपाल लाया गया।

इसी कालखंड में जब तत्कालीन राजा कृष्णा महाराज ने वाराणसी में विवाह किया, तो उनके साथ भी कुछ मुस्लिम सेवक और नागरिक नेपाल आकर बसे, जो उस समय बेहद सीमित और शांत आबादी थी। दूसरा चरण 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय आया जब अंग्रेजों ने लखनऊ पर कब्जा किया और अवध की बेगम हज़रत महल भागकर नेपाल की शरण में गईं।

उनके साथ बड़ी संख्या में उनके समर्थक और मुस्लिम नेपाल की सीमा में दाखिल हुए और तराई के इलाकों में बस गए। तीसरा चरण 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय का था जब सीमावर्ती जिलों के लोग नेपाल में जाकर बस गए।

चौथा और सबसे खतरनाक चरण 2017 के बाद देखा गया जब उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभाली और अपराधियों तथा कट्टरपंथियों पर नकेल कसी गई, जिससे डरकर यूपी के सीमावर्ती जिलों से भागकर सैकड़ों संदिग्ध तत्व नेपाल की खुली सीमा का फायदा उठाकर वहाँ छुप गए। इस चरण की शुरुआत रोहिंग्या की एंट्री से ही शुरू हो गई थी, लेकिन यूपी में योगी सरकार आने के बाद घुसपैठियों का भारत से नेपाल पलायन तेज हो गया और अब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सत्ता जाने के बाद इस्लामी भीड़ बड़ी-बड़ झुंडों में नेपाल में घुसपैठ करने लगी।

इन चार चरणों के बाद और विशेष रूप से नेपाल में राजशाही के अंत के बाद स्थिति पूरी तरह से बिगड़ गई। लोकतंत्र की आड़ में नेपाल में मुस्लिम आयोग का गठन किया गया और उसे संवैधानिक दर्जा दे दिया गया, जिसके बाद से नेपाल में इस्लामी गतिविधियों और कट्टरपंथ को कानूनी व राजनीतिक ढाल मिल गई।

​बिहार से सटे जिलों में ओवैसी का प्रभाव, रोहिंग्या-बांग्लादेशी घुसपैठ और नकली दस्तावेजों का खेल

​भारत और नेपाल की सीमा खुली होने का सबसे बड़ा खामियाजा आज नेपाल के सीमावर्ती जिलों को भुगतना पड़ रहा है। बिहार से सटे नेपाल के जिलों जैसे सुनसरी, मोरंग, पर्सा, बारा और रौतहट में मुस्लिम आबादी में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई है।

इस इलाके में भारत के कट्टरपंथी नेता असदुद्दीन ओवैसी की विचारधारा का प्रभाव तेजी से बढ़ा है और स्थानीय इस्लामी तत्व उसी आक्रामक राजनीति का अनुसरण कर रहे हैं। इससे भी ज्यादा भयावह बात रोहिंग्याओं और अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों का नेपाल में जमघट है।

आचार्य डिल्ली ने खुलासा किया कि जब से पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के शासन के दौरान जनसांख्यिकी बदली, तब से बांग्लादेशी और रोहिंग्या भारत के रास्ते नेपाल में घुसपैठ कर रहे हैं और वर्ष 2011 के बाद से इनकी संख्या में हजारों का इजाफा हुआ है।

इस पूरे खेल के पीछे भारत और नेपाल के एजेंटों का एक संगठित सिंडिकेट काम कर रहा है, जो फर्जीवाड़ा करके पहले इन घुसपैठियों के भारत के जाली आधार कार्ड और वोटर ID बनाता है, फिर नेपाल की खुली सीमा पार कराकर स्थानीय राजनीतिक आकाओं की मदद से उनके नेपाली नागरिकता के कागजात और पासपोर्ट तक बनवा देता है।

चिंता की बात यह है कि ये रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठिये अब केवल तराई तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नेपाल के शांत और संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में भी अपनी जगह बना रहे हैं।

​सऊदी-कतर की फंडिंग, 25 मस्जिद-मदरसे और कतरी शेख का राज: सांसद अमरेश सिंह का बड़ा खुलासा

​नेपाल में अचानक उग आई हजारों नई मस्जिदें और आलीशान मदरसे इस बात का सबूत हैं कि यह सब बिना बेहिसाब पैसे के संभव नहीं है। नेपाल में इस कट्टरपंथ के आर्थिक ताने-बाने का पर्दाफाश नेपाल के निर्भीक सांसद डॉ अमरेश कुमार सिंह ने किया था। उन्होंने नेपाल की संसद में पूरे 5 बार इस गंभीर मुद्दे को उठाया है कि कैसे विदेशी पैसा नेपाल की राष्ट्रीय सुरक्षा को खोखला कर रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार आचार्य डिल्ली ने बताया, “सांसद अमरेश सिंह ने संसद में कहा था कि जब कतर का एक शेख नेपाल के दौरे पर आया था, तो उसका असली मकसद निवेश नहीं बल्कि सीधे तौर पर 25 नई मस्जिदों और 25 बड़े मदरसों की स्थापना करना था और वह बांग्लादेश के रास्ते नेपाल पहुँचा था। जब कतर के इस गुप्त एजेंडे की जानकारी भारत की खुफिया एजेंसियों को मिली, तो भारत सरकार ने तत्काल इस पर अत्यंत कड़ा ऐतराज जताया, जिसके बाद कतरी शेख को वापस लौटना पड़ा।”

इसके अलावा आचार्य डिल्ली और स्थानीय सूत्रों का कहना है कि सऊदी अरब और कतर जैसे खाड़ी देशों से हर महीने नेपाल के सीमाई इलाकों में बेहिसाब फंडिंग आ रही है, जिसका इस्तेमाल मस्जिद-मदरसे बनाने, स्थानीय गरीब आबादी का धर्मांतरण कराने और सनातनी परंपराओं को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है।

​नेपाल के अस्तित्व पर मँडराता संकट और भारत के लिए चेतावनी

​सुनसरी में सावन के महीने में काँवड़ियों पर हुआ हमला कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि यह उस बड़े चक्रव्यूह की एक कड़ी है जो नेपाल को एक शांत हिंदू बहुल देश से कट्टरपंथी वामपंथी-इस्लामी प्रयोगशाला में बदलने के लिए रचा जा रहा है।

17 जुलाई 2026 से शुरू हुए इस पावन महीने में जब सनातनी अपने ईश्वर की आराधना कर रहे थे, तब उन्हें अपनी जान गँवानी पड़ी। 3 सनातनी भाइयों का बलिदान, वामपंथी मीडिया का पक्षपाती रवैया, रोहिंग्याओं की अनियंत्रित घुसपैठ और खाड़ी देशों की पेट्रो-डॉलर फंडिंग यह बताने के लिए काफी है कि पानी सिर से ऊपर जा चुका है।

हालाँकि इस पूरे काले अध्याय में उम्मीद की एकमात्र किरण नेपाल के सनातनियों का अप्रत्याशित जागरण है। जनकपुर, विराटनगर और चितवन में हिंदुओं ने जिस तरह से अपनी एकजुटता दिखाई और बालेन सरकार को बैकफुट पर धकेला, उसने यह साबित कर दिया है कि नेपाल की आत्मा अभी मरी नहीं है।

नेपाल सरकार को यह समझना होगा कि तुष्टिकरण और वामपंथी दबाव में आकर कट्टरपंथियों को दी जा रही ढील अंततः नेपाल की अपनी संप्रभुता को निगल जाएगी। वहीं भारत के लिए भी यह एक बहुत बड़ा चेतावनी संकेत है कि नेपाल की खुली सीमा का इस्तेमाल करके रचा जा रहा यह डेमोग्राफिक चेंज भारत के सीमावर्ती राज्यों की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है।

जिस पियरे-हेनरी ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में भारत के राफेल गिरने का फैलाया झूठ, वो निकला चीनी जासूस: फ्रांस में गिरफ्तार हुआ पूर्व पायलट, राहुल गाँधी समेत विपक्ष ने माना था इसका प्रोपेगेंडा

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राफेल को लेकर झूठ फैलाने वाला फ्रेंच एयरफोर्स का पूर्व पायलट पियरे-हेनरी शुए (Pierre-Henri Chuet) को गिरफ्तार कर लिया गया है। उसने ही दावा किया था कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के वक्त भारत का राफेल गिरा था।

दरअसल यह पाकिस्तान-चीन के युद्ध रणनीति का हिस्सा था, क्योंकि ये दावा किया गया था राफेल विमान को पाकिस्तान द्वारा इस्तेमाल किए गए चीनी विमान ने मार गिराया है। इसमें चीन ने उसका साथ दिया और उसके लिए जासूसी कर रहे इस फ्रांस के एक्स पायलट का इस्तेमाल किया।

इस दावे को भारत की विपक्षी पार्टियों ने हाथों हाथ लिया। सरकार और सेना के लाख समझाने के बाद भी कहते रहे कि कितने राफेल गिराए गए? संसद से सड़क तक उनलोगों ने पाकिस्तान-चीन के प्रोपेगेंडा को हवा देने का काम किया। अब दावा करने वाले का ‘असली चेहरा’ दुनिया के सामने आ गया है।

फ्रांस के इस पूर्व पायलट को चीन के लिए संवेदनशील दस्तावेज चोरी करने को लेकर फ्रांस ने गिरफ्तार किया है और उससे पूछताछ की जा रही है। इससे पहले रणनीति के तहत उसने चीनी जेट विमानों की तारीफ की थी। उसने चीन के लिए सैन्य विशेषज्ञता उपलब्ध कराई और चीन के सैन्य पायलटों के प्रशिक्षण से जुड़ी गतिविधियों में हिस्सा लिया।

वह फ्रांसीसी नौसेना में राफेल M उड़ाने वाला पायलट रह चुका है। वह एयर कनाडा में कमर्शियल पायलट रह चुका है। बाद में एविएशन यूट्यूबर और विश्लेषक बन गया।

फ्रांसीसी मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, उसने 2028-19 में फ्रांस की नौसेना में रहते हुए दो बार चीन की यात्रा बगैर अधिकारियों को बताए की। इस दौरान उसने दक्षिणी विमानन कंपनी के माध्यम से चीनी सैन्य पायलटों को ट्रेनिंग सत्र आयोजित किए। उसने संवेदनशील और सामरिक दृष्टि से अहम जानकारियाँ शेयर की। दावा किया जा रहा है कि उस वक्त से ही वह चीन के लिए ‘काम’ करने लगा। फ्रांस की खुफिया एजेंसी उसे अब हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही है। उसे न्यायिक जाँच के तहत रखा गया है।

राफेल को लेकर क्या कहा था शुए ने?

भारत ने जब पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान से आतंकों के तार जुड़ने पर पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों को उड़ाने के लिए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाया और पाकिस्तान में घुस कर इन ठिकानों को उड़ा दिए। मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर में भारत के राफेल विमानों ने पाकिस्तानी सीमा से 100 किलोमीटर अंदर बहावलपुर तक को निशाना बनाया। ये हमले SCALP मिसाइलों से किए गए और खास बात ये रही कि हमला करने के लिए इन्हें पाकिस्तानी सीमा में घुसने की जरूरत भी नहीं पड़ी।

इसके बावजूद चीन के टुकड़ों पर पलने वाले इस फ्रांस के एक्स पायलट शुए ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि भारतीय वायुसेना के राफेल विमान पाकिस्तान के चीनी मूल के लड़ाकू विमानों और PL-15 मिसाइलों के सामने कमजोर साबित हुए। उसने चीनी J-10C और JF-17 की तारीफ करते हुए उन्हें ‘राफेल किलर’ कहा था। ये सारे दावे उसने अपने यूट्यूब पर किए थे, जिसे ate chut के नाम से जाता जाता है। उसने दावा किया था कि चीनी तकनीक के सामने पश्चिमी देश नहीं ठहर रहे हैं।

शुए के इस दावे का भारतीय सेना ने जोरदार खंड़न किया था और कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कोई राफेल नहीं गिरा। यहाँ तक कि राफेल बनाने वाली कंपनी डसॉल्ट एविएशन ने भी इस दावे को बकवास बताया था।

उसने ऐसा क्यों कहा? इसका पता भी अब दुनिया को चल गया है। फ्रांस ने उसे चीन के लिए जासूसी करने और संवेदनशील रक्षा से जुड़ी जानकारियाँ चीन को मुहैया कराने के आरोप में गिरफ्तार किया है।

चीन पश्चिमी सैन्य विशेषज्ञों का कर रहा इस्तेमाल

चीन पर अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया समेत तमाम विकसित देश सालों से जासूसी करने का आरोप लगाते रहे हैं। चीन इन देशों के पूर्व रक्षा विशेषज्ञों और पायलटों को अपने देश में जासूसी करने के काम में लगाता है और उसे कई तरह से फायदा पहुँचाता है। उन्हें ‘फ्लाइट इंस्ट्रक्टर’ या ‘एविएशन कंसल्टेंट’ जैसे पद ऑफर कर काफी पैसे देता है। पहले नागरिक विमानन प्रशिक्षण के नाम पर अनुबंध करता है और फिर सैन्य प्रशिक्षण से जुड़े काम में लगाता है, लेकिन उसका मुख्य काम चीन के लिए गुप्त सैन्य तकनीक और दस्तावेज लाना होता है।

यह काम वह कई देशों में कर रहा है। रॉयटर्स के मुताबिक, फरवरी 2026 में अमेरिका में भी वायुसेना के एक पूर्व पायलट को चीन के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। फ्रांस का एक्स पायलट शुए भी चीन में सैन्य प्रशिक्षण से जुड़ा था। उसको मुखौटा के रूप में इस्तेमाल कर चीन ने भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के प्रहार को कमतर दिखाने के लिए ‘राफेल के गिरने की’ झूठी खबर फैला कर कूटनीतिक चाल चली।

इस कूटनीतिक चाल में फँस गई भारत की विपक्षी पार्टियाँ, जो ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान सरकार की कमियाँ निकालने में लगी थी। उन्हें शुए के बयान से मौका मिला और देश में गला फाड़ फाड़ कर कहने लगी कि सरकार बताए कि हमारे कितने राफेल ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान गिरे? सरकार से सवाल तो समझ में आता है, लेकिन विपक्षी नेताओं ने सेना के आधिकारिक बयान को भी खारिज कर दिया और राफेल पर सवाल दागते रहे।

राहुल गाँधी ने राफेल गिरने का दावा किया था

राहुल गाँधी ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान ही विदेशी बयानों और दावों का हवाला देते हुए सरकार से पूछा था कि सैन्य कार्रवाई में भारतीय वायुसेना के कितने राफेल विमानों को नुकसान पहुँचा या गिरे हैं। इस दौरान सरकार हर स्तर पर ये स्पष्ट करती रही कि कोई भी राफेल या भारतीय विमान ऑपरेशन सिंदूर के दौरान क्षतिग्रस्त नहीं हुआ। संसद में भी रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने साफ शब्दों में ये बातें कही थी। लेकिन राहुल गाँधी और दूसरे विपक्षी नेताओं को विदेशी एजेंटों पर भरोसा था इसलिए सवाल जारी रहे।

यहाँ तक कि भारतीय वायुसेना ने बाद में आधिकारिक तौर पर 36 राफेल के रखरखाव के लिए टेंडर जारी किए। इससे साफ था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमारे सारे राफेल सुरक्षित हैं। दस्तावेज में साफ लिखा था कि भारतीय सेना के 36 राफेल के रखरखाव के लिए 5 महीने के लिए ब्रिज सपोर्ट की जरूरत है। दस्तावेज में यह भी जिक्र था कि प्रस्तावित ब्रिज सपोर्ट अनुबंध के दौरान सभी 36 राफेल विमानों के संचालन को ध्यान में रखते हुए उड़ान के घंटे गिने गए।

यह एक तरह से राहुल गाँधी और दूसरे नेताओं के मुँह पर तमाचे की तरह था। दरअसल राहुल गाँधी का चीन प्रेम काफी पुराना है। इस मामले में भी चीनी विमान की बात थी। क्योंकि दावा किया जा रहा था कि चीनी विमान ने ही राफेल को गिराया।

राहुल गाँधी का चीन प्रेम

मार्च 2023 में कैम्ब्रिज जज पब्लिक स्कूल में एक विवादास्पद बयान दिया। इसमें उन्होंने चीन को ‘उभरती हुई महाशक्ति’ बताया था। उन्होंने ये भी दावा किया था कि चीन में सामाजिक समरसता है। चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी से राजीव गाँधी फाउंडेशन को पैसे मिलने की बात भी सामने आई

2022 में द प्रिंट की कॉलमिस्ट श्रुति कपिला के साथ बातचीत के दौरान राहुल गाँधी ने चीन के विवादास्पद वेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (BRI) के भी कसीदे पढ़े थे। इसे उन्होंने ‘समृद्धि’ कहा जबकि चीन की ये पहल कई देशों को कर्ज के जाल में फँसाने के लिए बदनाम है।

2023 में लद्दाख का दौरा करने के दौरान राहुल गाँधी ने दावा किया था कि चीन ने लद्दाख में भारत की चरागाह भूमि पर कब्जा कर लिया है। इससे पहले मई 2022 में अपने यूके दौरे के दौरान उन्होंने कहा था कि “लद्दाख चीन के लिए वही है जो यूक्रेन, रूस के लिए है।”

मार्च 2023 में कैम्ब्रिज जज पब्लिक स्कूल में एक विवादास्पद बयान दिया। इसमें उन्होंने चीन को ‘उभरती हुई महाशक्ति’ बताया था। उन्होंने ये भी दावा किया था कि चीन में सामाजिक समरसता है।

इससे पता चलता है कि राहुल गाँधी का चीनी प्रेम कोई आज का नहीं है। राफेल के विमान को दुनियाभर में बदनाम करने के लिए जो चीनी साजिश रची गई उसमें कॉन्ग्रेस पार्टी और वामपंथी मीडिया भी शामिल रहे। भारत के 36 राफेल खरीदने को लेकर घोटाले का आरोप लगाया। जब इससे बात नहीं बनी तो ऑपरेशन सिंदूर में राफेल के गिरने की कहानी गढ़ी गई।

अब साफ हो चुका है कि न तो राफेल गिरा और न ही ऑपरेशन सिंदूर में भारत को किसी तरह की क्षति हुई। भारत ने पाकिस्तान में घुसकर दुश्मन के छक्के छुड़ाए और विपक्ष को भी लगातार चुनावों में हरा कर ये साबित कर दिया कि देश की जनता उसके साथ है। वह विपक्ष के बहकावे में नहीं आ सकती है।

‘निकालो राम को… तुम्हारी सीता मैया को ले जाएँगे’: रामनवमी में हिंदुओं ने ही झेला हमला, 11 आरोपितों के बरी होने पर वही न्याय के इंतजार में

  1. इबादत
  2. सादिक
  3. अब्दुल्ला
  4. साहेब उर्फ शाहिब
  5. शेरयार
  6. फैजल
  7. आजम
  8. शब्बीर
  9. इमरान
  10. मुस्ताक
  11. राजिक

ऊपर जो 11 नाम हैं, वो रामनवमी शोभा यात्रा के दौरान हिंदुओं पर हमले के आरोपी रहे हैं। 2022 में मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में कट्टर मुस्लिम भीड़ ने शोभा यात्रा में DJ बजाने को लेकर हमला किया था। जिले के SP तक को गोली मारी थी इसी भीड़ ने। अनेकों घर जला दिए थे, हिंदू बहन-बेटियों को रेप की धमकी दी गई थी। भगवान श्रीराम और माता सीता को लेकर आपत्तिजनक बात कही थी। जहाँ इतना सब कुछ हुआ, उसी जिले के सेशन कोर्ट ने लगभग 4 साल बाद 27 जुलाई 2026 को उपरोक्त सभी 11 आरोपितों को बरी कर दिया।

अभियोजन पक्ष की ओर से आरोपितों पर निम्नलिखित गंभीर आरोप लगाए गए थे:
(a) भीड़ जमा करने
(b) घातक हथियारों से लैस होकर हमला करने
(c) पत्थरबाजी करने
(d) मकान-वाहन व अन्य सामानों की तोड़-फोड़ करने
(e) पेट्रोल बम फेंकने
(f) घरों में आग लगाने
(g) पीड़ितों के जीवन को खतरा में डालने
(h) संपत्ति की क्षति करने
पुलिस की ओर से इनसे संबंधित सुसंगत धाराएँ भी आरोपितों पर लगाई गई थी।

इन आरोपों को साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष ने कुल 13 साक्षी लोगों के बयानों को भी कोर्ट के सामने रखा, सभी 13 का परीक्षण भी कराया गया। कोर्ट ने इन 13 में से 11 लोगों को प्रत्यक्ष व चश्मदीद साक्षी भी माना। इस पूरी कानूनी प्रक्रिया में सभी 11 आरोपितों का कहना था कि वे लोग निर्दोष हैं, उनको झूठे केस में फँसाया गया है – हालाँकि किसी भी आरोपित की ओर से अपने बचाव में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।

अभियोजन पक्ष ने अपनी ओर से साक्ष्य सहित कुल 10 आरोप कोर्ट के सामने रखे। खरगोन (मंडलेश्वर) के चतुर्थ अपर सत्र न्यायाधीश मुकेश नाथ के समक्ष सभी 11 आरोपितों की संलिप्तता से संबंधित कुल 8 विचारणीय प्रश्न भी रखे गए। हालाँकि जज ने आदेश देते हुए 50 पॉइंट में सभी आरोपों और प्रश्नों पर कोर्ट का तर्क रखा। अंततः “अपराध संदेह से परे प्रमाणित करने में असफल” की बात रखते हुए जज मुकेश नाथ ने सभी 11 आरोपितों को उनके ऊपर लगाए गए अपराधों के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। अपने आदेश के पीछे न्यायाधीश ने 50 पॉइंट में निम्नलिखित महत्वपूर्ण तर्क दिए:

(i) साक्षी लोगों के कथनों में विरोधाभास
(ii) 2 दिन की देरी से दर्ज FIR
(iii) एक महत्वपूर्ण साक्षी के बयान को पुलिस द्वारा 51 दिन बाद दर्ज किया जाना
(iv) शिकायती आवेदन पत्र और शुरुआती FIR में 11 आरोपितों की जगह केवल 6 आरोपितों के ही नाम दर्ज
(v) कानूनी कार्रवाई के दौरान पुलिस द्वारा चश्मदीद साक्षी लोगों से आरोपितों की पहचान परेड नहीं कराया जाना
(vi) किसी भी साक्षी द्वारा कोर्ट में आरोपितों को नाम से नहीं पहचानना
(vii) दंगा करने आए लगभग 50 लोगों की भीड़ में से 11 आरोपितों की पहचान और उनके नाम किस आधार पर
(viii) एक साक्षी द्वारा आरोपितों को चेहरे से पहचानने का दावा जबकि दूसरे के द्वारा सभी दंगाई के चेहरे पर कपड़े बंधे होना बताना
(ix) भीड़ द्वारा विस्फोटक सामग्री के उपयोग संबंधित कोई भी विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जाना

अब सवाल उठता है कि जब कोर्ट ने आरोपितों को उनके ऊपर लगे अपराधों से बरी कर दिया है तो लंबी-चौड़ी खबर लिखी ही क्यों जाए? इसका उत्तर जानने से पहले यह देखना जरूरी है कि खरगोन में रामनवमी शोभा यात्रा में जो दंगे हुए थे, उसकी भयावहता क्या थी? तब मीडिया में क्या-क्या छपा था?

2022 की खरगोन रामनवमी शोभा यात्रा पर दंगाई मुस्लिम भीड़ के हमले को लेकर प्रकाशित खबरें

ऊपर जो खबरें दी गई हैं, वो सिर्फ ऑपइंडिया में प्रकाशित खबरें नहीं हैं। मुख्य धारा की मीडिया ने भी इसे प्रमुखता से कवर किया था। ग्राउंड रिपोर्टिंग की गई थी। दंगा पीड़ित हिंदुओं के अलावे घायल पुलिस वालों की आपबीती भी मीडिया ने बखूबी चलाया था। मतलब दंगा हुआ था, इसको इनकार नहीं किया जा सकता। बात अगर सिर्फ दंगे की हो तो मीडिया “अपराध संदेह से परे प्रमाणित करने में सफल” रहा था। व्यक्ति विशेष को अपराधी घोषित करना या नहीं – यह न्यायालय का काम है, उन्होंने किया भी।

“अपराध संदेह से परे प्रमाणित करने में असफल” Vs “अपराध संदेह से परे प्रमाणित करने में सफल”

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 1984 में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। Sharad Birdhi Chand Sarda vs State Of Maharashtra – इस केस के मामले में। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधारित मामलों वाले इस केस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि आरोपित पर लगाए गए आरोपों और अपराधों को साबित करने का दायित्व अभियोजन पक्ष का होता है। अभियोजन पक्ष मतलब राज्य, राज्य मतलब पुलिस-वकील-डॉक्टर-फॉरेंसिक-लैब आदि।

अब सवाल उठता है कि जब खरगोन में रामनवमी शोभा यात्रा पर दंगाई मुस्लिम भीड़ ने हमला किया और अभियोजन पक्ष को उससे संबंधित चश्मदीद की गवाही में एकरूपता नहीं दिखी, तो न्यायालय में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को लेकर जाने की जिम्मेदारी किसकी थी? मार खाए पीड़ित हिंदुओं की? जिनके घर जलाए गए, उन हिंदुओं की? जिनके बहू-बेटियों को रेप की धमकी मिली, उनकी? या राज्य सरकार और उसके तंत्र की?

दंगों के समय हिंदू अपनी जान बचाए या घड़ी में यह देखे कि कितना बजा है क्योंकि 2/4 साल बाद किसी न्यायालय में उससे समय पूछा जाएगा? दंगाई कितनी संख्या में थे, सभी हिंदू पीड़ित उसकी सटीक गिनती करें क्योंकि न्यायालय में अलग-अलग संख्या से संदेह उत्पन्न होगा। अगर हिंदू ऐसा नहीं करते हैं तो उनको ‘परिस्थितिजन्य साक्ष्य’, ‘अपराध संदेह से परे प्रमाणित करने में असफल’ – जैसे तकनीकी शब्दों में उलझाया जाएगा, तारीख पर तारीख मिलेगी… और अंततः न्याय के इंतजार में भटकना होगा।

भारतीय हॉकी टीम की नई भगवा जर्सी पर विवाद, कप्तान ने बताई रंग बदलने की वजह: जानिए केसरिया से क्यों है वामी-कामी गैंग को नफरत, पहले भी खड़ा कर चुके हैं बखेड़ा

भारतीय हॉकी टीम का रंग बदलने के फैसले को लेकर विवाद हो रहा है। दरअसल, हॉकी इंडिया ने भारतीय हॉकी टीम के रंग को गहरे नीचे से बदलकर केसरिया रंग का कर दिया है, जिसके बाद पुराने खिलाड़ी ही नहीं, राजनेता भी इस विवाद में कूद पड़े हैं। ये वही नेता हैं, जो अब तक कहते थे कि खेल में राजनीति को न घुसाया जाए।

कैसी है नई जर्सी की डिजाइन?

एफआईएच हॉकी विश्व कप के लिए हॉकी इंडिया (Hockey India) ने पुरुषों और महिलाओं की राष्ट्रीय टीम के लिए एक नई किट लॉन्च की। इस नई जर्सी में पारंपरिक नीले रंग (Navy Blue) की जगह प्रमुख रूप से भगवा/नारंगी (Saffron/Orange) रंग को जगह दी गई।

इस डिजाइन में कंधों और किनारों पर तिरंगे रंग की पाइपिंग, स्टाइलिश देवनागरी लिपि में लिखा ‘इंडिया’ और भारतीय हॉकी के लिए ओडिशा के लंबे समय से चले आ रहे समर्थन को मान्यता देने वाली ब्रांडिंग भी शामिल है। हॉकी इंडिया ने कहा कि जर्सी ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को दर्शाती है।

जैसे ही हॉकी इंडिया ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर इस जर्सी का वीडियो शेयर किया, वैसे ही इंटरनेट पर बहस छिड़ गई।

पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान और ओलंपियन वीरेन रसकिन्हा (Viren Rasquinha) ने इस फैसले पर हैरानी जताते हुए इसे ‘शर्मनाक’ करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय हॉकी की विरासत और पहचान हमेशा नीला रंग ही रहा है।

रसकिन्हा ने अपने ट्वीट में लिखा, “हॉकी इंडिया ने कई अच्छे काम किए हैं, लेकिन यह शर्मनाक है। भारतीय टीम की विरासत और पहचान हमेशा से नीला रंग रही है। मैंने सालों तक गर्व से नीली जर्सी पहनी है। फैंस भारतीय टीम को नीले रंग में ही देखना चाहते हैं। इस नारंगी रंग के पीछे क्या तर्क है?”

इस बीच, जब लोगों ने उनके ट्वीट पर राजनीतिक टिप्पणियाँ शुरू कीं, तो रसकिन्हा ने एक और पोस्ट में स्पष्ट किया कि उनकी चिंता केवल खेल की पहचान (Heritage & Identity) को लेकर है, किसी राजनीति से नहीं। उन्होंने उदाहरण देते हुए पूछा कि “क्या अर्जेंटीना की फुटबॉल टीम कभी अपनी पहली जर्सी के नीले-सफेद स्ट्राइप्स को हटाकर नारंगी पहन सकती है?”

हॉकी इंडिया और कप्तान हरमनप्रीत सिंह का स्पष्टीकरण बढ़ते विवाद के बीच हॉकी इंडिया और वर्तमान भारतीय हॉकी कप्तान हरमनप्रीत सिंह ने सामने आकर स्थिति साफ की।

कप्तान हरमनप्रीत सिंह ने कहा, “इसमें कोई राजनीति नहीं है। यह टीम और कोचों का सामूहिक फैसला था। आजकल हॉकी नीले रंग के सिंथेटिक टर्फ (Astroturf) पर खेली जाती है। जब खिलाड़ी नीले टर्फ पर नीली जर्सी पहनकर खेलते हैं, तो एक-दूसरे को पास देते समय दृश्यता (Visibility) प्रभावित होती है। नारंगी रंग नीले टर्फ पर साफ दिखता है।”

हॉकी इंडिया ने भी आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि भगवा रंग हमारे राष्ट्रीय ध्वज का हिस्सा है, जो साहस, त्याग और विजय का प्रतीक है। इस बारे में खिलाड़ियों से भी सलाह ली गई थी।

राजनीतिक बयानबाजी हुई तेज

जैसे ही इस जर्सी की तस्वीरें सामने आईं, राजनीतिक विरोध शुरू हो गया। ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक (BJD) ने भी इस जर्सी बदलाव पर नाराजगी जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि ओडिशा में सत्ता बदलने के बाद जानबूझकर राज्य और राष्ट्रीय पहचान से नीले रंग को हटाकर राजनीतिक कारणों से भगवा रंग थोपा जा रहा है। इसके जवाब में भाजपा नेताओं ने कहा कि भगवा राष्ट्रीय ध्वज का रंग है और इस पर राजनीति करना अनुचित है।

इस मामले में भी कॉन्ग्रेस अपनी राजनीति पर उतर आई। उसके साथ इंडी गठबंधन के नेता भी भारतीय टीम की नई जर्सी पर सवाल उठा रहे हैं। संसद भवन के बाहर कॉन्ग्रेस सांसद प्रियंका गाँधी, सुखदेव भगत, राजद सांसद सुधाकर सिंह, समाजवादी पार्टी के नेता उदयवीर सिंह सहित कई नेताओं ने सवाल उठाए। प्रियंका गांधी ने तो जर्सी बदलने को इतिहास बदलने की कोशिश बता डाला।

पहले क्रिकेट टीम की ‘ऑरेंज जर्सी’ पर मचा था बवाल

यह पहली बार नहीं है जब किसी भारतीय खेल टीम के परिधान में नारंगी या भगवा रंग आने पर बवाल हुआ हो। साल 2019 के आईसीसी क्रिकेट विश्व कप (England) के दौरान भी ऐसा ही एक बड़ा विवाद देखने को मिला था।

बता दें कि 2019 विश्व कप में ‘अवे जर्सी‘ का मामला भी ऐसे ही सामने आया था। विश्वकप में आईसीसी के नियमों के अनुसार, जब दो ऐसी टीमों का मैच होता है जिनकी जर्सी का रंग एक जैसा हो (जैसे भारत और इंग्लैंड, दोनों का रंग नीला था), तो मेहमान टीम को ‘अवे जर्सी’ पहननी पड़ती है। बीसीसीआई ने इस मैच के लिए नारंगी और नीले रंग के मिश्रण वाली जर्सी पेश की, जिसकी पीठ और बाजू पूरी तरह नारंगी थे।

रिफत जावैद जैसे वामी-इस्लामी पत्रकार ने तब भी विवाद पैदा करने की कोशिश की थी।

इसके अलावा सपा नेताओं ने जर्सी के लेकर अपनी मानसिकता खुलकर दिखाई थी, जिसपर वरिष्ठ पत्रकार गौरव सावंत ने सपा नेताओं को आड़े हाथों लिखा था।

विश्व कप 2023 की ट्रेनिंग किट को लेकर भी हुआ था विवाद

साल 2023 में भारत में खेले गए वनडे वर्ल्ड कप के दौरान जब भारतीय क्रिकेट टीम प्रैक्टिस के लिए नारंगी रंग की ट्रेनिंग टी-शर्ट पहनकर मैदान पर उतरी, तो फिर से सोशल मीडिया पर मीम्स और तंज कसने का दौर शुरू हो गया। आलोचकों ने इसकी तुलना स्विगी (Swiggy) डिलीवरी बॉयज और पेट्रोल पंप कर्मचारियों की यूनिफॉर्म से कर डाली। इस मामले में साउथ के एक्टर सिद्धार्थ ने व्यंग्य करते हुए क्रिकेट टीम की नई जर्सी की तुलना इंडियन ऑयल/पेट्रोल पंप वर्कर से की थी।

‘खेल और राजनीति को न मिलाएँ’ वाला राग

इस पूरे विवाद में सबसे दिलचस्प बात वह दोहरा मापदंड (Double Standard) है, जिसकी ओर अक्सर खेल प्रेमी इशारा करते हैं। आमतौर पर वामपंथी और लिबरल विचारकों का एक बड़ा वर्ग यह तर्क देता है कि खेल और राजनीति को आपस में नहीं मिलाया जाना चाहिए (Keep Politics Out of Sports)। लेकिन जब भी राष्ट्रीय टीम की किट, लोगो या ट्रेनिंग गियर में भगवा/नारंगी रंग का इस्तेमाल होता है, तो सबसे पहले इसे ‘राजनीतिक एजेंडा’ या ‘भगवाकरण’ बताने की शुरुआत भी इसी वर्ग द्वारा की जाती है।

भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा है, जिसमें सबसे ऊपर ‘केसरिया’ (Saffron) रंग है जो शौर्य और साहस का प्रतीक है। अगर राष्ट्रीय टीम तिरंगे के ही एक रंग को पहनती है, तो उसे किसी राजनीतिक दल विशेष से जोड़ना तर्कसंगत नहीं है।

तकनीकी कारणों की अनदेखी कर रहे विवाद फैलाने वाले लोग

हॉकी इंडिया और कप्तान हरमनप्रीत सिंह ने स्पष्ट रूप से बताया कि नीले एस्ट्रोटर्फ (Blue Turf) पर नारंगी जर्सी से बॉल और खिलाड़ियों की विजिबिलिटी बेहतर होती है। लेकिन खेल के इस तकनीकी पहलू (Scientific/Technical reason) को समझे बिना राजनीतिक रंग देना इस बात को साबित करता है कि विरोध केवल रंग को लेकर है, खेल के प्रदर्शन से नहीं।

भारतीय खेलों में जर्सी के रंग को लेकर होने वाली बहस यह दर्शाती है कि हमारे देश में खेल केवल मनोरंजन या प्रतिस्पर्धा नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक और राजनीतिक विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम भी बन चुके हैं। हालाँकि जब खिलाड़ी मैदान पर उतरते हैं, तो उनके सीने पर लिखा ‘INDIA’ और तिरंगा ही सबसे ज्यादा मायने रखता है। चाहे नीली जर्सी हो या भगवा, खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व करने उतरते हैं। खेल प्रशंसकों का मानना है कि जर्सी के रंग पर राजनीति करने के बजाय ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि हमारी टीम मैदान पर कैसा प्रदर्शन कर रही है और देश के लिए कितने पदक जीत रही है।

PM मोदी की 4 REEL के पीछे छिपे सरकार के 4 बड़े एक्शन: 1 हफ्ते में पेपर लीक पर फास्ट ट्रैक कोर्ट से लेकर नए बिल तक, जानें क्या-क्या हुआ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले एक हफ्ते में इंस्टाग्राम पर लगातार चौथी सेल्फी-स्टाइल रील (Reel) पोस्ट की है। आमतौर पर किसी प्रधानमंत्री का इतने कम समय में लगातार सोशल मीडिया के जरिए युवाओं से संवाद का विषय बनता है। लेकिन इस बार सिर्फ रीलें ही चर्चा में नहीं हैं, बल्कि उन 4 रील के पीछे दिख रहे सरकार के 4 बड़े एक्शन भी हैं। खासकर NEET पेपर लीक मामले में केंद्र सरकार ने पिछले एक हफ्ते के भीतर जिस तेजी से फैसले लिए हैं, उस पर भी नजर डालनी चाहिए।

फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का ऐलान, परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए हाई पावर्ड टास्क फोर्स का गठन, CBI की चार्जशीट दाखिल होना और फिर पेपर लीक रोकने वाले कानून को और सख्त बनाने के लिए संशोधन विधेयक संसद से पास कराना… एक के बाद एक कई बड़े कदम उठाए गए।

इन सभी फैसलों की जानकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी समय-समय पर इंस्टाग्राम रील के जरिए देश के युवाओं तक पहुँचाई। अब चौथी रील में पीएम मोदी ने अब तक हुई कार्रवाई का पूरा अपडेट देते हुए भरोसेमंद परीक्षा व्यवस्था बनाने की दिशा में सरकार की आगे की रणनीति भी बताई।

उन्होंने कहा कि टास्क फोर्स बनाई गई है, फास्ट ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था की जा रही है, राज्यों के सुझाव लिए जा रहे हैं और शिक्षा व्यवस्था में टेक्नोलॉजी का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल किया जाएगा ताकि भविष्य में पेपर लीक जैसी घटनाओं पर पूरी तरह रोक लगाई जा सके।

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि संसद के दोनों सदनों में व्यापक चर्चा के बाद पेपर लीक से जुड़े विधेयक को भी मंजूरी मिल चुकी है और अब बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले पेपर लीक माफियाओं पर पहले से ज्यादा सख्त कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया है।

पहली रील में GenZ युवाओं से फास्ट ट्रैक कोर्ट का वादा

जब NEET पेपर लीक को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में प्रदर्शन तेज हो रहे थे, उस माहौल में पीएम मोदी ने पिछले हफ्ते आधी रात को इंस्टाग्राम पर अपनी पहली सेल्फी-स्टाइल रील जारी की। उन्होंने युवाओं को ‘मेरे दोस्तों’ कहकर संबोधित किया और कहा कि जिन लोगों ने मेहनत करने वाले छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है, उन्हें किसी भी कीमत पर छोड़ा नहीं जाएगा।

इस रील को 24 घंटे से भी कम समय में 300 मिलियन से ज्यादा लोगों ने देखा।

इसी वीडियो में उन्होंने सबसे बड़ा ऐलान किया कि पेपर लीक और परीक्षाओं में गड़बड़ी से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएँगे। इस फास्ट ट्रैक कोर्ट में दिल्ली हाई कोर्ट के जज अनु ग्रोवर बलीगा को विशेष न्यायाधीश नियुक्त किया गया है। सरकार का मानना है कि अभी ऐसे मामलों में जाँच और मुकदमे लंबे समय तक चलते हैं, जिससे अपराधियों के मन में कानून का डर कम हो जाता है। फास्ट ट्रैक कोर्ट बनने के बाद ऐसे मामलों की सुनवाई तेजी से होगी और दोषियों को जल्द सजा मिल सकेगी।

बता दें कि फास्ट ट्रैक कोर्ट सामान्य अदालतों से अलग होते हैं। इन्हें किसी खास या गंभीर मामलों की जल्द सुनवाई के लिए बनाया जाता है। इससे सरकार बताना चाहती है कि पेपर लीक जैसे संगठित अपराधों में अगर फैसला जल्दी आएगा तो भविष्य में ऐसे गिरोहों पर प्रभावी रोक लग सकेगी। यही वजह है कि सरकार ने इसे परीक्षा में सुधार की दिशा में पहला बड़ा कदम भी बताया।

दूसरी रील में युवाओं का किया धन्यवाद

पहली रील को सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों ने देखा और उस पर अपनी प्रतिक्रिया दी। इसके बाद अगले ही दिन प्रधानमंत्री मोदी ने दूसरी इंस्टाग्राम रील पोस्ट की। इस वीडियो में उन्होंने किसी नई योजना का ऐलान नहीं किया, बल्कि युवाओं को पहले वीडियो पर मिले समर्थन के लिए धन्यवाद कहा।

इस दौरान उन्होंने एक बार फिर GenZ युवाओं को ‘मेरे दोस्त’ कहकर संबोधित किया। उन्होंने कहा कि छात्रों की चिंताओं को सरकार गंभीरता से सुन रही है और परीक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए लगातार फैसले लिए जा रहे हैं। उन्होंने युवाओं से भरोसा बनाए रखने की अपील भी की और कहा कि सरकार केवल बयान नहीं दे रही, बल्कि लगातार कार्रवाई भी कर रही है।

तीसरी रील में हाई पावर्ड टास्क फोर्स बनाने का ऐलान

फास्ट ट्रैक कोर्ट के ऐलान के तीन दिन बाद प्रधानमंत्री मोदी ने तीसरी इंस्टाग्राम रील जारी की। इस बार उनका फोकस सिर्फ दोषियों को सजा दिलाने पर नहीं, बल्कि पूरी परीक्षा व्यवस्था में सुधार करने पर था।

प्रधानमंत्री ने बताया कि केंद्र सरकार ने परीक्षा प्रणाली की समीक्षा और उसमें सुधार के लिए एक हाई पावर्ड टास्क फोर्स का गठन किया है। इस टास्क फोर्स की अध्यक्षता इंफोसिस के सह-संस्थापक और आधार परियोजना के पूर्व प्रमुख नंदन नीलेकणी को सौंपी गई है। इसमें शिक्षा, तकनीक, साइबर सुरक्षा और प्रशासन से जुड़े विशेषज्ञ शामिल किए गए हैं।

इस टास्क फोर्स का काम केवल पेपर लीक की जाँच करना नहीं है। इसका उद्देश्य पूरी परीक्षा प्रणाली की समीक्षा करना, कमजोर कड़ियों की पहचान करना, डिजिटल सुरक्षा बढ़ाना, प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर परीक्षा केंद्र तक की पूरी प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित बनाना और भविष्य के लिए ऐसे सुझाव देना है, जिनसे पेपर लीक जैसी घटनाओं की संभावना न्यूनतम हो सके।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी तीसरी रील में कहा कि सरकार अब केवल अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना चाहती है जिसमें भविष्य में किसी भी छात्र का भविष्य पेपर लीक माफिया की वजह से खतरे में न पड़े।

CBI की चार्जशीट ने जाँच को निर्णायक मोड़ पर पहुँचाया

इसी बीच NEET पेपर लीक मामले की जाँच कर रही CBI ने भी कार्रवाई तेज कर दी। सरकार की ओर से परीक्षा व्यवस्था में सुधार के फैसले लिए जा रहे थे, वहीं दूसरी तरफ जाँच एजेंसी अदालत में सबूत पेश करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही थी।

CBI ने NEET पेपर लीक मामले में अपनी चार्जशीट दिल्ली की राउड एवेन्यू कोर्ट में दाखिल करते हुए 13 आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), भ्रष्टाचार निरोधक कानून और सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम से जुड़े कानून की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए। जाँच एजेंसी ने अदालत को बताया कि यह कोई सामान्य नकल का मामला नहीं था, बल्कि एक संगठित नेटवर्क के जरिए प्रश्नपत्र लीक करने, उसे अभ्यर्थियों तक पहुँचाने और इसके बदले मोटी रकम वसूलने की साजिश रची गई थी।

CBI की आर्थिक अपराध शाखा की ओर से दाखिल चार्जशीट में 360 गवाहों के बयान, 422 महत्वपूर्ण दस्तावेज और 43 भौतिक साक्ष्यों को शामिल किया गया है। जाँच एजेंसी के अनुसार, डिजिटल फॉरेंसिक रिपोर्ट, हस्तलेखन विशेषज्ञों की राय और विषय विशेषज्ञों की जाँच से यह पुष्टि हुई है कि परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र का अवैध रूप से प्रसार किया गया था।

चार्जशीट में कुल 13 लोगों को आरोपित बनाया गया है। इनमें राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) से जुड़े बायोलॉजी विशेषज्ञ मनीषा मंधारे, केमिस्ट्री विशेषज्ञ प्रह्लाद विठ्ठलराव कुलकर्णी और फिजिक्स विशेषज्ञ मनीषा संजय हवालदार के अलावा कई बिचौलिए शामिल हैं। आरोपितों में यश यादव, मंगलिलाल बिवाल, दिनेश बिवाल, विकास बिवाल, शुभम माधुकर खैरनार, धनंजय निवृत्ति लोखंडे, मनीषा संजय वाघमारे और डॉ मनोज भगवानराव शिरुरे के नाम भी हैं।

संसद से पास हुआ एंटी पेपर लीक बिल

मामले में जाँच के साथ-साथ सरकार ने भविष्य के लिए भी ठोस कदम उठाए। केंद्र सरकार ने पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) संशोधन विधेयक, 2026 संसद में पेश किया। लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों में इस पर चर्चा हुई और बाद में इसे पारित कर दिया गया।

इस संशोधित विधेयक में पेपर लीक जैसी गंभीर अपराधों को लेकर, अधिनियम की धारा 10 के तहत अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने वालों के लिए न्यूनतम सजा 3 वर्ष से बढ़ाकर 5 वर्ष कर दी जाएगी, जबकि अधिकतम सजा 10 वर्ष तक हो सकेगी। इसके साथ ही दोषियों पर अधिकतम 50 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा।

परीक्षा आयोजित करने वाली सेवा प्रदाता एजेंसियों के लिए अधिकतम जुर्माना 1 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपए कर दिया गया है। साथ ही सार्वजनिक परीक्षाएँ आयोजित करने से प्रतिबंधित किए जाने की अवधि 4 वर्ष से बढ़ाकर 8 वर्ष कर दी जाएगी।

अगर किसी सेवा प्रदाता संस्था के निदेशक या जिम्मेदार अधिकारी दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें भी कम से कम 5 वर्ष की कैद होगी, जो पहले 3 वर्ष थी, और उन पर 5 करोड़ रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा। वहीं धारा 11 के तहत संगठित अपराध के मामलों में न्यूनतम सजा 5 वर्ष से बढ़ाकर 7 वर्ष कर दी जाएगी। जबकि न्यूनतम जुर्माना 1 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपए कर दिया जाएगा।

एक हफ्ते में सरकार के ताबड़तोड़ फैसले

अगर पिछले एक हफ्ते के घटनाक्रम को क्रमवार देखा जाए तो साफ दिखाई देता है कि सरकार ने NEET पेपर लीक मामले पर अलग-अलग स्तरों पर कार्रवाई की। सबसे पहले छात्रों से सीधे संवाद किया गया और फास्ट ट्रैक कोर्ट का ऐलान हुआ। इसके बाद परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए हाई पावर्ड टास्क फोर्स बनाई गई। इसी दौरान CBI ने अपनी जाँच को आगे बढ़ाते हुए चार्जशीट दाखिल की। फिर संसद ने संशोधित एंटी पेपर लीक विधेयक को मंजूरी दी और आखिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चौथी इंस्टाग्राम रील के जरिए इन सभी कदमों को जोड़ते हुए देश के युवाओं को सरकार की पूरी कार्ययोजना बताई।

यानी पिछले एक हफ्ते में सरकार की रणनीति केवल बयान देने तक सीमित नहीं रही। एक तरफ जाँच एजेंसियाँ कार्रवाई करती रहीं, दूसरी तरफ परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए संस्थागत बदलाव किए गए और साथ ही कानून को भी पहले से ज्यादा सख्त बनाने की दिशा में कदम उठाए गए। यही संदेश प्रधानमंत्री की चारों इंस्टाग्राम रील में भी लगातार दिखाई देता है।

स्पेन में घुसे हजारों अफ्रीकी घुसपैठियों को संभालने के लिए सेना तैनात, SC का आदेश बना ढाल: जानिए 6 साल पहले कैसे तबाही की कगार पर पहुँचा था यूरोप, भारत में भी घुसपैठियों के पास कानूनी ढाल

यूरोप एक बार फिर अवैध शरणार्थियों के नाम से काँप रहा है। दरअसल अफ्रीकी देश मोरक्को से बड़ी संख्या में अवैध शरणार्थी स्पेन में घुस गए हैं। ये लोग समुद्र तैर कर या जमीनी बॉर्डर के जरिए अवैध तरीके से स्पेन में घुस रहे हैं। सेउटा में घुसने से माइग्रेंट स्पेन के इलाके और आगे चलकर EU के इलाके में आ सकते हैं, जहाँ वे शरण माँग सकते हैं।

इन शरणार्थियों ने 8 साल पहले सीरिया संकट की याद ताजा कर दी है, जब यूरोप में बड़े पैमाने पर कट्टरपंथी शरणार्थी के तौर पर आए थे। स्पेन, फ्रांस, स्वीडन, जर्मनी समेत कई देशों में इनकी संख्या इतनी बढ़ गई कि प्रशासनिक व्यवस्था चरमराने लगी। इसकी याद दिलाते हुए इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने शरणार्थियों के नए दौर पर चिंता जाहिर की है और कहा है कि वे स्पेन के साथ शेंगेन समझौता रद्द कर सकते हैं।

क्या है मामला

सेउटा मोरक्को के उत्तरी तट पर स्पेन के कंट्रोल वाला एक छोटा सा इलाका है। इससे सटे मेलिला एन्क्लेव में अफ्रीका और यूरोपियन यूनियन का जमीनी बॉर्डर है। सेउटा में हजारों शरणार्थी ब्रेकवॉटर के आस-पास तैरकर या बॉर्डर की बाड़ तोड़कर घुस गए हैं, जिससे छोटा-सा यूरोपियन देश स्पेन पर काफी दबाव बढ़ गया है। यहाँ तक कि स्पेन को सेना और ज्यादा पुलिस बल तैनात करनी पड़ी है।

अवैध तरीके से घुस आए बेलगाम शरणार्थियों के चलते बवाल मच गया है। यहाँ बड़ा मानवीय और सुरक्षा संकट पैदा हो गया है। दरअसल अचानक हजारों शरणार्थी सीमा पार कर घुसने लगे। फॉक्स न्यूज के मुताबिक, हजारों शरणार्थी मोरक्को की सीमा पार कर स्पेन के शहर सेउटा में दाखिल हुए। नए जत्थे में 1500 से ज्यादा शरणार्थी हैं, जो समुद्र के रास्ते शहर में दाखिल हो रहे हैं। सेउटा के प्रशासनिक अधिकारी जुआन जीसस विवास के मुताबिक, पिछले हफ्ते भर से शरणार्थियों का आना काफी बढ़ गया है और संसाधनों की कमी हो रही है।

स्पेन में घुस रहे शरणार्थियों का वीडियो भी सामने आया है। सैकड़ों लोग इन्फ्लेटेबल ट्यूब और दूसरे फ्लोटेशन डिवाइस का इस्तेमाल करके ब्रेकवाटर के आसपास तैरते हुए दिखे। हजारों लोग जमीनी सीमा के गेट से घुसते दिखाई दिए। इससे घबरा कर सीमा पर तैनात सुरक्षाकर्मी घबरा कर भाग गए।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेन के सरकारी ब्रॉडकास्टर TVE ने अंदाजा लगाया है कि करीब 3000 लोग इस इलाके में घुसे हैं। समुद्र पार करते वक्त 9 शरणार्थियों की लाश भी पुलिस ने बरामद की है। इन शरणार्थियों में ज्यादातर मोरक्को के नागरिक हैं। दरअसल यूरोप में जमीन से घुसने का एकमात्र रास्ता मोरक्को और स्पेन की सीमा है। यहाँ तक कि सबसे आसान समुद्री रास्ता भी स्पेन तक ही जाता है। इसलिए 2021 के बाद 30 जुलाई 2026 को सबसे ज्यादा शरणार्थी स्पेन में घुस आए हैं। इसके साथ ही लगातार इनके आने का सिलसिला जारी है।

स्थानीय प्रशासन ने केन्द्र को आर्मी तैनात करने और नेशनल इमरजैंसी घोषित करने की माँग की है। स्पेन में आर्मी की हलचल तेज है। बख्तरबंद गाड़ियाँ घूमने लगी हैं। हालाँकि आपातकाल की घोषणा नहीं की गई है।

क्या कहा मेलोनी ने

स्पेन में बॉर्डर पर बवाल के बाद इटली भी सचेत हो गया है। अवैध शरणार्थियों के आने पर इटली ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने कहा कि वह ‘कड़े उपायों’ पर विचार कर रही हैं। उन्होंने स्पेन के साथ शेंगेन समझौते (Schengen Agreement) को अस्थायी रूप से निलंबित करने की चेतावनी दी है।

यूरोपीय देशों के बीच सीमा खुला रखने से जुडा शेंगेन समझौता इसके सदस्य देशों के बीच 1985 में हुई थी। जिसके तहत सदस्य देशों ने अपनी आपसी सीमाओं पर नियंत्रण समाप्त कर दिया है यानी इटली ने अपनी सीमा सील करने की चेतावनी दी है।

मेलोनी ने X पर लिखा, “सेउटा से आ रही तस्वीरें चौंकाने वाली हैं और एक बार फिर दिखाती हैं कि बिना कंट्रोल के अवैध घुसपैठ यूरोप के बॉर्डर की सिक्योरिटी के लिए एक बड़ा खतरा है।”

उन्होंने कहा कि इटली इस पर विचार कर रहा है कि वह स्पेन के साथ शेंगेन एरिया को सस्पेंड कर दिया जाए। हालाँकि मेलोनी ने यह नहीं बताया कि ऐसा कैसे किया जाएगा।

स्पेन के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आई शरणार्थियों की बाढ़

शरणार्थियों को लगता है कि यहाँ पहुँचने पर स्पेन के मुख्य भाग में एंट्री हो जाएगी और फिर यूरोपीय यूनियन के देशों तक पहुँचना आसान हो जाएगा।

स्पेन का मानना है कि मोरक्को और दूसरे अफ्रीकी देशों से जो शरणार्थी आ रहे हैं, उसके पीछे तस्करी करने वाले नेटवर्क का हाथ है। हाल ही में स्पेन के सुप्रीम कोर्ट ने बिना सही प्रक्रिया के समुद्र के रास्ते सेउटा में आने वाले शरणार्थियों को तुरंत वापस लौटने पर रोक लगा दी थी। स्पेन के सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मोरक्को के रास्ते सेउटा-मेलिला आने वाले शरणार्थियों को पकड़े जाने पर बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के सीधा मोरक्को नहीं भेजा जा सकता है। इससे तस्करी करने वाले नेटवर्क को बढ़ावा मिला है।

शरणार्थी सेउटा पहुँचने से पहले मोरक्को के शहर फनीडेक में इकट्ठा हो रहे हैं। मोरक्को के सुरक्षा बल इन पर काबू पाने की कोशिश कर रहे हैं और इन पर पानी की बौछारें की जा रही हैं, लेकिन ये टस से मस नहीं हो रहे।

स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज और गृह मंत्री फर्नांडो ग्रांडे-मार्लास्का के शुक्रवार को सेउटा जाकर लोकल अधिकारियों और सुरक्षा कर्मियों से मुलाकात की है। साथ ही मोरक्को के साथ कोऑर्डिनेट कर जो लोग अवैध तरीके से आए हैं, उन्हें वापस भेजने को लेकर वार्ता करेंगे।

2011-21 के बीच सेउटा में घुस आए थे शरणार्थी

स्पेन के साथ डिप्लोमैटिक विवाद के बीच मई 2021 में मोरक्को ने सीमा पर ढील दे दी थी, जिससे मात्र दो दिनों में हजारों लोग सेउटा घुस आए थे। इन अवैध शरणार्थियों में कई नाबालिग शामिल थे। नई शरणार्थियों की घुसपैठ से स्पेन और मोरक्को के रिश्तों पर असर पड़ने की आशंका है। हालाँकि अभी तक दोनों देशों ने सहयोग करने की बात कही है।

साल 2011 में शुरू हुए सीरियाई गृहयुद्ध और आईएसआईएस के आतंक से बचने के लिए लाखों सीरियाई यूरोपीय यूनियन के देशों में शरणार्थी बन कर आए। इनके यूरोप पहुँचने के कई मार्ग थे, जिनमें मोरक्को से होते हुए स्पेन तक पहुँचना भी एक था। उस वक्त भी इनलोगों ने समुद्री और जमीनी रास्ते को वैसे ही चुना था, जैसा अभी हो रहा है।

यहाँ से यूरोप के दूसरे देशों में ये पहुँचे। जर्मनी, स्वीडन, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड जैसे अमीर यूरोपीय देशों ने इनके लिए अपनी ‘मानवीयता’ दिखाई। इनलोगों को शरण दी गई। इसके बाद 2015 में यूरोप का प्रवासी संकट भी आया और यूरोप के ज्यादातर देशों में कट्टरपंथियों की जमात बढ़ गई। हालात ये है कि इंग्लैंड, फ्राँस, जर्मनी समेत सारे देश अब क्राइम काफी बढ़ गया है। इस्लामी ग्रूमिंग गैंग लगातार स्थानीय नाबालिग लड़कियों को अपना निशाना बना रहे हैं। रेप, लूट-पाट, नशे की तस्करी जैसे क्राइम से निपटना स्थानीय सुरक्षा बलों के लिए मुश्किल हो रहा है।

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में घुसपैठियों को लेकर कहा है कि अफ्रीका और दुनिया के दूसरे हिस्सों से आने वाले घुसपैठिए यूरोपीय देशों और यूके के लिए खतरा हैं। ये लोग यूरोप की पहचान और संस्कृति को नष्ट कर रहे हैं। उन्होंने इसको लेकर यूरोपीय नेताओं की आलोचना भी की थी कि उन्होंने नरमी बरती और कड़े कदम नहीं उठाए।

यूरोप की इस समस्या से भारत भी दो चार होता रहा है। यहाँ अवैध घुसपैठियों की वजह से दशकों से कई दिक्कतें पेश आ रही हैं। असम से पश्चिम बंगाल तक बांग्लादेशी घुसपैठियों से सिर्फ आबादी ही नहीं बढ़ी है, बल्कि सीमावर्ती इलाकों में जबरदस्त तरीके से डेमोग्राफी भी बदली है।

संसद में विदेश मामलों की स्थाई समिति ने बांग्लादेश से भारत में होने वाली अवैध घुसपैठ पर चिंता जताते हुए इस पर ज्वाइंट वर्किंग ग्रुप तैयार करने की बात कही है। ताकि बांग्लादेशी घुसपैठियों की राष्ट्रीयता की पुष्टि होने और उनके प्रत्यर्पण पर निगरानी रखने में आसानी हो। समिति के मुताबिक, अभी 2369 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों की राष्ट्रीयता की पुष्टि के मामले बांग्लादेश सरकार के पास लंबित हैं।

ये तो उन नागरिकों की बात है, जिनके मामले सामने आए हैं। लेकिन भारत में ऐसे अवैध घुसपैठियों के मामले अक्सर सामने आते हैं, जिनका पता सालों बाद चलता है। इनके वजह से भारत के संसाधनों पर असर पड़ता है और रोजगार प्रभावित होते हैं। चुनाव में ये लोग पार्टियों के वोट बैंक बन जाते हैं और उनके पास भारत के वोटर कार्ड से लेकर आधार कार्ड तक पहुँच जाता है। ये लोग रोजगार पर बहुत ज्यादा दबाव डालते हैं। चुनावों में इसका असर भी दिखता है।

न सिर्फ राजनीतिक- सामाजिक तौर पर बल्कि आर्थिक तौर पर भी इससे देश कमजोर होता है। घुसपैठियों के खिलाफ अभियान चलाने के दौरान कई बार मानवाधिकार की बात की जाती है। सुप्रीम कोर्ट तक में कई ऐसे मामले दर्ज हैं। कोर्ट ने घुसपैठियों को लेकर कहा है कि उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

लेकिन स्थानीय स्तर पर मिलने वाले फर्जी दस्तावेज और कानूनों की कुछ सीमाएं उन्हें अनौपचारिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और मिलीभगत से आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसे कागजात बन जाने के कारण पुलिस या प्रशासन के लिए तुरंत पहचान करना मुश्किल होता है। अगर पहचान हो भी गई तो कोर्ट में मामला लंबित रहता है। बड़े बड़े वकील से लेकर पूरा लिबरल इकोसिस्टम उन्हें बचाने में लग जाता है।