भारत-अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील के विरोध में दिल्ली के किसान घाट पर 21 जुलाई 2026 (मंगलवार) को ‘देश बचाओ मोर्चा’ ने विरोध प्रदर्शन आयोजित किया है।
आयोजकों का कहना है कि देशभर से लगभग 550 किसान संगठनों और सामाजिक समूहों के प्रतिनिधि इस किसान महापंचायत में शामिल होंगे।
वहीं सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर पुलिस ने शंभू बॉर्डर को सील कर दिया है और घग्गर नदी के पुल पर बैरिकेड्स लगा दिए हैं, साथ ही सीमेंट से ब्लॉक भी बनाए गए हैं। किसी भी स्थिति को संभालने के लिए मौके पर पुलिस बल तैनात है।
किसान नेताओं के आरोप
किसान नेताओं का आरोप है कि पंजाब और हरियाणा, दोनों सरकारें उन्हें दिल्ली जाने से रोक रही हैं। उनका कहना है कि हरियाणा पुलिस ने पंजाब की सीमा में घुसकर रास्ते बंद कर दिए और पंजाब सरकार ने भी इसे नहीं रोका। पंजाब के अलग-अलग हिस्सों से किसानों को दिल्ली लाने के लिए बसों का इंतजाम किया गया था।
#WATCH | A large number of farmers reach Shambhu Border (Punjab-Haryana border) ahead of their scheduled march to Delhi today. Visuals from Patiala (Punjab) side. pic.twitter.com/dJtdEt0qti
मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि 16 जुलाई (गुरुवार) की सुबह लगभग 1000 किसानों को लेकर एक काफिला गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब से रवाना हुआ था, जो जीटी रोड से होकर शंभू बॉर्डर की ओर बढ़ा, लेकिन वहाँ पहले से ही भारी पुलिस बल तैनात था और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी।
इससे पहले, भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढ़ूनी को कुरुक्षेत्र में पुलिस ने दिल्ली जाते समय हिरासत में लिया था। वहीं संगठन के प्रवक्ता प्रिंस वरैच ने बताया था कि उनके कई कार्यकर्ताओं को पकड़ा जा रहा है ताकि वे इस प्रदर्शन में शामिल न हो सकें।
हरियाणा के अंबाला और कुरुक्षेत्र जैसे इलाकों से भी किसान दिल्ली के लिए निकले। किसान मजदूर संघर्ष कमेटी (KMSC) के नेता सरवन सिंह पंधेर ने बताया कि उनके संगठन के अलावा किसान मजदूर मोर्चा, आजाद किसान मोर्चा और भारतीय किसान मोर्चा (BKU), एकता संघर्ष के लोग भी पंजाब के अलग-अलग हिस्सों से दिल्ली कूच कर रहे हैं।
VIDEO | Haryana Police put concrete barricades at Shambhu border as farmers prepare to head to Delhi for a planned 'mahapanchayat' to protest against the proposed Indo-US trade deal.
पंधेर का कहना है कि सरकार इस समझौते को बिना किसानों, कृषि संगठनों से चर्चा किए गुप्त रूप से आगे बढ़ा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार इस विषय पर कोई आधिकारिक जानकारी साझा नहीं कर रही है और उन्हें समझौते से जुड़ी जानकारी केवल अमेरिका की प्रेस विज्ञप्तियों के माध्यम से मिल रही है। उन्होंने कहा कि किसान दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस समझौते पर स्पष्ट जवाब माँगेंगे।
उनके अनुसार हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सहित कई राज्यों से किसान और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि एक दिवसीय रैली में भाग लेने के लिए दिल्ली पहुँच रहे हैं।
पंधेर ने बताया कि फरवरी में जारी एक बयान में दोनों देशों ने सहमति जताई थी कि वे जल्द ही एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे। ऐसे में उन्हें डर है कि इसमें खेती, डेयरी, डिजिटल ट्रेड, ई-कॉमर्स और सरकारी खरीद जैसे संवेदनशील सेक्टर भी शामिल हो सकते हैं।
उन्होंने अमेरिकी रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका लंबे समय से भारत के डेयरी और कृषि बाजार में अपनी पहुँच बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। वह सोयाबीन, मक्का, कपास, सेब, बादाम, डेयरी और पोल्ट्री उत्पादों पर भारत के लगाए जाने वाले आयात शुल्क (टैरिफ) को कम करवाना चाहता है।
#WATCH | Amritsar, Punjab | Kisan Mazdoor Sangharsh Committee leader & coordinator for Desh Bachao Morcha, Sarwan Singh Pandher, along with farmers, to leave for Delhi today for a one-day rally to protest against India-US FTA
इसी तरह किसान मजदूर संघर्ष कमेटी के नेता जर्मनजीत सिंह बंदाला ने दावा किया कि इस समझौते से देश के मजदूरों, छोटे दुकानदारों और किसानों को भारी नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि यह समझौता भारतीय किसानों के बजाय अमेरिकी कंपनियों और बड़े किसानों को फायदा पहुँचाएगा।
बंदाला ने तर्क दिया कि अमेरिका में खेती हजारों एकड़ के बड़े फार्म्स में होती है और वहाँ की सरकार किसानों को भारी सब्सिडी देती है। इसके विपरीत, भारत के ज्यादातर किसानों के पास सिर्फ दो-ढाई एकड़ जमीन है और उन्हें बहुत कम सरकारी मदद मिलती है। अगर अमेरिका से सस्ता सामान भारत के बाजारों में आने लगा, तो भारतीय किसान प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएँगे और उनकी आमदनी गिर जाएगी।
उन्होंने आरोप लगाया कि भारत सरकार अमेरिकी दबाव में यह समझौता कर रही है, जबकि पिछली सरकारों ने भारतीय कृषि क्षेत्र को विदेशी प्रभाव से बचाकर रखा था। किसान नेताओं ने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने उनकी माँगें नहीं मानीं, तो वे इस आंदोलन को और तेज करेंगे।
क्या है दावों की असलियत
मालूम हो कि भले ही इस ट्रेड डील को कुछ किसान संगठन, बेहद खतरनाक दिखाकर हंगामा और विरोध कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता अभी तक तय नहीं हुआ है और इसकी वजह यही है कि ये मोदी सरकार किसानों के हितों को ताक पर रखकर किसी प्रकार का समझौता करने को तैयार नहीं है।
अब ऐसी स्थिति में तो साफ लगता है कि जो आरोप लगाए जा रहे हैं, वे तथ्यों पर कम और सिर्फ आशंकाओं और अफवाहों पर ज्यादा आधारित हैं। दरअसल, हकीकत यह है कि केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और शिवराज सिंह चौहान बार-बार साफ कर चुके हैं कि बातचीत जारी है और भारत अपने किसानों या डेयरी सेक्टर के हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। ऐसा कोई फैसला नहीं लिया जाएगा जिससे घरेलू बाजार को नुकसान पहुँचे।
इसके अलावा फरवरी में दोनों देशों द्वारा जारी बयान के अनुसार, जिन चीजों पर टैक्स घटाने की बात चल रही है (जैसे जानवरों का दाना, मेवे, वाइन, सोयाबीन तेल आदि), वे ऐसी चीजें हैं जिन्हें भारत अपनी जरूरत पूरी करने के लिए पहले से आयात करता रहा है। इस समझौते में चावल, गेहूँ या मक्के जैसी मुख्य खाद्य फसलों का कोई जिक्र नहीं है। यह छूट सिर्फ उन चीजों के लिए है जिनका भारतीय किसानों की मुख्य फसलों से कोई सीधा मुकाबला नहीं है।
अब यदि किसानों के हितों की चिंता करने वालों को केंद्रीय मंत्री के बयान पर भी भरोसा नहीं है तो उन्हें अमेरिकी कॉमर्स सेक्रेट्री हॉवर्ड लुटनिक का बयान भी सुनना चाहिए, जो उन्होंने एक समय में गुस्से में दिया था। उन्होंने पिछले साल कहा था, “भारत के पास 1.4 अरब लोग हैं, फिर भी वे हमसे एक बोरा मक्का तक नहीं खरीदते। वे अपनी हर चीज हमें बेचते हैं, लेकिन हमारे सामान पर भारी टैक्स लगा देते हैं।”
अमेरिकी मंत्री का यह बयान खुद साबित करता है कि वह भारतीय बाजार में पैठ बनाने के लिए आतुर हैं, लेकिन भारत सरकार किसी दबाव में नहीं झुक रही है और उनके लिए किसान हित सर्वोपरि है।
पीएम मोदी ने तो खुद दोहराया है, “हमारे लिए किसानों का हित सबसे ऊपर है। भारत अपने किसानों, पशुपालकों और मछुआरों के हितों से कभी समझौता नहीं करेगा, चाहे इसकी जो भी कीमत चुकानी पड़े।”
किसान हित या स्वार्थ का खेल?
अब ये समझने की जरूरत है कि कैसे किसानों का नाम लेकर बनाए गए ये संगठन अक्सर कृषि सुधारों के रास्ते और किसानों के विकास में सबसे बड़ी रुकावट बनकर सामने आते हैं। यही स्थिति तीनों कृषि कानूनों के समय भी देखी गई थी।
वे ऐसे कानून थे, जो किसानों को यह आजादी देते थे कि वे सरकारी मंडियों (APMC) के बिचौलियों से बचकर अपनी फसल सीधे कंपनियों या प्राइवेट खरीदारों को अच्छे दामों पर बेच सकें। लेकिन फर्जी प्रचार फैलाकर आंदोलन खड़ा किया गया कि सरकार किसानों की जमीन छीन लेगी, और अंततः हिंसा व दबाव के कारण उन प्रगतिशील कानूनों को वापस लेना पड़ा।
अब जब भारत एक बड़े व्यापारिक समझौते के जरिए अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की ओर बढ़ रहा है, तो ये संगठन एक बार फिर बिना पूरी बात समझे सड़कों पर उतर आए हैं।
अगर इनका मकसद सच में किसानों की भलाई होता, तो वे सरकार के साथ बैठकर बातचीत का रास्ता चुनते, न कि बार-बार रास्ते जाम करके आम जनता और यात्रियों के लिए मुसीबत खड़ी करते।
इनका उद्देश्य, कृषि कानून को नकारने से लेकर ट्रेड डील का विरोध करने तक साफ है कि ये लोग मौके का फायदा उठाकर केवल अपने राजनीतिक और आर्थिक स्वार्थ पूरे करने का प्रयास करते हैं।
(नोट: मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में रुकमा राठौड़ ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
वामपंथी प्रचार पोर्टल ‘द वायर’ ने दावा किया कि भारत में छात्रों का विरोध प्रदर्शन ‘लंदन तक पहुँच गया है’ और दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व वाले प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई की खबरों के बाद भारतीय उच्चायोग के बाहर जमा हुए लोगों की तस्वीरें साझा करते हुए कहा है कि यह स्वतःस्फूर्त था।
गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस ने सीजेपी समर्थकों को संसद मार्च की अनुमति नहीं दी थी। इसके बावजूद इन लोगों ने बेहद संवेदनशील इस जगह पर मार्च निकाला और संसद तक जाने की कोशिश की। कई जगहों पर प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई। इस दौरान 5 आईपीएस अधिकारी समेत कई पुलिस वाले घायल हुए। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में कई प्रदर्शनकारी भी घायल हुए हैं।
‘द वायर’ ने सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट में कहा, “युवाओं का विरोध प्रदर्शन लंदन तक पहुँचा, प्रदर्शनकारी भारतीय उच्चायोग के बाहर जमा हुए।” उसने दावा किया कि दिल्ली और दूसरे शहरों में पुलिसिया कार्रवाई की खबर मिलने के बाद ‘बड़ी संख्या में’ लोग उच्चायोग के बाहर इकट्ठा हुए।
पोर्टल ने इस जमावड़े को ब्रिटेन में रहने वाले भारतीयों की स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया बताया और इस तथ्य को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया कि स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) की यूके शाखा ने पहले ही तय समय पर लंदन में भारतीय उच्चायोग के बाहर विरोध प्रदर्शन का आह्वान कर रखा था।
एसएफआई यूके ने विरोध प्रदर्शन की घोषणा पहले ही कर दी थी और इसकी विस्तृत जानकारी उसके सोशल मीडिया पर शेयर किया था। संगठन ने स्थान और समय पहले ही बता दिया था, पोस्टर चिपकाए थे और अपनी माँगों की फेहरिस्त बता कर समर्थकों से इसमें भाग लेने का आह्वान किया था। एसएफआई से जुड़ी शाखा पिछले कई हफ्तों से यूके के दूसरे जगहों मसनल लीड्स और एडिनबर्ग में विरोध प्रदर्शन कर रही हैं।
मैनचेस्टर में हुए विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वाले एक सोशल मीडिया यूजर ने बाद में पुष्टि की कि वहाँ का प्रदर्शन भी एसएफआई यूके ने ही आयोजित किया था।
द वायर ने एसएफआई के विरोध प्रदर्शन को प्रवासी भारतीयों के प्रदर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। दरअसल यह लोगों को गुमराह करने का तरीका है। द वायर ने दिल्ली में सीजेपी समर्थकों के साथ हुई पुलिसिया झड़प का लंदन में भारतीय दूतावास के सामने ‘जवाब के रूप में’ प्रस्तुत किया। जबकि इस विरोध प्रदर्शन का ऐलान दिल्ली में हुए घटना से एक दिन पहले यानी 19 जुलाई को ही कर दी गई थी।
(साभार-एक्स)
पोस्टर पर ‘लंदन के कॉकरोच एकजुट हों’ का आह्वान किया गया था और लोगों से 20 जुलाई को शाम 6 बजे लंदन के इंडिया हाउस के बाहर ‘विरोध प्रदर्शन’ करने का आग्रह किया गया था। पोस्टर में तीन बातें थी। इसमें समर्थकों से भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों के साथ खड़े होने, सोनम वांगचुक का समर्थन करने और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की गई थी।
सबसे नीचे स्पष्ट रूप से लिखा था कि लंदन में आयोजित यह सभा ‘दिल्ली में संसद तक 20 जुलाई को हुए मार्च के समर्थन में’ आयोजित की जा रही है। लेकिन जैसा कि द वायर ने बताया है उस तरह से लोग विरोध प्रदर्शन के लिए जमा नहीं हुआ थे, बल्कि पहले से विरोध प्रदर्शन के लिए बुलाए जाने पर ये जमा हुआ थे। ये स्वत: स्फूर्त तो कतई नहीं था, जैसा द वायर बताने की कोशिश कर रहा है।
एसएफआई यूके ने विरोध प्रदर्शन के बाद लिखा कि लंदन में हजारों भारतीयों ने ‘हमारे आह्वान’ का जवाब दिया। उसने कहा कि यह प्रदर्शन भारतीय छात्र आंदोलन के समर्थन में आयोजित किया गया था और भारत में अपने ‘साथियों’ के संघर्ष को सलाम करता है। हालाँकि एसएफआई यूके ने दावा किया कि ‘हजारों’ लोग इकट्ठा हुए थे, लेकिन उसने जो वीडियो शेयर किया, उसमें कुछ लोग एक छोटी सी जगह में ठसाठस भरे हुए दिखाई दिए।
Thousands of Indians in London answered our call for action in solidarity with the Indian student movement. The demand for a just education system echoes across borders, and we salute the fierce struggle of our comrades in India against all forms of brutality ✊ pic.twitter.com/pRWiVsLrOM
— Students' Federation of India – United Kingdom (@sfi_uk) July 20, 2026
ब्रिटेन में हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल लोग एसएफआई के सदस्य थे या नहीं यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन आह्वान, प्रचार, आयोजन स्थल, संदेश और भाषण सभी एसएफआई यूके की ओर से ही किए गए थे। द वायर ने इन सभी संदर्भों को हटाकर एसएफआई द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को भारतीय प्रवासी समुदाय के ‘स्वाभाविक समर्थन’ के रूप में प्रस्तुत किया।
एसएफआई यूके कई हफ्तों से समर्थकों को जुटाने में जुटा था
जंतर-मंतर पर हुई झड़प के बाद लंदन में हुआ प्रदर्शन कोई अचानक नहीं था। एसएफआई यूके कम से कम जून की शुरुआत से ही केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग करते हुए अभियान चला रहा था।
संगठन ने 4 जून को SFI लीड्स समिति के विरोध प्रदर्शन की तस्वीरें पोस्ट कीं, जिसमें राष्ट्रीय परीक्षाओं, जिनमें NEET, CUET, UGC NET और CBSE परीक्षाएं शामिल हैं, के कुप्रबंधन का विरोध किया गया। संगठन ने कहा कि यह प्रदर्शन भारतीय शिक्षा प्रणाली को लेकर युवाओं के गुस्से और निराशा को दर्शाता है।
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उसी दिन की एक अन्य पोस्ट में कहा गया कि एसएफआई यूके की सचिव सोमिहा समेत दूसरे सदस्यों ने धर्मेंद्र प्रधान के तत्काल इस्तीफे की माँग की है। संगठन ने वादा किया कि जब तक उनकी माँगें पूरी नहीं हो जातीं, तब तक वे अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगे।
एसएफआई के केंद्रीय नेतृत्व ने राष्ट्रव्यापी अल्टीमेटम जारी किया था
विदेशों में चल रही यह मुहिम भारत में एसएफआई के केंद्रीय संगठन के अभियान के साथ-साथ चल रही थी। 9 जून को एसएफआई की केंद्रीय कार्यकारी समिति ने केंद्र सरकार को दस दिन का अल्टीमेटम दिया। इसकी माँगों में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, एनटीए को समाप्त करना और परीक्षाओं का विकेंद्रीकरण शामिल था।
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इसमें सीबीएसई परीक्षाओं में ओएसएम मूल्यांकन प्रणाली को रद्द करने और नीट और सीबीएसई परीक्षा विवादों की स्वतंत्र न्यायिक जाँच कराने की भी माँग की गई थी।
संगठन ने ‘सड़कों पर मिलते है’ कहा
एसएफआई ने 14 जून को दावा किया कि 22 राज्यों में 623 केंद्रों पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। संगठन के मुताबिक, 753 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 16 लोगों को जेल भेजा गया। एसएफआई यूके ने इस संदेश को दोबारा साझा करते हुए घोषणा की कि संगठन का ‘साहस’ अभी भी बना हुआ है।
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ये पोस्ट लगातार चल रहे एसएफआई के संगठनात्मक अभियान का हिस्सा था। ब्रिटेन में हुए विरोध प्रदर्शन उस व्यापक लामबंदी का हिस्सा था, न कि खुद ब खुद मोदी सरकार के विरोध में आए प्रवासी भारतीयों का प्रदर्शन था।
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लीड्स और एडिनबर्ग समितियों ने अलग-अलग प्रदर्शनों का आयोजन किया
एसएफआई यूके की सोशल मीडिया गतिविधि से यह भी पता चलता है कि कैसे इसकी स्थानीय समितियाँ एक ही माँगों को लेकर एकजुट हुईं। 14 जुलाई को इसकी लीड्स समिति ने पार्किंसंस बिल्डिंग के बाहर विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया। पोस्टर पर हैशटैग ‘प्रधान गोबैक’ लिखा था और घोषणा की गई थी, ‘पार्किंसंस लीड्स में तिलचट्टे जमा हो रहे हैं।’ प्रचार सामग्री में प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें, एसएफआई के प्रतीक चिन्ह और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग शामिल थी।
एसएफआई यूके ने 18 जुलाई को कहा कि उसकी एडिनबर्ग समिति ने जंतर-मंतर भूख हड़ताल और भारत में छात्र आंदोलन के समर्थन में एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था। संगठन ने अपने एडिनबर्ग अध्यक्ष को वक्ता के रूप में नामित किया और सभा में सामूहिक और संगठित आंदोलनों की आवश्यकता पर बल दिया।
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उसी दिन लीड्स समिति ने लीड्स विश्वविद्यालय में एक और प्रदर्शन आयोजित किया। एसएफआई यूके ने कहा कि प्रदर्शनकारियों ने सरकार से जवाबदेही और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की।
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इसमें सचिव सोमिहा और लीड्स सचिव गायत्री ने भी अपनी बात रखी। संगठन ने कहा कि माँगें पूरी होने तक एकजुटता जारी रहेगी। ये दिल्ली में हुई घटनाओं की खबर सुनकर स्वतंत्र रूप से एकत्रित हुई भीड़ नहीं थी। ये समिति के नेतृत्व में किए गए प्रदर्शन थे जिनमें नामित पदाधिकारी, एक जैसे बैनर और बार-बार दोहराई जाने वाली राजनीतिक माँगें शामिल थीं।
मैनचेस्टर के प्रदर्शनकारी ने पुष्टि की कि एसएफआई यूके ने ही इस सभा का आयोजन किया था। कमल नाम के एक सोशल मीडिया यूजर ने मैनचेस्टर में हुए प्रदर्शन का फुटेज भी पोस्ट किया और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की।
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जब एक अन्य यूजर ने पूछा कि क्या बर्मिंघम में भी इसी तरह का विरोध प्रदर्शन आयोजित किया जा सकता है, तो कमल ने जवाब दिया कि मैनचेस्टर में आयोजित कार्यक्रम एसएफआई यूके द्वारा आयोजित किया गया था और आगे की जानकारी के लिए उनके इंस्टाग्राम अकाउंट को फॉलो करने का सुझाव दिया।
इससे इस बात की और पुष्टि होती है कि एसएफआई अपने नेटवर्क का इस्तेमाल कई ब्रिटिश शहरों में प्रदर्शन आयोजित करने के लिए कर रहा था।
एसएफआई यूके दिल्ली विरोध प्रदर्शन के बाद गठित अनौपचारिक ग्रुप नहीं है
एसएफआई यूके खुद को स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की पहली अंतरराष्ट्रीय समिति बताती है। इसकी वेबसाइट का दावा है कि ब्रिटेन में इसके 600 से अधिक सदस्य और दस से अधिक उपसमितियां हैं। यह ब्रिटिश विश्वविद्यालयों में सक्रिय इकाइयाँ संचालित करने का दावा करती है और कहती है कि यह नियमित रूप से अभियान, सांस्कृतिक कार्यक्रम, धन जुटाने की गतिविधियाँ और छात्र कल्याणकारी कार्यक्रम आयोजित करती है।
इसके संविधान में कहा गया है कि एसएफआई का उद्देश्य भारत में छात्रों के साथ-साथ विदेशों में पढ़ रहे भारतीय छात्रों को एक मंच पर लाना है। यह एक ‘लोकतांत्रिक और समाजवादी समाज’ के निर्माण को लेकर कटिबद्ध है। छात्रों को श्रमिकों, किसानों और अन्य ‘प्रगतिशील शक्तियों’ के साथ संगठित करने और विश्व भर में समाजवादी आंदोलनों के प्रति एकजुटता दिखाने का आह्वान करता है।
सीपीएम का छात्र संगठन एसएफआई है। सीपीआई(एम) के पूर्व महासचिव सीताराम येचुरी सहित कई वरिष्ठ नेता इसी संगठन से उभरे और पार्टी नेतृत्व में शामिल होने से पहले एसएफआई में वरिष्ठ पदों पर रहे।
इसलिए एसएफआई यूके जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान उभरे छात्रों का कोई अनौपचारिक व्हाट्सएप समूह नहीं है। यह सदस्यों, समितियों, पदाधिकारियों और एक वैचारिक कार्यक्रम के साथ एक स्थापित वामपंथी राजनीतिक नेटवर्क का हिस्सा है।
बीबीसी और अल जजीरा ने इस आंदोलन को GEN Z के विद्रोह के रूप में पेश किया
जहाँ एक ओर ‘द वायर’ ने लंदन प्रदर्शन से एसएफआई को हटा दिया, वहीं अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों ने कहा कि दिल्ली में हुआ आंदोलन भारत में जेनरेशन जेड का विद्रोह है।
बीबीसी ने ‘जंतर मंतर: दिल्ली में जनरेशन Z का CJP विरोध प्रदर्शन किस बारे में है?’ शीर्षक से एक वीडियो विश्लेषण प्रसारित किया। साथ ही सोशल मीडिया पर पोस्ट कर पूछा कि राजधानी में हजारों लोग विरोध प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं।
एक दूसरे रिपोर्ट में, बीबीसी ने सीजेपी को शिक्षा और रोजगार सुधारों की माँग करने वाला युवाओं के नेतृत्व वाला विरोध आंदोलन बताया। इसने इस आंदोलन को हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर ‘सबसे बड़ा असंतोष’ बताया।
अल जजीरा ने सनसनीखेज शीर्षक का इस्तेमाल किया , ‘अभी या कभी नहीं : छात्रों ने भारत की संसद की ओर मार्च करने के लिए दिल्ली के लॉकडाउन को तोड़ा’
इस रिपोर्ट में सीजेपी को मोदी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बताया गया और दावा किया गया कि हजारों लोगों ने संगठन के आह्वान पर अपनी भागीदारी दी है। रिपोर्ट में पुलिस कार्रवाई पर पूरा जोर दिखा, प्रदर्शनकारियों के बयान शामिल किए गए और मोदी विरोधी खेमे के मशहूर चेहरे की टिप्पणी का हवाला दिया गया। इसमें कहा गया कि यह आंदोलन शिक्षा, रोजगार, महँगाई और गरीबी को लेकर असंतोष का परिणाम है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच ने दमनकारी कार्रवाई की मनगढ़ंत कहानी बताई
अमेरिका की एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी भारत में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के दमन का आरोप लगाया । अपने बयान में उसने जंतर-मंतर के ‘तस्वीरों और रिपोर्टों’ का हवाला देते हुए कहा कि दिल्ली पुलिस ने ‘बेवजह और अत्यधिक बल’ का प्रयोग किया। रिपोर्ट में पुलिसिया लाठीचार्ज, आँसू गैस के गोले छोड़े जाने और पत्थरबाजी से आरोपों की जाँच की माँग की।
एमनेस्टी ने सीजेपी को नेतृत्वकर्ता माना और परीक्षा में अनियमितताओं, मुआवजे और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से संबंधित माँगों को दोहराया।
ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी इस आंदोलन को हाल के वर्षों के सबसे बड़े सरकार विरोधी प्रदर्शनों में से एक बताया । उसने अधिकारियों से संयम बरतने, प्रदर्शन स्थल के पास मोबाइल इंटरनेट सेवाएँ बहाल करने और लोगों को शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन करने की व्यवस्था करने का आग्रह किया।
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एमनेस्टी और एचआरडब्ल्यू के रिपोर्टों में ये बताने की कोशिश की गई कि मोदी सरकार के खिलाफ युवा सड़कों पर हैं और उनका दमन किया जा रहा है।
भारतीय सरकार के खिलाफ एक सुनियोजित साजिश
एसएफआई यूके, लेफ्ट लिबरल गैंग, अंतरराष्ट्रीय मीडिया आउटलेट्स और एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे गैर-सरकारी संगठनों ने विरोध प्रदर्शनों को जिस तरह से बताने का प्रयास किया है, उससे लगता है कि भारत सरकार छात्रों के कल्याण के खिलाफ है। इस बात को मानने से पहले यह जानना आवश्यक है कि इन विरोध प्रदर्शनों को कैसे आयोजित किया गया और कैसे प्रस्तुत किया गया।
(साभार-एक्स)
जंतर-मंतर पर मौजूद सभी छात्र दुष्प्रचार का हिस्सा नहीं थे, लेकिन गैरकानूनी प्रदर्शनों में भाग लेने के कारण निर्दोष छात्रों को भी लाठीचार्ज और कानूनी मुकदमों को झेलना पड़ रहा है। अभिजीत दिपके, सौरभ दास और अन्य तथाकथित नेता या तो लाठियों और आँसू गैस से दूर खड़े थे या विरोध स्थलों पर मौजूद ही नहीं थे।
इन सबके बीच अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रचारित-प्रसारित की जा रही विरोध प्रदर्शन के कहानी की गहन जाँच-पड़ताल की आवश्यकता है और उसके पीछे मंशा को सामने लाने की जरूरत है।
‘द न्यूज मिनट’ ने सरकारी स्वामित्व वाली तेल कंपनी ओएनजीसी के बारे में एक रिपोर्ट 19 जुलाई 2026 को प्रकाशित किया । रिपोर्ट में कहा गया है कि ओएनजीसी ने आरएसएस से जुड़े 20 संगठनों को 670.97 करोड़ रुपए दिए। 2013 में सबसे पहले पैसे दिए गए। हालाँकि इसका अधिकांश हिस्सा पिछले 10 वर्षों में यानी 2015 और 2025 के बीच दिए गए, जो 668.01 करोड़ रुपए था।
इसी अवधि में, ONGC ने CSR पर कुल ₹4531 करोड़ खर्च किए। पूरे सीएसआर फंड 2000 से अधिक संगठनों के बीच बांटा गया यानी कुल फंड का केवल 14.7% हिस्सा ही इन 20 संस्थाओं को गया।
(द न्यूज मिनट रिपोर्ट)
न्यूज मिनट ने 20 संगठनों को तीन समूहों में विभाजित किया। नौ संगठन सीधे आरएसएस से जुड़े हैं। जबकि नौ दूसरे संगठनों की स्थापना आरएसएस से जुड़े लोगों ने की है या उनका संचालन आरएसएस के कार्यकर्ता कर रहे हैं। दो ने अतीत में आरएसएस के साथ काम किया है।
जिन दो संगठनों को सबसे अधिक धनराशि प्राप्त हुई, वे थे बीएवीपी (डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर वैद्यकीय प्रतिष्ठान) और डीएटीएसएएस (डॉ. आबाजी थाट्टे सेवा और अनुसंधान संस्था)। बीएवीपी को असम के शिवसागर में 300 बिस्तरों वाला अस्पताल बनाने के लिए लगभग 434 करोड़ रुपए मिले, वहीं डीएटीएसएएस को नागपुर में कैंसर अस्पताल के लिए लगभग 140 करोड़ रुपए मिले।
ये आँकड़े सीधे ओएनजीसी की सीएसआर वार्षिक रिपोर्ट से लिए गए हैं। ये आँकड़े ओएनजीसी की वेबसाइट पर उपलब्ध है। ये तथ्य है और इसे समझना बेहद जरूरी है।
बाकी करीब 85% हिस्सा किन संगठनों को मिला
आरएसएस से जुड़े संगठनों को 14.7% ही मिला, बाकि 85% से थोड़ा अधिक हिस्सा यानी 4531 करोड़ रुपए के CSR खर्च में से लगभग 3863 करोड़ रुपए उन संगठनों को दिए गए, जिनका RSS से कोई संबंध नहीं है। इनकी संख्या 1980 से अधिक है।
अगर हम ONGC की वार्षिक CSR रिपोर्टों को देखें, तो ये पता चलता है कि ये खर्च कितना ज्यादा है। ये रिपोर्ट 2018-19 से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। अकेले वित्तीय वर्ष 2024-25 में ONGC ने असम के एसएम देव सिविल अस्पताल और करीमगंज सिविल अस्पताल के लिए चिकित्सा उपकरण उपलब्ध कराए। इनमें एनेस्थीसिया वर्कस्टेशन, आईसीयू वेंटिलेटर और डिजिटल रेडियोग्राफी सिस्टम शामिल हैं।
कंपनी ने इसके साथ-साथ हरिद्वार के एक नर्सिंग कॉलेज के लिए सभागार बनवाया। कोयंबटूर में बाल विकास सेवाओं के लिए सात आंगनवाड़ी भवन बनवाए। गुरुग्राम में ब्रह्मा कुमारिस के रिट्रीट सेंटर के लिए एक सौर ऊर्जा संयंत्र और ठाणे की एक झील से कचरा साफ करने में मदद करने वाली एक AI-सक्षम मशीन के लिए रकम उपलब्ध कराया। इनमें से किसी भी संगठन का RSS से कोई संबंध नहीं है। इनमें सरकारी सिविल अस्पतालों से लेकर पश्चिम बंगाल में एम्बुलेंस सेवा चलाने वाले एक सिख धर्मार्थ ट्रस्ट तक का नाम है।
ओएनजीसी के वित्त वर्ष 2018-19 के रिकॉर्ड भी इसी तरह के पैटर्न को दर्शाते हैं। हेल्पएज इंडिया को देशभर में बुजुर्ग नागरिकों की सेवा करने वाली मोबाइल मेडिकल यूनिटों के लिए 7 करोड़ रुपये से अधिक की राशि दी गई। अक्षय पात्र फाउंडेशन को राजस्थान और झारखंड में स्कूली बच्चों को भोजन पहुँचाने के लिए वाहनों की फंडिंग की गई।
केरल में आई बाढ़ के दौरान, ओएनजीसी ने हैबिटेट फॉर ह्यूमैनिटी के माध्यम से राहत कार्यों के लिए फंडिंग की और तमिलनाडु में चक्रवात गाजा जब तबाही मचा रहा था तो उस वक्त स्थानीय रिलीफ संगठनों के माध्यम से इमरजेंसी भोजन और लाइट के लिए फंडिंग की।
उसी वर्ष हजारों छोटे अनुदान बिहार, गुजरात और उत्तर प्रदेश के गाँवों में शौचालय बनाने, दूरदराज के क्षेत्रों में हैंडपंप और सौर स्ट्रीट लाइट लगाने और राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीय विद्यालय स्कूलों को सहायता प्रदान करने के लिए दिए गए। इनमें से अकेले केंद्रीय विद्यालय को एक वर्ष में 53 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्राप्त हुई।
इस कार्य में विचारधारा कभी आड़े नहीं आता। संरक्षण कार्यों के लिए वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया और वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी इंडिया, प्रशिक्षण और अभियानों के लिए इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन, कई राज्यों में स्वच्छता परियोजनाओं के लिए सुलभ इंटरनेशनल और विकलांगों के संगठनों को मदद की। कंपनी ने भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति को भी मदद की थी, जो कम कीमत पर या फ्री में कृत्रिम अंग बाँटती हैं।
कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि ओएनजीसी का सीएसआर खर्च वास्तव में बड़ा है। कंपनी इसके माध्यम से स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, आपदा राहत, स्वच्छता, वन्यजीव संरक्षण और हाशिए पर पड़े समुदायों को मदद करती है। यह राष्ट्रीय गैर सरकारी संगठनों से लेकर स्थानीय ग्राम पंचायतों तक को मदद करती है। न्यूज़ मिनट ने अपनी रिपोर्ट में ₹668 करोड़ आरएसएस से जुड़े 20 संगठनों को देने की बात कही है वह सही है, लेकिन यह एक बहुत बड़े सीएसआर बजट का एक छोटा सा हिस्सा है।
न्यूज मिनट ने अधूरी जानकारी दी
यह देखना महत्वपूर्ण है कि 668 करोड़ रुपये की राशि वास्तव में 20 संगठनों के बीच कैसे वितरित की गई है। ₹668 करोड़ में से 574 करोड़ रुपए यानी लगभग 86% केवल दो संगठनों BAVP और DATSAS को दी गई। बाकी 18 संगठनों को करीब 94 करोड़ रुपए मिले। इस दौरान किसी संगठन को 1 करोड़ भी मिले तो किसी को 15.53 करोड़ रुपये भी दिए गए।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अस्पताल और कैंसर संस्थान बनाना महँगा पड़ता है। एक बड़ी स्वास्थ्य परियोजना पर आसानी से सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च हो सकते हैं, जबकि स्कूल, छात्रावास और आपदा राहत जैसे दूसरे सामाजिक सेवा संबंध (सीएसआर) कार्यों में काफी कम खर्च आता है। यही वजह है कि आरएसएस से जुड़े कुल दान का बड़ा हिस्सा दो अस्पताल से जुड़े परियोजनाओं पर खर्च किया गया। इसलिए 14.7% का आँकड़ा इस वजह से नहीं है कि ये आरएसएस से जुड़े हुए संगठन थे, बल्कि दो अहम परियोजनाओं को इसका बड़ा हिस्सा दिया गया। न्यूज मिनट की रिपोर्ट में इस जानकारी को छिपाने की कोशिश की गई।
मेडिकल सेवा से जुड़ा बीएवीपी-डीएटीएसएएस
बीएवीपी की स्थापना 1989 में हुई थी और यह कई कार्यरत अस्पतालों का संचालन करता है। इनमें औरंगाबाद स्थित डॉ. हेडगेवार अस्पताल और असम में स्थित नया अस्पताल शामिल है। असम में 300 बिस्तरों वाला अस्पताल है, जिसमें 21 विशेषज्ञ मौजूद हैं और यह सरकार की आयुष्मान भारत स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत सूचीबद्ध है। यह कम खर्च पर आम जनता को चिकित्सा सेवा प्रदान करता है, जिसमें गरीबी रेखा से नीचे के रोगियों के लिए खास छूट भी शामिल है। डीएटीएसएएस ने नागपुर में राष्ट्रीय कैंसर संस्थान का निर्माण किया है, जो 470 बिस्तरों वाला अस्पताल है और 2023 में खोला गया था।
दोनों संगठन पंजीकृत हैं और चिकित्सा क्षेत्र में उनके काम जगजाहिर हैं। न्यूज मिनट ने रिपोर्ट किया कि दोनों संगठनों का आरएसएस से संबंध रहा है, लेकिन इन तथ्यों के साथ यह समझना भी जरूरी है कि ये कार्यरत संस्थाएँ हैं, जो मेडिकल सेवा कर रही हैं। आरएसएस से उनके पुराने संबंध भी हैं, तो इसमें दिक्कत क्या है।
संगठनों ने दी जानकारी
राष्ट्रीय सेवा भारती के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख उदय कुंतल का कहना है कि उन्हें द न्यूज मिनट की रिपोर्ट की विशिष्टताओं की पूरी जानकारी नहीं है और तथ्यों को देखे बिना वे इसके निष्कर्षों की पुष्टि करने की स्थिति में नहीं हैं।
उन्होंने इस बात का खंडन किया कि आरएसएस स्वयं जिला स्तर पर कार्यरत एक पंजीकृत संस्था नहीं है, बल्कि इससे संबद्ध संगठन जिनमें राष्ट्रीय सेवा भारती भी शामिल है, अलग-अलग पंजीकृत हैं। इन संगठनों की जानकारी इनकी वेबसाइटों पर उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवादी संगठनों को केवल इसलिए निशाना बनाना आसान हो जाता है, क्योंकि उन्हें ऐसा कहा जाता है। जबकि वास्तविकता में वे देश के लिए काम कर रहे होते हैं।
कुंतल ने कहा कि यह कहना भ्रामक है कि सीएसआर फंड आरएसएस से जुड़े संगठनों को सिर्फ इसलिए दिए गए थे क्योंकि वे आरएसएस से जुड़े हुए थे। उनके अनुसार, उनके जैसे संगठन अस्पताल और राहत कार्य जैसे क्षेत्रों में काम करते हैं। सीएसआर डेटा उनके द्वारा शुरू की गई परियोजनाओं को दर्शाता है, न कि किसी विचारधारा के आधार पर किए गए आवंटन को। उन्होंने कहा कि इसे जानबूझकर आरएसएस को पैसा भेजने के रूप में पेश करना गलत और भ्रामक है।
उन्होंने यह भी बताया कि उनका संगठन भारत भर में पहली बार सामाजिक कार्यों के लिए सीएसआर फंडिंग का प्रभावी ढंग से उपयोग करने के तरीके पर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाता है। उन्होंने कहा कि कई बड़ी संस्थाओं ने पहले अपनी सीएसआर की फंडिंग नहीं भी की है और उनके आवेदन को अस्वीकार कर दिया।
दोनों बातें सच हैं। ONGC ने एक दशक के CSR खर्च का 14.7% यानी 668 करोड़ रुपये उन संगठनों को दिए, जिनके RSS से जुड़े होने के दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं। यह कोई गलती या तकनीकी खामी नहीं है। यह एक बड़ी रकम है, और अकेले दो संगठनों- BAVP और DATSAS ने ही इसका अधिकांश हिस्सा खर्च किया। न्यूज मिनट के आँकड़े जाँच में खरे उतरते हैं, और किसी भी तरह से संदर्भ बदलकर इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन, इसका दूसरा पहलू भी देखने की जरूरत है। दो अस्पताल निर्माण परियोजनाओं के लिए दिए गए ₹574 करोड़ की राशि का अलग महत्व है। भले ही बाकी 18 संगठनों को 92 करोड़ रुपए ही दिए गए। दोनों डोनेशन को एक साथ मिलाना पाठकों को वास्तविक स्थिति से गुमराह करता है। अस्पताल का इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े परियोजनाओं की लागत सैकड़ों करोड़ रुपए होती है। यह तथ्य है। वहीं कुल सीएसआर खर्च का 85 फीसदी हिस्सा यानी ₹3863 करोड़ की विशाल धनराशि स्वच्छता, स्कूलों, आपदा राहत और दिव्यांग कल्याण से जुड़े 1980 से अधिक ऐसे संगठनों को डोनेट किया गया, जिनका आरएसएस से कोई संबंध नहीं है।
दोनों में से कोई भी तथ्य दूसरे का खंडन नहीं करता। जो पाठक TNM की हेडलाइन और अपने पूर्वाग्रह के कारण केवल ‘ONGC ने RSS को पैसा दिया’ जैसे निष्कर्ष निकालते हैं, वे इसकी बारीकियों को नजरअंदाज करते हैं या समझने की कोशिश ही नहीं करते।
(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
केंद्र की मोदी सरकार राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 (Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026) लाने जा रही है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को कानूनी सुरक्षा देना है। प्रस्तावित संशोधन के तहत राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 की धारा 3 में बदलाव किया जाएगा। अभी इस धारा के तहत अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रीय गान को गाने से रोकता है या उस दौरान सभा में बाधा डालता है, तो उसे सजा दी जा सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अब इस धारा में ‘राष्ट्रीय गान’ के साथ ‘राष्ट्रीय गीत’ शब्द भी जोड़ा जाएगा।
इसका मतलब है कि संसद से यह संशोधन पारित होने के बाद अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम् को गाने से रोकता है या इसे गाने वाली सभा में बाधा डालता है, तो उसे तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है। अगर कोई व्यक्ति इस कानून के तहत दोबारा दोषी पाया जाता है, तो उसे कम से कम एक साल की जेल की सजा अनिवार्य रूप से होगी। यह विधेयक 20 जुलाई 2026 से शुरू हुए मॉनसून सत्र के दौरान राज्यसभा में पेश किए जाने के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
यह संशोधन ऐसे समय लाया गया है, जब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने निर्देश जारी किए कि राज्य सरकारों के कार्यक्रमों और नागरिक सम्मान समारोहों में वंदे मातरम् का पूरा संस्करण गाया जाए। हालाँकि, प्रस्तावित विधेयक में दी गई सजा का प्रावधान केवल उन लोगों पर लागू होगा जो जानबूझकर वंदे मातरम् को गाने से रोकेंगे या गायन के दौरान सभा में बाधा डालेंगे। इसमें कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि केवल चुप रहने या वंदे मातरम् न गाने पर किसी व्यक्ति को जेल भेजा जाएगा।
विधेयक के उद्देश्य और कारण में 24 जनवरी 1950 को हुई संविधान सभा की बैठक का भी उल्लेख किया गया है। उस बैठक में संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि वंदे मातरम्, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, उसे जन गण मन के समान सम्मान दिया जाएगा और उसका दर्जा भी बराबर माना जाएगा।
हालाँकि, इस घोषणा के बावजूद राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को अब तक वह कानूनी सुरक्षा नहीं मिली थी, जो राष्ट्रीय गान, राष्ट्रीय ध्वज, और संविधान को प्राप्त है। मौजूदा कानून की धारा 3 में केवल राष्ट्रीय गान गाने को जानबूझकर रोकने या उस दौरान सभा में बाधा डालने को ही अपराध माना गया है।
इस्लामी संगठनों और वामपंथियों ने वंदे मातरम् पर सरकार के फैसले का किया विरोध
संसद में संशोधन विधेयक पेश होने से पहले ही कई इस्लामी संगठनों, वामपंथी दलों और विपक्ष के कुछ नेताओं ने सरकार के उस फैसले का विरोध शुरू कर दिया, जिसमें सरकारी कार्यक्रमों और स्कूलों में वंदे मातरम् के सभी 6 अंतरे गाने का निर्देश दिया गया है।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने इस निर्देश को संविधान के खिलाफ, धार्मिक स्वतंत्रता के विपरीत और मुस्लिमों के लिए अस्वीकार्य बताया। बोर्ड ने कहा कि वह सरकार के इस फैसले को अदालत में चुनौती देगा।
AIMPLB के महासचिव मोहम्मद फजलुर रहीम मुजद्दिदी ने कहा कि वंदे मातरम् के बाद के अंतरों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है, जबकि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी और को भगवान को न मानने की दीन जाती है।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के दोनों गुटों ने भी सरकार के इस फैसले का विरोध किया। मौलाना अरशद मदनी ने इसे पक्षपातपूर्ण बताया और कहा कि यह मुस्लिमों से मजहबी आजादी छीनने की साजिश है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार दबाव बनाकर अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित करना चाहती है।
CPI-M ने भी इस आदेश को वापस लेने की माँग की। पार्टी का कहना था कि सरकार राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर बेवजह विवाद खड़ा कर रही है। वहीं, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के राज्यसभा सांसद संतोष कुमार पी ने आरोप लगाया कि सरकार संस्कृति का इस्तेमाल ‘राजनीतिक हथियार’ के रूप में कर रही है। तृणमूल कॉन्ग्रेस ने भी कहा कि केंद्र सरकार वंदे मातरम् के इतिहास और इसके शब्दों को गलत तरीके से पेश कर रही है।
कॉन्ग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने भी मध्य प्रदेश में वंदे मातरम् के सभी अंतरे गाने के फैसले पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि इसे अनिवार्य बनाने से लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित होगी।
इन तर्कों के आधार पर इस बात पर बहस हो सकती है कि सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् का कौन-सा रूप या कितना हिस्सा गाया जाना चाहिए। लेकिन इन तर्कों से यह साबित नहीं होता कि किसी को दूसरे लोगों को वंदे मातरम् गाने से जबरन रोकने, सभा में बाधा डालने, राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करने या देशभक्ति से जुड़े किसी जुलूस में हिंसा करने का अधिकार मिल जाता है।
प्रस्तावित प्रावधान किसी व्यक्ति के धार्मिक आधार पर शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से अपने आपत्ति जताने को अपराध नहीं मानता। यह केवल उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान करता है, जो जानबूझकर दूसरों को वंदे मातरम् गाने से रोकते हैं या उनके इस अधिकार में बाधा डालते हैं।
याद कीजिए चंदन गुप्ता के साथ क्या हुआ था?
22 साल के चंदन गुप्ता की हत्या का मामला यह दिखाता है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति दुश्मनी को हर बार सिर्फ मतभेद, राजनीतिक बयानबाजी या व्यक्तिगत धार्मिक विश्वास का मामला मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 26 जनवरी 2018 को गणतंत्र दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश के कासगंज में एक तिरंगा यात्रा निकाली गई थी। इस यात्रा में चंदन गुप्ता, उनके भाई विवेक और कई अन्य युवक शामिल हुए थे। सभी के हाथों में तिरंगा था, और वे ‘भारत माता की जय’ औरर ‘वंदे मातरम्’ जैसे नारे लगा रहे थे।
एफआईआर, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अदालत के दस्तावेजों के अनुसार, जिन तक ऑपइंडिया को पहुँच मिली, सरकारी बालिका इंटर कॉलेज के पास हथियारों से लैस एक मुस्लिम भीड़ ने इस यात्रा को रोक लिया। भीड़ में शामिल लोगों ने तिरंगा छीनकर जमीन पर फेंक दिया। इसके बाद उन्होंने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ और ‘हिंदुस्तान मुर्दाबाद’ के नारे लगाए। साथ ही उन्होंने यात्रा में शामिल लोगों से कहा कि आगे बढ़ना है तो पहले ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा लगाना होगा।
लेकिन चंदन ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। इसके बाद भीड़ ने पत्थरबाजी और फायरिंग शुरू कर दी। सलीम नाम के व्यक्ति ने चंदन को गोली मारी, जो उनके फेफड़ों और दिल में लगी। गंभीर रूप से घायल चंदन को तुरंत जिला अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
यह हमला केवल दो समूहों के बीच रास्ते को लेकर हुए विवाद का मामला नहीं था, जैसा कि उस समय मीडिया के कुछ वर्गों ने दिखाने की कोशिश की थी। इस घटना में तिरंगा छीनकर उसका अपमान किया गया, तिरंगा यात्रा को जबरन रोक दिया गया और ‘वंदे मातरम्’ जैसे देशभक्ति के नारों के जवाब में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाए गए। इतना ही नहीं, तिरंगा लेकर चल रहे लोगों पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ बोलने का दबाव बनाया गया। जब चंदन गुप्ता ने इसका विरोध किया, तो उन्हें गोली मार दी गई।
02 जनवरी 2025 को राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत ने चंदन गुप्ता हत्याकांड में 28 लोगों को दोषी ठहराया। इसके अगले दिन, 3 जनवरी को अदालत ने सभी 28 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि भीड़ में शामिल लोग बंदूर, लोहे की रॉड और डंडों जैसे हथियारों से लैस थे और उन्होंने तिरंगा यात्रा में शामिल हिंदू लोगों पर सांप्रदायिक हिंसा की। अदालत ने यह भी कहा कि सांप्रदायिकता ऐसी सोच है, जिसमें धर्म के हितों को समाज और राष्ट्र के हितों से ऊपर रखा जाता है।
ट्रायल के दौरान चंदन गुप्ता के परिवार को भी डराने-धमकाने की कोशिशें हुईं। चंदन के पिता सुशील गुप्ता ने अदालत को बताया कि आरोपित मुनाजिर रफी के प्रभाव के चलते कासगंज में ऐसा माहौल बन गया था कि कई वरिष्ठ वकीलों ने उनके परिवार का पक्ष रखने से इनकार कर दिया। बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने परिवार की आशंकाओं को सही माना और मुकदमे की सुनवाई कासगंज से बाहर ट्रांसफर करने का आदेश दिया।
मजहबी आपत्ति से लेकर कट्टरपंथी हिंसा तक
किसी गीत को अपनी व्यक्तिगत मजहबी मान्यता के चलते न गाने और उस गीत को गाने वाले लोगों पर हमला करने में बड़ा अंतर है। कोई भी नागरिक अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है, सरकार के दिशा-निर्देशों पर सवाल उठा सकता है, वंदे मातरम् के कुछ पदों को शामिल किए जाने का विरोध कर सकता है या फिर शांतिपूर्वक इसे गाने से इनकार कर सकता है। ऐसे सभी कदम संविधान और लोकतांत्रिक बहस के दायरे में आते हैं।
लेकिन कई मामलों में इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों ने अपनी मजहबी आपत्ति को सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे दसरों पर भी थोपने की कोशिश की। बात केवल ‘मैं यह गीत नहीं गाऊँगा’ तक नहीं रहती, बल्कि ‘तुम भी यह गीत नहीं गाओगे’ तक पहुँच जाती है। कासगंज की घटना में इसका सबसे हिंसक रूप देखने को मिला, जहाँ हथियारबंद भीड़ ने तिरंगा यात्रा को रोक दिया, तिरंगे का अपमान किया, लोगों पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाने का दबाव बनाया और विरोध करने पर एक हिंदू की हत्या कर दी।
इसी वजह से चंदन गुप्ता का मामला यह समझने के लिए जरूरी माना जाता है कि ऐसे संशोधन की जरूरत क्यों महसूस की जा रही है। अगर किसी राष्ट्रीय प्रतीक को केवल कागजों पर ही संवैधानिक सम्मान मिले, जबकि संगठित समूह उसे गाने से लोगों को जबरन रोक सकें, कार्यक्रमों में बाधा डाल सकें या उसमें शामिल नागरिकों को धमका सकें, तो उस सम्मान का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
वंदे मातरम् के विरोध से जुड़ा एक दिलचस्प पहलू यह है कि इस मामले में विरोध चुनिंदा तरीके से किया जाता है। जो संगठन और लोग धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला देकर वंदे मातरम् का विरोध करते हैं, वे यह नहीं बताते कि दूसरे भारतीयों को राष्ट्रीय गीत गाने की आजादी आखिर उनकी मंजूरी पर क्यों निर्भर होनी चाहिए।
इसी तरह, वामपंथी और उदारवादी राजनीतिक दल भी यह स्पष्ट नहीं करते कि वंदे मातरम् को जानबूझकर बाधित करने या गाने से रोकने के खिलाफ कानूनी सुरक्षा देना धार्मिक विचारों को थोपना कैसे हो गया। राष्ट्रीय गान को ऐसी कानूनी सुरक्षा कई दशकों से मिली हुई है। ऐसे में संविधान सभा द्वारा समान सम्मान दिए गए राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को भी वही सुरक्षा देना न तो कोई नई बात है और न ही असामान्य। वास्तव में यह कदम भारत सरकार को कई दशक पहले ही उठा लेना चाहिए था।
धार्मिक मान्यताओं से परे: वंदे मातरम का इस्लामी विरोध किस तरह राष्ट्रीय प्रतीकों को पूरी तरह नकारने की गहरी सोच को दर्शाता है
अगर यह प्रस्तावित संशोधन कानून बन जाता है, तो भविष्य में ऐसी स्थिति नहीं आएगी कि किसी दूसरे चंदन गुप्ता की हत्या होने के बाद ही कानून उन लोगों से पैदा होने वाले खतरे को गंभीरता से समझे, जो अपनी मजहबी सोच के आधार पर दूसरों को राष्ट्रीय गीत का सम्मान करने से रोकने, उन्हें डराने-धमकाने या उन पर हमला करने का अधिकार अपने पास मानते हैं।
यह प्रस्तावित संशोधन केवल वंदे मातरम् को कानूनी सुरक्षा देने तक सीमित नहीं है। इसके साथ एक बड़ा वैचारिक सवाल भी जुड़ा है। इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों का विरोध सिर्फ वंदे मातरम् के कुछ शब्दों या मजहबी आपत्तियों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे ऐसी सोच काम करती है, जिसमें पूरी दुनिया के मुस्लिमों, यानी उम्माह, को राष्ट्र-राज्य से ऊपर माना जाता है।
इस सोच के कारण भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रवाद की अभिव्यक्तियों को अक्सर संदेह की नजर से देखा जाता है। यही वैचारिक सोच बार-बार वंदे मातरम्, तिरंगे और भारत माता की जय जैसे राष्ट्रीय प्रतीकों और नारों के विरोध की मुख्य वजह बनती है, न कि केवल मजहबी आपत्ति।
पिछले कई दसकों में वंदे मातरम् को लेकर कई इस्लामी संगठनों का लगातार विरोध इसी सोच को दिखाता है। इस विरोध के पक्ष में दिए जाने वाले कई तर्क कानूनी और ऐतिहासिक रूप से मजबूत नहीं माने जाते। संविधान किसी भी नागरिक को राष्ट्रीय गीत के जरिए किसी विशेष धर्म में आस्था जताने के लिए मजबूर नहीं करता। इसी तरह, प्रस्तावित संशोधन भी किसी व्यक्ति को वंदे मातरम् न गाने पर अपराधी नहीं मानता।
इसका उद्देश्य केवल उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करना है, जो जानबूझकर दूसरों को राष्ट्रीय गीत या उसका सम्मान करने से रोकते हैं। ऐसे में यह बहस अब केवल व्यक्तिगत धार्मिक मान्यता की नहीं रह जाती, बल्कि इस सवाल की बन जाती है कि क्या संगठित समूह मजहबी आपत्ति का हवाला देकर दूसरे नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से देशभक्ति व्यक्त करने से रोक सकता है।
चंदन गुप्ता की हत्या इस बात की गंभीर याद दिलाती है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति वैचारिक दुश्मनी केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कई बार हिंसा का रूप भी ले सकती है। जब देशभक्ति से जुड़े जुलूसों पर हमला होता है, तिरंगे का अपमान किया जाता है, वंदे मातरम् गाने वालों को डराया-धमकाया जाता है या लोगों पर किसी दूसरे देश के समर्थन में नारे लगाने का दबाव बनाया जाता, तब मामला केवल धार्मिक स्वतंत्रता का नहीं रह जाता। यह कानून-व्यवस्था और देश की एकता से जुड़ा मुद्दा बन जाता है। इसी संदर्भ में इस संशोधन के समर्थकों का कहना है कि वंदे मातरम् को कानूनी सुरक्षा देने का उद्देश्य किसी पर अपनी मान्यता थोपना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी नागरिक राष्ट्रीय गौरव व्यक्त करने के अपने कानूनी अधिकार का इस्तेमाल करते समय डर, बाधा या हिंसा का सामना न करे।
(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)
उत्तर प्रदेश में जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े विवादों के फिर से बढ़ने के साथ ही अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में आरक्षण व्यवस्था को लेकर भी बहस छिड़ चुकी है। लोगों का कहना है कि अगर देश में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए संवैधानिक आरक्षण की व्यवस्था है, तो फिर अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त शिक्षण संस्थानों में यह व्यवस्था क्यों लागू नहीं होती?
इस बहस के केंद्र में केवल रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय (जौहर यूनिवर्सिटी) ही नहीं है, बल्कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU), दिल्ली विश्वविद्यालय का खालसा कॉलेज और सेंट स्टीफंस कॉलेज जैसे कई प्रतिष्ठित संस्थान भी हैं। ये संस्थान अल्पसंख्यक छात्रों के लिए 50 प्रतिशत तक सीटें आरक्षित रखते हैं।
दरअसल, भारत में शिक्षा के क्षेत्र में अल्पसंख्यक संस्थानों का दर्जा एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान है। संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार दिया गया है। सवाल यह है कि आखिर इन संस्थानों को ऐसी छूट क्यों मिली है और इसका संवैधानिक आधार क्या है।
यह विरोधाभास इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि कई मुस्लिम जातियाँ अन्य संस्थानों में ओबीसी आरक्षण का लाभ लेती हैं, लेकिन अपने संस्थानों में ऐसा नहीं होता। सिख और ईसाई संस्थान भी इसी तरह अपने समुदाय के लिए आरक्षण रखते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2018 में इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया था और समानता की वकालत की थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार इस पर विचार किया है, लेकिन अभी भी कुछ मामले लंबित हैं। आइए इस पूरे मुद्दे को विस्तार से समझते हैं।
अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा कैसे मिलता है?
किसी भी शैक्षणिक संस्थान को अल्पसंख्यक दर्जा राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग (एनसीएमईआई) या संबंधित राज्य आयोग से मिलता है। इसके लिए संस्थान को यह साबित करना होता है कि वह किसी खास धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा स्थापित किया गया था और उसका प्रशासन भी उसी समुदाय के हाथ में है।
अनुच्छेद 30(1) के तहत यह अधिकार मौलिक अधिकार माना गया है ताकि अल्पसंख्यक अपनी संस्कृति, भाषा और धर्म को संरक्षित रख सकें। हालाँकि यह अधिकार पूर्ण नहीं है। अगर संस्थान सरकारी सहायता लेता है तो कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है। लेकिन आरक्षण के मामले में अदालतों ने स्पष्ट किया है कि अल्पसंख्यक संस्थान अनुच्छेद 30 के तहत अपनी प्रवेश नीति खुद तय कर सकते हैं।
विवाद की सबसे बड़ी वजह संविधान का अनुच्छेद 15(5) है। वर्ष 2005 के 93वें संविधान संशोधन यानी केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम 2006 के तहत केंद्रीय विश्वविद्यालयों में एससी के लिए 15 प्रतिशत, एसटी के लिए 7.5 प्रतिशत और ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य है। लेकिन इसी प्रावधान में स्पष्ट रूप से कहा गया कि अनुच्छेद 30(1) के तहत संरक्षित अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर यह व्यवस्था लागू नहीं होगी।
यही वजह है कि जामिया, एएमयू जैसे संस्थान सामान्य आरक्षण लागू नहीं करते। ऐसे में इन संस्थानों में सामान्य SC, ST और OBC आरक्षण के दायरे में आने वाले छात्रों की हकमारी होती है।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में 50 प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण
जामिया मिल्लिया इस्लामिया दिल्ली की एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है। 2011 में एनसीएमईआई ने इसे अल्पसंख्यक संस्थान घोषित किया। इसके बाद जामिया ने अपनी प्रवेश नीति बदल दी।
विश्वविद्यालय के नियमों के मुताबिक हर कोर्स में कुल सीटों का 30 प्रतिशत मुस्लिम छात्रों के लिए, 10 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं के लिए और 10 प्रतिशत मुस्लिम ओबीसी व एसटी छात्रों के लिए आरक्षित रखा जाता है। यानी कुल मिलाकर मुस्लिम समुदाय के लिए करीब 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित हो जाती हैं। बाकी सीटें सामान्य मेरिट पर भरी जाती हैं।
जामिया पहले सामान्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों की तरह एससी-एसटी-ओबीसी आरक्षण लागू करता था। लेकिन अल्पसंख्यक दर्जा मिलने के बाद यह व्यवस्था बदल गई। संसद में दिए गए जवाब में भी सरकार ने स्पष्ट किया है कि जामिया खुद को अल्पसंख्यक संस्थान मानते हुए एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण नहीं लागू करता।
हालाँकि मार्च 2025 में जामिया ने PhD कोर्स के लिए अपनी नीति में बदलाव किया और अनिवार्य 50% आरक्षण की जगह इसे ऐच्छिक घोषित कर दिया। इसका लेफ्ट विंग के स्टूडेंट्स पार्टियों (खासकर AISA) ने तीखा विरोध किया।
AMU का अल्पसंख्यक दर्जा सुप्रीम कोर्ट में लंबित
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का मामला और भी पेचीदा है। 1920 में यह संस्थान स्थापित हुआ था। 1967 में सुप्रीम कोर्ट ने अजीज बाशा मामले में फैसला दिया था कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है क्योंकि इसे संसद के कानून से बनाया गया था।
लेकिन 8 नवंबर 2024 को सात जजों की संविधान पीठ ने 4:3 के बहुमत से 1967 के फैसले को पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी संस्थान को कानून से मान्यता मिलने भर से उसका अल्पसंख्यक चरित्र समाप्त नहीं होता। कोर्ट ने कुछ मापदंड तय किए कि अल्पसंख्यक संस्थान माने जाने के लिए क्या शर्तें पूरी होनी चाहिए। अब इस मामले को नियमित पीठ के पास भेज दिया गया है ताकि वह तय करे कि एएमयू इन मापदंडों पर खरा उतरता है या नहीं।
फिलहाल एएमयू में भी एससी-एसटी-ओबीसी का पूरा आरक्षण लागू नहीं होता। संस्थान खुद को अल्पसंख्यक मानते हुए मुस्लिम छात्रों को प्राथमिकता देता है। ये AMU से जुड़े स्कूल-कॉलेजों की आड़ में 50% आरक्षण (सामान्य) लागू करता है, जिसमें उसका कहना है कि एएमयू से जुड़े संस्थानों ने पढ़ने वाले सभी बच्चों (सिर्फ मुस्लिम नहीं) को 50% आरक्षण (अनौपचारिक) दिया जाता है, लेकिन पड़ताल में अक्सर से सामने आता है कि इन 50% छात्रों में बहुत कम संख्या जनरल क्लास की होती है। अधिकतर छात्र मुस्लिम ही होते हैं।
एएमयू में 50% आरक्षण को हटा दें तो बाकी सीटें अनारक्षित हैं, यानी ये मेरिट पर भरी जाती हैं। ऐसे में आरक्षण कानूनों का पालन (एससी-एसटी/ओबीसी के लिए) नहीं किया जाता। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ साल 2018 से यह मुद्दा उठा रहे हैं कि अगर इन संस्थानों का अल्पसंख्यक दर्जा अभी लागू नहीं है, तो क्यों यहाँ पर आरक्षण लागू नहीं किया जाता। चूँकि एएमयू सरकारी फंडिंग पर चलता है, इसलिए इसे सबके लिए खुला होना चाहिए।
जौहर यूनिवर्सिटी रामपुर का मामला भी ध्यान देने योग्य
उत्तर प्रदेश के रामपुर में मौजूद मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी भी अल्पसंख्यक संस्थान है। इसे 2013 में एनसीएमईआई ने अल्पसंख्यक दर्जा दिया था। यह यूनिवर्सिटी समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान से जुड़ी हुई है। इसे फाउंडिंग मेंबर्स में आजम खान का पूरा परिवार यानी उनकी बीवी तजीन फातमा, बेटे अदीब आजम खान और दूसरे बेटे अब्दुल्ला आजम खान भी हैं।
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साल 2006 में स्थापित होने और 2013 में अल्पसंख्यक दर्जा मिलने के कारण यह भी सामान्य आरक्षण नीति से मुक्त है। यहाँ मुख्य रूप से मुस्लिम छात्रों को प्राथमिकता दी जाती है। इस यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों को तोड़ने के नोटिस आए हैं, जिसे विपक्ष राजनीतिक बदला बता रहा है, लेकिन मूल मुद्दा इसकी बिल्डिंगों के अवैध निर्माण, जमीनों पर कब्जे का है।
सिख और ईसाई संस्थानों का भी यही मॉडल
दिल्ली विश्वविद्यालय के खालसा कॉलेज जैसे सिख अल्पसंख्यक कॉलेजों में कुल सीटों का 50 प्रतिशत सिख छात्रों के लिए आरक्षित रखा जाता है। बाकी सामान्य मेरिट पर। इसी तरह सेंट स्टीफेंस कॉलेज ईसाई अल्पसंख्यक संस्थान है। वहाँ भी ईसाई छात्रों के लिए खास आरक्षण या प्राथमिकता की व्यवस्था है।
दिल्ली में हमदर्द विश्वविद्यालय और जीसस एंड मैरी कॉलेज को भी अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा प्राप्त है। यहाँ भी आरक्षण लागू नहीं होता है। ये सभी संस्थान अनुच्छेद 30 का हवाला देते हुए कहते हैं कि उन्हें अपने समुदाय के छात्रों को प्राथमिकता देने का अधिकार है। यही वजह है कि यह विवाद सिर्फ मुस्लिम संस्थानों तक सीमित नहीं बल्कि सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों से जुड़ा संवैधानिक प्रश्न है।
देश के अलग-अलग हिस्सों में कई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान
वैसे आपको बता दें कि सिर्फ जामिया, AMU, गौहर यूनिवर्सिटी ही नहीं बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में कई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान हैं, जिसमें सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए 50% आरक्षण लागू हैं। ऐसी ही एक यूनिवर्सिटी यूपी की राजधानी लखनऊ में भी है। लखनऊ के ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय (KMCLU) को अल्पसंख्यक का दर्जा मिला है। पहले इसका नाम ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती उर्दू, अरबी-फारसी विश्वविद्यालय (KMCUAFU) था, जिसे बाद में बदला गया। यह एक राज्य विश्वविद्यालय (स्टेट यूनिवर्सिटी) है।
इसी तरह से बिहार की राजधानी पटना में मौलाना मज़हरुल हक अरबी और फ़ारसी विश्वविद्यालय है तो राजस्थान के जोधपुर में मौलाना आजाद विश्वविद्यालय। हैदराबाद में उस्मानिया यूनिवर्सिटी है, जिसमें पढ़ाई ही उर्दू माध्यम से होती है, जिसमें अंग्रेजी दूसरी भाषा के तौर पर मान्य है। वहीं, हैदराबाद में ही मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी है, जिसकी स्थापना 1998 में हुई।
इसके अलावा देखें तो देश के सबसे पुराने आधुनिक शिक्षण संस्थानों में शामिल कलकत्ता मोहम्मडन कॉलेज भी अल्पसंख्यक संस्थान है, जिसकी स्थापना 1780 में अंग्रेजी हुकूमत के मुखिया वॉरेन हेस्टिंग्स ने की थी। इसे इस्लामिक कॉलेज ऑफ कलकत्ता, कलकत्ता मदरसा, कलकत्ता मोहम्मडन कॉलेज और मदरसा ए आलियाह के नाम से भी जाना जाता रहा है। हालाँकि वॉरेन हेस्टिंग्स इसे कलकत्ता मोहम्मडन कॉलेज ही कहते रहे। साल 2008 से इसे आलियाह विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है, जिसकी नई बिल्डिंग का शिलान्यास और उद्घाटन तत्कालीन CM ममता बनर्जी ने 2011 से 2014 तक किया था।
योगी आदित्यनाथ करते रहे हैं समानता की बात
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साल 2018 में कन्नौज में एक रैली में साफ कहा था कि अगर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में दलित और पिछड़े वर्गों को आरक्षण मिल सकता है, तो एएमयू और जामिया में क्यों नहीं? उन्होंने कहा था कि एएमयू सिर्फ मुसलमानों की नहीं, बल्कि पूरे देश की है।
योगी का तर्क था कि ये संस्थान सरकारी पैसे से चलते हैं, इसलिए इनमें एससी, एसटी और ओबीसी को भी आरक्षण मिलना चाहिए। उन्होंने इसे बड़ी गलती बताया था। 2024 में भी उन्होंने एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे पर सवाल उठाए और आरक्षण की माँग दोहराई।
कानूनी विरोधाभास कहाँ है?
इस पूरे विवाद में सबसे अधिक जिस तर्क का इस्तेमाल किया जा सकता है, वो ये है कि देश में कई मुस्लिम समुदाय केंद्र और राज्यों की OBC सूची में शामिल हैं। ऐसे समुदायों के लोग सरकारी नौकरियों और सामान्य विश्वविद्यालयों में OBC आरक्षण का लाभ लेते हैं। लेकिन जब बात अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की आती है, तो वहाँ वही संस्थान सामान्य OBC, SC और ST आरक्षण लागू नहीं करते।
हालाँकि अल्पसंख्यक संस्थानों का पक्ष है कि संविधान ने जानबूझकर उन्हें यह विशेष संरक्षण दिया है ताकि वे अपने समुदाय की शैक्षणिक और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रख सकें। उनके अनुसार यह विशेषाधिकार सामाजिक आरक्षण का विरोध नहीं बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त एक अलग अधिकार है।
वैसे, कानूनी तौर पर अल्पसंख्यक संस्थान बाध्य नहीं हैं कि वे एससी-एसटी-ओबीसी आरक्षण लागू करें। सुप्रीम कोर्ट ने TMA पाई फाउंडेशन मामले समेत कई फैसलों में कहा है कि अल्पसंख्यक संस्थान अपनी पसंद के छात्र भर्ती कर सकते हैं।
और ये वही ‘दोहरी व्यवस्था’ है, जिसका विरोध किया जाना चाहिए। दरअसल, अगर सामाजिक न्याय की व्यवस्था पूरे देश में लागू है, तो अल्पसंख्यक संस्थानों को इससे बाहर रखना समानता की भावना के सरासर विपरीत ही है।
क्या आगे निकल सकती है आरक्षण लागू करने की राह?
केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में SC, ST, OBC और EWS आरक्षण लागू किया जाता है, लेकिन अनुच्छेद 30 के तहत संरक्षित अल्पसंख्यक संस्थान इससे अलग हैं। सरकार ने यह भी कहा है कि AMU और जामिया से जुड़े कई मुद्दे अभी न्यायालयों में विचाराधीन हैं।
जौहर यूनिवर्सिटी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, खालसा कॉलेज और सेंट स्टीफंस कॉलेज को लेकर चल रही बहस केवल आरक्षण की नहीं बल्कि संविधान की दो महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं के बीच संतुलन की बहस है। एक ओर सामाजिक न्याय के लिए SC, ST और OBC आरक्षण की व्यवस्था है, वहीं दूसरी ओर धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान संचालित करने का संवैधानिक अधिकार है।
यही कारण है कि अल्पसंख्यक संस्थानों में आरक्षण का मुद्दा केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे संविधान, न्यायपालिका और शिक्षा नीति से जुड़ा हुआ विषय है। आने वाले समय में विशेषकर AMU से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय का असर इस पूरे विमर्श पर पड़ सकता है। तब तक वर्तमान कानूनी व्यवस्था के अनुसार, वैध रूप से अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त शिक्षण संस्थानों को सामान्य SC, ST और OBC आरक्षण लागू करने के लिए बाध्य नहीं माना जाता।
वैसे, सामाजिक तौर पर देखा जाए तो अल्पसंख्यक संस्थानों में भी आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों या पिछड़े वर्गों के लिए कुछ प्रतिशत आरक्षण रखा जाए, लेकिन धार्मिक आधार पर पूर्ण छूट न दी जाए। हालाँकि अल्पसंख्यक संगठन कहते हैं कि अनुच्छेद 30 का हनन नहीं होना चाहिए।
संसद में मोदी सरकार राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 ला रही है। इसे वंदे मातरम बिल भी कहा जा रहा है। इसका मकसद राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को ‘जन गण मन’ यानी राष्ट्रगान के समान कानूनी और वैधानिक सुरक्षा देना है।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में अध्यक्ष डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने भी ये बात कही थी। लेकिन उनके सपने को कॉन्ग्रेस ने ही पूरा होने नहीं दिया और शुरुआती अंतरे को गाने की परंपरा चला दी। अब मोदी सरकार इसके पूरे अंतरे को गाने का नियम बनाया है और इसके सम्मान के लिए संसद में बिल लेकर आ रही है।
दरअसल प्रावधान में ये है कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम के गाने में रुकावट डालता हो या उसका अपमान करता हो, तो इसे दंडनीय अपराध माना जाएगा और इसके लिए 3 साल जेल का प्रावधान है। इतना ही नहीं, ऐसे व्यक्ति को जुर्माना या दोनों लग सकता है।
सोशल मीडिया पर यह दावा किया जा रहा है कि अगर कोई ‘वंदे मातरम’ नहीं गाएगा तो उसे 3 साल की जेल होगी, लेकिन विधेयक में ऐसा कुछ नहीं है। सरकार जिस संशोधन को ला रही है, उसका उद्देश्य सिर्फ ‘वंदे मातरम’ के अपमान या उसके गायन में जानबूझकर बाधा डालने को दंडनीय बनाना है। केवल गीत न गाने को अपराध नहीं बताया गया है।
बिल में क्या संशोधन किए जा रहे हैं?
केंद्र सरकार Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 में संशोधन कर रही है। अभी इस कानून की धारा 3 केवल राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ के गायन में जानबूझकर बाधा डालने या उसका अपमान करने को दंडनीय अपराध माना जाता है।
संशोधन के बाद इसी धारा में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को भी शामिल किया जाएगा। इसके बाद यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ‘वंदे मातरम’ के गायन को रोके, गायन के दौरान व्यवधान पैदा करे या कानून में बताए गए तरीके से उसका अपमान करे, तो उसे 3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। यह वही दंड है जो अभी राष्ट्रीय गान के लिए लागू है।
सरकार का कहना है कि ‘वंदे मातरम’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक रहा है, लेकिन उसे अब तक वह वैधानिक संरक्षण नहीं मिला, जो ‘जन गण मन’ को मिला है। लेकिन कॉन्ग्रेस इसका विरोध कर रही है। दरअसल इसके पीछे कॉन्ग्रेस का वो काला इतिहास है, जिसने इसकी धर्मनिरपेक्षता’ को हिन्दू विरोध की तरफ लेकर गया।
1937 में कॉन्ग्रेस वर्किंग समिति के सामने मुस्लिम लीग सहित कुछ संगठनों ने ‘वंदे मातरम’ के बाद के अंतरों में देवी-देवताओं के उल्लेख और धार्मिक प्रतीकों पर आपत्ति जताई।
इसके बाद कॉन्ग्रेस ने फैसला लिया कि सार्वजनिक एवं सरकारी आयोजनों में केवल पहले दो अंतरे गाए जाएँ, जिसमें हिन्दू संस्कृति का जिक्र उस तरह से नहीं है। इसे मुस्लिम लीग ने भी स्वीकार किया और यही परंपरा आगे बढ़ी।
लेकिन अब जब केंद्र सरकार ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गान के समान वैधानिक संरक्षण देने वाला संशोधन ला रही है, तब कॉन्ग्रेस विरोध कर रही है और इसे संविधान की मूल भावना के विपरीत बता रही है। कॉन्ग्रेस का कहना है कि संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय गीत के बीच जानबूझकर अलग संवैधानिक स्थिति रखी थी।
दरअसल कॉन्ग्रेस पहले भी मुस्लिम लीग के दबाव में थी और अब भी मुस्लिम वोट बैंक ही उसके विरोध के केन्द्र में है। मुस्लिम लीग तो 1908 से ही वंदे मातरम का विरोध करना शुरू कर दिया था। अमृतसर अधिवेशन में सैयद अली इमाम ने कहा कि यह गीत इस्लाम विरोधी है, क्योंकि इसमें मातृभूमि की तुलना देवी-देवताओं से की गई है। बाद में खिलाफत आंदोलन के दौरान यह भावना और गहरी होती गई।
इस विरोध के बीच, 1937 में कॉन्ग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे। आजाद ने गीत का अध्ययन किया और निष्कर्ष दिया कि इसके शुरुआती दो पद केवल मातृभूमि की वंदना करते हैं और इनमें किसी मजहबी भावना का विरोध नहीं है। नतीजतन, कॉन्ग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया कि राष्ट्रगीत के रूप में केवल दो ही अंतरे को स्वीकार किए जाएँ।
नेहरू की अध्यक्षता में कॉन्ग्रेस ने दो अंतरे वाले ‘वंदे मातरम’ अपनाने का फैसला किया। कॉन्ग्रेस ने जानबूझकर माँ दुर्गा की स्तुति करने वाले छंद हटा दिए। कॉन्ग्रेस ने अपने एजेंडे के अनुरूप फैजपुर अधिवेशन में वंदे मातरम् के छोटे स्वरूप को अपनाया।
(कॉन्ग्रेस कार्यसमिति का फैसला)
जवाहर लाल नेहरू ने अली सरदार जाफरी को पत्र लिखा था। उसमें उन्होंने कहा, “मैं समझता हूँ कि पूरा गाना किसी को ठेस पहुँचाने वाला नहीं है। लेकिन मैं ये भी सोचता हूँ कि ये गाना राष्ट्रगान के ‘लायक’ नहीं है। इसके कुछ शब्द लोगों को समझ में नहीं आएँगे, क्योंकि इसमें व्यक्त भावनाएँ आज के राष्ट्रवाद के अनुकूल नहीं है। हमें आसान शब्दों वाले दूसरे राष्ट्रगान की तलाश करनी चाहिए।”
( अली सरदार जाफरी को लिखा पत्र)
यही नहीं, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लिखे नेहरू की 1937 की चिट्ठी में भी इस मुद्दे को लेकर सफाई दी गई। चिट्ठी में नेहरू ने कथित तौर पर कहा था कि वंदे मातरम के बैकग्राउंड से मुस्लिमों को नाराजगी हो सकती है। एक सितंबर 1937 को लिखी इस चिट्ठी में नेहरू ने कटुता से लिखा था कि ‘वंदे मातरम’ के शब्दों को किसी देवी से जोड़कर देखना बेतुका है। उन्होंने तंज कसते हुए यह भी कहा कि ‘वंदे मातरम’ राष्ट्रीय गान के रूप में उपयुक्त नहीं है। 20 अक्टूबर 1937 को भी नेहरू ने नेताजी को पत्र लिखकर दावा किया कि ‘वंदे मातरम’ की पृष्ठभूमि मुस्लिमों को नाराज कर सकती है।
(नहरु के पत्र में वंदे मातरम को लेकर उनके विचार)
मोहम्मद अली जिन्ना ने 1938 में The New Times of Lahore में वंदे मातरम् का विरोध करते हुए लिखा कि मुस्लिम किसी भी रूप में इस गीत को स्वीकार नहीं कर सकते। धीरे-धीरे इस ‘धार्मिक विरोध’ पर राजनीतिक का रंग चढ़ गया और देश का विभाजन हुआ।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में दिया था समान दर्जा
लेकिन कॉन्ग्रेस का एक धरा शुरू से वंदे मातरम को ‘जन गण मन’ के समान दर्जा देने का हिमायती रहा। इसको लेकर संविधान सभा में बार-बार बहस हुई। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की अंतिम बैठकों में तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रीय गान पर अपना ऐतिहासिक वक्तव्य दिया। उन्होंने ‘वंदे मातरम’ को ‘जन गण मन’ के समान दर्जा और राष्ट्रीय गीत का स्थान दिया।
उन्होंने कहा था “वंदे मातरम, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसे ‘जन गण मन’ के समान सम्मान दिया जाएगा और उसका समान दर्जा होगा।” उनका यही वक्तव्य आज मोदी सरकार के प्रस्तावित संशोधन के प्रमुख आधारों में से एक है।
संविधान सभा में कई बार उठी माँग
1947 से 1950 के बीच वंदे मातरम को लेकर कई बार बहस हुई क्योंकि आजादी के बाद स्वतंत्रता संग्राम का गीत बन चुके वंदे मातरम को सम्मान दिलाने की बात थी। 31 जुलाई 1947 में ने सदन से आग्रह किया था कि वंदे मातरम को आधिकारिक कार्यक्रम में शामिल किया जाए। आजादी की पूर्व संध्या पर 14 अगस्त 1947 में सुचेता कृपलानी ने आधिकारिक समारोह में वंदे मातरम का पहला अंतरा गाया था, जिसपर कुछ लोग बाहर चले गए। इस पर कामथ ने कहा था कि भले ही वंदे मातरम को राष्ट्रगान के रूप में शामिल नहीं किया गया, लेकिन यह हजारों देशवासियों के बलिदानी का प्रतीक है और पावन है।
संविधान शभा में जब 1948-49 में बहस के दौरान भी इस गीत के प्रति लोगों की आस्था का पता चला। सेठ गोविंद दास ने इसे देश की आजादी से जोड़ते हुए सच्चा राष्ट्रगान बताया। उन्होने जन गण मन को अंग्रेजी शासक जॉर्ज पंचम के सम्मान में गाए हुए गीत का तर्क देते हुए कहा कि वंदे मातरम ही राष्ट्रगीत होना चाहिए।
अक्टूबर 1949 में रोहिणी कुमार चौधरी ने सदन को याद दिलाया कि भारत का स्वतंत्रता आंदोलन वंदे मातरम से शुरू होता है। उन्होंने संपूर्ण गीत नहीं गाए जाने पर कहा कि ये देवी की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। सभी संप्रदाय के लोगों को समान मान्यता मिलनी चाहिए। उन्होंने भी जनगणमन के बजाए वंदे मातरम को तरजीह देने के लिए कहा।
इसी दौर में देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने अपने अंतिम प्रस्ताव में वंदे मातरम को देशभक्ति और सांस्कृतिक विविधता से जोड़ते हुए कहा कि इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई है इसलिए वंदे मातरम को जन गण मन के समान सम्मान दिया जाएगा और उसे समान दर्जा प्राप्त होगा। ये ऐतिहासिक घटनाएँ बताती हैं कि वंदे मातरम सिर्फ एक गान नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्रता संग्राम में प्रेरणा देनेवाला नारा है और इसमें समाज को जोड़ने की ताकत है।
आज फिर उस ताकत को पहचाने की कोशिश की जा रही है। हालाँकि बहाने बना कर समाजवाद के नाम पर इसे इस्लाम विरोधी करार दिया जा रहा है। ‘समाजवाद’ शब्द जिसे संविधान में संशोधन के बाद जोड़ा गया था, वह आजादी के इस प्रतीक का दुश्मन बना बैठा है।
आज दो महान फुटबॉल राष्ट्र फुटबॉल के इतिहास का एक और महान पाठ लिखने जा रहे थे। कतर विश्व कप ने जहाँ फुटबॉल के महाकाव्य को एक सुखांत प्रदान किया था, वहीं यह विश्व कप फुटबॉल को और ऊँचाइयों की ओर लेकर जा रहा था। कई नए नायक व कई नवीन कहानियाँ फुटबॉल को मिलने जा रही थीं।
दो ऐसे कोच जिन्हें क्लब लेवल पर टॉप डिवीजन का कोई अनुभव नहीं, आज अपनी अपनी टीमों के संग विश्व कप के फाइनल मुकाबले के लिए तैयार थे। वह दोनों ही मिल कर विश्व कप, कोपा अमेरिका व यूरोपीयन चैंपियनशिप का खिताब जीत चुके हैं। अर्जेंटीना के कोच जब फुटबॉल का ककहरा सीख रहे थे तो स्पेन के वर्तमान कोच लुई डे ला फुएन्ते ही उनके मेंटर थे। मगर आज दोनों ही आमने-सामने खड़े थे।
निर्धारित समय पर दोनों ही टीमें मैदान का रुख करती हैं। अर्जेंटीनी टीम के खिलाड़ी अपनी पारंपरिक ‘अल्बीसेलेस्त’ जर्सियां पहने हमारी टीवी स्क्रीन पर थे। उनके साथ साथ खड़े थे अपनी चटख लाल व नीले रंग की जर्सी में खड़े स्पेनिश खिलाड़ी। वह इस जंग के लिए तैयार नजर आ रहे थे।
अर्जेंटीना के कोच लियोनेल स्कालोनी ने सेमीफाइनल की ही भांति,आज एक बार फिर 4-1-3-2 के बजाए 4-4-2 की फॉर्मेशन में अपनी टीम को मैदान में उतारा था। फॉरवर्ड लाइन में इस बड़े मुकाबले में एक बार फिर लियोनेल मेस्सी का साथ देने के लिए हूलियन अल्वारेज़ खड़े थे। उनके पीछे रॉड्रिगो दी पॉल, एंजो फर्नाडेज़, एलेक्सिस मैकऐलिस्टर व नीको गोंजालेज की सेना थी।
इस विश्व कप में शानदार फॉर्म में रहे लिआन्द्रो पारेदेस़ आज बेंच पर थे। रक्षापंक्ति में एकबार फिर मोंटील, रोमेरो, लीसान्द्रो मार्टीनेज़ व ताग्लियाफीको थे और गोलपोस्ट की रक्षा करने एमिलियानो मार्टिनेज खड़े थे।
कोच स्कालोनी ने शायद पारेदेस को बेंच पर बैठाकर एक ग़लती कर दी थी। साथ ही साथ नीको गोंजालेज सदैव अंतिम क्षणों में बेंच से आकर असरकारी दिखाई दिए थे, उन्हें फाइनल मुकाबले में सीधा प्लेइंग इलेवन में देखना थोड़ा आश्चर्यचकित कर रहा था।
वहीं, अपनी टीम को एक बेहतरीन सिस्टम को आधार बनाकर यूरोपियन चैंपियन बनाने वाले कोच लुई डे ला फुएन्ते ने फिर 4-1-2-3 की फॉर्मेशन में अपनी टीम को मैदान पर उतारा। सेमीफाइनल की ही भांति मिडफील्ड में रोड्री के संग फैबियान रुईज़ व दानी ओल्मो मौजूद थे। आगे अटैकिंग लाइन में सेंट्रल फॉरवर्ड ओयारजाबाल का साथ देने के लिए विंगर्स के रूप में एलेक्स बाएना व लामीन यमाल को मैदान पर उतारा गया, जबकि नीको वीलियम्स, फेरां तोरे, गावी, मिकेल मेरीनो, विक्टर मुनोज़, पेड्री जैसे मजबूत खिलाड़ी बेंच पर मौजूद थे। रक्षण का जिम्मा एक दफा फिर आयम्रिक लापोर्त के नेतृत्व में पाऊ कुबार्सी, पेड्रो पोर्रो व कुक्कुरेया के हिस्से था। गोलपोस्ट पर हमेशा की भांति अनुभवी उनाई सीमॉन मौजूद थे।
आय्म्रिक लापोर्त को आज रक्षापंक्ति का शानदार तरीके से नेतृत्व करना था। फुलबैक्स पेड्रो पोर्रो व कुक्कुरेया पर दारोमदार था मेस्सी व हूलियन अल्वारेज़ को खामोश रखने का। उन्नीस वर्षीय, बेबी फेस्ड असैसिन, पाउ कुबार्सी को, जिसने सेमीफाइनल मैच में किलियन एमबाप्पे, उस्मान डेंबेले, बार्कोला, माइकल ओलीस़ व देसीरे दोऊ को गोल मारने से वंचित रख दिया था, आज अर्जेंटीनी टीम को गोल के लिए तरसा देना था।
अर्जेंटीना को भी तो आखिर मजबूत स्पेनिश डिफेंस से टकराना था। हालाँकि पिछले विश्व कप से इतर एंजेल दि मारिया जैसे बड़े मैचों के खिलाड़ी की अनुपस्थिति ने इस विश्व कप में अर्जेंटीनी अटैक की धार को काफी हद तक कम कर दिया था सो उम्मीद थी कि इस मुकाबले में उनकी ओर से कम ही गोल देखने को मिलेंगे। मैच से पूर्व स्पेन का पलड़ा काफी हद तक भारी नजर आ रहा था।
इस अर्जेंटीना की खासियत है कि यह टीम अंतिम क्षणों तक भी हार नहीं मानती। लेकिन फिर लुई डे ला फुएन्ते की स्पेन एक इकाई के रूप में खेलती नजर आई थी। वह मिल कर अटैक और मिल कर ही रक्षण भी करते दिखते हैं। न्यूयॉर्क के न्यूजर्सी स्टेडियम में आज अर्जेंटीनी टैंकों का मुकाबला स्पेनिश दीवार से था। यह एक बेहद जबरदस्त मैच होने जा रहा था।
विशालकाय मेटलाइफ स्टेडियम में मौजूद अस्सी हजार दर्शकों के शोर से स्टेडियम किसी रोमन साम्राज्य के उस अरीना सा नजर आ रहा था जहाँ चौदह मिनटों में ग्लैडिएटर्स जान की बाजी लगाने जा रहे थे। रेफरी स्लावको विनचिच व्हिस्ल बजाते हैं। एक सौ तीन मैचों के बाद आज यहां खड़ी दो टीमों के मध्य इस बहुप्रतीक्षित फाइनल मुकाबले की शुरुआत हो जाती है। दोनों ही टीमों को यह मैच कैसे भी जीतना ही था। लक्ष्य था – विश्व कप की चमचमाती ट्रॉफी घर लेकर जाना।
मैच की शुरुआत से ही ‘ला रोज़ा’ गेंद को अपने कब्जे में ले लेती है। पांचवें मिनट में ही स्पेनिश टीम अपने सितारा खिलाड़ी लामीन यमाल के नेतृत्व में एक अटैक करती है। फिनीश लक्ष्य से काफी दूर रह जाता है। अर्जेंटीना बमुश्किल गेंद को छू पा रही थी। स्पेन गेंद को छोड़ने के मूड में थे ही नहीं। पहला हाइड्रेशन ब्रेक हो जाता है।
खेल आगे बढ़ता है। स्पेन अटैकिंग मूव्स बनाता रहता है परन्तु दो तीन दफा उसके खिलाड़ी ऑफसाइड दे दिए जाते हैं। अर्जेंटीनी डिफेंस किसी तरह अपने दुर्ग की रक्षा कर रही थी। अर्जेंटीना की टीम थोड़ा फिजिकल खेल खेलती दिख रही थी। स्पेनिश टीम ऐसे खेलने के लिए नहीं जानी जाती। उनके खेल में सदैव एक नफासत रही है। स्पेन काव्यात्मक अंदाज में खेल रहे थे। वह छोटे छोटे पासों से अर्जेंटीनी टीम को गेंद के लिए तरसा रहे थे। मिकेल ओयारजाबाल एक जोरदार किक लगाते हैं। लेकिन गोलकीपर एमिलियानो मार्तिनेज़ एक अच्छा बचाव करते हुए उन्हें गोल करने से रोक लेते हैं।
इकतालिसवें मिनट में अर्जेंटीना के लिए पूरे टूर्नामेंट में ही बेहतरीन फॉर्म में रहे लिसान्द्रो मार्टिनेज को रेफरी द्वारा येलो कार्ड दिखा दिया जाता है। थोड़ी ही देर में मार्क कुक्कुरेया भी गोल लगाने का एक असफल प्रयास करते हैं। स्पेन के हमले रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। अचानक ही, मिकेल ओयारजाबाल पर किए टैकल के चलते मिले येलो कार्ड के बाद, अर्जेंटीनी बुचर लिसान्द्रो मार्टिनेज जाँघ की माँसपेशियों की चोट के चलते घायल हो जाते हैं। वह आगे मैदान में बने रहने की स्थिति में नहीं थे।
अनुभवी ओटामेंडी मैदान में उनका स्थान लेते हैं। कुछ पलों में पहला हाफ समाप्त हो जाता है। अर्जेंटीना बस किसी तरह, स्पेन को अबतक गोल करने से रोक कर, इस मैच में बनी हुई थी। उनकी प्लेइंग इलेवन में काफी गड़बड़ियाँ थी। पारेदेस के स्थान पर नीको गोंजालेज को मैच शुरू करवाना गलत फैसला साबित हुआ था। नीको गोंजालेज अबतक अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल रहे थे।
पहले हाफ में स्पेन ने विरोधी टीम को पूरी तरह अपने कब्जे में रखा हुआ था। उन्होंने उन्हें एक पल भी खुलकर खेलने ही नहीं दिया था। अर्जेंटीना बस स्पेन के अटैक के खिलाफ रक्षण करती दिख रही थी। स्पेन ने जो सबसे बेहतरीन चीज़ आज की थी वह यह थी कि गेंद लियोनेल मेस्सी तक पहुँचने ही नहीं दी जा रही थी। पहले हाफ में अर्जेंटीना के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी ने गेंद को मात्र पंद्रह बार ही छुआ था। स्कोर बोर्ड पर लिख रहे स्कोर से मैच की हकीकत काफी भिन्न रही थी। स्पेन मैच के पहले मिनट से ही गत विजेता पर पूरी तरह हावी हो गई थी। अर्जेंटीना खिताब बचाने उतरे हैं ऐसा लग ही नहीं रहा था।
खैर, दूसरे हाफ की शुरुआत होती है। अपनी ग़लती को ठीक करने के प्रयास में कोच लियोनेल स्कालोनी नीको गोंजालेज को बाहर बुलाकर अनुभवी डिफेंसिव मिडफील्डर लियान्द्रो पारेदेस को मैदान के भीतर भेजते हैं। खेल की शुरुआत होते ही स्पेन फिर हमले करती दिखती है। लेफ्ट विंगर एलैक्स बाएना गोल लगाने का एक प्रयास करते हैं पर वह गेंद को निशाने पर नहीं रख पाते। मैदान में उतरने के पाँच मिनट के भीतर ही लियान्द्रो पारेदेस एक घातक फाउल करते हैं और परिणामस्वरूप उन्हें रेफरी द्वारा येलो कार्ड दिखा दिया जाता है।
मैच में इस वक्त ऐसे फाउल की कोई जरूरत नहीं थी। अभी काफी खेल खेला जाना बाकी था। एक इतने अनुभवी खिलाड़ी से, इतने बड़े मुकाबले में, ऐसी उम्मीद नहीं थी। पाँच मिनट पश्चात अर्जेंटीना के लिए नाहुएल मोलीना मैदान पर गोंजालो मोंटील की जगह लेते हैं। थोड़ी ही देर में स्पेनिश कोच, एक गोल की आस में, मिकेल ओयारजाबाल के स्थान पर फेरां तोरे को और फैबियान रुईज़ की जगह पेड्री को मैदान पर उतारते हैं।
तुरंत ही स्पेन एक दफा फिर अटैक करते हैं। दानी ओल्मो गोल की दिशा में एक बेहतरीन शॉट लगाते हैं परन्तु गोलकीपर एमिलियानो मार्तिनेज़ एक बार फिर अच्छा बचाव करते हैं। एक मिनट के अंदर, गोल के लिए प्रयासरत, दानी ओल्मो फिर एक जोरदार हेडर लगाते हैं। लेकिन गोलकीपर एमिलियानो मार्तिनेज़ फिर एक शानदार बचाव कर लेते हैं। अगर पैंसठ मिनट तक स्कोर बराबरी पर था तो आज इसमें बड़ी भूमिका अर्जेंटीनी गोलपोस्ट पर खड़े उनके सजग प्रहरी एमिलियानो मार्तिनेज़ की थी।
आश्चर्यजनक यह था कि स्पेन अर्जेंटीना को गेंद दे ही नहीं रही थी, जिसके चलते मेस्सी मैच में कहीं नजर ही नहीं आ रहे थे। दो मिनट के भीतर एक बार फिर स्पेन अटैक करती है पर विपक्षी रक्षापंक्ति बचाव कर लेती है।
प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI Grok)
दूसरे हाइड्रेशन ब्रेक के बाद अर्जेंटीनी टीम की मुश्किलें तब और भी बढ़ जाती हैं जब कोच स्कालोनी क्रिश्चियान रोमेरो को मैदान से बाहर बुलाकर उनके स्थान पर फाकुन्दो मेदीना को मैदान में भेजते हैं। रोमेरो चोटिल हो गए थे। इसके चलते, इतने बड़े मैच के इतने अहम मोड़ पर, अर्जेंटीना के दोनों ही प्रमुख सेंट्रल डिफेंडर मैदान से बाहर जा चुके थे। इससे एक नुकसान यह भी हुआ था कि कोच को अपनी रणनीति के इतर दो सब्स्टीट्यूशन इस्तेमाल करने पड़ गए। अब उनके पास चाह कर भी अटैकिंग सब्स्टीट्यूशन करने के ज्यादा मौके थे नहीं।
राउंड ऑफ 16 में स्पेन का सामना पुर्तगाल से था। वहां, लामीन यमाल पर लगाम लगाए हुए, पुर्तगाल के प्रमुख खिलाड़ी नूनो मेंडेस मैच के अहम समय में चोटिल हो गए थे। मैच स्पेन जीत लेती है। फिर क्वार्टर फाइनल में बेल्जियम के गोलकीपर ऐन मौके पर घायल होकर बीच मैच में बाहर हो जाते हैं। सीधे क्वार्टर फाइनल में मैदान पर आए, विश्व कप में अपना पहला मैच खेलने उतरे, गोलकीपर की बेजा ग़लती के चलते स्पेन यह मैच जीत जाती है। फिर सेमीफाइनल में जहाँ सामना मजबूत फ्रांस से था, विलियम सलीबा बीच मैच में घायल होकर मैदान छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं। नतीजतन एक बार फिर स्पेन मौका भुनाते हुए मैच जीत जाती है। अब, एकबार फिर, उनकी विरोधी टीम दोनों ही सेंट्रल डिफेंडर को चोटिल होने के कारण को चुकी थी। क्या यह कोई इशारा था?
खेल आगे बढ़ता है। इस मैच में बेअसर रहे स्टार खिलाड़ी रोड्रिगो डि पॉल को सत्तरवें मिनट में बाहर बुलाकर कोच एक बार फिर सिमियोनी को मैदान पर लाते हैं। इस विश्व कप में बेंच से मैदान में आकर अंतिम क्षणों में अहम गोल दागने वाले लाउतारो मार्टिनेज का शायद अब मैदान पर आ पाना लगभग नामुमकिन था। स्पेन, सत्तर फीसदी समय गेंद अपने कब्जे में रखते हुए, लगातार आक्रमण करता रहता है। पहले तो सेमीफाइनल में फ्रांस को और अब आज उन्होंने अर्जेंटीना को गेंद के लिए तरसा दिया था। अर्जेंटीनी खिलाड़ी बस इधर से उधर दौड़ रहे थे। वह गेम में कहीं थे ही नहीं।
पिच्हत्तरवें मिनट में अपने अटैक को और धार प्रदान करने हेतु कोच लुई डे ला फुएन्ते एलेक्स बाएना के स्थान पर नीको विलियम्स को मैदान पर उतारते हैं। और, अब वक्त आ गया था कि वह अपना अंतिम दाँव खेलें। दानी ओल्मो को बाहर बुलाकर अब कोच, अपने सबसे घातक हथियार, मिकेल मेरीनो को मैदान में उतार चुके थे। अब अर्जेंटीना के लिए यह मैच और भी ज्यादा खौफनाक होने जा रहा था।
पाऊ कुबार्सी एक दूरी से गोल की दिशा में घातक शॉट लगाते हैं। परन्तु एकबार फिर एमिलियानो मार्तिनेज़ शानदार बचाव कर लेते हैं। दो मिनट पश्चात ही पाऊ कुबार्सी के साथी आय्म्रिक लापोर्त एक गजब हेडर लगाते हुए गोल मारने का प्रयास करते हैं। परन्तु एमिलियानो मार्तिनेज़ आज एक दीवार की माफिक खड़े थे। ऐसा लग रहा था कि अर्जेंटीना के लिए आज सिर्फ वही खेल रहे हैं। स्पेन लगातार हमले कर रही थी, एमिलियानो मार्तिनेज़ लगातार एक के बाद एक सेव करते जा रहे थे।
अर्जेंटीनी खिलाड़ी लगातार फाउल करते हुए स्पेनिश खिलाड़ियों की लय तोड़ने का प्रयास कर रहे थे। वह काफी खूँखार तरीके से खेल रहे थे। यह शायद फुटबॉल तो नहीं ही था। बयासिवें मिनट में सेमीफाइनल में बराबरी का गोल लगाने वाले एंजो फर्नानदेज़ को एक घातक फाउल करने पर रेफरी द्वारा येलो कार्ड दिखा दिया जाता है। स्पेन फिर हमले के लिए छोटे छोटे पासों से गेंद लिए आगे बढ़ती है। फेरां तोरे एक प्रयास करते हैं मगर वह गेंद को निशाने पर नहीं रख पाते। तुरंत ही कप्तान रोड्री भी एक जोरदार प्रयास करते हैं। मगर वह भी गेंद को गोलपोस्ट से दूर रखते हैं। स्कोर अब भी 0-0 ही था। मैच में गरमा-गरमी बढ़ती ही जा रही थी। अर्जेंटीना लगातार घातक फाउल कर रही थी। गलत आचरण के लिए मैदान से बाहर गए रोमेरो को रेफरी द्वारा येलो कार्ड दिखाया जाता है।
नब्बे मिनट का खेल पूर्ण हो चुका था। अर्जेंटीना नब्बे मिनट के खेल में एक बार भी विपक्षी गोलपोस्ट की ओर निशाना नहीं साध सकी थी। यह मैच पूरी तरह एकतरफा ही रहा था। लग ही नहीं रहा था कि स्पेन की विपक्षी टीम अपने ताज की रक्षा करने मैदान में उतरी है।
90+3 मिनट। नीडो विलियम्स गोल दागने की एक कोशिश करते हैं। मगर यह प्रयास अच्छा नहीं था। स्कोर अब भी 0-0। माहौल एकदम गरम। सबके चेहरों पर चिंता की लकीरें। जबरदस्त प्रेशर भी था ही।
90+3 मिनट। एंजो फर्नानदेज़ स्पेनिश खिलाड़ी पाऊ कुबार्सी को बहुत ही बुरी तरह टैकल करते हैं। नतीजा येलो कार्ड। दो येलो कार्ड मिलने के चलते एंजो फर्नानदेज़ को मैदान से बाहर कर दिया जाता है। अब पहले से ही पस्त अर्जेंटीना दस खिलाड़ियों के संग खेलने के लिए मजबूर थी। एंजो एक अनुभवी खिलाड़ी हैं। जाने क्यूँ वह खुद पर काबू नहीं रख सके। वह अंतिम क्षणों में गोल दागने की क्षमता रखते हैं। मगर उनकी इस ग़लती के चलते अब वह मैदान से बाहर हो चुके थे।
90+9 मिनट। लामीन यमाल स्पेन के लिए गोल करने का एक अंतिम प्रयास करते हैं। मगर, उनका यह प्रयास भी नाकाफी रहता है। रेफरी द्वारा मैच 0-0 की बराबरी पर रोक दिया जाता है। अब मैच का फैसला एक्स्ट्रा टाइम में होने जा रहा था। या शायद पेनाल्टी शूटआउट? यह तो खैर आगे पता चलने वाला था।
एक्स्ट्रा टाइम का पहला हाफ शुरू होता है। अर्जेंटीना दस खिलाड़ियों के संग मैदान पर थी। अर्जेंटीना के पास स्पेन को गोल करने से रोकते हुए मैच को पेनाल्टी शूटआउट की ओर ले जाने के अलावा ज्यादा कुछ शेष रह नहीं गया था।
तिरानवे मिनट में एकबार फिर नीको विलियम्स एक हेडर लगाते हैं। मगर फिर एकबार गोलकीपर एमिलियानो मार्तिनेज़ अच्छा बचाव कर लेते हैं। अन्ठानवें मिनट में गोलकीपर एमिलियानो मार्तिनेज़ भी चोटिल हो चुके थे। अर्जेंटीनी डगआउट में सभी लोग चिंतित नजर आ रहे थे। लेकिन, टीम के हित को सर्वोपरि रखते हुए एमिलियानो मार्तिनेज़ मैदान पर बने रहते हैं।
इस बीच स्पेन दो और सब्स्टीट्यूशन कर लेता है। कुछ पलों बाद अर्जेंटीनी टीम भी अंतिम सब्स्टीट्यूट के तौर पर हूलियन अल्वारेज़ की जगह एक डिफेंडर मार्कोस सेनेसी को मैदान पर उतार देती है। इस का यह अर्थ हुआ कि सेमीफाइनल में अर्जेंटीना के लिए विजयी गोल दागने वाले लाउतारो मार्टिनेज अब इस मैच का हिस्सा नहीं होने जा रहे थे।
स्पेन अपने अटैक लगातार जारी रखती है। पहले मिकेल मेरीनो फिर नीको विलियम्स गोल पर हमला करते हैं। दोनों ही निशाने से दूर रह जाते हैं। माहौल इतना तल्ख़ हो चला था कि अर्जेंटीनी कोच तक को रेफरी द्वारा येलो कार्ड दिखा दिया जाता है। अर्जेंटीना की टीम अब काफी ज्यादा फाउल करने लगी थी। एक्स्ट्रा टाइम का पहला हाफ समाप्त हो जाता है।
यह चमत्कार ही था कि स्कोर अब भी किसी तरह से 0-0 से बराबरी पर था। स्पेन ने एक के बाद एक लगातार विपक्षी गोलपोस्ट पर हमले जारी रखें थे। मुश्किल की इस घड़ी में आश्चर्यजनक तरीके से मेस्सी कहीं भी दिखाई नहीं दे रहे थे। अब तो लग रहा था कि मैच शाय़द पेनाल्टी शूटआउट तक खिंचेगा।
एक्स्ट्रा टाइम के दूसरे हाफ की शुरुआत होती है। पहले ही मिनट में स्पेनिश राइट बैक पेड्रो पोर्रो मैदान की दाईं ओर से एक बेहतरीन क्रॉस अर्जेंटीनी बॉक्स में भेजते हैं। उनका प्रयास था नीडो विलियम्स को तलाशना। गेंद नीको की ओर जाती है। वह बड़ी चपलता के साथ एक हेडर से गेंद को साथी खिलाड़ी फेरां तोरे की ओर सरका देते हैं। फेरां तोरे अपने बाएँ पाँव से गेंद को खूबसूरत किक लगाते हुए गोलपोस्ट के भीतर भेज देते हैं। एमिलियानो मार्तिनेज़ का दुर्ग अंततः भेद लिया गया था। फेरां तोरे जोश में मैदान की बाँई ओर बढ़ते हैं। स्पेनिश बेंच से तमाम लोग उनकी ओर जश्न मनाने दौड़ते हुए आते हैं। स्टेडियम में मौजूद तमाम स्पेनिश समर्थकों की खुशी देखते ही बनती थी। अर्जेंटीनी समर्थकों की आंखें नम हो गई थीं। अर्जेंटीना अब टूट चुकी थी।
अर्जेंटीना अब विपक्षी गोलपोस्ट पर जवाबी हमला करने का प्रयास करती है। अब कहीं जाकर वह विपक्षी गोलपोस्ट पर पहला शॉट लगाते हैं। अब मैदान पर मेस्सी के क्रॉस पर गोल दागने के लिए न तो एंजो फर्नानदेज़ मौजूद थे न ही लाउतारो मार्टिनेज। फाकुन्दो मेदीना भी गोल की दिशा में एक शॉट लगाते हैं, यह शॉट गोल से काफी दूर रह जाता है। तुरंत ही गुइलिआनो सिमियोनी एक प्रयास करते जरूर हैं। वह भी नाकाफी रह जाता है।
120+6 मिनट। रेफरी स्लावको विनचिच दिन की आखिरी व्हिस्ल बजाते हैं। मैच का अंत होता है। इसके साथ ही अर्जेंटीना के वर्चस्व का भी अंत होता है। अर्जेंटीना अपने खिताब की रक्षा करने में असमर्थ रह जाती है। वह अपने खिताब की रक्षा करने वाली तीसरी टीम बनने से चूक गई थी। स्पेन के रूप में विश्व को अपना नया विजेता मिल गया था। वह पूरी तरह इसके हकदार थे। उन्होंने आज बेहद शानदार तरीके से अर्जेंटीनी टीम को धूल चटा दी थी। आज, उनका नाम, सदैव के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका था।
कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है। इससे पहले भी सन् 2010 में फाइनल मुकाबले का निर्णायक गोल एक्स्ट्रा टाइम में बार्सिलोना के लिए खेलने वाले एक खिलाड़ी द्वारा आया था और स्पेन विश्व विजेता बनी थी। इस दफा फिर एक बार्सिलोना के ही खिलाड़ी ने स्पेन के लिए निर्णायक गोल दाग दिया था, वह भी एक्स्ट्रा टाइम में ही। क्या यह कथा स्वयं खुदा लिख रहा था? शायद हाँ।
मेस्सी मैदान में बैठे हुए कराह रहे थे। वह अपने आंसुओं को रोक नहीं पा रहे थे। हमेशा की तरह इस बार भी अकेले ही वह अपनी टीम को यहां तक ले आए थे। मगर, अफसोस, वह आज अंतिम बाधा पार नहीं कर सके थे।
ला रोजा ने आज लगातार एक सौ बीस मिनट तक अर्जेंटीना के गोलपोस्ट पर बमबारी कर दी थी। किसी तरह गोलकीपर एमिलियानो मार्तिनेज़ ने ग्यारह बेहद शानदार बचाव करते हुए अपनी टीम को मैच में बनाए रखा। आज अगर वह गोलपोस्ट पर खड़े नहीं होते तो शायद परिणाम इससे भी बद्तर हो सकता था। स्पेन ने मैच में 803 पास किए। अर्जेंटीना ने लगभग चार सौ। एक सौ बीस मिनट में अर्जेंटीना ने विपक्षी गोलपोस्ट की ओर कुल तीन बार शॉट लगाया। उसमें से एक भी निशाने पर न था।
लियोनेल मेस्सी का अंतिम नृत्य बेहद फीका रहा गया था। मैच पश्चात अर्जेंटीनी समर्थक उनके नाम के नारे गा रहे थे। वह जानते थे कि यह शायद अंतिम बार है जब वह मेस्सी को अल्बीसेलेस्त जर्सी पहने देख रहे हैं। मेस्सी भावुक हो गए थे। कहते हैं मरने से पहले कोई भी सितारा सबसे ज्यादा चमक बिखेरता है। मेस्सी ने इस विश्व कप में कमाल का प्रदर्शन किया था। अफसोस, उनके तमाम प्रयास आज असफल रह गए। स्पेन शानदार अंदाज में विश्व विजेता बन गई थी।
यह स्पेन के काव्यात्मक शैली के बेहद खूबसूरत खेल की अर्जेंटीनी टीम के कठोर दक्षिण अमेरिकी खेल पर जीत थी। यह फुटबॉल की जीत थी।
फुटबॉल का यह महाकुंभ अब समाप्त हो गया। यह बेहद शानदार आयोजन रहा। स्पेन के रूप में एक ऐसी टीम विश्व विजेता बनी, जो इसकी हकदार थी।
इस के साथ ही मैं अपने तमाम पाठकों का भी शुक्रिया अदा करूँगा जिन्होंने पिछले एक माह तक लगातार हमारे लेख पढ़े व मुलाकात कर या वॉट्सएप के जरिए अपनी राए हमें बतलाई। यह साथ बेहद खूबसूरत था। आपसे हमारी मैच रिपोर्ट्स को अपार स्नेह मिला। उम्मीद है कि यह साथ आगे भी बना रहेगा। तब तक के लिए अलविदा।
राजस्थान में अब वही कहानी सामने आ रही है जो छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में देखने को मिलती है। यहाँ ईसाई मिशनरी जनजातीय (ST) समाज के वंचित गाँवों के लोगों को मुफ्त राशन, मुफ्त नौकरी, और मुफ्त पढ़ाई जैसी जरूरी चीजों का लालच देकर उन्हें धर्म बदलने के लिए मजबूर कर रही हैं। इनसे कहा जाता है कि ईसाई बनने से उनकी सारी परेशानियाँ दूर हो जाएँगी, लेकिन इनका नतीजा यह निकलता है कि लोग अपनी संस्कृति और समाज से कटते चले जाते हैं। ये वही मकसद है जिसके लिए मिशनरियाँ देश के अलग-अलग हिस्सों में सक्रिय हैं।
इसी मामले पर चिंता जताते हुए अब राजस्थान के उदयपुर से सांसद डॉ. मन्नालाल रावत ने आवाज उठाई है। उन्होंने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को चिट्ठी लिखकर पूरे मामले की जानकारी दी है।
अपने पत्र में सासंद ने लिखा है कि उदयपुर, डूंगरपुर और बांसवाड़ा जैसे इलाकों में मिशनरियों की अवैध धर्मांतरण गतिविधियों खासतौर पर बढ़ी हैं। उनका कहना है कि यहाँ संगठित तरीके से गिरोह बनाकर जनजातीय समाज को निशाना बनाया जा रहा है और शिक्षा व रोजगार के नाम पर बच्चों को राज्य से बाहर ले जाया जा रहा है।
उदयपुर सांसद ने पत्र लिखकर धर्मांतरण गतिविधियों में NIA-CBI-IB की जाँच की रखी माँग
पत्र के मुताबिक हाल ही में उदयपुर जिले दो लड़कियाँ और पाँच लड़के समेत सात बच्चों को तमिलनाडु के एक स्कूल में दाखिला दिलाने के बहाने राज्य से बाहर ले जाया जा रहा था। सांसद के अनुसार इन बच्चों को गोवा में स्थानीय पुलिस और बाल कल्याण समिति ने रोका, जिसके बाद राजस्थान पुलिस ने कार्रवाई करते हुए बच्चों को रेस्क्यू करने की प्रक्रिया शुरू की। पत्र में यह भी कहा गया है कि पहले भी इसी तरह बच्चों को राज्य से बाहर ले जाया जा चुका है।
सांसद मन्नालाल रावत द्वारा लिखे पत्र की कॉपी (साभार: NDTV)
सांसद ने अपने पत्र में यह आशंका भी जताई है कि इस पूरे नेटवर्क के तार पंजाब, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के अलावा पाकिस्तान और नेपाल तक फैले हो सकते हैं।
मामलों की गंभीरता को देखते हुए सांसद ने माँग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच के लिए एक विशेष जाँच दल (SIT) बनाई जाए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर CBI, NIA और IB जैसी केंद्रीय एजेंसियों से भी जाँच करवाई जा सकती है, ताकि इन धर्मांतरण नेटवर्क से जुड़े संगठनों और मिशनरियों की फंडिंग की सच्चाई सामने आ सके।
उदयपुर सांसद का यह पत्र सचमुच राजस्थान में चल रहे धर्मांतरण रैकेट को बेनकाब करता है। क्योंकि पिछले कई वर्षों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें संगठित तरीके से मिशनरियों ने जनजातीय क्षेत्रों में पैठ जमाकर अवैध धर्मांतरण का खेल खेला है। राजस्थान में धर्मांतरण रैकेट के ऐसे 10 मामले इस रिपोर्ट में मैं आपको बताने जा रही हूँ।
1.उदयपुर से 7 बच्चों को मुफ्त शिक्षा के लिए गोवा लेकर गए मिशनरी
बीते दिन रविवार (19 जुलाई 2026) को ही मामला सामने आया, जहाँ मुफ्त सिक्षा का झाँसा देकर 7 से 12 साल के सात बच्चों को राजस्थान से गोवा ले जाया गया। बच्चों के साथ मिशनरी के 3 लोग भी थे, जिन्हें पुलिस ने हिरासत में ले लिया। यहाँ से बच्चों को तमिलनाडु ले जाने की प्लानिंग थी।
पूछताछ में इसका खुलासा हुआ है कि बच्चे उदयपुर में भी चर्च जाया करते थे। पुलिस इस मामले की धर्मांतरण एंगल से भी जाँच कर रही है। पुलिस की जानकारी में आया है कि पहले भी उदयपुर से ही कम से कम 15 बच्चों को तमिलनाडु भेजा गया था।
2.खेतों में कुआँ और ट्यूबवेल खुदवाने का लालच देकर 200+ जनजातियों को ईसाई बनाने की कोशिश
उदयपुर जिले के ऋषभदेव थाना क्षेत्र के कानूवाड़ा बिलखाई गाँव में प्रार्थना सभा आयोजित कर 20 से ज्यादा गाँवों के 200 जनजातीय लोगों को धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश की गई। सभा में लोगों को खेतों में कुआँ और ट्यूबवेल खुदवाने का लालच दिया गया और इसके बदले ईसाई बनने को कहा गया।
सभा में यह भी कहा गया कि हिंदू धर्म छोड़ दो, सारी बीमारियाँ दूर हो जाएँगी और हर तरीके से आर्थिक लाभ भी मिलेगा। पुलिस ने कार्यक्रम स्थल में पहुँचकर झारखंड और छत्तीसगढ़ के 3 पादरियों समेत 11 लोगों को हिरासत में लिया था।
3.पिछले 10 साल से 50+ गाँवों में सक्रिय ईसाई धर्मांतरण रैकेट
उदयपुर के ऋषभदेव क्षेत्र में धर्मांतऱण का मामला सामने आने के बाद दैनिक भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि खेरवाड़ा क्षेत्र के 50 से अधिक गाँवों इनकी चपेट में हैं, जहाँ मिशनरियाँ पिछले 10 सालों से जनजातीय परिवारों का लालच देकर धर्मांतरण करवा रही हैं।
रिपोर्ट में सामने आया कि गाँव वालों के धर्मांतरण के लिए मिशनरी ग्रुप ने हर गाँव में 3 से 4 ऐसे स्थानीय समाज के नेताओं को प्रभारी बना रखा था। कई ग्रामीणों और महिलाओं ने आरोप लगाया कि धर्मांतरण का विरोध करने वालों पर ऐसे प्रभावशाली लोगों के जरिए उन पर दबाव बनाया जाता था।
4.पादरी ने 450 लोगों को बनाया ईसाई
श्रीगंगानगर जिले में फ्रेंडस मिशनरी प्रेयर बैंड नाम की ईसाई मिशनरी के पादरी पोलुस बरजो को पुलिस ने गिरफ्तार किया। पूछताछ में पता लगा कि उसने पिछले 11 वर्षों में 450 से अधिक लोगों को ईसाई बनाया है। पुलिस ने उसके पास से एक रजिस्टर समेत कई दस्तावेज भी बरामद किए, जिनमें धर्मांतरण करने वाले लोगों का रिकॉर्ड था।
वह खुद एक हिंदू हुआ करता था और बाद में उसने धर्मांतरण कर लिया। उसने यह भी बताया कि पादरी के तौर पर उसे 9 हजार रुपए सैलरी दी जाती है और जिस संस्था के लिए वह काम करता है उसका काम ही हिंदुओं को लालच देकर धर्म परिवर्तन करना है। पोलस ने बताया कि उसे हर महीने 20 लोगों को ईसाई बनाने का टारगेट मिला है।
5.हिंदू देवी-देवताओं का विसर्जन करवा 250 लोगों को ईसाई बनाने का प्रयास
जयपुर के वाटिका थाना क्षेत्र में भी साल 2022 में ईसाई धर्मांतरण के बड़े मामले का खुलासा हुआ था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि करीब 250 लोगों पर हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव बनाया गया। मामले की जानकारी सामने आने के बाद हिंदू संगठनों ने विरोध जताया और आरोप लगाया कि लोगों को लालच और ईसाइयत की प्रार्थना सभाओं के जरिए धर्मांतरण के लिए प्रेरित किया जा रहा था।
शिकायत में यह भी कहा गया था कि हिंदुओं से हिंदू देवताओं की पूजा बंद करवाकर मूर्तियों का विसर्जन करवा दिया गया और बीमारी ठीक करने और पैसों का लालच दिया जा रहा था।
6.बाप-बेटे घर पर चर्च बनाकर चलाते थे धर्मांतरण का खेल
श्रीगंगानगर में बाप बग्गूसिंह और बेटा अमनदीप सिंह मिलकर जनजातीय समाज को ईसाई धर्मांतरण करवाया। बाप और बेटे ने अपने घर में चर्च बनाया, जहाँ प्रार्थना सभा में गरीब लोगों को बीमारी ठीक करने का लालच देकर ईसाई बनाते थे। पुलिस ने बाप-बेटों के खिलाफ कार्रवाई की।
मामले कि शिकायतकर्ता ने बताया कि खुद को पादरी बताने वाला बग्गू सिंह अपने घर पर पानी पिलाता, कुछ मंत्र पढ़ता औऱ सिर पर हाथ रखकर कहता, “अब तुम ईसाई हो गए हो, प्रभु यीशु तुम्हारी सारी बीमारी ठीक करेंगे।” वहीं दूसरी ओर बग्गू सिंह हिंदू धर्मों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करता था। पुलिस की जाँच में सामने आया था कि वह अब तक 25 परिवारों को ईसाई बना चुका था।
7.‘राजस्थान में शैतान का राज है, यहाँ यीशू राज होगा’: राजस्थान में मिशनरियों का मकसद
पिछले साल ईसाई धर्मांतरण का एक और गंभीर मामला सामने आया था जब कोटा के बोरेकहेड़ा थानाक्षेत्र की एक चर्च में ईसाई मिशनरियों ने तीन दिवसीय प्रार्थना सभा आयोजित की और अपना मकसद बताया। सभा से एक वीडियो वायरल हुई, जिसमें कहा गया था, “राजस्थान में शैतान का राज है, यहाँ यीशू राज होगा।”
इस मामले में ‘राजस्थान अवैध धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2025’ के तहत राज्य में पहला मुकदमा दर्ज हुआ था। शिकायत कुछ हिंदू संगठनों के स्वयंसेवकों द्वारा बोरेकहेड़ा थाने में वीडियो क्लिप और सोशल मीडिया लाइवस्ट्रीम के आधार पर दी गई थी।
8.छत पर बने कमरे में ईसाइयत की सभा में धर्म परिवर्तन का खेल
लगभग 10 महीने पहले राजस्थान में धर्म परिवर्तन के खिलाफ कानून लागू होते ही जयपुर के प्रताप नगर क्षेत्र में एक मामला सामने आया, जहाँ छत पर बने कमरे में ईसाइयत की सभा आयोजित की जाती थी और लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाया जाता था। मौके पर मिशनरी के 5 लोग मिल थे, जिसके बाद स्थानीय लोगों ने विरोध किया तो मारपीट शुरू कर दी।
9.बीकानेर और उदयपुर में ईसाई धर्मांतरण के गंभीर मामले
इसी साल फरवरी में उदयपुर और जयपुर, दो जिलों में एक साथ ईसाई धर्मांतरण का खुलासा हुआ, जिसमें एक सांसद मन्नालाल रावत और दूसरा हिंदू संगठन ने किया। उदयपुर वाले मामले में छगनलाल नाम के व्यक्ति पर प्रार्थना सभा आयोजित कर धर्मांतरण का पाठ पढ़ाया जा रहा था।
वहीं बीकानेर में भी ईसाई धर्मांतरण गतिविधियाँ आयोजित की जा रही थीं हिंदू संगठन ने विरोध किया तो उनसे मारपीट की गई। हिंदू संगठन ने पुलिस से इस मामले में शिकायत दर्ज कराई थी।
9.दिल्ली से अलवर आकर पादरी राजकुमार लोगों को बनाता ईसाई
हाल ही में एक और पादरी राजकुमार को पुलिस ने गिरफ्तार किया। जो अलवर जिले के अखेपुरा थाना क्षेत्र में ईसाइयत की सभा की आड़ में बीमारियाँ दूर करने का लालच देकर धर्मांतरण के लिए उकसा रहा था। हिंदु संगठन ने शिकायत में बताया था कि मौके पर ईसाइयत की किताबें और मोबाइल में ईसाई धर्मांतरण गतिविधि का खुलासा हुआ है।
वह दिल्ली से अलवर आकर यहाँ छोटे-छोटे गाँवों के लोगों को बहला-फुसलाकर ईसाई बनाने का काम करता था, ऐसा वो पिछले 4-5 साल से कर रहा था। उसके यह कारनामे देखकर हिंदू संगठन के कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने उसे सड़क पर घसीटकर पीटा जिसमें उसके कपड़े भी फट गए।
10.भरतपुर में धर्मांतरण गतिविधियाँ के तार इटली से जुड़े, बजिंदर ने 20 हजार लोगों को बनाया ईसाई
साल 2024 में भरतपुर जिले में ईसाई धर्मांतरण रैकेट का खुलासा हुआ था, तब जाँच के दौरान सामने आया था कि पूरे नेटवर्क के तार एक इटली की संस्था ‘लभाना मिनिस्ट्री’ से जुड़ रहे हैं। भरतपुर में ईसाई बने लोगों को इसी संस्था का धर्मांतरण सर्टिफिकेट दिया गया था।
यह संस्था ईसाइयों की संख्या को बढ़ाने के पीछे लगी है, जिसमें मूल काम लोगों को तमाम तरह के प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराना होता है। इसके अलावा भरतपुर के मालों में फंडिंग की जाँच में एलएमएन कंपनी का नाम सामने आया था, जो लोगों को बाइबिल भी गिफ्ट करती थी।
इस मामले में पादरी बजिंदर को गिरफ्तार किया गया था, जिसका ‘यीशु-यीशु’ गाने के साथ वीडियो भी वायरल है। वह अपने साथी के साथ मिलकर भरतपुर में 20 हजार से ज्यादा लोगों का धर्मांतरण करा चुका था।
निष्कर्ष: राजस्थान में धर्मांतरण पर कब लगेगी लगाम, सरकार के सख्त कानून का कितना असर
राजस्थान में पिछले कुछ वर्षों में सामने आए ईसाई धर्मांतरण के मामलों से यह सवाल लगातार उठ रहा है कि राज्य में 10 महीने पहले लागू हुआ सख्त कानून के बावजूद ऐसी घटनाएँ क्यों नहीं रुक रही हैं। उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, श्रीगंगानगर, जयपुर, कोटा, अलवर और बीकानेर जैसे कई जिलों में अलग-अलग समय पर धर्मांतरण से जुड़े मामले सामने आए हैं। इन मामलों में कहीं जनजातीय समाज को आर्थिक मदद, इलाज, शिक्षा और रोजगार का लालच दिया गया, तो कहीं बच्चों को दूसरे राज्यों में ले जाकर पढ़ाई के नाम पर धर्मांतरण कराने की आशंका जताई गई।
इससे यह साफ है कि पुलिस जिन मामलों की जाँच कर रही है, वे केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं हो सकते, बल्कि इनके पीछे संगठित नेटवर्क होने की संभावना है।
इसी पृष्ठभूमि में उदयपुर सांसद डॉ. मन्नालाल रावत ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर पूरे मामले की जाँच NIA, CBI और IB जैसी केंद्रीय एजेंसियों से कराने की माँग की है। सांसद का तर्क है कि अगर बच्चों को राज्य से बाहर ले जाने, दूसरे राज्यों के मिशनरियों की भूमिका और विदेशी फंडिंग जैसे पहलुओं की निष्पक्ष जाँच करनी है, तो केवल स्थानीय पुलिस की जाँच पर्याप्त नहीं होगी। उनका कहना है कि यदि वास्तव में कोई अंतरराज्यीय या अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क सक्रिय है, तो उसकी परतें केंद्रीय एजेंसियां ही प्रभावी ढंग से खोल सकती हैं।
लेफ्ट-लिबरल जमात खुद को ‘बुद्धिजीवी’, ‘सहिष्णु’, ‘असहमति का सम्मान करने वाला’ और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा रक्षक’ बताता है। पर हल्की से भी आलोचना इनसे बर्दाश्त नहीं होती। जैसे ही ये आलोचना के दायरे में आते हैं, अपने वैचारिक विरोधियों के विरुद्ध भीड़ की हिंसा का भी समर्थन करने लगते हैं।
सोशल मीडिया पर एक वायरल वीडियो में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के दौरान जंतर-मंतर पर ABP न्यूज के रिपोर्टर के साथ धक्का-मुक्की और अभद्र व्यवहार करते प्रदर्शनकारी दिख रहे हैं। लेकिन इस घटना की निंदा करने की जगह वामपंथी जमात सोशल मीडिया पर हमले का समर्थन करते दिख रहा है।
वैसे यह वीडियो जून 2026 की शुरुआत का है। लेकिन 19-20 जुलाई को नीट (NEET) पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर CJP का प्रदर्शन तेज होने के बाद यह फिर से वायरल है।
वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि प्रदर्शन को कवर कर रहे एबीपी न्यूज के रिपोर्टर को प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने चारों ओर से घेर रखा है। भीड़ ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगा रही है। रिपोर्टर के साथ धक्का-मुक्की कर रही है। हूटिंग कर लगातार रिपोर्टिंग में बाधा डाल रही। रिपोर्टर को डराने-धमकाने पर उतारू यह ‘भीड़’ मॉब लिंचिंग जैसी स्थिति पैदा करने को आतुर दिख रही है।
इसके जिम्मेदार अंजना, रूबिका, चित्रा, सुधीर जैसे लोग हैं। भुगतना फील्ड रिपोर्टर को पड़ता है। इस बहादुर रिपोर्टर की सहनशीलता को नमन है, जिन्होने सारी आवाजों को इग्नोर कर अपने Work पर फोकस रखा। pic.twitter.com/EBQkC731Qz
सीजेपी (CJP) प्रदर्शनकारियों की इस गुंडई के फिर से वायरल होने के बाद लेफ्ट-लिबरल और बीजेपी विरोधी समूह ने इसे सही ठहराने की कोशिश की। 19 जुलाई को इस वीडियो को साझा करते हुए ‘द वायर’ की इस्लामी पत्रकार अरफा खानम शेरवानी ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “दुख हो रहा रिपोर्टरों की ये हालत देखकर। जब स्टार एंकर दिन-रात स्टूडियो में नफरत और मोदी का प्रोपेगेंडा फैलाएँगे तो फील्ड में कीमत जूनियर रिपोर्टर को चुकानी पड़ेगी।”
दुख हो रहा है रिपोर्टरों की ये हालत देखकर। जब स्टार एंकर दिन-रात स्टूडियो में नफ़रत और मोदी प्रोपेगंडा फैलायेंगे तो फ़ील्ड में क़ीमत जूनियर रिपोर्टर को चुकानी पड़ेगी। pic.twitter.com/IOIUe5GBDD
आरफा की यह टिप्पणी पीड़ित पत्रकार के प्रति उनकी सहानुभूति नहीं है। वह अपरोक्ष रूप से रिपोर्टर के साथ भीड़ की बदसलूकी को उचित ठहराने का प्रयास कर रही है। उस भीड़ को जो ‘फासीवादी सरकार’ के विरोध में प्रदर्शन करने का दावा कर रही है।
पत्रकार को टारगेट कर रहे सीजेपी प्रदर्शनकारी के एक अन्य वीडियो को लेकर ‘द हिंदू’ की डिप्टी एडिटर विजेता सिंह ने सोशल मीडिया पर लिखा, “नफरत फैलाने वाले टीवी एंकर/प्रजेंटर/वरिष्ठ पत्रकारों और टीवी रिपोर्टरों के बीच अंतर किया जाना चाहिए, क्योंकि इनमें अधिकतर बेहद परिश्रमी होते हैं।”
विजेता सिंह की यह टिप्पणी उन पत्रकारों के खिलाफ भीड़ की कार्रवाई को वैध ठहराने जैसी है, जिन्हें वह और उनके वैचारिक सहयोगी ‘नफरत फैलाने वाला’ मानते हैं। यह ‘भीड़ के न्याय’ का खुला महिमामंडन है, जबकि यही इस्लामी-वामपंथी समूह उस समय ऐसी घटनाओं की तीखी आलोचना करता है, जब भीड़ वैचारिक तौर पर उनसे सहमत नहीं होती।
People need to make a distinction between hate spewing TV news anchors/presenters/senior journalists and TV reporters, most of whom are extremely hardworking. https://t.co/xFHyJ8TR3U
आरफा खानम शेरवानी और विजेता सिंह की सोशल मीडिया पोस्ट पत्रकारों पर हमले या उन गंभीर खतरों के प्रति चिंता नहीं है, जिससे गैर-वामपंथी पत्रकार घिरे हैं। उनका मकसद शाब्दिक चतुराई के साथ भीड़ के हमले को जायज ठहराने का प्रयास है।
Blaming media for any next event has become a familiar tactic.
Journalists on the ground take the brunt of the anger simply for doing their jobs rather than following a dictated scriptwith hardly anyone taking a stand for them.#JantarMantar#CJPpic.twitter.com/LZLs2PPF4V
— Indian Reporters' Diary (@reporters_diary) July 19, 2026
हालाँकि विजेता सिंह की टिप्पणी की आलोचना शेखर गुप्ता जैसों ने भी की है। उन्होंने एक्स पर लिखा है, “विजेता, हम यह फैसला भीड़ पर नहीं छोड़ सकते कि वह किस पत्रकार से प्यार करे और किससे नफरत। हर पत्रकार, चाहे वह वरिष्ठ हो या जूनियर, अपना काम करते समय पूरी तरह सुरक्षित महसूस करे। एक भीड़ के लिए जो ‘अच्छा’ है, वही दूसरी भीड़ के लिए ‘बुरा’ हो सकता है। यह प्रवृत्ति अन्ना आंदोलन के दौरान शुरू हुई थी। उस समय भी कई लोगों ने इसका समर्थन किया था। लेकिन यह उस समय भी गलत था और आज भी गलत है।”
No Vijeta. We can’t leave it to the mobs to decide which journalist to love or hate. All journalists, senior or not, must feel entirely safe on the job. One mob’s good ‘guy’ is another’s monster. This trend began during Anna movement and many partisans cheered it. It was wrong… https://t.co/EetkuyoBPd
6 जून को जब एबीपी न्यूज रिपोर्टर के साथ हुइ घटना का वीडियो पहली बार वायरल हुआ था, तब कॉन्ग्रेस समर्थक एक सोशल मीडिया अकाउंट को सीजेपी प्रदर्शनकारियों की इस हरकत से ‘चरम सुख’ प्राप्त हुआ था।
ABP reporter getting booed by CJP protestors with crowd chanting "Godi Media Go back."
These Godi Media demonise all the voices that are raised against the Govt
एक अन्य पत्रकार सचिन गुप्ता ने भी इस घटना को अपरोक्ष रूप से सही ठहराने की कोशिश की। उन्होंने लिखा, “इसके जिम्मेदार अंजना, रूबिका, चित्रा, सुधीर जैसे लोग हैं। भुगतना फील्ड रिपोर्टर को पड़ता है। इस बहादुर रिपोर्टर की सहनशीलता को नमन है, जिन्होने सारी आवाजों को इग्नोर कर अपने काम पर फोकस रखा।”
परीक्षाओं में कथित अनियमितता और पेपर लीक के मुद्दे पर केंद्र सरकार, विशेषकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री के खिलाफ प्रदर्शन का दावा सीजेपी करती है। लेकिन इस प्रदर्शन के दौरान ‘आजादी-आजादी’ के नारे लगे हैं। हिंदू घृणा से सने कथित कॉमेडियन कुणाल कामरा जैसे इस प्रदर्शन को समर्थन के बहाने हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कर चुके हैं।
इस प्रदर्शन को कवर करने के दौरान ऑपइंडिया के पत्रकार अनुराग मिश्रा भी इसी तरह के अनुभव से गुजर चुके हैं। जब वह सीजेपी समर्थकों से उनकी माँगों को लेकर बात कर रहे थे तो उन्हें घेरकर प्रदर्शनकारियों ने ‘गोदी मीडिया’ के नारे लगाने शुरू कर दिए थे।
A few days ago, these cockroaches were abusing PM Modi for "not taking questions."
Now, the same cockroaches tried to heckle @OpIndia_com reporter for asking questions, while calling him "Godi Media."
अनुराग मिश्रा ने प्रदर्शनकारियों से केवल इतना पूछा था कि जब सीजेपी के सोशल मीडिया पर लाखों समर्थक होने का दावा किया जाता है, तो प्रदर्शन स्थल पर लोगों की संख्या इतनी कम क्यों है। इस सवाल से प्रदर्शनकारी नाराज हो गए और उन्होंने डराने-धमकाने की नीयत से नारेबाजी शुरू कर दी।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी का प्रदर्शन शुरू होने के बाद से कई पत्रकारों के साथ धक्का-मुक्की और बदसलूकी की घटना हो चुकी है। कई बार पुलिस को बीच-बचाव कर पत्रकारों को भीड़ से सुरक्षित निकालना पड़ा है। इन घटनाओं में एक समान पैटर्न देखने को मिला है। ‘गोदी मीडिया’ के नारे, पत्रकारों के सख्त सवालों पर गुस्सा, उन्हें घेर लेना और उनके साथ धक्का-मुक्की करना। ऐसे कई मामलों की रिपोर्ट ऑपइंडिया ने प्रकाशित की है। हालाँकि प्रदर्शन स्थल पर पुलिस बल की भारी मौजूदगी के कारण अब तक गंभीर हिंसा की स्थिति पैदा नहीं हुई है।
वामपंथी जमात ‘गोदी मीडिया’ का लेबल लगाकर उन पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को बदनाम करता है जो उनके भाजपा-हिंदू विरोधी नैरेटिव का समर्थन नहीं करते। इनका मानना है कि कोई पत्रकार तभी निर्भीक, पेशेवर और लोकतंत्र का पहरेदार माना जाएगा, जब वह वामपंथी वैचारिक लाइन का अनुसरण करें। ऐसा नहीं होने पर यदि उनकी सुरक्षा और गरिमा पर हमला होता है तो इसे वे ‘जनता का गुस्सा’, ‘वे इसके हकदार थे’ जैसी टिप्पणियों के जरिए जायज ठहराते हैं।
सीजेपी प्रदर्शनकारियों की भीड़ उन इस्लामी भीड़ से अलग नहीं है जो अतीत में पत्रकारों पर हमले में शामिल रही है। चाहे वक्फ संशोधन विधेयक के विरोध में प्रदर्शन हो, अवैध बूचड़खानों या गोहत्या पर सवाल उठाने का मामला हो, या ‘मुस्लिम विक्टिम’ नैरेटिव के विपरीत सवाल पूछने का मामला हो, पत्रकारों पर हमले हुए हैं।
वैसे कथित ‘गोदी मीडिया’ पत्रकारों के निशाना बनने पर लेफ्ट-लिबरल जमात की खुशी चौंकाती नहीं है। सीजेपी के इस प्रदर्शन में हम उमर खालिद जैसे लोगों के प्रति समर्थन भी देख चुके हैं जो 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों की साजिश रचने के आरोपित हैं। सनद रहे कि इस दंगे की शुरुआत भी कथित ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ से ही हुई थी।
इस्लामी-वामपंथी समूह का सिद्धांत सरल है- हमारी भीड़ अच्छी, आपकी भीड़ बुरी। जब उनकी भीड़ हिंसा करे तो वह ‘न्याय’ है और उनसे सहमति न रखने वालों की हिंसा ‘नफरत और असहिष्णुता’ है।
संदेश स्पष्ट है- हमारे सुर में सुर मिलाओ या चुप रहो। ऐसा नहीं करने पर ‘हमारी भीड़’ चुप करा देगी।
मध्य प्रदेश सरकार ने 19 जुलाई 2026 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई विशेष कैबिनेट बैठक में ‘समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026’ को मंजूरी दे दी। विधानसभा से पारित होने और अधिसूचना के बाद ये लागू होगा।
इस पर मोहन सरकार का कहना है कि इस बिल का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और पारिवारिक मामलों में समान नागरिक कानून लागू करना है। दिसंबर 2024 में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने UCC लागू करने की घोषणा की थी।
विधेयक में क्या-क्या प्रावधान है
इसके प्रमुख प्रावधानों में बहुविवाह पर प्रतिबंध, तलाक के लिए समान कानूनी प्रक्रिया, पुरुषों-महिलाओं में संपत्ति का समान अधिकार, उत्तराधिकार, विवाह का पंजीकरण गाँव के स्तर पर कराने और लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीकरण शामिल है। हालाँकि राज्य की जनजातीय आबादी को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है।
वैवाहिक व्यवस्था- सभी धर्मों और समुदायों में विवाह और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है, जिसे ग्राम स्तर तक लागू किया जाएगा। यूसीसी विधेयक में साफ कहा गया है कि किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होगा, लेकिन विवाह व्यवस्था पर पूरा जोर है।
बहुविवाह पर रोक लगाई गई है, हालाँकि इसमें राज्य के जनजातीय लोगों को इस कानून में अपवाद रखा गया है। उनपर यह कानून लागू नहीं होगा। इसके अलावा कोई भी पुरुष या महिला एक से अधिक विवाह तभी कर सकता है, जब तलाक हो गया हो या पार्टनर की मौत हो गई हो।
लिव-इन रिलेशनशिप- विधेयक में लिव-इन रिलेशनशिप में सख्ती बरती गई है। लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को अपना रजिस्ट्रेशन अनिवार्य रूप से कराना होगा। रजिस्ट्रेशन के बिना साथ रहने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। रजिस्ट्रेशन कराने के लिए एक महीने तक का वक्त दिया गया है। ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों को वैध माना जाएगा। साथ ही महिला और बच्चों के भरण-पोषण के अधिकारों को स्पष्ट किया किया गया है।
महिला-पुरुष समान अधिकार- प्रावधान में महिलाओं के अधिकारों को साफ किया गया है। संपत्ति में महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार देने की बात कही गई है। यहाँ तक कि उत्तराधिकार के मामले में भी उन्हें समान माना गया है। यानी बेटा और बेटी दोनों को समान अधिकार हैं, वहीं पति-पत्नी को भी बराबरी का अधिकार है।
तीन तलाक और हलाला निकाह पर रोक- इन प्रथाओं को पूरी तरह से गैरकानूनी और दंडनीय अपराध बनाया गया है। सिर्फ ‘तलाक, तलाक, तलाक’ कह देने से तलाक वैध नहीं होगा। तलाक के लिए कानूनी प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य होगा। इसी तरह निकाह हलाला पर ड्राफ्ट में रोक लगाई गई है। ड्राफ्ट में निकाह हलाला को अपराध की श्रेणी में रखने का प्रस्ताव है।
किन-किन लोगों ने मिलकर मसौदा तैयार किया
विधेयक का मसौदा तैयार करने से पहले सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अगुवाई में समिति का गठन किया गया। इसके 6 सदस्य थे। समिति में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी शत्रुघ्न सिंह, कानूनी विशेषज्ञ अनूप नायर, शिक्षाविद गोपाल शर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता बुद्धपाल सिंह शामिल थे। इसके अलावा सामान्य प्रशासन विभाग के अपर सचिव अजय कटेसरिया समिति के सचिव थे।
समिति ने उत्तराखंड और गुजरात जैसे राज्यों के यूसीसी मॉडल की गहराई से अध्ययन किया। इसके बाद मध्य प्रदेश की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए पूरा ड्राफ्ट बनाया। समिति को 60 दिनों के अंदर ड्राफ्ट बिल के साथ अपनी रिपोर्ट जमा करना था।
समिति ने जिला स्तर तक जनता से सुझाव लिया। समिति को करीब 9.58 लाख सुझाव मिले। सभी धर्मों से जुड़े सामाजिक संगठनों और राज्य के राजनीतिक दलों से बातचीत की, फिर विधेयक का मसौदा तैयार किया। मसौदे को मुस्लिम समाज का भी पूरा समर्थन मिला है। करीब 80 फीसदी मुस्लिम महिलाओं और 40 फीसदी मुस्लिम पुरुषों ने यूसीसी कानून लागू करने का समर्थन किया। अब मानसून सत्र में विधानसभा में इस विधेयक को पेश किया जा रहा है।
किन-किन राज्यों में यूसीसी लागू
गोवा देश का पहला राज्य है, जहाँ 1962 से ही पुर्तगाली नागरिक संहिता के रूप में यूसीसी लागू है। स्वतंत्र भारत में उत्तराखंड ऐसा पहला राज्य है जहाँ यूसीसी लागू किया गया। यहाँ 2024 में प्रस्ताव आया और जनवरी 2025 में यूसीसी को पूरी तरह लागू कर दिया गया। इसके बाद गुजरात विधानसभा ने मार्च 2026 में यूसीसी विधेयक पारित किया। असम भी यूसीसी विधेयक को लेकर चर्चा में रहा। यहाँ मई 2026 में असम विधानसभा ने यूसीसी विधेयक को मंजूरी दी।
इन सभी राज्यों के यूसीसी ड्राफ्ट में विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों के लिए सभी धर्मों के लिए एक समान नियम बनाए गए हैं। सभी राज्यों में लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही उनके जन्में बच्चों को मान्यता दी गई है।
पुरुष और महिला को संपत्ति में बराबरी का अधिकार देते हुए बेटे-बेटियों को उत्तराधिकार के रूप में समान हक दिया गया है। इसके अलावा यूसीसी लागू करने वाले सभी राज्यों ने स्थानीय अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों को इस कानून से छूट दी है।
इसका असर सबसे ज्यादा मध्यप्रदेश में देखा जाएगा, क्योंकि यहाँ कि कुल आबादी का पाँचवाँ हिस्सा जनजातीय समुदाय का है। वहीं उत्तराखंड में जनजातीय आबादी काफी कम है, फिर भी उनकी संस्कृति की रक्षा करने के लिए संरक्षण दिया गया है।
असम और गुजरात में भी वहाँ के डेमोग्राफिक्स और स्थानीय स्थिति के अनुसार जनजातीय समुदाय को संरक्षण दिया गया है। उत्तराखंड स्वतंत्र भारत का पहला राज्य है जहाँ यह पूर्ण रूप से लागू हो चुका है। यहाँ यूसीसी नियमावली और ऑनलाइन पोर्टल भी शुरू हो चुका है।
गुजरात, असम और मध्यप्रदेश में इसे विधानसभा से पारित करने या लागू करने की प्रक्रिया चल रही है। कार्यान्वयन शुरू हो चुका है। सभी राज्यों में लिव-इन रजिस्ट्रेशन और विवाह रजिस्ट्रेशन न करने पर जुर्माना लगाया गया है। लेकिन रजिस्ट्रेशन की अवधि और जुर्माना राज्यों के हिसाब से अलग- अलग है। असम में बहुविवाह को अपराधिक काम माना गया है, वहीं उत्तराखंड और गुजरात में इसे केवल सिविल अपराध हैं। उत्तराखंड में लिव-इन का 30 दिन में रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है, जबकि गुजरात में यह समय-सीमा 60 दिन है। सभी राज्यों में यूसीसी से अनुसूचित जनजातियों को बाहर रखा गया है।